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Wednesday, 5 February 2025

पदार्थ विद्या

                  पदार्थ विद्या क्या है ?
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पदार्थ - पद और अर्थ तथा दोनों का सम्बन्ध बताने वाली
            विद्या को 'पदार्थ विद्या' कहते हैं !

           'पद' वेद में हैं और 'अर्थ' लोक में हैं ! 

      परमात्मा पद देता पर अर्थ न देता तो पद का अर्थ कैसे होता ? और अर्थ देता पर पद न देता तो हम क्या कह कर बुलाते ?
      'अश्व' का अर्थ लोग घोड़ा करते हैं पर वास्तव में देखा जावे तो घोड़ा भी तो शब्द है ! शब्द का लक्षण महर्षि पतन्जलि ने इस प्रकार किया है-

       श्रोतोपलब्धिर्बुद्धिनिर्ग्राह्य: प्रयोगेणाभिज्वलित
       आकाश देश शब्द: !

     जो कानों से सुना जाये, जो बुद्धि से पकड़ा जावे, जो वाणी से प्रकट हो और जिसका आकाश में निवास हो उसे शब्द कहते हैं! इस लक्षण द्वारा विद्यालय में जो भी अर्थ बतलाये जाते हैं वे सब शब्द हैं !
शब्द और अर्थ में अन्तर : -
शब्द और श्रोत का वाणी का विषय है  । एक शब्द बोलता है और दूसरा शब्द सुनता है ! उच्चारण और श्रवण ये दोनों शब्द से सम्बन्ध रखते हैं परन्तु अर्थ व्यवहार की वस्तु है उच्चारण की नहीं, अतः जिसका वाणी से उच्चारण हो वह शब्द और जिसका वाणी से उच्चारण न हो सके वह अर्थ होता है !
     अश्व, घोड़ा, घोटक, हॉर्स, अस्प आदि भाषान्तर शब्द हैं और इनका अर्थ लोक प्रसिद्ध चतुष्पाद् विशेष हैं जो अश्वशाला में हिनहिना रहा है ।

   इस प्रकार समस्त पद वेद में हैं और अर्थ लोक में, इन दोनों के सम्बन्ध की विद्या को पदार्थ विद्या कहते हैं !
परमात्मा ने 'पद' प्रथम दिये या 'अर्थ' : -

🔥'पद' परमात्मा के ज्ञान में सदैव वर्तमान रहते हैं ज्ञान रूप से और अर्थ प्रकृति में सदैव वर्तमान रहते हैं अव्यक्त रूप से परमात्मा अपने अन्तर्निहित ज्ञान के अनुसार प्रकृति में आन्तरिक प्रक्रिया द्वारा अव्यक्त सृष्टि को व्यक्त करता है ! 
    इस प्रकार ज्ञान के अनुसार सृष्टि 'अर्थ' और 'अर्थ' के अनुरूप ही ज्ञान 'शब्द' प्रदान किये गये हैं इनको पृथक समझना अपनी नादानी नहीं तो क्या है !
इस विषय में एक दृष्टान्त दृष्टव्य है -
एक कुम्भकार ने मिट्टी से घड़े बनाये, कुम्भकार निमित्त कारण, मिट्टी उपादान कारण, घड़ा कार्य, मिट्टी में घड़े हैं पर अव्यक्त हैं कुम्भकार के ज्ञान में घड़े अव्यक्त हैं । कुम्भकार चेतन है उसके ज्ञान की सार्थकता तभी है जब अपने ज्ञान को मिट्टी के माध्यम से मूर्तरूप प्रदान करें! न तो अकेले कुम्भकार के ज्ञान से काम चल सकता है और न अकेले मिट्टी के घड़े से जो अव्यक्त हैं । कुम्भकार का घट ज्ञान मृतिका में मूर्तरूप धारण करके ही घट व्यवहार के योग्य हो सकता है !

    परमात्मा ने ज्ञानपूर्वक सृष्टि की, और सृष्टि परक वेद दिया है, दोनों के सम्बन्ध की विद्या को 'पदार्थ विद्या' कहते हैं । पदार्थ, यथार्थ, यथातथ्य, तथ्य शब्दों का अर्थ पद और अर्थ = पदार्थ (अर्थात्) यथा पदम्, तथा अर्थ: इति पदार्थ: जैसा शब्द वेद में वैसा अर्थ लोक में' इसको पदार्थ कहते हैं! क्योंकि 'यथा पदम्' का 'पदम्' शब्द और तथा अर्थ: का अर्थ शब्द! अर्थात् उभय शब्दों के आदि पद यथा और तथा का लोप करने पर पदार्थ शब्द निष्पादन हुआ ! 

     यथा और अर्थ = यथार्थ (अर्थात्) यथा पदम् तथा अर्थ: में पूर्व पद का अन्त्य शब्द पद और द्वितीय पद का आदि शब्द तथा वा लोप हो जाने से पदार्थ शब्द बना! अर्थ वही हुआ जैसा पद वैसा अर्थ ।
 यथातथ्य शब्द में भी यथा पदम् तथा अर्थ: दोनों पदों में अन्त्य पद लोप करके यथा और तथा इन दो शब्दों का 'यथातथ्य' बनाया गया अर्थ वही हुआ यथा पदम तथा अर्थ ।
    जैसा पद वैसा अर्थ ! 
    'तथ्य' शब्द में 'यथा तथा' में पदम् और अर्थ: का लोप आदि शब्द यथा का लोप करके तथा से तथ्य बना अर्थ हुआ वैसे का वैसा ! अर्थात् जैसा पद वैसा अर्थ ।
    इस प्रकार महर्षि दयानन्द ने महर्षि पतन्जलि के शब्दों में -
 'सिद्ध शब्दार्थ सम्बन्धे'  शब्द नित्य:, अर्थो नित्य:, अर्थो नित्य:, तयो सम्बन्धोsपि नित्य: ।
इस प्रकार शब्द राशि वेद और अर्थ राशि जगत् का नित्य सम्बन्ध है! इनको पृथक करके नहीं देखा जा सकता ।

      योगी योग द्वारा शब्दार्थ सम्बन्ध का परिज्ञान करता है! योगी के समाधिस्थ होकर शब्द और अर्थ अर्थात् वेद और लोक के सम्बन्ध का परिज्ञान करता हैं ।
इस बात का स्पष्टीकरण 'तर्क संग्रह' नाम्नी पुस्तिका में किया है -
आप्तवाक्यं शब्द: ! आप्तस्तु यथार्थवक्ता ! वाक्यं पदसमूह:!यथागामानय इति शक्त पदम्! अस्मात्- पदादयमर्थो बोद्धव्य इतीश्वरेच्छा सङकेत: शक्ति:।
इस पद से यह अर्थ जानना चाहिए इस ईश्वरेच्छा का नाम शक्ति है । इस सङ्केत का ज्ञान (यथार्थरूपेण) योगी समाधिस्थ होकर प्राप्त करता है ।
महर्षि दयानन्द ने भी समाधि में वे ही पद और अर्थ नित्य सम्बन्ध वाले सङ्केत प्राप्त किये ! तभी तो वेदार्थ में सृष्टिक्रम को प्रधानता प्रदान की ।
 'वेद और सृष्टि' एक ही कवि के दोनों काव्य हैं !
'काव्य' शब्द की व्युत्पत्ति कु शब्दे धातु से होती है,  कवि से काव्य शब्द तद्धित प्रत्ययान्त निष्पन होता है । 'कवेर्भाव: कर्म वा' काव्य हैं ! वा अव्यय च अर्थ में हैं। अर्थात् कवि का कर्म और भाव दोनों काव्य हैं। 
कवि का कर्म सृष्टि और भाव वेद दोनों ही परमात्मा कवि के काव्य हैं, अन्य समस्त विश्व के काव्यों में यह अन्तर है कि वे भाव रूप में किसी अन्य के हैं और कर्म रूप में किसी अन्य के (भाव और कर्म में समन्वयात्मक दृष्टिकोण नहीं है ) परन्तु वेद में ज्ञान और कर्म का पूर्ण समन्वय है !

        ✍️ दर्शनवाचस्पति आचार्य विश्वबन्धु शास्त्री 
     स्रोत- आर्यसमाज के दस नियमों की व्याख्या
                        प्रस्तुतकर्त्ता- रामयतन
                           वयं राष्ट्रे जागृयाम

समुद्र मंथन एक सनातन प्रक्रिया

            समुद्र मंथन एक सनातन  प्रक्रिया 

      समुद्र मंथन की पौराणिक कथा प्रसिद्ध हैं ‌।  प्रतीक रूप में देखे तो समुद्र-मंथन एक सनातन क्रिया हैं जो मानव सभ्यता के प्रांरम्भ से अब तक यह क्रिया निरंतर होती आई है, व्यक्ति के संदर्भ में भी और मानव समाज के संदर्भ में भी।
       समुद्र है ज्ञान का, जो अथाह है, अपार है। इसके मंथन से मूल्यवान उपलब्कियो और क्षमताओं के रत्न मिलते हैं। मंथन का अर्थ है अध्ययन, चिंतन मनन और (ज्ञान का) सृजन । मंथन किसी द्रव को चक्राकार घुमाने की क्रिया है। ज्ञान जल को भी चक्राकार रूप से मथना पड़ता है। पहले मोटी - मोटी बाते जानी जाती है फिर अर्जित जानकारी के परिप्रेक्ष्य में पहले सीखी हुई बातो का पुनरावलोकन किया जात्य है। यदि आवश्यक है हुआ तो पूर्व अर्जित धारणाओं में संशोधन किया जाता हैं।
विज्ञान के अध्ययन पर तो यह बात विशेष रुप से लागू होती है। 

          मंदरांचल पर्वत - विशालता का प्रतीक 
       समुद्र मंथन के लिए मन्दराचल (मंदार गिरी) को मथानी बनाए जाने का वर्णन हैं तो यहां पर्वत प्रतीक है विशालता का, ऊंचाई का और अचल बने रहने का। ज्ञान सिंधु मंथन के लिए बड़ी इच्छा शक्ति, उच्च आकांक्षा और अडिग निष्ठा की आवश्यकता होती है। इन गुणो को पर्वताकार लक्षण / लगन कह सकते हैं। 

वासुकी सर्प -  ज्ञान मंथन के सतत् प्रयत्न रस्सी का प्रतीक 
       अब देखिए रस्सी के रुप में वासुकी ( सर्प ) का उपयोग किया गया हैं।  सर्प लम्बा और कष्ट साध्य होता हैं तथा कुण्डली का आकार धारण करता है। तो यह प्रतीक हैं उस कष्ट साध्य प्रयत्न का जिसे अटल निष्ठा रुपी मंदरांचल  के इर्द गिर्द लपेट कर ज्ञान सिंधु का मंथन करना होता हैं।  प्रयत्न को कुण्डली की भांति चक्राकार रुप से नियोजित करना पड़ता हैं ताकि उसकी पकड़ अटल निष्ठा रुपी मंदरांचल ( ज्ञान प्राप्ति  के लिए अटल निष्ठा से संकल्पित व स्थिर मन ) पर ढ़ीली न पड़े।

कच्छप - ज्ञानी और अनुभवी सदगुरु रुपी आधार का प्रतीक 
        कथा में मंदरांचल को कच्छप ( कछुए) की पीठ पर टिकाने का वर्णन हैं।  कच्छप की पीठ कठोर होती हैं, और यह प्रायः समुद्र में तथा समुद्र किनारे पाये जाते हैं।
( वहीं का जीव हैं। ) आश्य हैं कि अनुभव ( ज्ञान सिंधु की तटवर्ती भूमि ) से उत्पन्न उन सुस्थापित ( सुदृढ़) सिद्धांतों और प्रमेयों से जो स्वयं ज्ञान का भाग हैं, उसी में विहित हैं - इनका वाहक सदगुरु होता हैं। ऐसे गुरु पर ही अपनी अटल निष्ठा टिका कर उसे अध्धयन ( मंथन ) का आधार बनाना पड़ता हैं । 

                        देवता और दानव 

      समुद्र मंथन देवता और असुर ( दानव ) मिलकर करते हैं। आश्य है दैवी और आसुरी वृत्तियां। मनुष्य में यह दोनों विद्यामान है। तथा ज्ञान मंथन हेतु दोनो की आवश्यकता होती है। दैवी गुण है त्याग निस्पृहता, आस्था, साधना, सत्यान्वेषण विनम्रता सौहार्द इत्यादी। आसुरी गुण है निशा-जागरण, घोर श्रम कुछ हद तक हठधर्मिता, तीव्र लालसा, उन्माद की सीमा तक (अध्धयन) में लिप्तता स्वयंऔर स्वजनों के प्रति अन्याय, काया का उत्पीड़न, तथ्यों का संग्रह, तांत्रिक-अभियोजन अपव्यय दुस्साहस इत्यादि। जीव विज्ञान के अध्ययन में जीव हिंसा भी करनी पड़ती हैं।
       इन दोनो प्रकार की गुणो मे उचित तालमेल की आवश्यकता होती है। ताकि जब एक प्रकार की प्रवृति को बढ़ाने की जरूरत हो तो दूसरे प्रकार की प्रवृतियाँ कुछ ढ़ीली पड़ जाए । जैसा कि मंथन में होता हैं। प्रयत्न रूपी सर्प में दो सिरे वे कारण है जिनसे प्रयत्न छूट सकता है। एक ओर भौतिक कठिनाइयां विपत्तियाँ, असफलता जनित हताशा आदि इनका प्रतीक सर्प का मुख है। इसे पकडे रहने के लिए दुस्साहस हठधर्मिता उत्कट इच्छा और उन्माद जैसे दानवीय गुण चाहिए। इसलिए कथा में सर्प का मुंह दानव‌ पकड़ते हैं। दूसरी ओर सांसारिक सुखो और पलायन वादिता की फिसलन (पूंछ)  है जहां से प्रयत्न छूटता है। इसे पकडे रहने के लिए निस्पृहता त्याग जैसे देवी गुण चाहिए अत: पूंछ देवता पकड़ते है। 

                             चौदह रत्न 

  ज्ञान सिन्धु मंथन से उपलब्धियों के जो रत्न मिलते है उन्हे चौदह श्रेणियों में रखा जा करता हैं - 

(१) लक्ष्मी ( धन की अधिष्ठात्री देवी) - समृद्धि एव संम्पन्नता (भौतिक और मानसिक) । शास्त्रों में विद्या को धन कहा गया है। मानव सभ्यता के संर्दभ में देखे तो जैसे-जैसे ज्ञान विज्ञान की उन्नति हुई हैं मानव समाज अधिक सम्पन्न हुआ हैं उनका जीवन स्तर ऊपर उठा है। 

(२) रंभा ( अप्सरा / गंधर्व ) - सुंदर गुणवान स्त्री-पुरुष का प्रतीक माना हैं। ज्ञान मंथन से समृद्धि प्राप्त मनुष्य को जीवन में गृहस्थ आश्रम हेतु सुंदर गुणवान मनोनुकूल जीवन साथी सहजता से प्राप्त हो जाते हैं । 

(३) कौस्तुकमणि - अलंकरण का प्रतीक । विद्या मनुष्य का आभूषण है। विद्वानों का मानना हैं कि विद्या से व्यक्ति अलंकृत होता हैं । 

(४) कल्पवृक्ष -  भांत- भांति के सुख देने वाला वृक्ष ।
ज्ञान विज्ञान की अनेक शाखाएं - प्रशाखाएं जिनसे वांछित फल मिलते हैं। ज्ञान मंथन से भी नयी नयी विधाएं पनपती हैं, विकसित होती हैं और इच्छित फल देती हैं। इसलिए इस ज्ञान रुपी समुद्र जल के मंथन से प्राप्त इस उपलब्धि को कल्पवृक्ष की उपमा दी गई हैं । 

(५) वारुणी - अभिमान का दंभ रुपी नशा । बहुधा मनुष्य को अपने ज्ञान पर अभिमान होने लगता हैं, जिसके कारण वह विवेक खो सकता हैं। अतः यह दुर्गुण वारुणी ( शराब ) हैं। 

(६) धनवंतरि (वैद्यराज) - रुग्ण मनोवृत्तियों को सुधारने का गुण ज्ञान मंथन से रुग्ण मानसिकता मनोवृत्तियां ठीक होने लगती हैं और सद्गुण ( स्वास्थ्य ) होता है। 
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार स्वस्थ मन से शरीर भी स्वस्थ अर्थात् रोगमुक्त रहता है। 

(७) चंद्रमा - सौम्य प्रकाश ( विवेक ) का प्रतीक हैं। विद्या को प्रकाश की उपमा दी गई हैं। यह प्रकाश प्रकृति के रहस्य देख पाने की दृष्टि प्रदान करता हैं। 

(८) कामधेनु - मन चाहा करने की क्षमता। कहते हैं कि कामधेनु से जब चाहो जितना चाहो दूध दुहा जा सकता हैं । ज्ञान मंथन से मनुष्य में वह क्षमता आ जाती हैं कि वह मन चाहा कर सकता हैं । 

(९) ऐरावत ( इंद्र का हाथी ) - मान-सम्मान, प्रतिष्ठा और उच्च पद का प्रतीक । ऋषियों और गुरुओं का स्थान शासक से भी ऊंचा होता हैं। ब्रह्मर्षि पद के सामने विश्वामित्र जी ने राजर्षि पद को नीचा समझा था । 

(१०) उच्चैश्रवा अश्व ( सात मुखों वाला घोड़ा ) - बल शक्ति शोर्य आदि सात गुणों का प्रतीक। ज्ञान के मंथन से बुद्धिबल, आत्मबल, तपोबल, मनोबल, नैतिकबल, बाहुबल (भौतिक बल ) और चरित्रबल ये सप्त-बल मनुष्य के पुष्ट होते हैं, इन्हें सात मुख वाला अश्व समझना चाहिए।
( टिप्पणी - उच्चैश्रवा - उपर की ओर मुख या चलने का अर्थ भी माने तो ज्ञान मंथन से मन की उर्ध्व गति होती हैं) 

(११) कालकूट विष - घातक शक्तियां (जैसे परमाणु बम आदि ) दूसरों को हानि पहुंचाने की क्षमता । इस पर समाज कल्याण की भावना (शिव तत्व) द्वारा नियंत्रण रखना चाहिए। कालकूट विष का शिव के द्वारा पान किये जाने का यही तात्पर्य हैं। 

(१२) शार्ड़्न्ग धनुष - ईश्वर का विष्णु नाम सृष्टि के पालन रक्षण और संचालन गुण के लिए प्रसिद्ध हैं । ज्ञान मंथन से उपलब्ध शार्ड़्न्ग धनुष उस क्षमता का प्रतीक हैं जो मानव समाज की सुरक्षा (असुरों से रक्षा ) करती हैं। इससे किसी भी अनिष्टकारी तत्व ( मानवता के शत्रु ) का निराकरण ( वेधन) किया जा सकता हैं। 
( जैसे - मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने राक्षसों का अंत किया) 

(१३) पांचजन्य शंख - नाद एवं उद्घोषणा का प्रतीक। ज्ञान से परिपूर्ण व्यक्तित्व के नाम वह प्रसिद्धि और प्रमाणिकता जिससे विद्वत्त समाज में आदर और सम्मान पूर्वक पढ़ी सुनी और मानी जाती हैं। ( जैसे - योगीराज श्रीकृष्ण की बात धर्मात्मा - विद्वत्त समाज में सुनी और मानी जाती थी ) ऐसी ज्ञान समुद्र के मंथन से प्राप्त यह उपलब्धि किसी-किसी को युवा अवस्था में मिलती हैं, परंतु अधिकांश को प्रायः मनुष्य जीवन आयु का बहुत समय बीतने के बाद मिला करती हैं । 

(१४) अमृत - वह उपलब्धि कालजयी रचना, कृति या अविष्कार जिससे व्यक्ति का नाम समाज में अमर हो जाता हैं। या जिससे समाज को अमृत तुल्य जीवन मिलता हैं । यह व्यक्ति को ज्ञान मंथन से प्राप्त चरम उपलब्धि हैं। इसलिए यह समुद्र मंथन में सबसे अंत में निकलता है - ज्ञान से भरा हुआ कुंभ (अमृत-कुंभ) पूर्णता का प्रतीक हैं। जिस पात्र (व्यक्ति) में यह अमृत होता है वह मानो हर दृष्टि से परिपूर्ण हैं।                      

                      अमृत के लिए संघर्ष 
       अमृत तुल्य ज्ञान का उपयोग देवता (दैवी गुण) अपने संवर्धन के लिए करना चाहते हैं, और दानव (आसुरी गुण) अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए। इसके लिए दोनों में छीना-झपटी होती हैं परन्तु विजय अंतत: देवत्व की होती हैं। देवता अमृत कुंभ लेकर भागते हैं तो पृथ्वी पर चार स्थानों ( कुंभ तीर्थों) पर यह अमृत छलकता हैं। 

       तात्पर्य यह है कि ज्ञान का अमृत लाभ चार प्रकार के स्थानों पर मनुष्य को प्राप्त हैं। ( हो सकता है ) एक दक्षिण पंथ ( दक्षिण पंथी रचनात्मकता ) में जहां देवत्व की गोदावरी बहती है । इसका प्रतीक "नासिक" हैं‌। दूसरा विशुद्ध ज्ञान के केंद्रों पर जहां तेज ( क्षिप्र ) गति से ज्ञान की अविरल धारा ( क्षिप्रा) बहती है। ( अर्थात जहां सक्रिय शोध कार्य होता हैं ऐसे शोध-संस्थानों पर ) इसका प्रतीक है "उज्जैन" । तीसरा जहां ज्ञान की शाखाओं (विधाओं) का त्रिवेणी संगम होता हैं। इसका प्रतीक है तीर्थराज "प्रयाग" । और चौथा वहां जहां ज्ञान -गंगा बौद्धिक ऊंचाईयों (हिमाचल) से उतर कर जन साधारण के कल्याण के लिए धरातल ( मैदान) पर प्रकट होती हैं । इसका प्रतीक हैं " हरिद्वार " । ये चारों प्रकार के स्थान कुंभ तीर्थ है । 

        दृष्टव्य हैं कि इन चारों स्थानों पर ज्ञान का प्रवाहमान होना आवश्यक हैं। ज्ञान तभी सार्थक होता हैं जब तक वह गति (प्रवाह) बनी रहती हो । रुका हुआ झील रुपी ज्ञान भले ही वह मानसरोवर जैसा विशाल और पवित्र ही क्यों न हो जनसाधारण को अमृत लाभ नहीं दे सकता।
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साभार - डॉ एम एल खरे (कादम्बिनी नवंबर १९९३)
                          वयं राष्ट्रे जागृयाम