भारत की आध्यात्मिक चेतना: एक शाश्वत यात्रा
भारत केवल एक भौगोलिक भूखंड या राजनीतिक सीमाओं से घिरा हुआ राष्ट्र नहीं है; यह एक जीवंत, स्पंदनशील और शाश्वत विचार है। युग युगों से संसार ने भारत को एक ऐसे केंद्र के रूप में देखा है जहाँ जीवन के भौतिक पक्ष के समानांतर, और उससे कहीं अधिक गहरा, एक आंतरिक पक्ष विकसित हुआ है। इस आंतरिक पक्ष को ही हम भारत की आध्यात्मिक चेतना कहते हैं। भारत को समझने के लिए भारत की अन्तश्चेतना को अर्थात भारत की आत्मा को समझना बहुत आवश्यक है।
आज के आधुनिक युग में जब 'अध्यात्म' शब्द का व्यवसायीकरण हो चुका है और इसे केवल कर्मकांडों, योग के आसनों, या संन्यास तक सीमित मान लिया गया है, तब यह समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि भारत के परिप्रेक्ष्य में वास्तविक आध्यात्मिक चेतना का वास्तविक अर्थ क्या है ? क्योंकि यह सत्य है कि बाहर जो कुछ होता हुआ दिखाई दे रहा है अर्थात अध्यात्म के नाम पर अथवा कर्मकांड और योग आसनों के नाम पर जो कुछ भी किया जा रहा है, वह सब कुछ भारत नहीं है, भारत तो उससे अलग है। मजबूत, सशक्त, समर्थ और सक्षम विचारों से भरा हुआ भारत जो हर किसी को अपनी आध्यात्मिक चेतना के माध्यम से उन्नति और प्रगति का संदेश देता रहा है और दे रहा है वास्तव में उसी भारत को समझना भारत की आत्मा के साथ संबंध स्थापित करना है। भारतीय वैदिक संस्कृति के संदर्भ में अध्यात्म कोई पलायनवाद नहीं है, बल्कि यह जीवन को उसकी समग्रता में जीने और सत्य के साथ एकाकार होने का विज्ञान है। यदि अध्यात्म पलायनवाद होता तो श्री कृष्ण जी पलायनवादी बने अर्जुन को कभी भी युद्ध के क्षेत्र में खड़े होकर गीता का उपदेश नहीं देते। उन्होंने धर्म को निष्काम भाव के साथ समन्वित कर अध्यात्म की भारतीय पवित्र परंपरा के साथ इस प्रकार प्रस्तुत किया कि उनका वह संदेश शाश्वत संदेश बन गया। सनातन बन गया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत का अध्यात्म हमारी उन्नति की एकमात्र गारंटी है।
आध्यात्मिक चेतना: शब्दार्थ और भारतीय दृष्टिकोण
अध्यात्म शब्द दो शब्दों के मेल से बना है — 'अधि' और 'आत्म', जिसका अर्थ है 'आत्मा के विषय में' या 'स्वयं के भीतर स्थित होना'। भारत की आध्यात्मिक परंपरा हमको अपने भीतर से जोड़ती है। जैसे फल भीतर से पहले पकता है बाहर बाद में गदराया हुआ दिखाई देता है। उसी प्रकार भारत का अध्यात्म हमको पहले भीतर से रंगता है। बाहर का रंग तो बाद में चढ़ता है।
पश्चिमी जगत में जिसे प्रायः 'रिलीजन' (Religion) या मजहब कहा जाता है, वह भारतीय 'धर्म' और 'अध्यात्म' से काफी भिन्न है। रिलीजन एक विशिष्ट पैगंबर, एक पवित्र पुस्तक और नियमों के एक समूह पर आधारित होता है। इसके विपरीत, भारतीय आध्यात्मिक चेतना किसी एक व्यक्ति या ग्रंथ से बंधी नहीं है। यह 'एकम सत् विप्रा बहुधा वदन्ति' (सत्य एक है, ज्ञानी उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं) के सिद्धांत पर चलती है। इसकी अनोखी विशेषता है कि उस एक की ही संतान यह संपूर्ण मानवता को और प्राणीमात्र को मानती है। यह सभी जीवधारियों को एक ही दिव्य ज्योति से ज्योतित मानती है। भारत की इस महानता को जो भी समझ लेगा या जिसने भी समझ लिया है उसी ने भारत के सामने अपने आप शीश झुका दिया है । उसे भारत शब्द में ही एक अनोखी शांति प्रस्फुटित होते हुए दिखाई देती है। जब दूर देश से चलकर कोई यात्री भारत भूमि पर आ जाता है तो यहां के कण कण में उसे शांति का वास दिखाई देता है। इसका एक कारण यह भी है कि जहां अरब के इतिहास में सर्वत्र भूगोल दिखाई देता है, खून खराबा दिखाई देता है, यूरोप के इतिहास में राजनीति दिखाई देती है, राजनीतिक हमले दिखाई देते हैं, वहां भारत की इतिहास परंपरा में सर्वत्र आध्यात्मिक चेतना दिखाई देती है। यही कारण है कि जहां दुनिया के अन्य देशों का हमें राजनीतिक इतिहास मिलता है वहीं भारत का सांस्कृतिक आध्यात्मिक इतिहास मिलता है। इसी को भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहते हैं।
वास्तविक आध्यात्मिक चेतना का अर्थ किसी अदृश्य ईश्वर की खोज मात्र नहीं है, बल्कि स्वयं के भीतर छिपे उस असीम चैतन्य का अनुभव करना है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। यह बुद्धि से ऊपर उठकर बोध के स्तर पर जीने की कला है।
भारत की इस महान चेतना को समझने के लिए हमें इसके उन वैचारिक और व्यावहारिक स्तंभों को देखना होगा जो हज़ारों वर्षों से अपरिवर्तित रहे हैं:-
1. अंतर्निहित एकता का बोध
भारतीय अध्यात्म का शिखर 'अद्वैत' दर्शन है। उपनिषदों का उद्घोष है — 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ही ब्रह्म हूँ) और 'तत् त्वम् असि' (वह तुम ही हो)। इस अवस्था को प्राप्त आत्मा अपने आप को परमपिता परमेश्वर के सानिध्य में अनुभव करती है। जैसे लोहा अग्नि के भीतर जाकर अग्नि रूप अर्थात लाल हो जाता है , परंतु उसका अस्तित्व फिर भी अलग रहता है। उसी प्रकार मोक्ष को प्राप्त आत्माओं को इस प्रकार की अनुभूति होती है । यद्यपि उस काल में भी उनका अस्तित्व अलग ही होता है। स्वामी दयानंद जी महाराज त्रैतवादी सिद्धांत के समर्थक थे। वह ईश्वर जीव और प्रकृति को अनादी और अमर मानते थे। शंकराचार्य जी अद्वैतवादी थे।
इस संदर्भ को सही दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है।
इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति (व्यष्टि) को अपने चिंतन और चेतना का विकास करना चाहिए और उसे इतनी ऊंचाई पर स्थापित करना चाहिए कि समष्टि उसके लिए परिवार बन जाए। जब एक व्यक्ति इस चेतना में जागता है, तो उसके भीतर से 'परायापन' समाप्त हो जाता है। वह हर जीव में, पेड़-पौधों में, और नदियों-पहाड़ों में उसी एक ही चेतना का विस्तार देखता है।
2. कर्म और उत्तरदायित्व का सिद्धांत
भारत की चेतना मनुष्य को भाग्य के भरोसे अकर्मण्य बनाना नहीं सिखाती। इसके विपरीत भारत की संस्कृति मनुष्यों को कर्मशील बने रहना सिखाती है। भगवद्गीता का निष्काम कर्मयोग इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।"
वास्तविक आध्यात्मिक व्यक्ति वह नहीं है जो संसार छोड़कर जंगलों में भाग जाए, बल्कि वह है जो संसार के बीच रहकर, अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी उनके परिणामों से अनासक्त (Unattached) रहे। कर्म को ही पूजा बना देना वास्तविक चेतना है। अपने कर्तव्य कर्म पर अर्थात अपने धर्म पर बिना राग द्वेष का भाव मन में ले जब ध्यान केंद्रित करके व्यक्ति कर्म करता है अर्थात अपने धर्म का पालन करता है तब वह निष्काम भाव का साधन बन जाता है किसी को भारत कहते हैं। श्री कृष्ण जी बार-बार अर्जुन को युद्ध क्षेत्र में भारत कहकर पुकारते हैं। इसका एक अर्थ यह भी है कि श्री कृष्ण जी अर्जुन को निष्काम बना देना चाहते हैं। भारत की उस आध्यात्मिक चेतना से जोड़ देना चाहते हैं जो हर कदम पर हमें निष्काम कर्म करने की शिक्षा देती है अर्थात प्रकाश के बड़े ऊर्जा स्रोत से जोड़ने के लिए ही श्री कृष्ण जी अर्जुन को बार-बार भारत कह रहे हैं। उसे बता रहे हैं कि तू ज्ञान की दीप्ति में रत हो जा... भारत हो जा।
3. पुरुषार्थ चतुष्टय: जीवन का संतुलन
भारतीय ऋषियों ने जीवन को पूरी तरह से स्वीकार किया।
इसलिए उन्होंने जीवन का बहिष्कार नहीं किया। जीवन को बोझ नहीं समझा। जीवन का तिरस्कार भी नहीं किया बल्कि जीवन को एक पुरस्कार के रूप में ग्रहण किया। परमपिता परमेश्वर की एक बेजोड़ नेमत के रूप में ग्रहण किया। जनसाधारण को यह कहकर जीवन का सम्मान करने के लिए प्रेरित किया कि मानव जीवन को प्राप्त करने के लिए तो देवता भी तरसते हैं। इसलिए परमपिता परमेश्वर की इस नेमत का सम्मान करो। यही कारण रहा कि भारत में आत्महत्या को पाप माना गया है।
भारतीय संस्कृति के कुशल शिल्पकार ऋषियों ने जीवन के चार लक्ष्य निर्धारित किए:
धर्म: नैतिक मूल्य और कर्तव्य, जीवन की वह सबसे सुंदर व्यवस्था जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है और अन्य जीवधारी के प्रति उसका कर्तव्य निर्धारित करती है।
अर्थ: भौतिक समृद्धि और धन
काम: इच्छाएँ और आनंद
मोक्ष: परम स्वतंत्रता और आत्म-साक्षात्कार
भारतीय अध्यात्म धन या इच्छाओं का निषेध नहीं करता, बल्कि यह सिखाता है कि अर्थ और काम को 'धर्म' के दायरे में रहकर जिया जाए, ताकि अंतिम लक्ष्य 'मोक्ष' (मुक्ति) प्राप्त हो सके। यह जीवन का एक अत्यंत व्यावहारिक और संतुलित दृष्टिकोण है। अर्थ और काम को धर्म के अनुकूल बनाकर चलना जीवन की सबसे ऊंची साधना है। इसी साधना की ऊंचाई का नाम भारत है। समझो सारा भारत एक पिरामिड का रूप ले चुका हो और उसके सर्वोच्च शिखर पर हम सब पहुंच कर एक साथ गोलाई घूम रहे हों। हम गतिशील हैं। हम घूम रहे हैं। परंतु बिना किसी दूसरे को चोटिल किए हुए घूम रहे हैं। वास्तव में यह स्थिति धर्म की गति है। यही स्थिति धर्म चक्र का घूमना है। जब यह स्थिति प्रत्येक जन के भीतर समाविष्ट हो जाती है, तब वह भारत का उत्तराधिकारी बन जाता है।
इतिहास के झरोखे से: चेतना का विकास क्रम
भारत की आध्यात्मिक चेतना कोई स्थिर वस्तु नहीं है, यह एक बहती हुई नदी की तरह है। जिसने समय के साथ नए रूप धारण किए, लेकिन अपना मूल स्वभाव कभी नहीं बदला। अनेक झंझावात आए अनेक प्रकार की बाढों ने इसका स्वरूप बिगाड़ने का प्रयास किया । इसके प्रवाह को बदलने का प्रयास किया परंतु भारत था कि वह बदला नहीं उसकी आत्मिक पवित्रता निरंतर बनी रही। उसकी आध्यात्मिक चेतना अपने मौलिक स्वरूप में सतत प्रवाहमान बनी रही।
वैदिक और उपनिषद काल: भारत का वैदिक काल भारत की आध्यात्मिक चेतना का भोर था। इस काल में ऋषियों ने प्रकृति के रहस्यों को समझने और आंतरिक खोज के माध्यम से 'ऋत' की स्थापना की। ऋत अर्थात ब्रह्मांड की व्यवस्था को समझकर उसके अनुरूप मनुष्य को ढालने का प्रयास किया। उपनिषद काल में ऋषियों ने भारत की इसी आध्यात्मिक परंपरा को आगे बढ़ाया और शुद्ध निर्मल वैदिक ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने का एक आंदोलन खड़ा किया । उनका एक ही चिंतन था कि यदि वैदिक चिंतन नष्ट भ्रष्ट हो गया तो भारत की आध्यात्मिक परंपरा नष्ट भ्रष्ट हो जाएगी। महात्मा बुद्ध ने अपने समय में भारत की वैदिक परंपरा के नष्ट भ्रष्ट होने को रोकने के लिए अनेक प्रकार के प्रयास किये। यह अलग बात है कि उनके अनुयायियों ने आगे चलकर एक अलग मत बना लिया। यही स्थिति महावीर जी की रही। आगे चलकर भक्ति आंदोलन के संतों ने भी भारत के प्राचीन आध्यात्मिक गौरव को बनाए रखने का काम किया। यद्यपि उनका बौद्धिक स्तर उपनिषद कालीन ऋषियों के बौद्धिक स्तर से बहुत नीचे का रहा परंतु प्रयास फिर भी अच्छा था। इस काल में जितनी गिरावट आई उसके उत्थान और उद्धार के लिए स्वामी दयानंद जी महाराज का आगमन हुआ। उन्होंने भारत को भारत के वास्तविक स्वरूप में पहचानने का वंदनीय कार्य किया। बहुत दिनों की संघर्ष गाथा से निकले भारत को वास्तविक स्वरूप में पहचानना उस समय लगभग असंभव हो गया था। क्योंकि भारत के चेहरे पर उस समय तक काल के थपेड़ों की इतनी धूल पड़ चुकी थी कि उसे साफ करना तक संअभव दिखाई देता था।
स्वामी जी ने भगीरथ प्रयास किया और देश के लोगों को देश के लिए मर मिटने की प्रेरणा प्रदान की। इस कार्य के लिए उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की। आर्य लोगों को राष्ट्र रक्षा का पवित्र दायित्व सौंपा । उन्हें बताया कि तुम्हें भारत को भारत के सही स्वरूप में स्थापित करना है। यदि भारत सही स्वरूप में स्थापित हो जाता है तो प्रत्येक प्रकार के कष्ट क्लेशों का अंत होना निश्चित है। .... और यही हुआ।
आर्यों का परिश्रम अभी भी रुका नहीं है.... यह निरंतर जारी है और जारी रहेगा।
डॉ राकेश कुमार आर्य
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)