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Saturday, 14 March 2026

भली प्रकार से स्त्रियों को दूषित होने से बचाने के लिये हर संभव उपाय करना चाहिये।

√●●पुरुष को कुण्डली में सप्तम भाव स्त्री का है। स्त्री हर प्रकार से पुरुष की सेवा करती है। इसलिये,【 स्त्री =श्री】 स्त्री की कुण्डली में सप्तम भाव पुरुष का है। पुरुष भी स्त्री की सेवा करता है। इसलिये【, पुरुष = श्री】। अतः श्री = सेविका / सेवक। स्त्री का सेवक होता है, पुरुष पुरुष की सेविका होती है, स्त्री। जिस पुरुष के पास श्री स्त्री सेविका है, वह श्रीमान् है। जिस स्त्री के पास श्री= पुरुष = सेवक है, वह श्रीमती है। जो श्रीमान् है, यह सुखी है जो श्रीमती है, वह सुखी है जो सुखी नहीं है, वह श्रीमान/श्रीमती नहीं है। विवाहित / युगल रूप में होते हुए भी वह नाममात्र का श्रीमान् / श्रीमती है।

√●●कौन श्रीमान् है ? जिसके पास सेवा करने वाली सुख देने वाली हर प्रकार से तुष्ट करने वाली स्त्री है, वह श्रीमान है। कौन श्रीमती है ? जिसके पास सेवा करने वाला, सुख देने वाला हर प्रकार से तुष्टि देने वाला पति है, वह श्रीमती है। जिस पुरुष के पास स्त्री नहीं है, वह श्रीमान् नहीं है। जिस स्त्री के पास पुरुष नहीं है, वह श्रीमती नहीं है। यहाँ श्रीमान/श्रीमती का अर्थ है-सुखी जो सुखी नहीं है, वह पुरुष श्रीमान् नहीं है तथा वह स्त्री श्रीमती नहीं है भले ही ये विवाहित/ दाम्पत्य युक्त हों।

√●● क्या अविवाहित/ अकेले पुरुष-स्त्री श्रीमान्-श्रीमती नहीं है ? क्यों नहीं ? जो अपने आप में अपनी स्थिति से सन्तुष्ट है वह पुरुष निश्चय हो श्रीमान है।

 शंकराचार्य कहते हैं ...
"श्रीमांश्च को ? यस्य समस्त तुष्टः ।"
               ( प्रश्नोत्तरी)

√● ऐसे ही स्त्री के विषय में समझना चाहिये। जो असन्तुष्ट नहीं है, पूर्ण सन्तुष्ट है अपने जीवन से, वह श्रीमान् वा श्रीमती है। श्रीमान/श्रीमती होने का अर्थ है, सुखी होना। कहा गया है- 'सन्तोष परमम् सुखम्।'

श्री का अर्थ है- धन, सम्पत्ति जिसके पास धन सम्पत्ति है, यह श्रीमान/श्रीमती है। "धनात् धर्मः ततः।" धन से धर्म होता है। धर्म से सुख मिलता है। धनवान् पुरुष श्रीमान् है। धनवती स्त्री श्रीमती है। सुखम् धन से पुरुष, स्त्री प्राप्त करता है। धन से ही पुरुष वस्त्राभूषणों से स्त्री की सेवा करता है। धन से ही स्त्री. पुरुष को पाती है। जो धनी नहीं है, वह चाहे स्त्री हो वा पुरुष, उसका विवाह नहीं होता, उसके घर नहीं होता, उसके नौकर-चाकर नहीं होते। अतः वह सुखी नहीं होता। ऐसे पुरुष-स्त्री श्रीहीन किंवा दरिद्र होते हैं। सबसे बड़ा धन है, आत्मा जो श्रीधरः श्रीकरः श्रीमान् (श्रीधरी श्रीकरी, श्रीमती) है। ऐसे जन को मेरा प्रणाम ।

√●●श्री कहते हैं, उपस्थ (लिंग व योनि) को पुरुष अपने उपस्थ से स्त्री की सेवा करता है, स्त्री को सन्तुष्ट रखता है। इसी प्रकार, स्त्री अपने उपस्थ से पुरुष की सेवा करती है, पुरुष को संतुष्ट रखती है। इसलिये उपस्थ = श्री। जिसके पास उपस्थ नहीं है, वह श्रीहीन है, शोभाहीन है, अनाकर्षक है। पण्ड वा नपुंसक जातक श्रीविहीन होता है, तुच्छ होता है, असम्मान्य होता है। उपस्थ का होना और उसका सक्रिय वा जागृत रहना महत्वपूर्ण है। इसमें पुरुष और स्त्री दोनों की शोभा है। उपस्थ की शिथिलता/निष्क्रियता के साथ हो पुरुष स्त्री का सौन्दर्य जाता रहता है- दोनों श्रीहीनता को प्राप्त होते हैं। कृष्ण नहीं तो कुछ नहीं। यह उपस्थ कृष्ण है। यह सबको संकर्षित करता है। तस्मै संकर्षणाय नमः ।

√●●"उपस्थ" का अर्थ है- उपनिषद् । इस प्रकार सप्तम भाव उपनिषद् हुआ। यह कैसे ? उप + स्थ= उप + निषद् । स्था + क = स्थ। इसका अर्थ है- विद्यमान, वर्तमान, ठहरने वाला, खड़ा रहने वाला। नि + सद् निपद इसका अर्थ है- विश्राम करना, नीचे बैठना, लेटना, ठीक से स्थित होना।

√●● "इस उपसर्ग का अर्थ निकटता / समीपता से है। उपस्थ का अर्थ हुआ- समीप ठहरना, निकट रहना, संटे रहना, लग्न होना, लगे रहना। उपनिषद् का भी यही अर्थ है-निकट बैठना, समीप स्थित होना ।"

√● 【अतएव, उपस्थ = उपनिषद्। उपनिषद् नाम ब्रह्मविद्या का ब्रह्मविद्या गुह्यज्ञान है।】

√●●निकट आने से गुह्य ज्ञान होता है। यहाँ निकटता का तात्पर्य हृदय की निकटता अर्थात् प्रेम से है। शिष्य को जब गुरु का सामीप्य प्राप्त होता है तो उसे ब्रह्मविद्या का बोध होता है। पुरुष व स्त्री जब एक दूसरे के हृदय में प्रवेश करते हैं तो उन्हें गुह्यज्ञान होता है। उपनिषद् जितना गूढ़ है, उतना ही गूढ़ उपस्थ है। जी उपनिषद को जानता है, वह उपस्थ को जानता है। जो उपस्थ को जानता है, वह उपनिषद् को जानता है। जो उपनिषद् का अधिकारी है, वह उपस्थ का अधिकारी है। जो उपस्थ का अधिकारी है, वह उपनिषद् का अधिकारी है। दोनों में आनन्द है। यह आनन्द दोनों में प्रच्छन्न रूप से विद्यमान है। उपनिषद् में उपस्थ की चर्चा है। वेद में उपस्थ का वर्णन है। उपस्थ का आनन्द ही उपनिषद् का आनन्द है। तस्मै आनन्दाय नमः ।

√●●जब किसी की यज्ञस्थली में कोई दूसरा होम करे तो उस यज्ञस्थल के अधिपति श्रोत्रिय को क्या करना चाहिये ? उपनिषद् कहता है...

"अथ यस्य जायायै जारः स्यात्तं चेविष्यादामपात्रेऽग्निमुप- समाधाय प्रतिलोमं 
शरबर्हिस्तीव तस्मिन्नेताः शरभ्रष्टः प्रतिलोमाः 
सर्विषाक्ता जुहुयान्मम समिद्धेऽहीषीः प्राणापानौ त
 आददेऽसाविति मम समिद्धहौषीः पुत्रपशूं स्त 
आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त
 आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीराशायराकाशौ त
 आददेऽसाविति वा एष निरिन्द्रियो
 विसुकृतोऽस्माल्लोकात्यैति यमेवं विद्ब्राह्मणः शपति तस्मादेवंविच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोपहासमिच्छेदुत हि एवं वित्परो भवति ।" 
(बृहदारण्यक उपनिषद् ६ । ४ । १२ )

अथ यस्य जायायै जारः स्यात् तम् चेत् द्विष्यात् । आमपात्रे अग्निम् उप-समाधाय प्रतिलोमम् शरबर्हिः तीर्त्वा तस्मिन् एताः शरभृष्टीः प्रतिलोमाः सर्पिषा अक्ताः जुहुयात् । 

√●●【और यदि जिसकी भार्या का कोई गुप्त प्रेमी/भोक्ता होवे तो वह उससे द्वेष करे। मिट्टी के कच्चे पात्र में अग्नि को स्थापित कर प्रदीप्त कर, शररूप नुकीले कुशा को फैला कर उस (अग्नि) में इन शरभृष्टियों (सरकण्डे/ कुशा की अधजली तीलियों) को उल्टी ओर से (फैलाकर) घी से तर कर के हवन करे ।】

√● १. मम समिद्धे अदोषी: प्राण-अपानी ते आददे असौ इति [मेरी प्रदीप्त अग्नि (भार्या की योनि में) जिसने हवन किया (वीर्यपात किया है, उस (अमुक व्यक्ति पुरुष) के प्राण और अपान को मैं खींचता हूँ । 'ते' पद के स्थान पर जार का नाम लेवे तथा 'असौ' पद के स्थान पर अपना नाम लेवे ॥] 

√●२. मम समिद्धे अहौषीः पुत्र पशून् ते आददे असौ इति 
【मेरी प्रदीप्त यज्ञशाला की अग्नि में अर्थात् ऋतुस्नाता मेरी भार्या की योनि में तूने अपने वीर्य का हवन किया है, इसलिये मैं तेरे पुत्र एवं पशुओं को लेता (मारता हूँ। यह कह कर अग्नि में उन तिनकों की दूसरी आहुति दे।】

 √●३. मम समिद्धे अहोचीः इष्टा सुकृते ते आददे असौ इति ।

[उस तूने मेरी प्रदीप्त अग्नि में होम किया है-मेरी भार्या का भोग किया है, उसके दण्ड में मैं तेरे यज्ञ और पुण्यकर्म को लेता हूँ, नष्ट करता हूँ। यह कहकर उन कुशों की तीसरी आहुति दे।]

√● ४. मम समिद्धे अहौषीः आशा पराकाशी ते आददे असौ इति ।

 【 उस तू ने मेरी प्रदीप्त अग्नि में हवन किया है-मेरी भार्या के साथ व्यभिचार किया है, उसके दण्ड में तेरी आशा और प्रतीक्षा (आकांक्षा) दोनों को लेता हूँ, ध्वस्त करता हूँ। यह कह कर कुशखण्डों से तीसरी आहुति डाले】 

√●सः वै एषः = वही यह व्यभिचारी। निरिन्द्रियः =इन्द्रिय बल से रहित। विसुकृतः = पुण्यफल से वंचित । अस्मात् लोकात् = इस लोक से। प्रैति (प्र + एति) = चला जाता/मर जाता है। यम्= जिसको ।एवंविद् = इस प्रकार (की प्रक्रिया को) जानने वाला। ब्राह्मण = श्रोत्रिय ब्राह्मण। शपति =शाप देता है।

√● [ वह ही यह व्यभिचारी जार, जिसको ऐसा जानने वाला ब्राह्मण शाप देता है, इन्द्रियहीन (निर्बल) और शुभकर्म रहित होकर इस लोक से चला जाता है-मर जाता है।]

√● तस्मात् = इसलिये । एवंवित् श्रोत्रियस्य= इस रहस्य वा प्रक्रिया को जानने वाले वेदज्ञ ब्राह्मण  की। दारेण = पत्नी से ।न = नहीं। उपहासम् = अश्लील हंसी विनोद। इच्छेत् = (करने की इच्छा करे। उत हि = क्योंकि। एवंवित्= ऐसा ज्ञानी ब्राह्मण ।परः अत्यधिक पराया (शत्रु)। भवति = हो जाता है। 

√●【 इस कारण ऐसे ज्ञानी वेदपाठी की पत्नी से (कोई व्यक्ति) उपहास की इच्छा न करे, न सोचे। क्योंकि निश्चय ही ऐसा ज्ञानी ब्राह्मण पर श्रेष्ठ / उत्कृष्ट / सामर्थ्यशाली होता है। बलशाली से शत्रुता नहीं करना चाहिये। यह नीति है।】

√●●पूर्व वर्णित बृहदारण्यक उपनिषद् के इस मन्त्र समुच्चय में एक प्रक्रिया बतायी गयी है। इसका ज्ञान एक श्रोत्रिय ब्राह्मण को होना चाहिये। जब कोई किसी गृहस्थ का सुख छीनता है-उसकी भार्या को बहला फुसला कर उसका भोग करता है-उसकी जाया को लोभ लालच देकर अपना भोग्य बनाता है-उसकी पत्नी को भयभीत करते हुए उसका शील लूटता है-उसकी दारा के साथ बलात्कार करता है-उसकी अर्धांगिनी का अपहरण कर उसके साथ व्यभिचार करता है-उसका मान भङ् करता है-उसकी योनि की पवित्रता को नष्ट करता है तो वह गृहस्थ इसे सहन नहीं करता । श्रोत्रिय ब्राह्मण के पास बाहुबल नहीं होता, धनबल नहीं होता, केवल बुद्धिबल होता है और वह इसी का प्रयोग अपने उस सुखहर्ता जार पर करता है। इस प्रयोग से लाठी भी नहीं टूटती, साँप भी मर जाता है। पत्नी का जार पति का शत्रु होता ही है। अपने शत्रु को ध्वस्त करना नीति है। प्रकृति एवं सामर्थ्य के अनुसार इस नीति को अपनाना धर्म है। इसलिये शत्रु को समूल उखाड़ फेंकने के लिये उपनिषद्कार ऋषि ने इस आभिचारिक प्रयोग का निदेशन किया है। यह ऋषिनिदेशित प्रशस्त मार्ग करणीय है।

√★★ जब जातक की कुण्डली में सप्तम भाव और उसका कारक दूषित हो तो उसकी पत्नी निश्चय ही उपपति (जार) रखेगी- व्यभिचारिणी होगी। जब पत्नी की कुण्डली में व्यभिचारपरक योग हो तो वह स्वी निश्चय ही स्वभाव से जार प्रिया होगी। ऐसी दशा में जातक पति को चाहिये कि वह यह प्रयोग न करे। अपितु पत्नी को त्याग दे, उसके जार को दे दे। किन्तु, यदि ऐसा योग न हो सचमुच उसकी पत्नी को ठगा जा रहा और उसे धोखे में रखा जा रहा हो तो उसे यह प्रयोग अवश्य करना चाहिये। अपने शत्रु पर यह प्रयोग एक अप्रत्यक्ष प्रहार है और नितान्त निरापद है। संत्रस्त गृहस्थ इसे अवश्य करे। 

√★【अब पूर्वोक्त अभिचार कर्म का स्पष्टीकरण करता हूँ। 】

√★जिस गृहस्थ विद्वान की पत्नी का कोई उपपति हो और वह गृहस्थ उसके उपपति से द्वेष करता हो तो उसे उस जार के सर्वनाश के लिये अभिचार कर्म का समारंभ करना चाहिये। इसके लिये वह मिट्टे के कच्चे वर्तन में संस्कारपूर्वक अग्नि स्थापित करे। अग्नि स्थापित करके सारी क्रिया विपरीत क्रम से करे। यथा- ईशान से अग्नि कोण की ओर दक्षिणाम या पश्चिमाम भाव से बर्हियों का परिस्तरण करे। अर्थात् कुश, कास वा सरपत (करकण्डों) का नुकीला भाग दक्षिण वा पश्चिम दिशा की ओर करके उन्हें फैलावें । उस प्रस्थापित अग्नि में इन बाणाकार नुकीली सरकण्डों की सीकों का प्रतिलोम (दक्षिणाप वा पश्चिमाप) भाव से ही रखते हुए घी में भिगो कर उनकी आहुति दे आहुति देते समय इस प्रकार का भाव मन में रखे ...

√★अमुक नाम वाले हे जार !!! सम्भोग के योग्य रूप यौवन से युक्त मेरी पत्नी की योषाग्नि में तूने अपने वीर्य की अहुति दी है, अतः अमुक नाम वाला मैं तेरे प्राण और अपान का हरण करता हूँ-तेरे श्वास-प्रश्वास की गति का उच्छेद करता हूँ-तुम्हें निर्जीव करता हूँ। पहिली आहुति में ऐसा कहे। इसी प्रकार, दूसरी तीसरी और चौथी आहुतियों में क्रमशः यह कहें मैं तेरे पुत्र और पशुओं का हरण करता हूँ; मैं तेरे इष्ट और सुकृत का हरण करता हूँ; मैं तेरी आशा और प्रत्याशा का हरण करता हूँ। इन चार आहुतियों के चार मंत्र ये हैं ।

√★१. मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानौ त आददे।

√★ २. मम समिः पुत्रस्त आददे ।

√★ ३. मम समिद्धेषी अष्टाक्ते आददे ।

√★४. मम समिद्धे$हौषी आशापंराकाशौ त आददे। 

√●इन मंत्रों को पढ़ कर 'फट्' शब्द का उच्चारण करके आहुतियाँ डालें। प्रत्येक आहुति के अन्त में 'असौ मम शत्रु' कहें। असौ पद के स्थान पर शत्रु का नाम लें।

√●● ऐसी अभिचार क्रिया को जानने और करने वाला विद्वान जारकर्मा व्यभिचारी के लिये पराया वा शत्रु होता है। अतः ऐसे व्यक्ति की भार्या से समागम करने की बात तो दूर हास-परिहास भी नहीं करना चाहिये। क्योंकि ऐसा विद्वान जिसे शाप देता है, वह विसुकृत- पुण्यकर्मशून्य हो इस लोक से चल बसता है। अतः परस्त्रीगमन के ऐसे भीषण परिणाम को जानने वाला पुरुष कभी भी श्रोत्रिय ब्राह्मण की पत्नी की ओर आँख उठाकर देखे तक नहीं। इसी में उसका भला है। 

√●【 इस अभिचार कर्म में मात्र चार उपकरण हैं ।】

√★१. समिद्ध अग्नि = प्रज्ज्वलित/ प्रदीप्त अग्नि । 

√★२. श्रोत्रिय ब्राहम्ण = वेदज्ञ/विद्वान् ब्राह्मण ।

 √★३. सर्पिस / सर्पिषु = पिपलाया हुआ घी।

√★ ४. बर्हिस्/बर्हिष्= नोकदार/ तीक्षण कुशा।

 √●●ये चारों पवित्र हैं। पवित्र अग्नि की ज्वाला में पवित्र श्रोत्रिय द्वारा पवित्र घृत युक्त/ सिक्त कुशा की आहुति से यह कर्म पवित्र उद्देश्य से किया जाता है। अतः अभिचार होते हुए भी यह प्रशस्त है, धर्म सम्मत है, ऋषि-स्वीकार्य है। इसीलिये यह उपनिषद् में संग्रहीत है, प्रस्थापित है।

√●● परदारागमन करने वाले पुरुष को मारने के लिये अभिचार के प्रयोग का प्राविधान शास्त्र करता है। परन्तु परपुरुषगमिनी स्त्री को मारने की अनुमति शास्त्र नहीं देता। शास्त्रों में स्त्री को सदैव अवध्य कहा गया हैं। स्त्री को रत्न माना गया है। इसकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये। परपुरुष द्वारा दूषित स्त्री ऋतुस्नान के बाद शुद्ध समझी जाती है। स्त्री से वंश परम्परा चलती है। इसमें परपुरुष के वीर्य की आहुति पड़ने से जो सन्तान उत्पन्न होती है, उससे कुल धर्म नष्ट हो जाता है। अतः कुल धर्म की रक्षा के लिये उसी वर्ण वा कुल के श्रेष्ठ पुरुष द्वारा नियोग की अनुमति शास्त्र देता है। कुल का क्षय नहीं होने देना चाहिये।

√●●क्योंकि, 

"कुलक्ष्ये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
 धर्मे नष्टे कुलं कृलनमधर्मोऽभिभवत्युत ॥"
           (गीता १। ४०)

√● [कुल के नाश से सनातन कुल धर्म नष्ट हो जाते हैं। धर्म के नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है।]

√● अधर्म (पाप) के अधिक हो जाने का फल क्या होता है ? 

"अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
 स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥" 
              ( गीता १ । ४१)

√●【 हे कृष्ण । पाप के अधिक हो जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं। स्त्रियों के दूषित होने से वर्णसंकर उत्पन्न होता है।】

√● वर्णसंकरता का परिणाम बड़ा भयानक होता है ...

"दोषैरेतैः  कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः । उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च
 शाश्वताः ॥ " 
         (गीता १ । ४३)

√● [ इन वर्णसंकरकारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल धर्म और जाति धर्म नष्ट हो जाते हैं।] - कुलधर्म के नाश का फल शुभ कैसे हो सकता है ?

"उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
 नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥"
               ( गीता १।४४ )

√★【हे जनार्दन । जिनका कुल धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चितकाल तक नरक में वास होता है ऐसा सुनता हूँ।】

√★ यदि पुरुष दूषित होता है- वेश्यागामी होता है तो इससे उसके कुल में वर्णसंकरता नहीं आती। किन्तु यदि स्त्री दूषित होती है तो इससे कुल में वर्णसंकर की उत्पत्ति होती है। इससे सनातन धर्म का क्षयन होता है। इसलिये भली प्रकार से स्त्रियों को दूषित होने से बचाने के लिये हर संभव उपाय करना चाहिये। इस कलयुग में इससे बचना कठिन है। स्त्रियाँ दूषित हो रही हैं। वर्णसंकर उत्पन्न हो रहे हैं। कुलधर्म नष्ट हो रहे हैं। धर्म से आस्था उठ रही है। लोग दुःखी हो रहे हैं। सर्वत्र अशांति है। यद्यपि भौतिक समृद्धि है। पूरी तरह समाज के वर्ण संकर हो जाने पर कल्कि अवतार होगा। 

【तस्मै कल्कि पुरुषाय नमः।】
#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्

ईरान अमेरिका युद्ध में भारत की तेल सप्लाई /आपूर्ति मार्ग के सुरक्षा संबंधी अनुमानित कूटनीति

क्या आपने ध्यान दिया है कि इस पूरे मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत एक अजीब-सी खामोश कूटनीति खेल रहा है?ना कोई बड़ी घोषणा, ना कोई प्रेस कॉन्फ़्रेंस… लेकिन फोन कॉल्स लगातार हो रहे हैं।

और सवाल यह है ...क्या भारत और ईरान के बीच कोई चुपचाप समझौता बन रहा है?

असल में भारत की सबसे बड़ी चिंता इस समय युद्ध नहीं है।भारत की सबसे बड़ी चिंता है Strait of Hormuz।दुनिया के लगभग 20–25% तेल और LNG इसी रास्ते से गुजरते हैं।भारत के लिए तो यह और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि...पेट्रोलियम,LPG,LNG,Fertilizer
कई केमिकल्स

इन सबकी सप्लाई का बड़ा हिस्सा यहीं से आता है।

अब अगर ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के कारण इस इलाके में जहाज़ों पर रैंडम अटैक होने लगें तो असली समस्या क्या होती है?

रास्ता technically बंद नहीं होता…लेकिन कोई जहाज़ जाने को तैयार नहीं होता।

Insurance महँगा हो जाता है।Crew डर जाता है।Shipping कंपनियाँ route बदल देती हैं।

यही असली संकट है।

और यहीं पर भारत शायद अपना quiet strategy खेल रहा है।

खबर आई कि कोच्चि में मौजूद ईरानी जहाज़ के Iranian sailors को भारत वापस भेजने जा रहा है।ध्यान दीजिए… जहाज़ नहीं जा रहा, सिर्फ sailors जा रहे हैं।

कूटनीति की भाषा में इसका मतलब क्या होता है?

यह एक signal है।

तेहरान को संदेश ...“भारत तुम्हें दुश्मन की तरह नहीं देखता।”

वॉशिंगटन को संदेश ...“हम आपकी लड़ाई का हिस्सा नहीं हैं।”

ग़ल्फ देशों को संदेश ...“भारत एक neutral maritime power है।”

भारत की असली मांग क्या हो सकती है?

बहुत simple.

Indian flag वाले जहाज़ों को Hormuz में attack नहीं किया जाएगा।अगर mining या military activity होगी तो India को पहले warning मिलेगी।

बस।

कोई treaty नहीं।कोई joint statement नहीं।कोई फोटो नहीं।

सिर्फ एक quiet understanding।

ईरान इसके लिए क्यों मानेगा?

क्योंकि इस समय ईरान के पास बात करने के लिए बहुत कम देश बचे हैं।भारत उन गिने-चुने देशों में है जो...अमेरिका के भी दोस्त हैं!
इजराइल के भी दोस्त हैं...और ईरान से भी बात कर सकते हैं

और सबसे महत्वपूर्ण बात…

ईरान को भी पता है कि चीन सिर्फ सौदे करता है, भरोसा नहीं देता।

भारत कम से कम भरोसे की भाषा में बात करता है।

दूसरा कारण है Chabahar Port।

ईरान भी जानता है कि युद्ध के बाद अगर उसे...दवाइयाँ,खाद्य सामग्री
humanitarian supplies चाहिए होंगी तो भारत सबसे भरोसेमंद सप्लायर होगा।

और यह भी एक सच्चाई है…

आज मिडिल ईस्ट के कई देशों की food supply chain भारत से जुड़ी हुई है।

कुछ समय पहले UAE के लिए भारत से हज़ारों टन खाद्य सामग्री एयरलिफ्ट की गई थी।

तो अगर भारत को Hormuz में सुरक्षित रास्ता मिल जाता है तो भारत सिर्फ अपनी ऊर्जा नहीं बचाता…बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए supply hub भी बन सकता है।

अब सवाल आता है ... अमेरिका क्या करेगा?

सच बोलें तो अमेरिका इस समय भारत से टकराना नहीं चाहता।

क्योंकि दुनिया का तेल बाज़ार अस्थिर है…और भारत उन कुछ देशों में है जो refining capacity और energy market को stabilize कर सकते हैं।

इसलिए अगर भारत quietly अपना रास्ता बना लेता है तो शायद वॉशिंगटन दूसरी तरफ देखना ही बेहतर समझेगा।

यानी पूरी कहानी का सार क्या है?

भारत शायद वही कर रहा है जो बड़ी ताकतें करती हैं।

ना किसी युद्ध में कूदना…ना किसी ब्लॉक में खड़ा होना…बस चुपचाप अपना रास्ता सुरक्षित कर लेना।

कूटनीति में इसे कहते हैं ...

Strategic Hedging.

दोस्ती सब से…
निर्भरता किसी पर नहीं।

और अगर सच में Hormuz से भारतीय जहाज़ बिना समस्या के आने-जाने लगे…तो समझ लीजिएगा…

कहीं ना कहीं
दिल्ली और तेहरान के बीच कोई खामोश समझौता हो चुका है।


✍️ देवकांत झा ( फेसबुक पोस्ट 14 मार्च 2026 )
फाल्गुन कृष्ण १०, विक्रम संवत २०८२

Friday, 13 March 2026

कवि डॉ गजराज चारण ( राजस्थानी कविताएं )

क्यूं राखै करड़ाण अणूती
छोड परी आ बाण अणूती
धड़ो करंतां ध्यान राखजे
निजर-ताकड़ी काण अणूती

कुळपतराई कारण काया
खाली ओगण खाण अणूती

चाव-चूंटियो काढ़ माट सूं
छाछ मती ना छाण अणूती

मोटां पाण मती मोदीजे
प्रीत-विहूण पिछाण अणूती

काम पड्यां जो करै किनारो
जकी मतलबी-जाण अणूती

उडगण चांद आगियां चेतो
भुरक्यां न्हाखै भाण अणूती

पौधां रै पनपण में पंगा
बरगद पाळी बाण अणूती

रखवाळा ल्याळी रेवड़ रा
*ठणकै गाडर ठाण अणूती

चूक्यां चाल मलाल मिलेला
चढतां ऊंटां ढाण अणूती

सुर नैं साध धीर रख सावळ
तणी थकी मत ताण अणूती

बणै काम अपणै बळबूतै
पोल-ढोल री पाण अणूती

आँख मीच मत करे अँधारो
होवै नितप्रत हाण अणूती

पत राख्यां 'गजराज' रहै पत
कोई न राखै काण अणूती
©️डॉ. गजादान चारण 'शक्तिसुत'

**क्यूं राखै करड़ाण अणूती
छोड़ परी आ बाण अणूती**

**भावार्थ :**
मनुष्य को निरर्थक हठ, अकड़ या अहंकार को पकड़े नहीं रहना चाहिए। स्वाभिमान अलग बात है, पर बेतुकी जिद और अकड़ अंततः हानि ही पहुँचाती है। इसलिए ऐसी अनुचित जिद को समय रहते छोड़ देना ही बुद्धिमानी है।

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**धड़ो करंतां ध्यान राखजे
निजर-ताकड़ी काण अणूती**

**भावार्थ :**
संसार में किसी भी वस्तु या परिस्थिति का मोल-तोल करते समय अत्यंत सावधान रहना चाहिए। जैसे तराजू के दोनों पलड़ों का संतुलन आवश्यक होता है, वैसे ही लोगों की नजर रूपी तराजू में छिपे बाँकपन या खोट को समझना जरूरी है, अन्यथा मनुष्य धोखा खा सकता है।

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**कुळपतराई कारण काया
खाली ओगण खाण अणूती**

**भावार्थ :**
मनुष्य जब अपनी डेढ़ होशियारी, खुरापात और कुटिल चालाकियों में पड़ जाता है, तब उसका यह जीवन और शरीर गुणों का स्थान बनने के बजाय अवगुणों की खान बन जाता है।

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**चाव-चूंटियो काढ़ माट सूं
छाछ मती ना छाण अणूती**

**भावार्थ :**
जैसे दही को मथकर बिलौने में से खरा मख्खन निकाल लिया जाता है, वैसे ही जीवन में भी सार्थक और मूल्यवान तत्वों को पहचानकर ग्रहण करना चाहिए। जो वस्तु सारहीन है, उसमें व्यर्थ श्रम करना उतना ही निरर्थक है, जितना छाछ को छानना।

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**मोटां पाण मती मोदीजे
प्रीत-विहूण पिछाण अणूती**

**भावार्थ :**
केवल नाम या पद से बड़े दिखाई देने वाले लोगों के कारण कभी इतराना नहीं चाहिए। कई बार ऐसे लोग ‘नाम बड़े और दर्शन खोटे’ होते हैं, जिनकी पहचान और संबंध प्रेम से नहीं बल्कि स्वार्थ से बने होते हैं; इसलिए ऐसी प्रीत-विहीन जान-पहचान किसी के लिए भी उपयोगी नहीं होती।

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**काम पड़्यां जो करै किनारो
जकी मतलबी-जाण अणूती**

**भावार्थ :**
जो व्यक्ति आवश्यकता या कठिन समय आने पर किनारा कर ले, उसे मतलबी और स्वार्थी ही समझना चाहिए। सच्चा संबंध वही है जो विपत्ति में भी साथ निभाए।

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**उडगण चांद आगियां चेतो
भुरक्यां न्हाखै भाण अणूती**

**भावार्थ :**
कवि चन्द्रमा, तारों और जुगनुओं जैसे छोटे प्रकाशों को सावधान करते हैं कि वे सूर्य के झाँसे में न आएँ। सूर्य अपनी प्रखर किरणों के माध्यम से छोटे प्रकाशों के बीच भ्रम उत्पन्न करना चाहता है; इसलिए छोटे और सरल लोगों को ऐसे प्रभावों से सावधान रहना चाहिए।

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**पौधां रै पनपण में पंगा
बरगद पाळी बाण अणूती**

**भावार्थ :**
बरगद की व्यर्थ की अकड़ और फैलाव के कारण उसके आसपास उगने वाले छोटे पौधों के विकास में अनेक बाधाएँ आती हैं। इसी प्रकार जब कोई बड़ा व्यक्ति अपने अहंकार के कारण दूसरों पर छा जाता है, तो नवोदित लोगों के विकास में अवरोध उत्पन्न हो जाते हैं।

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**रखवाळा ल्याळी रेवड़ रा
ठणकै गाडर ठाण अणूती**

**भावार्थ :**
यदि भेड़ों के झुंड का रखवाला ही भेड़िया बन जाए, अर्थात् जो रक्षक है वही भक्षक हो जाए, तो भेड़ों की रक्षा की कोई आशा नहीं रह जाती। ऐसे में उनकी आशाभरी पुकार भी व्यर्थ सिद्ध होती है।

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**चूक्यां चाल मलाल मिलेला
चढ़तां ऊंटां ढाण अणूती**

**भावार्थ :**
जीवन में यदि सही चाल चूक जाए तो अंत में केवल पछतावा ही मिलता है। जैसे यात्रा शुरू करते ही ऊँट को तेज दौड़ाना उचित नहीं होता; इससे या तो ऊँट को चोट लग सकती है या सवार गिर सकता है। सवार और सवारी के बीच तालमेल बैठाने के लिए धैर्य आवश्यक है।

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**सुर नैं साध धीर रख सावळ
तणी थकी मत ताण अणूती**

**भावार्थ :**
संगीत की साधना में भी धैर्य और संतुलन आवश्यक है। यदि तान को आवश्यकता से अधिक ऊँचा खींच दिया जाए तो रस भंग हो जाता है। इसलिए जो सुर जितना तना हुआ है, उसे उससे अधिक नहीं तानना चाहिए।

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**बणै काम अपणै बळबूतै
पोल-ढोल री पाण अणूती**

**भावार्थ :**
कार्य अपने बल और सामर्थ्य से ही सिद्ध होता है। बाहर से दिखावे का समर्थन करने वाले, केवल पोल के ढोल पीटने वालों का जोश या सहारा कभी नहीं रखना चाहिए, क्योंकि वे वास्तविक काम में सहायक नहीं होते।

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**आँख मीच मत करे अँधारो
होवै नितप्रत हाण अणूती**

**भावार्थ :**
आँखें मूँद लेने से अँधेरा समाप्त नहीं होता। यदि मनुष्य सचाई से आँखें बंद कर ले, तो उसे प्रतिदिन हानि ही उठानी पड़ती है। इसलिए सजग और जागरूक रहना आवश्यक है।

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**पत राख्यां 'गजराज' रहै पत
कोई न राखै काण अणूती**

**भावार्थ :**
कवि ‘गजराज’ कहते हैं कि अपनी प्रतिष्ठा और मर्यादा की रक्षा मनुष्य को स्वयं ही करनी चाहिए। जो अपनी पत को संभालकर रखता है, उसी की पत बनी रहती है; क्योंकि संसार में कोई भी व्यक्ति एक सीमा से अधिक लिहाज़ नहीं रख पाता।


©Gajadan charan 'shaktisut'

⚠️ माँ दुर्गा के प्रति कुछ अपराध और उनका निवारण

⚠️ माँ दुर्गा के प्रति कुछ अपराध और उनका निवारण ___नमस्ते दोस्तों, आज मैं आपको एक बहुत ही गंभीर और महत्वपूर्ण विषय पर बात करने जा रहा हूँ। अक्सर लोग बिना जानकारी के देवी-देवताओं की साधना करते हैं और अनजाने में कुछ ऐसे काम कर बैठते हैं जो माँ दुर्गा के प्रति अपराध माने जाते हैं। ऐसे अपराधों से बचना बहुत जरूरी है, नहीं तो साधना का फल मिलने की बजाय उल्टा नुकसान हो सकता है। आइए जानते हैं उन मुख्य अपराधों के बारे में और अगर ऐसा अपराध हो गया है तो उसका निवारण कैसे करें।

🌟 क्यों जरूरी है इन अपराधों से बचना?

माँ दुर्गा हमारी आदि शक्ति हैं। वे हमारी रक्षा करती हैं, हमारी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। लेकिन अगर हम अनजाने में उनके प्रति कोई अपराध कर बैठें, तो वे नाराज हो सकती हैं। इससे जीवन में कई तरह की बाधाएं आ सकती हैं -

✅ गृह कलह - घर में झगड़े और कलह शुरू हो जाते हैं।
✅ व्यापार में हानि - व्यापार में लगातार नुकसान होने लगता है।
✅ सुरक्षा में कमी - जीवन में सुरक्षा का अहसास कम हो जाता है।
✅ स्त्री दोष - स्त्री दोष लग जाता है, जिससे परिवार की महिलाओं को कष्ट होता है।
✅ संतान सुख में बाधा - संतान सुख में रुकावट आती है।
✅ आर्थिक तंगी - धन की कमी होने लगती है।

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⚠️ माँ दुर्गा के प्रति प्रमुख अपराध

1️⃣ शक्ति के साथ भैरव पूजा न करना

देवी की साधना में भैरव पूजा का विशेष महत्व है। भैरव तंत्र साधना के अधिपति हैं। शक्ति की साधना में भैरव की उपासना अनिवार्य मानी गई है। बिना भैरव पूजा के की गई देवी साधना अधूरी रहती है और उसका पूरा फल नहीं मिलता।

2️⃣ बिना उपदेश या साक्षी भाव के तांत्रिक मंत्र उठा लेना

बिना गुरु के उपदेश के या बिना साक्षी भाव के गहरे तांत्रिक मंत्रों का जाप करना बहुत खतरनाक हो सकता है। इससे उल्टा असर होने की संभावना रहती है। जब तक साक्षी भाव मजबूत न हो, तब तक ऐसे मंत्रों से दूर रहना चाहिए।

3️⃣ साधना के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन न करना

देवी की किसी भी साधना को करते समय ब्रह्मचर्य का पालन करना बहुत जरूरी है। यह साधना की सफलता की पहली शर्त है। बिना ब्रह्मचर्य के की गई साधना न केवल फलहीन होती है, बल्कि उल्टे नुकसान भी पहुंचा सकती है।

4️⃣ घर की स्त्री को दुख पहुंचाना

देवी स्वयं स्त्री स्वरूपा हैं। घर की स्त्रियों (माता, पत्नी, बहन, बेटी) को दुख पहुंचाना देवी का अपमान करने के समान है। जो घर की स्त्रियों का सम्मान नहीं करता, उस पर देवी की कृपा नहीं होती।

5️⃣ देवी पूजा करते हुए शिव की अवज्ञा करना

देवी और शिव एक-दूसरे के पूरक हैं। शक्ति के बिना शिव और शिव के बिना शक्ति अधूरी है। देवी पूजा करते हुए अगर शिव का अपमान किया जाए या उनकी अवज्ञा की जाए, तो देवी नाराज हो जाती हैं।

6️⃣ बिना प्रतिष्ठित माला के जाप करना

माला का प्राण प्रतिष्ठित होना बहुत जरूरी है। बिना प्रतिष्ठित माला से किया गया जाप पूरा फल नहीं देता। इसलिए हमेशा प्रतिष्ठित माला का ही प्रयोग करना चाहिए।

💫 अपराध निवारण हेतु भवानी अष्टकम्

अगर अनजाने में माँ दुर्गा के प्रति कोई अपराध हो गया है, तो उसके निवारण के लिए भवानी अष्टकम् का पाठ करना बहुत लाभकारी है। यह स्तोत्र आदि शंकराचार्य द्वारा रचित है और इसमें माँ के सामने अपनी सारी कमियाँ रखकर क्षमा मांगी गई है।

🙏 भवानी अष्टकम्

न तातो न माता न बन्धुर्न दाता
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ 1 ॥

भवाब्धावपारे महादुःखभीरु
पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः
कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ 2 ॥

न जानामि दानं न च ध्यानयोगं
न जानामि तंत्रं न च स्तोत्रमंत्रम्
न जानामि पूजां न च न्यासयोगं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ 3 ॥

न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित्
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातः
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ 4 ॥

कुकर्मी कुसंगी कुबुद्धिः कुदासः
कुलाचारहीनः कदाचारलीनः
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबंधः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ 5 ॥

प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं
दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ 6 ॥

विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे
जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ 7 ॥

अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो
महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः
विपत्तौ प्रविष्टः प्रनष्टः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ 8 ॥

🪷 भवानी अष्टकम् पाठ की विधि

कितने दिन करें?

इस स्तोत्र का पाठ कम से कम 11 दिन करना चाहिए। अधिक लाभ के लिए 21 या 41 दिन भी कर सकते हैं।

कितनी बार?

रोज 11 बार इस स्तोत्र का पाठ करें। 11 की संख्या देवी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

कहाँ करें पाठ?

✅ अपराजिता के पेड़ के पास - यह सबसे उत्तम स्थान है। अपराजिता के पौधे के पास बैठकर पाठ करें।
✅ शिव मंदिर में - अगर अपराजिता का पेड़ न हो तो किसी शिव मंदिर में जाकर पाठ करें।

कैसे करें?

1. सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
2. अपराजिता के पेड़ के पास या शिव मंदिर में जाएं।
3. माँ दुर्गा का ध्यान करें।
4. भवानी अष्टकम् का 11 बार पाठ करें।
5. देवी से किए गए अपराधों की क्षमा मांगें।

🙏 क्षमा प्रार्थना

पाठ के बाद यह प्रार्थना करें -

"हे माँ भवानी! मुझसे अनजाने में जो भी अपराध हुआ हो, उसे क्षमा करें। मुझे अपनी शरण में लें। मेरे जीवन की सभी बाधाओं को दूर करें। परिवार में शांति बनाए रखें। व्यापार में उन्नति दें। स्त्री दोष से मुक्ति दिलाएं। जय माता दी!"

✨ इस उपाय से होने वाले लाभ

भवानी अष्टकम् के नियमित पाठ से अनेक लाभ होते हैं -

✅ किए गए अपराध क्षमा - माँ दुर्गा के प्रति किए गए अपराध क्षमा हो जाते हैं।
✅ गृह कलह दूर - घर के झगड़े और कलह दूर होते हैं।
✅ व्यापार में लाभ - व्यापार में हानि होना बंद हो जाती है और लाभ होने लगता है।
✅ सुरक्षा में वृद्धि - जीवन में सुरक्षा का अहसास बढ़ जाता है।
✅ स्त्री दोष निवारण - स्त्री दोष दूर हो जाता है और घर की महिलाएं सुखी रहती हैं।
✅ संतान सुख - संतान सुख में बाधाएं दूर होती हैं।
✅ आर्थिक लाभ - धन-समृद्धि में वृद्धि होती है।

🌿 अंतिम बात

दोस्तों, किसी भी देवी-देवता की साधना करते समय नियमों का पालन करना बहुत जरूरी है। लेकिन अगर अनजाने में कोई अपराध हो गया है, तो निराश होने की जरूरत नहीं है। माँ दुर्गा बहुत दयालु हैं। सच्चे मन से क्षमा मांगने पर वे जरूर प्रसन्न होती हैं। भवानी अष्टकम् का पाठ करके आप अपने सभी अपराधों के लिए क्षमा मांग सकते हैं और माँ की कृपा पा सकते हैं।

🔥 नेक्स्ट पार्ट में और भी खास जानकारी

दोस्तों, अगले पार्ट में मैं आपको देवी साधना से जुड़े और भी महत्वपूर्ण नियमों और अपराधों के निवारण के बारे में बताऊंगा।

अगला पार्ट मिस न करने के लिए पेज को फॉलो कर लीजिए। फॉलो बटन पर क्लिक करना न भूलें।

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जो लोग कमेंट करेंगे, उनको अगली पोस्ट का नोटिफिकेशन सबसे पहले मिलेगा। इसलिए कमेंट जरूर करें।

👇 कमेंट में लिखें - जय माता दी 🙏

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प्रेम / झगड़ा/ सम व्यवहार कराने में उपयोगी चिंगारी पौधे के फूल ( पुष्प )

॥ॐ॥

चिंगारी का पौधा 

एक ही पौधे में तीन रंगों के पुष्प आते हैं - गुलाबी, भूरे और पीले 

यदि गुलाबी फूल लेकर जिन दो घरों में फैंक दें वे परस्पर प्रेम से रहेंगे।

भूरे फूलों को जिन घरों फेंक दिया जाए वे आपस में झगड़ने लगेंगे।

और पीले फूल फेंकने पर सम रहेंगे। 

ऐसा बताया गया हैं -

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वयं राष्ट्रे जागृयाम

असाध्य रोगों का अंत – महाकाली काया-कल्प संजीवनी अस्त्र ( झाड़ा )

🔱 असाध्य रोगों का अंत – महाकाली काया-कल्प संजीवनी अस्त्र 🔱

कभी-कभी जीवन में ऐसा समय आता है जब दवाइयाँ काम करना बंद कर देती हैं।
रिपोर्ट सामान्य आती हैं, फिर भी शरीर पीड़ा से भरा रहता है…
कभी-कभी यह केवल रोग नहीं होता यह ऊर्जा का विकार, किसी की नज़र, या अदृश्य बाधा भी हो सकती है।

ऐसे समय में तंत्र की प्राचीन परंपरा एक दिव्य रहस्य बताती है 
“जहाँ चिकित्सा थक जाती है, वहाँ माँ महाकाली की कृपा जागती है।”

आज मैं, अमिताचार्य Supreme Guru of Mahakali Tantra,
आप सभी के कल्याण के लिए महाकाली का एक अत्यंत प्राचीन और गुप्त “काया-कल्प शाबर मंत्र” प्रकट कर रहा हूँ।

यह मंत्र केवल शब्द नहीं है 
यह देवी की संजीवनी ऊर्जा का आह्वान है,
जो रोग और पीड़ा को शरीर से ऐसे खींच लेता है जैसे चुंबक लोहे को खींच लेता है।

 महाकाली काया-कल्प (रोग नाशक) मंत्र

“ॐ नमो आदेश गुरु को।
पहाड़ फोड़ निकली कालिका, हाथ में खप्पर-धार।
रोग को काटे, शोक को काटे, काटे यम की मार।।

हाड़-हाड़ से, नाड़ी-नाड़ी से, चमड़ी-चमड़ी से,
निकले रोग, भागे पीड़ा, जैसे भागे अँधियारा देख उजियारा।

जल बांधी, थल बांधी, बांधी वेदना सारी।
अमुक (रोगी का नाम) की काया कंचन होवे, कृपा करे महतारी।।

न औषधि, न बूटी, केवल काली की दृष्टि अनूठी।
जा रोग पाताल समा, फिर मुड़ के मत देख।

शब्द साँचा, पिंड काँचा। फुरो मंत्र ईश्वरोवाचा!
दुहाई धन्वंतरि वैद्य की! दुहाई कामरू कामाख्या की!”

 दिव्य झाड़ा विधि (Healing Technique)

यह केवल मंत्र जप नहीं —
यह एक ऊर्जा क्रिया है जो शरीर से रोग को बाहर निकालती है।

• मोरपंख या नीम की टहनी लें (न हो तो दाहिना हाथ)
• रोगी को सामने बैठाएं
• सिर से पैर तक नीचे की ओर झाड़ते हुए मंत्र पढ़ें
• “फुरो मंत्र” पर रोगी के माथे या पीड़ा वाले स्थान पर फूंक मारें
• यह प्रक्रिया 21 बार करें

अंत में भभूत को 3 बार मंत्र से अभिमंत्रित करके
थोड़ी माथे पर लगाएं और थोड़ी जीभ पर चटा दें।

 चमत्कार के संकेत

यदि बाधा ऊर्जा या ऊपरी प्रभाव है तो
रोगी को तुरंत हल्कापन, उबासी, या आँखों से पानी आ सकता है।

यह संकेत है कि नकारात्मक ऊर्जा शरीर छोड़ रही है।

माँ महाकाली की कृपा से
आप स्वयं और अपने परिवार को
रोग, भय और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित कर सकते हैं।

जय माँ महाकाली।

Amitacharya
Supreme Guru of Mahakali Tantra

काली कीलकम्

क्या आपने कभी “काली कीलकम्” का नाम सुना है?
तंत्र शास्त्र कहता है 
बिना कीलक के मंत्र और साधना वैसी ही है जैसे बिना चाबी के ताला।
यही वह गुप्त तांत्रिक सूत्र है जिससे
साधक की रक्षा होती है,
दरिद्रता मिटती है,
और माँ काली की कृपा से जीवन के द्वार खुलते हैं।
आज पहली बार Mahakali Tantra में
इस अद्भुत रहस्य की झलक।
🔱 पढ़ें और अनुभव करें।

क्या आप जानते हैं कि आपकी कठिन साधना, मंत्र जप और कवच पाठ निष्फल क्यों हो जाते हैं? तंत्र का एक अटल सत्य है बिना 'कीलक' के साधना वैसी ही है जैसे बिना चाबी के ताला!

स्वयं भगवान शिव ने स्वीकारा है कि देवी काली ही 'परतत्त्व' हैं। लेकिन उनके तेज को प्राप्त करने के लिए जिस चाबी की आवश्यकता है, वह है काली कीलकम्। यह मात्र एक स्तोत्र नहीं, बल्कि वह दिव्य ऊर्जा है जिसने दुर्वासा, वशिष्ठ और देवगुरु बृहस्पति जैसे ऋषियों को ऐश्वर्य के शिखर पर पहुँचाया।

॥ श्री काली कीलकम् ॥
विनियोग:
ॐ अस्य श्री कालिका कीलकस्य सदाशिव ऋषिरनुष्टप् छन्दः, श्री दक्षिण कालिका देवता, सर्वार्थ सिद्धि साधने कीलक न्यासे जपे विनियोगः ।

कीलक महिमा:
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि कीलकं सर्वकामदम् ।
कालिकायाः परं तत्त्वं सत्यं सत्यं त्रिभिर्ममः ॥
दुर्वासाश्च वशिष्ठश्च दत्तात्रेयो बृहस्पतिः ।
सुरेशो धनदश्चैव अङ्गराश्च भृभूद्वाहः ॥
च्यवनः कार्तवीर्यश्च कश्यपोऽथ प्रजापतिः ।
कीलकस्य प्रसादेन सर्वैश्वर्चमवाप्नुयुः ॥
अथ काली कीलकम्:
ॐ कारं तु शिखाप्रान्ते लम्बिका स्थान उत्तमे ।
सहस्त्रारे पङ्कजे तु क्रीं क्रीं वाग्विलासिनी ॥
कूर्चबीजयुगं भाले नाभौ लज्जायुगं प्रिये ।
दक्षिणे कालिके पातु स्वनासापुट युग्मके ॥
हूंकारद्वन्द्वं गण्डे द्वे द्वे माये श्रवणद्वये ।
आद्यातृतीयं विन्यस्य उत्तराधर सम्पुटे ॥
स्वाहा दशनमध्ये तु सर्व वर्णन्न्यसेत् क्रमात् ।
मुण्डमाला असिकरा काली सर्वार्थसिद्धिदा ॥
चतुरक्षरी महाविद्या क्रीं क्रीं हृदय पङ्कजे ।
ॐ हूं ह्नीं क्रीं ततो हूं हट् स्वाहा च कंठकूपके ॥
अष्टाक्षरी कालिकाया नाभौ विन्यस्य पार्वति ।
क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं स्वाहान्ते च दशाक्षरी ॥
मम बाहु युगे तिष्ठ मम कुण्डलिकुण्डले ।
हूं ह्नीं मे वह्निजाया च हूं विद्या तिष्ठ पृष्ठके ॥
क्रीं हूं ह्नीं वक्षदेशे च दक्षिणे कालिके सदा ।
क्रीं हूं ह्नीं वह्निजायाऽन्ते चतुर्दशाक्षरेश्वरी ॥
क्रीं तिष्ठ गुह्यदेशे मे एकाक्षरी च कालिका ।
ह्नीं हूं फट् च महाकाली मूलाधार निवासिनी ॥
सर्वरोमाणि मे काली करांगुल्यङ्क पालिनी ।
कुल्ला कटिं कुरुकुल्ला तिष्ठ तिष्ठ सदा मम ॥
विरोधिनी जानुयुग्मे विप्रचित्ता पदद्वये ।
तिष्ठ मे च तथा चोग्रा पादमूले न्यसेत्क्रमात् ॥
प्रभा तिष्ठतु पादाग्रे दीप्ता पादांगुलीनपि ।
नीली न्यसेद्विन्दु देशे घना नादे च तिष्ठ मे ॥
वलाका विन्दुमार्गे च न्यसेत्सर्वाङ्ग सुन्दरी ।
मम पातालके मात्रा तिष्ठ स्वकुल कायिके ॥
मुद्रा तिष्ठ स्वमत्येमां मितास्वङ्गाकुलेषु च ।
एता नृमुण्डमालास्त्रग्धारिण्य: खड्‌गपाणयः ॥
तिष्ठन्तु मम गात्राणि सन्धिकूपानि सर्वशः ।
ब्राह्मी च ब्रह्मरंध्रे तु तिष्ठ स्व घटिका परा ॥
नारायणी नेत्रयुगे मुखे माहेश्वरी तथा ।
चामुण्डा श्रवणद्वन्द्वे कौमारी चिबुके शुभे ॥
तथामुदरमध्ये तु तिष्ठ मे चापराजिता ।
वाराही चास्थिसन्धौ च नारसिंही नृसिंहके ॥
आयुधानि गृहीतानि तिष्ठस्वेतानि मे सदा ।
फलश्रुति:
इति ते कीलकं दिव्यं नित्यं यः कीलयेत्स्वकम् ॥
कवचादौ महेशानि तस्यः सिद्धिर्न संशयः ।
श्मशाने प्रेतयोर्वापि प्रेतदर्शनतत्परः ॥
यः पठेत्पाठयेद्वापि सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ।
सवाग्मी धनवान्दक्षः सर्वाध्यक्ष: कुलेश्वर: ॥
पुत्र बांधव सम्पन्नः समीर सदृशो बले ।
न रोगवान् सदा धीरस्तापत्रय निषूदनः ॥
मुच्यते कालिका पायात् तृणराशिमिवानला ।
न शत्रुभ्यो भयं तस्य दुर्गमेभ्यो न बाध्यते ॥
यस्य य देशे कीलकं तु धारणं सर्वदाम्बिके ।
तस्य सर्वार्थसिद्धि: स्यात्सत्यं सत्यं वरानने ॥
मंत्रच्छतगुणं देवि कवचं यन्मयोदितम् ।
तस्माच्छतगुणं चैव कीलकं सर्वकामदम् ॥
तथा चाप्यसिता मंत्रं नील सारस्वते मनौ ।
न सिध्यति वरारोहे कीलकार्गलके विना ॥
विहीने कीलकार्गलके काली कवच यः पठेत् ।
तस्य सर्वाणि मंत्राणि स्तोत्राण्यन सिद्धये प्रिये ॥
॥ काली कीलकम् समाप्त ॥

काली कीलकम् के अद्भुत लाभ 
  सुरक्षा चक्र: इसके पाठ से शरीर के रोम-रोम की रक्षा होती है। हिंसक पशु या शत्रु आपका बाल भी बाँका नहीं कर सकते।
  सफलता की कुंजी: मंत्र जाप से 100 गुना अधिक फल कवच का है, और कवच से 100 गुना अधिक प्रभाव इस कीलक का है।
  दरिद्रता का नाश: यह पाठ साधक को कुबेर के समान ऐश्वर्यवान और समाज में सम्मानित बनाता है।
  रोग मुक्ति: भयंकर रोगों और अकाल मृत्यु के भय को जड़ से मिटा देता है।

सामान्य सिद्ध विधि (जनसाधारण के लिए) 🚩
 किसी भी शुक्रवार या अमावस्या की रात्रि से पाठ आरंभ करें।
 दक्षिण दिशा की ओर मुख करके काली माँ की प्रतिमा या यंत्र के समक्ष दीपक जलाएं।
 सर्वप्रथम विनियोग करें, फिर श्रद्धापूर्वक 'काली कीलकम्' का 11 बार पाठ करें।
  पाठ के बाद माँ काली से अपनी मनोकामना कहें। यह सरल विधि भी आपको चमत्कारिक अनुभव कराएगी।

⚠️ सावधान! क्या आप जानते हैं इसके 'गुप्त और लुप्त' प्रयोग?
काली कीलकम् मात्र एक पाठ नहीं है, इसके भीतर स्तम्भन, वशीकरण, उच्चाटन और मारण जैसी प्रचंड तांत्रिक क्रियाओं के सूत्र छिपे हैं।
  कैसे एक विशेष मुद्रा के साथ इसका पाठ करने से शत्रु स्वतः घुटने टेक देता है?
 कैसे इसके विशिष्ट न्यास से कुंडलिनी शक्ति को तीव्र गति से जागृत किया जा सकता है?
 कैसे श्मशान साधना में इसका प्रयोग कर प्रत्यक्ष दर्शन संभव हैं?
ये वे रहस्य हैं जो सदियों से गुरु-शिष्य परंपरा में गुप्त रखे गए हैं। यदि आप तंत्र की पराकाष्ठा को छूना चाहते हैं और इन लुप्त प्रयोगों को सिद्ध करना चाहते हैं, तो आज ही इस महाअभियान का हिस्सा बनें।
"अंधेरे से प्रकाश की ओर बढ़ें, महाकाली के शरणागत हों।"

 इन गुप्त प्रयोगों को सीखने और अपने जीवन को पूर्णतः बदलने के लिए आज ही 'Mahakali Tantra' ज्वाइन करें!

- (Amitacharya)
Supreme Guru of Mahakali Tantra