गोत्र - प्रवर - उपाधि गाथा
18 गोत्रों में बसा है, ऋषियों का सम्मान।
1. भारद्वाज गोत्र -
अंगिरा, बृहस्पति, भारद्वाज है प्रवर,
श्रोत्रिय, तिवारी उपाधि,
अंगिरा का पुत्र बृहस्पति, बृहस्पति के पुत्र भरद्वाज प्रखर ।
बृहस्पति अंगिरा का पुत्र, भरद्वाज उसका लाल, द्रोण का पिता बना, वेदों का भाल।
2. उपमन्यु गोत्र -
उपमन्यु, उतथ्य, भारद्वाज, बृहस्पति, अंगिरा पंच प्रवर,
पाठक उपाधि धारण करे, शिव भक्त निरंतर।
उपमन्यु व्याघ्रपाद का पुत्र, भारद्वाज का वंश,
दूध के लिए तप किया, शिव का लिया अंश।
3. वशिष्ठ गोत्र -
वशिष्ठ, शक्ति, पाराशर है त्रि-प्रवर महान,
आचार्य उपाधि पाते, ब्रह्मा के मानस संतान।
वशिष्ठ का पुत्र शक्ति, शक्ति का पाराशर,
पाराशर का व्यास, जिसने वेद किया अक्षर।
4. कश्यप गोत्र -
कश्यप, अवत्सर, निध्रुव त्रि-प्रवर,
व्यास, पांडे, शिल्पाचार्य, विश्वकर्मा का घर।
कश्यप मरीचि का पुत्र, अदिति-दिति का भर्ता,
देव-दानव-मानव सबका, वही एक कर्ता।
5. मुद्गल गोत्र -
अंगिरा, भार्म्यश्व, मुद्गल है प्रवर,
पुरोहित, दीक्षित उपाधि, अंगिरा का ही स्वर।
मुद्गल क्षत्रिय राजा था, पंचाल का वीर,
अंगिरा में आ के बना, ब्रह्मर्षि धीर।
भर्म्यश्व उसका पिता, मुद्गल उसका पुत्र,
क्षत्रिय से ब्राह्मण बना, यही है पवित्र सूत्र।
6. जातूकर्ण्य गोत्र -
वशिष्ठ, अत्रि, जातूकर्ण त्रि-प्रवर,
मालवीय, पंचाल उपाधि, पाँचाल देश के ईश्वर।
जातूकर्ण्य अत्रि-वशिष्ठ का संगम,
दो ऋषियों का पुत्र, एक में दो का रंग।
7. शांडिल्य गोत्र -
शांडिल्य, असित, देवल है प्रवर,
उपाध्याय, मिश्र उपाधि, कश्यप का ही स्वर।
शांडिल्य कश्यप का पुत्र, असित-देवल उसके लाल,
तीन पीढ़ी का प्रवर, शांडिल्य गोत्र विशाल।
8. कौंडिन्य गोत्र -
वशिष्ठ, मैत्रावरुण, कौंडिन्य है प्रवर,
मणीठिया उपाधि, कुण्डिन ऋषि का घर।
कौंडिन्य वशिष्ठ का पुत्र, मित्रा-वरुण से जन्म,
मैत्रावरुण प्रवर कहाया, वेदों का मर्म।
9. गौतम गोत्र -
अंगिरा, रहूगण, गौतम है प्रवर,
विधाता, अंगिरा उपाधि, रहूगण का घर।
गौतम अंगिरा का पुत्र, रहूगण उसका पिता,
अहल्या के पति गौतम, न्याय-शास्त्र विधाता।
10. अघमर्षण गोत्र -
विश्वामित्र, मधुच्छंदा, अघमर्षण है प्रवर,
यजुर्वेदी उपाधि, विश्वामित्र का स्वर।
मधुच्छंदा विश्वामित्र का पुत्र, अघमर्षण उसका लाल,
जिसने पाप - नाशक सूक्त दिया, अघमर्षण विशाल।
11. वात्स्य गोत्र -
भृगु, च्यवन, आप्नवान है प्रवर,
त्रिपाठी उपाधि, भार्गव वंश प्रखर।
वत्स भृगु का वंशज, च्यवन का पुत्र,
आप्नवान च्यवन का पिता, भृगु का पौत्र।
12. वामदेव गोत्र -
अंगिरा, वामदेव, गौतम है प्रवर,
शुक्ल, अवस्थी उपाधि, गौतम का ही घर।
वामदेव गौतम का पुत्र, अंगिरा का पौत्र,
साम-गान का ऋषि, वेदों का श्रोत्र।
13. ऋक्षु गोत्र -
अंगिरा, बृहस्पति, भारद्वाज, वंदन, मतवचस पंच प्रवर,
अग्निहोत्री उपाधि, अंगिरा वंश प्रखर।
ऋक्षु भरद्वाज का पुत्र, वंदन-मतवचस उसके लाल,
पांच ऋषियों का प्रवर, ऋक्षु गोत्र विशाल।
14. लौगाक्षि गोत्र -
गौतम, उतथ्य, अंगिरा है प्रवर,
पुरोहित उपाधि, अंगिरा का ही स्वर।
लौगाक्षि गौतम का पुत्र, उतथ्य अंगिरा का लाल,
तीन पीढ़ी का संगम, लौगाक्षि का भाल।
15. वत्स गोत्र -
भृगु, च्यवन, आप्नवान, और्व, जमदग्नि पंच प्रवर,
दुबे उपाधि, भार्गव वंश प्रखर।
वत्स जमदग्नि का पुत्र, और्व जमदग्नि का पिता,
आप्नवान और्व का पिता, भृगु से ही आता।
16. गविष्ठिर गोत्र -
अत्रि, अर्चनानस, गविष्ठिर है प्रवर,
मारकण्डे, चौधरी उपाधि, अत्रि वंश प्रखर।
गविष्ठिर अत्रि का पुत्र, अर्चनानस उसका पिता,
अत्रि ब्रह्मा का मानस, सृष्टि का विधाता।
17. विद् गोत्र -
भृगु, च्यवन, आप्नवान, और्व, विद् है प्रवर,
चतुर्वेदी उपाधि, भार्गव वंश प्रखर।
विद् जमदग्नि का भाई, और्व का पुत्र,
भृगु वंश का दीपक, वेदों का सूत्र।
18. दीर्घतमा गोत्र -
अंगिरा, उतथ्य, दीर्घतमा है प्रवर,
चतुर्वेदी उपाधि, अंगिरा का ही घर।
दीर्घतमा उतथ्य का पुत्र, अंगिरा का पौत्र,
अंधा होकर भी देखा, वेदों का श्रोत्र।
सार सुनो हे भाई -
गोत्र है मूल, ऋषि रक्त की धार,
प्रवर है शाखा, तीन-पांच ऋषि परिवार।
उपाधि है कर्म, जो पुरखों ने किया,
पाठक ,आचार्य ,विश्वकर्मा, नाम दिया।
कोई अंगिरा का पुत्र, कोई भृगु का लाल,
कोई अत्रि-वशिष्ठ से, बना गोत्र विशाल।
कोई कश्यप का वंशज, कोई विश्वामित्र का,
पर सब हैं अंङ्गिरा,पुत्र जांगिड ब्राह्मण।
भूलचुक लेनीदेनी
Anil SHARMA
जय श्री ब्रह्मर्षि अंङ्गिरा जी की 🙏
ये असत्य हैं।
यह सबसे बड़ा भ्रम है जो आजकल फैलाया जा रहा है कि
वैदिक सिद्धांत - गोत्र क्या है?
जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेय: संस्कारैर्द्विज उच्यते।
विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय लक्षणम्॥
गोत्र का अर्थ है -
गो = इन्द्रिय,
त्र = रक्षा करे।
जो ऋषि अपनी तपस्या से इन्द्रियों की रक्षा करे वो गोत्रकार।
मनुस्मृति में स्पष्ट है:
असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः।
सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ॥
अर्थात विवाह माता की 6 पीढ़ी और पिता के गौत्र से बाहर होना चाहिए।
18 गोत्र सब अंगिरा नहीं हैं-
अंगिरा वंश - 8गोत्र:
(१) भारद्वाज - आंगिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज
(२) उपमन्यु - उपमन्यु, उतथ्य, भारद्वाज
(३) मुद्गल - आंगिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य
(४) गौतम - आंगिरस, रहूगण, गौतम
(५) वामदेव- आंगिरस, वामदेव, गौतम
(६) ऋक्षु - आंगिरस, बृहस्पति, भारद्वाज, वंदन, मतवचस
(७) लौगाक्षि - गौतम, उतथ्य, आंगिरस
(८) दीर्घतमा - अंगिरस, उतथ्य, दीर्घतमा
वशिष्ठ वंश - 3 गोत्र:
(९) वशिष्ठ - वशिष्ठ, शक्ति, पाराशर
(१०) जातूकर्ण्य - वशिष्ठ, अत्रि, जातूकर्ण
(११) कौंडिन्य - वशिष्ठ, मैत्रावरुण, कौंडिन्य
भृगु वंश - 4 गोत्र:
(१२) वात्स्य - भार्गव, च्यवन, आप्नवान
(१३) वत्स - भार्गव, च्यवन, आप्नवान, और्व,
(१४) जामदग्न्य - भार्गव, च्यवन, आप्नवान, और्व, विद्
अन्य वंश - 3 गोत्र:
कश्यप वंश
(१५) कश्यप - काश्यप, अवत्सार, नैध्रुव
(१६) शांडिल्य - शांडिल्य, असित, देवल
विश्वामित्र वंश
(१७) अघमर्षण - विश्वामित्र, मधुच्छन्दा, अघमर्षण
अत्रि वंश
(१८) गविष्ठिर - आत्रेय, आर्चनानस, गविष्ठिर
उक्त 18 में से केवल 8 में ही अंगिरा प्रवर हैं।
बाकी 10 तो भृगु, वशिष्ठ, कश्यप, शांडिल्य अत्रि, विश्वामित्र हैं।
ये आपस में भाई-बहन कैसे हुए?
अगर एक ही मूल वंश में भी हों तो विवाह क्यों मान्य है?
" बौधायन श्रौतसूत्र और प्रवरमंजरी " का नियम लगता है।
भिन्न प्रवरेण विवाह: - बौधायन अर्थात प्रवर भिन्न हो तो एक ही मूल गोत्र में भी विवाह हो सकता है।
उदाहरण -
भारद्वाज और मुद्गल दोनों अंगिरा वंश के हैं, पर भारद्वाज का प्रवर है - अंगिरस,बार्हस्पत्य, भारद्वाज मुद्गल का प्रवर है - अंगिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य भार्म्यश्व और बार्हस्पत्य अलग हैं।
इसलिए ये भिन्न प्रवर हैं।
प्रवरमंजरी में इसे *"प्रवर भेद"* कहा है।
इसी कारण अंगिरा वंश में ही हरित, कण्व, रथीतर , मुद्गल, विष्णुवृद्ध, संकृति, कपि सबका प्रवर अलग -अलग बताया गया है, ताकि आपस में रोटी-बेटी का व्यवहार चल सके।
निष्कर्ष -
शास्त्रीय व्यवस्था गोत्र इसलिए बनाए ही इसीलिए गए थे कि सगोत्र विवाह का दोष न लगे।
*सगोत्र में विवाह निषेध है* -
यह वेद वाक्य है।
जांगिड के 18 गोत्र 5 अलग-अलग मूल ऋषियों से हैं -
इसलिए वे भाई-बहन नहीं हैं। जहाँ मूल एक ही है (अंगिरा में) वहाँ प्रवर अलग कर दिया गया है।
बौधायन के अनुसार भिन्न प्रवर में विवाह शास्त्र सम्मत है।
इसलिए जो लोग कहते हैं "सब अंगिरा हैं तो भाई-बहन में शादी हो रही है" - वो न तो गोत्रावली पढ़ते हैं, न प्रवरमंजरी जानते हैं, न मनुस्मृति मानते हैं।
सगोत्र विवाह करने से चाण्डालत्व आता है, पर भिन्न गोत्र और भिन्न प्रवर में विवाह करने से ही शुद्ध वंश चलता है -
यही 18 गोत्रों की रचना का वैदिक विज्ञान है।
-:गौत्र नाम विद्या;-
आप लोग गोत्र को सिर्फ _"ब्लड ग्रुप"_ समझते हैं, जबकि वेद में गोत्र का अर्थ है - _"ज्ञान की दीक्षा"_।
वेद में कहा है - "गोत्रं नाम विद्या" गोत्र रक्त नहीं, गुरु की विद्या है।
प्रवरमंजरी में 3 प्रकार के पुत्र लिखे हैं -
(१) औरस पुत्र - जो रक्त से पैदा हुआ हो।
जैसे - बृहस्पति अंगिरा का औरस पुत्र। यह रक्त संबंध है।
(२) दत्तक / कृत्रिम पुत्र- जो गोद लिया गया हो।
जैसे - रथीतर और विष्णुवृद्ध। - रथीतर, मुद्गल, विष्णुवृद्ध ये क्षत्रिय राजा थे। रथीतर क्षत्रिय राजा था, विरूप का पुत्र। उसने अंगिरा ऋषि से कहा - मुझे ब्राह्मण बना लो।
तब अंगिरा ने उसे गोद ले लिया। तब से वो आंगिरस , वैरूप, राथीतर कहलाया। विरूप का खून क्षत्रिय, पर दीक्षा अंगिरा की। इसलिए वो क्षत्रिय से ब्राह्मण बन गया।
ऐसे ही मुद्गल - पंचाल का राजा, युद्ध में अंगिरा की शरण में आया, अंगिरा ने कहा - तू मेरा पुत्र है। तब से आंगिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य प्रवर हुआ।
(३) शिष्य पुत्र - जो पढ़कर पुत्र बना हो।
जैसे - कण्व, हरित, कुत्स। कण्व तो घोर ऋषि का पुत्र था, पर अंगिरा के गुरुकुल में पढ़ा, इसलिए आंगिरस कहलाया।
तो ..
"अंगिरा परिवार" रक्त का परिवार नहीं, "विश्वविद्यालय" था। जहाँ अलग-अलग रक्त के लोग आकर एक ही उपाधि "आंगिरस" लेते थे।
इसलिए 18 गोत्रों में भाई-बहन वाला लॉजिक ही फेल है भाई-बहन तब होते जब सब एक ही बाप के औरस पुत्र हों।
यहाँ तो -
कोई क्षत्रिय राजा गोद लिया हुआ है (रथीतर)
कोई दूसरे ऋषि का पुत्र पढ़कर आया है (कण्व)
कोई शिष्य है (हरित)
गोद लिये पुत्र और पढ़े हुए पुत्र का रक्त अलग है।
*सिर्फ गुरु एक है।*
गुरु के एक होने से खून एक नहीं होता। जैसे आज IIT से पढ़े सब छात्र IITian कहलाते हैं,
पर वे भाई-बहन नहीं हो जाते, उनमें विवाह हो सकते है।
वैसे ही अंगिरा गुरुकुल से निकले सब अंगिरस कहलाये,पर रक्त अलग।
18 संख्या ही क्यों?
नया वैदिक गणित 18 गोत्र क्यों?
17 या 19 क्यों नहीं?
जांगिड़ ब्राह्मण जाति है अंङ्गिरा वंशज नही हैं।
संस्कार के 18 अंग बताए हैं -
अष्टादश शिल्पानि - 4 वेद, 6 वेदांग, 4 उपवेद, 4 कला = 18 गोत्र हुए
अंङ्गिरा ऋषि जी ने जांगिड़ ब्राह्मण समाज में विवाह संस्कार को 18 शाखाओं में बाँटा, वही18 गोत्र बने।
ये 18 विभाग हैं, एक ही वंश बनाने के लिए नही ,शादी - विवाह रोकना नहीं।,
ऋषियों ने बताया हैं की इन गोत्रों में विवाह संस्कार मान्य है।।
इसलिए गोत्र बनाये थे जिसे एक जाति का टाईटल नाम दिया गया है।
18 ऋषि गौत्र एक ही वंश (DNA) या एक ही गुण-सुत्र के होगे तो 18 ऋषि गौत्र में विवाह संस्कार मान्य होंगे??
वर्तमान में कुछ महाज्ञानी सज्जन पुरुष बोलते हैं की अपने नाम के आगे "अंङ्गिरा , अंङ्गिरस, आंङ्गिरस " लिखना चाहिए क्या ये उचित है?
यही शास्त्रीय कारण हैं जो कोई नहीं बताता गौत्र इसलिए बनाया गया था ताकि आपसी "गुण-सूत्र" न मिले।
आयुर्वेद कहता है - समान गुण वाले माता-पिता की संतान दुर्बल होती है।
भारद्वाज गोत्र - क्रोधी, तपस्वी गुण
वशिष्ठ गोत्र - शांत, क्षमाशील गुण
भृगु गोत्र - तेज, भोगी गुण
कश्यप गोत्र - सृजनशील गुण
यदि भारद्वाज का विवाह भारद्वाज में ही हो तो क्रोध + क्रोध = महा क्रोधी संतान।
इसलिए ऋषियों ने कहा अपना गुण छोड़, दूसरे गुण से मिलाओ।
*भारद्वाज का विवाह वशिष्ठ में करो तो तप + क्षमा = संतुलित संतान।*
*गोत्र-प्रवर का मुख्य कारण था।* इसलिए आपस में विवाह मान्य ही नहीं, *अनिवार्य* है ताकि 18 गुण आपस में मिलते रहें और जांगिड़ ब्राह्मण समाज शुद्ध बना रहे।
*निष्कर्ष -*
जांगिड़ ब्राह्मण अंगिरा वंश है, पर अंगिरा वंश का अर्थ है -
अंगिरा की दीक्षा, अंगिरा का ज्ञान।
रक्त अलग-अलग, दीक्षा एक।
इसलिए 18 गोत्रों में विवाह शत-प्रतिशत शास्त्र सम्मत है।
शब्दों या लेखन में फेर बदल हो सकता है, कुछ कार्य करेंगे तो गलती होना लाजिमी है। करना धरना कुछ हैं नही कमियां निकालना आसान है।
✍️अनिल कुमार शर्मा महाराष्ट्र कराड
जय श्री ब्रह्मर्षि अंङ्गिरा जी की 🙏