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Monday, 12 October 2026

दुर्गा शब्द की आघ्यात्मिक व्याख्या और नवार्ण मंत्र

             दुर्गा शब्द की आघ्यात्मिक व्याख्या

दुर्गा शब्द की आघ्यात्मिक व्याख्या में कई पुस्तकें लिखी गई हैं। इस नाम का इतना माहात्म्य है कि स्वयं नारायण, कृष्ण, भैरव आदि ने दुर्गा कवच की रचना की है।

द, र्, उ, ग, आ ये पाँचों वर्ण अग्नि तत्त्व के हैं। सभी वर्णों की भिन्न भिन्न व्याख्या है जिसे किसी अन्य दिन जानने का प्रयत्न करेंगे । 
दुर्गा नाम की सबसे सरल व्याख्या यही है कि-
                              दुर्+गा 
अर्थात् - दुर् से दुःख, दुर्गति, दुरति, दोष, दुराचार, दुराशा आदि से गा यानि गमन कराती हैं, पार करा देती हैं।

दुर्गा ब्रह्म विद्या हैं। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि अर्जुन मेरी महामाया मुझे आच्छादित करके रखती है जिससे भक्त मेरा मूल स्वरूप नहीं देख पाते। जो ब्रह्म को भी आच्छादित कर ले वो महामाया दुर्गा हैं। किसी वस्तु को आच्छादित करने के लिये दूसरी वस्तु को उससे बड़ा होना चाहिए। कुरुक्षेत्र में युद्ध आरम्भ होने से पहले ही भगवान कृष्ण अर्जुन से दुर्गा की स्तुति करवाते हैं और बलि प्रदान करवाते हैं।

दुर्गा महात्म्य में जितना भी लिखा जायेगा अल्प ही होगा। दुर्गा नाम ही अपने में द्वाक्षरीय मंत्र है जिसे जपने से सारे कष्ट दूर होते हैं। निर्गुण स्वरूप के लिये जो महत्त्व गायत्री मंत्र का है वही महत्त्व सगुण स्वरूप के लिये नवार्ण मंत्र का है ।
  नवार्ण मंत्र का सही और प्रामाणिक लिखित रुप हैं - 
             "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे"     
इस महामंत्र का शुद्ध उच्चारण करने के लिए इसके प्रत्येक बीज मंत्र और अक्षर को सही तरीके से बोलना आवश्यक है। 
अक्षरों के अनुसार शुद्ध उच्चारण की विधि इस प्रकार है:

* ॐ — इसका उच्चारण 'ओम्' (Om) करें।
* ऐं — इसे 'ऐङ्' या 'ऐम्' की तरह हल्के अनुनासिक (नाक से निकलने वाली ध्वनि) के साथ बोलें। ध्यान रखें कि यह 'ऐन' या 'एंग' नहीं है, बल्कि 'ऐ' के ऊपर बिंदु की शुद्ध ध्वनि है। 
* ह्रीं — इसका उच्चारण 'ह्रीङ्' या 'ह्रीम्' करें। इसमें 'ह', 'र' और 'ई' की संयुक्त ध्वनि के साथ अंत में अनुनासिक स्वर आता है। 
* क्लीं — इसे 'क्लीङ्' या 'क्लीम्' बोलें। इसे 'कलीम' (क-ली-म) अलग करके न बोलें, बल्कि आधा 'क' और 'लीं' को एक साथ मिलाकर बोलें। 
* चामुण्डायै — इसका शुद्ध रूप 'चा-मुन्-डायै' है। कई लोग इसे जल्दबाजी में 'चामुंडाय' बोल देते हैं, जो कि गलत है। अंत में 'यै' (ऐ की मात्रा) का स्पष्ट उच्चारण होना चाहिए। 
* विच्चे — इसका उच्चारण 'विच्-चे' करें। 

उच्चारण के दौरान रखें यह विशेष ध्यान:
जब आप मंत्र का जाप तीव्रता (तेज गति) से करते हैं, तो बीज मंत्रों (ऐं ह्रीं क्लीं) के अंत में आने वाला अनुनासिक स्वाभाविक रूप से 'ङ्' (ng की हल्की ध्वनि) जैसा सुनाई देता है। यदि आप रुक-रुक कर आराम से जाप कर रहे हैं, तो मकार (म) जैसी शुद्ध ध्वनि रख सकते हैं। तंत्र साधना में मंत्रों की अक्षरीय शुद्धता अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। 

     जपेत् दुर्गा, स्मरेत् दुर्गा, यजेत् दुर्गा भवनाशिनी।

              🙏🏻जय जय श्री दुर्गा भवानी🙏🏻
           साभार - ✍️ प्रवीण चावला, बीकानेर 
      ( सोमवार अश्विन शुक्ल २ विक्रम संवत् २०८३ )
                   12 अक्टूबर 2026 ईस्वी 
                          वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Saturday, 10 October 2026

नदी स्त्री है। किन्तु वैसी स्त्री, जिसमें अणिमा और लघिमा नहीं, गरिमा और महिमा है। इसी कारण, नदी माता है, देवी है, पूज्या है, पोषिता है।

नदी स्त्रीवाचक है। एक कहानी में मैंने देखा कि नायिका का नाम नदी था। किसी स्त्री का नदी से सुंदर नाम शायद ही कोई हो सकता है।

भारत की लगभग सभी नदियाँ स्त्रैण हैं। उनके नाम स्त्रीवाचक हैं- गंगा, यमुना, नर्मदा, कृष्णा, कावेरी, गोदावरी, सिन्धु, तीस्ता, गोमती, नारायणी। किन्तु कुछ नद पुरुषवाचक भी हैं। अपने आकार-प्रकार के अनुसार वे महानद भी कहलाए हैं। जैसे ब्रह्मपुत्र, शोणभद्र, शिवनाथ, दामोदर। इसी तरह अजय, रूपनारायण, लोहित आदि भी हैं।

नदी का पुरुषवाचक नाम जाने क्यूँ थोड़ा खटकता है!

रोचक यह है कि ये सभी नद-महानद समुद्र के बजाय किसी ना किसी नदी में ही विलीन होते हैं। ब्रह्मपुत्र अपनी यात्रा पूर्ण कर मेघना में, शोणभद्र गंगा में, शिवनाथ महानदी में, दामोदर भागीरथी में जाकर मिल जाता है।

नदी का संगम समुद्र से होता है, नद का नदी से। कोई नद अकेले अपने बूते समुद्र तक चला गया हो, यह भारत में तो देखने को नहीं मिलता। वह नदी में अपने यश को विलीन करके ही बूंद से समुंद बनता है।

समुद्र-संगम की सप्तपदी में पहला क़दम नदी ही आगे बढ़ाती है। नद उसके पीछे-पीछे अनुगामी-सा आता है। नदी नारी है, नद नर। नदी वधू है, नद वर!

भारतीय परम्परा में नदी के प्रति ही स्त्री का यह भाव क्यों जाग्रत हुआ- वृक्ष, अरण्य, पर्वत, समुद्र, मेघ जैसे पुरुषवाचक प्राकृत-तत्त्वों के प्रति क्यों नहीं- यह पृथक से विवेचना का विषय होना चाहिए।

नदी स्त्री है। किन्तु वैसी स्त्री, जिसमें अणिमा और लघिमा नहीं, गरिमा और महिमा है। इसी कारण, नदी माता है, देवी है, पूज्या है, पोषिता है। वह जन्म भी देती है, पोसती भी है, अपने भीतर समा भी लेती है।

इनमें भी नर्मदा सबसे विशिष्ट हैं। वे स्त्री, माता, देवी तो हैं ही- योगिनी भी हैं, वैरागिनी भी हैं, साध्वी हैं, तपस्विनी हैं। शिव की देह से उत्पन्न हुईं। शोणभद्र के विश्वासघात से रूठकर पूर्व दिशा से जो मुँह फेरा तो पश्चिम में सागर-संगम तक फिर किसी से आसक्ति नहीं की। अपने साथ अपनी समस्त सहयोगिनियों-सहचरियों को लेकर समुद्र में वे विलीन हो जाती हैं। 

अभी प्रगल्भा, अभी गम्भीरा। कभी किशोरी, कभी प्रौढ़ा। अभी तन्वंगी, अभी सुदीर्घा। कभी अभिमानिनी, कभी अनासक्ता। नर्मदा के कई रूप हैं।

नर्मदा की यात्रा की पूर्णता में नदी और स्त्री का रूपक भी अपनी पूर्णता पा जाता है!

Sushobhit

गंगा अस्थि विसर्जन प्रवाह को बन्द कराने को लेकर निवेदन और शंकराचार्य जी महाराज की प्रतिक्रिया

(एक राजनेता के द्वारा पुरी शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज के श्री चरणों मे गंगा अस्थि विसर्जन प्रवाह को बन्द कराने को लेकर निवेदन और शंकराचार्य जी महाराज की प्रतिक्रिया)
.

प्रश्न- महाराज जी मैं साधु- संतो से आग्रह करता हूँ कि वे ऐसी प्रेरणा दें कि अस्थियों को गंगा में न प्रवाहित करें ताकि गंगा मैली न हों।

उत्तर- मैं जिन्होंने ऐसा वक्तव्य दिया है, उनसे अनुरोध करता हूँ कि वे गंगा जी की अभिव्यक्ति के प्रयोजन का ज्ञान प्राप्त करें।

केन्द्रीय और प्रांतीय शासनतंत्रो के द्वारा गोमुख , गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक जो विभिन्न दिशाहीन परियोजनाएं विकास के नाम पर क्रियान्वित की गई हैं, उनके कारण गंगा में जो विकृति आयी है, 

गंगा विलुप्त होने के कगार पर है उसको समझने का प्रयास करके सबसे पहले टिहरी बांध की परियोजना जिस पर लाभ के स्थान पर हानि ही हानि है, और भविष्य में वह बांध तोड़ दिया गया या अकस्मात टूट गया तो विप्लव ही विप्लव है, उसको निरस्त करें।

केमिकल को लेकर विचार करें तो अस्थिविसर्जन को लेकर गंगा में प्रदूषण की प्राप्ति नहीं होती, लेकिन अस्थिविसर्जन को लेकर शास्त्रीय विधा है।

शास्त्रीय विधा कोई भी हो, वह अंधपरम्परा से रहित व दार्शनिक, वैज्ञानिक तथा व्यवहारिक धरातल पर उसकी उपयोगिता ही सिद्ध होती है।

मन्त्री महोदय को, राजनेता महोदय को , सांसद महोदय को यह विचार करना चाहिए कि शासनतंत्र के द्वारा गंगा जी पर जो कुछ भी विकास के नाम पर अत्याचार हुआ है, उसको शासनतंत्र दूर करने का प्रयास करे।

पहले भी चेतावनियां दी थी उन चेतावनियों की धज्जी उड़ाकर उत्तराखण्ड की सरकार चाहे भाजपा रही हो या कांग्रेस ने बांध परियोजना, नहर परियोजना, सुरंग परियोजना, विद्युत परियोजना को क्रियान्वित किया।

गंगा जी का शिरोभाग आज कल उत्तराखंड में सन्निहित है। गंगा जी अविरलता, निर्मलता वहीं ही कुंठित और विलुप्त है। ऐसी स्थिति में सचमुच में कोई राजनीतिक दल या विशेषकर भाजपा गंगा के प्रति आस्थान्वित है तो हम लोगों से सम्पर्क साध कर गंगा के मौलिक स्वरूप को यथासम्भव उद्भाषित करें।

धार्मिक कृत्यों पर जो कि शास्त्रसम्मत है कटाक्ष करने की अपेक्षा सबसे पहले शासनतंत्र के द्वारा गंगा जी पर जो अत्याचार हुआ है उसको निरस्त करने का प्रयास करें।
गंगा के प्रति अत्याचार का अर्थ होता है- मानवता के प्रति, प्राणिमात्र के प्रति व अपने प्रति अत्याचार।

ये समझना चाहिए कि सगर के पुत्रों के अस्थिउद्धार की भावना से ही गंगा जी का अवतरण हुआ था। गंगा जी के अवतरण का मुख्य प्रयोजन और राजा पांडु आदि की अस्थियों का विसर्जन भी गंगा में हुआ था।

महाभारत पढ़िए। 
दिव्य नदियों में , प्राची - सरस्वती आदि नदियों में अस्थि विसर्जन की सनातन परम्परा है।

मैं एक संकेत करना चाहता हूं, राजा पाण्डु के शरीर को देशज वस्त्र, स्वदेशी शब्द का प्रयोग है। देशज वस्त्र के द्वारा आच्छादित किया गया व गंगा में उसे विसर्जन किया गया। 

आज भी विश्वविद्यालय में दर्शन विभाग के नाम पर कुछ विश्वविद्यालय की स्थापना हुई हो, उस विभाग में कम विद्यार्थी भी हों, उस विभाग को तोड़ा नहीं जाता। तो गंगा के अभिव्यक्ति के प्रयोजन को पहले समझने का प्रयास करना चाहिए। और वैज्ञानिक ढंग से शास्त्रसम्मत जो विधा है, उसको लेकर गंगा में कोई विकृति नहीं प्राप्त होती है।

और मैने भाजपा के अध्यक्ष शाह जी को, जब वो पहली बार मिलने पुरी में आये थे, लगभग 75 मिनटों तक मेरे पास बैठे रहे। मैंने संकेत में कहा था - किसी के शरीर मे कैंसर हो, और तेल चुपड़ दें चमड़ी पर। उससे कैंसर रोग दूर हो जाय सम्भव नहीं ।'
   ।। जय महादेव।।
साभार अनिल वशिष्ठ 
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वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Thursday, 8 October 2026

"सेठानी का जोहड़ा " चूरु - राजस्थान

                     "सेठानी का जोहड़ा "
                   चुरु (राजस्थान) भारत 

चूरु में एक सेठानी ने अपने प्रांत के लोगों को प्यास से मरते देख अपना सारा धन खर्च करके बनवाया हुआ तालाब जो सेठानी के जोहड़ा के नाम से जाना गया।
ये बात तब की है, जब चूरु के लोग एक नई सदी के इंतजार में थे । 18वीं सदी बीतने वाली थी और समय था 1899 –1900 ईस्वी. तभी चूरु में भयानक छप्पनिया अकाल का प्रभाव पड़ा। थार के रेगिस्तान में बसे उस चूरु में जहाँ भारत में सबसे ज्यादा गर्मी पड़ती है। चारों ओर पानी का आभाव था, लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे थे । ऐसे में न केवल मनुष्यों बल्कि पशु पक्षियों और यहां तक गायें भी प्यासी मर रही थी। तभी एक एक धनी मारवाड़ी सेठानी रेत में तपते मनुष्यों से लेकर जानवरों तक की प्यास बुझाने के लिए चूरु में एक ऐसे ऐतिहासिक जोहड़े (तालाब) का निर्माण कराया और उस समय में भी यह सिद्ध कर दिखाया की सेठ ( श्रेष्ठ ) केवल जाति या वर्ण नहीं बल्कि पालनहार हैं । जिसने अकाल के अत्याचार को पराजय दे दी। वो कोई और नहीं बल्कि उस समय में चूरु के जाने–माने मारवाड़ी सेठ भगवानदास बागला की पत्नी थीं।

👉भगवानदास बागला पहले मारवाड़ी शेखावाटी करोड़पति और लकड़ी के व्यापारी होने के साथ–साथ कई सारे मिल के मालिक थे. भगवानदास मूल रुप से चूरु, राजस्थान के रहने वाले थे। सेठानी का जोहड़ा, रतनगढ़ रोड से पश्चिम में 3 किमी दूर हैं। यह तालाब आज भी का ‘नीलगाय’ पक्षियों और अन्य जानवरों को आकर्षित करता है। सेठानी का जोहड़ा चूरु में आने वाले लोगों और पर्यटकों द्वारा सबसे अधिक देखे जाने वाले स्थलों में से एक है।

👉125 साल पुराने सटीक आयताकार कोणीय रूप में निर्मित यह जोहड़ा अपने तीन मुखों से मुखातिब होकर मुख्य द्वार पर दक्षिणाभिमुखी है।आयताकार जोहड़ का मुख्यद्वार दक्षिण की ओर है। जोहड़ के चारो कोणों पर चार भुजाएं आकर मिलती हैं। जोहड़ में 14 स्तम्भो एवं कंगूरों से निर्मित तीन प्रवेश द्वार हैं। यह जोहड़ पत्थरों और चूने से निर्मित है। जिस पर सात स्तम्भों की छतरियाँ का निर्माण किया गया। इन छतरियों का वैभव उकेरे गये भिति चित्रों से बेहद मनमोहक दिखता है। धुंधलें पत्थरों के धरातल पर इस भव्य जोहड़े को चाँदनी रातों में निहारने के लिए दर्शनार्थी आते हैं। 
                  #RajasthanHeritage 
                              #churu 
        साभार - Rajasthani Vlog फेसबुक पोस्ट 
                      वयं राष्ट्रे जागृयाम 

कर्म और भाग्य

                       कर्म और भाग्य

                  चिंतन करने योग्य कहानी

बहुत समय पहले की बात है - एक गाँव में एक साधारण व्यक्ति रहता था। एक दिन वह लोटा लेकर पानी भरने निकला। पहले वह कुएँ पर पहुँचा, पर मन में विचार आया—
“तालाब कुएँ से बड़ा होता है, वहाँ अधिक पानी मिलेगा।”
वह तालाब की ओर चल पड़ा।
तालाब पहुँचा, तो फिर मन बोला—
“नदी तो तालाब से भी विशाल है, वहाँ तो और अधिक जल मिलेगा।”
वह नदी पर पहुँचा। नदी का बहाव देखकर फिर सोचने लगा—
“समुद्र में तो अनंत जल है, वहाँ चलूँगा तो जीवन भर का पानी मिल जाएगा।”
अब वह समुद्र के किनारे जा पहुँचा।
चारों ओर जल ही जल था— अथाह, अनंत, विराट विस्तार।
लहरें उठ रही थीं, क्षितिज तक नीला फैलाव था।
मन प्रसन्न हो गया— “अब तो कमी नहीं रहेगी।”
उसने लोटा आगे बढ़ाया और पानी भरा।
पर जैसे ही लोटा देखा, वह ठिठक गया।
समुद्र चाहे जितना भी विशाल हो,
लोटे में उतना ही पानी था—
जितना उसमें समा सकता था।
वह देर तक लोटे को देखता रहा…
फिर समुद्र को देखा…
और फिर उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान आ गई।
उसे समझ आ गया—
समस्या समुद्र में नहीं थी,
समस्या पात्र की क्षमता में थी।
उसी क्षण उसे जीवन का सत्य दिखाई दिया—
यह लोटा केवल पानी का पात्र नहीं था,
यह भाग्य का प्रतीक था।
मनुष्य चाहे कुएँ तक जाए,
तालाब तक पहुँचे,
नदी तक पहुँचे,
या समुद्र तक—
मिलेगा उसे उतना ही,
जितना उसके भाग्य-पात्र में समाने की क्षमता है।

वह व्यक्ति अब बदला हुआ था।

पर यह क्या? उसके मन में अब एक प्रश्न उठने लगा—
“अगर सब कुछ भाग्य के अनुसार ही मिलता है, तो फिर कर्म करने का क्या अर्थ?” 

“और अगर कर्म से ही भाग्य बनता है, तो फिर ईश्वर की आवश्यकता क्यों?”

चलते-चलते उसे एक विद्यालय दिखाई दिया।
अंदर एक छात्र पढ़ाई कर रहा था— 
मेहनत से, लगन से, अनुशासन से।
उस व्यक्ति ने सोचा—
“यह लड़का परिश्रम तो कर रहा है, पर क्या केवल पढ़ लेने से उसे जीवन में सफलता मिल जाएगी?”
उत्तर भीतर से आया—
नहीं।
जब तक कोई संस्था उसकी योग्यता को स्वीकार नहीं करेगी,
तब तक फल नहीं मिलेगा।
तभी उसे बोध हुआ—
" कर्म योग्यता बनाता है, लेकिन फल स्वीकृति से मिलता है। "

कर्म तैयारी है,
पर फल कृपा है।
अब उसे ईश्वर का अर्थ समझ में आने लगा।
ईश्वर मनुष्य के कर्मों का निर्माता नहीं है,
ईश्वर मनुष्य के कृत कर्मों को स्वीकार कर न्यायपूर्वक फल दाता है ।
हम कर्म करते हैं,
पर उनका फल तभी मिलता है
जब कोई उन्हें स्वीकार करता है।
और वही स्वीकार्यता—
ईश्वर की करुणा है,
ईश्वर की कृपा है।

वह व्यक्ति समुद्र किनारे बैठ गया।
लोटा उसके हाथ में था,
आँखों में शांति थी,
और मन में गहरी स्पष्टता।
अब वह जान गया था—
दुनिया बड़ी है,
समुद्र विशाल है,
अवसर अनंत हैं,
पर जीवन का सत्य यह है—
मिलता उसी को है, जो पात्र बनकर आता है।
वह घर लौटा तो पहली बार उसने अपने जीवन को नए दृष्टिकोण से देखा—
परिवार को देखा,
शरीर को देखा,
स्वास्थ्य को देखा,
सांसों को देखा,
रिश्तों को देखा,
अवसरों को देखा—
और पहली बार मन से निकला—
“यह सब मेरा नहीं है…
यह सब मुझे मिला है।”
और जिसने दिया है,
वही " ईश्वर " है।

                   -: " कहानी की सीख " :- 
ईश्वर को मानो—
डर से नहीं,
मांगने के लिए नहीं,
सौदे के लिए नहीं,
बल्कि इसलिए कि—
वह हमारे कर्मों को स्वीकार करता है,
और कर्म अनुसार हमारे पात्र को भरता है,
तथा बिना किसी पक्षपात के हमें फल देता है।
यही उसकी कृपा है।
यही जीवन का सत्य है।
और यही भक्ति की वास्तविक परिभाषा है।
                          🙏🏻 🌸 🙏🏻
      साभार - प्रवीण चावला, बीकानेर ( राजस्थान )
                       वयं राष्ट्रे जागृयाम 

‘सदाचार का तावीज’ परसाई जी की रचना बताती हैं कि सदाचार केवल शब्दों, नारों या प्रतीकों से नहीं आता।

                     साहित्यिक कड़ी

    हरिशंकर परसाई — ‘सदाचार का तावीज’

लेखक परिचय

हरिशंकर परसाई (1924–1995) हिंदी के महान व्यंग्यकार थे। उन्होंने अपने व्यंग्य के माध्यम से समाज, राजनीति, प्रशासन, भ्रष्टाचार, पाखंड और अवसरवाद की विसंगतियों को उजागर किया। उनकी विशेषता यह थी कि वे हँसाते हुए पाठक को गंभीर सामाजिक प्रश्नों पर सोचने के लिए विवश कर देते थे।

रचना का मूल कथांक

‘सदाचार का तावीज’ में परसाई ने एक काल्पनिक राज्य की कथा प्रस्तुत की है। उस राज्य में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है। जनता और शासन के बीच इसकी चर्चा होने लगती है।

राजा को जब पता चलता है कि उसके राज्य में भ्रष्टाचार फैल रहा है तो वह चिंतित होता है। वह अपने अधिकारियों से पूछता है कि भ्रष्टाचार को कैसे समाप्त किया जाए।

अधिकारी और दरबारी राजा को तरह-तरह के उपाय बताते हैं। अंततः एक ऐसे व्यक्ति की तलाश की जाती है जो भ्रष्टाचार को पहचान सके और उससे बचने का उपाय बता सके।

कथा में व्यंग्यात्मक ढंग से यह स्थिति सामने आती है कि भ्रष्टाचार केवल नीचे के कर्मचारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था में उसकी जड़ें फैल चुकी हैं। ऊपर बैठे लोग भी उससे पूरी तरह अलग नहीं हैं।

राजा के सामने सदाचार की बातें होती हैं और सत्यनिष्ठता का महत्व बताया जाता है। लेकिन वास्तविक जीवन में वही लोग अपने स्वार्थ और लाभ के लिए व्यवस्था का उपयोग करते दिखाई देते हैं।

यहीं से ‘सदाचार का तावीज’ शीर्षक का व्यंग्य सामने आता है—मानो केवल एक तावीज बाँध लेने से व्यक्ति सदाचारी और भ्रष्टाचार-मुक्त हो जाएगा।

कथा का व्यंग्य

परसाई की दृष्टि में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या केवल उपदेश, प्रतीक और दिखावटी सत्यनिष्ठता से भ्रष्टाचार समाप्त हो सकता है?

वे दिखाते हैं कि जब भ्रष्टाचार व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है, तब भ्रष्टाचार के विरुद्ध भाषण देने वाले लोग भी कभी-कभी उसी व्यवस्था से लाभ उठाते रहते हैं।

यही इस कथा की सबसे महत्वपूर्ण विडंबना है।

आज के सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में

आज भी यह रचना इसलिए प्रासंगिक लगती है क्योंकि समाज में भ्रष्टाचार के साथ-साथ उसका विरोध करने का दिखावा भी दिखाई देता है। राजनीति और प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिकता आज भी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।

परसाई किसी एक व्यक्ति पर व्यंग्य नहीं करते; वे उस मानसिकता पर चोट करते हैं जिसमें व्यक्ति अपने स्वार्थ को बचाते हुए सदाचार की बातें करता है।

रचना का संदेश

‘सदाचार का तावीज’ हमें बताता है कि सदाचार केवल शब्दों, नारों या प्रतीकों से नहीं आता। उसके लिए आचरण में धर्मनिष्ठता, व्यवस्था में पारदर्शिता और व्यक्ति में नैतिक साहस आवश्यक है।

परसाई की शक्ति यही है कि वे गंभीर राजनीतिक और सामाजिक प्रश्न को हास्य और व्यंग्य के माध्यम से इतना सहज बना देते हैं कि पाठक हँसते-हँसते अपने आसपास की व्यवस्था पर विचार करने लगता है।

                          ★★★★★
                   साभार ✍️ नरोत्तम शर्मा 
                     मो ० 9460026661

   सदाचार का तावीज (व्यंग्य) : हरिशंकर परसाई।  

एक राज्य में हल्ला मचा कि भ्रष्टाचार बहुत फैल गया है ।
राजा ने एक दिन दरबारियों से कहा, "प्रजा बहुत हल्ला मचा रही है कि सब जगह भ्रष्टाचार फैला हुआ है । हमें तो आज तक कहीं नहीं दिखा । तुम लोगों को नहीं दिखा हो तो बताओ।"
दरबारियों ने कहा- "जब हुजूर को नहीं दिखा तो हमें कैसे दिख सकता है ?"
राजा ने कहा- "नहीं, ऐसा नहीं है। कभी-कभी जो मुझे नहीं दीखता, वह तुम्हे दीखता होगा । जैसे मुझे बुरे सपने कभी नहीं दीखते, पर तुम्हें दिखते होंगे!"
दरबारियों ने कहा- "जी, दिखते हैं । पर वह सपनों की बात है ।"

राजा ने कहा- "फिर भी तुम लोग सारे राज्य में ढूंढ़ कर देखो कि कहीं भ्रष्टाचार तो नहीं है । अगर कहीं मिल जाए तो हमारे देखने के लिए नमूना लेते आना । हम भी तो देखें कि कैसा होता है ।"

एक दरबारी ने कहा- "हुजूर, वह हमें नहीं दिखेगा । सुना है, वह बहुत बारीक होता है । हमारी आँखें आपकी विराटता देखने की इतनी आदत हो गई है कि हमें बारीक चीज नहीं दिखती। (चापलूस) हमें भ्रष्टाचार दिखा भी तो उसमें हमें आपकी ही छवि दिखेगी, क्योंकि हमारी आँखों में तो आपकी ही सूरत बसी है । पर अपने राज्य में एक जाति रहती है जिसे "विशेषज्ञ" कहते हैं । इस जाति के पास कुछ ऐसा अंजन (काजल) होता है कि उसे आँखों में आँजकर (लगाकर) वे बारीक से बारीक चीज भी देख लेते हैं । मेरा निवेदन है कि इन विशेषज्ञों को ही हुजूर भ्रष्टाचार ढूंढ़ने का काम सौंपे ।"

राजा ने "विशेषज्ञ" जाति के पाँच आदमी बुलाए और कहा- "सुना है, हमारे राज्य में भ्रष्टाचार है । पर वह कहाँ है, यह पता नहीं चलता । तुम लोग उसका पता लगाओ । अगर मिल जाए तो पकड़कर हमारे पास ले आना । अगर बहुत हो तो नमूने के लिए थोड़ा-सा ले आना ।"

विशेषज्ञों ने उसी दिन से छान-बीन शुरू कर दी ।
दो महीने बाद वे फिर से दरबार में हाजिर हुए ।
राजा ने पूछा- "विशेषज्ञों ! तुम्हारी जाँच पूरी हो गई ?"
"जी, सरकार ।"
"क्या, तुम्हेँ भ्रष्टाचार मिला ।"
"जी, बहुत सा मिला ।"
राजा ने हाथ बढ़ाया- "लाओ मुझे बताओ । देखूँ कैसा होता है ।"

विशेषज्ञों ने कहा- "हुजूर, वह हाथ की पकड़ में नहीँ आता । वह स्थूल नहीं, सूक्ष्म है, अगोचर है । पर वह सर्वत्र व्याप्त है । उसे देखा नहीं जा सकता, अनुभव किया जा सकता है ।

राजा सोच में पड़ गए । बोले - "विशेषज्ञों ! तुम कहते हो कि वह सूक्ष्म है, अगोचर है और सर्वव्यापी है । ये गुण तो ईश्वर के हैं । तो क्या भ्रष्टाचार ईश्वर है ?"
विशेषज्ञों ने कहा- "हाँ, महाराज, अब भ्रष्टाचार ईश्वर हो गया है ।"
एक दरबारी ने पूछा- "पर वह है कहाँ ? कैसे अनुभव होता है ?"

विशेषज्ञों ने जवाब दिया- "वह सर्वत्र है । वह इस भवन में है । वह महाराज के सिंहासन में है ।"
"सिंहासन में है !" कहकर राजा साहब उछलकर दूर खड़े हो गए ।

विशेषज्ञों ने कहा- "हाँ, सरकार सिंहासन में है । पिछले माह इस सिंहासन पर रंग करने के जिस बिल का भुगतान किया गया है, वह बिल झूठा है । वह वास्तव में दुगुने दाम का है । आधा पैसा बीच वाले खा गए । आपके पूरे शासन में भ्रष्टाचार है और वह मुख्यत: घूस के रूप में है ।"
विशेषज्ञों की बात सुनकर राजा चिन्तित हुए और दरबारियों के कान खड़े हुए ।
राजा ने कहा- "यह तो बड़ी चिन्ता की बात है । हम भ्रष्टाचार बिल्कुल मिटाना चाहते हैं । विशेषज्ञो, तुम बता सकते हो कि वह कैसे मिट सकता है ?"

विशेषज्ञों ने कहा- "हाँ महाराज, हमने उसकी भी योजना तैयार की है । भ्रष्टाचार मिटाने के लिए महाराज को व्यवस्था में बहुत परिवर्तन करने होंगे । एक तो भ्रष्टाचार के मौके मिटाने होंगे । जैसे ठेका है तो ठेकेदार हैं और ठेकेदार है तो अधिकारियों को घूस है । ठेका मिट जाए तो उसकी घूस मिट जाए । इसी तरह और बहुत सी चीजें है । किन कारणों से आदमी घूस लेता है, यह भी विचारणीय है ।"
राजा ने कहा- "अच्छा, तुम अपनी पूरी योजना रख जाओ । हम और हमारा दरबार उस पर विचार करेंगे ।"
विशेषज्ञ चले गए ।
राजा ने और दरबारियों ने भ्रष्टाचार मिटाने की योजना को पढ़ा । उस पर विचार किया ।

विचार करते दिन बीतने लगे और राजा का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा ।
एक दिन एक दरबारी ने कहा- "महाराज, चिन्ता के कारण आपका स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा है । उन विशेषज्ञों ने आपको झंझट में डाल दिया ।"
राजा ने कहा- "हाँ, मुझे रात को नींद नहीं आती ।"
दूसरा दरबारी बोला- "ऐसी रिपोर्ट को आग के हवाले कर देना चाहिए जिससे महाराज की नींद में खलल पड़े ।"

राजा ने कहा- "पर करें क्या? तुम लोगों ने भी भ्रष्टाचार मिटाने की योजना का अध्ययन किया है । तुम्हारा क्या मत है? क्या उसे काम में लाना चाहिए?"

दरबारियों ने कहा- "महाराज, वह योजना क्या है, एक मुसीबत है । उसके अनुसार कितने उलट-फेर करने पड़ेंगे ! कितनी परेशानी होगी ! सारी व्यवस्था उलट-पलट हो जाएगी । जो चला आ रहा है, उसे बदलने से नई-नई कठिनाइयाँ पैदा हो सकती हैं । हमें तो कोई ऐसी तरकीब चाहिए जिससे बिना कुछ उलट-फेर किए भ्रष्टाचार मिट जाए ।"
राजा साहब बोले- "मैं भी यही चाहता हूँ । पर यह हो कैसे ? हमारे प्रपितामह को तो जादू आता था; हमें वह भी नहीं आता । तुम लोग ही कोई उपाय खोजो ।"

एक दिन दरबारियों ने राजा के सामने एक साधु को पेश किया और कहा- "महाराज, एक कन्दरा में तपस्या करते हुए इस महान साधक को हम ले आये हैं । इन्होंने सदाचार का तावीज बनाया है । वह मन्त्रों से सिद्ध है और उसके बाँधने से आदमी एकदम सदाचारी हो जाता है ।"

साधु ने अपने झोले में से एक तावीज निकालकर राजा को दिया । राजा ने उसे देखा । बोले- "हे साधु, इस तावीज के विषय में मुझे विस्तार से बताओ । इससे आदमी सदाचारी कैसे हो जाता है ?"

साधु ने समझाया- "महाराज, भ्रष्टाचार और सदाचार मनुष्य की आत्मा में होता है; बाहर से नहीं होता । विधाता जब मनुष्य को बनाता है तब किसी की आत्मा में धर्मनिष्ठ-सत्य की कल फिट कर देता है और किसी की आत्मा में अधर्म-असत्य की । इस कल में से धर्म या अधर्म के स्वर निकलते हैं, जिन्हें 'आत्मा की पुकार' कहते हैं । आत्मा की पुकार के अनुसार आदमी काम करता है । प्रश्न यह है कि जिनकी आत्मा से अधर्म के स्वर निकलते हैं, उन्हें दबाकर धर्म के स्वर कैसे निकाले जाएँ ? मैं कई वर्षों से इसी के चिंतन में लगा हूँ । अभी मैंने यह सदाचार का तावीज बनाया है । जिस आदमी की भुजा पर यह बंधा होगा, वह सदाचारी हो जाएगा । मैंने कुत्ते पर भी इसका प्रयोग किया है । यह तावीज गले में बाँध देने से कुत्ता भी रोटी नहीं चुराता। बात यह है कि इस तावीज में से भी सदाचार के स्वर निकलते हैं । जब किसी की आत्मा अधर्म (बेईमानी) के स्वर निकालने लगती है तब इस तावीज की शक्ति आत्मा का गला घोंट देती है और आदमी को तावीज से धर्म (ईमान) के स्वर सुनाई पड़ते हैं । वह इन स्वरों को आत्मा की पुकार समझकर सदाचार की ओर प्रेरित होता है । यही इस तावीज का गुण है, महाराज!"
दरबार में हलचल मच गई । दरबारी उठ-उठकर तावीज को देखने लगे ।

राजा ने खुश होकर कहा- "मुझे नहीं मालूम था कि मेरे राज्य में ऐसे चमत्कारी साधु भी हैं । महात्मन्, हम आपके बहुत आभारी हैं । आपने हमारा संकट हर लिया । हम सर्वव्यापी भ्रष्टाचार से बहुत परेशान थे । मगर हमें लाखों नहीं, करोड़ों तावीज चाहिए । हम राज्य की ओर से तावीजों का कारखाना खोल देते हैं ।आप उसके जनरल मैनेजर बन जाएँ और अपनी देख रेख में बढ़िया तावीज बनवाएँ ।"

एक मन्त्री ने कहा- "महाराज, राज्य क्यों झंझट में पड़े ? मेरा तो निवेदन है कि साधु बाबा को ठेका दे दिया जाए । वे अपनी मण्डली से तावीज बनवा कर राज्य को सप्लाई कर देंगे ।"

राजा को यह सुझाव पसन्द आया । साधु को तावीज बनाने का ठेका दे दिया गया । उसी समय उन्हें पाँच करोड़ रूपये कारखाना खोलने के लिए पेशगी मिल गए ।
राज्यों के अखबारों में खबरें छपीं-सदाचार के तावीज की खोज ! तावीज बनाने का कारखाना खुला!'
लाखों तावीज बन गए । सरकार के हर सरकारी कर्मचारी की भुजा पर एक-एक तावीज बाँध दिया गया ।
भ्रष्टाचार की समस्या का ऐसा सरल हल निकल आने से राजा और दरबारी सब खुश थे ।
एक दिन राजा की उत्सुकता जागी । सोचा- "देखें तो क्या यह तावीज कैसे काम करता है !"
वह वेश बदलकर एक कार्यालय गए । उस दिन 2 तारीख थी । एक दिन पहले तनख्वाह मिली थी ।
वह एक कर्मचारी के पास गए और कई काम बताकर उसे पाँच रूपये का नोट देने लगे ।
कर्मचारी ने उन्हें डाँटा- "भाग जाओ यहाँ से! घूस लेना पाप है !"
राजा बहुत खुश हुए । तावीज ने कर्मचारी को धर्मनिष्ठ और सत्यनिष्ठ बना दिया था ।
कुछ दिन बाद वह फिर वेश बदलकर उसी कर्मचारी के पास गए । उस दिन इकत्तीस तारीख थी- महीने का आखरी दिन ।
राजा ने फिर से पाँच का नोट दिखाया और उसने लेकर जेब में रख लिया ।
राजा ने उसका हाथ पकड़ लिया । बोले- "मैं तुम्हारा राजा हूँ । क्या तुम आज सदाचार का तावीज बाँधकर नहीं आए ?"
"बाँधा है, सरकार, यह देखिए !"
उसने आस्तीन चढ़ाकर तावीज दिखा दिया ।
राजा असमंजस में पड़ गए । फिर ऐसा कैसे हो गया ?
उन्होंने तावीज पर कान लगाकर सुना । तावीज में से स्वर निकल रहे थे - 
"अरे, आज इकत्तीस है । आज तो ले ले !"

                           ★★★★★

                         वयं राष्ट्रे जागृयाम 

सफलता हमें खुशी देती है, लेकिन 'ना' को संभालना हमें जीवन देता है।

॥ॐ॥

मित्रों !
  " हां " अर्थात् लोगों का Attention, प्राप्त सफलताऐं और प्रशंसाएं हमें खुशीयां देती है, लेकिन " ना " अर्थात् Ignorance, असफलताओं और लोगों की आलोचनाओं को सम्हालना हमें जीवन देता हैं ।

क्योंकि जीतने वाले को तालियां मिलती हैं, लेकिन हारकर उठने वाले को जीवन मिलता हैं। 

  इसे ठीक से समझने के लिए मुझे मेरे अनुज भ्राता देवेन्द्र द्वारा भेजा वाट्स एप पर प्राप्त एक अज्ञात व्यक्ति का लेख साझा कर रहा हूं कृपया समय निकाल कर इसे अवश्य पढ़ें ।

मेरी बिटिया ने अपनी यूरोप यात्रा से लौट कर मुझे एक ऐसा किस्सा सुनाया जिसे सुनकर मैं देर तक सोचता रहा, और लगा कि ये सिर्फ एक किस्सा नहीं, हम सबके लिए एक आईना है।

वह एम्स्टर्डम में Costco स्टोर गई थी। बाहर हल्की ठंड थी, लोग जल्दी-जल्दी अंदर-बाहर आ-जा रहे थे।

गेट के पास एक छोटा बच्चा खड़ा था। मुश्किल से पाँच साल का होगा। हाथ में चिप्स के कुछ पैकेट और गले में एक छोटा-सा बोर्ड लटका था। बोर्ड पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था - "स्काउट चैरिटी के लिए, सिर्फ $20 में।"

लोग उसके बगल से गुजर रहे थे। किसी को जल्दी थी, कोई फोन पर था, कोई देखकर भी अनदेखा कर रहा था।

लेकिन वो बच्चा... वो हार नहीं मान रहा था।

वो हर आने-जाने वाले के पास अपनी छोटी-छोटी टांगों से चलकर जाता, ऊपर देखता और बड़ी मासूमियत से पूछता, "क्या आप एक पैकेट खरीदेंगे?"

कोई खरीद लेता। कोई मुस्कुराकर कहता, "नहीं बेटा, थैंक यू।"

मैंने सोचा, इतना छोटा बच्चा, इतनी बार 'ना' सुनकर रो देगा, उदास हो जाएगा, अपनी टीचर के पीछे छिप जाएगा।

लेकिन नहीं।

वो हर 'ना' के बाद मुस्कुराता, हल्के से सिर हिलाता और अगले व्यक्ति की तरफ मुड़ जाता। उसके चेहरे पर न शर्म थी, न डर, न निराशा। सिर्फ एक अजीब-सा आत्मविश्वास था।

बिटिया से रहा नहीं गया। उसने एक पैकेट खरीद लिया। बच्चे की आँखें चमक उठीं। उसने उछलकर कहा, "थैंक यू सो मच!"

फिर बिटिया ने प्यार से पूछा, "तुम्हें और कितने पैकेट बेचने हैं? तुम यहाँ कब तक खड़े रहोगे?"

बच्चे ने जो जवाब दिया, वो बिटिया को अंदर तक हिला गया।

उसने कहा, "जब तक 100 लोग मुझे NO नहीं कह देते, तब तक!"

बिटिया हैरान रह गयी। उसने बगल में खड़ी टीचर की तरफ देखा। टीचर मुस्कुराईं और बोलीं,

"हमारा मकसद पैकेट बेचना नहीं है। हमारा मकसद है कि ये बच्चा इस उम्र में 'ना' सुनना सीखे। 'ना' को सुनकर उसे स्वीकार करना सीखे, और फिर भी अगले इंसान से पूछने की हिम्मत रखे।"

सुनकर बिटिया चुप हो गई। 
मैं भी चुप हो गया।

हम अपने बच्चों को क्या सिखाते हैं?

खूब पढ़ो, फर्स्ट आओ, कॉम्पिटिशन जीतो, सिलेक्ट हो जाओ, सबसे आगे निकलो।

हम उन्हें जीतना सिखाते हैं। लेकिन हम उन्हें हारना नहीं सिखाते।

हम उन्हें सफलता का रास्ता दिखाते हैं, लेकिन असफलता से गुजरने की हिम्मत नहीं देते।

जबकि जिंदगी में सबसे ज्यादा जरूरत उसी हिम्मत की पड़ती है।

क्योंकि जिंदगी हमेशा 'हाँ' नहीं कहेगी।

कुछ एग्जाम छूट जाएंगे। कुछ इंटरव्यू क्लियर नहीं होंगे। कुछ बिजनेस फेल होंगे। कुछ रिश्ते टूटेंगे। कुछ सपने देर से पूरे होंगे।

उस दिन जो 'ना' मिलेगा, वो हमें तोड़ भी सकता है और बना भी सकता है। फर्क सिर्फ इतना होगा कि हमने बचपन में 'ना' से दोस्ती की है या दुश्मनी।

वो पाँच साल का बच्चा Costco के बाहर चिप्स नहीं बेच रहा था।

वो हिम्मत बेच रहा था। वो 'ना' इकट्ठा कर रहा था। वो रिजेक्शन को गले लगाना सीख रहा था। वो जिंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा की तैयारी कर रहा था - गिरकर उठने की परीक्षा।

सोचिए, अगर हमारा बच्चा 10वीं में फेल हो जाए तो हम क्या करते हैं? डांटते हैं, ताना मारते हैं, शर्मा जाते हैं।

अगर वो इंटरव्यू में रिजेक्ट हो जाए तो हम कहते हैं, "तुमसे नहीं होगा।"

हम अनजाने में उसे सिखा देते हैं कि 'ना' का मतलब है - तुम बेकार हो।

जबकि उस टीचर ने सिखाया कि 'ना' का मतलब है - अभी नहीं, फिर कोशिश करो।

दोस्तों, सफलता हमें खुशी देती है, लेकिन 'ना' को संभालना हमें जिंदगी देता है।

आज से अपने बच्चों से सिर्फ ये मत पूछिए, "बेटा, जीते या हारे? कितने मार्क्स आए?"

कभी-कभी ये भी पूछिए, "बेटा, आज कितनी बार 'ना' सुना? और फिर भी तुमने कोशिश की? मुझे तुम पर गर्व है।"

ऐसे बच्चे मत पालिए जो सिर्फ जीतने से खुश हों।
ऐसे बच्चे पालिए जो हारने से डरते न हों।

क्योंकि जीतने वाले को तालियां मिलती हैं, लेकिन हारकर उठने वाले को जिंदगी मिलती है।

उस नन्हे बच्चे को सलाम, जिसने 100 'ना' से हमें जिंदगी का सबसे बड़ा 'हाँ' सिखा दिया।

अगर ये कहानी आपके दिल को छू गई हो, तो इसे किसी ऐसे माता-पिता तक जरूर पहुंचाएं जो आज अपने बच्चे के रिजल्ट से परेशान है। शायद उन्हें भी ये याद आ जाए...

*कभी-कभी 100 ना एक हां से ज्यादा सिखा जाते हैं।*

- कापीड-
साभार - भ्राता देवेन्द्र कुमार शर्मा, अंगिरा भवन-जयपुर।

वयं राष्ट्रे जागृयाम