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Monday, 2 November 2026

इरफान हबीब और रोमिला थापर को एक खत #VIJAYMANOHAR TIWARI

        इरफान हबीब और रोमिला थापर को एक खत
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              #VIJAYMANOHAR TIWARI
वामपंथी इतिहासकार इरफान हबीब और रोमिला थापर को कुछ समय पहले एक चिट्ठी लिखी थी। मैंने उन्हें  लिखा है कि आज इतिहास को लेकर भारतीयों में पहले से ज्यादा जागरूकता है। इंटरनेट ने तथ्यों को उजागर करने में बहुत मदद की है। आखिर ऐसा क्या सच सामने आ गया है कि एक समय इतिहास लेखन में इरफान हबीब और रोमिला थापर जैसे बड़े प्रतिष्ठित नाम आज आम लोगों के लिए गाली बन गए हैं। कभी सोचें कि लोग क्यों आप पर लानतें भेज रहे हैं? हो सके तो जवाब दें।
पूरी चिट्ठी इस प्रकार है-
आदरणीय इरफान हबीब साहब/ रोमिला थापर मैम,
सादर प्रणाम। मैं साइंस का विद्यार्थी रहा हूं। मगर बहुत बचपन से ही मेरी दिलचस्पी इतिहास में थी। लेकिन सबसे पास के कॉलेज में इतिहास में एमए की व्यवस्था ही नहीं थी और मैं पढ़ाई के लिए बाहर जा नहीं सकता था इसलिए गणित में एमएससी करके एक साल काॅलेज में पढ़ाया। फिर लिखने के शौक की वजह से मीडिया में आ गया। करीब पच्चीस बरस प्रिंट और टीवी में काम किया। इस दरम्यान पांच साल तक लगातार आठ दफा भारत भर के कोने-कोने में घूमनेे का भी मौका मिला। इन पच्चीस-तीस सालों में इतिहास ने मेरा पीछा कभी नहीं छोड़ा। स्कूल से कॉलेज तक की अपनी पूरी पढ़ाई में जितनी किताबें नहीं पढ़ी होंगी, उतनी अकेले इतिहास की किताबें पढ़ी होंगी। खासतौर से भारत का मध्यकालीन इतिहास। भारत के "मध्यकाल' से आप जैसे विद्वानों का आशय जो भी हो, मेरी मुराद लाहौर-दिल्ली पर तुर्कों के कब्जे के बाद से शुरू हुए भयावह दौर की है।
 मुझे अच्छी तरह याद है कि तीस साल पहले गणित की डिग्री लेते हुए जब इतिहास की किताबों में ताकाझांकी शुरू की थी तब इरफान हबीब और रोमिला थापर के नाम बहुत इज्जत से ही सुने और माने थे। हमने आपको इतिहास लेखन में बहुत ऊंचे दरजे पर देखा था। हम नहीं जानते थे कि इतिहास जैसे सच्चे और महसूस किए जाने वाले विषय में भी कोई मिलावट की गुंजाइश हो सकती है। हम सोच भी नहीं सकते थे कि इतिहास में कोई अपनी मनमर्जी कैसे डाल सकता है। मैं बरसों तक वही पढ़ता रहा, जो आजादी के बाद आप जैसे मनीषियों ने स्थापित किया। सल्तनत काल और फिर मुगल काल के शानदार और बहुत विस्तार से दर्ज एक के बाद एक अध्याय। सल्तनत काल के सुलतानों की बाजार नीतियां, विदेश नीतियां और फिर भारत के निर्माण में मुगल काल के बादशाहों के महान योगदान और सब तरह की कलाओं में उनकी दिलचस्पियां वगैरह। वह कथानक बहुत ही रूमानी था। वह इन सात सौ सालों के इतिहास की एक शानदार पैकेजिंग करता था। उसी पैकेजिंग से हिंदी सिनेमा के कल्पनाशील महापुरुषों ने बड़े परदे पर "मुगले-आजम' और "जोधा-अकबर' के कारनामे रचे।
 चूंंकि मुझे इतिहास में एमए की डिग्री नहीं लेनी थी और न ही पीएचडी करके किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी की नौकरी की तमन्ना या जरूरत थी इसलिए मैं एक आजाद ख्याल मुसाफिर की तरह इतिहास में सदियों तक भटका और कई ऐसे लोगों से अलग-अलग सदियों जाकर मिला, जो अपने समय का सच खुद लिख रहे थे। इस भटकन में एक सिरे को पकड़कर दूसरे सिरे तक गया। एक के बाद दूसरे कोने तक गया। एक सूत्र से दूसरे सूत्र तक गया। मीडिया में बीते ढाई दशक के दौरान कोई साल एेसा नहीं बीता होगा जब मैं किसी न किसी ब्यौरे को पढ़ते हुए ऐसे ही एक से दूसरे सूत्रों तक नहीं पहुंचा होऊं। उस खोजी तरीके ने मेरे दिमाग की खिड़कियां खोलीं। रोशनदान फड़फड़ाए। दरवाजे हिल गए। एक अलग ही तरह का मध्यकाल मेरे सामने अपनी सारी सच्चाई के साथ उजागर हुआ।
ऐसा होना तब शुरू हुआ जब मैंने समकालीन इतिहास के मूल स्त्रोतों तक अपनी सीधी पहुंच बनाई। यह काम उसी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जरिए हुआ, जहां आप इतिहास के एक प्रतिष्ठित आचार्य रहे हैं। मैंने आजादी के बाद की लिखी गई इतिहास की किताबों को अपनी लाइब्रेरी की एक अल्मारी मेंे रखा और सीधे मुखातिब हुआ मध्यकाल के मूल लेखकों से। कुछ के नाम इस प्रकार हैं, गलत हों तो दुरुस्त कीजिएगा, कम हों तो जोड़िएगा-फखरे मुदब्बिर, मिनहाजुद्दीन सिराजुद्दीन जूजजानी, जियाउद्दीन बरनी, सद्रे निजामी, अमीर खुसरो, एसामी, इब्नबतूता, निजामुद्दीन अहमद, फिरिश्ता, मुहम्मद बिहामत खानी, शेख रिजकुल्लाह मुश्ताकी, अल हाजुद्दबीर, सिकंदर बिन मंझू, मीर मुहम्मद मासूम, गुलाम हुसैन सलीम, अहमद यादगार, मुहम्मद कबीर, याहया, ख्वंद मीर, मिर्जा हैदर, मीर अलाउद्दौला, गुलबदन बेगम, जौहर आफताबची, बायजीद ब्यात, शेख अबुल फजल, बाबर और जहांगीर वगैरह। जाहिर है इनके अलावा अौर भी कई हैं, जिन्होंने बहादुर शाह जफर तक की आंखों देखी लिखी।
 इतिहास हमारे यहां एक उबाऊ विषय माना जाता रहा है। आम लोगों की कोई रुचि नहीं रही यह पढ़ने में कि बाबर का बेटा हुमायूं, हुमायूं का बेटा अकबर, उसका बेटा सलीम, उसका बेटा खुर्रम और उसका बेटा औरंगजेब। इसे पढ़ने से मिलना क्या है? गांव-गांव में बिखरी और बरबाद हो रही ऐतिहासिक विरासत के प्रति आम लोगों का नजरिया बहुत ही बेफिक्री का रहा है। उन्हें कोई परवाह ही नहीं कि ये सब कब और किसने बनाए और कब और किसने बरबाद किए, क्यों बरबाद किए। गांव-गांव में बरबादी की निशानियां टूटे-फूटे बुतखानों और बरबाद बुतों की शक्ल में मौजूद हैं। मैं जिस शहर के कॉलेज में पढ़ता था, वहां नौ सौ साल पहले परमार राजाओं ने एक शानदार मंदिर बनाया था, जिसे बाद के दौर में बहुत बुरी तरह तोड़कर बरबाद किया गया और एक मस्जिदनुमा ढांचा उस पर खड़ा किया। डेढ़ लाख आबादी के उस शहर में ज्यादातर बाशिंदे नहीं जानते कि वह सबसे पहले किसने तोड़ा था, कौन लूटकर ले गया था, किसने उसके मलबे से इबादतगाह बनाई?
 अलबत्ता प्राचीन बुतखानों की बरबादी को एकमुश्त सबसे बदनाम मुगल औरंगजेब के खाते में एकमुश्त डाला जाता रहा है। वहां भी पुरातत्व वालों के एक साइन बोर्ड पर आलमगीरी मस्जिद ही लिखा है, जो एक पुराने मंदिर को तोड़कर बनाई गई। वह बरबाद स्मारक उस शहर के एक जख्म की तरह आज भी खड़ा है, जहां बहुत कम लोग ही आते हैं। किसी को कोई मतलब नहीं है। जब मैं समकालीन लेखकों के दस्तावेजी ब्यौरों में गया तो पता चला कि मिनहाजुद्दीन सिराज ने उस मंदिर की ऊंचाई 105 गज ऊंची बताई है, जिसे शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने 1235 के भीषण हमले में तोड़कर बरबाद किया। लेकिन मुझे यह जानकर हैरत हुई कि इतिहास विभाग में नौकरी करने वाले कई प्रोफेसरों को भी इसके बारे में कुछ खास इल्म था नहीं। जब किसी विषय के प्रति किसी भी देश के अवाम में ऐसी उदासीनता और बेफिक्री होती है तो मिलावट और मनमर्जी उन लोगों के लिए बहुत आसान हो जाती है, जो एक खास नजरिए से अतीत की सच्चाइयों को पेश करना चाहते हैं। उस पर अगर सरकारें भी ऐसा ही चाहने लगें तो यकीनन यह अल्लाह की ही मर्जी मानिए।
 मैं अपने मूल विषय पर आता हूं। बरसों तक इतिहास को एक खास पैटर्न पर पढ़ते हुए हमने अलाउद्दीन खिलजी की बाजार नीतियों को इस अंदाज में पढ़ा जैसे कि दिल्ली के किले में बैठकर हुए फैसलों से भारत का शेयर मार्केट आसमान छूने लगा था और विदेशी निवेश में अचानक उछाल आ गया था, जिसने भारत के विकास के सदियों से बंद दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिए थे। जावेद अख्तर जैसे फिल्मकार भी ऐसे ही इतिहास के हवाले से खिलजी की बाजार नीतियों के जबर्दस्त मुरीद देखे गए हैं। इतिहास की उन किताबों को पढ़कर कोई भी सुलतानों और बादशाहों का दीवाना हो जाएगा। जबकि खिलजी के समय अपनी आंखों से सब कुछ देखने वाले लेखकों ने जो बताया है, वह असल इतिहास पूरी तरह गायब है और आपसे बेहतर कौन जानता है कि वह कितना भयावह है।
 मसलन बाजार नीतियों के कसीदों में दिल्ली में सजे गुलामों के बाजार का कोई जिक्र तक नहीं है, जहां दस-बीस तनके में वे लड़कियां गुलाम बनाकर बेची गईं, जो खिलजी की लुटेरी फौजें लूट के माल में हर तरफ से ढो-ढोकर लाई जा रही थीं। जियाउद्दीन बरनी ने गुलामों की मंडी के ब्यौरे दिए हैं और ऐसा हो नहीं सकता कि आपकी आंखों के सामने से वह मंजर गुजरा न हो।  इसी तरह मोहम्मद बिन तुगलक की नीतियों पर ऐसे चर्चा की गई, जैसे बाकायदा कोई नीति निर्माण जैसी संस्थागत व्यवस्थाएं आज की तरह संवैधानिक तौर पर काम कर रही थीं। जबकि उस दौर में अपने आसपास तमाम तरह के मसखरों और लुटेरों से घिरे तथाकथित सुलतानों की सनक ही इंसाफ थी। तुगलक की महान नीतियों के कसीदों में ईद के वे रौनकदार जलसे गायब कर दिए गए, जिनमें इब्नबतूता ने बड़े विस्तार से उन जलसों में नाचने के लिए पेश की गई लड़कियों से मिलवाया है। वे लड़कियां और कोई नहीं, हारे हुए हिंदू राज्यों के राजाओं की बेटियां थीं, जिन्हें ईद के जलसे में ही तुगलक अपने अमीरों और रिश्तेदारों में बांट देता था। लुटेरों की उन महफिलों में तमाम आलिम और सूफी भी सरेआम नजर आते हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि ये गिरोह आपकी निगाहों में आने से रह गए?
 मैं अक्सर सोचता हूं कि सदियों तक सजे रहे उन गुलामों के बाजार में बिकी हजारों-लाखों बेबस बच्चियां और औरतें कहां गई होंगी? वे जिन्हें भी बेची गई होंगी, उनकी भी औलादें हुई होंगी? आज उनकी औलादें और उनकी भी औलादों की औलादें सदियों बाद कहां और किस शक्ल में पहचानी जाएं? जब मैं यह सोचता हूं तो आज के आजम-आजमी, जिलानी-गिलानी, इमरान-कामरान, राहत-फरहत, सलीम-जावेद, आमिर-साहिर, माहरुख-शाहरुख, औवेसी-बुखारी, जुल्फिकार-इफ्तखार, तसलीमा-तहमीना, शेरवानी-किरमानी जैसे अनगिनत चेहरे आंखों के सामने घूमने लगते हैं। बांग्लादेश के इस छोर से लेकर अफगानिस्तान के उस छोर तक इस हरी-भरी आबादी के बेतहाशा फैलाव में नजर आने वाला हरेक चेहरा और तब मुझे लगता है कि मातृपक्ष (Mother’s side) से धर्मांतरण का व्याकरण कितना जटिल और अपमानजनक है, जो हमारी अपनी याददाश्तों से गुमशुदा किए बैठे हैं और यह सब नजरअंदाज कर हम मुगलों को राष्ट्र निर्माता बताकर प्रसन्न हैं। यह कैसी कयामत है कि कोई खुद को गाली देकर खुश होता रहे!
 ऐसे दो-चार नहीं सैकड़ों रुला देने वाले विवरण हैं, जो इतिहास पर लिखी हुई किताबों में पूरी तरह गायब हैं। इन पर लंबी बहस हो सकती है। कई किताबें लिखी जा सकती हैं। खुद ये असल और एकदम ताजे ब्यौरे मोटी-मोटी कई किताबों में रियल टाइम दर्ज हैं। इनमें कोई मिलावट नहीं है। कोई मनमर्जी नहीं है। जो देखा जा रहा था, जो घट रहा था, बिल्कुल वही जस का तस कागजों पर उतार दिया गया है। लेकिन आजादी के बाद के इतिहास लेखन में भारत के मध्यकाल के इतिहास का यह भोगा हुआ सच पूरी तरह गायब है। इसके उलट हमने ऐसी नकली और मनगढ़ंत अच्छाइयों का महिमामंडन किया, जो दरअसल कहीं थी ही नहीं। भारत के मध्यकाल के इतिहास की किताबें कूड़े में से बिजली बनाने के विलक्षण प्रयासों जैसी हैं और इन प्रयासों का नतीजा यह है कि सत्तर साल बाद कूड़ा अपनी पूरी सड़ांध के साथ सामने है। बिजली की रोशनी आपके ख्यालों और ख्वाबों में ही रोशन है!
 और मध्यकाल के पहले जिसे एक बिखरा हुआ भारत माना गया, जो एक राजनीतिक इकाई के रूप में कभी था ही नहीं, उसमें एक सबसे कमाल की बात को आप साहेबान में किसी ने गौर करने लायक ही नहीं समझा। गुजरात में साेमनाथ से लेकर हिमालय में केदारनाथ तक शिव के ज्योतिर्लिंगों की स्थापना और पूजा परंपरा हजारों साल पुरानी है। किसी मुल्क के इतने बड़े भौगोलिक विस्तार में देवी-देवता और उनकी मूर्तियां एक ही तरह से बनाई और पूजी जा रही थीं। आंधप्रदेश में विशाखापत्तनम के पहाड़ी स्तूपों से लेकर अफगानिस्तान के बामियान तक गौतम बुद्ध एक ही रूप में पूजे जा रहे थे, जिनके महान स्मारक इस छोर से उस छोर तक बन रहे थे। यह तो दो हजार साल पीछे की बातें हैं। मतलब, राजनीतिक रूप से भले ही इतने बड़े भारत में हजार राजघराने राज कर रहे होंगे, मगर उनकी सांस्कृतिक पहचान एक ही थी। वह "कल्चरल कवर' पूरे विस्तार में भारत का एक शानदार अावरण था, जिसके रहते अापसी राजनीतिक संघर्ष में भी भारत की संस्कृति चारों तरफ एक जैसी ही फलती-फूलती रही थी। यह महत्वपूर्ण बात थी, जिसे आजाद भारत के इतिहास लेखकों ने बिल्कुल ही नजरअंदाज किया। क्या यह अनेदखी अनायास है या एक शरारत जो जानबूझकर की गई?
 अगर भारत के इतिहास को एक किक्रेट मैच के नजरिए से देखा जाए तो पचास ओवर के टेस्ट मैच में सल्तनत और मुगलकाल आखिरी ओवर की गेंदों से ज्यादा हैसियत नहीं रखते। लेकिन इतिहास की कोर्स की किताबों में इन खिलाड़ियों को पूरे "मैच का मैन ऑफ द मैच' बना दिया गया है। अगर मैच जिताने लायक ऐसा कुछ बेहतरीन होता भी ताे कोई समस्या या आपत्ति नहीं थी। जिन लेखकों के नाम मैंने ऊपर लिखे हैं, उनके लिखे विवरणों से साफ जाहिर है कि सल्तनत और मुगल काल के सुलतानों और बादशाहों के कारनामे अपने समय के इस्लामी आतंक और अपराधों से भरी बिल्कुल वही दुनिया थी, जो हमने सीरिया और काबुल में इस्लामिक स्टेट और अफगानिस्तान में तालिबानों के रूप में अभी-अभी देखी। इस्लाम के नाम पर भारत भर में वे बिल्कुल वही कर रहे थे, जो वे आज कर रहे हैं। सदियों तक माथा फोड़ने के बावजूद वे भारत का संपूर्ण इस्लामीकरण नहीं कर पाए और एक दिन खुद खत्म हो गए।
तीस साल बाद आज भी मैं इतिहास के विवरणों में जाता रहता हूं। भारत की यात्राओं में मैं नालंदा और विक्रमशिला के विश्वविद्यालयों के खंडहरों में भी घूमा हूं अौर दूर दक्षिण के विजयनगर साम्राज्य के बरबाद स्मारकों में भी गया हूं। इनकी असलियत आपसे बेहतर कौन जानता है कि ये उस दौर में इस्लामी आतंक के शिकार हुए हैं। ऐसे हजारों और हैं। बामियान के डेढ़ सौ मीटर ऊंचे बुद्ध तभी बने होंगे जब आज का पूरा अफगानिस्तान बौद्ध और हिंदू ही रहा होगा। वे सब हमेशा-हमेशा के लिए बरबाद कर दिए गए। लेकिन आजाद भारत की इतिहास की किताबों में सल्तनत और मुगलकाल के उन कारनामों पर पूरी तरह चादर डालकर लोभान जला दिए गए। माशाअल्लाह, इतिहास पर पड़ी इन चादरों के अासपास आप भी किसी सूफी से कम नहीं लगते।
अगर हिंदी सिनेमा की एक मशहूर फिल्म "शोले' की नजर से भारत के इतिहास को देखा जाए तो मध्यकाल का इतिहास एक नई तरह की शोले ही है। आप जैसे महान विचारकों की इस रचना में गब्बर सिंह, सांभा और कालिया रामगढ़ के चौतरफा विकास की नीतियां बना रहे हैं। रामगढ़ पहली बार उनकी बदौलत ही चमक रहा है। रामगढ़ में विदेशी निवेश बढ़ रहा है और हर युवा के हाथ में काम है। बाजार नीतियां गजब ढा रही हैं। शेयर मार्केट आसमान छू रहा है। कारोबारी भी खुश हैं और किसान भी। मगर वीरू रामगढ़ की किसी गुमनाम गली में बसंती की घोड़ी धन्नो को घास खिला रहा है।  रामगढ़ में पसरे सन्नाटे के बीच जय मौलाना साहब का हाथ थामकर मस्जिद की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं, क्योंकि अजान हो रही है। जय ने अपना माऊथ ऑर्गन जेब में खोंसा हुआ है क्योंकि नमाज का वक्त है और म्युजिक हराम है, जिससे मौलाना साहब की इबादत में खलल हाे सकता है। ठाकुर के जुल्मो-सितम से निपटने के लिए जननायक गब्बर सिंह ने सूरमा भोपाली की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी बना दी है। बसंती ने गब्बर को राखी भेजी है और गब्बर ने खुश होकर रामगढ़ की आटा चक्की उसके नाम कर दी है। जेलर के गुणों से प्रसन्न मौसी बसंती और जेलर की जन्मकुंडली मिलवा रही हैं। गब्बर ने शिवजी के मंदिर में भंडारा कराया है और जन्मजात बदमाश गांव के ठाकुर ने दंगे की नीयत से मस्जिद के पास की जमीन पर नाजायज कब्जे करा दिए हैं। आपसे ही पूछता हूं कि मध्यकाल का इतिहास बिल्कुल ऐसा ही रचा गया एक फरेब नहीं है?
 इतिहास की बात है, बहुत दूर तक न जाए, इसलिए इस खत को यहीं समेटता हूं। मैं याद करता हूं, तीस साल पहले जब एनसीईआरटी की किताबों में इतिहास को पढ़ना शुरू किया और कॉलेज में चलने वाली कोर्स की किताबों के जरिए भारत के मध्यकाल को पढ़ा तो उस दौर में अखबार में छपने वाले इतिहास संबंधी लेखों में इरफान हबीब और रोमिला थापर को अपने समय के महान प्रज्ञा पुरुषों के रूप में ही पाया। अब तीस साल बाद मैं एक ऐसे समय में हूं जब टेक्नालॉजी ने कमाल ही कर दिया है। इंटरनेट की फोर-जी जनरेशन अपने आईफोन पर आज सब कुछ देख सकती है और पढ़ सकती है। दुनिया की किसी भी लाइब्रेरी की किसी भी भाषा और उसके अपने अनुकूल अनुवाद में हर दस्तावेज हाथों पर मौजूद है। भारत का अतीत आज हर युवा को आकर्षित कर रहा है। वह भले ही किसी भी विषय में पढ़ा हो लेकिन इतिहास में पहले से बहुत ज्यादा दिलचस्पी ले रहा है। वह सच को जानने में उत्सुक है। बिना लागलपेट वाला सच। बिना मिलावट वाला इतिहास का सच, जिसमें न किसी सरकार की मनमर्जी हो और न किसी पंथ की बदनीयत!
इतिहास जानने के लिए उसे एमए की डिग्री और मिलावटी किताबें कतई जरूरी नहीं हैँ। भारत के विश्वविद्यालयों के इतिहास विभाग दरअसल इतिहास के एेसे उजाड़ कब्रिस्तान हैं, जहां डिग्री धारी मुर्दा इतिहास के नाम पर फातिहा पढ़ने जाते रहे हैं। उनकी आंखें मध्यकाल के इतिहास में की गई आपराधिक मिलावट को देख ही नहीं पातीं। लेकिन इंटरनेट ने सारी दीवारें गिरा दी हैं। सारे हिजाब हटा दिए हैं। सारी चादरें उड़ा दी हैं और मध्यकाल अपनी तमाम बजबजाती बदसूरती के साथ सबके सामने उघड़कर आ गया है। जिस इस्लाम के नाम पर दिल्ली पर कब्जे के बाद सात सौ सालों तक और सिंध को शामिल करें तो पूरे हजार साल तक भारत में जो कुछ घटा है, वह सब दस्तावेजों में ही है। आज के नौजवान को यह सुविधा इन हजार सालों में पहली ही बार मिली है कि वह उसी इस्लाम की मूल अवधारणाओं को सीधा देख ले। कुरान अपने अनुवाद के साथ सबको मुहैया है और हदीसों के सारे संस्करण भी। भारत के लोग जड़ों में झांक रहे हैं जनाब।
 कभी बहुत इज्जत से याद किए जाने वाले इरफान हबीब और रोमिला थापर आज इतिहास लेखन का जिक्र आते ही एक गाली की तरह क्यों हो गए हैं, जिन्होंने उलटी व्याख्याएं करके इतिहास को दूषित करने की कोशिश की। वक्त मिले तो कभी विचार कीजिए। क्यों लोग इतनी लानतें भेज रहे हैं। वामपंथ को अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की यह दिव्य दृष्टि कहां से प्राप्त होती है? मेरे लिए यह भीतर तक दुखी करने वाला विषय इसलिए है क्योंकि मैंने जिस दौर में इतिहास पढ़ना शुरू किया, आप महानुभावों को सबसे योग्य इतिहासकारों के रूप में ही जाना और माना था। ऊंचे कद और लंबे तजुर्बे के ऐसे लोग जिन्होंने भारत के इतिहास पर किताबें लिखीं। यह कितना बड़ा काम था। आजादी और मजहब की बुनियाद पर मुल्क के बटवारे के साथ एक नया सफर शुरू कर रहे हजारों साल पुराने मुल्क में इससे बड़ा अहम काम और कोई नहीं था। जो इतिहास लिखा जाने वाला था, आजाद भारत की आने वाली पीढ़ियां उसी के जरिए अपने मुल्क के अतीत से रूबरू होने वाली थीं। लेकिन हुआ क्या? आज आप स्वयं को कहां पाते हैं?
 जनाब, मैं चाहता हूं कि आप चुप्पी तोड़ें। गिरेबां में झांकें, उठ रहे हर सवाल का जवाब दें। सामने आएं और मेहरबानी करके हाथापाई न करें। अपने समूह के अन्य इतिहास लेखकों को भी साथ लाएं। वैसे भी आपको अब पाने के लिए रह ही क्या गया है। पद, प्रतिष्ठा और पुरस्कार से परे हैं आप। न अब और कुछ हासिल होने वाला है और न ही यह कोई छीनकर ले जाएगा!
 इतिहास से अगर कोई छेड़छाड़ या मिलावट नहीं हुई है तो आपको खुलकर कहना चाहिए।  क्या आपको यह नहीं लगता कि आजादी के बाद अपनाई गई इतिहास लेखन की प्रक्रिया दूषित और दोषपूर्ण थी? क्या आज भी आपको लगता है कि सल्तनत और मुगल काल जैसे कोई कालखंड वास्तविक रूप में वजूद में रहे हैं या दिल्ली पर कब्जे की छीनाझपटी में हुई हिंदुस्तान की बेरहम पिसाई का वह एक कलंकित कालखंड है? 
आखिर उस सच्चाई पर चादर डाले रखने की ऐसी भी क्या मजबूरी थी? हमारी ऐसी क्या मजबूरी थी कि हम उन लुटेरे, हमलावरों और हत्यारों को सुलतान और बादशाह मानकर ऐसे चले कि हमने उन्हें देवताओं के बराबर रख दिया और देवताओं को हाशिए पर भी जगह नहीं मिली? आप सोचिए आजादी के बाद हमारी तीन पीढ़ियां यही मिलावटी झूठ पढ़ते हुए निकली हैं? इसका जरा सा भी अपराध बोध आपको हो तो आपको जवाब देना चाहिए। इस खत का जवाब मुझे नहीं, इस देश की अवाम को दें, जो इतिहास के प्रति पहले से ज्यादा जागी हुई है। सारे फरेब उसके सामने उजागर हैं।
 अंत में यह और कहना चाहूंगा कि आज की नौजवान पीढ़ी मध्यकाल के इतिहास को देख और पढ़ रही है तो वह इन ब्यौरों की रोशनी में टेक्नालॉजी के ही जरिए आज के सीरिया, इराक, ईरान, यमन, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और कुछ अफ्रीकी मुल्कों की हर दिन की हलचल को भी देख पा रही है। तारीख के जानकार आलिमों के इजहारे-ख्यालात ठीक उसी समय सबके सामने नुमाया है, जब वे अपनी बात कह रहे हैं। अब अगले दिन के अखबार का भी इंतजार बेमानी हो गया है। कुछ भी किसी से छिपा नहीं रह गया है। आज की जनरेशन 360 डिग्री पर सब कुछ अपनी आंखों से देख रही है और अपने दिमाग से सोच और समझ रही है। किसी राय को कायम करनेे के लिए अब मिलावटी और बनावटी बातों की जरूरत नहीं रह गई है।
ईश्वर आपको अच्छी सेहत और लंबी उम्र दे। ताकि सत्तर साल का इतिहास के कोर्स का बिगाड़ा हुआ हाजमा आप अपनी आंखों से सुधरता हुआ भी देख सकें। हमें यह भी मान लेना चाहिए कि आखिरकार ऊपरवाला सारे हिसाब अपने बंदों के सामने ही बराबर कर देता है! 
बहुत शुक्रिया।
#irfanhabib #romilathapar #indianhistory
साभार - डॉ विवेक आर्य 

सूफी संत बुल्ले शाह की अमर रचना

### सूफी संत बुल्ले शाह की अमर रचना

### “बुल्ला की जाणाँ मैं कौन”

ईश्वर की खोज, आत्मज्ञान और मानव-एकता का संदेश

पंजाब की महान सूफी परंपरा के संत और कवि बाबा बुल्ले शाह (1680–1758) ने अपनी रचनाओं में ईश्वर को बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर खोजने का संदेश दिया।

उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है — “बुल्ला की जाणाँ मैं कौन”। यह रचना मनुष्य की आत्मा, उसकी वास्तविक पहचान और परमात्मा से उसके संबंध पर गहरा प्रश्न उठाती है।

### मूल पंजाबी रचना (देवनागरी लिपि में)

बुल्ला की जाणाँ मैं कौन।

ना मैं मोमिन विच मसीतां, ना मैं विच कुफ़र दियां रीतां। ना मैं पाकां विच पलीतां, ना मैं मूसा, ना फिरऔन।

बुल्ला की जाणाँ मैं कौन।

ना मैं अंदर वेद किताबां, ना विच भंगां, ना शराबां। ना विच रिंदां मस्त खराबां, ना विच जागण, ना विच सौण।

बुल्ला की जाणाँ मैं कौन।

ना मैं अरबी, ना लाहौरी, ना मैं हिंदी शहर नागौरी। ना हिंदू, ना तुर्क पशौरी, ना मैं रहंदा विच नदाऊं।

बुल्ला की जाणाँ मैं कौन।

अव्वल आखिर आप नूं जाणां, ना कोई दूजा होर पछाणां। मैथों होर न कोई सयाणा, बुल्ला! ओह खड़ा है कौन?

बुल्ला की जाणाँ मैं कौन।

### हिंदी भावार्थ

कवि कहते हैं कि मैं अपनी वास्तविक पहचान नहीं जानता।

मैं केवल मस्जिद में जाने वाला मुसलमान नहीं हूँ, न ही किसी धार्मिक कर्मकांड या संप्रदाय की सीमाओं में बँधा हूँ।

मैं न मूसा हूँ, न फिरऔन। न मैं किसी एक धर्मग्रंथ या धार्मिक पहचान तक सीमित हूँ।

मैं न हिंदू हूँ, न मुसलमान; न अरबी हूँ, न लाहौरी। मेरी आत्मा को किसी देश, जाति, भाषा या धर्म की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता।

मैं उस परम सत्य को जानना चाहता हूँ, जो इन सभी पहचानों से परे है।

### इस रचना में ईश्वर का स्वरूप

बुल्ले शाह का ईश्वर किसी एक धर्म, संप्रदाय या पूजा-पद्धति का बंधक नहीं है।

उनके अनुसार ईश्वर को पाने के लिए मनुष्य को पहले अपने भीतर झाँकना होगा। जब अहंकार, जाति, धर्म, ऊँच-नीच और भेदभाव की दीवारें गिरती हैं, तभी मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सकता है।

### आज के समाज के लिए संदेश

बुल्ले शाह की यह रचना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी लगभग तीन सौ वर्ष पहले थी।

आज संसार में धर्म, जाति, भाषा और राष्ट्रीयता के नाम पर अनेक संघर्ष दिखाई देते हैं। बुल्ले शाह हमें याद दिलाते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसका मानवीय चरित्र है।

ईश्वर की सच्ची उपासना केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा, दया और मानवता है।

उनकी वाणी का सार यही है कि ईश्वर को खोजने से पहले स्वयं को पहचानो और मनुष्य को मनुष्य समझकर प्रेम करना सीखो।

### निष्कर्ष

बुल्ले शाह की सूफी वाणी हमें एक ऐसी आध्यात्मिक ऊँचाई पर ले जाती है जहाँ न कोई पराया है, न कोई छोटा-बड़ा। वहाँ केवल प्रेम है, आत्मज्ञान है और परमात्मा की अनुभूति है।

यही उनकी कविता की अमरता है।

संदर्भ : बुल्ले शाह की सूफी काव्य परंपरा और उनकी काफ़ी “बुल्ला की जाणाँ मैं कौन”। Shivpreet Singh +2

⭐⭐⭐⭐⭐⭐

साभार - नरोत्तम शर्मा 

Saturday, 31 October 2026

वेद नित्य विषय (२)

# वेदनित्यत्वविषयः

ननु गणपाठाष्टाध्यायीमहाभाष्येष्वपायादयो विधीयन्ते पुनरुत्पत्तकथं सङ्गच्छते ? इत्येवं प्राप्ते ब्रूते महाभाष्यकारः—

‘सर्वे सर्वपदादेशाः दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेः। एकदेशविकारो हि नित्यत्वं नोपपद्यते ॥१॥’

‘दाधा छ्वदाप्’ इत्यस्य सूत्रस्योपरि महाभाष्यवचनम्। अस्यायमर्थः—

सर्वे सङ्घाताः सर्वेषां पदानां स्थान आदेशाः भवन्ति अर्थाच्छब्दसङ्घातान्तराणां स्थानभूते शब्दसङ्घाताः प्रयुज्यन्ते। तथा—वेदपार । गम् । डु । सुँ । भू । शप् । तिप् । इत्येतस्य वाक्यसमुदायस्य स्थाने वेदपारगोऽभवदितीदं समुदायान्तरं प्रयुज्यते। अस्मिन् प्रयुक्तसमुदाये ‘गम् डु सुँ शप् तिप् इत्येतोषाम् ‘अम् डु उँ शु पू इ पू’ इत्येतेषामुपयन्तीति केषाञ्चिद् बुद्धिर्भवति सा भ्रममूलैवास्ति। कुतः? शब्दानामेकदेशविकारो चेत्युपलक्षणात्। नैव शब्दस्यैकदेशापाय एकदेशोपजन एकदेशविकाराणि सन्ति दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेराचार्यस्य मते शब्दानां नित्यत्वमुपपन्नं भवतः। तथैवाडागमो, भू इत्यस्य स्थाने भो इति विकारो चैवं सङ्गतिः कार्यार्था।

(श्रोत्रोपलब्धिरिति) श्रोत्रेन्द्रियेण ज्ञानं यस्य, बुद्ध्या नितरां गृहीतं योग्यं, उच्चारणेनाभिप्रकाशितो यो, यस्याकाशो देशोऽधिकरणं वर्तते, स शब्दो भवतीति बोध्यम्। अनेन शब्दलक्षणेनापि शब्दो नित्य एवास्तीत्यवगम्यते। कथम्? उच्चारणश्रवणादिप्रयत्नक्रियायाः क्षणभङ्गित्वात्। ‘एकैकवर्णवर्तिनी वाक्’ इति महाभाष्यप्रमाणात्। प्रतिवर्णं वाक्क्रिया परिणमते, अतस्तस्या एकानित्यत्वं गम्यते, न च शब्दस्येति।

**भाषार्थ-प्र०—** गणपाठ अष्टाध्यायी और महाभाष्य में अक्षरों के लोप आगम और विकार आदि कहे हैं, फिर शब्दों का नित्यत्व कैसे हो सकता है?

इस प्रश्न का उत्तर महाभाष्यकार पतञ्जलि मुनि देते हैं कि—शब्दों के समुदायों के स्थानों में अन्य शब्दों के समुदायों का प्रयोगमात्र होता है। जैसे ‘वेदपार गम् डु सुँ भू शप् तिप्’ इस पदसमुदाय वाक्य के स्थान में ‘वेदपारगोऽभवत्’ इस समुदायान्तर का प्रयोग किया जाता है। इसमें किसी पुरुष की ऐसी बुद्धि होती है कि अम् डु उँ शु पू इ पू इनकी निवृत्ति हो जाती है, सो उसकी बुद्धि में भ्रममात्र है, क्योंकि शब्दों के समुदाय के स्थानों में दूसरे शब्दों के समुदायों के प्रयोग किये जाते हैं। सो यह मत दाक्षी के पुत्र पाणिनि मुनि जी का है, जिन्होंने अष्टाध्यायी आदि व्याकरण के ग्रन्थ किये हैं। सो मत इस प्रकार से है कि शब्द नित्य ही होते हैं, तथा ‘कान से सुन के जिनका ग्रहण होता है, बुद्धि से जो जाने जाते हैं, जो वाक् इन्द्रिय से उच्चारण करने से प्रकाशित होते हैं, और जिनका निवास का स्थान आकाश है उनको शब्द कहते हैं। क्योंकि जो उच्चारण और श्रवणादि हम लोगों की क्रिया है उसके क्षणभङ्ग होने से अनित्य गिनी जाती है। इससे शब्द अनित्य नहीं होते, क्योंकि यह जो हम लोगों की वाणी है, वही वर्ण वर्ण के प्रति अन्य अन्य होती जाती है परन्तु शब्द तो सदा अखण्ड एकरस ही बने रहते हैं।

**ननु च भोः ! शब्दोऽप्युपरतागतो भवति। उच्चारित उपागच्छति, अनुच्चारितोऽनागतो भवति, वाक्क्रियावत्। पुनरस्तस्य कथं नित्यत्वं भवेत्।**

**अत्रोच्यते—** नाकाशवत् पूर्वस्थितस्य शब्दस्य साधनाभावादभिव्यक्तिर्भवति, किन्तु तस्य प्राणवाक्क्रियाभिरभिव्यक्तिश्च। तथा गौरित्यत्र यावद्गकारोऽस्ति न तावद्वकारो,यावद्वकारो न तावद्विसर्जनीयः। एवं वाक्क्रिययोच्चारणस्यापायोपजने भवतः न च शब्दस्याखण्डैकस्य, तस्य सर्वत्रोपलब्धत्वात्। यत्र खलु वायुर्वाक्क्रियायां न भवत्-स्रोत्रोच्चारणश्रवणे अपि न भवतः। अतः शब्दस्त्वाकाशादेव सदा नित्योऽस्तीत्यादि-व्याकरणमतेन सर्वेषां शब्दानां नित्यत्वमस्ति, किमुत वैदिकानामिति।

**भाषार्थ-प्र०—** शब्द भी उच्चारण किये के पश्चात् नष्ट हो जाता है और उच्चारण के पूर्व सुना नहीं जाता है, जैसे उच्चारण क्रिया अनित्य है, वैसे ही शब्द भी अनित्य हो सकता है। फिर शब्दों को नित्य क्यों मानते हो?

**उ०—** शब्द तो आकाश की नाईं सर्वत्र एकरस भर रहे हैं, परन्तु जब उच्चारणक्रिया नहीं होती, तब प्रसिद्ध सुनने में नहीं आते। जब प्राण और वाणी की क्रिया से उच्चारण किये जाते हैं, तब शब्द प्रसिद्ध होते हैं। जैसे ‘गौः’ इसके उच्चारण में जब पर्यन्त उच्चारण क्रिया गकार में रहती है, तब पर्यन्त औकार में नहीं, जब औकार में है तब गकार और विसर्जनीय में नहीं रहती। इसी प्रकार वाणी की क्रिया की उत्पत्ति और नाश होता है, शब्दों का नहीं। किन्तु आकाश में शब्द की प्राप्ति होने से शब्द तो अखण्ड एकरस सर्वत्र भर रहे हैं, परन्तु जब पर्यन्त वायु और वाक् इन्द्रिय की क्रिया नहीं होती, तब पर्यन्त शब्दों का उच्चारण और श्रवण भी नहीं होता। इससे यह सिद्ध हुआ कि शब्द आकाश की नाईं नित्य ही हैं। जब व्याकरण शास्त्र के मत से सब शब्द नित्य होते हैं तो वेदों के शब्दों की कथा तो क्या ही कहनी है, क्योंकि वेदों के शब्द तो सब प्रकार से नित्य ही बने रहते हैं।

## एवं जैमिनिमुनिनापि शब्दस्य नित्यत्वं प्रतिपादितम्—

**‘नित्यस्तु स्याद् दर्शनस्य परार्थत्वात्’॥**

पूर्वमीमांसा अ० १। पा० १। सू० १८॥

**अस्यायमर्थः—** ‘तु’ शब्देनानित्यशङ्का निवार्यते। विनाशरहितत्वाच्छब्दो नित्योऽस्ति कस्माद् दर्शनस्य परार्थत्वात्। दर्शनस्योच्चारणस्य परस्यार्थस्य ज्ञापनार्थत्वात्, शब्दस्यानित्यत्वं नैव भवति। अन्यथायं गोशब्दार्थोऽस्तीत्यभिज्ञाननित्येन शब्देन भवितुमयोग्योऽस्ति। नित्यत्वे सति ज्ञाप्यज्ञापकयोर्विद्यमानत्वात् सर्वमेतत् सुसंगतं स्यात्। अतश्चैकमेव गोशब्दं युगपदनेकेषु स्थलेष्वनेक उच्चारका उपलभन्ते। पुनः पुनस्तमेव चेति। एवं जैमिनिना शब्दनित्यत्वेऽनेकैर्हेतवः प्रदर्शिताः।

**भाषार्थ—** इसी प्रकार जैमिनि मुनि ने भी शब्द को नित्य माना है—(नित्यस्तु) शब्द में जो अनित्य होने की शङ्का आती है, उसका ‘तु’ शब्द से निवारण किया है। शब्द नित्य ही हैं, अर्थात् नाशरहित हैं, क्योंकि उच्चारणक्रिया से जो शब्द का श्रवण होता है सो अर्थ के जानने ही के लिए है, इससे शब्द अनित्य नहीं हो सकता। जो शब्द का उच्चारण किया जाता है, उसकी ही प्रत्यभिज्ञा होती है कि श्रोत्रद्वारा ज्ञान के बीच में वही शब्द स्थिर रहता है, फिर उसी शब्द से अर्थ की प्रतीति होती है। जो शब्द अनित्य होता तो अर्थ का ज्ञान कौन कराता, क्योंकि वह शब्द ही नहीं रहा, फिर अर्थ को कौन जनावे। और जैसे अनेक देशों में अनेक पुरुष एक काल में ही एक गो शब्द का उच्चारण करते हैं, इसी प्रकार उसी शब्द का उच्चारण बारम्बार भी होता है, इस कारण से भी शब्द नित्य हैं। जो शब्द अनित्य होता तो यह व्यवस्था कभी नहीं बन सकती। सो जैमिनि मुनि ने इस प्रकार के अनेक हेतुओं से पूर्वमीमांसा शास्त्र में शब्द को नित्य सिद्ध किया है।

**अन्यच्च वैशेषिकसूत्रकारः कणादमुनिरप्याह—**

‘तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ॥’

वैशेषिक अ० १। सू० ३॥

**अस्यायमर्थः—** तद्वचनात् यो धर्मेश्वरयोर्वचनाद्धर्मस्यैव कर्तव्यतया प्रतिपादनादादेशकरणे-वोक्तत्वाच्चाम्नायस्य वेदचतुष्टयस्य प्रामाण्यं सर्वैर्नित्यत्वेन स्वीकरणीयम्।

**भाषार्थ—** इसी प्रकार वैशेषिक शास्त्र में कणाद मुनि ने भी कहा है—(तद्वचनात्) वेद ईश्वरोक्त हैं, इनमें सत्यविद्या और पक्षपातरहित धर्म का ही प्रतिपादन है, इससे चारों वेद नित्य हैं। ऐसा ही सब मनुष्यों का मानना उचित है क्योंकि ईश्वर नित्य है। इससे उसकी विद्या भी नित्य है।

## तथा स्वकीय-न्यायशास्त्रे गौतममुनिरप्याह—

‘मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यात् ॥’

अ० २। आ० १। सूत्र ६५॥

**अस्यायमर्थः—** तेषां वेदानां नित्यानामीश्वरवोक्तानां प्रामाण्यं सर्वैः स्वीकरणीयम्। कुतः? आप्तप्रामाण्यात्। धर्मात्मभिः कपटछलादिदोषरहितैर्देवर्षिभिः सत्योपदेशदृष्टिभिर्विद्यापारङ्गमैर्महायोगिभिः सर्वैर्ब्रह्मादिभिराप्तैर्वेदानां प्रामाण्यं स्वीकृतमतः। किंतु? मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवत्। यथा सत्यपदार्थविद्याप्रकाशकानां मन्त्राणां विचाराणां सत्यत्वेन प्रामाण्यं भवति, यथा चायुर्वेदोक्तस्यैकदेशोक्तौषधसेवनेन रोगनिवृत्त्या तदिन्द्रियस्यापि भागस्य तादृशस्य प्रामाण्यं भवति, तथा वेदोक्तार्थस्यैकदेशप्रत्यक्षणोत्तरस्यादृष्टार्थविषयस्य वेदभागस्यापि प्रामाण्यमङ्गीकर्तव्यम्।

एतत्सूत्रोपरि भाष्यकारेण वात्स्यायनमुनिनैव प्रतिपादितम्—

“दृष्टप्रवक्तृसामान्याच्चानुमानम्। य एवाप्ता वेदार्थानां द्रष्टारः प्रवक्तारश्च त एवायुर्-वेदप्रभृतीनामित्यायुर्-वेदप्रामाण्यवद्वेदप्रामाण्यमनुमातव्यमिति। नित्यत्वाद्वेदवाक्यानां प्रामाण्ये तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यादित्युक्तम्।”

**अस्यायमभिप्रायः—** यथाप्तोपदेशस्य शब्दस्य प्रामाण्यं भवति तथा सर्वधात्पनेश्वरप्रोक्तानां वेदानां सर्वैराप्तैः प्रामाण्येनाङ्गीकृतत्वाद्वेदाः प्रमाणमिति बोद्ध्यम्। अत ईश्वरविद्यामयत्वाद्वेदानां नित्यत्वमेवोपपन्नं भवतीति दिक्।

**भाषार्थ—** वैसे ही न्यायशास्त्र में गौतम मुनि भी शब्द को नित्य कहते हैं, (मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च) वेदों को नित्य ही मानना चाहिए, क्योंकि सृष्टि के आरम्भ से लेके आज पर्यन्त ब्रह्मादि जितने आप्त होते आये हैं वे सब वेदों को नित्य ही मानते आये हैं। उन आप्तों का अवश्य ही प्रमाण करना चाहिए। क्योंकि आप्त लोग वे होते हैं जो धर्मात्मा, कपट छलादि दोषों से रहित, सब विद्याओं से युक्त, महायोगी और सब मनुष्यों के सुख होने के लिए सत्य का उपदेश करने वाले हैं, जिनमें लेशमात्र भी पक्षपात वा मिथ्याचार नहीं होता। उन्होंने वेदों का यथावत् नित्य गुणों से प्रमाण किया है जिन्होंने आयुर्वेद को बनाया है। जैसे आयुर्वेद वैद्यकशास्त्र के एकदेश में कहे औषध और पथ्य के सेवन करने से रोग की निवृत्ति से सुख प्राप्त होता है, जैसे उसके एकदेश के कहे के सत्य होने से उसके दूसरे भाग का भी प्रमाण होता है इसी प्रकार वेदों का भी प्रमाण करना सब मनुष्यों को उचित है। क्योंकि वेद के एकदेश में कहे अर्थ का सत्यापन विदित होने से उससे भिन्न जो वेदों के भाग हैं, कि जिनका अर्थ प्रत्यक्ष न हुआ हो, उनका भी नित्य प्रमाण अवश्य करना चाहिए, क्योंकि आप्त पुरुष का उपदेश मिथ्या नहीं हो सकता।
✍️  आचार्य धनंजय शास्त्री ( 31/10/2026 )
      ( आर्यों का महाकुंभ)

अतः वेदानां नित्यविचार:(१)

# अथ वेदानां नित्यत्वविचारः

ईश्वरस्य सकाशाद् वेदानामुत्पत्तौ सत्यां स्वतः नित्यत्वमेव भवति, तस्य सर्वसामर्थ्यस्य नित्यत्वात् ।

**भाषार्थ—** अब वेदों के नित्यत्व का विचार किया जाता है सो वेद ईश्वर से उत्पन्न हुए हैं इससे वे स्वतः नित्यस्वरूप ही हैं, क्योंकि ईश्वर का सब सामर्थ्य नित्य ही है।

**अत्र केचिदाहुः—** न वेदानां शब्दमयत्वान्नित्यत्वं सम्भवति। शब्दोऽनित्यः कार्यत्वात्। घटवत्। यथा घटः कृतोऽस्ति तथा शब्दोऽपि। तस्माच्छब्दानित्यत्वे वेदानामप्यनित्यत्वं स्वीकर्तव्यम्।

मैवं मन्तव्यम्। शब्दो द्विविधो नित्यकार्यभेदात्। ये परमात्मज्ञानस्थाः शब्दार्थसम्बन्धाः सन्ति ते नित्या भवितुमर्हन्ति। येऽस्मदादीनां वर्तन्ते ते तु कार्यार्थाः। कुतः? यस्य ज्ञानक्रिये नित्ये स्वभावसिद्धे अनादी सतस्तस्य सर्वं सामर्थ्यमपि नित्यमेव भवितुमर्हति। तद्विधाभावत्वाद् वेदानामनित्यत्वं नैव घटते।

**भाषार्थ-प्र०—** इस विषय में कितने ही पुरुष ऐसी शङ्का करते हैं कि वेदों में शब्द, छन्द, पद और वाक्यों के योग होने से नित्य नहीं हो सकते। जैसे बिना बनाने से घड़ा नहीं बनता, इसी प्रकार से वेदों को भी किसी ने बनाया होगा। क्योंकि बनाने के पहले नहीं थे और प्रलय में भी न रहेंगे, इससे वेदों को नित्य मानना ठीक नहीं है।

**उ०—** ऐसा आपको कहना उचित नहीं, क्योंकि शब्द दो प्रकार का होता है—एक नित्य और दूसरा कार्य। इनमें से जो शब्द, अर्थ और सम्बन्ध परमेश्वर के ज्ञान में हैं वे सब नित्य ही होते हैं, और जो हम लोगों की कल्पना से उत्पन्न होते हैं वे कार्य होते हैं। क्योंकि जिसका ज्ञान और क्रिया स्वभाव से सिद्ध और अनादि हैं उसका सब सामर्थ्य भी नित्य ही होता है। इससे वेद भी उसके विद्यात्मक स्वरूप होने से नित्य ही हैं क्योंकि ईश्वर की विद्या अनित्य कभी नहीं हो सकती।

**किं च भोः ! सर्वस्यास्य जगतो विभागं प्राप्तस्य कारणरूपस्थितौ सर्वस्थूलकार्याभावे पठनपाठनपुस्तकानामभावात् कथं वेदानां नित्यत्वं स्वीकृत्यते ?**

**अत्रोच्यते—** इदं तु पुस्तकपत्रमसीपदार्थादिषु घटते, तथास्मत्क्रियापेक्षे च नेतरस्मिन्। अतः कारणाणीश्वरविद्यामयत्वेन वेदानां नित्यत्वं वयं मन्यामहे। किं च, न पठनपाठन-पुस्तकानित्यत्वेन वेदानित्यत्वं जायते। तेषामीश्वरज्ञानेन सह सदैव विद्यमानत्वात्। यथास्मिन् काले वेदेषु शब्दाक्षरार्थ-सम्बन्धाः सन्ति तथैव पूर्वमासन्नत्र भविष्यन्ति च। कुतः, ईश्वरविद्याया नित्यत्वाद्व्यभिचारित्वाच्च। अत एवेदमुक्तमृग्वेदे—

**सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् इति।**

**अस्यायमर्थः—** सूर्यचन्द्रग्रहणमुपलक्षणार्थं, यथा पूर्वकल्पे सूर्यचन्द्रादिरचनं तस्य ज्ञानमध्ये ह्यासीत् तथैव तेनास्मिन् कल्पेऽपि रचनं कृतमस्तीति विज्ञायते। कुतः ईश्वरज्ञानस्य वृद्धिक्षय-विपर्ययाभावात्। एवं वेदैर्वपि स्वीकर्तव्यं, वेदानां तेनैव स्वविधातुः सृष्टत्वात्।

**भाषार्थ-प्र०—** जब सब जगत् के परमाणु अलग-अलग होकर कारणरूप हो जाते हैं तब जो कार्यरूप सब स्थूल जगत् है उसका अभाव हो जाता है, उस समय वेदों के पुस्तकों का भी अभाव हो जाता है, फिर वेदों को नित्य क्यों मानते हो?

**उ०—** यह बात पुस्तक, पत्र, मसी और अक्षरों की बनावट आदि पक्ष में घटती है तथा हम लोगों के क्रियापक्ष में भी बन सकती है, वेदपक्ष में नहीं घटती, क्योंकि वेद तो शब्द, अर्थ और सम्बन्धस्वरूप ही हैं, मसी, कागज, पत्र, पुस्तक और अक्षरों की बनावटस्वरूप नहीं हैं। यह जो मसी आदि द्रव्य और लेखनादि क्रिया है सो मनुष्यों की बनाई है, इससे अनित्य है। और ईश्वर के ज्ञान में सदा बने रहने से वेदों को हम लोग नित्य मानते हैं। इससे क्या सिद्ध हुआ कि पढ़ना-पढ़ाना और पुस्तक के अनित्य होने से वेद अनित्य नहीं हो सकते, क्योंकि वे बीजाङ्कुर न्याय से ईश्वर के ज्ञान में नित्य वर्तमान रहते हैं। सृष्टि की आदि में ईश्वर से वेदों की प्रसिद्धि होती है और प्रलय में जगत् के नहीं रहने से उनकी अप्रसिद्धि होती है, इस कारण से वेद नित्यस्वरूप ही बने रहते हैं।

जैसे इस कल्प की सृष्टि में शब्द, अक्षर, अर्थ और सम्बन्ध वेदों में हैं इसी प्रकार से पूर्वकल्प में थे और आगे भी होंगे, क्योंकि जो ईश्वर की विद्या है सो नित्य एक ही रस बनी रहती है। उनके एक अक्षर का भी विपरीताभाव कभी नहीं होता। सो ऋग्वेद से लेके चारों वेदों की संहिता अब जिस प्रकार की हैं कि इनमें शब्द, अर्थ, सम्बन्ध, पद और अक्षरों का जिस क्रम से वर्तमान है इसी प्रकार का क्रम सब दिन बना रहता है, क्योंकि ईश्वर का ज्ञान नित्य है, उसकी वृद्धि, क्षय और विपरीतता कभी नहीं होती। इस कारण से वेदों को नित्यस्वरूप ही मानना चाहिए।

## अत्र वेदानां नित्यत्वे व्याकरणशास्त्रादीनां साक्ष्यार्थं प्रमाणानि लिख्यन्ते। तत्राह महाभाष्यकारः पतञ्जलिमुनिः—

‘नित्याः शब्दा नित्येषु शब्देषु कूटस्थैरविचालिभिर्वर्णैर्भवितव्यमनपायोपजनविकारिभिरिति।

इदं वचनं प्रथमाह्निकमारभ्य बहुषु स्थलेषु व्याकरणमहाभाष्येऽस्ति। तथा—

‘श्रोत्रोपलब्धिर्बुद्धिनिर्ग्राह्यः प्रयोगेणाभिज्वलित आकाशदेशः शब्दः।’

इदम् ‘अइउण्’ सूत्रभाष्ये चोक्तमिति। अस्यायमर्थः—

वैदिका लौकिकाश्च सर्वे शब्दा नित्याः सन्ति। कुतः? शब्दानां मध्ये कूटस्थ विनाशरहिता अचला अनपाया अनपजना अविकरणो वर्णाः सन्त्यतः। अपायो लोपो निर्वर्त्यग्रहणम्, उपजन आगमः, विकार आदेशः, एते न विद्यन्ते येषु शब्देषु तस्मान्नित्याः शब्दाः।

**भाषार्थ—** यह जो वेदों के नित्य होने का विषय है इसमें व्याकरणादि शास्त्रों का प्रमाण साक्षी के लिए लिखते हैं। इनमें से जो व्याकरण शास्त्र है सो संस्कृत और भाषाओं के सब शब्दविद्या का मुख्य मूल प्रमाण है। उसके बनाने वाले महर्षि पाणिनि और पतञ्जलि हैं। उनका ऐसा मत है कि—‘सब शब्द नित्य हैं, क्योंकि इन शब्दों में जितने अक्षरादि अवयव हैं वे सब कूटस्थ अर्थात् विनाशरहित हैं, और वे पूर्वापर विचलित भी नहीं, उनका अभाव वा आगम कभी नहीं होता।’ इससे वैदिक अर्थात् जो वेद के शब्द और वेदों से जो शब्द लोक में आये हैं वे लौकिक कहाते हैं, वे भी सब नित्य ही होते हैं क्योंकि उन शब्दों के मध्य में सब वर्ण अविनाशी और अचल हैं, तथा इनमें लोप, आगम और विकार नहीं बन सकते, इस कारण से पूर्वोक्त शब्द नित्य हैं।
✍️ आचार्य धनंजय शास्त्री 
     ( आर्यों का महाकुंभ ) 31/10/2026

Thursday, 29 October 2026

संकष्ट चतुर्थी व्रत

जिस दिन एक आधुनिक स्त्री से यह कहा गया कि करवा चौथ केवल 'पुरुष की गुलामी' है, ठीक उसी दिन हमने ब्रह्मांड के सबसे प्रचंड क्वांटम भौतिकी और जैविक विज्ञान पर धूल फेंक दी। 

यह कथा किसी भूखी, लाचार नारी के गिड़गिड़ाने की नहीं है—यह उस महाशक्ति का सीधा तांडव है जो विधाता की लिखी तकदीर के पन्ने को बीच बाज़ार फाड़कर अपने पति के प्राण छीन लाती है। यदि आप इसे अब भी केवल एक अंधविश्वास और पाखंड मानते हैं, तो अपनी बौद्धिक समझ की कब्र पर माथा टेकने से पहले इस एक आलेख को पढ़ लीजिए; आपकी धारणाओं के परखच्चे उड़ने वाले हैं...

 क्या कभी आपने किसी हाड़-मांस की देह को काल (मृत्यु) की पुतलियों में सीधी आंखें डालकर बात करते देखा है? कार्तिक की उस घोर अंधियारी रात जब चांद निकलता है, तब छतों पर खड़ी लाल जोड़े वाली स्त्री दरअसल पानी के घूंट के लिए नहीं तरस रही होती—वह अपनी रीढ़ के भीतर सोई उस कॉस्मिक शक्ति को जगा रही होती है जो मृत्यु की दिशा बदल देती है। जिसे दुनिया 'उपवास' कहकर खारिज करती है, विज्ञान की आधुनिक प्रयोगशालाएं आज उसे 'बायो-इलेक्ट्रिकल शील्ड' कह रही हैं। रुकिए, और सांस थामकर जानिए कि जब छलनी के पार चांद देखा जाता है, तो असल में उस क्षण ब्रह्मांड में क्या घट रहा होता है...

नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों की रिसर्च, प्रकाश का विवर्तन, पृथ्वी की अर्थिंग और मस्तिष्क की अल्फा-तरंगें... क्या ये सब एक मिट्टी के करवे और छलनी में समा सकते हैं? जवाब है—हाँ। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जिस देश ने खगोल और देह-विज्ञान को एक धागे में पिरोकर 'करक चतुर्थी' जैसा अजूबा रचा, उसी देश की नई पीढ़ी इसे 'सामंती ढकोसला' समझकर हंस रही है। उपहास उड़ाने से पहले यह 1800 शब्दों का वैज्ञानिक दस्तावेज पढ़ लीजिए; दावा है कि इसके बाद आप इस परंपरा के आगे सिर झुकाने पर विवश हो जाएंगे।

जो लोग सनातन की कालजयी परंपराओं को आधुनिकता के छिछले और संकीर्ण चश्मे से देखकर करवा चौथ को केवल ‘स्त्री पर थोपा गया एक सामंती उपवास’ करार देते हैं, वे वस्तुतः ब्रह्मांड के उस सूक्ष्मतम ऊर्जा-विज्ञान, तात्विक संतुलन और प्रामाणिक शास्त्र-विधान से सर्वथा अनभिज्ञ हैं जिसे सहस्राब्दियों पूर्व भारत की ऋषि-प्रज्ञा ने आत्मसात किया था। करवा चौथ किसी अबला का विवश रुदन नहीं है, न ही यह किसी पुरुष-सत्ता के सम्मुख आत्मसमर्पण की कथा है। यह प्रकृति की उस मूल पराशक्ति का तांडव-विपरीत ‘महा-संकल्प’ है, जो जब अपनी चेतना के चरम पर जाग्रत होती है, तो काल के कपाल पर भी अमिट रेखा खींचकर नियति के विधान को उलट देने का सामर्थ्य रखती है।
जब कोई आधुनिक विमर्शकार यह प्रश्न उछाले कि "केवल स्त्री ही क्यों, क्या इसके पीछे कोई शास्त्रसम्मत आधार है अथवा यह केवल अंधविश्वास है?", तो उससे केवल भावुक संवाद मत कीजिए। उसे धर्मशास्त्र, पुराण, खगोलिकी, बायो-इलेक्ट्रिकल फिजिक्स, क्वांटम मैकेनिक्स और साइको-न्यूरो-इम्यूनोलॉजी के वे अकाट्य साक्ष्य दीजिए, जिनके आगे हर कुतर्क स्वतः भस्म हो जाए।

धर्मशास्त्रों और पुराणों में 'करक चतुर्थी' का प्रामाणिक विधान है।
करवा चौथ कोई मध्यकालीन लोक-रूढ़ि या आधुनिक सिनेमा द्वारा गढ़ी गई रस्म नहीं है। सनातन धर्मशास्त्रों, स्मृति-ग्रंथों और काल-निर्णय के निबंध-ग्रंथों में इसे अनादिकाल से ‘करक चतुर्थी’  के नाम से प्रतिष्ठा प्राप्त है। लोकभाषा में 'करक'—अर्थात् मिट्टी का वह विशिष्ट टोंटीदार पात्र जिससे अर्घ्य दिया जाता है—कालांतर में अपभ्रंश होकर 'करवा' कहलाया।
धर्मशास्त्र के सर्वोच्च प्रमाणिक काल-निर्णय ग्रंथ 'निर्णयसिन्धु' में महामहोपाध्याय कमलाकर भट्ट स्पष्ट निर्देश देते हैं:
 “कार्तिककृष्णचतुर्थ्यां करकचतुर्थीव्रतं भवति। तत्र पूर्वविद्धा ग्राह्या।”
अर्थात्—कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करक चतुर्थी का व्रत अनिवार्य रूप से किया जाता है, जिसमें चंद्रोदयव्यापिनी तिथि ही शास्त्रसम्मत मानी गई है।

इसी प्रकार 'धर्मसिन्धु' और 'व्रतराज' जैसे प्रामाणिक संहिता-ग्रंथों में इस दिन किए जाने वाले संकल्प का वह संस्कृत श्लोक आज भी सुरक्षित है, जो हर व्रती स्त्री के भीतर एक अलौकिक चेतना का संचार करता है:
 “मम सुखसौभाग्यपुत्रपौत्राद्यभीष्टसिद्धये करकचतुर्थीव्रतमहं करिष्ये।”
 (मेरे अखंड सौभाग्य, सुख, संतति और अभीष्ट की सिद्धि के लिए मैं यह करक चतुर्थी महाव्रत करती हूँ।)

स्कन्द पुराण के कार्तिक माहात्म्य और वामन पुराण में इस चतुर्थी का संबंध संकट-निवारण और पति के आरोग्य-आयुष्य से जोड़ा गया है।

 स्कन्द पुराण में मूल संस्कृत श्लोक एवं प्रमाण
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के माहात्म्य, करक (करवा) के दान और चंद्र-अर्घ्य का विधान करते हुए स्कन्द पुराण में कहा गया है।

कार्तिके कृष्णपक्षे तु चतुर्थी या भवेत्तिथिः।
तस्यां करकदानं च कर्तव्यं सुभगैः सदा॥
अर्घ्यं दद्याच्च विधिवच्चन्द्राय वरवर्णिनि।
सौभाग्यपुत्रवृद्ध्यर्थं स्वायुषो विजयाय च॥
अर्थात्:
हे वरवर्णिनि! कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की जो चतुर्थी तिथि होती है, उसमें सौभाग्यवती स्त्रियों द्वारा विधिपूर्वक ‘करक’ (करवा/पात्र) का दान सदैव कर्तव्य है। अपने सौभाग्य, पुत्र-पौत्र की वृद्धि, पति की दीर्घायु तथा समस्त बाधाओं पर विजय प्राप्त करने के लिए इस तिथि की रात्रि में विधिपूर्वक चंद्रमा को अर्घ्य प्रदान करना चाहिए।

चंद्रमा को अर्घ्य देने का शास्त्रसम्मत मंत्र (स्कन्द पुराणोक्त)
रात्रि में जब मिट्टी के करवे से चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है, तब स्कन्द पुराण में निर्दिष्ट इस प्रसिद्ध मंत्र का उच्चारण किया जाता है।

क्षीरोदार्णवसंभूत अत्रिनेत्रसमुद्भव।
गृहाणार्घ्यं शशाङ्केश रोहिण्या सहितो मम॥
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं ज्योतिषां पतये नमः।
नमस्ते रोहिणीकान्त सौभाग्यारोग्यवर्धनाय॥

अर्थात्:
क्षीरसागर से प्रकट हुए तथा महर्षि अत्रि के नेत्रों से उत्पन्न हुए, रोहिणी सहित हे शशांक (चंद्रदेव)! मेरे द्वारा अर्पित इस पावन अर्घ्य को स्वीकार कीजिए। हे ज्योत्स्ना (चांदनी) के स्वामी! समस्त नक्षत्र-ज्योतियों के अधिपति! हे रोहिणीकांत! आपको बारंबार नमस्कार है, आप मेरे सौभाग्य और आरोग्य की वृद्धि करें।

स्कन्द पुराण के अनुसार पूजन-विधान का मर्म
स्कन्द पुराण में स्पष्ट निर्देश है कि इस दिन केवल उपवास ही नहीं, बल्कि,
गौरी-गणेश और कार्तिकेय की प्रतिष्ठा: भगवान शिव, माता पार्वती, कार्तिकेय और गणेश का आवाहन कर संयुक्त पूजन किया जाता है।
करक (पात्र) की महत्ता: मिट्टी या तांबे के पात्र में मिष्ठान्न, अक्षत और जल भरकर उसे सुहाग की सामग्री के साथ दान करने का विधान है।
चंद्रोदयव्यापिनी ग्राह्यता: यह व्रत उसी दिन ग्राह्य होता है जिस दिन रात्रि में चतुर्थी तिथि विद्यमान हो और चंद्र दर्शन संभव हो।

 वहीं महाभारत के वनपर्व का वह अमर प्रसंग कौन भूल सकता है, जब अर्जुन तपस्या हेतु नीलगिरि पर्वत पर गए थे और शेष पांडवों पर चौतरफा संकट मंडरा रहा था? तब व्याकुल द्रौपदी के पूछने पर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के इसी ‘करक व्रत’ का उपदेश दिया था, जिसे पूर्वकाल में माता पार्वती ने देवाधिदेव महादेव की साक्षी में संपन्न कर समस्त अमंगलों का नाश किया था।

 वह भूखी नहीं, महाकाल की आंखों में आंखें डालती है। 
ऋग्वेद के दसवें मंडल में उद्घोषित ‘देवी सूक्त’ का वह अमर घोष स्मरण कीजिए—‘अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां...’—अर्थात् यह संपूर्ण ब्रह्मांडीय चेतना शक्ति (ऊर्जा) के ही स्पंदन से संचालित है। करवा चौथ का दिन वह क्षण है जब एक साधारण गृहस्थ नारी अपनी देह के क्षुधा-पिपासा जैसे समस्त भौतिक-जैविक बंधनों को एक ही झटके में त्याग देती है।
सूर्योदय से पूर्व तारों की छांव में 'सरगी' से आरंभ हुआ यह संकल्प जब दोपहर की तपिश को चीरता हुआ गोधूलि वेला में उतरता है, तब तक उस स्त्री का स्थूल शरीर पीछे छूट चुका होता है। कंठ सूखता है, रक्त की प्रत्येक कोशिका जल की पुकार करती है, किंतु उसके मस्तिष्क की तरंगें उस अलौकिक एकाग्रता में प्रवेश कर जाती हैं जिसे योगशास्त्र ‘धारणा’ और ‘समाधि’ का संधिकाल कहता है।
आधुनिक न्यूरोबायोलॉजी इसे मस्तिष्क की ‘अल्फा और थीटा अवस्था’  का चरम मानती है। यह वह मानसिक स्थिति है जहां मनुष्य की संकल्प-शक्ति अपने बायो-मैग्नेटिक फील्ड (Bio-field) को असीम विस्तार देकर कॉस्मिक ऊर्जा से एकाकार कर लेती है। वह दिन भर अन्न-जल का त्याग कर दुर्बल नहीं होती; वह अपनी आंतरिक प्राण-ऊर्जा को समेटकर अपने पति के मस्तक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा-कवच बुन रही होती है।

लोक-आख्यानों में जिस ‘करवा’ नाम की पतिव्रता की कथा सुनी जाती है, वह प्रतीकवाद का अप्रतिम शिखर है। कथा कहती है कि जब करवा के पति को नदी में एक ग्राह (मगरमच्छ) ने पकड़ लिया, तो उस नारी ने कच्चे सूत के धागे से उस ग्राह को बांध दिया और यमराज के द्वार पर जा खड़ी हुई। यमराज ने जब नियति का तर्क दिया, तो करवा ने स्पष्ट कहा—"यदि तुमने ग्राह को दंड देकर मेरे पति को जीवनदान नहीं दिया, तो मेरा सतीत्व और तपोबल तुम्हें भस्म कर देगा।" यमराज को नतमस्तक होकर उसके पति को दीर्घायु देनी पड़ी।
यमराज के सामने जाकर सत्यवान के प्राण लौटा लाने वाली पतिव्रता सावित्री हो या ग्राह को बांधने वाली करवा—ये कोई कपोल-कल्पनाएं नहीं हैं। सनातन का यह स्पष्ट दर्शन है कि 'काल' (समय और मृत्यु) भले ही सबसे बलवान हो, किंतु जब कोई जीवात्मा 'तप' और 'अनन्य निष्ठा' के चरम पर पहुंच जाती है, तो उसकी प्राण-ऊर्जा मृत्यु के भौतिक नियमों को शिथिल करने का सामर्थ्य रखती है।

स्त्री देह: चंद्रमा की साक्षात खगोलीय प्रयोगशाला है।
विज्ञान से पूछिए कि इस समूचे चराचर जगत में चंद्रमा की गति और आकर्षण से किसका सीधा और अटूट तालमेल है? उत्तर मिलेगा—महासागर के ज्वार-भाटे का, और केवल व केवल ‘स्त्री-शरीर’ का।
मानव शरीर और मस्तिष्क में 70 प्रतिशत से अधिक जल तत्व विद्यमान है। यजुर्वेद का शाश्वत सूत्र है—‘चन्द्रमा मनसो जातः’ (चंद्रमा मन का अधिष्ठाता है)। कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी की वह घोर अंधियारी निशा सामान्य नहीं होती। यह आश्विन और कार्तिक के संधिकाल में शरद ऋतु के अवसान और हेमंत के आगमन का वह समय है, जब पृथ्वी के वायुमंडल में सूक्ष्म विद्युत-तरंगों का संतुलन तेजी से बदलता है। स्त्री की जैविक घड़ी (Circalunar Rhythm) प्रकृति के उस 28 दिवसीय चंद्र-चक्र से जन्मजात जुड़ी होती है।
सरल उदाहरण: स्मार्टफोन और वायरलेस चार्जिंग पैड
आज की पीढ़ी वायरलेस चार्जर का उपयोग करती है। चार्जिंग पैड पर स्मार्टफोन रखते ही ऊर्जा का प्रवाह शुरू हो जाता है और बैटरी चार्ज होने लगती है। किंतु उसी पैड पर यदि चाबी, तांबे का सिक्का या पेन रख दिया जाए, तो वह चार्ज क्यों नहीं होता? क्योंकि चार्जिंग पैड से उत्सर्जित होने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणों को पकड़ने के लिए केवल फोन के भीतर एक विशेष ‘रिसीवर कॉइल’ बनाई गई है।
यही नियम देह-विज्ञान पर लागू होता है। चंद्रमा ब्रह्मांड का विशाल ट्रांसमीटर है और मनुष्य का शरीर एक जैविक उपकरण। पुरुष का शरीर टेस्टोस्टेरोन-प्रधान और रैखिक है, जबकि स्त्री का शरीर एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के कारण चंद्र-चक्र से प्राकृतिक रूप से जुड़ा हुआ ‘रिसेप्टर’ है। प्रकृति ने उस कॉस्मिक सिग्नल को आत्मसात करने का एंटीना केवल नारी-देह को दिया है। जब वह निर्जला रहकर अपनी फ्रीक्वेंसी ट्यून करती है, तो वह ऊर्जा सीधे ग्रहण होकर पूरे परिवार की आभा को आलोकित करती है।

 निर्जला तप: कोशिकीय शुद्धि और ऑटोफैगी का नोबेल विज्ञान है। 
उपवास को केवल 'भूखा रहना' समझना आधुनिक अल्पज्ञता है। यह देह के स्तर पर चलने वाला एक महान वैज्ञानिक शोधन-यज्ञ है।
प्रयाग फाइल्स में सरल उदाहरण से इसे समझिए। सिस्टम रीस्टार्ट और ऑटोफैगी है ये। 
जब कोई कंप्यूटर या मोबाइल अत्यधिक बैकग्राउंड डेटा लोड के कारण हैंग होने लगता है, तो हम क्या करते हैं? सारे ऐप्स बंद करके उसे रीस्टार्ट कर देते हैं। वर्ष 2016 में जापानी वैज्ञानिक योशिनोरी ओशुमी को 'ऑटोफैगी' की खोज के लिए चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार दिया गया। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने प्रमाणित किया कि जब मानव शरीर को 12 से 16 घंटे तक बाहर से अन्न-जल नहीं मिलता, तो शरीर की स्वस्थ कोशिकाएं भूखी होकर अंदर जमा कचरे, टॉक्सिन्स, मृत ऊतकों और बीमार कोशिकाओं को खुद ही भस्म करना शुरू कर देती हैं। इसे 'सेल्यूलर डिटॉक्स' कहा गया।
स्त्री जब निर्जला व्रत रखती है, तो भोजन पचाने में व्यय होने वाली शरीर की लगभग 70 प्रतिशत दैनिक ऊर्जा तत्काल मुक्त हो जाती है। शरीर का पूरा तंत्र स्वतः अपनी कोशिकाओं के नवीनीकरण और हीलिंग में लग जाता है। जब स्थूल भोजन में ऊर्जा का क्षरण नहीं होता, तो वही संचित प्राण-ऊर्जा उसके मन और संकल्प शक्ति को अप्रतिम तीव्रता प्रदान करती है। यह कमजोरी नहीं, बल्कि आंतरिक ऊर्जा का सुपर-चार्ज होना है।

षोडश शृंगार: सौंदर्य नहीं, बायो-इलेक्ट्रिकल सर्किट का परिरक्षण है।
अक्सर यह कुतर्क सुनने को मिलता है कि जब दिनभर उपवास है, तो स्त्रियों के लिए सोलह शृंगार करने, आभूषण लादने और सजने का क्या औचित्य है? क्या यह केवल बाह्य आडंबर है?
वस्तुतः षोडश शृंगार कोई फैशन शो नहीं है; यह निर्जला उपवास के दौरान शरीर की प्राण-ऊर्जा को रिसने से रोकने वाला एक 'बायो-इलेक्ट्रिकल सर्किट' है:
 
मांग में सिंदूर (पारा और हल्दी): सिंदूर में पारद (Mercury) और हल्दी का वैज्ञानिक सम्मिश्रण होता है। सिर का जो स्थान मांग कहलाता है, वह ठीक ‘आज्ञा चक्र’ और मस्तिष्क की ‘पीनियल ग्लैंड’ के ऊपर होता है। पारद विद्युत का सुचालक और शीतलक है, जो दिनभर के निर्जला उपवास में मस्तिष्क के तापमान को नियंत्रित रखता है और रक्तचाप को स्थिर करता है।
 
पैरों में चांदी की बिछिया और पायल: भौतिकी का नियम है कि पृथ्वी में ऋणात्मक ऊर्जा का असीम भंडार है। चांदी विद्युत की सर्वश्रेष्ठ संवाहक (Best Conductor) धातु है। पैर की दूसरी उंगली की नस सीधे गर्भाशय और हृदय से जुड़ी होती है। बिछिया का दबाव एक्यूप्रेशर के जरिए गर्भाशय के रक्त प्रवाह को संतुलित करता है, जबकि चांदी की पायल पृथ्वी से ऊर्जा खींचकर पूरे शरीर में सर्कुलेट करती है, जिसे आज का विज्ञान 'ग्राउंडिंग' (Earthing) कहता है।
 
 कांच की चूड़ियां और कंगन: कलाई पर शरीर के वे मर्म बिंदु (Acupressure Meridians) होते हैं जिनका संबंध थायरॉइड और प्रजनन ग्रंथियों से है। जब कांच की चूड़ियां कलाई पर टकराती हैं, तो उत्पन्न होने वाली सूक्ष्म ध्वनि और घर्षण परिधीय रक्त संचार (Peripheral Blood Circulation) को निर्बाध बनाए रखता है।
 
 हाथ-पांव में मेहंदी और महावर: निर्जला उपवास के कारण शरीर में आंतरिक ताप (Internal Heat/Metabolic Fire) बढ़ता है। मेहंदी और महावर प्राकृतिक शीतलक हैं, जो नसों के अंतिम सिरों (Nerve Endings) को शांत रखते हैं, जिससे सिरदर्द या बेचैनी नहीं होती।
सोलह शृंगार स्त्री देह को ऊर्जा के एक 'फैराडे केज' (Faraday Cage) की भांति सुरक्षित कर देता है, ताकि वातावरण की नकारात्मक तरंगें उसकी साधना को खंडित न कर सकें।

 'करवा' (पात्र) और अर्घ्य: पृथ्वी-जल का लैमिनार फ्लो और अर्थिंग है। 
करवा केवल जल भरने का लोटा नहीं है। शास्त्रों में स्पष्ट विधान है कि करवा मिट्टी का होना चाहिए, जिसमें एक विशिष्ट टोंटी (नलिका) हो।
पंचतत्वों का संतुलन और लैमिनार फ्लो:
मिट्टी पंचमहाभूतों में ‘पृथ्वी तत्व’ का प्रतिनिधित्व करती है। उस पकी हुई मिट्टी के पात्र में जब जल भरा जाता है, तो वह जल पृथ्वी तत्व के प्राकृतिक खनिजों से युक्त होकर चुंबकीय रूप से चार्ज हो जाता है।

जब चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है, तो उस संकीर्ण टोंटी से जल की एक पतली, अविच्छिन्न धार गिरती है। हाइड्रोडायनामिक्स में इसे 'लैमिनार फ्लो' कहते हैं। इस धार में कोई विक्षोभ (Turbulence) नहीं होता। जब यह जलधारा भूमि पर गिरती है, तो यह आकाशीय ऊर्जा और पृथ्वी के बीच एक जीवंत 'लिक्विड वायर' (तरल विद्युत तार) का निर्माण करती है। चंद्रमा से आने वाली विकिरण किरणें जब इस जलधारा से टकराकर धरती में समाती हैं, तो व्रती स्त्री के पैरों के पास एक शक्तिशाली ऊर्जा-मंडल बनता है। यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा को सीधे स्थूल जगत में उतारने की ‘ग्राउंडिंग’ प्रक्रिया है।

छलनी, दीपक और त्राटक: प्रकाश-भौतिकी और न्यूरो-बॉन्डिंग जो समझिए।
उस क्षण की कल्पना कीजिए, जब रात के नीरव सन्नाटे में सिंदूरी आंचल हवा में लहराता है और आकाश में श्वेत चंद्रमा उदित होता है। हाथ में तांबे या पीतल की छलनी है, और उस पर जलती हुई घृत-दीपक की स्वर्णिम शिखा। यह कोई साधारण लोक-कौतुक नहीं; यह योग के 'त्राटक' और ऑप्टिकल फिजिक्स का अद्भुत संगम है।

आप सोच रहे होंगे कि मनीष जी ने कोई उदाहरण दोबारा नहीं दिया तो परेशान मत होइए इसे सरल उदाहरण समझिए।   कैमरा लेंस का फिल्टर और विवर्तन (Diffraction) को लीजिए। 
कैमरे से जब आप सीधे सूर्य या किसी तीव्र प्रकाश पुंज की ओर लेंस घुमाते हैं, तो लेंस फ्लेयर (Lens Flare) उत्पन्न होता है और पूरी तस्वीर सफेद होकर धुंधली पड़ जाती है। किंतु जब उसी लेंस के आगे एक खास डिफ्यूजन ग्रिड या फिल्टर लगाया जाता है, तो वही तीक्ष्ण किरणें बिखरकर शांत और सुंदर तारों जैसी संरचनाओं में बदल जाती हैं।
भौतिक विज्ञान में इसे 'डिफ्रैक्शन' (Diffraction of Light) कहते हैं। दिनभर के तप के बाद जब स्त्री की आंखें सीधे चंद्रमा या पति को देखेंगी, तो आंखों का रेटिना अचानक तीखे प्रकाश से तनावग्रस्त हो सकता है। छलनी के सैकड़ों सूक्ष्म छिद्र उस प्रकाश को विखंडित और सौम्य कर देते हैं।
जब वह दृष्टि पहले अग्नि की लौ से छनती है, तो आंखों की पुतलियां एकाग्र होती हैं और आज्ञा चक्र जाग्रत होता है। इसके उपरांत जब वह उस छनित प्रकाश के पार अपने पति को देखती है, तो मस्तिष्क के विजुअल कॉर्टेक्स में कोई सांसारिक विक्षेप शेष नहीं रहता। मस्तिष्क में ऑक्सीटोसिन और एंडोर्फिन का वह प्रचंड स्राव होता है जो दांपत्य के सारे मानसिक तनाव को भस्म कर देता है। वह अग्नि की साक्षी में उस पुरुष के भीतर स्थित 'शिव' तत्व का साक्षात्कार करती है।

 पति की लंबी आयु का कार्डियोलॉजिकल व न्यूरोलॉजिकल सच को भी जानिए। 
तर्कवादी अक्सर उपहास उड़ाते हैं कि "पत्नी के भूखे रहने से पति के क्रोमोजोम या जीवन-काल की अवधि कैसे बढ़ सकती है?"
यह उपहास आधुनिक साइको-न्यूरो-इम्यूनोलॉजी (Psychoneuroimmunology - PNI) और हृदय-रोग विज्ञान (Cardiology) की अज्ञानता से उपजता है:
 
कॉर्टिसोल का शमन और दीर्घायु: आज चिकित्सा विज्ञान यह निर्विवाद रूप से स्वीकार करता है कि 80 प्रतिशत से अधिक पुरुषों में अकाल मृत्यु, स्ट्रोक और हार्ट अटैक का मुख्य कारण 'क्रॉनिक स्ट्रेस' (Chronic Stress) और तनाव हार्मोन 'कॉर्टिसोल' (Cortisol) का अनियंत्रित स्राव है।
 
 अगाध सुरक्षा और कृतज्ञता का न्यूरो-केमिकल प्रभाव: जब एक पुरुष अपनी आंखों के सामने यह देखता है कि एक स्त्री उसके अस्तित्व, उसके स्वास्थ्य और उसकी रक्षा के लिए पूरे दिन अन्न और जल की एक बूंद भी ग्रहण किए बिना खड़ी है, तो उसके अवचेतन मन में 'सुरक्षा', 'अहसास' और 'कृतज्ञता' की वह तीव्र अनुभूति जाग्रत होती है जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
 
हृदय गति की परिवर्तनशीलता (HRV - Heart Rate Variability): इस भावनात्मक अनुभूति के क्षण में पुरुष के मस्तिष्क से 'ऑक्सीटोसिन' (Love Hormone) और 'डोपामाइन' का विस्फोट होता है। यह हार्मोन तुरंत रक्त वाहिकाओं को शिथिल करता है, उच्च रक्तचाप को नीचे लाता है और पुरुष के हृदय गति की परिवर्तनशीलता (HRV) को संतुलित करता है। दांपत्य में मिलने वाली यह मानसिक शांति और भावनात्मक संबल पुरुष के इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है, जो सीधे तौर पर उसकी जैविक आयु (Biological Lifespan) को विस्तार देता है। पत्नी का यह महा-संकल्प पुरुष को अकाल मृत्यु के तनाव से बचाने वाली एक सजीव औषधि सिद्ध होता है।

"पुरुष क्यों नहीं?": पूरकता का शाश्वत सिद्धांत
जो यह पूछते हैं कि "पुरुष व्रत क्यों नहीं रखता?", वे भारतीय दांपत्य के पूरक दर्शन को समझ ही नहीं पाए, जहां पुरुष ने स्वयं नतमस्तक होकर स्त्री को ‘गृहिणी’, ‘अन्नपूर्णा’ और ‘प्राण-दात्री’ का सर्वोच्च आसन सौंपा है।

आप सोच रहे होंगे कि मनीष जी वैसे तो बहुत उदाहरण देते हैं लेकिन यहां कोई उदाहरण नहीं दे रहे हैं तो परेशान मत होइए इसे भी आप एकदम सरल उदाहरण: वाई-फाई राउटर और मोबाइल फोन से समझिए। 
घर में वाई-फाई (Wi-Fi) का राउटर एक स्थान पर स्थिर लगा रहता है, जबकि मोबाइल फोन को लेकर व्यक्ति बाहर गतिमान रहता है। क्या कोई यह कुतर्क कर सकता है कि राउटर भी सड़क पर घूमे और फोन दीवार पर टंग जाए? दोनों के आंतरिक सर्किट भिन्न हैं, और दोनों की उपयोगिता भी।
सृष्टि ने स्त्री और पुरुष को प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं, पूरकता के लिए गढ़ा है। पुरुष का व्रत इतिहास में रक्त और पसीने से लिखा गया। जब आक्रांताओं के संकट आते थे, तो पुरुष सीना तानकर रणभूमि में खड़ा होता था—वह उसका नित्य व्रत था। और स्त्री? वह उस युद्धरत पुरुष की आत्मिक रीढ़ बनकर घर की चौखट पर खड़ी रहती थी। वह जानती थी कि अस्त्र पुरुष का हो सकता है, किंतु विजय की शक्ति स्त्री के तपोबल से सिंचित होती है।
करवा चौथ पुरुष की पराधीनता का नहीं, बल्कि उसके प्रति उस संप्रभु, निर्भय और अगाध प्रेम का प्रमाण है जहां स्त्री काल (मृत्यु) की आंखों में आंखें डालकर कहती है—“जब तक मेरी सांसों का यह संकल्प-कवच जीवित है, तब तक मेरे सिंदूर की ओर देखने का साहस स्वयं काल भी नहीं कर सकता।”

सनातन की पौराणिक कथाएं वास्तव में ‘एलिगरी’ (Allegory - रूपक विज्ञान) हैं। हमारे ऋषियों ने अति-सूक्ष्म वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक सत्यों को जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए कथाओं का रूप दिया। जब आधुनिक पाठक इन दोनों कथाओं के वैज्ञानिक कोड को डिकोड करेगा, तो उसका संशय जड़ से समाप्त हो जाएगा।

करवा और 'ग्राह' (मगरमच्छ) की कथा: न्यूरोबायोलॉजी और बायो-एनेर्जेटिक रेजोनेंस है। 
पारंपरिक कथा में कहा जाता है कि जब करवा के पति को नदी में एक ग्राह (मगरमच्छ) ने अपने जबड़े में जकड़ लिया, तब करवा ने कच्चे सूत के धागे से ग्राह को बांध दिया और अपने तपोबल से यमराज को विवश कर पति के प्राण बचाए।
 
   कच्चा सूत भौतिक रूप से अत्यंत दुर्बल होता है, वह एक मगरमच्छ का भार भी नहीं सह सकता। यह इस बात का स्पष्ट वैज्ञानिक संकेत है कि बंधन स्थूल (Physical) नहीं, बल्कि सूक्ष्म ऊर्जा (Energetic Field) का था। भौतिकी का ‘क्वांटम एंटैंगलमेंट’ सिद्धांत कहता है कि जब दो कण गहरे रूप से जुड़े होते हैं, तो वे दूरी और भौतिक अवरोधों के पार भी एक-दूसरे की अवस्था को तुरंत प्रभावित करते हैं। करवा का वह 'कच्चा सूत' वास्तव में उसकी अपनी चेतना और प्राण-शक्ति का प्रक्षेपण (Energy Projection) था, जिसने उस परभक्षी के स्नायुतंत्र को स्तब्ध (Paralyze) कर दिया।
 

   जीवविज्ञान में मगरमच्छ 'रेप्टाइल' (Reptile) है। मानव मस्तिष्क का सबसे आदिम और क्रूर हिस्सा—जो केवल भय, आक्रामकता और संहार को नियंत्रित करता है—उसे आधुनिक न्यूरोसाइंस 'रेप्टिलियन ब्रेन' (Brainstem) कहता है। यह कथा बताती है कि जब पति बाह्य संसार के हिंसक, पाशविक संकटों (रेप्टिलियन प्रवृत्तियों) में घिर जाए, तब स्त्री की जाग्रत, शांत और उच्च चेतना (Higher Neocortex/ संकल्प-शक्ति) उस पाशविक शक्ति को निष्प्रभावी कर देती है।

 
   यमराज ब्रह्मांड के 'एन्ट्रॉपी' (Entropy - क्षय और मृत्यु का नियम) के अधिष्ठाता हैं। ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) का दूसरा नियम कहता है कि हर तंत्र क्षय (Decay) की ओर बढ़ता है। किंतु जब कोई चेतना 'एकाग्र तपोबल' से चरम गैर-एन्ट्रॉपिक अवस्था (Negative Entropy/Syntropy) में पहुंचती है, तो वह स्थानीय स्तर पर क्षय की गति को रोक देती है। करवा का संकल्प वही 'एंटी-एन्ट्रॉपी' बल था, जिसके आगे यमराज (मृत्यु का नियम) भी ठहर गया।

 सावित्री और सत्यवान की कथा: सेल्यूलर रिससिटेशन और इन्फॉर्मेशनल फील्ड (Morphic Resonance) है।
सावित्री का सत्यवान के मृत शरीर के पास बैठकर यमराज से संवाद करना और प्राण वापस लौटाना 'सेलुलर डेथ' और 'बायो-इन्फॉर्मेशन' का विज्ञान है।
 
   आधुनिक चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट करता है कि हृदय की धड़कन और सांस रुकने (Clinical Death) के तुरंत बाद शरीर की सारी कोशिकाएं एक साथ नहीं मरतीं। मस्तिष्क और कोशिकाओं में जीवन की सूचना (Cellular Information) कई घंटों तक प्रसुप्त अवस्था में जीवित रहती है। यदि उस संधिकाल में चेतना का तीव्र झटका (High-Frequency Electromagnetic Stimulus) दिया जाए, तो प्रणाली पुनर्जीवित हो सकती है—जैसे आज 'डीफिब्रिलेटर' (Defibrillator) से बिजली का झटका देकर रुकते हृदय को फिर से चालू किया जाता है।
 
   सावित्री कोई सामान्य स्त्री नहीं थी; उसने त्रिरात्र उपवास और घोर तप किया था। उसका हृदय-विद्युत क्षेत्र (Heart's Electromagnetic Field) अत्यंत सुसंगत (Highly Coherent) था। जब वह सत्यवान के अचेत शरीर के समीप बैठी, तो उसके शरीर से निकलने वाले उच्च-आवृत्ति के स्पंदनों ने सत्यवान के प्रसुप्त स्नायुतंत्र और माइटोकॉन्ड्रिया (कोशिकीय ऊर्जा केंद्र) को वह आवश्यक ऊर्जा-तरंग दी, जिसने प्राणों की सूचना को वापस शरीर में बांध लिया।
 
 
   यमराज से वरदान मांगना वास्तव में अवचेतन और सुपर-कॉन्शस माइंड (Superconscious Mind) का 'रीप्रोग्रामिंग' था। उसने यमराज से पहले सास-ससुर की दृष्टि, फिर खोया राज्य, और अंत में सौ पुत्रों का वरदान मांगा। सौ पुत्र बिना जीवित पति के संभव नहीं थे। यह लॉजिक-गेट (Logical Paradox) उस सार्वभौमिक बुद्धिमत्ता (Universal Intelligence) को यह संदेश देता है कि जीवन की निरंतरता अभी अपूर्ण है, अतः जैविक घड़ी को उल्टा घूमना ही होगा।

"कच्चे धागे से मगरमच्छ को बांधने वाली करवा और यमराज के पाश से प्राण खींच लाने वाली सावित्री—ये दोनों आख्यान यह सिद्ध करते हैं कि जब एक संकल्पबद्ध स्त्री की चेतना 'क्वांटम फील्ड' के चरम पर पहुँचती है, तो वह स्थूल भौतिकी के नियमों को धता बताकर क्षय (Entropy) और मृत्यु की गति तक को मोड़ देने की सामर्थ्य रखती है।"

यह परंपरा किसी के सम्मुख गिड़गिड़ाने की नहीं, यह उस महा-प्रकृति के जाग्रत होने की रात है जो विधाता के लिखे विधान को भी बदलने का सामर्थ्य रखती है। जब छलनी के पार चांद मुस्कुराता है और मिट्टी के करवे से अर्घ्य की पावन जल-धारा धरती को छूती है, तो वह केवल जल नहीं गिरता—उस क्षण सनातन का वह अमर विश्वास धरती को सींचता है, जो मृत्यु पर भी प्रेम और संकल्प की विजय का अनंत जयघोष करता है।

इसलिए अगली बार जब कार्तिक की उस शरद निशा में आप किसी छत पर सिंदूरी आंचल लहराते देखें... जब लाल जोड़े में सजी किसी स्त्री के हाथ में पीतल की छलनी कांपती दिखाई दे, और मिट्टी के करवे से टपकती जल-धारा धरती को छूती नजर आए—तो अपनी आंखें मूंदकर उसे बॉलीवुड के किसी रूमानी गाने का सीन मत समझ लेना। उसे फेमिनिज्म की सस्ती बहसों में घसीटकर किसी लाचार नारी का ढकोसला समझने की जहालत तो कतई मत करना।
सभ्यताओं के इतिहास में अपनी रीढ़ सीधी करके देखना—उस छत पर कोई दुर्बल स्त्री पानी के घूंट के लिए नहीं तरस रही; उस छत पर साक्षात 'प्रकृति' अपने पूरे शृंगार और प्रचंड ऊर्जा के साथ खड़ी होकर 'पुरुष' (चेतना) के प्राणों की परिक्रमा कर रही है!
वह छलनी प्लास्टिक का खिलौना नहीं, प्रकाश के विवर्तन का यंत्र है।
वह मिट्टी का करवा कोई बर्तन नहीं, पंचतत्वों की अर्थिंग का संवाहक है।
और उसकी सूखी अंतड़ियों से उठती वह मौन पुकार कोई लाचारी नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के नियमों को मोड़ देने वाला वह क्वांटम संकल्प है, जो सत्यवान के प्राण खींच लाया था और जिसने मगरमच्छ के जबड़े बांध दिए थे।
यह भारत के उन त्रिकालदर्शी ऋषि-वैज्ञानिकों का रचा हुआ वह अभेद्य 'कोड' है, जहां प्रेम और भौतिकी एक बिंदु पर आकर विलीन हो जाते हैं।
गर्व से भर लीजिए अपने सीने को कि आप उस माटी की संतान हैं जहां एक साधारण गृहस्थ नारी वर्ष में एक रात ऐसी जीती है, जब वह मृत्यु के देवता यमराज की आंखों में सीधी आंखें डालकर कह सकती है—
“पीछे हट जाओ काल! तुम्हारे नियम इस देहरी के बाहर चलते होंगे; इस सिंदूर की परिधि में प्रवेश करने का अधिकार स्वयं विधाता ने भी केवल मेरे संकल्प को सौंपा है।”
यह अंधविश्वास नहीं, यह महा-विज्ञान है।
यह विवशता नहीं, यह सनातन का अमर स्वाभिमान है!

आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ….। अगली कड़ी जल्द…….।

✍️अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज 

Wednesday, 28 October 2026

प्रकृति के अप्रकट रहस्य - कुछ सत्य ऐसे हैं जिन्हें सभी मनुष्य झुठलाने या बदलने के प्रयास में लगे रहते हैं ..

मनुष्य पाँच तत्त्वों से बना है। भूत-प्रेत चार तत्त्वों से बने होते हैं, उनमें पृथ्वी तत्त्व नहीं होता। देवताओं का शरीर तीन और दो तत्त्वों से बना होता है। परमात्मा केवल आकाश तत्त्व से बना होता है। इन सभी को इन्हीं बाहरी आँखों से देखा जा सकता है, परन्तु परमात्मा को अंतर्दृष्टि खुले बिना देखा ही नहीं जा सकता। आप मंत्र-सिद्धि मत कीजिए, केवल अपनी क्षमता बढ़ा लीजिए, दो तत्त्व तक के शरीर देख सकेंगे।
मैं देवघर में जिस होटल में रुकता हूँ, उसके कमरे की सारी खिड़कियाँ बाहर की ओर खुलती हैं। एक खिड़की के सामने एक पुरानी इमारत है, उस पर पानी की लोहे की एक पुरानी टंकी रखी है, जो शायद अब उपयोग में नहीं आती।
एक दिन एक दम्पत्ति अपनी दस वर्षीय पुत्री को लेकर आए। वह कुछ भी बोलती रहती थी। उन तीनों को कमरे में बैठाकर मैं नीचे होटल के रिसेप्शन पर चला गया। कुछ देर बाद ऊपर लौटा तो देखा, माँ अपनी बेटी को डाँट रही है। मैंने पूछा, क्या हुआ? वे बोले, कुछ नहीं, बस वह बीच-बीच में बाहर खिड़की की ओर देख रही थी।
मैंने उस लड़की को पास बुलाकर पूछा, क्या उस पानी की टंकी पर कोई खड़ा है? उसकी माँ बीच में ही बोल पड़ी, इसे पता नहीं क्या-क्या दिखता रहता है, हम तो परेशान हो गए हैं। वह छोटी बच्ची बोली, क्या आपको भी दिखा है।  मैंने कहा, मैं जब भी यहाँ आता हूँ, रोज़ ही देखता हूँ। यह दो-तीन बार यहाँ से कूदती है, परन्तु मरेगी नहीं, क्योंकि इसे मरे हुए कई वर्ष हो गए हैं। अब ऐसी बातें सभी को डराती हैं।उसके पश्चात मैंने उन दम्पत्ति को बाहर जाने के लिए कहा और उस बच्ची से डेढ़ घंटे तक बात की। सब कुछ सामान्य ही था। फिर उसके माता-पिता को बुलाकर कहा, यह बिल्कुल ठीक है, इसे कुछ नहीं हुआ है। यह केवल थोड़ा अधिक देख लेती है। अधिक से अधिक इतना कि यह चार तत्त्वों तक की वस्तुओं को देख लेती है। परन्तु माता-पिता को ऐसी बेटी नहीं चाहिए। यह समस्या हम सभी की है।हमें संतान तो चाहिए, परन्तु अपनी इच्छा के अनुसार। जबकि हमें यह भली-भाँति ज्ञात होना चाहिए कि पुत्र या पुत्री के रूप में जो भी मिला है, वह सब पहले से ही प्रोग्राम होकर मिला है। इस प्रकार की क्षमता प्राप्त करने के लिए लोग लम्बी तपस्या करते हैं। उस बच्ची को यह सब स्वाभाविक रूप से प्राप्त है। उस बच्ची के कुछ सिस्टम को लॉक कर दिया गया। लोगों की दृष्टि में वह ठीक हो गई, परन्तु मेरी दृष्टि में उसकी प्रगति रुक गई।
हम अपनी क्षमताओं को विकसित नहीं करना चाहते। हमें लगता है कि हम जिसकी साधना कर रहे हैं, वही सब कुछ करे। जो लोग प्रत्यक्षीकरण करना चाहते हैं, वे किसी योग्य व्यक्ति के सान्निध्य में त्राटक के सभी सात चरणों को गम्भीरता से पूरा करें। जिन्हें अपना माल बेचना है, मैं उनकी बात नहीं करता। बस गायत्री की प्रशंसा कर दी, लोग बिना सोचे-समझे उसे लेने के लिए मरे जाते हैं।
मनुष्य सत्य पर कितनी भी मिट्टी क्यों न डाल दे, सत्य को बदला नहीं जा सकता। उसे स्वीकार करना ही पड़ता है। एक बार सत्य को स्वीकार करने का स्वभाव बन जाए तो जीवन में परिवर्तन अपने आप आरम्भ हो जाता है। इसके लिए अलग से कोई टंटा-घंटा करने की आवश्यकता नहीं है।
कुछ सत्य ऐसे हैं जिन्हें सभी मनुष्य झुठलाने या बदलने के प्रयास में लगे रहते हैं, परन्तु जब से पृथ्वी बनी है तब से आज तक कोई ऐसा कर नहीं पाया। मैं यहाँ कुछ ऐसी ही बातों पर थोड़ा प्रकाश डाल रहा हूँ, जिन्हें हम सभी झुठलाने में लगे रहते हैं।
कुछ वर्ष पूर्व मैं राजधानी एक्सप्रेस से मुजफ्फरपुर से कामाख्या जा रहा था। सेकंड एसी में मेरी सीट के ठीक सामने एक ब्राह्मण की सीट थी। वहाँ कुछ विधायक भी थे। उन्हें देखकर ब्राह्मण कुछ अधिक ही सक्रिय हो गया। तुलसीदास ने क्या कहा है, यही उसके भीतर से उबाल मार रहा था। मैंने उसे दो-तीन बार रोककर कहा, शांत बैठो, परन्तु वह बिल्कुल नहीं माना।
अंततः मैंने उससे एक छोटा-सा प्रश्न किया - राम और सीता की विवाह-कुंडली किसने मिलाई थी? सीता के चरण जैसे ही अयोध्या में पड़े, राम को वनवास हो गया, ससुर दशरथ की मृत्यु हो गई, पूरा परिवार बिखर गया। उसके बाद जो कुछ हुआ, वह सबके सामने है। हम कैकेयी को दोष देते हैं, धोबी को दोष देते हैं, उस ब्राह्मण को दोष क्यों नहीं देते जिसने कुंडली मिलाई थी? हम उस ब्राह्मण से भी कुछ नहीं कहते जो द्वापर की जगह त्रेता ले आया था, उसने सब कुछ ठीक क्यों नहीं किया?यदि हमारे घरों में ऐसी बहू आई होती तो वह जीवन भर ताने सुनती।ब्राह्मण ने कई बार विषय बदलने का प्रयास किया, परन्तु मैं नहीं माना। मैंने कहा, अब पूरी रात इसी विषय पर बात करूँगा। मुझे तुम्हारे रामचरितमानस के ज्ञान को देखना है। वहाँ विधायक थे, भीड़ तो थी ही, और भी काफी भीड़ एकत्र हो गई। अंततः तीन घंटे बाद रात ग्यारह बजे ब्राह्मण सीट बदलकर थर्ड एसी में चला गया। उसके बाद वहाँ उपस्थित लोगों के साथ जो सत्संग हुआ, उसी के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं।
वास्तविकता को स्वीकार करने में हमारा साहस क्यों मर जाता है ?
राम एक आदर्श व्यक्तित्व हैं। जिन तथ्यों को हम नकारते हैं, वही उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाते हैं। हम राम को मानते तो हैं, परन्तु राम ने जो करके दिखाया, उसमें हमारी आस्था नहीं है। ईश्वर ने कृष्ण के रूप में कहा कि जीवन की वास्तविकता क्या है, और राम के रूप में जीकर दिखाया कि मनुष्य को जीवन कैसे जीना चाहिए। परन्तु हमने इन सबसे बचने के बहाने खोज रखे हैं।
राम ने सारा जीवन अपमान, पीड़ा और संघर्ष में जिया। यह सब समाज का ही दिया हुआ था। मंच पर बैठे लोग कहते हैं, वे लीला कर रहे थे। लीला तो नौटंकी को कहा जाता है। लोगों ने राम के सम्पूर्ण जीवन-चरित्र को ही मजाक बना दिया है। यही कारण है कि हम राम को आदर्श मानते तो हैं, परन्तु उनके जीवन जीने की शैली का अनुसरण नहीं करते।

विधेहि देवी कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

वेदोऽहम् अवेदोऽहम्। विद्याहम् अविद्याहम्।
*अजाहम् अनजाहम्। अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक् चाहम्॥

                  #अष्टावक्रवैदिकविज्ञानशोध
          साभार ✍️ हिमालयन घुमक्कड़ विक्रम गिरी
          Himalayan Ghumkkad Vikram Giri 

                         वयं राष्ट्रे जागृयाम 

विद्या और अविद्या में अंतर

                 🍃                ॥ॐ॥                🍃

                       विद्या और अविद्या का अंतर

• विद्या वह सच्चा ज्ञान है जो इस अज्ञान के आवरण को हटाकर जीव को मोक्ष और मुक्ति की ओर ले जाता हैं।
• अविद्या वह भ्रांति या पर्दा है जो वास्तविक सत्य (ब्रह्म या आत्मा) को ढक लेती है और मनुष्य को संसार एवं जन्म-मृत्यु के चक्र में बांधे रखती है।

                               ❀  विद्या  ❀
   श्रुति अनुसार विद्या मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं -

(१) परा विद्या (आध्यात्मिक या पारलौकिक ज्ञान)
  • यह वह ज्ञान है जो ब्रह्म (परम सत्य) और आत्मा की एकता का बोध कराता है।
  • इससे माया और संसार के बंधनों से मुक्ति मिलती है।
  • इसे जीवन जीने का ज्ञान भी कहा जाता है। 
(२)  अपरा विद्या (लौकिक या भौतिक ज्ञान)
  • यह संसार, प्रकृति, विज्ञान और जीविका से जुड़ी विद्या है।
  • इसमें चारों वेद, वेदांग, दर्शन, इतिहास-पुराण, न्याय, ज्योतिष और विभिन्न व्यावहारिक विषयों का अध्ययन आता है।
  • इसे जीविका चलाने का ज्ञान भी कहा जाता है। 
                     विद्या के अन्य वर्गीकरण
  • 14 विद्याएँ: भारतीय ग्रंथों के अनुसार मुख्य रूप से 14 विद्याएँ मानी गई हैं। इनमें 4 वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद), 4 उपवेद (आयुर्वेद, धनुर्र्वेद, गंधर्ववेद, अर्थवेद या स्थापत्य), और 6 वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष) शामिल हैं। 
  • 18 विद्याएँ: विष्णुपुराण और लोकनीति के अनुसार कुल 18 विद्याएँ बताई गई हैं (जिसमें 4 वेद, 6 वेदांग, पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, धनुर्र्वेद, गंधर्ववेद और अर्थशास्त्र शामिल हैं)।
  • शुक्रनीति के अनुसार: इसमें 32 मुख्य विद्याएँ और 64 कलाओं का वर्णन मिलता है। 

                             ❀ अविद्या ❀
 श्रुतिनुसार अविद्या भी मुख्य रुप से दो प्रकार की होती हैं-

   (१) महर्षि पतंजलि के योगसूत्र के अनुसार अविद्या

योगदर्शन (साधन पाद, सूत्र २.५ ) के अनुसार अविद्या चार प्रकार की होती है: -
अनित्यशुचिदुःखात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥

• अनित्य में नित्य की प्रतीति: जो चीज़ नाशवान या बदलने वाली है, उसे शाश्वत या सदा रहने वाली समझना (जैसे इस नश्वर शरीर को हमेशा रहने वाला मानना)।
• अशुचि में शुचि की प्रतीति: अशुद्ध या गंदी वस्तु को पवित्र या सुंदर समझना (जैसे शरीर और संसार की मलिनाता को सुंदर मानकर उसमें अत्यधिक आसक्ति रखना)।
• दुःख में सुख की प्रतीति: जिससे वास्तव में दुःख मिलने वाला है, उसे सुख का साधन समझना (संसार के भोग-विलासों को सच्चा सुख मानना)।
• अनात्मा में आत्म-बुद्धि: जो आत्मा नहीं है (जैसे शरीर, मन, इंद्रियां या अहंकार), उसे ही अपनी 'आत्मा' या 'मैं' समझना।

 (२)  आध्यात्मिक दृष्टि से जीव की अविद्या के पाँच स्तर 

अध्यात्मिक दृष्टिकोण से जीव की अविद्या को पाँच स्तरों में बांटा गया है: -
• स्वरूप-विस्मृति: जीव का अपने मूल, दिव्य और सत्य स्वरूप को भूल जाना।
• देहाध्यास: आत्मा होते हुए भी खुद को केवल नाशवान 'देह' (शरीर) मान लेना और देहभिमानी हो जाना।
• इंद्रियाध्यास: स्वयं को आंख, कान, नाक आदि इंद्रियों के रूप में देखना और उनके सुख-दुःख को अपना मानना।
• प्राणाध्यास: प्राण की क्रियाओं और ऊर्जा के उतार-चढ़ाव को ही अपना जीवन या अस्तित्व समझ लेना।
• अंतःकरणाध्यास: मन, बुद्धि और अहंकार के विचारों को ही अपना 'सत्य रूप' मान लेना।

                      साभार - सनातन ज्ञान महासागर 
                          ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा 
                           ❀ वयं राष्ट्रे जागृयाम ❀