युद्ध के नियमों को स्मरण करो।
एक निहत्थे और रथहीन योद्धा पर प्रहार करना अधर्म है।
जब तक मैं पहिया निकाल न लूँ, तुम बाण नहीं चला सकते।"
अर्जुन के हाथ ठिठक गए।
गांडीव की प्रत्यंचा ढीली पड़ गई।
तभी सारथी बने श्रीकृष्ण का अट्टहास गूँजा:
> "नियम, कर्ण?
आज तुम्हें धर्म और नियमों की याद आ रही है?
कहाँ था तुम्हारा धर्म जब तुम छह महारथियों के साथ मिलकर बालक अभिमन्यु को घेरकर मार रहे थे?
कहाँ गए थे नियम जब भरी सभा में द्रौपदी को अपशब्द कहे गए और तुमने मौन रहकर उसका अपमान देखा?"
>
केशव के इन तीखे वाक्यों ने अर्जुन के भीतर की अग्नि को प्रज्वलित कर दिया।
क्रोधित अर्जुन ने भगवान शिव का दिया हुआ अस्त्र संधान किया और एक ही वार में दानवीर कर्ण को मृत्यु की शैय्या पर सुला दिया।
#दानवीरता की अंतिम परीक्षा:
कर्ण लहूलुहान पड़ा अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था।
सूर्यास्त होने को था, लेकिन श्रीकृष्ण यह सिद्ध करना चाहते थे कि मृत्यु के द्वार पर खड़ा यह योद्धा वास्तव में 'महादानवीर' है। श्रीकृष्ण ने एक वृद्ध ब्राह्मण का भेष धरा और कर्ण के पास जाकर विलाप करने लगे।
"#हे #दानवीर!
मेरी पुत्री का विवाह है और मेरे पास दान देने को कुछ नहीं है। क्या तुम इस निर्धन की सहायता करोगे?"
मृत्यु के करीब पहुँच चुके कर्ण ने क्षीण स्वर में कहा,
"हे #ब्राह्मण, मैं रणभूमि में निहत्था पड़ा हूँ, मेरे पास आपको देने के लिए अब कुछ नहीं बचा।"
#ब्राह्मण रूपी #कृष्ण बोले, "नहीं कर्ण!
तुम्हारे दांतों में स्वर्ण जड़ा है, वह मुझे दे दो।"
कर्ण ने पास पड़ा एक पत्थर उठाया और बिना हिचकिचाए अपना दांत तोड़ दिया।
जब उसने वह दांत ब्राह्मण को दिया, तो ब्राह्मण ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, "यह तो रक्त से सना और अशुद्ध है, मैं इसे नहीं ले सकता।"
तब कर्ण ने अपना धनुष उठाया और धरती पर बाण चलाया। धरती की कोख फाड़कर 'बाण गंगा' की निर्मल धारा फूट पड़ी। कर्ण ने दांत को उस गंगा जल में शुद्ध किया और ब्राह्मण को अर्पित कर दिया।
इस अद्भुत त्याग को देख श्रीकृष्ण अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और उनकी आँखों में आंसू भर आए।
> #श्रीकृष्ण ने कहा: "कर्ण, जब तक यह सृष्टि रहेगी, तुम्हारी दानवीरता का गुणगान तीनों लोकों में होगा।
तुम जैसा न कोई हुआ है, न होगा।"
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#तीन #वरदान और कुंवारी भूमि का रहस्य:
प्रभु को सामने देख कर्ण ने अपने जीवन के दुखों को याद किया और तीन वरदान माँगे:
#सामाजिक #न्याय: "प्रभु, अगले जन्म में जब आप आएं, तो पिछड़े और उपेक्षित वर्ग के उत्थान के लिए कार्य करें।"
#साहचर्य: "अगले जन्म में आप मेरे ही राज्य में जन्म लें।"
#अंतिम #संस्कार: "मेरा अंतिम संस्कार ऐसी भूमि पर हो जो 'कुंवारी' हो, जहाँ आज तक किसी का दाह संस्कार न हुआ हो।"
कर्ण की मृत्यु के पश्चात श्रीकृष्ण स्वयं उनके पार्थिव शरीर को लेकर निकल पड़े।
पूरी पृथ्वी पर ऐसी भूमि मिलना असंभव था।
अंततः सूरत (गुजरात) में ताप्ती नदी के किनारे उन्हें मात्र एक इंच ऐसी भूमि मिली जो शुद्ध थी।
इतने छोटे टुकड़े पर संस्कार असंभव था, इसलिए श्रीकृष्ण ने अपना एक बाण रखा और उस पर कर्ण का दाह संस्कार किया।
आज इस स्थान को 'तुलसीबाड़ी मंदिर' के नाम से जाना जाता है।
तीन पत्तों वाला वट वृक्ष: एक जीवित चमत्कार
जब पांडवों ने उस भूमि की पवित्रता पर संदेह किया, तो आकाशवाणी हुई कि ताप्ती नदी कर्ण की बहन हैं और अश्विनी कुमार उनके भाई, अतः यह स्थान उनके लिए ही सुरक्षित था।
साक्ष्य के रूप में श्रीकृष्ण ने वहाँ एक वट वृक्ष (बरगद) को स्थापित किया।
हैरानी की बात यह है कि:
सूरत के इस मंदिर में मौजूद वह बरगद का पेड़ हजारों साल पुराना है, लेकिन उस पर हमेशा सिर्फ तीन पत्ते ही रहते हैं।
ये तीन पत्ते ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक माने जाते हैं। मान्यता है कि जो भी यहाँ अटूट श्रद्धा के साथ आता है, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है।