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Friday, 31 July 2026

कहीं आप भी तो इससे मिलती जुलती कोई त्रुटि अपने संसार में नहीं कर रहे हैं??

क्या उस घर के सदस्य पागल या maniac थे जिनको मैने कुछ दिन पहले खूब झेला था और उनकी खतरनाक मानसिकता को मैं बमुश्किल बदल पाया था!!हालांकि मैं उनकी हाड़ कंपा देने वाली प्रवृति को बदल पानी में समर्थ रहा लेकिन एक बात दावे से कह सकता हूं कि उनके द्वारा उत्पन्न किया गया अभिशाप जिस तरह से इस परिवार के सुनहरे बीस साल लील गया आप भी यही गलती भूले से मत करना!!हालांकि कुछ लोग बिना सोचे समझे ये कह सकते हैं कि साब हम अपने पितरों को जो 16 दिन तक नैवेद्य देते हैं उसका क्या??तो पहले ये मेरा अनुभूत प्रसंग पढ़िए और खुद डिसाइड कीजिए कहीं आप भी तो ऐसे किसी प्रसंग के भुक्तभोगी तो नहीं हैं??और हां,श्राद्ध के दिनों में दिया जाना वो नैवेद्य गृहों की परिस्थिति और उस पवित्र माहके कारण पूर्ण शास्त्र सम्मत है!! 

नाम शहर स्थान को बिल्कुल मत पूछिए लेकिन जिस परिवार ने यह भयंकर गलती की है ऐसी ही भयंकर गलती और परिवार वाले भी पूरे भारत भर में कहीं न कहीं कर रहे होंगे जोकि ऑलरेडी सनातनी है !!उन्हीं के विचारार्थ ये सच्चा किस्सा बयान कर रहा हूं!!

मेरा यह पोस्ट शायद उस परिवार वालों के भी पढ़ने में आ सकता है जिनको अपनी प्रत्यक्ष आंखों से मैंने यह खतरनाक उपक्रम करते हुए देखा है!!लेकिन ये सब कुछ उसी परिवार के जिम्मेदार बेटे की सहमति से लिखा जा रहा है!!

हुआ यूं की करीब 20 वर्ष पहले एक सनातनी परिवार की सुंदर और गृह कार्यों में कुशल गृहणी का 35 वर्ष की आयु में देहांत हो गया!! वह लोग इस घटना को 2005 मैं घटित हुआ बताते हैं!! उनकी पर्सनल पहचान ना बताने की शर्त पर उनसे यह तय हुआ कि मैं उनके इस खतरनाक अनुभव को फेसबुक पर दूसरे लोगों को सबक देने के लिए जरूर शेयर करूंगा!!

तो मित्रों उनकी मृत्यु के पश्चात उनके 13वीं संपन्न हुई क्योंकि उनके छोटे-छोटे तीन बच्चे थे जो आज काफी वयस्क हो चले हैं और इतने समझदार हैं कि अपने पिता की गलती को बड़े होकर उन्होंने सुधारने के क्रम के फल स्वरुप मुझे अपने घर पर आमंत्रित किया!!

होता यह था कि घर के गृह स्वामी अपनी पत्नी के वियोग में उनकी मृत्यु के पश्चात इतने पागल हो गए कि उन्होंने अपनी पत्नी के इसी दुनिया में रहने का एहसास कर लिया और यह मान लिया कि वह अभी भी उनके आसपास हैं!! रोज रात को वह उनके नाम से बिस्तर लगाते और उस बिस्तर पर उनकी मनपसंद भोजन सामग्री के रूप में लिट्टी चोखा रखने लगे!! सुबह उठते ही उनके बिस्तर बड़े करीने से समेट दिया जाता और रखे हुए लिट्टी चोखे को पशु पक्षियों में तकसीम कर दिया जाता था!!

तो मित्रों कुछ दिन तो सब कुछ ठीक चला लेकिन ठीक 15 महीने के बाद उनके घर में वह मर चुकी गृह लक्ष्मी अपनी खून जमा देने वाली उपस्थिति दर्ज कराने लगी!! पतिदेव का तो कुछ नहीं हुआ क्योंकि वह एक खतरनाक मानसिकता में जी रहे थे लेकिन घर का बड़ा बेटा जो उस वक्त लगभग 14 वर्ष का था उसका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा और वह गुमसुम रहने लगा दो-तीन साल बाद बीच वाला बेटा और सबसे छोटी बेटी भी अपने आप में सिमटी हुई रहने लगी!! गृह स्वामी पर उसका कोई असर नहीं था हालांकि उन्होंने दूसरी शादी नहीं की लेकिन वह यह मानने वाले उस घर में अकेले इंसान थे कि उनकी पत्नी अभी भी स्थूल शरीर में उनके साथ है!! कुछ अतरंग बातें मैं इस पोस्ट में जानबूझकर स्किप कर रहा हूं क्योंकि मेरी एक सभ्य ऑडियंस है लेकिन वास्तव में होता क्या रहा था वह आप खूब समझ रहे होंगे!!

एक वर्ष पहले मेरे पास फोन आया तो मैंने रिसीव किया!! उधर से एक युवक की आवाज आ रही थी जिसने पूछा,"क्या आप बाल्मीकि अंकल हैं?".... मेरे हां करने पर वह लगभग सुबकने की हालत में आ गया और रोते रोते अपने घर का डरावना हाल मुझे बताया!! सुनकर मैं भी सिहर गया और मैने उस घर जाकर बच्चों की मदद का निश्चय कर डाला!!

मित्रों करीब 13 घंटे की यात्रा के पश्चात में उस शहर में पहुंचा और स्टेशन पर थोड़ा फ्रेश होकर उस परिवार में एंट्री किया तो बड़ा बेटा जो लगभग 34-35 वर्ष का हो चला था उसने मेरा स्वागत किया उसके पीछे लगभग 27 वर्ष की युवती खड़ी थी और 30 वर्ष का उनका भाई अपने जॉब पर था जो 2 घंटे के भीतर मेरे आने की खबर सुनकर घर पर आ गया!!

उसके आने तक मैं उसे घर के हालात देख चुका था और बहुत सारी समस्याओं से परिचित हो चुका था!!

तो मित्रों अब तक वह ग्रहणी उस घर में एक जीवित आत्मा की भांति अपनी रहस्यमय उपस्थित स्वरूप ना केवल गृहस्वामी से वार्ता करती थीं बल्कि बच्चों को भी अपने दिशा निर्देश प्रदान करती रहती थीं!!घर में जो भी भोजन बनता था दोनों वक्त बाकायदा नियम स्वरूप उनको उसी बिस्तर पर अर्पित किया जाता था!!सच्ची कहानी है कोई उपन्यास नहीं सो ज्यादा लंबा ना खींचूंगा सो इतना समझ लीजिए उस घर में अगर भूल से भी लिट्टी चोखा घर तो छोड़िये बाहर भी जाकर खा लिया और गृह स्वामिनी को अर्पित ना किया तो फिर भयंकर तबियत खराब होना निश्चित समझिए संबंधित व्यक्ति की!!जब बड़े बेटे का विवाह हुआ तो मंढा उत्सव में खास व्यंजन लिट्टी चोखा बनवाया गया!!नाते रिश्तेदारों में जब ये खबर फैली तो उस घर से सबने किनारा करना शुरू कर दिया!!एक बार फिर कहता हूं कि अनेकों डराने वाले किस्से जानबूझकर स्किप कर रहा हूं कि मेरा इरादा डर के माहौल को फैलाना नहीं है बल्कि सबको एक शिक्षाप्रद तस्वीर दिखे वही बातें बता रहा हूं!!

अगर कोई मेहमान घर के कुछ नियमों की अवहेलना कर दे तो उसको ऐसी मार पड़ती कि पूछो मत भाई लोग!!

गृह स्वामी लगभग खुश थे अपनी स्थिति थे लेकिन अब तक बच्चों ने विद्रोह का मन बना लिया था हालांकि इसमें भी उन्होंने देर कर दी थी!!क्योंकि रिश्तेदारी में उनकी खूब जगहंसाई होती थी तो एक दिन विस्फोट होना निश्चित था!!तीनों बच्चों ने बाल्मीकि अंकल को बुला तो लिया लेकिन गृहस्वामी के स्वाभिमान पर ये लात के जैसा था!!बस उन्होंने तो मुझे धर लिया भाले की नोंक पे और नानी दादी की अति प्राचीन कहावते मुझे सुना डालीं!!इससे पहले कि वे मुझे पीट डालते पूरा भयभीत मुहल्ला,बड़े बेटे के ससुराल वाले और अड़ोसी पड़ोसी सबने उन भाई साब को सूअर की मानिंद धून डाला!!मुझे याद है जब मैं उन अदृश्य गृहस्वामिनी से वार्ता कर रहा था तो 150 के ऊपर लोग हैरत से मुझे देख रहे थे!!

वो गृह स्वामिनी एक भली औरत निकली और मेरे इसरार पर उन्होंने अपना पुनः विधिवत अंतिम संस्कार किया जाना मान लिया!!उन्होंने भी पुष्टि की उनके पति ने उनकी आत्मा को अति कष्ट पहुंचाया था और बिना किसी उकसावे के मृत आत्मा का आवाहन करके जबरन इस दुनिया में लौटने पर विवश कर दिया था और ममता की मारी वह माता अपने परिवार और बच्चों के मोह में वापस लौट आईं थीं!!

भीड़ के एक कोने में डरे सहमे एक पुरोहित जी खड़े थे जो मुझे देखकर मेरे पास आए,"भगत जी अब क्या किया जाए??सबसे पहले मैने लोगों द्वारा हाथपैर जकड़ कर एक और डाले गए गृह स्वामी को बंधनमुक्त किया!!गृह स्वामिनी की मर्जी पूछी और पति तथा दोनों बेटों को लेकर एक बड़े वाहन से हम उसी वक्त श्री गया जी रवाना हो गए!!तीन घंटे पश्चात वहां हमने गृह स्वामिनी की शादी की लाल ड्रेस,उनके नाक कान के आभूषण,उनका संपूर्ण बिस्तर और हां एक प्लेट लिट्टी चोखा इस वायदे के साथ +वैदिक मंत्रोपचार के साथ नदी को समर्पित कर दिया और वायदा लिया कि अब वे इस स्थूल दुनिया में कभी वापस नहीं आएंगी और अपने पति और बच्चों को कभी डिस्टर्ब नहीं करेंगी!!और हुआ भी यही!अब वह घर पूर्णरूपेण शांत है और घर में खुशी की किलकारियां गूंजती हैं!!

आज मैं इस फैमिली का प्यारा बाल्मीकि अंकल हूं और वो मासूम बिटिया 6 माह पूर्व एक धार्मिक लड़के से ब्याह दी गई है और ससुराल में सुखी है!!बड़े बेटे को मैने तीन दिन पहले फोन किया और हालचाल पूछे तो उसने कहा,"अंकल,हमारी पहचान गुप्त रखकर अपने शब्दों में आप हमारी कहानी को दुनिया के लिए नजीर के रूप में पेश करो ताकि ऐसी ही खतरनाक गलती कर रहा कोई अंजान परिवार हमारी तरह दुख न भोगे!!सो मित्रों मैने ये सब आपके समक्ष लिखा!!

ये तो रही एक सच्ची घटना मित्रों!!अब बस एक प्रश्न अपने प्रिय सनातन के लोगों से हैं कि कहीं आप भी तो इससे मिलती जुलती कोई त्रुटि अपने संसार में नहीं कर रहे हैं?? इफ yes तो जल्द से जल्द ऐसा कर्म अवॉइड करें वरना आपको भी इस कर्म से कष्ट पहुँच सकता है जो मैं कदापि नहीं चाहूंगा!!धन्यवाद!!

किशोर बाल्मीकि 
8077748527
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Wednesday, 29 July 2026

गुरु पूर्णिमा पर विशेष

बात तब की है जब हिरण्यकश्पय तपस्या करने चला गया था । जब उसका भाई हिरण्याक्ष भगवान विष्णु के हाथों मारा गया तब उसने विचार किया कि उसे अब और उग्र एवं प्रचंड तपस्या करके ऐसा वर प्राप्त करना पड़ेगा जिससे कि वह अजेय हो जाए और दैत्यों की कभी हार ना हो । इंद्र को उसकी इस योजना का पता चल गया ।जैसे ही हिरण्यकश्यप तपस्या करने गया देवराज इंद्र ने हिरण्यकश्यप के साम्राज्य पर आक्रमण कर दिया और सभी दैत्यों का संहार करके ‌उसकी पत्नी कयाधु को बंदी बनाकर ले जाने लगे ,तब नारद ऋषि ने आकर कयाधु को बचाया और इंद्र को समझाया कि कयाधु को मारकर अपयश पाने से बेहतर है उनके गर्भस्थ शिशु को भगवान का भक्त बना दिया जाएं।
   ऐसा समझाकर वे कयाधु को अपने आश्रम में ले आए ,उसे अभय दिया ,उसके पुत्र प्रह्लाद को भगवद दीक्षा दी बाल्यकाल में ही । नारद जी ने भक्तराज प्रह्लाद जी के बाल मन में भगवान श्रीहरि विष्णु की भक्ति का ऐसा बीजारोपण कर दिया कि शीघ्र ही वह विशाल वृक्ष बन गया ।उनके आश्रम में उपस्थित अन्य ढेरों ऋषियों ने उस वृक्ष को और पुष्पित पल्लवित कर दिया ।

  हिरण्यकश्यप जब वापिस लौटा लगभग अमरता का वरदान पाकर तब उसे सम्पूर्ण घटनाक्रम का पता चला तो उसने नारद ऋषि के प्रति अपना आभार व्यक्त किया और अपनी पत्नी और बच्चे को लेकर अपनी राजधानी लौट आया ।
   उसके बाद उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पुत्रों की सहायता से अथाह प्रयास किया कि प्रह्लाद की हरिभक्ति वाली विचारधारा बदला जाए और दैत्यराज हिरण्यकश्यप को ही सर्वशक्तिमान ईश्वर मान ले किन्तु ऐसा हो न सका ।
    आगे की कथा सभी को पता है ,कैसे भगवान ने अपन भक्त की रक्षा के लिए नरसिंह अवतार धारण किया और हिरण्यकश्यप का वध कर दिया ।
    यदि पूछा जाए कि हिरण्यकश्यप का वध किसने किया तो 90 प्रतिशत लोग यही कहेंगे कि भगवान नरसिंह ने किया किन्तु वास्तव में इस वध की सम्पूर्ण योजना के मुख्य सूत्रधार ब्रह्मर्षि नारद थे जिन्होंने दैत्यराज हिरण्यकश्यप के घर में उसके पुत्र को ही अपनी विचारधारा के प्रति इतना आग्रही बना दिया जन्म से ही बल्कि गर्भावस्था से ही (शास्त्रों के अनुसार) 
कि एक बालक की आयु में ही उसने अपने पिता द्वारा किये गए दमन और शुक्राचार्य के पुत्रों द्वारा किए जाने वाले ब्रेनवाश का प्रतिकार किया और सबसे बड़े हरिभक्त बन गए ,अधर्मी दैत्यराज हिरण्यकश्यप के पापपूर्ण साम्राज्य का अंत करवा दिया । उससे बड़े चार भाई और थे किन्तु उन्हें नारद जी का सानिध्य नहीं मिला तो वे सभी अपनी पिता की ही तरह अधर्मी दैत्य ही बने रहे । केवल प्रह्लाद अपने सद्गुरु की कृपा से सही मार्ग पर चले ! 
       प्रह्लाद दैत्य कुल में जन्मे थे किन्तु जेन जी तो फिर भी हमारे ही हिन्दू भाइयों की संताने है !! विचार कीजिए क्यों हम या हमारी ध्वजवाहक संस्थाएं इन तक इनके बाल्यकाल में ही नारद जी के समान की सद्गुरु नहीं उपलब्ध करवा पाए ?
कैसे ये बच्चे हमारी संताने होकर भी दैत्यगुरु शुक्राचार्य के अनुगामी असुरों का सा व्यवहार करने लग गए है ??
   निश्चित रूप से ये हमारी भी कमी है ,सामुहिक जिम्मेदारी है,सामूहिक फेल्योर है ।बच्चों में संस्कारों की कमी रही उस कालखंड में जब यह सबसे ज्यादा प्रभावी और आवश्यक था , तब जब ये बीजारोपण का श्रेष्ठ समय था किन्तु सांस्कृतिक प्रदूषण के संक्रमण कालखंड में हमारी सरकार /संगठन भी आर्थिक विवशताओं में दबे हुए ये अधर्म होते देखते रहे और आज उसका परिणाम भुगतने को अभिशप्त है ।
    आज भी करोड़ो जेन अल्फा , बीटा उसी दौर से गुजर रहे है ,प्रयास करे तो आज भी धर्मानुसार सदाचार के संस्कारों का बीजारोपण किया जा सकता है ताकि उस आने वाली पीढ़ी तक स्थितियों को पुनः नियंत्रण में लिया जा सके ।अभी तो सरकार भी हमारी है ,तंत्र भी और संगठन आदि भी ।
  आज गुरु पूर्णिमा के पावन दिवस पर समस्त सनातन से आग्रह करूंगा कि इस अत्यंत आवश्यक कार्य को त्वरित प्राथमिकता के साथ संपूर्ण करें , ये हम सबका सामूहिक दायित्व है,हमारा धर्म है ! केवल सरकार , संस्थाओं , संगठनों या तंत्र के भरोसे न छोड़े , स्वयं लगे ।
   ब्रह्मर्षि नारद के नाम पर सरकार को तत्काल ही नैतिक शिक्षा ,सदाचार का एक संस्कार सौरभ पाठ्यक्रम में जोड़ना चाहिए ,नारद जी के समान ही समर्थ एवं सक्षम गुरुओं को ये दायित्व सौंपा जाए कि वे देश में करोड़ों धर्मनिष्ठ संस्कारी प्रह्लाद चरित्रों का निर्माण करें।
    नारद जी द्वारा सर्वथा विपरीत विचारों वाले शक्तिशाली दैत्य के राज्य में हरिभक्ति का अंकुर प्रस्फुटन किया जा सकता है तो आज तो हमारी सरकार और हमारा ही तंत्र है पिछले 12 वर्षों से और अगले 3 वर्षों तक तो पक्का ।
    देर किस बात की ? शुभस्य शीघ्रम !! 
सभी को गुरुपूर्णिमा की बहुत बहुत शुभकामनाएं ! 
भगवान वेदव्यास की जय ,ब्रह्मर्षि नारद जी की जय
भक्तराज प्रह्लाद की जय , भक्तवत्सल भगवान श्रीहरि की जय ।।
#पुरोहितजी_कहिन
✍️गोविंद जी
गुरु पूर्णिमा आषाढ़ शुक्ल १५, विक्रम संवत २०८३
बुधवार दिनांक 29 जुलाई 2026 ईस्वी