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Tuesday, 29 September 2026

इस लेख में केवल स्वामी दयानन्द के घोर जातिवादी होने के साथ-साथ, निम्न-जातियों के प्रति उनकी घृणा के तथ्य प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

आर्यसमाजियों ने दयानन्द की केवल एक पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश से ही उनके अनेक सिद्धान्त हटाये और सैकड़ों प्रक्षेप किए। उनकी अन्य पुस्तकों के साथ भी यही किया गया। उनकी भयावह मृत्यु होने पर आर्यसमाजियों ने जहाँ तक सम्भव हुआ, उनकी पुस्तकों से उनके लिखे ये तथ्य समय-समय पर हटाये। स्वामी दयानन्द के साहित्य में प्रत्येक सिद्धान्त पर जो विरोधाभासी वाक्य मिलते हैं, ये आर्यसमाजियों की इस हेराफेरी का ही परिणाम है। इस लेख में केवल स्वामी दयानन्द के घोर जातिवादी होने के साथ-साथ, निम्न-जातियों के प्रति उनकी घृणा के तथ्य प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

जिस सत्यार्थ प्रकाश से स्वामी दयानन्द के ये सब कथन लिए गए हैं, यह विक्रम संवत् २०३५ (सन् १९३९ ई.) को वैदिक पुस्तकालय, दयानन्द आश्रम, अजमेर द्वारा प्रकाशित है। और इस सत्यार्थ प्रकाश को वैदिक यन्त्रालय, अजमेर द्वारा मुद्रित किया है, जिसकी स्थापना स्वयं दयानन्द करके गए थे। अतः सभी तथ्य पूर्णतः प्रामाणिक और अक्षरशः सत्य हैं।

स्वामी दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं - "उनमें से एक पाखंडी उन्मत्त होके नाच-कूद के कहता है - "मैं इसका प्राण ही ले लूँगा।" तब वे अंधे, उस भंगी चमार आदि नीच के पाँव में पड़ के कहते हैं - "आप चाहे सो लीजिए, इसको बचाइये।" (सत्यार्थ प्रकाश - पृष्ठ संख्या ३१)

शचीन्द्र - देखे, यहाँ स्वामी दयानन्द "भंगी, चमार" शब्द का प्रयोग करते हुए उन्हें नीच कह रहे हैं। तत्कालीन समय में झाड़-फूँक करने वाले, भूत-प्रेत आदि के उपचार का दावा करने वाले अधिकतर निम्न वर्ण के हुआ करते थे। तब कुछ उच्चवर्णीय लोग भी भूत-प्रेत आदि की समस्या अनुभूत होने पर इनके पास चले जाया करते थे। तो स्वामी दयानन्द का क्रोध और घृणा आप इन शब्दों में देख सकते हैं कि - "वे भंगी चमार आदि नीच के पाँव में पड़ के कहते हैं।"

स्वामी दयानन्द लिखते हैं - "चाहे कोई पुरुष वा स्त्री हो इस ऊट-पटांग वचन को पढ़ के समागम करने में वे वाममार्गी दोष नहीं मानते हैं। अर्थात् जिन नीच स्त्रियों को छूना नहीं चाहिए, उनको अतिपवित्र उन्होंने माना है। जैसे शास्त्रों में रजस्वला आदि स्त्रियों के स्पर्श का निषेध है, वाममार्गियों ने उन्हें अतिपवित्र माना है। (सत्यार्थ प्रकाश - पृष्ठ संख्या २६६)

शचीन्द्र - यहाँ स्वामी दयानन्द वाममार्गियों का खंडन करते समय कहते हैं कि - "जिन नीच स्त्रियों को छूना नहीं चाहिए।" अब यहाँ विचार होगा कि नीच स्त्रियाँ स्वामी जी किसको कह रहे हैं? इसका उत्तर वे अगली पंक्ति में देते हैं कि - "जैसे शास्त्रों में रजस्वला आदि स्त्रियों के स्पर्श का निषेध है।" तो "रजस्वला आदि" का विस्तार है कि - शास्त्रों में रजस्वला, चांडाली, चर्मकारी, रजकी, पुक्कसी" आदि स्त्रियों के स्पर्श का निषेध किया गया है। चांडाल का अर्थ स्वामी जी ने भंगी कर ही रखा है। और पुक्कस का अर्थ अंत्यज अर्थात् चमार, धोबी आदि निम्न जातीय लोग। अतः स्पष्ट है, स्वामी दयानन्द ने इन सबको अछूत माना है। और इस जाति की स्त्रियों को "नीच" कहते हुए उनके भी स्पर्श का निषेध कर दिया है।

स्वामी दयानन्द लिखते हैं - "अंग्रेज़, यवन, अंत्यज आदि से भी खाने-पीने का भेद नहीं रखा। इन्होंने यही समझा होगा कि खाने-पीने और जातिभेद तोड़ने से हम और हमारा देश सुधार जाएगा, परंतु ऐसी बातों में सुधार तो कहाँ है, उल्टा बिगाड़ होता है। (सत्यार्थ प्रकाश, पृष्ठ संख्या - ३५८)

शचीन्द्र - यहाँ स्वामी दयानन्द ब्रह्मासमाज व प्रार्थनासमाज के दोष बताते हुए, "अंत्यज (निम्नजातियों) के साथ  खाने-पीने का भेद न रखने से तथा जातिभेद को तोड़ने से, देश का बिगाड़ होने की बात कह रहे हैं।

स्वामी दयानन्द लिखते हैं - "जैसे पशुओं में गौ, अश्व, हाथी आदि जातियाँ हैं। वृक्षों में पीपल, वट, आम्र आदि। पक्षियों में हंस, काक, वकादि। जलजन्तुओं में मत्स्य, मकरादि जातिभेद हैं, वैसे मनुष्यों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज जातिभेद हैं, ईश्वरकृत हैं। परन्तु मनुष्यों में ब्राह्मणादि को सामान्य जाति में नहीं, किन्तु सामान्य विशेषात्मक जाति में गिनते हैं। (सत्यार्थ प्रकाश, पृष्ठ संख्या २५८)

शचीन्द्र - यहाँ स्पष्ट ही स्वामी दयानन्द पशुओं, वृक्षों, पक्षियों, जलजन्तुओं तथा मनुष्यों में जो जातिभेद है, उसे ईश्वरकृत बताते हुए, ब्राह्मण को विशेष जाति बता रहे हैं। इस कथन में विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि स्वामी दयानन्द ने यहाँ "अंत्यज" को चार वर्णों से अलग एवं निकृष्ट मानते हुए उन्हें एक ईश्वरकृत जाति माना है। आर्यसमाजियों ने दुष्प्रचार किया कि स्वामी जी तो चार वर्णों को ही मानते थे, वे अन्य किसी जाति को नहीं मानते थे, यहाँ स्पष्ट देखा जा सकता है कि सत्य क्या है। स्वामी दयानन्द की अंत्यजों के प्रति, निम्न जातियों के प्रति इतनी अधिक घृणा थी कि पृष्ठ संख्या ५७९ में उन्होंने "अंत्यज नाम वाली महिलाओं के साथ विवाह करने का भी निषेध कर दिया है।

स्वामी दयानन्द लिखते हैं - "शूद्र नीच लोग मंदिर में नैवेद्य लाते हैं। जब नैवेद्य हो चुकता है तब वे शूद्र नीच लोग झूठा कर देते हैं। पश्चात् जो कोई रुपया देकर हंडा लेवे उसके घर पहुँचाते और दीन गृहस्थ और साधु-संतों को लेके शूद्र और अंत्यज पर्यन्त एक पंक्ति में बैठ झूठा एक दूसरे का भोजन करते हैं। (सत्यार्थ प्रकाश, पृष्ठ संख्या ३०२)

शचीन्द्र - यहाँ स्वामी दयानन्द जगन्नाथपुरी मंदिर की बात कर रहे हैं। एवं शूद्रों को "नीच" कहते हुए उनके मंदिर में फल, प्रसाद आदि लाने पर आपत्ति कर रहे हैं। एवं स्वामी जी को इस पर भी घोर आपत्ति है कि - "मंदिर परिसर में साधु-संत आदि शूद्र नीच लोगों और अंत्यजों के साथ बैठकर भोजन क्यों करते हैं।"

स्वामी दयानन्द लिखते हैं - "किसी पंडित के पास संस्कृत पढ़ने के लिए गया। उसने उसका अपमान किया, कहा कि - हम जुलाहे को नहीं पढ़ाते। इसी प्रकार कई पंडितों के पास फिरा, किन्तु किसी ने न पढ़ाया। तब ऊटपटांग भाषा बना कर जुलाहे आदि नीच लोगों को समझाने लगा। (सत्यार्थ प्रकाश - पृष्ठ संख्या ३४०)

शचीन्द्र - यहाँ स्वामी दयानन्द कबीर की बात कर रहे हैं। ध्यान देने योग्य है कि - स्वामी जी यहाँ जुलाहे (कपड़ा बनाने वाले कारीगर, समुदाय) को भी नीच लोग कहकर उनको नीच जाति का मान रहे हैं।

स्वामी दयानन्द लिखते हैं - "उनका (रोग आदि का) औषधसेवन और पथ्यादि उचित व्यवहार न करके उन झूठे, पाखंडी, महामूर्ख, अनाचारी, स्वार्थी, भंगी, चमार, शूद्र, म्लेच्छादि पर भी विश्वासी होकर अनेक प्रकार के ढोंग, छल-कपट और उच्छिष्ट भोजन, डोरा, धागा आदि मिथ्या मन्त्र-यन्त्र बाँधते-बँधवाते फिरते हैं। (सत्यार्थ प्रकाश - पृष्ठ संख्या ३०)

शचीन्द्र - स्वामी दयानन्द इस कथन में भी "भंगी", "चमार", "शूद्र" शब्दों का प्रयोग करके इन्हें जाति ही मानकर इनके प्रति घृणा प्रकट कर रहे हैं।

सत्यार्थ प्रकाश में प्रश्न आता है कि - "मनुष्यमात्र के हाथ की हुई रसोई उस अन्न के खाने में क्या दोष है? क्योंकि ब्राह्मण से लेके चांडाल पर्यन्त के शरीर हाड़-मांस-चमड़े के हैं, और जैसा रुधिर ब्राह्मण के शरीर में है, वैसा ही चांडाल आदि के, पुनः मनुष्य मात्र के हाथ की पकी हुई रसोई के खाने में क्या दोष है?"

स्वामी दयानन्द इसका उत्तर लिखते हैं - "दोष है, क्योंकि जिन उत्तम पदार्थों के खाने-पीने से ब्राह्मण और ब्राह्मणी के शरीर में दुर्गन्धादि दोषरहित रज-वीर्य उत्पन्न होता है, वैसा चांडाल और चांडाली के शरीर में नहीं। क्योंकि चांडाल का शरीर दुर्गन्ध के परमाणुओं से भरा हुआ होता है, वैसा ब्राह्मणादि वर्ण का नहीं। इसलिए ब्राह्मणादि उत्तम वर्णों के हाथ का खाना और चांडालादि नीच भंगी चमार आदि का न खाना। भला जब कोई तुम से पूछेगा कि जैसा चमड़े का शरीर माता, सास, बहन, कन्या, पुत्रवधू का है, वैसा ही अपनी स्त्री का भी है, तो क्या माता आदि स्त्रियों के साथ भी स्वस्त्री के समान बतावेंगे? तब तुम को संकुचित होकर चुप ही रहना पड़ेगा। जैसे उत्तम अन्न हाथ और सुख से खाया जाता है, वैसे ही खाया जा सकता है, तो क्या मलादि भी खाओगे? क्या ऐसा भी कोई हो सकता है? (सत्यार्थ प्रकाश, पृष्ठ संख्या २५४)

शचीन्द्र - स्वामी दयानन्द यहाँ ब्राह्मण और चांडाल आदि शूद्रों के शरीर का भेद बता रहे हैं। तथा "चांडाल आदि अंत्यज के साथ-साथ चमार, भंगी आदि का भी न खाने का आदेश कर रहे हैं। इसके लिए वे एक उत्तम उदाहरण भी दे रहे हैं। उनका कहना था कि शूद्र सेवा तो करे अर्थात् नहा-धोकर शुद्ध होकर उच्च वर्ण के लिए भोजन तो बनाए, लेकिन बनाते समय भी मुँह पर कपड़ा बाँध ले, ऐसा वे इसी पुस्तक में कहते हैं। किन्तु शूद्र के घर का खाना तथा शूद्र के बर्तनों में खाने का वे निषेध करते हैं - "शूद्र के पात्र तथा उसके घर का पका हुआ अन्न आपातकाल के बिना न खावें।" (सत्यार्थ प्रकाश - पृष्ठ संख्या २५०)

ये उपरोक्त सब कथन स्वामी दयानन्द की लिखी सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय संस्करण के ही हैं। जिसे कि आर्यसमाजी प्रामाणिक मानते हैं। अन्य भी अनेक तथ्य हैं, पर इतने से ही बात सिद्ध होती है, इसलिए यही दिए जा रहे हैं। बाकी अंतिम कथन स्वामी जी के सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम संस्करण से भी देते हैं -

स्वामी दयानन्द लिखते हैं - "धात्रीकर्म घर की स्त्रियाँ स्वयं करें, संतान पर इससे उत्तम संस्कार पड़ेंगे--लड़के-लड़की के उत्पन्न होते समय जो इस देश में नीच जाति की स्त्रियाँ, उत्तम घरों में जाकर नाड़ीछेदन और धात्री का काम करती हैं और उसके मुख में उँगलियाँ डालती हैं, यह बहुत बुरी बात है। घर की स्त्रियों को चाहिए कि वह स्वयं करें, जिनसे उसकी बुद्धि तीक्ष्ण होगी। (सत्यार्थ प्रकाश, पृष्ठ संख्या ११९)

शचीन्द्र - हिन्दुओं में पूर्व में एक परम्परा थी, अनेक क्षेत्रों में आज भी है कि दाई का कार्य निम्न वर्ण की स्त्रियाँ ही किया करती थीं। इस तरह वे उच्च वर्णों के घर में, इस प्रसन्नता के अवसर में सम्मिलित होती थीं और धन, वस्त्र, अनाज आदि उन्हें माँगे अनुसार मिला करता था। स्वामी दयानन्द यहाँ उन्हें "नीच जाति की स्त्रियाँ" बताते हुए, ऐसे अवसर पर दाई आदि कर्म उनसे कराने का निषेध करते हैं। स्वामी जी का मानना है कि उन "नीच जाति की स्त्रियों के हाथों से" उच्च वर्ण के नवजात शिशु को स्पर्श किए जाने, मुख में उँगली डालने से उत्तम संस्कारों के पड़ने में बाधा होगी और बुद्धि भी तीक्ष्ण नहीं होगी।

स्वामी दयानन्द के लिखे इन तथ्यों से स्पष्ट होता है कि - 

(१) वे जातिभेद को ईश्वरकृत मानते थे एवं भिन्न-भिन्न वर्णों के शरीर में भेद मानते थे। 

(२) वे चार वर्णों के अतिरिक्त भी अन्य जो जातियाँ हैं, उन्हें भी स्वीकार करते थे और उन्हें भी ईश्वरकृत मानते थे।

 (३) वे जातिभेद को देश के लिए आवश्यक और जातिभेद को न मानने से देश का बिगाड़ समझते थे। 

(४) वे शूद्र, अंत्यज आदि जातियों के घर भोजन करना, उनके पात्रों में खाने का सर्वथा निषेध करते थे।

 (५) वे छुआछूत के प्रबल समर्थक थे, शूद्र, अंत्यज आदि जातियों को नीच मानने के साथ-साथ वे उनकी स्त्रियों को भी नीच मानने एवं उनका स्पर्श न करने का एवं उनके द्वारा धात्रीकर्म न कराने का आदेश देते थे। 

(६) वे शूद्र, अंत्यज, चमार, भंगी आदि सबके लिए नीच सम्बोधन करते व इन्हें नीच मानते थे, उनके कथनों में इन जातियों के लिए अत्यंत घृणा स्पष्ट झलकती है।

तब प्रश्न उठता है आर्यसमाजी जो प्रचार करते हैं कि - "स्वामी जी ने शूद्रों को वेद पढ़ने का अधिकार दिया", "स्वामी जी ने शूद्रों को यज्ञोपवीत का अधिकार दिया", "स्वामी जी ने शूद्रों को वर्णव्यवस्था में सबके समान माना", "स्वामी जी जातिवाद के घोर विरोधी थे", "स्वामी जी केवल चार वर्ण मानते थे, जाति नहीं मानते थे" आदि-आदि। यह सब केवल और केवल झूठ है। और इस झूठ को सिद्ध करने के लिए समाजियों ने इन वाक्यों के अनेक विरोधी वाक्य स्वामी दयानन्द के ग्रंथों में उनके मरते ही प्रक्षिप्त किए। और उनके ग्रंथों से उपरोक्त प्रकार के कथनों को निकालना प्रारम्भ कर दिया। अपनी बातें जोड़नी प्रारम्भ कर दीं। अनेक झूठी कहानियाँ बनाई, दुष्प्रचार किया। क्योंकि आर्यसमाज को एक पंथ के रूप में बनाकर, इनका उद्देश्य हिन्दुओं में जातीय विद्वेष फैलाना, हिन्दुओं के इन निम्न वर्णों के भीतर ब्राह्मण आदि उच्च वर्णों के प्रति घृणा भरना, इन जातियों में हिन्दुओं के साधु-संतों, आचार्यों तथा पुराण आदि शास्त्रों के प्रति घृणा भरना, देवी-देवताओं के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न करना। ताकि वे आर्यसमाजी बने, जिससे कि इनका पंथ मजबूत हो। और अगर वे आर्यसमाजी न बने तो ईसाई बने, नास्तिक बने, कुछ भी बने, लेकिन वे हिन्दू न रहे। यह कार्य ये लोग बड़े छल से, चतुराई से करते हैं, 

अच्छे-अच्छे हिन्दुत्वादियों को लगता है कि ये हमारे बड़े हितैषी हैं, जबकि ऐसा नहीं है। ये लोग हिन्दू धर्म के, वेद आदि शास्त्रों के घोर विरोधी हैं। और वर्तमान समय में इनका उद्देश्य केवल और केवल धर्मांतरण कराना ही है। मुसलमान आदि का विरोध केवल इस हेतु से ये करते-कराते हैं क्योंकि इनका मुख्य निशाना हिन्दू ही है। ये सब उपक्रम हिन्दुओं को आकर्षित करने के लिए हैं, ताकि ऐसा करके इन्हें अपना "देवता, उद्धारक" मान चुके सामान्य हिन्दू अंततः इनके अवैदिक विचारों से भी सहमत होकर, आर्यसमाजी (हिन्दू-विरोधी) बन जाये। आजकल फेसबुक पर जो अनेक आर्यसमाजी प्रवचन करते दिखते हैं, इन सबने यह 'अल-तकिया' की विधा मुसलमानों से सीखी है।
✍️ शचीन्द्र शर्मा - फेसबुक पोस्ट 
दिनांक 29/9/2026ईस्वीसन्  
मंगलवार भाद्रपद कृष्ण ३ विक्रम संवत २०८३ 

Sunday, 27 September 2026

‎जैसा खाओ अन्न ... वैसा होवे मन ।

एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी। सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लगा ।
‎
‎सेठ ने सोचा कि इतना पाप हो रहा है , तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए।
‎
‎एक दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा को आमंत्रित कर भोजनप्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की।
‎
‎साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खायी।
‎
‎दोपहर का समय था । सेठ ने कहाः "महाराज ! अभी आराम कीजिए । थोड़ी धूप कम हो जाय फिर पधारियेगा।
‎
‎साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली।
‎
‎सेठ ने 100-100 रूपये वाली 10 लाख जितनी रकम की गड्डियाँ उसी कमरे में चादर से ढँककर रख दी।
‎
‎साधु बाबा आराम करने लगे।
‎
‎खीर थोड़ी हजम हुई । साधु बाबा के मन में हुआ कि इतनी सारी गड्डियाँ पड़ी हैं, एक-दो उठाकर झोले में रख लूँ तो किसको पता चलेगा ?
‎
‎साधु बाबा ने एक गड्डी उठाकर रख ली।
‎
‎शाम हुई तो सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े।
‎
‎सेठ दूसरे दिन रूपये गिनने बैठा तो 1 गड्डी (दस हजार रुपये) कम निकली।
‎
‎सेठ ने सोचा कि महात्मा तो भगवतपुरुष थे, वे क्यों लेंगे.?
‎
‎नौकरों की धुलाई-पिटाई चालू हो गयी। ऐसा करते-करते दोपहर हो गयी।
‎
‎इतने में साधु बाबा आ पहुँचे तथा अपने झोले में से गड्डी निकाल कर सेठ को देते हुए बोलेः "नौकरों को मत पीटना, गड्डी मैं ले गया था।"
‎
‎सेठ ने कहाः "महाराज ! आप क्यों लेंगे ? जब यहाँ नौकरों से पूछताछ शुरु हुई तब कोई भय के मारे आपको दे गया होगा । और आप नौकर को बचाने के उद्देश्य से ही वापस करने आये हैं क्योंकि साधु तो दयालु होते है।"
‎
‎साधुः "यह दयालुता नहीं है । मैं सचमुच में तुम्हारी गड्डी चुराकर ले गया था।
‎
‎साधु ने कहा सेठ ....तुम सच बताओ कि तुम कल खीर किसकी और किसलिए बनायी थी ?"
‎
‎सेठ ने सारी बात बता दी कि स्टेशन मास्टर से चोरी के चावल खरीदता हूँ, उसी चावल की खीर थी।
‎
‎साधु बाबाः "चोरी के चावल की खीर थी इसलिए उसने मेरे मन में भी चोरी का भाव उत्पन्न कर दिया। सुबह जब पेट खाली हुआ, तेरी खीर का सफाया हो गया तब मेरी बुद्धि शुद्ध हुई कि
‎'हे राम.... यह क्या हो गया ?
‎
‎मेरे कारण बेचारे नौकरों पर न जाने क्या बीत रही होगी । इसलिए तेरे पैसे लौटाने आ गया ।
‎
‎"इसीलिए कहते हैं कि....
‎
‎जैसा खाओ अन्न ... वैसा होवे मन ।
‎जैसा पीओ पानी .... वैसी होवे वाणी ।
 जैसी शुद्धी.... वैसी बुद्धी.... ।
‎जैसे विचार ... वैसा संसार..... ।

कहानी काल्पनिक पर हमें चोरी ना करने की सीख दें रही हैं।
    ✍️लालपुरी लूनकरणसर 

महान सम्राट विक्रमादित्य के पौत्र और हिन्दू धर्मध्वजा रक्षक सम्राट स्कंद का व्यक्तित्व चरित्र और राष्ट्रीय चरित्र

हूण जाति की नृशंसता इतनी थी कि चीन से लेकर महान रोमन साम्राज्य तक काँप उठे थे...

इस अकेली बर्बर जाति का आतंक इतना था कि उसने उस समय के किसी भी बड़े साम्राज्य को रौंदे बिना नहीं छोड़ा...

चीन का विशाल साम्राज्य तो इतना भयाक्रांत हुआ कि उसने हूणों से लड़ने का विचार ही छोड़ दिया और रक्षात्मक होकर खुद को ऊँचे ऊँचे सैकड़ों किलोमीटर की दीवार से घेर लिया...

 जब चीन आत्मसमर्पित हुआ तो ये हूण अपनी एक टुकड़ी के साथ यूरोप की ओर दौड़ पड़ा... "आटिला" नाम के उसके सेनापति ने पोलैंड को मिट्टी में मिला दिया फिर एक एक कर यूरोप के बाकी देशों में खून की नदियाँ बहा दी....

 इन हूणों के कारण विशाल रोमन साम्राज्य मिट्टी में मिल गया तो इस विजयोन्माद में उन हूणों की टुकड़ी ने भारत का भी रुख किया और गांधार प्रदेश पहुँच गये...

वहां विजय प्राप्त कर जब वो सिंध को निगलने आगे बढ़े तो वहां उसे रोकने के लिए वैदिक सूर्य कुमारगुप्त का महान प्रतापी राज्य खड़ा था...

कुमारगुप्त ने इन बर्बर हूणों के समूल नाश के लिए किसी और सेनापति को न भेजकर अपने पुत्र राजकुमार स्कंद को भेजा... हूणों की विशाल और बर्बर टोली को स्कंद ने रौंद दिया और जन वो हूणजयी होकर पाटलिपुत्र लौटे तो वहां उनके स्वागत में वृद्ध पिता कुमारगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ किया...

फिर कुमारगुप्त के स्वर्गवासी होने के बाद स्कंद भारत के सम्राट बने..

स्कंद के शासन के उत्तरार्ध में हूणों ने फिर से अपनी शक्ति संकलित की और "खिंखिल" नाम के सेनापति के नेतृत्व में फिर से भारत पर हमलावर हो गया...

 भारत की सेना शुरुआत में जब परास्त होने लगी तो स्कंद स्वयं ही सेना का संचालन करने पश्चिम भारत की ओर चल पड़े... उधर वो युद्ध में हूणों से जूझ रहे थे और इधर उनके धूर्त भाई पुरुगुप्त ने सत्ता पर छल से कब्जा कर लिया..

सत्ता हड़पे जाने की सूचना महाराज स्कंद को पहुँचा तो उनके सामने दो रास्ते थे..

एक था कि वापस जाकर अपने सौतेले भाई से वापस सत्ता छीन लें और दूसरा ये कि हूणों को युद्ध में धूल चटाये..

महान सम्राट विक्रमादित्य के पौत्र और हिन्दू धर्मध्वजा रक्षक सम्राट स्कंद ने दूसरा विकल्प चुना और युद्ध भूमि में वीरगति को प्राप्त हुये..

 दूसरा विकल्प इसलिये चुना क्योंकि अगर वो सत्ता की सोचते और लौट जाते तो बर्बर हूणों के कारण न जाने कितने लोगों को अपनी जान देनी पड़ती, न जाने कितनी ललनाओं की इज़्ज़त लूटी जाती और न जाने कितने देवालय टूटते..
पहले अपनी सत्ता और फिर अपने प्राण की बलि देकर स्कंद ने सबको बचा लिया और मृत्यु पाकर अमर हो गये..

पाटलिपुत्र का महान वैभवशाली सम्राट अपनी राजधानी से हजारों किलोमीटर दूर पंजाब में बलिदान हुये पर बलिदान होने से पहले उन्होंने हूण सेनापति "खिंखिल" को भारत की सीमा से मीलों दूर खदेड़ दिया और धर्म तथा राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित की...

स्कंद का व्यक्तित्व चरित्र और राष्ट्रीय चरित्र उन सबके लिए पाथेय है जो सत्ता को सब कुछ समझते हुये राष्ट्र और धर्म की सुरक्षा से मुँह मोड़ लेते हैं पर दुर्भाग्य कि भारत में किसी ने इतिहास से न तो कभी कुछ सीखा और न सीखेंगे...

और ये हो भी क्यों न क्योंकि आज भारत में कितने हैं जिन्हें महान सम्राट स्कंद की ये गाथा याद है और अगर नहीं है तो फिर किसी और से ये उम्मीद करना कि उनका चरित्र स्कंद के चरित्र का अनुगमन करेगा हास्यास्पद ही हैं...
- ✍️Shivananda Mishra

सुपथ से ऐश्वर्य प्राप्ति की साधना

              सुपथ से ऐश्वर्य प्राप्ति की साधना 

अग्ने नय सुपथा रायेऽअस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युथोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्ति विधेम ॥ (यजुर्वेद ४०/१६)

(अग्ने अस्मान् राये सुपथा नय) हे ज्ञानस्वरूप प्रभो हमें ऐश्वर्य प्राप्ति के लिये अच्छे मार्ग से ले चलिये (देव) हे दिव्यगुणों के दाता प्रकाशस्वरूप परमात्म देव ( विश्वानि वयुनानि विद्वान् ) आप सम्पूर्ण कर्मों के जानने वाले हैं (अस्मज्जुहुराणम् एनः युयोधि) हमारे कुटिलाचरण पाप को नष्ट कर दीजिये (ते भूयिष्ठां नम उक्तिं विधेम) हम तुम्हारी बारंबार स्तुति करते हैं।
  सुपथ से ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए मन में सकारात्मकता के संग, हर पल शुभता का अहसास करते रहिए। यही विचार मनुष्य को सन्मार्ग पर ले जाता है। सन्मार्गगामी बनने से हमें शाश्वत सुखानुभूति होती रहती है, इसके साथ ही दुख की निवृत्ति होती रहती है। इसी प्रकार की जीवन शैली को तपश्चर्या कहते हैं। सुखानुभूति और दुख की निवृत्ति एक साथ होने से जीवन कुंदन बनता जाता है। तप की भट्टी में तपते तपते निखरता जाता है। परिणामस्वरूप जीवन से भटकाव समाप्त हो जाता है। चित्त में स्थिरता आती है।
ठोकर खाने का दौर समाप्त होता है और जीवन उन्नति में ढलता जाता है। हर व्यक्ति अपने कर्तव्य पालन को ही अपना धर्म मानने लगता है।
  वेद के उपरोक्त मंत्र में हमने सुपथ पर चलने की प्रार्थना परमपिता परमेश्वर से की है। परमपिता परमेश्वर ने चराचर जगत की रचना की है। इसके बारे में वह सब कुछ जानता है। इसका ज्ञान विज्ञान,दृश्य -अदृश्य कुछ भी उससे अछूता नहीं है। इसीलिए वह ज्ञानस्वरूप कहलाता है। उसको बनाने का भी ज्ञान है, चलाने का भी ज्ञान है और अंत में संहार करने का भी ज्ञान है । उस ज्ञानस्वरूप परमपिता परमेश्वर ने मनुष्य को वेद ज्ञान दिया। जिससे वह भी ज्ञानवान बन सके और अपने जीवन का उद्धार कर सके। 
  सदविद्या ही मनुष्य का सबसे सुंदर ऐश्वर्य है। सबसे मूल्यवान आभूषण है। जो सब कुछ जानता हो- वही हमें ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए सन्मार्ग दिखा सकता है। जो स्वयं ही रास्ता नहीं जानता हो वह दूसरों को क्या रास्ता दिखाएगा ? जो स्वयं ऐश्वर्य संपन्न है, वही आपको ऐश्वर्य संपन्न कर सकता है। जो स्वयं दरिद्र है, वह दूसरों को ऐश्वर्य संपन्न नहीं कर सकता। इसलिए उससे ही मांगना चाहिए जो देने में सक्षम हो, समर्थ हो। 
  इस मंत्र में परमपिता परमेश्वर से ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए अच्छे मार्ग से ले चलने की प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि आप ही समस्त कर्मों के ज्ञाता है। हम आपकी बारंबार स्तुत्ति करते हुए प्रार्थना करते हैं कि आप हमें पथभ्रष्ट करने वाले कुटिलाचरण रूपी पाप से मुक्त होने के लिये उसे भस्मसात् कर दीजिये।
  जब कुटिलाचरण रूपी पाप भस्म हो जाएगा तो उसके उपजने की सारी संभावनाएं क्षीण हो जाएंगी। परमेश्वर हमारा अग्रगन्ता नायक है। हमको सदा ध्यान रखना चाहिए कि उस परमपिता परमेश्वर के नायकत्व में ही हम आगे बढ़ रहे हैं। वह नायक इसीलिए है कि वह हमको अर्थात अपने अनुयायियों को सुपथ पर ले चलने की क्षमता रखता है। समाज, किसी संगठन या किसी राष्ट्र का नायक भी वही हो सकता है जो अपने समाज या अपने संगठन के लोगों को अथवा अपने राष्ट्रवासियों को सुपथ पर लेकर चलने की क्षमता रखता हो। यदि वह स्वयं पथ भ्रष्ट है तो वह नायक के गुणों से शून्य है।
  परमपिता परमेश्वर हमारे कल्याण में रत रहते हैं। उन्होंने सृष्टि तक की रचना हमारे कल्याण के लिए की है। चौबीसों घंटे उसके हृदय में हमारे कल्याण की योजनाएं आकार लेती रहती हैं । इसीलिए वह हमारा नायक होने की क्षमता रखता है। लौकिक जगत में भी वही व्यक्ति नायक हो सकता है जो अपने संगठन, अपने समाज, अपने राष्ट्र और अपने अनुयायियों के कल्याण की योजनाओं में लगा रहता है।  यदि नायक आग लगाने वाला है, विखंडनवादी है, संकीर्ण मानसिकता का है तो वह समाज, राष्ट्र या किसी संगठन का नेतृत्व करने की क्षमता नहीं रखता। यदि संयोग से उसे नेतृत्व करने का अवसर मिल भी जाता है तो वह ऐसे समाज, संगठन या राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध होता है। तिकड़मों से नेता बनने वाले लोग राष्ट्र का विखंडन करा देते हैं। क्योंकि तिकड़म अपने आप में एक ऐसा शब्द है जो विखंडन की ओर संकेत करता है।  
  मंत्र के भाव पर यदि विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि जिन सन्मार्ग के कार्यों से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है उनका हमारे नायक को ज्ञान होना चाहिये। नेता का यह गुण उसके चिंतन की व्यापकता को स्पष्ट करता है। उसके चिंतन में किसी प्रकार की संकीर्णता नहीं होनी चाहिए। हमारे देश के विभाजन के लिए मोहम्मद अली जिन्ना की संकीर्ण सोच जिम्मेदार रही। जिसके चलते वह कभी संपूर्ण भारत और भारतवासियों को अपना नहीं मान सका। 
  नेता के लिए यह भी आवश्यक है कि वह कुमार्ग से हटाने की सामर्थ्य वाला होना चाहिए। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह परिवार में कभी एक दूसरे के प्रति निंदा चुगली करके जहर नहीं फैलाएगा। संगठन के लोगों में भी एक दूसरे के प्रति जहर घोलने का प्रयास नहीं करेगा। समाज और राष्ट्र के लोगों को भी जहर घोलने की प्रवृत्तियों से बचा कर रखेगा। जैसे परम पिता परमेश्वर हमें सन्मार्ग पर लेकर चलता है और कुमार्ग से हमें बचाता है वैसे ही हमारा लौकिक नायक भी हमें सन्मार्ग पर लेकर चलेगा और कुमार्ग से बचाएगा। जहां परिवार समाज राष्ट्र के लोग अपेक्षा करते हैं कि आप वहां उपस्थित होने चाहिए, वहां अवश्य उपस्थित होने का प्रयास कीजिए और जहां आप आवश्यक समझते हैं कि लोगों की छोटी-मोटी बातों की उपेक्षा की जाए वहां उनकी उपेक्षा करिए। अपेक्षा और उपेक्षा दोनों का सदा ध्यान रखकर आगे बढ़िए।
    गम्भीरता पूर्वक विचार करने से ज्ञात होता है कि ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ही हमारे वास्तविक और स्वाभाविक नायक हैं। उसके पास अनन्त ज्ञान बल क्रियारूपी सामर्थ्य स्वाभाविक रूप से उपलब्ध है। उसकी प्रेरक शक्ति हमें प्रत्येक प्रकार के दुख दारिद्र्य से बचाती है। संपूर्ण दुर्गुणों और दुर्व्यसनों से बचाती है। वह हमारे हृदय में विराजमान होकर हमारा नेतृत्व करता रहता है। किस मार्ग पर चलने से हमारा कल्याण हो सकता है ? किस मार्ग पर चलने से हमारा विनाश हो सकता है ? इस बात का सही-सही अवलोकन करता रहता है और हमें साथ ही साथ संकेत भी देता रहता है। जिन लोगों के हृदय में भक्ति के भाव हैं और श्रद्धा विराजमान है, वे परमपिता परमेश्वर के संकेतों को समझते रहते हैं और उसी के अनुसार अपना आचरण बना लेते हैं।
उनके लिए संकेत ही पर्याप्त होता है। संकेत के आधार पर ही वह अपने जीवन पथ का निर्धारण कर लेते हैं। कुछ समय में उन संकेतों को सुनने के वे इतने अधिक अभ्यासी हो जाते हैं कि उन्हें हर कदम पर मिलने वाले संकेत अपने लिए देवदूत दिखाई देने लगते हैं।
   जिन लोगों के भीतर श्रद्धा नहीं होती उन्हें परमपिता परमेश्वर के ये सारे संकेत कभी दिखाई नहीं देते। श्रद्धावान को ही ज्ञान की प्राप्ति होती है अर्थात उसे इस बात का बोध होता है कि मेरे जीवन में जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह परमपिता परमेश्वर की असीम अनुकम्पा के चलते हो रहा है। करने वाला मैं नहीं हूं । करने वाला कोई और है। मैं तो उसके संकेत पर कठपुतली की भांति मात्र नाचने का काम कर रहा हूं। यदि जीवन में वह कुछ मुझसे शुभ करवा रहा है अर्थात कुछ ऐसा करवा रहा है जिसे ' बड़ा ' कहा जा सकता है तो यह उसकी कृपा का ही परिणाम है कि उसने इस शुभ के लिए मेरा चयन किया है। इस चयन के लिए भी उसका धन्यवाद ज्ञापित करो।
   वह दयालु - कृपालु परमपिता परमेश्वर हमारे हृदय में विराजमान हैं । हृदय में विराजमान रहकर वह दयानिधान सदा ही सुपथ पर बढ़ने एवं कुमार्ग से हटने की प्रेरणा करते रहते हैं। यदि हम उसकी प्रेरणा को सुन नहीं पाते अथवा उसके अनुसार अपना जीवन आचरण नहीं कर पाते तो इसमें दोष उसका नहीं है बल्कि हमारा है।

डॉ राकेश कुमार सिंह 
( आर्यों का महाकुंभ वाट्स एप ग्रुप से 27/9/2026 ईस्वी ) 
  भाग -२ 
अग्ने नय सुपथा रायेऽअस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युथोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्ति विधेम ॥
यजु० 40 । 16 ॥

सुपथ से ऐश्वर्य प्राप्ति की साधना 
कल से आगे.....

   वैदिक विद्वानों की मान्यता है कि " जैसे अग्नि अपने सांसारिक कार्यों के निष्पादन सम्पादन में अग्रणी होता है और विधि पूर्वक उसका अनुष्ठान करने से वह रत्नादि अनेक उत्तमोत्तम पदार्थों का देने वाला होता है। श्रुति ने तो उसे प्राणि-मात्र की भलाई के श्रेष्ठतम कार्य यज्ञ का पुरोहित ही कहा है। वैसे ही आध्यात्मिक सुपथ पर बढ़ाने के लिये अग्निदेव परमेश्वर ही हमारे अग्रणी हैं जो कि हमारे हृदय में सदा विराजमान हैं। हमें उनके ही आदेशानुसार सदा चलना चाहिये । परन्तु भौतिकोत्थान के लिये अभिदेव के उपर्युक्त गुणों से युक्त साथी को ही अपना अग्रणी (नेता) मान श्रद्धा के साथ उसके द्वारा निर्दिष्ट मार्ग का अनुसरण करना चाहिये। मन्त्र में निर्दिष्ट तीनों बातें तो नेता में होनी ही चाहिये। यदि नेता में अपने अनुयायियों को कुमार्ग से हटाकर सुपथ पर चलाने की सामर्थ्य नहीं है तो उसे अपने को नेता न समझना चाहिये और न ऐसे व्यक्ति को कभी अपना नेता ही बनाना चाहिये । लक्ष्य की सिद्धि प्राप्त करने एवं कराने के लिये सही नेतृत्व की आवश्यकता है।" 
   इस मंत्र के माध्यम से परमपिता परमेश्वर हमको इसी बात का संदेश दे रहे हैं कि जैसे मेरे नेतृत्व में संसार सही-सही गति को प्राप्त हो रहा है वैसे ही संसार में नायकों के नेतृत्व में मेरी व्यवस्था को आगे बढ़ाया जाता है। उस व्यवस्था को आगे बढ़ाने वाला मेरे ही समान गुणों वाला होना चाहिए। यदि उसके भीतर दिव्यता नहीं है ,दिव्य गुणों के प्रति श्रद्धा नहीं है, न्यायप्रियता से उसे किसी प्रकार का लगाव नहीं है, यदि उसके हृदय में पक्षपात है तो वह परमपिता परमेश्वर की व्यवस्था में नायक नहीं हो सकता। परमेश्वर के दिव्य गुणों को धारण करने वाला ही नायक हो सकता है। राजा हो सकता है। समाज का मार्गदर्शक हो सकता है।
 12 नवम्बर 2022 को दैनिक जागरण में प्रकाशित एक लेख के अनुसार चाणक्य ने भी नेता के कुछ गुणों का वर्णन किया है।
चाणक्य कहते हैं कि किसी भी नेता को अपने कार्य को योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए धैर्य रखना बहुत आवश्यक है। इसलिए दल के अन्य लोगों से अधिक नायक को धैर्य रखना चाहिए। जल्दबाजी में किए गए काम में लापरवाही का खतरा निरंतर बना रहता है। जिससे कड़ी मेहनत पर चंद मिनटों में ही पानी फैल सकता है। इसलिए धैर्य व संयम का साथ कभी ना छोड़ें।
एक अच्छा नायक अपने प्रतिद्वंदियों के सामने अपनी योजनाओं का खुलासा कभी नहीं करता है। योजनाओं की चर्चा करने से पराजय का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए अपने दल के अलावा किसी अन्य के साथ महत्वपूर्ण जानकारी न बाटें। साथ ही इस बात का विशेष ध्यान रखें कि आपके दल से भी कोई ऐसा न करे। इसलिए पूरी तरह सचेत रहें।
जब तक कोई काम सफलतापूर्वक पूरा न हो जाए तब तक एक कुशल नायक को हर समय सतर्कता बरतनी चाहिए। इसके साथ ही उसे दल के हर एक सदस्य से सुझाव भी लेना चाहिए। ऐसा करने से कार्य में रचनात्मकता आती है और सफलता के नए अवसर प्राप्त होते हैं।"
यजुर्वेद (अध्याय 36, मंत्र 18) के अनुसार:-

दृते दृंह मा मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम् ।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे ।मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे ॥ 
अर्थात' हे दुःख विनाशक परमेश्वर मुझे बढ़ाइये । मुझको  मित्र की दृष्टि से  सब प्राणी देखें। मैं मित्र की दृष्टि से सब प्राणियों को देखूं । हम सब मित्र की दृष्टि से देखें।'
 इस मंत्र में मित्रता का विस्तार किया गया है। उसको इतनी ऊंचाई दी गई है कि सर्वत्र मित्रता का ही मधुरस टपकता हुआ दिखाई देता है। कितनी पवित्र भावना से प्रार्थना की गई है कि मैं सबको मित्र की भावना से देखूं। सब मुझे मित्र की भावना से देखें और हम सब मिलकर एक दूसरे को मित्र की भावना से देखने वाले बनें। सर्वत्र मित्रता ही मित्रता दिखाई दे। शत्रुता कहीं लेशमात्र के लिए भी न हो। जब इस प्रकार की प्रार्थना हृदय से निकलती है तो प्रत्येक प्रकार का संप्रदायवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद ,प्रांतवाद ,भाषावाद भी दुम दबाकर भाग लेता है। क्योंकि मित्रता के विस्तार में उनके लिए कहीं कोई स्थान नहीं होता। 

विस्तार कर तू मित्रता का
नाश कर तू शत्रुता का,
मित्रबोध से हृदय भरकर
नवाचार कर तू मित्रता का।।

तू शुद्ध है - तू बुद्ध है 
 तू निर्मल और निर्विकार है। 
तू नवगीत है मित्रता का 
इसी का हो रहा संचार है।।

तेरी दिव्यता की साधना में 
है मित्रता सहभागिनी। 
 हृदय बसा तू भाव इसका
है यही प्रेम की अर्धांगिनी।।

  जीवन में आगे बढ़ते रहो और मित्रता के विस्तार के लिए प्रेम की सृष्टि करते रहो। प्रेम की ही वृष्टि करते रहो। जीवन में आगे बढ़ने के लिए तुम्हें दूसरों की मित्रता की आवश्यकता है तो दूसरों को तुम्हारी मित्रता की आवश्यकता है। जितनी आवश्यकता आपको है उतनी ही दूसरी ओर से भी आवश्यकता अनुभव की जा रही है। जब दोनों एक दूसरे के पूरक हैं तो फिर तकरार क्यों ? तकरार कभी आगे नहीं बढ़ने देती, इसलिए तकरार के रास्ते को मत अपनाओ। स्नेह भरी दृष्टि से मित्र खोजते रहो और मित्रों की संख्या बढ़ाते रहो।
मित्रों का उत्साहवर्धन जीवन पथ को सरल कर देता है। जीवन की यात्रा को सुगम कर देता है। जीवन पथ पर तभी आगे बढ़ा जा सकता है जब आपके चारों ओर शांति का परिवेश होगा और शांति का परिवेश होना तभी संभव है जब चारों ओर आपके मित्रों का वास हो। जैसे एक छोटी सी तिल्ली बड़े से बड़े जंगल को जला डालती है वैसे ही हमारे किसी भी प्रकार के प्रमाद के कारण यदि कोई छोटा सा भी शत्रु हमारे आसपास रहता है तो वह भी हमारे लिए कई बार बड़े विषम संकट खड़े कर डालता है। इसीलिए हमारे ऋषियों का चिंतन रहा कि मित्र भाव से ही सबको देखते रहो। हमारी अपनी उन्नति तभी संभव है जब हमारे चारों ओर हमारे मित्रों का वास हो और दूसरों की भी उन्नति तभी संभव है जब उनके भी चारों ओर मित्र वास करते हों।
 'स्वाध्याय और प्रवचन' नामक पुस्तक के लेखक रामेश्वर शास्त्री सिद्धांत शिरोमणि मुख्याध्यापक गुरुकुल विश्वविद्यालय वृंदावन मथुरा लिखते हैं :-
   " वैदिक संस्कृति को प्राय: आर्य संस्कृति या भारतीय संस्कृति के नाम से पुकारते हैं । क्योंकि सर्वप्रथम यहां के ऋषियों ने वेदों के पवित्र ज्ञान को प्राप्त कर और तदनुकूल आचरण करते हुए इस संस्कृति को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्ति का साधन समझा और उसका जनकल्याणार्थ सर्वत्र प्रसार किया। श्रेष्ठ कर्तव्य परायण ,साधु ,सज्जन, सभ्य परमात्मभक्त पुरुषों को आर्य कहते हैं । आर्यों द्वारा सामूहिक रूप में अपनाए जाने से इस संस्कृति को आर्य संस्कृति कहा गया और इस संस्कृति के उपासकों का वैदिक नारा सारे संसार को आर्य बनाओ प्रारंभ से चला आ रहा है। सभी विद्वानों ने ऋग्वेद को सबसे प्राचीन पुस्तक माना है। इसलिए इससे विकसित हुई संस्कृति सबसे प्राचीन और मानव मात्र को पवित्र करने वाली आदि संस्कृति है और निसंदेह ऐसा ही समझना चाहिए।
  मनुष्य का विश्लेषण करते हुए हमें ज्ञात होता है कि त्रिविध शरीर युक्त अर्थात कारण , सूक्ष्म और स्थूल शरीर से युक्त जीवात्मा जो मननपूर्वक कार्य करता है, वह मनुष्य है । अन्य प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य की श्रेष्ठता मनन के कारण ही है। मनुष्य ज्ञानपूर्वक कार्य करने वाला प्राणी है, जो अपने ज्ञान और कर्मों से अपना सम्यक विकास करके प्रभु के अमूल्य गुणों को अपने में धारण कर स्वयं सुसंस्कृत हो अपना तथा दूसरों का कल्याण कर सकता है।" 
  जब प्रत्येक कार्य मननपूर्वक किया जाने लगता है तो उसमें आनंद अनुभव होने लगता है। क्योंकि इस प्रकार किया जाने वाला कार्य शुभ और पवित्र मनोयोग के साथ संपन्न होता है। जिसमें सर्व कल्याण की भावना अंतर्निहित होती है। मनुष्य स्वार्थ को छोड़कर परमार्थ के लिए कार्य करता है। उसके भीतर यह भाव विकसित होने लगता है कि मेरा प्रत्येक कार्य समाज, संसार और राष्ट्र के लिए होना चाहिए । प्राणी मात्र के लिए होना चाहिए। यही भाव मनुष्य को मनुष्य बनाता है और यही भाव मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है। यही भाव मित्रता का आधार हो सकता है। 
   आज हमें राष्ट्र के लिए सोचते हुए अपने बिछुड़े हुए मित्रों की ओर भी देखना चाहिए, जो कभी सनातन का ही एक अटूट अंग हुआ करते थे। परंतु आज अपने आप को इस्लाम या ईसाई मत का अनुयाई मानते हैं। उनको हमने अपने आप से दूर किया और गले लगाना उचित नहीं माना। दूरियां इतनी बढ़ गईं कि इतिहास की उस सच्चाई पर भी लोगों को विश्वास नहीं होता जो हमको बार-बार बताती है कि हम सब एक थे। हमारे पूर्वज एक हैं, हमारा इतिहास एक है, हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक मान्यताएं एक हैं। यहां तक कि हमारा पिता भी एक है। दूरियों के बढ़ जाने के कारण हमारे विरोधियों और शत्रुओं की संख्या बढ़ती चली गई। अब इतिहास के इस भूत से हमें पिंड छुड़ाना चाहिए और अपनी मित्रता को विस्तार देते हुए उनकी घर वापसी का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। वेद ज्ञान केवल आदर्शवाद नहीं है। इसका व्यावहारिक पक्ष लोक कल्याण है। इस लोक कल्याण की साधना करने के लिए मानवतावाद का प्रचार करना आवश्यक है और यह तभी संभव है जब हम अपनी मित्रता को विस्तार देंगे।
डॉ राकेश कुमार सिंह 
( 29/9/2026)

Friday, 25 September 2026

26/11 में बंदूकें चलाने वाले आतंकवादियों के नाम इतिहास में दर्ज हैं। लेकिन उसी स्टेशन पर सैकड़ों लोगों को गोलियों के रास्ते से दूर करने वाली वह आवाज भी याद रखी जानी चाहिए। वह आवाज़ थी—विष्णु दत्ताराम झेंडे की।

26/11 का मुंबई रेलवे स्टेशन पाकिस्तान से आया कसाब और उसका साथी...प्लेटफॉर्म पर घूमते हुए पर घूमते लोगों को मार रहे थे 
....गोलियों की आवाज़ और 50 से ज्यादा लोगों की मौत.... ये घटना सभी याद रखते हैं 

लेकिन उस शख्स को बहुत कम लोग याद करते हैं, जिसकी आवाज़ ने सैकड़ों अनजान लोगों को गोलियों की दिशा में जाने से रोक दिया....., #विष्णु_दत्ताराम_झेंडे।

26 नवंबर 2008 की रात वह छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (CST) के अनाउंसमेंट केबिन में ड्यूटी पर थे। यह प्लेटफॉर्म के ऊपर बना एक कांच का कमरा था, जहाँ से पूरे स्टेशन का काफी हिस्सा दिखाई देता था।

ड्यूटी खत्म होने में ज्यादा वक्त नहीं बचा था कि अचानक उन्हें तेज धमाके और गोलियों की आवाज़ सुनाई दी। उन्होंने देखा कि लोग जान बचाकर भाग रहे हैं। दो आतंकवादी देश के सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशनों में से एक में घुस चुके थे और सामने आने वाले लोगों पर गोलियां चला रहे थे। उस स्टेशन पर ही 50 से ज्यादा लोगों की जान जाने वाली थी।

लेकिन विष्णु झेंडे ने ऊपर से एक ऐसी चीज देख ली, जिसे शायद बाकी लोग नहीं देख पा रहे थे। लोकल ट्रेनें लगातार स्टेशन पर आ रही थीं। हर ट्रेन से सैकड़ों यात्री उतरने वाले थे—सीधे उन्हीं प्लेटफॉर्मों पर, जहाँ आतंकवादी गोलियां चला रहे थे। उनके पास सिर्फ एक माइक्रोफोन था, जिसकी आवाज़ पूरे स्टेशन के प्लेटफॉर्म तक पहुंच सकती थी। उन्होंने फैसला किया कि वे इसका इस्तेमाल करेंगे।

भले ही इसका मतलब था कि उन्हें छिपने के बजाय उसी जगह पर रहना होगा, जहाँ से आतंकवादी उन्हें देख सकते थे। उन्होंने बार-बार हिंदी और मराठी में अनाउंसमेंट करना शुरू किया। लोगों से कहा कि वे मुख्य कॉनकोर्स की तरफ न जाएं। पीछे के रास्तों से स्टेशन से बाहर निकलें और गोलियों की दिशा से दूर रहें। उनकी आवाज़ सुनकर सैकड़ों लोगों ने अपना रास्ता बदल लिया।

वे स्टेशन से बाहर निकल गए—उस जगह जाने के बजाय जहाँ गोलियां चल रही थीं।
आतंकवादियों को समझ आ गया कि ये अनाउंसमेंट कहाँ से हो रही हैं। वे उनके केबिन के ठीक नीचे तक पहुंच गए।
एक आतंकवादी ने ऊपर की तरफ गोली चलाई।

विष्णु झेंडे नीचे झुक गए, इंतजार किया और जैसे ही मौका मिला, फिर माइक्रोफोन उठाकर लोगों को चेतावनी देने लगे। उनके पास न कोई हथियार था, न कोई सुरक्षा कवच। उनके पास था तो बस एक माइक्रोफोन और यह समझ कि खतरा कहाँ है। वह कोई कमांडो नहीं थे। वह कोई पुलिस अधिकारी नहीं थे।

वह रेलवे के एक सामान्य अनाउंसर थे, जो उस रात अपनी ड्यूटी कर रहे थे। लेकिन जब आतंकवादी लोगों की जान लेने आए, तो उन्होंने अपने पास मौजूद एकमात्र हथियार—अपनी आवाज़—का इस्तेमाल किया।

26/11 में बंदूकें चलाने वाले आतंकवादियों के नाम इतिहास में दर्ज हैं। लेकिन उसी स्टेशन पर सैकड़ों लोगों को गोलियों के रास्ते से दूर करने वाली वह आवाज भी याद रखी जानी चाहिए। वह आवाज़ थी—विष्णु दत्ताराम झेंडे की।

विकट परिस्थितियां ही मनुष्य को स्वर्णिम अवसर देती है भीड़ से अलग होने के लिए, इतिहास में स्थान बनाने के लिए और सबसे बढ़कर जीवन की सार्थकता के लिए।

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Vikram Verma