स्वामी दयानन्द अपनी प्रथम सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं -- "ब्रिटिश शासन से भारत को अनेक लाभ प्राप्त हुए हैं। इस शासन ने सर्वत्र शांति स्थापित की है, बार-बार होने वाली लड़ाइयों को समाप्त कर दिया है, कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल बढ़ाकर और सड़कों का जाल बिछाकर आर्थिक समृद्धि का संवर्धन किया है। ब्रिटिश शासन की एक अन्य बड़ी विशेषता यह है कि इसने भारतीयों को धार्मिक तथा अन्य विषयों में स्वतन्त्रता प्रदान की है। अब राज्य की ओर से धार्मिक मामलों में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं की जाती है। शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे स्कूल स्थापित किए हैं, जिनमें शिक्षा पाने की सुविधा है और छात्रों के लिए मुद्रणालयों से मुद्रित होकर पुस्तकें बड़ी संख्या में उपलब्ध होती हैं। एक अन्य विशेषता न्याय-पद्धति की है। अमीर-गरीब अदालत में जाकर समान रूप से न्याय प्राप्त कर सकते हैं।" (सत्यार्थ प्रकाश, प्रथम संस्करण, पृष्ठ 500)
आप यहाँ स्पष्ट देख सकते हैं कि ब्रिटिश शासन का ऐसा गुणगान लिखने वाला व्यक्ति भला ब्रिटिश सरकार का विरोधी हो सकता है? यह सत्यार्थ प्रकाश लगभग दस वर्षों तक छपती रही तथा आर्यसमाजियों को अंग्रेज़ों की भक्ति करने की प्रेरणा देती रही।
इसके अतिरिक्त, कुछ विषयों पर स्वामी दयानन्द अंग्रेज़ सरकार की आलोचना भी करते हैं, किन्तु वह आलोचना विद्रोह की नहीं, प्रशासनिक कारणों से की गई है - जैसे कि अंग्रेज़ गोरे-काले में भेद करते हैं, नमक और जंगल से लकड़ी लेने पर कर वसूल करते हैं।
यह निंदा अंग्रेज़ों को उखाड़ फेंकने के लिए नहीं, बल्कि उसमें सुधार करने के लिए है। अर्थात् स्वामी जी अंग्रेजी शासन के प्रशंसक थे किन्तु कुछ कमियाँ जो हैं, उन्हें सुधारने के उद्देश्य से बताते हैं। क्या स्वामी दयानन्द के लिखे को पढ़ने के बाद भी उनके ब्रिटिश शासन का भक्त होने में संदेह हो सकता है? अब तो वह व्यक्ति निश्चित ही बुद्धि का निपट अंधा हो सकता है, जो स्वामी जी के लिखे को पढ़कर भी उन्हें अंग्रेज़ सरकार का विरोधी कहे।
आर्यसमाजी कहते हैं कि स्वामी दयानन्द के समय हिन्दू समाज, मुसलमानों और ईसाई मिशनरियों के आक्षेपों का उत्तर देने में असमर्थ होता था तथा अपमान का अनुभव करता था। स्वामी दयानन्द व आर्यसमाज ने हिन्दुओं को इनसे लड़ना सिखाया। किन्तु यह बात भी निराधार है।
मौलवी व ईसाई हमारे बहुदेववादी होने पर आक्षेप करते थे, स्वामी दयानन्द ने उनका खंडन नहीं किया बलकि स्वयं हिन्दू धर्म के बहुदेववाद का खंडन किया। मौलवी व ईसाई हमारे मूर्तिपूजक होने पर आक्षेप करते थे, स्वामी दयानन्द ने भी वही किया और मूर्ति पूजा का खंडन किया। हिन्दू धर्म में श्राद्ध का विधान था, मौलवी-पादरी इस पर आक्षेप करते थे, तो स्वामी जी ने भी इस पर आक्षेप किए और इसका खंडन किया। मौलवी-पादरी हमारे पुराण आदि ग्रंथों पर आक्षेप करते थे, तो स्वामी जी ने भी वही किया और इनका खंडन किया। ईसाई व मुसलमान हमारे अवतारवाद पर आक्षेप करते थे, स्वामी दयानन्द ने भी वही किया इसका भी खंडन किया। अर्थात ईसाई व मुसलमान हिन्दू धर्म पर जो भी आक्षेप किया करते थे, स्वामी दयानन्द ने उन्हे कोई उत्तर नहीं दिया बल्कि स्वयं ही इन सबका खंडन किया।
स्वामी दयानन्द हिन्दुओं की ओर से नहीं लड़ रहे थे, बल्कि वे अपनी नई नवेली मनगढ़ंत मान्यताओ की स्थापना के लिए सर्वाधिक हिन्दू धर्म से ही लड़ रहे थे। मुसलमानों से भी वह शास्त्रार्थ करते थे, किन्तु उसका कोई विशेष लाभ हिन्दुओं को नहीं मिलता था। कोई मुसलमान उनसे प्रभावित भी हो तो, हिन्दू धर्म का तो विरोधी ही रहता था किन्तु स्वामी जी का प्रसंशक अवश्य हो जाता था। ईसाई मत के खंडन के कारण कुछ ईसाई मिशनरी दयानन्द स्वामी से रुष्ट अवश्य थे, किन्तु उन्हें एवं अंग्रेज़ी शासन को स्वामी दयानन्द से बहुत लाभ हो रहा था, हानि नगण्य थी।
अतः स्वामी दयानन्द हिन्दू धर्म के लिए तो लड़ ही नहीं रहे थे। सनातन धर्म की लगभग सभी मान्यताओ और परम्पराओ का स्वामी जी ने खंडन ही किया था, बल्कि ईसाई व मुसलमान इतनी शक्ति व तर्को के साथ नहीं कर पाते थे, स्वामी जी हिन्दू धर्म का विरोध करनें में इनसे कही अधिक आगे थे। स्वामी दयानन्द के इस कार्य से मुसलमानो व ईसाइयों के लिए हिन्दू धर्म पर आक्षेप लगाना बहुत सरल हो गया था। अतः स्वामी जी का उद्देश्य केवल और केवल अपने मत की स्थापना करना था। न कि हिन्दू धर्म की रक्षा करना या देश को स्वतन्त्रता दिलाना। अंग्रेज़ सरकार स्वामी जी को सब प्रकार से सहायता दिया करती थी।
स्वामी दयानन्द के सभी जीवनी लेखकों ने उन्हें ब्रिटिश सरकार का समर्थक तथा राजभक्त ही बताया है।
अंग्रेज़ी भाषा में स्वामी दयानन्द की पहली जीवनी लिखने वाले आर्यसमाजी बाबा छज्जू सिंह ने लिखा है - "स्वामी जी वर्तमान युग में अपने उपदेशों में शिक्षा के प्रसार पर विस्तार से प्रकाश डालते थे और ब्रिटिश राज के गुणों का संक्षेप में उल्लेख करते थे और यह बताया करते थे कि अंग्रेजों ने भारतीयों को भाषण की स्वतन्त्रता का महत्त्वपूर्ण वरदान प्रदान किया है।"
अन्य जीवनियों से स्वामी दयानन्द की ब्रिटिश शासन की भक्ति के प्रमाण पूर्व के लेख में दिए ही जा चुके हैं। इतने काफी हैं। आर्यसमाजी चाहें तो आगे और दे सकते हैं। यहाँ तक इतना स्पष्ट हो गया है कि स्वामी दयानन्द निश्चित तौर पर अंग्रेज़ सरकार के प्रबल प्रशंसक थे।
मधुलिका जी जैसे झूठ और भ्रम की दुनिया में जीने वाले जब कहते हैं कि "स्वामी दयानन्द न होते तो भारत आजाद न होता अथवा स्वतन्त्रता की नींव स्वामी दयानन्द ने रखी", तो इससे अधिक हास्यास्पद, झूठी और मक्कारी से भरी बात और कोई नहीं हो सकती। स्वामी दयानन्द स्वयं और उनकी जीवनी लिखने वाले उनके सब चेले स्पष्ट प्रमाण दे रहे हैं कि स्वामी दयानन्द ने स्वतन्त्रता या अंग्रेज़ों के विरुद्ध कुछ नहीं किया, बल्कि समर्थन ही दिया।
अगर स्वामी दयानन्द स्वतन्त्रता चाहते या इसके लिए प्रेरित करते, तो आर्यसमाज संगठन को स्वतन्त्रता के लिए लड़ना चाहिए था, किन्तु ऐसा नहीं हुआ। स्वामी दयानन्द की मृत्यु के बाद आर्यसमाज ने भी अंग्रेज़ों की भक्ति की परंपरा जारी रखी। आर्यसमाजी ब्रिटिश शासन को अपने लिए वरदान समझते थे। इसके सैकड़ो प्रमाण आर्यसमाज के तत्कालीन लेखो व पुस्तकों में उपलब्ध हैं।
देखिये स्वामी दयानन्द के पक्के चेले पंडित लेखराम अपनी पुस्तक में ब्रिटिश शासन की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं - "इंग्लैंड की रानी और भारत की साम्राज्ञी ने भारत के शासन की बागडोर सँभालने के बाद विद्या और शिक्षा का प्रसार करने का प्रयास किया है। उनकी कृपा और कीर्ति से सर्वत्र शान्ति का साम्राज्य है। चोर-डाकुओं का दमन कर दिया गया है। देश बदमाशों के आतंक से मुक्त हो चुका है और सब दशाओं को सुधारने के प्रयत्न किए जा रहे हैं।" (तहज़ीब-ए-बरहिनी)
लाहौर आर्यसमाज की अन्तरंग सभा ने 12 नवम्बर 1886 को ऐसा प्रस्ताव पास किया था कि भारत की स्वतन्त्रता आदि के लिए किए जा रहे राजनैतिक कार्यों में कोई आर्यसमाजी भाग न ले।
सन् 1888 में संयुक्त प्रान्त की आर्य प्रतिनिधि सभा ने भी नियम बनाया कि - "कोई भी आर्यसमाजी संस्था के रूप में किसी भी राजनैतिक गतिविधि या आन्दोलन से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखेगा और न ही ऐसे किसी आन्दोलन में भाग लेगा।" (आर्यसमाज का इतिहास, पृष्ठ 120)
परोपकारिणी सभा ने भी 1891 में ऐसा ही नियम बनाया, उसमें कहा गया कि: "आर्यसमाज के किसी भी प्रचारक के लिए यह उचित नहीं है कि वह (अपने भाषण में) किसी राजनैतिक विषय की चर्चा करे या उस पर भाषण दे, या किसी ऐसी संस्था से सम्बन्ध रखे या उसकी बैठकों में सम्मिलित हो, जिसके द्वारा राजनैतिक आन्दोलन किया जाता हो।"
स्वामी दयानन्द के पदचिन्हो पर चलते हुये आर्यसमाज बहुत लंबे समय तक ब्रिटिश शासन की भक्ति करता रहा।
इसके पश्चात एक समय जब आर्यसमाज पर राजद्रोह के आरोप लगे, तो प्रयास किया गया कि आर्यसमाज में अंग्रेज़ों की भक्ति की परंपरा के जो पुराने प्रमाण हैं, वे एकत्रित किए जाएँ। तब संयुक्त प्रान्त की आर्य प्रतिनिधि सभा के तत्कालीन मन्त्री श्री मदन मोहन सेठ ने अपनी पुस्तक "आर्यसमाज – ए पोलिटिकल बॉडी" में ऐसे सब पूर्व के प्रमाण प्रस्तुत किए, जिनमें आर्यसमाज की ब्रिटिश भक्ति दिखाई गई थी। आर्यसमाज दिखाना चाहता था कि, आर्यसमाज में कुछ अराजक तत्व ही ऐसे हैं जो आजादी के लिए भाषण आदि देने जैसा कुकर्म कर रहे है, किन्तु आर्यसमाज में तो ब्रिटिश भक्ति की पुरानी परंपरा है व आर्यसमाज आज भी उसी पर चलता हैं। सोचिए पुस्तक तक लिख डाली गई।
इस पुस्तक का एक प्रमाण देखिये, इसमें लिखा है: "अंग्रेज़ों ने यद्यपि हमारे देश को गुलाम बना रखा है, फिर भी उन्होंने देश को धार्मिक स्वतन्त्रता का बहुमूल्य वरदान दिया है, और इसी कारण मूर्ति-पूजा जैसी देश के लिए हानिकारक कुरीतियों का इस समय खण्डन किया जा सकता है। यदि आप अंग्रेज़ों को इस देश से निकाल देंगे, तो हम मूर्ति पूजा का विरोध करने वालों का गला भेड़-बकरियों के गले की भाँति काट देंगे।"
इस आर्यसमाजी की लिखी पुस्तक में ही आर्यसमाज द्वारा ब्रिटिश शासन की भक्ति करने के सैकड़ो प्रमाण हैं।
दरअसल आर्यसमाजी नेता आर्यसमाजियों को यह भय दिखाते थे कि अगर अंग्रेज़ इस देश से चले गए, तो हिन्दू हमें मारेंगे। इसलिए अंग्रेज़ों का इस देश में शासन करना आवश्यक है।
उस समय आर्यसमाजी ब्रिटिश सम्राटों के राज्यारोहण, स्वर्ण-जयन्ती आदि अवसरों पर उत्सव मनाया करते थे। आर्यसमाज को दीप आदि से सजाया करते थे। हवन प्रार्थना आदि करके अंग्रेज़ शासको की दीर्घायुता के लिए और उनके शासन के भारत में बने रहने के लिए प्रार्थना किया करते थे।
आर्यसमाज की भक्ति के प्रदर्शन का उदाहरण देखिये - 1887 में ब्रिटिश साम्राज्य में रानी विक्टोरिया के राजगद्दी पर बैठने के पचास वर्ष पूरे होने पर आर्यसमाज ने इस जयन्ती को बड़े धूम-धाम से मनाया तथा आर्यसमाज की ओर से लन्दन की महारानी को मानपत्र दिया गया, जिसमें ब्रिटिश शासन की स्तुति लिखी थी। आर्यसमाज के श्री लक्ष्मीनारायण तथा कुछ अन्य कार्यकर्ताओं ने महारानी के राजभवन में जाकर बड़ी श्रद्धा के साथ यह मानपत्र अर्पण किया। (भीमसेन विद्यालंकार, आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाब)
आर्यसमाजियों द्वारा छपने वाले एक पत्र 'आर्य-पत्रिका' में लिखा गया था: "भारत में महारानी के शासन ने अतीव लाभदायक परिणाम उत्पन्न किए हैं। उनके शासनकाल की पिछली आधी शताब्दी में कुछ बहुत बड़ी शिक्षा-संस्थाएँ स्थापित हुई हैं। इस समय सुधार और पुनरुज्जीवन के वे आन्दोलन शुरू हुए, जिनका भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा है। आर्य समाज का जन्म एवं पालन-पोषण विक्टोरिया के शासन-काल में हुआ, और इसे जो सफलता मिली है, उसका प्रधान कारण रानी द्वारा दी गयी विचार और भाषण की स्वतन्त्रता का सिद्धान्त है।"
जब इस महारानी की मृत्यु हुई और एडवर्ड सप्तम का राज्याभिषेक हुआ, तो इस अवसर पर भी आर्यसमाज की पत्रिकाओं ने अंग्रेज़ी शासन का बड़ा गुणगान किया। आर्य पत्रिका ने लिखा: "आर्यसमाज ने ब्रिटिश सरकार के प्रति राजभक्ति के पर्याप्त प्रमाण दिए हैं। लगभग हर समाज में इस अवसर पर प्रसन्नता प्रकट करने के लिए बैठकें की गई हैं। समाज-मन्दिरों में दिवाली की रोशनी की गई है। नगर-कीर्तन के जुलूस निकाले गए हैं। वस्तुतः इस समय हर प्रकार से यह प्रदर्शित किया गया है कि आर्यों को राजा के राज्याभिषेक से बड़ी प्रसन्नता हुई है। विभिन्न समाजों में राज्याभिषेक के बारे में होने वाली बैठकों के जो विवरण पत्रों द्वारा हमें मिले हैं, वे बहुत अधिक हैं और हम उन सबको इस पत्रिका में छापने में असमर्थ हैं।"
फिर 10 जनवरी 1903 में आर्य पत्रिका में छपा था: "शास्त्रों में आदर्श शासक के जो गुण बताए गए हैं, वे सब अंग्रेजों में विशेष रूप से पाए जाते हैं।" (आर्यसमाज का इतिहास, पृष्ठ 123)
ये केवल कुछ गिने चुने प्रमाण हैं, तत्कालीन आर्यसमाजी लेखको की पुस्तकों व पत्रिकाओ को देखा जाएँ तो ऐसे सौ पचास नहीं बल्कि हजारो प्रमाण मिलते है, जिनमें स्पष्ट आर्यसमाज द्वारा ब्रिटिश शासन को आदर्श शासन बताया जाता था।
तब आर्यसमाज ने मानपत्र भी दिया गया था, जिस पर लिखा था: "हम भगवान से आपके (ब्रिटिश सम्राट) दीर्घ जीवन और समृद्धि के लिए तथा ब्रिटिश राज्य के भारत में वर्षों तक शान्तिपूर्ण रीति से बने रहने के लिए प्रार्थना करते हैं।" (यह मानपत्र केशवराव तथा उपप्रधान राजगोविन्द प्रसाद द्वारा बनाया गया था।)
1907 ई. में सम्राट एडवर्ड के जन्मदिन को आर्यसमाज ने 'धन्यवाद-दिवस' के रूप में मनाया तथा अपने पूज्य सम्राट के दीर्घायुष्य के लिए विभिन्न आर्यसमाजों में प्रार्थनाएँ की गईं।
गुरुकुल कांगड़ी (जो तब आर्यसमाजियों का ही गुरुकुल था) से एक अंग्रेज़ी पत्रिका प्रकाशित होती थी। इसमें छपा था - "राज्याभिषेक के मंगल अवसर पर महामहिम ब्रिटिश सम्राट तथा साम्राज्ञी को हम अपनी सच्ची बधाई अतीव विनम्रतापूर्वक प्रस्तुत करते हैं। आर्यसमाज उग्र सुधारकों की संस्था है, इसकी ऐसी उन्नति अंग्रेज़ी सरकार के शासनकाल में ही सम्भव है।"
उस समय आर्यसमाज में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए अविचल भक्ति, अटूट निष्ठा और अगाध राजभक्ति थी। आर्यसमाज नाना प्रकार की बातें करके अंग्रेज़ों को भारत में रखने का ही पक्षधर था। वह हिन्दुओं में प्रचार करता था कि "यदि अंग्रेज़ भारत से चले गए तो मुसलमान इस देश पर हमला करेंगे", तथा आर्यसमाजियों में प्रचार करता था कि "हिन्दू स्वराज्य के योग्य नहीं हैं। आर्यसमाज के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भारत में ब्रिटिश शासन का रहना पूर्ण रूप से आवश्यक है। इस कारण आर्यसमाजियों को भारत में ब्रिटिश शासन को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए पूरी सहायता देनी चाहिए, तथा अंग्रेज़ सरकार के निन्दकों व आलोचकों से मुँह फेर लेना चाहिए। भारतवासियों की रक्षा के लिए अंग्रेज़ी शासन का भारत में चिरकाल तक स्थायी रूप से बना रहना अतीव आवश्यक है। यह शासन भारतीयों को धार्मिक स्वतन्त्रता का बहुमूल्य वरदान प्रदान कर रहा है। इसलिए सब भारतीयों तथा आर्यसमाजियों का 'पावन धार्मिक कर्तव्य' है कि वे भारत में ब्रिटिश सत्ता का प्रबल पृष्ठपोषण करें।" (आर्यसमाज का इतिहास, पृष्ठ 130)
आर्यसमाज तब ब्रिटिश शासन के भारत में बने रहने को अपना "पावन धार्मिक कर्तव्य" कहता था। तथा अंग्रेज़ो की शक्ति को पोषित करना अपना धर्म समझता था। जैसा कि पूर्व में कहा गया - आर्यसमाज और स्वामी दयानन्द का उद्देश्य इस देश में दयानन्द स्वामी के अधार्मिक विचारो को ही स्थापित करना था। तब वे हिन्दू, मुसलमान एवं ईसाई इन सभी को अपना शत्रु ही समझते थे।
"कांग्रेस के पुराने नेताओं की तरह अनेक आर्यसमाजी भी ब्रिटिश शासन को वरदान मानते थे और उसका गुणगान करने में सङ्कोच नहीं करते थे।" (पृष्ठ 16, आर्यसमाज का इतिहास)
यह है स्वामी दयानन्द का "स्वराज्य", यह है आर्यसमाज का अंग्रेज़ों से युद्ध, जिसके बल पर मधुलिका जी फरमा रही हैं कि आर्यसमाज और स्वामी दयानन्द न होते तो भारत कभी स्वतन्त्र न होता, जबकि सत्य यह है कि स्वामी दयानन्द और आर्यसमाज की चलती, तो वे कभी इस देश को स्वतन्त्र ही न होने देते। अंग्रेज़ो का ऐसा समर्थन तत्कालीन समय में भारत की किसी संस्था या संगठन ने नहीं किया था, जैसा हार्दिक समर्थन आर्यसमाज द्वारा किया गया था।
आर्यसमाज के प्रचार के फलस्वरूप अनेक हिन्दू उस समय उनके सुधारवादी विचारों को देखकर जुड़ गए थे। ये वे लोग थे जो मुसलमानों एवं कट्टर आर्यसमाजियों की भाँति सनातन धर्म के प्रतीकों के विरोधी नहीं थे।
जिनमें से एक थे लाला लाजपत राय। आर्यसमाज के अनेक विघ्न पैदा करने के बावजूद, लाला लाजपत राय ने आर्यसमाज में स्वतन्त्रता आन्दोलन की क्रान्ति की थोड़ी सी "घुसपैठ करा दी"। आज ये गर्व से कहते हैं कि देखो, लाला लाजपत राय आर्यसमाजी क्रान्तिकारी थे। किन्तु सत्य यह है कि लाजपत राय आर्यसमाज के नियम के विरुद्ध जाकर क्रान्ति कर रहे थे। अर्थात् आर्यसमाज में उस समय फूट पड़ गई थी। अनेक ऐसे हिन्दू आर्यसमाज में आ गए थे जो "पौराणिक संस्कार" के थे, तथा स्वामी दयानन्द की हिन्दू धर्म विरोधी सोच को अधिक महत्व न देकर, स्वतन्त्रता के लिए आर्यसमाज का लाभ उठाना चाहते थे। वे आर्यसमाज के नियमों और रहस्यों को ताक पर रखते हुये क्रान्तिकारियों से जुड़ने व उनकी ओर से लड़ने पर आमादा थे। लाला लाजपत राय ने भी आर्यसमाज में बने इन दो दलों का वर्णन किया है।
लाला लाजपत राय को जब अंग्रेज़ सरकार ने देश से निर्वासन का दण्ड दिया, तब पंजाब में आर्यसमाज के नेताओं ने लाला लाजपत राय से सम्बन्ध विच्छेद की घोषणा करते हुए, पंजाब के अंग्रेज़ गवर्नर को अपनी राजभक्ति का विश्वास दिलाया। (आर्यसमाज का इतिहास, पृष्ठ 137)
इसी प्रकार जब 1910 में भाई परमानन्द पर अंग्रेज़ सरकार ने राजद्रोह का मुकदमा लादकर उन्हें गिरफ्तार किया, तो वहाँ के डी.ए.वी. कॉलेज ने उनसे सम्बन्ध विच्छेद करके ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति राजभक्ति में अविचल निष्ठा प्रकट की।
जब अंग्रेज़ों ने कांग्रेस की स्थापना की, तो अनेकों आर्यसमाजी कांग्रेस से जुड़ गए। तब चन्दा इकट्ठा करके लाहौर में सभाएँ करने के लिए एक स्थायी भवन बनाया गया। लाला लालचन्द आदि आर्यसमाजियों ने यह धन एकत्रित करके एक विशाल भवन तैयार किया, और इस भवन का नाम ब्रिटिश सांसद चार्ल्स ब्रेडला के नाम पर "ब्रेडला हाल" रखा गया। लाला लाजपत राय, श्यामजी कृष्ण तथा भाई परमानन्द वाले दल ने इस पर विरोध किया, किन्तु उनकी न सुनी गई।
लाला लाजपत राय के नेतृत्व में पहली बार आर्यसमाज का एक छोटा सा वर्ग क्रान्तिकारियों की सहायता करने लगा। जिससे अंग्रेज़ सरकार पंजाब के आर्यसमाज से रुष्ट हो गई। तब लाला लाजपत राय के पंजाब से निर्वासन के आदेश के बाद आर्यसमाज के नेताओं ने बार-बार सार्वजनिक घोषणाएँ करवाईं कि "आर्यसमाज का राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है, वह राजनैतिक संस्था नहीं है।" (मुंशीराम – दि आर्यसमाज एण्ड इट्स डिक्ट्रेटर्स, पृष्ठ 92)
इसी प्रकार गुरुकुल कांगड़ी में भी कुछ छात्र थे जो क्रान्तिकारियों की सहायता कर रहे थे, तब गुरुकुल कांगड़ी के प्रशासन ने अपनी राज्यभक्ति दिखाने के लिए गुरुकुल में ब्रिटेन के सम्राट और साम्राज्ञी के चित्र टाँग दिए। तथा अंग्रेज़ो को विद्यालय में बुलाकर विद्यार्थियो से अंग्रेज़ सरकार एवं सम्राट साम्राज्ञी का स्तुति-ज्ञान कराया था। ये पूरा वर्णन आर्यसमाज के इतिहास में वर्णित हैं।
गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना करने वाले महात्मा मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानन्द) भी इस समय तक अंग्रेज़ों के सबसे बड़े भक्त थे। ये लिखते हैं - "पंजाब के आर्यसमाजियों की बहुसंख्या वर्तमान राजनैतिक मामलों के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहती है। यदि हम वैदिक आदर्शों तक पहुँच जाएँ, तो क्या भारतीयों में यह योग्यता है कि वे पक्षपात-शून्यता तथा न्याय के सिद्धान्तों के अनुसार शासन चला सकते हैं? मेरी सम्मति में इस समय कोई भी समझदार व्यक्ति यह नहीं चाहेगा कि ब्रिटिश शासन की समाप्ति हो, क्योंकि केवल इसी शासन में हम निर्भीकतापूर्वक अपने सिद्धान्तों का प्रचार और उन पर आचरण कर सकते हैं।"
यहाँ एक रोचक बात है। आजकल के आर्यसमाजी झूठ प्रचारित करते हैं कि सत्यार्थ प्रकाश क्रान्ति लाई, इसे पढ़कर सब क्रान्तिकारी बन जाते थे, आदि-आदि। किन्तु यही आरोप जब मुसलमानों ने सत्यार्थ प्रकाश पर लगाया कि इस पुस्तक में राजद्रोह के कुछ अंश हैं, तो देश के समूचे आर्यसमाज ने बार-बार इस पर सफाई दी कि सत्यार्थ प्रकाश के किसी अवतरण में राजद्रोह की गन्ध तक नहीं है। उनका कहना था कि किसी का भी यह सोचना कि सत्यार्थ प्रकाश में अंग्रेज़ शासन के विरुद्ध कुछ लिखा है, यह पूरी तरह मिथ्या, कपोलकल्पित तथा दुर्भावनापूर्ण है। बल्कि कई लेख लिख-लिखकर आर्यसमाजियों ने सिद्ध किया था कि सत्यार्थ प्रकाश में ऐसा कोई अंश नहीं है।
दरअसल मुसलमानों का आर्यसमाज से द्वेष था ही। अतः अंग्रेज़ सरकार में कार्यरत मुस्लिम कर्मचारी अंग्रेज़ों को निरन्तर भड़काते थे तथा गलत सूचना देते थे कि आर्यसमाज अंग्रेज़ी शासन के विरोध में कार्य कर रहा है। निरन्तर उन तक पहुँचाई गई भ्रामक खबरों तथा कुछ सच्ची खबरों से एक समय अंग्रेज़ पंजाब में आर्यसमाज को अपना विरोधी समझने लगे थे, किन्तु आर्यसमाज ने एक-दो बार नहीं, बल्कि अनेकों बार, नाना प्रकार से अपनी भक्ति अंग्रेज़ शासन के प्रति सिद्ध की।
हाँ, इतना अवश्य हो चुका था - जैसा कि पूर्व में भी कहा गया - कि आर्यसमाज का एक बड़ा वर्ग जहाँ ब्रिटिश शासन का भक्त था तथा अंग्रेज़ी राज्य को भारत के लिए वरदान समझता था, वहीं लाला लाजपत राय सहित एक छोटा सा वर्ग क्रान्ति में हिस्सा लेने लगा था। किन्तु आर्यसमाज का बड़ा वर्ग इन क्रांतिकारियों का विरोध कर रहा था, इस पर नियंत्रण स्थापित करने का पूरा प्रयास कर रहा था। _ _ _ क्रमशः।
(आर्यसमाजियों के झूठ को ध्वस्त करने के लिए, स्वामी दयानन्द एवं आर्यसमाज का ब्रिटिश प्रेम दिखाने हेतु इतने ही प्रमाण पर्याप्त हैं। किन्तु तब भी आगे दिखाया जाएगा कि किस तरह झूठ को असंख्यों बार लिख लिखकर बोल बोलकर,अनेकों क्रांतिकारियों को इन्हौने अपने साहित्य में आर्यसमाजी लिख रखा है, जबकि वे कभी आर्यसमाजी विचारधारा के न थे। अपने झूठे प्रचार से इन्हौने अनेकों सामान्य हिन्दुओ को ही नहीं बल्कि बड़े बड़े विद्वान हिन्दुओ को भी भ्रमित किया हुआ हैं। मेरी चुनौती है कि कोई भी आर्यसमाजी इन लेखों में आए किसी एक तथ्य को भी गलत सिद्ध करके दिखाए। ये सभी तथ्य आर्यसमाज के हीसाहित्य से जानकर लिए गए हैं, ताकि इन्हें इन तथ्यों को झूठा कहने का भी अवसर प्राप्त न हो।)