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Sunday, 19 April 2026

प्राचीन शास्त्रों का कोई विषय समझ न आए, तो वह झट से कह देता है कि - “अरे यह तो अवैदिक है, प्रक्षेप हैं।" कहने का आर्यसमाजी विद्वानों का स्वभाव बन गया हैं।

जब किसी आर्यसमाजी को अपनी संकीर्ण बुद्धि से प्राचीन शास्त्रों का कोई विषय समझ न आए, तो वह झट से कह देता है कि - “अरे यह तो अवैदिक है, प्रक्षेप है, गप्प है, असंभव है।” आर्यसमाजियों के एक अवैदिक पाखंडी वर्ग ने तो इसे अपना स्वभाव बना लिया हैं।
 
डॉक्टर मधुलिका आर्या जी ने पुराण से एक आपत्ति लिखी कि -- “ऋषि अगस्त्य ने समुद्रपान कर लिया था। ऐसी पापलीलाओ पर हमें लज्जा आती है "। अन्य भी आर्यसमाजी दशको से इस कथा का मज़ाक उड़ाते रहे हैं। और इन आर्यसमाजियों को देखकर इनके मुसलमान भाई व नीलमानव भी इस व अन्य कथाओ को गप्प कहकर उपहास करते हैं।

किन्तु इसमें आश्चर्य की क्या बात है? विधर्मियों का उद्देश्य तो अंधविरोध हैं, किन्तु आर्यसमाजियों को तो समझना चाहिए कि यह तो ऋषि मुनियो और उनके तप की महिमा का उज्ज्वल उदाहरण है। 

अगस्त्य ऋषि तपस्वी थे, जैसा कि महाभारत में कहा गया है - “तपस्वी तत्र भगवान् अगस्त्यः प्रत्यदृश्यत” (उद्योग पर्व)।

तब तपस्या के बल से असंभव से भी असंभव कार्यों को पूर्ण करने की क्षमता तपस्वी में हुआ करती है। तपस्या के बल से जल पर पत्थर तैराया जा सकता है, हथेली पर सरसों जमाई जा सकती है, समुद्रपान भी किया जा सकता है।

तपस्या की महत्ता मनुस्मृति में कही गई है - “यद् दुस्तरं यद् दुरापं यद् दुर्गं यच्च दुष्करम्। सर्वं तु तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्॥”

अर्थात जो भी कठिनता से पार करने योग्य कार्य हैं, जो कठिनता से प्राप्त होने योग्य कार्य या उद्देश्य है, या जो दुर्गम कार्य है, जो दुष्कर कार्य है - वह सब तप से सिद्ध होता है। तप का अतिक्रमण किसी कार्य में नहीं हो सकता।

यह मनुस्मृति का श्लोक समाजियों के मुँह पर तमाचा है, क्या वे मनु महाराज को नहीं मानते हैं ?

अगर मानते हैं, तब तो ऋषि अगस्त्य ने अपनी तपस्या की शक्ति से यदि दुस्तर, दुष्कर, दुर्गम समुद्र को तीन अंजलि जितना करके पी ले, इसमें क्या आश्चर्य शेष रहा?

दरअसल आर्यसमाजी भारत के इतिहास का सबसे महान ऋषि स्वामी दयानन्द को मानते हैं, और स्वामी जी को एक किलो दूध और दो-चार किलो आम खाकर दस्त का रोग हो जाया करता था, तब ये सोचते हैं कि पहले के ऋषि भी हमारे स्वामी जी जैसे ही रहे होंगे। तो ऐसा नहीं, बालकों! अन्य ऋषियों के तप के बल की तुलना स्वयं या स्वामी दयानन्द से मत करो।

तप की महिमा वेद में लिखी है - “भद्रमिच्छन्त ऋषयः स्वर्विदस्तपो दीक्षामुपनिषेदुरग्रे। ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदस्मै देवा उपसन्नमन्तु॥”

शतपथ ब्राह्मण में कहा है - “तपसा वै लोकं जयन्ति।” तो जब तपस्या से सारा संसार जीता जा सकता है, तब समुद्र पर विजय प्राप्त कर लेने में क्या कठिनता शेष रही? क्या समुद्र आर्यसमाजी संसार से बाहर की वस्तु है? या फिर ये वेद के वचन गलत हैं?

तैत्तिरीय आरण्यक में कहा गया है - “तपसा देवा देवतामग्रे आयन्, तपसा ऋषयः स्वरविन्दन्...” यहाँ अंतिम अंश में सिद्ध किया गया है कि तपस्या से सारा जगत परिभूत हो जाता है, अर्थात दब जाता है; तब फिर समुद्र को दबा देने में क्या कठिनाई है?

योगसूत्र के कैवल्यपाद में कहा गया है - “तपसा संकल्पसिद्धिः।” इस प्रकार जब तपस्या से सभी संकल्प सिद्ध हो जाते हैं, तो तपस्वी अगस्त्य ऋषि द्वारा देवताओं के हित के लिए समुद्र के सुखानेरूप समुद्रपानात्मक संकल्प में सिद्धि को कौन योगशास्त्र को मानने वाला नकार सकता है?

ऋषि अगस्त्य का तो जन्म ही अलौकिक है - “ततो हि मान उदियाय मध्यात्।” इस ऋग्वेद के मंत्र में ऋषि अगस्त्य को शमी प्रमाण तथा कुम्भ से उत्पन्न बताया गया है। मधुलिका जी इसका अर्थ बदलने का कुप्रयास करना चाहें, तो इस मंत्र का अर्थ ब्राह्मणग्रंथ में देख लें; वहाँ विस्तार से यह कथा लिखी हुई है।

तो जिसकी उत्पत्ति ही विचित्र है, अलौकिक है, उसकी शक्ति भी विचित्र और अलौकिक क्यों न हो?

ऋषि और देवताओं में अद्भुत सामर्थ्य हुआ करता है। अब देखिए, क्या वाणीमात्र से महारोग की निवृत्ति हो सकती है? आर्यसमाजी कहेंगे - यह तो असंभव है, ऐसा तो होता ही नहीं है। किन्तु देखिए, वेद में लिखा है - “इन्द्रस्य वचसा वयं मित्रस्य वरुणस्य च। देवानां सर्वेषां वाचा यक्ष्मं ते वारयामहे॥” (अथर्ववेद ६।८५।२)।

हम पूछते हैं, क्या वाणीमात्र से विभिन्न प्रकार के कृमियों का नाश हो सकता है? आर्यसमाजी कहेंगे - नहीं। किन्तु वेद में लिखा है -- “दृष्टमदृष्टमतृहामथो कुरूरुमतृहम्। अल्गण्डूंस्त्सर्वान्छलुनान्क्रिमीन्वचसा जम्भयामसि॥” (२।३१।२)।

शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है - “दैवी वाग् आविशति, सा वै दैवी वाग्, यया यद् यदेव वदति, तत् तद् भवति।” अर्थात दैवी वाणी वह होती है, जिससे जो कहा जाए, वही हो जाए।  

महाभारत के वनपर्व में विदर्भ नरेश ने अपनी पत्नी से कहा था - महर्षिवीर्यवानेष क्रुद्ध: शापाग्निना दहेत्‌॥

अर्थात - प्रिए , ये महर्षि अगस्त्य बड़े शक्तिशाली हैं, यदि कुपित हो तो हमें शाप की अग्नि से भस्म कर सकते हैं।

जब इल्विल नामी असुर ने अगस्त्य मुनि को मारने की इच्छा की थी तो महातेजस्वी अगस्त्य मुनि ने अपनी हुंकार से ही उसे भस्म कर दिया था --- भस्म चक्रे महातेजा हुंकारेण महासुरम्‌॥ (महाभारत , तीर्थयात्रा पर्व)

देवता और ऋषि-मुनि लोकोत्तर कार्य तप एवं शक्ति के बल से कर दिया करते हैं।

क्योंकि हमारी लघुशंका भी चींटी के लिए समुद्र है, और वर्षा उसके लिए प्रलय के समान है। ऊँट और हाथी की लघुशंका भी हमारे समाजी मित्रों के स्नान के लिए पर्याप्त है।

अर्थात तपस्यादि से अलौकिक शक्ति से सम्पन्न हमारे पूर्व ऋषि-मुनियों के समक्ष हम चींटी के समान हैं। हम चींटियों के लिए जो समुद्र है, वह तपस्वी अगस्त्य ऋषि के लिए लोटा भर पानी हो जाता है, तपस्या के बल से।

योगदर्शन के कैवल्यपाद में कहा है - “दण्डकारण्यं चित्तबलव्यतिरेकेण कः शारीरेण कर्मणा शून्यं कर्तुमुत्सहेत, समुद्रम् अगस्त्यवद् वा पिबेत्।” अर्थात यदि चित्तबल की सत्ता न होती, तो शारीरिक कर्ममात्र से समृद्ध नगर को कौन दण्डकारण्य बना सकता है? और समुद्र का अगस्त्य की तरह कौन शारीरिक कर्म से पान कर सकता, यदि चित्तबल न होता?

यह व्यास जी के भाष्य में लिखा है। अतः महर्षि व्यास जी भी अगस्त्य ऋषि के समुद्रपान के इतिहास को सत्य मानते हैं।

स्वामी दयानन्द भी पतंजलिकृत योगसूत्रों पर व्यासमुनि के भाष्य को, अपने सत्यार्थ प्रकाश में, संस्कार विधि तथा भाष्य भूमिका में ग्राह्य तथा प्रामाणिक मान गए हैं।

तब फिर मधुलिका व अन्य आर्यसमाजी यदि स्वामी दयानन्द के मान्य व्यासभाष्य में लिखे इस इतिहास को नहीं मान रहे, तो यह उनकी मूर्खता है। यह तो उनके द्वारा स्वामी जी के मुख पर जूता मारने के समान है, सत्यार्थ प्रकाश,संस्कार विधि, भाष्यभूमिका पर जूता मारने के समान है। बल्कि मैं तो कहता हूँ - यह स्वामी दयानन्द की जीभ को क्यों आए दिन ऐंठते हो, समाजियों?

सत्यार्थ प्रकाश के ११वें समुल्लास में स्वामी दयानन्द लिखते हैं-- “शारीरिक सूत्र, योगशास्त्र के भाष्य आदि व्यासोक्त ग्रंथों के देखने से विदित होता है कि व्यास जी बड़े विद्वान, सत्यवादी, धार्मिक योगी थे।”

तो प्रिय मधुलिका जी, इसी व्यासभाष्य में लिखा हुआ अगस्त्य ऋषि का समुद्रपान गप्प सिद्ध न हुआ, यथार्थ सिद्ध हुआ। तो आपके भी दयानन्द स्वामी का अनुयायी होने से इस घटना को झूठ, गप्प, असंभव कहने का कहाँ अवकाश रहा?

आद्यशंकराचार्य जी ने भी अगस्त्य ऋषि के समुद्रपान को अपने गीताभाष्य में माना है। विचार कीजिए, जिस इतिहास को महर्षि वेदव्यास से लेकर आद्यशंकराचार्य तक मानते हैं, उस इतिहास का निकृष्ट आर्यसमाजी मजाक उड़ाते हैं। क्या यही वैदिकता हैं? यही है ऋषि मुनियो के प्रति प्रेम? मधुलिका जी इसे “पापलीला” बताती हैं, कहती हैं कि उन्हें इन पर लज्जा आती है। मधुलिका जी, आपको लज्जा तो अपनी संकीर्ण बुद्धि पर आनी चाहिए। 

और देखिए, ऋग्वेद में लिखा है - “तपसा ये अनाधृष्याः”- अर्थात तपस्वी को कोई नहीं दबा सकता। तब तपस्वी अगस्त्य को समुद्र की विशालता कैसे दबा सकती है?

महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है - “न तपसा न साध्यं नाम किञ्चन।” तपस्या से कुछ भी असाध्य नहीं है।

महाभारत में अगस्त्य ऋषि के लिए लिखा है - “पीतः समुद्रोऽगस्त्येन अगाधो ब्रह्मतेजसा” (आदि पर्व)। अर्थात अगस्त्य ने ब्रह्मतेज के बल से समुद्रपान कर डाला।  

समुद्रमपिबत्‌ क्रुद्ध: सर्वलोकस्य पश्यत:॥ (महाभारत वनपर्वणि) । महाभारत में तो इस पूरी कथा को विस्तार से लिखा गया हैं।

इस महाभारत के प्रमाण को मानेंगी या नहीं, मधुलिका जी? 

अब भी थोड़ी शंका शेष है, तो श्री यास्क के निरुक्त को देख लो। उसे तो प्रमाण मानते हो न?

निरुक्त में विश्वामित्र ऋषि के विषय में लिखा है कि जब ऋषि सुदास राजा का यज्ञ कराकर बहुत-सा धन प्राप्त करके व्यास और सतलुज नदियों के संगम पर पहुँचे, उस समय चोर उनसे धन हरण करने को पीछे लगे। विश्वामित्र ने नदियों में बड़ा प्रवाह देखकर नदियों को प्रेरित किया - “गाधा भवति” (निरुक्त २।२४।६)। अगाध तुम नदिया गाध हो जाओ, अर्थात थोड़े जल वाली हो जाओ। यही इस वेदमंत्र में कहा गया है - “रमध्वं मे वचसे ऋतावरीः उप” (ऋग्वेद )।

इस वेदमंत्र के ऋषि विश्वामित्र हैं और देवता प्रौच्यमान - नदियाँ हैं।

इस मंत्र का अर्थ निरुक्तकार ने किया है - “उपरमध्वं मे वचसे”, अर्थात हे नदियो, मेरे वचन की पूर्ति के लिए तुम रुक जाओ। पहले तो नदियों ने न माना, अंत में मान लिया; अर्थात विश्वामित्र के वचन से वे थोड़े जल वाली हो गईं। यही निरुक्त में लिखा है - “प्रत्याख्याय अन्तत आशुश्रुवुः।” यह होती है तपस्वी के वचन की महिमा।

तो मधुलिका जी व आप जैसे संकीर्ण बुद्धि के आर्यसमाजी चलिए वेदों को नहीं मानेंगे, ब्राह्मण ग्रंथों को भी नहीं मानेंगे, महाभारत के भी प्रमाण को नहीं मानेंगे;, निरुक्त से भी मुंह फेर लेंगे, किन्तु अपने अलबेले कलयुगी ऋषि दयानन्द की बात तो मानेंगे न?

आर्यसमाज के स्वामी सत्यानन्द के बनाए स्वामी दयानन्द के जीवनचरित्र “दयानन्दप्रकाश” में लिखा है कि एक सज्जन ने स्वामी दयानन्द से निवेदन किया - “भगवन्, पातंजल शास्त्र का विभूतिपाद क्या सच्चा है?”

तब स्वामी दयानन्द ने कहा - “आप यों ही संदेह करते हैं, योगशास्त्र तो अक्षरशः सत्य है।”

यदि ऐसा है, तब इस योगशास्त्र में जलभूत के वशीकरण द्वारा समुद्र को पीना, सुखाना, कम पानी का कर देना या कुछ भी कर देना तो बड़ी सामान्य-सी बात है। और फिर स्वामी दयानन्द के मान्य योगसूत्र के व्यासभाष्य में तो स्पष्ट नाम लेकर “समुद्रम् अगस्त्यवद् वा पिबेत्” कहते हुए इस इतिहास को बताया गया है। 

योगदर्शन के भाष्य में महर्षि वेदव्यास लिखते हैं कि - " महर्षि अगस्त्य का समुद्रपान जलप्रकृति के अवयवो के अपसारण का दृष्टांत हैं। अर्थात समुद्रपान करते समय विशाल सागर स्वल्प परिमाण वाला बन गया और अगस्त्य मुनि ने उसका पान कर लिया। (योगसूत्र, व्यास भाष्य)

आर्यसमाजियों को पुराण आदि में ऋषि-मुनियों के लोकोत्तर कर्मों पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि जिन भूतों पर हमारा नियंत्रण नहीं होता, वे योगी, तपस्वी व ऋषियों के संकल्प के अनुसार चलते हैं।

अतः सब प्रकार से सिद्ध होता है कि तपशक्ति से समुद्रपान असंभव नहीं है। हाँ, ऐसे कर्म सर्वसाधारण नहीं हैं, अपवाद ही हैं अपवाद कदाचित् होता है, सार्वत्रिक नहीं। तो आर्यसमाजियों को पुराण आदि में जहाँ-जहाँ ऋषियों व देवताओं के ऐसे अद्भुत कार्य दिखाई दें, तो इसे समझने का प्रयास करें, न कि अपनी मूर्खता के चलते उनका उपहास उड़ाया करें। अगर नहीं समझ में आते है तो हमारे पास आओ, हम समझाएँगे न।

आशा है मधुलिका जी एवं उनके जैसे दयानन्दी इस सत्य को स्वीकार करेंगे।

एक बात और समझ लें - अनेक मूर्ख हिन्दू (अर्ध-आर्यसमाजी), और नए नवले बने हुये आर्यसमाजी, जो कि आर्यसमाज के दुष्प्रचार से प्रभावित होकर न्याय एवं मीमांसा के सिद्धान्तों के अनुसार बिना विचार किए ही, पुराण, महाभारत, रामायण आदि इतिहास की इन अलौकिक घटनाओं की निंदा करते हैं, इन्हें अपशब्द कहते हैं, वे वास्तव में केवल इन घटनाओं को ही नहीं, बल्कि वेदों को अपशब्द कहने का पाप कर रहे होते हैं। योगदर्शन आदि वैदिक ग्रंथों को अपशब्द कहने का पाप कर रहे होते हैं। ऋषि-मुनियों को अपशब्द कहने का पाप कर रहे होते हैं। वे सोच भी नहीं सकते कि किस प्रकार वे अपने पाप का घड़ा इन आर्यसमाजियों के बहकावे में आकर भरते जा रहे हैं। वे सावधान हो जाएँ, अन्यथा वेदधर्म के ऋषि-मुनियों, शास्त्रों आदि के प्रति ऐसा अपराध करने के कारण सब के सब दुर्गति को प्राप्त होंगे। इस पाप के फल से स्वामी दयानन्द तक न बच सके थे, तुम्हारी क्या औकात है?
✍️शचींद्र शर्मा
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दयानंद नहीं होते तो हिन्दू नहीं बचते .. मधुलिका आर्या वक्तव्य का शचींद्र जी द्वारा उत्तर

https://csangira.blogspot.com/2026/04/blog-post_41.html

मधुलिका आर्या के उक्त लेख का श्री शचींद्र जी द्वारा उत्तर -

मधुलिका आर्या जी हमारे लिए लिखती हैं --“ध्यान रखें कि जिन ऋषि दयानन्द को आप अपमानित करने का प्रयास करते हैं, उन्हीं की कृपा से आपके मन्दिर, यज्ञोपवीत, शिखा व तिलक सुरक्षित रह गए हैं, अन्यथा आप व हम सब ईसाई व मुसलमान बन गए होते और भारत स्वतन्त्र भी नहीं होता। क्या आप नहीं जानते कि हिन्दुओं को बचाने के लिए आर्यसमाजियों ने ही सबसे अधिक बलिदान दिए हैं?”

शचीन्द्र - भारत का पहला स्वतन्त्रता संग्राम 1857 को माना जाता है। मंगल पांडे, रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहेब, तात्या टोपे, वीर कुँवर सिंह, झलकारी बाई, राव तुलाराम आदि क्या आर्यसमाजी थे? इस स्वतन्त्रता संग्राम में लाखों हिन्दुओं ने बलिदान दिया था। कोई देवी का भक्त था, कोई विष्णु का उपासक, कोई शिव को मानने वाला।

स्वामी दयानन्द की आयु उस समय लगभग 35 वर्ष थी। यानी वे बालक नहीं थे, वृद्ध भी नहीं थे।

अब स्वयं स्वामी दयानन्द द्वारा लिखित अपनी जीवनी में देखें कि वे उस समय क्या कर रहे थे - 

“नदी में बहते शव को देखकर मैं शीघ्रता से भीतर गया और शव को पकड़कर तट पर ले आया। मैंने उसको एक तेज चाकू से, अच्छी प्रकार जैसे मुझसे हो सकता था, काटना प्रारम्भ किया। मैंने हृदय को उसमें से निकाल लिया और ध्यानपूर्वक उसकी परीक्षा की और देखा। फिर हृदय को नाभि से पसली तक काटकर मैंने अपने सामने रखकर देखने का यत्न किया, और जो वर्णन पुस्तक में था उससे समता करने लगा। फिर इसी प्रकार सिर और गर्दन के एक भाग को भी काटकर सामने रख लिया।” (पृष्ठ संख्या ३७, स्व-लिखित जीवन चरित्र)

“दुर्भाग्य से इस स्थान पर मुझको भाँग सेवन का अभ्यास पड़ गया और प्रायः उसके प्रभाव से मैं मूर्छित हो जाया करता था।” (स्वामी दयानन्द द्वारा स्वकथित जीवन चरित्र)

“उस स्थान पर साँड की मूर्ति खड़ी थी, तब मैं उस मूर्ति के भीतर घुस गया और शेष रात वहीं सोता रहा।” (स्वामी दयानन्द द्वारा स्वकथित जीवन चरित्र)

यानी जिस समय कानपुर में मूर्तिपूजक हिन्दू अंग्रेजों से युद्ध करते हुए हजारों की संख्या में अपना बलिदान दे रहे थे, उस समय स्वामी दयानन्द, सन्यासी होकर भी एक लाश को चीरने-फाड़ने जैसा मूर्खतापूर्ण कृत्य कर रहे थे। किसलिए? उसमें नाड़ी खोजने के लिए। यह तो भला हो कि स्वामी दयानन्द ने मुर्दे को चीरकर उसमें आत्मा, मन आदि खोजने का प्रयास नहीं किया, अन्यथा उसे न पाकर कह देते कि - “आत्मा और मन होते ही नहीं हैं”।

जिस समय रानी लक्ष्मीबाई, झलकारी बाई जैसी महिलाएँ तक अंग्रेजों से लोहा ले रही थीं, उस समय स्वामी दयानन्द भाँग खाकर दो-दो दिन बेसुध पड़े रहते थे।

दिल्ली में नरसंहार हुआ था, अंग्रेज जगह-जगह उनसे लड़ रहे हिन्दुओं की सामूहिक हत्याएँ कर रहे थे। हिन्दू भी बिना पीछे हटे मर रहे थे, उस समय आर्यसमाजियों के स्वामी दयानन्द भाँग खाकर बैल की मूर्ति की गुदा में घुस रहे थे।

क्यों भाई, ये बैल की गुदा में घुसकर, बैल की मूर्ति के भीतर ये तुम्हारे 35 साल के मुष्टण्डे स्वामी दयानन्द कौन से अंग्रेजों से आजादी के लिए लड़ रहे थे? कहते हो कि - ‘हम अपमानित करते हैं’। हम क्या अपमानित करेंगे, ये अपने कर्मों से स्वयं अपमानित हैं।

लाखों हिन्दू इस स्वतन्त्रता संग्राम में मारे गए। हिन्दू ही बड़ी संख्या में थे, उससे कम फिर सिख और मुसलमान थे। स्वामी दयानन्द जो कि इस समय युवा थे, उनका योगदान क्या था? उत्तर है - शून्य।

स्वामी दयानन्द तो इस समय अमर हो जाने के उपाय खोज रहे थे। भाँग पीकर मौज काट रहे थे, गुरु बदलते फिर रहे थे, मुर्दों को चीरने जैसे घृणित कर्म करके वैज्ञानिक बन रहे थे। आर्यसमाज का इस समय अस्तित्व भी नहीं था।

तब मधुलिका जी, ये मूर्तिपूजक हिन्दू किससे प्रेरित होकर लड़-मर रहे थे?

मधुलिका जी का कहना है कि - “उन्हीं की कृपा से आपके मन्दिर, यज्ञोपवीत, शिखा व तिलक सुरक्षित रह गए हैं, अन्यथा आप व हम सब ईसाई व मुसलमान बन गए होते।”

विद्वान मित्र देखें कि जो स्वामी दयानन्द मूर्ति-पूजा को पाप कहते थे, अधर्म कहते थे, मूर्ति को फिंकवाया करते थे, मूर्ति-पूजा का खण्डन करते थे, उनके कारण मन्दिर सुरक्षित रह गए - क्या इससे अधिक मूर्खतापूर्ण बात कोई हो सकती है?

स्वामी दयानन्द अपने आत्मचरित के अन्त में लिखते हैं - “मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि सर्वत्र ‘आर्य-समाज’ कायम होकर मूर्ति-पूजा आदि दुराचार दूर हो जाए।” (योगी का आत्मचरित, पृष्ठ २८१)

स्वामी दयानन्द के जीवनकाल में इस देश में हिन्दू लगभग 75 प्रतिशत थे और मुसलमान लगभग 20 प्रतिशत तथा ईसाई 1 प्रतिशत से भी कम थे।

तब यह कहना कि स्वामी दयानन्द न होते तो ७५ प्रतिशत हिन्दू मुसलमान या ईसाई बन गए होते, यज्ञोपवीत, शिखा, तिलक कुछ न रहता - यह कितनी निराधार एवं मूर्खतापूर्ण बात है?

अन्धभक्ति और मानसिक गुलामी सभी सीमाओं का अतिक्रमण कर डालती है। अपने आराध्य स्वामी दयानन्द को सर्वोच्च दिखाने के लिए मधुलिका जी मूर्खता की सभी सीमाओं को लाँघ जाना चाहती हैं।

इनके अनुसार - स्वामी दयानन्द न होते तो पूरा एक उपमहाद्वीप अनिवार्यतः किसी दूसरे धर्म में बदल जाता?

क्या स्वामी दयानन्द ने स्वतन्त्रता संग्राम में किसी भी तरह भाग लिया था? इसका उत्तर है - “नहीं”। किसी प्रामाणिक इतिहासकार की पुस्तक में इनका नाम तक नहीं मिलता है।

स्वामी दयानन्द का मुख्य कार्य केवल हिन्दू धर्म का प्रमुखता से विरोध करना व कुछ मुसलमान व ईसाई पादरियों से भी दार्शनिक चर्चाएँ करना था, बस इतना भर। स्वतन्त्रता के संघर्ष में उन्होंने किसी भी तरह से भाग नहीं लिया था।

बल्कि स्वामी दयानन्द तो जगह-जगह अंग्रेजी राज्य की प्रशंसा ही किया करते थे, जैसा कि उनकी जीवनी में लिखा है - 

“अनेक अंग्रेज राजकर्मचारी स्वामी जी से मिलने और व्याख्यान सुनने आया करते थे और उनकी प्रशंसा करते थे। स्वामी दयानन्द अंग्रेजी राज्य की बहुत प्रशंसा किया करते थे, इसी कारण बहुत से लोग उन्हें अंग्रेजों का गुप्तचर कहा करते थे।” (स्वामी दयानन्द जीवन चरित - पृष्ठ संख्या २९६)

यह तथ्य स्वामी जी की जीवनी में लिखा हुआ है। वे अंग्रेज सरकार की प्रशंसा किया करते थे, तथा उनकी सभाओं में अंग्रेजों का बड़ा आना-जाना रहा करता था, इसलिए लोग उन्हें अंग्रेजी जासूस तक समझा करते थे।

पंडित लेखराम कृत स्वामी दयानन्द की जीवनी का यह अंश पढ़िए - 

“एक यूरोपियन संवाददाता ने लिखा है - ‘इस व्यक्ति (स्वामी दयानन्द) का यह विचार कदापि नहीं कि सरकार के विरुद्ध किसी प्रकार का कोई आन्दोलन खड़ा करे; प्रत्युत उसने अपनी सभाओं में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ब्रिटिश सरकार का ही शासन है, जिसने मजहबी विवाद में कभी हस्तक्षेप नहीं किया, अपितु पूर्ण और अद्भुत स्वतन्त्रता दी।’” (लेखराम कृत जीवन चरित, पृष्ठ १७७)

स्वामी दयानन्द कहा करते थे कि भारत का बहुत-सा धन विलायत जाता है, परन्तु यह बन्दूक की गोली के समान कार्य करेगा, क्योंकि जितना धन जाएगा, अंग्रेज उतना ही आलसी और भोगी होकर आपदग्रस्त होंगे। (दयानन्द जीवनी, पृष्ठ २९६)

सोचिए, जिस समय अंग्रेज भारत को लूट-लूट कर धन ले जा रहे थे, स्वामी दयानन्द इसके लाभ गिना रहे थे।

अर्थात् स्वामी दयानन्द ने कभी अंग्रेज सरकार का विरोध नहीं किया, अंग्रेज सरकार के विरुद्ध कभी कोई भाषण नहीं दिया।

स्वामी दयानन्द ने इतनी पुस्तकें लिखी हैं - क्या अंग्रेजों के विरुद्ध अथवा स्वतन्त्रता हेतु भारतीयों को प्रेरित करते हुए क्या एक भी लेख उनके द्वारा लिखा गया है? इसका उत्तर है - “नहीं”।

बाद में आर्यसमाजियों ने स्वामी दयानन्द को स्वतन्त्रता आन्दोलन का प्रवर्तक दिखाने के लिए उनकी ओर से कहीं-कहीं कुछ पंक्तियाँ झूठ लिख दीं। झूठी कहानियाँ बनाई हैं। 

जबकि वास्तविकता यह है कि स्वामी दयानन्द ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध कभी किसी पत्र या पत्रिका में कोई लेख नहीं लिखा, कोई भाषण नहीं दिया। बल्कि इसके उलट वे अंग्रेज शासन की प्रशंसा अवश्य किया करते थे।

बल्कि अंग्रेज सरकार से “नियोग” का कानून बनाने के लिए निवेदन किया करते थे। उस पत्र को मैंने एक-दो महीने पहले दिखाया था, उसमें स्वामी दयानन्द की भाषा आप देख सकते हैं कि किस प्रकार वे अंग्रेजों की प्रशंसा में उनकी जी-हुजूरी करते हुए लहालोट हुए जा रहे थे।

तब मधुलिका जी का कहना कि दयानन्द न होते तो हमें स्वतन्त्रता न मिलती, बल्कि हिन्दुओं का अस्तित्व ही खत्म हो जाता - यह निरी पागलपन की बात है।

जब स्वामी दयानन्द का जन्म भी नहीं हुआ था, उससे पहले हम हिन्दुओं ने अपनी शिखाएँ नहीं कटवाईं, गर्दनें कटवा लीं... यज्ञोपवीत उतारने के स्थान पर हम हिन्दुओं ने अपने प्राणों को छोड़ना उचित समझा था। दयानन्द के जन्म से पहले इस देश में अपनी भूमि, अपने धर्म एवं मन्दिरों की रक्षा के लिए लाखों वीर हिन्दुओं ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे।

आर्यसमाजी मजाक उड़ाते हैं कि जब सोमनाथ तोड़ा गया तब देवता क्यों न आए? हिन्दू कहाँ थे? इन दुष्टों ने इतिहास ही नहीं पढ़ा है। अकेले सोमनाथ मन्दिर को बचाने के लिए हजारों क्षत्रिय, महमूद की पचास हजार की सेना से भिड़ गए थे। स्पष्ट मृत्यु को निश्चित जानकर ये क्षत्रिय अपने महलों की औरतों से कहकर जाते थे कि हम मरने जा रहे हैं, तुम भी अपने मरने की तैयारी कर लो।

केवल इस एक मन्दिर की रक्षा के लिए पचासों हजार हिन्दुओं ने, जिनमें अधिकतर क्षत्रिय थे, लड़कर अपने प्राण दिए।

वे अपने धर्म और मन्दिरों की रक्षा के लिए लड़कर मरते थे और उनकी महिलाएँ आग में कूदकर।

सोमनाथ मन्दिर की पुण्य दीवारों का स्पर्श कर-कर के हिन्दू युद्ध के मैदान की ओर दौड़ पड़ते थे। केसरिया बाना सजाकर “हर-हर महादेव” का घोष करते हुए क्षत्रिय यवनों पर टूट पड़ते थे। एक-एक राजपूत दस-दस यवनों को दोज़ख भेज रहा था। गोपा-बापा जैसे योद्धा बन्धु-बान्धवों सहित अपने पूरे कुल सहित बलिदान हो गए। इस मन्दिर की रक्षा के लिए, अपने धर्म के स्वाभिमान के लिए, गौरव के लिए। इधर इनके मरते ही, दुर्ग पर वीर राजपूत वीरांगनाएँ सुहागिन का वेश सजाकर और मंगल गीत गाती हुई, हँसते-हँसते जलती चिता पर चढ़कर अपना बलिदान देती थीं।

मधुलिका जी को यह कहते हुए जरा भी शर्म-लिहाज न आई कि इस देश के लिए सबसे अधिक बलिदान आर्यसमाजियों ने दिए हैं?

ये स्पष्ट बलिदान हुए लाखों हिन्दुओं का, योद्धाओं का, इन वीरांगनाओं का अपमान है या नहीं?

इनका दयानन्द, सत्यार्थ प्रकाश में लिख गया कि सोमनाथ मन्दिर जब तोड़ा जा रहा था तब हिन्दू केवल प्रार्थना कर रहे थे, आक्रमण का प्रतिरोध नहीं किया… और इस झूठे इतिहास को इन मूर्ख कुलकलंकियों ने मान लिया।

और आज के समय ये दयानन्दी चेले इसी बात को जगह-जगह दोहराते हैं।

इन मूर्खों को वास्तविक इतिहास पढ़ना चाहिए… एक धर्मस्थल की रक्षा के लिए ऐसा भीषण युद्ध और प्रतिकार पूरे विश्व में कहीं नहीं हुआ होगा। कई दिन तक भीषण मारकाट होती रही थी। क्या योद्धा, क्या आम हिन्दू - लगभग 60 हजार हिन्दुओं ने इस मन्दिर के लिए लड़कर अपनी जान दी थी।

और अन्त में जब दुर्दान्त महमूद न रुक सका, तो पुजारी शिवलिंग को छोड़कर न भागे… मन्दिर में ही उन्होंने प्राण त्यागे। इसके बाद भी लगातार संघर्ष होता रहा था। महमूद को जान बचाकर भागना भारी पड़ गया था। लेकिन क्या करें, हम ऐसे दुर्दान्त न थे। युद्ध में विजय और पराजय हुआ करती हैं। हमारी पराजय के भी अनेक कारण थे। किन्तु प्रश्न यह है कि क्या हम लड़े न थे? क्या हम मरे न थे?

हमारे पूर्वजो द्वारा अपने धर्म और मंदिरो के लिए दिये गए ऐसे बलिदानो को आर्यसमाजी 'दुकानदारी' बताते हैं। 

महाराणा प्रताप शिवजी के उपासक थे - ये आर्यसमाजी थे क्या? शिवाजी महाराज माँ भवानी के उपासक थे -ये आर्यसमाजी थे क्या? छत्रसाल कृष्ण भक्त थे - ये आर्यसमाजी थे क्या? दुर्गादास, हेमू आदि - इन सबके नेतृत्व में धर्म और राष्ट्र के लिए लड़ते हुए मरे लाखों हिन्दू - क्या आर्यसमाजी थे?

हल्दीघाटी, चित्तौड़, दक्कन आदि सहित कैसे-कैसे युद्ध हुए हैं? आर्यसमाज 150 वर्ष पहले पैदा हुई संस्था - इसने कौन-सा युद्ध लड़ा है? 

क्या ऐसी एक भी घटना हुई थी कि किसी आर्यसमाजी को धर्म परिवर्तन के लिए प्रताड़ित किया गया हो? इसका उत्तर है - “नहीं”।

वीर हकीकत राय 12 वर्ष का एक नन्हा-सा बालक था। उस पर आरोप लगा कि उसने इस्लाम का अपमान किया है। काज़ी (इस्लामिक न्यायाधिकारी) के पास यह मामला गया।

हकीकत राय से कहा गया कि दो विकल्प हैं तुम्हारे पास - या तो इस्लाम स्वीकार कर लो, तो बच जाओगे, अन्यथा मृत्युदण्ड दिया जाएगा।

हकीकत राय ने स्पष्ट मना कर दिया।

हकीकत की माँ रोती हुई बोली - “बेटा, बन जा मुसलमान, कम से कम जीवित तो रहेगा, दूर से ही तुझे देखकर मेरी ममता को शीतलता मिलती रहेगी।”

तब हकीकत राय, जो माँ दुर्गा का भक्त था, बोला - “माँ, अपने धर्म को छोड़कर मुसलमान बन जाना क्या यह मृत्यु से कम है? मेरे लिए तो असंख्यों मृत्युओं से भी यह बढ़कर है। राम नाम को छोड़कर कैसे कलमा वाचूँगा? मन्दिर को भूलकर कैसे मस्जिद जा पाऊँगा?”

उस ११-१२ साल के हिन्दू बच्चे ने जान की भीख नहीं माँगी, इस्लाम स्वीकार नहीं किया, सीना चौड़ा करके मरना स्वीकार किया। और मुसलमानों ने उस पर पत्थर बरसाए और अन्ततः गर्दन काट दी। 

क्या दुकानदारी थी इसमें? क्या ये फुसफुसिया जीव था? 

और ऐसे एक-दो किस्से नहीं हैं - हजारो घटनाएँ हैं जब हमारे बच्चों और औरतों तक ने धर्म नहीं छोड़ा, मरना स्वीकार किया। क्या ये आर्यसमाजी थे? क्या इन्हें किसी दयानन्द ने प्रेरणा दी थी?

हिन्दुओं ने बड़े से बड़े भीषण समय में, जब धर्म न बदलने पर शरीर में कीलें ठोंकी जाती थीं, आरे से चीरा जाता था, हमने सबसे लड़कर इस धर्म को बचाए रखा है। दयानन्द स्वामी को क्या किसी अंग्रेज का एक कोड़ा भी पड़ा था? कोई छड़ी खाई थी कभी अंग्रेज से? कहीं कैद किया गया हो? मतलब कुछ भी नहीं। हाँ, अंग्रेजों से लाभ अवश्य स्वामी दयानन्द को खूब मिला है।

हमने इस्लामिक असहिष्णुता का, इस्लामिक घृणा का, भीषण रक्तपात और अमानुषिक अत्याचारों का समय भी देखा है। हमारे मस्तक काटकर लाल किले की दीवारों पर टाँगे गए, हमें खौलते तेल में डालकर जलाया गया और चमड़ी खींच-खींचकर खौलते हुए तेल से हमारे घावों को सींचा गया… जिस भी तरह से अधिकाधिक तड़पाया जा सकता है, उन्होंने वह किया… हम लड़े और मरना स्वीकार किया, धर्म नहीं छोड़ा।

और आज ये झूठे लेख लिख-लिखकर कहते हैं कि दयानन्द न होते तो देश न होता, धर्म न होता… इनसे बड़ा झूठा, मक्कार कोई हो सकता है क्या? ये अपनी दो पंक्तियों से इस देश में धर्म और देश के लिए बलिदान हुए लाखों हिन्दुओं का अपमान कर देते हैं। इन मूर्खों का इतिहास दयानन्द द्वारा आर्यसमाज की स्थापना के समय से ही शुरू होता है।

जाकर पाइक विद्रोह, सन्थाल विद्रोह, भील आन्दोलन, मराठा युद्ध, राजपूत प्रतिरोध पढ़ो। भारत के हर कोने में हजारों लोगों ने बिना किसी एक संस्था के लड़कर बलिदान दिया है। ‘सन्यासी विद्रोह’ को जाकर पढ़ो, जो संघर्ष चालीस वर्षों तक चलता रहा था। सन्यासी साधु आदि लड़-लड़कर मरते रहे थे। कितना बताएँ तुम्हें, क्या-क्या बताएँ?

हिन्दू समाज, हिन्दू धर्म एवं इस देश की रक्षा किसी एक व्यक्ति, एक गुरु, या एक संस्था की देन नहीं है। यह हजारों-लाखों वर्षों से चले आ रहे सामूहिक संघर्ष, त्याग, आस्था और परम्परा का परिणाम है। सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर महाभारत काल तक, फिर गुप्तकाल, मध्यकाल तक हम बिना किसी संस्था या एक व्यक्ति के सभी आन्तरिक व बाहरी चुनौतियों से लड़े हैं। 

यह असंख्य ज्ञात-अज्ञात वीरों, साधकों, स्त्रियों और सामान्य जन के निरन्तर संघर्ष, त्याग और आस्था का परिणाम है। इसे बचाने का श्रेय किसी एक को देना, उन सभी अनगिनत बलिदानों का अपमान है।

“यह धर्म किसी एक व्यक्ति या संगठन से नहीं बना, इसलिए किसी एक व्यक्ति या संगठन के बिना मिट भी नहीं सकता।”

तो यहाँ तक आपने देख लिया कि स्वामी दयानन्द का देश और धर्म बचाने में कितना योगदान था। अपने जीवन काल में उन्होंने एक लेख तक अंग्रेजों के विरुद्ध नहीं लिखा। न ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी स्वतन्त्रता संघर्ष में सम्मिलित हुए। इतिहास में कोई प्रमाण नहीं हैं।

अब आते हैं १९४७ के स्वतन्त्रता आन्दोलन पर ....................... क्रमशः।
✍️ शचींद्र 
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=pfbid0EH2fZZtPeeGpi5EtCdCSqMfUxtrT8GHRHcoaXkzczpvCnPjgPq15ePvX5Qt6smVWl&id=61556300201732&mibextid=CDWPTG

Saturday, 18 April 2026

मां भगवती दुर्गा जी का ३२ नामावली स्तोत्र: ! 32 दिव्य नाम जो हर संकट को मिटा देंगे 🙏

दुर्गा 32 नामावली स्तोत्र: 32 दिव्य नाम जो हर संकट को मिटा देंगे 🙏

नमस्ते भक्तों। क्या आप जीवन में ऐसी स्थिति से गुजर रहे हैं जहाँ रास्ते बंद लग रहे हों, मन में भय हो, या फिर ऐसा लगे कि कोई अदृश्य शक्ति आपके प्रयासों में बाधा डाल रही है। ऐसे समय में माँ दुर्गा के 32 दिव्य नामों का स्मरण एक दिव्य कवच की तरह कार्य करता है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि ऊर्जा का वह स्रोत है जो आपके जीवन की दिशा बदल सकता है।

माँ दुर्गा का नाम ही उनकी शक्ति है। 'दुर्गा' शब्द का अर्थ है - दुर्गम को हरने वाली। जब हम इन 32 नामों को श्रद्धा से जपते हैं, तो हम वास्तव में अपनी चेतना को उस दिव्य शक्ति से जोड़ रहे होते हैं जो हर असंभव को संभव बना सकती है।

दुर्गा 32 नामावली - अर्थ सहित:

1. दुर्गा - संकटों से रक्षा करने वाली माता
2. दुर्गार्तिशमनी - दुख और कष्टों को शांत करने वाली
3. दुर्गापद्विनिवारिणी - विपत्ति और बाधाओं को दूर करने वाली
4. दुर्गमच्छेदिनी - कठिनाइयों का नाश करने वाली
5. दुर्गसाधिनी - असंभव कार्यों को सिद्ध करने वाली
6. दुर्गनाशिनी - संकटों का विनाश करने वाली
7. दुर्गतोद्धारिणी - संकट में पड़े जनों का उद्धार करने वाली
8. दुर्गनिहन्त्री - शत्रुओं और दुःखों का संहार करने वाली
9. दुर्गमापहा - कठिन दुःखों को हरने वाली
10. दुर्गमज्ञानदा - दुर्लभ ज्ञान देने वाली
11. दुर्गदैत्यलोकदवानला - दैत्यों के लोक को जलाने वाली अग्नि समान
12. दुर्गमा - जिन्हें पाना कठिन है, अगम्य स्वरूप
13. दुर्गमालोका - जिनका स्वरूप देखना कठिन है
14. दुर्गमात्मस्वरूपिणी - आत्मा के गूढ़ स्वरूप में स्थित
15. दुर्गमार्गप्रदा - कठिन मार्ग में सही रास्ता दिखाने वाली
16. दुर्गमविद्या - अत्यंत गूढ़ दिव्य विद्या स्वरूप
17. दुर्गमाश्रिता - जो कठिन समय में शरण देने वाली हैं
18. दुर्गमज्ञानसंस्थाना - गहन ज्ञान में स्थित रहने वाली
19. दुर्गमध्यानभासिनी - ध्यान में प्रकाश रूप से प्रकट होने वाली
20. दुर्गमोहा - मोह का नाश करने वाली
21. दुर्गमगा - कठिन मार्गों में साथ चलने वाली
22. दुर्गमार्थस्वरूपिणी - परम सत्य और अर्थ का स्वरूप
23. दुर्गमासुरसंहन्त्री - दुर्गम नामक असुर का वध करने वाली
24. दुर्गमायुधधारिणी - दिव्य अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली
25. दुर्गमांगी - दिव्य और तेजस्वी अंगों वाली
26. दुर्गमता - जिन तक पहुँचना कठिन है
27. दुर्गम्या - जिन्हें जानना या प्राप्त करना कठिन है
28. दुर्गमेश्वरी - कठिनाइयों पर शासन करने वाली ईश्वरी
29. दुर्गभीमा - भयंकर रूप धारण करने वाली
30. दुर्गभामा - अत्यंत सुंदर और तेजस्विनी
31. दुर्गभा - प्रकाशमयी और दिव्य आभा वाली
32. दुर्गदारिणी - संकटों को चीरकर रक्षा करने वाली

इन नामों का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व:

प्रत्येक नाम एक विशिष्ट कंपन (Vibration) रखता है। जब आप 'दुर्गार्तिशमनी' का उच्चारण करते हैं, तो यह ध्वनि आपके मन के उस हिस्से को सक्रिय करती है जो शांति और स्थिरता से जुड़ा है। 'दुर्गमच्छेदिनी' का जाप आपके अंदर की हिम्मत को जगाता है। यह केवल आस्था नहीं, बल्कि ध्वनि विज्ञान का भी चमत्कार है।

साधना विधि - सरल और प्रभावी:

• समय: प्रातः स्नान के बाद या शाम को दीपक जलाकर
• आसन: लाल या गुलाबी आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें
• संकल्प: हाथ में जल-अक्षत लेकर माँ दुर्गा से प्रार्थना करें
• जाप: 32 नामों को क्रम से पढ़ें, कम से कम 11 बार रोज 
• भाव: संख्या से अधिक महत्व श्रद्धा को दें - भाव से भरी एक माला, यांत्रिक सौ मालाओं से श्रेष्ठ है

विशेष लाभ:

✓ मानसिक भय और चिंता में तत्काल राहत
✓ शत्रु बाधाओं और नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा
✓ करियर, व्यवसाय और शिक्षा में आ रही रुकावटें दूर
✓ पारिवारिक कलह समाप्त, आपसी प्रेम बढ़े
✓ स्वास्थ्य में सुधार और आंतरिक शक्ति का विकास
✓ आध्यात्मिक उन्नति और चेतना का विस्तार

याद रखें:

माँ दुर्गा केवल पूजा की देवी नहीं, वे आपके भीतर की शक्ति हैं। जब आप इन नामों का जाप करते हैं, तो आप वास्तव में अपनी ही आंतरिक शक्ति को जगा रहे होते हैं। नियमितता और श्रद्धा - यही सफलता की कुंजी है।

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वयं राष्ट्रे जागृयाम 

धर्मस्य निर्णयो ज्ञेयो मिथिलाव्यवहारतः - अर्थात धर्म का निर्णय मिथिला के व्यवहार से होता है। (मृत्यु उपरांत 12-13 दिन तक के क्रियाकर्म)

धर्मस्य निर्णयो ज्ञेयो मिथिलाव्यवहारतः 
- अर्थात धर्म का निर्णय मिथिला के व्यवहार से होता है।
   (मृत्यु उपरांत 12-13 दिन तक के क्रियाकर्म)

वो विलाप-अचानक नहीं था।
वो 11 दिनों से भीतर जमा हुआ शोक था-
जो आखिरी दिन बाहर आया।

मैं पिछले तीन दिन से दरभंगा के महथौर में हूं -
 नाना जी की 12वीं-13वीं के क्रियाकर्म में।
मिथिला - वह भूमि - जहां जनक ने जन्म दिया था ज्ञान को। जहां सीता की मिट्टी है। जहां याज्ञवल्क्य ने कहा था - "नेति नेति"। जहां आज भी - धर्मस्य निर्णयो ज्ञेयो मिथिलाव्यवहारतः - अर्थात धर्म का निर्णय मिथिला के व्यवहार से होता है।
इसी मिथिला में - मैंने हर रीति को देखा। हर विधान में सवाल उठे। और हर जवाब - या तो शास्त्र में मिला - या उस गांव की मिट्टी में।

आज यह पोस्ट उसी यात्रा का लेखा-जोखा है।

नाना जी के जाने के बाद से- 
नानी, जिनके लिए शोक सर्वाधिक था -
सामान्य दिख रही थीं। बात करती रहीं। घर में रिश्तेदार मेहमान आते रहे। पर कहीं-एक दरवाजा बंद था। और कल- उस आखिरी दिन -वो दरवाज़ा खुला।
 
 मां, मौसी- सब रो रही थीं।
पर नानी का विलाप-
मेरे रूह को हिला रहा था
मैं - जो पेशे से पत्रकार हूं - 
जो रोज़ दूसरों के दर्द को शब्द देता है -
वो भी - उस रुलाई में - बह गया।
---
मृत्यु के बाद - एक यात्रा शुरू होती है

क्योंकि मृत्यु सिर्फ अंत नहीं है
यह एक संरचित यात्रा है- जो जीवित और मृत - दोनों के लिए होती है:

दाह संस्कार से पहले शरीर को गंगाजल से स्नान कराया जाता है। तिल, तुलसी, चंदन लगाए जाते हैं।

यह केवल शुद्धि नहीं -
यह उस शरीर के प्रति सम्मान है - जिसने जीवन जिया।

कुछ लोग इसे वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखते हैं -
गंगाजल में बैक्टीरिया मारनेवाला वायरस-
बैक्टीरियोफेस पाया जाता है
तुलसी आदि में भी एंटीमाइक्रोबियल गुण पाए जाते हैं-ताकि देह जीवाणुओं से मुक्त हो

लेकिन मूल अर्थ- सम्मान और संस्कार ही है।
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अर्थी -अंतिम विदाई

बांस की अर्थी - कंधे पर उठाकर।
“राम नाम सत्य है” का उच्चारण।

यह घोषणा सिर्फ दूसरों के लिए नहीं -
बल्कि खुद को याद दिलाने के लिए है -
कि अंततः सत्य क्या है।
-

चिता बनाई जाती है - ईशान से आग्नेय दिशा में। उत्तर से दक्षिण।
शव को चिता पर रखते समय पुरुष का मुंह नीचे और स्त्री का मुंह ऊपर - यह भी विधान है।
कर्ता -जो बेटा होता है - अपसव्य होता है। यानी जनेऊ को दाहिने कंधे पर रखता है। सामान्यतः जनेऊ बाएं कंधे पर होता है - देवकार्य में। पर मृत्युकार्य में दाहिने - क्योंकि यह पितृकार्य है। पितृ लोक - यम का लोक - वह दक्षिण में है।
अग्नि देते हुए मंत्र पढ़ा जाता है -
ॐ कृत्वा सुदुष्करं कर्म जानता वाप्यजानता।
मृत्युकालवशं प्राप्तं नरं पञ्चत्वमागतम्।।
धर्माधर्मसमायुक्तं लोभमोहसमावृतम्।
दहेयं सर्वगात्राणि दिव्यान् लोकान् स गच्छतु।।

अर्थ : "जाने-अनजाने में किए गए कर्मों के साथ - काल के वश में आए - धर्म-अधर्म से युक्त - लोभ-मोह से आवृत - इस शरीर को मैं जलाता हूं - यह आत्मा दिव्य लोकों को जाए।"
यह मंत्र - एक क्षमायाचना है। एक मुक्तिप्रार्थना है।
चिता की तीन परिक्रमा - तीनों ऋणों का - देव ऋण, पितृ ऋण, ऋषि ऋण का - निवेदन। और मुंह में अग्नि - क्योंकि जीवनभर जो मुंह बोला, खाया, जिया - उसी से यात्रा का अंत हो।
हिंदू शास्त्र में शरीर पंचभूत से बना है - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। दाह संस्कार उन्हें वापस करता है। पृथ्वी को मिट्टी, जल को नमी, अग्नि को ताप, वायु को वायु, आकाश को आकाश।

शास्त्र कहता है - मंत्रोच्चार से दी गई-अग्नि की धधक - अस्थियों में आकाश और तेज तत्त्वों की संयुक्त तरंगों का संक्रमण - 
यह तीन दिन बाद न्यून होने लगती है। इस कारण -
 तीसरे दिन अस्थि संचयन आवश्यक है।
अस्थियां - दूध और गंगाजल में धोई जाती हैं। फिर लाल कपड़े में बांधकर - 
मिट्टी के घड़े में। नदी में प्रवाहित करने के लिए।
जल में प्रवाहित करने का तर्क -
लिंग देह (सूक्ष्म शरीर) - जो मृत्यु के बाद बचता है - उसके आसपास जलतत्त्व की प्रबलता होती है। नदी का वातावरण - उस सूक्ष्म देह को परिचित लगता है। इसीलिए - पिंडदान से लेकर अस्थि विसर्जन तक - नदी के किनारे।

और व्यावहारिक सत्य - अस्थियां नदी में जाकर कैल्शियम और मिनरल्स बनकर जलचरों का पोषण करती हैं। वापस प्रकृति को।

घाट (श्मशान) पर क्रियाकर्म में सहयोगी -
एक ब्राह्मण होते हैं - महापात्र।
वह हर दिन मृत्यु के साथ रहते है।

समाज के उस हिस्से का प्रतिनिधि-
जिसके बिना सभ्यता चल ही नहीं सकती।

उसे दिया गया दान -
केवल परंपरा नहीं - बल्कि उसकी भूमिका का सम्मान भी है।
--
मृत्यु के दिन से 10 दिन तक -
 घर में सूतक रहता है।
क्या नहीं होता -
देव पूजा नहीं
अभिवादन नहीं
पलंग पर शयन नहीं
बाहर का खाना नहीं
उत्सव नहीं
मिथिला में इसे "सोग" कहते हैं।
यह अलग थलग करना नहीं -
यह एकाग्रता है। उस मृत आत्मा के प्रति -
 जो अभी भी आसपास है- भटक रही है -
यात्रा के लिए तैयार हो रही है।

जब घर के लोग उत्सव करें - 
खाएं-पिएं - तो वह आत्मा क्या अनुभव करे? 

शास्त्र कहता है - वह और भटकती है।
सूतक एक सामूहिक शोक है। जब पूरा परिवार एक ही दर्द में होता है- तो वह शोक शक्ति बन जाता है।
आहार का विधान भी गहरा है -
सात्विक भोजन - नमक कम - तला हुआ नहीं। 

कोर्टिसोल का स्तर - जो शिक में बढ़ता है -
 वह भरी भोजन से और बढ़ता है।
हल्का, सात्विक आहार उसे इस कोर्टिसोल को व्यवस्थित करता है। 

आधुनिक विज्ञान यही कहता है -
अंत में जलन हो तो मन में भी बेचैनी होता है।
हमारे पूर्वज - बिना किसी लैबोरेट्री के - यह समझ चुके थे।
--

10 दिनों तक - किसी योग्य पंडित से गरुड़ पुराण सुनाया जाता है।
गरुड़ पुराण - 18 महापुराणों में से एक -
भगवान विष्णु और उनके वाहन गरुड़ के बीच संवाद।
इसमें वर्णित है -
मृत्यु के बाद की पहली 24 घंटे की यात्रा - यमलोक। 
वहां सभी कर्मों का लेखा-जोखा। फिर -आत्मा वापस घर। परिजनों के बीच। 13 दिन।

यह क्यों सुना जाए?
क्योंकि हम सभी - एक दिन - मरेंगे।
गरुड़ पुराण की सबसे बड़ी देन - वह हमें मृत्यु से डरना नहीं सिखाता। 
वह हमें मृत्यु को समझना सिखाता है। जब हम जानते हैं कि बाद में क्या होगा - तो अभी कैसे जीना है -
 यह साफ हो जाता है।

एक बड़े विचारक ने लिखा है -
 "जो अपनी मृत्यु का सामना कर सकता है -
 वह जीवन को सबसे गहरे अर्थ में जी सकता है।"

गरुड़ पुराण - हजारों साल पहले - यही कह रहा था।
--

पिंडदान : सूक्ष्म शरीर का निर्माण
यह क्रियाकर्म का सबसे गहरा रहस्य है।
पहले दिन से दसवें दिन तक -
प्रतिदिन पिंड दिया जाता है।
पिंड - चावल, जौ, तिल और जल से बना एक पिंड -
जो आत्मा को अर्पित किया जाता है।

गरुड़ पुराण बताता है -
पहले दिन - सिर (मूर्धा) का निर्माण
दूसरे दिन - गर्दन और कंधे
तीसरे दिन - हृदय
चौथे दिन - पीठ
पांचवें दिन - नाभि
छठे-सातवें दिन - कमर और नीचे का भाग
आठवें दिन - पैर
नौवें-दसवें दिन - भूख-प्यास की अनुभूति
ग्यारहवें-बारहवें दिन - मांस और त्वचा का निर्माण - भोजन

इस तरह - 12 दिनों में - एक अंगूठे के बराबर - सूक्ष्म शरीर तैयार होता है। यही यमलोक की यात्रा करेगा।

भौतिक विज्ञान कहेगा - यह माइथोलॉजी है।

हर दिन एक कर्मकांड करना - शोकाकुल परिवार को उबरने की राह देता है।

जब दुख इतना भारी हो कि सांस लेना मुश्किल हो -तब एक छोटा-सा कार्य - "आज पिंड देना है" - उस दुख को उबरने योग्य बना देता है। 

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शोध यही कहते हैं -
व्यवस्थित शोक प्रक्रिया,
जिनमें रोज कोई न कोई कर्म कांड हों -
 वे शोक से उबरने में सबसे तीव्र कारगर होता हैं 

हमारे पूर्वजों ने - बिना किसी हार्वर्ड डिग्री के -
 यह 5000 साल पहले लिख दिया था।

सपिण्डीकरण की तैयारी
दसवें दिन - नदी तट पर या घाट पर - पिंडदान की विशेष विधि।
यहां कर्ता दक्षिण मुख होकर -
जल में खड़े होकर - तिल और जल लेकर - मंत्र पढ़ता है।
दक्षिण में मुख - क्योंकि पितरों का लोक दक्षिण में। जब हम पिंड देते हैं - हम उनसे संवाद करते हैं - उनकी दिशा में।

अग्नि देने वाला बेटा - उत्तरी पहनता है।
यह पवित्र धागा - जनेऊ की तरह - उसे याद दिलाता है कि वो अब गृहस्थी का मुखिया है।
13 दिन तक। हर पल।
जब भी वह उत्तरी को छुए - वह याद करे - "पिता गए। अब यह घर मेरी ज़िम्मेदारी है।"

यह शोक के बीच में उद्देश्य याद दिलाना है।

आखिरी दिन - उत्तरी तोड़ी जाती है।
यह यह सांकेतिक समाप्ति है। शोक यात्रा आधिकारिक रूप से समाप्त। अब जीवन आगे बढ़ना है।

12वें दिन का महाकर्म
यह मिथिला की अपनी विशेषता है।
धर्मस्य निर्णयो ज्ञेयो मिथिलाव्यवहारतः मिथिला में किसी एक स्मृति की पूर्ण मान्यता नहीं। यहां निबंधकारों की पद्धति है - लगभग 800 वर्ष पूर्व जो पद्धति निर्मित हुई - वही मान्य है।
सपिण्डीकरण - यानी मृत आत्मा का पितृगण में विलय।
इस विधि में - चार पिंड रखे जाते हैं - पिता (वसु रूप), पितामह (रुद्र रूप), प्रपितामह (आदित्य रूप) और मृतक।
फिर - एक विशेष विधि से - मृतक का पिंड - पितृ पिंडों में मिला दिया जाता है।
यह संदेश है - "आप अब प्रेत नहीं। तुम अब पितर हो। आप पितृ लोक में हो। हम आपका स्मरण करेंगे। आप हमारी रक्षा करो।"

गोदान, भोज और विसर्जन

गोदान- गाय का दान। मंत्र -"ॐ यमद्वारे महाघोरे कृष्णा वैतरणी नदी। तां सन्तर्तुं ददाम्येतां कृष्णां वैतरणीं च गाम्।।"
अर्थ - "यमद्वार पर जो वैतरणी नदी है - उसे पार करने के लिए - यह काली गाय दान करता हूं।"

यह प्रतीकात्मक है -पर इसके पीछे आर्थिक सच्चाई भी है।

दान में दिया गया धन -समाज के जरूरतमंद तक जाता था। जो परिवार समृद्ध था -उसने मृत्यु कर्म पर -
 गरीब को गाय दी - दूध, दही, घी - पोषण।

भोज -
तीन दिन तक - गांव को भोजन।
यहां दो विचार टकराते हैं।
प्रगतिशील कहते हैं - जिसके घर में कोई गया -
 वो टूटे हुए हैं। उन पर भोज का भार - क्रूरता है। 
कर्ज होता है। खर्च होता है। दिखावा होता है।

परंपरावादी कहते हैं - भोज सामाजिक संबंध मजबूत करता है। 
जब गांव साथ बैठे खाए - परिवार जाने - "हम अकेले नहीं।" एकल परिवार के जमाने में -यह कम्युनिटी स्पोर्ट - बेशकीमती है।

दोनों सही हैं।
समाधान बीच में है - भोज हो - पर उतना जो परिवार झेल सके। गरिमा बने - बोझ न बने।

शास्त्र में भी यही है - "वित्तशाठ्यं न समाचरेत्" - कंजूसी मत करो। पर यह भी नहीं कहा - कर्ज लेकर करो।
--

रुदाली : सामूहिक रुदन का विज्ञान
महिलाओं का एकत्रित होना।
यही मैंने कल देखा।
सभी महिलाएं एकत्रित हुईं। और एक साथ - रोईं।
 नाना जी का नाम लेकर। उनकी यादें बोलकर।

तंत्रिका विज्ञान कहती है -
जब हम अकेले रोते हैं - कोर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) कम होता है।
जब साथ रोते हैं - ऑक्सीटॉसिन भी रिलीज होता है।
ऑक्सीटॉसिन - बॉन्डिंग हार्मोन - जो कहता है -"तुम अकेले नहीं।"
इससे भी गहरा - मिरर न्यूरॉन्स जागृत होते हैं। जब एक रोती है -दूसरी को भी उसी दर्द की अनुभूति होती है। यह सहानुभूति का जैविक मैकेनिज्म है।

रुदाली - वह परंपरा जिसे हम कभी-कभी पुरानी कहकर हंसते थे - वह शोक थेरपी का सबसे एडवांस फॉर्म है।

मनोवैज्ञानिक शोध कहती है -“सामाजिक संदर्भों में भावनात्मक अभिव्यक्ति शोक के समाधान (या शोक से उबरने की प्रक्रिया) को तेज करती है।”

हमारे पूर्वजों ने - बिना किसी रिसर्च जर्नल के - हजारों साल पहले - यह समझ लिया था।
नानी - जो 13 दिन "ठीक" दिख रही थीं - वो कल टूटीं।
और टूटना - जरूरी था।

क्योंकि जो शोक भीतर रहती है -वह शरीर को खाती है। 

जो शोक बाहर आती है - वह हीलिंग की शुरुआत होती है।

 जीवन की वापसी
मिथिला की अनूठी परंपरा।
कर्म कांड खत्म होने के बाद
 मछली खाई जाती है।
"अगर इस दिन नहीं खाई - तो साल भर मछली नहीं।"

यह प्रतीकात्मक वापसी है -सामान्य जीवन में।
13 दिन - सात्विक। पवित्र। शोक।
13 वें दिन -एक आनंद देने वाला भोजन पसंदीदा भोजन -
 जो कहता है - "जीवन चलता है।"
और एक और सत्य -

मछली प्रोटीन और ओमेगा-3 फैटी एसिड्स से भरपूर है। 13 दिनों के इमोशनल और शारीरिक नुकसान के बाद — शरीर को न्यूट्रिशन चाहिए। 
ओमेगा-3 - दिमाग के रसायन को स्थिर करता है — अवसाद और शोक से उबरने में मदद करता है।

जो लोग शाकाहारी हैं, मछली सेवन नहीं करते हैं वो कढ़ी बड़ी, दही बड़ी, ओल की सब्जी इत्यादि खाते हैं। 
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अब - वह प्रश्न जो मन में उठा
नाना जी - हिंदू थे। उनका पूरा क्रियाकर्म - मिथिला की परंपरा के अनुसार - हुआ। सही हुआ। क्योंकि यही उनकी आस्था थी।

पर कुछ दिनों से मेरी पोस्ट अंगदान को प्रोत्साहित करनेवाली थी। अब ये पोस्ट। ऐसे में क्या हिंदू धर्म अंग दान की अनुमति देता है?
हां।

भागवत गीता कहती है, "न जायते म्रियते वा कदाचित् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।"

आत्मा न जन्मती है न मरती है। शरीर नश्वर है।
अगर शरीर नश्वर है- तो उसे किसी और की ज़िंदगी बचाने में लगाना - सबसे बड़ा धर्म है।
गरुड़ पुराण कहता है - "परोपकाराय पुण्याय।"
परोपकार ही पुण्य है।
कई धर्माचार्यों ने स्पष्ट कहा है - अंग दान में कोई बाधा नहीं। आत्मा शरीर छोड़ देती है - जो बचता है वह मैटर है। उस मैटर से - किसी की ज़िंदगी बचे - इससे बड़ा पुण्य क्या।

यह आस्था के विरुद्ध नहीं -
यह आस्था का सबसे बड़ा प्रकटन है।

अंत में - महथौर, दरभंगा की मिट्टी से
नाना जी -
आपके जाने के बाद - मैंने यहां - उस मिट्टी में - हजारों साल की बुद्धिमत्ता देखी।

हर विधि में - एक तर्क।
हर मंत्र में - एक विज्ञान।
हर रीति में - एक मानवीय सत्य।

हम जिसे "अंधविश्वास" कहकर खारिज करते थे -वह दरअसल - पौराणिक विरासत है। जिसे हमारे पूर्वजों ने - हजारों वर्षों के अनुभव से - तैयार किया।

हां-समय के साथ -कुछ रीतियां खत्म हो गईं। कुछ में दिखावा आ गया। कुछ में शोषण घुस गया।
पर मूल में - वह बुद्धिमता ज्ञान अभी भी है।
जो रोना मैंने कल देखा - वह यथार्थ था।
जो दर्द था -वह असली था।
और वह परंपरा - जो हजारों साल से चली आ रही है - उसमें - बहुत कुछ वास्तविक है।

🙏

अंत - एक व्यक्तिगत सत्य

नाना जी के जाने के बाद -
मैंने महसूस किया:

हर परंपरा अंधविश्वास नहीं होती
या समाज का दबाव भी नहीं होता 

लेकिन मूल में -
यह परंपरा इंसान को टूटने से बचाती है।
✍️राहुल मिश्रा 
संदर्भ - https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=pfbid06wSHuJQU7ftHi3qLV84pUH77K1nvPmxUCykPAdXVQCPjeacuhW95jQRsiUA1mPual&id=100000573083171&mibextid=CDWPTG

वयं राष्ट्रे जागृयाम 

नौकरी वाले करणी माता खटून्दरा धाम, खंडेला ( सीकर )

नोकरी वाले करणी माता खटून्दरा धाम कहाँ है
• स्थान: राजस्थान के सीकर जिले में खंडेला क्षेत्र के खटून्दरा गाँव में स्थित है • नज़दीकी पहचान: ये मंदिर खाटू श्याम जी के पास ही पड़ता है - खाटू नगरी के पास खंडेला में। सीकर जिला मुख्यालय से लगभग 44 किलोमीटर दूर है। • मंदिर कैसा है: एक मंजिला छोटा मंदिर है, रोड पर स्थित है। प्रवेश के लिए 5-6 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। आस-पास पार्किंग की सुविधा है।   
मान्यता / क्यों प्रसिद्ध है
• “नौकरी दिलाने वाली माता”: इस मंदिर की सबसे बड़ी मान्यता ये है कि यहाँ बेरोजगार लोग सरकारी नौकरी की मन्नत लेकर आते हैं और मुराद पूरी होती है। • बायोडाटा चढ़ाते हैं: लड़के-लड़कियाँ मनचाही नौकरी के लिए माता के चरणों में बायोडाटा चढ़ाते हैं और प्रार्थना करते हैं। इंटरव्यू या प्रतियोगी परीक्षा में जाने से पहले यहाँ हाजिरी लगाते हैं। • नारियल बाँधने की परंपरा: भक्त लाल कपड़े में नारियल को कलावे से बाँधकर माता को अर्पित करते हैं। मान्यता है कि इससे मनोकामना पूरी होती है। • अमर रोटी का प्रसाद: यहाँ प्रसाद के रूप में लड्डू-बर्फी हलवै का प्रसाद चढता है कहा जाता है कि इंद्र कंवर बाईसा ने वरदान दिया था कि यहाँ शीश नवाने वाले को अमर रोटी प्राप्त होगी। • अमर वृक्ष: मंदिर के अंदर एक अमर वृक्ष है। मान्यता है कि इस पर मन्नत का नारियल बाँधने से इच्छा पूरी होती है। • पहला वेतन अर्पित करना: कई भक्तों की मन्नत पूरी होने पर वे अपनी पहली सैलरी से माता के मंदिर का निर्माण/सेवा करते हैं।   
इतिहास
• मंदिर करीब 300 साल पुराना है। • स्थापना संवत 1995, आसोज सुदी चौदस को इंद्र कंवर बाईसा के कर-कमलों से हुई थी। • ये मंदिर चारण समाज और देवी आवड़ माता से जुड़ा है। मंदिर में एक फरसा भी रखा है जिसकी पूजा होती है - मान्यता है कि आवड़ माता ने ये सांवलदासजीमहाराज को भेंट किया था।   
इसे खटुन्दरा माता के नाम से भी जाना जाता है और ये चारणजाती पालावतसमाज की कुलदेवी करणी माता को समर्पित है।  
नोट: ये मंदिर बीकानेर के देशनोक वाले प्रसिद्ध करणी माता मंदिर से अलग है। देशनोक वाला मंदिर "चूहा वाली देवी" के नाम से जाना जाता है। खटून्दरा वाला मंदिर खास तौर पर नौकरी की मन्नत के लिए प्रसिद्ध है


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नकारात्मक ऊर्जा एवं बंधन से छुटकारा पाने का एक बहुत ही प्रभावशाली इसे अवश्य ही संभालकर रखे।

एक बहुत ही प्रभावशाली उपाय बता रहा हूं। इसे अवश्य ही संभालकर रखे। 

अमावस्या के दिन आपको काला धागा लेना है। अब आपको अपने सिर की चोटी से लेकर पैर के अंगूठे तक उसे नाप लेना है। फिर उसका 3 गुना धागा ले ले। 

अब आपको एक नारियल को धागा लपेट लेना है। उस नारियल को रात को सोते समय अपने पास में रखकर सोना है। 

एक सप्ताह तक उसे नित्य ऐसे ही रात को लेकर सो जाए। 

इन सात दिन तक आपको दिन में नारियल को अपने दाहिने हाथ में रखकर नीचे दिए हुए मंत्र की 3 माला जप करना है। 

ॐ हूं फट हूं फट हूं फट बंधय बंधय स्वाहा। 

उसके बाद गाय के उपले के साथ आपको 8 वे दिन नारियल को जला देना है। जब तक नारियल जले तब तक जप करतें रहे। 

आपका कार्य हो गया। 

ये प्रयोग आपकी समस्त नकारात्मक ऊर्जा को खत्म कर देते है और बंध मार्ग और लक्ष्मी बंधन को खोल देता है। 


संदर्भ -https://www.facebook.com/share/1CZP4tdRz6/

संपर्क सूत्र। 
पूजा जी - 9111610710

श्री सीताराम विजयते 🚩 
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