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Friday, 1 May 2026

दैहिक लक्षण बताते हैं कि आप क्या बनेंगे।

दैहिक लक्षण बताते हैं कि आप क्या बनेंगे
• डॉ. श्रीकृष्ण "जुगनू"
ज्ञान और अनुभव के बीज लोक और जनजातीय स्मृतियों में मिलते हैं। वे ही संवाद में आकर जब रचनाकारों के हत्थे चढ़ते हैं तो रचनाबद्ध हो जाते हैं और अंत में शास्त्र बनते हैं। शास्त्र बनने की जानकारी लोक को प्राय: नहीं होती। लोकधारा में अनुभव सदा चक्रीयमान रहते हैं। शास्त्र के प्रमाण शास्त्रीय जन ही देखते और देते हैं जबकि लोक में संवाद में सहज प्रकट होते हैं। 

हमारे बीच कितनी गाथाएं और कथाएं हैं जिनमें नायिका को इकतीस और नायक को बत्तीस लक्षणों वाला बताया जाता है। वैदिक ध्यान में लक्षणों की व्यंजना मिलती है। लक्षण का मतलब चिह्न, पहचान, अमिट लांछन। मां और धाय जानती है कि शिशु कितने लक्षण पूर्व जन्म के लेकर जन्मा है! हाथ - पांव की रेखाएं ही नहीं, भुजा, हंसली, कंधा और जंघा आदि के तिल, उरद, कपोल कर्णपाली के अर्बुद, पिटक, मशक, सिर की भ्रमरी, केश का आवर्तन आदि के बारे में भी जाना और परस्पर बताया जाता है।

हम कितना जानते हैं? 
दुनियाभर की बातें करते हैं और जानने का दावा करते हैं लेकिन अपने लक्षणों के बारे में? वह सब मां जानती हैं और लाखीणा कह देती हैं। 

• वैदिक वाङ्मय में स्वरूप को भव, वैभव, धार्यता, धारणा और प्रदेय के रूप में कहा गया है। ( शतरुद्रिय, शतपथ., जैमिनीय. आदि)
• श्रीराम के शारीरिक लक्षण कौशल्या से जानकर नारद ने उजागर किए। ( वाल्मीकि रामायण)
• जनजातियों में लक्ष्मण को 32 लक्षणों वाला ( जोगी, तापस, तपी) मानकर रावण के वध के लिए योग्य बताया गया है। ( जनजातियों में रामकथा)
• मां ने ही लक्षण जानकर आंख से आंसू क्या गिराया, भरथरी को वैराग्य हो गया। ( राजा भरथरी)
• मां ने ही गोरक्ष के लक्षण प्रकट किए तो वह कभी घर नहीं लौटे, न समाधि ली! ( गांव गांव गोरख, नगर नगर नाथ)
• मुनि गर्ग ने जिन 32 लक्षणों को कहा, उन सबको सबने स्वीकार किया। ( राजमार्तंड : राजा भोज)
• पराशर ने 32 लक्षणों को सर्वांग मानकर कहा कि ऐसे लक्षणों से राज्य, मित्र, धन, पुत्र आदि मिलते हैं। (लक्षण प्रकाश)
• बृहस्पति ने दैहिक लक्षणों को दैव कहा और स्फूर्ध्वज, मीनराज, कल्याण वर्मा ने निरापद जीवन का परिचायक बताया। ( जातकी, बृहद्यवन जातक, यवन जातक, सारावली)

ये लक्षण क्या हैं? बत्तीस ही क्यों हैं? इनके आधार पर जीवन चर्या ( केरियर) को चुना जा सकता है। ये ही लक्षण बताते हैं कि पद पाकर भी दायित्व से विमुख होकर रुचि को अपनाया जा सकता है।
🎁
(आचार्य समुद्र ने इन लक्षणों पर ऐसा शास्त्र लिखा जिसको ग्रीक, मिस्र, यूनान, चीन तक ने महत्व दिया। इसका एक अज्ञात लेकिन प्रमाणिक पाठ मिला है... बस उसी पर काम करते करते कुछ याद आ गया! सामुद्रिक विंशति प्रकाशनाधीन )

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चित्र : 
भगवान बुद्ध के जन्म पर शारीरिक लक्षण के आधार पर भविष्य बताने की कथा में अनेक युगों की धारणाओं के बीज निहित है।
सृजन मित्रवर श्री ओमप्रकाश सोनी
✍️ श्री श्री कृष्ण जूगनू

Thursday, 30 April 2026

यह कहानी सीता माता कहती थी और श्रीराम इसे सुना करते थे..

यह कहानी सीता माता कहती थी और श्रीराम इसे सुना करते थे। एक दिन श्रीराम भगवान को किसी काम के लिए बाहर जाना पड़ गया तो सीता माता कहने लगी कि भगवान मेरा तो बारह वर्ष का नितनेम (नित्य नियम) है। अब आप बाहर जाएंगे तो मैं अपनी कहानी किसे सुनाऊंगी? श्रीराम ने कहा कि तुम कुएं की पाल पर जाकर बैठ जाना और वहां जो औरतें पानी भरने आएंगी उन्हें अपनी कहानी सुना देना। 

 
सीता माता कुएं की पाल पर जाकर बैठ जाती हैं। एक स्त्री आई उसने रेशम की जरी की साड़ी पहन रखी थी और सोने का घड़ा ले रखा था। सीता माता उसे देख कहती हैं कि बहन मेरा बारह वर्ष का नितनेम सुन लो। पर वह स्त्री बोली कि मैं तुम्हारा नितनेम सुनूंगीं तो मुझे घर जाने में देर हो जाएगी और मेरी सास मुझसे लड़ेगी। उसने कहानी नहीं सुनी और चली गई। उसकी रेशम जरी की साड़ी फट गई, सोने का घड़ा मिट्टी के घड़े में बदल गया।  
सास ने देखा तो पूछा कि ये किस का दोष अपने सिर लेकर आ गई है? बहू ने कहा कि कुएं पर एक औरत बैठी थी उसने कहानी सुनने के लिए कहा लेकिन मैने सुनी नही जिसका यह फल मिला। 
 
बहू की बात सुनकर अगले दिन वही साड़ी और घड़ा लेकर सास कुएं की पाल पर गई। सास को वहीं माता सीता बैठी मिलीं तो माता सीता ने कहा कि बहन मेरी कहानी सुन लीजिए... सास बोली कि एक बार छोड़, मैं तो चार बार कहानी सुन लूंगी... . 
 
राम आए लक्ष्मण आए देश के पुजारी आए 
 
नितनेम का नेम लाए आओ राम बैठो राम

 
तपी रसोई जियो राम, माखन मिसरी खाओ राम
 
दूध बताशा पियो राम,सूत के पलका मोठो राम
 
शाल दुशाला पोठो राम, शाल दुशाला ओढ़ो राम
 
जब बोलूं जब राम ही राम, राम संवारें सब के काम
 
खाली घर भंडार भरेंगे सब का बेड़ा पार करेंगे
 
श्री राम जय राम जय-जय राम
 
सास बोली कि बहन कहानी तो बहुत अच्छी लगी। कहानी सुनकर सास घर चली गई और उसकी साड़ी फिर से रेशम जरी की बन गई। मिट्टी का घड़ा फिर सोने के घड़े में बदल गया। बहू कहने लगी सासू मां, आपने ये सब कैसे किया? सास ने कहा कि बहू तू दोष लगा के आई थी और मैं अब दोष उतारकर आ रही हूं. . . बहू ने फिर पूछा कि वह कुएं वाली स्त्री कौन है? सास बोली कि वे सीता माता थीं... वे पुराने से नया कर देती हैं, खाली घर में भंडार भर देती हैं, वह लक्ष्मी जी का वास घर में कर देती हैं, आदमी की जो भी इच्छा हो उसे पूरा कर देती हैं.... बहू बोली कि ऎसी कहानी मुझे भी सुना दो.... सास बोली कि ठीक है तुम भी सुनो और सास ने कहानी शुरु की...  

 
राम आए लक्ष्मण आए देश के पुजारी आए 
 
नितनेम का नेम लाए आओ राम बैठो राम
 
तपी रसोई जियो राम, माखन मिसरी खाओ राम
 
दूध बताशा पियो राम,सूत के पलका मोठो राम
 
शाल दुशाला पोठो राम, शाल दुशाला ओढ़ो राम
 
जब बोलूं जब राम ही राम, राम संवारें सब के काम
 
खाली घर भंडार भरेंगे सब का बेड़ा पार करेंगे
 
श्री राम जय राम जय-जय राम

 
कहानी सुनकर बहू बोली कि कहानी तो बहुत अच्छी है.. .. सास ने कहा कि ठीक है इस कहानी को रोज कहा करेगें। अब सास-बहू रोज सवेरे उठती, नहाती-धोती और पूजा करने के बाद नितनेम की सीता की कहानी कहती। एक दिन उनके यहां एक पड़ोस की औरत आई और बोली कि बहन जरा सी आंच देना तो वह बोली कि आंच तो अभी हमने जलाई ही नहीं। पड़ोसन ने कहा कि तुम सुबह चार बजे से उठकर क्या कर रही हो फिर? उन्होंने कहा कि सुबह उठकर हम पूजा करते हैं फिर सीता माता की नितनेम की कहानी कहते हैं। 
 
पड़ोसन ने उनकी बात सुनकर फिर कहा कि सीता माता की कहानी कहने से तुम्हें क्या मिला? वे बोली कि इनकी कहानी कहने से घर में भंडार भर जाते हैं। सारे काम सिद्ध होते हैं, मन की इच्छा भी पूरी होती है। पड़ोसन कहती है कि बहन ऎसी कहानी तो मुझे भी सुना दो फिर। वह बोली कि ठीक है तुम भी यह कहानी सुन लो... 
 
राम आए लक्ष्मण आए देश के पुजारी आए 
 
नितनेम का नेम लाए आओ राम बैठो राम ……………..
 
सारी कहानी सुनने के बाद पड़ोसन कहने लगी बहन कहानी तो मुझे बहुत अच्छी लगी। अब वह पड़ोसन भी नितनेम सीता माता की कहानी कहने लगी। कहानी कहने से सीता माता ने पड़ोसन के भी भंडार भर दिए। अब तो पूरे मोहल्ले में नितनेम की कथा चल पड़ी.. हर किसी की मनोकामना पूरी होने लगी...

 हे सीता माता ! जैसे आपने उनके भंडार भरे, वैसे ही आप हमारे भी भंडार भरना। कहानी सुनने वाले के भी और कहानी कहने वाले के भी।
 
उत्तरप्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में आज भी यह कथा सीता जयंती पर चाव से सुनाई जाती है।

पितृ दोष

🌹(पितृ से मुक्ति कैसे संभव है)🌹 

हजारों यथार्थ सत्य दृष्टांतों में से आप लोगों को दो दृष्टांत बताने की कोशिश करता हूँ !

1 :- भगवान राम जब लंका पर जाने के लिए समुन्द्र (सागर ) से रास्ता मांग रहे थे, तब सागर ने रास्ता नही दिया!

तब रामचंद्र जी को क्रोध आया और समुन्द्र को सुखाने के लिए अपनी कमान से बाण निकाल लिया (बाण यहां प्रतीक है)

लेकिन उन्होंने कृत्या नामक महा शक्ति का आवाहन कर लिए संकल्प ले लिए समुद्र को सुखाने के लिए)

जैसे ही भगवान राम समुन्द्र पर कृत्या का प्रहार करने लगे सागर ( सगर ) समुन्द्र के रूप में श्रापित पड़े हुये थे, 
अनंत वर्षों से अचानक समुन्द्र में से प्रकट हो गये,
और कहने लगे हे राम तुम ये क्या कर रहे हो, क्या करने जा रहे हो,
मै तुम्हारे तात का भी तात हूँ सगर जो इस समुद्र के रूप में श्रापित पड़ा हुआ हूँ,
अगर ये कृत्या नामक की शक्ति का प्रहार समुन्द्र पर कर दिया तो अनंत जीव-जंतु नष्ट हो जायेगे पहले से ही तुम्हारा वंश श्रापित है,

कोई सागर के रूप में तो कोई पर्वत कोई नदी के रूप में इस धरती पर पड़े हुये है, औऱ अपनी मुक्ति के लिए तड़प रहे है,

हे राम तुम हमारी मुक्ति के लिए पित्रेष्ठि साधना अनुष्ठान करो, 
औऱ इस कृत्या नामक शक्ति को उत्तर की तरफ़ हिमालय में एक विशाल कुंड है,
जिसमे एक राक्षस रहता है, वो किसी भी जीव जंतु को जीवित नही छोड़ता है,
तुम इस संकल्प की दिशा मोड़ कर उस तालाब पर छोड़ दो , जिससे उस राक्षस का अंत हो जायेगा और जीव हत्या बंद हो जायेगी !

जो नेपाल उसी तालाब में बसा हुआ है !
हे राम तुम्हारी सेना में दो विचित्र शक्ति लिए हुये दो बालक है, वो किसी भी पत्थर को छुएंगे वह पत्थर पानी मे तैरना शुरू कर देंगे !
तब जाकर राम ने रामेश्वरम शिवलिंग की स्थापना कर अपने पितृ दोष मुक्ति के लिए साधना अनुष्ठान किया !

2 :- भगवान श्री कृष्ण के 47 वर्ष की अवस्था तक कोई भी संतान नही थी !
*रुक्मणि कहती है, हे प्रभु आप तो द्वारका धीश हो, त्रिलोकी नाथ हो, तीनों लोकों के स्वामी हो !
मुझे एक संतान दे दो , वर्ना ये संसार मुझे बाँझ की संज्ञा देगा, 
मै बिन संतान के ये शरीर नही छोड़ना चाहाती, 
वार्ना लोग मुझे कलंकित कर देंगे!

तब भगवान श्री कृष्ण कहते है, हे देवी में तीनों लोक तुम्हें दे सकता हूँ लेकिन संतान में तुम्हें नही दे सकता,
तब रुक्मणि कहती है प्रभु कोई तो उपाय होगा,
तब श्री कृष्ण और रुक्मणि अपने गुरु सांदीपनि ऋषि के आश्रम उज्जैन जाते है, 
(संदीपिनी ऋषि) कहते है, हे कृष्ण, तुम्हारे पितृ ही तुम्हे संतान प्रदान कर सकते है,
इसलिए तुम पितृ दोष निवारण औऱ आशीर्वाद प्राप्ति अनुष्ठान करो,

भगवान श्री कृष्ण ने अपने गुरु सांदीपन ऋषि के बताए अनुसार 3 दिवसीय पित्रेष्ठि साधना अनुष्ठान किया उसके बाद हि (प्रधुम्न) का जन्म हुआ !

सोचिए पितृ दोष ने जब भगवानों को भी नही छोड़ा तो सामान्य व्यक्ति की क्या विसाद, इसलिए हर व्यक्ति को सांदीपनि ऋषि प्रणीत पितृ दोष निवारण साधना करनी चाहिए?

संक्षिप्त शरभ पूजन

🌹संक्षिप्त शरभ पूजन🌹 -
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ॐ गुं गुरुभ्यो नमः 
ॐ श्री गणेशाय नमः 
ॐ श्री सांब सदाशिवाय नम: 
ॐ ह्रीं दूं दुर्गायै नमः
ॐ श्री शरभेश्वराय नम: 

फिर आचमनी या चमच से चार बार बाए हाथ से दाहिने हाथ पर पानी लेकर पिए 

ॐ आत्मतत्वाय स्वाहा 
ॐ विद्या तत्वाय स्वाहा 
ॐ शिव तत्वाय स्वाहा 
ॐ सर्व तत्वाय स्वाहा

उसके बाद गुरु मंडल का ध्यान कर पूजन के स्थान पर पुष्प अक्षत अर्पण करे 

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः 
ॐ श्री परम गुरुभ्यो नमः 
ॐ श्री पारमेष्ठी गुरुभ्यो नमः

गुरु मंत्र का कमसे कम 5 बार जाप करे 

उसके बाद अपने आसन का स्पर्श करे और पुष्प अक्षत अर्पण करे

ॐ पृथ्वीव्यै नमः

अब तीन बार सर से पाँव तक हाथ फेरे 

ॐ श्री शरभेश्वराय नमः आत्मानं रक्ष रक्ष

अब जल के पात्र को गंध लगाकर अक्षत पुष्प अर्पण करे

ॐ कलश मण्डलाय नमः

अब गणेशजी का ध्यान करे और पुष्प अक्षत अर्पण करे 

वक्रतुंड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ 
निर्विघ्नं कुरु में देव सर्व कार्येषु सर्वदा

ॐ श्री गणेशाय नमः का 11 या 21 बार जाप करे

अब भगवान शिव का ध्यान कर पुष्प अक्षत या बेल अर्पण करे 

ॐ नम: शंभवाय च मयोभवाय च 
नम: शंकराय च मयस्कराय च 
नम: शिवाय च शिवतराय च 

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात् 

ॐ नम: शिवाय का 5 या 11 बार जाप करे 

फिर भैरव जी का स्मरण करे और पुष्प अक्षत अर्पण करे 

ॐ भं भैरवाय नमः

अब शरभेश्वर का ध्यान करे 

शरभेश्वर ध्यान मंत्र :- 
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चंद्रार्काग्निस्त्रिदृष्टि: कुलिशवर नखश्चन्चलो अतिउग्रजिव्ह: ! 
काली दुर्गा च पक्षौ हृदय जठरगो भैरवो वाडवाग्नि : ! 
उरुस्थौ व्याधि मृत्यु शरभवरखगश्चंड वाताति वेग: ! 
संहर्ता सर्वशत्रून सजयति शरभ: शालुव: पक्षिराज: !!

( यहाँ पर आप भगवान शरभेश्वर के आवाहन हेतु शरभ हृदय स्तोत्र का
 श्रद्धापूर्वक पाठ कर सकते है ) 

आवाहन कर उनका पंचोपचार पूजन करे 

ॐ श्री शरभेश्वराय नम: गंधं समर्पयामि 

ॐ श्री शरभेश्वराय नम: पुष्पं समर्पयामि 

ॐ श्री शरभेश्वराय नम: धूपं समर्पयामि 

ॐ श्री शरभेश्वराय नम: दीपं समर्पयामि 

ॐ श्री शरभेश्वराय नम: नैवेद्यं समर्पयामि

अब भगवान शरभेश्वर के लिये पुष्प अक्षत या बेल अर्पण करते जाये .. 

 ॐ नमो भगवते महाशिवाय पक्षिराजाय शरभेश्वराय हुं फट स्वाहा 

ॐ पक्षीराजाय नम: 
ॐ आकाशभैरवाय नम: 
ॐ शालुवेषाय नम: 
ॐ अष्टपादाय नम: 
ॐ आशुगरुडाय नम: 
ॐ महाशिवाय नम: 
ॐ शरभेश्वराय नम: 

अब भगवान शरभ के स्तोत्र का पाठ करे 

शरभ अष्टक स्तोत्र 

देवादिदेवाय जगन्मयाय शिवाय नालिक निभाननाय !
शर्वाय भीमाय शराधिपाय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!१!! 

हराय भीमाय हरिप्रियाय भवाय शांताय परात्पराय ! 
मृडाय रुद्राय त्रिलोचनाय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!२!! 

शीतांशुचूडाय दिगंबराय सृष्टिस्थितीध्वंसन कारणाय !
जटाकलापाय जितेंद्रियाय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!3!! 

कलंककंठाय भवांतकाय कपालशूलात्त करांबुजाय !
भुजंगभूषाय पुरांतकाय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!4!! 

शमादिषटकाय यमांतकाय यमादियोगाष्टक सिद्धिदाय ! 
उमाधिनाथाय पुरातनाय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!5!! 

घृणादिपाशाष्टक वर्जिताय खिलीकृतास्मत्पथिपूर्वगाय ! 
गुणादिहिनाय गुणत्रयाय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!6!! 

कालायवेदामृत कंदलाय कल्याणकौतुहल कारणाय ! 
स्थूलाय सूक्ष्माय स्वरुपगाय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!7!! 

पंचाननायनिलभास्कराय पंचाशदावर्णाद्य पराक्षराय ! 
पंचाक्षरेशाय जगद्धिताय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !! ८!!

नीलकंठाय रुद्राय शिवाय शशिमौलिने ! 
भवाय भवनाशाय पक्षिराजाय ते नम: !! 

परात्पराय घोराय शंभवे परमात्मने !
शर्वाय निर्मलांगाय सालुवाय नमो नम: !! 

गंगाधराय सांबाय परमानंद तेजसे ! 
सर्वेश्वराय शांताय शरभाय नमो नम: !! 

वरदाय वरांगाय वामदेवाय शूलिने ! 
गिरीशाय गिरीशाय गिरिजापतये नम: !! 

सर्वेश सर्वाधिक शांतमूर्ते कृतापराधान मरानथान्यान ! 
विनिय विश्व विधायिनिते नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!

अब भगवान शरभेश्वर को अर्घ्य दे 

ॐ पक्षिराजाय विद्महे आकाशभैरवाय धीमहि तन्नो शरभ: प्रचोदयात् 

ॐ शालुवेषाय विद्महे पक्षिराजाय धीमहि तन्नो शरभ: प्रचोदयात्

यहाँ पर आप चाहे तो भगवान शरभेश्वर के अष्टोत्तर शत नामावली(108 नाम ) के एकेक नाम को पढते हुते पुष्प अक्षत या बेल अर्पण कर सकते है  

अब नीचे दिये हुये शरभ माला मंत्र को पढकर पुष्पांजली प्रदान करे 

शरभ माला मंत्र

ॐ नम: पक्षिराजाय निशि कुलिश वर दंष्ट्रा नखायानेक कोटि ब्रह्म कपाल मालालंकृताय सकल कुल महानागभूषणाय सर्वभूतनिवारणाय नृसिंहगर्व निर्वापण कारणाय सकलरिपु रंभाटवी विमोटन महानिलाय शरभ सालुवाय ह्रां ह्रीं ह्रूं प्रवेशय प्रवेशय रोग ग्रहं बंधय बंधय बालग्रहं बंधय बंधय आवेशय आवेशय भाषय भाषय मोहय मोहय कंपय कंपय बंधय बंधय भूतग्रहं बंधय रोगग्रहं बंधय यक्षग्रहं बंधय पातालग्रहं बंधय चातुर्थग्रहं बंधय भीमग्रहं बंधय अपस्मारग्रहं बंधय उन्मत्तग्रहं बंधय राक्षसग्रहं बंधय ग्रहं बंधय ज्वालामुख ग्रहं बंधय तमोहार ग्रहं बंधय भूचरग्रहं बंधय खेचरग्रहं बंधय वेतालग्रहं बंधय कूष्मांडग्रहं बंधय स्त्रीग्रहं बंधय पापग्रहं बंधय विक्रमग्रहं बंधय व्युत्क्रमग्रहं बंधय प्रेतग्रहं बंधय पिशाचग्रहं बंधय आवेशग्रहं बंधय अनावेश ग्रहं बंधय सर्वग्रहान मर्दय सर्वग्रहान त्रोटय त्रोटय प्रैं त्रैं हैं मारय शीघ्रं मारय मुंच मुंच दह दह पच पच नाशय नाशय सर्वदुष्टान नाशय ह्रूं फट स्वाहा !! 

फिर एक आचमनी जल अर्पण करे 

अनेन पूजनेन श्री शरभेश्वर देवता प्रीयतां मम .. ॐ तत्सत ..

माता मातंगी साधना विधि (31 दिन, 21 माला प्रतिदिन)

माता मातंगी साधना विधि (31 दिन, 21 माला प्रतिदिन)
लेखक: रामकली शास्त्री

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माता मातंगी, दशमहाविद्याओं में नवम स्वरूप, तंत्र और ज्ञान की अत्यंत गूढ़ एवं रहस्यमयी देवी मानी जाती हैं। ये वाणी, संगीत, कला, आकर्षण और राजसी प्रभाव की अधिष्ठात्री हैं। जो साधक उनकी सच्ची निष्ठा से उपासना करता है, उसकी वाणी में सम्मोहन, व्यक्तित्व में तेज और जीवन में अप्रतिम सफलता का संचार होता है।

यह साधना विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत प्रभावशाली है जो कला, राजनीति, वाणी, नेतृत्व या आकर्षण शक्ति को बढ़ाना चाहते हैं।

नीचे 31 दिनों की संपूर्ण साधना विधि दी जा रही है, जिसमें प्रतिदिन 21 माला जप करना अनिवार्य है।

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🕉️ साधना का संकल्प

साधना आरंभ करने से पहले शुद्ध मन और स्पष्ट उद्देश्य होना आवश्यक है।
पहले दिन स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।

अपने दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प लें:
“मैं (अपना नाम), माता मातंगी की कृपा प्राप्ति हेतु 31 दिनों तक प्रतिदिन 21 माला जप करूँगा/करूँगी।”

जल को भूमि पर छोड़ दें।

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🪔 आवश्यक सामग्री

- हरे या काले रंग का आसन
- माता मातंगी की तस्वीर या यंत्र
- रुद्राक्ष या हकीक की माला
- दीपक (घी या सरसों का तेल)
- अगरबत्ती या धूप
- पुष्प (विशेषतः हरे या पीले)
- नैवेद्य (मिठाई या फल)
- ताम्बूल (पान) – विशेष तांत्रिक साधना में उपयोगी

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🔱 साधना का समय

- ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4–6 बजे) सर्वोत्तम
- या रात्रि 10 बजे के बाद (तांत्रिक प्रभाव के लिए अधिक शक्तिशाली)

एक ही समय का पालन पूरे 31 दिन करना अत्यंत आवश्यक है।

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🧘 आसन एवं दिशा

- हरे या काले आसन पर बैठें
- रीढ़ सीधी रखें
- ध्यान स्थिर रखें
- उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख रखें

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🔥 पूजन विधि

1. दीपक जलाएं 🪔
2. धूप अर्पित करें
3. माता मातंगी का ध्यान करें

ध्यान मंत्र:
“श्यामा वर्णा, त्रिनेत्रा, वीणा वादिनी, वरद मुद्रा धारण किए हुए माता मातंगी का मैं ध्यान करता हूँ।”

4. पुष्प अर्पित करें 🌸
5. नैवेद्य अर्पित करें 🍎

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📿 मुख्य मंत्र जप

आपको प्रतिदिन 21 माला जप करना है।

मूल मंत्र:
“ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा”

या सरल साधना के लिए:
“ॐ ह्रीं मातंग्यै नमः”

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⚠️ जप के नियम

- प्रत्येक माला में 108 मंत्र जप करें
- कुल 21 माला = 2268 मंत्र प्रतिदिन
- माला को कपड़े से ढककर जप करें
- जप के दौरान किसी से बात न करें
- मन भटके तो पुनः मंत्र पर ध्यान लाएं

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🌿 31 दिनों का अनुशासन

यह साधना अनुशासन आधारित है। नीचे दिए गए नियमों का पालन अनिवार्य है:

🚫 क्या न करें:

- झूठ बोलना
- नकारात्मक सोच
- क्रोध और अपशब्द
- मांस, शराब, तामसिक भोजन

✅ क्या करें:

- सात्विक भोजन 🥗
- ब्रह्मचर्य का पालन
- मौन या कम बोलना
- प्रतिदिन स्नान और स्वच्छता

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🌙 विशेष निर्देश (तांत्रिक प्रभाव हेतु)

- रात्रि साधना अधिक प्रभावी होती है
- यदि संभव हो तो एकांत स्थान चुनें
- 11वें, 21वें और 31वें दिन विशेष ध्यान करें

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🔮 साधना के अनुभव

यदि साधना सही ढंग से की जाए, तो निम्न अनुभव हो सकते हैं:

- वाणी में आकर्षण बढ़ना 🎤
- लोगों पर प्रभाव बढ़ना
- अचानक अवसर मिलना
- कला और रचनात्मकता में वृद्धि 🎨
- स्वप्न में संकेत मिलना

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💫 सिद्धि के संकेत

31 दिनों के अंत में यदि आपको निम्न संकेत मिलते हैं, तो समझिए साधना सफल हो रही है:

- आत्मविश्वास में वृद्धि
- लोगों का आपकी ओर आकर्षित होना
- शब्दों में शक्ति आना
- मानसिक स्पष्टता

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🛑 साधना के दौरान सावधानियां

- किसी को अपनी साधना के बारे में न बताएं
- बीच में साधना न छोड़ें
- यदि किसी दिन जप छूट जाए, तो अगले दिन पूर्ति करें
- मानसिक शुद्धता बनाए रखें

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🌺 31वें दिन की पूर्णाहुति

अंतिम दिन विशेष पूजन करें:

- 108 बार हवन करें (यदि संभव हो) 🔥
- ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराएं 🍛
- माता को धन्यवाद दें

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🧿 साधना का गुप्त तत्व

माता मातंगी की साधना केवल मंत्र जप नहीं है, यह वाणी, विचार और ऊर्जा को नियंत्रित करने की प्रक्रिया है।

यदि आप अपने शब्दों को नियंत्रित कर लेते हैं, तो आप अपने भाग्य को नियंत्रित कर सकते हैं।

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✨ निष्कर्ष

यह साधना अत्यंत शक्तिशाली है, लेकिन उतनी ही संवेदनशील भी।
इसे केवल गंभीर साधक ही करें।

माता मातंगी की कृपा से:

- वाणी सिद्ध होती है
- आकर्षण बढ़ता है
- धन और यश प्राप्त होता है

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जय माता मातंगी 🙏

— रामकली शास्त्री

जनेऊ पहनते के क्या है लाभ, और क्यों पहनते हैं ?

जनेऊ पहनते के क्या है लाभ, और क्यों पहनते हैं
ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम अर्थात ब्राह्मण ब्रह्म ,ईश्वर, तेज से युक्‍त हो।
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। उपनयन' का अर्थ है, 'पास या सन्निकट ले जाना।' किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। हिन्दू समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। कालांतर में इस संस्कार को दूसरे धर्मों में धर्मांतरित करने के लिए उपयोग किया जाने लगा। हिन्दू धर्म में प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। हर हिन्दू जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।
क्यों पहनते हैं जनेऊ : हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों में से एक 'उपनयन संस्कार' के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे यज्ञोपवीत संस्कार' भी कहा जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। प्राचीनकाल में पहले शिष्य, संत और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। इस दीक्षा देने के तरीके में से एक जनेऊ धारण करना भी होता था। प्राचीनकाल में गुरुकुल में दीक्षा लेने या संन्यस्त होने के पूर्व यह संकार होता था।
यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध भी कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है।
दीक्षा देना : दीक्षा देने का प्रचलन वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ किया था। प्राचीनकाल में पहले शिष्य और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। माता-पिता अपने बच्चों को जब शिक्षा के लिए भेजते थे तब भी दीक्षा दी जाती थी। हिन्दू धर्मानुसार दिशाहीन जीवन को दिशा देना ही दीक्षा है। दीक्षा एक शपथ, एक अनुबंध और एक संकल्प है। दीक्षा के बाद व्यक्ति द्विज बन जाता है। द्विज का अर्थ दूसरा जन्म। दूसरा व्यक्तित्व।
अन्य धर्मों में यह संस्कार : हिन्दू धर्म से प्रेरित यह उपनयन संस्कार सभी धर्मों में मिल जाएगा। यह दीक्षा देने की परंपरा प्राचीनकाल से रही है, हालांकि कालांतर में दूसरे धर्मों में दीक्षा को अपने धर्म में धर्मांतरित करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। इस आर्य संस्कार को सभी धर्मों में किसी न किसी कारणवश भिन्न-भिन्न रूप में अपनाया जाता रहा है। मक्का में काबा की परिक्रमा से पूर्व यह संस्कार किया जाता है।
सारनाथ की अति प्राचीन बुद्ध की प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है। जैन धर्म में भी इस संस्कार को किया जाता है। वित्र मेखला अधोवसन (लुंगी) का सम्बन्ध पारसियों से भी है। सिख धर्म में इसे अमृत संचार कहते हैं। बौद्ध धर्म से इस परंपरा को ईसाई धर्म ने अपनाया जिसे वे बपस्तिमा कहते हैं। यहूदी और इस्लाम धर्म में खतना करके दीक्षा दी जाती है।
जनेऊ पहनने के 9 लाभ
जनेऊ को हर उस हिन्दू को धारण करना चाहिए जो मांस और शराब को छोड़कर सादगीपूर्ण जीवन यापन करना चाहता है। हम यहां जनेऊ पहनने के आपको लाभ बता रहे हैं। जनेऊ के नियमों का पालन करके आप निरोगी जीवन जी सकते हैं।
1.जीवाणुओं-कीटाणुओं से बचाव : जो लोग जनेऊ पहनते हैं और इससे जुड़े नियमों का पालन करते हैं, वे मल-मूत्र त्याग करते वक्त अपना मुंह बंद रखते हैं। इसकी आदत पड़ जाने के बाद लोग बड़ी आसानी से गंदे स्थानों पर पाए जाने वाले जीवाणुओं और कीटाणुओं के प्रकोप से बच जाते हैं।
2.गुर्दे की सुरक्षा : यह नियम है कि बैठकर ही जलपान करना चाहिए अर्थात खड़े रहकर पानी नहीं पीना चाहिए। इसी नियम के तहत बैठकर ही मूत्र त्याग करना चाहिए। उक्त दोनों नियमों का पालन करने से किडनी पर प्रेशर नहीं पड़ता। जनेऊ धारण करने से यह दोनों ही नियम अनिवार्य हो जाते हैं।
3.हृदय रोग व ब्लडप्रेशर से बचाव : शोधानुसार मेडिकल साइंस ने भी यह पाया है कि जनेऊ पहनने वालों को हृदय रोग और ब्लडप्रेशर की आशंका अन्य लोगों के मुकाबले कम होती है। जनेऊ शरीर में खून के प्रवाह को भी कंट्रोल करने में मददगार होता है। ‍चिकित्सकों अनुसार यह जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।
4.लकवे से बचाव : जनेऊ धारण करने वाला आदमी को लकवे मारने की संभावना कम हो जाती है क्योंकि आदमी को बताया गया है कि जनेऊ धारण करने वाले को लघुशंका करते समय दांत पर दांत बैठा कर रहना चाहिए। मल मूत्र त्याग करते समय दांत पर दांत बैठाकर रहने से आदमी को लकवा नहीं मारता।
5.कब्ज से बचाव : जनेऊ को कान के ऊपर कसकर लपेटने का नियम है। ऐसा करने से कान के पास से गुजरने वाली उन नसों पर भी दबाव पड़ता है, जिनका संबंध सीधे आंतों से है। इन नसों पर दबाव पड़ने से कब्ज की श‍िकायत नहीं होती है। पेट साफ होने पर शरीर और मन, दोनों ही सेहतमंद रहते हैं।
6.शुक्राणुओं की रक्षा : दाएं कान के पास से वे नसें भी गुजरती हैं, जिसका संबंध अंडकोष और गुप्तेंद्रियों से होता है। मूत्र त्याग के वक्त दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से वे नसें दब जाती हैं, जिनसे वीर्य निकलता है। ऐसे में जाने-अनजाने शुक्राणुओं की रक्षा होती है। इससे इंसान के बल और तेज में वृद्ध‍ि होती है।
7.स्मरण शक्ति‍ की रक्षा : कान पर हर रोज जनेऊ रखने और कसने से स्मरण शक्त‍ि का क्षय नहीं होता है। इससे स्मृति कोष बढ़ता रहता है। कान पर दबाव पड़ने से दिमाग की वे नसें एक्ट‍िव हो जाती हैं, जिनका संबंध स्मरण शक्त‍ि से होता है। दरअसल, गलतियां करने पर बच्चों के कान पकड़ने या ऐंठने के पीछे भी मूल कारण यही होता था।
8.आचरण की शुद्धता से बढ़ता मानसिक बल : कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है। पवित्रता का अहसास होने से आचरण शुद्ध होने लगते हैं। आचरण की शुद्धत से मानसिक बल बढ़ता है।
9.बुरी आत्माओं से रक्षा : ऐसी मान्यता है कि जनेऊ पहनने वालों के पास बुरी आत्माएं नहीं फटकती हैं। इसका कारण यह है कि जनेऊ धारण करने वाला खुद पवित्र आत्मरूप बन जाता है और उसमें स्वत: ही आध्यात्म‍िक ऊर्जा का विकास होता है।
अलगे पन्ने पर कान में ही क्यों लपेटते हैं जनेऊ
क्यों कान पर लपेटते हैं जनेऊं : मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसें, जिनका संबंध पेट की आंतों से होता है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है, जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय के रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते।
कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है। कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है। जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है। इसी कारण जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है। वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।
माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।
विद्यालयों में बच्चों के कान खींचने के मूल में एक यह भी तथ्य छिपा हुआ है कि उससे कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है। इसलिए भी यज्ञोपवीत को दायें कान पर धारण करने का उद्देश्य बताया गया है।
जनेऊ का धार्मिक महत्व : यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है। जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है।
धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि जनेऊ धारण करने से शरीर शुद्घ और पवित्र होता है। शास्त्रों अनुसार आदित्य, वसु, रुद्र, वायु, अग्नि, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में माना गया है। अत: उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। आचमन अर्थात मंदिर आदि में जाने से पूर्व या पूजा करने के पूर्व जल से पवित्र होने की क्रिया को आचमन कहते हैं। इस्लाम धर्म में इसे वजू कहते हैं।
द्विज : स्वार्थ की संकीर्णता से निकलकर परमार्थ की महानता में प्रवेश करने को, पशुता को त्याग कर मनुष्यता ग्रहण करने को दूसरा जन्म कहते हैं। शरीर जन्म माता-पिता के रज-वीर्य से वैसा ही होता है, जैसा अन्य जीवों का। आदर्शवादी जीवन लक्ष्य अपना लेने की प्रतिज्ञा करना ही वास्तविक मनुष्य जन्म में प्रवेश करना है। इसी को द्विजत्व कहते हैं। द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म।
सामाजिक महत्व : आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है। धारण करने के बाद उसे बताता है कि उसे दो लोगों का भार या जिम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का। अब एक-एक जनेऊ में 9-9 धागे होते हैं जो हमें बताते हैं कि हम पर पत्नी और पत्नी पक्ष के 9-9 ग्रहों का भार ये ऋण है उसे वहन करना है। अब इन 9-9 धागों के अंदर से 1-1 धागे निकालकर देखें तो इसमें 27-27 धागे होते हैं। अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के 27-27 नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है। अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो 27+9 = 36 होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर 36= 3+6 = 9 आता है, जो एक पूर्ण अंक है। अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 2 और जोड़ दें तो 9+2= 11 होगा जो हमें बताता है की हमारा जीवन अकेले अकेले दो लोगों अर्थात् पति और पत्नी (1 और 1) के मिलने से बना है। 1+1 = 2 होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है। जब हम अपने दोनों पक्षों का ऋण वहन कर लेते हैं तो हमें अशीम शांति की प्राप्ति हो जाती है।
यज्ञोपवीत धारण करने के नियम
यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता। मैला होने पर उतारने के बाद तुरंत ही दूसरा जनेऊ धारण करना पड़ता है।
लड़की भी पहन सकती है जनेऊ : वह लड़की जिसे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।
कब पहने जनेऊ : जिस दिन गर्भ धारण किया हो उसके आठवें वर्ष में बालक का उपनयन संस्कार किया जाता है। जनेऊ पहनने के बाद ही विद्यारंभ होता है, लेकिन आजकल गुरु परंपरा के समाप्त होने के बाद अधिकतर लोग जनेऊ नहीं पहनते हैं तो उनको विवाह के पूर्व जनेऊ पहनाई जाती है। लेकिन वह सिर्फ रस्म अदायिगी से ज्यादा कुछ नहीं, क्योंकि वे जनेऊ का महत्व नहीं समझते हैं।
यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत।।
अर्थात : अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है। हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके ही इसे उतारें।
किसी भी धार्मिक कार्य, पूजा-पाठ, यज्ञ आदि करने के पूर्व जनेऊ धारण करना जरूरी है।
विवाह तब तक नहीं होता जब तक की जनेऊ धारण नहीं किया जाता है।
जब भी मूत्र या शौच विसर्जन करते वक्त जनेऊ धारण किया जाता है।
यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।
यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।
जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी यज्ञोपवीत संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।
यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।
देव प्रतिमा की मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।
अंत में जानिए आखिर जनेऊ क्या है, कैसे बनती और धारण करते हैं
जनेऊ क्या है : आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।
तीन सूत्र क्यों : जनेऊ में मुख्‍यरूप से तीन धागे होते हैं। प्रथम यह तीन सूत्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। द्वितीय यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और तृतीय यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है। चतुर्थ यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है। पंचम यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।
नौ तार : यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं। हम मुख से अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से अच्छा सुने।
पांच गांठ : यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है।
जनेऊ की लंबाई : यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि।
जनेऊ धारण वस्त्र : जनेऊ धारण करते वक्त बालक के हाथ में एक दंड होता है। वह बगैर सिला एक ही वस्त्र पहनता है। गले में पीले रंग का दुपट्टा होता है। मुंडन करके उसके शिखा रखी जाती है। पैर में खड़ाऊ होती है। मेखला और कोपीन पहनी जाती है।
मेखला, कोपीन, दंड : मेखला और कोपीन संयुक्त रूप से दी जाती है। कमर में बांधने योग्य नाड़े जैसे सूत्र को मेखला कहते हैं। मेखला को मुंज और करधनी भी कहते हैं। कपड़े की सिली हुई सूत की डोरी, कलावे के लम्बे टुकड़े से मेखला बनती है। कोपीन लगभग 4 इंच चौड़ी डेढ़ फुट लम्बी लंगोटी होती है। इसे मेखला के साथ टांक कर भी रखा जा सकता है। दंड के लिए लाठी या ब्रह्म दंड जैसा रोल भी रखा जा सकता है। यज्ञोपवीत को पीले रंग में रंगकर रखा जाता है।
जनेऊ धारण : बगैर सिले वस्त्र पहनकर, हाथ में एक दंड लेकर, कोपीन और पीला दुपट्टा पहनकर विधि-विधान से जनेऊ धारण की जाती है। जनेऊ धारण करने के लिए एक यज्ञ होता है, जिसमें जनेऊ धारण करने वाला लड़का अपने संपूर्ण परिवार के साथ भाग लेता है। यज्ञ द्वारा संस्कार किए गए विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है।
गायत्री मंत्र : यज्ञोपवीत गायत्री मंत्र से शुरू होता है। गायत्री- उपवीत का सम्मिलन ही द्विजत्व है। यज्ञोपवीत में तीन तार हैं, गायत्री में तीन चरण हैं। ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ प्रथम चरण, ‘भर्गोदेवस्य धीमहि’ द्वितीय चरण, ‘धियो यो न: प्रचोदयात्’ तृतीय चरण है। गायत्री महामंत्र की प्रतिमा- यज्ञोपवीत, जिसमें 9 शब्द, तीन चरण, सहित तीन व्याहृतियां समाहित हैं।
यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।
आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।
ऐसे करते हैं संस्कार : यज्ञोपवित संस्कार प्रारम्भ करने के पूर्व बालक का मुंडन करवाया जाता है। उपनयन संस्कार के मुहूर्त के दिन लड़के को स्नान करवाकर उसके सिर और शरीर पर चंदन केसर का लेप करते हैं और जनेऊ पहनाकर ब्रह्मचारी बनाते हैं। फिर होम करते हैं। फिर विधिपूर्वक गणेशादि देवताओं का पूजन, यज्ञवेदी एवं बालक को अधोवस्त्र के साथ माला पहनाकर बैठाया जाता है। फिर दस बार गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करके देवताओं के आह्‍वान के साथ उससे शास्त्र शिक्षा और व्रतों के पालन का वचन लिया जाता है।
फिर उसकी उम्र के बच्चों के साथ बैठाकर चूरमा खिलाते हैं फिर स्नान कराकर उस वक्त गुरु, पिता या बड़ा भाई गायत्री मंत्र सुनाकर कहता है कि आज से तू अब ब्राह्मण हुआ अर्थात ब्रह्म ,,सिर्फ ईश्वर को मानने वाला,, को माने वाला हुआ।
इसके बाद मृगचर्म ओढ़कर मुंज (मेखला) का कंदोरा बांधते हैं और एक दंड हाथ में दे देते हैं। तत्पश्चात्‌ वह बालक उपस्थित लोगों से भीक्षा मांगता है। शाम को खाना खाने के पश्चात्‌ दंड को साथ कंधे पर रखकर घर से भागता है और कहता है कि मैं पढ़ने के लिए काशी जाता हूं। बाद में कुछ लोग शादी का लालच देकर पकड़ लाते हैं। तत्पश्चात वह लड़का ब्राह्मण मान लिया जाता है।
जनेऊ संस्कार का समय : माघ से लेकर छ: मास उपनयन के लिए उपयुक्त हैं। प्रथम, चौथी, सातवीं, आठवीं, नवीं, तेरहवीं, चौदहवीं, पूर्णमासी एवं अमावस की तिथियां बहुधा छोड़ दी जाती हैं। सप्ताह में बुध, बृहस्पति एवं शुक्र सर्वोत्तम दिन हैं, रविवार मध्यम तथा सोमवार बहुत कम योग्य है। किन्तु मंगल एवं शनिवार निषिद्ध माने जाते हैं।
मुहूर्त : नक्षत्रों में हस्त, चित्रा, स्वाति, पुष्य, घनिष्ठा, अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, श्रवण एवं रवती अच्छे माने जाते हैं। एक नियम यह है कि भरणी, कृत्तिका, मघा, विशाखा, ज्येष्ठा, शततारका को छोड़कर सभी अन्य नक्षत्र सबके लिए अच्छे हैं।
पुनश्च: : पूर्वाषाढ, अश्विनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, ज्येष्ठा, पूर्वाफाल्गुनी, मृगशिरा, पुष्य, रेवती और तीनों उत्तरा नक्षत्र द्वितीया, तृतीया, पंचमी, दसमी, एकादसी, तथा द्वादसी तिथियां, रवि, शुक्र, गुरु और सोमवार दिन, शुक्ल पक्ष, सिंह, धनु, वृष, कन्या और मिथुन राशियां उत्तरायण में सूर्य के समय में उपनयन यानी यज्ञोपवीत यानी जनेऊ संस्कार शुभ होता है।
जनेऊ धारण के नियम
मल-मूत्र विसर्जन के दौरान जनेऊ को दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका मूल भाव यह है कि जनेऊ कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। यह बेहद जरूरी होता है।
अगर जनेऊ का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।
घर में जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी जनेऊ संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।
जनेऊ शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।
बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत संस्कार करना चाहिए।
जनेऊ का वैज्ञानिक महत्व
1. बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से ऐसे स्वप्न नहीं आते।
जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।
जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति सफाई नियमों में बंधा होता है। वयह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है।
4. जनेऊ को दायें कान पर धारण करने से कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है।
दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।
कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।
कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।
जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह रेखा नियंत्रित रहती है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।🌹🌹🌹 जय श्री राम🌹🌹🌹

                   🙏 हे महादेव ॥🙏

प्रेत-पितृ-तंत्रबाधा से मुक्ति

🌹प्रेत-पितृ-तंत्रबाधा से मुक्ति🌹
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   कुटुंब कलेश , आर्थिक तंगी , अविवाहित या दुखी दाम्पत्य जीवन , निःसंतान या बेरोजगार , भूत प्रेत की सवारी आना या किसीने ईर्ष्या भाव या वैरभाव से करवाई तांत्रिक क्रिया .. इन सब कारणों से अनेक परिवार पायमाल हो रहे है । अपनी समस्याओ से मुक्ति केलिए अनेक प्रकार के विधान पूजा करवाते है । पर कोई उपाय नही सूझते , कोई परिणाम नही पाते ओर सब व्यर्थ हो जाता है । 

   किसीने पूछा था कि हमारे पितृ जो हमारे पूर्वज है वो क्यों नुकसान करेंगे ? पहले ये प्रेत ओर पितृ का फर्क समझना होगा। पहले के लोग आसुरी वृतियो से दूर रहकर घर , परिवार , कुटुंब , गांव का भला हो ऐसे सद्भाव विचार वाले थे । उनके जीव की किसी कारणवश गति नही हुई तो वो पितृलोक को प्राप्त होते थे । पितृ बनने के बाद भी वो हमेशा घर परिवार गांव का भला ही करते थे। केयुकी जो वृति जीवंत शरीर के साथ थी बादमे भी वही रहती है। और जो काम क्रोध , कपट , प्रपंच , ईर्ष्या , अहंकार जैसी आसुरी वृति के साथ मृत्यु को प्राप्त करते है हो वो प्रेतयोनि को प्राप्त होते है। अब सोचिए कि आजकल ज्यादातर लोग किस वृति के है ? वो मृत्यु के बाद किस योनि को प्राप्त करेंगे ? वो आप केलिए पितृ है पर मूल रूप तो प्रेत ही है । 

" जो दया करे वो देव और दमन करे वो प्रेत " 

  10 साल से बड़ी हरेक कन्या ओर स्त्रियां मस्तिष्क को ढंक के रखते थे । मासिकधर्म के समय और अमावस्या या ग्रहण जैसे कालमे ओर सूर्यास्त के बाद घर से बाहर नही जाते थे । आजके आधुनिक युग्म खुल्ले बाल , पहेरवेश ओर लावण्य दिखाते हुवे सब बाहर घूमते है । तो लोग बुरी दृष्टि से देखते है और मौका मिले तो पकड़के बलात्कार करते है ऐसे किस्से आएदिन सुनते है । ऐसी स्थितिमे आसुरी वृति की प्रेत शक्तियां भी साथमे हो जाती है और उनके साथ ही घरमे प्रवेश कर लेती है । 

  पहले के समयमे ऋषिमुनियों ने गोत्र मुजब आपके देहमे जो स्थित है वो ऊर्जा शक्तिओ को ही कुलदेवी , इष्टदेव,गोत्रीज देव स्वरूप स्थापित करवाया था और सतयुग से आजतक उनकी उपासना होती थी और उनका रक्षा कवच था तो परिवार की हर आसुरी शक्तिओ से रक्षा होती थी । कलियुग व्याप्त होते ही अनेक तर्कटि सम्प्रदाय आये । लोगो पर हावी रहने केलिए भव्य मंदिरों , भ्रमजाल की ऐसी भाषा की बुद्धिजीवी लोग भी भ्रमित होकर अपनी मूल परंपराओं का त्याग करके ऐसे जुठे सम्प्रदाय ओर उनके धर्माचार्यो के दीवाने बन गए । रक्षा कवच हट गया और आसुरी शक्तिओ को घरमे प्रवेश मिल गया। जिस सम्प्रदाय ओर उनके महापुरुषों को भगवान का दरज्जा दे रहे हो कभी कोई भूत , प्रेत बाधा का कार्य करने कहिए ओर देखिए वो कितने बड़े महापुरुष है । 

   ऐसा लिखना तो अच्छा नही लगता पर कही लोगो को देखकर जो अनुभूत हुवा की अनेक परिवार मूल ऋषि गोत्र से नही है पर ऐसी आसुरी शक्तिओ से चले वंश है । अब इनकेलिये कौन कुलदेवी ओर कौन इष्टदेव कैसे तय करे और उनको क्या मार्ग दिखाए ? 

   ऐसे तो आसुरी शक्तिओ ओर तंत्रबाधा से मुक्ति केलिए उग्र देवी देवताओं की उपासना के अनेक विधान है । दुर्गा माता , कालीमाता , हनुमानजी , भैरव विगेरे उपासना है । पर समस्या से ग्रस्त व्यक्ति या परिवार विधान करवाते करवाते थक चुके होते है और अब किसी विधानमे उनको पूर्ण विस्वास नही होता । और ये तो सहज ही है कि भाव के बिगैर किया कोई विधान , मंत्र , यज्ञ , पूजा कभी फलदायी नही होता। पर फिर भी ऐसे निराश लोग मुक्ति पा सके और स्वयं ही बिना खर्च कर सके ऐसा कुछ सरल विधान दिखाते है । सम्भव है अगर भाव हुवा तो अवश्य ही फलदायी होगा।

    ऊपर बताई कोई भी समस्या से पीड़ित परिवार अति शीघ्र ही रुद्राक्ष धारण करे। घरके हरेक परिवार जन को रुद्राक्ष धारण करवा दीजिए । आसुरी शक्तियां भागने लगेगी । हो सके तो नित्य या संभव न हो तो सप्ताहमे एकबार शिवलिंग की दक्षिण दिशा पर बैठकर शिवलिंग पर जल अभिषेक कीजिये और मिल सके तो बिल्वपत्र शिवलिंग पर धाराएं । शिवलिंग के सन्मुख बैठकर शिव गायत्री मंत्र के 11 जाप कीजिये । 

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहितन्नो रुद्रः प्रचोदयात्!

महादेव का गायत्री मंत्र है सर्वशक्तिशाली माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जो व्यक्ति इसका नियमित रूप से जाप करता है उसे हर सुख की प्राप्ति होती है उसके जावन में शांति बनी रहती है।

 शिवजी को वंदन करके अपनी समस्या से मुक्ति की प्रार्थना करे। 

  शिवलिंग पर धाराएं बिल्वपत्र में से एक बिल्वपत्र घर लेकर जलपत्रमे डाल दीजिए ताकि घरके हरेक सदस्य को शिवजी का चरणामृत मिले।
घरमे नित्य कुलदेवी के नाम दीप जलाए। 

  हरदिन सूर्यास्त के बाद आप जब भी घर आने का जो समय हो तब घर पहुचकर हनुमानजी के नाम एक तेल का दिया लगाइए। आसन पर बैठकर हनुमान चालीसा का एक पाठ कीजिये । पाठ करने के बाद 20 मिनिट तक आंखे बंद करे और रदयमे हनुमानजी बैठे है ऐसा ध्यान करिए ।ध्यान कीजिये कि हनुमानजी सीताराम सीताराम नाम का जाप कर रहे है और आप भी हनुमानजी के साथ साथ सीताराम सीताराम नाम का जाप कीजिये। सतत 20 मिनिट तक हनुमानजी का ध्यान और उनके साथ साथ सीताराम नाम जाप। 

   जाप के बाद हनुमानजी के समक्ष अपनी समस्या और उनसे कैसे मुक्ति मिल सके ये प्रार्थना कीजिये । थोड़े ही दिनमे हनुमानजी आप केलिए जो श्रेष्ठ होगा ऐसा संजोग पैदा करेंगे । जो आप केलिए कल्याणकारी होगा आपको वो मिलने लगेगा । 

   ये विधान ऐसे सरल लगेगा पर ये शीघ्र फलदायी होते हमने कही बार देखा है । पूर्ण श्रद्धा से कीजिये

  महादेव आप सभी धर्मप्रेमी जनो पर कृपा करें यही प्रार्थना सह .. श्री मात्रेय नमः