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Tuesday, 12 May 2026

कभी-कभी, शांत लोग सबसे गहरा प्रभाव छोड़ जाते हैं।

कभी-कभी, शांत लोग सबसे गहरा प्रभाव छोड़ जाते हैं।

वे 70 वर्ष के रहे होंगे। उस दिन वे एक साधारण-से कैफे में आए। बहुत से लोग उस जगह को इसलिए पसंद करते थे क्योंकि वह एक V आकार में स्थित थी, जहां से ग्राहक एक साथ दो सड़कों को देख सकते थे। वे दोपहर 2:30 बजे आए और 4:30 बजे तक वहीं बैठे रहे। मालिक ने इसकी खास परवाह नहीं की, क्योंकि उस समय कम ही ग्राहक आते थे। उन्होंने मेन्यू का सबसे सस्ता आइटम- एक ब्लैक कॉफी मंगवाई और दो घंटे तक उसी के साथ बैठे रहे। फिर वे रोज उसी समय आने लगे; वे वही ऑर्डर देते और रोज उसी समय जाते। वे न फोन चलाते थे, न किताब पढ़ते थे, बस राह चलते लोगों को देखते थे। चूंकि वे बेघर नहीं लगते थे, इसलिए कैफे मालिक ने उनसे बातचीत की और जाना कि उनका नाम वॉल्टर है और हाल ही में उन्होंने अपनी पत्नी को खोया है।
एक महीने की नियमित विजिट्स के बाद एक दिन मालिक ने उन्हें केक का एक टुकड़ा दिया। वॉल्टर ने कहा, मैंने तो यह ऑर्डर नहीं किया था। मालिक ने जवाब दिया, यह हमारी ओर से है। वे चुपचाप बैठे रहे और लोगों को गुजरते हुए देखते रहे। एक दिन उन्होंने कहा, मैं यहां चंद आवाजों के लिए आता हूं- थोड़ी गर्माहट के लिए, अकेला न होने के एहसास के लिए। मालिक उनको लेकर अभ्यस्त हो गए, क्योंकि वे छह महीने तक नियमित रूप से आते रहे थे।
और फिर एक दिन वे नहीं आए। उस दिन मालिक ने पाया कि 2:30 बजे उनकी नजरें बार-बार दरवाजे की ओर चली जा रही थीं। अगले दिन भी वे नहीं आए। फिर एक सप्ताह बीत गया और वॉल्टर का कुछ अता-पता नहीं था। एक महीने बाद, एक प्रौढ़ महिला कैफे में आईं। वे इधर-उधर ऐसे देख रही थीं, मानो कुछ खोज रही हों। उन्होंने काउंटर पर पूछा, क्या आप ही इस कैफे के मालिक हैं? मालिक ने हां कहा। महिला ने कहा, मेरे पिता यहां आया करते थे- वॉल्टर। मालिक का दिल बैठ गया। उन्होंने धीमे से कहा, हां, वे कुछ समय से नहीं आए हैं। महिला ने हल्की उदासी से कहा, उनका पिछले महीने निधन हो गया। ये शब्द कैफे मालिक को गहराई से चुभे, लेकिन उनके मुंह से बस इतना ही निकला- यह सुनकर बहुत दु:ख हुआ। तब महिला ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, मेरे पिता इस जगह के बारे में हमेशा बात करते थे। यह उनका दूसरा लिविंग-रूम था। फिर उन्होंने अपने पर्स से एक लिफाफा निकाला और कहा, उन्होंने यह आपके लिए छोड़ा है। उसे खोलते समय मालिक के हाथ हल्के-से कांप उठे।
लिफाफे में एक हस्तलिखित पत्र था। उसमें लिखा था :
दयालु कैफे मालिक के नाम, शायद आपको इसका एहसास न हो, लेकिन आपने मुझे कॉफी से कहीं अधिक दिया है। पत्नी के जाने के बाद मेरे दिन बहुत लंबे हो गए थे। मैं अपनी बेटी पर बोझ नहीं बनना चाहता था। मैं नहीं चाहता था कि वह मेरे अकेलेपन को देखे। आपके कैफे ने मुझे अपने जीवन को चलाए रखने का एक कारण दिया। वह अतिरिक्त केक और आपकी अतिरिक्त विनम्रता मेरे लिए किसी भी चीज से ज्यादा मायने रखती थी। धन्यवाद, कि आपने एक बूढ़े आदमी को उस कोने में बैठने दिया। -वॉल्टर।
लिफाफे में एक छोटा-सा चेक भी था। उसमें बहुत बड़ी राशि नहीं थी, लेकिन वॉल्टर ने अब तक उस कैफे में जितनी रकम खर्च की थी, वह उससे अधिक ही थी। उनकी बेटी ने कहा, यह काइंडनेस-फंड के लिए है। वे चाहते थे कि आप इसे किसी ऐसे व्यक्ति की मदद के लिए इस्तेमाल करें, जिसे शायद बैठने के लिए एक जगह की जरूरत हो। तब कैफे मालिक को आंसू छिपाने के लिए अपना चेहरा दूसरी तरफ करना पड़ा।
महिला के जाने के बाद वे उस मेज तक गए- वॉल्टर की मेज। कुर्सी खाली थी, लेकिन मालिक ने तय किया कि वे उसे खाली नहीं रहने देंगे। उन्होंने वहां एक बोर्ड लगा दिया : यदि आपको बैठने के लिए एक गर्माहट भरी जगह चाहिए, तो आपका यहां स्वागत है। उस दिन के बाद, कभी कोई कॉलेज छात्र वहां बैठकर पढ़ाई करता, कभी कोई विधवा वहां बुनाई करती, या कोई व्यक्ति वहां चुपचाप बैठा रहता। हर बार जब वे किसी को कॉफी देते, तो साथ में वॉल्टर के नाम पर एक केक भी देते।
फंडा यह है कि..
वर्तमान एकल परिवारों के युग में  किसी को सबसे मूल्यवान चीज जो हम दे सकते हैं, वह अतिरिक्त अन्न धन या वस्त्र नहीं, बल्कि यह कि वे हमारे पास आकर शांतचित्त (सूकून) अनुभव करें कि वे अकेले नहीं हैं।

Monday, 11 May 2026

“स्व॒र्गे लो॒के ब॒हु स्त्रैण॑मेषाम् ॥” (अथर्ववेद ) - पौराणिकों और आर्य समाजीयों के भिन्न-भिन्न अर्थों पर चर्चा।

वेदों में स्वर्गलोक का वर्णन था, दयानंदियों ने उसे उड़ा दिया। वेदों में स्वर्गलोक में निवास करने वाले देवताओं का वर्णन था, आर्यसमाजियों ने उसे भी उड़ा दिया। इसी प्रकार वेद-शास्त्रों में अप्सराओं का भी वर्णन है। समाजियों ने ऐसे मंत्रों के बड़े मनमाने अर्थ किए हैं, जिससे स्थिति बड़ी हास्यास्पद बन जाती है।

कुछ आर्यसमाजी कहते हैं कि कला-निपुण स्त्री को ही वेदों में अप्सरा कहा गया है। तब हमारा प्रश्न है कि वेदों की यह बात आप (दयानंदी) अपने व्यवहार में क्यों नहीं लाते?

आर्यसमाजी अपनी कला-निपुण बहन-बेटियों को “अप्सरा” क्यो नहीं कहते। व और कोई कहे तो बुरा मानेंगे या गर्व से छाती फुला लेंगे?

आर्यसमाजी आचार्य अपनी शिष्याओं को “अप्सरा” क्यों नहीं कहते हैं? मतलब, क्या कभी आचार्य अग्निव्रत ने अपनी विदुषी, कला-निपुण शिष्या से कहा है कि - “अहो, तुम तो अप्सरा हो”? क्यों नहीं भला?

हमने आर्यसमाज का पूरा इतिहास पढ़ लिया, कहीं ऐसा प्रसंग नहीं मिला जिसमें इन दयानंदियों द्वारा किसी कला-निपुण स्त्री को “अप्सरा” कहा गया हो। न ही कोई “आर्या अप्सरा सम्मेलन” हुआ, न “अप्सरा” संबोधन।

कम-से-कम स्वामी दयानंद ने ही नृत्य व गायन की कला में निपुण नन्हीजान को “अप्सरा” कह दिया होता, तो समाजियों के लिए व्यावहारिक प्रमाण भी उपलब्ध हो जाता और काँच मिला दूध भी पीने से बच जाते।

चलिए, नन्हीजान को न सही, किन्तु रमाबाई को ही अपने प्रेमभाव से भरे लिखे गए ख़तों में “अप्सरा” कह दिया होता।

अर्थात् कोई एक भी उदाहरण नहीं है। यह विचित्र स्थिति है इन दयानंदियों की।

यह तो हुआ “अप्सरा” का एक अर्थ, अब समाजियों का किया दूसरा अर्थ देखिए- 

आर्यसमाज के एक विद्वान चमूपति थे। वे अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि - “यज्ञ में साथ देने वाली स्त्री को अप्सरा कहा जाता है।”

पुनः वही प्रश्न होगा - इस शब्द का व्यवहार फिर यज्ञ में क्यों नहीं करते? कम-से-कम एक बार तो करते!

यज्ञ में जो महिलाएँ साथ दे रही हों, वे सब “अप्सरा” हो गईं; आर्यसमाजियों के अनुसार ये विद्वान होने से सब “देवता” हैं, और आर्यसमाजी भवन ही इस प्रकार स्वर्गलोक बन गया। धन्य है ऐसी अद्भुत मूर्खता 🙂

स्वर्गलोक में अप्सराओं की सत्ता वेदादि शास्त्रों में भरी पड़ी है।

“स्व॒र्गे लो॒के ब॒हु स्त्रैण॑मेषाम् ॥” (अथर्ववेद ) - मंत्र में अप्सराओं का वर्णन है।

इसका अर्थ है - “स्वर्गलोक में उनके लिए (देवताओं के लिए) बहुत स्त्रियाँ होती हैं।”

अब दयानंदी इस वेदमंत्र के सत्य अर्थ को मान लें, तब तो दयानंदी सिद्धांत खंडित हो जाएगा। इसलिए देखिए, ये किस प्रकार वेदमंत्र के सत्यार्थ की हत्या करके अपना मनमाना अर्थ करते हैं - 

आर्यसमाज के पंडित क्षेमकरण मंत्र में आए “स्वर्ग” शब्द का अर्थ “सुखदायक” और “स्त्रैणम्” शब्द का अर्थ “सृष्टि का हितकर्म” करते हैं।

आर्यसमाज के दूसरे भाष्यकार हरिशरण सिद्धान्तालंकार “स्वर्गलोक” का अर्थ “घर” करते हैं तथा “स्त्रैणम्” का अर्थ “बहिन, भौजाई, पत्नी” कर देते हैं।

तीसरे दयानंदी भाष्यकार “स्वर्ग” शब्द का अर्थ “गृहस्थ” करते हैं और “स्त्रैणम्” का अर्थ “बहुत संबंधों की स्त्रियाँ” कर देते हैं।

यहाँ अपने सिद्धांत को ऊपर और वेद के सिद्धांत को दबाने के लिए आर्यसमाजी व्याकरण, निरुक्त आदि सबकी हत्या कर देते हैं। जो अर्थ मंत्र के शब्द से किसी भी प्रकार से निकल ही नहीं सकता, वह अर्थ लिख दिया करते हैं।

इन असुरों को कम-से-कम स्वयं द्वारा मान्य “पातंजल-महाभाष्य” का वचन ही देख लेना चाहिए था।

पातंजलमहाभाष्य का वचन है - “इज्याया: (यज्ञस्य) किञ्चित् प्रयोजनमुक्तम् .... किम् स्वर्गे लोके अप्सरस: एनं जाया भूत्वा उपशेरते” (६.१.८४)। इसमें स्पष्ट यज्ञकर्ता को स्वर्गलोक में अप्सराएँ प्राप्त होने का वर्णन है।

आगे महर्षि पतंजलि लिखते हैं - “उर्वशी वै रूपिणी अप्सरसाम्” (५.२.९५)। यहाँ उर्वशी अप्सरा को सुन्दर कहा है।

अब विचार करें कि वेद एवं पतंजलि मुनि का वचन प्रमाण माना जाएगा या इन धूर्त दयानंदियों के अनर्गल अर्थ?

योगदर्शन पर महर्षि व्यास के भाष्य को ही देख लेते। उसमें भी पृथ्वी से भिन्न लोकों व स्वर्गलोक आदि के इन प्रलोभनों का वर्णन है। किन्तु यह महर्षि व्यास को भी कुछ नहीं समझते। 

बल्कि उपनिषद, महाभारत, रामायण आदि में भी अप्सराओं का वर्णन है; ये इनकी भी नहीं मानते। ब्राह्मण-ग्रंथ तथा निरुक्त में भी अप्सराओं का उल्लेख है; उसे भी यह लोग स्वीकार नहीं करते, श्री यास्क को भी यह प्रमाण नहीं मानते।

इनके लिए वेद और अंतिम सत्य का अर्थ है स्वामी दयानंद के वचन एवं जो स्वयं को उचित लगे। इनके लिए एकमात्र ऋषि हैं इनके प्यारे दयानंद। आप स्पष्ट देख सकते हैं कि ये कितने वैदिक और ऋषियों के भक्त हैं।
साभार - शचीन्द्र शर्मा ( फेसबुक पोस्ट 11/5/2026 ईस्वी )