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Monday, 21 September 2026

भारत की आध्यात्मिक चेतना: एक शाश्वत यात्रा

भारत की आध्यात्मिक चेतना: एक शाश्वत यात्रा

भारत केवल एक भौगोलिक भूखंड या राजनीतिक सीमाओं से घिरा हुआ राष्ट्र नहीं है; यह एक जीवंत, स्पंदनशील और शाश्वत विचार है। युग युगों से संसार ने भारत को एक ऐसे केंद्र के रूप में देखा है जहाँ जीवन के भौतिक पक्ष के समानांतर, और उससे कहीं अधिक गहरा, एक आंतरिक पक्ष विकसित हुआ है। इस आंतरिक पक्ष को ही हम भारत की आध्यात्मिक चेतना कहते हैं। भारत को समझने के लिए भारत की अन्तश्चेतना को अर्थात भारत की आत्मा को समझना बहुत आवश्यक है। 
आज के आधुनिक युग में जब 'अध्यात्म' शब्द का व्यवसायीकरण हो चुका है और इसे केवल कर्मकांडों, योग के आसनों, या संन्यास तक सीमित मान लिया गया है, तब यह समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि भारत के परिप्रेक्ष्य में वास्तविक आध्यात्मिक चेतना का वास्तविक अर्थ क्या है ? क्योंकि यह सत्य है कि बाहर जो कुछ होता हुआ दिखाई दे रहा है अर्थात अध्यात्म के नाम पर अथवा कर्मकांड और योग आसनों के नाम पर जो कुछ भी किया जा रहा है, वह सब कुछ भारत नहीं है, भारत तो उससे अलग है। मजबूत, सशक्त, समर्थ और सक्षम विचारों से भरा हुआ भारत जो हर किसी को अपनी आध्यात्मिक चेतना के माध्यम से उन्नति और प्रगति का संदेश देता रहा है और दे रहा है वास्तव में उसी भारत को समझना भारत की आत्मा के साथ संबंध स्थापित करना है। भारतीय वैदिक संस्कृति के संदर्भ में अध्यात्म कोई पलायनवाद  नहीं है, बल्कि यह जीवन को उसकी समग्रता में जीने और सत्य के साथ एकाकार होने का विज्ञान है। यदि अध्यात्म पलायनवाद होता तो श्री कृष्ण जी पलायनवादी बने अर्जुन को कभी भी युद्ध के क्षेत्र में खड़े होकर गीता का उपदेश नहीं देते। उन्होंने धर्म को निष्काम भाव के साथ समन्वित कर अध्यात्म की भारतीय पवित्र परंपरा के साथ इस प्रकार प्रस्तुत किया कि उनका वह संदेश शाश्वत संदेश बन गया। सनातन बन गया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत का अध्यात्म हमारी उन्नति की एकमात्र गारंटी है।
  आध्यात्मिक चेतना: शब्दार्थ और भारतीय दृष्टिकोण
अध्यात्म शब्द दो शब्दों के मेल से बना है — 'अधि' और 'आत्म', जिसका अर्थ है 'आत्मा के विषय में' या 'स्वयं के भीतर स्थित होना'। भारत की आध्यात्मिक परंपरा हमको अपने भीतर से जोड़ती है। जैसे फल भीतर से पहले पकता है बाहर बाद में गदराया हुआ दिखाई देता है। उसी प्रकार भारत का अध्यात्म हमको पहले भीतर से रंगता है। बाहर का रंग तो बाद में चढ़ता है।
  पश्चिमी जगत में जिसे प्रायः 'रिलीजन' (Religion) या मजहब कहा जाता है, वह भारतीय 'धर्म' और 'अध्यात्म' से काफी भिन्न है। रिलीजन एक विशिष्ट पैगंबर, एक पवित्र पुस्तक और नियमों के एक समूह पर आधारित होता है। इसके विपरीत, भारतीय आध्यात्मिक चेतना किसी एक व्यक्ति या ग्रंथ से बंधी नहीं है। यह 'एकम सत् विप्रा बहुधा वदन्ति' (सत्य एक है, ज्ञानी उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं) के सिद्धांत पर चलती है। इसकी अनोखी विशेषता है कि उस एक की ही संतान यह संपूर्ण मानवता को और प्राणीमात्र को मानती है। यह सभी जीवधारियों को एक ही दिव्य ज्योति से ज्योतित मानती है। भारत की इस महानता को जो भी समझ लेगा या जिसने भी समझ लिया है उसी ने भारत के सामने अपने आप शीश झुका दिया है । उसे भारत शब्द में ही एक अनोखी शांति प्रस्फुटित होते हुए दिखाई देती है। जब दूर देश से चलकर कोई यात्री भारत भूमि पर आ जाता है तो यहां के कण कण में उसे शांति का वास दिखाई देता है। इसका एक कारण यह भी है कि जहां अरब के इतिहास में सर्वत्र भूगोल दिखाई देता है, खून खराबा दिखाई देता है, यूरोप के इतिहास में राजनीति दिखाई देती है, राजनीतिक हमले दिखाई देते हैं, वहां भारत की इतिहास परंपरा में सर्वत्र आध्यात्मिक चेतना दिखाई देती है। यही कारण है कि जहां दुनिया के अन्य देशों का हमें राजनीतिक इतिहास मिलता है वहीं भारत का सांस्कृतिक आध्यात्मिक इतिहास मिलता है। इसी को भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहते हैं।
वास्तविक आध्यात्मिक चेतना का अर्थ किसी अदृश्य ईश्वर की खोज मात्र नहीं है, बल्कि स्वयं के भीतर छिपे उस असीम चैतन्य  का अनुभव करना है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। यह बुद्धि  से ऊपर उठकर बोध  के स्तर पर जीने की कला है।
भारत की इस महान चेतना को समझने के लिए हमें इसके उन वैचारिक और व्यावहारिक स्तंभों को देखना होगा जो हज़ारों वर्षों से अपरिवर्तित रहे हैं:-
1. अंतर्निहित एकता का बोध 
भारतीय अध्यात्म का शिखर 'अद्वैत' दर्शन है। उपनिषदों का उद्घोष है — 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ही ब्रह्म हूँ) और 'तत् त्वम् असि' (वह तुम ही हो)। इस अवस्था को प्राप्त आत्मा अपने आप को परमपिता परमेश्वर के सानिध्य में अनुभव करती है। जैसे लोहा अग्नि के भीतर जाकर अग्नि रूप अर्थात लाल हो जाता है , परंतु उसका अस्तित्व फिर भी अलग रहता है। उसी प्रकार मोक्ष को प्राप्त आत्माओं को इस प्रकार की अनुभूति होती है । यद्यपि उस काल में भी उनका अस्तित्व अलग ही होता है। स्वामी दयानंद जी महाराज त्रैतवादी सिद्धांत के समर्थक थे। वह ईश्वर जीव और प्रकृति को अनादी और अमर मानते थे। शंकराचार्य जी अद्वैतवादी थे। 
इस संदर्भ को सही दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है।
  इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति (व्यष्टि) को अपने चिंतन और चेतना का विकास करना चाहिए और उसे इतनी ऊंचाई पर स्थापित करना चाहिए कि समष्टि उसके लिए परिवार बन जाए। जब एक व्यक्ति इस चेतना में जागता है, तो उसके भीतर से 'परायापन' समाप्त हो जाता है। वह हर जीव में, पेड़-पौधों में, और नदियों-पहाड़ों में उसी एक ही चेतना का विस्तार देखता है।
2. कर्म और उत्तरदायित्व का सिद्धांत
भारत की चेतना मनुष्य को भाग्य के भरोसे अकर्मण्य बनाना नहीं सिखाती। इसके विपरीत भारत की संस्कृति मनुष्यों को कर्मशील बने रहना सिखाती है। भगवद्गीता का निष्काम कर्मयोग इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।"
वास्तविक आध्यात्मिक व्यक्ति वह नहीं है जो संसार छोड़कर जंगलों में भाग जाए, बल्कि वह है जो संसार के बीच रहकर, अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी उनके परिणामों से अनासक्त (Unattached) रहे। कर्म को ही पूजा बना देना वास्तविक चेतना है। अपने कर्तव्य कर्म पर अर्थात अपने धर्म पर बिना राग द्वेष का भाव मन में ले जब ध्यान केंद्रित करके व्यक्ति कर्म करता है अर्थात अपने धर्म का पालन करता है तब वह निष्काम भाव का साधन बन जाता है किसी को भारत कहते हैं। श्री कृष्ण जी बार-बार अर्जुन को युद्ध क्षेत्र में भारत कहकर पुकारते हैं। इसका एक अर्थ यह भी है कि श्री कृष्ण जी अर्जुन को निष्काम बना देना चाहते हैं। भारत की उस आध्यात्मिक चेतना से जोड़ देना चाहते हैं जो हर कदम पर हमें निष्काम कर्म करने की शिक्षा देती है अर्थात प्रकाश के बड़े ऊर्जा स्रोत से जोड़ने के लिए ही श्री कृष्ण जी अर्जुन को बार-बार भारत कह रहे हैं। उसे बता रहे हैं कि तू ज्ञान की दीप्ति में रत हो जा... भारत हो जा।

3. पुरुषार्थ चतुष्टय: जीवन का संतुलन

भारतीय ऋषियों ने जीवन को पूरी तरह से स्वीकार किया।
इसलिए उन्होंने जीवन का बहिष्कार नहीं किया। जीवन को बोझ नहीं समझा। जीवन का तिरस्कार भी नहीं किया बल्कि जीवन को एक पुरस्कार के रूप में ग्रहण किया। परमपिता परमेश्वर की एक बेजोड़ नेमत के रूप में ग्रहण किया। जनसाधारण को यह कहकर जीवन का सम्मान करने के लिए प्रेरित किया कि मानव जीवन को प्राप्त करने के लिए तो देवता भी तरसते हैं। इसलिए परमपिता परमेश्वर की इस नेमत का सम्मान करो। यही कारण रहा कि भारत में आत्महत्या को पाप माना गया है।
 भारतीय संस्कृति के कुशल शिल्पकार ऋषियों ने जीवन के चार लक्ष्य निर्धारित किए:
धर्म: नैतिक मूल्य और कर्तव्य, जीवन की वह सबसे सुंदर व्यवस्था जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है और अन्य जीवधारी के प्रति उसका कर्तव्य निर्धारित करती है।
अर्थ: भौतिक समृद्धि और धन
काम: इच्छाएँ और आनंद
मोक्ष: परम स्वतंत्रता और आत्म-साक्षात्कार
भारतीय अध्यात्म धन या इच्छाओं का निषेध नहीं करता, बल्कि यह सिखाता है कि अर्थ और काम को 'धर्म' के दायरे में रहकर जिया जाए, ताकि अंतिम लक्ष्य 'मोक्ष' (मुक्ति) प्राप्त हो सके। यह जीवन का एक अत्यंत व्यावहारिक और संतुलित दृष्टिकोण है। अर्थ और काम को धर्म के अनुकूल बनाकर चलना जीवन की सबसे ऊंची साधना है। इसी साधना की ऊंचाई का नाम भारत है। समझो सारा भारत एक पिरामिड का रूप ले चुका हो और उसके सर्वोच्च शिखर पर हम सब पहुंच कर एक साथ गोलाई घूम रहे हों। हम गतिशील हैं। हम घूम रहे हैं। परंतु बिना किसी दूसरे को चोटिल किए हुए घूम रहे हैं। वास्तव में यह स्थिति धर्म की गति है। यही स्थिति धर्म चक्र का घूमना है। जब यह स्थिति प्रत्येक जन के भीतर समाविष्ट हो जाती है, तब वह भारत का उत्तराधिकारी बन जाता है।

इतिहास के झरोखे से: चेतना का विकास क्रम

भारत की आध्यात्मिक चेतना कोई स्थिर वस्तु नहीं है, यह एक बहती हुई नदी की तरह है। जिसने समय के साथ नए रूप धारण किए, लेकिन अपना मूल स्वभाव कभी नहीं बदला। अनेक झंझावात आए अनेक प्रकार की बाढों ने इसका स्वरूप बिगाड़ने का प्रयास किया । इसके प्रवाह को बदलने का प्रयास किया परंतु भारत था कि वह बदला नहीं उसकी आत्मिक पवित्रता निरंतर बनी रही। उसकी आध्यात्मिक चेतना अपने मौलिक स्वरूप में सतत प्रवाहमान बनी रही।
वैदिक और उपनिषद काल: भारत का वैदिक काल भारत की आध्यात्मिक चेतना का भोर था। इस काल में ऋषियों ने प्रकृति के रहस्यों को समझने और आंतरिक खोज के माध्यम से 'ऋत' की स्थापना की। ऋत अर्थात ब्रह्मांड की व्यवस्था को समझकर उसके अनुरूप मनुष्य को ढालने का प्रयास किया। उपनिषद काल में ऋषियों ने भारत की इसी आध्यात्मिक परंपरा को आगे बढ़ाया और शुद्ध निर्मल वैदिक ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने का एक आंदोलन खड़ा किया । उनका एक ही चिंतन था कि यदि वैदिक चिंतन नष्ट भ्रष्ट हो गया तो भारत की आध्यात्मिक परंपरा नष्ट भ्रष्ट हो जाएगी। महात्मा बुद्ध ने अपने समय में भारत की वैदिक परंपरा के नष्ट भ्रष्ट होने को रोकने के लिए अनेक प्रकार के प्रयास किये। यह अलग बात है कि उनके अनुयायियों ने आगे चलकर एक अलग मत बना लिया। यही स्थिति महावीर जी की रही। आगे चलकर भक्ति आंदोलन के संतों ने भी भारत के प्राचीन आध्यात्मिक गौरव को बनाए रखने का काम किया। यद्यपि उनका बौद्धिक स्तर उपनिषद कालीन ऋषियों के बौद्धिक स्तर से बहुत नीचे का रहा परंतु प्रयास फिर भी अच्छा था। इस काल में जितनी गिरावट आई उसके उत्थान और उद्धार के लिए स्वामी दयानंद जी महाराज का आगमन हुआ। उन्होंने भारत को भारत के वास्तविक स्वरूप में पहचानने का वंदनीय कार्य किया। बहुत दिनों की संघर्ष गाथा से निकले भारत को वास्तविक स्वरूप में पहचानना उस समय लगभग असंभव हो गया था। क्योंकि भारत के चेहरे पर उस समय तक काल के थपेड़ों की इतनी धूल पड़ चुकी थी कि उसे साफ करना तक संअभव दिखाई देता था।
स्वामी जी ने भगीरथ प्रयास किया और देश के लोगों को देश के लिए मर मिटने की प्रेरणा प्रदान की। इस कार्य के लिए उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की। आर्य लोगों को राष्ट्र रक्षा का पवित्र दायित्व सौंपा । उन्हें बताया कि तुम्हें भारत को भारत के सही स्वरूप में स्थापित करना है। यदि भारत सही स्वरूप में स्थापित हो जाता है तो प्रत्येक प्रकार के कष्ट क्लेशों का अंत होना निश्चित है। .... और यही हुआ।
आर्यों का परिश्रम अभी भी रुका नहीं है.... यह निरंतर जारी है और जारी रहेगा। 


डॉ राकेश कुमार आर्य 
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

Sunday, 20 September 2026

पुराण वेद का ही अनुसरण करते हैं। इनमें अलौकिक लीलाएँ लौकिक आश्रय से वर्णित हैं।

             पुराण वेद का ही अनुसरण करते हैं। 
(इनमें अलौकिक लीलाएँ लौकिक आश्रय से वर्णित हैं। )

आर्यसमाजियों की जहाँ भी पुराण में ऐसी कथाओं पर दृष्टि पड़ती है, तो इनके बाँछें खिल जाती हैं कि - वाह! अब हिन्दुओं को अपमानित करने का मसाला मिल गया है। अब हम इस कथा का प्रचार करके हिन्दुओं को शर्मिंदा करेंगे, उनके मन में हिन्दू देवी-देवताओं के प्रति घृणा पैदा करेंगे, उनके पुराण आदि धर्मग्रन्थों के प्रति घृणा पैदा करेंगे, हिन्दुओं के पुराण लिखने वाले ऋषियों के प्रति घृणा फैलाएँगे, जिससे कि हिन्दुओं की सनातन धर्म के प्रति निष्ठा व श्रद्धा समाप्त हो जाए और वे हमारे दयानंद-पंथ में आ जाएँ। इनका लक्ष्य यही रहता हैं।

इस कथा में आखिर आपत्तिजनक क्या है? भगवान शिव और पार्वती जी रतिक्रिया कर रहे थे, तो इसमें व्यभिचार या अनैतिकता क्या है? शिव और पार्वती पति-पत्नी हैं, पति-पत्नी तो भोग करेंगे ही। संसार के सब पति-पत्नी भोग किया ही करते हैं। अब भोग करते समय कोई ब्राह्मण अतिथि अकस्मात् आ जाएगा, तो वे इस भोग को रोकेंगे या नहीं? अतः रोकना भी उचित ही था। अब रोकेंगे, तो वीर्य नीचे ही ही गिरेगा। इसमें भी क्या आपत्ति है?

इसे काल्पनिक उदाहरण से समझिए - मान लीजिए कोई आर्यसमाजी अपनी पत्नी के साथ संभोग कर रहा हो। क्या इसमें कुछ अनुचित है? उत्तर है - नहीं। और उसी समय अकस्मात् स्वामी दयानन्द नाम का कोई व्यक्ति द्वार पर आ जाएँ, तो वह आर्यसमाजी रुकेगा या लगा ही रहेगा? स्वाभाविक है, रुकेगा ही। और चरम सुख के समय रुकने के कारण वह अचानक से हटेगा, तो वीर्य शय्या पर ही तो गिरेगा, या कि आर्यसमाजी का वीर्य उड़कर द्वार खटखटा रहे दयानन्द स्वामी के ऊपर जा गिरेगा? ऐसा तो नहीं होगा न! अतः यहाँ तक इस कथा में कुछ अनुचित नहीं है।

अब आगे कथा में आता है कि श्रीकृष्ण उस वीर्य में प्रविष्ट हुए तथा गणेश जी के रूप में प्रकट हो गए। अब विचार करें कि क्या किसी मनुष्य के वीर्य में विशिष्ट रूप से प्रविष्ट होकर परमात्मा प्रकट हो सकता है? यानी मनुष्यों के वीर्य में तो ऐसा सम्भव है नहीं, अन्यथा तो आर्यसमाजियों के वीर्य में उनका परमात्मा व्यापक हो रहा है या नहीं? किन्तु वह आर्यसमाजियों के वीर्य में प्रविष्ट होते हुए भी प्रकट नहीं हो रहा है। अतः इस विषय को तो वेद और पुराण से ही समझना पड़ेगा। वीर्य में प्रविष्ट होना भी कोई आपत्ति का विषय नहीं है, क्योंकि उक्त पुराण में श्रीकृष्ण परमात्मा कहे गए हैं। परमात्मा तो सबके वीर्य में भी व्यापक है ही। अन्यथा क्या आर्यसमाजी यह कहेंगे कि परमात्मा उनके वीर्य को देखकर बचकर निकल जाता है? अतः परमात्म दृष्टि से ही इस कथा पर विचार करना पड़ेगा।

समस्या यह है कि आर्यसमाजी यह नहीं समझ पाए हैं कि जब विषय पारलौकिक हो, तो लौकिक शब्दों के अर्थ और भाव बदल जाते हैं। जैसे कि सृष्टि की उत्पत्ति हेतु प्रकृति और परमात्मा का मैथुन होता है और सृष्टि का सृजन होता है। तब जहाँ-जहाँ परमात्मा का मैथुन, विहार, भोग, समागम आदि कहा जाए, वहाँ वह मैथुन लौकिक स्त्री-पुरुष की भाँति नहीं होता है। वीर्य का भी अर्थ यहाँ लौकिक वीर्य नहीं, बल्कि तेज ही होता है। इसके उदाहरण देते हैं।

आर्यसमाजी कन्याएँ व स्त्रियाँ प्रार्थना करती हैं - "वीर्यमसि वीर्य मयि धेहि" (यजुर्वेद १९।९) तथा "अन्नम् पयो रेतो अस्मासु धत्त" (यजुर्वेद)। अर्थात् - "हे परमात्मा! आप वीर्य हैं या वीर्यवान् हैं, हममें भी वीर्य का आधान करिए।" तो आर्यसमाजी क्या यहाँ यह समझेंगे कि आर्यसमाजी महिलाएँ अपनी योनि में परमात्मा से वीर्य के स्थापन की प्रार्थना कर रही हैं? यहाँ जो वीर्य का अर्थ होगा, वही पुराण की इस कथा में समझना चाहिए।

यजुर्वेद में आता है - "वृषा वाजी रेतोधा रेतो दधातु" (२३।२०)। इस मंत्र में भी वही रेतः शब्द है, जो इस पुराण के श्लोक में है। तब आर्यसमाजी यहाँ भी रेतः का अर्थ मानुषी वीर्य क्यों नहीं करते? यहाँ रेतः का अर्थ अगर तेज करेंगे, तो पुराण में भी परमात्मा शिव के लिए वही अर्थ करना पड़ेगा। अन्यथा दोनों स्थानों पर आर्यसमाजी मान लें कि मानुषी वीर्य ही समझा जाएगा? हम तो मान लेंगे, हमें इस पर भी कोई आपत्ति न होगी, क्योंकि जो परमात्मा शिव समस्त सृष्टि को स्वयं से उत्पन्न कर रहे है, वह मानुषी वीर्य भी स्वयं से निकाल दे, तो कौन-सी असम्भव बात है? किन्तु आर्यसमाजी कैसे समाधान करेंगे कि उनका निराकार परमात्मा, जो कि भोग वाले लिंग से रहित है, वह आर्यसमाजियों की प्रार्थना पर उनके भीतर कैसे वीर्य का स्थापन करेगा? अतः तेज मानने में ही भलाई है।

तो परमात्मा के परिप्रेक्ष्य में वीर्य, लिंग, योनि, मैथुन, रमण, विहार आदि शब्दों के अर्थ सामान्य मनुष्य के अंगों व धातुओं के व्यवहार को ज्यों-का-त्यों लक्षित नहीं करते हैं। अगर पुराण में इसके वर्णन को आर्यसमाजी अश्लीलता व गंदा वर्णन कहते हैं, तब यह तो वेदों में भी है। तब आर्यसमाजी क्या करेंगे? किन्तु हमारे अनुसार अश्लीलता या गंदा वर्णन दोनों में नहीं है, क्योंकि वेद एवं पुराणों में सर्वांगीणता होती है, सर्वांगता में सब कुछ होता है। अर्थात् जो आज के समय के अनुसार, आज की बुद्धि के अनुसार हमें अश्लील लगता है, वह पारलौकिक परिप्रेक्ष्य में अश्लील नहीं है।

जैसे कि यजुर्वेद में मंत्र आता है - "रेतो॒ मूत्रं॒ विज॑हाति॒ योनिं॑ प्रवि॒शदि॑न्द्रि॒यम्" (यजुर्वेद १९।७६)। इस मंत्र का अर्थ आर्यसमाजी आचार्य अपने पास पढ़ने वाली कन्याओं के आगे क्या करते हैं? यह आर्यसमाजियों को अश्लील लगता है या नहीं?

ऋग्वेद में मंत्र आता है -"तां पू॑षञ्छि॒वत॑मा॒मेर॑यस्व॒ यस्यां॒ बीजं॑ मनु॒ष्या॒३॒॑ वप॑न्ति" (ऋग्वेद १०।८५।३७)। इस मंत्र का अर्थ ज़रा आर्यसमाजी अपनी कन्याओं के आगे क्या करते हैं? यह अश्लील लगेगा या नहीं?

ऐसे सैकड़ों उदाहरण यहाँ दिए जा सकते हैं। तुम पुराण में यह क्या खोजते हो? यह सब वेदों में भरा पड़ा है। वहीं से लेकर पुराण में इसका विस्तार है। पुराण वेदों के ही भाष्य हैं।

परमात्मा का शरीर ही पंचभूतों से नहीं बना होता है। दिव्य होता है। "वपुषो मदनुग्रहस्य स्वेच्छामयस्य, न तु भूतमयस्य कोपि" कहा गया है। भगवान शिव परमात्मा (पुरुष) हैं और माता पार्वती प्रकृति हैं। पुरुष और प्रकृति का संबंध नित्य है। यहाँ पति-पत्नीभाव भी मात्र लौकिक पति-पत्नी की भाँति न समझकर प्रकृति-पुरुष की भाँति ही दिव्य समझना चाहिए, भले ही पुराण में उसका वर्णन लौकिक ढंग से किया जाए। क्योंकि पुराण काव्य भी हैं। वे भी वेदों की रीति से वर्णन करते हैं। जैसे कि निरुक्त में "पृथिव्या पर्जन्येन वा वाय्वादित्याभ्यां च संभोगः अग्निना च इतरस्य लोकस्य" कहते हुए पृथ्वी का बादल, वायु, सूर्य आदि से भी संभोग कहा गया है। क्या आर्यसमाजी इसे लौकिक मैथुन मानेंगे? अब ये तो वायु और सूर्य दोनों का अर्थ परमात्मा करते हैं, तब क्या यह मानेंगे कि इनका परमात्मा ही परमात्मा से संभोग करता है?

अतः श्रीकृष्ण उस वीर्य में अर्थात् शिव जी के तेज में प्रविष्ट हुए और गणेशरूपी बालक बन गए। यह किसी एक कल्प की कथा है। हमारे अनुसार सृष्टि पहली बार नहीं हुई है, अनेक कल्प व्यतीत हो चुके हैं। अतः भिन्न-भिन्न कल्पों में इन कथाओं में भेद हो, तो कोई आश्चर्य का विषय नहीं है, कोई समस्या नहीं है।

समझना बड़ा मुश्किल है कि आर्यसमाजियों को आखिर आपत्ति किस बात से है? अगर संभोग से आपत्ति है, तो भाई, हमारे परमात्मा के लिए तो संभोग घृणा का विषय नहीं है। तभी तो उन्होंने सृष्टि को बढ़ाने के लिए यह संभोग की प्रक्रिया दे रखी है। तब संभोग से क्या समस्या है? नहीं, नहीं, इनको संभोग से समस्या नहीं है। इनके प्यारे दयानन्द तो भारत के एकमात्र ऐसे संन्यासी रहे हैं, जो इनकी स्त्रियों को नियोग के नाम पर ग्यारह भिन्न-भिन्न पुरुषों से संभोग करने का आदेश देकर गए हैं। इस एकादश नियोग का आनंद तो आर्यसमाज के आचार्य व अन्य दयानन्दी अवश्य ही लूटते होंगे। अतः समस्या संभोग से तो नहीं है।

फिर किससे समस्या है? क्या ऐसी इनको अप्राकृतिक लगने वाली कथाओं से है? किन्तु यह तो वेदों में भी हैं। देखिए - 

ऋग्वेद में आता है - "सत्रे ह जाताविषिता नमोभिः कुम्भे रेतः सिषिचतुः समानम्" (७।३३।१३)। यह पूरा प्रकरण ऋग्वेद में है। मित्र और वरुण ने ऊर्वशी को देखा, तो उनका वीर्य गिर गया। उन्होंने क्षरित हुए वीर्य को कुम्भ (घड़े) में डाल दिया, जिससे अगस्त्य और वसिष्ठ ऋषि ने जन्म लिया। ऐसी अलौकिक उत्पत्तियाँ तो वेदों में भी हैं। उन्हें भी अश्लील और गप्प मानोगे क्या?

 समझो इसे - देवताओं को किसी को उत्पन्न करने के लिए अथवा स्वयं उत्पन्न होने के लिए गर्भाशय की आवश्यकता नहीं होती है। वे संकल्प से ही सृजन कर लिया करते हैं। ये सब वेदों व वैदिक ग्रन्थों में भरा पड़ा है। तुम क्यों केवल पुराण की ही निंदा करते हो? अरे, स्वामी जी एकमुँहे साँप का आदेश दे गए हैं, दो मुँहे साँप का नहीं देकर गए हैं? क्या उसके कारण बुद्धि भी दोमुँही हो गई है कि ऐसी कथा वेदों में है, तो मुँह छिपाओगे और पुराण में है, तो पुराण को गाली दोगे?

अतः इससे भी आर्यसमाजियों को समस्या नहीं होनी चाहिए। फिर बचता है कि क्या इस विषय पर आपत्ति है कि परमात्मा भी संभोग कर रहे हैं? किन्तु इस पर भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि वेदोक्त ब्रह्म को तो संभोग से कोई आपत्ति नहीं है। इसे वेद से ही दिखाते हैं - 

 स्वामी दयानन्द ने एक वेद मंत्र का अर्थ करते हुए लिखा है कि - "उस पुरुष (परमात्मा) के सामर्थ्य से घोड़े, ऊँट, गधे, गाय आदि उत्पन्न हुए हैं।" (यजु. ३१।८, दयानन्द भाष्य)

तब क्या कभी दयानन्दियों ने यह विचार किया कि निराकार ईश्वर ने ये सब जीव-जंतु आदि सृष्टि के समय कैसे उत्पन्न कर दिए? स्वामी दयानन्द के पास इसका उत्तर तो था, क्योंकि इसी मंत्र की व्याख्या शतपथ ब्राह्मण में लिखी है, किन्तु स्वयं के लज्जित होने के कारण उन्होंने यह वर्णन नहीं किया। हम दिखा देते हैं।

स्वामी दयानन्द द्वारा वेदों का भाष्य माने जाने वाले, प्रामाणिक माने जाने वाले एवं ऋषिकृत ग्रन्थ माने जाने वाले शतपथ ब्राह्मण में इसी वेदमंत्र की व्याख्या में लिखा है - "आत्मैव इदमग्रे आसीत् पुरुषविधः" (१।४।१)। अर्थात्, सृष्टि के आरंभ में परमात्मा पुरुषाकृति था। इस पहले ही वाक्य से आर्यसमाज का ईश्वर का शरीर न मानने का ही सिद्धान्त खंडित हो जाता हैं।  

परमात्मा ही प्रथम था। वह पुरुष के समान आकृति था। उसने अपने चारों तरफ देखा, अपने से अन्य किसी को न पाया।"

उसने दूसरे की इच्छा की (स द्वितीयमैच्छत)।

उसने अपने दो भाग किए, अर्थात् अपने से स्त्री को उत्पन्न किया। (स ह एतावान् आस, यथा स्त्री-पुमांसौ संपरिष्वक्तौ स इममात्मानं द्वेधाSपातयत्।)

उस परमात्मा ने सृष्टि-उत्पत्ति हेतु अपने को ही पुरुष और स्त्री बनाया, फिर उस स्त्री से संयोग किया। उससे मनुष्य उत्पन्न हुए (_ _ ततो मनुष्या अजायन्त _ १।४।४-५)।

तब स्त्री ने विचार कर कि यह मुझे अपने से उत्पन्न कर मुझी से संयुक्त होता है, मैं अपना रूप बदल लूँ—वह गाय बन गई, परमात्मा बैल बन गया। और उनके समागम से गाय-बैल आदि उत्पन्न हुए। (सा गौरभवद् वृषभ इतरः _ _ ततो गावोऽजायन्त। (१४।४।२।६-७))

क्यों दयानन्दियों! यहाँ तो वेद के अनुसार ही परमात्मा मनुष्य रूप, बैल रूप सहित सभी जीवों के रूप रखकर संभोग कर रहा है या नहीं? अतः वेद के अनुसार तो परमात्मा को संभोग से कोई आपत्ति नहीं है।

हमने इस पर आर्यसमाज के एक विद्वान पंडित शिवशंकर के हिन्दी अनुवाद को भी देखा, जो कि वैदिक यंत्रालय, अजमेर आर्यसमाज से प्रकाशित है। उसमें वे लिखते हैं - "सो यह विचारने लगी कि मुझको अपने से ही उत्पन्न करके मेरे साथ सहवास करता है। वह 'गौ' हो गई। परमात्मा साँड हो गया। उससे इसने सहवास किया, तब गाय की जाति उत्पन्न हुई। पुनः वह स्त्री घोड़ी हो गई, वह घोड़ा हो गया। वह खच्चरी हो गई, वह खच्चर हो गया, वह गधी हो गई, वह गधा हो गया। _ _ पिपीलिकाओं से लेकर जो भी कुछ जोड़ा दिखता है, उस सबको उसने इसी प्रकार से रचा।"

"एवमेव यदिदं कृञ्च मिथुनम् आ पिपीलिकाभ्यः, तत्त सर्वमसृजत्" (शत. १४।४।२।९)—इस तरह पिपीलिका तक समूची सृष्टि परमात्मा ने की।

स्वामी दयानन्द जिस वेदमंत्र से ईश्वर के द्वारा गधा, बैल, घोड़ा, भेड़ आदि का पैदा होना कह रहे हैं, उसी वेदमंत्र की व्याख्या का यह जो शतपथ में विस्तार है, क्या इसे भी अश्लील मानेंगे दयानन्दी? क्या इसे भी गपोड़ा कहेंगे? यहाँ परमात्मा क्या कर रहे है, जो कर रहे है वही पुराणों में शिव-पार्वती करते हैं, वही श्री राधा कृष्ण करते हैं। 

अतः परमात्मा, जिसने कि सभी जीवों को इस प्रकार से रचा कि संभोग से ही प्रजा बढ़े, उसे स्वयं यह करने से कोई आपत्ति नहीं है। वह सृष्टि की उत्पत्ति ही ऐसे करता है। हाँ, उनका संभोग या उनके साकार स्वरूप का संभोग मनुष्य के जैसा नहीं होता है। इसे मनुष्य के समान समझना मूर्खता हैं।

अतः हमारा आर्यसमाजियों से कहना है कि आप लोग पुराण में जहाँ भी अश्लीलता का दर्शन करते हैं, वह अश्लीलता नहीं है, बल्कि वे सभी कथाएँ वेदमूलक हैं और उनमें रहस्य छिपे हैं। पुराण वेद का ही अनुसरण करते हैं। इनमें अलौकिक लीलाएँ लौकिक आश्रय से वर्णित हैं। अतः एक की निंदा करना उचित नहीं है। स्वामी दयानन्द के कहने से जो दोमुँहा साँप दबाए बैठे हो, उसे थोड़ी देर के लिए निकालकर चिंतन करो, समझ में आ जाएगा। नहीं आता है तब दोनों स्थान पर अश्लीलता का दर्शन करो। मनुष्य बनो , दोगले पशु के समान व्यवहार करने से बचो।

✍️ शचीन्द्र शर्मा ( 20 सितंबर 2026 फेसबुक पोस्ट)

जेवर क्षेत्र का संबंध महर्षि जाबालि से माना जाता है, जिनके लिए रामायण में कहा गया - “आश्वासयन्तं भरतं जाबालिर्ब्राह्मणोत्तमः।

इस समाचार के विषय दो बाते विचारणीय हैं, जिनमें एक हास्यास्पद हैं। 

पहली तो यह कि जेवर क्षेत्र का संबंध महर्षि जाबालि से माना जाता है, जिनके लिए रामायण में कहा गया - “आश्वासयन्तं भरतं जाबालिर्ब्राह्मणोत्तमः। यदि आर्यसमाज वास्तव में समस्त ऋषि-परम्परा का संवाहक होता, जैसा कि वह दावा करता है, तब इनको महर्षि जाबालि का नाम आगे रखना चाहिए था। किंतु अपने पंथ के प्रवर्तक दयानन्द के नाम की मांग करना स्पष्ट करता हैं कि यह एक बाबा-पंथ है जिसका उद्देश्य है अपने पंथ प्रवर्तक को हर जगह घुसाना।

दूसरा - किसी प्रतिष्ठान का नाम अनुयायी अपने पंथ-प्रवर्तक के नाम पर रखवाना भी चाहे तो उसके कारण बताए जाते हैं कि - वे तो बड़े समाज सुधारक थे या बड़े धार्मिक नेता थे आदि आदि । 

किन्तु आर्यसमाज के नेताओ का "उचित कारण"देखिए, इनका कहना हैं कि - "जेवर में एयरपोस्ट की स्थापना हुई हैं, "इसलिए" इसका नाम महर्षि दयानन्द सरस्वती अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा रखा जाना चाहिए।

यानि इनके हिसाब से - कही भी कुछ भी स्थापित हो, तो चूंकि वह स्थापित हुआ है ये ही अपने आप में बड़ा कारण है कि उसका नाम दयानन्द के नाम पर रख दिया जाए। धन्य हो। :) 

बताइये भला ऐसा विलक्षण कारण अन्य कोई वर्ग या समाज दे सकता था क्या ? :) #मूर्ख_अनार्य_समाज

Thursday, 17 September 2026

गणेश जी बुद्धि के देवता हैं या बुद्धि ही गणेश हैं ।

🌹गणेश जी बुद्धि के देवता हैं या बुद्धि ही गणेश हैं 🌹

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ।।7.4।। 
                                          - श्रीमद्भागवत गीता

भगवान कृष्ण गीता के सातवें अध्याय के 4 श्लोक में कहते है कि - 
यह प्रकृति 
पंच महाभूत (भूमि गगन वायु अग्नि नीर)
 मन
 बुद्धि 
और मेरे अहSकार (DNA)से बना है।

भूमि गगन वायु अग्नि नीर को हम संक्षिप्त में भगवान कहते है।

 महाभूत अर्थात महाजीव होता है
अर्थात
इन पंच महाभूतों ने महाजीवों ने मिलकर एक भौतिक ढांचा निर्माण किया
जिसे अणु कहा गया है
इन अणुओ से बने शरीर में जब 
मन
बुद्धि
और 
अहमsकार (जीवन शुरू करने वाला एक निश्चित आकार अर्थात DNA) 
आ जाता है तो फिर जीवन की शुरुआत हो जाती है।

DNA से बनी एक कोशिका टूटकर 2 कोशिका बनाती है
2 टूटकर 4,4 से 8, 8से 16 ऐसे कोशिका बनते चले जाते है।
और यह दिखाई देने वाली प्रकृति बन गई।
सब जीवों में चाहे वह पेड़ पौधे हो या जीव जंतु सबमें DNA का स्ट्रक्चर एक जैसा ही है।

अरबों खरबों DNA से बने इस हमारे
शरीर का संचालन हाथ पैर करते है
लेकिन हाथ पैर को कार्य करने के लिए आंख कान नाक जीभ प्रेरित करते है
इन इंद्रियों को शक्ति मन देता है
मन भी एक पूरा का पूरा इंद्री है,अर्थात अंग है
जैसे नाक कान आंख हाथ पैर जैसे है वैसे ही मन भी शरीर का एक अंग है।

मन का निर्धारण बुद्धि करती है
अगर बुद्धि ने किसी बात को मान लिया तो मन सारे शरीर को उसी काम में लगा देता है
तो
शरीर का सुप्रीम बुद्धि हो गया।
मन सेनापति है तो बुद्धि उसका निर्देशक है

जहां बुद्धि लग जाती है वहां मन भी लग ही जाता है
मन के हारे हार है
मन के जीते जीत

जहां बुद्धि लग जाती है वहां मन को सफलता मिल ही जाती है
बुद्धि हर कार्य को सरल बना देती है,हर इच्छा को पूर्ण करने का उपाय ढूंढ लेती है,
बुद्धि ही आदमी को बाहर अंतरिक्ष तक लेकर जाती है,
बुद्धि ही आदमी को अंदर आध्यात्म तक भी लेकर जाती है
बुद्धि आदमी को सुख की ओर भगाती है
बुद्धि ही आदमी को संतुष्टि भी सिखाती है

बुद्धि ही परम चेतना है
बुद्धि को स्थितप्रज्ञ होने के लिए कहा गया है 
बुद्धि स्थिर होगी तो मन स्थिर होगा,
तो इंद्रियां भी स्थिर हो जाएंगी,मन और इंद्रियों का भटकाव विषय वासनाओं में से परे किसी एक कार्य में स्थिर हो जायेगा,इसी लिए प्राचीन ऋषि मुनि मन को स्थिर रखने के लिए ध्यान साधना तप की बात करते थे,आज के साधारण इंसान ध्यान साधना तप नहीं कर सकते तो पूजा करके मन को स्थिर रखने का अभ्यास करना विद्वानों ने सिखाया।

मानव मस्तिस्क को यदि किसी दीवाल पर टांग दिया जाए तो वह भगवान गणेश की तरह दिखाई देता है

बड़ा मस्तक, हाथी वाला सूंड,बड़ा पेट,पद्मासन पैर
सेम 
गणेश भगवान के आकार के सदृष्य 

क्योंकि 
मन यानी कार्तिकेय है
बुद्धि यानी गणेश ही है
दोनों को जन्म दिया है इस प्रकृति के निर्माणकर्ता परम पिता (पुरुष) और प्रकृति (माता) ने,
जिसे हम शिव और शक्ति,शंकर और पार्वती कहते है।

जो मस्तिष्क सब कुछ करवा रहा है
इह लोक (भौतिक दुनिया)से पर लोक (सूक्ष्म दुनिया) तक जाने का मार्ग प्रशस्त करता है उसकी पूजा क्यों न की जाए..?

किस स्वरूप में की जाए 
ये तत्कालिक बुद्धि पर निर्भर करती है
जिसकी जैसी बुद्धि होगी वह वैसी स्वरूप में पूजा करेगा।
पर
प्राप्त सबको होगा।

मै देख रहा हूं आजकल के बच्चे सब हाई ब्रीड पैदा हो रहे है
वनवासी या जंगल में रहने वाले माताओं के बच्चों में भी एक अलग ही बुद्धिमत्ता विकसित हो गई है।
या DNA की यात्रा है।

हम अपने 4,5 पीढ़ी पूर्व के पहले के दादा दादी को भूल चुके है पर DNA नहीं भूलता किसी भी नाती पोते में पूर्वजों के नाक कान आंख का अक्श आ जाते है,यह DNA की मेमोरी(बुद्धि) है,एक DNA में इतनी मेमोरी(बुद्धि) है जितनी पूरे गुगल की डाटा में नहीं होगी।
इतना ही नहीं
DNA इस मेमोरी को अगले 7 पीढ़ी तक की यात्रा तक ले जाता है,
जिसे आजकल के वैज्ञानिक DNA डिकोडिंग करके समझने की कोशिश की जा रही है

प्रकृति निर्माण करने वाली 8 सूक्ष्म विधाएं
पंच महाभूत
मन
बुद्धि
अहमSकार (DNA)

इनको जिसमें समझ लिया 
समझो उसने मंजिल देख लिया

गणेश चतुर्थी की आप सब फेसबुक मित्रों को शुभकामनाएं

गणेश चतुर्थी पर प्रोफेसर ताराचंद बेलजी की फेसबुक पोस्ट से
 

वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Wednesday, 16 September 2026

अनार्योंन्मूलन पर आचार्य महाप्रज्ञ की प्रतिक्रिया

आर्यसमाज के आचार्यों से निवेदन हैं कि - पुस्तक में केवल उन्ही ग्रंथो के प्रमाण हैं, जिनको आप आर्ष ग्रंथ, वैदिक ग्रंथ आदि कहते हो, जिनको कि दयानंद ने भी प्रमाण माना है, अतः इन प्रमाणो को आप क्या गलत सिद्ध करेंगे। ? इससे बेहतर हैं - किसी एक स्थान पर एकत्रित होकर हमसे इन विषयो पर सार्वजनिक शास्त्रार्थ कर लें। दयानंद-पंथ के किसी आचार्य में इतना साहस हैं ? अगर है तो सम्पर्क करे। 

नोट - आर्यसमाज के आचार्य ही सम्पर्क करें। नियोग से पैदा हुए अशिक्षित दयानंदी-रंगरूट दूर रहे।

चलिए भइया आपकी सफलता के गीत तो बजने लगे हैं बाज़ार में...ईश्वर उक्त नियोगी की इच्छा पूर्ण करें (यह पुस्तक जन जन तक पहुंचे ताकि लोग उस अधर्मी दयानंद के दलाली से परिचित हो सकें।) 
बहुत बहुत साधुवाद - दिव्यांश पांडेय 

मतलब तीर सही निशाने पर लगा है - रामांश भरत 

हिमांशु जुयाल

अब ये महाशय जो भी है आर्य समाज के पक्ष में शास्त्रार्थ की बात कर रहे हैं।
पर किस आधार पर करेंगे यह भी स्पष्ट कर दें क्योंकि वर्तमान आर्य समाजीयों में स्वाध्याय करने वाले नगण्य हैं मेरा अनुभव है कि अधिकांश दयानंद जी को मन ही मन भगवान मानते हैं ये अभिमानी दयानंद जी या आर्य समाज का कटुसत्य सुनना समझना नहीं चाहते और अपने पक्ष में आनलाइन मंच पर एक साथ आ कर वितंडावाद करते हैं ।

इसलिए जो भी शास्त्रार्थ करने आए उससे उसके प्रमाण और प्रमाणिक ग्रंथों की सूची लिखित में अवश्य लें ताकि वह अपनी बात से मुकरे नहीं। चंद्रशेखर शर्मा 

Monday, 14 September 2026

गायत्री मंत्र कोई मंत्र नहीं है, गायत्री मंत्र तो माँ है। बाल वृद्ध स्त्रियां सब जप सकते हैं ॥

गायत्री मंत्र कोई मंत्र नहीं है, गायत्री मंत्र तो माँ है। जैसे गौमाता तुम्हें दूध पिलाती है, वैसे ही गायत्री माता तुम्हें ज्ञान का दूध पिलाती है।

गायत्री मंत्र क्या है?

ये दुनिया का सबसे पुराना, सबसे वैज्ञानिक मंत्र है। ऋग्वेद में लिखा है। विश्वामित्र ऋषि ने इसे देखा था - बनाया नहीं, देखा था। जैसे सूरज को देखा जाता है, बनाया नहीं जाता।

पूरा मंत्र -

ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

एक-एक शब्द का अर्थ - गौमाता की तरह सरल

ॐ - शुरुआत, शिव, ब्रह्मांड की धड़कन, गाय के गले में घंटी की आवाज।

भूः - धरती - जहाँ हम रहते हैं, जहाँ गाय चरती है, जहाँ पेड़ उगता है।

भुवः - अंतरिक्ष - जहाँ साँस चलती है, जहाँ हवा है।

स्वः - स्वर्ग - जहाँ मन जाता है, जहाँ सपने हैं, जहाँ शिव हैं।

मतलब - जो धरती, आकाश और स्वर्ग - तीनों में है, वही शिव है।

तत् - वो - वो परमात्मा, वो शिव।

सवितुः - सूरज, सविता। जो सबको रोशनी देता है, जैसे गौमाता सबको दूध देती है। सविता मतलब - पैदा करने वाला।

वरेण्यं - सबसे सुंदर, चुनने लायक, पूजने लायक।

भर्गो - तेज, प्रकाश, जो अंधेरा मिटाए। भभूति का तेज भी भर्गो है, दीये का तेज भी भर्गो है, गौमाता की आँखों का तेज भी भर्गो है।

देवस्य - देव का, देने वाले का। देव कौन? - जो देता है, वही देव। गाय देव है, पेड़ देव है, गुरु देव है, शिव देव है।

धीमहि - हम ध्यान करते हैं, हम धारण करते हैं।

धियः - बुद्धि को, मन को, सोच को।

यः - जो।

नः - हमारी।

प्रचोदयात् - प्रेरित करे, सही रास्ते पर ले जाए, जगाए।

पूरा अर्थ एक लाइन में -

"हे धरती, आकाश, स्वर्ग में बसने वाले, सूरज जैसे तेज वाले, सबसे सुंदर, सबको देने वाले शिव, हम तुम्हारा ध्यान करते हैं, हमारी बुद्धि को तुम सही रास्ते पर ले चलो।"

गायत्री मंत्र क्यों सबसे बड़ा कहा? - 3 कारण

1. ये प्रार्थना नहीं, ये निवेदन है बुद्धि के लिए -
दूसरे मंत्र मांगते हैं - "धन दो, बेटा दो, रोग हटाओ।"
गायत्री मांगती है - "बुद्धि दे दो, सही सोच दे दो।"

क्योंकि बुद्धि सही तो धन अपने आप आएगा, रोग अपने आप हटेगा, जीवन अपने आप सुधरेगा।

इसीलिए इसे महामंत्र कहा।

2. ये सूरज का मंत्र है - विज्ञान है -
सवितुः - सूरज। गायत्री सूरज की शक्ति को जगाती है।

सुबह सूरज निकलता है, तो सारी सृष्टि जागती है, गाय जागती है, पेड़ जागते हैं। वैसे ही गायत्री जपने से अंदर का सूरज जागता है - आत्मा।

आज का विज्ञान कहता है - सुबह की धूप में विटामिन D है। सनातन हजारों साल पहले कह गया - सुबह गायत्री जपो, तो बुद्धि में विटामिन D आएगा - विवेक।

3. ये गौमाता का मंत्र है -
गायत्री में 24 अक्षर हैं, गाय के शरीर में भी 24 तत्व हैं - ऐसा वेद कहते हैं। गाय के 24 अंगों में 24 देवता हैं।

इसीलिए गाय को गौमाता कहा, और मंत्र को गायत्री माता। दोनों माता हैं, दोनों पालती हैं।

मेरे गुरुदेव डॉ शैलेन्द्र नाथ अघोरी बाबा जी कहते हैं - "गायत्री जपनी है तो गाय के साथ जपो, गायत्री सिद्ध हो जाएगी। गाय के बिना गायत्री आधी है।"

गायत्री मंत्र कैसे जपें? - सही विधि

विधि 1 - ब्रह्म मुहूर्त - सबसे उत्तम -
सुबह 4 से 6 बजे। सूरज निकलने से पहले।

नहाकर, भभूति लगाकर, पूर्व की तरफ मुँह करके बैठो - जहाँ से सूरज निकलेगा।
गाय के घी का दीया जलाओ।
108 बार, 11 बार, या 3 बार - भाव से।
जप के बाद - सूरज को जल दो, पीपल को जल दो, गाय को पहली रोटी दो। यही गायत्री की दक्षिणा है।

विधि 2 - गौशाला विधि - अघोर परम्परा -
गौशाला में बैठो, गाय को सहलाते हुए जपो।
गाय की आँखों में देखो और जपो - "तत्सवितुर्वरेण्यं" - गाय की आँखों में वही तेज है - भर्गो।
ये विधि सबसे जल्दी फल देती है, क्योंकि गाय खुद गायत्री है।

विधि 3 - साँस के साथ - मौन में -
साँस अंदर लो - "ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं"
साँस बाहर छोड़ो - "भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्"
ये चलते-फिरते, लोकल में, ऑफिस में भी कर सकते हो। कोई माला नहीं, कोई दिखावा नहीं।

गायत्री मंत्र कब नहीं जपना? - भ्रम तोड़ो

बहुत लोग कहते हैं - "औरतें नहीं जप सकतीं, फलाने नहीं जप सकते।" ये सब पाखंड है, धंधा है।

सनातन कहता है - गायत्री माता है, माता के पास जाने से कोई नहीं रोक सकता। माता सबकी है - बेटा भी जाए, बेटी भी जाए।

गायत्री कोई जात नहीं देखती, वो बुद्धि देखती है।
गायत्री कोई लिंग नहीं देखती, वो भाव देखती है।
गौमाता क्या देखती है - कौन आ रहा है? नहीं, वो तो सबको दूध देती है। वैसे ही गायत्री माता भी सबको ज्ञान देती है।

हाँ, एक नियम है - गायत्री को गंदे मन से मत जपो - किसी का बुरा करने के लिए मत जपो। ये बुद्धि का मंत्र है, दुर्बुद्धि का नहीं।

गायत्री और महामृत्युंजय में फर्क?

पिछले सवाल में महामृत्युंजय पूछा था।

महामृत्युंजय - शिव का मंत्र, जो मृत्यु के डर से बचाता है - "मृत्योर्मुक्षीय"।
गायत्री - शक्ति का मंत्र, जो बुद्धि को जगाता है - "धियो यो नः प्रचोदयात्"।

एक डर मिटाता है, दूसरा भ्रम मिटाता है। दोनों साथ जपो, तो जीवन पूरा।

सुबह गायत्री - बुद्धि के लिए।
शाम महामृत्युंजय - निर्भयता के लिए।

आज का प्रसाद -

आज से रोज सुबह, भभूति लगाकर, सूरज की तरफ देखकर, या गाय की फोटो देखकर, सिर्फ 11 बार बोलो -

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥

और अंत में बोलो - "हे गायत्री माता, हे गौमाता, मेरी बुद्धि को गौ जैसी पवित्र कर दो, शिव जैसी निर्मल कर दो।"

11 दिन में फर्क दिखेगा - सोच बदलेगी, गुस्सा कम होगा, मन शांत होगा।

जय गायत्री माता! जय गौमाता! जय गुरुदेव!

✍️ अमन शर्मा