शचीन्द्र - तत्क्षण पुनर्जन्म होता है, ऐसा कहीं नहीं लिखा है। बल्कि क्रम से जीव भिन्न-भिन्न लोकों की यात्रा करता है एवं अपने कर्मानुसार वहाँ निवास करता है। उन कर्मों की क्षति होने पर पुनः लौटता है। इसका विवरण सामवेद के ताण्ड्यमहाब्राह्मण तथा छान्दोग्य उपनिषद में विस्तार से मिलता है। जिससे ज्ञात होता है कि मृत्यु के अनन्तर तीन प्रकार की गतियाँ होती हैं - अर्चिमार्ग, धूममार्ग तथा उत्पत्ति-विनाश मार्ग। पूर्व के दो मार्गों को ही देवयान और पितृयान मार्ग कहा जाता है।
विज्ञान के अनुसार प्रत्येक वस्तु अपने सजातीय समूह की ओर स्वभावतः जाया करती है। इसलिए पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि तत्त्व से बना सूक्ष्म शरीर ही पार्थिव शरीर से निकलकर दूसरे लोकों और जन्मों में जाता है। इन सत्रह तत्त्वों में मन ही प्रधान है और वही मन चन्द्रमा की ओर वाहक शरीर के आकर्षण का कारण है। पर क्यों? क्योंकि विज्ञान का नियम है कि सजातीय पदार्थों में आकर्षण होता है। इसी प्रकार मन चन्द्ररूप है - "चन्द्रमा मनसो जातः" (पुरुषसूक्त)। इससे मनप्रधान सूक्ष्म शरीर का उसी सजातीय चन्द्रमा की ओर आकर्षण होता है। इसलिए चन्द्रमा के आकर्षण में बँधकर वह पितृलोक ही पहुँचेगा, जहाँ दिव्य पितरों का निवास है। वही मुख्य पितृलोक है।
यदि मन की प्रधानता न रहे और सूक्ष्म शरीर का कोई अन्य भाग प्रधान बन जाए, तो फिर उसके अनुसार गति होगी। जो तपस्वी, योगी या प्रबल उपासक होते हैं, वे बुद्धि-शक्ति को प्रबल कर मन को दबा देते हैं। बुद्धि सूर्य का अंश है, इसलिए इस वैज्ञानिक प्रक्रिया के अनुसार बुद्धि-प्रधान होने के कारण उन पर सूर्य का आकर्षण होता है। अतः वे सूर्य की ओर जाते हैं। सूर्य-मण्डल देवप्राणों की समष्टि है, इसलिए इस मार्ग को देवयान मार्ग कहा जाता है।
तीसरी गति जघन्य है। पृथ्वी के धन, पशु, गृह इत्यादि पदार्थों में जिसका मन अधिक फँस गया है, वहाँ पृथ्वी का आवरण मन पर चढ़ जाता है। जिस प्रकार तुम्बे में तैरने की शक्ति होने पर भी उसे मिट्टी से लपेट दिया जाए तो वह डूब जाता है, उसी प्रकार पार्थिव वस्तुओं की वासना प्रबल होने पर मन की शक्ति दब जाती है। जिसके फलस्वरूप चन्द्रलोक-गति नहीं बनती एवं जीव भूमि पर उत्पन्न होने और सैकड़ों बार मरने वाले कीट-पतंगों के प्रभाव में पड़ जाता है। इसे ही श्रुति ने "जायस्व म्रियस्व" (जन्म लो, भोगो, मरो) कहकर तीसरी गति कहा है।
सूक्ष्म शरीर जो भिन्न-भिन्न मार्गों पर, भिन्न-भिन्न लोकों में जाता है, वह किस प्रकार जाएगा? सूक्ष्म शरीर में ये अंश आते कैसे हैं? क्योंकि सूक्ष्म शरीर या आत्मा तो शक्तिविशेष है। इसका उत्तर वेदों के आधार पर विचार करके ब्रह्मसूत्र में इस प्रकार दिया गया है कि जिन पदार्थों का परस्पर सम्बन्ध होता है, संयोग रहता है, उनके वियोग होने पर भी एक पदार्थ का कुछ अंश दूसरे में बना रहता है। अर्थात जिन पदार्थों का परस्पर साथ रहता है, वे जब अलग होते हैं, तो एक का अनुशय-रूप कुछ अंश दूसरे के साथ देर तक बना रहता है।
जैसे एक लोटे में घी भर दिया जाए, तो घी निकाल लेने पर भी चिकनाई देर तक बनी रहती है। वह घृत का अनुशय या अंश है। ऐसे ही पुष्प से पवन का सम्बन्ध होता है, तो पुष्प का कुछ अंश पवन के साथ संयुक्त हो जाता है। इसी कारण हमें वायु में पुष्प की सुगन्ध की प्रतीति होती है। इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर ने जिस स्थूल शरीर में वास किया है, उसके कुछ अंश को वह अपने साथ लेकर निकलता है। उसी सूक्ष्म अंश को वेदों ने "अनुशय" वा "श्रद्धा" कहा है - "तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा श्रद्धां जुह्वति"।
जिस प्रकार वायु द्वारा आकर वस्त्र पर गर्द जम जाती है, उसी प्रकार पंचभूतों का एक स्तर जम जाने पर प्रज्ञात्मा का शरीर बन जाता है। इसे ही यातना-शरीर, भोग-शरीर अथवा वाहक-शरीर कहते हैं। जब तक दूसरे लोकों में भ्रमण करने वाला जीव नया शरीर ग्रहण न करे, तब तक यह भोग-शरीर नहीं मिटता। इस सम्बन्ध में यातना-शरीर की उत्पत्ति या परिवर्तन का क्रम मनुस्मृति में भी विशद रूप से निरूपित है।
तो यह मार्ग के शरीर की स्थिति हुई। लोकान्तरों में उनके अनुकूल ही शरीर बनता है। जैसे पृथ्वी पर आने के बाद भौतिक अनुशय ही पृथ्वी के पंचभूतों को ग्रहण कर नया शरीर बनाता है, और इस प्रकार शरीर-संयुक्त होने को ही "जन्म" कहते हैं। किन्तु पृथ्वी के अनन्तर अन्य लोकों में जीव के जाने पर यह भौतिक शरीर यहीं नष्ट हो जाता है। केवल अनुशय लेकर वह चन्द्रमा में जाता है। वहाँ चन्द्रमा का रस, सोम-भाग, इसमें सम्मिलित होकर एक सौमिक शरीर बनाता है। यह शरीर चन्द्रमा से अन्यत्र कहीं नहीं जा सकता। चन्द्रलोक से अन्यत्र जाने पर जीव इस सौमिक शरीर को छोड़ केवल अनुशय-भाग लेकर ही सूर्य या पृथ्वी में जाता है। सूर्य में भी वहाँ के अनुशय के कारण सूर्य का रस मिश्रित होकर सौर-शरीर बनता है। यह वैज्ञानिक प्रक्रिया ही कर्म-बन्धन-चक्र में परिभ्रमण का क्रम है। भिन्न-भिन्न शरीर ही भिन्न-भिन्न लोकों में जीवन की स्थिति के कारण वैदिक-विज्ञान से सिद्ध होते हैं।
वैदिक संस्कृति में जो श्राद्ध-प्रक्रिया चलती है, उसका मुख्य रूप से वैज्ञानिक सम्बन्ध इस चन्द्रलोक-गति के साथ है। चूँकि श्राद्ध के भोक्ता पितरों का निवास चन्द्रमण्डल में ही होता है। उक्त प्रक्रिया में हम जो श्रद्धा-रूप भूतों का अनुशय बता आए हैं, उसके पोषण के लिए ही श्राद्ध-कर्म किया जाता है।
मृत्यु के अनन्तर दाह होकर सबसे पहले दस दिनों में दशगात्र-पिण्ड दिए जाते हैं। गात्र-पिण्ड का अर्थ है - शरीर के बनाने वाले पिण्ड। यह सिद्ध ही है कि प्रत्येक वस्तु में निर्गमन के द्वारा क्षीणता आती है। उसकी पूर्ति का भी आयोजन होना चाहिए। जैसे हमारे इस भौतिक शरीर को एक बार भोजन प्राप्त कराने पर पुनः भोजन की आवश्यकता पड़ जाती है। यहाँ हम समर्थ होते हुए अपनी क्षीणता की पूर्ति उद्योग से आहार द्वारा कर लेते हैं। किन्तु मृतात्मा के वाहक-शरीर में जो क्षीणता आती है, उसकी पूर्ति करने में वे असमर्थ होते हैं।
किन्तु कोई कहे कि प्रकृति-नियमानुसार ही क्षीणता की पूर्ति होती रहेगी, तो भी श्राद्ध व्यर्थ नहीं होगा। क्योंकि ऐसा मानने पर भी यदि वायुमण्डल की मात्रा ही उनमें बढ़ जाएगी और सूर्य-चन्द्र के अंश अर्थात् बुद्धि या मन वायु से आक्रान्त होकर दब जाएँगे, तो सूर्य-चन्द्र का आकर्षण उन पर न रहने से उनकी सूर्याभिमुख एवं चन्द्राभिमुख गति रुक जाएगी। विज्ञान के नियमानुसार सजातीय पर ही आकर्षण हो सकता है। मन और बुद्धि चन्द्रमा एवं सूर्य के अंश हैं, अतः इन पर चन्द्रमा और सूर्य का ही आकर्षण हो सकता है। वायु पर उनका कोई आकर्षण नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में आत्मा की गति रुक जाएगी और वह इन लोकों में न जाकर वायु में ही इतस्ततः भ्रमण करती रहेगी। वायवीय शरीर प्रेत-पिशाचादि का होता है। अतः श्राद्ध न होने पर जीवात्मा के प्रेत-पिशाचादि योनि को प्राप्त होने की आशंका बनी रहती है।
इसी कारण सनातन धर्म के अनुयायियों में प्रसिद्ध है कि "अमुक व्यक्ति का श्राद्ध नहीं हुआ, वह तो वायु में उड़ता फिरता है।" इसी आपत्ति से पिता-माता के सूक्ष्म शरीरों को बचाने के लिए वेद पुत्रों को आदेश देते हैं कि "जिस समय तुम शरीर-विरहित थे, उस समय माता-पिता ने ही अपने अंशों से तुम्हारा शरीर बनाया था। आज वे माता-पिता शरीररहित होते जा रहे हैं, तो तुम्हारा कर्तव्य है कि उनका शरीर बनाओ।"
इसी वेदाज्ञा के अनुसार चावल आदि के पिण्डों में से सोम (सोम ही चन्द्र है) भाग पहुँचाकर अनुशय-भाग (शरीर) की पुष्टि करना ही गात्र-पिण्डों का उद्देश्य है।
अतः गात्र-पिण्डों का उद्देश्य चावल आदि के पिण्डों से सोम-भाग पहुँचाकर श्रद्धा-रूप अनुशय-भाग की पुष्टि करना होता है। वाहक शरीर में सोम-भाग परिपूर्ण होता रहे और चन्द्र-मण्डल का आकर्षण उन पर पड़ता रहे। इसका संकेत वेद-मन्त्र में भी स्पष्ट है -
यद् वो अग्निरजहादेकमङ्गं पितृभ्यो गमयन् जातवेदाः।
तद् व एतत् पुनराप्यययामि साङ्गाः पितरः स्वर्गे मादयध्वम्॥
अर्थात - "हे पितृलोक के पथिको! अग्नि ने तुम्हारा एक शरीर जलाकर तुमसे छीन लिया है एवं सूक्ष्म शरीर से तुमको पितृलोक में भेजा है। उस तुम्हारे छीने हुए शरीर को मैं पुनः पुष्ट कर देता हूँ। तुम साङ्ग बनकर स्वर्ग में आनन्द करो॥" (यह पिण्ड देने वाला पुत्र कहता है।)
येऽग्निष्वात्ता येऽनग्निष्वात्ता मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते।
तेभ्यः स्वराडसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयाति॥ (यजुर्वेद १९।६०)
“अग्नि से खाए हुए, अतएव 'अग्निष्वात्त' नाम से प्रसिद्ध तथा अग्नि से न खाए हुए, अतएव 'अनग्निष्वात्त' नाम से प्रसिद्ध पितर हमारे दिए हुए स्वधा-अन्न से अन्तरिक्ष में आनन्दित हो रहे हैं। उन मोदमान पितरों के लिए दीप्तिमान अग्नि कामनानुसार नवीन शरीर (आतिवाहिक शरीर) का निर्माण करता है।"
यहाँ यह भी विचारने की बात है कि ऐसी समस्त वैज्ञानिक प्रक्रिया को जानने वाले ऋषियों ने श्राद्ध में उन्हीं वस्तुओं को प्रशस्त माना है, जिनमें सोम की प्रधानता है।
यास्ते धाना अनुकिरामि तिलमिश्राः स्वधावतीः।
तास्ते सन्तूद्भ्वीः प्रभ्वीस्तास्ते यमो राजानु मन्यताम्॥ (अथर्ववेद १८।४।२६)
अर्थात - "मैं तेरे लिए जिन काले तिलों से युक्त खीलों को बिखेरता हूँ, वे तुझे परलोक में प्रचुर परिमाण में प्राप्त हों तथा उन्हें खाने के लिए यमराज तुझे आज्ञा दे।"
साभार - ✍️ शचीन्द्र शर्मा
फेसबुक पोस्ट दिनांक 4/10/2026