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Wednesday, 22 April 2026

राहु बाधा लक्षण और उपाय

👉 - राहु बाधा कैसी दिखती है_

_शास्त्र प्रमाण: बृहत्पाराशर होराशास्त्र 3.34_  
`राहुः सहसा फलदाता विघ्नकारी च कर्मणाम्। यत्र तिष्ठति तत्रैव भ्रमं च कुरुते भृशम्॥`  
_अर्थ:_ राहु अचानक फल देने वाला और कर्मों में विघ्नकारी है। जहां बैठता है वहीं भारी भ्रम पैदा करता है।
1. _गति:_ काम 80-90% पूरा होकर आखिरी समय अटक जाए। कोई कारण समझ न आए।  
2. _स्वरूप:_ बिजली गुल, इंटरनेट डाउन, फाइल डिलीट, मशीन लॉक, चेक बाउंस, अफसर ट्रांसफर, क्लाइंट का फोन बंद। राहु = तकनीक + बिजली + धुआं + भ्रम।  
3. _समय:_ बाधा हमेशा सबसे जरूरी मोड़ पर आएगी। टेंडर के आखिरी घंटे, पेमेंट वाले दिन, डील फाइनल होने से 10 मिनट पहले।  
4. _धन:_ पैसा आते-आते रुक जाए। उधारी फंस जाए। शेयर में आखिरी कैंडल लाल हो जाए। अचानक खर्चा आ जाए।  
5. _मन:_ बाधा आते ही बुद्धि काम न करे। शक, चिड़चिड़ापन, डर, नींद उड़ना। फैसला उल्टा ले लो और बाद में पछताओ।  
6. _आवृत्ति:_ ये 1 बार नहीं होता। राहु 18 महीने एक राशि में रहता है। इसलिए डेढ़ साल तक हर बड़े काम में 2-3 बार यही चक्र - चला, रुका, चला, फिर रुका।  
7. _रिश्ते:_ सबसे भरोसेमंद आदमी आखिरी समय धोखा दे या गायब हो जाए। साझेदारी टूटे।

_क्यों बुध-शुक्र से कंट्रोल:_ राहु अंधेरा और जहर है। बुध विवेक का दीपक है। शुक्र प्रेम का इत्र है। अंधेरे में जहर फैले तो दीपक जलाओ और इत्र छिड़को, जहर कटता है। वैसे ही बुध की बुद्धि और शुक्र की शांति से राहु वश में आता है।

_ उपाय:_  

_शास्त्र प्रमाण: मार्कण्डेय पुराण, दुर्गा सप्तशती_  
`अर्गलास्तोत्रपाठेन विघ्ननाशो भवेद् ध्रुवम्। राहुकेत्वादयो दोषा नश्यन्ति सहसा ततः॥`  
_अर्थ:_ अर्गला स्तोत्र के पाठ से विघ्न का नाश निश्चित है। राहु केतु आदि दोष तुरंत नष्ट होते हैं।
1. _दुर्गा = बुध + शुक्र दोनों।_ दुर्गा बुद्धि भी देती है, लक्ष्मी भी देती है। एक से दो ग्रह प्रसन्न।  
2. _अर्गला = कील।_ ये स्तोत्र राहु की बाधा को कीलित कर देता है। चलते काम में ताला लगाता है तो ये ताले की चाबी है।  
3. _राहु देवी का गण है।_ मां दुर्गा की आज्ञा राहु टाल नहीं सकता। इसलिए वैदिक मार्ग में सबसे सुरक्षित और अचूक है।
 - कैसे करना है_

1. _समय:_ _बुधवार या शुक्रवार_ सुबह सूर्योदय के बाद। दोनों दिन श्रेष्ठ। 21 दिन अखंड।  
2. _स्थान:_ घर का पूजा स्थान। पूर्व या उत्तर मुख बैठो। लाल आसन।  
3. _सामग्री:_ मां दुर्गा का चित्र, घी का दीपक, लाल फूल, लौंग-कपूर।  
4. _संकल्प:_ हाथ में जल लो। बोलो - "मम समस्त कार्येषु राहु जनित आकस्मिक विघ्न निवारणार्थं श्री अर्गलास्तोत्र पाठं करिष्ये।" जल छोड़ दो।  
5. _पाठ:_ _अर्गला स्तोत्र_ के 27 श्लोक का पाठ करो। संस्कृत न आए तो हिंदी में पढ़ो।  
   _शुरुआत:_ `ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी...`  
   _अंत:_ `...सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि॥`  
6. _आहुति:_ पाठ के बाद लौंग-कपूर से 3 बार आरती करो।  
7. _भोग:_ लाल फूल और मिश्री चढ़ाओ। प्रसाद खुद खाओ।  
8. _नियम 21 दिन:_ झूठ, मांस, मदिरा, कलह त्याग। बहन-बुआ-पत्नी से मीठा बोलो। बुध-शुक्र प्रसन्न रहेंगे।

_अगर संस्कृत नहीं पढ़ सकते तो ये 1 श्लोक 108 बार:_  
`सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥`  
_अर्थ:_ हे तीनों लोकों की ईश्वरी, तुम सभी बाधाओं को शांत करने वाली हो। हमारे शत्रुओं का नाश करो।

_3 दिन में:_ दिमाग का भ्रम कटेगा। रुके काम का रास्ता खुद दिखने लगेगा। अटका फोन आ जाएगा।  
_7 दिन में:_ जो फाइल, पेमेंट, अप्रूवल बिना कारण रुका था वो चल पड़ेगा। राहु की गांठ खुलती है।  
_21 दिन में:_ अचानक बाधा आनी बंद। काम की गति 1 जैसी रहेगी। बुध वाणी साफ करेगा, शुक्र लक्ष्मी टिकाएगा, राहु नौकर बनकर गुप्त मदद देगा।  
_6 महीने तक:_ चलते काम में ब्रेक नहीं लगेगा। टेक्निकल फॉल्ट, सर्वर डाउन, धोखा होना बंद। प्रतियोगी शांत।  
_स्थाई फल:_ जब तक आचरण शुद्ध रखोगे तब तक राहु दोबारा विघ्न नहीं देगा। गलती की तो मां दुर्गा भी नाराज होंगी।

`अर्गला पाठ जो करे, राहु बाधा जाए।  
बुध दे बुद्धि निर्मला, शुक्र लक्ष्मी लाए॥  
इक्कीस दिवस जाप कर, नियम धर्म अपनाय।  
रुका काम सब चल पड़े, विघ्न राहु मिट जाय॥`
जो व्यक्ति अर्गला स्तोत्र का पाठ करता है उसकी राहु बाधा चली जाती है।  
बुध निर्मल बुद्धि देता है और शुक्र लक्ष्मी ले आता है॥  
इक्कीस दिन जाप करो और नियम धर्म अपनाओ।  
रुका हुआ सब काम चल पड़ेगा और राहु का विघ्न मिट जाएगा॥
`दुर्गा के आगे झुके, राहु शीश नवाय।  
बुध शुक्र संग होय जब, सिद्ध काज सब आय॥`
दुर्गा के आगे राहु भी शीश नवाता है।  
जब बुध शुक्र संग हो जाएं तो सब सिद्ध काज आ जाते हैं॥
साभार - ओ पी शर्मा, दिल्ली 
            कुंडली ज्ञान 
संदर्भ - https://www.facebook.com/share/1E1NRBdtsV/

श्वेतवाराह कल्प

#श्वेतवराहकल्प-

( *सृष्टि* ) का प्रारम्भ १९७२९४९१२० वर्ष पूर्व हुआ था, इतने बृहत्तम इतिहास को भगवान् व्यास नारायण के अतिरिक्त लिखने में कोई अन्य समर्थ नहीं,उन्हीं भगवान् व्यास नारायण की कृपा से मैं इस *श्वेतवराह  कल्प के ७वें मन्वन्तर के २८ कलियुगों* के सार्वभौम जगदगुरुओं का सङ्केत मात्र में वर्णन करने का प्रयास कर रहा हूँ।

 *भगवान नारायण से चली आ रही हिंदुओं की गुरु शिष्य परम्परा:-* 

 *नारायण-->ब्रह्मा-->वशिष्ठ-->शक्ति-->पराशर-->व्यास-->शुकदेव-->गौड़पाद-->गोविंदपाद-->आदि शंकराचार्य ।* 

आदि शंकराचार्य जी ने चार शांकर पीठों की स्थापना करी। जिनमे प्रथम के चार शंकराचार्य नियुक्त किये गए जिनके नाम थे - पद्मपादाचार्य, तोटकाचार्य , हस्तमालकाचार्य , सुरेश्वराचार्य

श्रीमन्महाराज सार्वभौम युधिष्ठिर जी के २६३१ वर्ष व्यतीत होने पर स्वयं जगद्गुरु भगवान् शङ्कर आद्य शङ्कर भगवत्पाद् के रूप में इस धरा धाम पर प्रकट हुए थे । पूज्य भगवत्पाद् ने प्राचीन चतुराम्नाय सम्बद्ध चतुष्पीठों पर अपने चार प्रमुख शिष्यों को जगद्गुरु शङ्कराचार्य के रूप में ख्यापित किया था, यथा:- 

 # *ऋग्वेद* से सम्बद्ध पूर्वाम्नाय श्री *गोवर्द्धनमठ* *श्रीजगन्नाथ पुरी पीठ* पर पूज्य जगद्गुरु *पद्मपादाचार्य* जी को युधिष्ठिर संवत् २६५५ में (वर्तमान से २५०१ वर्ष पूर्व में ) अभिषिक्त किया।

# *यजुर्वेद* से सम्बद्ध दक्षिणाम्नाय *श्रीशृङ्गेरी-शारदामठ शृङ्गेरी,* पर पूज्य जगदगुरु श्री *हस्तामलकाचर्य* जी को युधिष्ठिर संवत् २६५४ में (वर्तमान से २५०२ वर्ष में ) पूर्व अभिषिक्त किया गया।

# *सामवेद* से सम्बद्ध पश्चिमाम्नाय *द्वारिका-शारदामठ द्वारिका* ,पर पूज्य जगद्गुरु श्री *सुरेश्वराचार्य* जी का युधिष्ठिर संवत् २६४९ में (वर्तमान से २५०८ वर्ष पूर्व में )अभिषेक किया गया।

और # *अथर्ववेद* से सम्बद्ध उत्तराम्नाय *ज्योतिर्मठ बद्रिकाश्रम* पर पूज्य जगद्गुरु श्री *तोटकाचार्यजी* को युधिष्ठिर संवत् २६५४ में (वर्तमान से २५०२ वर्ष पूर्व) अभिषेक किया ।

 *वर्तमान में* चतुराम्नाय चतुष्पीठों पर पूज्य जगद्गुरु महाभाग पूर्व में *पुरीपीठ में अनन्त श्री विभूषित भगवान् स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती* जी महाभाग अभिषिक्त हैं , गत २६ वर्षों से पीठ पर विराजमान हैं।

दक्षिण में *शृङ्गेरी मठ में पूज्य जगद्गुरु अनन्त श्री विभूषित भगवान् स्वामि श्री भारती तीर्थ जी* महाभाग अभिषिक्त हैं।

पश्चिम में *शारदामठ में पूज्य जगद्गुरु अनन्तश्रीविभूषित भगवान् स्वामि श्रीस्वरूपानन्द सरस्वती जी* महाभाग अभिषिक्त हैं, वे गत ३६ वर्षों से पीठ पर विराजमान हैं।

उत्तर में *ज्योतिर्मठ में पूज्य जगद्गुरु अनन्त श्री विभूषित भगवान् स्वामि श्री स्वरूपानन्द सरस्वती जी* महाभाग अभिषिक्त हैं, वे गत ४५ वर्षों से पीठ पर विराजमान हैं।

यह सार्वभौम जगद्गुरु की परम्परा अतिप्राचीन ही नहीं अपितु सनातन भी हैं।
कृत,त्रेता,द्वापर आदि युगों में मन्त्र दृष्टा ऋषियों से प्रसारित ज्ञान के द्वारा धर्म की व्यवस्था बनी रहती है।
किन्तु कलियुग में अल्पमेधा वाले,तपोबल और शुद्धता-पवित्रता रहित मनुष्यों को भगवत्साक्षात्कार,देवताओं का साक्षात्कार और ऋषियों का साक्षात्कार प्रत्यक्ष नहीं होता है। क्योंकि दिव्य महापुरुषों के दर्शनों की क्षमता नहीं होती है कलियुग के अल्पशक्ति सम्पन्न लोगों में..ऐसे में ऐसे मनुष्यों पर कृपा करने के लिये स्वयं भगवान् प्रत्येक द्वापर के अंतमें व्यास रूप में अवतार लेकर वेदों का विभाजन करके पुराणों के द्वारा वेदों का सरलीकरण करके जन-जन तक ज्ञान के प्रसार का मार्ग प्रशस्त करते हैं । 

उन्हीं भगवान् व्यास नारायण की सहायताके लिये जगद्गुरु भगवान् साम्ब शिव स्वयं अवतार धारण करते हैं, और व्यास जी के आदेश पर अपने चार प्रमुख शिष्यों को चतुराम्नाय चतुष्पीठों पर ख्यापित करके धर्म की पुनः स्थापना करते हैं।

श्री श्वेतवराहकल्प के सप्तम मन्वन्तर वैवस्वत का शुभारम्भ १२०५३३१२० वर्ष पूर्व हुआ था। वैवस्वत मन्वन्तरके *आद्य कलियुग* ११६६४५१२० वर्ष पूर्व में जब भगवान् ब्रह्माजी स्वयं व्यासजी के पद पर प्रतिष्ठित थे, तब भगवान् शिव ने उनकी सहायता के लिये जगद्गुरु श्वेत के रूप में अवतार लिया और चतुराम्नाय चतुष्पीठों पर अपने चार प्रमुख शिष्यों श्वेतलोहित, श्वेताश्व, श्वेतशिख और श्वेत को अभिषिक्त किया।
(यह चतुराम्नाय पूर्ववत ऋक्० ,यजु: ,साम और अथर्व के क्रम से है।
पाठक गण कृपया निम्न सूची को स्वयं इसी क्रम से चतुराम्नाय चतुष्पीठों से सम्बन्ध ज्ञात कर सकते हैं। )

 *द्वितीय कलियुग* के प्रारम्भ में ११२३२५१२० वर्ष पूर्व जब प्रजापति सत्य व्यासजी थे तब भगवान् शिव जगद्गुरु सुतार के नाम से अवतरित हुए,उनके चार प्रमुख शिष्य जगद्गुरु हुए ,केतुमान् ,हृषीक ,शतरूप व दुन्दुभि ।

 *तीसरे कलियुग* के प्रारम्भ में १०८००५१२० वर्ष पूर्व महर्षि भार्गव व्यासजी थे तब भगवान् शङ्कर जगद

गुरु दमन के रूप में प्रकट हुए और उनके प्रमुख शिष्य थे ,पापनाशन ,विपाप ,विशेष व विशोक।

 *चतुर्थ कलियुग* के प्रारम्भ में १०३६८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् अङ्गिरा व्यासजी थे और उनके सहायक भगवान् शङ्कर जगद्गुरु सुहोत्र केरूप में प्रकट हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए दुरतिक्रय ,दुर्दम ,दुर्मुख व सुमुख ।  

 *पञ्चम कलियुग* के प्रारम्भ में ९९३६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् सविता व्यासजी थे (शुक्लयजुर्वेद इन्हीं से प्रकट हुआ ) तब उनके सहायक भगवान् शङ्कर जगद्गुरु हँस (कङ्क) के रूप में प्रकट हुए ,उनके प्रमुख शिष्य थे ,सनत्कुमार ,सनन्दन ,सनातन व सनक । 

 *षट् कलियुग* के प्रारम्भ में भगवान् मृत्यु (सूर्यपुत्र- बालक नचिकेता के गुरु) व्यासजी के पद पर थे ,तब भगवान् महेश्वर  उनकी सहायता के लिये जगद्गुरु लोकाक्षीके रूप में प्रकट हुए,उनके प्रमुख शिष्य हुए,विजय संजय,विरजा व सुधामा।

 *सप्तम कलियुग* के प्रारम्भ में ९०७२५१२० वर्ष पूर्व भगवान् शतक्रतु (इन्द्र) थे,जो कि महर्षि भरद्वाज और विश्वामित्र के गुरु और प्राचीन व्याकरण के रचयिता थे,उनकी सहायतार्थ भगवान् शङ्कर जगद्गुरु जैगीषव्य के रूप में प्रकट हुए ,उनके शिष्य हुए-सुवाहन ,मेघवाहन ,योगीश व सारस्वत । 

 *अष्टम कलियुग* के प्रारम्भ में ८६४०५१२० वर्ष पूर्व भगवान् वसिष्ठ व्यासजी के पद पर थे (ऋग्वेद सप्तम मण्डल के दृष्टा ऋषि ,वसिष्ठ धर्मसूत्र ,वसिष्ठ शिक्षा व वसिष्ठ स्मृति की रचना इसी समय की ) उनकी सहायतार्थ भगवान् शङ्कर जगद्गुरु दधिवाहन के रूप में प्रकट हुए ,उनके शिष्य थे शाल्वल ,पञ्चशिख ,आसुरि व कपिल । 

 *नवम कलियुग* के प्रारम्भ में ८२०८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् सारस्वत व्यासजी थे ,उनके सहायक भगवान् शङ्कर जगदगुरु ऋषभ के रूप में हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए गिरीश ,भार्गव ,गर्ग व पराशर । 

 *दशमें कलयुग* के प्रारम्भ में ७७७६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् त्रिधन्वा व्यासजी थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु योगेश्वर हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,केतुशृङ्ग ,नरामित्र ,बलबन्धु व भृङ्ग , चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता इसी चतुर्युगी में हुए । 

 *एकादश कलियुग* के प्रारम्भ में ७३४४५१२० वर्ष पूर्व भगवान् त्रिवृत व्यासजी थे ,उनके सहायक  शिवावतार जगद्गुरु तप हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए प्रलम्बक ,केशलम्ब ,लम्बाक्ष व लम्बोदर । 

 *द्वादश कलियुग* के प्रारम्भ में ६९१२५१२० वर्ष पूर्व भगवान् शततेजा व्यासजी थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु अत्रि हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,शर्व ,साध्य ,समबुद्धि व सर्वज्ञ । 

 *त्रयोदश कलियुग* के प्रारम्भ में ६४८०५१२० वर्ष पूर्व भगवान् नारायण व्यासजी के पद पर थे ,उस समय उनके सहायक भगवान् शिवजगदगुरु बलि के रूप में प्रकट हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,विरजा ,वसिष्ठ ,काश्यप व सुधामा । 

 *चतुर्दश कलियुग* के  आदिमें ६०४८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् ऋक्ष व्यासजी के पद पर थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु गौतम थे (गौतमधर्मसूत्रके रचयिता ) ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,श्नविष्टक ,श्रवण ,वशद व अत्रि । 

 *पञ्चदश कलियुगमें* ५६१६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास के पद पर त्रय्यारुणि थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु वेदशिरा थे ,उनके प्रमुख शिष्य हैं ,कुनेत्रक ,कुशरीर ,कुणिबाहु व कुणि । 

 *षोडश कलियुग* में ५१८४५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास के पद पर देव आरूढ़ थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु गोकर्ण जी थे (जिन्होंने अपने भाई धुंधकारी को पिशाच योनि से मुक्त किया ) ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,बृहस्पति (अर्थशास्त्र के रचयिता ) ,च्यवन (आयुर्वेद के प्रवर्तक ) ,उशना(उशनास्मृति अथवा शुक्रनीति के रचयिता ) व काश्यप  ,चक्रवर्ती सम्राट भरत इसी चतुर्युग में हुए ।  

 *सप्तदश कलियुग* में ४७५२५१२० वर्ष पूर्व भगवत् व्यासके पद पर देवकृतञ्जय व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु गुहावसी थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,महाबल ,महायोग ,वामदेव व उतथ्य । 

 *अष्टदश कलियुग* के आदि में ४३२०५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास ऋतञ्जय थे ,व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु शिखण्डी थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,यतीश्वर ,श्यावास्य,रुचीक व वाचश्रवा । 

 *एकोन्विंशति कलियुग* में ३८८८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् भरद्वाज व्यासजी थे व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु माली थे ,उनके प्रमुख शिष्य प्रधिमि ,लोकाक्षी ,कौसल्य व हिरण्यनामा थे ,इसी चतुर्युग में भगवान् परशुरामजी हुए । 

 *विंशति कलियुग* के आदि में ३४५६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास गोतम ऋषि थे (गोतम न्यायदर्शन के प्रणेता ) ,उनके सहायक  शिवावतार जगद्गुरु अट्टहास हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए  कुणिकन्धर ,कबन्ध ,वर्वरि व सुमन्त । 

 *एकविंशति कलियुग* के आदि में ३०२४५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास जी  वाचाश्रवा थे उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु दारुक थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए गौतम ,केतुमान् ,दर्भामणि व प्लक्ष । 

 *द्वाविंशति कलियुग* के आदि में २५९२५१२० वर्ष पूर्व शुष्ययण व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु लाङ्गुली भीम हुए ,उनके प्रमुखं शिष

्य हुए श्वेतकेतु ,पिङ्ग ,मधु व भल्लवी । 

 *त्रविंशति कलियुग* के आदि में २१६०५१२० वर्ष पूर्व महर्षि तृणबिन्दु वेदव्यास जी थे (इन्हीं के दौहित्र महर्षि विश्रवा थे ) ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु श्वेत थे ,उनके शिष्य हुए कवि ,देवल ,बृहदश्व व उशिक । 

 *चतुर्विंशति कलियुग* के आदि में १७२८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् वेद व्यास थे ऋषि यक्ष ,उनके सहायक हुए शिवावतार जगद्गुरु शूली ,उनके प्रमुख शिष्य हुए शरद्वसु ,युवनाश्व ,अग्निवेश (धनुर्वेद के आचार्य -द्रोणाचार्य के गुरु) व शालिहोत्र ,इसी चतुर्युगी में वेदवेद्य जगदीश्वर श्रीरामभद्रका अवतार हुआ । 

 *पञ्चविंशति कलियुग* के आदि में  १२९६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यासके पद पर वसिष्ठ पुत्र शक्ति थे ,उनके सहायक शिवावतार मुण्डीश्वर हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए प्रवाहक ,कुम्भाण्ड ,कुण्डकर्ण व छगल । 

 *षड्विंशति कलियुग* के आदि में ८६४५१२० वर्ष पूर्व शक्ति पुत्र पाराशर भगवान् वेदव्यास के पद पर थे (विष्णुपुराण के संकलनकर्ता)  ,उनके सहायक हुए शिवावतार जगद्गुरु सहष्णु ,उनके प्रमुख शिष्य हुए आश्वलायन (शौनक शिष्य आश्वलायन ऋग्वेद की एक सम्पूर्ण शाखा के प्रवर्तक हैं ),शम्बूक ,विद्युत व उलूक । 

 *सप्तविंशति कलियुग* के आदि में ४३२५१२० वर्ष पूर्व महर्षि जातूकर्ण वेदव्यास थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु सोमशर्मा थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए वत्स ,उलूक ,कुमार व अक्षपाद । 

 *अष्टविंशति कलियुग* के आदि में ५१२० वर्ष पूर्व ,जिस दिन भगवान् श्रीकृष्ण इस धराधाम को अनाथ करके गोलोक धाम को गये ,भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासजी ने २८ वे वेदव्यास के पद पर रखकर महाभारत ग्रन्थ सहित १८ पुराणों व ब्रह्मसूत्र की रचना की व वेदोंका विभाजन किया । उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु योगेश्वर लकुलीश हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए पौरुष्य ,मित्र ,गर्ग व कुशिक (इन्ही जगद्गुरु कुशिक की दशवीं शिष्य परम्परा में आर्य उदिताचार्य हुए  जिन्होंने परमभट्टारक राजाधिराज समुद्रगुप्त के प्रतापी सत्पुत्र परम भट्टारक राजाधिराज चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के यज्ञ सम्पन्न किये थे ,व दो शिवलिंगों की स्थापना भी की थी-
देखिये गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय का गुप्त शक ६१ का मधुरा स्तम्भ लेख। 

२८वें भगवान्  वेदव्यास के आदेश पर ही शिवावतार जगद्गुरु  आदि शङ्कराचार्य जी ने अपने चार शिष्यों, श्रीपद्मपाद ,श्रीहस्तामलक,श्रीसुरेश्वर व श्रीतोटक को चतुष्पीठों पर जगद्गुरु कर रूप में ख्यापित किया।

जयति लोक शङ्कर:

Tuesday, 21 April 2026

हिंदू रक्षा यज्ञ

2 मई 2021 को जीतने के बाद ममता बनर्जी ने हिंदू परिवारों के ऊपर जो अत्याचार कराया, उस अत्याचार को देखकर स्वतंत्र भारतवर्ष में लोगों का कलेजा फट गया था और मोपला दंगे आदि और भारत विभाजन आदि की त्रासदी लोगों को दिखाई पड़ने लगी थी कि उस समय क्या हुआ होगा।

जब आज भारत की अपनी सेना है और प्रधानमंत्री की व्यवस्था है, इसके बावजूद भी इतनी बड़ी घटना हुई कि लगभग 12 से 15 हजार परिवार बंगाल से विस्थापित होने के लिए विवश हुए थे।

उसी समय गुरुदेव आचार्य श्री Kameshwar Upadhyaya जी ने उस पीड़ा के कारण व पीड़ित हिन्दुओं के लिए उसी दिन से काशी में दक्षिणेश्वर विश्वनाथ मंदिर में हिंदुओं की रक्षा के लिए एक यज्ञ शुरू किया था, जो आज तक 5 वर्ष से अनवरत चल रहा है। 

इसमें चार देवताओं का रक्षा विधान बनाया गया। श्री विष्णु के द्वादशाक्षर, माँ काली के एकाक्षर, भगवती बगलामुखी के 36 अक्षर मंत्र से, व भगवान शिव के अघोर मन्त्र से 5 वर्ष से निरन्तर रक्षा यज्ञ किया जा रहा है। स्वयं गुरुदेव ने निरन्तर यज्ञ किया व स्वास्थ्य अनुकूल न होने पर प्रतिनिधि से कराया परन्तु 5 वर्ष से यज्ञ भंग नहीं हुआ। 

इसके अतिरिक्त जब बांग्लादेश में हिंदुओं पर विपदा आई तो हवन बढ़ाया। हिन्दू रक्षा के लिए शतचण्डी और अति रुद्र का विधान गुप्त नवरात्रि में करवाया। अनेक साधकों ने गुरुदेव के निर्देशन में देश में जगह जगह पर विधान किया। व अभी बंगाल चुनाव से ठीक पूर्व चैत्र नवरात्रि में हिन्दू रक्षा हेतु शतचण्डी यज्ञ कराया गया है। केवल धर्म व हिन्दुओं की रक्षा के लिए ही यह विधान बनाए गए हैं।

और गुरुदेव को परम विश्वास था कि इसका शुभ परिणाम आएगा, प्रकृति बाध्य करेगी कि यह अन्याय समाप्त हो। इसके समाप्त होने की कोई भी स्थिति उत्पन्न हो सकती है, इसका लक्षण कुछ भी हो सकता है, लेकिन इसे समाप्त होना होगा।

उन्होंने जो चार प्रयोग आरंभ कराए थे। श्रीनिम्बार्क परिषद् ने ऐसे ही उद्देश्य से वराहदेव का आह्वान किया, कि हमारे हिंदू पुनः प्रतिष्ठित हो सकें बंगाल व सब जगह। इसके अलावा अन्य लोगों ने भी भगवान नृसिंह देव की आराधना की, कुछ लोगों ने भगवती की आराधना की। 

देश के अन्य कोनों में भी बहुत से लोगों ने आराधना शुरू की, लेकिन वो तात्कालिक पीड़ा धीरे-धीरे दूर होती चली गई और लोग विस्मृत हो गए कि वहां कुछ ऐसी घटना घटित हुई थी। पूरे बंग प्रदेश बंगाल बांग्लादेश में हिन्दुओं पर अत्याचार की कितनी ही घटना होती रहीं पर भुला दी जाती हैं।

लोगों को परिवारों को छोड़कर विस्थापित होना पड़ा था। पता नहीं आज भी मिदनापुर और तमाम जगहों में वो लोग असम आदि की सीमाओं से लौटकर के पुनः पूरी तरह से आ पाए हैं कि नहीं और उनकी संपत्ति पुनः उस रूप में प्राप्त हो सकी है कि नहीं?

लेकिन गुरुदेव आचार्य कामेश्वर उपाध्याय जी ने जो संकल्प लिया कि मुझे हिंदुओं की इस दुर्दशा के लिए कुछ ऋषिकर्म करना चाहिए। अब इस चुनाव में भारत सरकार की ओर से जो कार्य हो रहा है वह धर्म से युक्त कार्य है जो अत्यंत सराहनीय है। 

प्रधानमंत्री मोदी व गृहमंत्री शाह अपने प्रत्येक स्तर पर जितना हो सका वो हिंदुओं की रक्षा के लिए और वहां परिवर्तन के लिए वो सब कुछ कर रहे हैं। लेकिन वो भी मानते हैं कि 5 वर्षों तक वो विफल रहे, यह उनके भाषणों से स्पष्ट है क्योंकि देश की सरकार उनकी है, और वे स्वयं कहते हैं कि अनेक वर्षों से हिन्दुओं को यहां अत्याचार सहना पड़ रहा है। 

और 5 वर्ष तक वहां पर जो भी चलता रहा वो अमानवीय था और हिंदुओं के विरुद्ध था। जो भी रिपोर्ट वहां से मिलती रही माननीय गृहमंत्री जी को, उसका उन्होंने कलेक्शन करके और प्रत्येक स्तर पर आज जो उन्होंने प्रतिकार किया है, और चारों दिशाओं से घेराबंदी की है, एक सकारात्मक वातावरण बनाया है, आशा की किरण जगाई है. उसमें भगवती की दी हुई बुद्धि और भगवती की दी हुई संरचना के कौशल से ही हमारा आज भारत सरकार का अभियान वहां सफल दिखाई दे रहा है और चुनाव आयोग भी आज वहां सफल दिखाई दे रहा है।

कहीं न कहीं उसी का प्रभाव है कि ममता बनर्जी आज विचलित, हतप्रभ और दुर्बल दिखाई दे रही हैं, और संपूर्ण विश्वास है कि बंगाल में अब वैसा परिवर्तन होगा कि अब वहां से हिंदू भाग करके किसी अन्य जगह पर अपना ठौर नहीं ढूंढेगा।

अखिल भारतीय विद्वत्परिषद से जुड़े अनेक संगठन और उनसे प्रेरणा लेकर अनेक लोगों ने भी देश में जगह-जगह बंगाल के शुभ के लिए अनुष्ठान किए।

आचार्य श्री विनय झा जी, आचार्य श्री कामेश्वर उपाध्याय जी, उभय आचार्य बार-बार प्रेरित करते हैं कि यज्ञ किया जाए। भारत की समृद्धि के लिए, साम्राज्यवादी शक्तियों के सामने भारत खड़ा हो सके, डीप स्टेट के सामने भारत खड़ा हो सके, डीप स्टेट भारत को रौंद न सके, इसके लिए भगवती पराशक्ति की आराधना चलनी चाहिए, उसके लिए दक्षिणेश्वर विश्वनाथ मंदिर सतत सन्नद्ध है।
 
और बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी हल्ला-गुल्ला के, शांत ढंग से अनवरत वहां पर यज्ञ चल रहा है कि कैसे सनातन धर्म उत्तरोत्तर उत्कर्ष को प्राप्त कर सके और उसका विस्तार हो सके। केवल भारत में हम सिमटते रह जाएं ये हम नहीं चाहते, हिन्दुत्व का विस्तार हो सके।

सतत अजस्र घृतधारा का परिणाम वैश्वानर आज देने के लिए विवश हैं। अग्निदेव ने जो अजस्र घृतधारा का भक्षण किया है, उसके बदले में वो हिन्दू समाज को आज बहुत कुछ देने जा रहे हैं बंगाल में। और आज बंगाल का हिंदू एक विकट दासता और जड़ता से मुक्त होने के कगार पर खड़ा है। और विश्वास है कि शतमंगल अग्नि यहां मंगल ही मंगल करेगी

और आज वो लोग जो UGC की दुर्भावना से व्यथित हैं, उनके भी हृदय में यह भावना है कि हिंदू उत्पीड़न का यह परिदृश्य जो बंगाल में दिखाई दे रहा है, वह तत्काल बंद होना चाहिए। क्योंकि वस्तुतः जो लोग हिंदुत्व के लिए सोचते हैं और जीते हैं, वो एक भी हिंदू को कष्ट में नहीं देखना चाहते हैं। किसी भी प्रकार की पार्शियलिटी हो, जिसे अन्याय कहते हैं, वह समाज में नहीं होना चाहिए। 

लेकिन जो भारतवर्ष के भीतर छुपे हुए क्रिश्चियन हैं, और जो प्रहार कर रहे हैं नाम बदल कर के गाली-गलौज और ये सब कर रहे हैं, समाज में आग लगाने का कार्य कर रहे हैं, प्रकृति उनका भी एक दिन भक्षण कर जाएगी।

कभी ब्रिटेन ने सोचा नहीं था कि उसकी दुर्गति होगी। आज ब्रिटेन वासी, आज लंदन वासी वहां के अनेक क्षेत्रों में जा नहीं सकते क्योंकि वहां वो जाएंगे तो उनकी जान चली जाएगी। आज लंदन के भीतर क्रिश्चियन ठीक उसी तरह से घिर गया है जिस तरह से उसने हिंदुओं को भारतवर्ष में घेरने का काम किया था। 

आज उनका स्वयं का साम्राज्य निरंतर ढहता चला जा रहा है और पता नहीं कि कब ब्रिटेन ईसाई राष्ट्र से इस्लामिक राष्ट्र में बदल जाएगा, ये कहना कठिन है। ब्रिटेन के नाश के लिए 'ताम्रवंशविध्वंसनाय स्वाहा' की आहुतियाँ संत देते रहे हैं। जिसके साम्राज्य में सूरज नहीं डूबता था वहां मजहब की हरी रात है और जिस फारस में मजहब का झंडा बुलंद रहता था वह यहूदों के अटैक से खंडहर बन रहा है। 

तमाम घटनाएं जो घट रही हैं, वह परिवर्तन की हैं। और हिन्दू अपना शुभ परिवर्तन ही करेंगे, यह हमारा संकल्प है, और जो हिन्दुत्व के विरोधी हैं, उनके लिए एक ही सन्देश है "'"यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ""। नहीं तो उनके लिए एक दूसरा सन्देश भी है, ""मुखेन काली जगृहे रक्तबीजस्य शोणितम्""।  

अखिल भारतीय विद्वत् परिषद् और तमाम संगठनों के द्वारा एक प्रयास हो रहा है कि देश का तपस्वी, साधक वर्ग देश के लिए खड़ा हो और सतत यज्ञ में निरंतर बिना किसी के कहे लग जाए। चमत्कार हो जाएगा।

ये तपस्वियों का दायित्व है कि उस तपस्थली भारत को बचाएं कि वो तपस्या कर सकें। यदि भारत इस्लाम या ईसाईयत में बदल जाएगा या अन्य विधर्मी राष्ट्र में बदल जाएगा तो हमें तपस्या भी नहीं करने दी जाएगी। अगर उन्हें ज्ञात हो जाएगा कि कोई ये हिंदू व्यक्ति है जो तपस्या कर रहा है तो उसकी हत्या वैसे ही होगी जैसे दंडकारण्य में खर-दूषण करते थे।

तो एक अजस्र घृताहुति पड़ती रहनी चाहिए। धर्म के लिए, हिन्दुत्व के लिए, हिन्दुओं के लिए। जयतु जयतु हिन्दूराष्ट्रम्। 

गुरुदेव आचार्य श्री कामेश्वर उपाध्याय जी के भाव उन्हीं की एक पुरानी कविता में-------

"विश्वेदेवः सविता पवमान माँगता हूँ 
राष्ट्र के लिए वरदान माँगता हूँ ॥ 

मन में ऋषित्व, घोर बल में वलिवर्द हों 
तप में प्रदीप्त सूर्य, जग में यशस्विता; 
नभ में हो शान्त स्वर, गति में प्रवेग हो
धन-धान्य पूर्ण मही, भावना हो गर्विता,

सृष्टि में स्पन्द का अवदान माँगता हूँ 
राष्ट्र के लिए वरदान माँगता हूँ ॥ 

तत्त्वों का ज्ञान हो, बल का अनुमान हो 
गुण का सम्मान हो राष्ट्र की परंपरा; 
प्राची प्रशस्त हो, शत्रु शैन्य ध्वस्त हो 
राक्षसों के वक्ष पर जयिनी हो अपरा 

सारथी के रूप में भगवान् माँगता हूँ
राष्ट्र के लिए वरदान माँगता हूँ ॥"
–– Mudit Agrawal
बैशाख शुक्ल ५, विक्रम संवत २०८३, 21 अप्रैल 2029 ईस्वी 
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वयं राष्ट्रे जागृयाम 

ईश्वर "साकार" पौराणिक आर्य मत / "ईश्वर" निराकार आर्य समाजी मत पर मधुलिका जी के लेख का शचींद्र जी द्वारा उत्तर -४

प्रिय मधुलिका जी - पहले तो आपने वेदमंत्र ही अशुद्ध लिखा है। "दे शीर्ष" नहीं, बल्कि "द्वे शीर्षे" हैं। "हस्तासी" नहीं, "हस्तासो" हैं। "महोदेवा" नहीं, "महोदेवो" हैं। "त्रिचा" नहीं, "त्रिधा" होगा। "मत्यांम्" यह भी अशुद्ध है। एक वेदमंत्र लिखने में इतनी अशुद्धियाँ?

फिर आपने "भरे" को "मेर" लिख दिया है। "धातु" को "बातु" लिख दिया है। "वाले" को "बाले" लिख दिया है। "महान्" को "महानु" लिख दिया है। और भी दर्जनों अशुद्धियाँ हैं। 

वेदमंत्र में करने के साथ-साथ अन्य इतनी अशुद्धियों पर कोई बहाना चल सकता है क्या? जबकि आप किसी संस्थान की उपप्राचार्या हैं? और हमारे खंडन में यह लेख आपने और उसी संस्थान के "प्राचार्य" ने मिलकर लिखा था। और अग्निव्रत नैष्ठिक जी इसे देखकर प्रमुदित हो गए और शेयर कर रहे हैं। तो यह हाल है इनका। ये तो केवल लेख के एक अंश की अशुद्धियाँ हैं। धन्य हो।

पर ये बेचारे भी विवश हैं। यह तो इनकी गुरु-परंपरा है। स्वामी दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश में लगभग चार से पाँच हजार अशुद्धियाँ करके गए हैं। तब से आज तक ये अपने विद्वानों की, अलग-अलग समय पर कमेटियाँ बनाकर, अनेक बार उसे शुद्ध करने का प्रयास कर चुके हैं, पर कमबख्त यह शुद्ध ही नहीं हो पा रही है। अतः यह तो विरासत है इनकी। अगर ये शुद्ध-शुद्ध लिख देंगी तो गुरुद्रोह न हो जाएगा? अब विषय पर आते हैं -

स्वामी दयानन्द ने संस्कृत विग्रह किया – "निर्गतः आकारः यस्मात् सः निराकारः", और इसका अर्थ या अभिप्राय व्यक्त किया गया – "परमेश्वर किसी भी प्रकार के आकार, आकृति, रूप वा सीमा से रहित है।" अब प्रश्न है कि क्या यह अर्थ अथवा अभिप्राय इस विग्रह से निकलता है? उत्तर है – नहीं।

यहाँ ‘निर्गत’ में भूतकालिक कृदन्त है, जो पहले की उपस्थिति का सूचक है। अर्थात् पूर्वावस्था और निर्गमन इसका स्वभाव हैं। जहाँ ‘निर्गत’ होगा, वहाँ पूर्व में स्थित था, यह अनिवार्य है। यदि आकार पहले से ही ‘नहीं’ था, तो ‘निर्गत’ शब्द का प्रयोग व्याकरणतः व्यर्थ, निरर्थक, अयुक्त है। जब 'निर्गत' होगा तो किसी पूर्वाधार से संबंध मानना ही पड़ेगा। एवं जब धात्वर्थ बाधित नहीं है, तब उसके स्थान पर अन्य अर्थ ग्रहण करना व्याकरणसम्मत नहीं है। यही सब विचार करके ही तो स्वामी जी ने बाद में इसे बदलकर तत्पुरुष बनाया। अर्थात् स्वामी दयानन्द ने अपनी भूल स्वीकार कर सुधारने का प्रयास किया, किन्तु देवी मधुलिका जी मानना नहीं चाहतीं -क्योंकि स्वामी जी का दोष मान लें, तो फिर किस मुख से उन्हें ‘महर्षि’ कहेंगी?

मधुलिका जी कह रही हैं कि – "स्वामी जी का अभिप्राय ऐसा नहीं था, वैसा था।" यह बड़ी हास्यास्पद बात है। क्या ‘अभिप्राय’ बोल देने से अपनी बात सिद्ध हो जाती है?

मधुलिका जी को बताना चाहिए था कि स्वामी जी का अभिप्राय इस शब्द से सिद्ध है या इस विग्रह से सिद्ध है? यह कहना कि "अभिप्राय ऐसा नहीं था, वैसा था" – यह तो प्रामाणिक चर्चा से निकलकर भाग जाना हुआ।

यदि कोई लिखे – "नीलगतो वर्णो यस्मात्" और फिर अर्थ लिख दे – "जिसका कोई वर्ण नहीं है", तो क्या केवल यह कह देने से कि "मेरा या मेरे स्वामी जी का अभिप्राय यह नहीं था, बल्कि यह था" – यह अर्थ मान लिया जाएगा? कदापि नहीं।

तात्पर्य शब्दानुगत होना चाहिए, शब्द तात्पर्यानुगत नहीं बनाए जा सकते। क्या इतनी समझ भी मधुलिका जी में नहीं है?

हमने कहा था कि इस विग्रह से साकार सिद्ध होता है, क्योंकि पहले आकार था, इसीलिए तो निकल गया। यदि कोई आकार नहीं था, तो निकल क्या गया? हमारी यह आपत्ति स्वाभाविक थी, क्योंकि ‘निर्गतः’ शब्द ऐसा ही है।

नगरात् निर्गतः , गृहात् निर्गतः , शरीरात् प्राणो निर्गतः ,कोशात् खड्गो निर्गतः - इन सबमें एक ही बात है – पूर्वसंबंध और निष्क्रमण। अतः “निर्गतः” शब्द में यह भाव स्वाभाविक रूप से निहित है कि कोई वस्तु पहले किसी से संबद्ध थी, और फिर उससे पृथक हुई।

तब जब कहा गया – "निर्गतः आकारः यस्मात्", तब प्रश्न उठता है कि – क्या आकार उससे पहले संबद्ध था? यदि नहीं, तो फिर ‘निर्गतः’ क्यों कहा गया? यदि आकार सर्वथा था ही नहीं, तो निर्गत किसका हुआ?

मधुलिका जी ने इस आपत्ति के उत्तर में बस "ऋषि का अभिप्राय" कह दिया। यह कैसा उत्तर है, देवी जी? "ऋषि का अभिप्राय यह था" – कह देने से व्याकरण-दोष नहीं मिटता। केवल अभिप्राय के आधार पर शब्दार्थ परिवर्तित नहीं किया जा सकता। आपको बताना था कि ऐसा अर्थ व्याकरणतः अथवा प्रयोगतः कैसे मान्य है?

किन्तु मधुलिका जी ने ऐसा कोई श्रम करना आवश्यक नहीं समझा, अथवा वे असमर्थ रहीं। इसलिए वे क्या करती हैं? उनका उत्तर है – "ऋषि का अभिप्राय ये था", "आप पूर्वाग्रही हैं", "आप शब्दकोश पर चल रहे हैं।"

मधुलिका जी का यह कहना कि – "आप तो शब्दों का अर्थ ग्रहण कर रहे हैं, स्वामी जी का अभिप्राय ऐसा नहीं था" – इससे हमारा पक्ष आपने स्वयं सिद्ध कर दिया। वस्तुतः यह तर्कदोष है। ऐसा कहने से आपके पक्ष का क्या सिद्ध हुआ? उत्तर है – कुछ भी नहीं।

मधुलिका जी कहती हैं कि – "आपकी आपत्ति शब्दों का केवल शब्दकोश पर आधारित अर्थ करने की है।"

यह भी इनकी मिथ्या आपत्ति है, क्योंकि हमारा तर्क ‘केवल शब्दकोश’ पर आधारित नहीं है। यहाँ अन्य आधार भी हैं –
पहला, व्युत्पत्ति – ‘निर्गत’ का सामान्य निष्क्रमण-बोध। दूसरा, वाक्यबोध – "निर्गतः आकारः यस्मात्" का स्वाभाविक अर्थ क्या निकलता है?तीसरा, दार्शनिक परिणाम – यदि आकार ‘निर्गत’ कहा गया, तो आकार-संबंध की पूर्वकल्पना क्यों न मानी जाए?

मधुलिका जी आगे एक वैदिक मन्त्र का उदाहरण देती हैं और कहती हैं कि यदि शब्दशः अर्थ किया जाए, तो अनर्थ हो जाएगा। यह भी बड़ी हास्यास्पद बात है। यह उदाहरण यहाँ लागू नहीं होता, क्योंकि वहाँ मन्त्र है और यहाँ स्वयं प्रदत्त व्युत्पत्ति है। यहाँ कोई रहस्यमयी मन्त्र नहीं है जो निरुक्तपरक व्याख्या माँगे। अतः यह तुलना अनुचित है। मन्त्र में लाक्षणिकता सम्भव है, किन्तु यहाँ व्याकरणिक विग्रह की चर्चा हैअतः यहाँ वाच्यार्थ को प्राथमिकता मिलेगी।

वैदिक मन्त्र रूपकात्मक है और ‘निर्गत’ शब्द व्याकरणिक है। रूपक में लक्षणा अथवा व्यंजना हो सकती है, किन्तु व्याकरणिक शब्दों में मुख्य अर्थ (वाच्यार्थ) ही प्रथम मान्य होता है। यत्र वाच्यार्थो न बाध्यते, तत्र लक्षणा न गम्यते। अतः यहाँ भी देवी मधुलिका हँसी की पात्र बन बैठीं। 

कुल मिलाकर, मधुलिका जी ने यहाँ विग्रह और अर्थ की असंगति के दोष को छिपा लिया और केवल ‘अभिप्राय’ का सहारा लिया, पूर्वाग्रह का आरोप लगाया और अप्रासंगिक वैदिक मन्त्र का उदाहरण दे दिया। इस सबसे उन्होंने कुछ सिद्ध नहीं किया।

आगे मधुलिका जी कहती हैं कि ‘निरंजन’ में ‘निर्गतः’ का अर्थ ‘पृथग्भूतः’ होने से ‘निराकार’ में भी ‘निर्गतः’ का अर्थ ‘पृथक्’ होगा – किन्तु यह अयुक्ति है।

एक पद से दूसरे पद का अर्थ सिद्ध नहीं होता। ‘निरंजन’ और ‘निराकार’ भिन्न शब्द हैं। एक की व्युत्पत्ति दूसरे पर लागू करना शास्त्रीय रूप से असंगत है। निरंजन और निराकार दोनों में उत्तरपद भिन्न है। 

‘नि’ का अर्थ ‘अभाव’ भी होता है - यह एक सामान्य कथन है; किन्तु यहाँ यह निर्णायक नहीं है। संस्कृत में अर्थ का निर्णय केवल उपसर्ग देखकर नहीं होता, बल्कि मूल धातु या पद, समास की रचना, वाक्य में प्रयोग, प्रसंग तथा विग्रह आदि को देखकर किया जाता है। जैसे -‘निर्जल’ (जलरहित), ‘निर्गम’ (बाहर जाना), ‘निर्वाह’ (पालन), ‘निर्वचन’ (व्याख्या)।

अतः यह कह देना कि ‘नि’ कभी ‘अभाव’ का बोध भी कराता है, ‘निर्गत’ के अर्थ को निर्धारित नहीं करता।

‘निर्मक्षिकम्’ का उदाहरण भी यहाँ उपयुक्त नहीं है, क्योंकि वह एक विशिष्ट पद है, जहाँ रचना सीधे अभावबोधक है; किन्तु यहाँ ऐसी स्थिति नहीं है, यहाँ तो विग्रह दिया गया है।”

यदि अर्थ यह ग्रहण करना था कि आकार का सर्वथा अभाव हो, तो "नास्त्याकारो यस्य सः निराकारः" अथवा "अविद्यमान आकारो यस्य" – ये सरल विग्रह किए जाते।
स्पष्ट है कि मूल विग्रह दोषयुक्त है और बाद में उसे बचाने के लिए अर्थ बदला जा रहा है। निर्गतः आकारः यस्मात्” में “निर्गत” का मुख्य अर्थ निष्क्रमण (निकला हुआ) ही ग्रहण करना होगा, न कि अभाव या केवल पृथक्करण। इस विग्रह से किसी भी प्रकार से सर्वथा निराकार सिद्ध नहीं होता हैं। ________क्रमशः।
✍️ शचींद्र शर्मा 
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वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Monday, 20 April 2026

तंत्र साधना की प्रथम शिष्या पार्वती और प्रथम गुरु शिव हैं🌹

🌹तंत्र साधना की प्रथम शिष्या पार्वती और प्रथम गुरु शिव हैं🌹

      तंत्र के मूल में शिव और शक्ति हैं। परमेश्वर के जितने अवतार हुए हैं, सभी के मूल में आद्याशक्ति की ही लीला रही है। जैसे--राधा-कृष्ण, सीता-राम आदि। लेकिन तंत्र में पहले शिव-शक्ति या शंकर-पार्वती आता है। महादेव का नाम पहले आता है। तंत्र का प्रादुर्भाव करने के लिए और जगत में प्रकाश करने के लिए सर्वप्रथम शिव ने पार्वती को तंत्र का गूढ़ रहस्य बताया था। पार्वती तंत्र की पहली पात्रा हुईं अर्थात् गुरु-शिष्य परम्परा में पार्वती पहली शिष्या बनी और शिव बने प्रथम गुरु। लेकिन विश्वब्रह्माण्ड के विस्तार के लिए शक्ति का ही आश्रय लिया गया। इसलिए शक्ति को पहले बोला जाने लगा। जैसे--लक्ष्मी-नारायण, उमा-महेश और उन्हें लक्ष्मीपति व उमापति कहा जाने लगा।
       किसी भी देवी-देवता के मंदिर में सात्विक पूजा-उपासना हो या हो तामसिक साधना, दीपक प्रज्ज्वलित करना आवश्यक है। एक प्रकार से साधना की पूर्णता का प्रतीक है दीपक। जब तक साधना में दीपक का प्रकाश नहीं होगा, पूजा-उपासना, आराधना-साधना का और मन्त्रों के उच्चारण का कोई फल नहीं मिलता है। दीपक की नीली ज्योति साक्षात् शिव है और उसके चारों ओर फैली हुए पीली ज्योति साक्षात् शक्ति है। वह शिव और शक्ति रूपी दीपक की लौ ही हमारी साधना-आराधना-अर्चना आदि की साक्षी है। सायंकाल शुद्ध घी का दीपक जिस घर में जलता है, उस घर में साक्षात् शिव और पार्वती का वास होता है। अगर हमें साधना में आगे बढ़ना है और करनी है प्रगति तो रात्रि-जागरण का अभ्यास करना पड़ेगा। दरअसल दिन गृहस्थों का और रात्रि साधकों की होती है। सच्चा साधक रात में जागता है क्योंकि रात्रि की निस्तब्धता जरुरी है साधक के लिए।
      साधना में जल का भी बड़ा महत्व है। जल चाहे प्रकृति के रूप में हो या साधना के क्षेत्र में हो, चाहे श्राप या आशीर्वाद देने में हो, जल का अपना विशेष महत्व है। सर्वप्रथम पृथ्वी पर जल की ही उत्पत्ति हुई। उसी के द्वारा जगत में जलशक्ति का स्वरुप सामने आया। इसीलिए भगवती दुर्गा को 'अम्बा' भी कहा जाता है। जल का पर्यायवाची है अम्बा। अर्थात् जल साक्षात् अम्बास्वरूप है, दुर्गास्वरूप है। जल में असीम प्राण-ऊर्जा है जो मन्त्र की शक्ति को हज़ार गुना बढ़ा देती है।
      तंत्र-साधक सर्वप्रथम जल-सिद्धि करता है उसके बाद ही अन्य सिद्धि। तंत्र -साधना का सम्बन्ध यक्षलोक से है। इसलिए महादेव ने जल की रक्षा का उत्तरदायित्व यक्षों को दिया है। वरुण जल के देवता अवश्य हैं पर जल की सुरक्षा का कार्य सदैव यक्ष करते हैं और कभी-कभी वे यह कार्य मनुष्य के माध्यम से करते हैं। इसी प्रकार नृत्य, वाद्य व गान की रक्षा गन्धर्व करते हैं। किन्नर प्रकृति में सन्तुलन बनाने के लिए हैं। साधना में होने वाली त्रुटि, मन्त्रों के उच्चारण के समय होने वाली त्रुटि में विद्याधर साधक की रक्षा करते हैं। इसलिए अपदेवता के रूप में ये पूज्य हैं। इनका निवास यक्ष-लोक है।

स्वामी दयानन्द ब्रिटिश शासन के प्रबल समर्थक थे। ( मधुलिका आर्य के लेख पर शचींद्र जी का उत्तर -३)

पूर्व के लेख में हमने आर्यसमाज की पुस्तकों से ही दिखाया था कि स्वामी दयानन्द ब्रिटिश शासन के प्रबल समर्थक थे। वे अपने भाषणों में अंग्रेज़ सरकार की प्रशंसा किया करते थे।

स्वामी दयानन्द अपनी प्रथम सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं -- "ब्रिटिश शासन से भारत को अनेक लाभ प्राप्त हुए हैं। इस शासन ने सर्वत्र शांति स्थापित की है, बार-बार होने वाली लड़ाइयों को समाप्त कर दिया है, कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल बढ़ाकर और सड़कों का जाल बिछाकर आर्थिक समृद्धि का संवर्धन किया है। ब्रिटिश शासन की एक अन्य बड़ी विशेषता यह है कि इसने भारतीयों को धार्मिक तथा अन्य विषयों में स्वतन्त्रता प्रदान की है। अब राज्य की ओर से धार्मिक मामलों में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं की जाती है। शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे स्कूल स्थापित किए हैं, जिनमें शिक्षा पाने की सुविधा है और छात्रों के लिए मुद्रणालयों से मुद्रित होकर पुस्तकें बड़ी संख्या में उपलब्ध होती हैं। एक अन्य विशेषता न्याय-पद्धति की है। अमीर-गरीब अदालत में जाकर समान रूप से न्याय प्राप्त कर सकते हैं।" (सत्यार्थ प्रकाश, प्रथम संस्करण, पृष्ठ 500)

आप यहाँ स्पष्ट देख सकते हैं कि ब्रिटिश शासन का ऐसा गुणगान लिखने वाला व्यक्ति भला ब्रिटिश सरकार का विरोधी हो सकता है? यह सत्यार्थ प्रकाश लगभग दस वर्षों तक छपती रही तथा आर्यसमाजियों को अंग्रेज़ों की भक्ति करने की प्रेरणा देती रही।

इसके अतिरिक्त, कुछ विषयों पर स्वामी दयानन्द अंग्रेज़ सरकार की आलोचना भी करते हैं, किन्तु वह आलोचना विद्रोह की नहीं, प्रशासनिक कारणों से की गई है - जैसे कि अंग्रेज़ गोरे-काले में भेद करते हैं, नमक और जंगल से लकड़ी लेने पर कर वसूल करते हैं।

यह निंदा अंग्रेज़ों को उखाड़ फेंकने के लिए नहीं, बल्कि उसमें सुधार करने के लिए है। अर्थात् स्वामी जी अंग्रेजी शासन के प्रशंसक थे किन्तु कुछ कमियाँ जो हैं, उन्हें सुधारने के उद्देश्य से बताते हैं। क्या स्वामी दयानन्द के लिखे को पढ़ने के बाद भी उनके ब्रिटिश शासन का भक्त होने में संदेह हो सकता है? अब तो वह व्यक्ति निश्चित ही बुद्धि का निपट अंधा हो सकता है, जो स्वामी जी के लिखे को पढ़कर भी उन्हें अंग्रेज़ सरकार का विरोधी कहे।

आर्यसमाजी कहते हैं कि स्वामी दयानन्द के समय हिन्दू समाज, मुसलमानों और ईसाई मिशनरियों के आक्षेपों का उत्तर देने में असमर्थ होता था तथा अपमान का अनुभव करता था। स्वामी दयानन्द व आर्यसमाज ने हिन्दुओं को इनसे लड़ना सिखाया। किन्तु यह बात भी निराधार है।

मौलवी व ईसाई हमारे बहुदेववादी होने पर आक्षेप करते थे, स्वामी दयानन्द ने उनका खंडन नहीं किया बलकि स्वयं हिन्दू धर्म के बहुदेववाद का खंडन किया। मौलवी व ईसाई हमारे मूर्तिपूजक होने पर आक्षेप करते थे, स्वामी दयानन्द ने भी वही किया और मूर्ति पूजा का खंडन किया। हिन्दू धर्म में श्राद्ध का विधान था, मौलवी-पादरी इस पर आक्षेप करते थे, तो स्वामी जी ने भी इस पर आक्षेप किए और इसका खंडन किया। मौलवी-पादरी हमारे पुराण आदि ग्रंथों पर आक्षेप करते थे, तो स्वामी जी ने भी वही किया और इनका खंडन किया। ईसाई व मुसलमान हमारे अवतारवाद पर आक्षेप करते थे, स्वामी दयानन्द ने भी वही किया इसका भी खंडन किया। अर्थात ईसाई व मुसलमान हिन्दू धर्म पर जो भी आक्षेप किया करते थे, स्वामी दयानन्द ने उन्हे कोई उत्तर नहीं दिया बल्कि स्वयं ही इन सबका खंडन किया। 

स्वामी दयानन्द हिन्दुओं की ओर से नहीं लड़ रहे थे, बल्कि वे अपनी नई नवेली मनगढ़ंत मान्यताओ की स्थापना के लिए सर्वाधिक हिन्दू धर्म से ही लड़ रहे थे। मुसलमानों से भी वह शास्त्रार्थ करते थे, किन्तु उसका कोई विशेष लाभ हिन्दुओं को नहीं मिलता था। कोई मुसलमान उनसे प्रभावित भी हो तो, हिन्दू धर्म का तो विरोधी ही रहता था किन्तु स्वामी जी का प्रसंशक अवश्य हो जाता था। ईसाई मत के खंडन के कारण कुछ ईसाई मिशनरी दयानन्द स्वामी से रुष्ट अवश्य थे, किन्तु उन्हें एवं अंग्रेज़ी शासन को स्वामी दयानन्द से बहुत लाभ हो रहा था, हानि नगण्य थी।

अतः स्वामी दयानन्द हिन्दू धर्म के लिए तो लड़ ही नहीं रहे थे। सनातन धर्म की लगभग सभी मान्यताओ और परम्पराओ का स्वामी जी ने खंडन ही किया था, बल्कि ईसाई व मुसलमान इतनी शक्ति व तर्को के साथ नहीं कर पाते थे, स्वामी जी हिन्दू धर्म का विरोध करनें में इनसे कही अधिक आगे थे। स्वामी दयानन्द के इस कार्य से मुसलमानो व ईसाइयों के लिए हिन्दू धर्म पर आक्षेप लगाना बहुत सरल हो गया था। अतः स्वामी जी का उद्देश्य केवल और केवल अपने मत की स्थापना करना था। न कि हिन्दू धर्म की रक्षा करना या देश को स्वतन्त्रता दिलाना। अंग्रेज़ सरकार स्वामी जी को सब प्रकार से सहायता दिया करती थी। 

स्वामी दयानन्द के सभी जीवनी लेखकों ने उन्हें ब्रिटिश सरकार का समर्थक तथा राजभक्त ही बताया है।

अंग्रेज़ी भाषा में स्वामी दयानन्द की पहली जीवनी लिखने वाले आर्यसमाजी बाबा छज्जू सिंह ने लिखा है - "स्वामी जी वर्तमान युग में अपने उपदेशों में शिक्षा के प्रसार पर विस्तार से प्रकाश डालते थे और ब्रिटिश राज के गुणों का संक्षेप में उल्लेख करते थे और यह बताया करते थे कि अंग्रेजों ने भारतीयों को भाषण की स्वतन्त्रता का महत्त्वपूर्ण वरदान प्रदान किया है।"

अन्य जीवनियों से स्वामी दयानन्द की ब्रिटिश शासन की भक्ति के प्रमाण पूर्व के लेख में दिए ही जा चुके हैं। इतने काफी हैं। आर्यसमाजी चाहें तो आगे और दे सकते हैं। यहाँ तक इतना स्पष्ट हो गया है कि स्वामी दयानन्द निश्चित तौर पर अंग्रेज़ सरकार के प्रबल प्रशंसक थे।

मधुलिका जी जैसे झूठ और भ्रम की दुनिया में जीने वाले जब कहते हैं कि "स्वामी दयानन्द न होते तो भारत आजाद न होता अथवा स्वतन्त्रता की नींव स्वामी दयानन्द ने रखी", तो इससे अधिक हास्यास्पद, झूठी और मक्कारी से भरी बात और कोई नहीं हो सकती। स्वामी दयानन्द स्वयं और उनकी जीवनी लिखने वाले उनके सब चेले स्पष्ट प्रमाण दे रहे हैं कि स्वामी दयानन्द ने स्वतन्त्रता या अंग्रेज़ों के विरुद्ध कुछ नहीं किया, बल्कि समर्थन ही दिया।  

अगर स्वामी दयानन्द स्वतन्त्रता चाहते या इसके लिए प्रेरित करते, तो आर्यसमाज संगठन को स्वतन्त्रता के लिए लड़ना चाहिए था, किन्तु ऐसा नहीं हुआ। स्वामी दयानन्द की मृत्यु के बाद आर्यसमाज ने भी अंग्रेज़ों की भक्ति की परंपरा जारी रखी। आर्यसमाजी ब्रिटिश शासन को अपने लिए वरदान समझते थे। इसके सैकड़ो प्रमाण आर्यसमाज के तत्कालीन लेखो व पुस्तकों में उपलब्ध हैं। 

देखिये स्वामी दयानन्द के पक्के चेले पंडित लेखराम अपनी पुस्तक में ब्रिटिश शासन की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं - "इंग्लैंड की रानी और भारत की साम्राज्ञी ने भारत के शासन की बागडोर सँभालने के बाद विद्या और शिक्षा का प्रसार करने का प्रयास किया है। उनकी कृपा और कीर्ति से सर्वत्र शान्ति का साम्राज्य है। चोर-डाकुओं का दमन कर दिया गया है। देश बदमाशों के आतंक से मुक्त हो चुका है और सब दशाओं को सुधारने के प्रयत्न किए जा रहे हैं।" (तहज़ीब-ए-बरहिनी)

लाहौर आर्यसमाज की अन्तरंग सभा ने 12 नवम्बर 1886 को ऐसा प्रस्ताव पास किया था कि भारत की स्वतन्त्रता आदि के लिए किए जा रहे राजनैतिक कार्यों में कोई आर्यसमाजी भाग न ले।

सन् 1888 में संयुक्त प्रान्त की आर्य प्रतिनिधि सभा ने भी नियम बनाया कि - "कोई भी आर्यसमाजी संस्था के रूप में किसी भी राजनैतिक गतिविधि या आन्दोलन से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखेगा और न ही ऐसे किसी आन्दोलन में भाग लेगा।" (आर्यसमाज का इतिहास, पृष्ठ 120)

परोपकारिणी सभा ने भी 1891 में ऐसा ही नियम बनाया, उसमें कहा गया कि: "आर्यसमाज के किसी भी प्रचारक के लिए यह उचित नहीं है कि वह (अपने भाषण में) किसी राजनैतिक विषय की चर्चा करे या उस पर भाषण दे, या किसी ऐसी संस्था से सम्बन्ध रखे या उसकी बैठकों में सम्मिलित हो, जिसके द्वारा राजनैतिक आन्दोलन किया जाता हो।"

स्वामी दयानन्द के पदचिन्हो पर चलते हुये आर्यसमाज बहुत लंबे समय तक ब्रिटिश शासन की भक्ति करता रहा।

इसके पश्चात एक समय जब आर्यसमाज पर राजद्रोह के आरोप लगे, तो प्रयास किया गया कि आर्यसमाज में अंग्रेज़ों की भक्ति की परंपरा के जो पुराने प्रमाण हैं, वे एकत्रित किए जाएँ। तब संयुक्त प्रान्त की आर्य प्रतिनिधि सभा के तत्कालीन मन्त्री श्री मदन मोहन सेठ ने अपनी पुस्तक "आर्यसमाज – ए पोलिटिकल बॉडी" में ऐसे सब पूर्व के प्रमाण प्रस्तुत किए, जिनमें आर्यसमाज की ब्रिटिश भक्ति दिखाई गई थी। आर्यसमाज दिखाना चाहता था कि, आर्यसमाज में कुछ अराजक तत्व ही ऐसे हैं जो आजादी के लिए भाषण आदि देने जैसा कुकर्म कर रहे है, किन्तु आर्यसमाज में तो ब्रिटिश भक्ति की पुरानी परंपरा है व आर्यसमाज आज भी उसी पर चलता हैं। सोचिए पुस्तक तक लिख डाली गई।

इस पुस्तक का एक प्रमाण देखिये, इसमें लिखा है: "अंग्रेज़ों ने यद्यपि हमारे देश को गुलाम बना रखा है, फिर भी उन्होंने देश को धार्मिक स्वतन्त्रता का बहुमूल्य वरदान दिया है, और इसी कारण मूर्ति-पूजा जैसी देश के लिए हानिकारक कुरीतियों का इस समय खण्डन किया जा सकता है। यदि आप अंग्रेज़ों को इस देश से निकाल देंगे, तो हम मूर्ति पूजा का विरोध करने वालों का गला भेड़-बकरियों के गले की भाँति काट देंगे।"

इस आर्यसमाजी की लिखी पुस्तक में ही आर्यसमाज द्वारा ब्रिटिश शासन की भक्ति करने के सैकड़ो प्रमाण हैं।

दरअसल आर्यसमाजी नेता आर्यसमाजियों को यह भय दिखाते थे कि अगर अंग्रेज़ इस देश से चले गए, तो हिन्दू हमें मारेंगे। इसलिए अंग्रेज़ों का इस देश में शासन करना आवश्यक है।

उस समय आर्यसमाजी ब्रिटिश सम्राटों के राज्यारोहण, स्वर्ण-जयन्ती आदि अवसरों पर उत्सव मनाया करते थे। आर्यसमाज को दीप आदि से सजाया करते थे। हवन प्रार्थना आदि करके अंग्रेज़ शासको की दीर्घायुता के लिए और उनके शासन के भारत में बने रहने के लिए प्रार्थना किया करते थे।

आर्यसमाज की भक्ति के प्रदर्शन का उदाहरण देखिये - 1887 में ब्रिटिश साम्राज्य में रानी विक्टोरिया के राजगद्दी पर बैठने के पचास वर्ष पूरे होने पर आर्यसमाज ने इस जयन्ती को बड़े धूम-धाम से मनाया तथा आर्यसमाज की ओर से लन्दन की महारानी को मानपत्र दिया गया, जिसमें ब्रिटिश शासन की स्तुति लिखी थी। आर्यसमाज के श्री लक्ष्मीनारायण तथा कुछ अन्य कार्यकर्ताओं ने महारानी के राजभवन में जाकर बड़ी श्रद्धा के साथ यह मानपत्र अर्पण किया। (भीमसेन विद्यालंकार, आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाब)

आर्यसमाजियों द्वारा छपने वाले एक पत्र 'आर्य-पत्रिका' में लिखा गया था: "भारत में महारानी के शासन ने अतीव लाभदायक परिणाम उत्पन्न किए हैं। उनके शासनकाल की पिछली आधी शताब्दी में कुछ बहुत बड़ी शिक्षा-संस्थाएँ स्थापित हुई हैं। इस समय सुधार और पुनरुज्जीवन के वे आन्दोलन शुरू हुए, जिनका भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा है। आर्य समाज का जन्म एवं पालन-पोषण विक्टोरिया के शासन-काल में हुआ, और इसे जो सफलता मिली है, उसका प्रधान कारण रानी द्वारा दी गयी विचार और भाषण की स्वतन्त्रता का सिद्धान्त है।"

जब इस महारानी की मृत्यु हुई और एडवर्ड सप्तम का राज्याभिषेक हुआ, तो इस अवसर पर भी आर्यसमाज की पत्रिकाओं ने अंग्रेज़ी शासन का बड़ा गुणगान किया। आर्य पत्रिका ने लिखा: "आर्यसमाज ने ब्रिटिश सरकार के प्रति राजभक्ति के पर्याप्त प्रमाण दिए हैं। लगभग हर समाज में इस अवसर पर प्रसन्नता प्रकट करने के लिए बैठकें की गई हैं। समाज-मन्दिरों में दिवाली की रोशनी की गई है। नगर-कीर्तन के जुलूस निकाले गए हैं। वस्तुतः इस समय हर प्रकार से यह प्रदर्शित किया गया है कि आर्यों को राजा के राज्याभिषेक से बड़ी प्रसन्नता हुई है। विभिन्न समाजों में राज्याभिषेक के बारे में होने वाली बैठकों के जो विवरण पत्रों द्वारा हमें मिले हैं, वे बहुत अधिक हैं और हम उन सबको इस पत्रिका में छापने में असमर्थ हैं।"

फिर 10 जनवरी 1903 में आर्य पत्रिका में छपा था: "शास्त्रों में आदर्श शासक के जो गुण बताए गए हैं, वे सब अंग्रेजों में विशेष रूप से पाए जाते हैं।" (आर्यसमाज का इतिहास, पृष्ठ 123)

ये केवल कुछ गिने चुने प्रमाण हैं, तत्कालीन आर्यसमाजी लेखको की पुस्तकों व पत्रिकाओ को देखा जाएँ तो ऐसे सौ पचास नहीं बल्कि हजारो प्रमाण मिलते है, जिनमें स्पष्ट आर्यसमाज द्वारा ब्रिटिश शासन को आदर्श शासन बताया जाता था। 

तब आर्यसमाज ने मानपत्र भी दिया गया था, जिस पर लिखा था: "हम भगवान से आपके (ब्रिटिश सम्राट) दीर्घ जीवन और समृद्धि के लिए तथा ब्रिटिश राज्य के भारत में वर्षों तक शान्तिपूर्ण रीति से बने रहने के लिए प्रार्थना करते हैं।" (यह मानपत्र केशवराव तथा उपप्रधान राजगोविन्द प्रसाद द्वारा बनाया गया था।)

1907 ई. में सम्राट एडवर्ड के जन्मदिन को आर्यसमाज ने 'धन्यवाद-दिवस' के रूप में मनाया तथा अपने पूज्य सम्राट के दीर्घायुष्य के लिए विभिन्न आर्यसमाजों में प्रार्थनाएँ की गईं।

गुरुकुल कांगड़ी (जो तब आर्यसमाजियों का ही गुरुकुल था) से एक अंग्रेज़ी पत्रिका प्रकाशित होती थी। इसमें छपा था - "राज्याभिषेक के मंगल अवसर पर महामहिम ब्रिटिश सम्राट तथा साम्राज्ञी को हम अपनी सच्ची बधाई अतीव विनम्रतापूर्वक प्रस्तुत करते हैं। आर्यसमाज उग्र सुधारकों की संस्था है, इसकी ऐसी उन्नति अंग्रेज़ी सरकार के शासनकाल में ही सम्भव है।"

उस समय आर्यसमाज में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए अविचल भक्ति, अटूट निष्ठा और अगाध राजभक्ति थी। आर्यसमाज नाना प्रकार की बातें करके अंग्रेज़ों को भारत में रखने का ही पक्षधर था। वह हिन्दुओं में प्रचार करता था कि "यदि अंग्रेज़ भारत से चले गए तो मुसलमान इस देश पर हमला करेंगे", तथा आर्यसमाजियों में प्रचार करता था कि "हिन्दू स्वराज्य के योग्य नहीं हैं। आर्यसमाज के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भारत में ब्रिटिश शासन का रहना पूर्ण रूप से आवश्यक है। इस कारण आर्यसमाजियों को भारत में ब्रिटिश शासन को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए पूरी सहायता देनी चाहिए, तथा अंग्रेज़ सरकार के निन्दकों व आलोचकों से मुँह फेर लेना चाहिए। भारतवासियों की रक्षा के लिए अंग्रेज़ी शासन का भारत में चिरकाल तक स्थायी रूप से बना रहना अतीव आवश्यक है। यह शासन भारतीयों को धार्मिक स्वतन्त्रता का बहुमूल्य वरदान प्रदान कर रहा है। इसलिए सब भारतीयों तथा आर्यसमाजियों का 'पावन धार्मिक कर्तव्य' है कि वे भारत में ब्रिटिश सत्ता का प्रबल पृष्ठपोषण करें।" (आर्यसमाज का इतिहास, पृष्ठ 130)

आर्यसमाज तब ब्रिटिश शासन के भारत में बने रहने को अपना "पावन धार्मिक कर्तव्य" कहता था। तथा अंग्रेज़ो की शक्ति को पोषित करना अपना धर्म समझता था। जैसा कि पूर्व में कहा गया - आर्यसमाज और स्वामी दयानन्द का उद्देश्य इस देश में दयानन्द स्वामी के अधार्मिक विचारो को ही स्थापित करना था। तब वे हिन्दू, मुसलमान एवं ईसाई इन सभी को अपना शत्रु ही समझते थे। 

"कांग्रेस के पुराने नेताओं की तरह अनेक आर्यसमाजी भी ब्रिटिश शासन को वरदान मानते थे और उसका गुणगान करने में सङ्कोच नहीं करते थे।" (पृष्ठ 16, आर्यसमाज का इतिहास)

यह है स्वामी दयानन्द का "स्वराज्य", यह है आर्यसमाज का अंग्रेज़ों से युद्ध, जिसके बल पर मधुलिका जी फरमा रही हैं कि आर्यसमाज और स्वामी दयानन्द न होते तो भारत कभी स्वतन्त्र न होता, जबकि सत्य यह है कि स्वामी दयानन्द और आर्यसमाज की चलती, तो वे कभी इस देश को स्वतन्त्र ही न होने देते। अंग्रेज़ो का ऐसा समर्थन तत्कालीन समय में भारत की किसी संस्था या संगठन ने नहीं किया था, जैसा हार्दिक समर्थन आर्यसमाज द्वारा किया गया था।

आर्यसमाज के प्रचार के फलस्वरूप अनेक हिन्दू उस समय उनके सुधारवादी विचारों को देखकर जुड़ गए थे। ये वे लोग थे जो मुसलमानों एवं कट्टर आर्यसमाजियों की भाँति सनातन धर्म के प्रतीकों के विरोधी नहीं थे।

जिनमें से एक थे लाला लाजपत राय। आर्यसमाज के अनेक विघ्न पैदा करने के बावजूद, लाला लाजपत राय ने आर्यसमाज में स्वतन्त्रता आन्दोलन की क्रान्ति की थोड़ी सी "घुसपैठ करा दी"। आज ये गर्व से कहते हैं कि देखो, लाला लाजपत राय आर्यसमाजी क्रान्तिकारी थे। किन्तु सत्य यह है कि लाजपत राय आर्यसमाज के नियम के विरुद्ध जाकर क्रान्ति कर रहे थे। अर्थात् आर्यसमाज में उस समय फूट पड़ गई थी। अनेक ऐसे हिन्दू आर्यसमाज में आ गए थे जो "पौराणिक संस्कार" के थे, तथा स्वामी दयानन्द की हिन्दू धर्म विरोधी सोच को अधिक महत्व न देकर, स्वतन्त्रता के लिए आर्यसमाज का लाभ उठाना चाहते थे। वे आर्यसमाज के नियमों और रहस्यों को ताक पर रखते हुये क्रान्तिकारियों से जुड़ने व उनकी ओर से लड़ने पर आमादा थे। लाला लाजपत राय ने भी आर्यसमाज में बने इन दो दलों का वर्णन किया है।

लाला लाजपत राय को जब अंग्रेज़ सरकार ने देश से निर्वासन का दण्ड दिया, तब पंजाब में आर्यसमाज के नेताओं ने लाला लाजपत राय से सम्बन्ध विच्छेद की घोषणा करते हुए, पंजाब के अंग्रेज़ गवर्नर को अपनी राजभक्ति का विश्वास दिलाया। (आर्यसमाज का इतिहास, पृष्ठ 137)

इसी प्रकार जब 1910 में भाई परमानन्द पर अंग्रेज़ सरकार ने राजद्रोह का मुकदमा लादकर उन्हें गिरफ्तार किया, तो वहाँ के डी.ए.वी. कॉलेज ने उनसे सम्बन्ध विच्छेद करके ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति राजभक्ति में अविचल निष्ठा प्रकट की।

जब अंग्रेज़ों ने कांग्रेस की स्थापना की, तो अनेकों आर्यसमाजी कांग्रेस से जुड़ गए। तब चन्दा इकट्ठा करके लाहौर में सभाएँ करने के लिए एक स्थायी भवन बनाया गया। लाला लालचन्द आदि आर्यसमाजियों ने यह धन एकत्रित करके एक विशाल भवन तैयार किया, और इस भवन का नाम ब्रिटिश सांसद चार्ल्स ब्रेडला के नाम पर "ब्रेडला हाल" रखा गया। लाला लाजपत राय, श्यामजी कृष्ण तथा भाई परमानन्द वाले दल ने इस पर विरोध किया, किन्तु उनकी न सुनी गई।

लाला लाजपत राय के नेतृत्व में पहली बार आर्यसमाज का एक छोटा सा वर्ग क्रान्तिकारियों की सहायता करने लगा। जिससे अंग्रेज़ सरकार पंजाब के आर्यसमाज से रुष्ट हो गई। तब लाला लाजपत राय के पंजाब से निर्वासन के आदेश के बाद आर्यसमाज के नेताओं ने बार-बार सार्वजनिक घोषणाएँ करवाईं कि "आर्यसमाज का राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है, वह राजनैतिक संस्था नहीं है।" (मुंशीराम – दि आर्यसमाज एण्ड इट्स डिक्ट्रेटर्स, पृष्ठ 92)

इसी प्रकार गुरुकुल कांगड़ी में भी कुछ छात्र थे जो क्रान्तिकारियों की सहायता कर रहे थे, तब गुरुकुल कांगड़ी के प्रशासन ने अपनी राज्यभक्ति दिखाने के लिए गुरुकुल में ब्रिटेन के सम्राट और साम्राज्ञी के चित्र टाँग दिए। तथा अंग्रेज़ो को विद्यालय में बुलाकर विद्यार्थियो से अंग्रेज़ सरकार एवं सम्राट साम्राज्ञी का स्तुति-ज्ञान कराया था। ये पूरा वर्णन आर्यसमाज के इतिहास में वर्णित हैं। 

गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना करने वाले महात्मा मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानन्द) भी इस समय तक अंग्रेज़ों के सबसे बड़े भक्त थे। ये लिखते हैं - "पंजाब के आर्यसमाजियों की बहुसंख्या वर्तमान राजनैतिक मामलों के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहती है। यदि हम वैदिक आदर्शों तक पहुँच जाएँ, तो क्या भारतीयों में यह योग्यता है कि वे पक्षपात-शून्यता तथा न्याय के सिद्धान्तों के अनुसार शासन चला सकते हैं? मेरी सम्मति में इस समय कोई भी समझदार व्यक्ति यह नहीं चाहेगा कि ब्रिटिश शासन की समाप्ति हो, क्योंकि केवल इसी शासन में हम निर्भीकतापूर्वक अपने सिद्धान्तों का प्रचार और उन पर आचरण कर सकते हैं।"

यहाँ एक रोचक बात है। आजकल के आर्यसमाजी झूठ प्रचारित करते हैं कि सत्यार्थ प्रकाश क्रान्ति लाई, इसे पढ़कर सब क्रान्तिकारी बन जाते थे, आदि-आदि। किन्तु यही आरोप जब मुसलमानों ने सत्यार्थ प्रकाश पर लगाया कि इस पुस्तक में राजद्रोह के कुछ अंश हैं, तो देश के समूचे आर्यसमाज ने बार-बार इस पर सफाई दी कि सत्यार्थ प्रकाश के किसी अवतरण में राजद्रोह की गन्ध तक नहीं है। उनका कहना था कि किसी का भी यह सोचना कि सत्यार्थ प्रकाश में अंग्रेज़ शासन के विरुद्ध कुछ लिखा है, यह पूरी तरह मिथ्या, कपोलकल्पित तथा दुर्भावनापूर्ण है। बल्कि कई लेख लिख-लिखकर आर्यसमाजियों ने सिद्ध किया था कि सत्यार्थ प्रकाश में ऐसा कोई अंश नहीं है।

दरअसल मुसलमानों का आर्यसमाज से द्वेष था ही। अतः अंग्रेज़ सरकार में कार्यरत मुस्लिम कर्मचारी अंग्रेज़ों को निरन्तर भड़काते थे तथा गलत सूचना देते थे कि आर्यसमाज अंग्रेज़ी शासन के विरोध में कार्य कर रहा है। निरन्तर उन तक पहुँचाई गई भ्रामक खबरों तथा कुछ सच्ची खबरों से एक समय अंग्रेज़ पंजाब में आर्यसमाज को अपना विरोधी समझने लगे थे, किन्तु आर्यसमाज ने एक-दो बार नहीं, बल्कि अनेकों बार, नाना प्रकार से अपनी भक्ति अंग्रेज़ शासन के प्रति सिद्ध की।

हाँ, इतना अवश्य हो चुका था - जैसा कि पूर्व में भी कहा गया - कि आर्यसमाज का एक बड़ा वर्ग जहाँ ब्रिटिश शासन का भक्त था तथा अंग्रेज़ी राज्य को भारत के लिए वरदान समझता था, वहीं लाला लाजपत राय सहित एक छोटा सा वर्ग क्रान्ति में हिस्सा लेने लगा था। किन्तु आर्यसमाज का बड़ा वर्ग इन क्रांतिकारियों का विरोध कर रहा था, इस पर नियंत्रण स्थापित करने का पूरा प्रयास कर रहा था। _ _ _ क्रमशः। 

(आर्यसमाजियों के झूठ को ध्वस्त करने के लिए, स्वामी दयानन्द एवं आर्यसमाज का ब्रिटिश प्रेम दिखाने हेतु इतने ही प्रमाण पर्याप्त हैं। किन्तु तब भी आगे दिखाया जाएगा कि किस तरह झूठ को असंख्यों बार लिख लिखकर बोल बोलकर,अनेकों क्रांतिकारियों को इन्हौने अपने साहित्य में आर्यसमाजी लिख रखा है, जबकि वे कभी आर्यसमाजी विचारधारा के न थे। अपने झूठे प्रचार से इन्हौने अनेकों सामान्य हिन्दुओ को ही नहीं बल्कि बड़े बड़े विद्वान हिन्दुओ को भी भ्रमित किया हुआ हैं। मेरी चुनौती है कि कोई भी आर्यसमाजी इन लेखों में आए किसी एक तथ्य को भी गलत सिद्ध करके दिखाए। ये सभी तथ्य आर्यसमाज के हीसाहित्य से जानकर लिए गए हैं, ताकि इन्हें इन तथ्यों को झूठा कहने का भी अवसर प्राप्त न हो।)