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Saturday, 12 September 2026

दिग्विजय दिवस पर भारतीय सभ्यता के अग्र दूत स्वामी विवेकानंद जी को शत-शत नमन 11 सितंबर 1893

*दिग्विजय दिवस पर भारतीय सभ्यता के अग्र दूत स्वामी विवेकानंद जी को शत-शत नमन*
      🙏💐
*11 सितंबर 1893 आज ही के दिन अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद जी द्वारा दिए गए प्रेरणादायक भाषण की स्मृति में मनाया जाता है। उस भाषण में उन्होंने भारत और हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए सहिष्णुता, सार्वभौमिक भाईचारे और धार्मिक समरसता का संदेश दिया था।*

*उनके उद्घाटन शब्द "सिस्टर एंड ब्रदर ऑफ अमेरिका" ने पूरी सभा को मंत्र मुक्त कर दिया था और भारत की आध्यात्मिक शक्ति को वैश्विक मंच पर स्थापित किया।*

*एक बार पुनः करोड़ों युवाओं के प्रेरणापुंज स्वामी विवेकानंद जी द्वारा शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में दिए गए ऐतिहासिक व्याख्यान की 130 वीं वर्ष गांठ*
*"दिग्विजय दिवस"*
*की हार्दिक शुभकामनाएं*
      🎉🎉
बी.एन. शर्मा
महामंत्री 
प्रदेश सभा, दिल्ली

तदात्मकत्वात्कलानां अर्थात् समस्त कला-वैभव के विस्तार का बीज "काम" हैं।

✍️ राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी 

सेक्सी राधा 

थोड़ी देर पहले अन्तरराष्ट्रीय- ख्याति के कलाविद डा नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ने वाट्सऐप पर एक पोस्ट भेजी और आग्रह किया कि इसे अवश्य पढ़ें । पढ़नी ही थी ,पढ़ भी ली । स्वामी हरिदासजी के केलिमाल पर छह साल तक अध्ययन-अनुसंधान करता रहा हूँ , हर दूसरे-तीसरे दिन ऐसे सवाल आते रहे थे ,इसलिए इस पोस्ट को पढ़ कर मुझे कोई अचरज नहीं हुआ । डा अद्वैतवादिनी कौल के साथ जब भी विमर्श होता तब इन बिन्दुओं को लेकर हास-परिहास हो जाता । कपिलाजी ने तो बहुत स्पष्ट ही कर दिया था , आज बाजारवादी सभ्यता आक्रामक है और बाजारवाद देह को मनुष्यजीवन की परमावधि मानता है । आत्मा और अन्तश्चेतना से उसकी पहचान भी नहीं है । अतीन्द्रिय-अवधारणा को समझ पाना उनके कोर्स के बाहर है। बिहारिनदेव जी ने उदाहरण दिया - हीरा की परख कहा जानें मूरी बेचन हारौ ।मूली बेचने वाला हीरा की परख क्या जानें ? उस बेचारे ने हीरा को मामूली पत्थर समझा और बाँट बना लिया ।उससे यह आशा भी हम कैसे कर सकते हैं ? 
सेक्स या रति मनुष्य की मूलप्रवृत्ति है । यह प्रवृत्ति पशुओं-पक्षियों आदि में भी होती है लेकिन मनुष्य उसका उदात्तीकरण कर लेता है । रति प्रवृत्ति को आधार बना कर आधुनिक-युग में फ्रायड ने मनुष्य जीवन की व्याख्या की है और प्राचीनकाल में वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र में एक सूत्र दिया था- तदात्मकत्वात्कलानां अर्थात्‍ समस्त कला-वैभव के विस्तार का बीज काम है । हालाँकि अंग्रेजी शब्द सेक्स काम का पर्यायवाची नहीं है और काम के लिए अंग्रेजी में दूसरा कोई शब्द है भी नहीं । काम से कमनीयता बनती है , कामना शब्द बनता है , काम्य शब्द बनता है । कामेश्वर और कामेश्वरी उपास्य तत्त्व हैं । संगीत नृत्य चित्रकला मूर्तिकला का असीम विस्तार उस रति बीज का वृक्ष और वन है । वही प्रवृत्ति जब भाव बनती है तब प्रेम के सूक्ष्म से सूक्ष्म रूप बनते हैं - पुहुप वास ते पातरा । इस प्रेम को लेकर एक पुस्तक क्या, पुस्तकालय बने हुए हैं । समस्त भक्तिकाल के साहित्य ,संगीत , कला का विस्तार प्रेम का ही विस्तार है । प्रेम पर कोई कितना कहेगा , यह तो डूबने का विषय है । अब मनुष्य की प्रकृति का सवाल है , यदि राजस और तामस-प्रकृति में है तो उसी शब्द का दूसरा अर्थ ग्रहण करेगा और सात्विक मन:स्थिति में है तो उसका अर्थ भिन्न हो जायेगा । सेक्सी राधा और "वासना भरा कृष्ण" कहने वाला आदमी मूली बेचने वाला है ,उसकी गति देह और इन्द्रिय तक ही है , वह बेचारा क्या जानें कि संगीत के राग क्या हैं ? राग प्रेम की उद्दाम अवस्था का नाम है ।काम वहां पराजित है ! वहाँ देह नहीं है , इन्द्रिय कहाँ है ?सेक्स नहीं है ।वासना का ज्वार नहीं है । पशुधर्म नहीं है । जयदेव की बात आत्मराज्य की बात है , चेतना की वह अवस्था , जहां मन और इन्द्रिय का शासन नहीं है । निधिवन राज की जय कहियै।कृष्ण अप्राकृत मदन हैं । कामदेव प्राकृत मदन है । आत्मेन्द्रिय प्रीति इच्छा तार नाम काम , कृष्णेन्द्रिय प्रीति इच्छा तार नाम प्रेम ।सौन्दर्य और प्रेम दो नहीं हैं। प्रेम की प्रतीति सौन्दर्य है। प्रेम ही सौन्दर्य में व्यक्त होता है और उसे देखकर स्वयं ही उमंगता है। जैसे-जैसे उमंगता है, वैसे- वैसे सौन्दर्य की अभिवृद्धि होती है सौन्दर्य में नव-नवोन्मेष होता है। जब सौन्दर्य में नवोन्मेष होता है तो प्रेम की लालसा बढ़ती है, प्यास बढ़ती है। वृक्ष में बीज और बीज में वृक्ष, यही लीला है, यही निरवधि नित्य- विहार है। प्रेम की ठौर सौन्दर्य है और सौन्दर्य की ठौर प्रेम है । सौन्दर्य का स्वभाव ही प्रतिक्षण नवीनता -जब जब देखों तेरौ मुख तब तब नयौ नयौ लागत , ऐसौ भ्रम होत मैं कबहु देख्यौ न री । कौन बात जो अबही और अबही और अबही और । जनम अवधि हम रूप निहारिल नयन न तिरपित भेल - विद्यापति । ध्यान देने की बात है कि देश का लोकमानस जयदेव के पदों का गायन करता है , नाचता है , आनन्द में विभोर हो जाता है , उसने कभी नहीं कहा कि यह अश्लीलता है , प्रेम सौंदर्य माधुर्य आनंद रस को कोई अश्लील क्यों कहेगा ?

 ये बेचारे बुद्धिजीवी , मति मारी गई है,इनको अकल अजीरन रोग है, लेकिन ये महाकवि जयदेव और गीतगोविन्द से घिन करें तो इनकी समझ है, हम तो इनसे घिन करेंगे नहीं ; क्यों करें?

श्रीकृष्ण और कुबजा पर अनार्यों के आरोप निरर्थक हैं।

आर्यसमाजी - ब्रह्मवैवर्त पुराण कृष्ण जन्म खंड अध्याय 72 में कहा गया है कि कृष्ण ने कुब्जा से संभोग करके वीर्याधान किया। अब कहिए, क्या पुराण ने कृष्ण को व्यभिचारी नहीं बनाया?

शचीन्द्र - इस प्रकरण में श्रीकृष्ण और कुब्जा के लिए पद प्रयुक्त हुआ है - "दंपत्ती रतिपण्डितौ"। दंपति शब्द पति-पत्नी के लिए संस्कृत में प्रयुक्त हुआ करता है, अवैध संबंध स्थापित करने वालो के लिए नहीं। यानि किसी आर्यसमाजी के घर की नियोगिनी, स्वामी दयानन्द के अनुसार, ग्यारह पुरुष नियोग के लिए चुन लेगी, तो ये सब दंपति नहीं कहलाए जाते हैं। पति-पत्नी ही दंपति कहे जाते हैं, जो कि यहाँ कहे गए हैं। अतः दंपति अगर समागम करें, तब वह व्यभिचार कहा हुआ?

एवं यदि पुराणकार व्यभिचार दिखाना चाहते, तो अगम्या, व्यभिचार आदि शब्दों का प्रयोग करते, किन्तु दंपति शब्द प्रयुक्त किया। इसके अतिरिक्त इस प्रकरण में 'भर्ता', 'कान्त', 'कान्ता', 'दंपति' आदि शब्द जो प्रयुक्त हुए हैं, वे व्यभिचार में प्रयुक्त नहीं होते हैं। अतः स्पष्ट है कि पुराण या पुराणकार यहाँ व्यभिचार नहीं कह रहे हैं, किन्तु आर्यसमाजी ही बलात् श्रीकृष्ण को व्यभिचारी कहना चाहते हैं।

एवं पूर्वापर प्रकरण भी देखा जाना चाहिए, उसे छोड़कर निष्कर्ष निकालना अन्याय है। नियम है - "सन्दिग्धेषु वाक्येषु प्रकरणं बलवत्तरम्।" अर्थात् यदि संदेह हो, तो सम्पूर्ण प्रकरण से वास्तविक अभिप्राय प्रकट होता है।

इसी प्रकरण में वर्णित है कि शूर्पणखा ने भगवान् को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए उत्कट इच्छा से तप किया। तब ब्रह्माजी ने वरदान दिया था - "जन्मान्तरे च भर्तारं प्राप्स्यसि त्वं वरानने"

अर्थात् अगले जन्म में भगवान् तेरे पति होंगे। यही शूर्पणखा अगले जन्म में कुब्जा हुई - "देहं तत्याज सा वह्नौ सा च कुब्जा बभूव ह"

अतः यहाँ कोई आकस्मिक अवैध संबंध का प्रकरण नहीं है, न ही व्यभिचार है। पूर्वजन्म के वरदान की सिद्धि का यह प्रसंग है, जिसमें भगवान् पति-रूप में कुब्जा को प्राप्त हुए।

अब विचार करें, क्या आर्यसमाजी इसी प्रकरण की इस कथा को मानेंगे? उत्तर है - नहीं। वे पुराण की इस कथा को नहीं मानेंगे, किन्तु इसी प्रकरण के एक अंश को मानकर श्रीकृष्ण और पुराण पर दोष लगाएंगे क्योंकि इनका उद्देश्य समाधान नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण और पुराण पर दोष लगाना ही है।

अतः यहाँ न तो व्यभिचार कहा गया है और न हुआ है? संबंध की वैधता का निर्णय शारीरिक संयोग के वर्णन से नहीं, उसके शास्त्रीय और प्रसंगगत स्वरूप से निश्चित  होता है।

दरअसल ये मूर्ख शृंगार को ही व्यभिचार समझ लेते हैं। ऐसा नहीं होता है। महाभारत में दुष्यन्त और शकुन्तला के गान्धर्व-विवाह का वर्णन है, उसे कहीं व्यभिचार नहीं कहा गया है।

यह भी देखना चाहिए कि इस पुराण में श्रीकृष्ण को ब्रह्म माना गया है। तब इस दृष्टि से भी विचार करना होगा। वीर्याधान शब्द में 'वीर्य' का अर्थ क्या होगा, जिसका आधान कुब्जा में किया गया?

यह वही वीर्य है, जिसके लिए आर्यसमाजियों की महिलाएँ परमात्मा से प्रार्थना करती हैं - "वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि"

तब क्या समाजी महिलाएँ अपने परमात्मा से शारीरिक वीर्य को अपने शरीर में प्रविष्ट कराने की प्रार्थना कर रही होती हैं?

इसी वीर्य का आधान श्रीकृष्ण ने कुब्जा में किया। फलस्वरूप उसकी सद्गति का यहाँ वर्णन है।

इस प्रकरण का परिणाम परमगति प्रकट हुआ है, कामतृप्ति नहीं। क्योंकि किसी भी कथा या प्रकरण का उद्देश्य यदि काम-भोग आदि दिखाना हो, तो भला निष्कर्ष मोक्ष, भगवत्प्राप्ति आदि क्यों उपसंहार में होगा?

अतः ब्रह्मवैवर्त पुराण के कुब्जा-प्रसंग से श्रीकृष्ण व्यभिचारी सिद्ध नहीं होते,किन्तु ऐसा झूठा आक्षेप करने वाले दयानन्दी अवश्य दयानन्द के कथित एकादश-नियोग-रूपी व्यभिचार से उत्पन्न हुए लगते हैं, अतः इन्हें सर्वत्र व्यभिचार ही दिखता है। नियम है - "तात्पर्यस्य ग्रहणम्" - ग्रंथकार का अभिप्रेत अर्थ भाव ग्रहण करना चाहिए, किन्तु ये मूर्ख सदैव उल्टा अर्थ ही ग्रहण करते हैं।

 ✍️ शचीन्द्र शर्मा 

Thursday, 10 September 2026

तत्क्षण पुनर्जन्म के सिद्धान्त पर आर्य समाजीयों का मत और स्वामी दयानन्द जी का मत..

आर्यसमाजी आचार्य - "आत्मा एक शरीर को त्यागकर तुरंत ही दूसरा शरीर धारण कर लेती है। अतः तत्काल पुनर्जन्म होना ही शास्त्रीय सिद्धांत है। जैसा कि बृहदारण्यक उपनिषद में लिखा है - 

"तद्यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानम् उपसंहरत्येवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याऽविद्यां गमयित्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरति।"

यहाँ उपनिषद संकेत कर रहा है कि मृत्यु के बाद दूसरा शरीर प्राप्त होने में इतना ही समय लगता है, जितना एक कीड़ा एक तिनके से दूसरे तिनके पर जाने में लगाता है। अर्थात् मृत्यु के बाद दूसरा जन्म प्राप्त होने में कुछ ही क्षण लगते हैं। (आचार्य सोमदेव, परोपकारिणी सभा)

शचीन्द्र - आर्यसमाज का कोई सामान्य व्यक्ति हो या आचार्य, ये जो भी प्रमाण देते हैं, उसका पूर्वापर छिपा देते हैं अथवा स्वयं शास्त्र नहीं पढ़ते हैं। किसी अन्य आर्यसमाजी पुस्तक में अपने पक्ष का प्रमाण देखकर गद्गद होकर, आनंद के आँसू बहाते हुए, उसे कॉपी-पेस्ट कर देते हैं।

बृहदारण्यक उपनिषद का यह जो प्रमाण आर्यसमाजी प्रस्तुत करते फिरते हैं, इसमें पारलौकिक सूक्ष्म देह के ग्रहण की बात है। अर्थात् किसी की जब मृत्यु होती है, तब वह यदि देवलोक जाएगा तो देव-शरीर की प्राप्ति होगी। पितृलोक जाएगा तो पितृ-शरीर की प्राप्ति होगी। अर्थात् जिस भी लोक में व्यक्ति जाएगा, उसी लोक की देह के ग्रहण में ही इस श्रुतिवचन का तात्पर्य है। मृत्यु के बाद सभी जीवों का पुनर्जन्म इसी लोक में तुरंत नहीं होता है।

उपनिषद के इस प्रमाण को आर्यसमाजी जो प्रस्तुत करते हैं, उसके आगे ही पारलौकिक शरीर के ग्रहण की स्पष्टता का वचन साथ में है। उसे किसी एक आर्यसमाजी ने छिपाकर यह आधा-अधूरा प्रमाण किसी पुस्तक में लिख दिया और तब से अब तक आर्यसमाजी आचार्य भी मूर्खतावश इस अधूरे प्रमाण को प्रस्तुत करते फिरते हैं। वह प्रमाण देखें - 

"एवमेव अयमात्मा इदं शरीरं निहत्य, अविद्यां गमयित्वा, अन्यद् नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते - पित्र्यं वा, गान्धर्वं वा, दैवं वा, ब्राह्मं वा, प्राजापत्यं वा, अन्येषां वा भूतानाम्।"

यहाँ स्पष्ट कर दिया गया है कि मृतक को तत्काल मिलने वाला पारलौकिक शरीर पितृलोक या देवलोक का पितृ-देवादि शरीर होता है। इस प्रमाण से पितृलोक भी सिद्ध हो जाता है और जीव का पितृयोनि में जाना भी सिद्ध हो जाता है। मृतक पितर भी सिद्ध हो जाते हैं, जिनके लिए मृतक-पितृ श्राद्ध की भी सिद्धि हो जाती है। इस पितृलोक का वर्णन यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण (१४.४.३.२४ तथा ३.७.१.२५) में दिया गया है।

 इस तत्क्षण पुनर्जन्म के सिद्धान्त को लेकर भी आर्यसमाजियों में विवाद होता है। आधे आर्यसमाजी अपनी मूर्खता से उपनिषद के इस अधूरे प्रमाण से तत्क्षण पुनर्जन्म सिद्ध करते हैं, तो कुछ समाजी कहते हैं कि "१२ दिन बाद आत्मा का पुनर्जन्म होता है।"

स्वामी दयानन्द ने यजुर्वेद के ३९.९ मंत्र की व्याख्या में कम-से-कम १२ दिन बाद जीव का पुनर्जन्म माना है। इसलिए आधे आर्यसमाजी १२ दिन बाद पुनर्जन्म मानते हैं। अब पहले पक्ष वाले समाजी, जो तत्क्षण पुनर्जन्म मानते हैं, वे कहते हैं कि स्वामी जी ने १२ दिन नहीं कहा है, बल्कि बारह क्रम की बात कही है।

स्वामी दयानन्द ने भावार्थ में लिखा है - 

"हे मनुष्यों! जब ये जीव शरीर को छोड़ते हैं, तब सूर्यप्रकाश आदि पदार्थों को प्राप्त होकर कुछ काल भ्रमण कर अपने कर्मों के अनुकूल गर्भाशय को प्राप्त हो, शरीर धारण कर उत्पन्न होते हैं।"

इससे स्पष्ट होता है कि आधे आर्यसमाजी तो दयानन्द के लिखे को भी न मानकर तत्क्षण पुनर्जन्म के अवैदिक सिद्धांत पर अडिग हैं।

कुल मिलाकर स्वामी दयानन्द से लेकर अब तक के आर्यसमाजियों का एक सिद्धांत यह है कि अपनी-अपनी कल्पना करके सिद्धांत गढ़ो और छल आदि से शास्त्रों में उसे खोजकर निकालो; लेकिन जो वास्तव में सत्य शास्त्रीय सिद्धांत हो, उसे किसी भी हाल में मत मानो।

पितृलोक में जाने के प्रमाण वेद में भी हैं - 

"जीवानामायुः॒ प्र तिर त्वमग्ने पितॄ॒णां लोकमपि॑ गच्छन्तु॒ ये मृ॒ताः।" (अथर्ववेद १२.२.४५)

यहाँ पर मृतक का पितृलोक में जाना कहा गया है। इसी प्रकार - 

"परा॑परैतावसु॒विद्वो॑ अ॒स्त्वधा॑ मृ॒ताः पि॒तृषु॒ सं भ॑वन्तु।" - (अथर्ववेद १८.४.४८)

यहाँ भी मृतकों का पितृलोक में जाना सूचित किया गया है। ये दोनों वेदप्रमाण आर्यसमाज की परलोक-संबंधी सब मान्यताओं को ध्वस्त कर देते हैं।

लेकिन अपनी अवैदिक मान्यता को ऊपर रखने के लिए आर्यसमाजी इन सब प्रमाणों को अनदेखा कर देते हैं, छिपाते हैं अथवा इनका अनर्गल अर्थ करने का प्रयास करते हैं।

क्या श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ व्यभिचार किया था? - आर्यसमाजी - आक्षेप का समाधान।

#क्या श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ व्यभिचार किया था? - आर्यसमाजी - आक्षेप का समाधान।

विवेक आर्य और स्वामी सच्चिदानन्द नामक आर्यसमाजी लिखते व कहते हैं कि -- " कृष्ण भी अपनी किशोर अवस्था का मान करते हुए रात्रि के समय उनके (गोपियों) साथ रमण किया करते थे। कृष्ण उनके साथ किस प्रकार रमण करते थे, पुराणों के रचयिता ने श्रीकृष्ण को कलंकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। भागवत पुराण, स्कन्ध १०, अध्याय २९, श्लोक ४५ और ४६ में लिखा है।

"कृष्ण ने यमुना के कपूर के समान चमकीले बालू के तट पर गोपियों के साथ प्रवेश किया। वह स्थान जलतरंगों से शीतल एवं कुमुदिनी की सुगन्ध से सुवासित था। वहाँ कृष्ण ने गोपियों के साथ रमण, बाहें फैलाना, आलिंगन करना, गोपियों के हाथ दबाना, उनकी चोटी पकड़ना, जाँघों पर हाथ फेरना, लहँगे का नाड़ा खींचना, स्तन पकड़ना, मज़ाक करना, नाखूनों से उनके अंगों को नोच-नोचकर घायल करना, विनोदपूर्ण चितवन से देखना और मुस्कराना तथा इन क्रियाओं के द्वारा नवयौवना गोपियों को खूब जागृत करके उनके साथ कृष्ण ने रात्रि में रमण (विषयभोग) किया।"

ऐसे अभद्र विचार श्रीकृष्ण महाराज को कलंकित करने के लिए भागवत के रचयिता ने स्कन्ध १० के अध्याय २९ और ३३ में वर्णित किए हैं।

शचीन्द्र -- विवेक आर्य एवं स्वामी सच्चिदानन्द ने दुर्भावना से इन श्लोकों का अनुचित तात्पर्य ग्रहण करके श्रीकृष्ण और भागवत को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

स्वयं को हिन्दुओं का हितैषी एवं हिन्दू धर्म का चौकीदार कहने वाले आर्यसमाज को करना तो यह चाहिए था कि इन श्लोकों का वास्तविक तात्पर्य प्रकट करते हुए अन्य विधर्मियों के आक्षेपों का उत्तर देता, किन्तु इन्होंने तो स्वयं ही अर्थ को तोड़-मरोड़कर, अपना नमक-मिर्च-मसाला लगाकर श्रीकृष्ण और पुराणों को बदनाम करना आरम्भ कर दिया। इससे आप समझ सकते हैं कि ये कितने बड़े कृष्णप्रेमी हैं। अब इनकी बात पर आते हैं।

इस श्लोक में प्रत्यक्ष संभोग का तो वर्णन नहीं है, किन्तु 'रमण' शब्द से स्वामी दयानन्द एवं आर्यसमाजी यहाँ विषयभोग का अर्थ ग्रहण करते हैं। अब चूँकि आर्यसमाजी श्रीकृष्ण को मनुष्य ही मानते हैं, अतः उसी दृष्टि से प्रथम विचार किया जाता है।

हमारा प्रश्न है कि श्लोकों में श्रीकृष्ण की बाल्यावस्था का वर्णन होने पर 'रमु क्रीडायाम्' का अर्थ विषयभोग कैसे होगा? अर्थात् जहाँ बाल्यावस्था का वर्णन हो, वहाँ रमण का अर्थ विषयभोग नहीं होता। यदि विषयभोग अपेक्षित होता, तो 'यम् मैथुने' धातु का प्रयोग होता। अतः ऐसे सभी वर्णनों में प्रकरणानुसार 'रमयन्ति' का अर्थ 'प्रसन्न करना' होगा। अर्थात् बालक कृष्ण नाना प्रकार की उपर्युक्त क्रीड़ाएँ करके गोपियों को प्रसन्न किया करते थे।

धातुपाठ में 'रमु क्रीडायाम्' (भ्वादिगण) का मूल अर्थ क्रीड़ा ही है, तब यहाँ आर्यसमाजियों ने 'विषयभोग' अर्थ ही क्यों ग्रहण किया?

'गोपैः समं रममाणो व्रजे' इसका अर्थ 'गोपबालकों के साथ खेलते हुए' होगा या आर्यसमाजी यहाँ भी विषयभोग ही मानेंगे?

अपनी पुस्तक 'आर्याभिविनय' में स्वामी दयानन्द 'सोम रारन्धि नो ह्वदि' मन्त्र के अर्थ में लिखते हैं, "हे परमात्मा! आप हमारे हृदय में यथावत् रमण कीजिए।" तब हमारा प्रश्न है कि आर्यसमाजी जब इस मन्त्र का उच्चारण करते हैं, तब क्या वे परमात्मा का संभोग हेतु आवाहन कर रहे होते हैं?

इसी प्रकार 'भाष्य-भूमिका' के 'वेदविषय-विचार' में स्वामी दयानन्द 'परमेश्वर एव रथो रमणाधिकरणम्' मन्त्र का अर्थ करते हुए लिखते हैं, "परमेश्वर को सब स्त्री-पुरुषों के रमण का आश्रय कहते हैं।" तब क्या आप यहाँ भी आर्यसमाजियों के ईश्वर को सभी आर्यसमाजी स्त्री-पुरुषों से मैथुन करने वाला मानेंगे?

'सत्यार्थप्रकाश' में भी स्वामी दयानन्द ने अनेक स्थानों पर 'रमण' शब्द का प्रयोग किया है। वहाँ किसी एक स्थान पर भी रमण का अर्थ विषयभोग क्यों नहीं लिया गया?

'सत्यार्थप्रकाश' में ही मनुस्मृति के श्लोक, 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः', का अर्थ करते हुए स्वामी दयानन्द लिखते हैं, "जिस कुल में नारी लोग रमण अर्थात् आनन्द-क्रीड़ा करती हैं।" तब क्या यहाँ भी विवेक एवं सच्चिदानन्द जैसे दयानन्दी रमण का अर्थ संभोग मानते हुए यह कहेंगे कि दयानन्दियों के कुल की महिलाओं का जब सम्मान होता है, तभी देवता उनके घर संभोग करने आते हैं?

अतः भागवत के इस प्रकरण में बाल्यावस्था के परिप्रेक्ष्य में 'रमण' शब्द का अर्थ क्रीड़ा, आनन्द अथवा प्रसन्नता है, मैथुन नहीं। गोपियाँ स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण से कहती हैं, "सन्त्यज्य सर्वविषयान् तव..." अर्थात् "हम सभी विषयभोगों को छोड़कर भक्त बनकर तुम्हारी शरण में आई हैं।"

गोकुल में श्रीकृष्ण लगभग दस वर्ष की आयु तक रहे थे। ग्यारहवें वर्ष में वे मथुरा चले गए थे। जिस समय का यह प्रकरण है, उस समय उनकी आयु लगभग नौ वर्ष सिद्ध होती है। जब पुराण यहाँ उनकी बाल्यावस्था का वर्णन कर रहे हैं, तब यह लीला विशुद्ध सिद्ध होती है। अतः स्पष्ट होता है कि इस श्लोक तथा इस प्रकरण में लौकिक संभोग का न तो वर्णन है और न ही उसका संकेत। यह विशुद्ध प्रेम का वर्णन है।
साभार - शचीन्द्र शर्मा (8/9/2026 ) फेसबुक पेज से 

पैरासिटामोल से कमजोर हुए लीवर को नया जीवन देने की अद्भुत शक्ति है इस दिव्य औषधि में - छोटी दूधी

#छोटी_दूधी....पहली बार बचपन में इसका नाम सुना था,, जब मौसी को स्तनों में दूध नहीं उतर रहा था तब एक वैद्य ने कहा था कि #धागे_वाली_मिश्री और #छोटी_दूधी दोनों को #खरल में कूट लो,, फिर दूध में मिलाकर स्त्री को पिला दो...स्तनों में खूब दूध उतरता है शिशु के लिए....खैर अपना विषय अलग है।

अगर आपको भोजन करते ही #शौच के लिए जाना पड़ता है....पेट में #मरोड़ से उठते हैं,, दिन में चार पांच बार टॉयलेट जाना पड़ता हो,, हल्के फुल्के दस्त जैसे लगे हों,, #संग्रहणी जैसा रोग हो।
छोटी दूधी #मुट्ठीभर लेकर धो लें स्वच्छ जल से....और फिर अच्छे से चबा चबाकर खा लें....पहले दिन, पहली बार खाते ही ग़जब का आराम मिलता है....पांच सात दिन प्रतिदिन दिन में एक बार किसी भी समय ले लें।

#लीवर को खासकर #संग्रहणी से कमजोर हुए लीवर को.... #पैरासिटामोल से कमजोर हुए लीवर को नया जीवन देने की अद्भुत शक्ति है इस दिव्य औषधि में....नाम बेशक छोटी दूधी है.....काम बड़ा करती है।

साभार 
वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी

Wednesday, 9 September 2026

केतु + चंद्र ( केतु चंद्र में संबंध ) — कुछ लोगों को अपने ही जीवन से दूरी क्यों महसूस होती हैं ?

केतु + चंद्र — कुछ लोगों को अपने ही जीवन से दूरी क्यों महसूस होती है?
कहते हैं एक जन्म में एक स्त्री थी जो हर रात नदी के किनारे बैठकर किसी का इंतजार करती थी। उसके हाथ में एक छोटा-सा दीपक होता था और आंखों में एक ही सवाल — “तुम लौटोगे ना?” वह व्यक्ति कभी नहीं लौटा। दिन बीतते गए। मौसम बदलते गए। गांव वालों ने कहना शुरू कर दिया कि अब उसे भूल जाओ। लेकिन वह नहीं भूली। जिस दिन उसकी सांसें आखिरी बार चलीं उस दिन भी उसकी आंखें उसी रास्ते पर थीं जहां से किसी के आने की उम्मीद थी। उसने जाते-जाते शायद कोई नाम नहीं लिया… केवल एक अधूरा भाव अपने भीतर लेकर चली गई। कर्म की रहस्यमय परंपरा में प्रश्न यही है — अगर शरीर समाप्त हो गया तो क्या वह प्रतीक्षा भी समाप्त हो गई? और अगर नहीं हुई तो क्या वही अधूरी प्रतीक्षा अगले जन्म में किसी ऐसी आत्मा के रूप में जन्म ले सकती है जिसे आज भी अपने जीवन में कुछ कमी महसूस होती रहे लेकिन उसे पता ही न हो कि वह किसका इंतजार कर रही है?
केतु और चंद्रमा का संबंध इसी अजीब अनुभूति को छूता है। चंद्रमा कहता है “मैं महसूस करता हूं।” केतु कहता है “मैं इससे अलग हूं।” चंद्रमा संसार से जुड़ना चाहता है लेकिन केतु भीतर से संसार की पकड़ ढीली करता रहता है। इसलिए कुछ लोगों को अपना ही जीवन कभी-कभी बाहर से चलता हुआ दिखाई देता है। वे हंसते हैं लेकिन भीतर से हंसी में शामिल नहीं होते। परिवार के बीच रहते हैं लेकिन किसी बहुत दूर की जगह को याद करते रहते हैं। सफलता मिलती है लेकिन मन पूछता है — “इसके बाद क्या?” रिश्ते मिलते हैं लेकिन कोई अदृश्य दूरी बनी रहती है। उन्हें कोई दुख स्पष्ट रूप से नहीं होता फिर भी एक अनाम उदासी साथ चलती रहती है। जैसे जीवन हाथ में है लेकिन मन कहीं और छूटा हुआ है। यही वह जगह है जहां केतु और चंद्रमा का संबंध केवल वैराग्य नहीं बल्कि अज्ञात स्मृति का अनुभव बन सकता है।
कल्पना कीजिए वही आत्मा इस जन्म में एक बच्चे के रूप में आती है। परिवार खुश है। बच्चा सामान्य है। लेकिन वह कभी-कभी ऐसी बातें करता है जिन्हें सुनकर माता-पिता चौंक जाते हैं। उसे किसी अनजान जगह को देखकर अपनापन महसूस होता है। किसी मंदिर की घंटी सुनकर आंखें भर आती हैं। किसी पुराने गीत या मंत्र से अचानक मन शांत हो जाता है। उसे भीड़ से अधिक अकेले बैठना अच्छा लगता है। वह बहुत छोटी उम्र में पूछ देता है — “लोग मरने के बाद कहां जाते हैं?” या फिर बिना किसी स्पष्ट कारण के आकाश को बहुत देर तक देखता रहता है। यह सब अपने आप में पूर्व जन्म का प्रमाण नहीं है। बच्चे की संवेदनशीलता और वर्तमान जीवन के अनुभवों के भी कई कारण हो सकते हैं। लेकिन कर्म ज्योतिष की दृष्टि से यदि यही संकेत कुंडली में बार-बार दिखाई दें तो एक संभावना उठती है — क्या यह मन किसी ऐसी चीज को खोज रहा है जिसे वर्तमान जन्म की स्मृति पहचान नहीं पा रही लेकिन भीतर का संस्कार पहचान रहा है?
केतु की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह जिस क्षेत्र को छूता है वहां व्यक्ति को एक अजीब-सी “पहचान के बाद भी दूरी” दे सकता है। चंद्रमा से उसका संबंध हो तो यह दूरी सीधे मन के भीतर उतर सकती है। व्यक्ति को कभी-कभी अपने ही भावों से दूरी महसूस होती है। वह रोना चाहता है लेकिन आंसू नहीं आते। बहुत प्रेम करता है लेकिन उसे व्यक्त नहीं कर पाता। किसी के जाने पर दुख होता है लेकिन साथ ही भीतर से एक आवाज आती है — “सब कुछ तो पहले भी खो चुका हूं।” यह वाक्य बहुत गहरा है। क्योंकि केतु कभी-कभी मन को वर्तमान घटना पर उसकी वास्तविक उम्र से कहीं ज्यादा पुरानी प्रतिक्रिया देता हुआ दिखा सकता है। छोटी घटना बहुत बड़ी लगती है। कोई विदाई सामान्य नहीं लगती। किसी व्यक्ति से मिलना साधारण मुलाकात नहीं लगता। और किसी के चले जाने पर ऐसा महसूस हो सकता है जैसे केवल वह व्यक्ति नहीं गया बल्कि कुछ बहुत पुराना फिर से छिन गया।
अब यदि इसे पूर्व जन्म की दृष्टि से शोध की तरह देखें तो सबसे रोचक प्रश्न यह होगा कि चंद्रमा और केतु किस भाव में हैं। चौथे भाव से संबंध हो तो मन और घर के बीच अजीब दूरी की कथा बन सकती है। पंचम से संबंध हो तो पुराने प्रेम संस्कार मंत्र साधना या किसी अधूरे भाव की परतें खोजने योग्य हो सकती हैं। सप्तम से जुड़ाव हो तो व्यक्ति को कुछ रिश्ते असाधारण रूप से परिचित लग सकते हैं। अष्टम से संबंध हो तो मन रहस्यों और उन भावनाओं की ओर जा सकता है जिन्हें सामान्य भाषा समझ नहीं पाती। नवम से जुड़ाव आध्यात्मिक खोज और पुराने धार्मिक संस्कारों की ओर संकेत कर सकता है। द्वादश भाव से संबंध हो तो व्यक्ति का मन संसार में रहते हुए भी भीतर से किसी और लोक की तलाश करता हुआ प्रतीत हो सकता है। इसलिए केवल “केतु चंद्रमा के साथ है इसलिए व्यक्ति उदास रहेगा” कहना इस योग के साथ अन्याय होगा। यह योग कई बार दुख से ज्यादा एक गहरी आंतरिक दूरी की कहानी कहता है।
राशि और नक्षत्र इस रहस्य को और भी बदल देते हैं। जल राशियों में यह संबंध पुरानी भावनाओं को भीतर गहराई तक जमा कर सकता है। वायु राशियों में व्यक्ति अपनी ही भावनाओं को दूर खड़े होकर देखने लग सकता है। पृथ्वी राशियों में वह भावनाओं को जिम्मेदारियों और व्यवहारिकता के नीचे छिपा सकता है। अग्नि राशियों में भीतर की बेचैनी खोज और उद्देश्य में बदल सकती है। फिर नक्षत्र यह पूछता है कि दूरी किस चीज से है? संसार से? रिश्ते से? अपने शरीर से? किसी व्यक्ति से? या स्वयं की पुरानी पहचान से? यही कारण है कि केतु-चंद्र का फल केवल राशि से नहीं पढ़ा जा सकता। नक्षत्र स्वामी कहां है। चंद्रमा का नक्षत्र क्या है। केतु किस नक्षत्र में है। पंचमेश और नवमेश की स्थिति क्या है। राहु किस ओर खींच रहा है। दशा कब सक्रिय हुई। इन सबको साथ रखकर कभी-कभी कुंडली ऐसी कहानी सुनाती है जिसे जातक पहले से अपने भीतर महसूस कर रहा होता है लेकिन शब्द नहीं दे पाता।
और रिश्तों में इसका दर्द शायद सबसे ज्यादा दिखाई देता है। ऐसा व्यक्ति किसी को बहुत गहराई से चाह सकता है लेकिन उसी समय भीतर से उससे थोड़ा दूर भी रह सकता है। वह किसी के साथ बैठा हो और अचानक उसे लगे कि “मैं यहां होकर भी यहां नहीं हूं।” सामने वाला पूछे — “क्या हुआ?” और उसके पास कोई उत्तर न हो। कभी वह व्यक्ति किसी रिश्ते को बचाने के लिए बहुत कुछ करता है लेकिन भीतर कहीं जानता रहता है कि यह रिश्ता हमेशा उसका नहीं रहेगा। कभी कोई बहुत अपना व्यक्ति मिलता है और उससे मिलते ही मन भर आता है। जैसे पहचान हो। फिर वही व्यक्ति दूर हो जाए तो दर्द वर्तमान से बड़ा हो जाता है। कर्म की व्याख्या में ऐसी अनुभूति को पुराने संबंधों के संस्कार से जोड़ा जा सकता है लेकिन इसे निश्चित पूर्व जन्म की घटना मानना उचित नहीं। फिर भी यदि पूरी कुंडली वही संकेत दे रही हो तो यह प्रश्न बहुत सुंदर हो जाता है — क्या इस जन्म में हम किसी नए व्यक्ति से नहीं मिलते बल्कि किसी पुराने भाव से दोबारा मिलते हैं?
लेकिन केतु केवल छीनने नहीं आता। वह अंततः यह दिखाने आता है कि जिसे हम अपना समझकर पकड़ रहे थे वह स्थायी था ही नहीं। चंद्रमा हर स्मृति को पकड़कर रखना चाहता है। केतु धीरे से हाथ खोल देता है। शुरुआत में यह मुक्ति नहीं लगती। यह खालीपन लगता है। व्यक्ति सोचता है कि मेरे भीतर कुछ टूट गया है। फिर वर्षों बाद समझ आता है कि जो गया था उसके साथ मेरा एक भ्रम भी गया था। केतु चंद्रमा से शायद यही कहता है — “तुम्हें हर चीज को हमेशा याद रखकर नहीं जीना है।” कुछ यादें केवल इसलिए नहीं आईं कि उन्हें जीवन भर ढोया जाए। कुछ इसलिए आईं कि उन्हें देखकर समझा जा सके कि हम किस चीज से बंधे हुए हैं। कुछ रिश्ते इसलिए आते हैं कि हम उन्हें पा सकें और कुछ इसलिए कि हम उनके माध्यम से स्वयं को पहचान सकें। यही कारण है कि गहरे केतु-चंद्र प्रभाव वाला व्यक्ति समय के साथ बाहरी दुनिया से भागने के बजाय भीतर की शांति खोज सकता है।
और फिर उस पहली कहानी पर लौटिए। नदी किनारे बैठी वह स्त्री शायद जिस व्यक्ति का इंतजार कर रही थी वह कभी वापस नहीं आया। लेकिन हो सकता है अगले जन्म में उसका इंतजार किसी व्यक्ति के रूप में वापस न आया हो। वह एक खालीपन बनकर आया हो। एक ऐसी बेचैनी बनकर जिसे कोई रिश्ता भर न सके। एक ऐसा प्रश्न बनकर जिसका उत्तर कोई इंसान न दे सके। शायद इसलिए कुछ लोग पूरी जिंदगी किसी ऐसी चीज की तलाश करते रहते हैं जिसका नाम उन्हें मालूम ही नहीं होता। उन्हें लगता है उन्हें प्रेम चाहिए। फिर प्रेम मिलता है और खालीपन रहता है। उन्हें लगता है उन्हें सफलता चाहिए। सफलता मिलती है और प्रश्न रहता है। उन्हें लगता है उन्हें कोई अपना चाहिए। कोई अपना आता है और फिर भी मन कहता है — “नहीं… मैं किसी और चीज को खोज रहा हूं।” शायद वही वह क्षण है जहां केतु चंद्रमा के सामने आत्मा का आईना रख देता है।
शायद केतु + चंद्र का सबसे गहरा रहस्य यही है — कभी-कभी इंसान अपने जीवन से इसलिए दूर नहीं होता क्योंकि उसे जीवन से प्रेम नहीं है… बल्कि इसलिए क्योंकि उसकी आत्मा किसी बहुत पुराने अध्याय से अभी पूरी तरह लौटी ही नहीं है। शरीर इस जन्म में आ गया। नाम बदल गया। घर बदल गया। रिश्ते बदल गए। शहर बदल गया। लेकिन भीतर किसी अनदेखे कमरे में कोई पुरानी प्रतीक्षा अब भी बैठी रह गई। और फिर एक दिन कोई मंदिर की घंटी बजती है। कोई मंत्र सुनाई देता है। कोई अनजान चेहरा सामने आता है। कोई नदी दिखती है। कोई पुरानी-सी खुशबू आती है… और आंखों से अचानक आंसू निकल पड़ते हैं। समझ नहीं आता क्यों। शायद मन रो नहीं रहा होता… शायद कोई बहुत पुरानी स्मृति दरवाजा खटखटा रही होती है। और शायद उस दिन आत्मा पहली बार धीरे से कहती है,अब लौट आओ… वह जन्म बीत चुका है। जिसको खोया था उसे हर जन्म में खोजते रहना जरूरी नहीं। इस बार तुम्हें किसी और को नहीं… स्वयं को पाना है।”**

साभार - रजनी
( "कुछ यादें " वाट्स एप ग्रुप - एडमिन अनुभव दाधीच )