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Tuesday, 14 April 2026

भगवान परशुराम एक परिचय

हमारे ब्राह्मण परिवारों के प्रत्येक बालक को 
ज्ञात होनी चाहिए ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी।
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🔸️परशुराम जी के माता-पिता का नाम क्या था?
🔹️उत्तर : माता – रेणुका, पिता – महर्षि जमदग्नि।

🔸️ परशुराम जी ने पृथ्वी को कितनी बार आततायियों से विहीन किया था?
🔹️उत्तर : इक्कीस (21) बार।

🔸️भगवान परशुराम जी की गति किसके समान कही गई है?
🔹️उत्तर : मन एवं वायु के समान।

🔸️परशुराम जी के गुरु कौन थे?
🔹️उत्तर : भगवान शंकर।

🔸️परशुराम जी के प्रमुख शिष्यों के नाम क्या हैं?
🔹️उत्तर : भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, दानवीर कर्ण।

🔸️परशुराम जी का अवतार किस युग में हुआ था?
🔹️उत्तर : त्रेता युग में।

🔸️परशुराम जी किसके अवतार हैं और कौन से अवतार हैं?
🔹️उत्तर : भगवान विष्णु के छठे अवतार।

🔸️परशुराम जी के पिता सप्तर्षि मंडल में कौन से ऋषि माने जाते हैं?
🔹️उत्तर : सातवें ऋषि।

🔸️कैलाश पर्वत पर परशुराम जी का किससे युद्ध हुआ और उसका क्या परिणाम हुआ?
🔹️उत्तर : भगवान गणेश जी से; परिणामस्वरूप गणेश जी का एक दंत टूट गया, जिससे वे ‘एकदंत’ कहलाए।

🔸️परशुराम जी किस वंश के थे?
🔹️उत्तर : ब्रह्मा जी के मानसपुत्र महर्षि भृगु के वंशज।

🔸️परशुराम जी ने किस राजा का वध किया था?
🔹️उत्तर : सहस्त्रबाहु अर्जुन (कार्तवीर्यार्जुन)।

🔸️परशुराम जी के दादा-दादी का नाम क्या था?
🔹️उत्तर : ऋचीक मुनि एवं सत्यवती।

🔸️भागवत महापुराण के अनुसार वर्तमान में परशुराम जी कहाँ निवास करते हैं?
🔹️उत्तर : महेन्द्र पर्वत पर।

🔸️पृथ्वी पर किस वंश के अंत हेतु भगवान ने परशुराम रूप में अवतार लिया था?
🔹️उत्तर : हैहय वंश।

🔸️बाल्यावस्था में परशुराम जी ने भगवान की तपस्या कहाँ की थी?
🔹️उत्तर : परम पवित्र चक्रतीर्थ में।

🔸️सहस्त्रबाहु के साथ परशुराम जी का युद्ध कहाँ हुआ था?
🔹️उत्तर : नर्मदा जी के तट पर।

🔸️भगवान शंकर ने परशुराम जी को कौन-सा दुर्लभ मंत्र प्रदान किया था?
🔹️उत्तर : त्रैलोक्य-विजय कवच।

🔸️परशुराम जी की माता ने किस प्रकार देह त्याग किया?
🔹️उत्तर : महर्षि जमदग्नि की हत्या के पश्चात शोकवश सती हो गईं।

🔸️जमदग्नि ऋषि की संतानों में परशुराम जी का स्थान क्या था?
🔹️उत्तर : वे सबसे छोटे पुत्र थे।

🔸 ️ब्रह्मा जी की किस पीढ़ी में परशुराम जी अवतरित हुए?
🔹 ️उत्तर : पाँचवीं पीढ़ी में
(ब्रह्मा → भृगु → ऋचीक → जमदग्नि → परशुराम)।

🔸 ️मत्स्यराज से कवच प्राप्त करने हेतु परशुराम जी ने कौन-सा रूप धारण किया था?
🔹 ️उत्तर : शृंगधारी संन्यासी का।

अतः यह प्रत्येक ब्राह्मण कुल के लिए गर्व एवं ज्ञान का विषय है। इसे अधिकाधिक साझा करें, जिससे हमारी आने वाली पीढ़ियाँ अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित हो सकें।

🙏🏻 जय श्री भगवान परशुराम 

Monday, 13 April 2026

अत्यंत सटीक और दुर्लभ भैरव अस्त्र प्रयोग :-

🌹अत्यंत सटीक और दुर्लभ भैरव अस्त्र प्रयोग :-🌹
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आध्यात्मिक साधना क्षेत्र मे या तंत्र क्षेत्र मे यह एक दुर्लभ और बहुत ही सटीक फलदायी प्रयोग माना जाता है. अगर आपकी भैरव जी के उपर श्रद्धा है और जीवन मे किसी भी बाधा से या परेशानी या समस्या से या तंत्र प्रयोग से या शत्रू बाधा से आप पीडित है या भैरव जी कि कृपा प्राप्ती हेतू या भैरव जी से कवचित होने हेतू आप इस प्रयोग को एक बार अवश्य आजमाके देखे. यह कभी खाली नाही जाता.
 बस पूर्ण श्रद्धा पूर्वक और समर्पित भाव से किजीये. 

कालभैरव जयंती या किसी भी अष्टमी तिथी को या रविवार के दिन या जरुरत पडने पर किसी भी वक्त इस प्रयोग को कर सकते है.
पहले भैरव जी कां मानसिक या पंचोपचार पूजन करें और इस स्तोत्र को पढे. 

मात्र किसी व्यक्ती को बिना वजह तकलीफ देने हेतू इस प्रयोग को ना करें अन्यथा आपको नुकसान होगा. मात्र आपका पक्ष सही है और आपके उपर अन्याय हुवा है या आपको कोई व्यक्ती बिना वजह पीडा दे रहा है या सता रहा है या शत्रू बाधा है तो अवश्य इस प्रयोग कां उपयोग करें.

अथ कालभैरव बटुकभैरव प्रयोग :- 
सर्व प्रथम भैरव जी कां मानसिक या पंचोपचार पूजन करें.

फिर हाथ मे या आचमनी मे जल लेकरं विनियोग मंत्र पढते हुये आपकी समस्या निवारण हेतू या मनोकामना पूर्ती हेतू इच्छा बोलते हुये जल को पूजन स्थान पर या जमीन पर छोडे 
और स्तोत्र को पढे.

अथ बटुकभैरव स्तोत्रस्य सप्तऋषि: मात्रिका छंद: श्री बटुकभैरव देवता मम इप्सित सिद्ध्यर्थे जपे विनियोग : 

ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो  
महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 
शोकदु:ख क्षयकरं निरंजनं निराकारं नारायणं 
भक्तिपूर्णं त्वं महेशं सर्वकाम सिद्धिर्भवेत ! 
कालभैरव भूषणवाहनं कालहंता रुपं च 
भैरव गुनी महात्मन: योगीनां महादेव स्वरुपं सर्व सिद्धयेत ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव 
महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत 

ॐ त्वं ज्ञानं त्वं ध्यानं त्वं योगं त्वं तत्त्वं त्वं बीजं महात्मानं त्वं शक्ति शक्तिधारणं त्वं महादेव स्वरुपं सर्वसिद्धिर्भवेत ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

ॐ कालभैरव त्वं नागेश्वरं नागहारं च त्वं वंदे परमेश्वरं ब्रह्मज्ञानं ब्रह्मध्यानं ब्रह्मयोगं ब्रह्मतत्त्वं ब्रह्मबीजं महात्मन: ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

त्रिशूल चक्र गदापाणि शूलपाणि पिनाकधृक ! ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

ॐ कालभैरव त्वं विनागंधं विनाधूपं विनादीपं सर्वशत्रूविनाशनं सर्वसिद्धिर्भवेत ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

विभूति भूति नाशाय दुष्टक्षयकारकं महाभैरवे नम: सर्वदुष्ट विनाशनं सेवक सर्वसिद्धिं कुरु ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

ॐ कालभैरव त्वं महाज्ञानी महाध्यानी महायोगी महाबली तपेश्वरी देहि मे सिद्धिं सर्व त्वं भैरवं भीमनादं च नादनम ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं अमुकं मारय मारय उच्चाटय उच्चाटय मोहय मोहय वशं कुरु कुरु सर्वार्थकस्य सिस्धिरुपं त्वं महाकाल काल भक्षणं महादेव स्वरुप त्वं सर्व सिद्धयेत ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत 

ॐ कालभैरव त्वं गोविंद गोकुलानंद गोपालं गोवर्धनम धारण त्वं वंदे परमेश्वरं नारायणं नमस्कृत्य त्वं धामशिव रुपं च साधकं सर्व सिद्धयेत ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

ॐ कालभैरव त्वं राम लक्षण त्वं श्रीपती सुंदरं त्वं गरुड वाहनं त्वं शत्रूहंता च त्वं यमस्य रुपं सर्वकार्य सिद्धिं कुरु ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

ॐ कालभैरव त्वं ब्रह्मा विष्णु महेश्वरं त्वं जगतकारणं सृष्टि स्थिती संहारकारकं रक्तबीज महासैन्यं महाविद्या महाभय नाशनम ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

ॐ कालभैरव त्वं आहार मद्य मांसं च सर्वदुष्ट विनाशनं साधकं सर्वसिद्ध प्रदा 

ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं अघोर अघोर महा अघोर सर्व अघोर भैरव काल ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत !

ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ॐ आं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ आं क्रीं क्रीं क्रीं ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं रुं रुं रुं क्रूं क्रूं क्रूं मोहन सर्व सिद्धिं कुरु कुरु ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं अमुकं उच्चाटय उच्चाटय मारय मारय प्रूं प्रूं प्रें प्रें खं खं दुष्टान हन हन अमुकं फट स्वाहा ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

ॐ बटुक बटुक योगं च बटुकनाथ महेश्वर: बटुकं वटवृक्षै बटुकं प्रत्यक्ष सिद्धयेत ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

ॐ कालभैरव श्मशान भैरव कालरुप कालभैरव मेरो बैरी तेरो आहार रे काढि करेजा चखन करो कटकट ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

ॐ नमो हंकारी वीर ज्वालामुखी तू दुष्टन वधकरो विना अपराध जो मोहि सतावे तेकर करे छिदिपरे मुखवाट लोहु आवे को जाने चंद्र सूर्य जाने कि आदि पुरुष जाने कामरुप कामाक्षा देवी त्रिवाचा सत्यफुरो मंत्र ईश्वरो वाचा ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

ॐ कालभैरव त्वं डाकिनी शाकिनी भूत पिशाचश्च सर्वदुष्ट निवारणं कुरु कुरु साधकानां रक्ष रक्ष देहि मे ह्रदये सर्व सिद्धिं त्वं भैरव भैरवीभ्यो त्वं महाभय विनाशनं कुरु ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

ॐ आं ह्रीं पश्चिम दिशा मे सोने का मठ सोने का किवाड सोने का ताला सोने की कुंजी सोने का घंटा सोने की सांकुली पहिली सांकुली अठारह कुल नाग के वांधो दुसरी सांकुली अठारह कुल जाति के वांधो तीसरी सांकुली वैरी दुष्टन को वांधो चौथी सांकुली डाकिनी शाकिनी के वांधो पांचवी सांकुली भूतप्रेत को वांधो जरती अगिन वांधो जरता मसान वांधो जल वांधो थल वांधो वांधो अम्मरताई जहां भेजूं तहां जाई जेहि का वांधि लावो तेहि का वांध लावो 
वाचा चूकै उमा सुखे श्री बावन वीर ले जाय सात समुंदर तीर त्रिवाचा सत्य मंत्र फुरो वाचा ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

ॐ आं ह्रीं उत्तर दिशा मे रुपे का मठ रुपे का किवाड रुपे का ताला रुपे की कुंजी रुपे का घंटा रुपे की सांकुली पहिली सांकुली अठारह कुल नाग के वांधो दुसरी सांकुली अठारह कुल जाति के वांधो तीसरी सांकुली वैरी दुष्टन को वांधो चौथी सांकुली डाकिनी शाकिनी के वांधो पांचवी सांकुली भूतप्रेत को वांधो जरती अगिन वांधो जरता मसान वांधो जल वांधो थल वांधो वांधो अम्मरताई जहां भेजूं तहां जाई जेहि का वांधि लावो तेहि का वांध लावो 
वाचा चूकै उमा सुखे श्री बावन वीर ले जाय सात समुंदर तीर त्रिवाचा सत्य मंत्र फुरो वाचा ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

ॐ आं ह्रीं पूरव दिशा मे तामे का मठ तामे का किवाड तामे का ताला तामे की कुंजी तामे का घंटा तामे की सांकुली पहिली सांकुली अठारह कुल नाग के वांधो दुसरी सांकुली अठारह कुल जाति के वांधो तीसरी सांकुली वैरी दुष्टन को वांधो चौथी सांकुली डाकिनी शाकिनी के वांधो पांचवी सांकुली भूतप्रेत को वांधो जरती अगिन वांधो जरता मसान वांधो जल वांधो थल वांधो वांधो अम्मरताई जहां भेजूं तहां जाई जेहि का वांधि लावो तेहि का वांध लावो 
वाचा चूकै उमा सुखे श्री बावन वीर ले जाय सात समुंदर तीर त्रिवाचा सत्य मंत्र फुरो वाचा ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

ॐ आं ह्रीं दक्षिण दिशा मे अस्थि का मठ अस्थि का किवाड अस्थि का ताला अस्थि की कुंजी अस्थि का घंटा अस्थि की सांकुली पहिली सांकुली अठारह कुल नाग के वांधो दुसरी सांकुली अठारह कुल जाति के वांधो तीसरी सांकुली वैरी दुष्टन को वांधो चौथी सांकुली डाकिनी शाकिनी के वांधो पांचवी सांकुली भूतप्रेत को वांधो जरती अगिन वांधो जरता मसान वांधो जल वांधो थल वांधो वांधो अम्मरताई जहां भेजूं तहां जाई जेहि का वांधि लावो तेहि का वांध लावो 
वाचा चूकै उमा सुखे श्री बावन वीर ले जाय सात समुंदर तीर त्रिवाचा सत्य मंत्र फुरो वाचा ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत !

ॐ कालभैरव त्वं आकाशं त्वं पातालं त्वं मृत्युलोकं चतुर्भुजं चतुर्मुखं चतुर्बाहुं शत्रूहंता च त्वं भैरव भक्तिपूर्ण कलेवरम ! 
 ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत !

ॐ कालभैरव त्वं सहस्त्रमुख सहस्त्र जिव्हा सहस्त्र वाहनं सहस्त्र दुष्ट भक्षितं त्वं सेवकस्य सहस्त्र कामना सिद्धि करोसि ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत !

ॐ कालभैरव तुम जहां जाहु जहां दुश्मन बैठा होय तो बैठे को मारो चलत होय तो चलते को मारो सोवत होय तो सोते को मारो पूजा करत होय तो पूजा मे मारो जहां होय तहां मारो व्याघ्र लै भैरव दुष्ट को भक्षो सर्प लै भैरव दुष्ट को डंसो खडग से मारो भैरव दुष्ट को शिर गिरैवान से मारो दुष्टन करेजा फटै त्रिशूल से मारो शत्रूछिदि परै मुख वाट लोहू को आवे को जाने चंद्र सूरज जाने आदि पुरुष जानै कामरुप कामाक्षा देवि त्रिवाचा सत्य फुरो मंत्र ईश्वरी वाचा !
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत !

ॐ कालभैरव त्वं वाचा चूकै उमा सुखै दुश्मन मरै अपने घर मे दुहाई कालभैरव की जोमार वचन झूठा होय तो ब्रह्मा के कपाल टूटै शिवजी के तिनो नेत्र फूटै मेरी भक्ति गुरु की शक्ति फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत !

ॐ कालभैरव त्वं भूतस्य भूतनाथश्च भूतात्मा भूतभावन: त्वं भैरव सर्व सिद्धिं कुरु कुरु ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत !

ॐ कालभैरव त्वं ज्ञानी त्वं ध्यानी त्वं योगी त्वं जंगम स्थावरं त्वं सेवित सर्वकाम सिद्धिर्भवेत ! 
ॐ कालभैरो बटुकभैरो भूतभैरो महाभैरव महाभयविनाशनं देवता सर्वसिद्धिर्भवेत !

ॐ कालभैरव त्वं वंदे परमेश्वरं ब्रह्मरुपं प्रसन्नो भव गुनि महात्मानां महादेव स्वरुपं सर्वसिद्धिर्भवेत ! 

!ॐ कालभैरव बटुकभैरव योग विख्यात: गोपालेन संकीर्तितम ! 
गोरखनाथ स्वयं श्रूतं सर्व कार्येषु कामदम ! इति !

पूजिअ_बिप्र_सील_गुन_हीना। सूद्र_न_गुन_गन_ग्यान_प्रबीना॥ रामचरितमिनस की इस चौपाई के शब्द पूरक अर्थ से ऊपर जाकर व्यवहारिक अर्थ की जानकारी और सामाजिक सुरक्षा का सूत्र ।

#पूजिअ_बिप्र_सील_गुन_हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस किताब को हम सदियों से पूजते रहे हैं, जिस रामचरितमानस की चौपाइयों ने हमारे पूर्वजों को कठिन समय में संबल दिया, उसी के एक अंश को आज हमारे विरुद्ध हथियार क्यों बनाया जा रहा है? आज हम उस नैरेटिव की धज्जियां उड़ाएंगे, जिसने आपके आत्मविश्वास को दीमक की तरह चाटा है।

पूजिअ बिप्र: ब्राह्मण की पूजा करो।

सील गुन हीना: चाहे वह शील (चरित्र) और गुणों से रहित हो।

सूद्र न: शूद्र पूजनीय नहीं है।

गुन गन ग्यान प्रबीना: चाहे वह गुणों की खान और ज्ञान में अत्यंत प्रवीण (Expert) ही क्यों न हो।

हमें चौपाई का अर्थ यही बताया गया कि चरित्रहीन ब्राह्मण पूजनीय है, पर ज्ञानी शूद्र नीच है।"बड़े-बड़े मंचों से हजारों की भीड़ में इस चौपाई को और उसके इसी गलत अर्थ को बोलने में लोग बड़ा गौरवान्वित महसूस करते हैं। यहां ब्राह्मण को आज के जाति वाले शुक्ल, मिश्र, पांडेय आदि बताया जाता है और शूद्र को आज का एससी एसटी। गजबय जोड़ तोड़ है....।

आपने इस चौपाई का यही अर्थ पढ़ा है न...........?
.हां हां यही पढ़ा होगा। 
क्योंकि हमें यही पढ़ाया गया... 
यही दिखाया गया.... 
यही समझाया गया और यही हम समझ भी गए...। 

रामचरितमानस की वह चौपाई, जिसे वामपंथी और पश्चिमी नैरेटिव ने 'विवाद' का केंद्र बनाया, वह वास्तव में 'समाज की सुरक्षा' का सबसे बड़ा सूत्र है। आइए, इसका ऐसा विश्लेषण करें ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस सत्य पर गर्व करें।

यह चौपाई अरण्यकाण्ड से ली गई है...
यह चौपाई तब कही गई जब भगवान श्री राम ने 'कबंध' नामक राक्षस का उद्धार किया। कबंध असल में एक गंधर्व था, जो अपने रूप और ज्ञान के अहंकार में ऋषियों का अपमान करता था, जिसके कारण उसे राक्षस बनने का श्राप मिला।
 जब राम जी ने उसका उद्धार किया, तब कबंध ने पूछा कि प्रभु! आपने मुझ जैसे पापी पर कृपा क्यों की? तब राम जी ने उसे 'मर्यादा' का पाठ पढ़ाया। यह किसी 'जाति' को नहीं, बल्कि एक 'अहंकारी राक्षस' को दी गई सीख थी।

चौपाई का शब्द-विच्छेद और वास्तविक अर्थ समझिए

पूजिअ (Pujia)

 भ्रम: इसका अर्थ 'आरती उतारना' या 'पैर धोना' बताया गया।

 वास्तविक अर्थ: संस्कृत और अवधि में 'पूज्य' का अर्थ होता है—"सम्मान के योग्य" या "स्वीकार्य" (Acceptable/Authoritative)। इसका अर्थ है कि मार्गदर्शन के लिए उस व्यक्ति की बात को 'प्राथमिकता' देना

बिप्र (Bipra)

 भ्रम: ब्राह्मण जाति में पैदा हुआ व्यक्ति।

 वास्तविक अर्थ: विप्र का अर्थ जाति नहीं, बल्कि 'डिग्री' है। "वि" (विशेष) + "प्र" (प्राप्ति)। जिसने विशेष ज्ञान (ब्रह्मविद्या) प्राप्त कर ली हो। शास्त्र कहते हैं— "जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विज उच्यते। वेद पाठात् भवेत् विप्रः..."। अर्थात् विप्र वह है जो वेदों का ज्ञाता है।

सील गुन हीना (Seel-Gun Heena)

 भ्रम: "चरित्रहीन" या "बुरे आचरण वाला"।

 वास्तविक अर्थ: यहाँ 'शील' और 'गुण' का अर्थ 'सांसारिक उपलब्धियाँ' हैं।
   शील: सामाजिक चतुरता (Social Etiquette)।
   गुण: ऐश्वर्य, रूप, धन या भौतिक कलाएं।
 अर्थ: यदि कोई विप्र (ज्ञानी) फटेहाल है, उसके पास चकाचौंध नहीं है, वह दिखने में प्रभावशाली नहीं है, फिर भी वह अपनी 'विद्या' के कारण सम्मान का पात्र है।

 सूद्र (Sudra)

 भ्रम: दलित या पिछड़ी जाति।

 वास्तविक अर्थ: सनातन दर्शन में 'शूद्र' एक 'मानसिक अवस्था' है। जो केवल अपनी 'इंद्रियों' और 'शारीरिक सुखों' (Senses) के अधीन है, वह शूद्र है। "शोचति इति शूद्रः"—जो हमेशा शोक और संसारी प्रपंचों में फँसा रहे।

गुन गन ग्यान प्रबीना (Gun Gan Gyan Prabina)

 भ्रम: बहुत विद्वान या जानकार।

 वास्तविक अर्थ: यहाँ ज्ञान का अर्थ 'इन्फॉर्मेशन' (सूचना) है।
 अर्थ: यदि कोई व्यक्ति सांसारिक जानकारियों में बहुत 'प्रवीण' (Expert) है, लेकिन उसकी चेतना 'शूद्र' (असंस्कारित/स्वार्थी) है, तो वह 'पूजनीय' (Decision Maker) नहीं हो सकता।

जब हम इन शब्दों को जोड़ते हैं, तो अर्थ निकलता है:
"उस तपस्वी का सम्मान करो जो साधनहीन (Seal-Gun Heen) होकर भी ज्ञान की रक्षा कर रहा है, लेकिन उस चतुर बुद्धिजीवी का नेतृत्व कभी स्वीकार मत करो जिसके पास जानकारी (Gyan Prabina) तो बहुत है, लेकिन जिसमें संस्कार और मर्यादा (Sudra Frequency) शून्य है।"

"सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना" का अर्थ जाति से है ही नहीं। इसे 'योग' और 'सांख्य' की दृष्टि से देखिए।
यहां 'शूद्र' का अर्थ है वह व्यक्ति जिसकी चेतना केवल 'इंद्रियों' (Senses) तक सीमित है। अगर ऐसा व्यक्ति बहुत ज्ञानी (Information-rich) हो जाए, तो वह 'असुर' बन जाता है। रावण इसका साक्षात प्रमाण है—वेदों का ज्ञाता होने के बावजूद वह पूजनीय नहीं हुआ क्योंकि उसकी चेतना 'शूद्र' (तामसिक) थी। ज्ञान तब तक पूजनीय नहीं होता जब तक वह 'विनय' और 'परंपरा' से न बंधा हो। बिना संस्कार का ज्ञान समाज के लिए एटम बम की तरह है।

लोग यहाँ 'चरित्रहीन' शब्द जबरदस्ती घुसाते हैं। व्याकरण की दृष्टि से इसे समझिए। यहाँ 'शील' और 'गुण' का अर्थ 'सांसारिक उपलब्धियाँ' हैं (जैसे वाकपटुता, धन, या राजनैतिक शक्ति)। यदि एक ब्राह्मण के पास दुनिया भर की चकाचौंध (Glamour) नहीं है, वह दिखने में साधारण है, साधनहीन है, लेकिन वह अपने 'तप' और 'स्वधर्म' में स्थित है, तो वह उस व्यक्ति से श्रेष्ठ है जिसके पास डिग्रियां (Information) तो बहुत हैं लेकिन धर्म की जड़ नहीं है।

यह चौपाई 'Information' (सूचना) के ऊपर 'Wisdom' (बोध) को रखने का सूत्र है। यह कहती है कि नेतृत्व उसे मत दो जो केवल 'स्मार्ट' है, नेतृत्व उसे दो जो 'संस्कारित' है।

"जाति का चश्मा उतारोगे, तभी धर्म का चक्षु खुलेगा। यह चौपाई समाज को बांटने का गड्ढा नहीं, बल्कि भस्मासुरों को रोकने वाली 'लक्ष्मण रेखा' है।"

रावण से बड़ा 'ब्राह्मण' कौन था? वह तो चारों वेदों का ज्ञाता था, 'शील-गुण' से संपन्न था। फिर राम जी ने उसका वध क्यों किया? क्योंकि वह 'विप्र' की मर्यादा भूल चुका था।
 अगर राम जी केवल जाति की बात कर रहे होते, तो रावण की पूजा करते और केवट को गले न लगाते। यह चौपाई 'अहंकार के विरुद्ध चेतावनी' है, किसी जाति के विरुद्ध प्रमाण नहीं।

वामपंथी लोगों से पूछिए कि इसी रामचरितमानस में जब कागभुशुण्डि जी (जो जन्म से ब्राह्मण नहीं थे) उपदेश देते हैं, तो बड़े-बड़े ऋषि और स्वयं लोमश ऋषि उनके चरणों में क्यों बैठते हैं?
 अगर तुलसीदास जातिवादी होते, तो एक कौवे (कागभुशुण्डि) को परम ज्ञान का अधिकारी कभी न बनाते।
रामचरितमानस में 'भक्ति' ही एकमात्र योग्यता है। जिसके हृदय में राम हैं, वही श्रेष्ठ है। बाकी सब सांसारिक व्यवस्था (Administrative Order) है।

यह चौपाई समाज को जोड़ने वाली है क्योंकि यह 'अनुशासन' सिखाती है। यह बताती है कि:
पद और परंपरा का सम्मान व्यक्ति से बड़ा है।
संस्कारहीन ज्ञान (Information without character) घातक है।

विरोधी कहते हैं कि "चरित्रहीन ब्राह्मण पूजनीय है"। यह सरासर झूठ है!
 यहाँ 'शील' और 'गुण' का अर्थ है 'सांसारिक कलाएं' (जैसे धन कमाना, राजनीति करना, या सुंदर दिखना)।
 यदि एक विप्र (विद्वान) के पास फटी धोती है, वह गरीब है, उसे दुनियादारी नहीं आती (शील-गुण हीन), लेकिन वह अपनी 'साधना' में पक्का है, तो वह उस 'मल्टी-टैलेंटेड' आदमी से श्रेष्ठ है जो बहुत ज्ञानी तो है पर जिसकी जड़ें परंपरा से कटी हुई हैं। यह 'Inner Worth' बनाम 'Outer Show' की लड़ाई है।

विरोधियों को यह समझाना होगा कि सनातन व्यवस्था में 'विप्र' का अर्थ 'अथॉरिटी' (प्रामाणिकता) से है।
 जैसे आज के दौर में अगर कोई जज (Judge) व्यक्तिगत जीवन में कैसा भी हो, लेकिन जब वह अपनी कुर्सी पर बैठता है, तो उसे 'Your Honor' कहा जाता है और उसके आदेश का पालन किया जाता है। क्यों? क्योंकि वह उस संविधान और न्याय प्रणाली का प्रतीक है।
 "पूजिअ बिप्र" का अर्थ उस ज्ञान की गद्दी को पूजना है। यदि हम पद (Post) की गरिमा खत्म कर देंगे, तो समाज की पूरी संरचना (Social Order) गिर जाएगी। तुलसीदास जी यहाँ 'संस्थान' (Institution) को बचाने की बात कर रहे हैं।

अंग्रेजों ने 'Divide and Rule' के लिए शब्दों के अर्थ बदले, लेकिन हम 'तत्व' पकड़ेंगे। जो लोग इसे विवादित कहते हैं, वे असल में सनातन की 'मेरिटोक्रेसी' (योग्यता तंत्र) से डरे हुए हैं।

विरोधियों की सबसे बड़ी हार यहीं होती है कि वे 'विप्र' को 'जाति' समझ लेते हैं।
 'विप्र' शब्द 'वि' (विशेष) और 'प्र' (प्राप्ति) से बना है। जिसने 'विशेष ज्ञान' (ब्रह्मविद्या) को प्राप्त कर लिया हो।
जैसे एक 'कलेक्टर' कुर्सी पर बैठा हो और उसे कोई व्यक्तिगत रूप से पसंद न करे, फिर भी उस पद को सम्मान दिया जाता है क्योंकि वह 'स्टेट' (State) का प्रतिनिधित्व करता है। वैसे ही 'विप्र' उस 'सनातन ज्ञान परंपरा' का प्रतीक है। राम जी यहाँ व्यक्ति की नहीं, उस 'सीट' (पद) की गरिमा की बात कर रहे हैं। बिना 'प्रोटोकॉल' के समाज अराजक हो जाएगा।

विदेशी नैरेटिव कहता है कि यह "शूद्रों का अपमान" है। उन्हें जवाब दीजिए कि भगवान राम ने स्वयं साक्षात् परशुराम (ब्राह्मण) के क्रोध का सामना किया और उन्हें झुकाया, लेकिन एक केवट (शूद्र अवस्था) से गले मिले। जो नायक खुद केवट से प्रेम कर रहा है, उसी के मुंह से शूद्रों का अपमान करवाएंगे? बिल्कुल नहीं! यह केवल 'अहंकार बनाम विनम्रता' और 'परंपरा बनाम अराजकता' का युद्ध है।

अंग्रेजों और वामपंथियों ने 'डिवाइड एंड रूल' के लिए इस चौपाई को अलग से निकाला। उनसे पूछिए अगर तुलसीदास जातिवादी थे, तो उन्होंने राम जी के मुख से यह क्यों कहलवाया— "जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥ भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥" (अर्थात् भक्ति के बिना ऊँची जाति, कुल और धन-बल सब बेकार हैं)।

इसे और गहराई से समझ लीजिए

भ्रम (Narrative): "चरित्रहीन ब्राह्मण पूजनीय है, पर ज्ञानी शूद्र नीच है।"

सत्य (The Reality): यहाँ 'विप्र' और 'शूद्र' जाति नहीं, बल्कि 'चेतना की अवस्थाएं' हैं।
 
विप्र (The Institution): विप्र का अर्थ है वह 'सॉफ्टवेयर' या 'संस्था' जिसने हज़ारों साल से ज्ञान को सहेजा है। जैसे एक 'न्यायाधीश'(Judge) निजी जीवन में कैसा भी हो, पर जब वह अपनी कुर्सी पर बैठता है, तो पूरा राष्ट्र उसे सम्मान देता है क्योंकि वह 'न्याय के सिद्धांत' का प्रतीक है। राम जी कह रहे हैं कि उस 'ज्ञान की गद्दी' का सम्मान करो, व्यक्ति का नहीं।

 सील-गुन हीन (Sacrifice over Luxury): यहाँ 'शील-गुण' का अर्थ चरित्रहीनता नहीं, बल्कि 'सांसारिक सुखों का अभाव' है। एक वैज्ञानिक या संत फटेहाल हो सकता है, उसके पास चकाचौंध (गुण) नहीं हो सकती, लेकिन उसकी 'साधना' पूजनीय है।

 राम जी कहते हैं— "सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।"
यहाँ 'शूद्र' का अर्थ है— व्यक्ति की वह अवस्था जिसके पास 'संस्कार' नहीं हैं, जो केवल अपनी भूख और वासना का गुलाम है।

 कल्पना कीजिए, एक ऐसा व्यक्ति जो 'एटम बम' बनाने में 'प्रवीण' (Expert) है, लेकिन उसके पास 'संस्कार' शून्य हैं। वह क्या करेगा? वह 'आतंकवादी' बनेगा। वह 'विनाश' करेगा। ओसामा बिन लादेन इंजीनियर था लेकिन चरित्र नहीं था नतीजा वह आतंकवादी बना। 

 राम जी कह रहे हैं कि 'बिना संस्कार का ज्ञान' (Information without Values) समाज के लिए कैंसर है। ऐसे 'ज्ञानी' को अगर समाज का नेतृत्व (पूजा) दे दिया गया, तो वह पूरी सभ्यता को राख कर देगा। इसलिए, केवल 'ज्ञान' काफी नहीं है, उस ज्ञान का 'मर्यादित' और 'संस्कारित' होना अनिवार्य है।

तुलसीदास जी ने 'जाति' को नहीं, 'भक्ति' को प्रधान माना।
 अगर वे भेदभाव करते, तो निषादराज (शूद्र अवस्था) 
 को राम का 'भाई' क्यों लिखते?
 वे शबरी के जूठे बेर क्यों खिलाते?
 वे रावण (जो महाज्ञानी ब्राह्मण अवस्था में था) का वध क्यों लिखते ? न राम ने भेदभाव किया न तुलसी ने भेदभाव लिखा। 

 शबरी को समाज में निम्न स्थान प्राप्त था, लेकिन राम जी ने उन्हें "भामिनी" (प्रतिष्ठित स्त्री) कहा और उनकी भक्ति को सबसे ऊपर रखा।
निषादराज गुह राम जी ने उन्हें गले लगाया और कहा कि वह उन्हें 'भरत के समान' प्रिय हैं।

रावण 'विप्र' था, गुणी था, ज्ञानी था—परन्तु राम ने उसे मारा। क्यों? क्योंकि वह मर्यादाहीन था। केवट 'शूद्र अवस्था' में थे—परन्तु राम ने उन्हें अपना भाई मित्र कहा क्यों? क्योंकि वे भक्त और मर्यादित थे।

यह चौपाई समाज को बाँटने के लिए नहीं, बल्कि 'अनुशासन' (Order)बनाए रखने के लिए है। यह कहती है कि:
त्याग और साधना (विप्र) का सम्मान करो, चाहे वह दरिद्र क्यों न हो।
 संस्कारहीन और अहंकारी बुद्धि (शूद्र अवस्था) का नेतृत्व कभी स्वीकार न करो, चाहे वह कितनी ही आकर्षक क्यों न हो।

अंग्रेजों और वामपंथियों ने हमें हमारे ही ग्रंथों से डराना चाहा, ताकि हम अपनी जड़ों को काट सकें। पर आज यह सत्य जान लो—रामचरितमानस 'भेद' का नहीं, 'प्रेम और मर्यादा' का संविधान है। जो इस चौपाई को पढ़कर क्रोधित होता है, वह केवल शब्दों को पढ़ता है; जो इसे समझकर पढ़ता है, उसके भीतर का 'राम' जाग जाता है।

अब अपनी चेतना के कपाट खोलिए। जो लोग इस चौपाई पर सवाल उठाते हैं, वे आपके धर्मग्रंथ की 'स्याही' तो देख रहे हैं, पर उसकी 'गहराई' नहीं। रामचरितमानस 'भेद' का शास्त्र नहीं, बल्कि 'अहंकार के विसर्जन' का मंत्र है। जिस दिन आप शब्द के पीछे छिपे इस सत्य को आत्मसात कर लेंगे, उस दिन दुनिया का कोई भी नैरेटिव आपको झुका नहीं पाएगा।
आप उस संस्कृति के वारिस हैं जहाँ 'त्याग' को 'तख़्त' से ऊँचा रखा गया है। जहाँ फटेहाल खड़ा एक तपस्वी, वैभव में डूबे सम्राट को रास्ता दिखाने का साहस रखता है। यह चौपाई हमें यही सिखाती है कि नेतृत्व उसे मत दो जो केवल 'ज्ञानी' है, नेतृत्व उसे दो जो 'संस्कारित' और 'त्यागी' है।
अपनी जड़ों पर गर्व कीजिए, क्योंकि जहाँ तर्क समाप्त होते हैं, वहाँ से 'राम' की मर्यादा आरंभ होती है।

वामपंथी नैरेटिव यह भूल जाता है कि तुलसीदास जी "सिया राममय सब जग जानी" लिखने वाले कवि हैं। जो व्यक्ति पूरे जड़-चेतन में राम को देखता हो, वह किसी मनुष्य का अपमान कैसे कर सकता है?
यह चौपाई समाज को बांटने के लिए नहीं, बल्कि 'मर्यादा' और 'अनुशासन' सिखाने के लिए है। यह बताती है कि ज्ञान केवल सूचनाओं का ढेर नहीं है, बल्कि वह संस्कार और परंपरा के प्रति निष्ठा भी है।

     अस्तु 


संदर्भ - https://www.facebook.com/share/18HJxyszSh/

#Ramcharitmanas #SanatanDharma
✍️ Swami Sri Amar Das ji Maharaj 

वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Sunday, 12 April 2026

साकार ईश्वर पौराणिक मत / निराकार ईश्वर आर्य समाज मत (शचींद्र जी एक लेख के संदर्भ में डॉ मधुलिका आर्या और विशाल आर्य का लेख )

[ श्री शचीन्द्र शर्मा ने एक लेख 'आर्यसमाजियों का काल्पनिक निराकार ईश्वर' लिखकर प्रकाशित किया। जिसमें मुख्यतः आर्यसमाज की निराकार ईश्वर विषयक मान्यता पर प्रश्न उठाते हुए यह सिद्ध करने का असफल प्रयास किया है कि महर्षि दयानन्द भी मानते थे कि ईश्वर साकार है। उनके इस कुप्रयास का निराकरण डॉ. मधुलिका (भीनमाल, राज.) ने इस लेख में किया है। ]


महर्षि दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश (प्रथम संस्करण, प्रथम समुल्लास) में लिखते हैं-

"... 'निर्गतः आकारोयस्मात्स निराकारः " जिसका आकार कोई नहीं, इससे परमेश्वर का नाम 'निराकार' है।"

महर्षि यहाँ स्पष्ट रूप से यह अभिप्राय ग्रहण कर रहे हैं कि परमेश्वर किसी भी प्रकार के आकार, आकृति, रूप वा सीमा से रहित है। इसके पश्चात् भी यदि यह कहा जाए कि "इससे परमात्मा साकार सिद्ध हो जाता है, क्योंकि उसमें पहले आकार था, इसीलिए तो निकल गया। यदि उसमें कोई आकार नहीं था, तो निकल क्या गया?" तो यह अर्थ ऋषि के नाम के तात्पर्य के अनुरूप नहीं है। आप पूरी तरह से पूर्वाग्रह से मेर प्रतीत होते हैं। वस्तुतः आपकी पद्धति शब्दों का केवल शब्दकोश पर आधारित अर्थ करने की है। उदाहरणार्थ यदि निम्न वैदिक मन्त्र का ऐसा ही शाब्दिक अनुवाद कर दिया जाए- चत्वारि श्रृंगा त्रयो अस्य पादा दे शीर्ष सप्त हस्तासी अस्य । त्रिचा बद्धो वृषभो रोरवीति महोदेवा मत्यांम् आविवेश।
तो वह कुछ ऐसा होगा इसके चार सींग, तीन पैर, दो सिर और सात हाथ है। तीन टुकड़ों में बंधा बैल चिल्लाया और महानु देवता नश्वर संसार में प्रवेश कर गए।

ऐसे ही अनुवादों से सनातन धर्म का नाश हुआ।

प्रतीत होता है कि आपने सत्यार्थप्रकाश की भूमिका नहीं पढ़ी और सीधे जो अपने काम की बात लगी, वह ले ली। स्वयं महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश की भूमिका में स्पष्ट चेतावनी दी है-
"जो कोई इस ग्रन्थकर्ता के तात्पर्य से विरुद्ध मनसा से देखेगा, उसको कुछ भी अभिप्राय विदित न होगा.. बहुत से हठी, दुराग्रही मनुष्य होते हैं कि जो वक्ता के अभिप्राय से विरुद्ध कल्पना किया करते हैं, विशेषकर मत बाले लोग। क्योंकि मत के आग्रह से उनकी बुद्धि अन्धकार में फँस के नष्ट हो जाती है।"

यदि उसी समुल्लास में इससे आगे की दो पंक्ति और पढ़ ली होती, तो आप एक ऋषि का उपहास करनेका पाप न करते। वहाँ महर्षि 'निर्गत' शब्द का अर्थ करते हुए 'निरंजन' शब्द की व्युत्पत्ति में लिखते हैं-( 'अञ्जू व्यक्तिम्लक्षणकान्तिगतिषु) इस बातु से 'अञ्जन' शब्द और 'निं' उपसर्ग के योग से 'निरंजन' शब्द सिद्ध होता है।

अंजनं व्यक्तिर्लक्षणं कुकाम इन्द्रियै: प्राप्तिश्चेत्यस्माद्यो निर्गतः पृथग्भूतः स निरंजनः " जो व्यक्ति अर्थात् आकृति, म्लेच्छाचार, दुष्टकामना और चक्षुरादि इन्द्रियों के विषयों के पथ से पृथक् है, इससे ईश्वर का नाम 'निरंजन' है।

यहाँ महर्षि ने स्पष्ट रूप से 'निर्गत' का अर्थ 'पृथक्' लिया है, न कि 'पहले था और निकल गया'। 'निं' का अर्थ 'अभाव' भी है, जैसा कि 'निर्मक्षिकम्' आदि प्रयोग में है।

इस प्रकार 'निर्गतः आकारो यस्मात्स निराकारः' का अर्थ हुआ-जिससे आकार पृथक् है अर्थात् जगत् से पृथक् होने के कारण 'निराकार' कहलाता है। પૃથજી

द्वितीय संस्करण में महर्षि स्वयं इसे और अधिक स्पष्ट कर देते हैं- 'निर्गत आकारात्स निराकारः' जिसका आकार कोई भी नहीं और न कभी शरीर-धारण करता है, इसलिए परमेश्वर का नाम 'निराकार' है।
यहाँ भी 'निर्गत' का अर्थ 'पृथक्' लें, तो अर्थ इस प्रकार बनेगा जो आकार से पृथक् है, वह 'निराकार' कहलाता है।
यदि गम् धातु का अर्थ 'ज्ञान' और 'प्राप्ति' लें, तब भी यही भाव है कि परमेश्वर निराकार होने के कारण, आकार (भौतिक पदार्थों) से जाना वा प्राप्त नहीं किया जा सकता।

निराकार = सीमाबद्ध भौतिक रूप का निषेध

जब बुद्धि पर पत्थर पड़ जाते हैं, तो निराकार भी सब जगह साकार ही दिखाई पड़ता है।

आप आगे महर्षि दयानन्द को उद्धृत करते हैं- "जब वह (परमात्मा) प्रकृति से भी सूक्ष्म और उसमे व्यापक है।" (सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास ८)
जीव का स्वरुप सूक्ष्म है और परमेश्वर अतीव सूक्ष्मात् सूक्ष्मतर स्वरूप है । (सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास ७) इन दोनों से आप कहना चाहते हैं कि महर्षि जी ने परमात्मा को प्रकृति व आत्मा की अपेक्षा सूक्ष्मतर बताकर उसका सूक्ष्मतम आकार स्वयं सिद्ध कर दिया। अर्थात् आप सूक्ष्म से आकार का ग्रहण कर रहे हैं। यहाँ भी आपने वही भूल कर दी, लेखक का आशय नहीं समझा। जब बुद्धि सूक्ष्म न हो, तो ऋषियों के ग्रन्थों को नहीं पढ़ना चाहिए। यहाँ बुद्धि सूक्ष्म होने का अर्थ यह नहीं है कि बुद्धि का आकार हो गया।

सूक्ष्म का अर्थ है-
* किसी प्रकार से ग्राह्य न होना। 
* भौतिक मापन के अधीन न होना।

आपने सूक्ष्मता (subtlety) और आकार (form) को एक मान लिया गया है। यहीं से भ्रम प्रारम्भ होता है। मान लें- परमात्मा का सूक्ष्म आकार है। तब यहाँ प्रश्न उपस्थित होगा कि किसी पदार्थ का आकार है, तो उसकी सीमा होगी। सीमा के बाहर कुछ होगा, सीमा के अन्दर कुछ होगा और सीमा भी किसी से बनी होगी। पदार्थ की सीमा है अर्थात् वह संघनित है। इसका अर्थ है कि वहाँ कोई बल कार्य कर रहा है। वह कौनसा बल है? सूक्ष्म आकार है, तो क्या आप परमात्मा को कण रुप में मानेंगे? हवा का आकार बता सकते हैं ? आकाश जो मूल कणों से सूक्ष्म है, उसका क्या आकार हैं? प्रकृति का क्या आकार है? वस्तुतः आकार वाली बात मूल कणों से सूक्ष्मता की ओर जाने पर ही समाप्त हो जाती है। परमात्मा प्रकृति और यहाँ तक कि आत्मा से भी सूक्ष्म है, वहाँ आकार की बात करना मूर्खतापूर्ण है। जिसका आकार है, वह सीमित होगा। जो सीमित है, वह अनन्त नहीं, जो अनन्त नहीं, वह सर्वव्यापक नहीं और जो सर्वव्यापक नहीं, वह परमात्मा नहीं। कठोपनिषद् पढ़ लिया होता, तो मूर्खतापूर्ण बातें न करते।
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ (१.३.१५)
अर्थात् वह 'परतत्त्व' जिसमें न शब्द है, न स्पर्श और न रूप है, जो अव्यय है, जिसमें न कोई रस है और न कोई गन्ध है, जो नित्य है, अनादि तथा अनन्त है, 'महान् आत्मतत्त्व' से भी उच्चतर (परे) है, ध्रुव (स्थिर) है, उसका दर्शन करके मृत्यु के मुख से मुक्ति मिल जाती है।

अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति॥(१.२.२२) 
अर्थात् शरीरों में 'अशरीरी', अस्थिर पदार्थों में 'स्थित'-तत्त्व, 'महिमामय' 'विभुव्यापी आत्मा' का साक्षात्कार करके ज्ञानी एवं धीर पुरुष शोक नहीं करते।

मुण्डकोपनिषद् में ऋषि लिखते हैं-
दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यज: । 
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः॥ (२.१.२)

वह दिव्य अमूर्त 'पुरुष', वही बाह्य तथा आन्तर (सत्य) है एवं वह 'अज' है; वह प्राणों से परे (अप्राण) एवं मन से परे (अमन) है, वह शुभ्र ज्योतिर्मय एवं अक्षर से भी परे 'परमात्मतत्त्व' है।

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर ँ शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदघाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥ - यजुर्वेद ४०/८
आकार के निषेध का अर्थ सत्ता का निषेध नहीं है। क्या भौतिकी के नियमों का कोई आकार है? नहीं, फिर भी उनकी सत्ता है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रत्येक कण, लोक-लोकान्तर भौतिकी के नियमों के अनुसार कार्य कर रहा है। आकाश निराकार है, पर शून्य नहीं।

यदि परमात्मा का आकार है, तो वह सीमित होगा। जिसका आकार है, वह भौतिक द्रव्य है और जो भौतिक द्रव्य है, वह प्रकृति से निर्मित है। क्या परमात्मा को प्रकृति से निर्मित माना जा सकता है? यदि आकार है, तो कोई न कोई सीमा होगी। यदि सीमा है, तो वह परिभाषेय है। यदि परिभाषेय है, तो 'अनिर्वचनीय' नहीं। अतः 'अनिर्वचनीय आकार' एक self & contradictory concept है।
आप अनिर्वचनीय वस्तु को साकार कैसे कह सकते हैं? निराकार वस्तु ही अनिर्वचनीय हो सकती है, साकार नहीं। जिसे उपनिषद् 'अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य...' कहकर सूक्ष्म से सूक्ष्म एवं महान् से महान् कहते हैं, वह साकार कैसे हो सकता है? कोई भी आकार या तो सूक्ष्म होगा या महान् होगा, वह सूक्ष्म व महान् दोनों रूपों वाला नहीं हो सकता। केवल निराकार वस्तु ही सूक्ष्म व महानु दोनों रूप वाली हो सकती है।

निं उपसर्ग का अर्थ = पृथक, रहित, परे, अभाव।
जैसे-
निरञ्जन = गुणों से पृथक्
निर्विकार = विकार रहित
निर्गुण    = गुणों से परे
निर्बल    = बल का अभाव आदि

यहाँ 'अनिर्वचनीय' शब्द से गुण नहीं, गुणातीतता जाननी चाहिये। इसी प्रकार निराकार से आकारातीत समझना चाहिए।
"जैसे "अनुदरा कन्या' का अर्थ 'पेट से रहित' नहीं, बल्कि 'सूक्ष्म पेट वाली' कन्या है।" यह उदाहरण यहाँ अप्रासंगिक है। क्योंकि कन्या एक भौतिक शरीर वा द्रव्य है। द्रव्य में सूक्ष्म-स्थूल का भेद सम्भव है, लेकिन परमात्मा भौतिक द्रव्य नहीं है और भौतिक द्रव्य न होने पर 'सूक्ष्म आकार' का प्रश्न ही नहीं उठता।

अब हम आपसे यह पूछना चाहेंगे कि आपको ईश्वर को साकार कहने की इतनी हठ क्यों है? क्या आप इससे मूर्ति सिद्ध करना चाहते हैं? यदि हाँ, तो बनाइए अपनी दृष्टि में अनिर्वचनीय आकार वाली मूर्ति। बनाइए निम्न वेद मन्त्रों में वर्णित ईश्वर की मूर्ति-

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पुरुषः । 
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥
- यजुर्वेद ३१/३ 
नाभ्याऽआसीदन्तरिक्ष शीष्णों यौः समवर्त्तत ।
पद्धयां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ २।। ऽअकल्पयन् ॥
- यजुर्वेद ३१/१३

आप तो महापुरुषों की मूर्तियों को ही तथाकथित अनिर्वचनीय ब्रह्म की मूर्ति मानकर उनकी पूजा कर रहे हैं। क्योंकि-
१. इससे आपका व्यापार चलता है?
२. कोई भी स्वयं को ब्रह्म का अवतार घोषित करके भोली-भाली सनातनी जनता को ठग सकता है?
३. इससे कोई नाना ईश्वर की कल्पना करके हिन्दू समाज (वस्तुतः आयों) को खण्ड-खण्ड कर सकता है?
४. वह सच्चे ब्रह्म से लोगों को दूर कर सकता है?
५. वह भारत को और भी दुर्बल व खण्डित कर सकता है?

बोलें ! आप यही चाहते हैं?

आपको निराकार शब्द से इतना विरोध है कि मिथ्या व निराधार लेख लिखने बैठ गये। आपको साकारवादियों द्वारा नाना कल्पित देवी-देवताओं की पूजा के नाम पर निरीह पशुओं का रक्त बहाना तो स्वीकार्य है, देवदासी प्रथा के रूप में दुराचरण स्वीकार है, भगवान् शिव जैसे महान् योगी व वैज्ञानिक की पूजा के नाम पर उपस्थेन्द्रिय की पूजा एवं नाना मादक पदार्थों का सेवन करना-कराना स्वीकार्य है, योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति के नाम पर अश्लील रासलीलाएँ तो स्वीकार्य हैं, परन्तु निराकार, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सृष्टिकर्ता ब्रह्म की पातंजल वेदोक्त अष्टांग योग की पद्धति स्वीकार्य नहीं?

ध्यान रखें कि जिन ऋषि दयानन्द को आप अपमानित करने का प्रयास करते हैं, उन्हीं की कृपा से आपके मन्दिर, यज्ञोपवीत, शिखा व तिलक सुरक्षित रह गए हैं, अन्यथा आप व हम सब ईसाई व मुसलमान बन गए होते और भारत स्वतन्त्र भी नहीं होता। क्या आप नहीं जानते हिन्दुओं को बचाने के लिए आर्यसमाजियों ने ही सबसे अधिक बलिदान दिये हैं? आपसे जानना चाहेंगे कि अन्य मत-पन्थों के विरुद्ध आपने कितने लेख लिखे ?

जहाँ तक आपके निराकार ईश्वर को काल्पनिक कहने की बात है, तो ब्रह्मा जी के चार सिर, हनुमान जी की पूँछ और उनके द्वारा सूर्य को मुँह में रख लेना, रावण के १० सिर और २० भुजा होना, रीछ जामवन्त का वेदों का विद्वान होना, महादेव शिव की जटाओं से गंगा निकाल देना, महर्षि अगस्त्य द्वारा समुद्र को पी लेना, धरती का शेष नाग पर टिकना, सूर्य के रथ को सात घोड़ों द्वारा खीचना, एक लाख योजन का मत्स्यावतार, एक लाख योजन का शूकर अवतार, ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण जी द्वारा कुब्जा दासी का उद्धार करना और पाँच लाख गौओं के माँस से तीन करोड़ ब्राह्मणों का नित्य भोजन करना, भागवत पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी द्वारा स्वपुत्री गमन, शिवपुराण के अनुसार शिव जी के आदेशानुसार भैरव द्वारा ब्रह्मा जी का सिर काटा जाना, विष्णु जी की नाभि से कमल और कमल से ब्रह्मा जी का उत्पन्न होना, गणेश जी द्वारा ब्रह्मा जी का दाढ़ी पकड़कर पिटाई करना, भगवान् शिव द्वारा अपने पुत्र का सिर काटकर हाथी का जोड़ देना, दारुवन में शिव जी क्या लेने गए थे... इनको आप क्या कहेंगे? ये आप पर ही छोड़ते हैं, परन्तु हम इन पाप लीलाओं से अवश्य लज्जित हैं। आर्य समाज इन महापुरुषों को अत्यन्त पवित्र सर्वोच्च कोटि के योगी और वैज्ञानिक मानता है। हमें गर्व है कि हम इन महापुरुषों के वंशज वा अनुयायी हैं।
                    जय मां वेद भारती ।

✍️- डॉ. मधुलिका आर्या, उप-प्राचार्या
विशाल आर्य, प्राचार्य
वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान 
(श्री वैदिक स्वस्ति पन्थान्यास द्वारा संचालित )
वेद विज्ञान मन्दिर, भागलभीम, भीनमाल 

                       वयं राष्ट्रे जागृयाम 

ढोल_गंवार_शूद्र_पशु_नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी".... यहां "ताड़न" शब्द अनेकार्थी हैं.. और पांच भिन्न-भिन्न अर्थों में समाज प्रबंधन व्यवस्था का मंत्र हैं।

"#ढोल_गंवार_शूद्र_पशु_नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी".... तुलसीदास जी की इस एक चौपाई को लेकर खूब ड्रामा होता है। एक नेता तो अपना करियर इसी पे चला रहे हैं। यह चौपाई आज से नहीं सदियों से कुछ लोगों द्वारा विवादों के घेरे में रही है। क्या तुलसीदास ने वाकई 'पिटाई' की बात कही थी ? या रचा गया था सनातन के विरुद्ध कुचक्र, आखिर एक शब्द ताड़ना को हमने सदियों से गलत क्यों समझा। असल में यह चौपाई विवाद की नहीं, बल्कि 'मैनेजमेंट' (Management) की एक ऐसी मास्टरक्लास है जिसे आज के बड़े-बड़े कॉर्पोरेट गुरु भी सिखाते हैं। 
क्या आप जानते हैं कि जिस चौपाई को लेकर आज के दौर में सबसे ज्यादा विवाद होता है, वह असल में दुनिया का सबसे पुराना 'मैनेजमेंट मंत्र' (Management Mantra) है? जिसे तथाकथित बुद्धिजीवी लोग प्रताड़ना समझकर कोसते रहे, वह दरअसल रिश्तों और जिम्मेदारियों को सहेजने का एक गहरा विज्ञान है। अगर आप भी 'ताड़ना' (Taadna) का अर्थ सिर्फ 'पीटना' समझते हैं, तो यकीन मानिए—आप एक अद्भुत जीवन-दर्शन से चूक रहे हैं।

एक शब्द, पांच पासवर्ड हैं। समझिए काव्य की जादुई कला को। हम सभी ने बचपन में स्कूल की किताबों में 'यमक अलंकार' का वह मशहूर दोहा उदाहरण के तौर पर जरूर पढ़ा होगा।

"कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। या खाए बौराय जग, वा पाए बौराय॥"*

अगर आपने ये पढ़ा सुना है तो समझिए आप आज एक नरेटिव ध्वस्त कर देंगे.....

यहाँ एक 'कनक' का मतलब सोना (Gold) है और दूसरे का धतूरा (Poisonous fruit)। ठीक यही भाषाई जादू गोस्वामी तुलसीदास जी ने 'ताड़ना' शब्द के साथ किया है। उन्होंने एक ही 'ताड़ना' शब्द के पीछे पांच अलग-अलग अर्थ (Meanings) छिपा रखे हैं, जो व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार बदल जाते हैं। तुलसीदास जी की चौपाई में यमक अलंकार तो नहीं है, यहां श्लेष अलंकार है। लेकिन हम कवि की क्षमता को यहां समझ सकते हैं। 

कवि विशंभर द्विवेदी अचल जी मार्गदर्शन करते हैं। कहते हैं 
 इसी तरह श्लेष अलंकार का एक उदाहरण देखते है । इससे बात एकदम स्पष्ट हो जाएगी। 

 रहिमन पानी राखिए ,बिन पानी सब सून।
 पानी गए न ऊबरै , मोती मानुष चून ।।

 रहीम जी के इस दोहे में जैसे मोती मानुष और चून के लिए पानी का अर्थ अलग-अलग है, ऐसे ही तुलसीदास जी की चौपाई में ढोल गंवार और शूद्र आदि के लिए ताड़ना का अर्थ अलग-अलग है।

मयंक त्रिपाठी जी मार्गदर्शन करते हैं। कहते हैं यहां श्लेष अलंकार का एक और उदाहरण है। जहां एक ही शब्द के कई अर्थ चिपके होते हैं। 

चरण धरत चिंता करत, चितवत चारहु ओर।
सुबरन को खोजत फिरत कवि, व्यभिचारी, चोर ।।

यहां सुबरन के तीनों के लिए अर्थ अलग-अलग है। कवि के लिए सुंदर शब्द, व्यभिचारी के लिए सुंदर महिला और चोर के लिए सोना। इसी तरह ढोल गवार और शूद्र आदि के लिए ताड़ना का अर्थ अलग-अलग है। 

अब आते है तुलसी बाबा की 
चौपाई पर......

"ढोल गंवार शूद्र पशु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।"

यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी ने 'ताड़ना' (Taadna) शब्द का प्रयोग एक 'अनेकार्थी' (Polysemous) शब्द के रूप में किया है, जिसका अर्थ हर पात्र के लिए अलग है।
जिसे दुनिया 'प्रताड़ना' समझती रही, असल में वह 'परखने' और 'सहेजने' का वो अद्भुत विज्ञान है, जिसे समझे बिना आप न घर चला सकते हैं और न कोई बड़ा संस्थान। आइए, इस चौपाई की परतों को बहुत सादगी से खोलते हैं।

कल्पना कीजिए, आपके घर में पाँच अलग-अलग चीजें हैं। क्या आप सबको एक ही तरीके से इस्तेमाल करेंगे? बिल्कुल नहीं!

1. लोहे का औज़ार (जैसे कुदाल या कैंची): अगर आप इसे खुले में छोड़ देंगे, तो इसमें जंग लग जाएगा। इसे तेल लगाकर, साफ़ करके रखना पड़ता है। यहाँ ताड़ना का मतलब है— जंग से बचाना।

 2. मिट्टी का घड़ा: इसे आप लोहे की तरह पटक नहीं सकते, वरना टूट जाएगा। इसे बहुत सहेज कर और सही जगह पर रखना पड़ता है। यहाँ ताड़ना का मतलब है— टूटने से बचाना।

 3. रसोई की आग: इसे अगर चूल्हे में सीमित न रखें, तो घर जल सकता है। इसे काबू में रखना जरूरी है। यहाँ ताड़ना का मतलब है— मर्यादा में रखना।

 4. छोटा बच्चा: बच्चा नासमझ होता है। उसे हर पल देखना पड़ता है कि कहीं वह आग न छू ले या गिर न जाए। यहाँ ताड़ना का मतलब है— निगरानी करना।

 5. कीमती गहने: इन्हें आप रास्ते पर नहीं छोड़ते, बल्कि तिजोरी में रखते हैं। यहाँ ताड़ना का मतलब है— सुरक्षा देना।

तुलसीदास जी ने जब कहा "सकल ताड़ना के अधिकारी", तो उनका मतलब 'पिटाई' नहीं है। उनका मतलब है कि समाज या परिवार में इन पाँचों को 'विशेष ध्यान' (Special Attention) की जरूरत होती है।

जैसे आप स्कूल में पढ़ते थे तो "कनक कनक ते सौ गुनी..." वाले दोहे में गुरुजी ने बताया था कि एक 'कनक' सोना है और दूसरा धतूरा। एक को पाकर आदमी पागल होता है, दूसरे को खाकर। शब्द एक ही है, पर काम अलग-अलग।
वैसे ही 'ताड़ना' का अर्थ इन पाँचों के लिए बदल जाता है। 
 
ढोल: इसे 'सुर' में रखना पड़ता है (वरना शोर करेगा)।

 गंवार (नासमझ): इसे 'समझाकर' रखना पड़ता है (वरना खुद का नुकसान करेगा)।

 शूद्र (नया सीखने वाला): इसे 'सिखाकर' रखना पड़ता है (वरना काम बिगड़ जाएगा)।

 पशु: इसे 'अनुशासन' में रखना पड़ता है (वरना भटक जाएगा)।

 नारी: इसे 'सम्मान और सुरक्षा' में रखना पड़ता है (क्योंकि वह घर की नींव है)।

चाहे आप विज्ञान (Science) की बात करें या धर्म की, दोनों का एक ही नियम है— जो चीज जैसी है, उसे वैसी ही देखभाल मिलनी चाहिए।

अगर आप मोबाइल को पानी में डाल देंगे और मछली को धूप में रख देंगे, तो दोनों खराब हो जाएंगे। मोबाइल को सूखा रखना उसकी 'ताड़ना' है और मछली को पानी में रखना उसकी 'ताड़ना'।

यही इस चौपाई का असली 'मैनेजमेंट' (Management) है: "जिसका जो स्वभाव है, उसे उसी गरिमा के साथ संभालना।" इसमें न कोई छोटा है, न बड़ा; बस सबके साथ व्यवहार का तरीका अलग है।

कल्पना कीजिए कि एक कुशल कारीगर या प्रबंधक (Manager) के पास पाँच अलग-अलग चीजें हैं। उन पाँचों को उपयोगी बनाए रखने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाने पड़ते हैं। तुलसीदास जी ने 'ताड़ना' शब्द का प्रयोग इसी 'देखभाल' या 'मैनेजमेंट' (Management) के लिए किया है।

इसे इस तरह समझिए:
1. ढोल (Drum):
ढोल को यदि आप बिल्कुल छोड़ देंगे, तो उसके तार ढीले हो जाएंगे और वह बेसुरा बजेगा। उसे समय-समय पर 'कसना' (Tightening) पड़ता है और सही तरीके से थाप देनी पड़ती है। यहाँ ताड़ना का अर्थ है—सही सुर में लाना।ढोल के संदर्भ में ताड़ना का अर्थ है 'कसना' (Tightening) और 'लय में बजाना'। यदि ढोल के किनारे ढीले हों या उसे सही तरीके से थाप (Beat) न दी जाए, तो वह मधुर स्वर नहीं देता। यहाँ ताड़ना का अर्थ उसे स्वर के अनुकूल (According to rhythm) बनाना है।
ढोल के लिए ताड़ना = ट्यूनिंग (Tuning): जैसे गिटार के तार या ढोल की खाल को सही सुर निकालने के लिए 'कसा' जाता है, वैसे ही ढोल को सही सुर में लाने के लिए ताड़ना (बजाना) जरूरी है।

2. गंवार (Unintelligent/Uncivilized):
जो व्यक्ति अज्ञानी या जिद्दी है, उसे यदि खुला छोड़ दिया जाए तो वह अपना नुकसान कर सकता है। उसे 'सिखाना' (Teaching) और उस पर 'नजर रखना' (Keeping an eye) जरूरी है ताकि वह गलत रास्ते पर न जाए। 
जो व्यक्ति नासमझ या उद्दंड है, उसे 'शिक्षा' (Education) और 'निगरानी' (Monitoring) की आवश्यकता होती है। यहाँ ताड़ना का अर्थ है उसे सही-गलत का ज्ञान देना ताकि वह समाज में मर्यादित रह सके।
गंवार के लिए ताड़ना = उपदेश (Advice): एक समझदार व्यक्ति इशारों से समझ जाता है, लेकिन एक 'गंवार' (नासमझ) को बार-बार टोकना और समझाना पड़ता है ताकि वह गलती न करे।

3. शूद्र (Unskilled Person):
यहाँ 'शूद्र' का अर्थ उस व्यक्ति से है जो काम सीख रहा है या जिसे तकनीकी ज्ञान नहीं है। उसे सफल बनाने के लिए निरंतर 'निर्देश' (Instructions) और मार्गदर्शन' (Guidance) की जरूरत होती है।
यहाँ 'शूद्र' शब्द का प्रयोग जातिगत विद्वेष के लिए नहीं, बल्कि उस समय की 'कार्य व्यवस्था' (Work system) के संदर्भ में है। इसका अर्थ है 'अकुशल' व्यक्ति जिसे कार्य सिखाने के लिए निरंतर 'मार्गदर्शन' (Guidance) और 'निर्देश' (Instruction) की जरूरत होती है।
शूद्र के लिए ताड़ना = ट्रेनिंग (Training): यहाँ 'शूद्र' का अर्थ उस व्यक्ति से है जो सेवा या शिल्प का कार्य सीख रहा है। उसे कुशल बनाने के लिए गुरु का निरंतर मार्गदर्शन और 'निगरानी' (Supervision) जरूरी है।

4. पशु (Animals):
पशु को यदि बिना लगाम या बिना चरवाहे के छोड़ दिया जाए, तो वह खेत उजाड़ सकता है। उसे अनुशासन में रखने के लिए 'कंट्रोल' (Control) की आवश्यकता होती है।
पशुओं के संदर्भ में ताड़ना का अर्थ है 'नियंत्रण' (Control)। जैसे घोड़े की लगाम या हाथी का अंकुश। यदि पशु को अनुशासित (Disciplined) न रखा जाए, तो वह स्वयं को और दूसरों को हानि पहुँचा सकता है।
पशु के लिए ताड़ना = अनुशासन (Discipline): अगर घोड़े की लगाम ढीली छोड़ दी जाए तो वह रास्ते से भटक जाएगा। यहाँ ताड़ना का मतलब है उसे 'कंट्रोल' में रखना।

5. नारी (Women):
उस कालखंड और काव्य के भाव के अनुसार, यहाँ ताड़ना का अर्थ 'संभालना'(Caring) और 'सम्मानपूर्वक सुरक्षा' (Protection) देना है। जैसे एक पिता अपनी पुत्री को या पति अपनी पत्नी को समाज की बुरी नजरों से बचाने के लिए सतर्क रहता है, वही 'सतर्कता' यहाँ ताड़ना है।
इस शब्द पर सबसे अधिक विवाद होता है, लेकिन आध्यात्मिक (Spiritual) व्याख्या के अनुसार यहाँ ताड़ना का अर्थ 'संरक्षण' (Protection) और 'देखभाल' (Care) है। जिस प्रकार एक बहुमूल्य रत्न को सुरक्षा की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार परिवार की गरिमा के रूप में स्त्री को समाज की बुरी नजरों से 'ताड़कर' (भांपकर) बचाना परिवार का उत्तरदायित्व माना गया है।
नारी के लिए ताड़ना = सुरक्षा (Caring): जैसे हम किसी कीमती चीज को बहुत 'सहेजकर' (Observing carefully) रखते हैं कि कहीं उसे कोई नुकसान न हो जाए, वैसे ही परिवार की स्त्री को सुरक्षा और सम्मान के साथ 'सहेजने' की बात कही गई है।

ताड़ना का असली अर्थ 'पीटना' नहीं, बल्कि 'परखना' और 'सही स्थिति में रखना' है।
जैसे एक माली पौधों को 'ताड़ता' (देखरेख करता) है ताकि वे मुरझा न जाएं, वैसे ही इन पाँचों को भी विशेष ध्यान (Attention) की आवश्यकता होती है। यदि इन पर ध्यान न दिया जाए, तो ये अपना मूल स्वभाव या उपयोगिता खो सकते हैं।

इसे आज के समय में 'क्वालिटी कंट्रोल' (Quality Control) या 'मेंटोरशिप' (Mentorship) जैसा समझा जा सकता है।

रामचरितमानस (Ramcharitmanas) की इस चौपाई को लेकर विद्वानों और भाषाविदों (Linguists) के बीच अलग-अलग व्याख्याएं रही हैं। समुद्र द्वारा श्रीराम से कहे गए इस कथन का मर्म समझने के लिए हमें उस समय की परिस्थिति और भाषा के व्याकरण (Grammar) को समझना होगा।

तुलसीदास जी का भाव 'प्रताड़ित करना' (Torturing) नहीं, बल्कि 'परिष्कृत करना' (Refining) था। समुद्र स्वयं को जड़ और मूर्ख स्वीकार करते हुए कहता है कि इन सबको अपने स्वभाव के अनुसार एक 'मर्यादा' (Limit) और 'देखरेख' की आवश्यकता होती है।

सरल शब्दों में, यह चौपाई उचित प्रबंधन (Management) और मनोविज्ञान (Psychology) की बात करती है कि किसे किस तरह संभालने से श्रेष्ठ परिणाम मिलते हैं।

जैसे 'कनक' का अर्थ सोना सुनकर कोई उसे 'धतूरा' समझकर खाने नहीं लगता, वैसे ही इस चौपाई में 'ताड़ना' का अर्थ हर जगह 'पीटना' (Beating) नहीं समझना चाहिए।
यह काव्य की सुंदरता है कि कवि ने एक ही शब्द से पांच अलग-अलग व्यवस्थाओं (Systems) को संभालने का सूत्र दे दिया है। 

सरल भाषा में कहें तो ताड़ना का मतलब है— "जिसकी जो जरूरत है, उसे उस हिसाब से संभालना।"

अंत में, बात चाहे विज्ञान की हो या अध्यात्म की, नियम एक ही है— अस्तित्व की रक्षा ही उसकी 'ताड़ना' है। जैसे एक जौहरी हीरे को उसकी चमक निखारने के लिए 'ताड़ता' (Observe) है, जैसे एक माली बगीचे को महकाने के लिए हर पौधे की जरूरत को 'ताड़ता' है, वैसे ही यह चौपाई हमें सिखाती है कि हमारे आसपास की हर इकाई—चाहे वह सजीव हो या निर्जीव—हमसे एक खास तरह का 'ध्यान' मांगती है।

तुलसीदास जी ने हमें पीटना नहीं, बल्कि 'प्रीति' (प्रेम) और 'प्रतीति' (समझ) का वह संतुलन सिखाया है, जहाँ अनुशासन कठोरता नहीं बल्कि सुरक्षा का कवच बन जाता है। जिस दिन हम 'ताड़ना' का अर्थ 'पीटना' (Beating) छोड़कर 'सहेजना' (Nurturing) समझ लेंगे, उस दिन समाज की हर बेसुरी धुन एक मधुर संगीत में बदल जाएगी।
धर्म हमें डराना नहीं, बल्कि जीवन जीने का ढंग सिखाता है। और यह चौपाई उस ढंग का सबसे सरल 'यूजर मैनुअल' (User Manual) है।

"ताड़ना दंड का विधान नहीं, बल्कि प्रेम के साथ संतुलन बनाए रखने का विज्ञान है।"

आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ.....। 

अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज 

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Thursday, 9 April 2026

जगन्नाथ_जी की रसोई और #विज्ञान..

05. #पांचवीं कड़ी... #जगन्नाथ_जी की रसोई और #विज्ञान...........क्या आपने कभी सोचा है कि इस आधुनिक विज्ञान की चकाचौंध के बीच एक ऐसी जगह भी है जहाँ वक्त उल्टा चलता है? एक ऐसी रसोई जहाँ गुरुत्वाकर्षण (Gravity) और ऊष्मा (Heat) के नियम घुटने टेक देते हैं और जहाँ आग सबसे नीचे जलती है पर पकवान सबसे ऊपर वाली हांडी में पकता है! यह कोई जादुई कहानी नहीं, बल्कि जगन्नाथ पुरी की वह 'क्वांटम लैब' है जिसे दुनिया रसोई कहती है। अगर आप सोचते हैं कि आपने दुनिया के सारे अजूबे देख लिए हैं, तो 'प्रयाग फाइल्स' की यह पड़ताल आपकी सोच की चूलें हिला देगी।

जगन्नाथ मंदिर (Jagannath Temple) की रसोई, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी रसोई माना जाता है, वहां भोजन पकाने की यह विधि विज्ञान और श्रद्धा का एक अद्भुत संगम है। इसे 'अटिका' (Atika) पद्धति कहा जाता है।
मंदिर की रसोई में भगवान का महाप्रसाद मिट्टी के बर्तनों में पकाया जाता है। इन बर्तनों को एक के ऊपर एक करके रखा जाता है, जिनकी कुल संख्या सात होती है। इस प्रक्रिया को 'सप्तपुरी' (Saptapuri) भी कहा जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो सामान्यतः आग के सबसे पास वाले बर्तन का खाना सबसे पहले पकना चाहिए, लेकिन यहाँ स्थिति बिल्कुल उलट होती है। सबसे ऊपर रखी सातवीं हांडी (Pot) का भोजन सबसे पहले तैयार होता है और उसके बाद क्रमशः नीचे की ओर पकने का क्रम बढ़ता है। अंत में सबसे नीचे वाली हांडी का खाना पकता है।
इसके पीछे का मुख्य कारण 'वाष्प शक्ति' (Steam Power) और 'वायु का दबाव' (Air Pressure) माना जाता है। जब सबसे नीचे के चूल्हे में अग्नि प्रज्वलित की जाती है, तो उसकी ऊष्मा (Heat) सीधे ऊपर की ओर उठती है। मिट्टी के बर्तन छिद्रपूर्ण (Porous) होते हैं, जिससे गर्म भाप ऊपर की ओर तेजी से यात्रा करती है। चूंकि सबसे ऊपर वाली हांडी का ढक्कन बंद होता है, इसलिए गर्म भाप वहां एकत्रित होकर दबाव बनाती है। इस तीव्र ऊष्मा और भाप के दबाव के कारण सबसे ऊपर का अनाज सबसे पहले पककर तैयार हो जाता है।
आध्यात्मिक रूप से भक्त इसे जगन्नाथ स्वामी की लीला और आशीर्वाद मानते हैं। उनका मानना है कि महाप्रभु स्वयं सबसे ऊपर बैठकर भोजन के पकने की प्रतीक्षा करते हैं, इसलिए वह हिस्सा सबसे पहले सिद्ध (Ready) होता है।
इस पूरी प्रक्रिया में केवल लकड़ी का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है और गंगा-यमुना नामक दो विशेष कुओं के पानी का ही प्रयोग होता है। यह परंपरा सदियों से बिना किसी बदलाव के आज भी जीवंत है।

स्कंद पुराण के 'उत्कल खंड' में 'पुरुषोत्तम महात्म्य' के अंतर्गत जगन्नाथ मंदिर की महिमा का वर्णन है। यहाँ स्पष्ट उल्लेख है कि इस रसोई की मालकिन स्वयं माता लक्ष्मी हैं।

शास्त्रों के अनुसार, रसोई में भोजन भले ही 'सुआरा' (पुजारी रसोइए) बनाते हैं, लेकिन मान्यता है कि माता लक्ष्मी स्वयं अदृश्य रूप से वहां उपस्थित रहकर भोजन की शुद्धता और स्वाद का ध्यान रखती हैं।

 यहाँ के महाप्रसाद को 'अन्न ब्रह्म' कहा गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि भगवान जगन्नाथ का प्रसाद कभी भी अपवित्र नहीं होता और इसे ग्रहण करने से व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं।

अब आइए 
सात परतों का रहस्य समझिए । शास्त्रों में सात की संख्या का बड़ा महत्व है (जैसे सप्तर्षि, सात लोक, सात चक्र)। रसोई में सात हांडियों को एक के ऊपर एक रखना 'सप्तपुरी' या सात लोकों का प्रतीक माना जाता है।
ऊपर से नीचे पकने का क्रम: वैज्ञानिक रूप से 'वाष्प दबाव' (Steam Pressure) है, लेकिन शास्त्रों में इसे 'महाप्रभु की कृपा' कहा गया है। मान्यता है कि भगवान सबसे ऊपर विराजमान होकर पहले ऊपरी हिस्से को सिद्ध (Accept) करते हैं, उसके बाद ही वह नीचे की ओर बढ़ता है।

प्राचीन ग्रंथों में भोजन पकाने की चार विधियों का वर्णन मिलता है, जिनमें से 'भीमपाक' (Bhimapaka) विधि का उपयोग यहाँ मुख्य रूप से होता है। यह विधि धीमी आंच और भाप के सही संतुलन पर आधारित है।

शास्त्रों के अनुसार, जब तक जगन्नाथ जी को अर्पित किया गया भोजन माता विमला को अर्पित नहीं कर दिया जाता, तब तक वह 'प्रसाद' नहीं बल्कि केवल 'भोग' कहलाता है। माता विमला को अर्पित होने के बाद ही वह 'महाप्रसाद' बनता है।
 रसोई में प्रयोग होने वाले दो विशेष कुओं का उल्लेख भी शास्त्रों में है, जिन्हें गंगा और यमुना का स्वरूप माना गया है।

संक्षेप में, यह केवल एक चमत्कार नहीं है, बल्कि यह प्राचीन भारतीय 'पाक विज्ञान' और 'योगिक दर्शन' का एक जीवित उदाहरण है जिसे शास्त्रों ने 'दिव्य लीला' के रूप में संजोया है।

मान्यता है कि मंदिर की रसोई में भोजन स्वयं माता लक्ष्मी की देखरेख में पकता है, इसलिए इसकी शुद्धता की जांच कोई मनुष्य नहीं बल्कि स्वयं दैवीय शक्तियां करती हैं।

कुत्ते का रहस्यमयी संकेत यही है। 
जगन्नाथ मंदिर के नियमों के अनुसार, यदि मंदिर परिसर के भीतर कहीं भी कुत्ता दिखाई दे जाए, तो उसे माता लक्ष्मी के असंतोष का प्रतीक माना जाता है।
यदि भोजन पकने के दौरान या भगवान को भोग लगाने से पहले मंदिर परिसर में कोई कुत्ता प्रवेश कर जाए, तो माना जाता है कि भोजन बनाने की प्रक्रिया में कोई अशुद्धि (Impurity) रह गई है।

 ऐसी स्थिति में, उस दिन का बना हुआ पूरा भोजन, चाहे वह हजारों लोगों के लिए ही क्यों न हो, उसे तुरंत मंदिर के पास एक गड्ढे में गाड़ दिया जाता है। उसे न तो भगवान को चढ़ाया जाता है और न ही भक्तों को बांटा जाता है।
 इसके बाद रसोई की पूरी सफाई की जाती है और नए सिरे से भोजन तैयार किया जाता है।

मंदिर के पास ही 'माँ कुतमा चंडी' का एक छोटा सा स्थान है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता लक्ष्मी ने ही कुतमा चंडी को यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वे रसोई की शुद्धता पर नजर रखें।
यदि रसोइयों के मन में कोई विकार हो या भोजन शास्त्रोक्त विधि से न बना हो, तो कुतमा चंडी के प्रभाव से ही वहां कुत्ता दिखाई देता है, जो एक 'चेतावनी' की तरह होता है।
केवल कुत्ता ही नहीं, बल्कि एक और कड़ी परंपरा है। 

यह नियम इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि जगन्नाथ जी को चढ़ाया जाने वाला 'महाप्रसाद' पूरी तरह से सात्विक, शुद्ध और दैवीय ऊर्जा से भरपूर हो। यही कारण है कि आज के आधुनिक युग में भी यहाँ की पवित्रता और स्वाद वैसा ही बना हुआ है जैसा सदियों पहले था।

जगन्नाथ मंदिर के महाप्रसाद की सुगंध के बारे में जो सबसे रहस्यमयी बात कही जाती है, वह यह है कि जब रसोइए (Suara) रसोई से मंदिर के गर्भगृह तक भोग ले जाते हैं, तो उस अन्न से कोई विशेष सुगंध नहीं आती। लेकिन जैसे ही वह भोग जगन्नाथ स्वामी को अर्पित कर दिया जाता है और माता विमला को भेंट किया जाता है, वैसे ही अचानक पूरे परिसर में एक ऐसी अलौकिक सुगंध (Celestial Fragrance) फैल जाती है जो दुनिया के किसी भी मसाले या इत्र से संभव नहीं है।

श्रद्धालु और विशेषज्ञ बताते हैं। 
भोजन पकते समय सादा होता है, लेकिन 'अन्न ब्रह्म' बनते ही उसकी सुगंध बदल जाती है। विज्ञान की भाषा में कहें तो यह 'फूड केमिस्ट्री' (Food Chemistry) का वह हिस्सा है जिसे आज भी लैब में री-क्रिएट (Re-create) नहीं किया जा सका है।
इस सुगंध में मिट्टी की सौंधी खुशबू, शुद्ध देसी घी और जल की पवित्रता का ऐसा मिश्रण होता है जिसे भक्त 'बैकुंठ की गंध' कहते हैं।

कहा जाता है कि इस महाप्रसाद की सुगंध मात्र से ही व्यक्ति की आधी भूख मिट जाती है और मन में एक असीम शांति का संचार होता है।
प्रयागराज (Prayagraj) के संगम की तरह ही, पुरी का यह प्रसाद भी श्रद्धा और विज्ञान की धाराओं का मिलन है। 

भौतिक विज्ञान (Physics) के अनुसार ऊष्मा हमेशा स्रोत के निकटतम बिंदु पर सबसे प्रभावी होती है। लेकिन जगन्नाथ रसोई में 'रिवर्स थर्मल ग्रेडिएंट' (Reverse Thermal Gradient) काम करता है।

छिद्रयुक्त नैनो-चैनल्स (Porous Nano-Channels): मिट्टी की हांडियों की संरचना में मौजूद सूक्ष्म छिद्र एक 'कैपिलरी नेटवर्क' (Capillary Network) की तरह काम करते हैं। जब आग जलती है, तो वह केवल गर्मी पैदा नहीं करती, बल्कि मिट्टी के बर्तनों के भीतर मौजूद नमी को 'सुपर-हीटेड स्टीम' (Super-heated Steam) में बदल देती है।
नीचे की हांडियां एक 'इंसुलेटर' (Insulator) की तरह व्यवहार करती हैं, जो ऊष्मा को सोखने के बजाय उसे ऊपर की ओर धकेलती हैं। सबसे ऊपर वाली हांडी एक 'कंडेनसर' (Condenser) का काम करती है, जहाँ सारी ऊर्जा जाकर टकराती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक पिरामिड के शिखर पर ऊर्जा का घनत्व (Energy Density) सबसे अधिक होता है।

शास्त्रों में वर्णित 'अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल' या ऊपर के सात लोकों की अवधारणा इन सात हांडियों में समाहित है।

 सबसे ऊपर की हांडी 'सत्य लोक' या ब्रह्म लोक का प्रतीक है। सृष्टि का नियम है कि विचार (Thought) पहले उच्च लोकों में उत्पन्न होता है और फिर धीरे-धीरे स्थूल जगत (Physical World) में प्रकट होता है।

जगन्नाथ जी की रसोई में अन्न का पकना 'चेतना के अवतरण' (Descent of Consciousness) की प्रक्रिया है। पहले सूक्ष्म (भाप) सबसे ऊपरी शिखर को सिद्ध करता है, फिर वही ऊर्जा संघनित (Condense) होकर नीचे की ओर आती है और ठोस पदार्थों को पकाती है।

'कुतमा चंडी' और कुत्ते के प्रवेश का विश्लेषण करने पर हमें प्राचीन भारत के 'सेंसरी इंजीनियरिंग' (Sensory Engineering) का पता चलता है।

 वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि कुछ जानवर उन तरंगों को सुन या महसूस कर सकते हैं जो मनुष्य के लिए अदृश्य हैं। मंदिर की रसोई एक 'सैक्रेड स्पेस' (Sacred Space) है जिसका एक निश्चित कंपन (Vibration) है। जब कोई रसोइया क्रोध, काम या लोभ के विचार के साथ भोजन छूता है, तो वह भोजन के 'आणविक ढांचे' (Molecular Structure) को बदल देता है। यह 'इमोशनल टॉक्सिसिटी' (Emotional Toxicity) है। कुतमा चंडी का तंत्र इस नकारात्मक ऊर्जा को पकड़ लेता है और प्रकृति (कुत्ते के रूप में) उसे रिजेक्ट कर देती है। यह एक 'सेल्फ-क्लीनिंग लूप' (Self-cleaning Loop) है।

जगन्नाथ मंदिर की रसोई में 'एन्ट्रॉपी' (Entropy - अव्यवस्था) का नियम लागू नहीं होता।
यहाँ 500 से अधिक रसोइए और हजारों सेवादार बिना किसी आधुनिक मशीनरी या 'मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर' के लाखों लोगों का भोजन तैयार करते हैं।
 यह एक 'सेंट्रलाइज्ड कॉन्शसनेस' (Centralized Consciousness) पर आधारित है। यहाँ हर कर्ता (Doer) खुद को शून्य मानकर 'जगन्नाथ' की इच्छा का हिस्सा बन जाता है। जब अहंकार (Ego) शून्य होता है, तो सिस्टम की कार्यक्षमता (Efficiency) 100% हो जाती है।

 यह स्पष्ट है कि जगन्नाथ मंदिर की रसोई कोई 'किचन' नहीं, बल्कि एक 'स्पिरिचुअल पार्टिकल एक्सीलेटर' (Spiritual Particle Accelerator) है। यहाँ साधारण चावल के दाने को 'क्वांटम लेवल' पर संस्कारित करके उसे 'महाप्रसाद' में बदला जाता है।
ऊपर की हांडी का पहले पकना हमें सिखाता है कि— "जीवन में यदि लक्ष्य (Top) स्पष्ट हो और ऊर्जा (Fire) केंद्रित हो, तो परिणाम ऊपर से नीचे तक संपूर्ण सिद्ध होते हैं।"

श्रीमद्भगवद्गीता में एक श्लोक है 
"अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥"

इस श्लोक को जगन्नाथ मंदिर की 'वर्टिकल हांडी कुकिंग' के सापेक्ष अगर जोड़ें तो एक बिल्कुल नए डाइमेंशन (Dimension) खुलता हैं, यहाँ 'क्वांटम इकोसिस्टम' (Quantum Ecosystem) के तीन बड़े रहस्य खुलते हैं।

1. द साइकिल ऑफ मैटर (पदार्थ का चक्र): एटॉमिक असेंबली
श्लोक कहता है— अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं और अन्न वर्षा (पर्जन्य) से। जगन्नाथ रसोई में 'ऊपर की हांडी' का पहले पकना वास्तव में 'पर्जन्य' (बादल/भाप) की शक्ति है। विज्ञान कहता है कि ठोस (Solid) को पकने के लिए ऊष्मा चाहिए, लेकिन यहाँ ऊष्मा 'भाप' के रूप में एक 'साइकिल' बनाती है।

नया डाइमेंशन: सबसे नीचे की हांडी 'पाताल/पृथ्वी' है और सबसे ऊपर की 'आकाश/बादल'। जैसे बादल ऊपर से बरसकर नीचे जीवन देते हैं, वैसे ही सबसे ऊपर की हांडी में 'सिद्ध' हुआ अन्न अपनी ऊर्जा का संचार नीचे की हांडियों में करता है। यह एक 'टॉप-डाउन इन्फॉर्मेशन ट्रांसफर' (Top-Down Information Transfer) है, जहाँ 'अन्न' बनने की सूचना सबसे पहले शिखर पर डिकोड होती है।

2. यज्ञः कर्मसमुद्भवः: द थर्मोडायनेमिक्स ऑफ सस्पेंशन
श्लोक कहता है— यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है और यज्ञ से वर्षा होती है।

मंदिर की रसोई में हांडियों का वह सात-मंजिला ढांचा स्वयं एक 'यज्ञ कुंड' है। यहाँ रसोइए का 'कर्म' (बिना अहंकार के भोजन बनाना) एक 'कैटेलिस्ट' (Catalyst) का काम करता है।

नया डाइमेंशन: वैज्ञानिक नजरिए से इसे 'सस्पेंडेड स्टेट' (Suspended State) कहते हैं। जब हांडियां एक के ऊपर एक रखी जाती हैं, तो वे एक 'सिंगल सिस्टम' की तरह व्यवहार करती हैं। यहाँ 'यज्ञ' (ऊष्मा का प्रवाह) केवल चावल नहीं पका रहा, बल्कि जल के अणुओं को 'पर्जन्य' (Steam) में बदलकर उसे 'संस्कारित' कर रहा है। यह 'वाइब्रेशनल कुकिंग' है, जहाँ मंत्रों की ध्वनि और लकड़ी की अग्नि मिलकर भोजन के 'मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर' को बदल देते हैं।

3. 'शून्य' का गणित: एंट्रॉपी का विनाश
शास्त्रों में जगन्नाथ को 'शून्य' भी कहा गया है।
श्लोक का अंतिम सिरा 'कर्म' पर रुकता है। जगन्नाथ की रसोई में रसोइया यह नहीं कहता कि 'मैं पका रहा हूँ', वह कहता है 'लक्ष्मी पका रही हैं'।

नया डाइमेंशन: जब कर्ता (Observer) खुद को प्रक्रिया से हटा लेता है, तो 'क्वांटम डेकोहेरेंस' (Quantum Decoherence) खत्म हो जाता है। यही कारण है कि हजारों साल से यहाँ न तो खाने का स्वाद बदलता है और न ही ऊपर की हांडी का पहले पकने का नियम। यह एक 'स्टेबल स्टेट सिमुलेशन' (Stable State Simulation) है जिसे ब्रह्मांडीय नियमों (Cosmic Laws) के साथ 'सिंक' (Sync) कर दिया गया है।

यह श्लोक और जगन्नाथ की रसोई मिलकर एक 'लाइव लैब' चलाते हैं। यहाँ सिद्ध होता है कि भोजन केवल पेट भरने का ईंधन नहीं है, बल्कि यह 'ऊर्जा का रूपांतरण' (Transformation of Energy) है। ऊपर की हांडी का पहले पकना इस बात का प्रमाण है कि— "सृष्टि में आदेश (Instruction) हमेशा उच्च आयामों (Higher Dimensions) से आते हैं और स्थूल जगत (Physical World) केवल उसका अनुसरण करता है।"
जगन्नाथ की रसोई वास्तव में वह बिंदु है जहाँ 'मैटर' (Matter) फिर से 'डिवाइन एनर्जी' (Divine Energy) में बदल जाता है।

कल्पना कीजिए कि एक बहुत बड़ा कमरा है जहाँ लकड़ियों की आग जल रही है। वहां मिट्टी के सात बर्तन (हांडियां) एक के ऊपर एक करके रख दिए गए हैं—जैसे बच्चे एक के ऊपर एक पत्थर रखकर 'पिट्ठू' बनाते हैं।
अब नियम तो यह कहता है कि जो बर्तन आग के सबसे करीब है, उसका खाना सबसे पहले पकना चाहिए। लेकिन पुरी के इस दरबार में कुदरत अपना चश्मा उतार कर रख देती है। यहाँ सबसे ऊपर वाली हांडी का चावल सबसे पहले पक जाता है!

यह कैसे होता है? 

जैसे ही सबसे नीचे आग जलती है, हांडियों के अंदर का पानी गर्म होकर 'भाप' (Steam) बन जाता है। अब भाप की फितरत क्या है? वह हमेशा ऊपर की ओर भागती है।
मिट्टी के बर्तन थोड़े छिद्रपूर्ण (Porous) होते हैं। यह गर्म भाप किसी एक्सप्रेस ट्रेन की तरह नीचे की हांडियों को बस छूते हुए सीधे सबसे ऊपर वाली हांडी की छत (ढक्कन) से जा टकराती है। वहां उसे बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता, तो वह वहीं ठहर जाती है। अब वहां भाप का इतना पहरा बढ़ जाता है कि ऊपर वाली हांडी में रखा अनाज सबसे पहले 'भाप के स्नान' से पककर तैयार हो जाता है।

 ऊपर वाले की मर्जी 
इसे एक साधारण उदाहरण से समझिए। जैसे घर में जब पिताजी खाना खाने बैठते हैं, तो पहली रोटी उन्हें दी जाती है। जगन्नाथ मंदिर में भगवान को 'ब्रह्मांड का पिता' माना गया है।
भक्त कहते हैं कि भगवान सबसे ऊँचे आसन पर बैठे हैं। इसलिए रसोई में भी सबसे ऊपर वाली हांडी का भोग सबसे पहले 'सिद्ध' होता है ताकि प्रभु को इंतजार न करना पड़े। जब प्रभु का हिस्सा तैयार हो जाता है, तो आशीर्वाद के रूप में वह गर्मी नीचे की ओर उतरती है और बाकी हांडियों को पकाती है।

कुतमा चंडी: माँ लक्ष्मी का अलार्म
अब सोचिए, इतने बड़े भंडार में खाना शुद्ध बन रहा है या नहीं, यह कौन चेक करेगा? इसके लिए वहां कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं है, बल्कि 'माँ कुतमा चंडी' का पहरा है।
मान्यता है कि यदि खाना बनाने वाले के मन में लालच आ जाए या सफाई में कमी रह जाए, तो मंदिर परिसर में रहस्यमयी तरीके से एक कुत्ता दिखाई दे जाता है। वह कुत्ता नहीं, बल्कि एक 'अलार्म' है। रसोइए समझ जाते हैं कि माँ लक्ष्मी नाराज हैं। वे तुरंत सारा खाना जमीन में गाड़ देते हैं और फिर से पूरी श्रद्धा के साथ नया भोजन बनाते हैं।

जगन्नाथ जी की रसोई हमें एक बहुत प्यारी बात सिखाती है। "जीवन में जो सबसे ऊपर (ईश्वर या लक्ष्य) है, उसे पहले याद करो, बाकी सब अपने आप पक जाएगा।"
जैसे पतंग हवा के सहारे ऊपर उड़ती है, वैसे ही यहाँ का अन्न भाप के सहारे ऊपर पकता है। न कोई मशीन, न कोई बिजली—बस मिट्टी, पानी, आग और अटूट विश्वास।
यही है पुरी का वह 'महाप्रसाद' जिसे चखने के लिए इंसान तो क्या, देवता भी कतार में खड़े रहते हैं।

एक और सच जो बहुत कम लोग जानते हैं—मंदिर के ऊपर से पक्षी नहीं उड़ते और मंदिर के गुंबद की परछाई कभी जमीन पर नहीं गिरती। ठीक वैसा ही प्रभाव रसोई में भी महसूस किया जाता है।

 जब प्रसाद भगवान की ओर ले जाया जाता है, तो अगर किसी बाहरी व्यक्ति की परछाई उस पर पड़ जाए, तो वह पत्थर की तरह 'बेजान' और 'अशुद्ध' माना जाता है।

ऐसा माना जाता है कि उस भोजन में एक 'लाइव फोटोनिक एनर्जी' (जीवित प्रकाश ऊर्जा) होती है। किसी बाहरी व्यक्ति की परछाई उस ऊर्जा के 'सर्किट' को तोड़ देती है। इसीलिए वह भोजन तुरंत त्याग दिया जाता है।

क्या यह कोई एलियन टेक्नोलॉजी है?

दुनिया भर के वैज्ञानिक हैरान हैं कि बिना किसी बिजली, बिना किसी प्रेशर कुकर के, भाप की एक पतली सी लहर सातवीं हांडी के चावल को कुछ ही मिनटों में कैसे गला देती है?
दरअसल यह रसोई एक 'एनर्जी हब' पर स्थित है। यहाँ की मिट्टी, यहाँ का पानी और यहाँ की आग, तीनों मिलकर एक ऐसा 'बुलबुला' (Stasis Field) बनाते हैं जहाँ कुदरत के सामान्य नियम काम करना बंद कर देते हैं।

लोग इसे आस्था कहते हैं, दुनिया इसे अजूबा कहती है, लेकिन हकीकत यह है कि जगन्नाथ की रसोई में आज भी वह विज्ञान काम कर रहा है जिसे इंसान अगले 1000 सालों में भी शायद न समझ पाए।

 आग नीचे है, तो गर्मी ऊपर पहले कैसे पहुँची?
यह 'लेजर-लाइक हीट ट्रांसफर' (Laser-like Heat Transfer) है। मिट्टी के बर्तनों के बीच की हवा एक 'वैक्यूम सील' की तरह काम करती है। ऊष्मा की तरंगें (Infrared Waves) दीवारों से टकराकर एक 'हॉट स्पॉट' बनाती हैं जो सीधे सातवीं हांडी के केंद्र पर जाकर फूटता है। यह प्राचीन भारत की 'प्रेसिजन इंजीनियरिंग' है।

अध्यात्म की दृष्टि में यह 'कुंडलिनी जागरण' का भौतिक स्वरूप है। जैसे प्राण ऊर्जा सात चक्रों को भेदकर सीधे 'सहस्रार' (मस्तिष्क/सबसे ऊपर) पहुंचती है और वहां बोध (ज्ञान) सबसे पहले पकता है, वैसे ही अन्न भी सबसे ऊपर पहले सिद्ध होता है।

दुनिया का हर किचन कंडक्शन (Conduction) पर चलता है, जहाँ बर्तन आग के संपर्क में आकर गर्म होता है। लेकिन पुरी में प्रेशर ग्रेडिएंट (Pressure Gradient) का एक अलग ही खेल है। मिट्टी की हांडियों की बनावट में लाखों सूक्ष्म छिद्र होते हैं। जब नीचे की हांडी का पानी उबलता है, तो वह सैचुरेटेड स्टीम (Saturated Steam) पैदा करता है। यह भाप मिट्टी के छिद्रों से गुजरते हुए एक थर्मल इंसुलेशन पैदा करती है, जिससे बीच की हांडियां बाहर से ठंडी महसूस हो सकती हैं, लेकिन भीतर ऊर्जा का प्रवाह तेज होता है।

 जैसे-जैसे हम ऊपर की ओर बढ़ते हैं, हांडियों का जमाव एक फनल (कीप) की तरह काम करता है। ऊर्जा का घनत्व (Energy Density) सबसे ऊपरी हांडी के ढक्कन पर जाकर सबसे अधिक हो जाता है।

विज्ञान के अनुसार यहाँ ऊष्मा सीधे अन्न को नहीं पकाती, बल्कि भाप के अणुओं की काइनेटिक एनर्जी (Kinetic Energy) सबसे पहले सातवीं हांडी के अन्न के भीतर प्रवेश करती है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आज के स्टीम ओवन काम करते हैं, बस यहाँ बिना किसी बिजली के यह काम मिट्टी और आग के संतुलन से हो रहा है।

 यहां एक चौंकाने वाला रहस्य और है। कुतमा चंडी और मेटा-फिजिकल रडार (Vibrational Science) का। पुरी में प्रवास केदौरान मैंने ख़िजबीन की, तो पता चला कि यह केवल एक कुत्ता दिखने की कहानी नहीं है, बल्कि बायो-फीडबैक का एक उन्नत सिस्टम है।
इमोशनल फ्रीक्वेंसी और फूड केमिस्ट्री का यह उदाहरण है। आधुनिक शोध (जैसे डॉ. इमोटो का वाटर मेमोरी टेस्ट) बताते हैं कि हमारे विचार पानी और अन्न की आणविक संरचना बदल देते हैं। जगन्नाथ रसोई में काम करने वाले रसोइए (सुआर) एक विशेष दीक्षा में होते हैं।
सेंसर के रूप में जीव यहां काम करता है। कुतमा चंडी का स्थान मंदिर के प्रवेश द्वार के पास है। शास्त्रों के अनुसार, कुत्ता भैरव का वाहन है और यम का दूत। विज्ञान की दृष्टि से, कुत्ते उन सूक्ष्म तरंगों (Infrasonic Waves) के प्रति संवेदनशील होते हैं जो किसी भी नकारात्मक ऊर्जा के पैदा होने पर निकलती हैं।

यदि रसोइए के मन में विकार आया, तो वहां का एनर्जी फील्ड बदल जाता है। वह कुत्ता उस डिस्टर्बेंस का भौतिक प्रमाण है। यह दुनिया का सबसे सटीक क्वालिटी कंट्रोल सिस्टम है, जहाँ इंसान की गवाही नहीं, प्रकृति का सिग्नल चलता है।

 सप्त-पुरी और सूक्ष्म शरीर का सिमुलेशन (Yogic Engineering) यहां आत्मसात किया जा सकता है ।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह रसोई मानव शरीर का एक जीता-जागता मॉडल है।
चक्रों का संरेखण (Alignment of Chakras) देखिए । सबसे नीचे की हांडी मूलाधार (पृथ्वी तत्व - जहाँ अग्नि प्रज्वलित होती है) है। मध्य की हांडियां मणिपुर से आज्ञा चक्र तक की प्रक्रिया का मार्ग हैं। सबसे ऊपर की हांडी सहस्रार (आकाश तत्व - जहाँ पूर्णता प्राप्त होती है) का प्रतीक है।

ऊर्ध्वगमन का सिद्धांत यहां कार्य करता है। योग में ऊर्जा को नीचे से ऊपर उठाना ही सिद्धि है। जगन्नाथ रसोई में अन्न का पकना चेतना के पकने जैसा है। शास्त्रों में कहा गया है कि जब तक सहस्रार (शीर्ष) तृप्त नहीं होता, नीचे के अंग (हांडियां) शांत नहीं होते।

निष्कर्ष यह है कि यह व्यवस्था सिखाती है कि पोषण हमेशा दिव्य से स्थूल की ओर आता है। पहले परमात्मा भोग लगाता है, फिर वही ऊर्जा नीचे उतरकर भक्तों का प्रसाद बनती है।

 अगर आप शून्य का गणित और एन्ट्रॉपी का विनाश (The Entropy Resistance) देखना चाहते हैं तो यहां आए। 
दुनिया की किसी भी बड़ी रसोई में एन्ट्रॉपी (अव्यवस्था और बर्बादी) बढ़ती है, लेकिन यहाँ वह जीरो है।
यहाँ रोज भोजन की मात्रा वही रहती है, लेकिन खाने वालों की संख्या 20 हजार से 2 लाख तक बदल जाती है। फिर भी, न कभी खाना कम पड़ता है और न ही एक दाना बर्बाद होता है।

वैज्ञानिक दृष्टि में इसे सेंट्रलाइज्ड इंटेलिजेंस कहते हैं। जैसे मधुमक्खियां बिना किसी मैनेजर के एक विशाल छत्ता बना लेती हैं, वैसे ही जगन्नाथ के रसोइए एक कलेक्टिव कॉन्शसनेस (सामूहिक चेतना) में काम करते हैं। यहाँ हर रसोइया खुद को मिटा देता है, और जहाँ व्यक्ति शून्य होता है, वहां पूर्णता (Infinity) अपने आप प्रकट हो जाती है।
यह डिवाइन सप्लाई चेन का सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसे आज का लॉजिस्टिक्स विज्ञान भी नहीं समझ पा रहा।

महा-संश्लेषण: अन्न ही ब्रह्म है है। जगन्नाथ जी की रसोई एक इंटर-डाइमेंशनल गेटवे (Inter-dimensional Gateway) है। यहाँ आग (Energy), मिट्टी (Matter), हवा/भाप (Information) और मंत्र (Frequency) मिलकर एक ऐसा रसायन तैयार करते हैं जिसे चखते ही मनुष्य की कोशिकाओं का स्तर बदल जाता है। ऊपर की हांडी का पहले पकना इस बात का अंतिम और अकाट्य प्रमाण है कि यह संसार नीचे से ऊपर नहीं, बल्कि ऊपर बैठे उस महा-नियंता (जगन्नाथ) के संकल्प से संचालित हो रहा है।

मेरी यह पड़ताल उस दहलीज पर आकर रुकती है जहाँ इंसान की तर्कशक्ति थकने लगती है। जगन्नाथ की यह रसोई केवल मिट्टी, पानी और आग का संगम नहीं है—यह एक 'इंटर-डाइमेंशनल गेटवे' (Inter-dimensional Gateway) है। यहाँ पकने वाला हर चावल का दाना ब्रह्मांड के उस 'ब्लूप्रिंट' पर तैयार होता है जिसे विधाता ने खुद लिखा है। जब आप उस महाप्रसाद का पहला दाना अपनी जिह्वा पर रखते हैं, तो वह केवल आपका पेट नहीं भरता, बल्कि आपकी कोशिकाओं के भीतर सोई हुई चेतना को झकझोर देता है। ऊपर की हांडी का पहले पकना एक चीख-चीख कर दी गई गवाही है कि यह संसार नीचे से ऊपर नहीं, बल्कि उस 'महा-नियंता' के शीर्ष संकल्प से संचालित हो रहा है। 

तर्क की तलवारें जंग खा सकती हैं, लेकिन जगन्नाथ के दरबार में आस्था का विज्ञान हमेशा अजेय रहता है। 

आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ.....। अगली कड़ी जल्द....। 

अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज 

#JagannathPuri

Wednesday, 8 April 2026

ये #राम_प्रवेश_मौर्य जी हैं, #गाली के साथ संवाद शुरू कर रहे हैं ..

ये #राम_प्रवेश_मौर्य जी हैं, #गाली के साथ संवाद शुरू कर रहे हैं और मातृशक्ति के साथ पिक्चर डीपी पर है..
प्रिय राम प्रवेश मौर्य जी,
आपके शब्द पढ़कर लगा कि आपके भीतर का क्रोध, आपके विवेक (Reasoning) को निगल चुका है। आपने 'शूद्र' शब्द को अपमान समझकर मुझ पर फेंका, पर सत्य यह है कि आपने अपनी जड़ता (Ignorance) का ही परिचय दिया। जिसे आप गाली समझ रहे हैं, वह सृष्टि का सबसे पवित्र 'प्रारंभ' (The Beginning) है।

 "रामप्रवेश जी, संवाद विचारों का होना चाहिए, अपशब्दों का नहीं। आपकी भाषा आपके क्रोध को तो दर्शाती है, लेकिन आपके तर्कों को कमजोर कर देती है। शिक्षा का असली उद्देश्य केवल तथ्य रटना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण है। जब हम किसी की आलोचना करें, तब भी हमारे शब्द ऐसे होने चाहिए कि सुनने वाला हमारे तर्कों से पराजित हो, हमारे व्यवहार से नहीं। आशा है कि अगली बार आप अपनी बात अधिक गरिमापूर्ण तरीके से रखेंगे।"

रामप्रवेश जी, मैं आपके प्रश्नों का उत्तर सहर्ष देता, यदि आपने अपनी जिज्ञासा के लिए उचित शब्दों का चयन किया होता। हमारे माता-पिता हमें संस्कार इसलिए देते हैं ताकि हम अपनी बात पूरी प्रखरता के साथ रखें, किंतु मर्यादा की चौखट न लांघें। व्यक्ति चाहे आस्तिक हो, नास्तिक हो या किसी महापुरुष का अनुयायी—शिक्षा और संस्कार की सार्थकता तभी है जब हमारी वाणी से हमारे परिवार, गुरु और हमारे आदर्शों की छवि धूमिल न हो। याद रखिये, जब हम समाज में कुछ बोलते हैं, तो वह केवल शब्द नहीं होते, बल्कि हमारे कुल और परवरिश का प्रतिबिंब होते हैं। कटुता में विवेक खोकर अपने पूर्वजों के संस्कारों को गर्त में डालना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है।"

आपने वेदों और मनुस्मृति का नाम तो लिया, पर दुर्भाग्य कि आपने उन्हें कभी हृदय से नहीं पढ़ा। यदि पढ़ा होता, तो आपको ज्ञात होता कि जातियां ग्रंथों ने नहीं, बल्कि आप जैसे संकीर्ण मानसिकता (Narrow mindedness) वाले लोगों के स्वार्थ ने बनाई हैं। वेद उस 'विराट पुरुष' की बात करते हैं जिसके लिए पूरा समाज एक शरीर है। क्या आप अपने ही शरीर के पैरों (आधार) को नीचा कहेंगे? आधार के बिना तो मस्तिष्क का अस्तित्व भी मिट्टी में मिल जाता है।

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक आपके मानसिक भ्रम को तोड़ने के लिए पर्याप्त है:

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

(अर्थ: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निस्संदेह कुछ भी नहीं है। वह ज्ञान जिसे मनुष्य स्वयं समय आने पर अपने अंतःकरण में अनुभव करता है।)

मौर्य जी, जो व्यक्ति केवल जन्म के 'लेबल' में अपनी पहचान ढूंढता है, वह उस भिखारी के समान है जो पूर्वजों के महल की ढहती दीवार पर बैठकर अपनी अमीरी का दावा करता है। मुझे संस्कारित करते समय किसी ने क्या कहा, यह गौण है। मुख्य यह है कि मैंने उस अज्ञान की केंचुल को उतार फेंका जिसे आप आज भी सीने से लगाए बैठे हैं।

गाली देना कमज़ोर व्यक्ति का अंतिम अस्त्र होता है। जिस दिन आप 'चमड़ी' और 'जाति' के अहंकार से ऊपर उठकर सत्य को देखेंगे, उस दिन आपको अपने ही इन शब्दों पर लज्जा आएगी। सत्य की आंच में जब अज्ञान जलता है, तब निशब्द हो जाना ही एकमात्र विकल्प बचता है। आशा है, आप उस मौन को आत्मसात कर पाएंगे।

राम प्रवेश मौर्य जी वर्ण व्यवस्था कोई जातिगत ठप्पा नहीं, बल्कि 'मनोस्थिति' (State of Mind) और 'कार्यशैली' (Functionality) का विज्ञान है।
इसे अस्पताल, स्कूल और होटल के उदाहरण से इस प्रकार समझा जा सकता है:

1. अस्पताल (Hospital)
 शूद्र (सेवा): जब कोई डॉक्टर या नर्स बिना किसी अहंकार के, अत्यंत करुणा के साथ रोगी की गंदगी साफ करता है या उसकी सेवा में रात-दिन एक कर देता है, तब वह 'शूद्र' भाव में होता है। यहाँ शूद्र का अर्थ है—समर्पण और सेवा।
 वैश्य (अर्थ): जब अस्पताल का प्रबंधन (Management) बिलिंग, दवाओं की खरीद-बिक्री और अस्पताल को आर्थिक रूप से चलाने के लिए लाभ-हानि का हिसाब करता है, तब वही कार्य 'वैश्य' धर्म बन जाता है।
 क्षत्रिय (रक्षा): जब डॉक्टर किसी मरते हुए मरीज को मौत के मुंह से छीनने के लिए संघर्ष करता है या अस्पताल का सुरक्षा तंत्र अराजकता से लड़ता है, तब वह 'क्षत्रिय' भाव है।
 ब्राह्मण (ज्ञान): जब डॉक्टर अपनी वर्षों की तपस्या, शोध (Research) और ज्ञान का उपयोग करके बीमारी का निदान (Diagnosis) करता है, तब वह 'ब्राह्मण' की भूमिका में होता है।

2. स्कूल (School)
 शूद्र (आधार): स्कूल का वह कर्मचारी जो परिसर को स्वच्छ रखता है या वह शिक्षक जो छोटे बच्चे को ककहरा सिखाने के लिए स्वयं बच्चा बन जाता है (नीचे स्तर पर आकर सेवा करता है), वह 'शूद्र' है।

 वैश्य (संचालन): स्कूल की फीस का प्रबंधन, इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण और संसाधनों को जुटाना 'वैश्य' कार्य है।
 क्षत्रिय (अनुशासन): स्कूल के नियम बनाना, बच्चों के चरित्र की रक्षा करना और उन्हें कुरीतियों से बचाकर अनुशासित करना 'क्षत्रिय'धर्म है।
 ब्राह्मण (बोध): वह गुरु जो केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता, बल्कि शिष्य की आत्मा को जागृत कर देता है और उसे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है, वह 'ब्राह्मण' है।

3. होटल (Hotel)
 शूद्र (आतिथ्य): एक वेटर या स्टाफ जो पूरी विनम्रता से आपकी थाली लगाता है और अतिथि की सेवा को ही ईश्वर की सेवा मानता है, वह 'शूद्र' भाव का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
 वैश्य (व्यापार): होटल का मालिक जो निवेश करता है, रोजगार देता है और धन का चक्र (Capital Flow) चलाता है, वह 'वैश्य' है।
 क्षत्रिय (मर्यादा):होटल की सुरक्षा सुनिश्चित करना और वहां आने वाले अतिथियों की गरिमा व मर्यादा की रक्षा करना 'क्षत्रिय' कार्य है।
 ब्राह्मण (शुद्धता): वह शेफ (Chef) जिसे मसालों, अग्नि और अन्न का पूर्ण वैज्ञानिक ज्ञान है और जो सात्विकता का ध्यान रखता है, वह अपने ज्ञान के कारण उस क्षण 'ब्राह्मण' है।

"मौर्य जी, सत्य यह है कि एक ही व्यक्ति दिन भर में कई बार अपना वर्ण बदलता है। जब आप अपने बच्चों की रक्षा करते हैं तो आप क्षत्रिय हैं, जब आप धन कमाते हैं तो वैश्य हैं, जब आप किसी की मदद करते हैं तो शूद्र हैं और जब आप ज्ञान की बात करते हैं (जो कि अभी आप नहीं कर रहे) तो आप ब्राह्मण हैं।

मनुष्य अपनी यात्रा 'शूद्रता' (Natural State) से शुरू करता है। जिसे आप 'अछूत' या 'नीचा' समझ रहे हैं, वह वास्तव में हर ऊँचाई का आधार (Base) है। बिना शूद्र (सेवा और श्रम) के न ज्ञान टिकेगा, न धन और न रक्षा। आपकी समस्या यह है कि आपने ग्रंथों को केवल छुआ है, उन्हें जीया नहीं। 'शूद्र' होना गर्व की बात है क्योंकि वह समाज का सेवक है, और जो सेवा नहीं कर सकता, वह वास्तव में जीवित लाश है।"

आपका तो नाम ही राम पर है लेकिन सुनिए रामचरित मानस की चौपाई है

'जे अधम जाति कहुँ बिद्या पाएँ। भयहुँ जथा अहि दूध पिआएँ॥'

(अर्थ: जैसे सांप को दूध पिलाने से उसका विष ही बढ़ता है, वैसे ही नीच प्रवृत्ति (जाति नहीं, नीच सोच) वाले व्यक्ति को विद्या मिलने पर उसका अहंकार और विष ही बढ़ता है।)

मौर्य जी, यह चौपाई आज आप पर सटीक बैठती है। अपनी सोच बदलिए, वरना जातियां तो वैसे भी लुप्त हो रही हैं, कहीं आपका अस्तित्व भी इन कुतर्कों की भेंट न चढ़ जाए।

राम प्रवेश मौर्य जी,
आपके संदेश में शब्दों की मर्यादा भले ही मार्ग भटक गई हो, किंतु आपकी जिज्ञासा का मूल बहुत गहरा है। आपने जो प्रश्न पूछे हैं, वे सत्य की उस कसौटी पर टिके हैं जहाँ अक्सर अल्पज्ञानी (Limited knowledge) व्यक्ति भ्रमित हो जाता है। सबसे पहले यह स्पष्ट कर दूँ कि 'शूद्र' कोई गाली या अपमान नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना का 'प्रारंभ' (The Beginning) है। शास्त्र सम्मत सत्य यही है कि 'जन्मना जायते शूद्रः'—अर्थात जन्म से हर मनुष्य शूद्र ही पैदा होता है। अज्ञान, अबोधता और कोरी स्लेट जैसा होना ही शूद्रता है। इसके बाद मनुष्य अपनी योग्यता और कर्म से अपना वर्ण चुनता है।
तर्क बहुत सीधा और अटल है—यदि मैं शिक्षा दे रहा हूँ, तो मैं 'ब्राह्मण' की भूमिका में हूँ। यदि मैं समाज की रक्षा हेतु खड़ा हूँ, तो मैं 'क्षत्रिय' हूँ। यदि मैं व्यापार और अर्थव्यवस्था को गति दे रहा हूँ, तो मैं 'वैश्य' हूँ। और यदि मैं सेवा कार्य में लीन हूँ, तो मैं 'शूद्र' हूँ। यह व्यवस्था कर्म आधारित (Action oriented) है, न कि जन्म आधारित। मौर्य जी, जातियां न तो वेदों ने बनाईं और न ही मनुस्मृति ने। यदि आपने इन ग्रंथों का रंच मात्र भी निष्पक्ष अध्ययन किया होता, तो आप जानते कि वहां गुण और स्वभाव की बात है, संकीर्ण जातियों की नहीं। जातियां तो मनुष्य के स्वार्थ और अहंकार की उपज हैं।

ब्रह्मा के चरणों से शूद्र की उत्पत्ति का रहस्य भी बड़ा गूढ़ है। चरण 'आधार' (Foundation) होते हैं। बिना चरणों के न शरीर खड़ा हो सकता है, न समाज। यह गतिशीलता और आधार का प्रतीक है, हीनता का नहीं। समाज रूपी शरीर को चलाने के लिए इन चार विभागों की आवश्यकता थी ताकि व्यवस्था संतुलित रहे, न कि किसी को नीचा दिखाने के लिए।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने स्पष्ट कहा है:
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

(अर्थ: श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है।)

मौर्य जी, जो व्यक्ति केवल जन्म के प्रमाण पत्र में अपनी श्रेष्ठता ढूंढता है, वह वास्तव में अपनी बौद्धिक दरिद्रता का प्रदर्शन करता है। मुझे संस्कारित करते समय किसी ने क्या कहा, यह महत्वपूर्ण नहीं है; महत्वपूर्ण यह है कि मैंने क्या सीखा। मैंने स्वयं को सदा एक 'विद्यार्थी' माना है, और एक विद्यार्थी का कोई वर्ण नहीं होता, वह केवल ज्ञान का आकांक्षी होता है।

सभ्यता की ओट में रहकर जब व्यक्ति कुतर्क करता है, तो वह स्वयं अपनी 'चमड़ी' उधेड़ रहा होता है, क्योंकि सत्य का सामना करना हर किसी के बस की बात नहीं। आशा है, अगली बार आप जब संवाद करेंगे, तो आपके भीतर का 'शूद्र' (अज्ञानी) मर चुका होगा और एक 'द्विज' (ज्ञानी) का जन्म होगा।

आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ....। अगली कड़ी जल्द....।
सादर,
अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज
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