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Monday, 24 August 2026

सत्ता जब सेवा से कट जाती है, तो पहले वह अहंकार बनती है; अहंकार जब आलोचना से कट जाता है, तो उन्माद बनता है; और उन्माद जब मर्यादा से कट जाता है, तो पतन बन जाता है।

मेरा देवता भी और ऊंचा उठे मेरे साथ
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भारतीय पुराणों ने मनुष्य को सत्ता के बारे में बहुत पहले ही सावधान कर दिया था। इतना पहले कि तब न चुनाव होते थे, न प्रेस-कॉन्फ्रेंस, न सर्वेक्षण एजेंसियाँ, न सोशल मीडिया की ट्रोल-सेना। फिर भी सत्ता के चरित्र को लेकर मनुष्य की बीमारी वही थी—सिंहासन मिलते ही आदमी अपने कद को भूल जाता है और सिंहासन की ऊँचाई को अपना कद समझने लगता है।

महाराज नहुष इसका प्राचीनतम और शायद सबसे सुंदर उदाहरण हैं।
इंद्र के लुप्त हो जाने पर देवताओं ने नहुष को इंद्रपद दिया। नहुष में तेज था, तप था, पुण्य था, योग्यता थी। किंतु सत्ता की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह अयोग्य को योग्य नहीं बनाती—वह कई बार योग्य को भी अपने भ्रम में अयोग्य बना देती है।

नहुष को इंद्रासन मिला तो भीतर का मनुष्य धीरे-धीरे बाहर के पद में घुलने लगा। जो कभी विनम्र था, वह ऐश्वर्य का अभ्यासी हुआ। फिर अधिकार का अभ्यासी। फिर अधिकार के प्रदर्शन का। और अंततः उसे लगा कि देवताओं के ऊपर बैठने वाला व्यक्ति देवताओं से ऊपर हो गया है।
यहीं से पतन शुरू हुआ।

कहानी का सबसे मार्मिक दृश्य तब आता है जब नहुष ने सप्तर्षियों को अपनी पालकी उठाने के लिए लगा दिया। ऋषि पालकी ढो रहे थे और इंद्रासन पर बैठा हुआ नहुष अपने को विश्व का स्वामी समझ रहा था। अगस्त्य मुनि की चाल स्वाभाविक रूप से धीमी थी। नहुष अधीर हुआ।

“सर्प! सर्प!”—कहा जाता है कि उसने शीघ्र चलने के लिए प्रेरित किया।
और फिर सत्ता का व्याकरण बदल गया।
उसने अगस्त्य को पैर से स्पर्श किया। ऋषि का शाप मिला—“सर्प योनि में जाओ।”
नहुष गिरा।
जिस ऊँचाई पर वह पहुँचा था, उससे कहीं अधिक ऊँचाई से।

यह केवल एक राजा के सर्प बनने की कथा नहीं है। यह भारतीय राजनीतिक दर्शन का एक अद्भुत रूपक है।

सत्ता जब सेवा से कट जाती है, तो पहले वह अहंकार बनती है; अहंकार जब आलोचना से कट जाता है, तो उन्माद बनता है; और उन्माद जब मर्यादा से कट जाता है, तो पतन बन जाता है।

आज नहुष हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन नहुषत्व बिल्कुल जीवित है।

आज सप्तर्षियों को पालकी उठाने के लिए बुलाने की आवश्यकता नहीं। सत्ता ने तकनीक विकसित कर ली है। अब पालकी दिखाई नहीं देती; कुर्सी दिखाई देती है। ऋषि दिखाई नहीं देते; अधिकारी, कर्मचारी, समर्थक, पत्रकार, विशेषज्ञ, पार्टी कार्यकर्ता और नागरिक दिखाई देते हैं। और सबसे सुविधाजनक बात यह है कि पालकी भी अब अदृश्य है।

सत्ता में बैठे व्यक्ति को अब यह कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि “मुझे उठाओ।”
व्यवस्था स्वयं उठाती है।

दरवाज़े स्वयं खुलते हैं। रास्ते स्वयं साफ होते हैं। स्वागत स्वयं होता है। कैमरे स्वयं घूमते हैं। जयकारे स्वयं उत्पन्न होते हैं। समर्थक स्वयं प्रमाणपत्र देते हैं कि जो हो रहा है, वह ऐतिहासिक है।

इतिहास भी बेचारा कई बार सोचता होगा—“मुझे कब बुलाया गया?”

सत्ता का नैतिक पतन किसी एक बड़े अपराध से नहीं होता। वह छोटी-छोटी सुविधाओं से शुरू होता है।
पहले नेता को सुरक्षा घेरे की आदत होती है।
फिर प्रशंसा की।
फिर विरोध से असुविधा होने लगती है।
फिर प्रश्न पूछने वाला शत्रु दिखाई देता है।
फिर आलोचक राष्ट्र-विरोधी, व्यवस्था-विरोधी, विकास-विरोधी या किसी अन्य सुविधाजनक श्रेणी में रख दिया जाता है।

और अंत में राजा को राजा नहीं, अवतार समझने वाले लोग चारों ओर खड़े हो जाते हैं।
यही नहुष का संकट था।

और यही किसी भी लोकतंत्र का संकट है।
लोकतंत्र में सिंहासन नहीं होना चाहिए—लेकिन कुर्सियाँ कभी-कभी सिंहासन से भी अधिक खतरनाक हो जाती हैं। क्योंकि सिंहासन पर बैठने वाला राजा जानता था कि उसके ऊपर देवता हैं, ऋषि हैं, धर्म है, लोकमत है और अंततः मृत्यु है।

आधुनिक सत्ता में समस्या यह है कि आदमी के पास पाँच साल का कार्यकाल होता है और उसके चारों ओर पाँच हजार लोग होते हैं जो उसे बताते रहते हैं कि वह अमर है।
यहाँ नहुष फिर मुस्कुराते हैं।

उन्हें याद आता है कि उन्होंने भी कभी सोचा था कि इंद्रासन स्थायी है।

सत्ता का सबसे बड़ा छल यही है कि वह अपने धारक को अस्थायित्व भूलने देती है।
कुर्सी स्थायी नहीं होती, लेकिन कुर्सी पर बैठे व्यक्ति की स्मृति बहुत जल्दी स्थायी हो जाती है।
उसे लगता है—यह सब मेरे कारण है।
वह भूल जाता है कि लोकतंत्र में जनता ने उसे नियुक्त नहीं, उधार दिया है।
जनादेश स्वामित्व-पत्र नहीं होता।
वह एक अस्थायी विश्वास है।

लेकिन जब विश्वास को अधिकार समझ लिया जाता है, तब नैतिकता धीरे-धीरे सरकारी फाइल की तरह नीचे दब जाती है।
और सत्ता पक्ष का नैतिक पतन यहीं से आरंभ होता है।

विरोधी दलों की गलतियाँ गिनाने में सत्ता जितनी दक्ष होती है, अपनी गलतियों को देखने में उतनी ही अंधी।

यह भी नहुष की ही परंपरा है।
क्योंकि अहंकार का सबसे मनोरंजक गुण यह है कि उसे आईना पसंद नहीं आता।
उसे चित्र पसंद आता है।
आईना बताता है—चेहरे पर दाग है।
चित्र बताता है—चेहरा शानदार है।
इसलिए सत्ता को आईने से अधिक चित्रकार चाहिए।

आज के चित्रकार आधुनिक हैं। वे शब्दों से चित्र बनाते हैं। आँकड़ों से बनाते हैं। प्रचार से बनाते हैं। उपलब्धियों की ऐसी माला बनाते हैं जिसमें कभी-कभी फूल कम और प्लास्टिक अधिक होता है।
पर जनता की आँखें अंततः चित्र से नहीं, जीवन से निर्णय करती हैं।
रसोई में महँगाई का दर्शन अलग होता है।
बेरोजगार युवक के कमरे में विकास की परिभाषा अलग होती है।
किसान के खेत में अर्थव्यवस्था का रंग अलग होता है।
और अस्पताल की कतार में नागरिकता का अनुभव किसी भाषण से बिल्कुल अलग।

राजनीति की विडंबना यह है कि सत्ता अक्सर राष्ट्र को नक्शे पर देखती है और जनता उसे रसोई, खेत, नौकरी, सड़क, विद्यालय और अस्पताल में देखती है।
यहीं नैतिकता और प्रचार के बीच दूरी पैदा होती है।
नहुष की कथा हमें यह नहीं बताती कि सत्ता बुरी है।
वह बताती है कि सत्ता के सामने मनुष्य की परीक्षा शुरू होती है।
योग्यता ने नहुष को ऊपर पहुँचाया था।
लेकिन चरित्र उसे वहाँ टिकाकर नहीं रख सका।
यही किसी भी सत्ता पक्ष के लिए सबसे बड़ा पाठ होना चाहिए।

किसी सरकार की सफलता केवल इस बात में नहीं है कि उसने कितनी सड़कें बनाईं, कितने भवन बनाए, कितनी योजनाएँ घोषित कीं या कितने चुनाव जीते।
उसकी वास्तविक सफलता इस बात में है कि सत्ता मिलने के बाद उसके भीतर विनम्रता कितनी बची।
क्या वह अपने आलोचक को सुन सकती है?
क्या वह अपनी भूल स्वीकार सकती है?
क्या वह अपने समर्थक को भी गलत कह सकती है?
क्या वह कानून को अपने विरोधी और अपने समर्थक के लिए समान रख सकती है?
क्या वह यह स्मरण रख सकती है कि जनता प्रजा नहीं है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या वह अगस्त्य को पैर लग जाने पर शाप से पहले क्षमा माँग सकती है?

नहुष की कथा का आधुनिक संस्करण शायद यही होगा।
एक दिन सत्ता की पालकी रुकती है।
नीचे खड़े लोग थक चुके होते हैं।
ऊपर बैठा हुआ व्यक्ति चिल्लाता है—“जल्दी चलो!”
कोई धीरे से कहता है—
“महाराज, हम थक गए हैं।”
सत्ता कहती है—
“तुम्हें समझ नहीं कि मैं कौन हूँ?”
और इतिहास बहुत धीरे से उत्तर देता है—
“हमें अच्छी तरह मालूम है। इसी लिए तो पालकी नीचे रख दी है।”
इतिहास का हास्य बड़ा निर्मम होता है।
वह किसी को तत्काल दंड नहीं देता।
वह पहले उसे ऊँचा उठाता है।
फिर उसकी स्मृति में उसका अहंकार सुरक्षित रखता है।
फिर समय बीतने देता है।
और जब लोग उस व्यक्ति का नाम लेते हैं, तो उसके महलों, भाषणों और विजय से अधिक उसकी भूल याद आती है।
नहुष इसलिए अमर नहीं हुए कि वे इंद्र बने थे।
वे इसलिए अमर हुए कि इंद्र बनकर भी मनुष्य रहना भूल गए थे।

आज के सत्ता पक्ष के लिए इससे बड़ा व्यंग्य और क्या होगा कि लोकतंत्र ने राजाओं को समाप्त कर दिया, लेकिन राजसी मानसिकता को नहीं।

राजा चला गया।
राजत्व बचा रहा।
सिंहासन चला गया।
सिंहासन-बोध बचा रहा।
और पालकी उठाने वाले सप्तर्षि अब भी कहीं न कहीं मौजूद हैं।
बस फर्क इतना है कि आज उनके हाथ में संविधान है।

और यदि कभी कोई नहुष फिर यह समझ बैठे कि संविधान उसके नीचे है, तो उसे नहुष की कथा एक बार फिर पढ़ लेनी चाहिए।
क्योंकि भारतीय परंपरा का सबसे गहरा राजनीतिक संदेश शायद यही है—
सत्ता सिर पर रखी जाने वाली वस्तु नहीं है; वह सिर झुकाने की परीक्षा है।

जो सिर झुका सकता है, वही लंबे समय तक ऊँचा रह सकता है।
और जो अपने लिए सप्तर्षियों को पालकी ढोने पर मजबूर करता है, उसके लिए इतिहास के पास एक ही पुराना शब्द है— नहुष।
मधुसूदन

Friday, 21 August 2026

आर्यसमाजी कृतेश पटेल लिखते हैं -- "जब मराठा हिन्दवी स्वराज्य के लिए लड़ रहे थे, तब अद्वैती क्या कर रहे थे? परोपकारणि पत्रिका में प्रकाशित लेख का उत्तर

दयानन्द की उत्तराधिकारी परोपकारिणी सभा की पत्रिका में हमारे लिए एक लेख छापा गया। और जैसा कि पूर्व में भी हुआ है, हमारे पास नहीं भेजा गया। हमारे एक मित्र द्वारा सूचित किया गया। यह लेख जिस दयानंदी ने लिखा है उसनें हमारे लेख के पचासों प्रमाणों में से किसी पर बोलना उचित नहीं समझा, आक्षेप ही आक्षेप किए। उनके लेख के अंश ले-लेकर इसका उत्तर दिया जाता है- 

आर्यसमाजी कृतेश पटेल लिखते हैं -- "जब मराठा हिन्दवी स्वराज्य के लिए लड़ रहे थे, तब अद्वैती क्या कर रहे थे?  
शृंगेरी मठ से 'शृंगेरी धर्म स्थान के दस्तावेज' नामक पुस्तक प्रकाशित हुई है। ए. के. शास्त्री द्वारा लिखित इस पुस्तक में टीपू सुल्तान द्वारा 7 अक्तूबर 1791 को लिखा हुआ पत्र भी है, जिसमें टीपू सुल्तान ने अपने शत्रु को हराने के लिए शृंगेरी मठ में सहस्रचंडी जाप करने के लिए धन्यवाद ज्ञापन किया था। इसके अलावा हिजरी 1226 का एक पत्र है, जिसमें टीपू के शत्रु के नाश के लिए तत्कालीन शंकराचार्य सच्चिदानन्द भारती द्वारा सहस्रचंडी होम करने का वर्णन है। जिस शिवाजी के स्वराज्य का नाम लेकर शचीन्द्र शर्मा जी ज्ञान दे रहे हैं, अद्वैतियों के परमगुरु उसी स्वराज्य को नष्ट करने के लिए यज्ञ कर रहे थे। आखिर ऐसा क्यों?"

शचीन्द्र -- दयानन्दी पूछ रहा है कि - 'जब मराठा हिन्दवी स्वराज्य के लिए लड़ रहे थे, तब शंकराचार्य के अनुयायी क्या कर रहे थे?' इस प्रश्न से पता चलता है कि इस दयानन्दी ने इतिहास नहीं पढ़ा है, बस अपनी पुस्तकों में शांकर परंपरा पर लगाए गए आक्षेपों को पढ़कर ही कॉपी-पेस्ट कर दिया है।

दयानन्दी को पता नहीं है कि शिवाजी महाराज के आदर्श समर्थ गुरु रामदास स्वामी शांकर परंपरा के भक्त ही थे तथा उनका मार्गदर्शन लिया करते थे। रामदास जी की शिक्षाओं को पढ़ें, उनमें शांकर परंपरा के ज्ञान, वैराग्य, अद्वैत-वेदान्तीय शब्दावली मिलती है। दासबोध में अद्वैत, ब्रह्म, माया, आत्मज्ञान, द्वैत-निरसन आदि पर व्यापक चर्चा है।

जैसे कि - "अद्वैत म्हणिजे काये । अदृश्य म्हणिजे काये । अच्युत म्हणिजे काये । मज निरोपावें ॥"

आगे रामदास स्वामी कहते हैं -"सत्य ब्रह्माचा संकल्प । मिथ्या मायेचा विकल्प ।"

तो स्वामी रामदास अद्वैती थे या त्रैतवादी? और इन्होंने क्या-क्या किया है, वह पता ही होगा।

उस काल के पेशवा माधवराव बल्लाल ने तो सार्वजनिक रूप से शंकराचार्य जी को अग्रपूजा हेतु चुना था तथा शंकराचार्य जी को पुणे बुलाया था। ये सभी मराठा शासक शंकराचार्य जी का संरक्षण, धार्मिक वैधता तथा आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त किया करते थे। इसके सैकड़ो ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। ये शंकराचार्य जी के भक्त कहाएँगे या दयानन्दी विचारधारा के?

दयानन्दी विचारधारा का तो उस काल में कोई था ही नहीं। बल्कि दयानन्द से पहले के पूरे इतिहास में दयानन्दी विचारधारा का कोई मनुष्य नहीं मिलता है।

पेशवा बाजीराव द्वितीय ने भी सार्वजनिक घोषणा की थी कि सभी धार्मिक स्थलों में शृंगेरी शारदा पीठ को प्रथम पूजा का सम्मान दिया जाए। इन्होंने भी स्वयं को शंकराचार्य जी का शिष्य घोषित किया था।

और ये पेशवा प्रसिद्ध भी थे शंकराचार्य के शिष्य के तौर पर। 1805 के ईस्ट इंडिया कंपनी के पत्र में शृंगेरी शंकराचार्य जी के लिए लिखा गया - 'पंडित प्रधान पेशवा बहादुर का गुरु।'

तो ये सब शंकराचार्य जी को सर्वोच्च मानने वाले, उनका आशीर्वाद, मार्गदर्शन की कामना रखने वाले - यह सब त्रैतवादी हुए? दयानंदी बताए कि - अगर अद्वैत परंपरा कुछ नहीं कर रही थी तो ये यह सब पक्ष विपक्ष के शासक सब क्यो शंकराचार्य जी के समर्थन, आशीर्वाद और मार्गदर्शन के लिए लालायित होते थे, घोषणाएँ कर करके स्वयं को उनका शिष्य, भक्त आदि क्यो कहा करते थे? 

ब्रिटिश अधिकारी और इतिहासकार जे. बी. सीली ने उल्लेख किया है कि - 18वीं सदी में, एक मजबूत हिंदू शक्ति और शृंगेरी जैसे आध्यात्मिक केंद्र के बीच संबंध हिंदुओं के लिए गौरव और एकता का स्रोत था।  

कर्नाटक के अभिलेखागार में प्राचीन पांडुलिपियाँ हैं, उनमें विस्तार से मराठाओं और शांकर पीठ के संबंध, सम्मान आदि का वर्णन है। मूर्ख दयानन्दी जाकर पढ़ ले। उसे इनके संबंध पता चल जाएंगे। 

अब शंकराचार्य जी का जो कार्य था - आध्यात्मिक संरक्षण देना, राजनीतिक मार्गदर्शन देना - वह दिया ही करते थे। इसके सैकड़ों ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं, अनेक इतिहासकारों के। वह स्वयं भाला पकड़कर लड़ने तो जाते नहीं। युद्ध तो सैनिक ही लड़ा करते हैं। 

हम पूछें कि - जब कारगिल का युद्ध हुआ था तो परोपकारिणी सभा के सदस्य कौन से दयानंदी भवन में सर्प और बकरा लिए बैठे थे ? तो ऐसे प्रश्न का कोई तुक हैं?

फिर आगे दयानन्दी - शांकर पीठ में किए गए - 'सहस्रचंडी' जाप व होम के पत्रों को प्रस्तुत करते हुए पूछ रहा है कि - "जिस शिवाजी के स्वराज्य का नाम लेकर शचीन्द्र शर्मा जी ज्ञान दे रहे हैं, अद्वैतियों के परमगुरु उसी स्वराज्य को नष्ट करने के लिए यज्ञ कर रहे थे।"

यहाँ भी हम कहेंगे कि इसने इस इतिहास को भी नहीं पढ़ा है। बस केवल यह पत्र पढ़कर निष्कर्ष निकाल लिया है। इतिहास पढ़ना या सत्य जानना इनका उद्देश्य नहीं होता है कभी। इनका उद्देश्य होता है - बस बीच में से कहीं से भी कुछ निकालो और आक्षेप करो। इस पूरे प्रकरण को समझिए।

1791 में मराठा सेना 'हिन्दू सेना' नहीं रही थी तथा वह 'हिन्दवी स्वराज्य' के आदर्शों से दूर हो चुकी थी। तब वे मुख्यतः 'मराठा स्वराज्य', यानी अपने राज्य के विस्तार, राजनीतिक प्रभुत्व और आर्थिक लाभ के लिए लड़ रहे थे।

यह सम्मिलित सेना थी, जिसमें मराठा, सिख, मुसलमान और यूरोपीय सैनिक भी शामिल थे। इस सेना में पिंडारी दल भी थे, जिनमें अधिकांश मुसलमान हुआ करते थे। अंग्रेज़, स्कॉटिश, फ्रांसीसी, आयरिश, इतालवी, जर्मन और डच आदि सैनिक अधिकारी थे। तब यह युद्ध धर्मयुद्ध नहीं था, राज्य के लिए युद्ध हो रहे थे।

शृंगेरी मठ की महिमा ये थी कि हिन्दू शासक और मुस्लिम शासक दोनों ही मठ से मैत्रीपूर्ण संबंध चाहते थे। किन्तु स्वाभाविक है कि मठ के संन्यासियों का हृदय मराठाओं की ही तरफ था, और वे उनका निरंतर यथोचित मार्गदर्शन भी किया करते थे।

किन्तु 1791 में एक बड़ा अपराध हुआ। मराठा सेना की एक टुकड़ी ने, जिसका कि पिंडारी दल होने का दावा किया जाता है, शृंगेरी मठ पर आक्रमण कर दिया। यह घृणित हमला मराठा सरदार रघुनाथराव की सेना से जुड़े एक दल ने किया था।

इस दल ने मठ से हाथी, घोड़े, नकदी तथा सब मूल्यवान वस्तुएँ लूटीं, यहाँ तक कि शंकराचार्य जी का दंड और कमंडल भी लूटकर ले गए।

वे इतने पर ही नहीं रुके, उन्होंने मठ में रखी माँ शारदा की प्रतिमा खंडित की तथा कई ब्राह्मणों और संन्यासियों की हत्या की। तथा मठ में जो महिलाएँ थीं, उनके साथ अत्याचार किया।

इन रघुनाथराव के पुत्र त्रिंबकराव का एक पत्र मिलता है, जो उसने अपने चाचा को लिखा था। उसमें वह लिखता है - "सेना के तुंगा नदी पार करने से पहले ही लामान और पिंडारी शिमोग्गा पहुँच गए थे। वे गए और शृंगेरी में स्वामी जी के मठ को लूट लिया। स्वामी का दंड (लाठी) और कमंडलु (पात्र) भी ले लिया गया। कुछ भी नहीं बचा। महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया गया। कई महिलाओं ने आत्महत्या कर ली। स्वामी जी की मूर्ति, लिंग आदि लूट लिए गए।"

तब दयानन्दी बताए कि यह यज्ञ इस अधार्मिक कार्य के विरोध में किया गया था या स्वराज्य को नष्ट करने के लिए किया गया था?

इस घटना की चारों ओर निंदा हुई थी। टीपू सुल्तान ने शृंगेरी के शंकराचार्य जी को एक पत्र लिखा था, जिसमें उसने इस घटना पर गहरा दुःख और क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा था - "शृंगेरी मठ में घटित घटना का समाचार प्राप्त हुआ। मठ और श्री शारदाम्बा की मूर्ति के साथ जो अनर्थ हुआ, उससे हमें अत्यन्त दुःख हुआ है। जो लोग ऐसे पवित्र स्थान के विरुद्ध पाप करते हैं, उन्हें अपने कर्मों का फल भुगतना ही पड़ेगा। श्री शारदाम्बा की मूर्ति की पुनःप्रतिष्ठा तथा मठ की व्यवस्था को पूर्ववत् करने के लिए आवश्यक सहायता सरकार की ओर से प्रदान की जाएगी। आप श्री देवी की आराधना करें और शत्रुओं के विनाश तथा समृद्धि और कल्याण के लिए तप, जप एवं अनुष्ठान सम्पन्न करें।"

इसके पश्चात टीपू सुल्तान ने मठ की सहायता की तथा इसकी सुरक्षा हेतु सैनिक भेजे।

तब शंकराचार्य जी को क्या करना चाहिए था? उनके संन्यासियों की हत्या करने वालों, उनके आश्रम में महिलाओं पर अत्याचार करने वालों, उनको लूटने वालों को समर्थन देना चाहिए था और इस घटना पर दुःख व्यक्त करने वाले टीपू को श्राप देना चाहिए था?

कोई मुसलमान सत्यार्थ प्रकाश हाथ में भी पकड़ ले तो इनका वक्षस्थल फूल जाता है। किसी मुसलमान ने दयानन्द की प्रशंसा में दो शब्द कह दिए हों तो रोमांचित हो जाते हैं - आहा, देखो हमारे प्यारे करामाती ऋषि की महिमा! लेकिन एक मुस्लिम शासक शंकराचार्य को जगद्गुरु कह रहा है, बार-बार पत्र लिखकर उनसे आशीर्वाद माँग रहा है, शंकराचार्य के कारण यज्ञ पर उसका विश्वास है कि इनके यज्ञ से राज्य के शत्रु नष्ट हो जाएँगे, राज्य में समृद्धि होगी... और यज्ञ के उपरांत वह पत्र लिखकर यज्ञ का प्रभाव भी स्वीकार कर रहा है कि शंकराचार्य जी के यज्ञ के कारण राज्य में वर्षा हुई है और समृद्धि हुई है। इसमें इनको शंकराचार्य जी की महिमा दिखाई नहीं देती।

अतः स्पष्ट है कि यह होम मराठा साम्राज्य का अंत करने या किसी हिंदुत्व की सेना के अंत के लिए नहीं किया गया था, बल्कि इस आक्रमण के प्रतिउत्तर में ऐसे अधर्मियों के विनाश तथा राज्य में समृद्धि, कल्याण और शांति भी इसका उद्देश्य था। 

अब इसे समझें कि मान लीजिए टीपू सुल्तान पराजित हो जाता, तब क्या होता? क्या हिन्दू शासन स्थापित हो रहा था?

नहीं। दरअसल मराठा सेना, निजाम की सेना और ब्रिटिश - ये तीन पक्ष संयुक्त होकर टीपू सुल्तान के विरुद्ध उस समय युद्ध लड़ रहे थे। तो राज्य को आपस में बाँटा जाता, न कि भगवा लहराया जाता। उस समय की राजनीति अत्यंत जटिल थी। बिना समझे मूर्ख यह अनुमान करते हैं कि एक तरफ हिन्दू योद्धा थे, दूसरी तरफ मुसलमान थे। ऐसा नहीं था।

और यही हुआ था। तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद टीपू की हुई पराजय के बाद श्रीरंगपट्टणम् की संधि के अनुसार, टीपू को अपना आधा राज्य इनको देना पड़ा था, जिसे इन्होंने तीन हिस्सों में बाँट लिया था। ब्रिटिश इंडिया कंपनी को मालाबार तट, बारामहल आदि महत्वपूर्ण क्षेत्र मिले, उत्तर-पश्चिम के कुछ क्षेत्र पेशवाओं को मिले तथा हैदराबाद के निजाम को कृष्णा और पेन्नार नदियों के बीच के कई क्षेत्र तथा दुर्ग दिए गए।

तो यह आपस में बाँटकर हिन्दूराष्ट्र स्थापित हो रहा था? उस समय की राजनीतिक स्थिति अत्यंत जटिल थी। हम अधिक नहीं लिख रहे हैं, अन्यथा बहुत बड़े भ्रमों के महल भरभराकर गिर पड़ेंगे। बुद्धिमान इतने में ही समझ लेंगे।

आर्यसमाजी कहते हैं कि हमने ही इस धर्म को बचाया है, हमने ही बलिदान दिए हैं - तब हमने प्रतिउत्तर में लेख लिखा था कि शिवाजी महाराज आदि सहित जिन्होंने भी युद्ध लड़े, बलिदान दिए, सब हिन्दू ही थे, मूर्तिपूजक ही थे, आर्यसमाजी विचारधारा का तो कोई था ही नहीं। तब दयानन्दी ने विचार किया, बात तो सत्य है, अतः 'अद्वैती' शब्द ले आया। किन्तु इससे वह बात तो ऐसी की ऐसी ही रहेगी। ये सब अद्वैती न भी हों, किन्तु पौराणिक और मूर्तिपूजक तो रहेंगे ही या नहीं? न ही इससे यह सत्य बदलेगा कि दयानन्द के जन्म से पहले आर्यसमाजी विचारधारा का कोई योद्धा नहीं हुआ है इस धरती पर । इस पंथ का इतिहास तो दयानन्द से ही शुरू होता है।

यह बिल्कुल ऐसे है जैसे हम भी आर्यसमाज को सभाओं में बाँटकर प्रश्न करें। जैसे कि - "जब स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था, तब परोपकारिणी सभा कहाँ थी? परोपकारिणी सभा का एक भी सदस्य क्रांतिकारी क्यों न हुआ? बल्कि परोपकारिणी सभा तो खुलकर अंग्रेज़ों का समर्थन करती थी तथा घोषणाएँ किया करती थी कि कोई भी स्वतंत्रता संघर्ष से संबन्धित गतिविधियों में भाग न ले, भाषण न दे, चर्चा ही न करे। 

जैसा कि बताया था - इसी परोपकारिणी सभा ने 1891 में नियम बनाया, उसमें कहा गया कि: "आर्यसमाज के किसी भी प्रचारक के लिए यह उचित नहीं है कि वह (अपने भाषण में) किसी राजनैतिक विषय की चर्चा करे या उस पर भाषण दे, या किसी ऐसी संस्था से सम्बन्ध रखे या उसकी बैठकों में सम्मिलित हो, जिसके द्वारा राजनैतिक आन्दोलन किया जाता हो।"
✍️शचीन्द्र शर्मा 
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बहुत ही उत्कृष्ट लेख शर्मा जी। श्रृंगेरी शंकराचार्य द्वारा टीपू सुल्तान के लिए किए गए यज्ञ का आक्षेप बहुत लोग करते हैं, यहां तक कि कुछ संघी व भाजपाई के it सेल वाले भी। परंतु एक मराठा टुकड़ी द्वारा श्रृंगेरी मठ पर किए गए वीभत्स आक्रमण का तो अधिकांश जनों को पता ही नहीं। इस महत्वपूर्ण जानकारी के लिए आपका बहुत बहुत आभार शर्मा जी।🙏🙂 Vipraj Mishra 

मराठा कोई बहुत बड़े सनातन धर्म संरक्षक नहीं थे। अपने राज्य विस्तार,धन लिप्सा,प्रभुत्व के लिए युद्ध लड़ते थे। हिन्दू राज्यों,राजाओं से चौथ के लिए युद्ध लड़ते थे। - सागर नैन 

कुछ राजनीति में आए क्रांतिकारियों को आर्य समाज के पर्दे के पीछे की कहानी का पता नहीं था क्योंकि उनका जुनून देश के प्रति था । Satyavart Sharma