शुचि शुचिपदं हंसं तत्पदं परमेष्ठिनम् युक्त्वा सर्वात्मनाऽऽमानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम्।।
सहस्र रश्मि सूर्य, सहल वाक् शिव, सहस्र फण शेष, सहस्रनेत्र इन्द्र, सहस्र कर्ण पृथु सहस्रपात् विष्णु, सहस्र पाश वरुण, सहस्र पक्ष गरुण, सहस्र रूप राम, सहस्र काय कृष्ण का ध्यान करते हुए मैं श्री पं. जी को प्रणाम करता हूँ।
वेदों पर सर्वप्रथम भाष्य लिखा, व्यास ने यह भाष्य १८ खण्डों में लिखा गया। इन खण्डों को पुराण कहते हैं। वेदों को जीवित रखने का श्रेय व्यास को जाता है। वेद गूढ है। पुराण गूढ़तर हैं किन्तु रोचक हैं। वेद, पुराणों के रूप में जन-जन तक पहुंचे हुए हैं। व्यास की शैली को समझना कठिन है। इस शैली को न जानने के कारण पुराण अबोधगम्य हैं। सत्य की कृपा से यह शैली समझ में आती है। इसको जानने के लिये व्यास को जानना आवश्यक है। व्यास मन इस समीकरण की सिद्धि पर मैं अपना ध्यान केन्द्रित करता हूँ। 'व्यास' का मूल अस् वा आस् धातु है।
वि + अस् + घञ् = व्यास।
व्यस्ति व्यस्यति व्यसति ते व्यासते वियोजन करना विभाजन करना विश्लेषण करना पृथक्-पृथक् करना फाड़ना टुकड़े करना अतिक्रमण करना फेंकना उछालना विखेरना प्रकट करना मन का गुण धर्म है। इस लिये यह व्यास है।
अस् अदादि परस्मै अस्ति
अस् दिवादि परस्मै अस्यति
अस् भ्वादि उभय असति-ते
आस् अदादि आत्मने आस्ते
वि+ आसू आत्मने व्यासते
"विण्यास वेदान्यस्मात् तम्माद् व्यास इतिस्मृतः ।'
व्यास का एक विशिष्ट अर्थ है। विश्व को दो समान टुकड़ों में बाँटना। भूगोल खगोल वा ब्रह्माण्ड के केन्द्र से होकर विश्व वा ज्ञान के ओर छोर को स्पर्श करने वाला व्यास होता है। जो दीर्घतम वा बृहत्तम है वह व्यास है।
मान लिया के केन्द्र वाला कोई है। क केन्द्र से हो कर जाने वाली वृत्त रेखा, जो परिधि को अ और इ बिन्दुओं पर काटती है, व्यास कही जाती है। यदि यह रेखा केन्द्र से हो कर नहीं जाती तो व्यास नहीं होती। तब इसे जीवा कहते हैं। आ ई रेखा केन्द्र क से होकर नहीं जाती, इस लिये जीवा है। आ ई रेखा केन्द्र क से होकर जाती है, इस लिये व्यास है। जीवा, व्यास से सदैव छोटी होती है। जीवा, जब व्यास के बराबर होती है अर्थात् जब केन्द्र से हो कर जाती है तो जीवा नहीं होती। अपितु व्यास होती है। जीवा, जीव है। व्यास, ईश्वर है। जीव का ईश्वर से तादात्म्य होने पर जीव जीव नहीं रहता- ईश्वर हो जाता है। जीवा, व्यास से सदा छोटी होती है। जीव, ईश्वर से छोटा होता है। जीवाएँ अनेक होती हैं, ईश्वर एक होता है। राम चरित मानस की यह पंक्ति है...
"परबस जीव, स्वबस भगवन्ता ।
जीव अनेक, एक श्री कन्ता ॥
-(तुलसीदास)
जो ब्रह्मण्ड के केन्द्र से हो कर जाता है, ब्रह्माण्ड को आर-पार करता है, वह व्यास है। महत्व है केन्द्र से हो कर जाने गा । ब्रह्मण्ड के ओर-छोर का पता अनेकों को होता है। केन्द्र को न जानने के कारण वे जीव हैं। इस केन्द्र को जानने के कारण वही जीव व्यास कहलाता है। ब्रह्माण्ड का केन्द्र है- आत्मा। इस ब्रह्माण्ड की परिधि है-माया। जो आत्मा और प्रकृति दोनों को जानता है, वह व्यास है। जो क्षेत्र और क्षेत्री दोनों का ज्ञान रखता है, वह व्यास है। व्यास का एक सिरा अस्ति है, दूसरा सिरा नारित है। व्यास का एक छोर अंधकार है, दूसरा छोर प्रकाश है। व्यास का आदि बिन्दु जन्म है, अन्तिम बिन्दु मृत्यु है। जो द्वैतज्ञ है, वह व्यास है। जो दो आँखों से देखता है, वह व्यास है। जो आत्मा को स्त्री-पुरुष के रूप में देखता है, वह व्यास है। इस संबंध में एक कथा है। व्यास जी अपने पुत्र शुक देव के पीछे-पीछे जा रहे थे। एक सरोवर में स्त्रियाँ नग्न स्नान कर रही थीं। शुकदेव १६ वर्ष के थे। शुक देव को देख कर उन्हें लज्जा नहीं आयी। वे नग्न खड़ी रह कर उन्हें देखती रहीं। जब व्यास जी को उन स्त्रियों ने देखा तो अपने शरीर को ढकने लगीं। व्यास ने इसका कारण उन से पूछा तो उन युवतियों ने कहा- आप का बेटा शुकदेव स्त्री-पुरुष भेद नहीं करता, आप भेद करते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि शुकदेव के पास अद्वैत दृष्टि थी, व्यास के पास द्वैत दृष्टि । शुकदेव समदर्शी थे, व्यास विषमदर्शी । समदर्शी के पास एक आँख होती है, विषमदर्शी के पास दो । यद्यपि एक आँख विषम हैं, दो आँख सम है। व्यास ने एक तत्व को दो भागों में बाँट कर देखा है, शुकदेव ने इन दोनों को एक कर के देखा है। व्यास विश्लेषक मन का नाम है, शुक संश्लेषक मन का नाम है। शुक् धातु भ्वादि गण परस्मैपदी शोकति-जाना हिलना डुलना अर्थ वाली है। शुक् + क = शुक । जो हिलता डुलता है, इधर-उधर जाता रहता है वह शुक है। यही तो मन है। मन चंचल है, शुक्र चंचल है। शुक देव की उत्पत्ति घृताची अप्सरा के रज और व्यास के वीर्य से हुई है। घृत + आ + चि= घृताची। अप इव सरति सा अप्सरा (स्त्री)। जिस मन में घृत की स्नेहन शीलता है, एकत्रीकरण (आचिनोति) की क्षमता है तथा जल की तरह प्रवाह है-वह घृताची अप्सरा है। विश्लेषक मन व्यास है। क्यों कि यह पराशरज है। महर्षि पराशर ब्रह्मा के मानसपुत्र हैं। पर + आ + श् + अच् पराशर परान् आशृणाति पराशरः । जो छिन्न-भिन्न करता है, टुकड़े टुकड़े करता है, खण्डन करता है नष्ट करता है-वह पराशर है। पराशर ने काल का खण्डन किया है। विपल पल घटी मुहूर्त होरा लग्न दिन पक्ष मास अयन अब्द संवत्मर युग मन्वन्तर- ये १४ खण्ड काल के हैं। पराशर ने होराशास्त्र की रचना की। १४ भुवन पर्यन्त इस शास्त्र का सम्मान है। यह पराशर मन ही तो ही एक कथा है- पराशर ने मत्स्यगन्धा के गर्भ से व्यास को उत्पन्न किया। अतिगोप्य सूत्र है, यह शुक्र मीन राशि में उच्च का माना जाता है, इसलिये बलवान होता है। काम का पर्याय है, मीन केतन। इसका भी वही अर्थ है। शुक्र और काम में अनन्यत्व है। गन्ध पृथ्वी तत्व का तन्मात्र है। शुक्र में गन्ध है। मत्स्य चंचल है, शर गतिमान है। यह युवान मन है। यह मन, व्यास है। व्यास + अंबिका धृतराष्ट्र व्यास + अंबालिका → पाण्डु । व्यास + दासी विदुर व्यास शुकी घृताची शुक। ये सब मन को विभिन्न अवस्थाएँ हैं और सब मन हैं। धृतराष्ट्र अन्धामन है। पाण्डु अबुध मन है। विदुर ज्ञानी मन है। व्यास विशाल मन है। शुक निर्गुण मन है। नमोऽस्तु ते व्यास विशाल बुद्धे।'
व्यास व्यष्टि नहीं है, समष्टि है। व्यास वाक्य आप्त वाक्य है। व्यास ने ब्रह्मसूत्र रचा। ब्रह्म = विभु। सूत्र अणु। जिसे विभु और अणु का ज्ञान है, वह व्यास है। जिस का इहलोक और पर लोक दोनों पर समान अधिकार है, वह व्यास है जो भौतिक विश्व एवं आत्मिक विश्व-दोनों का ज्ञान देता है, वह व्यास है। जो इन दोनों को जान कर इन से परे हो जाता है, वह शुक है। भागवत कथा शुक वा व्यास के मुख का प्रसाद है। इस प्रसाद के स्वाद का वर्णन नहीं किया जा सकता। पुण्य पुष्यवानों को यह प्रसाद मिलता है। उन पुण्यवानों को मैं प्रणाम करता हूँ।