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Saturday, 25 July 2026

माननीय धर्मेन्द्र प्रधान जी का त्यागपत्र

माननीय धर्मेन्द्र प्रधान जी का त्यागपत्र-केन्द्र
सरकार ने इसमें अद्भुत् कुशलता का परिचय दिया है। भौतिक विज्ञान में या इंजीनियरिंग में गणित पद्धति पढ़ी थी-Method of successive approximation. अधिकांश गणित समीकरण का कोई सीध हल सम्भव नहीं है। हल का कई बार अनुमान लगाते हैं तथा बार बार गणना कर अशुद्धि को क्रमशः कम करते हैं। भारतीय गणित ज्योतिष में इसे असकृत् पद्धति कहा गया है। सकृत् पद्धति में एक ही बार गणना होती है। राजनीति में यह पद्धति १९७० में एक पूर्व सांसद ने समझायी थी। यदि १० अरब की लूट का आरोप लगता है, तो सरकार द्वारा एक विरोधी दल सांसद की सेवा ली जाती है। उसके द्वारा अपने विरुद्ध १० करोड़ के गबन का आरोप संसद में लगवाते हैं। बहस में सरकार द्वारा १० लाख का गबन स्वीकार कर जांच करवाई जाती है। जांच के बाद १० हजार के गबन का आरोप पत्र कोर्ट में दाखिल होता है। निर्णय के लिए अगले जन्म की प्रतीक्षा करें। 
वर्तमान काल में यूजीसी कानून आने के बाद लोगों में असन्तोष हुआ कि भाजपा सरकार द्वारा सवर्णों का दमन लगातार बढ़ता जा रहा है तथा हजारों झूठे केस में उनको फंसा रहे हैं। इस पर आन्दोलन करने या जन्तर मन्तर पर धरना देने की अनुमति २ वर्ष तक नहीं मिली। तब सरकार ने अपने विरुद्ध अन्य आरोप लगवाने के लिए काॅकरोच जनता पार्टी बनवाई तथा यह नाम भी सरकार द्वारा ही दिया गया। भाजपा सांसद श्रीमती बांसुरी स्वराज के अनुसार उसके नेता श्री अभिजित दिपके को अमेरिका से बुलाकर एयरपोर्ट पर ही पुलिस द्वारा २७ दिन तक जन्तर मन्तर पर धरना देने की अनुमति दी गयी जिसका उन्होंने आवेदन भी नहीं किया था। सामान्य तोड़फोड़ तथा पुलिस पिटाई के बाद शिक्षा मन्त्री श्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा करवा दिया। इस सेवा के लिए उनको और बड़ा पद मिलेगा। 
https://youtube.com/shorts/Hb-Bvhl8Q8I?si=FkUMFBOIZfimOBdg

✍️ अरुण कुमार उपाध्याय 
( 25/7/2026 ईस्वी फेसबुक पोस्ट )

Friday, 24 July 2026

धराचक्र के अनुसार जिस भूमि में धन दबा हुआ हो या जहाँ देवता निवास करें वहाँ स्वत: कुछ लक्षण प्रतीत होते हैं ...

धराचक्र के अनुसार जिस भूमि में धन दबा हुआ हो या जहाँ देवता निवास करें वहाँ स्वत: कुछ लक्षण प्रतीत होते हैं और वहाँ कुछ जीव भी देखे जाते हैं उनका वर्णन इस प्रकार है ।
जिस भूमि पर रात्रि में गाने बजाने की आवाज आये और रात के अंतिम पहर में , अंधकार में भी प्रकाश दिखाई दे वहाँ जमीन के नीचे निश्चय ही विपुल धन गड़ा समझें ।

जहाँ नित्य सर्पों का दर्शन हो , नेवले का दर्शन या बिल हो और गिरगिट जहाँ नित्य दिखता हो ।
प्रातः काल और सायं काल जिस स्थान पर खंजन पक्षी उत्तर की और मुँह करके बैठे वहाँ भी निश्चय गड़ा जानें ।
तत्र स्यांनिश्चितम निधि: ।वहाँ निश्चय धन जानें।

ऐसे ही जिस स्थान पर लाल रंग का साँप और लाल चीटियाँ नित्य दिखाई दें वहाँ निश्चय ही धन गड़ा हो ।
तत्र द्रव्यम न संशयः । वहाँ धन हो इसमें संशय न करें

जिस स्थान पर शयन करने से प्रतिदिन स्वप्न में देवता , अग्नि ,ब्राह्मिण और दूध दही आदि दिखाई पढ़ें ,जहां तुलसी पौधा स्वयं उग आए नीम पीपल के पेड़ हों वहां निश्चय ही देवताओं का वास जानें ।

देवानां दर्शनम यत्र विप्राणां दर्शनम तथा ।
यत्राग्निदृष्यते स्वप्ने गव्यानाम दर्शनम तथा ।।
तुलसी स्वयंमुत्पन्ना यत्र तत्र च भूतले।
निम्बाश्वथादिवृक्षाश्च तत्र देवो न संशय:।।

ऐसा महर्षि लोमश का मत है ।

भारत भूषण गौड़ , ज्योतिषाचार्य
सम्पर्क :-- 8810639340

"पगड़ी सम्भाल जट्टा" एक गीत नहीं क्रांतिकारी आंदोलन हैं।

*पगड़ी संभाल जट्टा* एक गीत नहीं, असल में बांके दयाल की क्रांतिकारी कविता थी जो बाद में लोकगीत और आंदोलन का नारा बन गई।
1. *कब और किसने लिखा*
- *लेखक*: लाला *बांके दयाल* - "जंग सयाल" अखबार के संपादक और राष्ट्रवादी कवि
- *समय*: *3 मार्च 1907* को लायलपुर (अब फैसलाबाद, मुल्तान पंजाब पाकिस्तान) में एक किसान रैली में पहली बार उन्होंने इसे गाया/पढ़ा 
2. *किस अखबार से जुड़ा था*
बांके दयाल उस समय *"जंग सयाल" / "झंग स्याल"* अखबार के संपादक थे। इसी अखबार के जरिए उनके लेख और कविताएं पंजाब भर में फैलती थीं। कविता का मकसद 3 ब्रिटिश कानूनों का विरोध था - _पंजाब भूमि उपनिवेशीकरण अधिनियम 1906, दोआब बारी अधिनियम 1907, पंजाब भूमि अलगाव अधिनियम 
3. *इसे लोक में किसने प्रचलित किया*
कविता को मंच से जनता तक पहुंचाने का श्रेय मुख्य रूप से *सरदार अजीत सिंह* को जाता है।
- 1907 की लायलपुर की ऐतिहासिक सभा में बांके दयाल ने ये कविता पढ़ी, जिसके बाद आंदोलन का नाम ही *"पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन"* पड़ गया
- अजीत सिंह, उनके भाई *किशन सिंह* (भगत सिंह के पिता), *लाला लाजपत राय, सूफी अंबा प्रसाद, घसीटा राम* ने पूरे पंजाब में रैलियां कर इसे घर-घर पहुंचाया
- बाद में *गदर आंदोलन* और *भगत सिंह की टोली* ने भी इसे खूब गाया
- फिल्मों में इसे मशहूर किया - 1965 की फिल्म _शहीद_ में मोहम्मद रफ़ी ने और 2002 की _द लेजेंड ऑफ भगत सिंह_ में सुखविंदर सिंह ने गाया 

4. *इस व्यक्ति और परिवार को कितने "हिंदू राष्ट्रवादी देशभक्त क्रांतिकारी" जानते हैं?*
सच कहें तो बहुत कम।

- *बांके दयाल*: उनका नाम आज स्कूल की किताबों में भी नहीं मिलता। जबकि "पगड़ी संभाल जट्टा" का नारा हर किसान आंदोलन में गूंजता है। वो जंग सयाल के संपादक थे और 1907 में किसानों की आवाज बने, पर उनकी शहादत/त्याग को कम ही याद किया जाता है।
- *अजीत सिंह का परिवार*: अजीत सिंह भगत सिंह के चाचा थे। उन्होंने 1906 में *भारत माता सोसाइटी* बनाई। अंग्रेजों ने उन्हें 1907 में मांडले जेल भेजा, फिर वो ईरान, जर्मनी, तुर्की होते हुए दुनिया भर के क्रांतिकारियों से मिले। लोकमान्य तिलक ने उन्हें "किसानों का राजा" कहा था। 
आज जिन संगठनों को "हिंदू राष्ट्रवादी" कहा जाता है, उनमें अजीत सिंह का नाम कभी-कभी आता है क्योंकि वो भगत सिंह के चाचा थे। पर *बांके दयाल* और *भारत माता सोसाइटी* का जिक्र बहुत कम होता है। ज्यादातर लोग गाना तो जानते हैं, पर जिसके कलम से निकला और जिस परिवार ने उसे शहीदों तक पहुंचाया - उनके बारे में जानकारी सीमित है।
23 फरवरी को अब *"पगड़ी संभाल दिवस"* भी मनाया जाता है, जो अजीत सिंह की जयंती है। 2021 और 2024 के किसान आंदोलन में भी किसानों ने इसी नारे को फिर से जिंदा किया। 
संक्षेप में:
*लेखक* = बांके दयाल, *पहली बार* = 3 मार्च 1907 लायलपुर, *अखबार* = जंग सयाल, *लोकप्रिय किया* = अजीत सिंह + किशन सिंह + गदर पार्टी( भगतसिंह का परिवार)

प्रश्नोत्तर/ कमेंट 
[7/23, 18:33] दीपक कुमार तलवार: सरदार अजीतसिंह जी ही सावरकर जी द्वारा लिखित पुस्तक "१८५७ प्रथम स्वातंत्र्य समर" की पांडुलिपि को स्वदेश लाए थे। जिसे सुखदेव थापर - भगतसिंह - आजाद - राजगुरु आदि क्रांतिकारी छपवाकर बांटते थे। सरदार अजीतसिंह जी भगतसिंह के चाचा थे। १९०७ विक्टोरिया मदारिन द्वारा किसानों के उत्पीड़न को लेकर चलाए गए आंदोलन के कारण देश छोड़कर जर्मनी अमेरिका आदि देशों में रहे
[7/23, 18:37] दीपक कुमार तलवार: अखबार का नाम था
*झंग स्याल*
[7/23, 18:39] दीपक कुमार तलवार: यह गीत पहली बार फैसलाबाद,मुल्तान , पश्चिमी पंजाब ( वर्तमान में पाकिस्तान अधिकृत) के वृहद किसान सम्मेलन में रखा गया
[7/23, 19:55] दीपक कुमार तलवार: आपने सही कहा है। यह जानकारियां जानबूझकर सामान्य जन से छुपाई गई हैं ताकि लोगों को भेड़ बकरी बनाकर हांका जा सके और लोग व्याघ्र सिंह सैनिक न बन जाएं
[7/23, 19:57] दीपक कुमार तलवार: हमने यह प्रश्न एक व्हाट्सएप समूह " क्रांति " में पूछा था। वहां बैठे रंगे सियार तुरंत हुआं हुआं करते हुए सामने आ गये

Wednesday, 22 July 2026

घोर जातिवादी - स्वामी दयानंद

आर्यसमाजियों ने दयानन्द की केवल एक पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश से ही उनके अनेक सिद्धान्त हटाये और सैकड़ों प्रक्षेप किए। उनकी अन्य पुस्तकों के साथ भी यही किया गया। उनकी मृत्यु होने पर आर्यसमाजियों ने जहाँ तक सम्भव हुआ उनकी पुस्तकों से उनके लिखे तथ्य समय-समय पर हटाये। दयानन्द के साहित्य में प्रत्येक सिद्धान्त पर जो विरोधाभासी वाक्य मिलते हैं, ये आर्यसमाजियों की इस हेरा-फेरी का ही परिणाम है। इस लेख में केवल स्वामी दयानन्द के घोर जातिवादी होने के साथ-साथ, निम्न-जातियों के प्रति उनकी घृणा के तथ्य प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

जिस सत्यार्थ प्रकाश से स्वामी दयानन्द के ये सब कथन लिए गए हैं, यह विक्रम संवत् 2035 (सन् 1939 ई.) को वैदिक पुस्तकालय, दयानन्द आश्रम, अजमेर द्वारा प्रकाशित है। और इस सत्यार्थ प्रकाश को, वैदिक यंत्रालय, अजमेर द्वारा मुद्रित किया है, जिसकी स्थापना स्वयं स्वामी दयानन्द करके गए थे। अतः सभी तथ्य पूर्णतः प्रामाणिक और अक्षरशः सत्य हैं।

स्वामी दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं - "उनमें से एक पाखंडी उन्मत्त होके नाच कूँद के कहता है - 'में इसका प्राण ही ले लूँगा'। तब वे अंधे, उस भंगी चमार आदि नीच के पाँव में पड़ के कहते हैं - 'आप चाहे सो लीजिये, इसको बचाइये'।" (सत्यार्थ प्रकाश - पृष्ठ संख्या ३१)

शचीन्द्र - देखें, यहाँ स्वामी दयानन्द "भंगी, चमार" शब्द का प्रयोग करते हुए उन्हें नीच कह रहे हैं। तत्कालीन समय में झाड़-फूँक करने वाले, भूत-प्रेत आदि के उपचार का दावा करने वाले अधिकतर निम्न वर्ण के हुआ करते थे। तब कुछ उच्चवर्णीय लोग भी भूतप्रेत आदि की समस्या अनुभूत होने पर इनके पास चले जाया करते थे। तो स्वामी दयानन्द का क्रोध और घृणा आप इन शब्दों में देख सकते हैं कि - "वे भंगी चमार आदि नीच के पाँव में पड़ के कहते हैं"।

स्वामी दयानन्द लिखते हैं - "चाहे कोई पुरुष वा स्त्री हो इस ऊटपटांग वचन को पढ़ के समागम करने में वे वाममार्गी दोष नहीं मानते हैं। अर्थात जिन नीच स्त्रियों को छूना नहीं चाहिए, उनको अतिपवित्र उन्होंने माना है। जैसे शास्त्रों में रजस्वला आदि स्त्रियों के स्पर्श का निषेध है, वाममार्गियों ने उन्हें अतिपवित्र माना है।" (सत्यार्थ प्रकाश - पृष्ठ संख्या २६६)

शचीन्द्र - यहाँ स्वामी दयानन्द वाममार्गियों का खंडन करते समय कहते हैं कि - "जिन नीच स्त्रियों को छूना नहीं चाहिए" अब यहाँ विचार होगा कि नीच स्त्रियाँ स्वामी जी किसको कह रहे हैं? इसका उत्तर वे अगली पंक्ति में देते हैं कि - "जैसे शास्त्रों में रजस्वला आदि स्त्रियों के स्पर्श का निषेध है" तो "रजस्वला आदि" का विस्तार है कि - शास्त्रों में रजस्वला, चांडाली, चर्मकारी, रजकी, पुक्कसी" आदि स्त्रियों के स्पर्श का निषेध किया गया है। चांडाल का अर्थ स्वामी जी ने भंगी कर ही रखा है। और पुक्कस का अर्थ अंत्यज अर्थात चमार, धोबी आदि निम्न जातीय लोग। अतः स्पष्ट है स्वामी दयानन्द ने इन सबको यहाँ अछूत माना है। और इस जाति की स्त्रियों को "नीच" कहते हुए उनके भी स्पर्श का निषेध कर दिया है।

स्वामी दयानन्द लिखते हैं - "अंग्रेज़, यवन, अंत्यज आदि से भी खाने-पीने का भेद नहीं रखा। इन्होंने यही समझा होगा कि खाने-पीने और जातिभेद तोड़ने से हम और हमारा देश सुधार जाएगा, परंतु ऐसी बातों में सुधार तो कहाँ है, उल्टा बिगाड़ होता है।" (सत्यार्थ प्रकाश, पृष्ठ संख्या -३५८)

शचीन्द्र - यहाँ स्वामी दयानन्द ब्रह्मसमाज व प्रार्थनासमाज के दोष बताते हुए, "अंत्यज (निम्नजातियों) से खाने-पीने का भेद न रखने से तथा जातिभेद को तोड़ने से, देश का बिगाड़ होने की बात कह रहे हैं।

स्वामी दयानन्द लिखते हैं - "जैसे पशुओं में गौ, अश्व, हाथी आदि जातियाँ हैं। वृक्षों में पीपल, वट, आम्र आदि। पक्षियों में हंस, काक, वकादि। जलजन्तुओं में मत्स्य, मकरादि जातिभेद हैं वैसे मनुष्यों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज जातिभेद हैं, ईश्वरकृत हैं। परन्तु मनुष्यों में ब्राह्मणादि को सामान्य जाति में नहीं किन्तु सामान्य विशेषात्मक जाति में गिनते हैं।" (सत्यार्थ प्रकाश, पृष्ठ संख्या २५८)

शचीन्द्र - यहाँ स्पष्ट ही स्वामी दयानन्द पशुओं, वृक्षों, पक्षियों, जलजन्तुओं तथा मनुष्यों में जो जातिभेद है उसे ईश्वरकृत बताते हुए, ब्राह्मण को विशेष जाति बता रहे हैं। इस कथन में विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि, स्वामी दयानन्द ने यहाँ "अंत्यज" को चार वर्णों से अलग एवं निकृष्ट मानते हुए उन्हें एक ईश्वरकृत जाति माना है। आर्यसमाजियों ने दुष्प्रचार किया कि स्वामी जी तो चार वर्णों को ही मानते थे, वे अन्य किसी जाति को न मानते थे, यहाँ स्पष्ट देखा जा सकता है कि, सत्य क्या है। स्वामी दयानन्द की अंत्यजों के प्रति, निम्न जातियों के प्रति इतनी अधिक घृणा थी कि पृष्ठ संख्या ५७९ में उन्होंने "अंत्यज नाम वाली महिलाओं के साथ विवाह करने का भी निषेध कर दिया है।"

स्वामी दयानन्द लिखते हैं - "शूद्र नीच लोग मंदिर में नैवेद्य लाते हैं। जब नैवेद्य हो चुकता है तब वे शूद्र नीच लोग झूठा कर देते हैं। पश्चात जो कोई रुपया देकर हंडा लेवे उसके घर पहुँचाते और दीन गृहस्थ और साधु-संतों को लेके शूद्र और अंत्यज पर्यन्त एक पंक्ति में बैठ झूठा एक दूसरे का भोजन करते हैं।" (सत्यार्थ प्रकाश, पृष्ठ संख्या ३०२)

शचीन्द्र - यहाँ स्वामी दयानन्द जगन्नाथपूरी मंदिर की बात कर रहे हैं। एवं शूद्रों को "नीच" कहते हुए उनके मंदिर में फल-प्रसाद आदि लाने पर आपत्ति कर रहे हैं। एवं स्वामी जी को इस पर भी घोर आपत्ति है कि - "मंदिर परिसर में साधु-संत आदि 'शूद्र नीच लोगों' और अंत्यजों के साथ बैठकर भोजन क्यों करते हैं।"

स्वामी दयानन्द लिखते हैं -"किसी पंडित के पास संस्कृत पढ़ने के लिए गया। उसने उसका अपमान किया, कहा कि - हम जुलाहे को नहीं पढ़ाते। इसी प्रकार कई पंडितों के पास फिरा किन्तु किसी ने न पढ़ाया। तब ऊटपटांग भाषा बना कर जुलाहे आदि नीच लोगों को समझाने लगा।" (सत्यार्थ प्रकाश- पृष्ठ संख्या ३४०)

शचीन्द्र - यहाँ स्वामी दयानन्द कबीर की बात कर रहे हैं। ध्यान देने योग्य है कि - स्वामी जी यहाँ जुलाहे (कपड़ा बनाने वाले कारीगर समुदाय) को भी नीच लोग कहकर उनको नीच जाति का मान रहे हैं।

स्वामी दयानन्द लिखते हैं - " उनका (रोग आदि का) औषधसेवन और पथ्यादि उचित व्यवहार न करके उन झूठे, पाखण्डी, महामूर्ख, अनाचारी, स्वार्थी, भंगी, चमार, शूद्र, म्लेच्छादि पर भी विश्वासी होकर अनेक प्रकार के ढोंग, छल कपट और उच्छिष्ठ भोजन, डोरा, धागा आदि मिथ्या मन्त्र-यन्त्र बांधते-बंधवाते फिरते हैं।" (सत्यार्थ प्रकाश, पृष्ठ संख्या -३०)

शचीन्द्र - स्वामी दयानन्द इस कथन में भी "भंगी" "चमार" "शूद्र" शब्दों का प्रयोग करके इन्हें जाति ही मानकर इनके प्रति घृणा प्रकट कर रहे हैं।

सत्यार्थ प्रकाश में प्रश्न आता है कि - "मनुष्यमात्र के हाथ की हुई रसोई उस अन्न के खाने में क्या दोष है? क्योंकि ब्राह्मण से लेके चांडाल पर्यन्त के शरीर हाड़-मांस-चमड़े के हैं, और जैसा रुधिर ब्राह्मण के शरीर में है, वैसा ही चांडाल आदि के, पुनः मनुष्य मात्र के हाथ की पकी हुई रसोई के खाने में क्या दोष है?

स्वामी दयानन्द इसका उत्तर लिखते हैं - "दोष है, क्योंकि जिन उत्तम पदार्थों के खाने-पीने से ब्राह्मण और ब्राह्मणी के शरीर में दुर्गन्धादि दोष रहित रज-वीर्य उत्पन्न होता है वैसा चांडाल और चांडाली के शरीर में नहीं। क्योंकि चांडाल का शरीर दुर्गन्ध के परमाणुओं से भरा हुआ होता है वैसा ब्राह्मणादि वर्ण का नहीं। इसलिए ब्राह्मणादि उत्तम वर्णों के हाथ का खाना और चांडालादि नीच भंगी चमार आदि का न खाना। भला जब कोई तुम से पूछेगा कि जैसा चमड़े का शरीर माता, सास, बहन, कन्या, पुत्रवधू का है वैसा ही अपनी स्त्री का भी है तो क्या माता आदि स्त्रियों के साथ भी स्वस्त्री के समान बतावेंगे? तब तुम को संकुचित होकर चुप ही रहना पड़ेगा। जैसे उत्तम अन्न हाथ और सुख से खाया जाता है वैसे च खाया जा सकता है तो क्या मलादि भी खाओगे? क्या ऐसा भी कोई हो सकता है?" (सत्यार्थ प्रकाश, पृष्ठ संख्या २५४)

शचीन्द्र - स्वामी दयानन्द यहाँ ब्राह्मण और चांडाल आदि शूद्रों के शरीर का भेद बता रहे हैं। तथा "चांडाल आदि अंत्यज के साथ-साथ चमार, भंगी आदि का भी न खाने का आदेश कर रहे हैं। इसके लिए वे एक उत्तम उदाहरण भी दे रहे हैं। उनका कहना था कि शूद्र सेवा तो करे अर्थात नहा-धोकर शुद्ध होकर उच्च वर्ण के लिए भोजन तो बनाए लेकिन बनाते समय भी मुँह पर कपड़ा बाँध ले, ऐसा वे इसी पुस्तक में कहते हैं। किन्तु शूद्र के घर का खाना तथा शूद्र के बर्तनों में खाने का वे निषेध करते हैं - "शूद्र के पात्र तथा उसके घर का पका हुआ अन्न आपातकाल के बिना न खावें।" (सत्यार्थ प्रकाश - पृष्ठ संख्या २५०)

ये उपरोक्त सब कथन स्वामी दयानन्द की लिखी सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय संस्करण के ही हैं। जिसे कि आर्यसमाजी प्रामाणिक मानते हैं। अन्य भी अनेक तथ्य हैं पर इतने से ही बात सिद्ध होती है इसलिए यही दिए जा रहे हैं। बाकी अंतिम कथन स्वामी जी के सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम संस्करण से भी देते हैं --

स्वामी दयानन्द लिखते हैं - "धात्रीकर्म घर की स्त्रियाँ स्वयं करें, संतान पर इससे उत्तम संस्कार पड़ेंगे--लड़के-लड़की के उत्पन्न होते समय जो इस देश में नीच जाति की स्त्रियाँ, उत्तम घरों में जाकर नाड़ीछेदन और धात्री का काम करती हैं और उसके मुँह में उंगलियाँ डालती हैं, यह बहुत बुरी बात है। घर की स्त्रियों को चाहिए कि वह स्वयं करें जिनसे उसकी बुद्धि तीक्ष्ण होगी।" (सत्यार्थ प्रकाश , पृष्ठ संख्या ११९)

शचीन्द्र - हिन्दुओं में पूर्व में एक परम्परा थी, अनेक क्षेत्रों में आज भी है कि दाई का कार्य निम्न वर्ण की स्त्रियाँ ही किया करती थी, इस तरह वे उच्च वर्णों के घर में, इस प्रसन्नता के अवसर में सम्मिलित होती थीं और धन, वस्त्र, अनाज आदि उनको माँगे अनुसार मिला करता था। स्वामी दयानन्द यहाँ उन्हें "नीच जाति की स्त्रियाँ" बताते हुए, ऐसे अवसर पर दाई आदि कर्म उनसे कराने का निषेध करते हैं। स्वामी जी का मानना है कि, उन "नीच जाति की स्त्रियों के हाथों से", उच्च वर्ण के नवजात शिशु को स्पर्श किए जाने, मुँह में उंगली डालने से उत्तम संस्कारों के पड़ने में बाधा होगी और बुद्धि भी तीक्ष्ण नहीं होगी।

स्वामी दयानन्द के लिखे इन तथ्यों से स्पष्ट होता है कि -
(१) वे जातिभेद को ईश्वरकृत मानते थे। एवं भिन्न-भिन्न वर्णों के शरीर में भेद मानते थे।

(२) वे चार वर्णों के अतिरिक्त भी अन्य जो जातियाँ हैं, उन्हें भी स्वीकार करते थे और उन्हें भी ईश्वरकृत मानते थे।

(३) वे जातिभेद को देश के लिए आवश्यक और जातिभेद को न मानने से देश का बिगाड़ समझते थे।

(४) वे शूद्र, अंत्यज आदि जातियों के घर भोजन करना, उनके पात्रों में खाने का सर्वथा निषेध करते थे।

(५) वे छुआछूत के प्रबल समर्थक थे, शूद्र अंत्यज आदि जातियों को नीच मानने के साथ-साथ वे उनकी स्त्रियों को भी नीच मानने एवं उनका स्पर्श न करने का एवं उनके द्वारा धात्रीकर्म न कराने का आदेश देते थे।

(६) वे शूद्र, अंत्यज, चमार, भंगी आदि सबके लिए नीच सम्बोधन करते व इन्हें नीच मानते थे, उनके कथनों में इन जातियों के लिए अत्यंत घृणा स्पष्ट झलकती है।

अतः आर्यसमाजी जो प्रचार करते हैं कि - "स्वामी जी ने शूद्रों को वेद पढ़ने का अधिकार दिया" "स्वामी जी ने शूद्रों को यज्ञोपवीत का अधिकार दिया" "स्वामी जी ने शूद्रों को वर्णव्यवस्था में सबके समान माना" "स्वामी जी जातिवाद के घोर विरोधी थे"। "स्वामी जी केवल चार वर्ण मानते थे, जाति नहीं मानते थे" आदि-आदि। यह सब केवल और केवल झूठ है। 

और इस झूठ को सिद्ध करने के लिए समाजियों ने इन वाक्यों के अनेक विरोधी वाक्य स्वामी दयानन्द के ग्रंथों में उनके मरते ही प्रक्षिप्त किए। और उनके ग्रंथों से उपरोक्त प्रकार के कथनों को निकालना प्रारम्भ कर दिया। अपनी बातें जोड़नी प्रारम्भ कर दी। अनेक झूठी कहानियाँ बनाई, दुष्प्रचार किया। क्योंकि आर्यसमाज को एक पंथ के रूप में बनाकर, इनका उद्देश्य हिन्दुओं में जातीय विद्वेष फैलाना, हिन्दुओं के इन निम्न वर्णों के भीतर ब्राह्मण आदि उच्च वर्णों के प्रति घृणा भरना, इन जातियों में हिन्दुओं के साधु-संतों, आचार्यों तथा पुराण आदि शास्त्रों के प्रति घृणा भरना, देवी-देवताओं के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न करना था । ताकि वे आर्यसमाजी बनें, जिससे कि इनका पंथ मजबूत हो।

(पुस्तक - 'अनार्योंन्मूलन' का अंश, अध्याय 4- कलयुगी ऋषि ' )
✍️ शचीन्द्र शर्मा