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Sunday, 7 June 2026

आसपास के देवस्थल

हमारी भूमि पर ही कुछ ऐसे देव होते हैं जो तुरंत फल देते हैं।
इन्हें हम, हमारे माता पिता और दादाजी भी पूजते रहे होंगे।
इन्हें वही पसंद है जो हमें है।
जो लोक में प्रचलित है।
और बहुत जल्दी तुष्ट हो जाते हैं। तुरंत बड़े बड़े फल देते हैं।
पहले मै आर्य समाज के प्रभाव से इन्हें नहीं मानता था।
कई बार मजाक उड़ाता था।
लेकिन जैसे जैसे जीवन समझा, इन्हें भी समझा।
जीवन के कई वर्ष इस #समझने_की_व्यर्थता में गंवा दिए।
काश कि सीधे ही मां पिता के कहने पर श्रद्धाभाव से अर्चना करता रहता।
लेकिन आधुनिक इंटेलेक्चुअल व्यक्ति तभी मानता है जब स्वयं अनुभव कर ले।
गरज हमको है फिर भी एटीट्यूड ये रहता है कि "ए देवता! अपने को साबित कर!" 
देव शक्तियां ऐसे कार्य नहीं करती।
वे भाव की भूखी हैं।
उन्हें चाहिए पूर्ण समर्पण।
और ये जो कोई बड़े देवताओं वाले बड़े मंदिरों के उपासक हैं न, कई बार वे भी ऐसी गलतियां कर जाते हैं।
काशी में बाबा विश्वनाथ तो हैं ही लेकिन जनता भैरव जी से मांगती है।
जैसलमेर के किले में लक्ष्मीनाथ जी का मंदिर है लेकिन हारी बीमारी महारावल गिरधरसिंह जी को याद करते हैं।
आपके आसपास भी ऐसे ही देवस्थान होंगे, जो अपने से, भले से लगते होंगे।
कभी जाइये, अपने चित्त की व्यथा सुनाइये, परम्परा अनुसार पान सुपारी चढ़ा आइए।
यह भारत भूमि है, पता नहीं किस कण में कौनसी शक्ति छिपी है।
नमो तस्मै भूदेवाय।🙏🙏🙏🙏
#कुमारsचरित

Monday, 1 June 2026

दो जून की रोटी

                      'दो जून की रोटी' 
'दो जून की रोटी' (या 2 जून की रोटी) एक बेहद लोकप्रिय हिंदी/अवधी मुहावरा हैं। इसका अर्थ कैलेंडर की 2 जून की तारीख से बिल्कुल नहीं है।

इस मुहावरे का सीधा और सटीक अर्थ हैं 
" दो समय का भरपेट भोजन " 
( प्रातः और सायं का भोजन प्रसाद / खाना )
 
" जून " का अभिप्राय, अर्थ या तात्पर्य : अवधी भाषा में 'जून' का अर्थ 'समय' या 'वक्त' होता हैं ।
किसी गरीब या मजदूर के लिए दोनों वक्त का भोजन जुटाना एक बहुत बड़ा संघर्ष होता हैं। जब किसी को दोनों वक्त की रोटी नसीब हो जाती है, तो उसे 'दो जून की रोटी' मिलना कहा जाता है।

कवि  प्रभातकुमार"प्रभात" हापुड़ वालों ने इसका मार्मिक कविता के माध्यम से शब्द चित्रण किया हैं - 

दो जून की रोटी मांग रही, 
भूखे पेट की आग।
ज्वाला सी धधकती धरती, 
आसमां उगलता आग।
नंगे पांव, फटे वस्त्र,
जलता बदन,नहीं कहीं छांव
किंतु तनिक नहीं परवाह।
दो जून की रोटी मांग रही,
भूखे पेट की आग।
खाली कटोरा, खाली हाथ,
भूखे बच्चों की
सिसकती आवाज,
बस अब यही एक अरमान,
कभी सोए न भूखा,
किसी माँ का लाल।
दो जून की रोटी मांग रही
भूखे पेट की आग।



 (सोशल मिडिया ए आई एवं अंतर्जाल से संकलित) 
                        2 जून 2026 
                     वयं राष्ट्रे जागृयाम