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Tuesday, 14 July 2026

दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पेडी या ऑटले पर थोड़ी देर बैठते हैं।

बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि जब भी किसी मंदिर में दर्शन के लिए जाएं तो दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पेडी या ऑटले पर थोड़ी देर बैठते हैं। 
क्या आप जानते हैं इस परंपरा का क्या कारण है?

आजकल तो लोग मंदिर की पैड़ी पर बैठकर अपने घर की व्यापार की राजनीति की चर्चा करते हैं परंतु यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई। 

वास्तव में मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर के हमें एक श्लोक बोलना चाहिए। 
यह श्लोक आजकल के लोग भूल गए हैं। आप इस श्लोक को सुनें और आने वाली पीढ़ी को भी इसे बताएं। 
यह श्लोक इस प्रकार है – 

अनायासेन मरणम्,
बिना देन्येन जीवनम्।
देहान्त तव सानिध्यम्, 
देहि मे परमेश्वरम्।।

इस श्लोक का अर्थ है : 
🌹अनायासेन मरणम्... अर्थात् बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और हम कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर पड़े पड़े, कष्ट उठाकर मृत्यु को प्राप्त ना हो चलते फिरते ही हमारे प्राण निकल जाएं।

🌹 बिना देन्येन जीवनम्...
अर्थात् परवशता का जीवन ना हो मतलब हमें कभी किसी के सहारे ना पड़े रहना पड़े। जैसे कि लकवा हो जाने पर व्यक्ति दूसरे पर आश्रित हो जाता है वैसे परवश या बेबस ना हो। ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख के ही जीवन बसर हो सके।

🌹देहांते तव सानिध्यम...
अर्थात् जब भी मृत्यु हो तब भगवान के सम्मुख हो। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर जी उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए। उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले।

🙏🏻देहि में परमेशवरम्.... 
हे परमेश्वर ऐसा वरदान हमें देना।

यह प्रार्थना करें..... 
गाड़ी, लाडी, लड़का, लड़की, पति, पत्नी, घर, धन – यह नहीं माँगना है यह तो भगवान आप की पात्रता के हिसाब से खुद आपको देते हैं। 
इसीलिए दर्शन करने के बाद बैठकर यह प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए।

यह प्रार्थना है, याचना नहीं है। याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है जैसे कि घर, व्यापार, नौकरी, पुत्र, पुत्री, सांसारिक सुख, धन या अन्य बातों के लिए जो माँग की जाती है वह याचना है वह भीख है।

हम प्रार्थना करते हैं प्रार्थना का विशेष अर्थ होता है अर्थात् विशिष्ट, श्रेष्ठ। अर्थना अर्थात् निवेदन। ठाकुर जी से प्रार्थना करें और प्रार्थना क्या करना है, यह श्लोक बोलना है।

#सब_से_जरूरी_बात – 
जब हम मंदिर में दर्शन करने जाते हैं तो खुली आँखों से भगवान को देखना चाहिए, निहारना चाहिए। उनके दर्शन करना चाहिए। 
कुछ लोग वहाँ आँखें बंद करके खड़े रहते हैं। आँखें बंद क्यों करना हम तो दर्शन करने आए हैं। भगवान के स्वरूप का, श्री चरणों का, मुखारविंद का, श्रृंगार का, संपूर्णानंद लें। आँखों में भर लें स्वरूप को। दर्शन करें और दर्शन के बाद जब बाहर आकर बैठें तब नेत्र बंद करके जो दर्शन किए हैं उस स्वरूप का ध्यान करें। मंदिर में नेत्र नहीं बंद करना। बाहर आने के बाद पैड़ी पर बैठकर जब ठाकुर जी का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें और अगर ठाकुर जी का स्वरूप ध्यान में नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और भगवान का दर्शन करें। नेत्रों को बंद करने के पश्चात उपरोक्त श्लोक का पाठ करें।

यही शास्त्र है... 
यही बड़े बुजुर्गो का कहना है!!
...✍️ अनुराधा बरनवाल 

मन की नियमावली ( Manual Of Mind )

                         श्रीमद्भगवद्गीता 
                       मन की नियमावली 
                    ( Manual Of Mind )
           पक्ष और विपक्ष में हम क्यों खड़े होते हैं?

भगवान श्री कृष्ण इसका उत्तर देते हैं :-

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
       ( गीता - ३.३४ )

हमारा मन और बुद्धि सदैव सापेक्ष में काम करते हैं। 
सापेक्ष अर्थात तुलना में। नमक की तुलना मिठास से, दिन की तुलना रात से, आदि आदि। यह नियम है। ऐसे ही हमारा माइंड काम करता है। 

आधुनिक शब्दों में लाइक और डिसलाइक। हम जिसके भी संपर्क में आते हैं, जिनसे भी हमारा साक्षात्कार होता है - व्यक्ति, वस्तु, विचार या भाव, उनको हम या तो पसंद करते हैं या नापसंद। जिनके आप संपर्क में नहीं हैं, उनके लिए यह नियम नहीं लागू होता। 

तो पहली बात जिन विचारों को हम अपना मान लेते हैं वे हमसे नहीं निकले, वरन हमने किसी न किसी से उधार ले रखा है। परंतु उनसे तादात्म्य के कारण हम उन्हें अपना मान बैठते हैं।

और विचार वाष्प की भांति हैं बादल की भांति - उड़ते हुए, हजारों लाखों की संख्या में प्रतिदिन विचार हमारे मन में मंडराते रहते हैं। 

फिर बात आती है भाव की, इमोशन्स की। इमोशन विचारों के घनीभूत रूप हैं, पानी जैसा। आप पहले किसी को पसंद या नापसंद करते हैं। फिर कुछ ऐसा होता है कि आप उसे अधिक पसंद या नापसंद करने लगते हैं। और फिर और अधिक, और अधिक। एक समय आता है कि आपको लगता है कि आप उसके बिना जी ही नहीं सकते। 
लेकिन कब तक ऐसा होगा? जब तक वह आपकी अपेक्षाओं के अनुकूल व्यवहार करता है।

देखा है न - सारे समाज और अपने परिवार से द्रोह करके - प्रेम विवाह किया। लेकिन फिर कुछ वर्ष बाद - झंझट झगड़ा शुरू हुआ, और फिर विवाह विच्छेद। जिनके बिना कभी जी नहीं सकते थे, उनके साथ अब जीना संभव नहीं है। 

ठीक ऐसा ही नियम डिसलाइक या नापसंदगी के साथ भी होता है। 

विचार और भाव के स्तर पर हमारे अंदर बदलाव संभव है। जिनको हम पसंद करते थे, उनको कल हम नापसंद कर सकते हैं। जिनके बिना हम जी नहीं सकते थे, उनके साथ जीना जहर के घूंट पीने जैसा लग सकता है।

तीसरे स्तर पर है - अवधारणा - firm believe. एक विचार या विचारधारा से इस तरह चिपक जाना, जैसे बंदरिया का बच्चा अपनी मां से चिपक जाता है। मर जाएगा लेकिन छोड़ेगा नहीं। किसी विचार या भाव को अंतिम सत्य मानकर उसके साथ खड़े होना। प्राण प्रण के साथ। जीवन और मृत्यु को अलग रखकर। अब जो विचार वाष्प से पानी बना था, अब बर्फ बन चुका है। बर्फ कहना भी गलत होगा - हिमखंड कहिए, जो पिघलता नहीं है। पत्थर, शिलालेख। 
जो टस से मस नहीं हो सकता। प्राणों का बलिदान स्वीकार है परंतु विचारधारा को खंडित नहीं होने देंगे। 

प्रायः विचार, विचारधाराओं को, इसी तरह स्थापित किया जाता है, आपके मन में आपकी पहचान बनाकर। 
तभी तो कोई व्यक्ति, भिन्न मत और विचारधारा वालों की हत्या करने हेतु, स्वयं को बम बनाकर आत्महत्या कर लेता है। 
हम प्रतिदिन न सही वर्ष में सैकड़ो दिन इन घटनाओं का साक्षात्कार करते हैं। 

उन्हीं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है यह। 

कहने का तात्पर्य है कि राग और द्वेष हमारे मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति हैं, लेकिन इन्हीं के कारण हम निरंतर पक्ष और विपक्ष में बंटे रहते हैं। हम सापेक्षता (तुलना) में जीते हैं — Like-Dislike, पसंद-नापसंद, प्रेम-घृणा। धीरे-धीरे हल्के विचार भावनाओं में, और भावनाएँ कठोर विश्वासों में बदल जाते हैं। यही विश्वास हमें इतना अंधा बना देते हैं कि हम अपने पक्ष के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाते हैं।परिणाम?
व्यक्तिगत जीवन में तनाव, रिश्तों में टूटन, और सामाजिक स्तर पर द्वेष, हिंसा तथा विभाजन।
सच्चा समाधान गीता हमें यही सिखाती है —
राग-द्वेष को जानो, लेकिन उनके वश में मत आओ।
इन्हें अपने शत्रु समझकर उनसे ऊपर उठो। जब मन राग-द्वेष से मुक्त होता है, तभी वह सच्ची शांति और स्पष्ट बुद्धि प्राप्त करता है।

         .... ✍️ साभार - भगवद्गीता समूह
                       वयं राष्ट्रे जागृयाम 

किसी संप्रदाय को वैदिक संप्रदाय माना जाए या नहीं ?

कुछ लोगों ने यह प्रश्न किया है कि किसी संप्रदाय को वैदिक संप्रदाय माना जाए या नहीं? अर्थात् वह श्रौत–स्मार्त परम्परा की अविच्छिन्न एवं अखण्ड परम्परा है या नहीं—इसकी पहचान कैसे की जाए? इसका संक्षिप्त उत्तर इस प्रकार है—

यदि कोई भी संप्रदाय स्वयं को वैदिक संप्रदाय कहता है, तो निम्नलिखित बातें स्पष्ट होनी चाहिए—

1. उसकी अपनी वेदशाखा (मन्त्र एवं ब्राह्मण) कौन-सी है? यह स्पष्ट होना चाहिए।
2. उसका गृह्यसूत्र और श्रौतसूत्र कौन-सा है, जिनके आधार पर जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कार, नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य कर्म तथा श्रौतयज्ञ सम्पन्न होते हैं? यह भी स्पष्ट होना चाहिए।
3. उस संप्रदाय के अनुयायियों द्वारा धारण किए जाने वाले तिलक, माला तथा जप आदि नित्यकर्मों का विधान वेद, वेदाङ्ग, गृह्यसूत्र अथवा श्रौतसूत्र में कहाँ किया गया है? इसका भी स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत होना चाहिए।

जैसे हम शुक्लयजुर्वेदीयों का संप्रदाय आदित्यब्रह्म संप्रदाय है। हमारा गृह्यसूत्र महर्षि कात्यायनकृत पारस्करगृह्यसूत्र तथा हमारा श्रौतसूत्र कात्यायनश्रौतसूत्र है। हमारे धार्मिक कर्मकाण्ड मुख्यतः इन्हीं तथा इनके अन्य परिशिष्ट ग्रन्थों के आधार पर सम्पन्न होते हैं।

इसी प्रकार आज समाज में वैष्णव नाम से अनेक संप्रदाय प्रचलित हैं। उनमें से अधिकांश को अपने मूल आधार का ही ज्ञान नहीं है; वे जिस परम्परा में हैं, उसकी मूल जड़ क्या है, यह भी उन्हें स्पष्ट नहीं है।

वैष्णव संप्रदायों में श्रौत–स्मार्त परम्परा से सम्बद्ध केवल एक ही संप्रदाय है—कृष्णयजुर्वेदीय वैखानस वैष्णव संप्रदाय।

अन्य वैष्णव संप्रदाय, जैसे—पाञ्चरात्र (श्रीवैष्णव), माध्व, निम्बार्क, गौड़ीय, रामानन्दी आदि तथा बाद में उत्पन्न हुए अन्य वैष्णव संप्रदाय, वैदिक मूलधारा से बाहर के अर्थात् तन्त्र, आगम और पौराणिक परम्परा पर आधारित संप्रदाय हैं। यदि वे स्वयं को वैदिक सिद्ध करना चाहते हैं, तो वे प्रमाण सहित यह प्रस्तुत करें कि उनके नित्य धार्मिक अनुष्ठान किस गृह्यसूत्र और श्रौतसूत्र के अनुसार सम्पन्न होते हैं। इस विषय पर शास्त्रार्थ के लिए मंच खुला है।

जिन लोगों को वेदशाखाओं और सूत्रपरम्परा का समुचित परिचय नहीं है, उनके किसी संप्रदाय में दीक्षित होने पर कोई आपत्ति नहीं है; क्योंकि ईसाई या मुसलमान बनने की अपेक्षा हिन्दू सनातन परम्परा में रहकर किसी भी प्रकार के अध्ययन, भजन और भक्ति के मार्ग पर चलना निश्चय ही प्रशंसनीय है।

किन्तु वे लोग जिन्होंने वेदमार्ग का परित्याग कर विविध नवीन संप्रदायों का आश्रय लिया, वैदिक श्रौत–स्मार्त राजमार्ग से हटकर आगम आदि पर आधारित मार्ग अपनाया, वे यदि मूल वैदिक श्रौत–स्मार्त परम्परा के अनुयायियों से यह कहें कि वे अपने कुलाचार का त्याग कर उनके संप्रदाय में सम्मिलित हों और दीक्षा लें, तो यह अत्यन्त निन्दनीय तथा कुलघातक बात है।

नमो रुद्राय!
✍️ निरंजन सुवेदी