Pages

Monday, 9 February 2026

तेलिया कंद

तेलिया कन्द
(नीचे के प्रयोग तंत्र ग्रंथों के अनुसार हैं कितना सत्य है कितना असत्य है प्रयोग करने पर ही पता चलेगा)

यह बहुत चमत्कारिक वनौषधि है और भाग्यशाली लोगों को ही प्राप्त होती है। इसकी उत्पत्ति गिरनार, हिमालय तथा आबू आदि पर्वतीय क्षेत्रों में होती है। इसके पत्ते कनेर के पत्तों की भाँति चिकने तथा पृथ्वी की ओर झुके रहते हैं। इन पत्तों के ऊपर काले तिलों की भाँति छींटे-से पड़े होते हैं। यह एक बड़ी महत्त्वपूर्ण वनस्पति है और इसी के विषय में सभी शास्त्र मौन हैं। इसे प्रत्येक भाषा में तेलिया कन्द ही कहा जाता है क्योंकि इसके पत्ते पर जैसे तेल चुपड़ा गया हो, इस भाँति चिकनापन तथा चमक होती है। इसके तने के पास पृथ्वी लगभग एक मीटर के व्यास तक इस भाँति की होती है जैसे कई लीटर तेल गिरा दिया गया हो। यह पौधा बड़ा चमत्कारिक, प्राप्त करने में खतरनाक तथा देखने में दुर्लभ है।

तन्त्र में गोपनीयता अत्यन्त आवश्यक होती है शायद इसी कारण इसके विषय में सभी मौन हैं। इस पौधे की जड़ का प्रयोग किया जाता है। जब यह पौधा आपको मिले तो स्वयं उखाड़ने के बदले एक बकरी, खरगोश या लोमड़ी का प्रयोग करें। मेरी समझ से बकरी ही उचित रहेगी। यदि बरसात के दिन हों तो इसके तने में पतली तथा मजबूत रस्सी बाँध कर बकरी के गले में बाँध कर उसे हाँक दें। बकरी भागेगी तो यह पौधा भी साथ ही खिंच जायेगा। चूँकि इसकी जमीन मुलायम होती है अतः यह जड़ समेत निकल आता है। इस वृक्ष की जड़ में एक सर्प होता है जो कि जड़ के निकलते ही जड़ की तरफ भागता है और क्रोधित होकर जिसे भी पाता है, उसे लगातार काटता ही रहता है। यही कारण है कि यह वनस्पति प्राप्त करना खतरनाक है। दुर्लभइसलिये है कि यह बड़े भाग्य से ही दर्शित होती है।

दक्षिण भारत तथा मध्य भारत की पर्वत श्रृंखला के दुर्गम क्षेत्रों में भी तेलिया कन्द की उत्पत्ति होती है। इस पौधे से काले रंग का कुछ तरल पदार्थ बहता है जिसमें कि बहुत चिकनायी होती है। यदि भाग्यवश यह आपको मिल जाये या दिख जाय तो सावधानी से प्राप्त करें और इसको अभिमंत्रित कीजिये।

.....................

पारा

तेलिया कन्द का रस निकाल कर पारे के साथ खरल में मर्दन करने से बीस मिनट में ही पारा ढीला होकर मर जाता है।यह ढीला रहता है अतः मनचाही शक्ल दे सकते हैं।

गोली

तेलिया कन्द को छोटे-छोटे टुकड़े करके गोली की भाँति कर लें और चन्द्रमा की चाँदनी में सुखायें। जब यह सूख जाय तो एक गिलास दूध में गोली डाल कर दस मिनट रुकें। इसके बाद गोली निकाल कर दूध पी जायें। यह दूध सभी रोगों को नाश करके शरीर को हरा-भरा करता है।

सोना

ताँबे को गरम करके तेलिया कन्द के रस में डुबा दें। ठण्डा होने पर निकालें और ताँबे के स्थान पर शुद्ध सोना ले लें। क्योंकि यह ताँबा सोना हो जाता है। अतः जितना ताँबा होगा उतना ही सोना बनेगा।

रसायन

तेलिया कन्द को कूट-पीस कर गाय के दूध के साथ खाने पर वृद्ध भी तरुण होकर वृद्धता खो देता है।

पारस

मेरा विचार है कि जहाँ पर तेलिया कन्द होता है। इसी प्रभाव क्षेत्र में अर्थात तेलीय क्षेत्र में या इसकी जड़ के पास रहने वाला पत्थर पारस के गुण ग्रहण कर लेता है।

ताबीज

तेलिया कन्द को स्वर्ण के ताबीज में भर करके कण्ठ में धारण करने से भूत, पिशाचादि का भयं नहीं होता। धन की कभी कमी नहीं होती। देह निरोग रहती है। मन प्रसन्न रहता है।

तेलिया कन्द के और भी बहुत से तान्त्रिक प्रयोग होते हैं परन्तु यह दुर्लभ होने के कारण इसके विषय में विस्तृत वार्ता नहीं कर रहा।

नोट 🚫 उपर्युक्त वनस्पति और उसके प्रयोग का मेरा कोई निजी अनुभव नहीं है क्योंकि ये मुझे कभी प्राप्त नहीं हुई अतः किसी भी सज्जन को इनके प्रयोग करना हो स्वयं कीजिये कितने प्रमाणिक है या नहीं 

प्राचीन शाबर पद्धति के शाबर मंत्रों की साधनाओं के लिए टेलीग्राम ग्रुप से जुड़े
👇
(https://t.me/sabar_mantravali टेलीग्राम ग्रुप से जुड़े )

चेतावनी- शाबर मंत्रावली का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबधित जानकारी प्रदान करना है शाबर मंत्रावली की पोस्टों को पढ़कर यदि कोई व्यक्ति किसी मंत्र तंत्र यंत्र,टोने-टोटके, गण्डे, तावीज अथवा नक्श आदि का प्रयोग करता है और उससे उसे कोई लाभ नहीं होता या फिर किसी वजह से नुकसान होता है, तो उसकी जिम्मेदारी हमारी या फेसबुक बेबसाइट की कतई नहीं होगी क्योंकि हमारा उद्देश्य केवल विषय से परिचित कराना है।मंत्र तंत्र यंत्र की साधना और किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श लें
श्री नाथजी गुरूजी
की चरण कमल पादुका
को आदेश

कस्तूरी

कस्तूरी 

तन्त्र प्रयोगों में कस्तूरी का एक विशेष स्थान है और ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं होगा जो कि इसके विषय में जानता न हो परन्तु यह असली मिलती ही नहीं। इसी कारण तन्त्र प्रयोग करने पर इससे मिलने वाले लाभ प्रश्न ही बने रहते हैं।

कस्तूरी प्रायः सर्वत्र उपलब्ध है और कस्तूरी कहने मात्र से पन्सारी दे देता है। यह असली है या नकली ? यह प्रश्न बना ही रहता है क्योंकि इसके विषय में बहुत अधिक किसी को मालूम नहीं रहता और न ही कोई बताता है।

कस्तूरी एक विशेष प्रकार के हिरण के निश्राववाही का सूखा हुआ रस है। यह विशेष प्रकार का हिरण लगभग आठ हजार फुट की ऊँचाई पर पाया जाता है। मुख्यतः यह मृग हिमालय, दार्जिलिंग, नेपाल, आसाम, चीन तथा सोवियत देश में अधिकता से पाया जाता है। कस्तूरी नामक कीमती औषधि केवल पुरुष जाति के हिरण में ही बनती है। इसकी महक की दीवानी होकर स्त्री जाति की हिरणी पुरुष हिरण के पास आकर दीवानेपन में उससे विषय-भोग करती है। कस्तूरी का पूर्ण निर्माण हो जाने के पश्चात हिरण के शरीर में लगभग एक महीने तक ही रहती है। इसी एक महीने में हिरण को पकड़ करके कस्तूरी प्राप्त की जाती है। इस एक महीने के पश्चात कस्तूरी प्राप्त नहीं होती। हिरण के बच्चों में कस्तूरी नहीं होती। इनके बच्चे जब दो बर्ष के हो जाते हैं तब लगभग डेढ़ से तीन तोला तक कस्तूरी बनती है। यह कस्तूरी इस हालत में होती है कि इसका प्रयोग नहीं किया जाता। जब हिरण पूरी तरह जवान हो जाता है तब इसमें लगभग डेढ़ औंस से लेकर कम-से-कम दो औंस तक कस्तूरी पायी जाती है। इस विवरण के अलावा भी प्रत्येक हिरण में एक से डेढ़ इन्च के व्यास वाली गोल या चौकोर थैली में बन्द होती है। इस थैली के ऊपर का धरातल कुछ चिकना तथा चपटा होता है। इसी पर कुछ सख्त बाल होते हैं। इस थैली का थोड़ा-सा मुख रहता है। कुछ विद्वानों का विचार है कि कस्तूरी की ही भाँति का कुछ है जो अन्य जानवरों से भी प्राप्त किया जाता है।जैसे कि

एक साँड होता है जिसे कि ओबीबस मस्केटस कहते हैं। इस साँड के सारे शरीर से कस्तूरी की महक आती है।

एक बत्तख होती है जिसे कि अनास मस्काटा कहते हैं। इसमें कस्तूरी की तीव्र महक पायी जाती है।

एक बकरा होता है जिसे कि कपरा आइवेक्स कहते हैं। इसके रक्त से कस्तूरी की महक आती है।

एक और हिरण होता है जिसे कि एन्टीकोप डोर्क्स के नाम से जानते हैं। इसके रक्त से कस्तूरी की तीव्र महक आती है।

एक मगरमच्छ होता है जिसे कि क्रोको डिप्लस वेल्ोरिस कहते हैं। इसके शरीर से तो कस्तूरी की शानदार महक आती है।

उपरोक्त विवरण से आप समझ रहे होंगे कि यदि इनका रक्त सुखा करके बेचा जाय तो कस्तूरी कही जा सकती है जबकि कस्तूरी के अन्य गुण इनमें नहीं होते हैं।

बाजार में मुख्यतः तीन भाँति की कस्तूरी आती है-

१. रूस की कस्तूरी,

२. आसाम की कस्तूरी (इसे कामरूप कस्तूरी भी कहते हैं),

३. चीन की कस्तूरी।

आइये कस्तूरी पहचाने

एक गिलास में पानी भर करके कस्तूरी का एक दाना इसमें गिरा दें। यह दाना पानी में जाकर गिलास के तले पर जाकर बैठ जाये और गले या ढीला न हो तो कस्तूरी को असली समझें।

एक अंगीठी में कोयले दहकायें। कुछ अंगारे लेकर कस्तूरी का एक दाना अंगारे के ऊपर डाल दें। यदि यह कस्तूरी का दाना जलकर राख हो जाये तो कस्तुरी नकली जानना चाहिये। यदि कस्तूरी का दाना अंगारे पर पिघल करके बुलबुले छोडे तो कस्तूरी को असली जानें।

एक धागे को हींग से भिंगो करके तर कर लें। कस्तूरी को लेकर इसके बीच से धागा गुजार करके निकालें। यदि हींग की महक बनी रहे तो कस्तूरी को नकली समझें। मेरे विचार से इस प्रयोग को करने से असली कस्तूरी की परख नहीं होगी। क्योंकि कस्तूरी जब बाजार में बिकती है तब अपनी महक खो देती है और जब महक न होगी तो हींग की महक को मारेगा कौन ? यदि आपको कोई महकती हुई कस्तूरी दे तो आप यह प्रयोग करके असल नकल का भेद जान सकते हैं।

एक पदार्थ होता है जिसका कि नाम ट्रिनीट्रोब्यूटिल टोलबल है। इस पदार्थ की महक कस्तूरी की भाँति होती है और यह महक अधिक समय तक टिकती है।

कस्तूरी भारी होती है।

कस्तूरी छूने में चिकनी होती है।

कस्तूरी कपड़े में रखने से कपड़ा पीला हो जाता है।

कस्तूरी प्राप्त करने के लिये हिरण को मार करके उसकी नाभि काट लेते हैं। इस हिस्से को कस्तूरी नाभा कहते हैं।
कस्तूरी मक्का के चून की भाँति होती है। यह तिलों की भाँति भी होती है। यह कुलथ के बीज की भाँति भी होती है। यह मटर के दाने के भाँति भी होती है। कहीं-कहीं पर यह इलायची के दानों की भाँति पायी जाती है।कस्तूरी को तन्त्र प्रयोगों में अनगिनत कार्यों में लिया जाता है। मन्त्र लिखने के लिये इसकी परम आवश्यकता पड़ती है।

नोट 🚫 उपर्युक्त वनस्पति और उसके प्रयोग का मेरा कोई निजी अनुभव नहीं है क्योंकि ये मुझे प्राप्त नहीं हुई,अतः किसी भी सज्जन को इनके प्रयोग करना हो स्वयं कीजिये कितने प्रमाणिक है या नहीं 

प्राचीन शाबर पद्धति के शाबर मंत्रों की साधनाओं के लिए टेलीग्राम ग्रुप से जुड़े
👇
(https://t.me/sabar_mantravali टेलीग्राम ग्रुप से जुड़े )

चेतावनी- शाबर मंत्रावली का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबधित जानकारी प्रदान करना है शाबर मंत्रावली की पोस्टों को पढ़कर यदि कोई व्यक्ति किसी मंत्र तंत्र यंत्र,टोने-टोटके, गण्डे, तावीज अथवा नक्श आदि का प्रयोग करता है और उससे उसे कोई लाभ नहीं होता या फिर किसी वजह से नुकसान होता है, तो उसकी जिम्मेदारी हमारी या फेसबुक बेबसाइट की कतई नहीं होगी क्योंकि हमारा उद्देश्य केवल विषय से परिचित कराना है।मंत्र तंत्र यंत्र की साधना और किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श लें
श्री नाथजी गुरूजी
की चरण कमल पादुका
को आदेश

Sunday, 8 February 2026

क्षिरणी (खिरनी) वृक्ष का महत्व।

#क्षिरिणी के पेंड़ विलुप्त होते जा रहे हैं। 
इसके वृक्ष विशालकाय एवं विशाल शाखा प्रशाखाओं वाले होते हैं। 
इसे #राजदान भी कहा जाता है 
क्योंकि यह 
#राजा-#महाराजाओं का #प्रिय #फल था और इसीलिए इसका नाम #राजदान पड़ा। 
आम बोलचाल की भाषा में इसे #खिरनी कहा जाता है। 
इसके फल #पौष्टिक गुणों से भरपूर होते हैं। 
इसके #फलों_में_दूध होता है। 
इसके #तने_से_गोंद भी निकलता है जो विभिन्न आयुर्वेद की औषधियों के निर्माण में प्रयुक्त होता है। 
पुरुषों के #शुक्र_दौर्बल्य के लिए यह #अनोखा_फल है। 
इस पेंड़ के संरक्षण की आवश्यकता है क्योंकि अब यह पेंड़ विलुप्ति के कगार पर हैं। 
हमारे विद्यालय के सामने गुलाबबाड़ी में इसके बहुत पेंड़ थे जो अब नहीं दिखाई देते। 
🌹हरे कृष्ण 🌹
Dr. Rajpoot ~ 9452 319 885
साभार - आधुनिक आयुर्वेद 

वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Saturday, 7 February 2026

त्रिया चरित्र ..

      एक प्यासा आदमी एक कुएं के पास जल पीने गया।
जहां एक  जवान_औरत पानी भर रही थी। उस आदमी ने औरत से थोड़ा जल पिलाने के लिए कहा खुशी से उस औरत ने उसे जल पिलाया। 
      जल पीने के बाद उस आदमी ने औरत से पूछा कि आप मुझे औरतों की त्रिया चरित्र के बारे में कुछ बता सकती है ?

इतना कहने पर वह औरत जोर जोर से चिल्लाने लगी -
 " बचाओ...! बचाओ...!! "

        उसकी आवाज सुनकर गांव के लोग कुए की तरह दौड़ने लगे तो उस आदमी ने कहा कि आप ऐसा क्यों कर रही है, तो उस औरत ने कहा ताकि गांव वाले आए और आपको खूब पीटें और इतना पीटे की आपके होश ठिकाने लग जाए। 

      यह बात सुनकर उस आदमी ने कहा मुझे क्षमा करें, मैं तो आपको एक भली और इज्जतदार औरत समझ रहा था। 
     तभी उस औरत ने कुएं के पास रखा मटके का सारा पानी अपने शरीर पर डाल लिया और अपने शरीर को पूरी तरह भींगा डाला।  इतने देर में गांव वाले भी कुएं के पास पहुंच गए।
गांव वालों ने उस औरत से पूछा कि - " क्या हुआ ? "
औरत ने कहा - " मैं कुएं में गिर गई थी इस भले आदमी ने मुझको बचा लिया। यदि यह आदमी यहां नही रहता तो आज मेरी जान चली जाती। "
गांव वालों ने उस आदमी की बहुत तारीफ की और उसको कंधों पर उठा लिया। उसका खूब आदर सत्कार किया और उसको इनाम भी दिया।
    जब गांव वाले चले गए तो औरत ने उस आदमी से कहा कि -
    "अब समझ में आया औरतों का त्रिया चरित्र??? "

       अगर आप औरत को दुःख देंगे और उसे परेशान करेंगे तो वह आपका सब सुख- चैन छीन लेगी और अगर आप उसे खुश रखेंगे तो वह आपको मौत के मुंह से भी निकाल लेगी,,,
                                 🙏🙏
                 साभार - एक कहानी सुंदर सी
                         वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Friday, 6 February 2026

अप्सराएँ : नर्तकी या देवियां ?

अप्सराएँ 

हिन्दू धर्म में अप्सराएँ सौंदर्य का प्रतीक मानी जाती है और बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। अप्सराओं से अधिक सुन्दर रचना और किसी की भी नहीं मानी जाती। पृथ्वी पर जो कोई भी स्त्री अत्यंत सुन्दर होती है उसे भी अप्सरा कह कर उनके सौंदर्य को सम्मान दिया जाता है। कहा जाता है कि देवराज इंद्र ने अप्सराओं का निर्माण किया था। कई अप्सराओं की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा ने भी की थी जिनमे से तिलोत्तमा प्रमुख है। इसके अतिरिक्त कई अप्सराएं महान ऋषिओं की पुत्रियां भी थी। भागवत पुराण के अनुसार अप्सराओं का जन्म महर्षि कश्यप और दक्षपुत्री मुनि से हुआ था। कामदेव और रति से भी कई अप्सराओं की उत्पत्ति बताई जाती है।

अप्सराओं का मुख्य कार्य इंद्र एवं अन्य देवताओं को प्रसन्न रखना था। विशेषकर गंधर्वों और अप्सराओं का सहचर्य बहुत घनिष्ठ माना गया है। गंधर्वों का संगीत और अप्सराओं का नृत्य स्वर्ग की शान मानी जाती है। अप्सराएँ पवित्र और अत्यंत सम्माननीय मानी जाती है। अप्सराओं को देवराज इंद्र यदा-कड़ा महान तपस्वियों की तपस्या भंग करने को भेजते रहते थे। पुराणों में ऐसी कई कथाएं हैं जब किसी तपस्वी की तपस्या से घबराकर, कि कहीं वो त्रिदेवों से स्वर्गलोक ही ना मांग लें, देवराज इंद्र ने कई अप्सराओं को पृथ्वी पर उनकी तपस्या भंग करने को भेजा।

अप्सराओं का सौंदर्य ऐसा था कि वे सामान्य तपस्वियों की तपस्या को तो खेल-खेल में भंग कर देती थी। हालाँकि ऐसे भी महान ऋषि हुए हैं जिनकी तपस्या को अप्सरा भंग ना कर पायी और उन्हें उनके श्राप का भाजन करना पड़ा। महान ऋषियों में से एक महर्षि विश्वामित्र की तपस्या को रम्भा भंग ना कर पायी और उसे महर्षि के श्राप को झेलना पड़ा किन्तु बाद में वही विश्वामित्र मेनका के सौंदर्य के आगे हार गए। उर्वशी ने भी कई महान ऋषियों की तपस्या भंग की किन्तु मार्कण्डेय ऋषि के समक्ष पराजित हुई।

अप्सराओं को उपदेवियों की श्रेणी का माना जाता है। वे मनचाहा रूप बदल सकती हैं और वरदान एवं श्राप देने में भी सक्षम मानी जाती है। कई अप्सराओं ने अनेक असुरों और दैत्यों के नाश में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। इसमें से तिलोत्तमा का नाम उल्लेखनीय है जो सुन्द-उपसुन्द की मृत्यु का कारण बनी। रम्भा को कुबेर के पुत्र नलकुबेर के पास जाने से जब रावण रोकता है और उसके साथ दुर्व्यहवार करता है तब वो रावण को श्राप देती है कि यदि वो किसी स्त्री को उसकी इच्छा के बिना स्पर्श करेगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। उसी श्राप के कारण रावण देवी सीता को उनकी इच्छा के विरुद्ध स्पर्श ना कर सका। उर्वशी ने अर्जुन को १ वर्ष तक नपुंसक रहने का श्राप दिया था। 

पुराणों में कुल १००८ अप्सराओं का वर्णन है जिनमे से १०८ प्रमुख अप्सराओं की उत्पत्ति देवराज इंद्र ने की थी। उन १०८ अप्सराओं में भी ११ अप्सराओं को प्रमुख माना जाता है। उन ११ अप्सराओं में भी ४ अप्सराओं का सौंदर्य अद्वितीय माना गया है। ये हैं - रम्भा, उर्वशी, मेनका और तिलोत्तमा। रम्भा सभी अप्सराओं की प्रधान और रानी है। कई अप्सराएं ऐसी भी हैं जिन्हे पृथ्वीलोक पर रहने का श्राप मिला था जैसे बालि की पत्नी तारा, दैत्यराज शम्बर की पत्नी माया और हनुमान की माता अंजना।

अप्सराएँ दो प्रकार की मानी गयी हैं:
दैविक: ऐसी अप्सराएँ जो स्वर्ग में निवास करती हैं। रम्भा सहित मुख्य ११ अप्सराओं को दैविक अप्सरा कहा जाता है। 
लौकिक: ऐसी अप्सराएँ जो पृथ्वी पर निवास करती हैं। जैसे तारा, माया, अंजना इत्यादि। इनकी कुल संख्या ३४ बताई गयी है। 
अप्सराओँ को सौभाग्य का प्रतीक भी माना गया है। कहते हैं अप्सराओं का कौमार्य कभी भंग नहीं होता और वो सदैव कुमारी ही बनी रहती है। समागम के बाद अप्सराओं को उनका कौमार्य वापस प्राप्त हो जाता है। उनका सौंदर्य कभी क्षीण नहीं होता और ना ही वे कभी बूढी होती हैं। उनकी आयु भी बहुत अधिक होती है। मार्कण्डेय ऋषि के साथ वार्तालाप करते हुए उर्वशी कहती है - हे महर्षि! मेरे सामने कितने इंद्र आये और कितने इंद्र गए किन्तु मैं वही की वही हूँ। जब तक १४ इंद्र मेरे समक्ष इन्द्रपद को नहीं भोग लेते मेरी मृत्यु नहीं होगी।

ये भी जानने योग्य है कि भारतवर्ष का सर्वाधिक प्रतापी पुरुवंश स्वयं अप्सरा उर्वशी की देन है। उनके पूर्वज पुरुरवा ने उर्वशी से विवाह किया जिससे आगे पुरुवंश चला जिसमे ययाति, पुरु, यदु, दुष्यंत, भरत, कुरु, हस्ती, शांतनु, भीष्म और श्रीकृष्ण पांडव जैसे महान राजाओं और योद्धाओं ने जन्म लिया। उन्ही के दूसरे वंशबेल में इक्षवाकु कुल में भगवान श्रीराम ने जन्म लिया। अन्य संस्कृतियों में जैसे ग्रीक धर्म में भी अप्सराओं का वर्णन है। इसके अतिरिक्त कई देशों जिनमे से इंडोनेशिया, कम्बोडिया, चीन और जावा में अप्सराओं का बहुत प्रभाव है।

आइये मुख्य अप्सराओं और उनके मन्त्रों के विषय में जानते हैं:
प्रधान अप्सरा - रम्भा: ॐ सः रम्भे आगच्छागच्छ स्वाहा
३ सर्वोत्तम अप्सराएँ:
उर्वशी: ॐ श्री उर्वशी आगच्छागच्छ स्वाहा
मेनका
तिलोत्तमा: ॐ श्री तिलोत्तामे आगच्छागच्छ स्वाहा
७ प्रमुख अप्सराएँ:
कृतस्थली
पुंजिकस्थला
प्रम्लोचा
अनुम्लोचा
घृताची
वर्चा
पूर्वचित्ति
अन्य प्रमुख अप्सराएँ:
अम्बिका
अलम्वुषा
अनावद्या
अनुचना
अरुणा
असिता
बुदबुदा
चन्द्रज्योत्सना
देवी
गुनमुख्या
गुनुवरा
हर्षा
इन्द्रलक्ष्मी
काम्या
कांचन माला: ॐ श्री कांचन माले आगच्छागच्छ स्वाहा
कर्णिका
केशिनी
कुण्डला हारिणि: ॐ श्री ह्रीं कुण्डला हारिणि आगच्छागच्छ स्वाहा
क्षेमा
लता
लक्ष्मना
मनोरमा
मारिची
मिश्रास्थला
मृगाक्षी
नाभिदर्शना
पूर्वचिट्टी
पुष्पदेहा
भूषिणि: ॐ वाः श्री वाः श्री भूषिणि आगच्छागच्छ स्वाहा
रक्षिता
रत्नमाला: ॐ श्री ह्रीं रत्नमाले आगच्छागच्छ स्वाहा
ऋतुशला
साहजन्या
समीची
सौरभेदी
शारद्वती
शुचिका
सोमी
सुवाहु
सुगंधा
सुप्रिया
सुरजा
सुरसा
सुराता
शशि: ॐ श्री शशि देव्या मा आगच्छागच्छ स्वाहा
उमलोचा
साभार - चरणामृत 
https://www.facebook.com/share/16jZ8asNUM/

बेटा नहीं सिर्फ वारिस...

“28 लाख का चेक और बेटे की नंगी सच्चाई”

“पापा…
अब और कितनी देर?
इतना छोटा सा अमाउंट है और पूरा बैंक सिर पर उठा रखा है।
किस फालतू बैंक में अकाउंट खुलवाया था आपने?”
पूरा हॉल सुन रहा था लोगों की नज़रें झुकीं,
लेकिन बुजुर्ग पिता की नजरें जमीन में गड़ गईं।

“दो मिनट…
बस दो मिनट बेटा,”
उन्होंने धीरे से कहा...हाथ कांप रहे थे... जब चेक मैनेजर के सामने पहुंचा मैनेजर ने जैसे ही चेक देखा उसकी भौंहें तन गईं।
₹28,00,000
और अकाउंट में बस यही आख़िरी पैसा।
यह वही चाचा जी थे जो हर महीने बैंक आते थे,
कभी अपनी दवा के लिए कभी पेंशन के लिए,
कभी बस दो बातें करने के लिए।

मैनेजर ने कुर्सी से उठकर कहा—
“चाचा जी, अंदर आइए।”
बेटा भी अकड़ कर अंदर घुस आया...
मैनेजर ने चेक मेज पर रखा और सीधे पूछा—
“इतनी बड़ी रकम एक साथ क्यों निकाल रहे हैं?”
बेटा तुरंत बोल पड़ा—
“आपको क्या दिक्कत है?
हमारे पैसे हैं...हम जो चाहें करेंगे।”
मैनेजर की आवाज सख्त हो गई—
“ये आपके पैसे नहीं हैं ये इनके जीवन की पूरी कमाई है।”
बेटा झल्लाया—
“तो?
मैं इनका बेटा हूँ!”
मैनेजर आगे झुका—
“बेटा होने का मतलब
सिर्फ पैसा लेना नहीं होता।”
कमरे में सन्नाटा।
मैनेजर ने बुजुर्ग की ओर देखा—
“चाचा जी, सच बताइए…
आपको ये पैसा क्यों चाहिए?”
बुजुर्ग की आवाज टूट गई—
“मैनेजर साहब …
बेटे को घर लेना है ..
कहता है—
‘या तो पैसा दो ...या रास्ते से हट जाओ।’”
बेटा चिल्लाया—
“ड्रामा बंद कीजिए!
मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा!”
मैनेजर ने मेज पर हाथ मारा—
“काफी है!”
“आप जानते हैं,
मैंने आपको कभी यहाँ इनके साथ नहीं देखा।
न बीमारी में,
न त्योहार में,
न अकेलेपन में।”
“लेकिन हम बैंक वाले हर दिन इनके साथ खड़े रहे।”
बेटा तिलमिला गया—
“तो आप लोग ही पाल लीजिए इन्हें!
पैसे नहीं देंगे तो इन्हीं से अंतिम संस्कार भी करवा लेना!”
वह दरवाजे की तरफ बढ़ा।
मैनेजर की आवाज पीछे से गूंजी—
“रुकिए!”
“आज आपने साबित कर दिया कि आप बेटे नहीं,
सिर्फ वारिस हैं।”
“आप सिर्फ पैसा लेने आए थे और पैसा लेकर
इन्हें यहीं छोड़ जाते।”
“इसलिए मैं यह पैसा नहीं दूँगा।”
बेटा पलटा,
आँखों में जहर था—
“याद रखिएगा ये बात।”
और चला गया।
दरवाजा बंद हुआ।
बुजुर्ग आदमी फूट-फूटकर रो पड़े...
मैंने आज अपना बेटा खो दिया।”
मैनेजर ने उनका हाथ थाम लिया—
“नहीं चाचा जी।
आज आपने बेटा नहीं खोया,
आज आपने सच्चाई देखी है।”
“जब तक हम हैं आप अकेले नहीं हैं।
आपका ख्याल हम रखेंगे।”
बैंक के कर्मचारी पास आए।
किसी ने पानी दिया,
किसी ने कुर्सी खिसकाई।
और बाहर…एक बेटा 28 लाख के बिना
जिंदगी में आगे बढ़ गया।
लेकिन अंदर…
एक बूढ़ा पिता आज भी मानवता के सहारे जिंदा था।

आरती गहरवार ✍🏼 
धन्यवाद 🙏🏼

आयुर्वेदिक घरेलू चिकित्सा दोहे

हरड़े भरड़े आँवले, लो तीनो सम तोल।
कूट पीस कर छानिए,त्रिफला है अनमोल।।

पाँच भाँति के नमक से,करो चूर्ण तैयार।
दस्तावर है औषधि, कहते पंचसकार।।

ताजे माखन में सखी, केसर लेओ घोल।
मुख व होठों पर लगा,रंग गुलाब अमोल।।

सूखी मेंथी लीजिए, खाएँ मन अनुसार।
किसी तरह पहुँचे उदर,मेटे बहुत विकार।।

ठंड जुकाम भारी लगे, नाक बंद हो जाय।
अजवायन को सेंक कर, सूंघे तो खुल जाय।।

चर्म रोग में पीसिए, अजवायन को खूब।
लेप लगाओ साथिया,मिलता लाभ बखूब।।

फोड़े फुंसी होय तो, अजवायन ले आय।
नींबू रस में पीस कर,औषध मान लगाय।।

अजवाइन गुड़ घी मिला,हल्का गर्म कराय।
वात पित्त कफ संतुलन, सर्दी में हो जाय।।

भारी सर्दी पोष की, करती बेदम हाल।
अदरक नींबू शहद को,पीना संग उबाल।।

मेंथी अजवायन उभय,हरती उदर विकार।
पाचन होता संतुलित, खाएँ किसी प्रकार।।

अदरक के रस में शहद, लेना सखे मिलाय।
पखवाड़े नियमित रखो,श्वाँस कास मिटजाय।

मक्का की रोटी भली,खूब लगाओ भोग।
पाचन के संग लाभ दे,क्षय में रखे निरोग।।

छाछ दही घी दूध ये, शुद्ध हमारा भोज।
गाय पाल सेवा करो ,मेवा पाओ रोज।।

गाजर रस मय आँवला,पीना पूरे मास।
रक्त बने भरपूर तो,नयनन भरे उजास।।

बथुआ केंहि विधि खाइए,मिले लाभ भरपूर।
पाचन भी अच्छा करे, रहे बुढ़ापा दूर।।

चौंलाई में गुण बहुत, रक्त बढ़े भरपूर।
हरी सब्जियों से रहे,मानुष तन मन नूर।।

पालक मेथी मूलियाँ,स्वास्थ्य रक्त दातार।
हरी सब्जियां नित्य लो,रहलो सदाबहार।।

जूस करेला पीजिए, प्रतिदिन बारहो मास।
मधुहारे तुमसे सदा, हो सुखिया आभास।।

दातुन करिए नीम की,होय न दंत विकार।
नीम स्वयं ही वैद्य है, समझो सही प्रकार।।
.
जामुन की दातुन करो, गुठली लेय चबाय।
मधुमेही को लाभ हो ,प्रदर प्रमेह नशाय।।

दातुन करो बबूल की,हिलते कभी न दंत।
तन मन शीतलता रहे, शूल बचाओ पंत।।

कच्ची पत्ती नीम की ,प्रातः नित्य चबाय।
रक्त साफ करके सखे,यह मधुमेह मिटाय।।

सदाबहारी फूल जो, प्रात चबालो आप।
दूर करे मधुमेह को, खाओ मधु को माप।।

तुलसी पत्ते औषधी, पीना सदा उबाल।
कितनी भी सर्दी पड़े,होय न बाँका बाल।।

चूर्ण बना कर आँवले, खाओ बारह मास।
नहीं जरूरत वैद्य की,जब तक तन में श्वाँस।

संध्या भोजन बाद में, थोड़ा सा गुड़ खाय।
पाचन भी अच्छा रहे, बुरी डकार न आय।।

लहसुन डालो तेल में,अजवायन अरु हींग।
जोड़ो में मलते रहो , नहीं चुभेंगे सींग।।

सब्जी में खाओ लहसुन, हरता कई विकार।
नेमी धर्मी डर रहे, खाएँ खूब विचार।।

कैसे भी खा लीजीए ,करे सदा ही लाभ।
ग्वार पाठा बल खूब दे,आए तन में आभ।।

दाल चीनि जल घोल कर,पीजिए दोनो वक्त।
पेचिस में आराम हो, मल हो जाए सख्त।।

दालचीनि मुख राखिए, जैसे पान सुबास।
मुख कभी न आएगी, गन्दी श्वाँस कुबास।।

दूध पियो नित ही भला,हल्का मीठा डाल।
ग्रीष्म ऋतु में पीजिए,संगत मिला रसाल।।

ग्वारपाठ रस आँवला ,करे पित्त को नष्ट।
नित्य निहारा पीजीए,स्वास्थ्य रहेगा पुष्ट।।

तीन भाग रस आँवला,एक भाग मधु साथ।
प्रातः सायं पीजिए, नेत्र नए हो जात।।

हल्दी डालें दूध में, छोटी चम्मच एक।
कफ खाँसी के शूल मिट,स्वस्थ रहोगे नेक।।
.
हल्दी चम्मच एक भर, पीवे छाछ मिलाय।
खुजली फुन्शी दाद भी,जल्दी से मिटजाय।।
.
बेसन नींबू नीर मधु, सबको लेय मिलाय।
चेहरे पर लेपन करो,सुन्दरता बढ़ि जाय।।

शहद मिला कर दूध पी,जीवन रहे निरोग।
दीर्घायु होकर करो, जीवन के सुखभोग।।

भोजन के संग छाछ तो,होती अमरित मान।
स्वस्थ पुष्ट तन मन रहे, बनी रहेगी शान।।

सौ रोगों की औषधी, देखी परखी मान।
पिए गुनगुना नीर तो,बनी रहे तन जान।।

दिन के भोजन में रखो, दही कटोरी एक।
पाचक रस निर्माण कर,मेटे व्याधि अनेक।।

अजवायन की भाप से,मिटे शीत के रोग।
गर्म भाप को सूँघिए ,रहना शीत निरोग।।

लो अजवायन छाछ से,पेट रहे तन्दरुस्त।
कीड़े मरते पेट के, भोजन करना मस्त।।

सौंफ हींग सेंधा नमक, पीपल उसमे डाल।
जीरा छाछ मिला य पी, रहे न उदर मलाल।।

भूतों को सावन पिला, कार्तिक पिला सपूत।
ग्रीष्मकाल में सब पियो,उत्तम छाछ अकूत।।

✍️अरकिता