Pages

Tuesday, 19 May 2026

सम्राट पृथ्वीराज चौहान

आखिर कौन थे ?
सम्राट पृथ्वीराज चौहान 

पुरा नाम :- पृथ्वीराज चौहान 
अन्य नाम :- राय पिथौरा 
माता/पिता :- राजा सोमेश्वर चौहान/कमलादेवी
पत्नी :- संयोगिता
जन्म :- 1149 ई.  
राज्याभिषेक :- 1169 ई.   
मृत्यु :- 1192 ई. 
राजधानी :- दिल्ली, अजमेर
वंश :- चौहान (राजपूत)

आज की पिढी इनकी वीर गाथाओ के बारे मे..
 बहुत कम जानती है..!! 
तो आइए जानते है.. #सम्राट #पृथ्वीराज #चौहान से जुडा इतिहास एवं रोचक तथ्य,,,

''(1) प्रथ्वीराज चौहान ने 12 वर्ष कि उम्र मे बिना किसी हथियार के खुंखार जंगली शेर का जबड़ा फाड़ 
ड़ाला था ।

(2) पृथ्वीराज चौहान ने 16 वर्ष की आयु मे ही
 महाबली नाहरराय को युद्ध मे हराकर माड़वकर पर विजय प्राप्त की थी।

(3) पृथ्वीराज चौहान ने तलवार के एक वार से जंगली हाथी का सिर धड़ से अलग कर दिया था ।

(4) महान सम्राट प्रथ्वीराज चौहान कि तलवार का वजन 84 किलो था, और उसे एक हाथ से चलाते थे ..सुनने पर विश्वास नहीं हुआ होगा किंतु यह सत्य है.. 

(5) सम्राट पृथ्वीराज चौहान पशु-पक्षियो के साथ बाते करने की कला जानते थे। 

(6) महान सम्राट पुर्ण रूप से मर्द थे ।
 अर्थात उनकी छाती पर स्तंन नही थे ।

(8) प्रथ्वीराज चौहान 1166 ई. मे अजमेर की गद्दी पर बैठे और तीन वर्ष के बाद यानि 1169 मे दिल्ली के सिहासन पर बैठकर पुरे हिन्दुस्तान पर राज किया।

(9) सम्राट पृथ्वीराज चौहान की तेरह पत्निया थी। 
इनमे संयोगिता सबसे प्रसिद्ध है..

(10) पृथ्वीराज चौहान ने महमुद गौरी को 16 बार युद्ध मे हराकर जीवन दान दिया था..
और 16 बार कुरान की कसम का खिलवाई थी ।

(11) गौरी ने 17 वी बार मे चौहान को धौके से बंदी बनाया और अपने देश ले जाकर चौहान की दोनो आँखे फोड दी थी ।
उसके बाद भी राजदरबार मे पृथ्वीराज चौहान ने अपना मस्तक नहीं झुकाया था।

(12) महमूद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाकर अनेको प्रकार की पिड़ा दी थी और कई महिनो तक भुखा रखा था.. 
फिर भी सम्राट की मृत्यु न हुई थी ।

(13) सम्राट पृथ्वीराज चौहान की सबसे बड़ी विशेषता यह थी की...
जन्मसे शब्द भेदी बाण की कला ज्ञात थी।
जो की अयोध्या नरेश "राजा दशरथ" के बाद..
 केवल उन्ही मे थी। 

(14) पृथ्वीराज चौहान ने महमुद गौरी को उसी के भरे दरबार मे शब्द भेदी बाण से मारा था ।
 गौरी को मारने के बाद भी वह दुश्मन के हाथो नहीं मरे.. 
 अर्थार्त अपने मित्र चन्द्रबरदाई के हाथो मरे, दोनो ने एक दुसरे को कटार घोंप कर मार लिया.. क्योंकि और कोई विकल्प नहीं था ।

दुख होता है ये सोचकर कि वामपंथीयो ने इतिहास की पुस्तकों में टीपुसुल्तान, बाबर, औरँगजेब, अकबर जैसे हत्यारो के महिमामण्डन से भर दिया और पृथ्वीराज जैसे योद्धाओ को नई पीढ़ी को पढ़ने नही दिया बल्कि इतिहास छुपा दिया....

सकारात्मकता लोगों के अपने विश्वास और आंतरिक शक्ति की वजह से आया।

इस तस्वीर में दिख रहे शख्स का नाम विक्रम गांधी है, जो पेशे से एक फिल्ममेकर और पत्रकार हैं..
लेकिन साल 2011 में इन्होंने एक ऐसा अनोखा और हैरान कर देने वाला 'सोशल एक्सपेरिमेंट' किया, जिसने आध्यात्मिकता,बाबागिरी और धर्म के नाम पर हो रहे पाखंड की बधिया उधेड़ दी.

विक्रम ने अपनी दाढ़ी-बाल बढ़ाए, भगवा वस्त्र पहने यानी आध्यात्मिक गुरु बन बैठा. खुद को एक प्रबुद्ध गुरु 'कुमारें' (Kumaré) के रूप में पेश किया.
 वे अमेरिका के एरिजोना राज्य में गए और वहां योग और ध्यान सिखाने लगे. 
आम जनमानस वो चाहे किसी भी देश का,आधुनिक हो..वो भी इन चक्करों में फंस ही जाता है.
 देखते ही देखते सैकड़ों लोग उनके अनुयायी बन गए. लोग उनके पैरों में गिरकर रोने लगे, अपनी जिंदगी के सबसे गहरे राज उनसे साझा करने लगे और उन्हें साक्षात भगवान मानने लगे 
  
जबकि विक्रम के पास कोई दैवीय शक्ति नहीं थी, वह सब कुछ कैमरे के सामने सिर्फ एक 'एक्ट' कर रहे थे.
विक्रम ने इन सब गतिविधियों को कैमरे में कैद किया..और डॉक्यूमेंट्री बना डाली.

   जब इस डॉक्यूमेंट्री के अंत में विक्रम ने अपने शिष्यों के सामने इस सच का खुलासा किया कि वे कोई गुरु नहीं बल्कि एक आम फिल्ममेकर हैं, तो जो सच निकलकर सामने आया, वही इस पूरे प्रयोग का सबसे बड़ा 'टर्निंग पॉइंट' है.अनुयायी इस बात को स्वीकार ही नही कर पा रहे थे कि वो एक फर्जी गुरु के सानिध्य में थे..वे इस बात पर टिके थे कि उन्हें शारीरिक,मानसिक और आर्थीक रूप से लाभ हुआ है.
 यहाँ मुझे फ़िल्म "गाइड" याद आई .

 विक्रम ने अपने शिष्यों को कोई नया ज्ञान नहीं दिया था. उन्होंने बस वही बातें दोहराईं जो लोग सुनना चाहते थे.जब लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया, तो वह किसी 'गुरु' के चमत्कार से नहीं, बल्कि उन लोगों के अपने विश्वास और आंतरिक शक्ति की वजह से आया था.
   हम अक्सर अपनी समस्याओं का समाधान खुद के भीतर ढूंढने के बजाय किसी बाहरी चमत्कारी पुरुष या गुरु में तलाशने लगते हैं. यह प्रयोग साबित करता है कि शांति, खुशी और बदलाव की चाबी आपके खुद के पास है, किसी बाबा या गुरु के पास नहीं.
   यह एक्ट ये भी दिखाता है कि इंसानी मन कितना भोला और कमजोर हो सकता है, जिसे आसानी से बहकाया जा सकता है.
   
   यह प्रयोग किसी की आस्था का मज़ाक उड़ाने के लिए नहीं था, बल्कि यह हमारी आँखें खोलने के लिए था. किसी के पीछे आंखें बंद करके भागने से बेहतर है कि हम अपने भीतर को पहचानें,अपने गुरु खुद बने...!
डाक्यूमेंट्री प्राइम पर उपलब्ध है.
                - अरुण खामख्वाह 
#Kumare #VikramGandhi #SpiritualAwaking #SelfBelief #SocialExperiment #RealityCheck #InnerStrength

कैसे विलासिता ने एक सुखी परिवार को बर्बाद कर दिया ?

 इस प्रकरण को किशोर युवा वरिष्ठ लोगों के लिए उपयुक्त समझते हुए साझा करना चाहिए, ताकि युवा पीढ़ी भी इसे समझ सके! 👇
कैसे विलासिता ने एक सुखी परिवार को बर्बाद कर दिया ?

एक बार पारिवारिक समस्या सुलझाने के लिए परामर्श सलाह लेने के लिए मेरे पास एक बहुत ही असामान्य "मामला" आया।
इसमें कोई संपत्ति विवाद नहीं था। कोई आपराधिक आरोप नहीं था। कोई तलाक की अर्जी नहीं थी। कोई मुकदमेबाजी नहीं थी।
और फिर भी— वह घर पूरी तरह से एक गृहयुद्ध का अखाड़ा बन चुका था!
एक बुजुर्ग पिता घर में हर किसी को खरी-खोटी सुनाते थे।
माँ उदास, क्रोधित और भावनात्मक रूप से टूटी हुई रहने लगी थीं, और धीरे-धीरे डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) का शिकार हो रही थीं।
बेटा और बहू थक चुके थे और मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुके थे। हर कोई एक-दूसरे से लड़ रहा था। बेटे और बहू ने मेरे पास आकर कहा:
"हमें समझ नहीं आ रहा कि क्या हो गया है। हमने अपने माता-पिता को हर संभव सुख-सुविधा दी। लेकिन घर में सभी सुख-सुविधाओं के आने के बाद— शांति कहीं गायब हो गई।"
फिर उन्होंने मुझे पूरी कहानी सुनाई:
पति और पत्नी दोनों ने पुणे की बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सालों तक काम किया था। उनका जीवन बेहद व्यस्त था। कॉर्पोरेट शेड्यूल्स, मीटिंग्स और डेडलाइन्स।
ज्यादातर आधुनिक पेशेवरों की तरह, उन्होंने अपने जीवन के लगभग हर घरेलू काम को आउटसोर्स कर दिया था—
रसोइया, सफाई, कपड़े धोना, किराने का सामान, सब कुछ।
बाद में वे अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने के लिए वापस दिल्ली आ गए और कई वर्षों बाद पति के 80 वर्षीय माता-पिता के साथ रहने लगे। लेकिन उन्होंने जो देखा, उसने उन्हें हैरान कर दिया।
बुजुर्ग दंपत्ति का पूरा जीवन रसोई के काम, कपड़े धोने, कपड़े तह करने, सब्जियां खरीदने, बर्तन व्यवस्थित करने, मसालों पर चर्चा करने और छोटे-छोटे घरेलू कामों को संभालने के इर्द-गिर्द घूमता था।
बेटा और बहू भावुक हो गए। उन्होंने सोचा:
"हमारे माता-पिता ने हमारे लिए जीवन भर संघर्ष किया है। अब उन्हें आराम देना हमारा कर्तव्य है।"
इसलिए, उन्होंने घर का कायापलट कर दिया।
—एक फुल-टाइम रसोइया रखा गया। किराने का सामान ब्लिंकिट (Blinkit) के जरिए आने लगा।
अमेज़ॅन (Amazon) घरेलू सामान की डिलीवरी करने लगा।
माँ के लिए एक फुल-टाइम केयरटेकर (सहायिका) रखी गई।
माता-पिता के लिए एक अलग कार की व्यवस्था की गई।
केयरटेकर उनके पैरों की मालिश करती, बालों में तेल लगाती, पानी लाती, चाय परोसती और उन्हें टहलाने ले जाती।
बच्चों ने सोचा कि अब हमारे माता-पिता आखिरकार जीवन का आनंद लेंगे। लेकिन, कुछ ही महीनों में, सब कुछ बिखर गया।
—सास ने पूरी तरह से काम करना बंद कर दिया।
उनका हिलना-डुलना बंद हो गया। सोचना बंद हो गया। वह पूरा दिन सोने लगीं और लगातार शिकायतें करने लगीं।
वे भावनात्मक रूप से दूसरों पर आश्रित होने लगीं।
फिर डिप्रेशन आ गया। उसके बाद डिमेंशिया के लक्षण दिखाई देने लगे।
—ससुर आक्रामक और कड़वे स्वभाव के हो गए। वे डिलीवरी बॉयज़ से लड़ते। नौकरानियों का अपमान करते। रसोइयों को गालियां देते। केयरटेकर्स पर चिल्लाते। पूरा दिन बिना किसी उद्देश्य के बाहर घूमते रहते और गुस्से में घर लौटते।
घर भावनात्मक रूप से जहरीला हो गया था।
बेटा और बहू पूरी तरह भ्रमित होकर मेरे सामने बैठे थे:
"हमने उनके जीवन से सारे संघर्ष हटा दिए। फिर जीवन बदतर क्यों हो गया?"
और सच कहूं तो, मैंने जितने भी अदालती मामले संभाले हैं, उनमें मुझे यह मामला सबसे गहरा लगा। क्योंकि धीरे-धीरे असली समस्या स्पष्ट होने लगी थी। बूढ़े माता-पिता इसलिए दुखी नहीं थे क्योंकि पहले उन्हें काम करना पड़ता था।
वे इसलिए दुखी थे क्योंकि अब उनके जीवन का उद्देश्य ही खत्म हो गया था।
पहले पिता एक उद्देश्य के साथ सुबह उठते थे। वे अपनी पत्नी के लिए चाय बनाते थे। उनके साथ अखबार पढ़ते थे। कपड़े का थैला लेकर बाजार जाते थे। सब्जियों के बारे में मोलभाव करते थे। कीमतों की तुलना करते थे। किराने का सामान खरीदते थे। पहले माँ भोजन की योजना बनाती थीं। मसाले चेक करती थीं। रोटियां पकाती थीं। कपड़े तह करती थीं। अगले दिन के कामों पर चर्चा करती थीं।
—ये केवल "घरेलू काम" नहीं थे। ये वे अदृश्य भावनात्मक धागे थे जो दो बुजुर्गों को मानसिक रूप से जीवित और एक-दूसरे से गहराई से जोड़े रखते थे। रसोई केवल एक रसोई नहीं थी। यह "सहचर्य (साथ)" था।
बाजार जाना केवल खरीदारी नहीं था। यह उनकी प्रासंगिकता (अहमियत) थी। धनिया और मिर्च पर होने वाले छोटे-छोटे झगड़े कोई विवाद नहीं थे। वह उनका आपसी संवाद था।
हमारे जैसे आधुनिक लोग अक्सर बुढ़ापे को गलत समझ लेते हैं। हम सोचते हैं कि बूढ़े लोगों को केवल आराम की जरूरत है। 'नहीं'।
मनुष्य को केवल आराम की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य को प्रासंगिकता की आवश्यकता होती है। दिमाग को कोई काम चाहिए। शरीर को गति चाहिए। दिल को यह महसूस करने की आवश्यकता है कि वह उपयोगी है।
~इसलिए, मैंने उन्हें एक बहुत ही अजीब सुझाव दिया।
"सुख-सुविधाएं कम कर दें।"
कोई क्रूरता नहीं। कोई उपेक्षा नहीं। बस अत्यधिक निर्भरता को हटा दें। फुल-टाइम केयरटेकर को हटा दें। केवल आंशिक मदद रखें। उन्हें फिर से जिम्मेदारी दें। उन्हें फिर से महत्व दें। उन्हें यह महसूस कराएं कि उनकी जरूरत है।
—बेटे ने अपनी मां से कहना शुरू किया:
"आपके जैसा खाना कोई नहीं बनाता। कृपया मेरे लिए रोज एक सब्जी बना दिया करें।"
बहू ने ससुर से कहना शुरू किया:
"आप जो सब्जियां लाते हैं, वे ज्यादा ताजी होती हैं।"
धीरे-धीरे, जीवन की पुरानी लय लौट आई। फिर से चर्चाएं होने लगीं।
फिर से कल के लिए योजनाएं बनने लगीं। फिर से छोटी-मोटी तकरारें होने लगीं। फिर से शरीर में हरकत हुई।
फिर से जीवन में एक उद्देश्य आ गया।
—और धीरे-धीरे... खुशियां भी लौट आईं।
उस मामले ने मुझे मानव जीवन के सबसे गहरे सबक में से एक सिखाया।
1. विलासिता (Luxury) हमेशा खुशी नहीं लाती।
2. कभी-कभी रोजमर्रा के छोटे-छोटे संघर्ष ही मनुष्य को भीतर से चुपचाप जीवित रखते हैं।
3. एक व्यक्ति को सुबह यह महसूस करते हुए उठना चाहिए:
"आज किसी को मेरी जरुरत हैं ।" यह एहसास ही जीवन है।

गृहस्थाश्रम धन्य हैं !

गृहस्थाश्रम धन्य है गृहस्थी पर संस्कृत श्लोक 

यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी ।
विभवे यश्च सन्तुष्टः तस्य स्वर्ग इहेव हि ॥

जिसका पुत्र उसके वश है, पत्नी कहा करनेवाली है, और वैभव से जो संतुष्ट है, उसके लिए तो यहीं स्वर्ग है ।

अर्थागमो नित्यमरोगिता च
प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च ।

वशश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या
षड्जीवलोकस्य सुखानि राजन् ॥

हे राजन् ! अर्थोपार्जन, अरोगित्व, अच्छी लगनेवाली और प्रिय बोलनेवाली पत्नी, अपने आधीन पुत्र, और अर्थकरी विद्या – ये छे जीवलोक के सुख है ।

वनेऽपि दोषा प्रभवन्ति रागिणां
गृहेऽपि पञ्चेन्द्रिय निग्रह स्तपः ।

अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते
निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम् ॥

आसक्त लोगों का वन में रहना भी दोष उत्पन्न करता है । घर में रहकर पंचेन्द्रियों का निग्रह करना हि तप है । जो दुष्कृत्य में प्रवृत्त होता नहीं, और आसक्तिरहित है, उसके लिए तो घर हि तपोवन है ।

तप्त्वा तपस्वी विपिने क्षुधार्तो
गृहं समायाति सदान्न दातुः ।

भुक्त्वा स चान्नं प्रददाति तस्मै
तपो विभागं भजते हि तस्य ॥

तपस्वी वन में तप करके जब भूख से पीडित होता है, तब वह अन्नदाता के घर आता है । वहाँ अन्न लेकर, वह (एक तरीके से) अपने तप का हिस्सा उसे बाँटता है ।

यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तवः ।
तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमाः ॥

क्रोशन्तः शिशवः सवारि सदनं पङ्कावृतं चाङ्गणम्
शय्या दंशवती च रुक्षमशनं धूमेन पूर्णः सदा ।

भार्या निष्ठुरभाषिणी प्रभुरपि क्रोधेन पूर्णः सदा
स्नानंशीतलवारिणा हि सततं धिग् गृहस्थाश्रमम् ॥

जिस घर में बालक रोते हो, सब जगह पानी गिरा हो, आंगन में कीचड हो, गद्दों में मांकड हो, खुराक रुक्ष हो, धूँए से घर भरा हो, पत्नी निष्ठुर बोलनेवाली हो, पति सदा क्रोधी हो, ठंडे पानी से स्नान करना पडता हो – ऐसे गृहस्थाश्रम को धिक्कार है ।

सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता प्रियभाषिणी
सन्मित्रं सधनं स्वयोषिति रतिः चाज्ञापराः सेवकाः ।

आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे
साधोः सङ्गमुपासते हि सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः ॥

घर में आनंद हो, पुत्र बुद्धिमान हो, पत्नी प्रिय बोलनेवाली हो, अच्छे मित्र हो, धन हो, पति-पत्नी में प्रेम हो, सेवक आज्ञापालक हो, जहाँ अतिथि सत्कार हो, ईशपूजन होता हो, रोज अच्छा भोजन बनता हो, और सत्पुरुषों का संग होता हो – ऐसा गृहस्थाश्रम धन्य है ।

Monday, 18 May 2026

ब्रह्मांड का परम रहस्य: क्या अपराधियों और अपवित्र चीजों में भी परमात्मा है ?

ब्रह्मांड का परम रहस्य: क्या अपराधियों और अपवित्र चीजों में भी परमात्मा है?

सनातन दर्शन का एक अत्यंत उद्घोषक सिद्धांत है— "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति" अर्थात वह परमात्मा हर जगह, हर जीव में रमे हैं। लेकिन जब हम इस परम सत्य को आज के व्यावहारिक धरातल पर देखते हैं, तो आधुनिक तार्किक बुद्धि कुछ असहज और तीखे प्रश्न खड़े करती है।  

यदि ईश्वर सचमुच कण-कण में है, तो क्या वह नाली के बहते गंदे पानी में भी मौजूद है? क्या एक मासूम की जान लेने वाले क्रूर हत्यारे के भीतर भी उसी परमेश्वर का वास है? या समाज को अपनी कड़वाहट से दूषित करने वाले दुष्टों के भीतर भी वही ईश्वरीय चेतना धड़कती है?  
हमारे ऋषि-मुनि अंधविश्वास के पक्षधर नहीं थे; वे अपने समय के सबसे बड़े वैज्ञानिक और तार्किक विचारक (सिग्मा हिंदू) थे, जो ग्रंथों में लिखी बात को भी बिना प्रमाण और लॉजिक के स्वीकार नहीं करते थे। आइए, वेदान्त के इसी सबसे गहरे और चमत्कारी सिद्धांत को आज के विज्ञान और तार्किकता के लेंस से नए रूप में समझते हैं।  

1. अदृश्य होकर भी ईश्वर हर जगह है—इसका कॉस्मिक लॉजिक
चूंकि परमात्मा हमारी इन भौतिक आँखों से सीधे दिखाई नहीं देता, इसलिए हमारे पास कोई सीधा प्रयोगशाला साक्ष्य (Direct Physical Evidence) नहीं है। परंतु ऋषियों ने ब्रह्मांड के दो मूलभूत नियमों के आधार पर इसे गणितीय सटीकता से सिद्ध किया है:  

अ) कॉस्मिक डिपेंडेंसी का नियम (The Law of Interconnected Existence)
सृष्टि की कोई भी वस्तु पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है; हर चीज अपने वजूद के लिए किसी न किसी दूसरी कड़ी पर टिकी है।  

यदि आप नदी किनारे की रेत के एक कण को देखें, तो वह पत्थरों के घिसने से बना है। पत्थर पहाड़ों का हिस्सा थे, पहाड़ पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटों के टकराने से बने और पृथ्वी सूर्य के गुरुत्वाकर्षण की डोर से बंधी है। सूर्य हमारी आकाशगंगा के केंद्र पर आश्रित है।  

यदि आप निर्भरता की इस अनंत शृंखला (Chain) के अंतिम छोर को ढूंढने निकलेंगे, तो अंत में एक ऐसा 'परम स्वतंत्र बिंदु' (The Ultimate Independent Source) होना ही चाहिए, जो अपने अस्तित्व के लिए ब्रह्मांड में किसी और पर निर्भर न हो। वेदों ने इसी स्वयंभू, अनंत और परम स्वतंत्र चेतना को 'ब्रह्म' या ईश्वर कहा है। चूंकि वह अनंत है, इसलिए ब्रह्मांड की हर दृश्य-अदृश्य वस्तु उसी के भीतर और उसी के द्वारा प्रकट होती है।  

ब) कारण-कार्य का तादात्म्य सिद्धांत (The Law of Cause and Effect)
विज्ञान का अकाट्य नियम है कि कोई भी 'कार्य' (Product) अपने 'कारण' (Source) के तत्वों से मुक्त नहीं हो सकता। सूती कपड़े के भीतर धागा और कपास हर जगह मौजूद होता है; मिट्टी के अनगिनत खिलौनों के भीतर मिट्टी अनिवार्य रूप से व्याप्त होती है।
श्रुति (वेद) कहती है कि इस दृश्यमान जगत का जो 'परम कारण' (Substratum) है, वह ब्रह्म ही है। इसलिए, ब्रह्मांड में जो कुछ भी निर्मित हुआ है, उसके मूल ताने-बाने में उसका कारण (परमात्मा) स्वतः ही अंतर्निहित और ओतप्रोत होगा।  

2. यदि ईश्वर हर जगह है, तो क्या वह गंदगी और पाप से दूषित नहीं होता?
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि परमात्मा नाली के कीचड़ या किसी दुष्ट इंसान के भीतर भी है, तो क्या उसकी पवित्रता खंडित नहीं होती? वेदान्त ने इसके लिए दो दिव्य विशेषण दिए हैं— 'असंग' और 'निर्लिप्त'। इसका अर्थ है कि वह परमात्मा इस संसार के भीतर पूरी तरह समाया हुआ है, फिर भी इसके विकारों और सीमाओं से अनंत गुना दूर और अछूता है।  

इसे आज के विज्ञान की सबसे अद्भुत खोज— 'प्रकाश' (Light) के उदाहरण से समझते हैं:
क्वांटम उपमा: प्रकाश और दूषित जल का प्रयोग
कल्पना कीजिए कि आप एक पारदर्शी कांच के पात्र में गंदा और बदबूदार पानी भर देते हैं। अब यदि आप उस पात्र के आर-पार एक शक्तिशाली लेज़र लाइट या टॉर्च का प्रकाश डालते हैं, तो प्रकाश की किरणें उस मटमैले पानी के परमाणुओं के बीच से गुजरती हुई दूसरी तरफ निकल जाती हैं।  

अब स्वयं से पूछिए—क्या वह प्रकाश उस गंदगी के भीतर से गुजरने के कारण खुद गंदा, मटमैला या बदबूदार हुआ? बिल्कुल नहीं! प्रकाश वहां उपस्थित था, लेकिन वह उस गंदगी से पूरी तरह 'असंग' (Unaffected) रहा।  
जब हमारे इस भौतिक संसार का 'प्रकाश' मैली से मैली वस्तु के बीच रहकर भी अपनी शुद्धता अक्षुण्ण रख सकता है, तो ईश्वर तो कोई भौतिक तत्व (Physical Entity) हैं ही नहीं; वे तो परम चैतन्य हैं। वे संसार की प्रत्येक तरंग और परमाणु के भीतर स्पंदित हो रहे हैं, लेकिन उसके गुण-दोषों से सर्वथा परे हैं। यदि वे भौतिक रूप से लिप्त होते, तो पेड़ के कटने पर ईश्वर भी कट जाते या पानी के खौलने पर ईश्वर भी जल जाते, परंतु परमात्मा इन सभी भौतिक सीमाओं से मुक्त हैं।  

3. परमात्मा भीतर रहकर भी बुरे लोगों को अपराध से क्यों नहीं रोकते?

यह जिज्ञासा सबसे अधिक व्याकुल करती है कि यदि ईश्वर साझी ऊर्जा के रूप में एक पापी के हृदय में भी बैठा है, तो वह उसकी बुद्धि को उसी क्षण बदलकर उसे पाप करने से रोक क्यों नहीं लेता? इसके पीछे सनातन ब्रह्मांड का परम निष्पक्ष और स्वचालित नियम कार्य करता है:  

क) ईश्वर 'कर्म-ऊर्जा' के तटस्थ प्रदाता हैं (The Neutral Powerhouse)
परमात्मा ब्रह्मांड के सबसे बड़े अनबायस्ड (निष्पक्ष) जज हैं; वे न तो किसी के व्यक्तिगत मित्र हैं और न ही शत्रु। उन्होंने मनुष्य को रोबोट नहीं बनाया, बल्कि उसे 'फ्री विल' (कर्म चुनने की स्वतंत्रता) दी है। उन्होंने एक स्वचालित 'कर्म नियम' (Law of Karma) स्थापित कर दिया है, जो कर्मों का लेखा-जोखा रखता है—अच्छे का अच्छा और बुरे का बुरा परिणाम।  

सूर्य की तटस्थता का उदाहरण: सूर्य देव बिना किसी भेदभाव के अपनी जीवनदायिनी किरणें पूरी धरती पर समान रूप से बिखेरते हैं। उनकी धूप पाकर एक तरफ अमृत तुल्य औषधियां और सुगंधित फूल भी खिलते हैं, तो दूसरी तरफ किसी विषैले पौधे को भी उतनी ही ऊर्जा मिलती है। सूर्य कभी यह सोचकर विषैले पौधे पर धूप डालना बंद नहीं करते कि यह संसार के लिए हानिकारक है। परमात्मा की स्थिति भी इसी पावरहाउस की तरह है। 
 
विद्युत (Electricity) का उदाहरण: पावर ग्रिड से आने वाली बिजली पूरे शहर में समान रूप से बहती है। अब उस बिजली से आप किसी अस्पताल में जीवन बचाने वाला वेंटिलेटर चलाएं या किसी को नुकसान पहुंचाने वाला उपकरण, यह पूरी तरह उपभोक्ता की चॉइस पर निर्भर करता है। बिजली का काम केवल शुद्ध शक्ति (Power) देना है, उसका उपयोग नहीं।  

ख) हमारा दृष्टिकोण क्षणिक है, ईश्वर का विज़न अनंत है
हम किसी भी व्यक्ति को केवल उसके वर्तमान जीवन की कुछ भूलों या बुरे कृत्यों के आधार पर 'परम दुष्ट' मान लेते हैं। हमारा अनुभव केवल कुछ वर्षों का है। जैसे—समाज की नजर में जो व्यक्ति अत्यंत क्रूर या कठोर है, वह अपनी वृद्धा माँ या अपने नन्हे बच्चे के सामने पूरी तरह पिघल जाता है, क्योंकि माँ ने उसकी आत्मा के दूसरे पहलुओं को भी देखा है।  

परमात्मा ने हमें केवल इस एक जन्म के कुछ दृश्यों में नहीं, बल्कि अनंत जन्मों की यात्रा (जन्मांतरों) में देखा है। वे जानते हैं कि कोई आत्मा किस गहरे अज्ञान, अतीत के संस्कारों या कार्मिक ऋण के वशीभूत होकर इस समय अंधकार का आचरण कर रही है। इसलिए ईश्वर हमें तात्कालिक रूप से जज नहीं करते, बल्कि एक विकासशील चेतना (Evolutionary Soul) के रूप में देखते हैं।  

ग) कर्म की भट्टी ही अंततः चेतना का शोधन करती है
ईश्वर मनुष्य की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करके सीधे उसका हाथ नहीं मरोड़ते। जब कोई जीव अपनी अज्ञानता व अहंकार में आकर प्रकृति के शाश्वत नियमों का उल्लंघन करता है और घोर पाप करता है, तो कर्म की यही अचूक न्याय व्यवस्था उसे अंततः कठोर दुखों, आत्मग्लानि और संघर्षों की भट्टी में झोंक देती है।  

कई जन्मों की ठोकरें खाने और उस दंड को भुगतने के बाद ही आत्मा का मैल साफ होता है। यही दुखों की भट्टी अंततः जीव को सुधरने पर विवश करती है और वह विकारों को पार कर वापस उसी परम प्रकाश (परमात्मा) में लीन होने की राह पर अग्रसर होता है।  

महा-निष्कर्ष (The Ultimate Takeaway)
परमात्मा की उपस्थिति इस संसार में बिल्कुल निराकार 'आकाश' या 'प्रकाश' की तरह है। वह पावन मंदिर के दीये की लौ में भी उतनी ही शुद्धता से मौजूद है, जितनी शुद्धता से किसी श्मशान की राख या अपवित्र नाली में। वह एक परम दानी संत के विचारों में भी ऊर्जा भर रहा है और एक अज्ञानी अपराधी की धड़कनों में भी।  
वह हमें जीवन की ऊर्जा और कर्मों की पूरी स्वतंत्रता देता है, लेकिन हमारे कर्मों के कीचड़ से कभी खुद सराबोर नहीं होता। जब मनुष्य अपनी सीमित अपेक्षाओं को छोड़कर इस विराट कॉस्मिक न्याय व्यवस्था को समझ लेता है, तब वह संसार में किसी से घृणा नहीं करता, बल्कि स्वयं के भीतर के प्रकाश को पहचानकर ईश्वरत्व की ओर बढ़ जाता है।

कहीं भी काम करें - काम के प्रति समर्पण और प्रतिबद्धता को सबसे ऊपर रखें ।

कहीं भी काम करें, काम के प्रति समर्पण और प्रतिबद्धता को सबसे ऊपर रखें क्योंकि इससे आपको पैसा मिलता है या प्रशंसा और ज्यादातर मामलों में तो दोनों

इसी साल की बात है। एक व्यक्ति एटीएम से पैसे निकाल रहा था, तभी दूसरा व्यक्ति अंदर गया और उससे पांच हजार रुपए छीनकर भाग गया। पीड़ित ने उसका पीछा किया। 74 वर्षीय अनुराधा कुलकर्णी वहीं ट्रैफिक संभाल रही थीं और उन्होंने यह सब देखा। उन्होंने तुरंत अपनी बाइक स्टार्ट की, पीड़ित को लिफ्ट दी और चोर का पीछा करते हुए देखा कि वह टाटा कॉलोनी नामक एक रिहायशी इलाके में घुस रहा है। उनके तेज दिमाग को पता था कि कॉलोनी का केवल एक ही एग्जिट पॉइंट है, इसलिए उन्होंने पुलिस को सूचित कर गेट पर पीड़ित के साथ इंतजार किया। एक घंटे बाद, आरोपी भागने की कोशिश कर रहा था, तभी पुलिस ने उसे पकड़ लिया और पैसे बरामद कर लिए।
दो महीने पहले एक व्यक्ति सड़क पार करते समय ट्रक से कुचलकर मारा गया। सड़क के बीचों-बीच खड़ी हुई अनुराधा ने देखा कि पीड़ित की चप्पल डिवाइडर में फंस गई थी, जिससे वह चलते ट्रक के सामने गिर गया था। गुस्साए स्थानीय लोग ट्रक ड्राइवर पर हमला करने लगे। अनुराधा ने तुरंत एक्शन लिया और गवाही दी कि यह ड्राइवर की गलती नहीं थी। वह इस चल रहे मामले में मुख्य गवाह हैं। लगभग छह महीने पहले एक सोसाइटी के चौकीदार का मोबाइल फोन चोरी हो गया था। सीसीटीवी फुटेज के आधार पर स्थानीय पुलिस ने अनुराधा से आरोपी की पहचान करने में मदद मांगी। उन्होंने तीन दिनों में मोबाइल चुराने वाले सफाईकर्मी की पहचान की, जिसके बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और मोबाइल फोन बरामद कर लिया।
आप सोच रहे होंगे कि यह 74 वर्षीय महिला हमेशा सड़क के बीच में क्या करती रहती हैं? हर दिन वह बाइक पर घूमती हैं, जहां भी ट्रैफिक नजर आता है, वहां उतरकर ट्रैफिक संभालती हैं, एंबुलेंस को तेजी से जाने में मदद करती हैं और स्कूली बच्चों को सड़क पार कराती हैं। लगभग 30 साल पहले की बात है, एक बार उन्होंने देखा कि मुंबई में सांताक्रूज में एक स्कूल के पास लोग गलत लेन में आ रहे थे, तभी उन्होंने अकेले ही लोगों को वहां से आने से रोक दिया था। एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें ऐसा करते देखा और उन्हें ट्रैफिक वार्डन के रूप में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने मुंबई के बायकला में ट्रैफिक ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में अपनी ट्रेनिंग के बाद लिखित और मौखिक परीक्षा पास की। तब से, वह मुंबई के पश्चिमी उपनगरीय इलाके जुहू-विले पार्ले-सांताक्रूज में स्वेच्छा से यह काम कर रही हैं। उनके एक फोन कॉल पर पुलिस तुरंत कार्रवाई में जुट जाती है क्योंकि वह केवल तभी कॉल करती हैं जब वह स्थिति को संभाल नहीं पातीं, चाहे वह ट्रैफिक की समस्या हो या कोई असामाजिक गतिविधि।
साल 2014 में बॉलीवुड अभिनेता अनुपम खेर ने उनके उत्कृष्ट काम के लिए उन्हें सम्मानित किया था और उन्होंने कोविड के दौरान कोरोना पॉजिटिव लोगों को भोजन पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वह इन उपनगरों में सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं क्योंकि ट्रैफिक जाम होने पर किसी को उन्हें बुलाने की जरूरत नहीं पड़ती। वह खुद पहुंच जाती हैं और ट्रैफिक वार्डन का काम करती हैं। ट्रैफिक सुचारू होने के बाद, वह अपनी बाइक लेती हैं और अगले स्थान पर चली जाती हैं, जहां उनकी जरूरत होती है। ठेले वाले से लेकर दुकानदार तक, वहां के सभी लोकल लोग इस शहर को ट्रैफिक जाम से मुक्त रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की सराहना करता है। बैंक में काम करने वाले उनके पति का बहुत पहले निधन हो चुका है और उनकी सास ने उन्हें एक घर दिया है, जिसके किराए से और समय-समय पर रिश्तेदारों की मदद से उनकी जरूरतें पूरी होती रहती हैं। इसलिए वह मुंबई ट्रैफिक पुलिस के लिए फ्री में काम करते हुए अपना सारा समय बिताती हैं।

फंडा यह है कि जो लोग किसी भी काम के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं, फिर चाहे वह स्वप्रेरणा से हो या उसके एवज में कोई पैसा मिले, एेसे लोगों को हमेशा पहचान और सराहना मिलती है। इसलिए कहीं भी काम करें, काम के प्रति समर्पण और प्रतिबद्धता को सबसे ऊपर रखें क्योंकि इससे आपको पैसा मिलता है या प्रशंसा और ज्यादातर मामलों में तो दोनों।
✍️Management Funda of Raghuraman 

इतिहास में जब भी किसी सरकार के पास रोजगार, महंगाई और आय पर जवाब कम होते हैं, वह जनता को भावनात्मक युद्ध में डाल देती है।

बीजेपी का 2014 के बाद में पहला खेल था “दुश्मन बनाओ और अर्थव्यवस्था छुपाओ”। इतिहास में जब भी किसी सरकार के पास रोजगार, महंगाई और आय पर जवाब कम होते हैं, वह जनता को भावनात्मक युद्ध में डाल देती है। 

रोमन साम्राज्य में इसे “ब्रेड एंड सर्कस” कहा जाता था। जनता को मनोरंजन और दुश्मन दो, वह टैक्स भूल जाएगी। भारत में इसका देसी संस्करण निकला “मंदिर और मीडिया”। 

बेरोजगारी बढ़ रही है, लेकिन टीवी पर बहस होगी किसने किसको क्या कहा। पेट्रोल 100 पार कर गया, लेकिन जनता का ध्यान कहीं और मोड़ दो। क्योंकि अगर जनता 6 महीने लगातार सिर्फ रोजगार और महंगाई पर सोचने लगे, तो आधी राजनीति ICU में पहुंच जाएगी। 

तुम्हें गुस्सा अर्थव्यवस्था पर नहीं, पड़ोसी की थाली पर दिलाया गया।

फिर सरकार ने सीधे टैक्स कम और “छुपे टैक्स” ज्यादा लगाए। गरीब आदमी Income Tax नहीं देता, लेकिन पेट्रोल पर टैक्स देता है, गैस पर टैक्स देता है, दूध, साबुन, टूथपेस्ट, मोबाइल रिचार्ज, हर चीज पर GST देता है। मतलब रिक्शा वाला और अरबपति दोनों टूथपेस्ट पर लगभग समान टैक्स देते हैं। 

इसे कहते हैं “Indirect Tax Trap”। सरकार ने अमीरों पर सीधा टैक्स बढ़ाने की बजाय आम आदमी की रोजमर्रा की सांसों पर टैक्स लगा दिया। और कमाल यह कि आदमी को लगा “मैं टैक्स नहीं देता”। अरे भाई, तुम तो चाय की प्याली से टैक्स दे रहे हो। 

फर्क इतना है कि पहले जेब काटते समय आवाज आती थी, अब डिजिटल मशीन से कटती है इसलिए दर्द कम महसूस होता है।

फिर तीसरा काम तुम्हें “नागरिक” से “समर्थक” बनाया गया। नागरिक सवाल पूछता है। समर्थक बचाव करता है। पहले जनता सरकार से पूछती थी “रोजगार कहां है?” अब जनता खुद दूसरे लोगों से लड़ती है “देश खतरे में है सवाल मत पूछो।” यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा सॉफ्टवेयर अपडेट था। 

जनता को ऐसा भावनात्मक सैनिक बना दो कि वह अपनी ही तकलीफ को राष्ट्रभक्ति समझने लगे। गैस महंगी? देशहित। पेट्रोल महंगा? देशहित। नौकरी नहीं? आत्मनिर्भर बनो। अस्पताल महंगे? योग करो। मतलब हर समस्या का समाधान जनता खुद बने। सरकार सिर्फ इवेंट मैनेजमेंट करे।

चुनाव से पहले सड़कें चमकेंगी, योजनाएं बरसेंगी, विज्ञापन ऐसे चलेंगे जैसे देश दुबई को खरीदने वाला हो। लेकिन चुनाव खत्म होते ही टैक्स, दाम, कटौती। क्यों? क्योंकि चुनाव आज विचारधारा से नहीं, “Narrative Investment” से लड़े जाते हैं। 

हजारों करोड़ विज्ञापन, प्रचार, सोशल मीडिया, रैलियां, आईटी सेल, डेटा मैनेजमेंट में जाते हैं। फिर वह पैसा कहीं से निकलेगा। और सबसे आसान एटीएम कौन है? जनता। इसलिए चुनाव के बाद अक्सर महंगाई का इंजेक्शन लगता है। 

जनता भूल जाती है कि चुनावी मुफ्तखोरी का बिल आखिर भर कौन रहा है। वही आदमी जो लाइन में सिलेंडर खरीद रहा है।

बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत उसकी राजनीति नहीं, “ध्यान नियंत्रित करने की कला” है। अगर देश में बेरोजगारी बढ़े और जनता रोज उसी पर चर्चा करे, तो सरकार मुश्किल में पड़ जाएगी। लेकिन अगर जनता दिनभर धर्म, पाकिस्तान, इतिहास, फिल्म, कपड़े, खानपान, यूट्यूबर और बहिष्कार में उलझी रहे, तो अर्थव्यवस्था बैकग्राउंड में चली जाती है।

यह बिल्कुल वैसा है जैसे जेबकतरा पहले सड़क पर तमाशा करवाता है, फिर जेब काटता है। जनता तमाशा देखती रहती है। जेब बाद में टटोलती है।

अगर देश सच में इतना मजबूत और आत्मनिर्भर हो गया है, तो फिर हर कुछ महीने में जनता से “त्याग” क्यों मांगा जाता है? कभी पेट्रोल कम जलाओ। कभी बिजली बचाओ। कभी खर्च कम करो। कभी घर पर रहो। कभी कम खरीदो। 

अरे भाई, 12 साल से लगातार सत्ता में बैठी सरकार अगर आज भी जनता से कह रही है कि “कठिन समय है”, तो फिर वह सुनहरे दिन गए कहां? टीवी पर? ड्रोन शो में? विज्ञापनों में?

नेहरू के समय देश सचमुच गरीब था, टूटा हुआ था, भूखा था। फिर भी सरकार कहती थी “हम फैक्ट्री बनाएंगे, IIT बनाएंगे, बांध बनाएंगे, वैज्ञानिक संस्थाएं बनाएंगे।” आज देश खुद को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताता है, लेकिन जनता से कहा जाता है “कम खर्च करो, त्याग करो, सहन करो।” 

यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। गरीब देश उम्मीद दे रहा था। अमीर बनने का दावा करने वाला देश डर बेच रहा है।

तुम्हें यह यकीन दिला दिया गया कि सरकार की आलोचना करना देश की आलोचना है। बस यहीं लोकतंत्र आधा मर जाता है।

क्योंकि जिस दिन जनता सवाल पूछने से डरने लगे, उस दिन नेता राजा बन जाता है और नागरिक भक्त। फिर महंगाई भी प्रसाद लगती है और बेरोजगारी भी राष्ट्रसेवा।

साभार 
https://www.facebook.com/share/p/18gLG782P6/

साभार - Pankaj Kumar Jat ( फेसबुक  पोस्ट )
वयं राष्ट्रे जागृयाम 
18/5/2026