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Monday, 17 August 2026

सत्यार्थ प्रकाश की संस्करणों में अशुद्धियों का लगातार शुद्धिकरण

पूर्व के एक लेख में मैंने, सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानन्द के दो झूठ दिखाये। जिसमें पहला झूठ था - स्वामी दयानन्द ने राजा भोज के संजीवनी नामक ग्रंथ का झूठा वर्णन किया, ऐसा कोई ग्रंथ था ही नहीं, न अब है। स्वामी जी ने दूसरा झूठ भोज प्रबंध ग्रंथ का श्लोक लिखकर बोला था, जब कि भोजप्रबंध में ऐसा कोई श्लोक था ही नहीं । आर्यसमाजियों ने इस प्रत्यक्ष दिख रहे स्वामी जी के झूठ को भी झूठ स्वीकार नहीं किया, और न ही इस पर कोई टिप्पणी की, न ही इसका खंडन किया।अब इतने स्पष्ट असत्य की रक्षा बेचार कैसे कर पाये ? किन्तु मेरे नाम से लिखी गयी एक एक पोस्ट पर एक आर्यसमाजी ने कमेन्ट किया कि - "सत्यार्थ प्रकाश में कुछ भी गलत नहीं है, इस पर हठी और दुराग्रही ही आक्षेप करते है"। 

यह केवल इस एक आर्यसमाजी की मान्यता नहीं है, यह सत्य है कि प्रत्येक आर्यसमाजी यही मानता है कि - स्वामी दयानन्द ऋषि थे, महर्षि थे, आप्तपुरुष थे, व्याकरण के सूर्य थे , इसलिए उनकी बनाई सत्यार्थ प्रकाश में सब कुछ सत्य है, यह स्वतः प्रमाण है, इसमें जो भी लिखा है वह अंतिम सत्य है "। 

जब कि वास्तविकता यह है कि - इन नए नए पैदा हुये आर्यसमाजियों को आर्यसमाज और सत्यार्थ प्रकाश का सही इतिहास ही नहीं पता है। ये मूर्ख कहते है कि - "सत्यार्थ प्रकाश में कोई दोष नहीं है , और में घोषणा करता हूँ , कि विश्व की एकमात्र ऐसी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश ही है, जिसमें सर्वाधिक अशुद्धिया है, गलतिया है। और ये अशुद्धिया इस हद तक है कि पिछले सवा सौ वर्ष से इस पुस्तक को अनेकों आर्यसमाजी शुद्ध करने का प्रयास करते आ रहे है, किन्तु यह शुद्ध ही नहीं हो पा रही है।

मेरी तो यहाँ तक इच्छा है कि, गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड वालो से सम्पर्क करके "सर्वाधिक अशुद्धियों वाली और सवा सौ वर्ष से लगातार किए जा रहे शुद्धिकरण के अथक प्रयासो के बाद भी शुद्ध नही हो पा रही " पुस्तक के तौर इसका नाम वर्ल्ड रेकॉर्ड वाली सूची में दर्ज कराया जाये। 

अब में सत्यार्थ प्रकाश की इन हजारो गलतियो में से केवल उन उन गलतियो और परवर्तन को दिखाता हूँ, जो कि केवल आर्यसमाजियों द्वारा स्वीकार की गयी है --- 

 सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय संस्करण की भूमिका में स्वामी दयानन्द लिखते है कि - "इस ग्रंथ को भाषा व्याकरणानुसार शुद्ध करके दूसरी बार छपवाया है_ _ _ जो प्रथम छपने में कही कही भूल रही थी, वह निकालकर शोधकर ठीक ठीक कर दी गयी है। "

यानि पहले स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश अपने लिपिकरो से लिखवाई । उसके बाद स्वामी दयानन्द ने उसे जांचा और ठीक किया । फिर उसके बाद उस लिखे हुये को मुद्रित किया गया और फिर मुद्रण प्रतियो के अंश पुनः स्वामी दयानन्द के पास आए , उन्हौने पुनः इसे जाँचकर शुद्ध किया। यानि स्वामी दयानन्द ने अपनी लिखवाई गयी सत्यार्थ प्रकाश को , स्वयं दो बार पढ़कर शुद्ध किया"। 

अब देखिये कैसी हास्यास्पद मूर्खताओ का क्रम चलता है - 

स्वामी दयानन्द ने दो बार सत्यार्थ प्रकाश को शुद्ध करके , वैदिक यंत्रालय के प्रबंधकर्ता मुंशी समर्थदान को भेज दिया। स्वाभाविक है मुंशी जी ने भी इसे पढ़ा होगा। फिर इस सत्यार्थ प्रकाश को छाप दिया गया। 

किन्तु इसके बाद इस संस्कारण में 147 अशुद्धिया पाई गई और इसका शुद्धिपत्र जारी कर दिया गया। पुस्तक को शुद्ध करके छापा गया। 

उस समय तक सत्यार्थ प्रकाश को छापने का अधिकार (कॉपीराइट) आर्यसमाज की परोपकारिणी सभा के ही पास था। स्वामी दयानन्द ने इस सभा को ही अपना उत्तराधिकारी बनाया था। 

तब परोपकारिणी सभा के लोगो ने पुनः पाया कि स्वामी दयानन्द के द्वारा दो बार शुद्ध की गयी, फिर उसके बाद हमारे भी द्वारा 147 अशुद्धियों को शुद्ध करने के बाद भी , सत्यार्थ प्रकाश में अनेक अशुद्धिया रह गयी है। तब सभा ने पाँचवी आवृत्ति छपवाते समय पंडित लेखराम से सत्यार्थ प्रकाश को संशोधित करवाया। इस तरह पाँचवी आवृति 'महाशुद्ध' करवाके परोपकारिणी सभा ने छपवा दी। 

किन्तु हाय रे दुर्भाग्य , पाँचवी आवृत्ति जिसे कि महान पंडित लेखराम द्वारा पूर्ण शुद्ध कर दिया था, इसके बाद भी देखा गया कि सत्यार्थ प्रकाश में तो अभी भी अनेक अशुद्धिया है , संशोधन की आवश्यकता है। 

तब फिर परोपकारिणी सभा ने पाँचवी आवृत्ति से लेकर 39 वी आवृत्ति तक समय समय पर 5 से 6 समितिया आर्यसमाज के विद्वानो की बनाई , जिनका कार्य सत्यार्थ प्रकाश को शुद्ध करना था। इन समितियों में स्वामी श्रद्धानंद , भवानीलाल भारतीय सहित अनेकों आर्यसमाज के उस उस समय के विद्वान शामिल किए गए। इस तरह वर्ष दर वर्ष समितिया बना बनाकर सत्यार्थ प्रकाश की अशुद्धियों को दूर करने के लिए महा-महा-शुद्धि अभियान चलाया गया। किन्तु यह पुस्तक शुद्ध न हो सकी, फिर भी अनेक दोष बने रहे।

इसके बाद सत्यार्थ प्रकाश को छापने का परोपकारिणी सभा का कॉपीराइट समाप्त हो गया, तब आर्यसमाज की अन्य सभाओ ने भी सत्यार्थ प्रकाश को अपनी अपनी हैसियत के अनुसार शुद्ध करके छापा, किसने कितनी अशुद्धिया/गलतिया पायी और संशोधन किए है , वह बताते है ------ 

1 - परोपकारिणी सभा ने 35 के लगभग संस्करण निकालकर लगभग 3000 अशुद्धियों को शुद्ध व परिवर्तन किया। 

2- आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट ने भी लगभग 3000 परिवर्तन किए। 

3 - युधिष्ठिर मीमांसक तथा स्वामी विद्यानंद सरस्वती के अलग अलग संस्करणों में लगभग 4500 संशोधन-परिवर्तन किए गए। 

4- स्वामी जगदीशवरानंद सरस्वती के संस्करण में इतने संशोधन किए कि आर्यसमाजी भी गिन नहीं पाये। 

5 - सत्यार्थ प्रकाश न्यास , उदयपुर के संस्करण में 3000 के लगभग परिवर्तन किए गए। 

इस प्रकार आर्यसमाज की भिन्न भिन्न सभाओ ने सत्यार्थ प्रकाश छापी , सभी ने औसतन 3500 अशुद्धियों को ठीक किया, पाठ परिवर्तन किए , जोड़ा घटाया। 

यानि स्वामी दयानन्द जिस शुद्ध सत्यार्थ प्रकाश को देकर गए थे, उसे मूल रूप में "शर्म के मारे" आर्यसमाज की कोई सभा आज के समय में प्रकाशित नहीं कर रही है। सब ने अपनी अपनी "औकात" के अनुसार सत्यार्थ प्रकाश का शुद्धिकरण कर डाला है, अर्थात जोड़ना घटाना कर दिया है, अर्थात सत्यार्थ प्रकाश की इज्जत लूट ली है। .... और हमें ये आर्यसमाज के नए रंगरूट बताते है कि - 'सत्यार्थ प्रकाश में कुछ गलत नहीं है'। और कैसे और कितना गलत होगा मियां ? 

लेकिन बात इतने पर ही न रुकी ..... 140 वर्षो तक आर्यसमाज के बड़े बड़े विद्वानो द्वारा समितिया बना बना कर , और स्वतंत्र रूप से भी लगातार सत्यार्थ प्रकाश को शुद्ध करने के प्रयासो के बावजूद सत्यार्थ प्रकाश शुद्ध न हो सकी । :) 

फिर आर्यसमाज के एक विद्वान डॉक्टर सुरेन्द्र कुमार ने इसे "फाइनली महा महा महा शुद्ध करने का बीड़ा उठाया । यहाँ ये भी बताना आवश्यक है कि आर्यसमाजियों में आपस में सत्यार्थ प्रकाश को शुद्ध करने को लेकर, जोड़ने घटाने को लेकर , पाठ बदलने को लेकर आपस में मुर्गा-लड़ाई होती रही है। आर्यसमाज का एक पक्ष कहता है कि - जो दो चार हजार परिवर्तन करके स्वामी जी की इज्जत पर रफू कर दिया है इतना ही रहने दो , और आर्यसमाज का दूसरा पक्ष कहता है कि - इतनी शुद्धिया करके भी अशुद्ध रह गयी तो क्या लाभ , इसलिए और ज़ोर लगाकर इसे पूरा शुद्ध करते है, ताकि आगे चलकर दुनिया से कह सके कि - देखो स्वामी दयानन्द इतने बड़े विद्वान थे कि उनकी पुस्तक में एक भी गलती नहीं है । 

खैर आर्यसमाज के डॉक्टर सुरेन्द्र कुमार ने काफी समय श्रम किया , और अंततः सत्यार्थ प्रकाश का अब तक का सबसे शुद्ध संस्करण प्रकाशित करने का दावा किया। इन्हौने भी तीन चार हजार गलतिया सत्यार्थ प्रकाश में निकाल दी, अर्थात इतने परिवर्तन किए। 

लेकिन क्या अब भी सत्यार्थ प्रकाश शुद्ध एवं दोष रहित है ? इसका उत्तर है नहीं । :) सवा सौ से अधिक वर्ष तक , सौ से अधिक संस्करण प्रकाशित करने के बाद , 40 के लगभग आर्यसमाज के संपादकों द्वारा संशोधित संस्करण प्रकाशित करने के बाद भी सत्यार्थ प्रकाश अशुद्ध ही रह गया। अरे जब खुद स्वामी दयानन्द जैसे महान ऋषि ही दो बार शुद्ध करने के बाद खुद ही इसे शुद्ध न कर पाये,तो ये 40 क्या 400 भी लग जाये तो क्या कर पाएंगे ? :) अब बताइये पूरे विश्व में किसी भी पुस्तक को लेकर ऐसा कोई उदाहरण है क्या ? 

आर्यसमाज के रामनाथ वेदालंकार, दयानंद संदेश में लिखते है कि - "हे देव दयानंद, तुम यदि देख पाते कि तुम्हारे सत्यार्थ प्रकाश की कैसी मिट्टी पलीत हो रही है तो तुम रो पड़ते __ _ _ _ तुमने कभी स्वप्न में नहीं सोचा होगा कि तुम्हारे किए कराये हुये सही संशोधन, प्रतिलिपिकर्ता की मिलावट कहकर ठुकरा दिये जाएँगे और तुम्हारी प्रथम पाण्डुलिपि की रफ तथा गलत इबारत को भी रत्न मानकर सँजोया जाएगा "। 

निष्कर्ष यह निकलता है कि, सत्यार्थ प्रकाश में एक दो सौ पाँच सौ नहीं बल्कि हजारो गलतिया थी, छोटी से लेकर बड़ी गलतिया। आर्यसमाजियों ने इन्हे ठीक करने का खूब प्रयास किया , लेकिन गलतिया ही ऐसी ऐसी विचित्र और इतनी थी , कि हर बार कम करे, अगली बार फिर दिख जाती । रक्तबीज की तरह .... । गलतिया ठीक करने के साथ साथ आर्यसमाजियों ने, सत्यार्थ प्रकाश से अनेक चीजों को हटाया भी, कुछ अपनी ओर से जोड़ा भी । मतलब स्वामी जी के अमर ग्रंथ का हाल इन दुष्टो ने उस मजबूर वैश्या जैसा कर दिया, जिससे आकर कोई भी बलात्कार कर जाये । कभी अकेले किया, कभी समितिया बनाकर सामूहिक बलात्कार किया। 

इसका एक कारण तो यह जान पड़ता है कि, आर्यसमाजी नहीं चाहते थे जिन स्वामी दयानन्द की हद से ज्यादा झूठी प्रसंशा वे कर रहे है, सत्यार्थ प्रकाश को पढ़कर लोग सत्य जानेंगे , दूसरा कारण संशोधन का ये रहा कि कई चीजे स्वामी दयानन्द की इन्हे अटपटी लग रही थी। जिसे इन्हौने हटा दिया। तीसरा कारण था कि कुछ अपना भी जोड़ना था । अब इन्हौने क्या क्या परिवर्तन किए और क्या क्या गलतिया थी , इसे संक्षेप में देखिये - 

1 - बीस से अधिक वेदमंत्रो को ही स्वामी दयानन्द ने गलत लिख रखा था । जैसे कि - "सत्यमेव जयति नानृतम्" (पृष्ठ संख्या 4) । "एकं सद् विप्रा बहु वदन्ति (पृष्ठ संख्या 7 ) मूल प्रति । ऐसे ऐसे प्रसिद्ध मंत्र भी स्वामी दयानन्द ने गलत लिखे थे। इन गलतियो को बाद में आर्यसमाजियों ने ठीक किया। 

2 - अनेक संस्कृत वाक्य अशुद्ध लिखे थे - जैसे कि - "गण्यन्ते ये ते गुणा " (गुण्यंते )" (पृष्ठ संख्या 34) ऐसी अनेकों गलतिया स्वामी जी ने की थी, जो आर्यसमाजियों ने सुधारी। 

3 - स्वामी दयानन्द ने गणित की भी अनेक हास्यास्पद गलतिया कर रखी थी जैसे कि - "पृष्ठ संख्या 67 , पर लिखा था कि - छत्तीस और आठ मिलके बयालीस होते है :) , बाद में आर्यसमाजियों ने बयालीस की जगह चौबालीस लिखा। 

"बारह बारह वर्ष मिल के छत्तीश और आठ मिला के बयालीश (समुल्लास 3, मूलस॰ पृष्ठ 47 , द्वितीय स॰ 32 )

ये था स्वामी दयानन्द का अद्भुद गणित का ज्ञान , बारह और बारह को जोड़कर छत्तीश बना दिये :) 

इस प्रकार की अनेक हास्यास्पद साधारण गुना भाग की भी गलतिया स्वामी दयानन्द ने की थी। ऐसी कई गणनात्मक गलतियो को आर्यसमाजी ठीक करते रहे। 

 4 - शब्दो में हजारो गलतिया थी, जो ठीक की गई। 

5 - इसके अलावा कई जगह पाठ परिवर्तन किया, जैसे कि चतुर्थ समुल्लास में स्वामी दयानन्द पहले से ही गर्भवती स्त्री से भी नियोग करा रहे थे, इसे संशोधित किया गया। 

6- अब देखिये सत्यार्थ प्रकाश से क्या क्या हटाया गया - समुल्लास दस में मूलप्रति पृष्ठ 365 में लिखा है कि - "(माँस को , चाहे कुत्ते आदि मांसाहारियो को खिला देवे, चाहे कोई मांसाहारी खावे तो भी संसार की हानि नहीं होती ) 

इसके आगे स्वामी दयानन्द लिखते है कि - "जो ग्राम में कुक्कुट सूअर तथा मांसाहारी सब पशु-पक्षी जो पेट से चलते है, अशुद्धहारी है , मत्स्यादि है, वे सब अभक्ष्य (न खाने योग्य) है, और इनसे भिन्न शुद्धाहारी जांगल सब भक्ष्य है, किन्तु यह बात राजवर्गी मनुष्यो के लिए है । 

यहाँ स्वामी दयानन्द माँस किस किस का खाना चाहिए, यह बता रहे थे। आर्यसमाजियों ने इसे सत्यार्थ प्रकाश से हटा दिया। 

फिर आगे स्वामी दयानन्द "ग्राम के कुक्कुट आदि अभक्ष्य और वनस्थ भक्ष्य है, इसमें क्या युक्ति है " इस प्रश्न के उत्तर में लिखते है कि - " ग्राम के कुक्कुट आदि अशुद्धाहारी , अभक्ष्य और जंगलवासी शुद्धाहारी भक्ष्य है। किन्तु उस मनुष्य का स्वभाव मांसाहारी होकर हिंसक हो सकता है " ( समुल्लास दस , मुद्रणप्रति पृष्ठ 183) 

अब स्वामी दयानन्द मांसभक्षण को पुनः ठीक मानने लगे थे इसका प्रमाण यह है कि , जब शोध करके स्वामी दयानन्द ने ये सत्यार्थ प्रकाश के पृष्ठ , वैदिक यंत्रालय को भेजे थे तब वैदिक यंत्रालय के प्रमुख मुंशी समर्थदास भड़क उठे थे और उन्हौने स्वामी दयानन्द को उलाहना देते हुये पत्र लिखा कि - ""थोड़े थोड़े काल में विचार का बदलना हानिकारक होता है"। आप कभी मांसभक्षण का विरोध करने लगते है, कभी समर्थन करने लगते है। हर कुछ समय में सिद्धान्त बदल लेते है। (यह पत्र आर्यसमाज से प्रकाशित दयानन्द पत्रावली में है , जाकर देख सकते है, और स्वामी दयानन्द का मांसभक्षण का समर्थन करने वाला पत्र इनके द्वारा फाड़ दिया गया था, इसका वर्णन भी दयानन्द पत्रावली में है ) 

 और भी देखिये , मुद्रणप्रति पृष्ठ संख्या 183, समुल्लास दस में स्वामी दयानन्द लिखते है कि - "तंडुलादि, गोधूम, फल -मूल, कन्द , दूध , घी मिष्ठादि का सेवन और पूर्वोक्त वनस्थ पशुओ के माँस का सेवन राजपुरुष करे"। 

यह भी आर्यसमाजियों ने सत्यार्थ प्रकाश से हटा दिया। ऐसे अनेक तथ्य जिनको लेकर स्वामी दयानन्द ने अपना मत बदल लिया था, किन्तु आर्यसमाजियों को यह ठीक न लगा, उन्हौने सोचा इससे तो बड़ी अप्रतिष्ठा होगी, इसलिए ये सत्यार्थ प्रकाश से हटा दिये गए। यही कारण है कि स्वामी दयानन्द की पुस्तकों में वर्णव्यवस्था, मांसभक्षण, यज्ञोपवीत, मुक्ति आदि अनेक सिद्धांतो पर विरोधी विचार मिलते है। यह सब इसी जोड़ने घटाने का परिणाम है। 

(7) - स्वामी दयानन्द लिखते है कि - "उत्तम वर्णो के हाथ का खाना और चांडालादि नीच भंगी चमार आदि का न खाना । (समुल्लास 10, मुद्रणप्रति , पृष्ठ संख्या 183। स्वामी दयानन्द के इस जातिवादी घृणा दर्शाने वाले वाक्य को भी हटा दिया गया। 

स्वामी दयानन्द लिखते है - "अयोध्या नगरी वस्ती, कुत्ते, गधे, भंगी, चमार, जाजरू सहित तीन बार स्वर्ग में गयी (समुल्लास 11, मुद्रणप्रति पृष्ठ संख्या 224 ) 

इन पंक्तियो में स्वामी दयानन्द ने भंगी, चमार आदि शब्दो का प्रयोग घृणा के साथ किया था, इसलिए आर्यसमाजियों ने इन वाक्यो को भी हटा दिया।

इसके अतिरिक्त भी शूद्रो के लिए ऐसे वाक्य स्वामी दयानन्द ने कहे थे, वे सब हटाये गए। 

8 - अनेक गलतिया ऐसी भी थी कि -स्वामी जी लिखते है - "इसलिए जो कुछ भी वेदादि शास्त्रो में व्यवस्था व इतिहास लिखे है, उसी का मान्य करना भद्र पुरुषो का काम है । (मूलप्रति पृष्ठ संख्या 304) । यहाँ स्वामी दयानन्द वेदो में इतिहास स्वीकार कर रहे थे, इसे हटा दिया गया। 

कुल मिलाकर अधिक क्या कहे , सत्य तथ्य यह है कि - ऐसी हजारो गलतिया स्वामी दयानन्द की लिखी इस सत्यार्थ प्रकाश में खुद आर्यसमाजियों द्वारा ही मानी और परिवर्तित की गयी है , जिससे यह हमारा कथन सिद्ध होता है कि सत्यार्थ प्रकाश विश्व के इतिहास की सर्वाधिक अशुद्धियों से भरी पुस्तक है। 

अब आर्यसमाजियों के सामने दो विकल्प है - पहला - हजारो गलतियो अशुद्धियों वाली पुस्तक को लिखने वाला व्यक्ति ऋषि महर्षि या आप्तपुरुष नहीं हो सकता, इसे स्वीकार करे और इस झूठ को गाना बंद करे । दूसरा - इसे सच माने कि यह द्वितीय संस्करण स्वामी दयानन्द ने लिखा ही नहीं है। स्वामी दयानन्द ने केवल सत्यार्थ प्रकाश का प्रथम संस्करण ही लिखा था। द्वितीय संस्करण आर्यसमाजियों ने उनके मरने के बाद , खुद से बनाकर छापा इसलिए इसमें हजारो की संख्या में गलतिया है। अब जिनमें थोड़ी बुद्धि शेष है वे आर्यसमाजी इन दोनों में से किसी एक विकल्प को चुन ले।

किन्तु कम से कम इतना बड़ा झूठ बोलकर हिन्दुओ को न बहकाइए कि - स्वामी दयानन्द जैसा विद्वान अन्य कोई न रहा है और उनकी लिखी सत्यार्थ प्रकाश मे कोई गलतिया नहीं है। एवं ये हजारो गलतिया केवल वह है जो कि आर्यसमाजी विद्वानों द्वारा ही स्वीकार की गयी है। इसके अतिरिक्त भी अनेकों बड़ी बड़ी गलतिया झूठ इस पुस्तक में लिखे गए है। कुछ ऐसे झूठो को पूर्व के लेखो में दिखाया जा चुका है, आगे भी दिखाया जाएगा। ॥जय श्री राम॥
साभार - शचींद्र शर्मा 
लिंक - https://www.facebook.com/share/p/17qxmHYToT/
शचीन्द्र शर्मा जी

 कमेंट १ चन्र्दभान सिंह कानावत मेवाड़ 
सुना है कि वर्तमान आर्य समाजियों ने पुरानी सत्यार्थ प्रकाश दयानंद की पुस्तक ही बदल दी हैं। 😁

शचींद्र जी का रिप्लाई 
चन्द्रभान सिंह कानावत मेवाड़ हां यह सत्य है। सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम संस्करण में स्वामी दयानंद ने बांझ गायों की बलि देने को भी उचित ठहराया है। और भी अनेक ऐसी बाते है। दयानंद की मृत्यु के बाद आर्यसमाजियों ने उसे गायब करके यह सत्यार्थ प्रकाश चलाई, इससे संबंधित यह छोटा सा लेख है । https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=122170072202210006&id=61556300201732&mibextid=Nif5oz
 

"किताबें जल सकती हैं, स्याही मिट सकती है और पन्ने धूल बन सकते हैं; मगर जो सत्य ब्रह्मांड के कण-कण में गूंज रहा है, वह अजर, अमर और अपौरुषेय है!"

"सन 1193 की वह खौफनाक रात याद कीजिए, जब नालंदा महाविहार के नौ मंजिला पुस्तकालय 'धर्मगंज' में आग लगा दी गई थी। इतिहास गवाह है कि 'रत्नसागर', 'रत्नोदधि' और 'रत्नरंजक' की लाखों दुर्लभ पांडुलिपियां तीन महीने तक लगातार जलती रहीं। उस भयंकर अग्निकांड को देखकर हमलावर बर्बर सेनापति ने सोचा था कि उसने भारत की रीढ़, उसका मस्तिष्क और उसकी हज़ारों साल पुरानी ज्ञान-परंपरा को राख के ढेर में बदल दिया है। मगर वह एक बुनियादी बात से पूरी तरह अनजान था।

जिस ज्ञान को वह जलाकर खाक समझ रहा था, वह दरअसल कभी किसी कागज़, कपड़े या ताड़पत्र का मोहताज था ही नहीं! वह तो अंतरिक्ष के कण-कण में, हवाओं के कम्पन में और भारत के ऋषियों के कंठ में जीवित था। एक ऐसा ज्ञान, जिसे न आग छू सकती थी, न पानी गला सकता था, न काल का कोई क्रूर थपेड़ा मिटा सकता था।

मगर सवाल यह उठता है कि क्या यह केवल एक भावुक अतिशयोक्ति है या इसके पीछे छिपा है कोई ऐसा अचूक वैज्ञानिक, गणितीय और ध्वन्यात्मक कोड, जिसे आधुनिक क्वांटम भौतिकी आज जाकर समझने की कोशिश कर रही है? जब दिनेश श्रीवास्तव जी जैसे सजग पाठक यह पूछते हैं कि 'वेदों को केवल लिखित ग्रंथ न मानने का आधार क्या है, ऋषियों ने इसे कब, कहाँ और किस अवस्था में देखा, और इसका अकाट्य साक्ष्य क्या है?'—तो यह सवाल भारतीय दर्शन की उस सबसे गहरी गुफा का दरवाज़ा खटखटाता है जहाँ विज्ञान और चेतना एक बिंदु पर आकर विलीन हो जाते हैं।"

1. अक्षरों का भ्रम और शाश्वत ज्ञान की मीमांसा
आज की 21वीं सदी में जब भी हम 'शास्त्र' या 'ग्रंथ' शब्द सुनते हैं, तो हमारे मन-मस्तिष्क में किसी लाइब्रेरी की अलमारी में सजी जिल्द वाली किताबें, कागज़ के पन्ने या स्मार्टफोन की स्क्रीन पर तैरते पीडीएफ दस्तावेज़ कौंध जाते हैं। हम यह मान बैठते हैं कि किसी लेखक ने मेज़-कुर्सी पर बैठकर कलम उठाई, अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाए और एक ग्रंथ लिख दिया।

परंतु भारतीय ज्ञान परंपरा का आधारभूत ढांचा इस संकीर्ण दृष्टिकोण को पहले ही चरण में पूरी तरह खारिज करता है। भारतीय दर्शन में समस्त वांग्मय को दो स्पष्ट श्रेणियों में विभाजित किया गया है: स्मृति और श्रुति।

स्मृति (मानव-निर्मित संकलन): वे ग्रंथ जिन्हें मानवीय बुद्धि ने अपनी स्मृति, सामाजिक परिस्थितियों, देश-काल और अनुभवों के आधार पर रचा। उदाहरण के लिए मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति, रामायण, महाभारत और अठारह पुराण। ये ग्रंथ काल-सापेक्ष (Time-bound) हैं; युग बदलने पर इनमें संशोधन संभव है और इनमें मानवीय सीमाओं का प्रभाव भी दिखाई दे सकता है।

श्रुति (अपौरुषेय सत्य): वे मूलभूत और सार्वभौमिक नियम जिन्हें किसी मनुष्य (पुरुष) ने अपनी बुद्धि से गढ़ा नहीं है। यह प्रकृति और ब्रह्मांड के वे शाश्वत सत्य हैं जो काल और स्थान की सीमाओं से सर्वथा परे हैं। इसके अंतर्गत केवल चार वेद संहिताएं, उनके ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् आते हैं।

अपौरुषेयता का वास्तविक दार्शनिक आधार: 'अपौरुषेय' शब्द का शास्त्रीय विग्रह है—न पौरुषेयम् इति अपौरुषेयम्—अर्थात् जिसकी रचना किसी सीमित मानव व्यक्तित्व द्वारा न की गई हो। महर्षि जैमिनि ने अपने कालजयी ग्रंथ पूर्व मीमांसा सूत्र (अध्याय 1, पाद 1, सूत्र 18–27) में 'शब्द-अर्थ-सम्बन्ध' की नित्य मीमांसा करते हुए यह सिद्ध किया है कि मौलिक ज्ञान नित्य (Eternal) होता है।

इसे एक अत्यंत सरल और दैनिक जीवन के उदाहरण से समझा जा सकता है। आइजैक न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत दुनिया के सामने रखा या अल्बर्ट आइंस्टीन ने द्रव्यमान-ऊर्जा समीकरण प्रतिपादित किया। क्या न्यूटन से पहले गुरुत्वाकर्षण अस्तित्व में नहीं था? क्या उससे पहले पेड़ से टूटा सेब आकाश की ओर उड़ जाता था? बिल्कुल नहीं। सेब हमेशा से नीचे ही गिरता था। न्यूटन गुरुत्वाकर्षण के 'निर्माता' (Creator) नहीं थे, वे केवल उसके 'खोजकर्ता' (Discoverer) थे। ठीक इसी प्रकार, सृष्टि को संचालित करने वाले आध्यात्मिक, चेतनात्मक और ब्रह्मांडीय नियम अनादि काल से अस्तित्व में हैं। वैदिक ऋषियों ने इन नियमों को बैठकर अपनी कल्पना से नहीं रचा; वे तो इन सार्वभौमिक नियमों के प्रथम प्रत्यक्षदर्शी (First Witnesses) बने।

"यहाँ पहुंचकर बुद्धि चकरा जाती है! अगर ऋषि लेखक नहीं थे, तो फिर वे क्या थे? कल्पना कीजिए एक ऐसे वैज्ञानिक की, जिसके पास न कोई आधुनिक टेलीस्कोप था, न लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर, और न ही कोई सुपरकंप्यूटर। वह केवल आंखें मूंदकर एक एकांत गुफा में या नदी के किनारे बैठा था। फिर उसने ऐसा क्या देख लिया जो आज के पार्टिकल फिजिक्स के वैज्ञानिक अरबों डॉलर की मशीनों से देखकर भी पूरी तरह समझ नहीं पा रहे हैं?

क्या यह संभव है कि मनुष्य का अपना मस्तिष्क ही ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली एंटीना बन जाए? क्या सचमुच हमारे भीतर एक ऐसा रेडियो ट्यूनर मौजूद है जो ब्रह्मांड की मौलिक फ्रीक्वेंसी को लाइव पकड़ सकता है? आइए, अब उस अलौकिक प्रयोगशाला का रहस्य खोलते हैं जहाँ शब्दों का जन्म किसी कागज़ पर नहीं, बल्कि समाधि के परम शून्य में हुआ था..."

2. 'ऋषिर्दर्शनात्': ऋषि रचनाकार नहीं, सत्य के द्रष्टा हैं
प्राचीन काल के महान भाषाविद् और व्युत्पत्ति-शास्त्र के आचार्य महर्षि यास्क ने अपने विश्वप्रसिद्ध ग्रंथ निरुक्त (2.11) में एक अकाट्य सूत्र दिया है: 'ऋषिर्दर्शनात्'—अर्थात् 'ऋषि' शब्द की व्युत्पत्ति ही 'दर्शन' (देखने) से हुई है। ऋषि कोई कवि या कथावाचक नहीं थे जो छंदों की तुकबंदी करते थे। ऋषि वे महामानव थे जिनकी चेतना इतनी निर्मल, स्थिर और एकाग्र हो चुकी थी कि वे उस परम सत्य को साक्षात देख सकते थे जो साधारण मानवीय आंखों और सीमित तर्कबुद्धि की पकड़ में नहीं आता।

इसे आप एक रेडियो और तरंगों के उदाहरण से बहुत सरलता से समझ सकते हैं। जब आपके कमरे में रखा रेडियो चालू होता है, तो उस पर एक मधुर गीत बजने लगता है। क्या वह गीत उस लकड़ी या प्लास्टिक के बक्से के अंदर बैठा हुआ कोई इंसान गा रहा है? नहीं। वह गीत तो अदृश्य रेडियो तरंगों (Electromagnetic Waves) के रूप में पूरे कमरे और वातावरण में पहले से ही तैर रहा था। रेडियो ने बस सही फ्रीक्वेंसी पर ट्यून होकर उस अदृश्य तरंग को पकड़ा और उसे आवाज़ में बदल दिया। ठीक इसी प्रकार ऋषि का मन वह 'रिसीवर' था, जिसने ब्रह्मांड में तैरते शाश्वत ज्ञान को अपनी समाधि में ट्यून करके पकड़ा और वाणी दी।

वैदिक साहित्य की वैज्ञानिक प्रामाणिकता का सबसे बड़ा साक्ष्य यह है कि प्रत्येक वैदिक सूक्त के साथ तीन अनिवार्य तत्व सदैव जुड़े रहते हैं: पहला ऋषि (The Observer) यानी वह चेतना जिसने उस मंत्र का पहली बार साक्षात्कार किया; दूसरा छंद (The Mathematical Metric) यानी उस मंत्र का विशिष्ट ध्वन्यात्मक और आवृत्तिमूलक ढांचा (जैसे गायत्री, अनुष्टुप, त्रिष्टुप, जगती); और तीसरा देवता (The Subject/Energy Field) यानी उस मंत्र का मुख्य विषय, तत्त्व या ब्रह्मांडीय ऊर्जा-केंद्र।

ऋग्वेद के विभिन्न मंडलों में इस साक्षात्कार का स्पष्ट विवरण मिलता है। उदाहरण के लिए, द्वितीय मंडल में महर्षि गृत्समद ने अग्नि और प्राण-ऊर्जा के मूल नियमों का साक्षात्कार किया। तृतीय मंडल में महर्षि विश्वामित्र ने चेतना को सूर्यवत जाग्रत करने वाले प्रसिद्ध गायत्री महामंत्र का दर्शन किया। चतुर्थ मंडल में महर्षि वामदेव ने आत्म-साक्षात्कार और गर्भस्थ चेतना के विकास के गूढ़ रहस्यों को अनुभव किया। पंचम मंडल में महर्षि अत्रि ने सौर भौतिकी, ग्रहण और अंधकार निवारण के सिद्धांतों को देखा। षष्ठ मंडल में महर्षि भारद्वाज ने आयुर्वेद, ब्रह्मांडीय संतुलन और पर्यावरण ऊर्जा का दर्शन किया। सप्तम मंडल में महर्षि वसिष्ठ ने जीवन-रक्षा के महामृत्युंजय मंत्र और वरुण चेतना का साक्षात्कार किया। वहीं दशम मंडल में ऋषि प्रजापति परमेष्ठी ने सृष्टि-उत्पत्ति के महाविस्फोट और ब्रह्मांडीय विकास को नासदीय सूक्त के रूप में देखा।

यहाँ यह तथ्य भी विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि वैदिक ज्ञान केवल पुरुषों की धरोहर नहीं था। वैदिक परंपरा में ब्रह्मवादिनी स्त्रियों यानी ऋषिकाओं की एक सुदीर्घ और गौरवशाली श्रृंखला रही है। गार्गी, मैत्रेयी, घोषा, लोपामुद्रा, विश्ववारा, अपाला और वाग्आम्भृणी जैसी विदुषियों ने गहन ध्यान में उतरकर वैदिक ऋचाओं का प्रत्यक्ष साक्षात्कार किया। ऋग्वेद के दशम मंडल का अत्यंत प्रसिद्ध 'देवी सूक्त' विदुषी वाग्आम्भृणी की ही आत्म-अनुभूति का प्रकटीकरण है, जहाँ वे संपूर्ण ब्रह्मांडीय चेतना के साथ एकाकार होकर बोलती हैं।

3. कब और कहाँ हुआ यह प्रकटीकरण? ऐतिहासिक एवं भूगोलीय साक्ष्य
दिनेश श्रीवास्तव जी का यह प्रश्न अत्यंत व्यावहारिक है कि "ऋषियों ने इसे कब और कहाँ देखा?" क्या इसका कोई ऐतिहासिक, भौगोलिक या वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद है? इसका उत्तर हाँ है, और यह आधुनिक भू-विज्ञान तथा खगोलशास्त्र दोनों से पूरी तरह प्रमाणित होता है।

सरस्वती नदी का भू-वैज्ञानिक साक्ष्य: ऋग्वेद के सातवें मंडल (7.95.2) में महर्षि वसिष्ठ सरस्वती नदी का प्रत्यक्ष वर्णन करते हुए कहते हैं—एकाचेतत् सरस्वती नदीनां शुचिर्यती गिरिम्य आ समुद्रात्... अर्थात् सरस्वती, जो पर्वतों से निकलकर सीधे समुद्र में जाकर गिरती है, नदियों में सबसे पवित्र और वेगवती है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के उपग्रह चित्रों और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के आइसोटोपिक हाइड्रोलॉजी परीक्षणों ने यह निर्विवाद रूप से सिद्ध कर दिया है कि प्राचीन घग्गर-हकरा नदी तंत्र ही वैदिक सरस्वती नदी थी। भू-गर्भीय हलचलों और जलवायु परिवर्तन के कारण यह विशाल नदी लगभग 4000 से 3000 ईसा पूर्व के आसपास सूखने लगी थी। ऋषियों ने जब सरस्वती को अपने पूरे वेग और विस्तार में बहते हुए देखकर इन मंत्रों का साक्षात्कार किया, वह कालखंड स्पष्ट रूप से ईसा पूर्व चौथी-पांचवीं सहस्राब्दी या उससे भी पूर्व का था। यह भूगोल सिद्ध करता है कि यह कोई काल्पनिक कथा नहीं, बल्कि इसी पावन धरती पर साक्षात घटित हुआ यथार्थ है।

खगोलीय संरेखण (Archaeo-Astronomy): वेदों और वेदांग ज्योतिष में दर्जनों ऐसे खगोलीय संदर्भ मिलते हैं जो उस समय आकाश में दिखने वाले ग्रहों और नक्षत्रों की विशेष स्थितियों को दर्शाते हैं। उदाहरण के लिए, कृत्तिका (Pleiades) नक्षत्र में वसंत संपात (Vernal Equinox) का होना। आधुनिक खगोल विज्ञान के 'प्रिसेशन ऑफ द इक्विनॉक्सिस' के गणित के आधार पर जब इन खगोलीय गणनाओं का मिलान किया जाता है, तो यह कालखंड 4500 से 6000 ईसा पूर्व के बीच का सटीक बैठता है।

4. ऋषियों ने 'उच्चतर अवस्था' में देखा—इसका स्रोत और विज्ञान क्या है?
हम यह किस आधार पर दावा करते हैं कि ऋषियों ने इसे सामान्य बुद्धि से नहीं बल्कि समाधि की उच्चतर अवस्था में देखा? इसका प्रमाण हमारे प्राचीन दर्शन, योगशास्त्र और आंतरिक मनोविज्ञान में पूरी तार्किकता के साथ दर्ज है।

वाणी के चार स्तर (The Spectrum of Sound): ऋग्वेद के प्रथम मंडल (1.164.45) का प्रसिद्ध मंत्र वाणी और ज्ञान के स्तरों को स्पष्ट करता है—चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः। अर्थात् वाणी के चार स्तर होते हैं। पहला स्तर है वैखरी, जो वह स्थूल ध्वनि है जो जीभ, होंठ और कंठ से निकलती है और कान से सुनी जाती है (जो हम अपनी दैनिक दिनचर्या में बोलते हैं)। दूसरा स्तर है मध्यमा, जो वह मानसिक भाषा है जो विचारों के रूप में हमारे मस्तिष्क और मन के भीतर चलती है। तीसरा स्तर है पश्यन्ती, जो वह दृश्यमान चेतना है जहाँ ज्ञान शब्दों में नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष प्रकाश, भाव या विजन के रूप में दिखाई देता है। और चौथा व सबसे गहरा स्तर है परा, जो चेतना की वह मूल, अव्यक्त और सूक्ष्मतम अवस्था है जहाँ से संपूर्ण ब्रह्मांड की ऊर्जा और नाद का जन्म होता है। साधारण मनुष्य केवल चौथे स्तर यानी वैखरी तक सीमित रहता है। परंतु ऋषियों ने जब ध्यान लगाया, तो वे परा और पश्यन्ती के उस स्तर पर पहुंचे जहाँ ज्ञान शब्दों के रूप में सोचा नहीं जाता, बल्कि साक्षात देखा जाता है।

शांत झील और मोती का उदाहरण: इसे समझने के लिए एक शांत झील की कल्पना कीजिए। जब पानी में लगातार पत्थर फेंके जा रहे हों और तेज़ लहरें उठ रही हों, तो झील की तलहटी में पड़ा हुआ कीमती मोती कभी दिखाई नहीं दे सकता। लेकिन जैसे ही हवा थम जाती है, पानी में हलचल बंद हो जाती है और झील पूरी तरह शांत, स्थिर और कांच जैसी पारदर्शी हो जाती है, तो तलहटी में पड़ा एक-एक बारीक कण और मोती ऊपर से ही बिल्कुल साफ दिखाई देने लगता है। साधारण अवस्था में हमारा मन विचारों, चिंताओं और इच्छाओं की लहरों से अशांत रहता है। लेकिन जब ऋषि गहन ध्यान में उतरे, तो उनके मन की सारी हलचल शांत हो गई। उस परम सन्नाटे में ब्रह्मांड का शाश्वत सत्य उनकी चेतना में साक्षात प्रतिबिंबित हो गया।

पतंजलि योगसूत्र का गवाह (ऋतम्भरा प्रज्ञा): योग दर्शन के प्रणेता महर्षि पतंजलि अपने योगसूत्र (समाधि पाद, 1.48–49) में लिखते हैं—ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा। श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात्॥ हमारी सामान्य बुद्धि केवल दो स्रोतों पर निर्भर करती है—दूसरों से सुनकर (श्रुत) या तर्क-अनुमान लगाकर (अनुमान)। इसमें हमारी व्यक्तिगत पसंद, नापसंद और पूर्वाग्रहों की मिलावट हो सकती है। परंतु जब चित्त निर्विचार समाधि (पूर्ण आंतरिक मौन) की अवस्था को प्राप्त करता है, तब 'ऋतम्भरा प्रज्ञा' जागती है। 'ऋत' का अर्थ है ब्रह्मांड का अटल, नग्न सत्य। इस अवस्था में बुद्धि किसी कल्पना को जन्म नहीं देती, बल्कि वह ब्रह्मांडीय सत्य को बिना किसी मिलावट के एक स्वच्छ दर्पण की तरह परावर्तित कर देती है। ऋषियों ने इसी निर्विचार अवस्था में वेदों के सत्यों का साक्षात्कार किया था।

5. बिना लिखे हज़ारों साल तक ज्ञान कैसे सुरक्षित रहा? (गणितीय और ध्वन्यात्मक सुरक्षा)
दिनेश जी का एक स्वाभाविक और तार्किक संशय यह भी हो सकता है कि "यदि यह ज्ञान लिखित रूप में नहीं था, तो क्या सदियों के गुजरने के साथ इसमें मिलावट (Distortion) नहीं हुई होगी?" यहीं पर प्राचीन भारतीय ऋषियों की प्रतिभा का वह चमत्कार सामने आता है जिसे देखकर आज का कंप्यूटर साइंस और क्रिप्टोग्राफी भी नतमस्तक है।

आठ विकृति पाठ (Permutation and Error-Correction Algorithms): वेदों के मूल पाठ को किसी भी प्रकार की मानवीय मिलावट या परिवर्तन से बचाने के लिए ऋषियों ने आठ प्रकार की अत्यंत जटिल विकृति पाठ शैलियां विकसित की थीं—जटा पाठ, माला पाठ, शिखा पाठ, रेखा पाठ, ध्वज पाठ, दण्ड पाठ, रथ पाठ और घन पाठ।

उदाहरण के लिए, यदि किसी मंत्र में मूल शब्द क्रम 1 - 2 - 3 (क - ख - ग) है, तो 'घन पाठ' में इसे एक अत्यंत जटिल गणितीय क्रम से उच्चारित किया जाता है: 1-2, 2-1, 1-2-3, 3-2-1, 1-2-3 (अर्थात् कख - खक - कखग - गखक - कखग)। शब्दों को सीधा, उलटा, आगे और पीछे इस कदर आपस में गूंथ दिया गया था कि यदि कोई व्यक्ति हज़ारों वर्षों में एक मात्रा, एक दीर्घ स्वर या एक अनुनासिक ध्वनि भी बदलने की कोशिश करता, तो पूरी गणितीय धुन और छंद टूट जाता था। यह मानव इतिहास का सबसे पहला और सबसे सुरक्षित 'ऑडियो ब्लॉकचेन' और 'एरर-डिटेक्शन सिस्टम' था।

यूनेस्को (UNESCO) की आधिकारिक मुहर: वर्ष 2003 में संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को ने भारतीय वैदिक पाठ की इस मौखिक परंपरा को "Masterpiece of the Oral and Intangible Heritage of Humanity" (मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर) घोषित किया। दुनिया भर के शीर्ष भाषाविदों और वैज्ञानिकों ने यह आधिकारिक रूप से स्वीकार किया कि मानव इतिहास में बिना एक अक्षर लिखे, हज़ारों वर्षों तक हज़ारों पृष्ठों के ज्ञान को एक मात्रा के अंतर के बिना पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखना मानव मस्तिष्क की सबसे असाधारण उपलब्धि है।

6. आधुनिक क्वांटम भौतिकी और 'नाद ब्रह्म' का संगम
आधुनिक भौतिक विज्ञान आज उसी मुहाने पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ उपनिषदों के ऋषि हज़ारों वर्ष पहले खड़े थे। क्वांटम फील्ड थ्योरी और स्ट्रिंग थ्योरी आज यह मानती हैं कि यदि आप पदार्थ के सूक्ष्मतम स्तर पर झांकें, तो वहाँ कोई ठोस कण (Solid Particle) नहीं है। सूक्ष्मतम स्तर पर केवल ऊर्जा के अत्यंत सूक्ष्म तंतु (Strings) हैं जो अलग-अलग आवृत्तियों (Frequencies) पर लगातार कम्पन कर रहे हैं।

हमारे शास्त्रों ने हज़ारों साल पहले उद्घोष किया था—नादात्मकं जगत् और सर्वं खल्विदं ब्रह्म। संपूर्ण ब्रह्मांड मूलतः कम्पन (Vibration) और ध्वनि का ही मूर्त रूप है। ऋषियों ने समाधि के परम शून्य में जिस आदि-कम्पन को अपनी चेतना में ग्रहण किया, वही छंदोबद्ध होकर ऋचाओं के रूप में फूट पड़ा। इसलिए वेद केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा-तरंगों के ध्वन्यात्मक समीकरण (Acoustic Equations) हैं।

"ज़रा एक पल के लिए अपनी आंखें बंद कीजिए और सोचिए… जिस ज्ञान को नालंदा की आग नहीं जला पाई, जिसे आक्रांताओं की तलवारें नहीं काट पाईं, जिसे सदियों की गुलामी मिटा नहीं पाई—वह ज्ञान आज भी हमारे बीच उसी मूल आवृत्ति और शुद्धता में जीवित है!

क्या यह केवल एक बीती हुई पुरातन कहानी है? या यह इस बात का जीता-जागता वैज्ञानिक प्रमाण है कि हमारे भीतर चेतना का एक ऐसा अनछुआ आकाश मौजूद है, जो आज भी उसी ब्रह्मांडीय फ्रीक्वेंसी पर ट्यून होने के लिए पूरी तरह तैयार है?

सवाल यह नहीं है कि ऋषियों ने हज़ारों साल पहले क्या सुना था… असली सवाल तो यह है कि क्या आज हमारे पास अपने भीतर के मानसिक शोर को शांत करने का वह साहस है, ताकि हम भी उस शाश्वत नाद को सुन सकें जो हमारे भीतर हर धड़कन के साथ गूंज रहा है?"

अब अंतिम में 
दिनेश श्रीवास्तव जी के प्रश्नों का संक्षेप व अंतिम समाधान
शास्त्र केवल लिखित सामग्री क्यों नहीं हैं? क्योंकि वे किसी मनुष्य की सीमित बौद्धिक रचना या कल्पना नहीं हैं। वे ब्रह्मांड के शाश्वत नियम हैं, जिन्हें कागज़ के आविष्कार से हज़ारों साल पहले चेतना के धरातल पर जिया और अनुभव किया गया।
अपौरुषेय और श्रुति क्यों कहा गया? क्योंकि इनका उद्गम मानवीय अहंकार या सीमित बुद्धि नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय चेतना का वह शाश्वत स्पंदन है जिसे उच्चतम ध्यान की अवस्था में सुना गया।
किन ऋषियों ने और कब देखा? विश्वामित्र, वसिष्ठ, अत्रि, भारद्वाज, वामदेव और गार्गी-मैत्रेयी जैसी ब्रह्मवादिनी ऋषिकाओं ने सरस्वती नदी के पूर्ण प्रवाह काल (लगभग 4000–5000 ईसा पूर्व) में इसका साक्षात्कार किया।
ऋषियों ने इसे उच्चतर अवस्था में देखा—यह हमें कैसे पता चला? यास्क मुनि के निरुक्त, उपनिषदों के परा-अपरा विद्या विभाजन, और महर्षि पतंजलि के 'ऋतम्भरा प्रज्ञा' के वैज्ञानिक मनोविज्ञान से यह अकाट्य रूप से प्रमाणित है।
इसकी प्रामाणिकता का क्या साक्ष्य है? आठ विकृति पाठों की जटिल गणितीय संरचना, यूनेस्को द्वारा दी गई वैश्विक मान्यता, सरस्वती घाटी के उपग्रह साक्ष्य और आधुनिक क्वांटम भौतिकी का नाद-सिद्धांत इसकी जीवित गवाही देते हैं।

"किताबें जल सकती हैं, स्याही मिट सकती है और पन्ने धूल बन सकते हैं; मगर जो सत्य ब्रह्मांड के कण-कण में गूंज रहा है, वह अजर, अमर और अपौरुषेय है!"

अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज 

#PrayagFiles #VedicScience

Saturday, 15 August 2026

स्वामी दयानंद और अंग्रेज ब्रिटिश शासन

जो कहते हैं कि स्वतन्त्रता का बीज दयानन्द ने बोया था, वे दयानन्द का लिखा हुआ एक भी ऐसा लेख नहीं दिखा सकते जो अंग्रेज़ सरकार के विरोध में लिखा गया हो, एक भाषण नहीं बता सकते जो अंग्रेज़ सरकार के विरोध में दिया गया हो। ले-देकर कुछ पंक्तियाँ दिखाते हैं, जो बाद में इनके द्वारा ही प्रक्षिप्त की गई होती हैं। किन्तु हमारे पास सैकड़ों ऐसे प्रमाण हैं - दयानन्द के लिखे हुए, उनकी जीवनियों में लिखे हुए तथा उनके चेलों द्वारा लिखे हुए - जो सिद्ध करते हैं कि दयानन्द अंग्रेज़ सरकार के बड़े प्रशंसक और भक्त थे। सदैव अपने उपदेशों में अंग्रेज़ सरकार की प्रशंसा किया करते थे तथा भारत में उनके बने रहने की कामना किया करते थे। सत्यार्थ प्रकाश में यह जो दयानन्द ने लिखा है, उनके मरने के बाद प्रकाशित सत्यार्थ प्रकाश के संस्करणों में से आर्यसमाजियों ने इस अंश को नहीं छापा है। हाँ प्रक्षेप अनेक कर दिये हैं।

इस बात का एक प्रमाण यह भी है कि स्वामी दयानन्द का कोई पक्का चेला भी कभी अंग्रेज़ सरकार का विरोधी नहीं रहा, बल्कि भक्त ही रहा है- दयानन्द के कारण । उदाहरणस्वरूप - दयानन्द के पक्के चेले पंडित लेखराम अपनी पुस्तक में ब्रिटिश शासन की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं - "इंग्लैंड की रानी और भारत की साम्राज्ञी ने भारत के शासन की बागडोर सँभालने के बाद विद्या और शिक्षा का प्रसार करने का प्रयास किया है। उनकी कृपा और कीर्ति से सर्वत्र शान्ति का साम्राज्य है। चोर-डाकुओं का दमन कर दिया गया है। देश बदमाशों के आतंक से मुक्त हो चुका है और सब दशाओं को सुधारने के प्रयत्न किए जा रहे हैं।" (तहज़ीब-ए-बरहिनी)

साभार - शचीन्द्र शर्मा फेसबुक पोस्ट 15/8/2026 

Wednesday, 12 August 2026

राम कौन थे – मिथक या ऐतिहासिक नायक ?


आदरणीय प्रेम सचदेवा जी द्वारा अग्रेषित लेख रामायण और रामायण काल के विषय पर आंग्ल भाषा में था आज 12.44 बजे - सुधीर बंसल 

पढ़िये सभी आर्य सदस्यों की सुविधा के लिए सुन्दर लेख का हिन्दी रूपान्तरण:-👇🏼👇🏼

राम कौन थे – मिथक या ऐतिहासिक नायक? लाखों लोगों के लिए राम का अस्तित्व मूल रूप से आस्था का विषय है। इसलिए, कोई भी सरकार या अन्य पक्ष राम के अस्तित्व को नकार नहीं सकता। हिन्दू धर्म के कुछ तथाकथित "बड़े पैरोकारों" ने सरकार या तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमन्त्री स्व. करुणानिधि (जो निश्चित ही वामपंथी विचारधारा के और ईश्वर में आस्था नहीं रखने वाले नेता रहे ताजिन्दगी) का सामना करने की हिम्मत नहीं दिखाई और इसे साबित नहीं करने का श्रम किया किया कि राम एक ऐतिहासिक तथ्य हैं, न कि कोई मिथक।*

इसके बावजूद, उन्हें कश्मीर की हुर्रियत कॉन्फ्रेंस जैसी जगहों से भी समर्थन मिला। हुर्रियत का यह भी कहना था कि धर्म से जुड़े मामलों को परखने का पैमाना वैज्ञानिक या ऐतिहासिक सबूत नहीं हो सकते। इसलिए, राम का अस्तित्व था या नहीं, यह वैज्ञानिक या ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। यह मामला मूल रूप से दुनिया भर के करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है, और इसलिए इसमें किसी भी सरकार या राजनीतिक दल का दखल अवांछित है।

अभी तक, कई वैज्ञानिकों ने खगोलीय डेटा के आधार पर यह बताया है कि राम का अस्तित्व लगभग 5044 ईसा पूर्व में था, अर्थात् अब से लगभग मात्र 7070 वर्ष पूर्व! ऐसी उलझन भरी स्थिति में आम लोगों के लिए राम के अस्तित्व के बारे में किसी ठोस नतीजे पर पहुँचना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। इसलिए किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले हमें राम और उनके महाकाव्य, रामायण से जुड़े विभिन्न तथ्यों का विश्लेषण करना होगा।

आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करने के लिए महर्षि वाल्मीकि ने एक ऐतिहासिक महाकाव्य लिखने का फ़ैसला किया, जो सभी को नैतिकता और धर्म के रास्ते पर चलने में मदद कर सके। इस बात को लेकर वे दुविधा में पड़ गए। बाद में, उन्होंने नारद मुनि से सलाह ली, जिन्होंने उन्हें रघु के कुल में जन्मे दशरथ के पुत्र राम के बारे में लिखने का सुझाव दिया। इसी तरह, महाकवि कालिदास ने 'रघुवंशम्' लिखी। यह किताब रघु के वंश पर प्रकाश डालती है और राम के बाद शासन करने वाले विभिन्न राजाओं का भी ज़िक्र करती है। तो, अब बहस का मुद्दा यह है कि अगर राम एक पौराणिक पात्र थे, तो वाल्मीकि ने राम के पूर्वजों का इतिहास कैसे बताया?

रघुवंशम में कालिदास ने राम के पूर्वजों और उनके बाद शासन करने वाले उनके विभिन्न वंशजों (उत्तराधिकारियों) के बारे में जानकारी कैसे दी? आज के समय में भारत और दुनिया भर में राम की कहानियों वाली कई किताबें मौजूद हैं। *हम इस लेख के अगले हिस्से में इस विषय पर चर्चा करेंगे।*

*राम का जन्म कब हुआ था:* [वाल्मीकि रामायण के आधार पर] आज के दौर में सबसे ज़्यादा चर्चा वाले विषयों में से एक यह है कि राम का जन्म कब हुआ था? इस विषय पर बात करने से पहले, हमें यह समझना होगा कि हमारे महान ऋषियों ने सृष्टि के कालक्रम को व्यवस्थित रूप से 'मन्वंतरों' में विभाजित किया है। हर मन्वंतर को आगे 'चतुर्युगों' में बांटा गया है।

हर चतुर्युग में कृत (सतयुग), त्रेता, द्वापर और कलियुग शामिल होते हैं। अभी वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है। अब तक सत्ताइस चतुर्युग बीत चुके हैं। अभी इस समय 28वां चतुर्युग चल रहा है और हम अभी इस चतुर्युग के पहले चरण में हैं। यह बात सभी जानते हैं कि राम का जन्म त्रेता युग के आखिरी चरण में हुआ था। इसलिए, अगर हम यह मान लें कि राम का जन्म इसी चतुर्युग में हुआ था, तो इसका मतलब है कि उनका जन्म कम से कम 10 लाख साल पहले हुआ था। उनके जन्म का समय शायद इससे भी ज़्यादा रहा होगा।

हालांकि, वायु पुराण हमें रामायण का सही समय-काल बताता है। अगर हम वायु पुराण के समय-काल को मानें, तो राम का समय कम से कम 1,80,00,000 साल पुराना हो जाता है। इसलिए, हम आसानी से यह नतीजा निकाल सकते हैं कि समय के पैमाने पर राम का काल कम से कम 10,00,000 से 80,00,000 साल पहले का है। इस मुद्दे को "भारतीय इतिहास की गलतियाँ" (Blunders of Indian History) नाम के एक दूसरे विषय में सुलझाया जाएगा। इस बात का समर्थन इस तथ्य से भी होता है कि जब हनुमान सीता की खोज में श्रीलंका गए थे, तो उन्होंने वहाँ चार दाँत वाले हाथी देखे थे। इसलिए, अब पुरातत्वविदों/जीवविज्ञानियों के लिए यह पता लगाना एक मुद्दा है कि ऐसे हाथी धरती पर कब मौजूद थे? (चतुर्युगों की गणना पर “वर्तमान सृष्टि का युग” (Age of present shristi) नाम के दूसरे विषय में चर्चा की जाएगी।) ईसा मसीह से पहले की ऐतिहासिक घटनाओं के कालक्रम की सही जानकारी तय करने में आने वाली मुश्किलों पर “इतिहास की गलतियाँ” (Blunders of History) नाम के दूसरे लेख में बात की जाएगी। वाल्मीकि रामायण में एक और दिलचस्प बात बताई गई है कि भरत और शत्रुघ्न का ननिहाल एक ऐसे देश में था जहाँ परिवहन के लिए कुत्तों या हिरणों से खींचे जाने वाले वाहनों का इस्तेमाल होता था। जब दोनों भाई अपने ननिहाल से अयोध्या लौटे, तो वे बर्फ से ढकी कई जगहों से गुज़रे और उन्होंने ऊनी कपड़े भी पहने हुए थे। हालाँकि, अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि यह घटना किस जगह पर हुई थी। हमारे तर्क के अनुसार, यह घटना रूस में हुई थी, और सुनने में 'रूस' (Russia) शब्द किसी 'ऋषि' के नाम का गलत उच्चारण जैसा लगता है; इस बारे में हमने अपने लेख "भारतीय/ विश्व इतिहास की भूल" (Blunder of Indian/World history) में विस्तार से बताया है। ऊपर बताए गए तथ्यों से हमें राम के जन्म के समय के बारे में साफ़ जानकारी मिलती है। इसलिए, जो लोग राम को केवल एक पौराणिक पात्र मानते हैं, वे गलत साबित हुए हैं, क्योंकि हमने इस लेख में उनके लिए बहुत सारे सबूत पेश किए हैं। हम यह भी साबित करेंगे कि ईसाई और इस्लाम धर्म के आने से पहले, राम को पूरी दुनिया में एक अंतरराष्ट्रीय और पूजनीय हस्ती के तौर पर माना जाता था। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रामायण से जुड़ी कहानियाँ प्रामाणिक रूप प्रदर्शित करतीं हैं।

1) *रूस और मंगोलिया में रामायण:* 15 दिसंबर 1972 को 'डेक्कन हेराल्ड' ने अपने पहले पन्ने पर एक खबर छापी थी, जिसमें बताया गया था कि रूस में काल्मिक की राजधानी एलिस्टा में रामायण से जुड़ी एक कहानी प्रकाशित हुई थी। खबर में यह भी बताया गया था कि काल्मिक के लोगों के बीच रामायण की कई कहानियाँ मशहूर थीं। काल्मिक की लाइब्रेरी में रामायण के कई संस्करण पहले से ही मौजूद हैं। खबरों से साफ़ पता चलता है कि रामायण की कहानियाँ बहुत पुराने समय से ही बहुत लोकप्रिय रही हैं। रूसी लेखक डोमोडिन सुरेन ने उन कई कहानियों का ज़िक्र किया है जो मंगोलियाई और कल्मिक लोगों के बीच लोकप्रिय थीं। प्रोफ़ेसर सी.एफ. ग्लोस्टुन्की की लिखी किताब "एकेडमी ऑफ़ साइंसेज" की पांडुलिपि (मैन्युस्क्रिप्ट) पूर्व सोवियत संघ (U.S.S.R.) की साइबेरियन शाखा में मौजूद है। यह किताब वोल्गा नदी के किनारे लोकप्रिय कहानियों के बारे में है और इसकी पांडुलिपि कल्मिक भाषा में है। आखिर में, लेनिनग्राद में आज भी रामायण की कहानियों वाली बहुत सारी किताबें रूसी और मंगोलियाई भाषाओं में मौजूद और सुरक्षित हैं। 

2) *चीन में रामायण:-* चीन में, कांग-सेंग-?हुआ ने रामायण की अलग-अलग घटनाओं से जुड़ी जातक कथाओं का एक बड़ा संग्रह तैयार किया था, जो 251 ईस्वी का है। 742 ईस्वी की एक और किताब, जिसमें राम के वनवास पर जाने के बाद दशरथ की हालत का ज़िक्र है, आज भी चीन में मौजूद है। इसी तरह, 1600 ईस्वी में 'हिस-यी-ची' ने 'कपि' (बंदर) नाम का एक उपन्यास लिखा, जिसमें रामायण की कहानियों, खासकर हनुमान की कहानियों को विस्तार से बताया गया था। 

3) *श्रीलंका में रामायण:-* नरेश कुमार धातुसेन, जिन्हें कुमारदास के नाम से भी जाना जाता है और जिन्होंने 617 ईस्वी में श्रीलंका पर शासन किया था, उन्होंने "जानकीहरण" नाम की एक किताब लिखी थी। यह श्रीलंका में उपलब्ध सबसे पुराना संस्कृत साहित्य है। आधुनिक समय में, सी. डॉन बोस्टियन और जॉन डी'सिल्वा ने रामायण पर आधारित कहानियाँ लिखी हैं। आज भी, वहाँ की ज़्यादातर आबादी राम और सीता की जोड़ी को बहुत मानती है और उनका बहुत सम्मान करती है। 

4) *कंबोडिया (कंपूचिया) में रामायण:-* आज भी कंबोडिया के खमेर इलाके में 700 ईस्वी के कई शिलालेख मौजूद हैं। ये शिलालेख रामायण की घटनाओं पर आधारित हैं। खमेर राजवंश के शासनकाल में कई मंदिर बनाए गए थे, और आज भी उनकी दीवारों पर रामायण के कई दृश्य और घटनाएँ दिखाई देती हैं। *अंकोर के मंदिर रामायण और महाभारत की कहानियों के लिए बहुत मशहूर हैं। ये मंदिर 400 ईस्वी से 700 ईस्वी के शुरुआती दौर के हैं।* इन नक्काशीदार चित्रों में एक हैरान करने वाली बात यह है कि हनुमान और बाकी वानरों को पूंछ के साथ नहीं दिखाया गया है, जो आम लोगों की प्रचलित धारणा के खिलाफ है। (हनुमान बंदर थे या नहीं, इस बात की जाँच बाद में की जाएगी।)

5) *इण्डोनेशिया में रामायण:-* डी कैस्परिस के अनुसार, "चांडी लोरो जोंगरोंग" नाम का एक मंदिर था, जिसकी दीवारों पर रामायण के कुछ दृश्य उकेरे गए थे। यह मंदिर 9वीं सदी ईस्वी का था। इंडोनेशिया में, रामायण की एक कहानी का 'काकाविन' नाम का वर्ज़न बहुत लोकप्रिय है। यह कहानी प्रम्बानन वाली कहानी से थोड़ी अलग है। इसके अलावा, रामायण से जुड़ी कहानियों के कई अन्य वर्ज़न भी थे जो ईसा के बाद की शुरुआती सदियों में मौजूद थे; इससे यह भी साबित होता है कि इस्लाम के आने से पहले इंडोनेशियाई लोगों के बीच रामायण बहुत लोकप्रिय थी। यह भी एक हैरान करने वाली बात है कि कुछ साल पहले इंडोनेशिया में ही रामायण पर पहला इंटरनेशनल कन्वेंशन आयोजित किया गया था।

6) *लाओस में रामायण:-* जब वहाँ के लोग अपनी भाषा में 'लाओस' शब्द का उच्चारण करते हैं, तो सुनने में यह राम के एक बेटे के नाम जैसा लगता है। इसके अलावा, 'वाट-शे-फुम' और 'वाट-पा-केव' मंदिरों की दीवारों पर भी रामायण के कई दृश्य बने हुए हैं। 'वाट-प्रा-केव' और 'वाट-सिसकेट' मंदिरों में ऐसी किताबें मौजूद हैं जिनमें रामायण महाकाव्य की कथा है। लाफोंट नाम के एक फ्रांसीसी यात्री ने 'पा लाका-पा लामा' की कहानी का फ्रेंच भाषा में अनुवाद किया और इसे अपनी किताब 'पोम्माचक' में शामिल किया। इस किताब में भी रामायण की कहानी है, जो आज भी लाओस के लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय है। 

7) *थाईलैंड में रामायण:- *रामायण की कहानियाँ आज भी लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। ईसा मसीह के बाद की शुरुआती सदियों में, इस देश पर राज करने वाले कई राजाओं के नाम में 'राम' शब्द जुड़ा होता था (चाहे नाम के आगे हो या पीछे)। जैसे भारत में आज भी रामायण का नाटक आयोजित किया जाता है, वैसे ही थाईलैंड में भी रामायण के कई नाटकीय रूप आयोजित किए जाते हैं। इसी तरह, इंडोनेशिया, मलेशिया और कंबोडिया जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भी रामायण के कई नाटकीय रूप आज भी आयोजित किए जाते हैं। 

😎 8) *मलेशिया में रामायण:-* मलेशिया में आज भी 14वीं सदी में लिखी गई 'हिकायत सेरी रामा' की कहानियों पर आधारित नाटक आयोजित किए जाते हैं। 'दलांग' सोसाइटी रामायण से जुड़े लगभग 200-300 नाटकों का आयोजन करती है। नाटक शुरू होने से पहले, लोग राम और सीता के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए पहले विभिन्न प्रार्थनाएं और शुद्धिकरण की रस्में निभाते हैं। 

9) *बर्मा में रामायण:-* राजा कयान्झिथा, जिन्होंने 1084-1112 ईस्वी के दौरान शासन किया, खुद को राम के वंश का मानते थे। बर्मा में 15वीं सदी की रामायण की कहानियों से जुड़ी कई किताबें आज भी मिलती हैं। 'काव्यादर्श' और 'सुभाषित रत्ननिधि' जैसी किताबें रामायण की कहानियों पर आधारित हैं। तारानाथ ने रामायण पर 'झांग-झुंगपा' नाम की टीका (व्याख्या) लिखी थी, जो दुर्भाग्यवश आज उपलब्ध नहीं है। बर्मा में भी रामायण की कहानियों पर आधारित कई तरह के नाटक किए जाते हैं। 

10) *नेपाल में रामायण:-* नेपाल में रामायण का सबसे पुराना संस्करण (1075 ईस्वी का) आज भी मिलता है।

11) फिलीपींस में रामायण::- वहाँ के ज़्यादातर लोगों के रीति-रिवाजों, परंपराओं और लोक-कथाओं में रामायण की कहानियों का असर आसानी से देखा जा सकता है। प्रोफ़ेसर जुओन आर. फ्रांसिस्को ने पाया कि मारिनियो मुसलमानों के बीच रामायण पर आधारित लोक-कथाएँ लोकप्रिय हैं, जिनमें राम को ईश्वर का अवतार बताया गया है। इसी तरह, मैगिंडानो या सुलु के मुस्लिम समुदायों में भी रामायण की कहानियों पर आधारित कई लोक-कथाएँ प्रचलित हैं। 

12) *ईरान में रामायण:-* आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद शहर में सालारजंग नाम का एक म्यूज़ियम है। वहाँ एक तस्वीर है जिसमें एक हट्टे-कट्टे बंदर को दिखाया गया है, जिसके हाथ में एक बहुत बड़ा पत्थर है। यह तस्वीर द्रोणागिरी पर्वत उठाए हुए हनुमान की याद दिलाती है। इसी तरह, मार्को पोलो ने अपनी किताब (जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद सर हेनरी यूल ने किया था) के दूसरे वॉल्यूम के पेज नंबर 302 पर मुसलमानों के बीच फैली एक अजीब मान्यता के बारे में लिखा है; यह मान्यता अफ़गानिस्तान से लेकर मोरक्को और अल्जीरिया तक फैली हुई थी। इन मुसलमानों का मानना था कि ट्रेबिज़ोंड के शाही परिवार के सदस्यों की छोटी पूंछ होती थी, जबकि मध्ययुगीन यूरोप के लोगों में अंग्रेज़ों के बारे में भी ऐसी ही कहानियाँ प्रचलित थीं - जैसा कि मैथ्यू पेरिस बताते हैं...
हमारा मानना है कि अगर इस्लाम और ईसाई धर्म के आने से पहले अरब और यूरोपीय देशों में प्रचलित अलग-अलग कथाओं की गंभीरता से जांच की जाए, तो रामायण और महाभारत के अस्तित्व को साबित किया जा सकता है। इन लोगों के बर्बर और कट्टरपंथी कामों की वजह से ऐतिहासिक महत्व का बहुत सारा साहित्य और इमारतें नष्ट हो गईं। 

13) *यूरोप में रामायण:-* इटली में, जब एस्ट्रोकन सभ्यता के अवशेषों की खुदाई की गई, तो कई ऐसे घर मिले जिनकी दीवारों पर खास तरह की पेंटिंग बनी हुई थीं। करीब से जांच करने पर ये पेंटिंग रामायण की कहानियों पर आधारित लगती हैं। कुछ पेंटिंग्स में अजीबोगरीब लोगों को पूंछ के साथ दिखाया गया है, साथ ही दो पुरुषों के कंधों पर तीर-कमान हैं और उनके पास एक महिला खड़ी है। ये पेंटिंग्स 7वीं सदी BC की हैं। याद रखें कि कभी एस्ट्रोकॉन सभ्यता इटली के 75% हिस्से में फैली हुई थी। सर हेनरी यूल ने मार्को पोलो के कामों के अनुवाद में मध्ययुगीन यूरोप के लोगों की इस मान्यता का ज़िक्र किया है कि उनके पूर्वजों की छोटी पूंछें होती थीं। महर्षि दयानन्द ने भी अपनी मशहूर पुस्तक अमर-ग्रंथ ''सत्यार्थ प्रकाश' में इसी बात का ज़िक्र किया है। वहाँ स्वामीजी कहते हैं कि यूरोप के लोगों को वानर (बंदर) कहा जाता था, क्योंकि महाभारत और वाल्मीकि रामायण जैसे हमारे महाकाव्यों में उनका रूप-रंग वैसा ही बताया गया है। अगर हम आज के संदर्भ में इस बात का विश्लेषण करें, तो हम 'कंगारू' (ऑस्ट्रेलियाई टीम) और 'मेन इन ब्लू' (भारतीय टीम) के बीच कोलकाता में होने वाले मुक़ाबले जैसी बातों को कैसे परिभाषित करेंगे?

विश्व युद्ध के दौरान अलग-अलग देशों की सेनाओं का वर्णन करने के लिए इसी तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया जाता था; जैसे हमारे यहाँ 'चीता' नाम के हेलिकॉप्टर हैं। जिस तरह ये शब्द अलग-अलग तरह के लोगों या हथियारों आदि का वर्णन करने का एक तरीका हैं, उसी तरह हमारी पौराणिक कथाओं में 'राक्षस', 'वानर' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। ये तथ्य साफ तौर पर बताते हैं कि रामायण की कथाएँ कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं हैं और ये दुनिया भर में बहुत लोकप्रिय थी।

14) *अफ्रीका (महाद्वीप) में रामायण:-* इथियोपिया के लोग खुद को 'कुशाइट्स' (Cushites) का वंशज मानते हैं। 'कुश' (Cush) शब्द असल में 'कुश' (Kush) का ही उच्चारण-संबंधी गलत रूप है, जो राम के बेटे थे।
यह बात वेदों पर लिखी गई टीका 'शतपथ ब्राह्मण' से अच्छी तरह साबित होती है। वेदों के अलग-अलग मंत्रों की व्याख्या करते समय, ये ब्राह्मण ग्रंथ विषय को समझाने के लिए कई ऐतिहासिक घटनाओं का ज़िक्र करते हैं। हैरानी की बात है कि शतपथ ब्राह्मण में रोडेशिया में राजा भरत (कौरवों और पांडवों के पूर्वज) के शासन का ज़िक्र मिलता है। इसके अलावा, अफ़्रीकी समुदायों में रामायण महाकाव्य से प्रेरित कई ऐसी कहानियाँ प्रचलित हैं जो मुख्य रूप से वानरों की विभिन्न गतिविधियों से जुड़ी हैं। मिस्र (Egypt) का नाम मूल रूप से 'अजपति' से आया है, जो राम के पूर्वजों में से एक का नाम था। अगर मिस्र में प्रचलित विभिन्न कथाओं का विश्लेषण किया जाए, तो वहाँ दशरथ (राम के पिता) का ज़िक्र भी मिलता है। इन तथ्यों को ब्राह्मण ग्रंथों के विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों से अच्छी तरह साबित किया जा सकता है। (इसके सबूत के लिए हमारा लेख 'भारतीय/विश्व इतिहास की गलतियाँ' देखें) 

15) *उत्तरी और दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीपों में रामायण:-*
कोलंबस द्वारा उत्तरी अमेरिकी महाद्वीप की खोज से पहले, यूरोपीय लोग इसके बारे में नहीं जानते थे। हालाँकि, ए. डी. क्वाट्रेफेजेस (A. de Quatrefages) ने अपनी किताब 'द ह्यूमन स्पीशीज़' (The Human Species) में साफ़ तौर पर कहा है कि चीनी लोग अमेरिकी महाद्वीप के बारे में जानते थे और उनके साथ व्यापारिक संबंध रखते थे; अमेरिका को 'फद-सांग' (Fad-Sang) कहा जाता था। इसी तरह, जापानी लोग इसे 'फद-सी' (Fad-See) के नाम से जानते थे। साथ ही, अगर हम महाभारत और वाल्मीकि रामायण जैसे ऐतिहासिक संदर्भों को देखें, तो पाएँगे कि अमेरिकी महाद्वीप को 'पाताल देश' (पाताल का अर्थ है पैरों के नीचे) कहा गया है। भौगोलिक दृष्टि से देखें तो अमेरिकी महाद्वीप भारतीय उपमहाद्वीप के ठीक नीचे स्थित है। हम अपने विषय 'भारतीय इतिहास/विश्व इतिहास की गलतियाँ' (Blunders of Indian History/World History) में इस मुद्दे पर और विस्तार से चर्चा करेंगे।

लेकिन आपकी जानकारी के लिए हम आपको कुछ प्रचलित कहानियाँ बता रहे हैं। 
a) मैक्सिको के आदिवासी इलाकों में आज भी सुंदर लड़कियों को 'उलोपी' कहा जाता है। अगर हम महाभारत देखें, तो हमें अर्जुन के 'उलोपी' नाम की लड़की से शादी करने का ज़िक्र मिलता है, जो पाताल देश के राजा की बेटी थी। 
b) डब्ल्यू. एच. प्रेस्कॉट ने अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ़ कॉन्क्वेस्ट ऑफ़ मैक्सिको' में कई ऐसे संदर्भ दिए हैं जो साबित करते हैं कि अमेरिकी उपमहाद्वीप की शुरुआती सभ्यताओं और भारतीय (आर्य) सभ्यता में काफी समानताएँ थीं। हालाँकि, यहाँ हम आपको एक ऐसा संदर्भ दे रहे हैं जो साफ़ तौर पर बताता है कि रामायण कोई काल्पनिक महाकाव्य नहीं है, बल्कि इसका ऐतिहासिक आधार है। किताब के लेखक के अनुसार, एज़्टेक समुदाय में एक प्रचलित कहानी है कि पूर्व से 'क्वेत्ज़ल कोटल' नाम का एक सुंदर व्यक्ति वहाँ आया था। उसने उन्हें उन्नत सभ्यता की कई बातें सिखाईं, जिसके कारण उसके समय को 'स्वर्ण युग' माना जाता है। बाद में, किसी दैवीय प्राणी द्वारा सताए जाने के कारण वह अपने मूल देश लौट गया। हैरानी की बात है कि यह कहानी इस बात पर रोशनी नहीं डालती कि वह क्यों लौटा था।

प्रेस्कॉट ने एक और दिलचस्प बात बताई है कि यह कहानी लिखित रूप में भी मौजूद है। भारतीय परम्परा के अलावा और कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि इस कहानी की जड़ें उनसे जुड़ी हैं। यही कहानी वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में भी बताई गई है, (पर उत्तर काण्ड तो वाल्मिकि रामायण में है ही नहीं) यर रामायण जिसमें कहा गया है कि लंका में रहने वाले सालकंटक राक्षसों को विष्णु ने परेशान किया था। इस परेशानी की वजह से वे लंका छोड़कर पाताल लोक चले गए। इस समूह का नेता सुमाली था। रामायण के अनुसार, वे लंबे समय तक पाताल लोक में रहे। जब उन्हें हालात अनुकूल लगे, तो वे अपनी मातृभूमि लौट आए। *अब यह पाठकों को तय करना है कि जब ऐसे पक्के सबूत मौजूद हैं जो यह साबित करते हैं कि रामायण का महाकाव्य कोई काल्पनिक कथा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक प्रमाण है जो दुनिया भर में प्रचलित कई कहानियों की पुष्टि करता है, तो इसे कैसे देखा जाए।* आज दभी मेक्सिको के कई समुदायों में 'रामासीतोताव' नाम का नाटक खेला जाता है। 
हैरानी की बात है कि बाइबिल के न्यू टेस्टामेंट में मैथ्यू चैप्टर 2/18 में 'रामा' का ज़िक्र है, जहाँ लिखा है "उसकी आवाज़ रामा में सुनी गई"। यहाँ 'रामा' एक खास नाम (proper noun) है; अब बाइबिल सोसाइटी को यह बताना चाहिए कि रामा कौन थे और बाइबिल में उनका ज़िक्र क्यों है। यहाँ तक कि दशरथ और अयोध्या के नाम भी बाइबिल में मिलते हैं। हम 'भारतीय/विश्व इतिहास की गलतियों' (Blunders of Indian/world History) में इन तथ्यों का ज़िक्र करेंगे। अब हम तथाकथित 'सेक्युलर' इतिहासकारों से कुछ दिलचस्प सवाल पूछना चाहेंगे: 
1) मुसलमानों के रोज़े वाले महीने को 'रमज़ान' क्यों कहा जाता है? 
2) गाज़ा पट्टी में एक जगह का नाम 'रामल्लाह' क्यों है? 3) लंदन में एक जगह का नाम 'रैम्सगेट' क्यों है? 
4) इटली की राजधानी को 'रोम' (जो 'रामा' का ही बिगड़ा हुआ रूप है) क्यों कहा जाता है? हम ऐसे कई उदाहरण दे सकते हैं जहाँ 'रामा' शब्द का इस्तेमाल अलग-अलग ऐतिहासिक जगहों या लोगों के नामों के साथ सफ़िक्स (बाद में जुड़ने वाला शब्द) या प्रीफ़िक्स (पहले जुड़ने वाला शब्द) के तौर पर हुआ है, या फिर 'रामा' के बिगड़े हुए रूप का इस्तेमाल ऐतिहासिक जगहों या लोगों के नामों के लिए किया गया है। जब तक हम भारतीय ऐतिहासिक सबूतों पर ध्यान नहीं देते, तब तक कोई भी ऐतिहासिक सबूत इन तथ्यों का पक्का जवाब नहीं देता।
यह सर्वमान्य है कि सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था। *यह विडंबना ही है कि हम बिना किसी ऐतिहासिक प्रमाण के इस सिद्धांत को स्वीकार कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विभिन्न ऐतिहासिक प्रमाणों के बावजूद राम के अस्तित्व को नकार रहे हैं, जबकि यह सिद्ध होता है कि वे कोई काल्पनिक पात्र नहीं बल्कि एक वास्तविक महान नायक थे।* राम के अस्तित्व को नकारने के लिए ये इतिहासकार बेतुके ढंग से विकासवाद के पुराने सिद्धांत को दोहरा रहे हैं, जिसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। (विकासवाद का सिद्धांत क्यों और कैसे महत्वपूर्ण हुआ, इस पर हम अपने लेख - ब्रह्मांड की रचना कैसे हुई - में चर्चा करेंगे।) विकासवाद के सिद्धांत के बारे में हम यहाँ केवल इतना ही कहना चाहते हैं कि यह चर्च के निरंकुश वर्चस्व को चुनौती देने का एक साधन था।

ये इतिहासकार राम के अस्तित्व को नकारने के लिए विकासवाद (थ्योरी ऑफ़ इवोल्यूशन) की उसी पुरानी और बेतुकी बात को दोहराते रहते हैं, जिसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। (विकासवाद को इतना महत्व कैसे और क्यों मिला, इस पर हम अपने लेख 'ब्रह्मांड की रचना कैसे हुई' में चर्चा करेंगे। विकासवाद के बारे में हम बस इतना ही कहना चाहते हैं कि यह चर्च के कठोर वर्चस्व को चुनौती देने के लिए बनाया गया एक साधन था। चर्च का दावा था कि इस दुनिया को ईश्वर ने शून्य से बनाया है और इस ब्रह्मांड की आयु 10,000 साल से अधिक नहीं है। विकासवाद की मदद से वैज्ञानिक जगत ने चर्च के वर्चस्व को चुनौती दी और पादरियों पर जीत हासिल की।)
यह पाठकों को खुद तय करना है कि वे राम को किस नज़रिए से देखते हैं। हमें लगता है कि हमने सोचने के लिए काफ़ी सामग्री दी है। जो लोग बिना किसी तर्क के पूर्वाग्रह रखते हैं, वे शायद राम के अस्तित्व को नकारते रहें; लेकिन जो लोग तर्कसंगत हैं और मानते हैं कि कोई पौराणिक पात्र दुनिया भर में इतना सम्मान या श्रद्धा नहीं पा सकता, वे राम को व्यापक ऐतिहासिक सबूतों के आधार पर देखना शुरू करेंगे। यहाँ हम कुछ बातें साफ़ कर देतना चाहते हैं: *1)* राम एक महानायक और महान व्यक्ति थे, जिन्होंने एक आदर्श जीवन जिया और आज भी वे अनुकरणीय उदाहरण हैं। *2)* राम के अस्तित्व की सच्चाई साबित करने के लिहाज़ से यह बात मायने नहीं रखती कि रामसेतु (जिस पर काफ़ी विवाद हो रहा है) राम ने ही बनाया था या नहीं। चाहे रामसेतु को इंसानों द्वारा बनाया गय

Tuesday, 11 August 2026

हरियाली अमावस्या की हार्दिक शुभकामनाएं !!

भारतीय सिनेमा की कुछ सुंदर कलाकृतियों में से एक फिल्मी गीतों ने भारतीय जनमानस पर बहुत गहन प्रभाव डाला है ।यद्यपि एजेंडा , नरेटिव और अवचेतन मस्तिष्क को लक्षित करके भावास्त्र चलाना भी सदैव से निदेशकों का प्रिय शगल रहा है तथापि बुद्धिमान श्रोताओं ने उसमें से नीर क्षीर विवेक का उपयोग करके अपना अभीष्ट पा ही लिया है । 

   बहरहाल स्तर , उद्देश्य और गुणवत्तापूर्ण मनोरंजन की कसौटी पर इस विधा में भी भयंकर गिरावट लगातार आती जा रही है तथापि उसके स्वर्ण काल में संपादित कुछ विशिष्ट कृतियों पर लिखने का लोभ सँवरण नहीं हो पाता कभी कभी ! 
   तो सावन कृष्ण चतुर्दशी के दिन जबकि कल हमारे नगर में हरियाली अमावस्या का मेला भरता है तब मेलों से जुड़े एक सुन्दर गीत पर लिखना तो बनता ही है ।

      "आज का अर्जुन" फिल्म का "गोरी है कलाइयां" 
गीत !! 
   सावन का ओज ,मेले की मौज , 
लता मंगेशकर की ध्वनि और जयाप्रदा की कामाग्नि ।।
   क्या ही सम्मांग,सरस और स्वादिष्ट मिश्रण !! 
  
    भारत में नायक द्वारा घुटने पर बैठकर अंगूठी प्रस्तुत कर प्रणय निवेदन की परम्परा नहीं रहीं है कभी , 
वरन भारत में तो ढेरों प्रकार से प्रणय निवेदन किया जाता रहा है ,नायिका द्वारा भी और नायक द्वारा भी !!
     
       यहां नायिका जयाप्रदा अपने नायक से प्रणय निवेदन करते हुए कहती है ....
     "गोरी है कलाइयां ,तू लादे मुझे हरी हरी चूड़ियां ,
      अपना बना ले मुझे बालमा ......... ......" 
     अर्थात मेरी गोरी गोरी कलाइयों के लिए हरी हरी चूड़ियां लाकर पहना दीजिए और मुझे अपना बना लीजिए प्रिय !!

         वही अपनी बहन,खेती और अन्य दायित्वों से बद्ध नायक भीमा हास्यात्मक रूप से इस निवेदन को ठुकराते हुए कह देता है शब्बीर कुमार की गुरुत्व भरी वाणी में कि 

    "गोरी हो कलाई, चाहे काली हो कलाई
जो भी चूड़ी पहनाए फस जाए।
हरी हरी चूड़ियों की देखे हरियाली
तो ये भीमा की ना खेती सूख जाए ।।
   
अर्थात बिल्कुल नहीं ! ना ! क्षमा कीजिए मुझे तो !! 

   किन्तु प्रेम निवेदन करने वाले कहां इतनी सरलता से पराजय स्वीकार कर लेते है भला !!
  नायिका भी अपने रूप यौवन और वातावरण को देखकर अगला अस्त्र चलाती है और नायक को समझाती है कि ....
" माना की चर्चे होंगे तेरे मेरे प्यार के
जीत ही लेंगे तुमको हम दिल हार के
माना की चर्चे होंगे तेरे मेरे प्यार के
जीत ही लेंगे तुमको हम दिल हार के
हमको पसंद है, तुमको पसंद है
हमको पसंद है, तुमको पसंद है
प्यार में तेरे दुश्वारियां
गोरी हैं कलाइया ........
 
     इस गाने की धुन , राग आदि में तकनीकी रूप से क्या जादू है यह तो मैं नहीं जानता ,संगीत के विशेषज्ञ ही प्रकाश डालें तो ज्ञात हो किन्तु इतना अवश्य कह सकता हूं एक श्रोता के रूप में कि इस गीत के संगीत के साथ शब्द हृदय में उतरते ,कम्पायमान होते ,जप के समान परत प्रति परत जमते चले जाते है । संगीत कहीं मस्तिष्क से लेकर हृदय तक नाचता गाता रहता है निमिष के सहस्त्रांश में सौ बार !!
      
      सम्प्रति !! भीमा अभी भी नहीं मानता !
उल्टे अन्य विकल्पों पर ध्यान देने का अनावश्यक परामर्श देकर छींजा अवश्य देता है नायिका को ।
  साथ ही साथ गले पड़ने वाली / रास्ता काटने वाली जैसे असभ्य उलाहने भी दे देता है ।बताइए इतनी सुन्दर नायिका द्वारा, रम्भा-शुक प्रणय निवेदन के समान विनती करते देख भी भीमा पिघलता नहीं है,
  और तो और एक पुलिया पर सहायिकाओं द्वारा घेर लिए जाने पर क्रोध से भरकर एक थप्पड़ भी जड़ देता है नायिका के सुकोमल गालों पर और भाग जाता है किसी गुमनाम छत पर !!
    बताइए कौन मूर्ख ऐसा करता है ??
क्या भीमा अगर अमिताभ बच्चन है तो कुछ भी करेगा ??
आज की नारीवादी नेत्रियों की माताएं ऐसे दृश्य देखकर ही तो प्रण ली थी कि ऐसी संताने जनेगी जो कभी पुरुष को हाथ उठाने की क्षमता ही न दे !! 😄

    बहरहाल यह नायिका तो बहुत कठोर चर्म की निकली ,पहुंच गई वहां भी , प्यार किया तो डरना क्या !!थोड़ी हताशा का स्वांग करते हुए नायिका अपना ब्रह्मास्त्र भावनात्मक जाल फेंकने पर विवश हो जाती है !! 
कहती है ....
    अपना बना के मुझे छोड़ ना जाना
प्यार भरा दिल ये मेरा तोड़ ना जाना
अपना बना के मुझे छोड़ ना जाना
प्यार भरा दिल ये मेरा तोड़ ना जाना

  और लगभग रोते हुए कहती है ...
दिल मेरा कुर्बान, मेरी जान भी कुर्बान
दिल मेरा कुर्बान, मेरी जान भी कुर्बान
कुर्बान तुझ पर ये जवानियां
कुर्बान तुझ पर ये जवानियां  

   तभी परीक्षा पूर्ण हो जाती है !
प्रेमी अंततः इस निवेदन को स्वीकार कर ही लेता है ।
तप के सिद्ध होने पर प्रेम का वर देने को उद्यत हो जाता है ! 
    कह पड़ता है उसी राग ,सुर में ,
     गोरी है कलाइयां ....
मैं ला दू तुझे हरी-हरी चूड़ियाँ
गोरी हैं कलाइया
मैं ला दू तुझे हरी-हरी चूड़ियाँ
अपना बना लु तुझे बालमा
अपना बना लु तुझे बालमा

फिर दोनों साथ गाते है एक दूसरे का हो जाने के संकल्प को संगीतबद्ध करके !!
अपना बना ले मुझे बालमा
अपना बना लु तुझे बालमा

अपना बना ले मुझे बालमा
अपना बना लु तुझे बालमा

   कीचक को मारने के लिए द्रौपदी जब भीम से अनुरोध करने विराट नगर की पाकशाला में जाकर सोते हुए महाकाय भीम से लिपट जाती है तब कवि कहते है कि जैसे कोई सुकोमल वल्लरि (लता /बेल) किसी सुदृढ़ वृक्ष पर लिपट जाती है वैसे पांचाली ,याज्ञसेनी द्रौपदी भीम की देह से लिपट जाती है और अपना मनोरथ कह देती है जिस महाबली भीम पूर्ण करके ही दम लेते है ।
     ठीक वैसे ही यहां भी नायिका भीमा के सुदृढ़ न सही लंबी ही सही देह पर वल्लरी की भांति लिपट जाती है चक्षु पटाक्षेप कर प्रेम के अमूल्य क्षणों को अनुभव करती हुई !!
         गौर वर्ण पर हरी चूड़ियां हो या हरित साड़ी या कोई अन्य परिधान ,सदैव अद्भुत प्रतीत होते है ।
यह प्रकृति के सबसे घातक सम्मिश्रणों में से एक है ,
अमोघ ,अचूक और हाहाकारी !!
      मेरा मानना है कि भगवती पार्वती भी संभवतः हरितिमा युक्त परिधान धारण करके ही परमपुरुष शिव को मनाने गई होंगी । शिव के मानने में भी निश्चित रूप से यह तत्व भी रहा ही होगा लौकिक लीला स्वरूप !
  भगवती पार्वती अपने प्रकृति रूप में हरित परिधान से भूषित होकर ही तो गई होंगी ,प्रकृति का प्रिय वर्ण धरके।
   
    तो भाई भक्तों आज सावन की हरियाली के बीच इस 
गोरी कलाई और हरी हरी चूड़ियों वाले गीत को सुनकर 
प्रकृति की हरितिमा को अपने प्रेम जीवन में स्थापित करें!
     
    हरियाली अमावस्या की हार्दिक शुभकामनाएं !!

#पुरोहितजी_कहिन 

(सलंग्न चित्र अपनी क्लचर वाली, अंग्रेजी की मैडम जी का ही है ,जिन्होंने कल ये चित्र प्रकाशित कर लिखने के लिए आंदोलित कर दिया !)
टिप्पणियां और प्रतिक्रिया अवश्य देवें वह भी शुद्ध क्यूंकि एथेनॉल युक्त टिप्पणियां जुकरु स्वीकार नहीं करता आजकल !!😂😂

Friday, 7 August 2026

----- अजमेर शरीफ दरगाह और हिन्दू ------

----- अजमेर शरीफ दरगाह और हिन्दू ------ 
बात उस समय की है जब भारत के शूरवीर योद्धा पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच हरियाणा के तराइन क्षेत्र में युद्ध चल रहा था।‌ पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच तबतक 15 -16 युद्ध हो चुके थे। 
पहले के युद्ध में सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए हिन्दूओं में कवि होते थे जो अपनी वीर रस की कविता से थके-हारे सैनिकों में उत्साह भरते थे।‌  हिंदू युद्ध के बनाए नियमों का पालन अपने मानवीय कर्तव्यों के आधार पर करते थे, जो आज भी हमारी सेना में कायम है। ठीक इसी प्रकार मुसलमान आक्रांताओं में भी था जो आज भी मौलाना मौलवी कहते हैं कि काफिरों को मारोगे तो जन्नत नसीब होगा? 72 हूरें मिलेंगी? 
मोहम्मद गौरी के लश्कर में भी इसी तरह का मौलाना था - मोइनुद्दीन चिश्ती ! वह भी मोहम्मद गौरी की सेना में जन्नत का ख्वाब दिखाकर इस्लाम की दुहाई देकर लड़ने के लिए प्रेरित करता था। जिसे बाद में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के नाम से फिर ख्वाजा गरीब नवाज के नाम से नवाजा गया। मोइनुद्दीन चिश्ती मूलतः फारस, वर्तमान ईरान के सिजिस्तान क्षेत्र का रहने वाला था।‌ जिसे भारत के शिक्षामंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने सूफी संत का खिताब देकर हमारे किताबों में छापा और हम-सब वही पढ़ते आए ! अब आइए मोइनुद्दीन चिश्ती और अजमेर शरीफ दरगाह पर! 
बता चुका हूं कि कैसे मध्य रात्रि में सोते हुए पृथ्वीराज चौहान के शिविर पर हमला कर पृथ्वीराज को बंदी बनाया गया? 
मोहम्मद गौरी के शिविर में जश्न का माहौल था। तभी चर्चा का विषय बना कि पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता को एवं उनकी दोनों पुत्रियां - १ बेला और २ पृथा को मोहम्मद गौरी के हरम में शामिल किया जाए?  मतलब आप समझ ही गए होंगे कि मोहम्मद गौरी इन स्त्रियों के साथ कौन सा व्यवहार करना चाहता था? बता दूं कि पृथ्वीराज चौहान की दोनों पुत्रियों का विवाह हो चुका था। बड़ी बेटी बेला का विवाह महोबा के राजकुमार ब्रह्मदत्त से और छोटी पुत्री पृथा का विवाह मेवाड़ के राजकुमार रावल समर सिंह जी से हुआ था। सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक सेना की टुकड़ी लेकर चलने लगा तो मोइनुद्दीन चिश्ती के भी अंदर का  शैतान जाग उठा? वह भी टुकड़ी में शामिल हो गया। यहां बता देना जरूरी है पृथ्वीराज की दोनों पुत्रियां शस्त्र कला में निपुण एवं परम साहसी थी। आखिर बेटी भी थी तो क्षत्रिय शिरोमणि पृथ्वीराज चौहान की? 
रानी संयोगिता को मालूम चला कि कुतुबुद्दीन ऐबक अपनी सेना लेकर किले में प्रवेश कर लिया है तो रानी ने दासियों सहित जौहर कर लिया । महल का मुख्य द्वार खुलने के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक महारानी के शरीर को छूना तो दूर, देख भी नहीं सका! अब आइए मोइनुद्दीन चिश्ती पर। मोइनुद्दीन चिश्ती को मालूम चला कि पृथ्वीराज की दोनों पुत्रियां शिव-पार्वती मंदिर में विशेष पूजा  * गणगौर * पूजने गई है तो कुछ सैनिकों को साथ में लेकर मोइनुद्दीन चिश्ती चल दिया पहाड़ी पर बने मंदिर के तरफ। जानकारी मिलने पर दोनों शेरनियां सतर्क हो गई और मोइनुद्दीन चिश्ती को सैनिकों सहित मार गिराई। सेना की दूसरी टुकड़ी आने से पूर्व ही दोनों बहनों ने स्वयं को नष्ट कर दिया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपने मोइनुद्दीन चिश्ती को देखकर आग बबूला हो गया। उसने मंदिर के मूर्तियों को खण्डित किया और मोइनुद्दीन चिश्ती को वहीं दफ़न करने का फैसला किया।‌ यह घटना 1192 की है। भारत के इस्लामिक इतिहासकारों ने, कांग्रेसी हुकुमत ने इसे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह, तो उससे भी जी नहीं भरा तो अब गरीब नवाज शरीफ दरगाह कहकर हिन्दुओं को मूर्ख बनाते आ रहे हैं।‌ कहते हैं कि दरगाह पर चादर और चढ़ावा चढ़ाने से मन्नतें पूरी होती हैं? अरे मूर्ख हिन्दूओं ? कब्र पर चादर चढ़ाने से कहां पर मन्नतें पूरी होती हैं? यह सब तो इसलिए किया गया है ताकि हिन्दुओं को असलियत का पता नहीं चले कि मोइनुद्दीन चिश्ती कितना बड़ा पापी था जो चला था हिन्दु की बेटी का बलात्कार करने? 
जब अपने खुद के चाचा के पार्थिव शरीर को छूकर आते हो तो पहले स्नान करते हो? अपने बाप का दाह संस्कार कर पहले गंगा स्नान कर शुद्ध करते हो शरीर को फिर घर में प्रवेश करते हो? वह जेहादी की लाश कब से पवित्र हो गया जहां चादर चढ़ाने पर तुम गर्व करने लग गए? वह तो तुम्हारे अपने पूर्वजों का हत्यारा है तो वह कैसे पवित्र हो गया? 
सीधी सी बात है कि हमसे हमारा इतिहास चुराया गया है।‌ हमारा सोना चोरी हुआ है तो रिकवरी में यदि कोई दरोगा तुम्हें पीतल वापस करे तो क्या मान लोगे? जरा सोचिए। 70 वर्षों में  हमारा सोना चुरा कर हमें पीतल वापस किया है? अब तो अपने पूर्वजों को जानो और जो अंदर से फैसला हो वही करें।
विचार अवश्य कीजिएगा।

Friday, 31 July 2026

कहीं आप भी तो इससे मिलती जुलती कोई त्रुटि अपने संसार में नहीं कर रहे हैं??

क्या उस घर के सदस्य पागल या maniac थे जिनको मैने कुछ दिन पहले खूब झेला था और उनकी खतरनाक मानसिकता को मैं बमुश्किल बदल पाया था!!हालांकि मैं उनकी हाड़ कंपा देने वाली प्रवृति को बदल पानी में समर्थ रहा लेकिन एक बात दावे से कह सकता हूं कि उनके द्वारा उत्पन्न किया गया अभिशाप जिस तरह से इस परिवार के सुनहरे बीस साल लील गया आप भी यही गलती भूले से मत करना!!हालांकि कुछ लोग बिना सोचे समझे ये कह सकते हैं कि साब हम अपने पितरों को जो 16 दिन तक नैवेद्य देते हैं उसका क्या??तो पहले ये मेरा अनुभूत प्रसंग पढ़िए और खुद डिसाइड कीजिए कहीं आप भी तो ऐसे किसी प्रसंग के भुक्तभोगी तो नहीं हैं??और हां,श्राद्ध के दिनों में दिया जाना वो नैवेद्य गृहों की परिस्थिति और उस पवित्र माहके कारण पूर्ण शास्त्र सम्मत है!! 

नाम शहर स्थान को बिल्कुल मत पूछिए लेकिन जिस परिवार ने यह भयंकर गलती की है ऐसी ही भयंकर गलती और परिवार वाले भी पूरे भारत भर में कहीं न कहीं कर रहे होंगे जोकि ऑलरेडी सनातनी है !!उन्हीं के विचारार्थ ये सच्चा किस्सा बयान कर रहा हूं!!

मेरा यह पोस्ट शायद उस परिवार वालों के भी पढ़ने में आ सकता है जिनको अपनी प्रत्यक्ष आंखों से मैंने यह खतरनाक उपक्रम करते हुए देखा है!!लेकिन ये सब कुछ उसी परिवार के जिम्मेदार बेटे की सहमति से लिखा जा रहा है!!

हुआ यूं की करीब 20 वर्ष पहले एक सनातनी परिवार की सुंदर और गृह कार्यों में कुशल गृहणी का 35 वर्ष की आयु में देहांत हो गया!! वह लोग इस घटना को 2005 मैं घटित हुआ बताते हैं!! उनकी पर्सनल पहचान ना बताने की शर्त पर उनसे यह तय हुआ कि मैं उनके इस खतरनाक अनुभव को फेसबुक पर दूसरे लोगों को सबक देने के लिए जरूर शेयर करूंगा!!

तो मित्रों उनकी मृत्यु के पश्चात उनके 13वीं संपन्न हुई क्योंकि उनके छोटे-छोटे तीन बच्चे थे जो आज काफी वयस्क हो चले हैं और इतने समझदार हैं कि अपने पिता की गलती को बड़े होकर उन्होंने सुधारने के क्रम के फल स्वरुप मुझे अपने घर पर आमंत्रित किया!!

होता यह था कि घर के गृह स्वामी अपनी पत्नी के वियोग में उनकी मृत्यु के पश्चात इतने पागल हो गए कि उन्होंने अपनी पत्नी के इसी दुनिया में रहने का एहसास कर लिया और यह मान लिया कि वह अभी भी उनके आसपास हैं!! रोज रात को वह उनके नाम से बिस्तर लगाते और उस बिस्तर पर उनकी मनपसंद भोजन सामग्री के रूप में लिट्टी चोखा रखने लगे!! सुबह उठते ही उनके बिस्तर बड़े करीने से समेट दिया जाता और रखे हुए लिट्टी चोखे को पशु पक्षियों में तकसीम कर दिया जाता था!!

तो मित्रों कुछ दिन तो सब कुछ ठीक चला लेकिन ठीक 15 महीने के बाद उनके घर में वह मर चुकी गृह लक्ष्मी अपनी खून जमा देने वाली उपस्थिति दर्ज कराने लगी!! पतिदेव का तो कुछ नहीं हुआ क्योंकि वह एक खतरनाक मानसिकता में जी रहे थे लेकिन घर का बड़ा बेटा जो उस वक्त लगभग 14 वर्ष का था उसका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा और वह गुमसुम रहने लगा दो-तीन साल बाद बीच वाला बेटा और सबसे छोटी बेटी भी अपने आप में सिमटी हुई रहने लगी!! गृह स्वामी पर उसका कोई असर नहीं था हालांकि उन्होंने दूसरी शादी नहीं की लेकिन वह यह मानने वाले उस घर में अकेले इंसान थे कि उनकी पत्नी अभी भी स्थूल शरीर में उनके साथ है!! कुछ अतरंग बातें मैं इस पोस्ट में जानबूझकर स्किप कर रहा हूं क्योंकि मेरी एक सभ्य ऑडियंस है लेकिन वास्तव में होता क्या रहा था वह आप खूब समझ रहे होंगे!!

एक वर्ष पहले मेरे पास फोन आया तो मैंने रिसीव किया!! उधर से एक युवक की आवाज आ रही थी जिसने पूछा,"क्या आप बाल्मीकि अंकल हैं?".... मेरे हां करने पर वह लगभग सुबकने की हालत में आ गया और रोते रोते अपने घर का डरावना हाल मुझे बताया!! सुनकर मैं भी सिहर गया और मैने उस घर जाकर बच्चों की मदद का निश्चय कर डाला!!

मित्रों करीब 13 घंटे की यात्रा के पश्चात में उस शहर में पहुंचा और स्टेशन पर थोड़ा फ्रेश होकर उस परिवार में एंट्री किया तो बड़ा बेटा जो लगभग 34-35 वर्ष का हो चला था उसने मेरा स्वागत किया उसके पीछे लगभग 27 वर्ष की युवती खड़ी थी और 30 वर्ष का उनका भाई अपने जॉब पर था जो 2 घंटे के भीतर मेरे आने की खबर सुनकर घर पर आ गया!!

उसके आने तक मैं उसे घर के हालात देख चुका था और बहुत सारी समस्याओं से परिचित हो चुका था!!

तो मित्रों अब तक वह ग्रहणी उस घर में एक जीवित आत्मा की भांति अपनी रहस्यमय उपस्थित स्वरूप ना केवल गृहस्वामी से वार्ता करती थीं बल्कि बच्चों को भी अपने दिशा निर्देश प्रदान करती रहती थीं!!घर में जो भी भोजन बनता था दोनों वक्त बाकायदा नियम स्वरूप उनको उसी बिस्तर पर अर्पित किया जाता था!!सच्ची कहानी है कोई उपन्यास नहीं सो ज्यादा लंबा ना खींचूंगा सो इतना समझ लीजिए उस घर में अगर भूल से भी लिट्टी चोखा घर तो छोड़िये बाहर भी जाकर खा लिया और गृह स्वामिनी को अर्पित ना किया तो फिर भयंकर तबियत खराब होना निश्चित समझिए संबंधित व्यक्ति की!!जब बड़े बेटे का विवाह हुआ तो मंढा उत्सव में खास व्यंजन लिट्टी चोखा बनवाया गया!!नाते रिश्तेदारों में जब ये खबर फैली तो उस घर से सबने किनारा करना शुरू कर दिया!!एक बार फिर कहता हूं कि अनेकों डराने वाले किस्से जानबूझकर स्किप कर रहा हूं कि मेरा इरादा डर के माहौल को फैलाना नहीं है बल्कि सबको एक शिक्षाप्रद तस्वीर दिखे वही बातें बता रहा हूं!!

अगर कोई मेहमान घर के कुछ नियमों की अवहेलना कर दे तो उसको ऐसी मार पड़ती कि पूछो मत भाई लोग!!

गृह स्वामी लगभग खुश थे अपनी स्थिति थे लेकिन अब तक बच्चों ने विद्रोह का मन बना लिया था हालांकि इसमें भी उन्होंने देर कर दी थी!!क्योंकि रिश्तेदारी में उनकी खूब जगहंसाई होती थी तो एक दिन विस्फोट होना निश्चित था!!तीनों बच्चों ने बाल्मीकि अंकल को बुला तो लिया लेकिन गृहस्वामी के स्वाभिमान पर ये लात के जैसा था!!बस उन्होंने तो मुझे धर लिया भाले की नोंक पे और नानी दादी की अति प्राचीन कहावते मुझे सुना डालीं!!इससे पहले कि वे मुझे पीट डालते पूरा भयभीत मुहल्ला,बड़े बेटे के ससुराल वाले और अड़ोसी पड़ोसी सबने उन भाई साब को सूअर की मानिंद धून डाला!!मुझे याद है जब मैं उन अदृश्य गृहस्वामिनी से वार्ता कर रहा था तो 150 के ऊपर लोग हैरत से मुझे देख रहे थे!!

वो गृह स्वामिनी एक भली औरत निकली और मेरे इसरार पर उन्होंने अपना पुनः विधिवत अंतिम संस्कार किया जाना मान लिया!!उन्होंने भी पुष्टि की उनके पति ने उनकी आत्मा को अति कष्ट पहुंचाया था और बिना किसी उकसावे के मृत आत्मा का आवाहन करके जबरन इस दुनिया में लौटने पर विवश कर दिया था और ममता की मारी वह माता अपने परिवार और बच्चों के मोह में वापस लौट आईं थीं!!

भीड़ के एक कोने में डरे सहमे एक पुरोहित जी खड़े थे जो मुझे देखकर मेरे पास आए,"भगत जी अब क्या किया जाए??सबसे पहले मैने लोगों द्वारा हाथपैर जकड़ कर एक और डाले गए गृह स्वामी को बंधनमुक्त किया!!गृह स्वामिनी की मर्जी पूछी और पति तथा दोनों बेटों को लेकर एक बड़े वाहन से हम उसी वक्त श्री गया जी रवाना हो गए!!तीन घंटे पश्चात वहां हमने गृह स्वामिनी की शादी की लाल ड्रेस,उनके नाक कान के आभूषण,उनका संपूर्ण बिस्तर और हां एक प्लेट लिट्टी चोखा इस वायदे के साथ +वैदिक मंत्रोपचार के साथ नदी को समर्पित कर दिया और वायदा लिया कि अब वे इस स्थूल दुनिया में कभी वापस नहीं आएंगी और अपने पति और बच्चों को कभी डिस्टर्ब नहीं करेंगी!!और हुआ भी यही!अब वह घर पूर्णरूपेण शांत है और घर में खुशी की किलकारियां गूंजती हैं!!

आज मैं इस फैमिली का प्यारा बाल्मीकि अंकल हूं और वो मासूम बिटिया 6 माह पूर्व एक धार्मिक लड़के से ब्याह दी गई है और ससुराल में सुखी है!!बड़े बेटे को मैने तीन दिन पहले फोन किया और हालचाल पूछे तो उसने कहा,"अंकल,हमारी पहचान गुप्त रखकर अपने शब्दों में आप हमारी कहानी को दुनिया के लिए नजीर के रूप में पेश करो ताकि ऐसी ही खतरनाक गलती कर रहा कोई अंजान परिवार हमारी तरह दुख न भोगे!!सो मित्रों मैने ये सब आपके समक्ष लिखा!!

ये तो रही एक सच्ची घटना मित्रों!!अब बस एक प्रश्न अपने प्रिय सनातन के लोगों से हैं कि कहीं आप भी तो इससे मिलती जुलती कोई त्रुटि अपने संसार में नहीं कर रहे हैं?? इफ yes तो जल्द से जल्द ऐसा कर्म अवॉइड करें वरना आपको भी इस कर्म से कष्ट पहुँच सकता है जो मैं कदापि नहीं चाहूंगा!!धन्यवाद!!

किशोर बाल्मीकि 
8077748527
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