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Wednesday, 28 October 2026

प्रकृति के अप्रकट रहस्य - कुछ सत्य ऐसे हैं जिन्हें सभी मनुष्य झुठलाने या बदलने के प्रयास में लगे रहते हैं ..

मनुष्य पाँच तत्त्वों से बना है। भूत-प्रेत चार तत्त्वों से बने होते हैं, उनमें पृथ्वी तत्त्व नहीं होता। देवताओं का शरीर तीन और दो तत्त्वों से बना होता है। परमात्मा केवल आकाश तत्त्व से बना होता है। इन सभी को इन्हीं बाहरी आँखों से देखा जा सकता है, परन्तु परमात्मा को अंतर्दृष्टि खुले बिना देखा ही नहीं जा सकता। आप मंत्र-सिद्धि मत कीजिए, केवल अपनी क्षमता बढ़ा लीजिए, दो तत्त्व तक के शरीर देख सकेंगे।
मैं देवघर में जिस होटल में रुकता हूँ, उसके कमरे की सारी खिड़कियाँ बाहर की ओर खुलती हैं। एक खिड़की के सामने एक पुरानी इमारत है, उस पर पानी की लोहे की एक पुरानी टंकी रखी है, जो शायद अब उपयोग में नहीं आती।
एक दिन एक दम्पत्ति अपनी दस वर्षीय पुत्री को लेकर आए। वह कुछ भी बोलती रहती थी। उन तीनों को कमरे में बैठाकर मैं नीचे होटल के रिसेप्शन पर चला गया। कुछ देर बाद ऊपर लौटा तो देखा, माँ अपनी बेटी को डाँट रही है। मैंने पूछा, क्या हुआ? वे बोले, कुछ नहीं, बस वह बीच-बीच में बाहर खिड़की की ओर देख रही थी।
मैंने उस लड़की को पास बुलाकर पूछा, क्या उस पानी की टंकी पर कोई खड़ा है? उसकी माँ बीच में ही बोल पड़ी, इसे पता नहीं क्या-क्या दिखता रहता है, हम तो परेशान हो गए हैं। वह छोटी बच्ची बोली, क्या आपको भी दिखा है।  मैंने कहा, मैं जब भी यहाँ आता हूँ, रोज़ ही देखता हूँ। यह दो-तीन बार यहाँ से कूदती है, परन्तु मरेगी नहीं, क्योंकि इसे मरे हुए कई वर्ष हो गए हैं। अब ऐसी बातें सभी को डराती हैं।उसके पश्चात मैंने उन दम्पत्ति को बाहर जाने के लिए कहा और उस बच्ची से डेढ़ घंटे तक बात की। सब कुछ सामान्य ही था। फिर उसके माता-पिता को बुलाकर कहा, यह बिल्कुल ठीक है, इसे कुछ नहीं हुआ है। यह केवल थोड़ा अधिक देख लेती है। अधिक से अधिक इतना कि यह चार तत्त्वों तक की वस्तुओं को देख लेती है। परन्तु माता-पिता को ऐसी बेटी नहीं चाहिए। यह समस्या हम सभी की है।हमें संतान तो चाहिए, परन्तु अपनी इच्छा के अनुसार। जबकि हमें यह भली-भाँति ज्ञात होना चाहिए कि पुत्र या पुत्री के रूप में जो भी मिला है, वह सब पहले से ही प्रोग्राम होकर मिला है। इस प्रकार की क्षमता प्राप्त करने के लिए लोग लम्बी तपस्या करते हैं। उस बच्ची को यह सब स्वाभाविक रूप से प्राप्त है। उस बच्ची के कुछ सिस्टम को लॉक कर दिया गया। लोगों की दृष्टि में वह ठीक हो गई, परन्तु मेरी दृष्टि में उसकी प्रगति रुक गई।
हम अपनी क्षमताओं को विकसित नहीं करना चाहते। हमें लगता है कि हम जिसकी साधना कर रहे हैं, वही सब कुछ करे। जो लोग प्रत्यक्षीकरण करना चाहते हैं, वे किसी योग्य व्यक्ति के सान्निध्य में त्राटक के सभी सात चरणों को गम्भीरता से पूरा करें। जिन्हें अपना माल बेचना है, मैं उनकी बात नहीं करता। बस गायत्री की प्रशंसा कर दी, लोग बिना सोचे-समझे उसे लेने के लिए मरे जाते हैं।
मनुष्य सत्य पर कितनी भी मिट्टी क्यों न डाल दे, सत्य को बदला नहीं जा सकता। उसे स्वीकार करना ही पड़ता है। एक बार सत्य को स्वीकार करने का स्वभाव बन जाए तो जीवन में परिवर्तन अपने आप आरम्भ हो जाता है। इसके लिए अलग से कोई टंटा-घंटा करने की आवश्यकता नहीं है।
कुछ सत्य ऐसे हैं जिन्हें सभी मनुष्य झुठलाने या बदलने के प्रयास में लगे रहते हैं, परन्तु जब से पृथ्वी बनी है तब से आज तक कोई ऐसा कर नहीं पाया। मैं यहाँ कुछ ऐसी ही बातों पर थोड़ा प्रकाश डाल रहा हूँ, जिन्हें हम सभी झुठलाने में लगे रहते हैं।
कुछ वर्ष पूर्व मैं राजधानी एक्सप्रेस से मुजफ्फरपुर से कामाख्या जा रहा था। सेकंड एसी में मेरी सीट के ठीक सामने एक ब्राह्मण की सीट थी। वहाँ कुछ विधायक भी थे। उन्हें देखकर ब्राह्मण कुछ अधिक ही सक्रिय हो गया। तुलसीदास ने क्या कहा है, यही उसके भीतर से उबाल मार रहा था। मैंने उसे दो-तीन बार रोककर कहा, शांत बैठो, परन्तु वह बिल्कुल नहीं माना।
अंततः मैंने उससे एक छोटा-सा प्रश्न किया - राम और सीता की विवाह-कुंडली किसने मिलाई थी? सीता के चरण जैसे ही अयोध्या में पड़े, राम को वनवास हो गया, ससुर दशरथ की मृत्यु हो गई, पूरा परिवार बिखर गया। उसके बाद जो कुछ हुआ, वह सबके सामने है। हम कैकेयी को दोष देते हैं, धोबी को दोष देते हैं, उस ब्राह्मण को दोष क्यों नहीं देते जिसने कुंडली मिलाई थी? हम उस ब्राह्मण से भी कुछ नहीं कहते जो द्वापर की जगह त्रेता ले आया था, उसने सब कुछ ठीक क्यों नहीं किया?यदि हमारे घरों में ऐसी बहू आई होती तो वह जीवन भर ताने सुनती।ब्राह्मण ने कई बार विषय बदलने का प्रयास किया, परन्तु मैं नहीं माना। मैंने कहा, अब पूरी रात इसी विषय पर बात करूँगा। मुझे तुम्हारे रामचरितमानस के ज्ञान को देखना है। वहाँ विधायक थे, भीड़ तो थी ही, और भी काफी भीड़ एकत्र हो गई। अंततः तीन घंटे बाद रात ग्यारह बजे ब्राह्मण सीट बदलकर थर्ड एसी में चला गया। उसके बाद वहाँ उपस्थित लोगों के साथ जो सत्संग हुआ, उसी के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं।
वास्तविकता को स्वीकार करने में हमारा साहस क्यों मर जाता है ?
राम एक आदर्श व्यक्तित्व हैं। जिन तथ्यों को हम नकारते हैं, वही उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाते हैं। हम राम को मानते तो हैं, परन्तु राम ने जो करके दिखाया, उसमें हमारी आस्था नहीं है। ईश्वर ने कृष्ण के रूप में कहा कि जीवन की वास्तविकता क्या है, और राम के रूप में जीकर दिखाया कि मनुष्य को जीवन कैसे जीना चाहिए। परन्तु हमने इन सबसे बचने के बहाने खोज रखे हैं।
राम ने सारा जीवन अपमान, पीड़ा और संघर्ष में जिया। यह सब समाज का ही दिया हुआ था। मंच पर बैठे लोग कहते हैं, वे लीला कर रहे थे। लीला तो नौटंकी को कहा जाता है। लोगों ने राम के सम्पूर्ण जीवन-चरित्र को ही मजाक बना दिया है। यही कारण है कि हम राम को आदर्श मानते तो हैं, परन्तु उनके जीवन जीने की शैली का अनुसरण नहीं करते।

विधेहि देवी कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

वेदोऽहम् अवेदोऽहम्। विद्याहम् अविद्याहम्।
*अजाहम् अनजाहम्। अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक् चाहम्॥

                  #अष्टावक्रवैदिकविज्ञानशोध
          साभार ✍️ हिमालयन घुमक्कड़ विक्रम गिरी
          Himalayan Ghumkkad Vikram Giri 

                         वयं राष्ट्रे जागृयाम 

विद्या और अविद्या में अंतर

                 🍃                ॥ॐ॥                🍃

                       विद्या और अविद्या का अंतर

• विद्या वह सच्चा ज्ञान है जो इस अज्ञान के आवरण को हटाकर जीव को मोक्ष और मुक्ति की ओर ले जाता हैं।
• अविद्या वह भ्रांति या पर्दा है जो वास्तविक सत्य (ब्रह्म या आत्मा) को ढक लेती है और मनुष्य को संसार एवं जन्म-मृत्यु के चक्र में बांधे रखती है।

                               ❀  विद्या  ❀
   श्रुति अनुसार विद्या मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं -

(१) परा विद्या (आध्यात्मिक या पारलौकिक ज्ञान)
  • यह वह ज्ञान है जो ब्रह्म (परम सत्य) और आत्मा की एकता का बोध कराता है।
  • इससे माया और संसार के बंधनों से मुक्ति मिलती है।
  • इसे जीवन जीने का ज्ञान भी कहा जाता है। 
(२)  अपरा विद्या (लौकिक या भौतिक ज्ञान)
  • यह संसार, प्रकृति, विज्ञान और जीविका से जुड़ी विद्या है।
  • इसमें चारों वेद, वेदांग, दर्शन, इतिहास-पुराण, न्याय, ज्योतिष और विभिन्न व्यावहारिक विषयों का अध्ययन आता है।
  • इसे जीविका चलाने का ज्ञान भी कहा जाता है। 
                     विद्या के अन्य वर्गीकरण
  • 14 विद्याएँ: भारतीय ग्रंथों के अनुसार मुख्य रूप से 14 विद्याएँ मानी गई हैं। इनमें 4 वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद), 4 उपवेद (आयुर्वेद, धनुर्र्वेद, गंधर्ववेद, अर्थवेद या स्थापत्य), और 6 वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष) शामिल हैं। 
  • 18 विद्याएँ: विष्णुपुराण और लोकनीति के अनुसार कुल 18 विद्याएँ बताई गई हैं (जिसमें 4 वेद, 6 वेदांग, पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, धनुर्र्वेद, गंधर्ववेद और अर्थशास्त्र शामिल हैं)।
  • शुक्रनीति के अनुसार: इसमें 32 मुख्य विद्याएँ और 64 कलाओं का वर्णन मिलता है। 

                             ❀ अविद्या ❀
 श्रुतिनुसार अविद्या भी मुख्य रुप से दो प्रकार की होती हैं-

   (१) महर्षि पतंजलि के योगसूत्र के अनुसार अविद्या

योगदर्शन (साधन पाद, सूत्र २.५ ) के अनुसार अविद्या चार प्रकार की होती है: -
अनित्यशुचिदुःखात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥

• अनित्य में नित्य की प्रतीति: जो चीज़ नाशवान या बदलने वाली है, उसे शाश्वत या सदा रहने वाली समझना (जैसे इस नश्वर शरीर को हमेशा रहने वाला मानना)।
• अशुचि में शुचि की प्रतीति: अशुद्ध या गंदी वस्तु को पवित्र या सुंदर समझना (जैसे शरीर और संसार की मलिनाता को सुंदर मानकर उसमें अत्यधिक आसक्ति रखना)।
• दुःख में सुख की प्रतीति: जिससे वास्तव में दुःख मिलने वाला है, उसे सुख का साधन समझना (संसार के भोग-विलासों को सच्चा सुख मानना)।
• अनात्मा में आत्म-बुद्धि: जो आत्मा नहीं है (जैसे शरीर, मन, इंद्रियां या अहंकार), उसे ही अपनी 'आत्मा' या 'मैं' समझना।

 (२)  आध्यात्मिक दृष्टि से जीव की अविद्या के पाँच स्तर 

अध्यात्मिक दृष्टिकोण से जीव की अविद्या को पाँच स्तरों में बांटा गया है: -
• स्वरूप-विस्मृति: जीव का अपने मूल, दिव्य और सत्य स्वरूप को भूल जाना।
• देहाध्यास: आत्मा होते हुए भी खुद को केवल नाशवान 'देह' (शरीर) मान लेना और देहभिमानी हो जाना।
• इंद्रियाध्यास: स्वयं को आंख, कान, नाक आदि इंद्रियों के रूप में देखना और उनके सुख-दुःख को अपना मानना।
• प्राणाध्यास: प्राण की क्रियाओं और ऊर्जा के उतार-चढ़ाव को ही अपना जीवन या अस्तित्व समझ लेना।
• अंतःकरणाध्यास: मन, बुद्धि और अहंकार के विचारों को ही अपना 'सत्य रूप' मान लेना।

                      साभार - सनातन ज्ञान महासागर 
                          ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा 
                           ❀ वयं राष्ट्रे जागृयाम ❀

Monday, 26 October 2026

पर्जन्यों के आकर्षण केन्द्र वृक्षों में देवताओं का निवास

               🍃                *॥ॐ॥*                 🍃     

                          *** वृक्षों में देवता निवास ***

बिल्व वृक्ष में भगवान् शिव का निवास तथा अश्वत्थ में विष्णु का निवास होता है l शिरीष वृक्ष में इन्द्र देव का तथा निम्ब और अर्क (मदार) में सूर्य देव का निवास होता है l ये वृक्ष इन देवों के विग्रह माने गए हैं l अतः इनका विनाश वर्जित है—-
               तत्र बिल्वे स्थितः शम्भु: अश्वत्थे हरिरव्ययः l 
                 शिरीषेऽभूत् सहस्रक्षो निम्बे देवः प्रभाकर: ll 
                 स तु तन्मयताँ यातः तस्मात् तं न विनाशयेत् ll ( पद्म पुराण )

ऋग्वेद के अनुसार बिल्व वृक्ष श्रीदेवी का वृक्ष है - 
                            वनस्पतिस्तव वृक्षोथ बिल्व: ll 
 देवासुर युद्ध के समय संकट काल में इन वृक्षों में इन देवों ने गुप्त रूप से निवास किया था l  अतः इन वृक्षों का छेदन वर्जित है l 
ग्रहों की समिधा के वैदिक वृक्ष निम्नवत् हैं— 
सूर्य का मदार, चंद्र का पलाश, मंगल का खदिर, बुध का अपामार्ग (चिड़चिड़ा),गुरु का अश्वत्थ,शुक्र का औदुम्बर (गूलर), शनि का शमी, राहु का दूर्वा तथा केतु का कुशा l 
तिल अन्न को विष्णु का प्रत्यक्ष प्रकटी करण माना गया है l पृथ्वी को तिल तिल में व्याप्त कर विष्णु ने अपने को तिल रूप में प्रकट किया था l अतः इसे हवनीय माना गया है l 
इसी तरह से २७ नक्षत्रों के २७ वनस्पति प्रसिद्धि को प्राप्त हैं l 
   वेदों में अथवा ब्राह्मण ग्रंथों में किस वृक्ष से हवन करने से क्या मिलता है यह वर्णित है जैसे खदिर से हवन से बल तेज की वृद्धि, पलाश से हवन से विद्या वृद्धि तथा गूलर से हवन से वंश वृद्धि होती है l देवी के निवास के लिए निम्ब वृक्ष लोक प्रसिद्ध है ही l 
प्रेत निवास वृक्ष के रूप में विभीतक (बहेड़ा) माना गया है l 
ये वृक्ष पृथ्वी के रोम माने गये हैं l ये पृथ्वी की सम्पदा हैं l देवता के निवास स्थान हैं l पर्जन्यों के आकर्षण केन्द्र हैं l

                               ✍️ कमलेश्वर उपाध्याय 

                           ❀ *_वयं राष्ट्रे जागृयाम_* ❀*

गायत्री_मंत्र_पाठ_करने_के_विशेष_नियम

#गायत्री_मंत्र_पाठ_करने_के_विशेष_नियम :
गायत्री मंत्र का पाठ करने का अधिकार किसको है, इसे लेकर शास्त्रों में दो तरह के मत मिलते हैं - 
1. परम्परागत शास्त्रीय मत और 
2. आधुनिक/सुधारवादी मत !
1. परम्परागत शास्त्रीय मत के अनुसार
परम्परागत स्मृति और धर्मशास्त्रों में गायत्री मंत्र को वैदिक मंत्र माना गया है, इसलिए इसका पाठ करने के कुछ खास नियम बताये गए हैं :
किसे पाठ करने का अधिकारी माना जाता है :
• जिसका यज्ञोपवीत संस्कार/उपनयन संस्कार हुआ हो ! इसीलिए इसे द्विज मंत्र भी कहा जाता है !
• जो शारीरिक और मानसिक शुचिता का पालन करता हो !
- स्नान के बाद, पवित्र स्थान पर, सात्विक अवस्था में पाठ करता हो !
• जिसने किसी योग्य गुरु से गायत्री मंत्र की दीक्षा ली हो ! बिना दीक्षा लिए केवल गायत्री मंत्र को सुनना और मानसिक स्मरण करने का विधान है, वाचिक जप का नहीं !
नियम/निषेध के रूप में जो बताया गया है --
• अशौच अवस्था में होने पर पाठ नहीं करना चाहिए!
- जन्म-मरण का सूतक होने, मासिक धर्म, या अपवित्र अवस्था में होने पर पाठ का निषेध किया गया है !
• बिना उच्चारण शुद्धि के भी पाठ नहीं करना चाहिए !
- गायत्री मंत्र में उदात्त-अनुदात्त स्वर का बहुत महत्व है, अशुद्ध उच्चारण से विपरीत फल मिल सकता है !
• मांस-मदिरा का सेवन करके, क्रोध में होने पर, असत्य के साथ पाठ नहीं करना चाहिए !
- मंत्र-जप के समय संयम रखना अनिवार्य माना गया है !
• कुछ आचार्य ग्रंथों में स्त्रियों और यज्ञोपवीत-रहित वर्णों द्वारा वैदिक स्वर में गायत्री के वाचिक जाप को निषिद्ध बताया है, उनके लिए पौराणिक गायत्री - जैसे "या देवी सर्वभूतेषु..."  या  "ऊँ गायत्र्यै नमः" जैसे नाम-जप का विधान बताया है !
यह मत मीमांसा, मनुस्मृति और कई पुराने भाष्यों पर आधारित हैं !
2. आधुनिक और दूसरा शास्त्रीय मत
यह मत वेद, उपनिषद और पुराणों के दूसरे प्रमाणों को सामने रखता है :
• यजुर्वेद श्लोक 26.2 में कहा गया है - "यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः!" - यह कल्याणी वाणी सभी जनों के लिए है !
 • देवी भागवत और कई तंत्र ग्रंथों में गायत्री को आदिशक्ति - वेदमाता कहा गया है, न कि केवल एक वैदिक छंद !शक्ति रूप में उसकी उपासना पर किसी का प्रतिबंध नहीं होता है !
• आर्य समाज, गायत्री परिवार (शांतिकुंज) और अधिकांश आधुनिक संत मानते हैं कि गायत्री मंत्र प्राण-शक्ति और सद्बुद्धि का मंत्र है, इसलिए श्रद्धा, पवित्रता और सही उच्चारण के साथ स्त्री-पुरुष, सभी वर्ण, सभी आयु के लोग इसका जाप कर सकते हैं !
• बालकों के लिए मानसिक जप या 3-5-11 बार का लघु जाप करना पर्याप्त बताया जाता है, लम्बी माला का पाठ नहीं !
 गायत्री मंत्र का पाठ कैसे नहीं करना चाहिए पर अधिक जोर दिया गया है !
व्यवहार में क्या ध्यान रखना चाहिए  -
यदि आप परम्परागत पद्धति से पाठ करना चाहते हैं तो --
1. योग्य गुरु से दीक्षा लेकर, जनेऊ धारण करके, प्रातः सायं संध्या के समय शुद्ध उच्चारण के साथ गायत्री मंत्र का जप करें !
2. यदि अपने गुरु से दीक्षा नहीं ली गयी है या किसी विशेष परम्परा से बंधे नहीं हैं, तो बिना तेज स्वर के, शुद्ध मन से, मानसिक या मधुर वाचिक रूप में इसका पाठ सभी कर सकते हैं - 
ऐसा आज अधिकांश पंचांग और ज्योतिर्विद मानते हैं !
3. सूतक-पातक, अपवित्र स्थान, और बिना स्नान के जप करने से बचें !
4. गायत्री का जप क्रोध, द्वेष या किसी का अहित करने के संकल्प से कभी नहीं करना चाहिए !
संक्षेप में - 
अधिकारी वह है जो -- पुरानी मर्यादा रक्षा के लिए कुछ विशेष नियम और उनके पालन करते हुए पाठ करे, ऐसा भेद बताया गया है और उपासना-परक परम्परा गायत्री को माता मानकर सभी को पाठ करने का अधिकारी मानती है !आप जिस परम्परा का अनुसरण करते हैं, उसी के अनुसार आचरण करना उचित होता है !
हाँ, यह बात ध्यान देने योग्य अवश्य है कि गायत्री को केवल मंत्र नहीं, महामंत्र माना गया है, इसलिए इसके जप के साथ कुछ विशेष नियम शास्त्रों में बताये गए हैं 
 संक्षेप में गायत्री मंत्र पाठ का मुख्य नियम यह हैं :
1. समय और दिशा का नियम :
• सर्वोत्तम समय : ब्राह्म मुहूर्त ( सूर्योदय से लगभग 1.5 घंटा पहले ) और तीनों संध्या - प्रातः, मध्याह्न, व सायं !
गृहस्थ के लिए प्रातः और सायं ही पर्याप्त माना गया है !
• दिशा: -- प्रातःकाल पूर्वमुखी, सायंकाल पश्चिममुखी या उत्तरमुखी बैठकर जप करना चाहिए !
दक्षिण मुख करके पाठ करने का निषेध है "
• चलते-फिरते, लेटे हुए, या जूते पहनकर जप नहीं करना चाहिए !
2. शुचिता और आसन :
• स्नान, आचमन, पवित्री धारण करने के उपरांत ही जप करना चाहिए !
 • आसन: कुश का आसन सर्वश्रेष्ठ होता है, उसके बाद ऊनी या सूती आसन प्रयोग कर सकते हैं !
नंगे भूमि पर या बिस्तर पर बैठकर जप करने का फल नकारात्मक फल मिलता है, ऐसा माना जाता है !
• वस्त्र शुद्ध और हल्के रंग के हों, विशेषकर सफेद या पीले !
3. माला और संख्या :
• माला तुलसी, रुद्राक्ष या स्फटिक की होनी चाहिए ! गायत्री मंत्र के लिए 108 दानों की माला से जप की गणना होती है !
• माला को गोमुखी में या दायें हाथ में रखकर, मध्यमा उंगली से चलाना चाहिए ! तर्जनी उंगली से माला छूना निषेध है !
• जप की संख्या - कम से कम 11, 27, 54 या 108 बार जप करना चाहिए !अनुष्ठान में 1000, 24000 (एक पुरश्चरण) तक का विधान है ! बीच में संख्या गिनने के लिए बोलना नहीं चाहिए !  
4. उच्चारण और विधि :
• गायत्री के तीन पाद हैं, इसलिए बीच में बिना रुके, लय और स्वर के साथ स्पष्ट उच्चारण करना चाहिए !
  ॐ भूर्भुवः स्वः! तत्सवितुर्वरेण्यं! भर्गो देवस्य धीमहि! धियो यो नः प्रचोदयात् !
• जप से पहले प्राणायाम, आचमन और गायत्री का आवाहन और अंत में क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए !
• जप तीन प्रकार का होता है - 
1. वाचिक (बोलकर), 2. उपांशु (होंठ हिलाकर धीरे) और; 3. मानसिक (मन में) बिना होंठ हिलाए ! 
गृहस्थ के लिए उपांशु और मानसिक को अधिक फलदायी माना गया है !
5. आहार-विहार का नियम :
• जप के दिन सात्विक भोजन करना चाहिए, लहसुन-प्याज, मांस-मदिरा से परहेज रखना चाहिए !
• सत्य, संयम, और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना चाहिए ! जप के दौरान क्रोध, चुगली, झूठ और अधिक बातचीत से बचना चाहिए !
• ब्रह्मचर्य का पालन करना अनुष्ठान के दिनों में विशेष रूप से बताया गया है !
 6. क्या न करें :
• अशौच, सूतक के समय, बिना स्नान किए, अपवित्र हाथों से जप नहीं करना चाहिए !
• दूसरे की माला से भी जप न करें !
• जप का प्रदर्शन या फल की चर्चा करके अहंकार न करें !
शास्त्र कहते हैं - गायत्री का तेज गुप्त रखने से बढ़ता है !
गृहस्थ व्यक्ति के लिए सार यह है - **श्रद्धा + शुचिता + नियमितता** !! यदि रोज 108 बार भी शांत मन से, सही उच्चारण के साथ, एक निश्चित समय पर गायत्री मंत्र का पाठ कर लिया जाए तो यह पूर्ण अनुष्ठान के समान फल देता है !     
  #सौजन्य से पंडित रज्जी राम उपाध्याय हनुमान गढं जं 
                                   💐🌷💐

Thursday, 22 October 2026

आदमी को वोटर बना दिया, नागरिक बनाना भूल गए।

78 सालों में तुम्हें 5 किलो राशन देकर, 500 रुपये गैस में छोड़ कर, 2 हजार खाते में डालकर ऐसे दिखाया जाता है जैसे सरकार ने जनता पर कोई एहसान कर दिया हो। जबकि सच यह है कि एक आम आदमी जिंदगी भर टैक्स देता है। 🤷

पेट्रोल में टैक्स, मोबाइल रिचार्ज में टैक्स, साबुन में टैक्स, कपड़ों में टैक्स, बिजली में टैक्स, घर बनाओ तो टैक्स, मर जाओ तो लकड़ी तक में टैक्स। आदमी पैदा होने से लेकर मरने तक सरकार को पैसा देता रहता है 

बदले में उसे क्या मिलता है। राशन की थैली और चुनावी भाषण में एक नया नारा। लोकतंत्र को भिखारी योजना बना दिया गया है।

अगर कोई पढ़ी-लिखी और मस्तिष्क वाली सरकार हो तो वह जनता को मुफ्त की आदत नहीं लगाएगी बल्कि ऐसा सिस्टम बनाएगी जिससे आदमी स्वयं कमाने लायक बने। असली सरकार वह होती है जो आदमी को लाइन में खड़ा नहीं करती बल्कि उसके हाथ में काम देती है।

भारत की केंद्र सरकार का वार्षिक बजट लगभग 48 से 50 लाख करोड़ रुपये का है। राज्यों का अलग बजट है। उत्तर प्रदेश अकेले लगभग 7 लाख करोड़ का बजट चलाता है। राजस्थान करीब 4 से 5 लाख करोड़ का। 

मतलब पैसा कम नहीं है, सोच छोटी है। नेता जनता को गरीब रखकर राजा बने रहना चाहते हैं। गरीब आदमी 500 रुपये के लिए वोट बेच देता है, आत्मनिर्भर आदमी सवाल पूछता है। यही असली खेल है।

अगर कोई समझदार प्रधानमंत्री हो तो वह हर जिले में कम से कम 200 से 300 सरकारी इंडस्ट्रियल यूनिट खोल सकता है। टेक्सटाइल, मेडिकल इक्विपमेंट, फूड प्रोसेसिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, खेती आधारित फैक्ट्री, डेयरी प्लांट, सोलर पैनल यूनिट। लगा सकता है 

एक जिले में 50 हजार से 1 लाख रोजगार पैदा हो सकते हैं। देश के 700 से ज्यादा जिलों में यह मॉडल लागू हो जाए तो करोड़ों लोगों को सीधा रोजगार मिल सकता है। लेकिन यहां फैक्ट्री खोलने से ज्यादा ध्यान चुनावी रैली में कुर्सी भरने पर है।

केंद्र सरकार चाहे तो हर युवा को 2 लाख रुपये तक का ब्याज मुक्त बिजनेस स्टार्टअप फंड दे सकती है। कोई कपड़े की दुकान खोले, कोई डेयरी, कोई मेडिकल स्टोर, कोई मोबाइल रिपेयर, कोई ट्रैक्टर सर्विस सेंटर। 

10 करोड़ युवाओं को भी 2 लाख दिए जाएं तो 20 लाख करोड़ लगेंगे, लेकिन यह पैसा खर्च नहीं निवेश होगा क्योंकि आदमी कमाएगा तो टैक्स वापस आएगा। और इसकी जगह अभी क्या हो रहा है। बेरोजगार को 2 हजार भत्ता देकर शांत रखो और पांच साल बाद फिर वही फोटो खिंचवा लो।

एक पढ़ी-लिखी सरकार गांव मे मिनी हॉस्पिटल, सरकारी कोल्ड स्टोरेज, खेती, मशीन बैंक, फ्री वाईफाई टावर, स्किल, ट्रेनिंग सेंटर, डेयरी प्लांट, सोलर बिजली , यूनिट, स्पोर्ट्स ग्राउंड, डिजिटल लाइब्रेरी, लड़कियों के लिए हॉस्टल, लोकल फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगा सकतीं हैं 

एक गांव पर साल के 20 से 30 करोड़ खर्च हों तो गांव की पूरी तस्वीर बदल सकती है। लेकिन यहां पंचायत भवन की टूटी कुर्सी पर ही विकास खत्म हो जाता है।

राज्य सरकार चाहे तो हर जिले में फ्री कोचिंग यूनिवर्सिटी खोल सकती है
हर तहसील में 24 घंटे ट्रॉमा सेंटर बना सकती है सरकारी स्कूलों को प्राइवेट से बेहतर बना सकती है किसानों के लिए फसल खरीद की गारंटी दे सकती है हर गरीब परिवार को 300 यूनिट मुफ्त बिजली दे सकती है महिलाओं को लोकल रोजगार मिशन से जोड़ सकती है

हर शहर में सरकारी किराये के मकान बना सकती है सोचो अगर सरकार हर जिले में 1000 करोड़ की इंडस्ट्री लगाए और 50 जिले हों तो 50 हजार करोड़ लगेंगे। नेताओं के कर्ज माफ करने, चुनावी विज्ञापन, फालतू परियोजनाओं और भ्रष्टाचार में इससे ज्यादा पैसा उड़ जाता है।

आज हमें क्या मिल रहा है 5 किलो राशन, गैस सिलेंडर में सब्सिडी, 1000-3000 भत्ता, चुनाव से पहले मुफ्त घोषणा, फिर पांच साल की चुप्पी ..

अगर तुम चाहो तो बहुत कुछ मिल सकता है स्थायी रोजगार, फ्री स्किल शिक्षा, सस्ता इलाज, मजबूत सरकारी स्कूल, लोकल फैक्ट्री, ब्याज मुक्त बिजनेस लोन, गांव में उद्योग, युवाओं को तकनीकी ट्रेनिंग, किसानों के लिए प्रोसेसिंग यूनिट, महिलाओं के लिए घर के पास काम लेकिन यह सब नहीं हो रहा

दुनिया के कई देशों ने यही किया। चीन ने गांव-गांव फैक्ट्री पहुंचाई। जर्मनी ने स्किल सिस्टम मजबूत किया। जापान ने लोकल इंडस्ट्री बचाई। भारत में क्या हुआ। 

यहां नेता हेलीकॉप्टर से उतरकर गरीब के घर खाना खाकर फोटो खिंचवा लेते हैं और अगले दिन वही गरीब आदमी मजदूरी पर चला जाता है।

असल विकास वह नहीं जो पोस्टर में दिखे। असली विकास वह है जिसमें आदमी को किसी नेता के आगे हाथ न फैलाना पड़े। लोकतंत्र का मतलब मुफ्त राशन नहीं, मजबूत नागरिक होता है। 

लेकिन मजबूत नागरिक नेताओं को पसंद नहीं आते। उन्हें भीड़ चाहिए, सोचने वाले लोग नहीं। आदमी को वोटर बना दिया, नागरिक बनाना भूल गए।

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... ✍️Suman Gupta 

लकार - संस्कृत में यह दस लकार होते हैं।

*लकार*  
संस्कृत में लट् , लिट् , लुट् , लृट् , लेट् , लोट् , लङ् , लिङ् , लुङ् , लृङ् – ये दस लकार होते हैं। वास्तव में ये दस प्रत्यय हैं जो धातुओं में जोड़े जाते हैं। इन दसों प्रत्ययों के प्रारम्भ में 'ल' है इसलिए इन्हें 'लकार' कहते हैं (ठीक वैसे ही जैसे ॐकार, अकार, इकार, उकार इत्यादि)। इन दस लकारों में से आरम्भ के छः लकारों के अन्त में 'ट्' है- लट् लिट् लुट् आदि इसलिए ये टित् लकार कहे जाते हैं और अन्त के चार लकार ङित् कहे जाते हैं क्योंकि उनके अन्त में 'ङ्' है। व्याकरणशास्त्र में जब धातुओं से पिबति, खादति आदि रूप सिद्ध किये जाते हैं तब इन टित् और ङित् शब्दों का बहुत बार प्रयोग किया जाता है।

इन लकारों का प्रयोग विभिन्न कालों की क्रिया बताने के लिए किया जाता है। जैसे – जब वर्तमान काल की क्रिया बतानी हो तो धातु से लट् लकार जोड़ देंगे, परोक्ष भूतकाल की क्रिया बतानी हो तो लिट् लकार जोड़ेंगे।

(१) लट् लकार (= वर्तमान काल) जैसे :- श्यामः खेलति । ( श्याम खेलता है।)

(२) लिट् लकार (= अनद्यतन परोक्ष भूतकाल) जो अपने साथ न घटित होकर किसी इतिहास का विषय हो । जैसे :-- रामः रावणं ममार । ( राम ने रावण को मारा ।)

(३) लुट् लकार (= अनद्यतन भविष्यत् काल) जो आज का दिन छोड़ कर आगे होने वाला हो । जैसे :-- सः परश्वः विद्यालयं गन्ता । ( वह परसों विद्यालय जायेगा ।)

(४) लृट् लकार (= सामान्य भविष्य काल) जो आने वाले किसी भी समय में होने वाला हो । जैसे :--- रामः इदं कार्यं करिष्यति । (राम यह कार्य करेगा।)

(५) लेट् लकार (= यह लकार केवल वेद में प्रयोग होता है, ईश्वर के लिए, क्योंकि वह किसी काल में बंधा नहीं है।)

(६) लोट् लकार (= ये लकार आज्ञा, अनुमति लेना, प्रशंसा करना, प्रार्थना आदि में प्रयोग होता है ।) जैसे :- भवान् गच्छतु । (आप जाइए ) ; सः क्रीडतु । (वह खेले) ; त्वं खाद । (तुम खाओ ) ; किमहं वदानि । (क्या मैं बोलूँ ?)

(७) लङ् लकार (= अनद्यतन भूत काल ) आज का दिन छोड़ कर किसी अन्य दिन जो हुआ हो । जैसे :- भवान् तस्मिन् दिने भोजनमपचत् । (आपने उस दिन भोजन पकाया था।)

(८) लिङ् लकार = इसमें दो प्रकार के लकार होते हैं :--

(क) आशीर्लिङ् (= किसी को आशीर्वाद देना हो) जैसे :- भवान् जीव्यात् (आप जीओ ) ; त्वं सुखी भूयात् । (तुम सुखी रहो।)
(ख) विधिलिङ् (= किसी को विधि बतानी हो ।) जैसे :- भवान् पठेत् । (आपको पढ़ना चाहिए।) ; अहं गच्छेयम् । (मुझे जाना चाहिए।)
(९) लुङ् लकार (= सामान्य भूत काल) जो कभी भी बीत चुका हो । जैसे :- अहं भोजनम् अभक्षत् । (मैंने खाना खाया।)

(१०) लृङ् लकार (= ऐसा भूत काल जिसका प्रभाव वर्तमान तक हो) जब किसी क्रिया की असिद्धि हो गई हो । जैसे :- यदि त्वम् अपठिष्यत् तर्हि विद्वान् भवितुम् अर्हिष्यत् । (यदि तू पढ़ता तो विद्वान् बनता।)

इस बात को स्मरण रखने के लिए कि धातु से कब किस लकार को जोड़ेंगे, निम्नलिखित श्लोक स्मरण कर लीजिए-

लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्‍तथा ।
विध्‍याशिषोर्लिङ् लोटौ च लुट् लृट् लृङ् च भविष्‍यति ॥
(अर्थात् लट् लकार वर्तमान काल में, लेट् लकार केवल वेद में, भूतकाल में लुङ् लङ् और लिट्, विधि और आशीर्वाद में लिङ् और लोट् लकार तथा भविष्यत् काल में लुट् लृट् और लृङ् लकारों का प्रयोग किया जाता है।)
 *लकारों के नाम याद रखने की विधि-* 
ल् में प्रत्याहार के क्रम से ( अ इ उ ऋ ए ओ ) जोड़ दें और क्रमानुसार ( ट् ) जोड़ते जाऐं । फिर बाद में ( ङ् ) जोड़ते जाऐं जब तक कि दश लकार पूरे न हो जाएँ । जैसे लट् लिट् लुट् लृट् लेट् लोट् लङ् लिङ् लुङ् लृङ् ॥ इनमें लेट् लकार केवल वेद में प्रयुक्त होता है । लोक के लिए नौ लकार शेष रहे । अब इन नौ लकारों में लङ् के दो भेद होते हैं :-- आशीर्लिङ् और विधिलिङ् । इस प्रकार लोक में दश के दश लकार हो गए ।

जगदीश डाभी

Tuesday, 20 October 2026

गोत्र प्रवर उपाधि गाथा

                  गोत्र - प्रवर - उपाधि गाथा
          18 गोत्रों में बसा है, ऋषियों का सम्मान।

1. भारद्वाज गोत्र -
अंगिरा, बृहस्पति, भारद्वाज है प्रवर,
श्रोत्रिय, तिवारी उपाधि, 
अंगिरा का पुत्र बृहस्पति, बृहस्पति के पुत्र भरद्वाज प्रखर ।
बृहस्पति अंगिरा का पुत्र, भरद्वाज उसका लाल, द्रोण का पिता बना, वेदों का भाल।

  2. उपमन्यु गोत्र -
उपमन्यु, उतथ्य, भारद्वाज, बृहस्पति, अंगिरा पंच प्रवर, 
पाठक उपाधि धारण करे, शिव भक्त निरंतर।
उपमन्यु व्याघ्रपाद का पुत्र, भारद्वाज का वंश,
दूध के लिए तप किया, शिव का लिया अंश।

 3. वशिष्ठ गोत्र -
वशिष्ठ, शक्ति, पाराशर है त्रि-प्रवर महान, 
आचार्य उपाधि पाते, ब्रह्मा के मानस संतान।
वशिष्ठ का पुत्र शक्ति, शक्ति का पाराशर,
पाराशर का व्यास, जिसने वेद किया अक्षर।

   4. कश्यप गोत्र -
कश्यप, अवत्सर, निध्रुव त्रि-प्रवर, 
व्यास, पांडे, शिल्पाचार्य, विश्वकर्मा का घर।
कश्यप मरीचि का पुत्र, अदिति-दिति का भर्ता,
देव-दानव-मानव सबका, वही एक कर्ता।

    5. मुद्गल गोत्र -
 अंगिरा, भार्म्यश्व, मुद्गल है प्रवर,
 पुरोहित, दीक्षित उपाधि, अंगिरा का ही स्वर।
मुद्गल क्षत्रिय राजा था, पंचाल का वीर,‌ 
अंगिरा में आ के बना, ब्रह्मर्षि धीर।
भर्म्यश्व उसका पिता, मुद्गल उसका पुत्र,
क्षत्रिय से ब्राह्मण बना, यही है पवित्र सूत्र।

6. जातूकर्ण्य गोत्र -
वशिष्ठ, अत्रि, जातूकर्ण त्रि-प्रवर, 
मालवीय, पंचाल उपाधि, पाँचाल देश के ईश्वर।
जातूकर्ण्य अत्रि-वशिष्ठ का संगम, 
दो ऋषियों का पुत्र, एक में दो का रंग।

  7. शांडिल्य गोत्र -
शांडिल्य, असित, देवल है प्रवर, 
उपाध्याय, मिश्र उपाधि, कश्यप का ही स्वर।
शांडिल्य कश्यप का पुत्र, असित-देवल उसके लाल, 
तीन पीढ़ी का प्रवर, शांडिल्य गोत्र विशाल।

 8. कौंडिन्य गोत्र -
वशिष्ठ, मैत्रावरुण, कौंडिन्य है प्रवर,
मणीठिया उपाधि, कुण्डिन ऋषि का घर।
कौंडिन्य वशिष्ठ का पुत्र, मित्रा-वरुण से जन्म, 
मैत्रावरुण प्रवर कहाया, वेदों का मर्म।

   9. गौतम गोत्र -
अंगिरा, रहूगण, गौतम है प्रवर,
विधाता, अंगिरा उपाधि, रहूगण का घर।
  गौतम अंगिरा का पुत्र, रहूगण उसका पिता, 
अहल्या के पति गौतम, न्याय-शास्त्र विधाता।

 10. अघमर्षण गोत्र -
विश्वामित्र, मधुच्छंदा, अघमर्षण है प्रवर,
यजुर्वेदी उपाधि, विश्वामित्र का स्वर।
मधुच्छंदा विश्वामित्र का पुत्र, अघमर्षण उसका लाल, 
जिसने पाप - नाशक सूक्त दिया, अघमर्षण विशाल।

11. वात्स्य गोत्र -
भृगु, च्यवन, आप्नवान है प्रवर, 
त्रिपाठी उपाधि, भार्गव वंश प्रखर।
वत्स भृगु का वंशज, च्यवन का पुत्र, 
आप्नवान च्यवन का पिता, भृगु का पौत्र।

 12. वामदेव गोत्र -
अंगिरा, वामदेव, गौतम है प्रवर, 
शुक्ल, अवस्थी उपाधि, गौतम का ही घर।
वामदेव गौतम का पुत्र, अंगिरा का पौत्र,
साम-गान का ऋषि, वेदों का श्रोत्र।

13. ऋक्षु गोत्र -
अंगिरा, बृहस्पति, भारद्वाज, वंदन, मतवचस पंच प्रवर,
अग्निहोत्री उपाधि, अंगिरा वंश प्रखर।
ऋक्षु भरद्वाज का पुत्र, वंदन-मतवचस उसके लाल,
पांच ऋषियों का प्रवर, ऋक्षु गोत्र विशाल।

14. लौगाक्षि गोत्र -
गौतम, उतथ्य, अंगिरा है प्रवर, 
पुरोहित उपाधि, अंगिरा का ही स्वर।
  लौगाक्षि गौतम का पुत्र, उतथ्य अंगिरा का लाल, 
तीन पीढ़ी का संगम, लौगाक्षि का भाल।

15. वत्स गोत्र -
भृगु, च्यवन, आप्नवान, और्व, जमदग्नि पंच प्रवर, 
दुबे उपाधि, भार्गव वंश प्रखर।
वत्स जमदग्नि का पुत्र, और्व जमदग्नि का पिता,
आप्नवान और्व का पिता, भृगु से ही आता।

  16. गविष्ठिर गोत्र -
अत्रि, अर्चनानस, गविष्ठिर है प्रवर,
मारकण्डे, चौधरी उपाधि, अत्रि वंश प्रखर।
गविष्ठिर अत्रि का पुत्र, अर्चनानस उसका पिता, 
अत्रि ब्रह्मा का मानस, सृष्टि का विधाता।

  17. विद् गोत्र -
भृगु, च्यवन, आप्नवान, और्व, विद् है प्रवर,
चतुर्वेदी उपाधि, भार्गव वंश प्रखर।
 विद् जमदग्नि का भाई, और्व का पुत्र, 
भृगु वंश का दीपक, वेदों का सूत्र।

18. दीर्घतमा गोत्र -
अंगिरा, उतथ्य, दीर्घतमा है प्रवर, 
चतुर्वेदी उपाधि, अंगिरा का ही घर।
दीर्घतमा उतथ्य का पुत्र, अंगिरा का पौत्र,
अंधा होकर भी देखा, वेदों का श्रोत्र।

                        सार सुनो हे भाई -

गोत्र है मूल, ऋषि रक्त की धार, 
प्रवर है शाखा, तीन-पांच ऋषि परिवार।
उपाधि है कर्म, जो पुरखों ने किया, 
पाठक ,‌आचार्य ,विश्वकर्मा, नाम दिया।
 कोई अंगिरा का पुत्र, कोई भृगु का लाल, 
कोई अत्रि-वशिष्ठ से, बना गोत्र विशाल।
कोई कश्यप का वंशज, कोई विश्वामित्र का,
 पर सब हैं अंङ्गिरा,पुत्र जांगिड ब्राह्मण।

                      भूलचुक लेनीदेनी 
                      Anil SHARMA 
             जय श्री ब्रह्मर्षि अंङ्गिरा जी की 🙏




"जांगिड़ ब्राह्मण के 18 गोत्र सब अंगिरा वंशज हैं" 
                              ये असत्य हैं।
यह सबसे बड़ा भ्रम है जो आजकल फैलाया जा रहा है कि 
      वैदिक सिद्धांत -  गोत्र क्या है? 
जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेय: संस्कारैर्द्विज उच्यते। 
विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय लक्षणम्॥
     गोत्र का अर्थ है - 
गो = इन्द्रिय, 
त्र = रक्षा करे।
जो ऋषि अपनी तपस्या से इन्द्रियों की रक्षा करे वो गोत्रकार।
   मनुस्मृति में स्पष्ट है:
असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः।
सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने‌ ॥
अर्थात विवाह माता की 6 पीढ़ी और पिता के गौत्र से बाहर होना चाहिए।

18 गोत्र सब अंगिरा नहीं हैं-
अंगिरा वंश - 8गोत्र:
(१) भारद्वाज - आंगिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज
(२) उपमन्यु - उपमन्यु, उतथ्य, भारद्वाज
(३) मुद्गल - आंगिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य
(४) गौतम - आंगिरस, रहूगण, गौतम
(५) वामदेव- आंगिरस, वामदेव, गौतम
(६) ऋक्षु - आंगिरस, बृहस्पति, भारद्वाज, वंदन, मतवचस
(७) लौगाक्षि - गौतम, उतथ्य, आंगिरस 
(८) दीर्घतमा - अंगिरस, उतथ्य, दीर्घतमा

वशिष्ठ वंश - 3 गोत्र:
(९) वशिष्ठ - वशिष्ठ, शक्ति, पाराशर
(१०) जातूकर्ण्य - वशिष्ठ, अत्रि, जातूकर्ण
(११) कौंडिन्य - वशिष्ठ, मैत्रावरुण, कौंडिन्य

भृगु वंश - 4 गोत्र:
(१२) वात्स्य - भार्गव, च्यवन, आप्नवान 
(१३) वत्स - भार्गव, च्यवन, आप्नवान, और्व, 
(१४) जामदग्न्य - भार्गव, च्यवन, आप्नवान, और्व, विद्

अन्य वंश - 3 गोत्र:
    कश्यप वंश
(१५) कश्यप - काश्यप, अवत्सार, नैध्रुव 
(१६) शांडिल्य - शांडिल्य, असित, देवल 

     विश्वामित्र वंश
(१७) अघमर्षण - विश्वामित्र, मधुच्छन्दा, अघमर्षण  

  अत्रि वंश
(१८) गविष्ठिर - आत्रेय, आर्चनानस, गविष्ठिर 
       
उक्त 18 में से केवल 8 में ही अंगिरा प्रवर हैं।
बाकी 10 तो भृगु, वशिष्ठ, कश्यप, शांडिल्य अत्रि, विश्वामित्र हैं। 

ये आपस में भाई-बहन कैसे हुए? 
अगर एक ही मूल वंश में भी हों तो विवाह क्यों मान्य है?
" बौधायन श्रौतसूत्र और प्रवरमंजरी " का नियम लगता है। 
भिन्न प्रवरेण विवाह: - बौधायन अर्थात प्रवर भिन्न हो तो एक ही मूल गोत्र में भी विवाह हो सकता है।
        उदाहरण - 
भारद्वाज और मुद्गल दोनों अंगिरा वंश के हैं, पर भारद्वाज का प्रवर है - अंगिरस,बार्हस्पत्य, भारद्वाज मुद्गल का प्रवर है - अंगिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य भार्म्यश्व और बार्हस्पत्य अलग हैं।
इसलिए ये भिन्न प्रवर हैं।
    प्रवरमंजरी में इसे *"प्रवर भेद"* कहा है।
इसी कारण अंगिरा वंश में ही हरित, कण्व, रथीतर , मुद्गल, विष्णुवृद्ध, संकृति, कपि सबका प्रवर अलग -अलग बताया गया है, ताकि आपस में रोटी-बेटी का व्यवहार चल सके।

      निष्कर्ष -
शास्त्रीय व्यवस्था गोत्र इसलिए बनाए ही इसीलिए गए थे कि सगोत्र विवाह का दोष न लगे।
          *सगोत्र में विवाह निषेध है* - 
                    यह वेद वाक्य है।

जांगिड के 18 गोत्र 5 अलग-अलग मूल ऋषियों से हैं - 
इसलिए वे भाई-बहन नहीं हैं। जहाँ मूल एक ही है (अंगिरा में) वहाँ प्रवर अलग कर दिया गया है।
    बौधायन के अनुसार भिन्न प्रवर में विवाह शास्त्र सम्मत है।
इसलिए जो लोग कहते हैं "सब अंगिरा हैं तो भाई-बहन में शादी हो रही है" - वो न तो गोत्रावली पढ़ते हैं, न प्रवरमंजरी जानते हैं, न मनुस्मृति मानते हैं।
       सगोत्र विवाह करने से चाण्डालत्व आता है, पर भिन्न गोत्र और भिन्न प्रवर में विवाह करने से ही शुद्ध वंश चलता है - 
         यही 18 गोत्रों की रचना का वैदिक विज्ञान है।

 -:गौत्र नाम विद्या;- 
आप लोग गोत्र को सिर्फ _"ब्लड ग्रुप"_ समझते हैं, जबकि वेद में गोत्र का अर्थ है - _"ज्ञान की दीक्षा"_।
वेद में कहा है - "गोत्रं नाम विद्या" गोत्र रक्त नहीं, गुरु की विद्या है।

प्रवरमंजरी में 3 प्रकार के पुत्र लिखे हैं -
(१) औरस पुत्र - जो रक्त से पैदा हुआ हो।
जैसे - बृहस्पति अंगिरा का औरस पुत्र। यह रक्त संबंध है।
(२) दत्तक / कृत्रिम पुत्र- जो गोद लिया गया हो।
जैसे - रथीतर और विष्णुवृद्ध। - रथीतर, मुद्गल, विष्णुवृद्ध ये क्षत्रिय राजा थे। रथीतर क्षत्रिय राजा था, विरूप का पुत्र। उसने अंगिरा ऋषि से कहा - मुझे ब्राह्मण बना लो। 
तब अंगिरा ने उसे गोद ले लिया। तब से वो आंगिरस , वैरूप, राथीतर कहलाया। विरूप का खून क्षत्रिय, पर दीक्षा अंगिरा की। इसलिए वो क्षत्रिय से ब्राह्मण बन गया।
 ऐसे ही मुद्गल - पंचाल का राजा, युद्ध में अंगिरा की शरण में आया, अंगिरा ने कहा - तू मेरा पुत्र है। तब से आंगिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य प्रवर हुआ। 

(३) शिष्य पुत्र - जो पढ़कर पुत्र बना हो।
जैसे - कण्व, हरित, कुत्स। कण्व तो घोर ऋषि का पुत्र था, पर अंगिरा के गुरुकुल में पढ़ा, इसलिए आंगिरस कहलाया।
तो ..
"अंगिरा परिवार" रक्त का परिवार नहीं, "विश्वविद्यालय" था। जहाँ अलग-अलग रक्त के लोग आकर एक ही उपाधि "आंगिरस" लेते थे। 
    इसलिए 18 गोत्रों में भाई-बहन वाला लॉजिक ही फेल है भाई-बहन तब होते जब सब एक ही बाप के औरस पुत्र हों।
       यहाँ तो -
कोई क्षत्रिय राजा गोद लिया हुआ है (रथीतर)
कोई दूसरे ऋषि का पुत्र पढ़कर आया है (कण्व)
कोई शिष्य है (हरित)
गोद लिये पुत्र और पढ़े हुए पुत्र का रक्त अलग है।
 *सिर्फ गुरु एक है।* 
गुरु के एक होने से खून एक नहीं होता। जैसे आज IIT से पढ़े सब छात्र IITian कहलाते हैं, 
पर वे भाई-बहन नहीं हो जाते, उनमें विवाह हो सकते है। 
वैसे ही अंगिरा गुरुकुल से निकले सब अंगिरस कहलाये,पर रक्त अलग।
18 संख्या ही क्यों? 
नया वैदिक गणित 18 गोत्र क्यों? 
17 या 19 क्यों नहीं?
जांगिड़ ब्राह्मण जाति है अंङ्गिरा वंशज नही हैं।
 संस्कार के 18 अंग बताए हैं - 
अष्टादश शिल्पानि - 4 वेद, 6 वेदांग, 4 उपवेद, 4 कला = 18 गोत्र हुए
अंङ्गिरा ऋषि जी ने जांगिड़ ब्राह्मण समाज में विवाह संस्कार को 18 शाखाओं में बाँटा, वही18 गोत्र बने।
ये 18 विभाग हैं, एक ही वंश बनाने के लिए नही ,शादी - विवाह रोकना नहीं।, 
ऋषियों ने बताया हैं की इन गोत्रों में विवाह संस्कार मान्य है।। 
      इसलिए गोत्र बनाये थे जिसे एक जाति का टाईटल नाम दिया गया है।  
18 ऋषि गौत्र एक ही वंश (DNA) या एक ही गुण-सुत्र के होगे तो 18 ऋषि गौत्र में विवाह संस्कार मान्य होंगे??
         वर्तमान में कुछ महाज्ञानी सज्जन पुरुष बोलते हैं की अपने नाम के आगे "अंङ्गिरा , अंङ्गिरस, आंङ्गिरस " लिखना चाहिए क्या ये उचित है? 
  यही शास्त्रीय कारण हैं जो कोई नहीं बताता गौत्र इसलिए बनाया गया था ताकि आपसी "गुण-सूत्र" न मिले। 
आयुर्वेद कहता है - समान गुण वाले माता-पिता की संतान दुर्बल होती है।
भारद्वाज गोत्र - क्रोधी, तपस्वी गुण
वशिष्ठ गोत्र - शांत, क्षमाशील गुण
भृगु गोत्र - तेज, भोगी गुण
कश्यप गोत्र - सृजनशील गुण

यदि भारद्वाज का विवाह भारद्वाज में ही हो तो क्रोध + क्रोध = महा क्रोधी संतान। 
इसलिए ऋषियों ने कहा अपना गुण छोड़, दूसरे गुण से मिलाओ।
*भारद्वाज का विवाह वशिष्ठ में करो तो तप + क्षमा = संतुलित संतान।*
*गोत्र-प्रवर का मुख्य कारण था।* इसलिए आपस में विवाह मान्य ही नहीं, *अनिवार्य* है ताकि 18 गुण आपस में मिलते रहें और जांगिड़ ब्राह्मण समाज शुद्ध बना रहे।

        *निष्कर्ष -*
जांगिड़ ब्राह्मण अंगिरा वंश है, पर अंगिरा वंश का अर्थ है - 
                   अंगिरा की दीक्षा, अंगिरा का ज्ञान। 
                       रक्त अलग-अलग, दीक्षा एक। 
   इसलिए 18 गोत्रों में विवाह शत-प्रतिशत शास्त्र सम्मत है।

शब्दों या लेखन में फेर बदल हो सकता है, कुछ कार्य करेंगे तो गलती होना लाजिमी है। करना धरना कुछ हैं नही कमियां निकालना आसान है।

✍️अनिल कुमार शर्मा महाराष्ट्र कराड 
जय श्री ब्रह्मर्षि अंङ्गिरा जी की 🙏