Pages

Thursday, 8 October 2026

"सेठानी का जोहड़ा " चूरु - राजस्थान

                     "सेठानी का जोहड़ा "
                   चुरु (राजस्थान) भारत 

चूरु में एक सेठानी ने अपने प्रांत के लोगों को प्यास से मरते देख अपना सारा धन खर्च करके बनवाया हुआ तालाब जो सेठानी के जोहड़ा के नाम से जाना गया।
ये बात तब की है, जब चूरु के लोग एक नई सदी के इंतजार में थे । 18वीं सदी बीतने वाली थी और समय था 1899 –1900 ईस्वी. तभी चूरु में भयानक छप्पनिया अकाल का प्रभाव पड़ा। थार के रेगिस्तान में बसे उस चूरु में जहाँ भारत में सबसे ज्यादा गर्मी पड़ती है। चारों ओर पानी का आभाव था, लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे थे । ऐसे में न केवल मनुष्यों बल्कि पशु पक्षियों और यहां तक गायें भी प्यासी मर रही थी। तभी एक एक धनी मारवाड़ी सेठानी रेत में तपते मनुष्यों से लेकर जानवरों तक की प्यास बुझाने के लिए चूरु में एक ऐसे ऐतिहासिक जोहड़े (तालाब) का निर्माण कराया और उस समय में भी यह सिद्ध कर दिखाया की सेठ ( श्रेष्ठ ) केवल जाति या वर्ण नहीं बल्कि पालनहार हैं । जिसने अकाल के अत्याचार को पराजय दे दी। वो कोई और नहीं बल्कि उस समय में चूरु के जाने–माने मारवाड़ी सेठ भगवानदास बागला की पत्नी थीं।

👉भगवानदास बागला पहले मारवाड़ी शेखावाटी करोड़पति और लकड़ी के व्यापारी होने के साथ–साथ कई सारे मिल के मालिक थे. भगवानदास मूल रुप से चूरु, राजस्थान के रहने वाले थे। सेठानी का जोहड़ा, रतनगढ़ रोड से पश्चिम में 3 किमी दूर हैं। यह तालाब आज भी का ‘नीलगाय’ पक्षियों और अन्य जानवरों को आकर्षित करता है। सेठानी का जोहड़ा चूरु में आने वाले लोगों और पर्यटकों द्वारा सबसे अधिक देखे जाने वाले स्थलों में से एक है।

👉125 साल पुराने सटीक आयताकार कोणीय रूप में निर्मित यह जोहड़ा अपने तीन मुखों से मुखातिब होकर मुख्य द्वार पर दक्षिणाभिमुखी है।आयताकार जोहड़ का मुख्यद्वार दक्षिण की ओर है। जोहड़ के चारो कोणों पर चार भुजाएं आकर मिलती हैं। जोहड़ में 14 स्तम्भो एवं कंगूरों से निर्मित तीन प्रवेश द्वार हैं। यह जोहड़ पत्थरों और चूने से निर्मित है। जिस पर सात स्तम्भों की छतरियाँ का निर्माण किया गया। इन छतरियों का वैभव उकेरे गये भिति चित्रों से बेहद मनमोहक दिखता है। धुंधलें पत्थरों के धरातल पर इस भव्य जोहड़े को चाँदनी रातों में निहारने के लिए दर्शनार्थी आते हैं। 
                  #RajasthanHeritage 
                              #churu 
        साभार - Rajasthani Vlog फेसबुक पोस्ट 
                      वयं राष्ट्रे जागृयाम 

कर्म और भाग्य

                       कर्म और भाग्य

                  चिंतन करने योग्य कहानी

बहुत समय पहले की बात है - एक गाँव में एक साधारण व्यक्ति रहता था। एक दिन वह लोटा लेकर पानी भरने निकला। पहले वह कुएँ पर पहुँचा, पर मन में विचार आया—
“तालाब कुएँ से बड़ा होता है, वहाँ अधिक पानी मिलेगा।”
वह तालाब की ओर चल पड़ा।
तालाब पहुँचा, तो फिर मन बोला—
“नदी तो तालाब से भी विशाल है, वहाँ तो और अधिक जल मिलेगा।”
वह नदी पर पहुँचा। नदी का बहाव देखकर फिर सोचने लगा—
“समुद्र में तो अनंत जल है, वहाँ चलूँगा तो जीवन भर का पानी मिल जाएगा।”
अब वह समुद्र के किनारे जा पहुँचा।
चारों ओर जल ही जल था— अथाह, अनंत, विराट विस्तार।
लहरें उठ रही थीं, क्षितिज तक नीला फैलाव था।
मन प्रसन्न हो गया— “अब तो कमी नहीं रहेगी।”
उसने लोटा आगे बढ़ाया और पानी भरा।
पर जैसे ही लोटा देखा, वह ठिठक गया।
समुद्र चाहे जितना भी विशाल हो,
लोटे में उतना ही पानी था—
जितना उसमें समा सकता था।
वह देर तक लोटे को देखता रहा…
फिर समुद्र को देखा…
और फिर उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान आ गई।
उसे समझ आ गया—
समस्या समुद्र में नहीं थी,
समस्या पात्र की क्षमता में थी।
उसी क्षण उसे जीवन का सत्य दिखाई दिया—
यह लोटा केवल पानी का पात्र नहीं था,
यह भाग्य का प्रतीक था।
मनुष्य चाहे कुएँ तक जाए,
तालाब तक पहुँचे,
नदी तक पहुँचे,
या समुद्र तक—
मिलेगा उसे उतना ही,
जितना उसके भाग्य-पात्र में समाने की क्षमता है।

वह व्यक्ति अब बदला हुआ था।

पर यह क्या? उसके मन में अब एक प्रश्न उठने लगा—
“अगर सब कुछ भाग्य के अनुसार ही मिलता है, तो फिर कर्म करने का क्या अर्थ?” 

“और अगर कर्म से ही भाग्य बनता है, तो फिर ईश्वर की आवश्यकता क्यों?”

चलते-चलते उसे एक विद्यालय दिखाई दिया।
अंदर एक छात्र पढ़ाई कर रहा था— 
मेहनत से, लगन से, अनुशासन से।
उस व्यक्ति ने सोचा—
“यह लड़का परिश्रम तो कर रहा है, पर क्या केवल पढ़ लेने से उसे जीवन में सफलता मिल जाएगी?”
उत्तर भीतर से आया—
नहीं।
जब तक कोई संस्था उसकी योग्यता को स्वीकार नहीं करेगी,
तब तक फल नहीं मिलेगा।
तभी उसे बोध हुआ—
" कर्म योग्यता बनाता है, लेकिन फल स्वीकृति से मिलता है। "

कर्म तैयारी है,
पर फल कृपा है।
अब उसे ईश्वर का अर्थ समझ में आने लगा।
ईश्वर मनुष्य के कर्मों का निर्माता नहीं है,
ईश्वर मनुष्य के कृत कर्मों को स्वीकार कर न्यायपूर्वक फल दाता है ।
हम कर्म करते हैं,
पर उनका फल तभी मिलता है
जब कोई उन्हें स्वीकार करता है।
और वही स्वीकार्यता—
ईश्वर की करुणा है,
ईश्वर की कृपा है।

वह व्यक्ति समुद्र किनारे बैठ गया।
लोटा उसके हाथ में था,
आँखों में शांति थी,
और मन में गहरी स्पष्टता।
अब वह जान गया था—
दुनिया बड़ी है,
समुद्र विशाल है,
अवसर अनंत हैं,
पर जीवन का सत्य यह है—
मिलता उसी को है, जो पात्र बनकर आता है।
वह घर लौटा तो पहली बार उसने अपने जीवन को नए दृष्टिकोण से देखा—
परिवार को देखा,
शरीर को देखा,
स्वास्थ्य को देखा,
सांसों को देखा,
रिश्तों को देखा,
अवसरों को देखा—
और पहली बार मन से निकला—
“यह सब मेरा नहीं है…
यह सब मुझे मिला है।”
और जिसने दिया है,
वही " ईश्वर " है।

                   -: " कहानी की सीख " :- 
ईश्वर को मानो—
डर से नहीं,
मांगने के लिए नहीं,
सौदे के लिए नहीं,
बल्कि इसलिए कि—
वह हमारे कर्मों को स्वीकार करता है,
और कर्म अनुसार हमारे पात्र को भरता है,
तथा बिना किसी पक्षपात के हमें फल देता है।
यही उसकी कृपा है।
यही जीवन का सत्य है।
और यही भक्ति की वास्तविक परिभाषा है।
                          🙏🏻 🌸 🙏🏻
      साभार - प्रवीण चावला, बीकानेर ( राजस्थान )
                       वयं राष्ट्रे जागृयाम 

‘सदाचार का तावीज’ परसाई जी की रचना बताती हैं कि सदाचार केवल शब्दों, नारों या प्रतीकों से नहीं आता।

                     साहित्यिक कड़ी

    हरिशंकर परसाई — ‘सदाचार का तावीज’

लेखक परिचय

हरिशंकर परसाई (1924–1995) हिंदी के महान व्यंग्यकार थे। उन्होंने अपने व्यंग्य के माध्यम से समाज, राजनीति, प्रशासन, भ्रष्टाचार, पाखंड और अवसरवाद की विसंगतियों को उजागर किया। उनकी विशेषता यह थी कि वे हँसाते हुए पाठक को गंभीर सामाजिक प्रश्नों पर सोचने के लिए विवश कर देते थे।

रचना का मूल कथांक

‘सदाचार का तावीज’ में परसाई ने एक काल्पनिक राज्य की कथा प्रस्तुत की है। उस राज्य में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है। जनता और शासन के बीच इसकी चर्चा होने लगती है।

राजा को जब पता चलता है कि उसके राज्य में भ्रष्टाचार फैल रहा है तो वह चिंतित होता है। वह अपने अधिकारियों से पूछता है कि भ्रष्टाचार को कैसे समाप्त किया जाए।

अधिकारी और दरबारी राजा को तरह-तरह के उपाय बताते हैं। अंततः एक ऐसे व्यक्ति की तलाश की जाती है जो भ्रष्टाचार को पहचान सके और उससे बचने का उपाय बता सके।

कथा में व्यंग्यात्मक ढंग से यह स्थिति सामने आती है कि भ्रष्टाचार केवल नीचे के कर्मचारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था में उसकी जड़ें फैल चुकी हैं। ऊपर बैठे लोग भी उससे पूरी तरह अलग नहीं हैं।

राजा के सामने सदाचार की बातें होती हैं और सत्यनिष्ठता का महत्व बताया जाता है। लेकिन वास्तविक जीवन में वही लोग अपने स्वार्थ और लाभ के लिए व्यवस्था का उपयोग करते दिखाई देते हैं।

यहीं से ‘सदाचार का तावीज’ शीर्षक का व्यंग्य सामने आता है—मानो केवल एक तावीज बाँध लेने से व्यक्ति सदाचारी और भ्रष्टाचार-मुक्त हो जाएगा।

कथा का व्यंग्य

परसाई की दृष्टि में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या केवल उपदेश, प्रतीक और दिखावटी सत्यनिष्ठता से भ्रष्टाचार समाप्त हो सकता है?

वे दिखाते हैं कि जब भ्रष्टाचार व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है, तब भ्रष्टाचार के विरुद्ध भाषण देने वाले लोग भी कभी-कभी उसी व्यवस्था से लाभ उठाते रहते हैं।

यही इस कथा की सबसे महत्वपूर्ण विडंबना है।

आज के सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में

आज भी यह रचना इसलिए प्रासंगिक लगती है क्योंकि समाज में भ्रष्टाचार के साथ-साथ उसका विरोध करने का दिखावा भी दिखाई देता है। राजनीति और प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिकता आज भी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।

परसाई किसी एक व्यक्ति पर व्यंग्य नहीं करते; वे उस मानसिकता पर चोट करते हैं जिसमें व्यक्ति अपने स्वार्थ को बचाते हुए सदाचार की बातें करता है।

रचना का संदेश

‘सदाचार का तावीज’ हमें बताता है कि सदाचार केवल शब्दों, नारों या प्रतीकों से नहीं आता। उसके लिए आचरण में धर्मनिष्ठता, व्यवस्था में पारदर्शिता और व्यक्ति में नैतिक साहस आवश्यक है।

परसाई की शक्ति यही है कि वे गंभीर राजनीतिक और सामाजिक प्रश्न को हास्य और व्यंग्य के माध्यम से इतना सहज बना देते हैं कि पाठक हँसते-हँसते अपने आसपास की व्यवस्था पर विचार करने लगता है।

                          ★★★★★
                   साभार ✍️ नरोत्तम शर्मा 
                     मो ० 9460026661

   सदाचार का तावीज (व्यंग्य) : हरिशंकर परसाई।  

एक राज्य में हल्ला मचा कि भ्रष्टाचार बहुत फैल गया है ।
राजा ने एक दिन दरबारियों से कहा, "प्रजा बहुत हल्ला मचा रही है कि सब जगह भ्रष्टाचार फैला हुआ है । हमें तो आज तक कहीं नहीं दिखा । तुम लोगों को नहीं दिखा हो तो बताओ।"
दरबारियों ने कहा- "जब हुजूर को नहीं दिखा तो हमें कैसे दिख सकता है ?"
राजा ने कहा- "नहीं, ऐसा नहीं है। कभी-कभी जो मुझे नहीं दीखता, वह तुम्हे दीखता होगा । जैसे मुझे बुरे सपने कभी नहीं दीखते, पर तुम्हें दिखते होंगे!"
दरबारियों ने कहा- "जी, दिखते हैं । पर वह सपनों की बात है ।"

राजा ने कहा- "फिर भी तुम लोग सारे राज्य में ढूंढ़ कर देखो कि कहीं भ्रष्टाचार तो नहीं है । अगर कहीं मिल जाए तो हमारे देखने के लिए नमूना लेते आना । हम भी तो देखें कि कैसा होता है ।"

एक दरबारी ने कहा- "हुजूर, वह हमें नहीं दिखेगा । सुना है, वह बहुत बारीक होता है । हमारी आँखें आपकी विराटता देखने की इतनी आदत हो गई है कि हमें बारीक चीज नहीं दिखती। (चापलूस) हमें भ्रष्टाचार दिखा भी तो उसमें हमें आपकी ही छवि दिखेगी, क्योंकि हमारी आँखों में तो आपकी ही सूरत बसी है । पर अपने राज्य में एक जाति रहती है जिसे "विशेषज्ञ" कहते हैं । इस जाति के पास कुछ ऐसा अंजन (काजल) होता है कि उसे आँखों में आँजकर (लगाकर) वे बारीक से बारीक चीज भी देख लेते हैं । मेरा निवेदन है कि इन विशेषज्ञों को ही हुजूर भ्रष्टाचार ढूंढ़ने का काम सौंपे ।"

राजा ने "विशेषज्ञ" जाति के पाँच आदमी बुलाए और कहा- "सुना है, हमारे राज्य में भ्रष्टाचार है । पर वह कहाँ है, यह पता नहीं चलता । तुम लोग उसका पता लगाओ । अगर मिल जाए तो पकड़कर हमारे पास ले आना । अगर बहुत हो तो नमूने के लिए थोड़ा-सा ले आना ।"

विशेषज्ञों ने उसी दिन से छान-बीन शुरू कर दी ।
दो महीने बाद वे फिर से दरबार में हाजिर हुए ।
राजा ने पूछा- "विशेषज्ञों ! तुम्हारी जाँच पूरी हो गई ?"
"जी, सरकार ।"
"क्या, तुम्हेँ भ्रष्टाचार मिला ।"
"जी, बहुत सा मिला ।"
राजा ने हाथ बढ़ाया- "लाओ मुझे बताओ । देखूँ कैसा होता है ।"

विशेषज्ञों ने कहा- "हुजूर, वह हाथ की पकड़ में नहीँ आता । वह स्थूल नहीं, सूक्ष्म है, अगोचर है । पर वह सर्वत्र व्याप्त है । उसे देखा नहीं जा सकता, अनुभव किया जा सकता है ।

राजा सोच में पड़ गए । बोले - "विशेषज्ञों ! तुम कहते हो कि वह सूक्ष्म है, अगोचर है और सर्वव्यापी है । ये गुण तो ईश्वर के हैं । तो क्या भ्रष्टाचार ईश्वर है ?"
विशेषज्ञों ने कहा- "हाँ, महाराज, अब भ्रष्टाचार ईश्वर हो गया है ।"
एक दरबारी ने पूछा- "पर वह है कहाँ ? कैसे अनुभव होता है ?"

विशेषज्ञों ने जवाब दिया- "वह सर्वत्र है । वह इस भवन में है । वह महाराज के सिंहासन में है ।"
"सिंहासन में है !" कहकर राजा साहब उछलकर दूर खड़े हो गए ।

विशेषज्ञों ने कहा- "हाँ, सरकार सिंहासन में है । पिछले माह इस सिंहासन पर रंग करने के जिस बिल का भुगतान किया गया है, वह बिल झूठा है । वह वास्तव में दुगुने दाम का है । आधा पैसा बीच वाले खा गए । आपके पूरे शासन में भ्रष्टाचार है और वह मुख्यत: घूस के रूप में है ।"
विशेषज्ञों की बात सुनकर राजा चिन्तित हुए और दरबारियों के कान खड़े हुए ।
राजा ने कहा- "यह तो बड़ी चिन्ता की बात है । हम भ्रष्टाचार बिल्कुल मिटाना चाहते हैं । विशेषज्ञो, तुम बता सकते हो कि वह कैसे मिट सकता है ?"

विशेषज्ञों ने कहा- "हाँ महाराज, हमने उसकी भी योजना तैयार की है । भ्रष्टाचार मिटाने के लिए महाराज को व्यवस्था में बहुत परिवर्तन करने होंगे । एक तो भ्रष्टाचार के मौके मिटाने होंगे । जैसे ठेका है तो ठेकेदार हैं और ठेकेदार है तो अधिकारियों को घूस है । ठेका मिट जाए तो उसकी घूस मिट जाए । इसी तरह और बहुत सी चीजें है । किन कारणों से आदमी घूस लेता है, यह भी विचारणीय है ।"
राजा ने कहा- "अच्छा, तुम अपनी पूरी योजना रख जाओ । हम और हमारा दरबार उस पर विचार करेंगे ।"
विशेषज्ञ चले गए ।
राजा ने और दरबारियों ने भ्रष्टाचार मिटाने की योजना को पढ़ा । उस पर विचार किया ।

विचार करते दिन बीतने लगे और राजा का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा ।
एक दिन एक दरबारी ने कहा- "महाराज, चिन्ता के कारण आपका स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा है । उन विशेषज्ञों ने आपको झंझट में डाल दिया ।"
राजा ने कहा- "हाँ, मुझे रात को नींद नहीं आती ।"
दूसरा दरबारी बोला- "ऐसी रिपोर्ट को आग के हवाले कर देना चाहिए जिससे महाराज की नींद में खलल पड़े ।"

राजा ने कहा- "पर करें क्या? तुम लोगों ने भी भ्रष्टाचार मिटाने की योजना का अध्ययन किया है । तुम्हारा क्या मत है? क्या उसे काम में लाना चाहिए?"

दरबारियों ने कहा- "महाराज, वह योजना क्या है, एक मुसीबत है । उसके अनुसार कितने उलट-फेर करने पड़ेंगे ! कितनी परेशानी होगी ! सारी व्यवस्था उलट-पलट हो जाएगी । जो चला आ रहा है, उसे बदलने से नई-नई कठिनाइयाँ पैदा हो सकती हैं । हमें तो कोई ऐसी तरकीब चाहिए जिससे बिना कुछ उलट-फेर किए भ्रष्टाचार मिट जाए ।"
राजा साहब बोले- "मैं भी यही चाहता हूँ । पर यह हो कैसे ? हमारे प्रपितामह को तो जादू आता था; हमें वह भी नहीं आता । तुम लोग ही कोई उपाय खोजो ।"

एक दिन दरबारियों ने राजा के सामने एक साधु को पेश किया और कहा- "महाराज, एक कन्दरा में तपस्या करते हुए इस महान साधक को हम ले आये हैं । इन्होंने सदाचार का तावीज बनाया है । वह मन्त्रों से सिद्ध है और उसके बाँधने से आदमी एकदम सदाचारी हो जाता है ।"

साधु ने अपने झोले में से एक तावीज निकालकर राजा को दिया । राजा ने उसे देखा । बोले- "हे साधु, इस तावीज के विषय में मुझे विस्तार से बताओ । इससे आदमी सदाचारी कैसे हो जाता है ?"

साधु ने समझाया- "महाराज, भ्रष्टाचार और सदाचार मनुष्य की आत्मा में होता है; बाहर से नहीं होता । विधाता जब मनुष्य को बनाता है तब किसी की आत्मा में धर्मनिष्ठ-सत्य की कल फिट कर देता है और किसी की आत्मा में अधर्म-असत्य की । इस कल में से धर्म या अधर्म के स्वर निकलते हैं, जिन्हें 'आत्मा की पुकार' कहते हैं । आत्मा की पुकार के अनुसार आदमी काम करता है । प्रश्न यह है कि जिनकी आत्मा से अधर्म के स्वर निकलते हैं, उन्हें दबाकर धर्म के स्वर कैसे निकाले जाएँ ? मैं कई वर्षों से इसी के चिंतन में लगा हूँ । अभी मैंने यह सदाचार का तावीज बनाया है । जिस आदमी की भुजा पर यह बंधा होगा, वह सदाचारी हो जाएगा । मैंने कुत्ते पर भी इसका प्रयोग किया है । यह तावीज गले में बाँध देने से कुत्ता भी रोटी नहीं चुराता। बात यह है कि इस तावीज में से भी सदाचार के स्वर निकलते हैं । जब किसी की आत्मा अधर्म (बेईमानी) के स्वर निकालने लगती है तब इस तावीज की शक्ति आत्मा का गला घोंट देती है और आदमी को तावीज से धर्म (ईमान) के स्वर सुनाई पड़ते हैं । वह इन स्वरों को आत्मा की पुकार समझकर सदाचार की ओर प्रेरित होता है । यही इस तावीज का गुण है, महाराज!"
दरबार में हलचल मच गई । दरबारी उठ-उठकर तावीज को देखने लगे ।

राजा ने खुश होकर कहा- "मुझे नहीं मालूम था कि मेरे राज्य में ऐसे चमत्कारी साधु भी हैं । महात्मन्, हम आपके बहुत आभारी हैं । आपने हमारा संकट हर लिया । हम सर्वव्यापी भ्रष्टाचार से बहुत परेशान थे । मगर हमें लाखों नहीं, करोड़ों तावीज चाहिए । हम राज्य की ओर से तावीजों का कारखाना खोल देते हैं ।आप उसके जनरल मैनेजर बन जाएँ और अपनी देख रेख में बढ़िया तावीज बनवाएँ ।"

एक मन्त्री ने कहा- "महाराज, राज्य क्यों झंझट में पड़े ? मेरा तो निवेदन है कि साधु बाबा को ठेका दे दिया जाए । वे अपनी मण्डली से तावीज बनवा कर राज्य को सप्लाई कर देंगे ।"

राजा को यह सुझाव पसन्द आया । साधु को तावीज बनाने का ठेका दे दिया गया । उसी समय उन्हें पाँच करोड़ रूपये कारखाना खोलने के लिए पेशगी मिल गए ।
राज्यों के अखबारों में खबरें छपीं-सदाचार के तावीज की खोज ! तावीज बनाने का कारखाना खुला!'
लाखों तावीज बन गए । सरकार के हर सरकारी कर्मचारी की भुजा पर एक-एक तावीज बाँध दिया गया ।
भ्रष्टाचार की समस्या का ऐसा सरल हल निकल आने से राजा और दरबारी सब खुश थे ।
एक दिन राजा की उत्सुकता जागी । सोचा- "देखें तो क्या यह तावीज कैसे काम करता है !"
वह वेश बदलकर एक कार्यालय गए । उस दिन 2 तारीख थी । एक दिन पहले तनख्वाह मिली थी ।
वह एक कर्मचारी के पास गए और कई काम बताकर उसे पाँच रूपये का नोट देने लगे ।
कर्मचारी ने उन्हें डाँटा- "भाग जाओ यहाँ से! घूस लेना पाप है !"
राजा बहुत खुश हुए । तावीज ने कर्मचारी को धर्मनिष्ठ और सत्यनिष्ठ बना दिया था ।
कुछ दिन बाद वह फिर वेश बदलकर उसी कर्मचारी के पास गए । उस दिन इकत्तीस तारीख थी- महीने का आखरी दिन ।
राजा ने फिर से पाँच का नोट दिखाया और उसने लेकर जेब में रख लिया ।
राजा ने उसका हाथ पकड़ लिया । बोले- "मैं तुम्हारा राजा हूँ । क्या तुम आज सदाचार का तावीज बाँधकर नहीं आए ?"
"बाँधा है, सरकार, यह देखिए !"
उसने आस्तीन चढ़ाकर तावीज दिखा दिया ।
राजा असमंजस में पड़ गए । फिर ऐसा कैसे हो गया ?
उन्होंने तावीज पर कान लगाकर सुना । तावीज में से स्वर निकल रहे थे - 
"अरे, आज इकत्तीस है । आज तो ले ले !"

                           ★★★★★

                         वयं राष्ट्रे जागृयाम 

सफलता हमें खुशी देती है, लेकिन 'ना' को संभालना हमें जीवन देता है।

॥ॐ॥

मित्रों !
  " हां " अर्थात् लोगों का Attention, प्राप्त सफलताऐं और प्रशंसाएं हमें खुशीयां देती है, लेकिन " ना " अर्थात् Ignorance, असफलताओं और लोगों की आलोचनाओं को सम्हालना हमें जीवन देता हैं ।

क्योंकि जीतने वाले को तालियां मिलती हैं, लेकिन हारकर उठने वाले को जीवन मिलता हैं। 

  इसे ठीक से समझने के लिए मुझे मेरे अनुज भ्राता देवेन्द्र द्वारा भेजा वाट्स एप पर प्राप्त एक अज्ञात व्यक्ति का लेख साझा कर रहा हूं कृपया समय निकाल कर इसे अवश्य पढ़ें ।

मेरी बिटिया ने अपनी यूरोप यात्रा से लौट कर मुझे एक ऐसा किस्सा सुनाया जिसे सुनकर मैं देर तक सोचता रहा, और लगा कि ये सिर्फ एक किस्सा नहीं, हम सबके लिए एक आईना है।

वह एम्स्टर्डम में Costco स्टोर गई थी। बाहर हल्की ठंड थी, लोग जल्दी-जल्दी अंदर-बाहर आ-जा रहे थे।

गेट के पास एक छोटा बच्चा खड़ा था। मुश्किल से पाँच साल का होगा। हाथ में चिप्स के कुछ पैकेट और गले में एक छोटा-सा बोर्ड लटका था। बोर्ड पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था - "स्काउट चैरिटी के लिए, सिर्फ $20 में।"

लोग उसके बगल से गुजर रहे थे। किसी को जल्दी थी, कोई फोन पर था, कोई देखकर भी अनदेखा कर रहा था।

लेकिन वो बच्चा... वो हार नहीं मान रहा था।

वो हर आने-जाने वाले के पास अपनी छोटी-छोटी टांगों से चलकर जाता, ऊपर देखता और बड़ी मासूमियत से पूछता, "क्या आप एक पैकेट खरीदेंगे?"

कोई खरीद लेता। कोई मुस्कुराकर कहता, "नहीं बेटा, थैंक यू।"

मैंने सोचा, इतना छोटा बच्चा, इतनी बार 'ना' सुनकर रो देगा, उदास हो जाएगा, अपनी टीचर के पीछे छिप जाएगा।

लेकिन नहीं।

वो हर 'ना' के बाद मुस्कुराता, हल्के से सिर हिलाता और अगले व्यक्ति की तरफ मुड़ जाता। उसके चेहरे पर न शर्म थी, न डर, न निराशा। सिर्फ एक अजीब-सा आत्मविश्वास था।

बिटिया से रहा नहीं गया। उसने एक पैकेट खरीद लिया। बच्चे की आँखें चमक उठीं। उसने उछलकर कहा, "थैंक यू सो मच!"

फिर बिटिया ने प्यार से पूछा, "तुम्हें और कितने पैकेट बेचने हैं? तुम यहाँ कब तक खड़े रहोगे?"

बच्चे ने जो जवाब दिया, वो बिटिया को अंदर तक हिला गया।

उसने कहा, "जब तक 100 लोग मुझे NO नहीं कह देते, तब तक!"

बिटिया हैरान रह गयी। उसने बगल में खड़ी टीचर की तरफ देखा। टीचर मुस्कुराईं और बोलीं,

"हमारा मकसद पैकेट बेचना नहीं है। हमारा मकसद है कि ये बच्चा इस उम्र में 'ना' सुनना सीखे। 'ना' को सुनकर उसे स्वीकार करना सीखे, और फिर भी अगले इंसान से पूछने की हिम्मत रखे।"

सुनकर बिटिया चुप हो गई। 
मैं भी चुप हो गया।

हम अपने बच्चों को क्या सिखाते हैं?

खूब पढ़ो, फर्स्ट आओ, कॉम्पिटिशन जीतो, सिलेक्ट हो जाओ, सबसे आगे निकलो।

हम उन्हें जीतना सिखाते हैं। लेकिन हम उन्हें हारना नहीं सिखाते।

हम उन्हें सफलता का रास्ता दिखाते हैं, लेकिन असफलता से गुजरने की हिम्मत नहीं देते।

जबकि जिंदगी में सबसे ज्यादा जरूरत उसी हिम्मत की पड़ती है।

क्योंकि जिंदगी हमेशा 'हाँ' नहीं कहेगी।

कुछ एग्जाम छूट जाएंगे। कुछ इंटरव्यू क्लियर नहीं होंगे। कुछ बिजनेस फेल होंगे। कुछ रिश्ते टूटेंगे। कुछ सपने देर से पूरे होंगे।

उस दिन जो 'ना' मिलेगा, वो हमें तोड़ भी सकता है और बना भी सकता है। फर्क सिर्फ इतना होगा कि हमने बचपन में 'ना' से दोस्ती की है या दुश्मनी।

वो पाँच साल का बच्चा Costco के बाहर चिप्स नहीं बेच रहा था।

वो हिम्मत बेच रहा था। वो 'ना' इकट्ठा कर रहा था। वो रिजेक्शन को गले लगाना सीख रहा था। वो जिंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा की तैयारी कर रहा था - गिरकर उठने की परीक्षा।

सोचिए, अगर हमारा बच्चा 10वीं में फेल हो जाए तो हम क्या करते हैं? डांटते हैं, ताना मारते हैं, शर्मा जाते हैं।

अगर वो इंटरव्यू में रिजेक्ट हो जाए तो हम कहते हैं, "तुमसे नहीं होगा।"

हम अनजाने में उसे सिखा देते हैं कि 'ना' का मतलब है - तुम बेकार हो।

जबकि उस टीचर ने सिखाया कि 'ना' का मतलब है - अभी नहीं, फिर कोशिश करो।

दोस्तों, सफलता हमें खुशी देती है, लेकिन 'ना' को संभालना हमें जिंदगी देता है।

आज से अपने बच्चों से सिर्फ ये मत पूछिए, "बेटा, जीते या हारे? कितने मार्क्स आए?"

कभी-कभी ये भी पूछिए, "बेटा, आज कितनी बार 'ना' सुना? और फिर भी तुमने कोशिश की? मुझे तुम पर गर्व है।"

ऐसे बच्चे मत पालिए जो सिर्फ जीतने से खुश हों।
ऐसे बच्चे पालिए जो हारने से डरते न हों।

क्योंकि जीतने वाले को तालियां मिलती हैं, लेकिन हारकर उठने वाले को जिंदगी मिलती है।

उस नन्हे बच्चे को सलाम, जिसने 100 'ना' से हमें जिंदगी का सबसे बड़ा 'हाँ' सिखा दिया।

अगर ये कहानी आपके दिल को छू गई हो, तो इसे किसी ऐसे माता-पिता तक जरूर पहुंचाएं जो आज अपने बच्चे के रिजल्ट से परेशान है। शायद उन्हें भी ये याद आ जाए...

*कभी-कभी 100 ना एक हां से ज्यादा सिखा जाते हैं।*

- कापीड-
साभार - भ्राता देवेन्द्र कुमार शर्मा, अंगिरा भवन-जयपुर।

वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Wednesday, 7 October 2026

मृत्यु के बाद स्वर्ग मिलेगा।

                   मृत्यु के बाद स्वर्ग मिलेगा।

इस आशा  में मानव पूरे जीवन बहुत प्रयास करता है।

कोई उपवास करता है,
कोई दान-धर्म करता है,
कोई तीर्थयात्रा करता है,
तो कुछ लोग भगवान से मन्नतें मांगते हैं।
                        ----- ~~~ -----

स्वर्ग जैसे कोई नई हाउसिंग सोसाइटी जैसा लगता है,
जहाँ एक छोटा सा फ्लैट पाने के लिए  "पुण्य के अंक" (पॉइंट्स) जमा करने पड़ते हैं...!

लेकिन एक पल ठहरकर यह भी सोचिए...

क्या पता शायद हम पहले से ही स्वर्ग में ही जी रहे हों ?

सुबह उठते ही एक बार अपने आसपास ध्यान दीजिए।

० एक बटन दबाओ तो अंधेरा रोशनी में बदल जाता है।
० दूसरा बटन दबाओ तो पंखा घूमने लगता है।
० तीसरा बटन दबाओ तो ठंडी हवा पूरे कमरे में भर जाती है।
० नल खोलो तो पानी बहने पलगता है।
० गैस जलाओ तो कुछ ही मिनटों में खाना तैयार।
० जेब से मोबाइल निकालो तो पूरी दुनिया आपकी हथेली में आ जाती है।
० हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले आपके प्रिय लोग भी कुछ ही सेकंड में आपके सामने दिखाई देते हैं।

इतनी सारी अद्भुत सुविधाएं..

 लेकिन हम इसे बहुत सामान्य समझते हैं। हम ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे यह सब हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हो।
                         ----- ~~~ -----

एक बार कल्पना कीजिए...

दो सौ साल पहले का कोई राजा आज आपके घर आए, तो शायद वह अपने राजमहल में वापस भी न जाना चाहे।

वह आश्चर्य से पूछेगा —

० "यह क्या?" — गर्म पानी!
० "और यह क्या?" — ठंडी हवा।
० "यह क्या है?" — पूरी दुनिया की जानकारी।
० "यह क्या?" — दस मिनट में घर आने वाला खाना।

तब वह हंसकर कहेगा —

" मैंने अपने पूरे जीवन राज किया, युद्ध जीते, बेहिसाब संपत्ति हासिल की... लेकिन ऐसी सुविधाएं मुझे कभी नहीं मिलीं। "

यह बिल्कुल सच है!
आज एक आम आदमी भी कई सुविधाओं के मामले में पुराने जमाने के सबसे शक्तिशाली राजाओं से भी ज्यादा अमीर है।

फिर भी...
हम खुश नहीं हैं।
क्यों ?

क्योंकि आदमी को जो मिल जाता है, उसकी कीमत धीरे-धीरे कम हो जाती है।
                              ----- ~~~ -----

AC चालू है — आनंद नहीं है।

बंद होता है तब ही... तकलीफ होती है।

मोबाइल है — आनंद नहीं है।
नेटवर्क चला जाए तो लगता है दुनिया ही खत्म हो गई।

अपना घर है — संतोष नहीं है।
पड़ोसी का घर बड़ा है, इसका दुख है।

अपनी गाड़ी है — तृप्ति नहीं है।
दूसरे की गाड़ी बड़ी है, उसकी चिंता है।

यानी आदमी अपने स्वर्ग में खड़ा होकर, दूसरे के स्वर्ग से अपनी तुलना करके दुखी होता है।

लेकिन इसी पृथ्वी पर एक दूसरी दुनिया भी है...

आज भी लाखों लोग एक घड़े पानी के लिए घंटों तक लाइन में खड़े रहते हैं।
लाखों परिवारों के पास पक्का मकान तक नहीं है।
दिन में दो वक्त का खाना भी तय नहीं है।
बच्चों के सपने स्कूल की चौखट तक पहुँचने से पहले ही टूट जाते हैं।
शरीर ढ़़कने के लिए ठीक से कपड़े भी नहीं हैं।

हम जिसे "सामान्य" समझते हैं, वे सुविधाएं ही दूसरों के लिए जीवन का सबसे बड़ा सपना हैं।
               ----- ~~~ -----🍬----- ~~~ -----

हमें AC का रिमोट न मिले तो गुस्सा आता है।
उन्हें धूप से बचने के लिए पेड़ की छांव तक नहीं मिलती।

हम डाइट चार्ट ढूंढते हैं।
वे लोग अगले वक्त का खाना कैसे मिलेगा, यह सोचते - सोचते सो जाते हैं।

तब समझ आता है...

स्वर्ग और नरक मृत्यु के बाद मिलने वाली जगहें नहीं हैं...

वे यहीं हैं...
इसी पृथ्वी पर...
इसी गांव नगर शहर में...
इसी सड़क पर...

कभी-कभी एक ही दीवार की दो तरफ...
एक घर का बच्चा अपना नया मोबाइल थोड़ा स्लो होने पर चिड़चिड़ाता है।

सामने के घर का बच्चा ऑनलाइन पढ़ने के लिए मोबाइल न होने पर रोता है।

एक आदमी गर्म पानी पाँच मिनट देर से आने पर शिकायत करता है।
दूसरा आदमी आज पानी मिल गया, बस यही काफी है कहकर ईश्वर से प्रार्थना करता है।

अंतर केवल परिस्थिति में नहीं है...
अंतर दृष्टिकोण में भी है।

कुछ लोग खराब परिस्थिति में भी मुस्कुराना सीख गए हैं।
तो कुछ लोग तमाम सुविधाएं होने के बावजूद शिकायतों से बाहर नहीं निकल पाते।

आदमी की सबसे अजीब आदत यह है कि —

उसके पास जो नहीं है, उसका हिसाब वह रोज करता है...
लेकिन उसके पास जो है, उसका हिसाब वह कभी नहीं करता। 
                          ----- ~~~ ----- 

हर रात सोने से पहले बस पाँच बातें लिखकर देखिए —

१ आज मैं सांस ले रहा हूँ।
२ आज मेरे पास पीने के लिए पानी है।
३ आज मुझे खाना मिला।
४ आज मेरे पास रहने के लिए एक घर है।
५ आज मेरे अपने मेरे साथ हैं।

शायद हमारा जीवन ही बदल जाएगा।
                         ----- ~~~ -----     

संभवतः "स्वर्ग" कोई जगह नहीं है.. वह एक अनुभव है।

वैसे ही "नरक" भी कोई जगह नहीं है... उस अनुभव को भूल जाना ही नरक है।

हमारे पास जो है उसके लिए कृतज्ञ होना ही स्वर्ग है।
जो मिला है उसे भूलकर, शिकायतों में जीना ही नरक है।
                           ----- ~~~ -----  

मौत के बाद क्या होता है, यह कोई पक्के तौर पर नहीं जानता।
लेकिन जीते-जी ही हमें यह सुंदर पृथ्वी, सांस लेने के लिए हवा, पीने के लिए पानी, खाने के लिए अन्न, प्यार करने वाले हमारे लोग और एक बटन दबाने से मिलने वाली अनगिनत सुविधाएं मिली हैं।
इतना सब होने के बावजूद अगर हम हमेशा दुखी रहें...
तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा ?
                          ----- ~~~ -----

शायद ईश्वर भी हंसकर कहता होगा —
" मैंने तुझे स्वर्ग में ही रखा है... लेकिन तू वहां भी शिकायतों का दफ्तर ही खोलकर बैठा हैं !

इसलिए आज से शिकायतें मत गिनिए...

० "कृतज्ञता" गिनिए।
क्योंकि "कृतज्ञता" वाले हृदय में ही सच्चा स्वर्ग होता है।

              🥀🌸🌸 ❤️💮❤️🌸🌸🙏

साभार - नीलम 

लाखो हिन्दू लड़कियों के माता पिता के सम्मान की हत्या आर्यसमाज करवा चुका हैं। भारत में ईसाईयत को वेद और समाज सुधार के नाम पर फैलाने में जितना ज़ोर इस संस्था ने लगाया है उतना अन्य किसी ने नहीं।

चचेरे-ममेरे भाई-बहन, या चाचा-भतीजी जैसे रिश्ते, या भिन्न-भिन्न जाति के व भिन्न-भिन्न धर्म के लड़के-लड़कियाँ जब कथित प्यार के नाम पर अपने माता-पिता के प्यार को, परिवार के विश्वास को, वर्षों के त्याग को, सम्मान को रौंदते हुए घर छोड़कर भागते हैं, तो उनके दिमाग में सबसे पहले आता है - आर्यसमाज। उन्हें दिखाई देता है यह दयानंदी गिरोह, जो फूल-माला लिए इनके स्वागत में तैयार खड़ा दिखता है। इन भागे हुए लड़के-लड़कियों के लिए आर्यसमाज जन्नत है।

ये दयानंदी गिरोह वाले लड़के लड़कियों को समझाते हैं कि - "माता-पिता अगर तुम्हारे विवाह करने को नहीं मान रहे हैं तो वे माता-पिता कुएँ में पड़े" (अपनी पुस्तक में दयानंद ने भी माता-पिताओं के लिए यही शब्द प्रयुक्त किया है - माता-पिता कुएँ में पड़े) - और ऐसा कहकर, कुल छह-सात हजार रुपए के लालच में ये बस उनके दो कागज देखकर उनका विवाह करा देते हैं। किस्से ऐसे भी आए हैं कि मुसलमान ने हिन्दू नाम से फर्जी आधार कार्ड बनाया और आर्यसमाज मंदिर में जाकर हिन्दू लड़की से शादी कर ली। और यह दयानंदी गिरोह न केवल उस लड़की के बलात्कार का सर्टिफिकेट उस लड़के को दे देता है, बल्कि यह तक सुनने में आया है कि इनकी कुछ संस्थाएं तो घर से भागे लड़के-लड़कियों का विवाह कराकर वहीं सेक्स करने के लिए कमरा भी दे देते हैं, उनसे अधिक पैसे लेकर। कहते हैं कि - हो सकता है घर वाले शादी को न मानें, इसलिए सुहागरात भी यहीं माना डालो, ताकि तुम्हारे माँ बाप फिर विवश हो जाएँ।

अगस्त 2025 का मामला है। एक मुस्लिम जेहादी ने नाबालिग हिन्दू लड़की का अपहरण किया, उसे बहलाया-फुसलाया, उसके साथ बलात्कार किया और नकली कागजों के साथ जाकर आर्यसमाज में जाकर शादी कर ली, और इनकी शादी करा भी दी गई। यह मामला हाईकोर्ट में पहुँचा था।

भोपाल का मामला था, जिसमें एक लड़की ने अपने ममेरे भाई से जाकर आर्यसमाज में विवाह कर लिया। उसकी माँ थाने में फूट-फूटकर रो रही थी, और लड़की कह रही थी कि आज से उसकी तीनों बहनें व माँ-बाप उसके लिए मर गए।

ऐसा ही एक मामला दिल्ली में हुआ। इसमें आर्यसमाज ने एक भाई-बहन की शादी करा दी थी। लेकिन लड़की के परिवार ने विवाह को नहीं माना और वे कार्यवाही करने की बात करने लगे। तब वहाँ के दयानंदी गिरोह के विवाह कराने वाले की बेटी ने अपने साथ गुंडों को ले जाकर इस परिवार पर हमला करके उन्हें घायल कर दिया था।

ऐसे अनेक मामले आए दिन अखबारों में छपते आए हैं। यह दयानंदी रैकेट लड़के-लड़कियों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले कागजों को भी वेरिफाई नहीं करता है। इनको चाहिए बस वे सात-आठ हजार रुपए और वे लड़के-लड़कियाँ इनके पंथ में शामिल हो जाएँ, जिससे इनकी संख्या बढ़े। बस इतना ही चाहिए इनको।

मित्रों, एक लड़की के पिता का हृदय बड़ा कोमल हो जाता है। यह निर्विवादित सत्य है कि एक पिता के अन्तर्मन में जैसा स्नेह पुत्री के लिए होता है, वैसा संसार में अन्य किसी के लिए नहीं होता, भले ही वह उसे प्रकट करे या न करे। पुत्री उसके लिए गौरव होती है। माता पुत्री के भविष्य के लिए सपने सँजोती है। फिर वह लड़की एक दिन बिना कुछ विचार किए लड़के के साथ भाग जाती है। उसकी आयु ऐसी होती है कि वह इतना कुछ नहीं सोच-समझ पाती है।

तब इन दुष्ट दयानंदी गिरोह वालों को करना तो यह चाहिए कि उन लड़के-लड़कियों को समझाएँ, उनके परिवार से बात करें। यह देखें कि यह निर्णय उन्होंने क्षणिक आवेश या किसी छल के कारण तो नहीं लिया है। किन्तु ये कुछ नहीं देखते, कुछ नहीं समझाते। बल्कि उन्हें और भड़काकर माता-पिता के विरुद्ध कर देते हैं।

अनेक वीडियो इंटरनेट पर हैं, कोई भी जाकर देख सकता है। फिर थाने में वह बाप फफक-फफककर रोते हुए अपनी पगड़ी को लड़की के पैरों में रखता है कि - "मेरी इज्जत को नीलाम मत करो।" वह लड़की, जिसे इनका सहयोग प्राप्त होता है, सारी शर्म और भय इनके सहयोग से दूर हो जाते हैं। उसे अपना रोता और झुका हुआ बाप भी दिखाई नहीं देता।  

और लड़की के पीछे खड़े यही आर्यसमाजी गिरोह वाले हँसा करते हैं। इनके लिए यह दयानंद और इनके पंथ की जीत है।आज तक ऐसे लाखो हिन्दू लड़कियों के माता पिता के सम्मान की हत्या आर्यसमाज करवा चुका हैं। भारत में ईसाईयत को वेद और समाज सुधार के नाम पर फैलाने में जितना ज़ोर इस संस्था ने लगाया है उतना अन्य किसी ने नहीं।

साभार - शचीन्द्र शर्मा ( 7 October 2026 ईस्वी )
https://www.facebook.com/share/1eQHzybaV1/

Tuesday, 6 October 2026

इनके अंदर कम से कम श्राद्ध को लेकर विश्वास आज भी है...

एक मेरे भइया हैं लक्ष्मीकांत पाण्डेय उन्होंने इस श्राद्ध
अर्थात पितृपक्ष को लेकर कुछ कहा है सुनिए👇

मैं जिस कंपनी मे कार्यरत हूं,उसी मे मेरे मैनेजर के यहां कल उनके पिताजी का श्राद्ध था(पितृपक्ष नवमी तिथि)कल उन्होंने मुझे ब्राह्मण भोज के लिये बुलाया था....!

जब मैं उनके घर पहुँचा तो बड़ा आश्चर्य लगा मुझे.... आपको विश्वास नही होगा जेसे ही उनकी माताजी को पता चला मैं ब्राह्मण हूँ और उनके यहां श्राद्ध का भोजन ग्रहण करने आया हूँ...!

तो उनकी माताजी जो लगभग 92 वर्ष की हैं....जो की मेरे मैनेजर ने ही मुझे बताया... वो मेरे पैरों पर गिर गयीं...!

मैं क्या कहता... कुछ कह नही पा रहा था... मैंने उन्हे उठाने का बहुत प्रयास किया....मगर वो नही उठी मेरे पैर पकड़कर सिर्फ रोये जा रही थीं.....!

उनका रोना देख कर मुझे भी रोने जैसा लगने लगा.... मुझसे जब वो नही उठी तो लास्ट मे उनकी बहु आई तो उन्होंने उन्हें उठाया...!

मैंने उनके रोने का कारण जानना चाहा तो पता चला की उनके ससुर,पति के समय तक कई ब्राह्मण उनके यहां खाने पीने दान दक्षिणा लेने हमेशा आया करते थे...!

मगर ना जाने ये कुछ समय से किसने इतना दुष्प्रचार किया ब्राह्मणों को लेकर की अब तो ब्राह्मणों का आना जाना ही बंद हो गया...!

तब से घर मे ना कोइ शुभ पूजा पाठ होता हैं ना कोइ धार्मिक प्रोग्राम...!

हालांकि अभी हाल ही मे उनके माताजी प्रयागराज गंगा स्नान करके आई हैं और अयोध्या मे राम लला के दर्शन करके भी आई हैं...!

उनके माताजी रोते हुवे बोल रही थीं...!

उन्होंने कहा जब मैं राम लला के दर्शन करके लोटी तो सोचा कोइ ब्राह्मण को घर बुलाकर अपने हाथों से भोजन करवाउंगी मगर मेरे बेटे लोग कभी किसी ब्राह्मण को बुलाता ही नही और मेरी उम्र इतनी हो गयी हैं की मै चल फिर भी नही पाती हूँ..!

मै सोच रही थीं की मरने से पहले किसी ब्राह्मण को भोजन अवश्य करवा लूँ... मगर आज भगवान ने सुन लिया...!

मैंने देखा की घर मे उनके किसी भगवान का फोटो नही था हाँ भीम का पूरा घर मे फोटो टंगा मिला...

अब तो घर मे सिर्फ जय भीम जय भीम होता हैं और कुछ नही...!

मैंने देखा की अपने पिताजी के जगह पर उन्होंने भीम का फोटो लगा रखा है...!!
मैंने जब उनसे पूछा तो उन्होंने बताया की उनके पिताजी का फोटो तो नही है बचपन मे ही उनके पिताजी का देहांत हो गया और उस समय कोइ फोटो भी नही खींचवाया था उनके पिताजी ने तो पिता के जगह वो भीम को ही अपना पिताजी मान लिये है....!

मुझे बहुत अच्छा लगा की चलो जहाँ लोग आज सिर्फ जय भीम...जय भीम.... करते रहते है...और अपने पुराण पद्धति को ढोंग मानते है...

 मगर इनके अंदर कम से कम श्राद्ध को लेकर विश्वास आज भी है...

और दान दक्षिणा देना चाहिए...ये भी पता है इन लोगों को....

और भले ही बदलाव करके कर रहे है तो क्या हुवा श्राद्ध तो कर रहे है न..!

चाहे जैसे करें... धर्म मान तो रहे हैं...!

मुझे दान दक्षिणा मिला और भोजन मे पूड़ी सब्जी पनीर और खीर खाने को मिला...!!

उनकी माताजी ने ना जाने कब से दान करने के लिये जोड़ जोड़ कर कब से संभाल कर रखी थीं पैसे को अपने दोनों हाथों से मुठी भर कर सिक्का और रूपये मुझे दिये...!

मेरे मैनेजर की वाइफ ने 500 रूपये दिये... और मेरे मैनेजर ने भी 500 दिया...!!

उनके दोनों छोटे बच्चे लोग ने भी 20 रूपये करके दिये...!!

पता नही क्यों आज शायद कुछ लोगों को लगेगा की मैंने अपने मैनेजर को लूट लिया....!

क्योंकि ब्राह्मणों को दान देने और उनके यहां खाने पीने को ही तो ये लोग ब्राह्मणों द्वारा खुदको लूटना मानते आए हैं...!!
हालांकि यह जो नई जनरेशन है यही यह मान रही है, उनके बाबा दादा हमेशा ब्राह्मणों का सम्मान किए थे और ब्राह्मण भी उनका सम्मान करते चले आए थे। 
साभार :-अनुपमा तिवारी
( Ajai Sharma fb Post 6 October 26 से )