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Thursday, 26 February 2026

शनिदेव की कथा

एक ब्राह्मण को सपने में नीली घोड़ी पर नीले कपड़े पहने एक आदमी दिखाई देता है और कहता है – हे ब्राह्मण देवता मैं तेरे लगूंगा। ब्राह्मण घबरा कर उठ गया। अगले दिन यही सपना उसे फिर आता है। यह सपना उसे रोज आने लगा । वह परेशान हो गया और चिंता के मारे दुबला होने लगा। उसकी पत्नी ने कारण पूछा तो उसने सपने के बारे में बताया। ब्राह्मणी बोली वे अवश्य ही शनि महाराज होंगे। अबकी बार दिखे तो कहना ” लग जाओ पर सवा पहर से ज्यादा मत लगना ” उस दिन सपना आने पर ब्राह्मण ने कहा लग जाओ पर कितने समय के लिए लगोगे ? शनि जी बोले – साढ़े सात वर्ष का लगूंगा। ब्राह्मण ने कहा – क्षमा करें शनि जी इतना भारी तो मुझसे झेला नहीं जायेगा। तब शनि जी बोले – तो पांच वर्ष का लग जाऊंगा। ब्राह्मण बोला – यह भी मेरे लिए ज्यादा है। शनि जी बोले – ढ़ाई साल का लग जाऊं ? ब्राह्मण ने मना किया तो शनि जी कहने लगे सवा पहर का तो लगूंगा ही। इतना तो कोढ़ी , कलंगी , भिखारी के भी लग जाता हूँ। तब ब्राह्मण ने कहा – ठीक है। ब्राह्मण को सवा पहर की शनि की दशा लग गई।
ब्राह्मण ने नींद से जागकर ब्राह्मणी से कहा – मेरे सवा पहर शनि की दशा लग गई है। इसलिए मैं जंगल में जाकर यह समय बिताऊंगा। मेरे लिए खाने पीने का सामान बांध दे। मेरे पीछे से किसी से लड़ाई झगड़ा ना हो इसका ध्यान रखना । ज्यादातर घर में ही रहना। बच्चों का भी ध्यान रखना। इस सवा पहर के समय में कोई गाली भी दे तो चुपचाप सुन लेना। बहस मत करना। यह सब समझा कर ब्राह्मण जंगल में चला गया।
जंगल में ब्राह्मण एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गया और हनुमान जी का पाठ करने लगा। एक पहर बीत गया। ब्राह्मण ने सोचा बाकि बचा समय रास्ते में बीत जायेगा। इसलिए वहां से चल दिया। रास्ते में एक बाड़ी में मतीरे लगे देखे। माली से एक मतीरा खरीदा , पोटली में बांधा और आगे बढ़ा।
आगे एक आदमी मिला जो असल में शनिदेव थे। ब्राह्मण से पूछा पोटली में क्या है ? उसने कहा मतीरा है। शनि देव बोले दिखाओ। ब्राह्मण ने पोटली खोली। उसमे राजकुमार का कटा हुआ खून से लथपथ सिर दिखा। शनिदेव ब्राह्मण को राजा के पास ले गए और कहा की इस ब्राह्मण ने राजकुमार की हत्या कर दी है। इसके पास पोटली में राजकुमार का सिर है।
राजा ने कहा – मैं यह नहीं देख सकता। इस ब्राह्मण को सूली पर चढ़ा दो। राजा के यहाँ हाहाकार मच गया। ब्राह्मण को सूली पर चढ़ाने से पहले पूछा गया की उसकी कोई आखिरी इच्छा हो तो बताये। ब्राह्मण ने सोचा किसी तरह सवा पहर पूरा करना होगा। उसने कहा वह रोज बालाजी की कथा सुनता है। मरने से पहले अंतिम बार बाला जी की कथा सुनना चाहता हूँ। ब्राह्मण को कथा सुनाने का प्रबंध किया गया।
कथा कहते कहते सवा पहर पूरा हो गया। शनि की दशा टलते ही राजकुमार शिकार खेल कर लौटता हुआ दिखाई दिया। राजकुमार को आता देख राजा बहुत खुश हुआ। लेकिन उसे निर्दोष ब्राह्मण की हत्या का दोष लगने का डर सताने लगा। उसने तुरंत घुड़सवार सैनिकों को ब्राह्मण को आदर सहित ले आने के लिए भेजा। ब्राह्मण राजदरबार में आया तो राजा ने क्षमा मांगी और पोटली दिखाने के लिए कहा। पोटली खोली तो उसमे मतीरा था।
राजा ने इन सबके बारे में पूछा तो ब्राह्मण ने बताया – मुझे सवा पहर की शनिश्चर की दशा लगी थी इस कारण यह सब तमाशा हुआ। राजा ने पूछा – यह दशा कैसे टलती है ? ब्राह्मण बोला – राजा या सेठ के लगे तो काला हाथी या काला घोड़ा दान करे। गरीब के लगे तो पीपल की पूजा करे। पूजा करे तब बोले – साँचा शनिश्चर कहिये जाके पाँव सदा ही पड़िए। शनि की कहानी सुने। तिल का तेल और काला उड़द दान करे।
काले कुत्ते को तेल से चुपड़ कर रोटी खिलाये तो शनिश्चर की दशा उतर जाती है। राजा ने उसे मतीरा वापस दे दिया। घर आकर ब्राह्मण ने मतीरा काटा तो उसमे बीज की जगह हीरे मोती निकले। ब्राह्मणी ने पूछा – यह कहाँ से लाये ? आप तो कह रहे थे शनि की दशा लगी है। ब्राह्मण ने कहा – जब दशा लगी थी तो यही मतीरा राजकुमार का सिर बन गया था। उतरती दशा के शनि जी निहाल कर गए।
हे शनि देवता जैसी ब्राह्मण के शनि की दशा लगी वैसी किसी को ना लगे। निहाल सबको करे।

शनिदेव की जय !!!
साभार ‌- कथा संग्रह 

वीर सावरकर ने अंग्रेजों से माफी क्यों मांगी?

वीर सावरकर ने अंग्रेजों से माफी क्यों मांगी?
 
(26 फरवरी को पुण्य तिथि के उपलक्ष पर प्रचारित)
वीर सावरकर भारत देश के महान क्रांतिकारियों में से एक थे। कांग्रेस राज की बात है। मणिशंकर अय्यर ने मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा देने के लिए अण्डेमान स्थित सेलुलर जेल से वीर सावरकर के स्मृति चिन्हों को हटवा दिया। यहाँ तक उन्हें अंग्रेजों से माफी मांगने के नाम पर गद्दार तक कहा था। भारत देश की विडंबना देखिये जिन महान क्रांतिकारियों ने अपना जीवन देश के लिए बलिदान कर दिया। उन क्रांतिकारियों के नाम पर जात-पात, प्रांतवाद, विचारधारा, राजनीतिक हित आदि के आधार पर विभाजन कर दिया गया। इस विभाजन का एक मुख्य कारण देश पर सत्ता करने वाला एक दल भी रहा। जिसने केवल गांधी-नेहरू को देश के लिए संघर्ष करने वाला प्रदर्शित किया। जिससे यह भ्रान्ति पैदा हो गई हैं कि देश को स्वतंत्रता गांधी जी/कांग्रेस ने दिलाई? वीर सावरकर भी स्वाधीनता के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले, सर्वस्व समर्पित करने वाले असंख्य क्रांतिकारियों, अमर हुतात्माओं में से एक थे जिनकी पूर्ण रूप से उपेक्षा की गई।
वीर सावरकर ने अपनी कहानी में अंडमान की यात्राओं पर प्रकाश डालते हुए कोल्हू में बैल की तरह जुत कर तेल पेरने का बड़ा ही सजीव वर्णन किया है | उन्होंने लिखा है -
"हमें तेल का कोल्हू चलने का काम सोंपा गया जो बैल के ही योग्य माना जाता है | जेल में सबसे कठिन काम कोल्हू चलाना ही था | सवेरे उठते ही लंगोटी पहनकर कमरे में बंद होना तथा सांय तक कोल्हू का डंडा हाथ से घुमाते रहना | कोल्हू में नारियल की गरी पड़ते ही वः इतना भारी चलने लगता की हृदय पुष्ट शरीर के व्यक्ति भी उसकी बीस फेरियां करते रोने लग जाते | राजनीतिक कैदियों का स्वास्थ्य खराब हो या भला, ये सब सख्त काम उन्हें दिए ही जाते थे | चिकित्सा शास्त्र भी इस प्रकार साम्राज्यवादियों के हाथ की कठपुतली हो गया | सवेरे दस बजे तक लगातार चक्कर लगाने से श्वास भारी हो जाता और प्रायः सभी को चक्कर आ जाता या कोई बेहोश हो जाते | दोपहर का भोजन आते ही दरवाजा खुल पड़ता, बंदी थाली भर लेता और अंदर जाता की दरवाजा बंद |
"यदि इस बीच कोई अभागा केडी चेष्टा करता की हाथ पैर धोले या बदन पर थोड़ी धूप लगा ले तो नम्बरदार का पारा चढ़ जाता | वह मा बहन की गालियाँ देनी शुरू कर देता था | हाथ धोने का पानी नहीं मिलता था, पीने के पानी के लिए तो नम्बरदार के सैंकड़ों निहार करने पड़ते थे | कोल्हू को चलाते चलाते पसीने से तर हो जाते, प्यास लग जाती | पानी मांगते तो पानी वाला पानी नहीं देता था | यदि कहीं से उसे एकाध चुटकी तम्बाकू की दे दी तो अच्छी बात होती , नहीं तो उलटी शिकायत होती की ये पानी बेकार बहाते हैं जो जेल में एक बड़ा भारी जुर्म होता | यदि किसी ने जमादार से शिकायत की तो वः गुस्से में कह उठता - " दो कटोरी पानी देने का हुक्म है , तुम तो तीन पि गया | और पानी क्या तुम्हारे बाप के यहाँ से आएगा ? " नहाने की तो कल्पना करना ही अपराध था | हां , वर्षा हो तो भले नाहा लें | " केवल पानी ही नहीं अपितु " भोजन की भी वाही स्थिति थी | खाना देकर जमादार कोठरी बंद कर देता और कुछ देर में हल्ला करने लगता - " बैठो मत , शाम को तेल पूरा हो नही तो पीते जाओगे | और जो सजा मिलेगी सो अलग | " इसे वातावरण में बंदियों को खाना निगलना भी कठिन हो जाता | बहुत से ऐसा करते की मुंह में कौर रख लिया और कोल्हू चलाने लगे | कोल्हू पेरते पेरते , थालियों में पसीना टपकाते टपकाते , कौर को उठाकर मुंह में भरकर निगलते कोल्हू पेरते रहते | " १०० में से एकाध ऐसे थे जो दिन भर कोल्हू में जुतकर तीस पौंड तेल निकाल पाते | जो कोल्हू चलाते चलाते थककर हाय हाय कर दते उन पर जमादार और वार्डन की मार पड़ती | तेल पूरा न होने पर उपर से थप्पड़ पड़ रहे हैं , आँखों में आंसुओं की धारा बह रही है | "
वीर सावरकर जानते थे कि यह अत्याचार क्रांतिकारियों पर अंग्रेजों द्वारा इसलिए किया जा रहा है ताकि वे मानसिक रूप से विक्षिप्त होकर या तो पागल हो जाये अथवा मर जाये। अंग्रेजों की छदम न्यायप्रियता का यह साक्षात उदहारण था। इतिहास फिर से दोहरा रहा था। औरंगजेब ने भी कभी अंग्रेजों के समान शिवाजी को कैद कर समाप्त करने का सोचा था ताकि शिवजी दक्कन का कभी दोबारा मुँह न देख सके। जन्मभूमि से इतनी दूर जाकर इस प्रकार से मरना वीर सावरकर को किसी भी प्रकार से स्वीकार्य नहीं था। उन्हें लगा की उनका जीवन इसी प्रकार से नष्ट हो जायेगा। मातृभूमि की सेवा वह कभी नहीं कर पाएंगे। उन्होंने साम,दाम, दंड और भेद की वही नीति अपनाई जो वीर शिवाजी ने औरंगज़ेब की कैद में अपनाई थी। उन्होंने अंग्रेजों से क्षमा मांग कर मातृभूमि जाने का प्रस्ताव उनके समक्ष रखा। अंग्रेज उनकी कूटनीति का शिकार बन गए। वीर सावरकर को सशर्त रिहा कर दिया गया। अपने निर्वासित जीवन में उन्हें न रत्नागिरी से बाहर नहीं निकलना था और न ही किसी भी प्रकार की क्रांतिकारी गतिविधि में भाग लेना था। वीर सावरकर ने अवसर का समुचित लाभ उठाया। उन्होंने अण्डेमान जेल के कैदियों के अधिकारों के लिए आंदोलन किया। उससे भी बढ़कर उन्होंने छुआछूत रूपी अन्धविश्वास के विरोध में आंदोलन चलाया। वीर सावरकर ने पतित पावन मंदिर की स्थापना की जिसमें बिना किसी भेदभाव के ब्राह्मण से लेकर शूद्र सभी को प्रवेश करने की अनुमति थी। सामूहिक भोज का आयोजन किया जिसमें शूद्रों के हाथ से ब्राह्मण भोजन ग्रहण करते थे। दलित बच्चों को जनेऊ धारण करवाने से लेकर गायत्री मंत्र की शिक्षा दी। रत्नागिरि में वीर सावरकर ने छुआछूत रूपी अभिशाप को समाप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली आंदोलन किया। इसके साथ साथ जनचेतना के लिए उनका लेखन कार्य अविरल चलता रहा।
खेद हैं कि वीर सावरकर के इस चिंतन, श्रम और पुरुषार्थ की अनदेखी कर साम्यवादी इतिहासकार अपनी आदत के मुताबिक उन्हें गद्दार कहकर अपमानित करते हैं। उनकी माफ़ी मांगने की कूटनीति को कायरता के रूप में प्रेषित करते है। धिक्कार है ऐसे पक्षपाती लेखकों को और ऐसे राजनेताओं को जो वीर सावरकर के महान कार्यों की उपेक्षा कर अपने राजनीतिक हितों को साधने में लगे हुए हैं। उन्हें गद्दार कहते है। वीर सावरकर गद्दार नहीं अपितु स्वाभिमानी थे। देशभक्त थे। धर्मयोद्धा थे। अनेक क्रांतिकारियों के मार्गदर्शक थे। कूटनीतिज्ञ थे। प्रबुद्ध लेखक थे। आत्मस्वाभिमानी थे। समाज सुधारक थे।
आईये आज वीर सावरकर की जयंती पर हम लोग यह प्राण करे कि हम भी उनके समान छुआछूत मिटाने, धर्म रक्षा, देश भक्ति के लिए पुरुषार्थ करेंगे।
हमारे क्रांतिकारी महान है गद्दार कभी नहीं। गद्दार तो वो है जो उनकी आलोचना करते है।
#VeerSavarkar

साभार - डॉ . विवेक आर्य 
वयं राष्ट्रे जागृयाम 

#ब्राम्हणवाद_को_खलनायक_बनाने_की_पृष्ठभूमि : दलित उत्पीड़न का पोस्टमॉर्टम

उम्मीद है सार्थक तर्क होगा... #ब्राम्हणवाद_को_खलनायक_बनाने_की_पृष्ठभूमि : दलित उत्पीड़न का पोस्टमॉर्टम:

wily ( दुस्ट) ब्राम्हण सिद्ध करने के कुचक्र का बैकग्राउंड।

मार्क्स ने 1853 ( आर्थिक इतिहास के क्रोनोलॉजी को ध्यान में रखें ) में न्यूयॉर्क ट्रिब्यून में एक लेख लिखता है। अपने लेख में भारत सामाजिक पृष्ठिभूमि का वर्णन करते हुए वह कहता है:
( यह लेख गूगल पर उपलब्ध है)

" (1) भारत एक ऐसा राष्ट्र है, जहाँ प्रोडूसर यानि मैन्युफैक्चरर और कंस्यूमर दोनों ही एक हैं। अर्थात कंस्यूमर ही मैन्युफैक्चरर है, और मैन्युफैक्चरर ही कंस्यूमर है। खुद ही निर्माण करता है और खुद ही इस्तेमाल करता है, यानि हर गावं एक स्वतंत्र आर्थिक इकाई है । इसको उसने "एशियाटिक मॉडल ऑफ़ प्रोडक्शन" का नाम दिया। किसी भी तरह के वर्ग विशेष द्वारा किसी वर्ग विशेष के शोसण का जिक्र नहीं है।

(2) ईस्ट इंडिया कंपनी ने कृषि और पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट को नेग्लेक्ट किया और बर्बाद किया।

(3) ब्रिटेन जो कि इंडियन फैब्रिक इम्पोर्ट करता था, एक एक्सपोर्टर में तब्दील हुवा।

(5 ) भारत के फाइन फैब्रिक मुस्लिन का निर्माण नष्ट किये जाने के कारण 1824 से 1837 के बीच ढाका की फैब्रिक मैन्युफैक्चरर आबादी 150,000 से घट कर मात्र 20,000 रह गयी।
(अब कोई फैक्ट्री तो होती नहीं थी उस वक़्त, इसलिए सब मैन्युफैक्चरिंग घर घर होती थी)।
(6) हालांकि सब ठीक है ,,लेकिन ये जनमानस गायों और बंदरों (हनुमान जी ) कि पूजा न जाने कब से करते आ रहे है, इसलिए ये अर्ध बर्बर सभ्यता है। जो अंग्रेज भारत के साथ कर रहे हैं यद्यपि पीड़ादायक है, लेकिन यदि क्रांति लानी है तो इस सभ्यता को नष्ट करना आवश्यक है। अंग्रेज एशियाटिक सभ्यता को नष्ट करके उस पर पाश्चात्य matrialism की नीव रखने का अति उत्तम कार्य कर रहे हैं।"

मार्क्स एक नास्तिक था उसको क्रिश्चियनिटी से उतनी ही दूरी बनाके रखनी चाहिए थी जितनी हिंदूइस्म से । लेकिन क्यों कहा उसने ऐसा , ये तो वही जाने लेकिन आधुनिक मार्क्सवादी वामपंथी और लिबरल्स अभी भी उसी फलसफा का अनुसरण कर रहे हैं। 

मार्क्स ने गाय और हनुमान कि पूजा करने वालों को सेमी barberic कहा, लेकिन 1500 से 1800 के बीच यूरोपीय christianon ने 200 मिलियन (20 करोड़ ) देशी अमेरिकन की हत्या कर दिया । वे यूरोपीय ईसाई दैवीय लोग थे ? इस पर आज तक ने मार्क्स ने कुछ बोला कभी न उनके उत्तराधिकारियों ने।
क्यों? क्या चमड़ी का रंग बदल जाने से और गैर ईसाई होने से मानवता का मूल्य कम हो जाता है? 

अब दो मूल प्रश्न :
(1) जो लोग ढाका जैसे शहरों से बेरोजगार होने के कारण भागे शहर छोड़कर, वो कहाँ गए ? और क्यों गए ? उनका और उनकी वंशजो का क्या हुवा? 

 मेरा मानना है वो गावों की और गए , जहाँ उन्हें प्रताणित नहीं किया गया बल्कि शरण दिया लोगों ने ।

(२) आप जानते हैं शहर में रहना महंगा है । उस पर अगर उसका पेशा ही नष्ट कर दिया जाय तो वो अपना और अपने परिवार के लिए रोटी कपड़ा और मकान का इंतेज़ाम शहर में नहीं कर सकता । गावं में लोगों ने उनको कहा एक छोटा सा घर बनवा लो , रहो और खेती बाड़ी में मजदूरी करो या मदद करो । क्योंकि गावं में आप एक लुंगी या चड्ढी में भी बसर कर सकते हैं। श्रीलाल शुक्ल के रागदरबारी का शनिचर सिर्फ चड्ढी और बनियान में ही रहता था प्रधान बनाने के बाद भी ।

इस तरह एक स्किल्ड और enterpreuner तबका एक मजदूर वर्ग में तब्दील हो गया । इसी तथ्य में आंबेडकर का उस प्रश्न का भी उत्तर छुपा है , जिसमे उन्होंने कहा कि यद्यपि स्मृतियों में मात्र 12 अछूत जातियों का वर्णन है , लेकिन govt कौंसिल 1936 ने 429 जातियों को अछूत घोषित किया गया है । और आप अनुमान लगाये 700 प्रतिशत बेरोजगार कितनी बड़ी जनसँख्या होती है ।
जो लोग गावं में रहे हैं वो जानते हैं कि उनके दादा परदादा बताते रहे होंगे कि हमने फलने फलने को बसाया । बसाया तो कौन लोग थे, जो उजड़कर दुबारा बसने गए थे ? वो वही लोग हैं 700 % बेरोजगार स्किल्ड मन्फक्टुरेर ऑफ़ इंडिया।

अब कहानी को मंथर गति से आगे बढ़ाते हैं ..अगर 1900 तक भारत के स्किल्ड कारीगर और व्यापार से जुड़े अन्य लोग, जो विश्व के सकल घरेलु उत्पाद में भारत की 25% हिस्सेदारी (कम से कम angus maddison के आंकड़ों से अनुसार) पिछले 1750 तक बरकरार रखा था , और जो 1900 आते आते मात्र 1.8 % तक सिमटकर रह गया , उनकी काम कौशल के साथ जीविका और जीवन भी बदल गया।
 जो निर्माता से मजदूर में तब्दील हो गया क्या वो मनुस्मृति या वेदों में लिखे कुछ श्लोकों के कारन हुवा?

 क्या दलित चिंतक समाज के अर्थशास्त्र को देखने का साहस रखते हैं ? आजादी आते आते और ५० साल लगभग गुजर गए।और इन 50 वर्षों में और भी स्किल्ड लोग बेरोजगार, और बेघर हुए होंगे ।

क्या ये ब्राम्हणवाद की देन है ?

बंगाल में आजादी के पूर्व करीब ४० से ज्यादा बार सूखा पड़ा जिसमे करोणों लोग मरे । कौन लोग थे वे?

इस भयानक दुर्दशा से अगर कोई अपने आपको बचा पाया होगा तो वो रहे होंगे किसान , और वो भी वही किसान,जो जमींदारी प्रथा और टैक्सेशन से अपने आपको बचा पाएं होंगे । पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक बहुत बड़ा वर्ग दलित वर्ग में आता है, और संविधान प्रदत्त आरक्षण का लाभ भी लेता है , बहुतायत से उसमे मेरे मित्र भी हैं , लेकिन वो सैकड़ों बीघो के जमीन के मालिक हैं।

 कैसे हैं वे इतने बड़े काश्तकार होते हुए भी दलित? क्या ये विसंगतियां दिखती नहीं लोगों को ? इससे ज्यादा ईमानदार चिंतक तो आंबेडकर जी थे ,जिन्होंने स्मृतियों में वर्णित और कौंसिल ऑफ़ इंडिया में लिस्टेड S C जातियों की विसंगत्यों पर एक ईमानदार प्रश्नचिन्ह तो खड़ा किया ।
अब आइये उस बात की चर्चा करें की भारतीय समाज को टुकडे टुकडे में कैसे बांटा प्रशासन ने और पादरियों ने। कैसे स्वास्तिक जर्मनी के हिटलर और सैनिकों के बांह पर सुशोभित हुवा? 
 कैसे ब्राम्हण वाद की फलसफा ने जन्म लिया? क्यों जरूरत पड़ी इन सबकी? 
1857 के संग्राम में इतने अंग्रेज मारे गए कि यदि पंजाब का राजघराना जो कि अभी राजनीती में सक्रिय हैं , दूसरे सिंधिया घरानों ने अंग्रेजों कि मदद न कि होती तो शायद उसी समय भाग गए होते।
 लेकिन 1857 की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए उन्होंने कि योजनाबद्ध तरीके से भारत में न सिर्फ हिन्दू मुस्लिम भेद पैदा किया बल्कि हिन्दू समाज को इतने हिस्सों में बाँट दो कि वे एक न हो सके।
 ये अघोषित राजनीतिक योजना थी । दूसरे कुछ वर्षों के लिए मिशनरियों के क्रिया कलाप पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। क्योंकि सेना में उच्च पदों पर बैठे अधिकारी खुले आम सिपाहियों के हिन्दू धर्म को नीचा दिखाया करते थे, इसलिए सेना में काफी असंतोष रहा करता था।
लेकिन यह ऊपरी स्तर पर किया गया। लेकिन जमीनी स्तर पर धर्म परिवर्तन की जमीन तैयार करने के लिए वैधानिक मार्ग अपनाया गया। 

अब बात ये है कि सिर्फ हिन्दू समाज को ही क्यों बांटना था ? क्योंकि 1857 के संग्राम में अधिकतम हिस्सेदारी हिन्दुओं की ही थी । 1857 के पहले सेना में सभी वर्ण के लोग एक साथ थे। मंगल पण्डे तो याद ही होंगे आपलोगों को ।

तो पहला काम था सेना का regimentation करना ।

 जिसके बाद उन्होंने राजपूत बटालियन, सिख रेजिमेंट , मराठा रेजिमेंट , इत्यादि खास तौर पर उन वर्गों को सेना में शामिल किया, जिन्होंने अंग्रेजों की 1857 में मदद क़ी थी।
विशेष तौर पर ब्रामणो को सेना से बाहर किया और ये ख्याल रखा गया कि जवान जो रखे जाय उनकी पारिवारिक पृष्ठिभूमि क्या है? और उनके कोई रिश्तेदार आर्मी में हैं कि नहीं हैं? यदि हैं तो उनको प्राथमिकता दी जाएगी। इसीलिए अम्बेडकर जी के पितामह और पिता दोनो सेना में रखे गए थे। 
एक नया शब्द कॉइन किया गया --मार्शल रेसेस जिनमे क्षत्रियों और सिखों को रखा गया। अर्थात मोटी बुद्धि के साहसी लोगों का समुदाय। 

भारत के हिन्दू समाज को बाँटने का सिलसिला शुरू हुवा "#आर्य " और "#द्रविड़" बंटवारे से । नार्थ साउथ विभाजन से। क्योंकि दक्षिण में क्रिस्चियन मिशनरीज काफी पहले से आ गयी थी परन्तु धर्म परिवर्तन में सफल नहीं हो पा रहीं थी । इस लिए सबसे पूर्वे भारत को उत्तर और दक्षिण भारतीयों में बांटा और उसमे वे सफल रहे । यानी आर्य और द्रविड़।
उसके पश्चात कल्पित #आर्यनअफवाह और बाइबिल के चश्मे से हिन्दुओ को सवर्ण और असवर्ण में बांटा गया।
कास्ट को हिन्दू धर्म का अमानवीय और अभिन्न अंग बताते हुए इसकी उत्पत्ति के लिए ब्राम्हणो को उत्तरदायी ठहराया गया और ब्राम्हणवाद को जमकर गालियां देनी शुरू की गयी। 
एम ए शेरिंग ने ब्राम्हणो को गालियां देने का टेम्पलेट तैयार किया - wily Bramhan दुष्ट ब्राम्हण आदि आदि। 
अम्बेडकर जी इन मिशनरियों से अत्यंत प्रभावित थे। उनकी पुस्तक में एम ए शेरिंग के प्रति आदर का भाव यही दर्शाता है। 
1901 में HH रिसले ने सवर्णो को तीन उच्च जातियां और अन्य हिन्दू समुदाय को निम्न जातियों में विभाजित कर 2378 कास्ट की लिस्ट बनायी।
यही से ऊंची और निम्न जाति की अवधारणा पुष्पित पल्लवित होनी शुरू हुई।

इसी पुस्तक से।