Pages

Tuesday, 17 February 2026

समझ में आया तो बच जाओगे।

                          ॥॥ ॐ ॥॥
              समझ में आया तो बच जाओगे। 
    एक प्रसिद्ध मंदिर था जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते थे। मन्दिर की ख्याति और उसमे आने वाला चढ़ावा दोनों में वृद्धि होने लगी।

धीरे धीरे मन्दिर की चर्चा उस शहर में रहने वाले भिखारियों के कानों में पड़ी, भिखारियों को उस मन्दिर में खजाना नजर आने लगा। दिन प्रतिदिन भिखारियों की संख्या मन्दिर के इर्द गिर्द बढ़ने लगी और मंदिर की सुरक्षा कमेटी इससे आंखे मूंदे रही। कमेटी का मानना था कि अगर मन्दिर में आने वाले श्रद्धालु उन्हें भीख दे रहे है तो ये पुण्य का काम है और मानव सेवा है।

इस अनदेखी का परिणाम ये हुवा की बेहतर जीवन जी रहे भिखारी अन्य शहरों से अपने परिचितों को भी बुलाने लगे और उस इलाके में बसाते रहे। स्थिति ये होने लगी कि मंदिर में श्रद्धालुओं से अधिक भिखारी हो गए और उनको मिलने वाली भीख कम होने लगी। इस वजह से भिखारी उग्र होने लगे और जबरन भिक्षा वसूली करने लगे। इस चक्कर मे आये दिन फसाद और श्रद्धालुओं से बदतमीजी बढ़ने लगी।

अब सुरक्षा कमेटी ने सख्त रवैया अपनाया और भिखारियों को खदेड़ना आरम्भ किया। लेकिन भिखारी यूनियन टस से मस न हुई। संख्या बल से वो अपराजेय सिद्ध हुवे।

कमेटी ने एक अन्य तरीका अपनाने की सोची। कमेटी ने प्रस्ताव रखा कि अन्य शहरों से आये भिखारियों को वापस भेज दिया जाए और स्थानीय भिखारी पुनः उस मंदिर के जरिये अपना जीवन स्तर बेहतर करें।

यूनियन में चर्चा हुइ, सर्वसम्म्मत्ति से एक बिंदु पर उनका मत स्थिर हुवा की अगर संख्या कम हुई तो उसके बाद सुरक्षा कमेटी हमे यहां से भागने पर मजबूर कर देगी।

बस स्थानीय भिखारी अड़ गए कि जो बाहरी है उन्हें भी मान्यता दी जाए अन्यथा मंदिर को नुकसान पहुंचाएंगे और आने वाले श्रद्धालुओं पर हमला करेंगे।
नतीजा शून्य रहा और स्थिति बिगड़ने लगी। इस अराजकता से घबराकर श्रद्धालुओ ने मंदिर जाना बंद कर दिया और मंदिर धीरे धीरे खंडहर बनता गया।

भिखारियों के आतंक से भयभीत श्रद्धालुओ ने अपने ही मंदिर को त्याग दिया क्योंकि सुरक्षा कमेटी अमानवीय तरीके अपनाने से पीछे हट चुकी थी।

लेकिन बात यही खत्म नही होने वाली, शहर में बहुत से समृद्ध मंदिर शेष है व भिखारी उधर का रुख कभी भी कर सकते है।

श्रद्धालु कब तक अपनी श्रद्धा से समझौता करेंगे व अपनी ही पुण्यभूमि का त्याग करते रहेंगे ???

यह सिर्फ एक कहानी नही है। समझ में आया तो बच जाओगे। आंख मीच दी तो आने वाली पीढ़ी आपको क्षमा नही करेगी।
साभार - Jain Dinesh 
वयं राष्ट्रे जागृयाम 

केवाँच: ख़तरनाक मगर बड़े काम की!



केवाँच: ख़तरनाक मगर बड़े काम की!

बहुत ही अनोखे गुण और अवगुण रखने वाली एक वनस्पति के विषय में जानकारी साझा करने जा रही हूँ आज मैं, पर उससे पहले बचपन में सुनी अकबर-बीरबल की एक मनोरंजक कहानी से आपको अवगत कराना चाहूँगी। वह कहानी इसी अनोखी बेल पर आधारित है और उसे पढ़कर आपको अवश्य ही आनन्द आयेगा।

तो कहानी के अनुसार हुआ कुछ यूँ था कि बादशाह अकबर हमेशा बीरबल का इस बात पर मज़ाक उड़ाया करते थे कि तुम लोग हर किसी को माता यानी माँ मान लेते हो, जैसे गौमाता, गंगा मैया, तुलसी मैया आदि-आदि!

एक दिन सुबह-सुबह दोनों साथ-साथ बगीचे की सैर कर रहे थे और बादशाह ने फिर यही बात छेड़ दी। बीरबल ने इस बार मन ही मन उन्हें सही सबक सिखाने की सोच ली।

उन्होंने चलते-चलते एक पौधे को झुककर प्रणाम किया फिर आगे बढ़ गये। पूछने पर कह दिया कि ये तुलसी हैं, हमारी माता!
अकबर हँसते हुए तत्काल आगे बढ़े और बीरबल को चिढ़ाने के लिए उस पौधे को जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया। ऐसा दो-तीन बार हुआ।

अबकी बार बीरबल दूसरी दिशा की ओर मुड़ गये और थोड़ी दूरी पर जाकर सुनहरी फलियों से लदी एक सुन्दर बेल को झुककर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर वहीं खड़े हो गये। पीछे-पीछे बादशाह आये और फिर से अपनी हरकत दुहरायी, आगे बढ़कर दोनों हाथों से बेल को जकड़ कर उखाड़ा और दूर फेंक दिया।

बस! कुछ क्षण ही बीते थे कि बादशाह के शरीर में भयंकर खुजली होनी शुरू हो गयी। और शुरू क्या हुई, बढ़ती चली गयी, बढ़ती ही चली गयी।
पता है क्यों?

क्योंकि वह केवाँच की बेल थी।😀😀

थोड़ी ही देर में खुजाते-खुजाते बादशाह की हालत बुरी हो गयी। शरीर की त्वचा एकदम से लाल हो गयी, जगह-जगह फफोले पड़ गये और पीड़ा व जलन की तो सीमा ही न रही।

"अरे बीरबल ये कौनसी माता थीं तुम्हारी, ये क्या कर दिया?"

अकबर ने जब रोते हुए पूछा तो बीरबल ने जवाब दिया, 

"हुजूर ये माता नहीं, पिता जी थे...तुलसी तो मैया थीं, माता होने के नाते क्षमाशील थीं, उन्होंने आपकी धृष्टता माफ कर दी लेकिन अफसोस पिताजी नहीं कर पाये!"

असहनीय कष्ट से मुक्ति का उपाय भी बीरबल ने जो बताया और बादशाह ने 'मरता क्या न करता' वाली हालत में अपनाया, वह था, गाय के ताजे गोबर का पूरे शरीर में लेपन करके रगड़-रगड़ कर नहाना, जिसके बाद ही राहत मिल सकी।

इस गोबर वाले उपाय को आप मज़ाक न समझ लें, यह सच में काम करता है। मुझे प्रायमरी स्कूल के समय की एक घटना याद है जहाँ स्कूल में किसी ने कुछ बच्चों की बैठने वाली जगह पर यह केवाँच लगा दी थी और मेरा व मेरी सहेली का छोटा भाई उसकी चपेट में आ गये थे। दोनों छोटे बच्चे बुरी तरह से रोते हुए घर लाये गये थे, और दोनों को सहेली की माँ ने इसी तरीक़े से नहला कर ठीक किया था!🤗🤗

संलग्न चित्रों में देखें एक बार, कितना सुन्दर सलोना रूप है इसकी फलियों का! सुनहरी छटा कितनी ध्यानाकर्षक है, फूल भी कितने सुन्दर हैं। लेकिन गुण! बाबा रे बाबा! कोई इसका शिकार न बने!🙅🙅

हिन्दी में केवाँच, कौंच या कपिकच्छु के नाम से जानी जाने वाली यह, सेम और मटर वाली फैबेसी (Fabaceae) फैमिली की एक फलीदार बेल है जिसका वानस्पतिक नाम मुकुना प्रुरिएंस (Mucuna pruriens) है।

वैसे तो इसका मूल उद्गम दक्षिणी चीन और पूर्वी भारत है, जहाँ इसे हरी सब्जी के रूप में उगाया जाता था। अब यह अफ्रीका, उष्णकटिबन्धीय एशिया, कैरिबियन, दक्षिण अमेरिका और प्रशान्त द्वीपों में व्यापक रूप से फैल गया है, जहाँ यह प्राकृतिक रूप से भी उगता है और उपयोग के लिए खेती भी की जाती है। भारत में यह सूखे पथरीले जंगलों, झाड़ियों और मैदानी इलाकों में जंगली तौर पर उगता पाया जाता है।

यह वास्तव में एक वार्षिक चढ़ने वाली बेल होती है, जिसकी लम्बाई 15-20 फुट तक हो सकती है। इसके पत्ते सेम फली के पत्तों की तरह ट्राईफोलिएट यानी तीन पत्तियों के समूह में होते हैं। फूल सफेद, गुलाबी या बैंगनी, और फलियाँ मोटी गूदेदार होती हैं, जो भूरे या सुनहरे काँटेदार रोमों यानी ट्राइकोम्स से ढँकी रहती हैं। इसके बीज चमकदार काले या भूरे रंग के होते हैं।

यह केवाँच खतरनाक इस कारण से है कि फलियों और पत्तियों पर मौजूद ट्राइकोम्स में मुकुनेन (mucunain) नामक प्रोटीन और सेरोटोनिन होते हैं, जो त्वचा से सीधे सम्पर्क होने पर तीव्र खुजली, लालिमा, सूजन और फफोले जैसे लक्षण पैदा करते हैं और आसानी से ठीक नहीं होते।

इसके कच्चे बीजों के सेवन से भी विषाक्तता हो सकती है, जिसके कारण उल्टी, पाचनतंत्र में गड़बड़ी या अन्य समस्याएँ सामने आ सकती हैं।

लेकिन इसकी फली और बीजों से मिलने वाले लाभ की बात करें, तो इसके बीजों में एल-डोपा (L-DOPA) प्रचुर मात्रा में होता है, जो पार्किंसन रोग के इलाज में उपयोगी है।

साथ ही यह पौरुष दुर्बलता, तंत्रिका विकार, अवसाद, मूड स्विंग, शरीर में किसी भी कारण से आयी सूजन कम करने और कामोद्दीपक के रूप में काम करता है। 
लम्बे समय से आयुर्वेद में कौंच पाक प्रसिद्ध है जिसे शरीर के वात और पित्त दोष सन्तुलित करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है वह इसी केवाँच के बीजों से बनाया जाता है। यह मांसपेशियों को आराम देता है, रक्त प्रवाह बढ़ाता है, साथ ही साँप के काटने पर भी उपयोगी है।

उपयोग से पहले बीजों को भूनकर, उबालकर या किसी अन्य विधि से संसाधित यानी प्रोसेस करना जरूरी है ताकि इसकी विषाक्तता दूर हो जाये। आयुर्वेदिक दवाओं में इसे पाउडर या अर्क के रूप में उपयोग किया जाता है, जैसे फ़ूड सप्लीमेंट्स वगैरह में।

पार्किंसन के उपचार के लिए डॉक्टर की सलाह से ही इसकी निश्चित मात्रा ली जानी चाहिए। भोजन में आटे या सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है, किन्तु जिन्हें लिवर या किडनी सम्बन्धित समस्या हो, उन्हें और गर्भवती, स्तनपान कराने वाली स्त्रियों को इसके प्रयोग से बचना चाहिए, ऐसा आयुर्वेद के वैद्य सलाह देते हैं।

यदि अनजाने में या दुर्घटनावश केवाँच के रोम लगने से तेज खुजली हो तो प्रभावित स्थान को सौम्य साबुन और पानी से धोना चाहिए और साफ सूखे कपड़े से हल्के हाथों से पोंछकर कैलेमाइन लोशन या हाइड्रोकोर्टिसोन क्रीम लगाना चाहिए।

अधिक गम्भीर स्थिति होने पर एण्टीहिस्टामाइन लेना चाहिए जो गोली, सिरप, स्प्रे और ड्रॉप के रूप में मेडिकल स्टोर में उपलब्ध होते हैं। किसी भी स्थिति में नाखूनों से खुजलाने या खरोंचने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे संक्रमण और बढ़कर समस्या गम्भीर कर सकती है।

जान लीजिए कि दोधारी तलवार की तरह है यह केवाँच, एक तरफ इतनी सुन्दर, पौष्टिक और उपयोगी, वहीं दूसरी ओर इतनी भयंकर और ख़तरनाक! इसके साथ सावधानी से डील करने की जरूरत है, समझ लें!😊😊

क्या आपने भी इसे कभी कहीं देखा है या आपका भी इससे कभी पाला पड़ा है? या आपने भी इसकी कभी सब्जी खायी है? या फिर यह आपके लिए बिल्कुल नयी चीज है?
जो भी हो, इससे सम्बन्धित अपने अनुभवों और राय से मुझे अवगत करवाइयेगा। साथ ही आपको आलेख में दी गयी जानकारी यदि अच्छी लगी हो तो कमेंट और शेयर द्वारा मेरा उत्साहवर्धन भी अवश्य कीजियेगा! आपका दिन शुभ हो!🙏🙏💐💐
__________________________________________
©𝓝𝓮𝓮𝓵𝓪𝓶 𝓢𝓸𝓾𝓻𝓪𝓫𝓱 नीलम सौरभ रायपुर, छत्तीसगढ़
__________________________________________
https://www.facebook.com/share/1Cy5mHgebW/

वयं राष्ट्रे जागृयाम 

हमारे गौरवशाली जाति वर्ण के स्वावलंबी वीरों को " दलित " घोषित कर "आरक्षण की बैसाखियों" के लोभ में पंगु बना दिया।

हिंदू खटीक जाति - एक धर्माभिमानी समाज की उत्पति, उत्थान एवं पतन का इतिहास।

एक हिन्दू। श्रेष्ठ हिन्दू।।

खटीक जाति मूल रूप से वो ब्राह्मण जाति है, जिनका काम आदि काल में याज्ञिक पशु बलि देना होता था। आदि काल में यज्ञ में बकरे की बलि दी जाती थी। संस्कृत में इनके लिए शब्द है, 'खटिटक'।

मध्यकाल में जब क्रूर इस्लामी अक्रांताओं ने हिंदू मंदिरों पर हमला किया, तो सबसे पहले खटिक जाति के ब्राह्मणों ने ही उनका प्रतिकार किया। राजा व उनकी सेना तो बाद में आती थी, उससे पहले मंदिर परिसर में रहने वाले खटीक ही उनका मुकाबला किया करते थे। 

तैमूरलंग को दीपालपुर व अजोधन में खटीक योद्धाओं ने ही रोका था और सिकंदर को भारत में प्रवेश से रोकने वाली सेना में भी सबसे अधिक खटीक जाति के ही योद्धा थे। तैमूर खटीकों के प्रतिरोध से इतना भयाक्रांत हुआ कि उसने सोते हुए हजारों खटीक सैनिकों की हत्या करवा दी और 1,00,000 सैनिकों के सिर का ढेर लगवाकर उस पर रमजान की तेरहवीं तारीख पर नमाज अदा की।

मध्यकालीन बर्बर दिल्ली सल्तनत में गुलाम, तुर्क, लोदी वंश और मुगल शासनकाल में जब अत्याचारों की मारी हिंदू जाति मौत या इस्लाम का चुनाव कर रही थी, तो खटीक जाति ने अपने धर्म की रक्षा और बहू बेटियों को मुगलों की गंदी नजर से बचाने के लिए अपने घर के आसपास सूअर बांधना शुरू किया।

इस्लाम में सूअर को हराम माना गया है। मुगल तो इसे देखना भी हराम समझते थे और खटीकों ने मुस्लिम शासकों से बचाव के लिए सूअर पालन शुरू कर दिया। उसे उन्होंने हिंदू के देवता विष्णु के वराह (सूअर) अवतार के रूप में लिया। मुस्लिमों की गौहत्या के जवाब में खटीकों ने सूअर का मांस बेचना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे यह स्थिति आई कि वह अपने ही हिंदू समाज में पद्दलित होते चले गए। कल के शूरवीर ब्राहण आज अछूत और दलित श्रेणी में हैं।

1857 की लडाई में, मेरठ व उसके आसपास अंग्रेजों के पूरे के पूरे परिवारों को मौत के घाट उतारने वालों में खटीक समाज सबसे आगे था। इससे गुस्साए अंग्रेजों ने 1891 में पूरी खटीक जाति को ही वांटेड और अपराधी जाति घोषित कर दिया।

जब आप मेरठ से लेकर कानपुर तक 1857 के विद्रोह की कहानी पढेंगे, तो रोंगटे खडे हो जाए्ंगे। जैसे को तैसा पर चलते हुए खटीक जाति ने न केवल अंग्रेज अधिकारियों, बल्कि उनकी पत्नी बच्चों को इस निर्दयता से मारा कि अंग्रेज थर्रा उठे। क्रांति को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने खटीकों के गाँव के गाँव को सामूहिक रूप से फांसी दे दिया गया और बाद में उन्हें अपराधी जाति घोषित कर समाज के एक कोने में ढकेल दिया।

स्वतंत्रता से पूर्व जब मोहम्मद अली जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन की घोषणा की थी तो मुस्लिमों ने कोलकाता शहर में हिंदुओं का नरसंहार शुरू किया, लेकिन एक-दो दिन में ही पासा पलट गया और खटीक जाति ने मुस्लिमों का इतना भयंकर नरसंहार किया कि बंगाल के मुस्लिम लीग के मंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि हमसे भूल हो गई।

बाद में, इसी का बदला मुसलमानों ने बंग्लादेश में स्थित नोआखाली में लिया। आज हम आप खटीकों को अछूत मानते हैं, क्योंकि हमें उनका सही इतिहास नहीं बताया गया है, उसे दबा व साजिशन छुपा दिया गया है।

दलित शब्द का सबसे पहले प्रयोग अंग्रेजों ने 1931 की जनगणना में 'डिप्रेस्ड क्लास' के रूप में किया था। उसे ही बाबा साहब अंबेडकर ने अछूत के स्थान पर दलित शब्द में तब्दील कर दिया। इससे पूर्व पूरे भारतीय इतिहास व साहित्य में 'दलित' शब्द का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है। मुस्लिमों के डर से अपना धर्म नहीं छोड़ने वाले, हिंसा और सूअर पालन के जरिए इस्लामी आक्रांताओं का कठोर प्रतिकार करने वाले एक शूरवीर ब्राहमण खटीक जाति को आज दलित वर्ग में रखकर अछूत की तरह व्यवहार किया और आज भी किया जा रहा है।

भारत में 1000 ईस्वी में केवल 1% अछूत जाति थी, लेकिन मुगल वंश की समाप्ति होते-होते इनकी संख्या 14% हो गई। आखिर कैसे ?

सबसे अधिक इन अनुसूचित जातियों के लोग आज के उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य भारत में है, जहाँ मुगलों के शासन का सीधा हस्तक्षेप था और जहाँ सबसे अधिक धर्मांतरण हुआ। आज सबसे अधिक मुस्लिम आबादी भी इन्हीं प्रदेशों में है, जो धर्मांतरित हो गये थे।

डॉ सुब्रहमनियन स्वामी लिखते हैं - ''अनुसूचित जाति उन्हीं बहादुर ब्राह्मण व क्षत्रियों के वंशज है, जिन्होंने जाति से बाहर होना स्वीकार किया, लेकिन मुगलों के जबरन धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया। आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए, उन्हें कोटिश: प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उन लोगों ने हिंदू के भगवा ध्वज को कभी झुकने नहीं दिया, भले ही स्वयं अपमान व दमन झेला।''

प्रोफेसर शेरिंग ने भी अपनी पुस्तक 'हिंदू कास्ट एंड टाईव्स' में स्पष्ट रूप से लिखा है कि - "भारत के निम्न जाति के लोग कोई और नहीं, बल्कि ब्राह्मण और क्षत्रिय ही हैं।" स्टेनले राइस ने अपनी पुस्तक "हिन्दू कस्टम्स एण्ड देयर ओरिजिन्स" में यह भी लिखा है कि - "अछूत मानी जाने वाली जातियों में प्रायः वे बहादुर जातियां भी हैं, जो मुगलों से हारीं तथा उन्हें अपमानित करने के लिए मुसलमानों ने अपने मनमाने काम करवाए थे।"

यदि आज हम बचे हुए हैं तो अपने इन्हीं अनुसूचित जाति के भाईयों के कारण जिन्होंने नीच कर्म करना तो स्वीकार किया, लेकिन इस्लाम को नहीं अपनाया।

धन्य हैं हमारे ये भाई जिन्होंने पीढ़ी-दर-पीढ़ी अत्याचार और अपमान सहकर भी हिन्दुत्व का गौरव बचाये रखा और स्वयं अपमानित और गरीब रहकर भी हर प्रकार से भारतवासियों की सेवा की। हमारे अनुसूचित जाति के भाइयों को पूरे देश का प्रणाम।

नेहरू-गांधी कांग्रेस ने हमें जाति के ऐसे जन्जाल मे फंस दिया गया है कि निकलने की कोशिश पर भी नही निकल पा रहे। परन्तु सत्य यही है कि हमें निकलना ही होगा। जहां चाह, वहां राह!!!
साभार : 
1. हिंदू खटिक जाति : एक धर्माभिमानी समाज की उत्पत्ति, उत्थान एवं पतन का इतिहास, लेखक डॉ.विजय सोनकर शास्त्री, प्रभात प्रकाशन।
2. आजादी से पूर्व कोलकाता में हुए हिंदू-मुस्लिम दंगे में खटीक जाति का जिक्र, पुस्तक 'अप्रतिम नायक - श्यामाप्रसाद मुखर्जी' में है। यह पुस्तक भी प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है।

नमन् वंदन 🙏
हमारे गौरवशाली जाति वर्ण की एकता और वीरता को अंग्रेजों ने छद्म इतिहास कानून और स्वार्थी गांधी नेहरू की मदद से आज ऊंच नीच छूत अछूत और स्वाभीमान स्वावलंबी वीरों को " दलित " घोषित कर आरक्षण की बैसाखियों के लोभ में पंगु बना दिया।

Monday, 16 February 2026

दाढ़ी का वैशिष्ट्यावाद

दाढ़ी की ख़ासियत यह है कि उसे उगाने या बढ़ाने मे कोई हाथ पाँव नहीं हिलाने पड़ते। वो खतपतवार की तरह अपने आप उगती है। इसलिये दाढ़ी बढ़ाना जैसे वाक्य तकनीकी रूप से सही नही है। पर कुछ लोग इसे लगातार हटाते रहते है तो कुछ और कुछ काम ना होने पर इससे ही उलझे रहते है। दाढ़ी बढ़ाने वालो की ज़िंदगी मे ऐसे साढ़े तीन हज़ार घंटे और जुड़ते है जो उन्होंने दाढ़ी ना बना कर बचाये होते हैं। ऐसे लोग उसे कुछ दूसरे फ़ालतू कामों में ज़ाया करते है जबकि ऐसा करने वाले रिकार्ड बना जाते है ।उन्नीस सौ सत्ताईस मे नार्वे के एक साढ़े चार फुट के सज्जन की दाढ़ी जब नापी गई तो वो पाँच मीटर की निकली। दाढ़ी इकलौता मामला है जिसमें महिलायें पुरूषों को मात नहीं दे सकी है अब तक। जहाँ तक रिकार्ड की बात है तो महिलाओ की सबसे लंबी दाढ़ी केवल तीस सेन्टीमीटर की थी।

दाढ़ी को मर्दानगी से कब जोड़ दिया गया यह तो पता नहीं ,पर चूँकि आमतौर पर मर्दों के चेहरे पर ही ऊगती रही है। शायद इसलिये हुआ होगा ऐसा ,मर्दानगी जुड़ी सत्ता से ,और शायद इसलिये यूरोप मे एक वक्त ऐसा आया जब वहाँ की रानियों ने नक़ली दाढ़ियाँ लगाई और इस तरह अपनी मर्दानगी ज़ाहिर की। हमने खुद अपनी एक रानी को मर्दानी कहा। हालाँकि वे दाढ़ी नहीं लगाती थी।पर वो खूब लड़ी और अपना नाम कर गई।

रूस के पीटर द ग्रेट को अपने अलावा और किसी का दाढ़ी रखना पसंद नहीं था। इसलिये उसने प्रति दाढ़ी सौ रूबल का सालाना टैक्स लगा दिया था। दाढ़ी प्रेमियों ने फिर भी दाढ़ी रखना नहीं छोड़ा ,पर इसी बहाने सरकारी ख़ज़ाना भरा और पीटर की दाढ़ी और लंबी और खुशहाल हुई।

पर दाढ़ी पहचान भी बनती ही है इंसान की। अरस्तू को लोगों ने उनकी दाढ़ी की वजह से सुना। टैगोर की दाढ़ी ने उनके अंदर के कवि को निखारा। ईसा मसीह ने भी सराहा इसे और मार्क्स और लेनिन ने भी इसे तवज्जो दी । इब्राहीम लिंकन पहले दाढ़ी रखते नहीं थे ,पर एक बच्ची के सुझाव पर उन्होंने ऐसा करना शुरू किया। दाढ़ी रखते ही वे थोड़े बहुत दर्शनीय हो गये ,अमेरिकियो को तो वो इतने पसंद आए कि उन्हें राष्ट्रपति चुन लिया।

हमारे यहाँ के बहुत से लोग अपनी और देश की अर्थव्यवस्था से ज्यादा अपनी दाढ़ी की चिंता करते हैं। और ऐसा इसलिये है क्योंकि दाढ़ी को सजा संवार कर रखने वाले मर्द लड़कियों को ज़्यादा भाते है। वैसे तितर-बितर ,निराश दाढ़ी के पीछे भी कोई लड़की ही छुपी होती है। ज़ाहिर है हिंदुस्तान की नब्बे फ़ीसदी दाढ़ियों की वजह भी लड़कियाँ ही है। वे ना होती तो दाढ़ियों को कोई पूछने वाला ना होता।

रोज दाढ़ी छीलने वाले ,कभी भी दढ़ियलों की बराबरी नहीं कर सकते। उनकी गिनती नाबालिगों मे होती है। छिले हुए अंडे माने जाते है वो ,और उन्हें देखते ही झुके कंधों वाले सरकारी बाबू याद आते हैं। पर शुक्र है भगवान का कि ऐसे लड़के अब सरकारी नौकरियों की ही तरह ग़ायब होते जा रहे हैं। 

दाढी रखने वाले उसे सजाने संवारने पर ढेरों रूपये भी खर्च करते हैं। हर गली के नुक्कड़ पर खुले ब्यूटी सेलूनों के पेट भी दाढ़ी वालो की वजह से ही पल रहे हैं। उन्होंने दाढ़ी को रखने की ,उसे तराशने के इतने सारे तरीक़े और क़िस्में इजाद कर डाली है कि कुत्ते और गुलाबों की क़िस्में पीछे छूट गई है।

पुराने जमाने मे चोरों की बिरादरी की आचार संहिता के मुताबिक़ हर चोर को अपनी दाढ़ी में तिनका रखना ज़रूरी होता था। पर यह बात पुलिस वालो को भी पता चल गई। ऐसे मे चतुर चोरों ने अपनी दाढ़ी मे तिनका रखना बंद कर दिया। पर पुलिस तक यह बात पहुँच नहीं सकी। पुलिस सुधार हो नहीं सके बरसों से ऐसे में वो आज भी पुराने ढर्रे पर चल रही है। वो मौक़ा मिलते ही किसी भी दाढ़ी मे हाथ डाल देती है। तिनका तलाशती है ,और तिनका मिलते ही उसे जेल मे डालकर अपनी ड्यूटी पूरी कर लेती है। पुलिस बहुत बार अपनी तरफ से भी तिनके डाल दिया करती है दाढ़ियों मे। ऐसे में दाढ़ी रखने वाले को चाहिये कि घर से निकलने के पहले अपनी दाढ़ी की अच्छी तरह जाँच पड़ताल कर ले।और जब भी निकलें पुलिस से वाजिब दूरी बनाए रखें। 

तिनका हो और उस तक कोई पहुँच ना सके तो आपको कुछ भी करने की पूरी छूट होती है। पहले के जमाने मे लोगों के पास दाढ़ी बढ़ाने की यह एक माकूल वजह थी। दाढ़ी उन्हें ऋषि मुनि ,दार्शनिक वाला लुक देती थी। ऐसा करते ही दूसरे लोग उनकी इज़्ज़त करने लगते थे। उस जमाने मे भी दाढ़ी लुच्चों को सारे धतकरम करने की सुविधा प्रदान करती थी। और दाढ़ी अपनी यह ज़िम्मेदारी आज भी निभा रही है।

दाढ़ी झुर्रियों के साथ नियत भी छुपा लेती है। लड़कों को तो हैंडसम और स्मार्ट बनाती ही है ,बुजुर्गों को भी कन्याओं के सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद देने का मौक़ा उपलब्ध कराती है। दाढ़ी ,रखने वाले के व्यक्तित्व को गरिमामय बनाती है। लोग उन पर भरोसा करने लगते हैं। दाढ़ी रखते ही चोरों की गिनती साहूकारों मे होने लगती है। दाढी आपको रौबदार ,चतुर और विचारक दिखा सकती है। यह दाढ़ी का ही प्रताप है कि आप कितनी भी लंबी लंबी छोड़े ,लोग आपकी तरफ़ ध्यान देने पर मजबूर हो जाते है। आप लोगों को अपनी दाढ़ी मे उलझा कर उनका ध्यान बटा सकते है और फिर वो सब कुछ कर सकते है जो करना चाहते हैं।

दाढ़ी से जनता प्रभावित होती क्यों है ? दरअसल दाढ़ी प्रतीक है,ज्ञान,विद्रोह,शक्ति ,गंभीरता ,रचनात्मकता और आध्यात्मिकता की। ऐसे में दाढ़ी को नमस्कार किया जाता है। दाढी कामयाबी की सीढ़ी है। दाढ़ी रखने के और भी सैकड़ों फ़ायदे है ,ऐसे मे मेरी सलाह यही है आपको। यदि अब तक दाढ़ी रखी नहीं है तो अब रख लें। ज़माना दाढ़ी का ही रहा है हमेशा से और हमेशा बना रहेगा ये तय है। 

इस दाढ़ी चर्चा की वजह भी जान लें अब। मेरे दोस्त ओमप्रकाश श्रीवास्तव आजकल सपत्नीक नर्मदा परिक्रमा कर रहे है। इस दौरान उन्होंने अपनी दाढ़ी को बढ़ने की पूरी छूट दे रखी है। बढ़ती दाढ़ी विद्वान ओपी के व्यक्तित्व को आदरणीय टाईप बनाने में भरसक मदद कर रही है।और बढ़ती दाढ़ी की वजह से ही उनके चरण स्पर्श करने वालो की गिनती भी बढ़ती जा रही है। मुझे इस बात पर पूरा यकीन है कि आईएएस रहे ओपी बहुत जल्दी मशहूर बाबाओं की फ़ेहरिस्त में सिरमौर होंगे ,और इसका थोड़ा सा क्रेडिट उनकी फहराती लहराती भव्य दाढ़ी के खाते मे भी होगा। 

मुकेश नेमा
दाढ़ी का वैशिष्ट्यावाद- शानदार सर 
श्रीवास्तव सर साधुमना तो हमेशा से ही थे,
अब पूर्णतः साधु हो गए - आर सी त्रिवेदी 

सर,सादर नमस्ते। दाढ़ी पर आपका यह आलेख बहुत सुंदर है।आपको इस आलेख के लिए दाढ़ी पर बहुत लम्बे समय तक शोध करना पड़ा होगा। यह आलेख व्यंग्य के रूप में वर्तमान सामाजिक,राजनीतिक परिवेश पर एक करारा तमाचा है।सादर।🙏😊🌷 अखिलेश सिंह 

इतने विकट मिशन में धर्मपत्नी का साथ भी मिल गया यह ज्यादा आश्चर्यजनक और सम्मानजनक है🤣 इस दाढ़ी बढ़ाने का एक कारण यह भी हो सकता है कि पुराने लोग पहचान ना सके जो सिर्फ काम के लिए आते थे और नए लोगों से मिलना हो जाए,🙏 पंकज 

Saturday, 14 February 2026

महाशिवरात्रि शिव- साधना , उपवास और आत्मशुद्धि का महान् परात्पर पर्व

॥ॐ॥ 
महाशिवरात्रि शिव- साधना , उपवास और आत्मशुद्धि का महान् परात्पर पर्व
 ================================
 आशुतोष महादेव की उपासना और फलस्वरूप सद्य:फल प्राप्ति का पर्व और व्रत महाशिवरात्रि है।इस वर्ष महाशिवरात्रि का पर्व 15 फरवरी 2026 रविवार को है। देवाधिदेव महादेव की उपासना अत्यन्त प्राचीन है। मंगल- मूर्ति शिव का स्वरूप लोक-मंगल स्वरूप हैं। यद्यपि उनकी प्रसिद्धि प्रलयंकर के रूप में भी है, किन्तु शिव का यह आगमिक रूप लोकाभिमत नहीं हो पाया। इसीलिए शिव की उपासना आदि काल से लोकदेवता और लोकगुरु के रूप में सदैव एवं सर्वत्र होती रही है। इसमें कभी पूर्व और पश्चिम तथा उत्तर और दक्षिण का भेद नहीं रहा।मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के उत्खनन में योगस्थ ध्यानमग्न शिव प्रतिमा प्राप्त हुई है। शिव परम योगीश्वर और आदियोगी कहे जाते हैं।वैदिक काल में शिव की पूजा रुद्र के रूप में होती थी। कालान्तर में रुद्र का स्वरूप शिव के रूप में क्रमशः कैसे बदलता गया ,यह उपनिषदों, आरण्यकों,ब्राह्मण ग्रन्थों,वाल्मीकि रामायण और महाभारत से स्पष्ट होता है। उपनिषदों में कहा गया है कि शिव ही जगत् के आदि कारण हैं और वही परब्रह्म हैं।             
  तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम्।
पतिं पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम्।  
श्वेता० उपनिषद् 3/4।          
महाप्रलय रूप समाधि में अद्वितीय और एकमात्र रुद्र ही थे-
एको हि रुद्र न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाॅल्लोकानीशत ईशनीभि:।
श्वेता ०3/2
तैत्तिरीय आरण्यक में रुद्र को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सर्व व्यापी और सर्वगुण बताते हुए कहा गया है कि -
सर्वो वै रुद्रस्तस्मै रुद्राय नमो अस्तु।
10/16
         महाशिवरात्रि -व्रत को नित्य और काम्य दोनों प्रकार का व्रत माना गया है ।प्रति वर्ष इस व्रत को करने पर यह नित्य व्रत की श्रेणी में और जब किसी विशिष्ट कामना की पूर्ति हेतु किया जाता है ,तब यह काम्य व्रत कहा जाता है ।ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के अर्धरात्रिमें ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य हुआ था, इसलिए इसे शिव की महारात्रि कहा जाता है ।कुछ विद्वानों के अनुसार महाशिवरात्रि के अर्धरात्रि को शिव और पार्वती दोनों गार्हस्थ जीवन में प्रवेश किये थे, इसलिए इसे महाशिवरात्रि कहा जाता है और शिवार्चन में इसका सर्वाधिक महत्त्व है।
महाशिवरात्रि के व्रत के काल के सम्बन्ध में शास्त्रकारों पर्याप्त मतभेद है। कुछ विद्वान् प्रदोष व्यापिनी चतुर्दशी पर बल देते हैं तो कुछ निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी पर जोर देते हैं। वैसे चतुर्दशी अर्धरात्रि के पूर्व और उपरान्त भी रहे तो अति उत्तम है।
महाशिवरात्रि की पूजा का संकल्प शिव पुराण में इस प्रकार बताया गया है-
देव देव महादेव नीलकण्ठ नमोsस्तु ते ।
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव ।
तव प्रभावाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति ।
कामाद्याः शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि ।।
उपर्युक्त संकल्प करके शिवलिंग के पास जाकर विधि विधान से शिवजी की आराधना पूजा करे ।
यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है कि शिवजी को जलधारा अत्यन्त प्रिय है, अस्तु शिवजी की पूजा में शिवलिंग का जलाभिषेक अवश्य करे ।
जलधारा प्रियो शिव: । ऋग्वेद 7/35/6 में रुद्र को जलधारा प्रिय कहा गया है -शं नो रुद्रो रुद्रेभिर्जलाष : ।शिवजी को जलाभिषेक चाँदी या तांबे के पात्र से करें ।खडे होकर जलाभिषेक करना उचित नहीं है ।शिवजी को विल्वपत्र और धतूरे का फल अत्यन्त प्रिय है ।अतः शिवार्चन में श्वेत अर्क पुष्प, बिल्वपत्र और धतूरे का फल अवश्य चढाना चाहिए ।
भगवान् शिव आदि देव हैं । देवाधिदेव महादेव हैं । आशुतोष हैं।शिवजी के समस्त उपासना और अर्चना प्रकारों में शिवरात्रि के दिन उपवास , जागरण और पूजा का अतिशय एवं विशेष महत्त्व है।शिवप्रिया रात्रिःइति शिवरात्रिः अर्थात् जो रात्रि शिवजी को सर्वाधिक प्रिय हो।इसे शिव चतुर्दशी भी कहते हैं । स्कन्द पुराण में कहा गया है कि यदि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी रविवार या मंगलवार को पडे तो शिवरात्रि व्रत का महत्त्व और अधिक बढ जाता है ।ईशान संहिता में भगवान् शिव का वचन है -
फाल्गुने कृष्णपक्षस्य या तिथिः स्याच्चतुर्दशी ।
तस्यां या तामसी रात्रिः सोच्यते शिवरात्रिका ।।
तत्रोपवासं कुर्वाणः प्रसादयति मां ध्रुवम् ।
न स्नानेन न वस्त्रेण न धूपेन न चार्चया।
तुष्यामि तु तथा पुष्पैर्यथा तत्रोपवासतः ।।
इस प्रकार स्पष्ट है कि शिवरात्रि पूजा का प्रधान अङ्ग उपवास ही है ।
इसके अतिरिक्त ईशान संहिता में शिवरात्रि के दिन शिव की चार मूर्तियों ईशान, अघोर,वामदेव और सद्योजात मूर्ति को क्रमशः दुग्ध, दधि, घृत और मधु से स्नान कराने का महत्त्व वर्णित है ।शंकर जी की पूजा के समय मस्तक पर भस्म लेपन और गले में रुद्राक्ष की माला अवश्य धारण करना चाहिए । शिवपुराण विश्वेश्वर संहिता 25/47 में कहा गया है कि शिवजी की आज्ञा है कि सभी आश्रमों एवं वर्णों तथा स्त्री और शूद्रों को सदैव रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। सर्वाश्रमाणां वर्णानां स्त्रीशूद्राणां। शिवाज्ञया धार्या: सदैव रुद्राक्षा:। यदि कोई शिव साधक भस्म का त्रिपुण्ड धारण करता है ,तब उसे सब तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त हो जाता है।कालाग्निरुद्रोपनिषद् में तो यहां तक कहा गया है कि भस्म से त्रिपुण्ड धारण करने वाले को सभी वेदों के अध्ययन का फल मिलता है।               
  शिवार्चन में सर्वप्रथम श्री गणेश पूजन और गौरी स्मरण करना चाहिए। शिवजी को कनेर, मौलसिरी , धतूरा,मदार, चमेली,कमल,शमी, नागकेसर,मगर,बेला ,पलाश,केसर, गूलर आदि के पुष्प प्रिय हैं। इसी प्रकार शिव पूजा में निषिद्ध पुष्पों में केतकी,शिरीष,कुंद,जूही ,कपास और सेमल के पुष्प मुख्य हैं। वैसे त्रिदल अर्थात् विल्व पत्र का शिवार्चन में सर्वाधिक महत्त्व शास्त्रों में अनेकशः वर्णित है। शिवपुराण में आठ नाम मन्त्रों द्वारा शंकर जी को पुष्प समर्पित करने का निर्देश है - शिव के वे आठ नाम हैं - भव ,शर्व, रुद्र,पशुपति, उग्र, महान्,भीम और ईशान।पूजा के अन्त में शिवलिंग के समक्ष साष्टांग लेट कर प्रार्थना करनी चाहिए और क्षमा मांगनी चाहिए ।
शिवरात्रि व्रत को सर्वपाप- प्रणाशक और भुक्ति -मुक्ति को देने वाला बताया गया है ।
शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापप्रणाशनम् 
आचाण्डालमनुष्याणां भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ।।
शिवरात्रि व्रत करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता ।
गरुडपुराण में भी कहा गया है कि 
चतुर्दश्यां निराहारो भूत्वा शम्भो परेsहनिभोक्ष्येsहं भुक्तिमुक्त्यर्थं शरणं मे भवेश्वर।
अब यहाँ प्रश्न यह है कि उपवास क्या है? 
उपवास शब्द की व्युत्पत्ति उप + वस + घञ् से होती है ।
उपवास का धातुमूलक अर्थ किसी के समीप रहना है ।अतः यहाँ उपवास का अर्थ शिव के समीप रहने से है ।
अग्निपुराण में उपवास का अर्थ बताते हुए लिखा है कि पापों से उपावृत अर्थात् निवृत्त होकर ,सभी प्रकार के भोगो का त्याग करते हुए जो सद्गुणों के साथ वास करता है , उसको उपवास कहते हैं ।उपवास करने वाले व्यक्तियों को बहुत से कार्य और वस्तुओं जैसे मांस, शहद , नमक,पराया अन्न,मैथुन, मसूर, चना , सुगन्ध, अंगराग, पान, शाक , लोभ , क्रोध आदि का त्याग करना चाहिए और सत्य, अहिंसा, शौच, दया, दान , सन्तोष , इन्द्रिय- संयम , क्षमा इन सद्गुणों के साथ रहना चाहिए ।उपवासी को तैलाभ्यंग, दिन में सोना, व्यायाम, लोभ, सुरापान, द्यूतक्रीडा आदि का भी त्याग करना चाहिए ।
भविष्य पुराण में भी उपवास शब्द की निरुक्ति में भी ऐसा ही लिखा है-
उपावृत्तस्य पापेभ्योयश्च वासो गुणैः सह।उपवासः स विज्ञेयः सर्वभोगविवर्जितः ।।
सामान्य रूप से आहार से निवृत्ति को लोग उपवास कहते हैं ।मन , बुद्धि या इन्द्रियों द्वारा जो कुछ भी बाहर से अन्दर आहृत अर्थात् लिया जाता है उसे आहार कहते हैं ।यह आहार स्थूल और सूक्ष्म के भेद से दो प्रकार का होता है।
स्थूल आहार में अन्न आदि और सूक्ष्म आहार में मन आदि एकादश इन्द्रियों द्वारा शब्द, रूप , रस ,गन्ध, स्पर्श और चिन्तन आदि विषय आते हैं ।
इस प्रकार उपवास के दिन उपवासी को स्थूल अन्नादि आहार को त्यागने के साथ साथ मन और वाणी सहित समस्त इन्द्रियों की पवित्रता बनाये रखनी चाहिए ।
शिवरात्रि के दिन शिव के स्वरूप का ध्यान, उनका नाम- जप , पंचाक्षरी मन्त्र नमः शिवाय , षडक्षर मन्त्र ओम् नमः शिवाय का जप करना चाहिए ।शिवरात्रि के प्रथम प्रहर का मन्त्र क्रमशः ह्रीं ईशानाय नमः,द्वितीय प्रहर का मन्त्र ह्रीं अघोराय नमः, तृतीय प्रहर का मन्त्र ह्रीं वामदेवाय नमः और चतुर्थ प्रहर का मन्त्र ह्रीं सद्योजाताय नमः है।
शिवरात्रि व्रत के पारण के विषय में शास्त्रकारो में मतभेद है ।कुछ विद्वानों के अनुसार चतुर्दशी के अन्त में ही पारण करना चाहिए ,जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार व्रत के समाप्ति पर पारण करना उचित है ।
शिवरात्रि व्रत सम्पन्न करने के पश्चात् प्रार्थना और विसर्जन के लिए शिवमहापुराण में अधोलिखित स्तुति बतायी गयी है -
नियमो यो महादेव कृतश्चैव त्वदाज्ञया।
विसृज्यते मया स्वामिन् व्रतं जातमनुत्तमम्।
व्रतेनानेन देवेश यथाशक्तिकृतेन च।
सन्तुष्टो भव शर्वाद्य कृपां कुरु ममोपरि।
शिवरात्रि के व्रत का उद्यापन 12वर्ष या 14 वर्ष के बाद करने का निर्देश है । स्कन्द पुराण में बारह वर्षों तक शिवरात्रि व्रत रखने का फल बताते हुए लिखा है - एवं द्वादशवर्षाणि शिवरात्रिमुपोषक:।यो मां जागरयते रात्रिं मनुज: स्वर्गमारुहेत्। शिवं च पूजयित्वा यो जागर्ति चतुर्दशीम्।
मातु: पयोधररसं न पिबेत् से कदाचन।
नागर खण्ड।
अर्थात् चौदह वर्षों तक रात्रि जागरण सहित शिव रात्रि का व्रत करने वाला स्वर्ग जाता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता।
उद्यापन के समय शिवजी की षोडशोपचार पूजा करके हवन आदि करे और सुवर्ण का दान और गोदान कर ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक भोजन करा कर यथा - शक्ति द्रव्यदान देना चाहिए ।प्रत्येक व्रत में अन्तः शुद्धि और बाह्य शुद्धि, इन्द्रियों का संयम, श्रद्धा और दान ये अनिवार्य अंग माने गये हैं ।
शिवरात्रि के दिन गंगा स्नान का भी शास्त्रों में अतिशय महत्त्व वर्णित है । गङ्गा स्नान हरिद्वार, प्रयागराज या काशी में करने का अवसर मिले तो उसका अनन्त फल होता है। इस समय प्रयागराज में कुम्भ महापर्व के अवसर पर करोड़ों श्रद्धालु गङ्गा और संगम में महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर दिव्य स्नान कर अक्षय पुण्य के भागी होंगे। यदि यह कहा जाय कि शिव - तत्त्व में समस्त सनातन योग - तत्त्व समाहित हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। शिव की इयत्ता का निर्वचन परम दुष्कर है।तप और व्रत ही शिव साधना का अपरिहार्य अंग और शिव प्राप्ति का साधन है।शिव की तपस्या में रत पार्वती जी के शब्दों में -
तप: किलेदं तदवाप्तिसाधनम्।
कुमारसम्भव।
इस प्रकार महाशिवरात्रि के दिन शरीर को स्थूल रूप अन्नादि आहार को त्यागने के साथ साथ सूक्ष्म रूप आहार काम,क्रोध, लोभ ,असत्य भाषण ,परनिन्दा आदि का त्याग करना चाहिए ।व्रती को केवल शिव स्मरण, शिवकीर्तन , शिव विषयक मन्त्रों का जप, शिव सहस्त्रनाम का पाठ,शिवस्तोत्र और रुद्रसूक्त का पाठ करना चाहिए ।
महाशिवरात्रि व्रत से श्रेष्ठ कोई व्रत नहीं है।शिवतत्त्व को आत्मसात करने का यह व्रत परात्पर है। स्कन्द पुराण में स्पष्ट रूप से कहा गया है -
परात् परतरं नास्ति शिवरात्रिपरात् परम्।
सभी पर आशुतोष भगवान भोलेनाथ की कृपा बनी रहे ।
इसी सदिच्छा के साथ 
सादर,
महामहोपाध्याय आचार्य डॉ • सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय
आई•ए•एस• ( सेवानिवृत्त)प्रयागराज

_वयं राष्ट्रे जागृयाम_

शरीर में चंद्रमा की कलाएं के अनुसार कामुकता का विज्ञान

#शरीर चंद्रमा और कामुकता; चंद्रकला और कामुकता का #अद्भुत विज्ञान!
भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में, मानव शरीर को ब्रह्मांड का ही एक सूक्ष्म रूप माना गया है "यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे"(जो शरीर में है, वही ब्रह्मांड में है)। जिस प्रकार आकाश में स्थित चंद्रमा अपनी कलाओं से विशाल समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पन्न करने की शक्ति रखता है, उसी प्रकार वह मानव शरीर के भीतर बहने वाले रसों और भावनाओं को भी गहराई से प्रभावित करता है।
11वीं शताब्दी रचित ग्रंथ रति रहस्य में पंडित कोक्कोक ने इस संबंध को और अधिक स्पष्टता से समझाया। इस ग्रंथ ने यौन संबंधों को केवल शारीरिक आवश्यकता से ऊपर उठाकर एक #मनोवैज्ञानिक_कला का दर्जा दिया। रति रहस्य का सबसे क्रांतिकारी सिद्धांत #चंद्रकला_सिद्धांत है, जो यह बताता है कि स्त्री की कामुकता स्थिर नहीं होती, बल्कि चंद्रमा की गति के साथ शरीर के विभिन्न अंगों में भ्रमण करती है।
आधुनिक दौर में, जहाँ रिश्ते अक्सर तनाव और यांत्रिक जीवनशैली का शिकार हो रहे हैं, यह प्राचीन विज्ञान हमें अपने साथी को बेहतर समझने और दांपत्य जीवन में नवीनता लाने का एक अद्भुत मार्ग दिखाता है। इस लेख में, हम रति रहस्य के उसी दुर्लभ ज्ञान, चंद्रकला और मर्मस्थानों(erotic zone) के रहस्य को विस्तार से जानेंगे।

#रति_रहस्य के अनुसार, कामदेव (कामुकता) का वास स्त्री के शरीर में एक जगह नहीं रहता। यह चंद्रमा की कलाओं (तिथियों) के अनुसार, शरीर के अंगों में ऊपर चढ़ता और नीचे उतरता है। इसे दो पक्षों में विभाजित किया गया है।
#शुक्ल_पक्ष जब चाँद बढ़ता है (अमावस्या से पूर्णिमा तक), तो कामुकता पैरों से शुरू होकर सिर की ओर चढ़ती है।
#कृष्ण_पक्ष जब चाँद घटता है (पूर्णिमा से अमावस्या तक), तो कामुकता सिर से शुरू होकर पैरों की ओर उतरती है।

रति रहस्य में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि किस तिथि को कामुकता (कास-वास) किस अंग में होती है। इसे जानकर आप रति-क्रीड़ा को अधिक प्रभावी बना सकते हैं।
#शुक्ल_पक्ष(बढ़ता चाँद नीचे से ऊपर)
#प्रतिपदा पैर का अंगूठा
शुरुआत यहाँ से होती है।
#द्वितीया तलवे/पंजे
मालिश या गुदगुदी से आनंद मिलता है।
#तृतीया टखने (Ankles)
यहाँ स्पर्श संवेदनशील होता है।
#चतुर्थी घुटने (Knees)
घुटनों के पीछे का हिस्सा।
#पंचमी जांघें (Thighs)
यह एक प्रमुख कामुक क्षेत्र है।
#षष्ठी नाभि (Navel)
यहाँ चुंबन या स्पर्श गहरा असर करता है।
#सप्तमी कटि/कमर (Waist)
आलिंगन का महत्व बढ़ जाता है।
#अष्टमी वक्षस्थल/छाती
स्पर्श और मर्दन के लिए उपयुक्त।
#नवमी कक्षा/बगल (Armpits)
यहाँ गुदगुदी या चुंबन उत्तेजक होता है।
#दशमी कंठ/गला (Throat)
गले पर चुंबन (Love bites) का दिन।
#एकादशी गाल (Cheeks)
कोमल स्पर्श और चुंबन।
#द्वादशी होंठ (Lips)
गहरा चुंबन (Deep Kissing)।
#त्रयोदशी आँखें (Eyes)
पलकों पर चुंबन।
#चतुर्दशी ललाट/माथा (Forehead)
माथे को चूमना और सहलाना।
#पूर्णिमा सिर/केश (Head/Hair)
इस दिन कामुकता पूरे शरीर में चरम पर होती है, जिसका केंद्र सिर होता है। बालों में उंगलियां फेरना बहुत सुखदायी होता है।
#कृष्ण_पक्ष (घटता चाँद ऊपर से नीचे)
कृष्ण पक्ष में यह क्रम उल्टा हो जाता है। पूर्णिमा के बाद पहले दिन (प्रतिपदा) कामुकता वापस सिर/बालों में होती है और अमावस्या तक धीरे-धीरे पैरों के अंगूठे में वापस चली जाती है।

#चंद्रकला_के_विज्ञान_का_महत्व
रति रहस्य का यह ज्ञान केवल शारीरिक सुख के लिए नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक जुड़ाव के लिए भी महत्वपूर्ण है।
▪️आधुनिक समय में रति-क्रिया अक्सर केवल जननांगों (Genitals) तक सीमित रह जाती है। चंद्रकला का सिद्धांत सिखाता है कि पूरा शरीर कामुक है। यह दृष्टिकोण साथी को यह महसूस कराता है कि आप उनके पूरे अस्तित्व को प्रेम करते हैं।
▪️यदि आप रोज एक ही तरह का व्यवहार करेंगे, तो संबंध नीरस हो जाएगा। चंद्रकला आपको हर दिन एक नया फोकस पॉइंट देती है। एक दिन पैरों की मालिश, तो दूसरे दिन गले पर ध्यान; यह विविधता (Variety) बनाए रखता है।▪️यदि आप सही तिथि पर सही अंग को स्पर्श करते हैं, तो साथी बहुत कम समय में उत्तेजित हो जाता है और पूर्ण संतुष्टि प्राप्त करता है।
#व्यावहारिक_प्रयोग
इस प्राचीन ज्ञान को आज के जीवन में लागू करने के लिए आप निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं;
▪️तिथि की जानकारी रखें
आपको ज्योतिषी बनने की जरूरत नहीं है। आजकल मोबाइल एप्स या कैलेंडर में आसानी से पता चल जाता है कि आज कौन सी तिथि (शुक्ल पक्ष की पंचमी है या कृष्ण पक्ष की दशमी) है।
फोरप्ले (Foreplay) की योजना
मुख्य रति-क्रिया से पहले, कम से कम 10-15 मिनट उस दिन के विशेष अंग को समर्पित करें।
#उदाहरण: यदि आज 'दशमी' है, तो रति रहस्य कहता है कि कामुकता 'गले' में है। आप गले को चूमने, सहलाने या हल्के दंत-प्रयोग पर ध्यान दें। आप देखेंगे कि साथी की प्रतिक्रिया सामान्य दिनों से अधिक तीव्र है।
स्पर्श की कला
रति रहस्य केवल छूने के लिए नहीं कहता, बल्कि भाव के साथ छूने को कहता है। शुक्ल पक्ष में (जब ऊर्जा ऊपर चढ़ रही हो) स्पर्श थोड़ा अधिक ऊर्जावान हो सकता है, जबकि कृष्ण पक्ष में (जब ऊर्जा नीचे उतर रही हो) स्पर्श अधिक कोमल और शांत होना चाहिए।
#सावधानी
#अमावस्या के दिन ऊर्जा सबसे निचले स्तर पर होती है। रति रहस्य और कामशास्त्र, दोनों ही इस दिन संभोग से बचने या बहुत संयमित रहने की सलाह देते हैं, ताकि शरीर की ऊर्जा संचित रहे।

रति रहस्य और इसके चंद्रकला सिद्धांत का अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि हमारे पूर्वज न केवल शरीर विज्ञान के ज्ञाता थे, बल्कि वे मानव मनोविज्ञान की भी गहरी समझ रखते थे। कोक्कोक का यह सिद्धांत हमें सिखाता है कि प्रेम और रति-क्रीड़ा कोई हड़बड़ी में किया जाने वाला कृत्य नहीं, बल्कि धैर्य और संवेदना का एक अनुष्ठान है।
जब हम अपनी जीवनशैली और अंतरंगता को प्रकृति की लय के साथ जोड़ते हैं, तो रिश्ते में ऊर्जा का प्रवाह सहज और सुखद हो जाता है।
इस प्राचीन ज्ञान को अंधविश्वास मानकर त्यागने के बजाय, इसे एक जीवन जीने की कला के रूप में अपनाना चाहिए। जब आप अपने साथी के शरीर और भावनाओं के इस चक्र को समझकर व्यवहार करते हैं, तो आपका रिश्ता केवल शारीरिक नहीं रह जाता, बल्कि वह आत्मिक गहराई और परम आनंद की ओर अग्रसर होता है। यही रति रहस्य का वास्तविक सार है।
क्या आप अपनी दिनचर्या में तिथियों और चंद्रकलाओं पर ध्यान देते हैं? भारतीय ज्ञान परंपरा के इस अद्भुत विज्ञान को अपने जीवन में उतारें और बदलाव स्वयं महसूस करें।
साभार - Unique Quote ( फेसबुक पेज )
https://www.facebook.com/share/p/1NFgPtPd19/
#रतिरहस्य #कामसूत्र #facebook

Wednesday, 11 February 2026

दानवीर ..

जब युद्ध के चरम पर अचानक कर्ण के रथ का पहिया धरती में धंस गया। नियति ने अपना खेल दिखाया। विवश कर्ण रथ से नीचे उतरा और अर्जुन से बोला— "ठहरो अर्जुन!
युद्ध के नियमों को स्मरण करो।
एक निहत्थे और रथहीन योद्धा पर प्रहार करना अधर्म है।
जब तक मैं पहिया निकाल न लूँ, तुम बाण नहीं चला सकते।"

अर्जुन के हाथ ठिठक गए।
गांडीव की प्रत्यंचा ढीली पड़ गई।
तभी सारथी बने श्रीकृष्ण का अट्टहास गूँजा:

> "नियम, कर्ण?
आज तुम्हें धर्म और नियमों की याद आ रही है?
कहाँ था तुम्हारा धर्म जब तुम छह महारथियों के साथ मिलकर बालक अभिमन्यु को घेरकर मार रहे थे?
कहाँ गए थे नियम जब भरी सभा में द्रौपदी को अपशब्द कहे गए और तुमने मौन रहकर उसका अपमान देखा?"
केशव के इन तीखे वाक्यों ने अर्जुन के भीतर की अग्नि को प्रज्वलित कर दिया।
क्रोधित अर्जुन ने भगवान शिव का दिया हुआ अस्त्र संधान किया और एक ही वार में दानवीर कर्ण को मृत्यु की शैय्या पर सुला दिया।

#दानवीरता की अंतिम परीक्षा:

कर्ण लहूलुहान पड़ा अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था।
सूर्यास्त होने को था, लेकिन श्रीकृष्ण यह सिद्ध करना चाहते थे कि मृत्यु के द्वार पर खड़ा यह योद्धा वास्तव में 'महादानवीर' है। श्रीकृष्ण ने एक वृद्ध ब्राह्मण का भेष धरा और कर्ण के पास जाकर विलाप करने लगे।
"#हे #दानवीर!
मेरी पुत्री का विवाह है और मेरे पास दान देने को कुछ नहीं है। क्या तुम इस निर्धन की सहायता करोगे?"

मृत्यु के करीब पहुँच चुके कर्ण ने क्षीण स्वर में कहा,
"हे #ब्राह्मण, मैं रणभूमि में निहत्था पड़ा हूँ, मेरे पास आपको देने के लिए अब कुछ नहीं बचा।"

#ब्राह्मण रूपी #कृष्ण बोले, "नहीं कर्ण!
तुम्हारे दांतों में स्वर्ण जड़ा है, वह मुझे दे दो।"

कर्ण ने पास पड़ा एक पत्थर उठाया और बिना हिचकिचाए अपना दांत तोड़ दिया।
जब उसने वह दांत ब्राह्मण को दिया, तो ब्राह्मण ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, "यह तो रक्त से सना और अशुद्ध है, मैं इसे नहीं ले सकता।"

तब कर्ण ने अपना धनुष उठाया और धरती पर बाण चलाया। धरती की कोख फाड़कर 'बाण गंगा' की निर्मल धारा फूट पड़ी। कर्ण ने दांत को उस गंगा जल में शुद्ध किया और ब्राह्मण को अर्पित कर दिया।
इस अद्भुत त्याग को देख श्रीकृष्ण अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और उनकी आँखों में आंसू भर आए।
> #श्रीकृष्ण ने कहा: "कर्ण, जब तक यह सृष्टि रहेगी, तुम्हारी दानवीरता का गुणगान तीनों लोकों में होगा।
तुम जैसा न कोई हुआ है, न होगा।"
#तीन #वरदान और कुंवारी भूमि का रहस्य:

प्रभु को सामने देख कर्ण ने अपने जीवन के दुखों को याद किया और तीन वरदान माँगे:

#सामाजिक #न्याय: "प्रभु, अगले जन्म में जब आप आएं, तो पिछड़े और उपेक्षित वर्ग के उत्थान के लिए कार्य करें।"

 #साहचर्य: "अगले जन्म में आप मेरे ही राज्य में जन्म लें।"

#अंतिम #संस्कार: "मेरा अंतिम संस्कार ऐसी भूमि पर हो जो 'कुंवारी' हो, जहाँ आज तक किसी का दाह संस्कार न हुआ हो।"

कर्ण की मृत्यु के पश्चात श्रीकृष्ण स्वयं उनके पार्थिव शरीर को लेकर निकल पड़े।
पूरी पृथ्वी पर ऐसी भूमि मिलना असंभव था।
अंततः सूरत (गुजरात) में ताप्ती नदी के किनारे उन्हें मात्र एक इंच ऐसी भूमि मिली जो शुद्ध थी।
इतने छोटे टुकड़े पर संस्कार असंभव था, इसलिए श्रीकृष्ण ने अपना एक बाण रखा और उस पर कर्ण का दाह संस्कार किया।
आज इस स्थान को 'तुलसीबाड़ी मंदिर' के नाम से जाना जाता है।

तीन पत्तों वाला वट वृक्ष: एक जीवित चमत्कार

जब पांडवों ने उस भूमि की पवित्रता पर संदेह किया, तो आकाशवाणी हुई कि ताप्ती नदी कर्ण की बहन हैं और अश्विनी कुमार उनके भाई, अतः यह स्थान उनके लिए ही सुरक्षित था।
साक्ष्य के रूप में श्रीकृष्ण ने वहाँ एक वट वृक्ष (बरगद) को स्थापित किया।

हैरानी की बात यह है कि:

सूरत के इस मंदिर में मौजूद वह बरगद का पेड़ हजारों साल पुराना है, लेकिन उस पर हमेशा सिर्फ तीन पत्ते ही रहते हैं।
ये तीन पत्ते ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक माने जाते हैं। मान्यता है कि जो भी यहाँ अटूट श्रद्धा के साथ आता है, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है।