महाशिवरात्रि शिव- साधना , उपवास और आत्मशुद्धि का महान् परात्पर पर्व
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आशुतोष महादेव की उपासना और फलस्वरूप सद्य:फल प्राप्ति का पर्व और व्रत महाशिवरात्रि है।इस वर्ष महाशिवरात्रि का पर्व 15 फरवरी 2026 रविवार को है। देवाधिदेव महादेव की उपासना अत्यन्त प्राचीन है। मंगल- मूर्ति शिव का स्वरूप लोक-मंगल स्वरूप हैं। यद्यपि उनकी प्रसिद्धि प्रलयंकर के रूप में भी है, किन्तु शिव का यह आगमिक रूप लोकाभिमत नहीं हो पाया। इसीलिए शिव की उपासना आदि काल से लोकदेवता और लोकगुरु के रूप में सदैव एवं सर्वत्र होती रही है। इसमें कभी पूर्व और पश्चिम तथा उत्तर और दक्षिण का भेद नहीं रहा।मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के उत्खनन में योगस्थ ध्यानमग्न शिव प्रतिमा प्राप्त हुई है। शिव परम योगीश्वर और आदियोगी कहे जाते हैं।वैदिक काल में शिव की पूजा रुद्र के रूप में होती थी। कालान्तर में रुद्र का स्वरूप शिव के रूप में क्रमशः कैसे बदलता गया ,यह उपनिषदों, आरण्यकों,ब्राह्मण ग्रन्थों,वाल्मीकि रामायण और महाभारत से स्पष्ट होता है। उपनिषदों में कहा गया है कि शिव ही जगत् के आदि कारण हैं और वही परब्रह्म हैं।
तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम्।
पतिं पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम्।
श्वेता० उपनिषद् 3/4।
महाप्रलय रूप समाधि में अद्वितीय और एकमात्र रुद्र ही थे-
एको हि रुद्र न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाॅल्लोकानीशत ईशनीभि:।
श्वेता ०3/2
तैत्तिरीय आरण्यक में रुद्र को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सर्व व्यापी और सर्वगुण बताते हुए कहा गया है कि -
सर्वो वै रुद्रस्तस्मै रुद्राय नमो अस्तु।
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महाशिवरात्रि -व्रत को नित्य और काम्य दोनों प्रकार का व्रत माना गया है ।प्रति वर्ष इस व्रत को करने पर यह नित्य व्रत की श्रेणी में और जब किसी विशिष्ट कामना की पूर्ति हेतु किया जाता है ,तब यह काम्य व्रत कहा जाता है ।ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के अर्धरात्रिमें ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य हुआ था, इसलिए इसे शिव की महारात्रि कहा जाता है ।कुछ विद्वानों के अनुसार महाशिवरात्रि के अर्धरात्रि को शिव और पार्वती दोनों गार्हस्थ जीवन में प्रवेश किये थे, इसलिए इसे महाशिवरात्रि कहा जाता है और शिवार्चन में इसका सर्वाधिक महत्त्व है।
महाशिवरात्रि के व्रत के काल के सम्बन्ध में शास्त्रकारों पर्याप्त मतभेद है। कुछ विद्वान् प्रदोष व्यापिनी चतुर्दशी पर बल देते हैं तो कुछ निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी पर जोर देते हैं। वैसे चतुर्दशी अर्धरात्रि के पूर्व और उपरान्त भी रहे तो अति उत्तम है।
महाशिवरात्रि की पूजा का संकल्प शिव पुराण में इस प्रकार बताया गया है-
देव देव महादेव नीलकण्ठ नमोsस्तु ते ।
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव ।
तव प्रभावाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति ।
कामाद्याः शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि ।।
उपर्युक्त संकल्प करके शिवलिंग के पास जाकर विधि विधान से शिवजी की आराधना पूजा करे ।
यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है कि शिवजी को जलधारा अत्यन्त प्रिय है, अस्तु शिवजी की पूजा में शिवलिंग का जलाभिषेक अवश्य करे ।
जलधारा प्रियो शिव: । ऋग्वेद 7/35/6 में रुद्र को जलधारा प्रिय कहा गया है -शं नो रुद्रो रुद्रेभिर्जलाष : ।शिवजी को जलाभिषेक चाँदी या तांबे के पात्र से करें ।खडे होकर जलाभिषेक करना उचित नहीं है ।शिवजी को विल्वपत्र और धतूरे का फल अत्यन्त प्रिय है ।अतः शिवार्चन में श्वेत अर्क पुष्प, बिल्वपत्र और धतूरे का फल अवश्य चढाना चाहिए ।
भगवान् शिव आदि देव हैं । देवाधिदेव महादेव हैं । आशुतोष हैं।शिवजी के समस्त उपासना और अर्चना प्रकारों में शिवरात्रि के दिन उपवास , जागरण और पूजा का अतिशय एवं विशेष महत्त्व है।शिवप्रिया रात्रिःइति शिवरात्रिः अर्थात् जो रात्रि शिवजी को सर्वाधिक प्रिय हो।इसे शिव चतुर्दशी भी कहते हैं । स्कन्द पुराण में कहा गया है कि यदि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी रविवार या मंगलवार को पडे तो शिवरात्रि व्रत का महत्त्व और अधिक बढ जाता है ।ईशान संहिता में भगवान् शिव का वचन है -
फाल्गुने कृष्णपक्षस्य या तिथिः स्याच्चतुर्दशी ।
तस्यां या तामसी रात्रिः सोच्यते शिवरात्रिका ।।
तत्रोपवासं कुर्वाणः प्रसादयति मां ध्रुवम् ।
न स्नानेन न वस्त्रेण न धूपेन न चार्चया।
तुष्यामि तु तथा पुष्पैर्यथा तत्रोपवासतः ।।
इस प्रकार स्पष्ट है कि शिवरात्रि पूजा का प्रधान अङ्ग उपवास ही है ।
इसके अतिरिक्त ईशान संहिता में शिवरात्रि के दिन शिव की चार मूर्तियों ईशान, अघोर,वामदेव और सद्योजात मूर्ति को क्रमशः दुग्ध, दधि, घृत और मधु से स्नान कराने का महत्त्व वर्णित है ।शंकर जी की पूजा के समय मस्तक पर भस्म लेपन और गले में रुद्राक्ष की माला अवश्य धारण करना चाहिए । शिवपुराण विश्वेश्वर संहिता 25/47 में कहा गया है कि शिवजी की आज्ञा है कि सभी आश्रमों एवं वर्णों तथा स्त्री और शूद्रों को सदैव रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। सर्वाश्रमाणां वर्णानां स्त्रीशूद्राणां। शिवाज्ञया धार्या: सदैव रुद्राक्षा:। यदि कोई शिव साधक भस्म का त्रिपुण्ड धारण करता है ,तब उसे सब तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त हो जाता है।कालाग्निरुद्रोपनिषद् में तो यहां तक कहा गया है कि भस्म से त्रिपुण्ड धारण करने वाले को सभी वेदों के अध्ययन का फल मिलता है।
शिवार्चन में सर्वप्रथम श्री गणेश पूजन और गौरी स्मरण करना चाहिए। शिवजी को कनेर, मौलसिरी , धतूरा,मदार, चमेली,कमल,शमी, नागकेसर,मगर,बेला ,पलाश,केसर, गूलर आदि के पुष्प प्रिय हैं। इसी प्रकार शिव पूजा में निषिद्ध पुष्पों में केतकी,शिरीष,कुंद,जूही ,कपास और सेमल के पुष्प मुख्य हैं। वैसे त्रिदल अर्थात् विल्व पत्र का शिवार्चन में सर्वाधिक महत्त्व शास्त्रों में अनेकशः वर्णित है। शिवपुराण में आठ नाम मन्त्रों द्वारा शंकर जी को पुष्प समर्पित करने का निर्देश है - शिव के वे आठ नाम हैं - भव ,शर्व, रुद्र,पशुपति, उग्र, महान्,भीम और ईशान।पूजा के अन्त में शिवलिंग के समक्ष साष्टांग लेट कर प्रार्थना करनी चाहिए और क्षमा मांगनी चाहिए ।
शिवरात्रि व्रत को सर्वपाप- प्रणाशक और भुक्ति -मुक्ति को देने वाला बताया गया है ।
शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापप्रणाशनम्
आचाण्डालमनुष्याणां भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ।।
शिवरात्रि व्रत करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता ।
गरुडपुराण में भी कहा गया है कि
चतुर्दश्यां निराहारो भूत्वा शम्भो परेsहनिभोक्ष्येsहं भुक्तिमुक्त्यर्थं शरणं मे भवेश्वर।
अब यहाँ प्रश्न यह है कि उपवास क्या है?
उपवास शब्द की व्युत्पत्ति उप + वस + घञ् से होती है ।
उपवास का धातुमूलक अर्थ किसी के समीप रहना है ।अतः यहाँ उपवास का अर्थ शिव के समीप रहने से है ।
अग्निपुराण में उपवास का अर्थ बताते हुए लिखा है कि पापों से उपावृत अर्थात् निवृत्त होकर ,सभी प्रकार के भोगो का त्याग करते हुए जो सद्गुणों के साथ वास करता है , उसको उपवास कहते हैं ।उपवास करने वाले व्यक्तियों को बहुत से कार्य और वस्तुओं जैसे मांस, शहद , नमक,पराया अन्न,मैथुन, मसूर, चना , सुगन्ध, अंगराग, पान, शाक , लोभ , क्रोध आदि का त्याग करना चाहिए और सत्य, अहिंसा, शौच, दया, दान , सन्तोष , इन्द्रिय- संयम , क्षमा इन सद्गुणों के साथ रहना चाहिए ।उपवासी को तैलाभ्यंग, दिन में सोना, व्यायाम, लोभ, सुरापान, द्यूतक्रीडा आदि का भी त्याग करना चाहिए ।
भविष्य पुराण में भी उपवास शब्द की निरुक्ति में भी ऐसा ही लिखा है-
उपावृत्तस्य पापेभ्योयश्च वासो गुणैः सह।उपवासः स विज्ञेयः सर्वभोगविवर्जितः ।।
सामान्य रूप से आहार से निवृत्ति को लोग उपवास कहते हैं ।मन , बुद्धि या इन्द्रियों द्वारा जो कुछ भी बाहर से अन्दर आहृत अर्थात् लिया जाता है उसे आहार कहते हैं ।यह आहार स्थूल और सूक्ष्म के भेद से दो प्रकार का होता है।
स्थूल आहार में अन्न आदि और सूक्ष्म आहार में मन आदि एकादश इन्द्रियों द्वारा शब्द, रूप , रस ,गन्ध, स्पर्श और चिन्तन आदि विषय आते हैं ।
इस प्रकार उपवास के दिन उपवासी को स्थूल अन्नादि आहार को त्यागने के साथ साथ मन और वाणी सहित समस्त इन्द्रियों की पवित्रता बनाये रखनी चाहिए ।
शिवरात्रि के दिन शिव के स्वरूप का ध्यान, उनका नाम- जप , पंचाक्षरी मन्त्र नमः शिवाय , षडक्षर मन्त्र ओम् नमः शिवाय का जप करना चाहिए ।शिवरात्रि के प्रथम प्रहर का मन्त्र क्रमशः ह्रीं ईशानाय नमः,द्वितीय प्रहर का मन्त्र ह्रीं अघोराय नमः, तृतीय प्रहर का मन्त्र ह्रीं वामदेवाय नमः और चतुर्थ प्रहर का मन्त्र ह्रीं सद्योजाताय नमः है।
शिवरात्रि व्रत के पारण के विषय में शास्त्रकारो में मतभेद है ।कुछ विद्वानों के अनुसार चतुर्दशी के अन्त में ही पारण करना चाहिए ,जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार व्रत के समाप्ति पर पारण करना उचित है ।
शिवरात्रि व्रत सम्पन्न करने के पश्चात् प्रार्थना और विसर्जन के लिए शिवमहापुराण में अधोलिखित स्तुति बतायी गयी है -
नियमो यो महादेव कृतश्चैव त्वदाज्ञया।
विसृज्यते मया स्वामिन् व्रतं जातमनुत्तमम्।
व्रतेनानेन देवेश यथाशक्तिकृतेन च।
सन्तुष्टो भव शर्वाद्य कृपां कुरु ममोपरि।
शिवरात्रि के व्रत का उद्यापन 12वर्ष या 14 वर्ष के बाद करने का निर्देश है । स्कन्द पुराण में बारह वर्षों तक शिवरात्रि व्रत रखने का फल बताते हुए लिखा है - एवं द्वादशवर्षाणि शिवरात्रिमुपोषक:।यो मां जागरयते रात्रिं मनुज: स्वर्गमारुहेत्। शिवं च पूजयित्वा यो जागर्ति चतुर्दशीम्।
मातु: पयोधररसं न पिबेत् से कदाचन।
नागर खण्ड।
अर्थात् चौदह वर्षों तक रात्रि जागरण सहित शिव रात्रि का व्रत करने वाला स्वर्ग जाता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता।
उद्यापन के समय शिवजी की षोडशोपचार पूजा करके हवन आदि करे और सुवर्ण का दान और गोदान कर ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक भोजन करा कर यथा - शक्ति द्रव्यदान देना चाहिए ।प्रत्येक व्रत में अन्तः शुद्धि और बाह्य शुद्धि, इन्द्रियों का संयम, श्रद्धा और दान ये अनिवार्य अंग माने गये हैं ।
शिवरात्रि के दिन गंगा स्नान का भी शास्त्रों में अतिशय महत्त्व वर्णित है । गङ्गा स्नान हरिद्वार, प्रयागराज या काशी में करने का अवसर मिले तो उसका अनन्त फल होता है। इस समय प्रयागराज में कुम्भ महापर्व के अवसर पर करोड़ों श्रद्धालु गङ्गा और संगम में महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर दिव्य स्नान कर अक्षय पुण्य के भागी होंगे। यदि यह कहा जाय कि शिव - तत्त्व में समस्त सनातन योग - तत्त्व समाहित हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। शिव की इयत्ता का निर्वचन परम दुष्कर है।तप और व्रत ही शिव साधना का अपरिहार्य अंग और शिव प्राप्ति का साधन है।शिव की तपस्या में रत पार्वती जी के शब्दों में -
तप: किलेदं तदवाप्तिसाधनम्।
कुमारसम्भव।
इस प्रकार महाशिवरात्रि के दिन शरीर को स्थूल रूप अन्नादि आहार को त्यागने के साथ साथ सूक्ष्म रूप आहार काम,क्रोध, लोभ ,असत्य भाषण ,परनिन्दा आदि का त्याग करना चाहिए ।व्रती को केवल शिव स्मरण, शिवकीर्तन , शिव विषयक मन्त्रों का जप, शिव सहस्त्रनाम का पाठ,शिवस्तोत्र और रुद्रसूक्त का पाठ करना चाहिए ।
महाशिवरात्रि व्रत से श्रेष्ठ कोई व्रत नहीं है।शिवतत्त्व को आत्मसात करने का यह व्रत परात्पर है। स्कन्द पुराण में स्पष्ट रूप से कहा गया है -
परात् परतरं नास्ति शिवरात्रिपरात् परम्।
सभी पर आशुतोष भगवान भोलेनाथ की कृपा बनी रहे ।
इसी सदिच्छा के साथ
सादर,
महामहोपाध्याय आचार्य डॉ • सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय
आई•ए•एस• ( सेवानिवृत्त)प्रयागराज
_वयं राष्ट्रे जागृयाम_