Pages

Friday, 3 July 2026

विष्णु का प्रत्यक्ष रूप सूर्य है (भर्गो देवः) किन्तु वह तत् सविता नहीं है। यह (सूर्य) पृथ्वी का सविता है, उसका सविता ब्रह्माण्ड है जो स्वायम्भुव मण्डल से उत्पन्न है। उसका भी सविता अव्यक्त ब्रह्म ही तत् सविता हैं।

मित्र वरुण अर्यमा
१. विवाद-
२००६ ई में बंगलोर के भारतीय विज्ञान संस्थान (IISC) के एक सम्मेलन में एक भाषण के में मैंने ऋग्वेद के मन्त्र (१/२२/२०) में विष्णु के परम पद पर टिप्पणी की कि यह ब्रह्माण्ड के विषय में है जिसकी माप सूर्य सिद्धान्त (१२/९०) में है तथा लिखा है कि वह सूर्य किरण प्रसार की अन्तिम सीमा है। विष्णु का प्रत्यक्ष रूप सूर्य है (भर्गो देवः) किन्तु वह तत् सविता नहीं है। यह पृथ्वी का सविता है, उसका सविता ब्रह्माण्ड है जो स्वायम्भुव मण्डल से उत्पन्न है। उसका भी सविता अव्यक्त ब्रह्म ही तत् सविता है (गायत्री मन्त्र के प्रथम और द्वितीय पाद)। ब्रह्माण्ड की वही माप ऋक् (१/१६४/१२) तथा कठोपनिषद् (१/३/१) में है जहां परार्ध योजन कहा है। परा = १०घात १७, इसका आधा ब्रह्माण्ड की परिधि है, अतः इस संख्या परा को प्रायः परार्ध कहते हैं। (ऋक् (१/१२३/८) के अनुसार उषा सदा ३० योजन सदा वरुण (पश्चिम) दिशा में पीछे रहती है। भारत में सूर्य से १५ अंश पश्चिम तक उषा काल मानते हैं। विषुव रेखा पर यह ३० धाम होगा। अतः इस धाम योजन का मान विषुव परिधि का ७२० भाग = ५५.५ किमी होगा। इस तर्क के औचित्य पर विवाद हो सकता है। किन्तु अचानक कुछ व्यक्ति अपनी विख्यात शास्त्रार्थ शैली में मञ्च की तरफ आक्रमण के लिए बढ़े तथा हल्ला किया कि मैं सायण का भक्त तथा दयानन्द का शत्रु हूं। उसके कुछ पूर्व वहां के एक वैज्ञानिक की आतंकवादियों ने हत्या की थी, अतः सुरक्षा कर्मचारी दौड़े और कुछ शास्त्रार्थ महारथियों को रस्सी से बान्ध कर बाहर ले गये। बचे महारथियों से कहा कि सायण या दयानन्द ने इस विषय में कुछ नहीं कहा है तो उनकी भक्ति या शत्रुता का क्या अर्थ है। उस समय स्वामी दयानन्द सरस्वती की पुस्तक आर्याभिविनय स्तोत्र बांटी जा रही थी। उसमें प्रथम मन्त्र के सभी ६ पारिभाषिक शब्दों का एक ही अर्थ परमेश्वर किया गया था। ब्रह्म एक होने का यह अर्थ नहीं है कि वेद के सभी शब्दों का अर्थ केवल परमेश्वर किया जाय। केवल राम नाम जपना पर्याप्त था। तब मनुष्यों के भी अलग-अलग नाम नहीं होने चाहिये। सुरक्षा अधिकारियों के द्वारा छोड़े जाने पर मैंने कहा कि इन ६ शब्दों में किसी २ का अन्तर कोई बता दे तो उसके साथ शास्त्रार्थ का आनन्द आयेगा। १७ वर्ष के बाद भी कोई उनका अन्तर बताने के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि भक्ति में कमी हो जायेगी।
२. मन्त्र और अर्थ-
शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्यर्यमा।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुक्रमः॥
(ऋक्, १/९०/९, ऋक्, १९/९/६,७, वाज. यजु, ३६/९, तैत्तिरीय आरण्यक, ७/१/१)
सामान्य अर्थ है कि मित्र, वरुण, अर्यमा, इन्द्र, बृहस्पति, उरुक्रम विष्णु हमें शान्ति दें।
सभी ६ शान्ति दाताओं को परमेश्वर कहने पर इस मन्त्र में या अन्य वेद मन्त्र में एक ही शब्द का बारम्बार प्रयोग निरर्थक हो जाता है।
३. आकाश में अर्थ-
(क) आदित्य- आकाश के ३ धामों में मूल स्वरूप अन्तरिक्ष में दीखता है। मूल रूप से आदि हुआ था, अतः इनको आदित्य कहते हैं। स्वयम्भू मण्डल १०० अरब ब्रह्माण्डों का समूह है, जिसके भीतर अन्तरिक्ष (ब्रह्माण्डों के बीच खाली स्थान) अर्यमा है। जिस ऊर्जा से निर्माण होता है वह मित्र है, जिससे निर्माण नहीं होता वह वरुण है। या निकट (सौर मण्डल) का आदित्य मित्र है, दूर के ब्रह्माण्ड का आदित्य वरुण है। सबसे ऊपर अपरिवर्तित या स्थिर आदित्य अर्यमा है। वरुण वाः (वारि) का क्षेत्र है जहां जल जैसा बहुत विरल पदार्थ फैला हुआ है। उसके कुछ भाग में निर्माण होता है, वह मित्र है। आकाश में ब्रह्माण्ड के अप् का क्षेत्र वरुण है। सौर मण्डल के भीतर ऊर्जा का प्रसार मित्र है। स्वयम्भू मण्डल १०० अरब ब्रह्माण्डों का समूह है, जिसके भीतर अन्तरिक्ष (ब्रह्माण्डों के बीच खाली स्थान) अर्यमा है। ब्रह्माण्ड में १०० अरब ताराओं के बीच का स्थान वरुण है। सौर मण्डल का आदित्य मित्र है। ब्रह्माण्ड या ब्रह्माण्ड में तारा संख्या की गणना शतपथ ब्राह्मण (१२/३/२/५) में है।
ब्रह्मैव मित्रः (शतपथ बाह्मण, ४/१/४/१, ५/३/२/४)
मित्रः (एवैनं) सत्यानां (सुवते(। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/७/४/१)
क्रिया भाग दक्षिण तथा निष्क्रिय भाग वाम हस्त है। अतः मित्र को दक्षिण और वरुण को वाम कहा है।
मैत्रो वै दक्षिणः। वरुणः सव्यः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/७/१०/१)
अप्सु वै वरुणः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/६/५/६) 
आभिर्वा अहमिदं सर्वं आप्स्यामि यदिदं किं चेति। तस्मादापोऽभवन्। तदपामप्त्वम्। (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/१/२)
ता या अमू रेतः समुद्रं वृत्वातिष्ठंस्ताः प्राच्यो दक्षिणाच्यः प्रतीच्य उदीच्यः समवद्रवन्त। तद्यत्समवद्रवन्त तस्मात्समुद्र उच्यते। ता भीता अब्रुवन्। भगवन्तमेव वयं राजानं वृणीमह इति। यच्च वृत्वातिष्ठंस्तद्वरणोऽभवत्। तं वा एतं वरणं सन्तं वरुण इत्याचक्षते परोक्षेण। (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/१/७)
सबसे ऊपर अर्यमा-एषा वा ऊर्ध्वा बृहस्पतेः दिक् तदेष उपरिष्टाद् अर्यम्णः पन्थाः। (शतपथ ब्राह्मण, ५/५/१/१२)
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋग्वेद, २/२७/८)
(ख) सौर मण्डल-सूर्य विष्णु का प्रत्यक्ष रूप है अतः उसे जगत् की आत्मा कहा है। उसी से हमारा जीवन चल रहा है।
सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च (ऋक्, १/११५/१, अथर्व सं, १३/२/३५, २०/१०७/१४, वाज.यजु, ७/४२, १३/४६, तैत्तिरीय सं, १/४/४३/१, २/४/१४/४, मैत्रायणी सं, १/३/३७, काण्व सं, ४/९, २२/५)
विष्णु के कई विक्रम कहे गये हैं-
यज्ञो विष्णुः स देवेभ्य इमां विक्रान्तिं विचक्रमे यैषामियं विक्रान्तिरिदमेव प्रथमेन पदेन पस्पाराथेदमन्तरिक्षं द्वितीयमेन दिवमुत्तमेन। (शतपथ ब्राह्मण, १/९/३/९)
इमे वै लोका विष्णोर्विक्रमणं विक्रान्तं विष्णोः क्रान्तम्। (शतपथ ब्राह्मण, ५/४/२/६)
स (विष्णुः) इमाँल्लोकान्विचक्रमेऽथो वेदानथो वाचम् (ऐतरेय ब्राह्मण, ६/१५)
एतद्वै देवा विष्णुर्भूत्वेमाँल्लोकानक्रमन्त यद्विष्णुर्भूत्वा क्रमन्त तस्माद् विष्णुक्रमाः। (शतपथ ब्राह्मण, ६/७/२/१०)
तद्वाऽहोरात्रेऽएव विष्णुक्रमा भवन्ति। (शतपथ ब्राह्मण, ६/७/४/१०)
अथर्व वेद (८/१०) के ६‍ खण्डों में विराट् (दृश्य जगत् के विभिन्न रूप) का वर्णन है। इसमें विक्रान्त (विभाजन), उदक्राम (उत्क्रान्त-बाहर निकलना) न्यक्रामत् (परिणत होना) शब्दों के प्रयोग हैं। जैसे-
(१०/१)-विराड् वा इदमग्र आसीत् (पुरुष सूक्त, वाजसनेयि, ३१/५- ततो विराड् अजायत, विराजो अधिपूरुषः। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः। अथर्व, १९/६/९)-विराड् अग्रे समभवत्----)
स उदक्रामत् सा गार्हपत्ये न्यक्रामत्॥२॥
विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः (ऋक्, १/१५४/१, अथर्व, ७/२६/१, वाज.सं. ५/१८, तैत्तिरीय सं. १/२/१३/३, काण्व सं. २/१०, मैत्रायणी सं. १/२९/१९/९)
शं नो विष्णुरुरुक्रमः (ऋक्, १/९०/९) उरुक्रमः ककुहो यस्य पूर्वीर्न मर्धन्ति युवतयो जनित्रीः (ऋक्, ३/५४/१४) स चक्रमे महतो निरुरुक्रमः समानस्मात्सदस एवयामरुत् (ऋक्, ५/८७/४) विश्वेत्ता विष्णुराभरद् उरुक्रमः त्वेषितः। सतं महिषान् क्षीरपाकमोदनं एमृषम्॥ (ऋक्, ८/७७/१०) उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः॥ (ऋक्, १/१५४/५) इयं मनीषा बृहन्तोरुक्रमा तवसा वर्धयन्ती। (ऋक्, ७/९९/६)
(१०/२)-स उदक्रामत् सा अन्तरिक्षे चतुर्धा विक्रान्ता अतिष्ठत्॥१॥
विष्णु के बहुत से क्रमों की सूची अथर्ववेद (१०/५) में है। कुछ के अर्थ हैं-
(१) त्रिविक्रम-३ प्रकार के प्रभाव क्षेत्र या साम (विष्णु सहस्रनाम में त्रिसामा कहा है)। ताप, तेज, प्रकाश या अग्नि-वायु-रवि (अथर्व, ५/१०/२७, मनु स्मृति, १/२३) मनुष्य रूप विष्णु वामन द्वारा बलि के प्रति राजनीति के ३ नियमों का प्रयोग। राजनीति के ४ अंग हैं-साम, दाम, दण्ड भेद। यदि बल हो तो दण्ड दिया जा सकता है। बल नही है तो अन्य ३ नियम होंगें जिनको छल (त्रिविक्रम = तिकड़म) कहते हैं-साम, दाम, भेद। मनस्तेज (अथर्व, ५/१०/२८)
(२) उरुक्रम-इसका अर्थ सामान्यतः त्रिविक्रम करते हैं। उरु = बड़ा। शरीर में सबसे बड़ी हड्डी जंघा को भी उरु कहते है। विस्तृत होने के कारण पृथ्वी को उर्वी (स्त्रीलिङ्ग रूप) कहते हैं। क्रम = डिजाइन, विशेष क्रम में स्थापित करना। सबसे बड़ा निर्माण नगर का होता है, अतः नगर को दक्षिण भारत में उरु या उर कहते हैं, जैसे चित्तूर, बंगलोर, तंजाउर। मनुष्य विष्णु ने शिल्पशास्त्र के अनुसार सबसे पहले नगरों का निर्माण किया अतः उनको उरुक्रम कहा गया। बाद में राजा वरुण ने भी उरु बनाये, अतः इराक का सबसे पुराना नगर उर है जहां की उर्वशी थी। 
उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋक्, १/२४/८) शं नो विष्णुरुरुक्रमः (ऋक्, १/९०/१)
(४) यज्ञ के ३ सवन-प्रातः, माधन्दिन और सायं। (अथर्व, १०/५/३१)
(५) दिशा के ३ विक्रम-३ आयामी आकाश में गति या घूर्णन (चक्रम) (अथर्व, ५/१०/२८)
(६) औषधि या सोम (अथर्व, ५/१०/३२)-रेतः, यश, श्रद्धा।  
रेतो वै सोमः (कौषीतकि ब्राह्मण उप. १३/७, शतपथ ब्राह्मण, १/९/२/९, तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/७/४/२ आदि) 
यशो वै सोमः (शतपथ ब्राह्मण, ४/२/४/९)
(ऋक्, १०/७२/१०)-यशो वै सोमो राजा (ऐतरेय ब्राह्मण, १/१३)
श्रद्धस्य सोम्येति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं (छान्दोग्य उपनिषद्, ६/१२/३) 
(७) कृषि रूप (अथर्व, ५/१०/३४)-यज्ञ, पर्जन्य, अन्न। पर्जन्य वरुण तत्त्व है।
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्न सम्भवः। 
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥(गीता, ३/१४)
(ग) आकाश का इन्द्र-इन्द्र परब्रह्म का स्वरूप है, जिसे कई अन्य नामों से भी कहते हैं-
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥ 
(ऋक्, १/१६४/४६, अथर्व, ९/१०/२८)
अव्यक्त ब्रह्म निर्विशेष तथा निराकार है। सृष्टि के लिए उसके कई प्रकार के क्रियात्मक रूप हैं।
(१) इन्द्र सृष्टि निर्माण के लिए ऊर्जा है।
(देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे) इन्द्रियस्य इन्द्रियेण। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/६/५/३)
इन्द्रस्य इन्द्रियेण अभिषिंचामि (शतपथ ब्राह्मण, ५/४/२/२, ऐतरेय ब्राह्मण, ८/७)
(२) शुनः इन्द्र-ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहां इन्द्र नहीं हो-
नेन्द्रात् ऋते पवते धाम किञ्चन । (ऋक्, ९/६९/६) 
यह शून्य में भी वर्तमान है, अतः इसे शुनः इन्द्र कहते हैं इस इन्द्र से इद्दर, ईथर (Ether) हुआ है, जो शून्य में भी वर्तमान है। 
(३) मघवा-वह मेघ की तरह पूरे आकाश या देश में छाया हुआ है अतः मघवा है। इसका मूल है-महि (मंह) वृद्धौ (धातु पाठ, १/४२२) इसका अन्य अर्थ पूज्य करते हैं (मह पूजायाम्-१/४८५, ११/३२)। 
शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रम्। (ऋक्, ३/३०/२२)। 
(२) मनु तत्त्व-यन् मनः स इन्द्रः (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ४/११)
शून्य में वर्तमान मन का मूल रूप था श्वो-वसीयस (शून्य में वास करने वाला)-
असतोऽधि मनोऽसृज्यत। मनः प्रजापतिं असृजत। प्रजापतिः प्रजा असृजत। तद् वा इदं मनस्येव परमं प्रतिष्ठितम्। यदिदं किं च। तत् एतत् श्वोवस्यसं नाम ब्रह्म। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/२/९/१०)
उसके खण्ड १०० अरब ब्रह्माण्ड और हमारे ब्रह्माण्ड के १०० अरब तारा हैं। इनकी माप शतपथ ब्राह्मण (१२/३/२/१-५) में है। मुहूर्त्त (४८ मिनट) को ७ बार १५ से भाग देने पर लोमगर्त्त होगा (सेकण्ड का प्रायः ७५,००० भाग)। शतपथ ब्राह्मण (१०/४/४/२) के अनुसार १ संवत्सर में जितने लोमगर्त्त हैं, आकाश में उतने ही नक्षत्र हैं (स्वयम्भू मण्डल के लिए ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड के लिए तारा)। यह १० घात १२ है, पुरुष विश्व का १० गुणा है, अतः 
१० घात ११ (१०० अरब) = दृश्य जगत् में ब्रह्माण्ड संख्या 
= हमारे ब्रह्माण्ड में तारा संख्या
= मनुष्य मस्तिष्क में कलिल (लोमगर्त) संख्या।
इन संख्याओं का अनुमान आधुनिक ज्योतिष में १९८५ के बाद हुआ है।
मनुष्य मन का विराट् रूप ब्रह्माण्ड है, अतः उसका अक्ष भ्रमण काल मन्वन्तर है।
(३) क्रिया रूप-इन्द्र ऊर्जा से क्रिया होती है, उसका सञ्चालन केन्द्र हृदय है, कार्य का क्षेत्र वाक् है।
हृदयमेव इन्द्रः (शतपथ ब्राह्मण, १२/९/१/१५)
यन् मनः स इन्द्रः (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ४/११)
प्राण एव इन्द्रः (शतपथ ब्राह्मण, १२/९/१/१४)
वाक् इन्द्रः (शतपथ ब्राह्मण, ८/७/२/६)
इसकी प्रतिमा मनुष्य मन शरीर के अंगों को संचालित करता है, अतः उनको इन्द्रिय कहते हैं।
(४) १४ इन्द्र-ऊर्जा का घनीभूत रूप अग्नि है, जिसकी १४ जिह्वा हैं, अतः इन्द्र भी १४ है। अग्नि की ७ जिह्वा निगलने की (लेलायमाना) तथा ७ निकालने की (अर्चि) है। 
अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वेनो देवा अवसा गमन्निह। (ऋक्, १/९८/७, वाज. यजु, २५/२०)
काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा। 
स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः॥ (मुण्डकोपनिषद्, १/२/४) 
सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्, सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः (मुण्डकोपनिषद्, २/१/८)
शरीर के मन और उसका प्राण इन्द्र की भी १४ जिह्वा हैं-
तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा। (योग सूत्र, २/२७)
(५) इन्द्र और विष्णु-सूर्य इन्धन रूप में तेज का विकिरण करता है। इस अर्चि रूप के ३ क्षेत्र हैं-अग्नि, आदित्य, यम (मनु स्मृति, १/२३ के अनुसार अग्नि, वायु, रवि)। 
विष्णु रूप में आकर्षण करता है। यह भृगु है जिसके कारण घनत्व के ३ स्तर हैं।
अर्चिर्षि भृगुः सम्बभूव, अङ्गारेष्वङ्गिराः सम्बभूव। अथ यदङ्गारा अवशान्ताः पुनरुद्दीप्यन्त, तद् बृहस्पतिरभवत्। (ऐतरेय ब्राह्मण, ३/३४)
अग्निरादित्ययमा-इत्येतेऽङ्गिरसः ....वायुरापश्चन्द्रमा-इत्येते भृगवः (गोपथ ब्राह्मण पूर्व, २/९)।
दोनों में समन्वय से शान्ति और शक्ति होती है।
(६) वासव इन्द्र- ऊर्जा रूप इन्द्र विभिन्न पदार्थ रूपों में वास करता है, वह वसु या वासव इन्द्र है।
तत् सृष्ट्वा तदेव अनुप्राविशत्। तत् अनुप्रविश्य सत् च त्यत् च अभवत्। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/६)
ऊर्जा रूप ब्रह्म इन्द्र है, वह भी हर रूप में प्रविष्ट है-
रूपं रूपं वयो वयः (अथर्व सं, १३/१/४, काण्व सं, ८/१४)
= हर रूप एक वयन है-परस्पर सम्बन्ध का सूत्र या ऋषि (रस्सी) है, उनसे निर्माण वस्त्र बुनने जैसा वयन है। यह वयन जितने काल तक रहता है, वह भी वयः (वयस = आयु) है। 
रूपं रूपं अधुः सुते (वाज. सं, २०/६४)
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय।
इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दश॥ (ऋक्, ६/४७,१८, शतपथ ब्राह्मण, १४/५/१९)
= माया अर्थात् आवरण द्वारा फैली हुई इन्द्र ऊर्जा पुरु (पुर या रचना) रूप में आता है। वह रूप अलग से स्पष्ट दीखता है। सभी रूप उसके ही प्रतिरूप हैं, ये अनेक (सहस्रों) हैं।
(घ) बृहस्पति-सोम क्षेत्र ३ हैं-(१) चान्द्र मण्डल का देवसोम या राजसोम, (२) जहां तक सौर वायु जाती है वह पवमान सोम है। इसका केन्द्र बृहस्पति होने से यह बृहस्पति सोम है। (३) ब्रह्माण्ड सीमा तक ब्रह्मणस्पति सोम है।
निकट का सोम क्षेत्र चन्द्र कक्षा का गोल है जिसमें सूर्य का रौद्र तेज कुछ शान्त होने से यहां सृष्टि होती है। 
एतद्वै देवसोमं यत् चन्द्रमाः (ऐतरेय ब्राह्मण, ७/११)
सोमो राजा चन्द्रमाः (शतपथ ब्राह्मण, १०/४/२/१)
असौ वै सोमो राजा वोचक्षणश्चन्द्रमाः (कौषीतकि ब्राह्मण, ४/४, ७/१०)
ग्रहों में सबसे बड़ा बृहस्पति है, ग्रह कक्षाओं के बाद प्रायः खाली स्थान है जिसमें केवल इन्द्र या प्रकाश है। शून्य स्थान में भी इन्द्र है, वहां का पदार्थ पवमान सोम कहते हैं बृहस्पति (ग्रह) क्षेत्र में बृहस्पति सोम तथा ब्रह्माण्ड में ब्रह्मणस्पति सोम है। अतः २ भागों में विभाजन इन्द्र बृहस्पति है।
अग्निर्वाव पवित्रम्। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/३/७/१०) 
अयं वायुः पवमानः (शतपथ ब्राह्मण, २/५/१/५) 
(वायुः) यः पश्चाद् वाति। पवमान एव भूत्वा पश्चाद् वाति। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/३/९/६) 
तस्मादुत्तरत्ः पश्चादयं (वायुः) भूयिष्ठं पवते सवितृप्रसूतो ह्येष एतत् पवते। (ऐतरेय ब्राह्मण, १/७) 
सोमो वै पवमानः। (शतपथ ब्राह्मण, २/२/३/२२) 
बृहस्पतिर्ब्रह्म ब्रह्मपतिः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/५/७/४) 
वाग् वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः।(शतपथ ब्राह्मण, १४/४/१/२२) 
(यजु ३८/८) अयं वै बृहस्पतिर्योऽयं (वायुः) पवते। (शतपथ ब्राह्मण, १४२/२/१०)
बृहस्पतिर्वै देवानां ब्रह्मा (कौषीतकि ब्राह्मण, ६/१३, शतपथ ब्राह्मण, १/७/४/२१, ४/६/६/७)
४. लौकिक अर्थ-
भूगोल में भारत के पश्चिम भाग में निकट में मित्र (ईरान) तथा दूर में वरुण (ईराक, अरब) है। भारत का पूर्व भाग इन्द्र का क्षेत्र था (पूर्व के लोकपाल)। आज भी बर्मा से लेकर इण्डोनेसिया में इन्द्र सम्बन्धी वैदिक शब्द प्रचलित हैं। पूरा विश्व या उसका नियन्त्रक अर्यमा (अरबी में आजम) है।
व्यक्तिगत रूप से सहायक लोग मित्र हैं, शत्रु वरुण हैं, समाज या निरपेक्ष अर्यमा हैं।
क्षितिज के ऊपर गोल का पूर्व भाग मित्र, पश्चिम भाग वरुण है। इनको विभाजित करने वाली याम्योत्तर (उत्तर-दक्षिण) रेखा का उत्तर विन्दु वसिष्ठ तथा दक्षिण विन्दु अगस्त्य है। अतः इनको कुम्भज (आकाश रूपी कुम्भ से उत्पन्न) कहा है। स्थिर गोल अर्यमा है।
देव त्रिलोकी के मुख्य को इन्द्र कहते थे। इन्द्र तथा गरुड़ के भवन यवद्वीप सहित सप्त द्वीपों में थे। यहां द्वीप समुद्र, पर्वत, नदी या मरुस्थल से घिरा प्राकृतिक भूखण्ड है।
पूर्वस्यां दिशि निर्माणं कृतं तत् त्रिदशेश्वरैः (इन्द्र)॥५४॥
(जम्बूद्वीप = एसिया) की पूर्व दिशा के लिये वहां उदय पर्वत (पूर्व दिशा में पहले सूर्योदय) पर ३ सिर का ताल (स्तम्भ) इन्द्र का बनाया है। (४ त्रिभुजों से घिरा पिरामिड, या त्रिकोणाकार स्तम्भ)
तत्र पूर्वपदं कृत्वा पुरा विष्णुः त्रिविक्रमे। द्वितीयं शिखरे मेरोः चकार पुरुषोत्तमः॥५८॥
(वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड, अध्याय ४०)
पूर्व दिशा में प्रथम पाद यवद्वीप (सप्तद्वीप) के पूर्व भाग में गया जिसकी सीमा पर इन्द्र ने पिरामिड बनाया था। उसके बाद मेरु (उत्तर ध्रुव) तक द्वितीय पाद गया। तृतीय पद पुनः वापस भारत की पश्चिम सीमा (उज्जैन से ४५ अंश पश्चिम) तक गया जो राजा बलि के सिर पर था।   
यहां पूर्व पद का अर्थ है पूर्व दिशा में भू-परिधि का चतुर्थांश। उत्तर गोल में ४ पाद हैं-भारत वर्ष (उज्जैन मध्य रेखा के पूर्व पश्चिम ४५-४५ अंश, विषुव से उत्तर ध्रुव तक), पूर्व में भद्राश्व, पश्चिम में केतुमाल, विपरीत दिशा में कुरु वर्ष।
भद्राश्वं पूर्वतो मेरोः केतुमालं च पश्चिमे। 
वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठ तयोर्मध्यमिलावृतः॥२४॥
भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा। 
पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः॥४०॥ (विष्णु पुराण, २/२)
इस भारत वर्ष (भू पद्म का चतुर्थ अंश) में इन्द्र के ३ लोक थे-हिमालय से दक्षिण समुद्र तक भारत, मध्य में चीन ( वहां के लोग चीन को मध्य लोक कहते हैं), उत्तर में रूस, शिविर (साइबेरिया)। भारत का नेता (अग्रि) को अग्नि कहते थे। वह विश्व का भरण करने से भरत कहलाता था।
इन्द्र का काल वैवस्वत मनु (१३९०० ईपू) से १० युग = ३६०० वर्ष तक था। इस काल में १४ प्रमुख इन्द्र हुए। इन लोगों ने प्रायः १००-१०० वर्षों तक शासन किया अतः इन्द्र को शत-क्रतु या संक्षेप में शक्र कहते थे। 
नारद पुराण. अध्याय (१/४०) के अनुसार १४ मन्वन्तरों के १४ इन्द्र हैं-
(१) शचीपति, (२) विपश्चित्, (३) सुशान्ति, (४) शक्र, (५) विभु, (६) मनोजव, (७) पुरन्दर, (८) बलि, (९) अद्भुत्, (१०) शान्ति, (११) वृष, (१२) ऋभु, (१३) सुत्रामा, (१४) महावीर्य।   
बृहस्पति देवगुरु थे। वेद के अनुसार शब्द के लिए ब्रह्मा ने बृहस्पति को अधिकृत किया, जिन्होंने शब्द तथा उसके लिए चिह्न (दर्श वाक्) बनाये-
बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रं यत् प्रैरत् नामधेयं दधानाः॥१॥
उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचमुत त्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम्॥४॥ (ऋक्, १०/७१) 
वाग्वै बृहती तस्या एष पतिः तस्मादु बृहस्पतिः (शतपथ ब्राह्मण, १८/४/१/२२, बृहदारण्यक उपनिषद्, ३/२/३) 
बृहस्पति चीन के थे, अतः वहां हर शब्द के चिह्न रह गये। वहां ६० वर्ष का बार्हस्पत्य चक्र भी चल रहा है। शतपथ ब्राह्मण (१/२/३/२२-२६) के अनुसार इन्द्र ने उनको मनुष्य लोक (भारत) में भेजा था। उन्होंने यज्ञ विरोधी लोगों को पहले उल्टा उपदेश दिया जिससे वे यज्ञ के महत्त्व को समझें।
✍️ Arun Kumar Upadhyay fb post 28july2023
 (_वयं राष्ट्रे जागृयाम_ 4 July 2026 )

अंतरराष्ट्रीय चुटकुला दिवस

*।। अंतरराष्ट्रीय चुटकुला दिवस ।।*

हँसी और मुस्कान हमारे जीवन को खुशियों से भर देती हैं। *कल अंतरराष्ट्रीय चुटकुला दिवस था तो आइए हम हँसी के महत्व को समझें और इसे अपने जीवन में शामिल करें।*

*हँसी न केवल हमारे शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है, बल्कि यह हमारे मानसिक स्वास्थ्य को भी मजबूत करती है।* यह हमें तनाव और चिंता से मुक्ति दिलाती है और हमें जीवन के प्रति अधिक सकारात्मक बनाती है।

आइए हम हँसी को अपने जीवन में एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाएं और दूसरों को भी हँसाने का प्रयास करें। इससे न केवल हमारा जीवन खुशहाल होगा, बल्कि हम दूसरों के जीवन में भी खुशियाँ ला सकेंगे।

*हँसी के कुछ आध्यात्मिक लाभ:-*

1. *तनाव से मुक्ति*: हँसी हमें तनाव और चिंता से मुक्ति दिलाती है।
2. *सकारात्मकता*: हँसी हमें जीवन के प्रति अधिक सकारात्मक बनाती है।
3. *आत्म-विश्वास*: हँसी हमें आत्म-विश्वास बढ़ाती है और हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करती है।
4. *संबंधों में सुधार*: हँसी हमारे संबंधों में सुधार लाती है और हमें दूसरों के साथ बेहतर ढंग से जुड़ने में मदद करती है।

*आप सभी को अंतरराष्ट्रीय चुटकुला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!*

वर्ण व्यवस्था और वर्तमान स्थिति

देखिये आजकल कुछ बचा नहीं है ।
मूल बात को सबने खो दिया है ।
शास्त्र कहता है कि जिस पुरुष के वर्ण को बतलाने वाला जो लक्षण कहा गया है , वह यदि दूसरे वर्ण वाले में भी मिले तो उसे भी उसी वर्ण वाला जानना चाहिए ।।

पहले के समय में लक्षण और गुणों से एक ही पिता की संतानों को ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शुद्र हुआ करते थे , जिसे वर्ण बोला जाता था । 

अगर उसकी वृत्ति पवित्रता , शुद्ध आचरण , भगवद प्रेम , शास्त्रों का पठन पाठन इत्यादि है तो उसे ब्राह्मण बोला जाता था ।

अगर उसकी वृत्ति शासन करने की , युद्ध कला में माहिर , रक्षण आदि की वृत्ति है तो उसे क्षत्रिय ।

अगर उसकी उपरोक्त दोनों में से कोई न होकर धन उपार्जन में है और उसे व्यापार आदि में रुचि है तो वैश्य । 

और जिनकी रुचि उपरोक्त किसी में नहीं थी , जिनमें कोई गुण नहीं था , आचरण अपवित्र था , अपराधी स्वभाव वाले थे , उनका द्विज संस्कार नहीं किया गया , उसे शुद्र बोला गया ।

पहले ऐसे ही होता था ।
बहुत उदाहरण हैं शास्त्रों में । 

जैसे - 

राजा प्रियव्रत के 10 पुत्र हुए - आग्नीध्र , इध्मजिह्न , यज्ञबाहु , महावीर , हिरण्यरेता, धृतपृष्ठ, सवन , मेधातिथि , वीतिहोत्र और कवि । 

कवि , महावीर और सवन ये तीनों नैष्ठिक ब्रह्मचारी बनकर #ब्राह्मण हो गए । 

राजा प्रियव्रत के राजा आग्नीध्र हुए , उनके पुत्र राजा नाभि हुए , इनके पुत्र भगवान ऋषभ हुए ।
देखिये ये सब क्षत्रिय वृत्ति के ।

राजा ऋषभ ने राज्य किया तब तक वे क्षत्रिय थे , जब उन्होंने वन् में प्रस्थान किया तो #ब्राह्मणत्व धारण किया ।

अब इसमें देखिये ।

राजा ऋषभ के 100 पुत्र थे ।

सबसे बड़े भरत जिनके नाम पर भारतवर्ष पड़ा ।
इनके 9 पुत्र हुए जो योगीश्वर हो गए और #ब्राह्मण बन गए । 

81 पुत्र इनके कर्मकांडी ब्राह्मण हो गए । 
बाकी के 9 पुत्र क्षत्रिय हुए जिन्होंने राज्य किया और राजा बने । 

अब आगे और सुनिए ।

राजा प्राचीनबर्हि के 10 पुत्र हुए जिन्हें प्रचेता कहा जाता है , सब ब्राह्मण हो गए । देखिये #क्षत्रिय से #ब्राह्मण हो गए । 

मनुपुत्र करुष से कारूष नामक क्षत्रिय उत्पन्न हुए । वे बड़े ही ब्राह्मण भक्त और धर्मप्रेमी थे ।
मनुपुत्र धृष्ट से धार्ष्ट नामक क्षत्रिय हुए और अंत में वह इसी शरीर से #ब्राह्मण बन गए । 

कश्यप ऋषि के पुत्र हुए विवस्वान ।
विवस्वान के श्राद्धदेव मनु हुए ।  
मनु से 10 पुत्र हुए ।।

यहाँ देखते जाईये ब्राह्मण से क्षत्रिय , क्षत्रिय से ब्राह्मण , शूद्र , वैश्य सब बन रहे हैं ।

मनुपुत्र नरिष्यन्त हुए । इनसे चित्रसेन हुए ।
इनसे ऋक्ष हुए ।
ऋक्ष से मीढ़वान ।
मीढ़वान से कूर्च 
कूर्च से इन्द्रसेन 
इन्द्रसेन से वीतिहोत्र ।
वीतिहोत्र से सत्यश्रवा 
सत्यश्रवा से उरुश्रवा 
उरुश्रवा से देवदत्त 
देवदत्त से अग्निवेश्य 

अग्निवेश्य ब्राह्मण निकल गए । बहुत बड़े महर्षि हुए , ये जातुकर्णा के नाम से विख्यात हुए । 

ब्राह्मणों का अग्निवेश्यायन गोत्र उन्हीं से चला ।

अब आगे सुनिए और ।

मनुपुत्र दिष्ट हुए । इनसे नाभाग हुए ।
नाभाग वैश्य हो गए । 

नाभाग से वत्स्प्रीति । वतस्प्रीति से प्रांशु । 
प्रांशु से प्रमति ।
प्रमति से खनित्र ।
खनित्र से चाक्षुष । 
चाक्षुष से विविशन्ति 
इनसे रम्भ । रम्भ से खनिनेत्र ।
खनिनेत्र से क्रंधम । 
क्रंधम से अविक्षित । 
अविक्षित से राजा मरुत हुए जो चक्रवर्ती सम्राट हुए ।।

मतलब क्षत्रिय से वैश्य फिर वैश्य से क्षत्रिय ।

और बताऊँ तो सुनिए ।

राजा अक्रिय जो क्षत्रिय थे , उनके पुत्र से ब्राह्मण वंश चला ।

और सुनिए ।

विश्वामित्र क्षत्रिय थे , वह ब्राह्मण हो गए ।
इन्होंने ही गायत्री मंत्र को प्रकट किया था ।
और इन्हीं विश्वामित्र  के 49 पुत्र #म्लेच्छ हो गए ।

#शूद्र  भी नहीं , म्लेच्छ हो गए । मतलब और नीचे गिर गए ।।

और देखिये अभी । 

मन्युपुत्र गर्ग से शिनि और शिनि से गार्ग्य का जन्म हुआ ।
गार्ग्य क्षत्रिय था , फिर भी उससे ब्राह्मण वंश चला ।।

महावीर्य का पुत्र था दुरित्क्षय ।
इनके तीन पुत्र हुए । 
त्र्यारुणि , कवि और पुष्करिणी ।
ये तीनों ब्राह्मण हो गए । 

बृहत्क्षत्र का पुत्र हस्ती । 
इसी ने हस्तिनापुर बसाया ।

हस्ती के तीन पुत्र हुए । 

अजमीढ़ , द्विमीढ़  और पुरुमीढ़ ।

अजमीढ़ के पुत्र ब्राह्मण हो गए । 

भाग्यर्शव के पाँच पुत्र हुए । पांचों पांच देश का शासन करने में समर्थ थे , इसलिए पांचाल कहलाये ।।

इनमें से मुद्गल से मौद्गल्य नामक ब्राह्मण गोत्र की उत्पत्ति हुई ।।

नाभागारिष्ट का जो पुत्र हुआ , उसने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया ।
वह अपने क्षत्रिय वंश की स्थापना कर ब्राह्मण कर्म में प्रवृत्त हो गया ।

धृष्ट से धारष्ट हुए , वे क्षत्रिय थे लेकिन वह बाद में ब्राह्मण बन गए । 

करुष के पुत्र कारूष क्षत्रिय हो गए । 

राजा पृषध को ग़लती से बछड़े की हत्या करने पर उनके गुरु ने उन्हें शूद्र होने का शाप दे दिया ।।

ऐसे बहुत उदाहरण हैं ।

लेकिन क्या हुआ कालांतर में आते आते ब्राह्मण ब्राह्मण में ही विवाह करने लगे क्योंकि वह उनके आचार विचार से मेल खाते थे ।

ऐसे ही क्षत्रियों का हुआ ।
ऐसे ही वैश्यों का ।

फिर बचे शूद्र तो उन्होंने भी वैसे ही करना शुरू कर दिया ।

जिससे एक Blood की शुद्धता बनती चली गयी ।
blood clan या रक्त वर्ण के अनुसार सब हो गया ।

अब यह कलियुग में यह हो गया कि उसी प्रकार से सब जातियों में विभाजित हो गए ।

लोग मूल स्वरूप भूल गए और अपने ही clan में विवाह और आदान प्रदान हो गया ।।

आज उसी का यह विकृत रूप हो गया ।

आज ब्राह्मण वर्ग में जन्मे दारू , नशा , वेश्यावृत्ति करने पर भी यह शूद्र न होकर ब्राह्मण ही बने रहे । 

भले इनको एक शास्त्र की line तक न आती हो ।
बस यह है कि रक्त शुद्धता के कारण यह ब्राह्मण से सुशोभित किये जाते हैं ।

यह ऐसे ही हो गया कि किसी का पिता IAS बन गया तो उसका अनपढ़ पुत्र भी स्वयं को आईएएस मान रहा है ।
किसी के पिता प्रधानमंत्री जनता की मूर्खता और भावुकता के कारण बन गए तो उस राहुल गांधी को आज भी प्रधानमंत्री पद का दावेदार माना जाता है , यह जाति ही है जो जन्म लेने से आई है उस कुल में भले वह उसकी योग्यता न रखता हो ।

ये जितने POLITICIANS हैं , अखिलेश यादव , तेजस्वी यादव से लेकर अन्य जो परिवार के कारण अध्यक्ष पद लिए बैठे हैं , वह सब जाति ही तो पालन कर रहे हैं ।

रही सही कसर दम्भी लोगों ने जातियों के नाम पर उत्पात मचाना शुरू कर दिया और स्वयं की श्रष्ठता का दम्भ भरने लगे भले उनके पास एक भी लक्षण उस वर्ण के न हों ।

जब से यह जन्म पर आधारित हो गया , यह जातियाँ बन गयी और वर्ण ध्वस्त हो गया जो मूल तत्त्व था इसका ।

नहीं तो आज भी यह प्रथा है ।
आज हमारा गाँव ब्राह्मणों का है , लेकिन अगर किसी के चरित्र के विषय मे पता लग जाता है तो उसके यहाँ पानी तक पिया जाता ।।
उसको गाँव से बाहर तक निकाल दिया जाता है ।

आज भी हमारे यहाँ गांव में एक ब्राह्मण थे वह characterless थे , आज वह मर भी गए हैं तो उनके लड़के को जो अब 60 वर्ष की उम्र पहुंच गयी है , उनको आसन नहीं दिया जाता ।।
और पानी उनको मिट्टी के भरुके में दिया जाता है ।
अपने पात्र में उनको कोई पानी तक नहीं पिलाता । घर में किसी के वह घुस नहीं सकते ।।

तो ऐसा नहीं है कि यह शूद्रों के साथ ही किया जाता है ।
यह ब्राह्मणों में भी है ।

हमारे यहाँ के एक जानकार थे , युवावस्था में उन्होंने ग़लत लड़कों की संगति में आकर मांस खा लिया था ।
मुझे याद है उनकी माता जी ने उनको 28 दिन तक जब तक वीर्य शुद्ध नहीं हो जाता , तब तक उनको पत्तल में भोजन दिया जाता रहा । उनका खाट , बिस्तर सब अलग कर दिया गया था और वह खेत में सोते थे । 

तो यह रहा है शुरू से ।

यही कारण रहा कि शूद्रों को अलग थलग रखा जाता था । 
क्योंकि इनके आचरण में ही यह सब रहता ही रहता था ।।

लेकिन आज तो सब गड्डमगड्ड हो गया है ।

आज लक्षण , गुण और आचरण से नहीं बल्कि कुल से सब हो रहा है ।
भले शूद्र वर्ण में कोई सही आचरण या वृत्ति वाला व्यक्ति ही क्यों न पैदा हो रहा हो , वह भी गेहूं के साथ घुन की तरह पिस जाता है ।

लेकिन ऐसा भी नहीं रहा ।

संत रैदास जी चमार जाति से थे । 
लेकिन उन्हीं सन्त रैदास से हज़ारों ब्राह्मणों ने दीक्षा ली थी । 
और इनको भक्तमाल में स्थान मिला ।

यह सब जातियों का स्वरूप बिगड़ चुका है । 

अब वैसे भी लोग डरते हैं रक्त शुद्धता को लेकर । 

तो यह सब इसी तरह बन गया ।

लेकिन यह जातियाँ वर्ण इत्यादि का भगवद क्षेत्र में प्रवेश पूर्णतः वर्जित है ।

जातियाँ बस समाज तक है । 
इसके बाद भगवान के क्षेत्र में इनका कोई महत्व नहीं है ।

द्वापर युग मे जब युद्धिष्ठिर ने यज्ञ सम्पन्न किया तो भगवान श्रीकृष्ण ने एक शंख लाकर रख दिया कि जब आपके राज्य में सभी भगवद्प्रेमी और ब्राह्मण भोजन कर लेंगे तो यह स्वतः बजकर यज्ञ पूर्ण कर देगा ।

सभी राज्य के ब्राह्मणों  को भोजन करवा दिया गया लेकिन शंख नहीं बजा । 

तो भगवान तो अंतर्यामी हैं ही । उन्होंने युद्धिष्ठिर से कहा कि तुम्हारे राज्य में एक मेहतर है श्वपच वाल्मीकि । बस वही रह गया । भीम अर्जुन इत्यादि सब जायें और उसे आदरपूर्वक ले आएं ।।

भगवान की आज्ञा से भीम अर्जुन इत्यादि सब गए उसके झोपड़ी में । 
वह डर गया और रोने लगा कि मैं तो सड़क पर झाड़ू लगाने वाला व्यक्ति हूँ ।

लेकिन वह भगवान का बहुत बड़ा भक्त था बस छुपकर रहता था । 
कभी out नहीं होने दिया कि वह इस स्तर का है ।
लेकिन भीम अर्जुन उसे अपनी पालकी में स्वयं ढोकर राजमहल ले आये ।।

भगवान ने द्रौपदी से कहा कि इनके लिए तुम विभिन्न पकवान बनाओ ।
द्रौपदी ने ही परोसा । 
तो जब वह खाने लगे तो , शंख बजकर फिर चुप हो गया ।

अब श्रीकृष्ण ने कहा अरे अब क्या बात है ।
तो शंख की ओर क्रोध करके देखा तो शंख ने कहा कि भगवन मेरा कोई दोष नहीं , आप द्रौपदी से पूँछे ।

द्रौपदी ने बताया हाँ कि मेरे मन मे यह आया की पूरे दिन भर से मैं विभिन्न पकवान बना रही हूं और ये सभी पकवानों को एकसाथ मिलाकर खाने लगे तो इनको स्वाद कैसे पता लगेगा , मेरा परिश्रम बेकार जाते हुए देखकर मैंने सोचा कि है तो ये श्वपच वाल्मीकि जाति का ही न , इसे भोजन करना कहाँ आएगा ।

तो इसका कारण पूछा श्रीकृष्ण ने वाल्मीकि से कि भगवन आप बतायें आपने ऐसा क्यों किया कि सभी व्यंजनों को एक साथ मिलाकर खा रहे हैं ।

तो उन्होंने बताया कि प्रभु आपने पा लिया बस इसी को प्रसाद समझकर मैं इसे प्राप्त कर रहा था। अलग अलग भोजन करता तो सबका अलग अलग रस आता तो उसमें प्रसाद की भावना तिरोहित हो जाती और जिह्वा का रस ही रह जाता ।।

यह सुनकर द्रौपदी के मन में श्रद्धा हुई और उन्होंने प्रणाम किया ।

तब शंख ने बजकर यज्ञ की पूर्णाहुति की । 

इन्हीं शास्त्रों को सही सही न पढ़कर जय भीम प्रजाति जलाती , थूकती और चप्पल मारती है ।

अगर मन में कुछ जानने की अभिलाशा होती तो वह स्वयं किसी ब्राह्मण के पास जाकर इस सबका रहस्य पूछते ।।
आज इसीलिए यह सब इतनी वैमनस्यता आ गयी है ।

हाँ यह जानता हूँ कि हमारे यहाँ भी किसी को चाहे ब्राह्मण ही क्यों न हो , उसने कोई अपराध किया होता था तो सरपंच उसका घोड़ा पर बैठने का अधिकार , दाढ़ी मूंछ , पगड़ी पहनने का अधिकार छीन लिया जाता था और उन्हें गाँव से बहुत दूर कर दिया जाता था । उसको उसके वर्ण से भी च्युत कर दिया जाता था । 

यह उनका दंड होता था ।

जो आज एक प्रथा के रूप में विकसित हो गयी ।

अब उनके पूरे कुल को बहिष्कृत दृष्टि से देखा जाता है ।

जो कि पूरी तरह ग़लत है ।
ऐसा नहीं होता कि अपराधी के वंश में अपराधी ही जन्म लेगा ।।

इनको मंदिरों से प्रवेश वर्जित कर दिया गया था क्योंकि यह मंदिरों में बिना शुद्धता धारण किये हुए प्रवेश कर जाते थे । 
मांस रक्त चमड़ा आदि का कार्य करते हुए भी यह अशुचि अवश्था में ही मन्दिर की मर्यादा भंग कर देते थे ।
पहले शुद्र मन्दिर से स्वर्ण आदि चुरा ले जाते थे । 
इसीलिए स्वर्ण चोरी को 5 महापाप की श्रेणी में रखा गया ।

तभी से यह परम्परा के नाम पर विकसित होता चला गया और पूर्वजों के अपराधों को लेकर उनके सन्ततितियों को भी लपेट लिया गया ।

तो बस यही होता है कि सब चीजें समय के साथ स्वरूप बिगाड़ लेती हैं और एक ग़लत परम्परा के नाम पर बन जाती हैं ।

लेकिन अब वह बात नहीं रही है ।
धीरे धीरे यह सब समाप्त हो रहा है ।

आज भी सनातन धर्म सभी वर्णों को साथ लेकर चलती है ।।
शूद्र वर्णों का भी उतना ही महत्व है जितना सबका है ।
इनको प्रजा बोला जाता है ।
विवाह में यह जितना माँग ले , सब इनको दिया जाता है ।
अरे बस विवाह में थाली बजाने तक का इनको वस्त्र , सोने की अंगूठी , कई बोरे अनाज तक दिया जाता है ।

किसी का भी विवाह हो तो 1 लाख से ऊपर बटाई होती है प्रजा के लिए जिसमें इनको धोती साड़ी सब दिया जाता है ।

अगर 1 बीघा खेती होगी तो इनके लिए 1 बिस्सा ऐसे ही छोड़ दिया जाता है अनाज का कि ये इनका हिस्सा है ।

अस्तु । सार यही है कि कालांतर में सबका स्वरूप बिगड़ जाता है ।

मुख्य है भगवद भक्ति और भगवान के मार्ग पर जो चल गया , वह चांडाल उस ब्राह्मण से श्रेष्ठ है जो गुटखा खाकर पैर पूजवा रहा है ।।

बहुत से कथावाचक जो कि कई मेरे मित्र भी हैं , अपनी अज्ञानता का परिचय जातिगत श्रेष्ठता को लेकर कर रहे हैं और द्वेष फैला रहे हैं , वह बिचारे अपनी छोटी बुद्धि के मारे हैं । उनको कुछ नहीं पता , उनको जाति और वर्ण तक में भेद नहीं पता तो उनको क्या ही कहा जाय ।

लेकिन इससे कुछ नहीं मिलेगा ।
 कितना भी श्रेष्ठ बन लो , मरने के बाद यह नहीं पूछा जाएगा कि यह ब्राह्मण था या शूद्र । उसे उसके कर्मों के अनुसार दण्ड और पुरस्कार मिलेगा । अपितु 50 Extra कोड़े उस ब्राह्मण को लगाए जायेंगे जो ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बावजूद भी पशुवत कार्य करता रहा और समाज को जोड़ने की बजाय जातिगत विषमता फैलाकर लोगों को भगवद तत्त्व से विमुख करने में लगा रहा । 

मुझे अच्छी तरह पता है कि जातीय विदूषक और दम्भी इस पोस्ट पर गालियाँ देंगे और इसको पढ़कर भी इसको आगे प्रसारित नहीं करेंगे लेकिन यह सदा से होता आया है कि पूरे सोशल मीडिया पर यही पोस्ट घूमती मिलेगी विभिन्न नामों से और बड़े बड़े न्यूज channels पर इसी तथ्य को लेकर debate किये जाते हैं ।।

फिर भी बहुत से लोग हैं जो मुझे जानते हैं और वही इन सब बातों का प्रचार प्रसार करेंगे ।

इतना लंबा पढ़ने के लिए धन्यवाद ।

- @topfans 
(श्वेताभ पाठक)
30/6/2026 

Shwetabh Pathak Shwet Prem Ras 

#viralreelschallenge #viral #post #reels

Thursday, 2 July 2026

घूस उपनिषद्(विकृतार्थ सहित)

घूस उपनिषद्
(विकृतार्थ सहित)
१. अथातो घूस जिज्ञासा।
= घूस तत्त्व तथा महत्व जानने की इच्छा है।
२. परिभाषा-अपना इच्छित कार्य कराने के लिए सरकारी कार्यालय में घुसने के लिए जो धन देना पड़ता है, उसे घूस कहते हैं।
राम दुआरे तुम रखवारे। 
होत न आज्ञा बिनु पैसा-रे॥
३. अन्य शब्द-
भेंटी = सरकारी अधिकारी से भेंट करने के लिए खर्च।
रिश्वत = अज्ञात अधिकारी से रिश्ता बनाने के लिए दिया धन। इसके विशेषज्ञ को सम्मान से रिश्वतश्री या रिशुश्री भी कहते हैं।
लांच (ओड़िया में प्रचलित) -कार्यालय अधिकारी को अपना काम कराने के लिए खिलाने को लांच कहते हैं। अतः कार्यालय समय के भोजन का नाम अंग्रेजी में लंच हो गया है।
४. धन का महत्त्व-रुपया (टंका) ही जीवन में सबकुछ है।
टका धर्मः टका स्वर्गः,टका हि परमां गतिः।
यस्य गृहे टका नास्ति, हा टके टकटकायते॥
(टका पर ध्यान केन्द्रित करने को टकटकी कहते हैं)।
यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः, स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः।
स एव वक्ता स च दर्शनीयः, सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति॥
५. सच्चा गुरु-विज्ञान, गणित, इंजीनियरिंग आदि पढ़ाने वाले असल गुरु नहीं हैं। परम गुरु वही है, जिसने अखण्ड मण्डलाकार (गोल सिक्का) पाने का मार्ग दिखाया।
अखण्ड मण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरवे नमः॥
६. सुकर्मी = सुकर्मी या सुकृति वह है, जिसके घर में रखी सम्पत्ति अभी तक छिपी हुई है, अर्थात् अलक्ष्मी है। उसी को बुद्धिमान भी कहा जा सकता है।
या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः।
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः।
(चण्डी पाठ, ४/५)
७. श्रेय मार्ग-जिससे श्री या प्रतिष्ठा मिले, उसी मार्ग पर चलना चाहिए। यह जिससे संपरेगा, वही धीर है।
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते॥
(कठोपनिषद्, १/२/२)
जिसके पास आय से अधिक सम्पत्ति (असम्भूति) है, वह अन्धकार में जाता है, कभी कभार निगरानी विभाग द्वारा पकड़ा जाता है। किन्तु वह पैसा दे कर छूट सकता है। उससे भी घने अन्धकार में वह जाता है, जिसके पास सीमित आय है, उसके पास घूस दे कर बचने के लिए कुछ नहीं है। नहीं भी पकड़ा जाए, तो वह धन के अभाव में सदा दुःखी तथा निन्दित रहता है।
✍️ Arun kumar Upadhyay 
2 july 2026 / Facebook post 
आषाढ़ कृष्ण २ विक्रम संवत २०८३ गुरुवार 

Wednesday, 1 July 2026

ताराचंद घनश्यामदास रामगढ़ शेखावाटी पोद्दार परिवार की ट्रेडिंग कंपनी का समृद्ध इतिहास

ताराचंद घनश्यामदास राजस्थान के रामगढ शेखावाटी में पोद्दार परिवार की एक जानी-मानी मारवाड़ी ट्रेडिंग और बैंकिंग फर्म थी। यह लगभग 1791 में बनी थी और 1957 तक चलती रही। यह पूरे भारत में फाइनेंस, अफीम, कपास और अनाज का व्यापार करती थी।
रामगढ़ सेठान का सारा टैक्स केवल सेठ भरते थे ।
1. इन्होंने काफी स्कूल , कॉलेज , हॉस्पिटल और धर्मशालाएं खोली थीं ।
2. रामगढ़ सेठान को उस समय #छोटा_काशी कहा जाता था क्योंकि उसमें 25 संस्कृत के विद्यालय थे , उसमे आयुर्वेद और ज्योतिष के लिए विद्यालय थे और उस समय जयपुर के अलावा केवल रामगढ़ में कॉलेज था ।
3. सभी विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा , मुफ्त खाना और सभी चीजें मिलती थीं ।
4. सेठों के लड़कों के विवाह में नगर के सभी लोग आमंत्रित होते थे और जो भी आता था उसे हेड़ा दिया जाता था जो कि बहुत प्रसिद्ध था । जो भी आता था उसे एक रुपये दिए जाते थे जाते समय कुछ लोग तो तो अपने साथ अपने मवेशी लाते थे उनके लिए भी ले जाते थे । एकबार एक आदमी लोटा भर के चीटे लाया और हर चीटे के लिए हेड़ा मांगा और उसे दिया भी गया ।
5. गौशाला में गायों के लिए 60-70 मन (2400 किलो)ग्वार रहता था जो कि जिसका प्रबन्द सेठों द्वारा किया जाता था ।
6. उनके लड़के की शादी के वक़्त खुली लूट रहती थी पूरे नगर में कोई भी जिसके घर मे शादी है उसकी दुकान से कुछ भी ले सकता था जिसका नुकसान जिस सेठ के लड़के की शादी है वो ही उठाता था ।
7. एकबार किसी गांव के एक गांववाले ने सीकर के महाराज से शिकायत की आप रामगढ़ वालों पे इतना ज्यादा ध्यान क्यों देते हैं । राजा ने उनकी परीक्षा ली कहा कि तुमलोग 1 करोड़ रुपये का प्रबन्द करो अभी । और पूरे सीकर में । लोगों ने मना कर दिया कहा ऐसा नहीं हो सकता है । फिर राजा ने अपने मंत्रियों से कहा कि रामगढ़ जाओ और सेठों को बोलो की महाराज को इस समय एक करोड़ रुपये चाहियें (इस समय के करीब अरबों में ) । मंत्री गए और सेठों को बताया । सेठों ने कहा कि राजा से पूछो की रुपये ,अन्ना ,पैसे किसमे चाहिए ? मंत्री आये और राजा को बताया । राजा ने कहा अब समझे मैं रामगढ़ सेठान का इतना ध्यान क्यों रखता हूँ । 
8. पोद्दारों ने वहाँ कुएं , तालाब , बावड़ी , मंदिर , छतरियाँ और आलीशान हवेलियां बनवाईं थीं वहीं रुइया ने कॉलेज , स्कूल और हॉस्पिटल इत्यादि ।
9. सेठ श्री अनंत राम पोद्दार जी जाड़ों में सियारों को लाडू और कंबल देते थे ताकि वो मर न जाएं ।
10. भक्तवारी देवी , सेठ श्री लक्ष्मी चंद पोद्दार जी की धर्म पत्नी गुप्त दान करतीं थीं । उन्होंने अपने मुनीम को बोल दिया था कि नगर में कोई भूखा नहीं रहना चाहिए न ही किसी को किसी बात की चिंता हो ।

शुरुआत और परिवार का इतिहास
इस फर्म की जड़ें शेखावटी इलाके के चुरू के पोद्दार परिवार से जुड़ी हैं, यह बंसल गोत्र के अग्रवाल थे जिनके शुरुआती पूर्वजों जैसे सेठ चतरभुज पोद्दार ने 18वीं सदी के आखिर में कमर्शियल काम शुरू किए थे चतरभुज के बेटों—जोहुरीमल, जिंदाराम, और ताराचंद—ने परिवार के व्यापार नेटवर्क को बढ़ाया, और ताराचंद के वंशज ही फर्म के मुख्य सदस्य बने जिंदाराम के बेटे मिर्ज़ामल (1790–1850) ने पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के दरबारी बैंकर के तौर पर काम किया और बीकानेर के महाराजा सूरत सिंह जैसे शासकों को 400,000 रुपये जैसी बड़ी रकम उधार दी यह फर्म परिवार के सदस्यों के बीच बंटवारे से बनी; ताराचंद की असमय मृत्यु के बाद, उनके बेटों गुरसहायमल और हरसहायमल ने परिचालन का प्रबंधन किया, गुरसहायमल के बेटे घनश्यामदास (मृत्यु 1885) ने नेतृत्व किया जब तक कि उनके अपने बेटों - राधाकृष्ण, केशवदास, और अन्य ने 19वीं शताब्दी के अंत में कार्यभार नहीं संभाला 1823 तक, पारिवारिक विभाजन ने शाखाओं को औपचारिक रूप दिया, जिसमें हरसमल रामचंद्र जैसी संबंधित फर्मों के साथ-साथ ताराचंद घनश्यामदास भी शामिल थे
ताराचंद घनश्यामदास ने हुंडी प्रणाली (विनिमय पत्र) के माध्यम से स्वदेशी बैंकिंग में उत्कृष्टता हासिल की, पूर्वी भारत के मुद्रा बाजार के केंद्र, बड़ा बाजार में अपने कलकत्ता बेस से बंगाल, बिहार और असम में व्यापार को वित्तपोषित किया इसने 1860 के आसपास कलकत्ता शाखा की स्थापना की, 1864 तक निर्देशिकाओं में सूचीबद्ध किया, और बम्बई (1868 से पूर्व), कराची, मथुरा (1833 तक) और यहां तक कि 1919 में न्यूयॉर्क तक विस्तार किया, न्यूयॉर्क कॉटन एसोसिएशन जैसे एक्सचेंजों में शामिल हो गया। प्रमुख गतिविधियों में मालवा के इलाकों में अफीम का व्यापार, कपड़ा वितरण (1917-1921 तक मुंगटूराम जयपुरिया जैसी फर्मों के साथ साझेदारी), तेल दलाली (शिवरामदास मोरारका जैसे भागीदारों को शेयर आवंटित किए गए) फर्म ने शेखावाटी गांवों से मुनीम (क्लर्क) नियुक्त किए, मुख्य रूप से अग्रवाल, निश्चित वेतन (51-351 रुपये सालाना) और भत्ते के साथ, परिवार और सामुदायिक संबंधों के माध्यम से वफादारी पर जोर दिया इसने मारवाड़ी प्रवासियों को ऋण, मुफ्त आवास और प्रारंभिक पूंजी प्रदान की, जबकि दिवाली खाता पूजा और नकद आधारित लेखा (परता प्रणाली) जैसी पारंपरिक प्रथाओं को बनाए रखा उल्लेखनीय वित्तीय पैमाने में 1919 में करों में 38 लाख रुपये और शासकों को ऋण शामिल थे, जैसे 1825 में बीकानेर को 127,000 रुपये का ऋण साझेदारी, जैसे कि 1905 से तेल में, अक्सर गद्दी (फर्म-विशिष्ट) नेटवर्क शामिल होते थे, 1933 में एक बड़ा विभाजन हुआ
1860 और 1919 के बीच बड़ी मारवाड़ी फर्मों में से एक मानी जाने वाली ताराचंद घनश्यामदास, शेखावाटी मारवाड़ियों के लोकल साहूकारी से भारत के देसी बैंकिंग और व्यापार पर हावी होने, जूट, कपास और अफीम में ब्रिटिश कमर्शियल हितों को फाइनेंस करने और कम्युनिटी नेटवर्क बनाने का एक उदाहरण है यह ट्रेडिंग कम्युनिटी के लिए एक मॉडल के तौर पर काम करती थी, जिसमें बिड़ला परिवार ने अपना इंडस्ट्रियल साम्राज्य बनाने से पहले इसके ब्रोकर के तौर पर शुरुआत की थी फर्म की एडजस्ट करने की क्षमता – पारिवारिक बंटवारे, पुरोहिती संबंधों और रिसोर्स शेयरिंग के ज़रिए – ब्रिटिश विस्तार और 1918 के बाद के बदलावों के बीच काम करती रही, जिससे 19वीं सदी तक भारत के नौ-दसवें हिस्से के व्यापार पर मारवाड़ियों का कंट्रोल हो गया इसके वाहिस (लेजर) और कर्मचारियों के इंटरव्यू पीढ़ियों से चली आ रही निरंतरता को दिखाते हैं, जो बचत, प्रतिष्ठा बनाए रखने और आपसी मदद के मूल्यों को दिखाते हैं, जिसने आधुनिक भारतीय एंटरप्रेन्योरशिप का रास्ता बनाया 1957 में फर्म बंद हो गई, जिससे पारंपरिक मारवाड़ी घरों से इंडस्ट्रियलाइज़्ड ग्रुप्स में बदलाव आया।
फर्म ने ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों के अनुकूल खुद को ढाल लिया, अंतर्देशीय रसद के लिए यूरोपीय एजेंसियों के साथ साझेदारी करते हुए पृथक बाज़ार अर्थव्यवस्था में एकीकृत हो गई। यह इजारा प्रणाली के तहत राजस्व खेती में शामिल थी यह जुड़ाव कॉलोनियल रेवेन्यू की मांगों के साथ जुड़ा हुआ था, जिससे ताराचंद घनश्यामदास को खेती की मार्केटिंग को फाइनेंस करने और श्रॉफ और आढ़तिया के तौर पर ट्रेड बिल की गारंटी देने का मौका मिला
1820-1840 के दशक में मालवा इलाके में अफीम एजेंसी कॉन्ट्रैक्ट मिलना एक अहम घटना थी, जहाँ इंदौर और आस-पास के अफीम इलाकों में ब्रांचों ने चीन जाने वाले उतार-चढ़ाव वाले एक्सपोर्ट के बीच सीधी सोर्सिंग और सट्टेबाजी को मुमकिन बनाया। जार्डाइन हेंडरसन जैसी ब्रिटिश फर्मों के साथ नेटवर्क के ज़रिए हासिल किए गए इन कॉन्ट्रैक्ट ने बंगाल की ईस्ट इंडिया कंपनी के कंट्रोल के बाहर मालवा के नॉन-मोनोपॉली प्रोडक्शन का फ़ायदा उठाया, जिससे 1840 के दशक तक बॉम्बे में शुरू हुए फ्यूचर ट्रेडिंग में फर्म की भूमिका को बढ़ावा मिला
1860 के दशक तक, ताराचंद घनश्यामदास मारवाड़ी व्यापारियों के बीच सबसे बड़ी "बड़ी फर्मों" में से एक बन गए थे, जो 1914 तक पूर्वी भारत में ब्रिटिश कंपनियों के बराबर थीं। कलकत्ता से काम करते हुए, शॉ वालेस और बर्मा ऑयल जैसी बड़ी यूरोपियन कंपनियों के लिए मुख्य (गारंटी ब्रोकर) के तौर पर काम किया इस भूमिका में बिल ऑफ़ एक्सचेंज की गारंटी देना और क्रेडिट फ्लो को आसान बनाना, कमीशन कमाना और फर्म को ब्रिटिश कमर्शियल नेटवर्क में गहराई से शामिल करना शामिल था। जो क्लासिक मारवाड़ी महाजन संरचना के हिस्से के रूप में ब्रोकरेज, सट्टेबाजी और स्थानीय संग्रह का प्रबंधन करते थे ये एजेंट, जो अक्सर ताराचंद घनश्यामदास जैसे स्थापित घरानों में क्लर्क के रूप में शुरुआत करते थे, ने फर्म की पहुंच सट्टा बाजारों में बढ़ा दी, जिसमें कमोडिटीज में वायदा कारोबार भी शामिल था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, फर्म ने आकर्षक अफीम व्यापार के माध्यम से चीन के साथ संबंध बनाए, अंतर्देशीय क्षेत्रों से पोस्त का स्रोत बनाया और पारसी व्यापारियों को आपूर्ति की, जिन्होंने इसे चीनी बाजारों में निर्यात किया और अहमदाबाद और सूरत में इकाइयों में इसका प्रसंस्करण किया।[3] परोपकारी प्रयासों ने ताराचंद घनश्यामदास की सामाजिक प्रतिष्ठा को बढ़ाया, इस तरह की गतिविधियों ने न केवल फर्म की प्रतिष्ठा को चमकाया बल्कि औपनिवेशिक बंगाल में मारवाड़ियों को आर्थिक बाहरी लोगों के रूप में देखने की धारणा के बीच सद्भावना को भी बढ़ावा दिया। औपनिवेशिक परियोजनाओं के वित्तपोषण में, ताराचंद घनश्यामदास ने जूट और तेल सहित वाणिज्यिक कृषि और निर्यात व्यापार के विस्तार को रेखांकित करके एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की मांगों का समर्थन किया। शॉ वालेस के लिए अपनी ब्रोकरेज के माध्यम से, फर्म ने उत्तर भारतीय क्षेत्रों में किसान कृषकों को ऋण के प्रवाह को सक्षम किया, जिससे औपनिवेशिक उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चे माल के उत्पादन और परिवहन में सुविधा हुई 20वीं सदी की शुरुआत तक, इसने फर्म को स्वदेशी पूंजी के शिखर पर पहुंचा दिया, जो औद्योगिक निवेशों की ओर संक्रमण करते हुए बाज़ार अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों को नियंत्रित कर रही थी।
1957 के बाद, परिवार में बंटवारे के बीच फर्म के ऑफिशियल तौर पर खत्म होने के बाद, इसके पोद्दार परिवार से अलग-अलग कंपनियाँ निकलीं, जो टेक्सटाइल और फाइनेंस जैसे अलग-अलग सेक्टर में काम करती रहीं; खास वारिसों में जयपुरिया परिवार से जुड़ी ब्रांच शामिल हैं, जिन्होंने असली गद्दी (फर्म सीट) मॉडल को आज़ाद भारत के इंडस्ट्रियल माहौल के हिसाब से अपनाया ये ब्रांच पोस्ट-कोलोनियल बिज़नेस तरीकों पर फर्म के लंबे समय तक चलने वाले स्ट्रक्चरल असर को दिखाती हैं। ऐतिहासिक रूप से, ताराचंद घनश्यामदास कॉलोनियल भारत में देसी कैपिटलिज़्म के उदय और कमज़ोरियों को दिखाते हैं। वे इस बात की चेतावनी देते हैं कि कैसे ग्लोबल ट्रेड में बदलाव – जो पहले विश्व युद्ध की रुकावटों और युद्ध के बाद डीकोलोनाइज़ेशन से और बढ़ गए – ने पारंपरिक बड़ी फर्मों को खत्म कर दिया, जिससे मॉडर्न कंपनियों के लिए रास्ता बना, साथ ही माइग्रेशन, रिश्तेदारी और इकोनॉमिक नेशनलिज़्म के आपसी असर को भी दिखाया। साहित्य में इसकी विरासत अभी भी खास है, पोद्दार अभिनंदन ग्रंथ (1950s) जैसे मारवाड़ी बायोग्राफिकल कलेक्शन में इसके कुछ ज़िक्र हैं, जो वैष्णव समाज सेवा के ज़रिए इसके कल्चरल संरक्षण का त्यौहार मनाते हैं
ऐतिहासिक मारवाड़ी फर्म तारा चंद घनश्यामदास 1957 के दशक में भंग हो गई और कई उत्तराधिकारी शाखाओं में विभाजित हो गई। पोद्दार और नेओटिया परिवार के वंशजों ने राधाकृष्ण बिमल कुमार, पोद्दार ग्रुप वेंचर्सऔर नेवटिया ग्रुप जैसे समूह स्थापित किए , जबकि श्रीकुमार पोद्दार और रोहित पोद्दार जैसे अन्य लोगों ने रियल एस्टेट जैसे आधुनिक उद्यमों में कदम रखा।मुख्य वंशज और उनके वर्तमान समूह इस प्रकार हैं:राधाकृष्ण बिमल कुमार / नेओटिया समूह: बिमल कुमार पोद्दार (एक दत्तक वंशज) द्वारा सुरेश और विनोद नेवटिया के साथ मिलकर स्थापित किया गया। यह समूह रियल एस्टेट, आतिथ्य सत्कार और इंजीनियरिंग (जैसे, अंबुजा नेओटिया समूह) में विस्तारित हुआ।पॉद्दार ग्रुप (अमेरिका/यूरोप): मूल फर्म के प्रत्यक्ष वंशज श्रीकुमार पॉद्दार द्वारा स्थापित, जो अंतरराष्ट्रीय निवेशों पर ध्यान केंद्रित करता है।पॉद्दार हाउसिंग एंड डेवलपमेंट: इसका संचालन रोहित पॉद्दार द्वारा किया जाता है, जो मुंबई में रियल एस्टेट का कारोबार संभालने वाले उनके वंशज हैं।
 ( पॉद्दार हाउसिंगके बारे में विस्तृत जानकारी )। 
क्या आप पोद्दार/नियोटिया परिवार की वर्तमान पीढ़ियों केविशिष्ट रियल एस्टेट, आतिथ्य सत्कारया अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक उपक्रमोंके बारे में अधिक जानना चाहेंगे।
✍️Praveen Pareek 

बेमोल मित्रता

॥ॐ॥

    मित्रता हैं बेमोल -

         बात उन दिनों की है जब श्री चैतन्य महाप्रभु नवद्वीप में ‘निमाई’ के नाम से जाने जाते थे। व्याकरण की शिक्षा के पश्चात वे न्यायशास्त्र लिख रहे थे। संयोगवश उन्हीं दिनों निमाई के सहपाठी मित्र श्री रघुनाथ जी भी न्यायशास्त्र पर ही ‘दीधिति’ नामक उस महान ग्रंथ की संरचना में तल्लीन थे जिसे आगे चलकर विद्या का प्रख्यात ग्रंथ माना गया। श्री रघुनाथ जी को अपने इस ग्रंथ के विद्वतापूर्ण लेखन पर बहुत आत्माभिमान था। 
विचित्र संयोग देखिये कि उन्हीं दिनों किसी कार्य विशेष से दोनों मित्रों को एक ही नाव मंे बैठकर कहीं बाहर जाना पड़ा। दोनों मित्र परस्पर पुराने दिनों की सुखद यादों को बटोर-बटोर कर अपने हृदयों को आह्लाद से भर रहे थे। यकायक रघुनाथजी के हाथ में अपने मित्र निमाई का संरचनाधीन न्यायशास्त्र आ गया और वे उसे पढ़ने लगे । निमाई द्वारा लिखे इस ग्रंथ को वे ज्यों ज्यों पढ़ते जा रहे थे त्यों त्यों उनके चेहरे के खुशनुमा भाव क्षीण होते जा रहे थे। विद्वतापूर्ण लेखन के लिए आत्ममुग्ध एवं आत्म गौरवान्वित रघुनाथजी के चहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। पढ़ते पढ़ते उन्हें यह निश्चयपूर्वक लगने लगा कि निमाई के इस ग्रंथ के सामने उनका स्वयं का लिखा ग्रंथ नितान्त तुच्छ है। लाख रोकते हुए भी श्री रघुनाथ जी की वो आंखे जो पल भर पहले खुशी से चहक रही थीं अब खुद को ग्लानि केे आंसू बहाने से रोक नहीं पा रहीं थीं। मित्र की अन्तर्व्यथा समझने में सरल हृदयी निमाई ने क्षण मात्र की भी देर नहीं की। 
           पलक झपकते ही निमाई ने अपने मित्र श्री रघुनाथजी के हाथ से अपना नव रचित ग्रंथ खींच लिया और जब तक मित्र को पूरी बात समझ में आती उससे पहले ही अपने नव रचित ग्रंथ को धीरे से नदी में यह कहते हुए बहा दिया कि
 ‘‘जो ग्रंथ मेरे मित्र को संताप देने का कारण बने, उसे अस्तित्व में ही नहीं आना चाहिये।’’ 
आनन फानन में घटी इस घटना से जहां एक ओर श्री रघुनाथ जी हक्के बक्के रह गये और उनकी जिह्वा से एक शब्द भी नहीं फूट पड़ा, वहीं दूसरी ओर निमाई के सौम्य चेहरे पर कान्ति और गहरे आत्म संतोष की दिव्य रेखाएं और भी गहरी और उज्ज्वलतर हो उठीं। मानो वातावरण में महासंत तुलसीदास के इस दोहे -  
*जो ना मित्र दुख होई दुखारी ।*
 *तिन्हें बिलोकत पातक भारी।।* 
 से सावचेत होकर मित्र व्यथा के समग्र भाव जीवंत होकर स्वयं कह उठे हों -‘निमाई तुम्हारी जय हो ।
 तुमने तो मित्र के मन की अनकही अछन्तर्व्यथा को समझकर ही न केवल स्वयं को पातकी की उपमा से बचा लिया बल्कि अपनी मित्रता को सर्वप्रशंसनीय और धन्यभागी बना दिया। तुम धन्य हो!
तुम्हारी मित्रता धन्य है !!’’
मित्रता की महिमा में चार चांद लगाने वाली एक कहावत है कि मित्र के लिए जान देना इतना मुश्किल नही हैं जितना मुश्किल ऐसे मित्र को खोजना , जिसके लिए जान दी जा सके। 
                            ----------------

Tuesday, 30 June 2026

आचार्य अग्निव्रत जी की पुस्तक " मेरी गौरवशाली परम्परा " पर आर्य समाजी अर्थ और पौराणिक अर्थ पर शचीन्द्र शर्मा जी द्वारा तुलना करते हुए समीक्षात्मक पोस्ट

कल शिवांश जी ने आर्यसमाजी आचार्यअग्निव्रत जी की लिखी एक पुस्तक भेजी - जिसका नाम है "मेरी गौरवशाली परम्परा"। पुस्तक के शीर्षक को देखकर ही बड़ी हँसी आई। ऐसा प्रतीत हुआ मानो कोई फटेहाल ठग अपनी टूटी-फूटी झोपड़ी पर बोर्ड लगा रहा हो कि यह प्राचीन राजाओं का महल है।

इसमें अग्निव्रत जी पुराण के लाखों श्लोकों में से अपने काम के आठ-दस श्लोक निकालकर उन्हें लिखते हैं और उसे सनातनी परम्परा बताते हैं, और फिर उन्हीं हमारे ग्रंथों से अपने काम के श्लोक निकालकर उसे अपनी परम्परा बताते हैं। कुछ स्थानों पर तो इनकी मूर्खता दर्शनीय है कि बालकाण्ड के श्लोक लिखकर उसे हिन्दुओं की परम्परा बता रहे हैं, और किष्किन्धाकाण्ड के श्लोक लिखकर उसे अपनी श्रेष्ठ परम्परा बता रहे हैं। ऐसी अद्भुत मूर्खता विरले ही देखने को मिलती है।

जब कि वास्तविकता में, अग्निव्रत जी की गौरवशाली परम्परा यह है कि इनकी परम्परा ब्रह्मा जी से नहीं, बल्कि दयानन्द से शुरू होती है। उन दयानन्द से, जिनके मरने के बाद आर्यसमाजियों को उनके पिता का नाम भी नहीं पता था। फिर जब खोजने निकले तो ऐसा ज़ोर लगाया कि उनके दो-तीन बाप खोज मारे। आधे आर्यसमाजी लड़ते हैं कि दयानन्द के पिता अम्बाशंकर थे और आधे कहते हैं कि कर्शनजी थे। देखिए तो कितनी गौरवशाली परम्परा है। 

अग्निव्रत बताएँ, दयानन्द से पहले उनकी परम्परा कहाँ थी, कौन आचार्य थे, कौन इनके जैसे दयानन्दी मत वाले थे? अरे, तुम्हारे पंथ-प्रवर्तक दयानन्द जो थे, वे स्वयं एक शिवलिंग-पूजक पौराणिक के वीर्य से ही पैदा हुए थे, पौराणिकों से ही सन्यास में दीक्षित हुए थे, पौराणिकों से ही वेद,योग, व्याकरण आदि की शिक्षा पाए थे। और आप , आचार्य अग्निव्रत, भी पौराणिक के ही वीर्य से पैदा हुए हो या नहीं? आपके बाप-दादा राम-राम, कृष्ण-कृष्ण जपने वाले थे या नहीं थे? कहाँ है तुम्हारी परम्परा? इस अनार्यसमाज की स्थापना से लेकर अब तक तुम्हारे जितने भी कथित विद्वान हुए हैं, सब के सब की उत्पत्ति में पौराणिक वीर्य ही है। तुम कहाँ, चार दिन से अपनी दुकान सजाकर उसे ब्रह्मा जी से शुरू बता रहे हो?

अब दयानन्द से शुरू हुई इनकी गौरवशाली परम्परा को भी ज़रा देखिए तो। इनके पंथ-प्रवर्तक विरजानन्द से शिक्षा प्राप्त करके सब पढ़-लिखकर भी मूर्तिपूजा किया करते थे, पुराण को प्रमाण मानते थे, अवतारवाद मानते थे; वह सब मानते थे जिसकी बाद में उन्होंने निन्दा की। इसमें क्या गौरव है? भाँग पी-पीकर दयानन्द दो-दो दिन बेसुध पड़े रहते थे, इतने नशे में रहा करते थे कि बैल की मूर्ति की गुदा से होकर उसके भीतर घुस जाया करते थे, उन्हें खट्टी दही पिलाकर उनका नशा उतारा जाता था। इसमें क्या गौरव है? संन्यासी होकर दयानन्द, मनुष्य-शरीर में नाड़ी खोजने के लिए लाशों की चीर-फाड़ कर रहे थे; इसमें गौरव था क्या?

दयानन्द अधेड़ उम्र तक मूर्तिपूजा में विश्वास करते थे, फिर मुकर गए; पुराण को मानते थे, फिर मुकर गए; ब्राह्मण-ग्रंथ को वेद मानते थे, फिर मुकर गए; अवतारवाद मानते थे, फिर मुकर गए; मुक्ति को सदैव के लिए मानते थे, फिर मुकर गए; श्राद्ध को मानते थे, फिर मुकर गए। अग्निव्रत जी, में आपको चुनौती देता हूँ कि आप दयानन्द के चार ऐसे चार सिद्धान्त नहीं बता सकते, जिन पर दयानन्द ने अपना मत न बदला हो। दयानन्द मांसभक्षण का समर्थन करते थे, कभी गाय की बलि का समर्थन करते थे। कभी कुछ, कभी कुछ। अपने पूरे जीवनकाल में जो व्यक्ति प्रत्येक विषय पर बार-बार अपना मत बदलता रहे, उसे आप्त पुरुष कहा जाएगा या भ्रांत पुरुष कहा जाएगा? क्या इस भ्रांतता को तुम गौरवशाली कहते हो? बताओ, इसमें क्या गौरव है?

दयानन्द ने वेदभाष्य तक तम्बाकू-ज़र्दा खाते हुए, हुक्के के धुएँ के छल्ले उड़ाते हुए, नसवार सूँघते हुए किए थे। यह गौरव की बात थी? दयानन्द की जीवनी में स्पष्ट लिखा है कि पूरे जीवन भर वे नशा तो करते ही रहे, वेदभाष्य करते समय भी नशा किया करते थे। यह परम्परा कौन से ऋषि-मुनियों से जुड़ी है, अग्निव्रत जी? यह तम्बाकू चबाकर कौन तुम्हारे प्राचीन ऋषि-मुनि वेद पढ़ा करते थे, भाष्य करते थे? शर्म नहीं आती दयानन्द को इतिहास का सबसे महान ऋषि कहते हुए?

आचार्य सायण और पुराण से तुम दो-चार कथन खोज लाते हो इन्हें बदनाम करने को, किन्तु दयानन्द से शुरू हुई अपनी गौरवशाली परम्परा में तुम्हें अश्लीलता, अधर्म आदि नहीं दिखता? चलो, थोड़ी-सी झलक हम दिखा देते हैं।

दयानन्द एक स्त्री को ग्यारह पुरुषों तक नियोग करने का आदेश दे गए हैं। अग्निव्रत जी, आपकी शिष्याओं के संतान न हो रही हो तो उन्हें ग्यारह खसम करने को कहोगे क्या? इसमें क्या गौरव है? अगर यही गौरव है तो आप 11 की जगह 110 खसम बनवाकर इस गौरव को दस गुना बढ़ा क्यों नहीं देते? बताओ ज़रा, यह दयानन्द के एकादश-नियोग का प्रमाण कौन-सी प्राचीन परम्परा व शास्त्र में आता है?

इनकी गौरवशाली परम्परा यह है कि दयानन्द नशे में किए गए वेदभाष्यों में इन्हें कहीं बकरे का दूध पीने का आदेश देकर गए हैं, कहीं बैल से संभोग करने को कह गए हैं, कहीं इनकी गुदा में इन्हें अंधे कुटिल सर्प घुसाने को कह गए हैं, कहीं स्त्री के गुप्तांगों पर शहद लगाने का कह गए हैं। अग्निव्रत जी, इसमें आपको अश्लीलता व अधर्म दिखता है या नहीं? इस पर भी गौरव होता है? ज़रा इस परम्परा की प्राचीनता दिखाएँगे क्या? आपके पूर्वज तो साँपो का केवल खेल ही देखा करते थे।

एक उदाहरण इनकी पुस्तक से दिखाते हैं कि ये किस चतुराई से, छल करते हुए, पुराण आदि के इतिहास को दुर्भावना से गलत प्रकार से प्रस्तुत करके सामान्य जनता को भ्रमित करते हैं।

अग्निव्रत अपनी पुस्तक में पुराण का श्लोक लिखते हैं -"पञ्चलक्षगवां मांसैः सुपक्वैर्घृतसंस्कृतैः।" (ब्रह्मवैवर्तपुराण)

इसका अर्थ करते हैं - "(आयोजन में) पाँच लाख गायों के घृत में भलीभाँति पकाए गए मांस रहते थे।"

अग्निव्रत जी, यह वचन अथर्ववेद के मंत्र "अपूपवान् मांसवान् चरुरेह सीदतु" इस वेदमंत्र की व्याख्या ही है, जैसा कि सिद्ध है कि पुराण वेद का ही अनुसरण करते हैं। तब क्या आप वेद के इस मंत्र में भी मांस का अर्थ पशु का मांस मानेंगे?

जो अर्थ अथर्ववेद के इस मंत्र में होगा, वही अर्थ इस श्लोक में भी होगा।

किन्तु अग्निव्रत जी जैसे समाजी, वेद में लिखा हो कि "मांस खाओ", तो कहेंगे कि मांस का अर्थ यहाँ अन्न है, चावल है, औषधि है; लेकिन वेद का ही अनुसरण करने वाले पुराण में ऐसा लिखा दिखे तो वहाँ ये अर्थ नहीं लगाएंगे। वहाँ उस श्लोक को उठाकर दुष्प्रचार करेंगे।

यहाँ मांस परमान्न को कहा गया हैं।परमान्न खीर को कहा जाता है, जैसा कि अमरकोश में लिखा है - "परमान्न तु पायसम्" (अमरकोश)। पुराण में यहाँ मांस शब्द से खीर अर्थ ग्रहण होगा।

अतः श्लोक में पाँच लाख गायों के घृत से निर्मित खीर की बात कही गई है, न कि गाय का मांस खाने या अन्य किसी पशु का मांस खाने की बात है।

अग्निव्रत जी की गौरवशाली परम्परा को भी देखिए - सन् 1932 में प्रकाशित संस्कार-विधि के पृष्ठ संख्या 12 पर लिखा है - "जो चाहे कि मेरा पुत्र पंडित ...... सब वेद-वेदांग विद्या का पढ़ने और पढ़ाने वाला हो, वह मांसयुक्त भात को पका के पूर्वोक्त घृतयुक्त खावे, तो वैसे पुत्र का होना संभव है।"

इसके अतिरिक्त दयानन्द ने अपनी प्रथम सत्यार्थप्रकाश में लिखा था कि - "मांस तथा अन्य खाद्य पदार्थों का यज्ञ में होम करने के पश्चात सेवन किया जाए।" अपनी इस पुस्तक में दयानन्द वन्ध्या गाय और बैल की बलि को भी वेदसम्मत बताने जैसा पाप लिखकर गए हैं।

अग्निव्रत जी निष्पक्ष या सत्यवादी हैं तो इन सबको भी अपनी गौरवशाली परम्परा में क्यों नहीं लिखते? केवल पुराण व हिन्दू धर्म में ही दोष दिखते हैं? आप नहीं लिखते, किन्तु हिन्दू धर्म में दोष ही दोष देखने की, उसका दुष्प्रचार करने की प्रवृत्ति है। इससे व्यथित होकर हमें ही यह सब बताना पड़ता है। तब आपको समस्या होती है कि हमारी गौरवशाली परम्परा क्यों बताई जा रही है, तब फिर गालियाँ देते हैं।
✍️शचीन्द्र शर्मा 
( फेसबुक पोस्ट दिनांक ३० जून २०२६ ईस्वी )
आषाढ़ कृ१ विक्रम संवत २०८३ मंगलवार