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Thursday, 9 April 2026

जगन्नाथ_जी की रसोई और #विज्ञान..

05. #पांचवीं कड़ी... #जगन्नाथ_जी की रसोई और #विज्ञान...........क्या आपने कभी सोचा है कि इस आधुनिक विज्ञान की चकाचौंध के बीच एक ऐसी जगह भी है जहाँ वक्त उल्टा चलता है? एक ऐसी रसोई जहाँ गुरुत्वाकर्षण (Gravity) और ऊष्मा (Heat) के नियम घुटने टेक देते हैं और जहाँ आग सबसे नीचे जलती है पर पकवान सबसे ऊपर वाली हांडी में पकता है! यह कोई जादुई कहानी नहीं, बल्कि जगन्नाथ पुरी की वह 'क्वांटम लैब' है जिसे दुनिया रसोई कहती है। अगर आप सोचते हैं कि आपने दुनिया के सारे अजूबे देख लिए हैं, तो 'प्रयाग फाइल्स' की यह पड़ताल आपकी सोच की चूलें हिला देगी।

जगन्नाथ मंदिर (Jagannath Temple) की रसोई, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी रसोई माना जाता है, वहां भोजन पकाने की यह विधि विज्ञान और श्रद्धा का एक अद्भुत संगम है। इसे 'अटिका' (Atika) पद्धति कहा जाता है।
मंदिर की रसोई में भगवान का महाप्रसाद मिट्टी के बर्तनों में पकाया जाता है। इन बर्तनों को एक के ऊपर एक करके रखा जाता है, जिनकी कुल संख्या सात होती है। इस प्रक्रिया को 'सप्तपुरी' (Saptapuri) भी कहा जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो सामान्यतः आग के सबसे पास वाले बर्तन का खाना सबसे पहले पकना चाहिए, लेकिन यहाँ स्थिति बिल्कुल उलट होती है। सबसे ऊपर रखी सातवीं हांडी (Pot) का भोजन सबसे पहले तैयार होता है और उसके बाद क्रमशः नीचे की ओर पकने का क्रम बढ़ता है। अंत में सबसे नीचे वाली हांडी का खाना पकता है।
इसके पीछे का मुख्य कारण 'वाष्प शक्ति' (Steam Power) और 'वायु का दबाव' (Air Pressure) माना जाता है। जब सबसे नीचे के चूल्हे में अग्नि प्रज्वलित की जाती है, तो उसकी ऊष्मा (Heat) सीधे ऊपर की ओर उठती है। मिट्टी के बर्तन छिद्रपूर्ण (Porous) होते हैं, जिससे गर्म भाप ऊपर की ओर तेजी से यात्रा करती है। चूंकि सबसे ऊपर वाली हांडी का ढक्कन बंद होता है, इसलिए गर्म भाप वहां एकत्रित होकर दबाव बनाती है। इस तीव्र ऊष्मा और भाप के दबाव के कारण सबसे ऊपर का अनाज सबसे पहले पककर तैयार हो जाता है।
आध्यात्मिक रूप से भक्त इसे जगन्नाथ स्वामी की लीला और आशीर्वाद मानते हैं। उनका मानना है कि महाप्रभु स्वयं सबसे ऊपर बैठकर भोजन के पकने की प्रतीक्षा करते हैं, इसलिए वह हिस्सा सबसे पहले सिद्ध (Ready) होता है।
इस पूरी प्रक्रिया में केवल लकड़ी का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है और गंगा-यमुना नामक दो विशेष कुओं के पानी का ही प्रयोग होता है। यह परंपरा सदियों से बिना किसी बदलाव के आज भी जीवंत है।

स्कंद पुराण के 'उत्कल खंड' में 'पुरुषोत्तम महात्म्य' के अंतर्गत जगन्नाथ मंदिर की महिमा का वर्णन है। यहाँ स्पष्ट उल्लेख है कि इस रसोई की मालकिन स्वयं माता लक्ष्मी हैं।

शास्त्रों के अनुसार, रसोई में भोजन भले ही 'सुआरा' (पुजारी रसोइए) बनाते हैं, लेकिन मान्यता है कि माता लक्ष्मी स्वयं अदृश्य रूप से वहां उपस्थित रहकर भोजन की शुद्धता और स्वाद का ध्यान रखती हैं।

 यहाँ के महाप्रसाद को 'अन्न ब्रह्म' कहा गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि भगवान जगन्नाथ का प्रसाद कभी भी अपवित्र नहीं होता और इसे ग्रहण करने से व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं।

अब आइए 
सात परतों का रहस्य समझिए । शास्त्रों में सात की संख्या का बड़ा महत्व है (जैसे सप्तर्षि, सात लोक, सात चक्र)। रसोई में सात हांडियों को एक के ऊपर एक रखना 'सप्तपुरी' या सात लोकों का प्रतीक माना जाता है।
ऊपर से नीचे पकने का क्रम: वैज्ञानिक रूप से 'वाष्प दबाव' (Steam Pressure) है, लेकिन शास्त्रों में इसे 'महाप्रभु की कृपा' कहा गया है। मान्यता है कि भगवान सबसे ऊपर विराजमान होकर पहले ऊपरी हिस्से को सिद्ध (Accept) करते हैं, उसके बाद ही वह नीचे की ओर बढ़ता है।

प्राचीन ग्रंथों में भोजन पकाने की चार विधियों का वर्णन मिलता है, जिनमें से 'भीमपाक' (Bhimapaka) विधि का उपयोग यहाँ मुख्य रूप से होता है। यह विधि धीमी आंच और भाप के सही संतुलन पर आधारित है।

शास्त्रों के अनुसार, जब तक जगन्नाथ जी को अर्पित किया गया भोजन माता विमला को अर्पित नहीं कर दिया जाता, तब तक वह 'प्रसाद' नहीं बल्कि केवल 'भोग' कहलाता है। माता विमला को अर्पित होने के बाद ही वह 'महाप्रसाद' बनता है।
 रसोई में प्रयोग होने वाले दो विशेष कुओं का उल्लेख भी शास्त्रों में है, जिन्हें गंगा और यमुना का स्वरूप माना गया है।

संक्षेप में, यह केवल एक चमत्कार नहीं है, बल्कि यह प्राचीन भारतीय 'पाक विज्ञान' और 'योगिक दर्शन' का एक जीवित उदाहरण है जिसे शास्त्रों ने 'दिव्य लीला' के रूप में संजोया है।

मान्यता है कि मंदिर की रसोई में भोजन स्वयं माता लक्ष्मी की देखरेख में पकता है, इसलिए इसकी शुद्धता की जांच कोई मनुष्य नहीं बल्कि स्वयं दैवीय शक्तियां करती हैं।

कुत्ते का रहस्यमयी संकेत यही है। 
जगन्नाथ मंदिर के नियमों के अनुसार, यदि मंदिर परिसर के भीतर कहीं भी कुत्ता दिखाई दे जाए, तो उसे माता लक्ष्मी के असंतोष का प्रतीक माना जाता है।
यदि भोजन पकने के दौरान या भगवान को भोग लगाने से पहले मंदिर परिसर में कोई कुत्ता प्रवेश कर जाए, तो माना जाता है कि भोजन बनाने की प्रक्रिया में कोई अशुद्धि (Impurity) रह गई है।

 ऐसी स्थिति में, उस दिन का बना हुआ पूरा भोजन, चाहे वह हजारों लोगों के लिए ही क्यों न हो, उसे तुरंत मंदिर के पास एक गड्ढे में गाड़ दिया जाता है। उसे न तो भगवान को चढ़ाया जाता है और न ही भक्तों को बांटा जाता है।
 इसके बाद रसोई की पूरी सफाई की जाती है और नए सिरे से भोजन तैयार किया जाता है।

मंदिर के पास ही 'माँ कुतमा चंडी' का एक छोटा सा स्थान है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता लक्ष्मी ने ही कुतमा चंडी को यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वे रसोई की शुद्धता पर नजर रखें।
यदि रसोइयों के मन में कोई विकार हो या भोजन शास्त्रोक्त विधि से न बना हो, तो कुतमा चंडी के प्रभाव से ही वहां कुत्ता दिखाई देता है, जो एक 'चेतावनी' की तरह होता है।
केवल कुत्ता ही नहीं, बल्कि एक और कड़ी परंपरा है। 

यह नियम इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि जगन्नाथ जी को चढ़ाया जाने वाला 'महाप्रसाद' पूरी तरह से सात्विक, शुद्ध और दैवीय ऊर्जा से भरपूर हो। यही कारण है कि आज के आधुनिक युग में भी यहाँ की पवित्रता और स्वाद वैसा ही बना हुआ है जैसा सदियों पहले था।

जगन्नाथ मंदिर के महाप्रसाद की सुगंध के बारे में जो सबसे रहस्यमयी बात कही जाती है, वह यह है कि जब रसोइए (Suara) रसोई से मंदिर के गर्भगृह तक भोग ले जाते हैं, तो उस अन्न से कोई विशेष सुगंध नहीं आती। लेकिन जैसे ही वह भोग जगन्नाथ स्वामी को अर्पित कर दिया जाता है और माता विमला को भेंट किया जाता है, वैसे ही अचानक पूरे परिसर में एक ऐसी अलौकिक सुगंध (Celestial Fragrance) फैल जाती है जो दुनिया के किसी भी मसाले या इत्र से संभव नहीं है।

श्रद्धालु और विशेषज्ञ बताते हैं। 
भोजन पकते समय सादा होता है, लेकिन 'अन्न ब्रह्म' बनते ही उसकी सुगंध बदल जाती है। विज्ञान की भाषा में कहें तो यह 'फूड केमिस्ट्री' (Food Chemistry) का वह हिस्सा है जिसे आज भी लैब में री-क्रिएट (Re-create) नहीं किया जा सका है।
इस सुगंध में मिट्टी की सौंधी खुशबू, शुद्ध देसी घी और जल की पवित्रता का ऐसा मिश्रण होता है जिसे भक्त 'बैकुंठ की गंध' कहते हैं।

कहा जाता है कि इस महाप्रसाद की सुगंध मात्र से ही व्यक्ति की आधी भूख मिट जाती है और मन में एक असीम शांति का संचार होता है।
प्रयागराज (Prayagraj) के संगम की तरह ही, पुरी का यह प्रसाद भी श्रद्धा और विज्ञान की धाराओं का मिलन है। 

भौतिक विज्ञान (Physics) के अनुसार ऊष्मा हमेशा स्रोत के निकटतम बिंदु पर सबसे प्रभावी होती है। लेकिन जगन्नाथ रसोई में 'रिवर्स थर्मल ग्रेडिएंट' (Reverse Thermal Gradient) काम करता है।

छिद्रयुक्त नैनो-चैनल्स (Porous Nano-Channels): मिट्टी की हांडियों की संरचना में मौजूद सूक्ष्म छिद्र एक 'कैपिलरी नेटवर्क' (Capillary Network) की तरह काम करते हैं। जब आग जलती है, तो वह केवल गर्मी पैदा नहीं करती, बल्कि मिट्टी के बर्तनों के भीतर मौजूद नमी को 'सुपर-हीटेड स्टीम' (Super-heated Steam) में बदल देती है।
नीचे की हांडियां एक 'इंसुलेटर' (Insulator) की तरह व्यवहार करती हैं, जो ऊष्मा को सोखने के बजाय उसे ऊपर की ओर धकेलती हैं। सबसे ऊपर वाली हांडी एक 'कंडेनसर' (Condenser) का काम करती है, जहाँ सारी ऊर्जा जाकर टकराती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक पिरामिड के शिखर पर ऊर्जा का घनत्व (Energy Density) सबसे अधिक होता है।

शास्त्रों में वर्णित 'अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल' या ऊपर के सात लोकों की अवधारणा इन सात हांडियों में समाहित है।

 सबसे ऊपर की हांडी 'सत्य लोक' या ब्रह्म लोक का प्रतीक है। सृष्टि का नियम है कि विचार (Thought) पहले उच्च लोकों में उत्पन्न होता है और फिर धीरे-धीरे स्थूल जगत (Physical World) में प्रकट होता है।

जगन्नाथ जी की रसोई में अन्न का पकना 'चेतना के अवतरण' (Descent of Consciousness) की प्रक्रिया है। पहले सूक्ष्म (भाप) सबसे ऊपरी शिखर को सिद्ध करता है, फिर वही ऊर्जा संघनित (Condense) होकर नीचे की ओर आती है और ठोस पदार्थों को पकाती है।

'कुतमा चंडी' और कुत्ते के प्रवेश का विश्लेषण करने पर हमें प्राचीन भारत के 'सेंसरी इंजीनियरिंग' (Sensory Engineering) का पता चलता है।

 वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि कुछ जानवर उन तरंगों को सुन या महसूस कर सकते हैं जो मनुष्य के लिए अदृश्य हैं। मंदिर की रसोई एक 'सैक्रेड स्पेस' (Sacred Space) है जिसका एक निश्चित कंपन (Vibration) है। जब कोई रसोइया क्रोध, काम या लोभ के विचार के साथ भोजन छूता है, तो वह भोजन के 'आणविक ढांचे' (Molecular Structure) को बदल देता है। यह 'इमोशनल टॉक्सिसिटी' (Emotional Toxicity) है। कुतमा चंडी का तंत्र इस नकारात्मक ऊर्जा को पकड़ लेता है और प्रकृति (कुत्ते के रूप में) उसे रिजेक्ट कर देती है। यह एक 'सेल्फ-क्लीनिंग लूप' (Self-cleaning Loop) है।

जगन्नाथ मंदिर की रसोई में 'एन्ट्रॉपी' (Entropy - अव्यवस्था) का नियम लागू नहीं होता।
यहाँ 500 से अधिक रसोइए और हजारों सेवादार बिना किसी आधुनिक मशीनरी या 'मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर' के लाखों लोगों का भोजन तैयार करते हैं।
 यह एक 'सेंट्रलाइज्ड कॉन्शसनेस' (Centralized Consciousness) पर आधारित है। यहाँ हर कर्ता (Doer) खुद को शून्य मानकर 'जगन्नाथ' की इच्छा का हिस्सा बन जाता है। जब अहंकार (Ego) शून्य होता है, तो सिस्टम की कार्यक्षमता (Efficiency) 100% हो जाती है।

 यह स्पष्ट है कि जगन्नाथ मंदिर की रसोई कोई 'किचन' नहीं, बल्कि एक 'स्पिरिचुअल पार्टिकल एक्सीलेटर' (Spiritual Particle Accelerator) है। यहाँ साधारण चावल के दाने को 'क्वांटम लेवल' पर संस्कारित करके उसे 'महाप्रसाद' में बदला जाता है।
ऊपर की हांडी का पहले पकना हमें सिखाता है कि— "जीवन में यदि लक्ष्य (Top) स्पष्ट हो और ऊर्जा (Fire) केंद्रित हो, तो परिणाम ऊपर से नीचे तक संपूर्ण सिद्ध होते हैं।"

श्रीमद्भगवद्गीता में एक श्लोक है 
"अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥"

इस श्लोक को जगन्नाथ मंदिर की 'वर्टिकल हांडी कुकिंग' के सापेक्ष अगर जोड़ें तो एक बिल्कुल नए डाइमेंशन (Dimension) खुलता हैं, यहाँ 'क्वांटम इकोसिस्टम' (Quantum Ecosystem) के तीन बड़े रहस्य खुलते हैं।

1. द साइकिल ऑफ मैटर (पदार्थ का चक्र): एटॉमिक असेंबली
श्लोक कहता है— अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं और अन्न वर्षा (पर्जन्य) से। जगन्नाथ रसोई में 'ऊपर की हांडी' का पहले पकना वास्तव में 'पर्जन्य' (बादल/भाप) की शक्ति है। विज्ञान कहता है कि ठोस (Solid) को पकने के लिए ऊष्मा चाहिए, लेकिन यहाँ ऊष्मा 'भाप' के रूप में एक 'साइकिल' बनाती है।

नया डाइमेंशन: सबसे नीचे की हांडी 'पाताल/पृथ्वी' है और सबसे ऊपर की 'आकाश/बादल'। जैसे बादल ऊपर से बरसकर नीचे जीवन देते हैं, वैसे ही सबसे ऊपर की हांडी में 'सिद्ध' हुआ अन्न अपनी ऊर्जा का संचार नीचे की हांडियों में करता है। यह एक 'टॉप-डाउन इन्फॉर्मेशन ट्रांसफर' (Top-Down Information Transfer) है, जहाँ 'अन्न' बनने की सूचना सबसे पहले शिखर पर डिकोड होती है।

2. यज्ञः कर्मसमुद्भवः: द थर्मोडायनेमिक्स ऑफ सस्पेंशन
श्लोक कहता है— यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है और यज्ञ से वर्षा होती है।

मंदिर की रसोई में हांडियों का वह सात-मंजिला ढांचा स्वयं एक 'यज्ञ कुंड' है। यहाँ रसोइए का 'कर्म' (बिना अहंकार के भोजन बनाना) एक 'कैटेलिस्ट' (Catalyst) का काम करता है।

नया डाइमेंशन: वैज्ञानिक नजरिए से इसे 'सस्पेंडेड स्टेट' (Suspended State) कहते हैं। जब हांडियां एक के ऊपर एक रखी जाती हैं, तो वे एक 'सिंगल सिस्टम' की तरह व्यवहार करती हैं। यहाँ 'यज्ञ' (ऊष्मा का प्रवाह) केवल चावल नहीं पका रहा, बल्कि जल के अणुओं को 'पर्जन्य' (Steam) में बदलकर उसे 'संस्कारित' कर रहा है। यह 'वाइब्रेशनल कुकिंग' है, जहाँ मंत्रों की ध्वनि और लकड़ी की अग्नि मिलकर भोजन के 'मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर' को बदल देते हैं।

3. 'शून्य' का गणित: एंट्रॉपी का विनाश
शास्त्रों में जगन्नाथ को 'शून्य' भी कहा गया है।
श्लोक का अंतिम सिरा 'कर्म' पर रुकता है। जगन्नाथ की रसोई में रसोइया यह नहीं कहता कि 'मैं पका रहा हूँ', वह कहता है 'लक्ष्मी पका रही हैं'।

नया डाइमेंशन: जब कर्ता (Observer) खुद को प्रक्रिया से हटा लेता है, तो 'क्वांटम डेकोहेरेंस' (Quantum Decoherence) खत्म हो जाता है। यही कारण है कि हजारों साल से यहाँ न तो खाने का स्वाद बदलता है और न ही ऊपर की हांडी का पहले पकने का नियम। यह एक 'स्टेबल स्टेट सिमुलेशन' (Stable State Simulation) है जिसे ब्रह्मांडीय नियमों (Cosmic Laws) के साथ 'सिंक' (Sync) कर दिया गया है।

यह श्लोक और जगन्नाथ की रसोई मिलकर एक 'लाइव लैब' चलाते हैं। यहाँ सिद्ध होता है कि भोजन केवल पेट भरने का ईंधन नहीं है, बल्कि यह 'ऊर्जा का रूपांतरण' (Transformation of Energy) है। ऊपर की हांडी का पहले पकना इस बात का प्रमाण है कि— "सृष्टि में आदेश (Instruction) हमेशा उच्च आयामों (Higher Dimensions) से आते हैं और स्थूल जगत (Physical World) केवल उसका अनुसरण करता है।"
जगन्नाथ की रसोई वास्तव में वह बिंदु है जहाँ 'मैटर' (Matter) फिर से 'डिवाइन एनर्जी' (Divine Energy) में बदल जाता है।

कल्पना कीजिए कि एक बहुत बड़ा कमरा है जहाँ लकड़ियों की आग जल रही है। वहां मिट्टी के सात बर्तन (हांडियां) एक के ऊपर एक करके रख दिए गए हैं—जैसे बच्चे एक के ऊपर एक पत्थर रखकर 'पिट्ठू' बनाते हैं।
अब नियम तो यह कहता है कि जो बर्तन आग के सबसे करीब है, उसका खाना सबसे पहले पकना चाहिए। लेकिन पुरी के इस दरबार में कुदरत अपना चश्मा उतार कर रख देती है। यहाँ सबसे ऊपर वाली हांडी का चावल सबसे पहले पक जाता है!

यह कैसे होता है? 

जैसे ही सबसे नीचे आग जलती है, हांडियों के अंदर का पानी गर्म होकर 'भाप' (Steam) बन जाता है। अब भाप की फितरत क्या है? वह हमेशा ऊपर की ओर भागती है।
मिट्टी के बर्तन थोड़े छिद्रपूर्ण (Porous) होते हैं। यह गर्म भाप किसी एक्सप्रेस ट्रेन की तरह नीचे की हांडियों को बस छूते हुए सीधे सबसे ऊपर वाली हांडी की छत (ढक्कन) से जा टकराती है। वहां उसे बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता, तो वह वहीं ठहर जाती है। अब वहां भाप का इतना पहरा बढ़ जाता है कि ऊपर वाली हांडी में रखा अनाज सबसे पहले 'भाप के स्नान' से पककर तैयार हो जाता है।

 ऊपर वाले की मर्जी 
इसे एक साधारण उदाहरण से समझिए। जैसे घर में जब पिताजी खाना खाने बैठते हैं, तो पहली रोटी उन्हें दी जाती है। जगन्नाथ मंदिर में भगवान को 'ब्रह्मांड का पिता' माना गया है।
भक्त कहते हैं कि भगवान सबसे ऊँचे आसन पर बैठे हैं। इसलिए रसोई में भी सबसे ऊपर वाली हांडी का भोग सबसे पहले 'सिद्ध' होता है ताकि प्रभु को इंतजार न करना पड़े। जब प्रभु का हिस्सा तैयार हो जाता है, तो आशीर्वाद के रूप में वह गर्मी नीचे की ओर उतरती है और बाकी हांडियों को पकाती है।

कुतमा चंडी: माँ लक्ष्मी का अलार्म
अब सोचिए, इतने बड़े भंडार में खाना शुद्ध बन रहा है या नहीं, यह कौन चेक करेगा? इसके लिए वहां कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं है, बल्कि 'माँ कुतमा चंडी' का पहरा है।
मान्यता है कि यदि खाना बनाने वाले के मन में लालच आ जाए या सफाई में कमी रह जाए, तो मंदिर परिसर में रहस्यमयी तरीके से एक कुत्ता दिखाई दे जाता है। वह कुत्ता नहीं, बल्कि एक 'अलार्म' है। रसोइए समझ जाते हैं कि माँ लक्ष्मी नाराज हैं। वे तुरंत सारा खाना जमीन में गाड़ देते हैं और फिर से पूरी श्रद्धा के साथ नया भोजन बनाते हैं।

जगन्नाथ जी की रसोई हमें एक बहुत प्यारी बात सिखाती है। "जीवन में जो सबसे ऊपर (ईश्वर या लक्ष्य) है, उसे पहले याद करो, बाकी सब अपने आप पक जाएगा।"
जैसे पतंग हवा के सहारे ऊपर उड़ती है, वैसे ही यहाँ का अन्न भाप के सहारे ऊपर पकता है। न कोई मशीन, न कोई बिजली—बस मिट्टी, पानी, आग और अटूट विश्वास।
यही है पुरी का वह 'महाप्रसाद' जिसे चखने के लिए इंसान तो क्या, देवता भी कतार में खड़े रहते हैं।

एक और सच जो बहुत कम लोग जानते हैं—मंदिर के ऊपर से पक्षी नहीं उड़ते और मंदिर के गुंबद की परछाई कभी जमीन पर नहीं गिरती। ठीक वैसा ही प्रभाव रसोई में भी महसूस किया जाता है।

 जब प्रसाद भगवान की ओर ले जाया जाता है, तो अगर किसी बाहरी व्यक्ति की परछाई उस पर पड़ जाए, तो वह पत्थर की तरह 'बेजान' और 'अशुद्ध' माना जाता है।

ऐसा माना जाता है कि उस भोजन में एक 'लाइव फोटोनिक एनर्जी' (जीवित प्रकाश ऊर्जा) होती है। किसी बाहरी व्यक्ति की परछाई उस ऊर्जा के 'सर्किट' को तोड़ देती है। इसीलिए वह भोजन तुरंत त्याग दिया जाता है।

क्या यह कोई एलियन टेक्नोलॉजी है?

दुनिया भर के वैज्ञानिक हैरान हैं कि बिना किसी बिजली, बिना किसी प्रेशर कुकर के, भाप की एक पतली सी लहर सातवीं हांडी के चावल को कुछ ही मिनटों में कैसे गला देती है?
दरअसल यह रसोई एक 'एनर्जी हब' पर स्थित है। यहाँ की मिट्टी, यहाँ का पानी और यहाँ की आग, तीनों मिलकर एक ऐसा 'बुलबुला' (Stasis Field) बनाते हैं जहाँ कुदरत के सामान्य नियम काम करना बंद कर देते हैं।

लोग इसे आस्था कहते हैं, दुनिया इसे अजूबा कहती है, लेकिन हकीकत यह है कि जगन्नाथ की रसोई में आज भी वह विज्ञान काम कर रहा है जिसे इंसान अगले 1000 सालों में भी शायद न समझ पाए।

 आग नीचे है, तो गर्मी ऊपर पहले कैसे पहुँची?
यह 'लेजर-लाइक हीट ट्रांसफर' (Laser-like Heat Transfer) है। मिट्टी के बर्तनों के बीच की हवा एक 'वैक्यूम सील' की तरह काम करती है। ऊष्मा की तरंगें (Infrared Waves) दीवारों से टकराकर एक 'हॉट स्पॉट' बनाती हैं जो सीधे सातवीं हांडी के केंद्र पर जाकर फूटता है। यह प्राचीन भारत की 'प्रेसिजन इंजीनियरिंग' है।

अध्यात्म की दृष्टि में यह 'कुंडलिनी जागरण' का भौतिक स्वरूप है। जैसे प्राण ऊर्जा सात चक्रों को भेदकर सीधे 'सहस्रार' (मस्तिष्क/सबसे ऊपर) पहुंचती है और वहां बोध (ज्ञान) सबसे पहले पकता है, वैसे ही अन्न भी सबसे ऊपर पहले सिद्ध होता है।

दुनिया का हर किचन कंडक्शन (Conduction) पर चलता है, जहाँ बर्तन आग के संपर्क में आकर गर्म होता है। लेकिन पुरी में प्रेशर ग्रेडिएंट (Pressure Gradient) का एक अलग ही खेल है। मिट्टी की हांडियों की बनावट में लाखों सूक्ष्म छिद्र होते हैं। जब नीचे की हांडी का पानी उबलता है, तो वह सैचुरेटेड स्टीम (Saturated Steam) पैदा करता है। यह भाप मिट्टी के छिद्रों से गुजरते हुए एक थर्मल इंसुलेशन पैदा करती है, जिससे बीच की हांडियां बाहर से ठंडी महसूस हो सकती हैं, लेकिन भीतर ऊर्जा का प्रवाह तेज होता है।

 जैसे-जैसे हम ऊपर की ओर बढ़ते हैं, हांडियों का जमाव एक फनल (कीप) की तरह काम करता है। ऊर्जा का घनत्व (Energy Density) सबसे ऊपरी हांडी के ढक्कन पर जाकर सबसे अधिक हो जाता है।

विज्ञान के अनुसार यहाँ ऊष्मा सीधे अन्न को नहीं पकाती, बल्कि भाप के अणुओं की काइनेटिक एनर्जी (Kinetic Energy) सबसे पहले सातवीं हांडी के अन्न के भीतर प्रवेश करती है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आज के स्टीम ओवन काम करते हैं, बस यहाँ बिना किसी बिजली के यह काम मिट्टी और आग के संतुलन से हो रहा है।

 यहां एक चौंकाने वाला रहस्य और है। कुतमा चंडी और मेटा-फिजिकल रडार (Vibrational Science) का। पुरी में प्रवास केदौरान मैंने ख़िजबीन की, तो पता चला कि यह केवल एक कुत्ता दिखने की कहानी नहीं है, बल्कि बायो-फीडबैक का एक उन्नत सिस्टम है।
इमोशनल फ्रीक्वेंसी और फूड केमिस्ट्री का यह उदाहरण है। आधुनिक शोध (जैसे डॉ. इमोटो का वाटर मेमोरी टेस्ट) बताते हैं कि हमारे विचार पानी और अन्न की आणविक संरचना बदल देते हैं। जगन्नाथ रसोई में काम करने वाले रसोइए (सुआर) एक विशेष दीक्षा में होते हैं।
सेंसर के रूप में जीव यहां काम करता है। कुतमा चंडी का स्थान मंदिर के प्रवेश द्वार के पास है। शास्त्रों के अनुसार, कुत्ता भैरव का वाहन है और यम का दूत। विज्ञान की दृष्टि से, कुत्ते उन सूक्ष्म तरंगों (Infrasonic Waves) के प्रति संवेदनशील होते हैं जो किसी भी नकारात्मक ऊर्जा के पैदा होने पर निकलती हैं।

यदि रसोइए के मन में विकार आया, तो वहां का एनर्जी फील्ड बदल जाता है। वह कुत्ता उस डिस्टर्बेंस का भौतिक प्रमाण है। यह दुनिया का सबसे सटीक क्वालिटी कंट्रोल सिस्टम है, जहाँ इंसान की गवाही नहीं, प्रकृति का सिग्नल चलता है।

 सप्त-पुरी और सूक्ष्म शरीर का सिमुलेशन (Yogic Engineering) यहां आत्मसात किया जा सकता है ।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह रसोई मानव शरीर का एक जीता-जागता मॉडल है।
चक्रों का संरेखण (Alignment of Chakras) देखिए । सबसे नीचे की हांडी मूलाधार (पृथ्वी तत्व - जहाँ अग्नि प्रज्वलित होती है) है। मध्य की हांडियां मणिपुर से आज्ञा चक्र तक की प्रक्रिया का मार्ग हैं। सबसे ऊपर की हांडी सहस्रार (आकाश तत्व - जहाँ पूर्णता प्राप्त होती है) का प्रतीक है।

ऊर्ध्वगमन का सिद्धांत यहां कार्य करता है। योग में ऊर्जा को नीचे से ऊपर उठाना ही सिद्धि है। जगन्नाथ रसोई में अन्न का पकना चेतना के पकने जैसा है। शास्त्रों में कहा गया है कि जब तक सहस्रार (शीर्ष) तृप्त नहीं होता, नीचे के अंग (हांडियां) शांत नहीं होते।

निष्कर्ष यह है कि यह व्यवस्था सिखाती है कि पोषण हमेशा दिव्य से स्थूल की ओर आता है। पहले परमात्मा भोग लगाता है, फिर वही ऊर्जा नीचे उतरकर भक्तों का प्रसाद बनती है।

 अगर आप शून्य का गणित और एन्ट्रॉपी का विनाश (The Entropy Resistance) देखना चाहते हैं तो यहां आए। 
दुनिया की किसी भी बड़ी रसोई में एन्ट्रॉपी (अव्यवस्था और बर्बादी) बढ़ती है, लेकिन यहाँ वह जीरो है।
यहाँ रोज भोजन की मात्रा वही रहती है, लेकिन खाने वालों की संख्या 20 हजार से 2 लाख तक बदल जाती है। फिर भी, न कभी खाना कम पड़ता है और न ही एक दाना बर्बाद होता है।

वैज्ञानिक दृष्टि में इसे सेंट्रलाइज्ड इंटेलिजेंस कहते हैं। जैसे मधुमक्खियां बिना किसी मैनेजर के एक विशाल छत्ता बना लेती हैं, वैसे ही जगन्नाथ के रसोइए एक कलेक्टिव कॉन्शसनेस (सामूहिक चेतना) में काम करते हैं। यहाँ हर रसोइया खुद को मिटा देता है, और जहाँ व्यक्ति शून्य होता है, वहां पूर्णता (Infinity) अपने आप प्रकट हो जाती है।
यह डिवाइन सप्लाई चेन का सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसे आज का लॉजिस्टिक्स विज्ञान भी नहीं समझ पा रहा।

महा-संश्लेषण: अन्न ही ब्रह्म है है। जगन्नाथ जी की रसोई एक इंटर-डाइमेंशनल गेटवे (Inter-dimensional Gateway) है। यहाँ आग (Energy), मिट्टी (Matter), हवा/भाप (Information) और मंत्र (Frequency) मिलकर एक ऐसा रसायन तैयार करते हैं जिसे चखते ही मनुष्य की कोशिकाओं का स्तर बदल जाता है। ऊपर की हांडी का पहले पकना इस बात का अंतिम और अकाट्य प्रमाण है कि यह संसार नीचे से ऊपर नहीं, बल्कि ऊपर बैठे उस महा-नियंता (जगन्नाथ) के संकल्प से संचालित हो रहा है।

मेरी यह पड़ताल उस दहलीज पर आकर रुकती है जहाँ इंसान की तर्कशक्ति थकने लगती है। जगन्नाथ की यह रसोई केवल मिट्टी, पानी और आग का संगम नहीं है—यह एक 'इंटर-डाइमेंशनल गेटवे' (Inter-dimensional Gateway) है। यहाँ पकने वाला हर चावल का दाना ब्रह्मांड के उस 'ब्लूप्रिंट' पर तैयार होता है जिसे विधाता ने खुद लिखा है। जब आप उस महाप्रसाद का पहला दाना अपनी जिह्वा पर रखते हैं, तो वह केवल आपका पेट नहीं भरता, बल्कि आपकी कोशिकाओं के भीतर सोई हुई चेतना को झकझोर देता है। ऊपर की हांडी का पहले पकना एक चीख-चीख कर दी गई गवाही है कि यह संसार नीचे से ऊपर नहीं, बल्कि उस 'महा-नियंता' के शीर्ष संकल्प से संचालित हो रहा है। 

तर्क की तलवारें जंग खा सकती हैं, लेकिन जगन्नाथ के दरबार में आस्था का विज्ञान हमेशा अजेय रहता है। 

आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ.....। अगली कड़ी जल्द....। 

अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज 

#JagannathPuri

Wednesday, 8 April 2026

ये #राम_प्रवेश_मौर्य जी हैं, #गाली के साथ संवाद शुरू कर रहे हैं ..

ये #राम_प्रवेश_मौर्य जी हैं, #गाली के साथ संवाद शुरू कर रहे हैं और मातृशक्ति के साथ पिक्चर डीपी पर है..
प्रिय राम प्रवेश मौर्य जी,
आपके शब्द पढ़कर लगा कि आपके भीतर का क्रोध, आपके विवेक (Reasoning) को निगल चुका है। आपने 'शूद्र' शब्द को अपमान समझकर मुझ पर फेंका, पर सत्य यह है कि आपने अपनी जड़ता (Ignorance) का ही परिचय दिया। जिसे आप गाली समझ रहे हैं, वह सृष्टि का सबसे पवित्र 'प्रारंभ' (The Beginning) है।

 "रामप्रवेश जी, संवाद विचारों का होना चाहिए, अपशब्दों का नहीं। आपकी भाषा आपके क्रोध को तो दर्शाती है, लेकिन आपके तर्कों को कमजोर कर देती है। शिक्षा का असली उद्देश्य केवल तथ्य रटना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण है। जब हम किसी की आलोचना करें, तब भी हमारे शब्द ऐसे होने चाहिए कि सुनने वाला हमारे तर्कों से पराजित हो, हमारे व्यवहार से नहीं। आशा है कि अगली बार आप अपनी बात अधिक गरिमापूर्ण तरीके से रखेंगे।"

रामप्रवेश जी, मैं आपके प्रश्नों का उत्तर सहर्ष देता, यदि आपने अपनी जिज्ञासा के लिए उचित शब्दों का चयन किया होता। हमारे माता-पिता हमें संस्कार इसलिए देते हैं ताकि हम अपनी बात पूरी प्रखरता के साथ रखें, किंतु मर्यादा की चौखट न लांघें। व्यक्ति चाहे आस्तिक हो, नास्तिक हो या किसी महापुरुष का अनुयायी—शिक्षा और संस्कार की सार्थकता तभी है जब हमारी वाणी से हमारे परिवार, गुरु और हमारे आदर्शों की छवि धूमिल न हो। याद रखिये, जब हम समाज में कुछ बोलते हैं, तो वह केवल शब्द नहीं होते, बल्कि हमारे कुल और परवरिश का प्रतिबिंब होते हैं। कटुता में विवेक खोकर अपने पूर्वजों के संस्कारों को गर्त में डालना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है।"

आपने वेदों और मनुस्मृति का नाम तो लिया, पर दुर्भाग्य कि आपने उन्हें कभी हृदय से नहीं पढ़ा। यदि पढ़ा होता, तो आपको ज्ञात होता कि जातियां ग्रंथों ने नहीं, बल्कि आप जैसे संकीर्ण मानसिकता (Narrow mindedness) वाले लोगों के स्वार्थ ने बनाई हैं। वेद उस 'विराट पुरुष' की बात करते हैं जिसके लिए पूरा समाज एक शरीर है। क्या आप अपने ही शरीर के पैरों (आधार) को नीचा कहेंगे? आधार के बिना तो मस्तिष्क का अस्तित्व भी मिट्टी में मिल जाता है।

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक आपके मानसिक भ्रम को तोड़ने के लिए पर्याप्त है:

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

(अर्थ: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निस्संदेह कुछ भी नहीं है। वह ज्ञान जिसे मनुष्य स्वयं समय आने पर अपने अंतःकरण में अनुभव करता है।)

मौर्य जी, जो व्यक्ति केवल जन्म के 'लेबल' में अपनी पहचान ढूंढता है, वह उस भिखारी के समान है जो पूर्वजों के महल की ढहती दीवार पर बैठकर अपनी अमीरी का दावा करता है। मुझे संस्कारित करते समय किसी ने क्या कहा, यह गौण है। मुख्य यह है कि मैंने उस अज्ञान की केंचुल को उतार फेंका जिसे आप आज भी सीने से लगाए बैठे हैं।

गाली देना कमज़ोर व्यक्ति का अंतिम अस्त्र होता है। जिस दिन आप 'चमड़ी' और 'जाति' के अहंकार से ऊपर उठकर सत्य को देखेंगे, उस दिन आपको अपने ही इन शब्दों पर लज्जा आएगी। सत्य की आंच में जब अज्ञान जलता है, तब निशब्द हो जाना ही एकमात्र विकल्प बचता है। आशा है, आप उस मौन को आत्मसात कर पाएंगे।

राम प्रवेश मौर्य जी वर्ण व्यवस्था कोई जातिगत ठप्पा नहीं, बल्कि 'मनोस्थिति' (State of Mind) और 'कार्यशैली' (Functionality) का विज्ञान है।
इसे अस्पताल, स्कूल और होटल के उदाहरण से इस प्रकार समझा जा सकता है:

1. अस्पताल (Hospital)
 शूद्र (सेवा): जब कोई डॉक्टर या नर्स बिना किसी अहंकार के, अत्यंत करुणा के साथ रोगी की गंदगी साफ करता है या उसकी सेवा में रात-दिन एक कर देता है, तब वह 'शूद्र' भाव में होता है। यहाँ शूद्र का अर्थ है—समर्पण और सेवा।
 वैश्य (अर्थ): जब अस्पताल का प्रबंधन (Management) बिलिंग, दवाओं की खरीद-बिक्री और अस्पताल को आर्थिक रूप से चलाने के लिए लाभ-हानि का हिसाब करता है, तब वही कार्य 'वैश्य' धर्म बन जाता है।
 क्षत्रिय (रक्षा): जब डॉक्टर किसी मरते हुए मरीज को मौत के मुंह से छीनने के लिए संघर्ष करता है या अस्पताल का सुरक्षा तंत्र अराजकता से लड़ता है, तब वह 'क्षत्रिय' भाव है।
 ब्राह्मण (ज्ञान): जब डॉक्टर अपनी वर्षों की तपस्या, शोध (Research) और ज्ञान का उपयोग करके बीमारी का निदान (Diagnosis) करता है, तब वह 'ब्राह्मण' की भूमिका में होता है।

2. स्कूल (School)
 शूद्र (आधार): स्कूल का वह कर्मचारी जो परिसर को स्वच्छ रखता है या वह शिक्षक जो छोटे बच्चे को ककहरा सिखाने के लिए स्वयं बच्चा बन जाता है (नीचे स्तर पर आकर सेवा करता है), वह 'शूद्र' है।

 वैश्य (संचालन): स्कूल की फीस का प्रबंधन, इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण और संसाधनों को जुटाना 'वैश्य' कार्य है।
 क्षत्रिय (अनुशासन): स्कूल के नियम बनाना, बच्चों के चरित्र की रक्षा करना और उन्हें कुरीतियों से बचाकर अनुशासित करना 'क्षत्रिय'धर्म है।
 ब्राह्मण (बोध): वह गुरु जो केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता, बल्कि शिष्य की आत्मा को जागृत कर देता है और उसे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है, वह 'ब्राह्मण' है।

3. होटल (Hotel)
 शूद्र (आतिथ्य): एक वेटर या स्टाफ जो पूरी विनम्रता से आपकी थाली लगाता है और अतिथि की सेवा को ही ईश्वर की सेवा मानता है, वह 'शूद्र' भाव का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
 वैश्य (व्यापार): होटल का मालिक जो निवेश करता है, रोजगार देता है और धन का चक्र (Capital Flow) चलाता है, वह 'वैश्य' है।
 क्षत्रिय (मर्यादा):होटल की सुरक्षा सुनिश्चित करना और वहां आने वाले अतिथियों की गरिमा व मर्यादा की रक्षा करना 'क्षत्रिय' कार्य है।
 ब्राह्मण (शुद्धता): वह शेफ (Chef) जिसे मसालों, अग्नि और अन्न का पूर्ण वैज्ञानिक ज्ञान है और जो सात्विकता का ध्यान रखता है, वह अपने ज्ञान के कारण उस क्षण 'ब्राह्मण' है।

"मौर्य जी, सत्य यह है कि एक ही व्यक्ति दिन भर में कई बार अपना वर्ण बदलता है। जब आप अपने बच्चों की रक्षा करते हैं तो आप क्षत्रिय हैं, जब आप धन कमाते हैं तो वैश्य हैं, जब आप किसी की मदद करते हैं तो शूद्र हैं और जब आप ज्ञान की बात करते हैं (जो कि अभी आप नहीं कर रहे) तो आप ब्राह्मण हैं।

मनुष्य अपनी यात्रा 'शूद्रता' (Natural State) से शुरू करता है। जिसे आप 'अछूत' या 'नीचा' समझ रहे हैं, वह वास्तव में हर ऊँचाई का आधार (Base) है। बिना शूद्र (सेवा और श्रम) के न ज्ञान टिकेगा, न धन और न रक्षा। आपकी समस्या यह है कि आपने ग्रंथों को केवल छुआ है, उन्हें जीया नहीं। 'शूद्र' होना गर्व की बात है क्योंकि वह समाज का सेवक है, और जो सेवा नहीं कर सकता, वह वास्तव में जीवित लाश है।"

आपका तो नाम ही राम पर है लेकिन सुनिए रामचरित मानस की चौपाई है

'जे अधम जाति कहुँ बिद्या पाएँ। भयहुँ जथा अहि दूध पिआएँ॥'

(अर्थ: जैसे सांप को दूध पिलाने से उसका विष ही बढ़ता है, वैसे ही नीच प्रवृत्ति (जाति नहीं, नीच सोच) वाले व्यक्ति को विद्या मिलने पर उसका अहंकार और विष ही बढ़ता है।)

मौर्य जी, यह चौपाई आज आप पर सटीक बैठती है। अपनी सोच बदलिए, वरना जातियां तो वैसे भी लुप्त हो रही हैं, कहीं आपका अस्तित्व भी इन कुतर्कों की भेंट न चढ़ जाए।

राम प्रवेश मौर्य जी,
आपके संदेश में शब्दों की मर्यादा भले ही मार्ग भटक गई हो, किंतु आपकी जिज्ञासा का मूल बहुत गहरा है। आपने जो प्रश्न पूछे हैं, वे सत्य की उस कसौटी पर टिके हैं जहाँ अक्सर अल्पज्ञानी (Limited knowledge) व्यक्ति भ्रमित हो जाता है। सबसे पहले यह स्पष्ट कर दूँ कि 'शूद्र' कोई गाली या अपमान नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना का 'प्रारंभ' (The Beginning) है। शास्त्र सम्मत सत्य यही है कि 'जन्मना जायते शूद्रः'—अर्थात जन्म से हर मनुष्य शूद्र ही पैदा होता है। अज्ञान, अबोधता और कोरी स्लेट जैसा होना ही शूद्रता है। इसके बाद मनुष्य अपनी योग्यता और कर्म से अपना वर्ण चुनता है।
तर्क बहुत सीधा और अटल है—यदि मैं शिक्षा दे रहा हूँ, तो मैं 'ब्राह्मण' की भूमिका में हूँ। यदि मैं समाज की रक्षा हेतु खड़ा हूँ, तो मैं 'क्षत्रिय' हूँ। यदि मैं व्यापार और अर्थव्यवस्था को गति दे रहा हूँ, तो मैं 'वैश्य' हूँ। और यदि मैं सेवा कार्य में लीन हूँ, तो मैं 'शूद्र' हूँ। यह व्यवस्था कर्म आधारित (Action oriented) है, न कि जन्म आधारित। मौर्य जी, जातियां न तो वेदों ने बनाईं और न ही मनुस्मृति ने। यदि आपने इन ग्रंथों का रंच मात्र भी निष्पक्ष अध्ययन किया होता, तो आप जानते कि वहां गुण और स्वभाव की बात है, संकीर्ण जातियों की नहीं। जातियां तो मनुष्य के स्वार्थ और अहंकार की उपज हैं।

ब्रह्मा के चरणों से शूद्र की उत्पत्ति का रहस्य भी बड़ा गूढ़ है। चरण 'आधार' (Foundation) होते हैं। बिना चरणों के न शरीर खड़ा हो सकता है, न समाज। यह गतिशीलता और आधार का प्रतीक है, हीनता का नहीं। समाज रूपी शरीर को चलाने के लिए इन चार विभागों की आवश्यकता थी ताकि व्यवस्था संतुलित रहे, न कि किसी को नीचा दिखाने के लिए।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने स्पष्ट कहा है:
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

(अर्थ: श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है।)

मौर्य जी, जो व्यक्ति केवल जन्म के प्रमाण पत्र में अपनी श्रेष्ठता ढूंढता है, वह वास्तव में अपनी बौद्धिक दरिद्रता का प्रदर्शन करता है। मुझे संस्कारित करते समय किसी ने क्या कहा, यह महत्वपूर्ण नहीं है; महत्वपूर्ण यह है कि मैंने क्या सीखा। मैंने स्वयं को सदा एक 'विद्यार्थी' माना है, और एक विद्यार्थी का कोई वर्ण नहीं होता, वह केवल ज्ञान का आकांक्षी होता है।

सभ्यता की ओट में रहकर जब व्यक्ति कुतर्क करता है, तो वह स्वयं अपनी 'चमड़ी' उधेड़ रहा होता है, क्योंकि सत्य का सामना करना हर किसी के बस की बात नहीं। आशा है, अगली बार आप जब संवाद करेंगे, तो आपके भीतर का 'शूद्र' (अज्ञानी) मर चुका होगा और एक 'द्विज' (ज्ञानी) का जन्म होगा।

आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ....। अगली कड़ी जल्द....।
सादर,
अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज
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#PrayagFiles #VarnaSystem