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Wednesday, 29 April 2026

आज्ञा चक्र

प्रश्न: लेकिन आज्ञा चक्र पर तो ॐ जप बताया गया है। 'ह‌ं' कंठ (विशुद्धि) पर बताया है, 'शं' ब्रह्मरंध्र पर। क्रम से चलें तो – लं, वं, रं, यं, हं, ॐ, शं।
यह गूढ़ प्रश्न आज्ञाचक्र: मास्टर चाबी, ध्वनियाँ और अन्य आयाम वाली पोस्ट पर आया है।

उत्तर: नमस्ते मित्र,
बहुत सुंदर और गहन प्रश्न उठाया है आपने। आभार।
आपने पारंपरिक क्रम बताया – लं, वं, रं, यं, हं, ॐ, शं – और यह सही भी है। पर यहाँ एक बारीक लेकिन बहुत ज़रूरी अंतर समझना होगा, जो अक्सर कंफ्यूजन पैदा करता है। मैं आपके साथ इसे खोलकर रखता हूँ, उसी पोस्ट "आज्ञाचक्र: मास्टर चाबी, ध्वनियाँ और अन्य आयाम" के संदर्भ में।

1. बीज मंत्र और पंखुड़ी की ध्वनियाँ – दो अलग चीज़ें हैं
आपने जो क्रम लिखा – लं (मूलाधार), वं (स्वाधिष्ठान), रं (मणिपूर), यं (अनाहत), हं (विशुद्धि), ॐ (आज्ञा), शं (सहस्रार या बिंदु) – यह हर चक्र का बीज मंत्र है। हर चक्र का अपना एक तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, महत्) और उस तत्व की ध्वनि-ऊर्जा है। यह मंत्र जप के लिए हैं, तत्व शुद्धि और चक्र जागरण की विधियों में काम आते हैं। विशुद्धि का बीज “हं” है, आज्ञा का बीज प्रमुख रूप से “ॐ” है। यह बिल्कुल शास्त्रसम्मत है।

2. आज्ञाचक्र का कमल और उसकी दो पंखुड़ियाँ – हं और क्षं
अब आज्ञाचक्र का जो प्रतीक है – दो पंखुड़ियों वाला कमल – उन दो पंखुड़ियों पर जो अक्षर लिखे हैं, वे हैं “हं” और “क्षं”। शास्त्रों में इसे स्पष्ट कहा गया है – हं (हं) और क्षं (क्षं) ये दो वर्ण आज्ञा दल के हैं। यह पंखुड़ियों की ध्वनि ऊर्जा है, बीज मंत्र नहीं। इसे हम “पंखुड़ी-ध्वनि” या “प्राण-धारा की ध्वनि” कह सकते हैं।

मेरी पोस्ट में जो “हं और क्षं” आया है, वह ठीक इसी को इंगित कर रहा है। मैंने लिखा है – “दो मुख्य ध्वनियाँ सामने आती हैं – हं और क्षं। ये दोनों कोई मंत्र नहीं, बल्कि प्राण की ही दो अलग-अलग धाराएँ हैं।” जब आप अनुभव के गहरे स्तर पर जाओगे ऐसा पाओगे।
अर्थात यहाँ जप करने का मंत्र नहीं बताया गया, बल्कि जब साधक भीतर गहराता है तो प्राण की फ्रीक्वेंसी स्वतः इन दो मूल ध्वनि-पैटर्न के रूप में सुनाई देने लगती है। यह कोई मानसिक उच्चार नहीं, अनाहत नाद का स्तर है।

3. फिर विशुद्धि के “हं” और आज्ञा के “हं” का क्या संबंध?
विशुद्धि का बीज मंत्र “हं” है, और आज्ञा दल का पहला अक्षर भी “हं” (हं) है। दोनों में ध्वनि समान है, पर ऊर्जा का स्तर भिन्न है। विशुद्धि पर “हं” आकाश तत्व की बीज ध्वनि के रूप में कंपन करता है, जबकि आज्ञा पर आते-आते वही “हं” प्राण की उस धारा में ढल जाता है जो पीले से नीले प्रकाश में बदलती है और अंततः ॐ में विलीन होती है। इसलिए पोस्ट में कहा कि ये दोनों ॐ के साथ ओवरलैप होती हैं, अनुनादित होती हैं।

हम यह भी कह सकते हैं – विशुद्धि का “हं” शुद्धि करता है, आज्ञा का “हं” आयामों को खोलता है।

4. “क्षं” और “शं” का भेद भी समझे
आपने लिखा “शं“ "ब्रह्मरंध्र” या सहस्रार के लिए है कुछ ग्रंथों में “शं” (शं) या “क्षं” दोनों का उल्लेख मिलता है, यह परंपरा पर निर्भर करता है। कई क्रमों में मूलाधार से विशुद्धि तक लं, वं, रं, यं, हं और फिर आज्ञा के लिए ॐ, उसके बाद “क्षं” सहस्रार या बिंदु का संकेत करता है। मेरी पोस्ट में “क्षं” आज्ञा की दूसरी पंखुड़ी का प्राण स्पंद है, कोई अंतिम बीज मंत्र नहीं।
यानी पारंपरिक बीज मंत्र क्रम – लं, वं, रं, यं, हं, ॐ – बिल्कुल अपनी जगह पर स्थापित है। और आज्ञा के भीतर के गहन अनुभव में हं और क्षं वो दो प्राण-धाराएँ हैं जो 48-48 फ्रीक्वेंसी में टूटकर प्रकाश बन जाती हैं। इसे कहीं से भी विरोध नहीं है।

5. 48-48 का राज़ और पंखुड़ियों का गणित भी समझे
पोस्ट में बताया गया कि हं के भीतर 48 सूक्ष्म ध्वनियाँ और क्षं के भीतर 48 – यह कोई यादृच्छिक संख्या नहीं है। योग शास्त्रों में भी मानव शरीर में कुल 96 अंगुलियाँ (उँगलियों के पोरुओं की संख्या) बताई गई हैं, जो 48-48 के जोड़े में नाड़ियों और चेतना की लय से जुड़ी हैं। जब आज्ञाचक्र जागता है, तो यह पूरी बायो-इलेक्ट्रिक व्यवस्था एक साथ प्रकाश-स्पंद में बदलती अनुभव होती है। यही कारण है कि कमल की दो पंखुड़ियाँ हैं – हर पंखुड़ी अपने भीतर 48 स्पंदनों को समेटे है।

6. तो क्या ओम का जप छोड़ दें? इसको भी समझे।
बिल्कुल नहीं
आपने कहा कि “आज्ञा चक्र पर तो ॐ जप बताया गया है” – और यह परम सत्य है। मेरी पूरी पोस्ट का निचोड़ ही यही है कि अंततः सब कुछ ॐ में ही समा जाता है। मैने लिखा है – “ये दोनों ध्वनियाँ ॐ ध्वनि ऊर्जा पैटर्न के साथ ओवरलैप होती हैं, अनुनादित होती हैं।” और गहरे में जाने पर “शेष रहता है केवल सफेद प्रकाश – वह कोरी ऊर्जा है, ही ॐ है, ही शून्य है।”
अर्थात हं और क्षं का स्वतः उठना और ॐ में विलय – यह साधना का आंतरिक अनुभव है। जप की विधि में आप ॐ का ही आश्रय लेंगे, यह सर्वथा उचित और प्रभावी भी है।

7. एक बात और समझे
उस पोस्ट का दूसरा अंश आयामों (डाइमेंशन) के बारे में है। जब आज्ञाचक्र पर हं और क्षं की ये दो धाराएँ अपनी पूरी 48-48 की गहराई में खुलती हैं, तो चेतना का फ्रीक्वेंसी बैंड इतना चौड़ा हो जाता है कि वह केवल तीन आयामों में कैद नहीं रहती। तब साधक अन्य आयामों के प्राणियों और लोकों का अनुभव कर सकता है। यह कोई मंत्र जप से थोड़े में होने वाली बात नहीं, यह वर्षों की साधना से प्राण की धाराओं के इस रूपांतरण का परिणाम है।
मित्र
आपका प्रश्न बीज मंत्र क्रम और आज्ञा की पंखुड़ियों की ध्वनियों के संगम पर खड़ा है, और इस अंतर को उजागर करना बहुत ज़रूरी है।

· बीज मंत्र : लं, वं, रं, यं, हं, ॐ – चक्र जप और तत्व शुद्धि के लिए।
· पंखुड़ी की प्राण-ध्वनियाँ (जो सिर्फ गूढ़ ध्यान में सुनाई देती हैं) : हं और क्षं – आज्ञा दल पर।
  ये दोनों आपस में टकराते नहीं, बल्कि एक ही सीढ़ी के दो स्तर हैं। बीज मंत्र से शुरू करके, एक दिन साधक जब पूर्ण मौन और प्राण के सूक्ष्म कंपनों में डूबता है, तो उसे हं और क्षं का यह द्वार खुलता है, जो उसे ॐ रूपी अनंत में ले जाता है।

आपकी जिज्ञासा उत्तम है। ऐसे प्रश्न ही साधना को कोरी मान्यता से उतारकर अनुभव की वास्तविकता में बदलते हैं।

ॐ शांति
साभार - टैलीपैथी 

Tuesday, 28 April 2026

जन्म_कुण्डली_में_सन्तान_भाव_का_एक_अज्ञात_रहस्य

#जन्म_कुण्डली_में_सन्तान_भाव_का_एक_अज्ञात_रहस्य 
सूर्य सिद्धांत का गुप्त अध्याय: #संतान_रहस्य – ब्रह्मांड का वह खगोलीय गणित जो 99% ज्योतिषी कभी नहीं छू पाए

कल्पना कीजिए... 6778 ईसा पूर्व की वह रात्रि, जब मायासुर को सूर्यदेव ने स्वयं वह ग्रंथ सौंपा जिसमें ग्रहों की गति का कोड छिपा था। #सूर्य_सिद्धांत। एक ऐसा ग्रंथ जो महायुग (43,20,000 वर्ष) में सूर्य की 43,20,000 परिक्रमाओं, चंद्र की 6,77,53,336 परिक्रमाओं और प्रत्येक ग्रह की #मंदा_सिंहरा_फल की जटिल #त्रिकोणमिति (साइन टेबल, एपिसाइकिल, बीज सुधार) से ग्रहों की सटीक स्पष्ट स्थिति निकालता है। 

यदि आप अपनी #कुण्डली_विश्लेषण चाहते हैं तो जन्म स्थान समय बताएं.....

आज के 99% ज्योतिषी पाराशर, फलित सूत्रों में फंसे रहते हैं। वे कुंडली देखते हैं, लेकिन खगोलीय गणित नहीं। वे #पंचम_भाव और गुरु देखते हैं, लेकिन सूर्य सिद्धांत का वह बीज-क्षेत्र स्फुट + दैनिक गति का सूक्ष्म समीकरण नहीं जानते जो #संतान को कब, क्यों, कितनी, पुत्र या कन्या – सब कुछ #ब्रह्मांड के साइन में लिख देता है।

यह लेख उस रहस्य को खोलता है। कोई सैद्धांतिक गलती नहीं, कोई मिसप्रिंट नहीं। शुद्ध सूर्य सिद्धांत + प्राचीन फलित + गहन शोध का सम्मिश्रण। पढ़ते-पढ़ते आप रुक नहीं पाएंगे, क्योंकि हर पैराग्राफ में एक नया रहस्य खुलता है।

1. #संतान_कब_होगी? – सूर्य सिद्धांत का “स्पष्ट दैनिक गति” सूत्र (Timing का गुप्त कोड)
सामान्य ज्योतिषी कहते हैं – “गुरु की दशा या #पंचमेश गोचर में बच्चा होगा।” लेकिन सूर्य सिद्धांत कहता है: सबसे पहले ग्रहों की सटीक स्पष्ट स्थिति (True Longitude) निकालो।

#सूर्य_सिद्धांत अध्याय 2 में मंद फल (Equation of Centre) और सिंहर फल (Equation of Conjunction) का सूत्र दिया है:
भुजफल = (बेस-साइन × एपिसाइकिल) / 360°
फिर हाइपोटेन्यूज H = √(R² ± कोटि फल²)
स्पष्ट गति = #मंद_सिनहर सुधार के बाद दैनिक गति × (H - R)/H

यह सूत्र #कुंडली के जन्म काल से लेकर वर्तमान तक प्रत्येक दिन की स्पष्ट स्थिति देता है। 
अब रहस्य:
#पंचम_भाव_का_स्वामी + गुरु की स्पष्ट लंबाई को सूर्य सिद्धांत के अहरगण (Sum of Days) से जोड़कर देखो। जब यह योग 5वें #नवांश में “बीज सुधार” (Bija Correction) के बाद 23°-27° के बीच पहुंचे और चंद्र की मंद गति (Moon's Anomaly) 90° के निकट हो, तब संतान का द्वार खुलता है।

यह 99% नहीं जानते क्योंकि वे Drik सिद्धांत (आधुनिक #एफेमरिस) यूज करते हैं, #सूर्य_सिद्धांत का बीज सुधार (1100 ई. के बाद 750 वर्ष पुराना, लेकिन मकरंद द्वारा अंतिम सुधार) भूल जाते हैं। परिणाम? गलत टाइमिंग। असली गणित बताता है – संतान उस ठीक तिथि पर होगी जब पुत्र तिथि स्फुट (Moon ×5 - Sun ×5 / 360 → तिथि शुभ_पक्ष में 5वें या 10वें करण में हो।

2. #संतान_होने_में_बाधा – बीज-क्षेत्र स्फुट का अंधकारमय रहस्य (Obstacles का खगोलीय डिटेक्टर)
सूर्य_सिद्धांत में ग्रहों की परिक्रमा संख्या (Revolutions in Mahayuga) बताती है कि हर ग्रह की “बीज शक्ति” (Seed Power) कितनी है। अब फलित में इसे संतान से जोड़ो:

#बीज_स्फुट (पुरुष) = सूर्य + शुक्र + गुरु की निरयन लंबाई जोड़ो → राशि + नवांश।
अगर दोनों विषम राशि/नवांश → बीज शक्तिशाली (संतान निश्चित)।
दोनों सम → पूर्ण बाधा (99% ज्योतिषी यही चूक जाते हैं)।
मिश्र → देरी, लेकिन सूर्य सिद्धांत के मंद फल सुधार (Mars 76° epicycle) से ठीक होता है।

क्षेत्र स्फुट (#स्त्री) = #२_भाव_का_वाणी_रहस्य चंद्र_मंगल_गुरु → दोनों सम राशि/नवांश → क्षेत्र उपजाऊ।
दोनों विषम → बांझपन या गंभीर बाधा।

रहस्य यह कि इन स्फुटों को सूर्य सिद्धांत के साइन इंटरपोलेशन (Sine Table 225' अंतर) से और सूक्ष्म बनाओ। अगर बीज स्फुट पर राहु/केतु की लंबाई 120' विक्षेप (Latitude) डाल रही हो, तो गर्भपात या देरी। अगर क्षेत्र स्फुट पर शनि की मंद गति (Saturn 49° epicycle) हावी, तो 7-12 वर्ष देरी। यह गणित इतना गहरा है कि आज के सॉफ्टवेयर भी पूरा नहीं करते – क्योंकि वे Drik यूज करते हैं, सूर्य का बीज नहीं।

3. #कितनी_संतान_होगी? – #नवांश_अष्टकवर्ग + महायुग गणित का सम्मिश्रण (Number का गणितीय रहस्य)
सामान्य नियम: पंचम भाव में जितने नवांश गुजरे, उतनी संतान। लेकिन सूर्य सिद्धांत का गुप्त लेयर:

#गुरु_चंद्र + सूर्य लंबाई जोड़ो → राशि का नवांश संख्या = संतान संख्या।
पंचमेश के नवांश + गुरु की अष्टकवर्ग बिंदु (5वें भाव से गुरु को देखते हुए) × 3 (अगर गुरु उच्च/वक्री)।

सूर्य सिद्धांत की महायुग परिक्रमा से एनालॉजी: जितनी “अंतरिम मास” (Intercalary Months = 15,93,336) पंचम भाव में प्रभावी, उतनी संतान।
उदाहरण: अगर पंचम नवांश 4 पूर्ण हो + गुरु अष्टकवर्ग 7 बिंदु + क्षेत्र स्फुट सम → 4 संतान (2 पुत्र, 2 कन्या संभावित)। यदि मंगल/शनि मालेफिक ड्रिस्टि → 1-2 कम। यह सूत्र इतना सटीक कि प्राचीन ऋषि इससे राजवंश की भविष्यवाणी करते थे।

4. #कितनी_कन्या_कितने_पुत्र? – विषम-सम + नर-स्त्री ग्रह + साइन पैरिटी (Gender का ब्रह्मांडीय कोड)
पंचम भाव विषम राशि + नर ग्रह (सूर्य, मंगल, गुरु, शनि) की ड्रिस्टि → पुत्र संख्या।
सम राशि + स्त्री ग्रह (चंद्र, शुक्र, बुध) → कन्या संख्या।

सूर्य सिद्धांत ट्विस्ट: स्फुट की राशि + नवांश की पैरिटी देखो। बीज स्फुट विषम → पुत्र प्रधान। क्षेत्र सम + चंद्र/शुक्र प्रभाव → कन्या प्रधान। D7 सप्तांश लग्न यदि मिथुन/कन्या/धनु/मीन (द्विस्वभाव) → जुड़वां या मिश्रित।

रहस्य: सूर्य सिद्धांत अध्याय 7 में ग्रहों का विक्षेप (Latitude) – अगर पंचम में चंद्र 270' विक्षेप डाल रहा हो → अधिक कन्या। मंगल 90' → पुत्र लेकिन स्वास्थ्य बाधा।

5. पूरा विश्लेषण कैसे करें? – एक कुंडली के लिए स्टेप-बाय-स्टेप (आपकी कुंडली पर लागू करो)
जन्म विवरण से सूर्य सिद्धांत अहरगण → सटीक स्पष्ट ग्रह।
बीज + क्षेत्र स्फुट → बाधा स्तर (0-100%)।
पंचम + गुरु + D7 → संख्या + लिंग।
दशा में सिंहर फल सुधार → ठीक वर्ष/माह।
यह विधि इतनी गहन है कि एक बार समझ लेने पर आप कभी सामान्य ज्योतिषी की तरह नहीं सोचेंगे। पढ़ने वाला मजबूर हो जाता है क्योंकि हर लाइन में “अरे! यह तो...” वाला अहसास होता है।

अंतिम रहस्य: सूर्य सिद्धांत कहता है – संतान ब्रह्मांड का “फल” है। अगर बीज-क्षेत्र कमजोर, तो संतान गोपाल मंत्र + पीला दान + गुरुवार व्रत से बीज सुधार (Bija) हो जाता है। लेकिन गणित सही हो तो कोई बाधा टिकती नहीं।

यह लेख समाप्त नहीं होता – क्योंकि अब आप जान गए कि संतान कोई संयोग नहीं, खगोलीय गणित का रहस्यमय नृत्य है। अपनी कुंडली पर इसे लागू करो, और देखो कैसे ब्रह्मांड जवाब देता है।

जो 99% नहीं जानते, वे अब जान गए। बाकी... पढ़कर रुक गए न? 😌
#SHRI_NARAYANA_JI
#Shri_Narayann_Ji

ईशनिंदा पर ईसाई इस्लाम की कठोर शारीरिक दण्ड व्यस्था और मनुस्मृति में उदारता (केवल आर्थिक दण्ड)

मनुस्मृति ( ६८) 

अदण्ड्यश्चैव दण्ड्यश्च दण्ड्योऽपि च यथाक्रमम् ।  
दण्डे दण्ड्ये च विज्ञेयं न्यायतोऽन्यायतोऽपि वा॥ 

यानी कुछ लोग दंड के योग्य नहीं होते, कुछ योग्य होते हैं, और कुछ विशेष रूप से दंडनीय होते हैं; इस सबका निर्णय न्यायपूर्वक करना चाहिए।

कभी मनुस्मृति के इस श्लोक की तुलना चर्च के उस सिद्धांत से कीजिए कि Error non habet ius" (गलती या भटकाव को कोई अधिकार नहीं होता)। चर्च का मानना था कि एक गलत विचार को जिंदा छोड़ना हज़ारों लोगों को नर्क भेजने जैसा है, इसलिए अपराधी को खत्म करना 'करुणा' का काम है। जैसे राजा के खिलाफ विद्रोह करने पर मौत मिलती थी, वैसे ही गॉड के नियमों (Dogma) को चुनौती देना "दिव्य राजद्रोह" माना जाता था, जिसके लिए सबसे कठोर सजा अनिवार्य थी। चर्च का मानना था कि ईशनिंदा एक संक्रामक रोग (Gangrene) की तरह है। अगर एक अंग (अपराधी ) को नहीं काटा गया, तो वह पूरे समाज की आत्मा को नर्क ले जाएगा। शरीर को जलाना नर्क की आग का पृथ्वी पर पूर्वाभ्यास माना जाता था ताकि शायद मरने वाला आखिरी पल में पश्चाताप कर ले।

मनुस्मृति में देवनिन्दा (देवताओं/ईश्वर की निंदा) के लिए कोई विशिष्ट “राजकीय दंड” (जैसे जुर्माना या शारीरिक सजा) का सीधा प्रावधान नहीं है। यह मुख्य रूप से धार्मिक/नैतिक पाप (pāpa) माना गया है, जिसके परिणाम कर्मफल, नरक या सामाजिक/आध्यात्मिक हानि के रूप में बताए गए हैं। मनुस्मृति 4.163 कहती है कि: नास्तिक्यं वेदनिन्दा च देवतानां च कुत्सनम् ॥ द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं च वर्जयेत् ॥ यानी नास्तिकता, वेदों की निंदा, देवताओं की निंदा (कुत्सन), द्वेष, दंभ आदि से बचना चाहिए।यहाँ देवनिन्दा को नैतिक रूप से वर्जित बताया गया, लेकिन कोई दंड निर्दिष्ट नहीं किया गया। 

जबकि चर्च के इतिहास से इस अपराध के लिए दंडों के वास्तव में घटे उदाहरण लूँ तो मन में खौफ पैदा हो जाता है। मैं आगे जब जब भी अपराध का नाम लूँ तो वह अपराध यही है। 

मसलन जीवित जलाना (Burning at the Stake) चर्च की सबसे मानक सजा थी। जियोर्डानो ब्रूनो और जान हस को चर्च के आदेश पर इसी तरह खत्म किया गया ताकि उनका शरीर (Relic) न बचे। जॉन हस का अपराध यह था कि उसने कहा चर्च का असली मुखिया ईसा मसीह हैं, न कि पोप अहिंसा का नाटक" (Ecclesia abhorret a sanguine) यहां था। चर्च का नियम था कि वह "खून नहीं बहा सकता"। इसलिए जलाने की सजा चुनी गई क्योंकि इसमें खून नहीं बहता था और शरीर पूरी तरह खत्म हो जाता था। मारिया बारबरा कार्लो (Maria Barbara Carillo, 1721) को 95 वर्ष की आयु में जिंदा जला दिया गया (वह स्पेनिश इनक्विजिशन द्वारा जलाई गई सबसे बुजुर्ग व्यक्तियों में से एक थीं)।उन पर "जुडाइजिंग" (ईसाई होने के बावजूद यहूदी रीति-रिवाजों का पालन करना) का आरोप था। मार्गेरिट पोरटे (Marguerite Porete, 1310) अपनी रहस्यमयी किताब के साथ पेरिस में जिंदा जला दी गईं। उन्होंने 'द मिरर ऑफ सिंपल सोल्स' लिखी थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि एक पूर्ण आत्मा को चर्च के नियमों की आवश्यकता नहीं होती।

स्ट्रैपाडो (Strappado) में अपराधी के हाथ पीछे बांधकर उसे ऊपर लटकाया जाता था और फिर झटके से नीचे गिराया जाता था। इससे कंधे के जोड़ पूरी तरह उखड़ जाते थे।

द रैक (The Rack) पर चढ़ाये जाने की सज़ा ऐन एस्क्यू को मिली थी । बेलन (Rollers) की मदद से शरीर को तब तक खींचा जाता था जब तक कि नसें और जोड़ फट न जाएं। एन एस्क्यू का अपराध यह था कि उन्होंने 'ट्रांसबस्टैंशिएशन' (Transubstantiation) से इनकार किया—यानी उन्होंने यह मानने से मना कर दिया कि चर्च की रोटी सच में मसीह का मांस बन जाती है।

मरणोपरांत मुकदमा (Posthumous Trial) भी चलता था। चर्च ने जॉन वाइक्लिफ की मौत के 44 साल बाद उनकी कब्र खुदवाई, उनकी हड्डियों पर मुकदमा चलाया और फिर उन्हें जलाकर राख को नदी में फेंक दिया। पिएत्रो डी अबानो (Pietro d'Abano, 1316) की 
मुकदमे के दौरान उनकी मृत्यु हो गई, तो चर्च ने उनकी लाश को खोदकर निकाला और सार्वजनिक रूप से जलाया।

जिह्वा छेदन (Piercing the Tongue) भी हुआ। जो लोग चर्च के खिलाफ बोलते थे, उनकी जीभ में लोहे की कील ठोक दी जाती थी या उसे काट दिया जाता था ताकि वे 'ईशनिंदा' न कर सकें। ब्रूनो वैज्ञानिक ने तर्क दिया था कि ब्रह्मांड अनंत है और कई अन्य संसार भी हो सकते हैं, जो चर्च की 'धरती ही केंद्र है' वाली बात के खिलाफ था। उन्हें लोहे की कील जीभ में ठोककर जिंदा जलाया गया (1600) था। 

हेरेटिक फोर्क (The Heretic's Fork) एक दोमुंहा कांटा था जो गले और छाती के बीच बांध दिया जाता था। गर्दन जरा भी झुकने पर वह गले को चीर देता था। यह सोने न देने की एक यातना थी।

दीवार में चुनवाना (Immurement) सिर्फ मुगलों तक सीमित न था। कई अपराधियों को ताउम्र के लिए चर्च की कालकोठरी की दीवारों के पीछे बंद कर दिया जाता था, जहाँ उन्हें बस एक छोटे छेद से खाना मिलता था।

पीला क्रॉस पहनना (The Yellow Cross) भी एक सज़ा थी। पश्चाताप' करने वाले अपराधियों को उम्र भर अपने कपड़ों पर बड़े पीले क्रॉस सिलकर घूमने पड़ते थे ताकि समाज उनका बहिष्कार करे।

लोहे का अस्त्र (Iron Maiden) से भी सजा मिलती थी। इनक्विजिशन के संग्रहालयों में इसे एक डरावने यंत्र के रूप में दिखाया जाता है, जिसमें अंदर की तरफ कीलें होती थीं।

जूडस क्रेडल (Judas Cradle) की सजा और क्रूर थी। संदिग्ध अपराधी को रस्सियों से एक नुकीले पिरामिड पर धीरे-धीरे उतारा जाता था ताकि वह उसे अंदर से फाड़ दे।

गला घोंटना और जलाना (Garrote) की सजा भी थी। विलियम टिंडेल जैसे लोगों को पहले लोहे के तार से गला घोंटकर मारा गया, फिर उनके शव को जलाया गया।

संपत्ति की जब्ती (Confiscation) भी की जाती थी। किसी को अपराधी घोषित करते ही चर्च उसकी सारी जमीन और धन छीन लेता था, जिससे उसका परिवार सड़कों पर आ जाता था।

सार्वजनिक कोड़े मारना (Public Scourging) भी था। कम अपराध वाले अपराधियों को हर रविवार चर्च के दरवाजे पर नग्न कर कोड़े मारे जाते थे।

पुनः बपतिस्मा पर मृत्युदंड मिलता था। एनाबैप्टिस्ट' (Anabaptists) जो चर्च के बाल-बपतिस्मा को नहीं मानते थे, उन्हें 'तीसरा बपतिस्मा' देने के नाम पर नदी में डुबोकर मार दिया जाता था।

लोहे के जूते (Iron Boots) वाली सजा और क्रूर थी। इसमें पैरों को लोहे के जूतों में डालकर उन्हें गर्म किया जाता था या कीलों से कस दिया जाता था जिससे हड्डियाँ चकनाचूर हो जाती थीं।

घुटने तोड़ना (Knee Splitter) भी सज़ा का एक प्रकार था। एक औजार से घुटने की कटोरी और जोड़ों को तब तक दबाया जाता था जब तक वे हमेशा के लिए बेकार न हो जाएं।

वाटर टॉर्चर (Toca) में आरोपी के मुंह में कपड़ा ठूंसकर ऊपर से पानी डाला जाता था ताकि उसे डूबने और दम घुटने का एहसास हो (आज का वॉटरबोर्डिंग)।

कैथर्स का नरसंहार (Albigensian Crusade) करने हेतु चर्च ने पूरे के पूरे 'कैथर' समुदाय को खत्म करने के लिए सेना भेजी और हजारों लोगों को एक साथ जला दिया गया।

अंगूठे दबाना (Thumb Screws) तो सस्ती सजा थी। इसमें लेखकों और विचारकों के अंगूठों को लोहे के शिकंजे में कसकर कुचल दिया जाता था ताकि वे दोबारा न लिख सकें।हमारे यहाँ के एकलव्य की तो बड़ी चर्चा मिश न रि यों ने की करवाई, अपनी इस सज़ा के बारे में बतलाने में चूक गये। 

ऑटो-डा-फे (Auto-da-fé) की चर्चा मैंने पिछली एक पोस्ट में की थी। यह एक सार्वजनिक उत्सव जैसा होता था जहाँ सैकड़ों अपराधियों को एक साथ जुलूस में ले जाकर सामूहिक रूप से जलाया जाता था।

ह्युजेस एम्ब्रायट (Hugues Aubriot, 1381) को मिली सजा ‘मुरस स्ट्रेक्टस' (Murus Strictus) यानी जीवन भर के लिए अंधेरी कालकोठरी में केवल रोटी और पानी पर रखा जाना। उस पर यहूदियों के प्रति सहानुभूति रखने और चर्च के नियमों की अवहेलना करने का आरोप था। 

फ्रा डोलसिनो (Fra Dolcino, 1307) ने एक क्रांतिकारी पंथ चलाया था जो चर्च की अमीरी के खिलाफ था। उन्हें गरम चिमटों से धीरे-धीरे नोंचकर मारा गया और फिर उनके शरीर के अंगों को जला दिया गया।

सर्वेंटस जैसे रक्त संचार वैज्ञानिक को मारने में जल्लादों ने जानबूझकर गीली लकड़ी (Green oak wood) का उपयोग किया था। गीली लकड़ी धीरे जलती है और बहुत धुआं पैदा करती है, जिससे आग की लपटें धीमी रहती हैं। इसका उद्देश्य मृत्यु की प्रक्रिया को लंबा खींचना था ताकि अपराधी अधिक समय तक तड़पे। उसके सिर पर तिनकों का एक मुकुट रखा गया था जिस पर सल्फर (गंधक) छिड़का गया था। जब आग की लपटें ऊपर पहुँचीं, तो सल्फर ने भीषण गर्मी पैदा की जिससे उसका सिर जलने लगा, लेकिन वह तुरंत मरा नहीं।जहाँ सामान्य तौर पर सूखी लकड़ी से व्यक्ति कुछ ही मिनटों में दम घुटने या जलने से मर जाता था, सर्वेंटस को मरने में 30 मिनट से लेकर लगभग 2 घंटे तक का समय लगा। वह पूरी प्रक्रिया के दौरान होश में था और दया की भीख मांगता रहा। उसकी प्रसिद्ध किताब 'Christianismi Restitutio' (जिसके कारण उसे अपराधी माना गया था) को उसकी जांघ से बांध दिया गया था ताकि वह भी उसके साथ भस्म हो जाए। सर्वेंटस पश्चिमी दुनिया के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने यह बताया कि रक्त (Blood) हृदय के दाहिने हिस्से से फेफड़ों (Lungs) में जाता है, वहां ऑक्सीजन लेकर शुद्ध होता है, और फिर वापस हृदय के बाएं हिस्से में आता है। उनसे पहले यह माना जाता था कि रक्त हृदय के बीच की एक दीवार से होकर सीधे गुजरता है। उस समय चर्च का मानना था कि "आत्मा" (Soul) रक्त में निवास करती है। सर्वेंटस का यह कहना कि रक्त फेफड़ों में हवा से मिलने जाता है, चर्च को ऐसा लगा जैसे वह आत्मा के दैवीय रहस्य को एक भौतिक या मैकेनिकल प्रक्रिया बता रहे हैं।

ल्यसिलो वानिनी को उनकी पुस्तकों Amphitheatrum Aeternae Providentiae Divino-Magique ( ईश्वरीय और जादुई शाश्वत विधान का रंगमंच) और De Admirandis Naturae Reginae Deaeque Mortalium Arcanis(मृत्युलोक की रानी और देवी प्रकृति के अद्भुत रहस्यों पर) के लिए लकड़ी के एक फ्रेम से चर्च तक घसीट कर लाया गया। फिर उसकी शर्ट फाड़ी गई, फिर उसे एक जलती मशाल पकड़ाई गई, उसकी जीभ काटी गई, उसका गला घोंटा गया और उसे जला दिया गया। 

इस्लामी दंड विधान का भी पुराना इतिहास रहा। का'ब इब्न अल-अशरफ (624 ईस्वी): एक कवि था जिसने मदीना में पैगंबर और मुसलमानों के खिलाफ अपमानजनक कविताएं लिखीं। उसे मौत की सजा दी गई।
असमा बिंत मरवान (624 ईस्वी) को पैगंबर मोहम्मद की आलोचना करने और कबीलों को भड़काने के आरोप में दंडित किया गया।अबू अफक (624 ईस्वी) एक वृद्ध कवि था जिसे पैगंबर के अपमान के आरोप में मार दिया गया।
जाद इब्न दिरहम (742 ईस्वी) उमेय्यद काल का एक विद्वान था जिसने कुरान के नाजिल होने पर बहस की। उसे ईद-उल-अजहा के दिन सार्वजनिक रूप से वध किया गया।बशर अल-मरीसी (9वीं सदी) एक मुअतज़िला विद्वान था जिसे अब्बासिद काल में कट्टरपंथियों ने ईशनिंदा के आरोप में प्रताड़ित किया।मंसूर अल-हल्लाज (922 ईस्वी) सबसे प्रसिद्ध सूफी शहीद हुए। उन्होंने "अनल हक" (मैं ही सत्य हूँ) कहा था। उन्हें पहले सार्वजनिक रूप से कोड़े मारे गए, फिर उनके हाथ-पैर काटे गए और अंत में फांसी देकर उनके शरीर को जला दिया गया। इमाद अल-दीन नसिमी (1417 ईस्वी) सूफी कवि था जिस पर ईशनिंदा का आरोप लगा और अलेप्पो (सीरिया) के बाजार में उनकी जिंदा खाल उतार दी गई (Flaying alive)। ऐन अल-कुज़ात हमदानी (1131 ईस्वी)को हमदान की जेल में गला घोंटकर मारा गया और फिर उनके शव को चटाई में लपेटकर खौलते हुए तेल में डाल दिया गया।

परफेक्टस (850 ईस्वी) कोर्डोबा का एक पादरी था जिसने पैगंबर के बारे में अपमानजनक शब्द कहे थे। उसे सिर काटकर मौत की सजा दी गई। इसाक ऑफ कोर्डोबा (851 ईस्वी) एक ईसाई भिक्षु था जिसने सार्वजनिक रूप से इस्लाम की आलोचना की। उसे फांसी दी गई। फ्लोरा और मारिया (851 ईस्वी) दो ईसाई महिलाएं थीं जिन्हें ईशनिंदा और इस्लाम छोड़ने के लिए मृत्युदंड दिया गया। यूलागियस (859 ईस्वी) कोर्डोबा के 'शहीद' आंदोलन के नेता थे। उन्हें ईसाइयों को ईशनिंदा के लिए उकसाने के आरोप में सिर काटकर मार दिया गया। जाद इब्न दिरहम (742 ईस्वी) को उमेय्यद गवर्नर खालिद अल-कसरी ने ईद-उल-अजहा की नमाज के बाद मिंबर के नीचे भेड़ की तरह ज़बह (गला काटना) कर दिया। शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी (1191 ईस्वी) को अलेप्पो के किले में तब तक भूखा रखा गया जब तक उनकी मृत्यु नहीं हो गई। बशर अल-हफी के अनुयायियों को ऊंची मीनारों से नीचे फेंककर मारा गया था। इब्न मुक़फ़्फ़ा (756 ईस्वी) एक प्रसिद्ध लेखक थे जिस पर ईशनिंदा का आरोप लगा। उसे भट्टी के पास ले जाया गया और उसके शरीर के अंगों को एक-एक करके काट कर उसी के सामने आग में भून दिया गया।मैं भारतीय उदाहरण देना नहीं चाह रहा था पर फिरोज शाह तुगलक के काल में एक ब्राह्मण को यह कहने पर कि 'इस्लाम और हिंदू धर्म दोनों सच्चे हैं', चर्च की तरह लकड़ियों के ढेर पर जिंदा जला दिया गया। 18वीं-19वीं सदी में दरगाहों पर जाने या 'बिदत' (नवाचार) को ईशनिंदा मानकर सार्वजनिक रूप से कोड़े मारना और सिर काटना आम था।

ये सब नाम मात्र के उदाहरण हैं वरना ऐसी सजाओं को भुगतने का इतिहास लाखों लोगों का है। 

मनु का दंड विधान इस पर एकदम मौन है। मनुस्मृति में सीधा उल्लेख न होने पर भी प्राचीन भारतीय व्यवस्था में देवनिन्दा को वाक्पारुष्य (मौखिक अपमान) की श्रेणी में देखा जाता था। याज्ञवल्क्य स्मृति (2.211) देवताओं, राजा या त्रिवेदी ब्राह्मण की निंदा पर उत्तम साहस दंड (भारी जुर्माना — लगभग 500-1000 पण या अधिक, शास्त्र अनुसार) का प्रस्ताव करती है। कौटिल्य अर्थशास्त्र (3.18.12) में देवताओं या चैत्य की निंदा पर उत्तम साहस दंड(500-1000 पण का जुर्माना) था। यह जुर्माना राजा द्वारा लगाया जाता था, लेकिन शारीरिक सजा (जैसे अंग-भंग) नहीं थी। मुख्यतः आर्थिक दंड था। चार्वाक, बौद्ध, जैन, आजीवक — ये सब वैदिक विरोधी थे। फिर भी इनके अनुयायियों को राज्य-दण्ड नहीं मिला। आधुनिक उदारवादी लोकतन्त्र, UN का Article 18 (UDHR), John Stuart Mill का “On Liberty” — सब यही कहते हैं कि विचार और अन्तःकरण की स्वतन्त्रता राज्य-दण्ड से परे होनी चाहिए।इस मानदण्ड पर मनुस्मृति की परम्परा — और व्यापक हिन्दू परम्परा — Inquisition और apostasy-law से निःसन्देह श्रेष्ठतर रही। चार्वाक ने ईश्वर को नकारा — जीवित रहे। बृहस्पति ने वेदों को “धूर्त-प्रपञ्च” कहा — उनके विचार संरक्षित रहे। बौद्धों ने आत्मा को नकारा — सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया। यह intellectual tolerance वास्तविक और ऐतिहासिक है।अजितकेशकंबली, संजय बेलठिपुत्त, पकुद्ध कात्यायन जैसे कितने ही वेदनिंदक हुए, किसी को कुछ नहीं हुआ। ‘न परमेश्वरोऽपिकश्चित्’ कहने वाले को भी कुछ नहीं हुआ और ‘काम एवैक: पुरुषार्थ:’ कहने वाले को भी छेड़ा नहीं गया। ‘प्रत्यक्षमेव प्रमाणम्’ कहने वाले का किसी ने कुछ नहीं बिगाड़ा। 

पर इसके दुष्परिणाम भी हुए। आज नव-बौद्धों सहित बहुत से प्रतिद्वंद्वी रिलीजन मनु के द्वारा दिखाई गई उदारता का भारत में दुरुपयोग धड़ल्ले से कर रहे हैं ।

फिर भी मनु की ओर दुनिया क्रमशः बढ़ रही है। 21वीं सदी में न्यूजीलैंड (2019), कनाडा, आइसलैंड, आयरलैंड, माल्टा, नॉर्वे और स्कॉटलैंड जैसे देशों ने अपने ईशनिंदा कानूनों को पूरी तरह से हटा दिया है। प्यू रिसर्च सेंटर' (Pew Research Center) के अनुसार, 2019 तक दुनिया के लगभग 79 देशों (करीब 40%) में ईशनिंदा के खिलाफ कानून मौजूद थे। मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका (MENA) क्षेत्र में स्थिति सबसे सख्त है, जहाँ लगभग 90% देशों में ऐसे कानून लागू हैं।

मनुस्मृति और तत्जनित भारतीय औदार्य की आधुनिकता देखकर आश्चर्य होता है।

मनोज श्रीवास्तव 
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भारतीय वैदिक धर्मशास्त्र व्यवस्था में चतुर्वर्ण के लिए कर्तव्य और उच्च वर्ग के लिए कठोर दण्डविधान

कभी जरा सा अपने शास्त्रों को पढ़ कर देखना । देखना उसमें क्या लिखा है ! 
सबसे ज्यादा नियम , कानून , restrictions , विधि , निषेध , यह नहीं करना है , वह नहीं करना है , ऐसा करना है , वैसा करना है , ऐसे बैठना है , ऐसे चलना है , ऐसे सोना है , यह खाना है , यह नहीं खाना है , यहाँ बैठना है , यहाँ नहीं बैठना है इत्यादि ब्राह्मणों के लिए बनाये गए हैं ।

इसके बाद क्षत्रियों के लिए , फिर वैश्यों के लिए और शूद्रों के लिए तो मात्र 10% ही नियम है । 

एक ब्राह्मण को यग्योपवीत होने के बाद क्या खाना है , क्या पीना है , कैसे रहना है , कितना खाना है , कब उठना है , कब बैठना है , कब स्नान करना है , कौन से दिन क्या खाना है , कैसे रहना है इत्यादि पढ़कर आप फफक फफक कर रोने लगेंगे । 
पागल हो जायेंगे आप ! 
इतना ही नहीं द्विज , पुरोहित , विप्र , आचार्य सबके लिए अलग अलग नियम ।
और जो ब्रह्मचारी और सन्यासी हो जाता है उसके लिए तो कठोरतम नियम है । इसके हाथ का नहीं , इस अग्नि पर नहीं , इस दिशा में नहीं , इस स्थान पर नहीं , पृथ्वी पर पैर रखते वक्त कौन सी नाड़ी , इस दिशा में चलते वक़्त कौन सी नाड़ी , उक्त कार्य करते वक़्त कौन सी नाड़ी चलनी चाहिए इत्यादि तक नियम कानून बनाये गए हैं ।

आपने अगर किसी अशुद्ध तत्व का विचार भी कर लिया तो उसके लिए भी घोर दंड और प्रायश्चित का विधान है । छू लिया या उसके कारण आपकी मानसिकता भी दूषित हुई तो न जाने इतनी बार डुबकी लगाने का प्रावधान है । 

एक ही अपराध के लिए ब्राह्मण को मृत्युदंड तक है , उसी अपराध के लिए क्षत्रिय को आजीवन कारावास , उसी अपराध के लिए वैश्य को कुछ वर्ष का कारावास और उसी अपराध के लिए शुद्र को बस कोड़े मार कर छोड़ दिये जाने का विधान है ।
लेकिन फिर इसका उल्टा भी कहीं कहीं विशेष परिस्थिति में है । 

इतना सब कुछ होने के बावज़ूद भी कभी ब्राह्मण ने अपने शास्त्र नहीं जलाए और न ही यह कहा कि जान बूझ कर ब्राह्मणों को सताने के लिए यह शास्त्र लिखे गए हैं और न ही शोषण का रोना रोया । 

इतिहास उठा कर देख लीजिये , इतिहास साक्षी है जब भी राक्षसों और असामाजिक तत्वों का या कोई भी बाहरी संस्कृति का आक्रमण हुआ है ,उन्होंने सबसे पहले ब्राह्मणों की हत्याएं की हैं और ब्राह्मण ही असुरों के कोप का भाजन बना है । 
जंगलों में , कुटिया बनाकर , सभी विलासिता पूर्ण जीवन को त्याग कर कठोर तप नियम संयम का आचरण करते हुए भी उसने यह नहीं कहा कि हमारा शोषण हो रहा है या अत्याचार हुआ ।

अब क्षत्रियों पर आ जाईये । 
यह एक ऐसी प्रजाति रही है जिसने प्रजा पालन के लिए अपने स्त्री , पुत्र , रिश्तेदार, यहाँ तक कि स्वयं को दांव पर लगा दिया । अपने शरीर का मांस तक काट काट कर इसने प्रजा की रक्षा के लिए तिरोहित कर दिया ।
किसी से भी लोहा लेना हो ,कोई भी आक्रमण हो , क्षत्रियों ने पहला वार अपनी छाती पर खाया है । अपने 10 से लेकर 16 वर्ष तक के पुत्रों की बलि हँसते हँसते इसने चढ़ा दी । 
वीर क्षत्राणी हँसते हँसते अपने पुत्रों को युद्धक्षेत्र में भेजती थी कि आज ही के दिन के लिए एक क्षत्राणी अपने पुत्र को जन्म देती है । 
अपने पुत्र, पति , भाई , पिता को इन्होंने ही सबसे ज्यादा खोया है । और इसके बाद यह भी हँसते हँसते जौहर कर लेती थी । 
किसके लिए ???? 
इन्हीं शास्त्रों के बताए नियम और कानून, मर्यादा की रक्षा के लिए क्योंकि शास्त्रों ने क्षत्रियों को यही धर्म बताया है कि सबकी रक्षा का दायित्व इन्हीं के ऊपर है ।
इन लोगों ने कभी यह नहीं कहा कि हे वैश्य , हे ब्राह्मण , हे शुद्र , तुम लोग जाओ युद्ध भूमि में , हम ही क्यों जायें और मरें ।

बल्कि अगर कोई शुद्र , ब्राह्मण या वैश्य बोलता भी था तो इनके लिए डूब मरने वाली बात होती थी कि इनके रहते युद्धभूमि में कोई कैसे जा सकता है । 
इतिहास साक्षी रहा है जितना युद्ध की विभीषिका क्षत्रियों ने झेला है और देश के मान की रक्षा के लिए कुर्बानी दी है , उतना किसी भी जाति ने नही दी है । 

लेकिन फिर भी इन्होंने कभी शास्त्र नहीं जलाए ,न ही शोषण का रोना रोया कि ब्राह्मणों , वैश्यों और शूद्रों ने चालाकी करके हमें मरने के लिए लिख दिया या छोड़ दिया या इन लोगों ने हमारा शोषण किया । 

अब आईये वैश्य पर !! 

यह वह प्रजाति रही है जो सदा से डकैतों , लुटेरों द्वारा लूटी गई है । 
युद्ध जीतने के बाद इन्हीं पर धावा बोला जाता था और इनके जीवन भर की मेहनत कर कर के कमाई हुई धन संपत्ति लूट ली जाती थी ।
जब देश पर युद्धकाल में भीषण संकट आता था या कोई प्राकृतिक आपदा आती थी , तो यही रहते थे जो अपना सर्वस्व दान कर देते थे । बड़े बड़े राजाओं को इन लोगों ने देश हित में अपने परिवार और भविष्य की परवाह न करते हुए सब कुछ दान किया है और देश को संकट से उबारा है । 
व्यापार करने दूर दूर तक जाते थे अपने परिवार से वर्षों विलग रहकर , मेहनत करके कमा कर जब लौटते थे तो डकैतों , नक्सलियों द्वारा इनके धन को लूट लिया जाता था और मार तक दिया जाता था । 
लेकिन फिर भी यह व्यापार करते थे क्योंकि शास्त्रों ने इनको यही धर्म बताया था कि तुम व्यापार से देश और समाज का भरण पोषण करो । 

लेकिन इन्होंने कभी शास्त्र नहीं जलाए और न ही शोषण का रोना रोया । 
जानते हो क्यों ???? 
क्योंकि इन सभी में अपना स्वाभिमान था , गर्वित भाव था अपने लिए । बस यही एक अंतर था । 

लेकिन शूद्रों के लिए ?? शास्त्र उठा लो और देख लो , सबसे ज्यादा freedom , liberty इसी जाति को दी गयी है । इसके लिए कोई कठोर नियम नहीं है कि क्या खाना है , कब खाना है , कितना खाना है , क्या करना है , क्या नहीं करना है , तुम कैसे भी रह सकते हो , नहाओ या न नहाओ , मांस खाओ या न खाओ , शराब पियो या न पियो , जुवा खेलो या न खेलो , कुछ भी करो , कोई कठोर नियम नहीं ।

बस इतना कहा गया कि उपरोक्त जो भी जाति अपने नियम , विधि निषेध का पालन कर रही है उसमें उसके पालन करने के लिए सहायक बनो , बाधक मत बनो । 
बस यही एक reason रहा जहाँ तुम्हारे लिए विधि निषेध शुरू हो जाता है । 

लेकिन तुमने इसको भी न मानकर और शास्त्रों की बातों का उल्टा अर्थ लगा लगा कर उसको जलाना और गरियाना शुरू कर दिया । शोषण शोषण का रोना रो रो कर रावण की तरह विलाप शुरू कर दिया । 

तुम तो किसी के आक्रमण का कभी केंद्र ही नहीं रहे । किसी ने भी तुमको कभी समूल नष्ट करने की विचार पर बल भी नहीं दिया, जितना कि उपरोक्त तीनों जातियों को ।

लेकिन तब भी तुम्हारा रोना चालू रहा । 

कभी सोचकर देखना कि इन वामपंथियों ने , इतिहासकारों ने और देश तोड़ने वालों ने तुम्हे कितना अंदर से खोखला कर दिया है । तुम्हें बरगलाकर अपने ही भाईयों , समाज और धर्म के खिलाफ गाली निकलवाई जाती है । इतना कमजोर कर दिया गया है और तुम हाथ छुड़ाकर इतने दूर चले गए हो कि बस वह ताक में हैं कि तुम कमजोर पड़ो और तुम पर वह हावी होकर तुम पर राज करें।  

इन सब बातों को समझो , अपनी संस्कृति , अपने धर्म , अपने शास्त्रों का सम्मान करो और दुबारा लौट आओ । 

जिस दिन तुम अपने भगवान , अपने देवी देवता , अपने शास्त्रों , अपने कुल , अपनी मर्यादा , अपने समाज के अन्य जातियों को गालियाँ देना बंद कर उनका सम्मान करना शुरू करोगे और अपना रोना न रोकर अपने संस्कृति पर , स्वयं पर स्वाभिमान पूर्वक गर्व करना शुरू कर दोगे , उस दिन दोनों भुजायें फैलाये सभी लोग तुम्हारा आलिंगन करेंगे । 

इन वामियों और देश विरोधी तत्वों के स्वप्न को चकनाचूर कर वापस अपने जड़ों में दुबारा लौट आओ । 

साभार - Shwetabh Pathak ( श्वेताभ पाठक )
आध्यात्मिक दिग्दर्शक 
Shwet Prem Ras 
www.ShwetPremRas.in
#fb #tuesday 
                         वयं राष्ट्रे जागृयाम 
तिथि - मिति वैशाख शुक्ल १३, विक्रम २०८३, बुधवार 
दिनांक 29/4/2026 ईस्वी 

सप्तशती_महास्तोत्र

🌹गुप्तसप्तशती_महास्तोत्र🌹 

         700मन्त्रों की ‘श्रीदुर्गा सप्तशती, का पाठ करने से साधकों का जैसा कल्याण होता है, वैसा-ही कल्याणकारी इसका पाठ है। यह ‘गुप्त-सप्तशती’ प्रचुर मन्त्र-बीजों के होने से आत्म कल्याणेछु साधकों के लिए अमोघ फलप्रद है।इसके पाठ का क्रम इस प्रकार है। प्रारम्भ में ‘कुञ्जिका-स्तोत्र’, उसके बाद ‘गुप्त-सप्तशती’, तदन्तर ‘स्तवन’ का पाठ करें।

गुप्त सप्तशती पाठ में इन तीनों स्तोत्रों का पाठ आवश्यक है।
1.कुञ्जिका-स्तोत्र
2.गुप्त-सप्तशती स्तोत्र 
3.देवीस्तवन

सबसे पहले 11बार इस मालामंत्र का पाठ करें 

           नवार्ण मालामंत्र

 ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महादुर्गे नवाक्षरी नवदुर्गे नवात्मिके नवचन्डि महामाये महामोहे महायोगनिंद्रे जय मधुकैटभ विद्राविणी महिषासुरमर्दिनी धूम्रलोचनसंहंत्री चन्डमुन्डविनाशिनी रक्तबीजांतके निशुम्भ ध्वंसिनी शुम्भ दर्पघ्नी देवी अष्टादशबाहुके कपाल खटवांग शूल खड्ग खेटक धारिणी छिन्नमस्तक धारिणी रुधिरमांंस भोजिनी
समस्त भूतप्रेतादिकयोग ध्वंसिनी ब्रहमेन्द्रादिक स्तुते ।
देवी माम् रक्ष रक्ष मम शत्रुन् नाशय नाशय ह्रीं फट् ह्रूं फट् ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै नमः।

      कुञ्जिका-स्तोत्र

।।पूर्व-पीठिका-ईश्वर उवाच।।
श्रृणु देवि, प्रवक्ष्यामि कुञ्जिका-मन्त्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेन चण्डीजापं शुभं भवेत्‌॥1॥
न वर्म नार्गला-स्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्‌।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासं च न चार्चनम्‌॥2॥
कुञ्जिका-पाठ-मात्रेण दुर्गा-पाठ-फलं लभेत्‌।
अति गुह्यतमं देवि देवानामपि दुर्लभम्‌॥ 3॥
गोपनीयं प्रयत्नेन स्व-योनि-वच्च पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्‌।
पाठ-मात्रेण संसिद्धिः कुञ्जिकामन्त्रमुत्तमम्‌॥ 4॥

अथ मंत्र :-
१..ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं स:ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।''

२..ॐ श्लैं दुँ क्लीं क्लौं जुं सः ज्वलयोज्ज्वल ज्वल प्रज्वल-प्रज्वल प्रबल-प्रबल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा
               ।।इति मंत्र:।।

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नम: कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिन।।1।।

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिन।।2।।

जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका।।3।।

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते।
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी।।4।।

विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिण।।5।।

धां धीं धू धूर्जटे: पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देविशां शीं शूं मे शुभं कुरु।।6।।

हुं हु हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः।।7।।

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा।।
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा।। 8।।

सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिंकुरुष्व मे।।

इदंतु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति।।

यस्तु कुंजिकया देविहीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा।।

।इतिश्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वती संवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम्। 
         गुप्तसप्तशती स्तोत्र
ॐ ब्रीं-ब्रीं-ब्रीं वेणु-हस्ते, स्तुत-सुर-बटुकैर्हां गणेशस्य माता।
स्वानन्दे नन्द-रुपे, अनहत-निरते, मुक्तिदे मुक्ति-मार्गे।।
हंसः सोहं विशाले, वलय-गति-हसे, सिद्ध-देवी समस्ता।
हीं-हीं-हीं सिद्ध-लोके, कच-रुचि-विपुले, वीर-भद्रे नमस्ते।।१

ॐ हींकारोच्चारयन्ती, मम हरति भयं, चण्ड-मुण्डौ प्रचण्डे।
खां-खां-खां खड्ग-पाणे, ध्रक-ध्रक ध्रकिते, उग्र-रुपे स्वरुपे।।
हुँ-हुँ हुँकांर-नादे, गगन-भुवि-तले, व्यापिनी व्योम-रुपे।
हं-हं हंकार-नादे, सुर-गण-नमिते, चण्ड-रुपे नमस्ते।।२

ऐं लोके कीर्तयन्ती, मम हरतु भयं, राक्षसान् हन्यमाने।
घ्रां-घ्रां-घ्रां घोर-रुपे, घघ-घघ-घटिते, घर्घरे घोर-रावे।।
निर्मांसे काक-जंघे, घसित-नख-नखा, धूम्र-नेत्रे त्रि-नेत्रे।
हस्ताब्जे शूल-मुण्डे, कुल-कुल ककुले, सिद्ध-हस्ते नमस्ते।।३

ॐ क्रीं-क्रीं-क्रीं ऐं कुमारी, कुह-कुह-मखिले, कोकिलेनानुरागे।
मुद्रा-संज्ञ-त्रि-रेखा, कुरु-कुरु सततं, श्री महा-मारि गुह्ये।।
तेजांगे सिद्धि-नाथे, मन-पवन-चले, नैव आज्ञा-निधाने।
ऐंकारे रात्रि-मध्ये, स्वपित-पशु-जने, तत्र कान्ते नमस्ते।।४

ॐ व्रां-व्रीं-व्रूं व्रैं कवित्वे, दहन-पुर-गते रुक्मि-रुपेण चक्रे।
त्रिः-शक्तया, युक्त-वर्णादिक, कर-नमिते, दादिवं पूर्व-वर्णे।।
ह्रीं-स्थाने काम-राजे, ज्वल-ज्वल ज्वलिते, कोशिनि कोश-पत्रे।
स्वच्छन्दे कष्ट-नाशे, सुर-वर-वपुषे, गुह्य-मुण्डे नमस्ते।।५

ॐ घ्रां-घ्रीं-घ्रूं घोर-तुण्डे, घघ-घघ घघघे घर्घरान्याङि्घ्र-घोषे।
ह्रीं क्रीं द्रूं द्रोञ्च-चक्रे, रर-रर-रमिते, सर्व-ज्ञाने प्रधाने।।
द्रीं तीर्थेषु च ज्येष्ठे, जुग-जुग जजुगे म्लीं पदे काल-मुण्डे।
सर्वांगे रक्त-धारा-मथन-कर-वरे, वज्र-दण्डे नमस्ते।।६

ॐ क्रां क्रीं क्रूं वाम-नमिते, गगन गड-गडे गुह्य-योनि-स्वरुपे।
वज्रांगे, वज्र-हस्ते, सुर-पति-वरदे, मत्त-मातंग-रुढे।।
स्वस्तेजे, शुद्ध-देहे, लल-लल-ललिते, छेदिते पाश-जाले।
किण्डल्याकार-रुपे, वृष वृषभ-ध्वजे, ऐन्द्रि मातर्नमस्ते।।७

ॐ हुँ हुँ हुंकार-नादे, विषमवश-करे, यक्ष-वैताल-नाथे।
सु-सिद्धयर्थे सु-सिद्धैः, ठठ-ठठ-ठठठः, सर्व-भक्षे प्रचण्डे।।
जूं सः सौं शान्ति-कर्मेऽमृत-मृत-हरे, निःसमेसं समुद्रे।
देवि, त्वं साधकानां, भव-भव वरदे, भद्र-काली नमस्ते।।८

ब्रह्माणी वैष्णवी त्वं, त्वमसि बहुचरा, त्वं वराह-स्वरुपा।
त्वं ऐन्द्री त्वं कुबेरी, त्वमसि च जननी, त्वं कुमारी महेन्द्री।।
ऐं ह्रीं क्लींकार-भूते, वितल-तल-तले, भू-तले स्वर्ग-मार्गे।
पाताले शैल-श्रृंगे, हरि-हर-भुवने, सिद्ध-चण्डी नमस्ते।।९

हं लं क्षं शौण्डि-रुपे, शमित भव-भये, सर्व-विघ्नान्त-विघ्ने।
गां गीं गूं गैं षडंगे, गगन-गति-गते, सिद्धिदे सिद्ध-साध्ये।।
वं क्रं मुद्रा हिमांशोर्प्रहसति-वदने, त्र्यक्षरे ह्सैं निनादे।
हां हूं गां गीं गणेशी, गज-मुख-जननी, त्वां महेशीं नमामि।।१०

            देवीस्तवन
या देवी खड्ग-हस्ता, सकल-जन-पदा, व्यापिनी विशऽव-दुर्गा।
श्यामांगी शुक्ल-पाशाब्दि जगण-गणिता, ब्रह्म-देहार्ध-वासा।।
ज्ञानानां साधयन्ती, तिमिर-विरहिता, ज्ञान-दिव्य-प्रबोधा।
सा देवी, दिव्य-मूर्तिर्प्रदहतु दुरितं, मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे।।१

ॐ हां हीं हूं वर्म-युक्ते, शव-गमन-गतिर्भीषणे भीम-वक्त्रे।
क्रां क्रीं क्रूं क्रोध-मूर्तिर्विकृत-स्तन-मुखे, रौद्र-दंष्ट्रा-कराले।।
कं कं कंकाल-धारी भ्रमप्ति, जगदिदं भक्षयन्ती ग्रसन्ती-
हुंकारोच्चारयन्ती प्रदहतु दुरितं, मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे।।२

ॐ ह्रां ह्रीं हूं रुद्र-रुपे, त्रिभुवन-नमिते, पाश-हस्ते त्रि-नेत्रे।
रां रीं रुं रंगे किले किलित रवा, शूल-हस्ते प्रचण्डे।।
लां लीं लूं लम्ब-जिह्वे हसति, कह-कहा शुद्ध-घोराट्ट-हासैः।
कंकाली काल-रात्रिः प्रदहतु दुरितं, मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे।।३

ॐ घ्रां घ्रीं घ्रूं घोर-रुपे घघ-घघ-घटिते घर्घराराव घोरे।
निमाँसे शुष्क-जंघे पिबति नर-वसा धूम्र-धूम्रायमाने।।
ॐ द्रां द्रीं द्रूं द्रावयन्ती, सकल-भुवि-तले, यक्ष-गन्धर्व-नागान्।
क्षां क्षीं क्षूं क्षोभयन्ती प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे।।४

ॐ भ्रां भ्रीं भ्रूं भद्र-काली, हरि-हर-नमिते, रुद्र-मूर्ते विकर्णे।
चन्द्रादित्यौ च कर्णौ, शशि-मुकुट-शिरो वेष्ठितां केतु-मालाम्।।
स्त्रक्-सर्व-चोरगेन्द्रा शशि-करण-निभा तारकाः हार-कण्ठे।
सा देवी दिव्य-मूर्तिः, प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे।।५

ॐ खं-खं-खं खड्ग-हस्ते, वर-कनक-निभे सूर्य-कान्ति-स्वतेजा।
विद्युज्ज्वालावलीनां, भव-निशित महा-कर्त्रिका दक्षिणेन।।
वामे हस्ते कपालं, वर-विमल-सुरा-पूरितं धारयन्ती।
सा देवी दिव्य-मूर्तिः प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे।।६

ॐ हुँ हुँ फट् काल-रात्रीं पुर-सुर-मथनीं धूम्र-मारी कुमारी।
ह्रां ह्रीं ह्रूं हन्ति दुष्टान् कलित किल-किला शब्द अट्टाट्टहासे।।
हा-हा भूत-प्रभूते, किल-किलित-मुखा, कीलयन्ती ग्रसन्ती।
हुंकारोच्चारयन्ती प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे।।७

ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं कपालीं परिजन-सहिता चण्डि चामुण्डा-नित्ये।
रं-रं रंकार-शब्दे शशि-कर-धवले काल-कूटे दुरन्ते।।
हुँ हुँ हुंकार-कारि सुर-गण-नमिते, काल-कारी विकारी।
त्र्यैलोक्यं वश्य-कारी, प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे।।८

वन्दे दण्ड-प्रचण्डा डमरु-डिमि-डिमा, घण्ट टंकार-नादे।
नृत्यन्ती ताण्डवैषा थथ-थइ विभवैर्निर्मला मन्त्र-माला।।
रुक्षौ कुक्षौ वहन्ती, खर-खरिता रवा चार्चिनि प्रेत-माला।
उच्चैस्तैश्चाट्टहासै, हह हसित रवा, चर्म-मुण्डा प्रचण्डे।।९

ॐ त्वं ब्राह्मी त्वं च रौद्री स च शिखि-गमना त्वं च देवी कुमारी।
त्वं चक्री चक्र-हासा घुर-घुरित रवा, त्वं वराह-स्वरुपा।।
रौद्रे त्वं चर्म-मुण्डा सकल-भुवि-तले संस्थिते स्वर्ग-मार्गे।
पाताले शैल-श्रृंगे हरि-हर-नमिते देवि चण्डी नमस्ते।।१०

रक्ष त्वं मुण्ड-धारी गिरि-गुह-विवरे निर्झरे पर्वते वा।
संग्रामे शत्रु-मध्ये विश विषम-विषे संकटे कुत्सिते वा।।
व्याघ्रे चौरे च सर्पेऽप्युदधि-भुवि-तले वह्नि-मध्ये च दुर्गे।
रक्षेत् सा दिव्य-मूर्तिः प्रदहतु दुरितं मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे।।११

इत्येवं बीज-मन्त्रैः स्तवनमति-शिवं पातक-व्याधि-नाशनम्।
प्रत्यक्षं दिव्य-रुपं ग्रह-गण-मथनं मर्दनं शाकिनीनाम्।।
इत्येवं वेद-वेद्यं सकल-भय-हरं मन्त्र-शक्तिश्च नित्यम्।
मन्त्राणां स्तोत्रकं यः पठति स लभते प्रार्थितां मन्त्र-सिद्धिम्।।१२

चं-चं-चं चन्द्र-हासा चचम चम-चमा चातुरी चित्त-केशी।
यं-यं-यं योग-माया जननि जग-हिता योगिनी योग-रुपा।।
डं-डं-डं डाकिनीनां डमरुक-सहिता दोल हिण्डोल डिम्भा।
रं-रं-रं रक्त-वस्त्रा सरसिज-नयना पातु मां देवि दुर्गा।।१
              इसके बाद भगवती दुर्गा के निम्नलिखित शतनाम का पाठ करें।
        सिद्धिदायक दुर्गा शतनाम
ॐ दुर्गा भवानी देवेशी विश्वनाथप्रिया शिवा ।
घोरदंष्ट्राकरालास्या मुण्डमालाविभूषिता ॥ १॥

रुद्राणी तारिणी तारा माहेशी भववल्लभा ।
नारायणी जगद्धात्री महादेवप्रिया जया ॥ २॥

विजया च जयाराध्या शर्वाणी हरवल्लभा ।
असिता चाणिमादेवी लघिमा गरिमा तथा ॥ ३॥

महेशशक्तिर्विश्वेशी गौरी पर्वतनन्दिनी ।
नित्या च निष्कलङ्का च निरीहा नित्यनूतना ॥ ४॥

रक्ता रक्तमुखी वाणी वस्तुयुक्तासमप्रभा।
यशोदा राधिका चण्डी द्रौपदी रुक्मिणी तथा ॥ ५॥

गुहप्रिया गुहरता गुहवंशविलासिनी ।
गणेशजननी माता विश्वरूपा च जाह्नवी ॥ ६॥

गङ्गा काली च काशी च भैरवी भुवनेश्वरी ।
निर्मला च सुगन्धा च देवकी देवपूजिता ॥ ७॥

दक्षजा दक्षिणा दक्षा दक्षयज्ञविनाशिनी।
सुशीला सुन्दरी सौम्या मातङ्गी कमलात्मिका ॥ ८॥

निशुम्भनाशिनी शुम्भनाशिनी चण्डनाशिनी ।
धूम्रलोचनसंहारी महिषासुरमर्दिनी ॥ ९॥

उमा गौरी कराला च कामिनी विश्वमोहिनी ।
जगदीशप्रिया जन्मनाशिनी भवनाशिनी ॥ १०॥

घोरवक्त्रा ललज्जिह्वा अट्टहासा दिगम्बरा ।
भारती स्वरगता देवी भोगदा मोक्षदायिनी ॥ ११॥

इत्येवं शतनामानि कथितानि वरानने ।
नामस्मरणमात्रेण जीवन्मुक्तो न संशयः।
पठित्वा शतनामानि मन्त्रसिद्धिं लभेत् धृवम् ॥ १२॥


✍️ पुजारी मनीष भारद्वाज 
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