मनुष्य पाँच तत्त्वों से बना है। भूत-प्रेत चार तत्त्वों से बने होते हैं, उनमें पृथ्वी तत्त्व नहीं होता। देवताओं का शरीर तीन और दो तत्त्वों से बना होता है। परमात्मा केवल आकाश तत्त्व से बना होता है। इन सभी को इन्हीं बाहरी आँखों से देखा जा सकता है, परन्तु परमात्मा को अंतर्दृष्टि खुले बिना देखा ही नहीं जा सकता। आप मंत्र-सिद्धि मत कीजिए, केवल अपनी क्षमता बढ़ा लीजिए, दो तत्त्व तक के शरीर देख सकेंगे।
मैं देवघर में जिस होटल में रुकता हूँ, उसके कमरे की सारी खिड़कियाँ बाहर की ओर खुलती हैं। एक खिड़की के सामने एक पुरानी इमारत है, उस पर पानी की लोहे की एक पुरानी टंकी रखी है, जो शायद अब उपयोग में नहीं आती।
एक दिन एक दम्पत्ति अपनी दस वर्षीय पुत्री को लेकर आए। वह कुछ भी बोलती रहती थी। उन तीनों को कमरे में बैठाकर मैं नीचे होटल के रिसेप्शन पर चला गया। कुछ देर बाद ऊपर लौटा तो देखा, माँ अपनी बेटी को डाँट रही है। मैंने पूछा, क्या हुआ? वे बोले, कुछ नहीं, बस वह बीच-बीच में बाहर खिड़की की ओर देख रही थी।
मैंने उस लड़की को पास बुलाकर पूछा, क्या उस पानी की टंकी पर कोई खड़ा है? उसकी माँ बीच में ही बोल पड़ी, इसे पता नहीं क्या-क्या दिखता रहता है, हम तो परेशान हो गए हैं। वह छोटी बच्ची बोली, क्या आपको भी दिखा है। मैंने कहा, मैं जब भी यहाँ आता हूँ, रोज़ ही देखता हूँ। यह दो-तीन बार यहाँ से कूदती है, परन्तु मरेगी नहीं, क्योंकि इसे मरे हुए कई वर्ष हो गए हैं। अब ऐसी बातें सभी को डराती हैं।उसके पश्चात मैंने उन दम्पत्ति को बाहर जाने के लिए कहा और उस बच्ची से डेढ़ घंटे तक बात की। सब कुछ सामान्य ही था। फिर उसके माता-पिता को बुलाकर कहा, यह बिल्कुल ठीक है, इसे कुछ नहीं हुआ है। यह केवल थोड़ा अधिक देख लेती है। अधिक से अधिक इतना कि यह चार तत्त्वों तक की वस्तुओं को देख लेती है। परन्तु माता-पिता को ऐसी बेटी नहीं चाहिए। यह समस्या हम सभी की है।हमें संतान तो चाहिए, परन्तु अपनी इच्छा के अनुसार। जबकि हमें यह भली-भाँति ज्ञात होना चाहिए कि पुत्र या पुत्री के रूप में जो भी मिला है, वह सब पहले से ही प्रोग्राम होकर मिला है। इस प्रकार की क्षमता प्राप्त करने के लिए लोग लम्बी तपस्या करते हैं। उस बच्ची को यह सब स्वाभाविक रूप से प्राप्त है। उस बच्ची के कुछ सिस्टम को लॉक कर दिया गया। लोगों की दृष्टि में वह ठीक हो गई, परन्तु मेरी दृष्टि में उसकी प्रगति रुक गई।
हम अपनी क्षमताओं को विकसित नहीं करना चाहते। हमें लगता है कि हम जिसकी साधना कर रहे हैं, वही सब कुछ करे। जो लोग प्रत्यक्षीकरण करना चाहते हैं, वे किसी योग्य व्यक्ति के सान्निध्य में त्राटक के सभी सात चरणों को गम्भीरता से पूरा करें। जिन्हें अपना माल बेचना है, मैं उनकी बात नहीं करता। बस गायत्री की प्रशंसा कर दी, लोग बिना सोचे-समझे उसे लेने के लिए मरे जाते हैं।
मनुष्य सत्य पर कितनी भी मिट्टी क्यों न डाल दे, सत्य को बदला नहीं जा सकता। उसे स्वीकार करना ही पड़ता है। एक बार सत्य को स्वीकार करने का स्वभाव बन जाए तो जीवन में परिवर्तन अपने आप आरम्भ हो जाता है। इसके लिए अलग से कोई टंटा-घंटा करने की आवश्यकता नहीं है।
कुछ सत्य ऐसे हैं जिन्हें सभी मनुष्य झुठलाने या बदलने के प्रयास में लगे रहते हैं, परन्तु जब से पृथ्वी बनी है तब से आज तक कोई ऐसा कर नहीं पाया। मैं यहाँ कुछ ऐसी ही बातों पर थोड़ा प्रकाश डाल रहा हूँ, जिन्हें हम सभी झुठलाने में लगे रहते हैं।
कुछ वर्ष पूर्व मैं राजधानी एक्सप्रेस से मुजफ्फरपुर से कामाख्या जा रहा था। सेकंड एसी में मेरी सीट के ठीक सामने एक ब्राह्मण की सीट थी। वहाँ कुछ विधायक भी थे। उन्हें देखकर ब्राह्मण कुछ अधिक ही सक्रिय हो गया। तुलसीदास ने क्या कहा है, यही उसके भीतर से उबाल मार रहा था। मैंने उसे दो-तीन बार रोककर कहा, शांत बैठो, परन्तु वह बिल्कुल नहीं माना।
अंततः मैंने उससे एक छोटा-सा प्रश्न किया - राम और सीता की विवाह-कुंडली किसने मिलाई थी? सीता के चरण जैसे ही अयोध्या में पड़े, राम को वनवास हो गया, ससुर दशरथ की मृत्यु हो गई, पूरा परिवार बिखर गया। उसके बाद जो कुछ हुआ, वह सबके सामने है। हम कैकेयी को दोष देते हैं, धोबी को दोष देते हैं, उस ब्राह्मण को दोष क्यों नहीं देते जिसने कुंडली मिलाई थी? हम उस ब्राह्मण से भी कुछ नहीं कहते जो द्वापर की जगह त्रेता ले आया था, उसने सब कुछ ठीक क्यों नहीं किया?यदि हमारे घरों में ऐसी बहू आई होती तो वह जीवन भर ताने सुनती।ब्राह्मण ने कई बार विषय बदलने का प्रयास किया, परन्तु मैं नहीं माना। मैंने कहा, अब पूरी रात इसी विषय पर बात करूँगा। मुझे तुम्हारे रामचरितमानस के ज्ञान को देखना है। वहाँ विधायक थे, भीड़ तो थी ही, और भी काफी भीड़ एकत्र हो गई। अंततः तीन घंटे बाद रात ग्यारह बजे ब्राह्मण सीट बदलकर थर्ड एसी में चला गया। उसके बाद वहाँ उपस्थित लोगों के साथ जो सत्संग हुआ, उसी के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं।
वास्तविकता को स्वीकार करने में हमारा साहस क्यों मर जाता है ?
राम एक आदर्श व्यक्तित्व हैं। जिन तथ्यों को हम नकारते हैं, वही उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाते हैं। हम राम को मानते तो हैं, परन्तु राम ने जो करके दिखाया, उसमें हमारी आस्था नहीं है। ईश्वर ने कृष्ण के रूप में कहा कि जीवन की वास्तविकता क्या है, और राम के रूप में जीकर दिखाया कि मनुष्य को जीवन कैसे जीना चाहिए। परन्तु हमने इन सबसे बचने के बहाने खोज रखे हैं।
राम ने सारा जीवन अपमान, पीड़ा और संघर्ष में जिया। यह सब समाज का ही दिया हुआ था। मंच पर बैठे लोग कहते हैं, वे लीला कर रहे थे। लीला तो नौटंकी को कहा जाता है। लोगों ने राम के सम्पूर्ण जीवन-चरित्र को ही मजाक बना दिया है। यही कारण है कि हम राम को आदर्श मानते तो हैं, परन्तु उनके जीवन जीने की शैली का अनुसरण नहीं करते।
विधेहि देवी कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
वेदोऽहम् अवेदोऽहम्। विद्याहम् अविद्याहम्।
*अजाहम् अनजाहम्। अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक् चाहम्॥
#अष्टावक्रवैदिकविज्ञानशोध
साभार ✍️ हिमालयन घुमक्कड़ विक्रम गिरी
Himalayan Ghumkkad Vikram Giri
वयं राष्ट्रे जागृयाम