Pages

Sunday, 27 September 2026

‎जैसा खाओ अन्न ... वैसा होवे मन ।

एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी। सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लगा ।
‎
‎सेठ ने सोचा कि इतना पाप हो रहा है , तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए।
‎
‎एक दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा को आमंत्रित कर भोजनप्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की।
‎
‎साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खायी।
‎
‎दोपहर का समय था । सेठ ने कहाः "महाराज ! अभी आराम कीजिए । थोड़ी धूप कम हो जाय फिर पधारियेगा।
‎
‎साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली।
‎
‎सेठ ने 100-100 रूपये वाली 10 लाख जितनी रकम की गड्डियाँ उसी कमरे में चादर से ढँककर रख दी।
‎
‎साधु बाबा आराम करने लगे।
‎
‎खीर थोड़ी हजम हुई । साधु बाबा के मन में हुआ कि इतनी सारी गड्डियाँ पड़ी हैं, एक-दो उठाकर झोले में रख लूँ तो किसको पता चलेगा ?
‎
‎साधु बाबा ने एक गड्डी उठाकर रख ली।
‎
‎शाम हुई तो सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े।
‎
‎सेठ दूसरे दिन रूपये गिनने बैठा तो 1 गड्डी (दस हजार रुपये) कम निकली।
‎
‎सेठ ने सोचा कि महात्मा तो भगवतपुरुष थे, वे क्यों लेंगे.?
‎
‎नौकरों की धुलाई-पिटाई चालू हो गयी। ऐसा करते-करते दोपहर हो गयी।
‎
‎इतने में साधु बाबा आ पहुँचे तथा अपने झोले में से गड्डी निकाल कर सेठ को देते हुए बोलेः "नौकरों को मत पीटना, गड्डी मैं ले गया था।"
‎
‎सेठ ने कहाः "महाराज ! आप क्यों लेंगे ? जब यहाँ नौकरों से पूछताछ शुरु हुई तब कोई भय के मारे आपको दे गया होगा । और आप नौकर को बचाने के उद्देश्य से ही वापस करने आये हैं क्योंकि साधु तो दयालु होते है।"
‎
‎साधुः "यह दयालुता नहीं है । मैं सचमुच में तुम्हारी गड्डी चुराकर ले गया था।
‎
‎साधु ने कहा सेठ ....तुम सच बताओ कि तुम कल खीर किसकी और किसलिए बनायी थी ?"
‎
‎सेठ ने सारी बात बता दी कि स्टेशन मास्टर से चोरी के चावल खरीदता हूँ, उसी चावल की खीर थी।
‎
‎साधु बाबाः "चोरी के चावल की खीर थी इसलिए उसने मेरे मन में भी चोरी का भाव उत्पन्न कर दिया। सुबह जब पेट खाली हुआ, तेरी खीर का सफाया हो गया तब मेरी बुद्धि शुद्ध हुई कि
‎'हे राम.... यह क्या हो गया ?
‎
‎मेरे कारण बेचारे नौकरों पर न जाने क्या बीत रही होगी । इसलिए तेरे पैसे लौटाने आ गया ।
‎
‎"इसीलिए कहते हैं कि....
‎
‎जैसा खाओ अन्न ... वैसा होवे मन ।
‎जैसा पीओ पानी .... वैसी होवे वाणी ।
 जैसी शुद्धी.... वैसी बुद्धी.... ।
‎जैसे विचार ... वैसा संसार..... ।

कहानी काल्पनिक पर हमें चोरी ना करने की सीख दें रही हैं।
    ✍️लालपुरी लूनकरणसर 

महान सम्राट विक्रमादित्य के पौत्र और हिन्दू धर्मध्वजा रक्षक सम्राट स्कंद का व्यक्तित्व चरित्र और राष्ट्रीय चरित्र

हूण जाति की नृशंसता इतनी थी कि चीन से लेकर महान रोमन साम्राज्य तक काँप उठे थे...

इस अकेली बर्बर जाति का आतंक इतना था कि उसने उस समय के किसी भी बड़े साम्राज्य को रौंदे बिना नहीं छोड़ा...

चीन का विशाल साम्राज्य तो इतना भयाक्रांत हुआ कि उसने हूणों से लड़ने का विचार ही छोड़ दिया और रक्षात्मक होकर खुद को ऊँचे ऊँचे सैकड़ों किलोमीटर की दीवार से घेर लिया...

 जब चीन आत्मसमर्पित हुआ तो ये हूण अपनी एक टुकड़ी के साथ यूरोप की ओर दौड़ पड़ा... "आटिला" नाम के उसके सेनापति ने पोलैंड को मिट्टी में मिला दिया फिर एक एक कर यूरोप के बाकी देशों में खून की नदियाँ बहा दी....

 इन हूणों के कारण विशाल रोमन साम्राज्य मिट्टी में मिल गया तो इस विजयोन्माद में उन हूणों की टुकड़ी ने भारत का भी रुख किया और गांधार प्रदेश पहुँच गये...

वहां विजय प्राप्त कर जब वो सिंध को निगलने आगे बढ़े तो वहां उसे रोकने के लिए वैदिक सूर्य कुमारगुप्त का महान प्रतापी राज्य खड़ा था...

कुमारगुप्त ने इन बर्बर हूणों के समूल नाश के लिए किसी और सेनापति को न भेजकर अपने पुत्र राजकुमार स्कंद को भेजा... हूणों की विशाल और बर्बर टोली को स्कंद ने रौंद दिया और जन वो हूणजयी होकर पाटलिपुत्र लौटे तो वहां उनके स्वागत में वृद्ध पिता कुमारगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ किया...

फिर कुमारगुप्त के स्वर्गवासी होने के बाद स्कंद भारत के सम्राट बने..

स्कंद के शासन के उत्तरार्ध में हूणों ने फिर से अपनी शक्ति संकलित की और "खिंखिल" नाम के सेनापति के नेतृत्व में फिर से भारत पर हमलावर हो गया...

 भारत की सेना शुरुआत में जब परास्त होने लगी तो स्कंद स्वयं ही सेना का संचालन करने पश्चिम भारत की ओर चल पड़े... उधर वो युद्ध में हूणों से जूझ रहे थे और इधर उनके धूर्त भाई पुरुगुप्त ने सत्ता पर छल से कब्जा कर लिया..

सत्ता हड़पे जाने की सूचना महाराज स्कंद को पहुँचा तो उनके सामने दो रास्ते थे..

एक था कि वापस जाकर अपने सौतेले भाई से वापस सत्ता छीन लें और दूसरा ये कि हूणों को युद्ध में धूल चटाये..

महान सम्राट विक्रमादित्य के पौत्र और हिन्दू धर्मध्वजा रक्षक सम्राट स्कंद ने दूसरा विकल्प चुना और युद्ध भूमि में वीरगति को प्राप्त हुये..

 दूसरा विकल्प इसलिये चुना क्योंकि अगर वो सत्ता की सोचते और लौट जाते तो बर्बर हूणों के कारण न जाने कितने लोगों को अपनी जान देनी पड़ती, न जाने कितनी ललनाओं की इज़्ज़त लूटी जाती और न जाने कितने देवालय टूटते..
पहले अपनी सत्ता और फिर अपने प्राण की बलि देकर स्कंद ने सबको बचा लिया और मृत्यु पाकर अमर हो गये..

पाटलिपुत्र का महान वैभवशाली सम्राट अपनी राजधानी से हजारों किलोमीटर दूर पंजाब में बलिदान हुये पर बलिदान होने से पहले उन्होंने हूण सेनापति "खिंखिल" को भारत की सीमा से मीलों दूर खदेड़ दिया और धर्म तथा राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित की...

स्कंद का व्यक्तित्व चरित्र और राष्ट्रीय चरित्र उन सबके लिए पाथेय है जो सत्ता को सब कुछ समझते हुये राष्ट्र और धर्म की सुरक्षा से मुँह मोड़ लेते हैं पर दुर्भाग्य कि भारत में किसी ने इतिहास से न तो कभी कुछ सीखा और न सीखेंगे...

और ये हो भी क्यों न क्योंकि आज भारत में कितने हैं जिन्हें महान सम्राट स्कंद की ये गाथा याद है और अगर नहीं है तो फिर किसी और से ये उम्मीद करना कि उनका चरित्र स्कंद के चरित्र का अनुगमन करेगा हास्यास्पद ही हैं...
- ✍️Shivananda Mishra

सुपथ से ऐश्वर्य प्राप्ति की साधना

              सुपथ से ऐश्वर्य प्राप्ति की साधना 

अग्ने नय सुपथा रायेऽअस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युथोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्ति विधेम ॥ (यजुर्वेद ४०/१६)

(अग्ने अस्मान् राये सुपथा नय) हे ज्ञानस्वरूप प्रभो हमें ऐश्वर्य प्राप्ति के लिये अच्छे मार्ग से ले चलिये (देव) हे दिव्यगुणों के दाता प्रकाशस्वरूप परमात्म देव ( विश्वानि वयुनानि विद्वान् ) आप सम्पूर्ण कर्मों के जानने वाले हैं (अस्मज्जुहुराणम् एनः युयोधि) हमारे कुटिलाचरण पाप को नष्ट कर दीजिये (ते भूयिष्ठां नम उक्तिं विधेम) हम तुम्हारी बारंबार स्तुति करते हैं।
  सुपथ से ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए मन में सकारात्मकता के संग, हर पल शुभता का अहसास करते रहिए। यही विचार मनुष्य को सन्मार्ग पर ले जाता है। सन्मार्गगामी बनने से हमें शाश्वत सुखानुभूति होती रहती है, इसके साथ ही दुख की निवृत्ति होती रहती है। इसी प्रकार की जीवन शैली को तपश्चर्या कहते हैं। सुखानुभूति और दुख की निवृत्ति एक साथ होने से जीवन कुंदन बनता जाता है। तप की भट्टी में तपते तपते निखरता जाता है। परिणामस्वरूप जीवन से भटकाव समाप्त हो जाता है। चित्त में स्थिरता आती है।
ठोकर खाने का दौर समाप्त होता है और जीवन उन्नति में ढलता जाता है। हर व्यक्ति अपने कर्तव्य पालन को ही अपना धर्म मानने लगता है।
  वेद के उपरोक्त मंत्र में हमने सुपथ पर चलने की प्रार्थना परमपिता परमेश्वर से की है। परमपिता परमेश्वर ने चराचर जगत की रचना की है। इसके बारे में वह सब कुछ जानता है। इसका ज्ञान विज्ञान,दृश्य -अदृश्य कुछ भी उससे अछूता नहीं है। इसीलिए वह ज्ञानस्वरूप कहलाता है। उसको बनाने का भी ज्ञान है, चलाने का भी ज्ञान है और अंत में संहार करने का भी ज्ञान है । उस ज्ञानस्वरूप परमपिता परमेश्वर ने मनुष्य को वेद ज्ञान दिया। जिससे वह भी ज्ञानवान बन सके और अपने जीवन का उद्धार कर सके। 
  सदविद्या ही मनुष्य का सबसे सुंदर ऐश्वर्य है। सबसे मूल्यवान आभूषण है। जो सब कुछ जानता हो- वही हमें ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए सन्मार्ग दिखा सकता है। जो स्वयं ही रास्ता नहीं जानता हो वह दूसरों को क्या रास्ता दिखाएगा ? जो स्वयं ऐश्वर्य संपन्न है, वही आपको ऐश्वर्य संपन्न कर सकता है। जो स्वयं दरिद्र है, वह दूसरों को ऐश्वर्य संपन्न नहीं कर सकता। इसलिए उससे ही मांगना चाहिए जो देने में सक्षम हो, समर्थ हो। 
  इस मंत्र में परमपिता परमेश्वर से ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए अच्छे मार्ग से ले चलने की प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि आप ही समस्त कर्मों के ज्ञाता है। हम आपकी बारंबार स्तुत्ति करते हुए प्रार्थना करते हैं कि आप हमें पथभ्रष्ट करने वाले कुटिलाचरण रूपी पाप से मुक्त होने के लिये उसे भस्मसात् कर दीजिये।
  जब कुटिलाचरण रूपी पाप भस्म हो जाएगा तो उसके उपजने की सारी संभावनाएं क्षीण हो जाएंगी। परमेश्वर हमारा अग्रगन्ता नायक है। हमको सदा ध्यान रखना चाहिए कि उस परमपिता परमेश्वर के नायकत्व में ही हम आगे बढ़ रहे हैं। वह नायक इसीलिए है कि वह हमको अर्थात अपने अनुयायियों को सुपथ पर ले चलने की क्षमता रखता है। समाज, किसी संगठन या किसी राष्ट्र का नायक भी वही हो सकता है जो अपने समाज या अपने संगठन के लोगों को अथवा अपने राष्ट्रवासियों को सुपथ पर लेकर चलने की क्षमता रखता हो। यदि वह स्वयं पथ भ्रष्ट है तो वह नायक के गुणों से शून्य है।
  परमपिता परमेश्वर हमारे कल्याण में रत रहते हैं। उन्होंने सृष्टि तक की रचना हमारे कल्याण के लिए की है। चौबीसों घंटे उसके हृदय में हमारे कल्याण की योजनाएं आकार लेती रहती हैं । इसीलिए वह हमारा नायक होने की क्षमता रखता है। लौकिक जगत में भी वही व्यक्ति नायक हो सकता है जो अपने संगठन, अपने समाज, अपने राष्ट्र और अपने अनुयायियों के कल्याण की योजनाओं में लगा रहता है।  यदि नायक आग लगाने वाला है, विखंडनवादी है, संकीर्ण मानसिकता का है तो वह समाज, राष्ट्र या किसी संगठन का नेतृत्व करने की क्षमता नहीं रखता। यदि संयोग से उसे नेतृत्व करने का अवसर मिल भी जाता है तो वह ऐसे समाज, संगठन या राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध होता है। तिकड़मों से नेता बनने वाले लोग राष्ट्र का विखंडन करा देते हैं। क्योंकि तिकड़म अपने आप में एक ऐसा शब्द है जो विखंडन की ओर संकेत करता है।  
  मंत्र के भाव पर यदि विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि जिन सन्मार्ग के कार्यों से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है उनका हमारे नायक को ज्ञान होना चाहिये। नेता का यह गुण उसके चिंतन की व्यापकता को स्पष्ट करता है। उसके चिंतन में किसी प्रकार की संकीर्णता नहीं होनी चाहिए। हमारे देश के विभाजन के लिए मोहम्मद अली जिन्ना की संकीर्ण सोच जिम्मेदार रही। जिसके चलते वह कभी संपूर्ण भारत और भारतवासियों को अपना नहीं मान सका। 
  नेता के लिए यह भी आवश्यक है कि वह कुमार्ग से हटाने की सामर्थ्य वाला होना चाहिए। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह परिवार में कभी एक दूसरे के प्रति निंदा चुगली करके जहर नहीं फैलाएगा। संगठन के लोगों में भी एक दूसरे के प्रति जहर घोलने का प्रयास नहीं करेगा। समाज और राष्ट्र के लोगों को भी जहर घोलने की प्रवृत्तियों से बचा कर रखेगा। जैसे परम पिता परमेश्वर हमें सन्मार्ग पर लेकर चलता है और कुमार्ग से हमें बचाता है वैसे ही हमारा लौकिक नायक भी हमें सन्मार्ग पर लेकर चलेगा और कुमार्ग से बचाएगा। जहां परिवार समाज राष्ट्र के लोग अपेक्षा करते हैं कि आप वहां उपस्थित होने चाहिए, वहां अवश्य उपस्थित होने का प्रयास कीजिए और जहां आप आवश्यक समझते हैं कि लोगों की छोटी-मोटी बातों की उपेक्षा की जाए वहां उनकी उपेक्षा करिए। अपेक्षा और उपेक्षा दोनों का सदा ध्यान रखकर आगे बढ़िए।
    गम्भीरता पूर्वक विचार करने से ज्ञात होता है कि ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ही हमारे वास्तविक और स्वाभाविक नायक हैं। उसके पास अनन्त ज्ञान बल क्रियारूपी सामर्थ्य स्वाभाविक रूप से उपलब्ध है। उसकी प्रेरक शक्ति हमें प्रत्येक प्रकार के दुख दारिद्र्य से बचाती है। संपूर्ण दुर्गुणों और दुर्व्यसनों से बचाती है। वह हमारे हृदय में विराजमान होकर हमारा नेतृत्व करता रहता है। किस मार्ग पर चलने से हमारा कल्याण हो सकता है ? किस मार्ग पर चलने से हमारा विनाश हो सकता है ? इस बात का सही-सही अवलोकन करता रहता है और हमें साथ ही साथ संकेत भी देता रहता है। जिन लोगों के हृदय में भक्ति के भाव हैं और श्रद्धा विराजमान है, वे परमपिता परमेश्वर के संकेतों को समझते रहते हैं और उसी के अनुसार अपना आचरण बना लेते हैं।
उनके लिए संकेत ही पर्याप्त होता है। संकेत के आधार पर ही वह अपने जीवन पथ का निर्धारण कर लेते हैं। कुछ समय में उन संकेतों को सुनने के वे इतने अधिक अभ्यासी हो जाते हैं कि उन्हें हर कदम पर मिलने वाले संकेत अपने लिए देवदूत दिखाई देने लगते हैं।
   जिन लोगों के भीतर श्रद्धा नहीं होती उन्हें परमपिता परमेश्वर के ये सारे संकेत कभी दिखाई नहीं देते। श्रद्धावान को ही ज्ञान की प्राप्ति होती है अर्थात उसे इस बात का बोध होता है कि मेरे जीवन में जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह परमपिता परमेश्वर की असीम अनुकम्पा के चलते हो रहा है। करने वाला मैं नहीं हूं । करने वाला कोई और है। मैं तो उसके संकेत पर कठपुतली की भांति मात्र नाचने का काम कर रहा हूं। यदि जीवन में वह कुछ मुझसे शुभ करवा रहा है अर्थात कुछ ऐसा करवा रहा है जिसे ' बड़ा ' कहा जा सकता है तो यह उसकी कृपा का ही परिणाम है कि उसने इस शुभ के लिए मेरा चयन किया है। इस चयन के लिए भी उसका धन्यवाद ज्ञापित करो।
   वह दयालु - कृपालु परमपिता परमेश्वर हमारे हृदय में विराजमान हैं । हृदय में विराजमान रहकर वह दयानिधान सदा ही सुपथ पर बढ़ने एवं कुमार्ग से हटने की प्रेरणा करते रहते हैं। यदि हम उसकी प्रेरणा को सुन नहीं पाते अथवा उसके अनुसार अपना जीवन आचरण नहीं कर पाते तो इसमें दोष उसका नहीं है बल्कि हमारा है।

डॉ राकेश कुमार सिंह 
( आर्यों का महाकुंभ वाट्स एप ग्रुप से 27/9/2026 ईस्वी ) 

Friday, 25 September 2026

26/11 में बंदूकें चलाने वाले आतंकवादियों के नाम इतिहास में दर्ज हैं। लेकिन उसी स्टेशन पर सैकड़ों लोगों को गोलियों के रास्ते से दूर करने वाली वह आवाज भी याद रखी जानी चाहिए। वह आवाज़ थी—विष्णु दत्ताराम झेंडे की।

26/11 का मुंबई रेलवे स्टेशन पाकिस्तान से आया कसाब और उसका साथी...प्लेटफॉर्म पर घूमते हुए पर घूमते लोगों को मार रहे थे 
....गोलियों की आवाज़ और 50 से ज्यादा लोगों की मौत.... ये घटना सभी याद रखते हैं 

लेकिन उस शख्स को बहुत कम लोग याद करते हैं, जिसकी आवाज़ ने सैकड़ों अनजान लोगों को गोलियों की दिशा में जाने से रोक दिया....., #विष्णु_दत्ताराम_झेंडे।

26 नवंबर 2008 की रात वह छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (CST) के अनाउंसमेंट केबिन में ड्यूटी पर थे। यह प्लेटफॉर्म के ऊपर बना एक कांच का कमरा था, जहाँ से पूरे स्टेशन का काफी हिस्सा दिखाई देता था।

ड्यूटी खत्म होने में ज्यादा वक्त नहीं बचा था कि अचानक उन्हें तेज धमाके और गोलियों की आवाज़ सुनाई दी। उन्होंने देखा कि लोग जान बचाकर भाग रहे हैं। दो आतंकवादी देश के सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशनों में से एक में घुस चुके थे और सामने आने वाले लोगों पर गोलियां चला रहे थे। उस स्टेशन पर ही 50 से ज्यादा लोगों की जान जाने वाली थी।

लेकिन विष्णु झेंडे ने ऊपर से एक ऐसी चीज देख ली, जिसे शायद बाकी लोग नहीं देख पा रहे थे। लोकल ट्रेनें लगातार स्टेशन पर आ रही थीं। हर ट्रेन से सैकड़ों यात्री उतरने वाले थे—सीधे उन्हीं प्लेटफॉर्मों पर, जहाँ आतंकवादी गोलियां चला रहे थे। उनके पास सिर्फ एक माइक्रोफोन था, जिसकी आवाज़ पूरे स्टेशन के प्लेटफॉर्म तक पहुंच सकती थी। उन्होंने फैसला किया कि वे इसका इस्तेमाल करेंगे।

भले ही इसका मतलब था कि उन्हें छिपने के बजाय उसी जगह पर रहना होगा, जहाँ से आतंकवादी उन्हें देख सकते थे। उन्होंने बार-बार हिंदी और मराठी में अनाउंसमेंट करना शुरू किया। लोगों से कहा कि वे मुख्य कॉनकोर्स की तरफ न जाएं। पीछे के रास्तों से स्टेशन से बाहर निकलें और गोलियों की दिशा से दूर रहें। उनकी आवाज़ सुनकर सैकड़ों लोगों ने अपना रास्ता बदल लिया।

वे स्टेशन से बाहर निकल गए—उस जगह जाने के बजाय जहाँ गोलियां चल रही थीं।
आतंकवादियों को समझ आ गया कि ये अनाउंसमेंट कहाँ से हो रही हैं। वे उनके केबिन के ठीक नीचे तक पहुंच गए।
एक आतंकवादी ने ऊपर की तरफ गोली चलाई।

विष्णु झेंडे नीचे झुक गए, इंतजार किया और जैसे ही मौका मिला, फिर माइक्रोफोन उठाकर लोगों को चेतावनी देने लगे। उनके पास न कोई हथियार था, न कोई सुरक्षा कवच। उनके पास था तो बस एक माइक्रोफोन और यह समझ कि खतरा कहाँ है। वह कोई कमांडो नहीं थे। वह कोई पुलिस अधिकारी नहीं थे।

वह रेलवे के एक सामान्य अनाउंसर थे, जो उस रात अपनी ड्यूटी कर रहे थे। लेकिन जब आतंकवादी लोगों की जान लेने आए, तो उन्होंने अपने पास मौजूद एकमात्र हथियार—अपनी आवाज़—का इस्तेमाल किया।

26/11 में बंदूकें चलाने वाले आतंकवादियों के नाम इतिहास में दर्ज हैं। लेकिन उसी स्टेशन पर सैकड़ों लोगों को गोलियों के रास्ते से दूर करने वाली वह आवाज भी याद रखी जानी चाहिए। वह आवाज़ थी—विष्णु दत्ताराम झेंडे की।

विकट परिस्थितियां ही मनुष्य को स्वर्णिम अवसर देती है भीड़ से अलग होने के लिए, इतिहास में स्थान बनाने के लिए और सबसे बढ़कर जीवन की सार्थकता के लिए।

https://www.facebook.com/share/p/1DuKKcV3tT/
Vikram Verma