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Sunday, 29 March 2026

पुराण के कारण अगर हिन्दू समाज में फूट हैं, तब फिर पुराणो को न मानने वाले आर्यसमाजियों में तो बड़ी एकता होनी चाहिए, किन्तु क्या ऐसा हैं ?

पुराण के कारण अगर हिन्दू समाज में फूट है , तब फिर पुराणो को न मानने वाले आर्यसमाजियों में तो बड़ी एकता होनी चाहिए, किन्तु क्या ऐसा हैं? एक किताब (सत्यार्थ प्रकाश), एक रसूल (स्वामी दयानन्द) और एक खुदा (कल्पित निराकार ) को मानने वाला आर्यसमाज भारत का ऐसा संगठन है जिसमें सर्वाधिक विवाद आपस में ही होते रहते हैं। अनेक सभाए बनी है आपस में झगड़ती रहती हैं। बल्कि एक खुदा , एक रसूल और एक किताब वाले होकर भी आर्यसमाजियों में अधिकांश धार्मिक सिद्धांतो को लेकर भी मतभेद व झगड़े होते रहते है व बड़े बड़े झगड़े इनमें हुए हैं संगठन दो दो हिस्सो में बंट गया है, एक दूसरे के विरुद्ध लेख तो क्या किताबे तक लिखी गई है...यह एकता तो न हुई..तब क्यो न आर्यसमाजी अपनी सत्यार्थ प्रकाश का बहिष्कार करके एकता स्थापित करने का प्रयास करके एक बार देखे?

इस पर तैयार न हो और अगर स्पष्ट विरोधाभास के उदाहरण देखने है तो हम वह सत्यार्थ प्रकाश सहित स्वामी दयानन्द के ही ग्रंथो से दिखाएंगे, किसी एक दो को नहीं लगभग सभी सिद्धांतो को लेकर, तब क्या इसी ईमानदारी के साथ आर्यसमाजी सत्यार्थ प्रकाश और स्वामी दयानन्द का बहिष्कार करने को तैयार होंगे? 

हिन्दू समाज की राजनीतिक पराजयों का कारण केंद्रीय राजनैतिक व सैन्य शक्ति का अभाव, आंतरिक कलहे आदि रहे , न कि कोई धार्मिक ग्रंथ ... ऐसी मूर्खतापूर्ण बात वही व्यक्ति कह सकता हैं जिसका राजनीति और इतिहास का ज्ञान शून्य हो अथवा अपने पंथ के कारण मूर्खता या धूर्तता की उच्चतम स्थिति को प्राप्त कर चुका हो। पुराण तो एकात्मकता में विविधता के पोषक है, और यह हिन्दू समाज की कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति हैं...

इनका तर्क है पुराण में एक देवता की प्रशंसा और दूसरे की निंदा है, जबकि दूसरे पुराण में इसके विपरीत है।यह विरोधाभास है?

आर्यसमाजी या तो शास्त्रों की शैली को नहीं समझते, अथवा समझते हुए भी हिन्दू जनता की दृष्टि में अपने ही धर्मग्रंथों के प्रति घृणा उत्पन्न कराकर उन्हें अपने दयानन्दी पंथ में लाने के लिए ठगविद्या का सहारा लेते हैं।

किसी इष्ट वस्तु की ओर प्रवृत्ति कराने और अन्य से निवृत्ति कराने के लिए अर्थवाद का आश्रय लिया जाता है। यह अर्थवाद केवल पुराणों में ही नहीं, वेद की संहिता तथा ब्राह्मण भागों में भी विद्यमान है।पुराण वेदों का ही अनुसरण करते हैं। एक देवता को अन्य देवताओं से बड़ा बताना यह अर्थवाद वेदों में भी है , तब पुराण में भला क्यो न होगा?

अर्थवाद के तीन भेद होते हैं - प्रथम गुणवाद, द्वितीय अनुवाद, तृतीय भूतार्थवाद।

गुणवाद में अपनी इष्ट वस्तु की अत्यधिक प्रशंसा तथा उस जैसी दूसरी वस्तु की निंदा की जाती है, किन्तु वहाँ दूसरी वस्तु के लिए वास्तव में निंदा इष्ट नहीं होती, बल्कि अपनी इष्ट वस्तु की प्रशंसा में वह निंदा पर्यवसित हो जाती है। अनुवाद में अनेक बार भिन्न-भिन्न युक्तियों एवं प्रकारों से अपनी इष्ट वस्तु की प्रशंसा व महिमा कही जाती है। भूतार्थवाद में किसी कल्पित अथवा परम्पराप्राप्त आख्यान के द्वारा अपनी इष्ट वस्तु की प्रशंसा तथा उससे भिन्न की निंदा की जाती है। यह प्राचीन वैदिक शैली है।

जो विद्वान् तथा सारग्राही होते हैं, वे केवल तात्पर्य देखते हैं, किन्तु जो भगवान् की भक्ति एवं उनकी कृपा से रहित अविद्वान् होते हैं, वे उन शब्दों के अर्थ की उलझन में पड़कर रह जाते हैं। यदि कहीं अर्थवाद से किसी की निंदा हो तो वे उसे सच में की गई निंदा समझने की मूर्खता कर बैठते हैं, जबकि वहाँ अर्थवाद का आश्रय लेने का कारण इष्ट में प्रवृत्ति कराना है - इसे वे समझ नहीं पाते।

मीमांसादर्शन के शाबरभाष्य में इसे स्पष्ट किया गया है - “न हि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते, किन्तु विधेयं स्तोतुम्” (१.४.२६)। अर्थात् शास्त्रों में निंदा अपने से निंदित किए हुए की निंदा के लिए नहीं, बल्कि अपनी वस्तु की प्रशंसा-स्तुति आदि के लिए होती है। देखिए, इतना स्पष्ट कहा गया है। साथ ही इस सूत्र के भाष्य में अर्थवाद के उदाहरण भी दिए गए हैं।

जैसे -“अपशवो वा अन्ये गोअश्वेभ्यः, पशवो गोअश्वाः”—अर्थात् कहा जाता है कि गाय व घोड़े के अलावा अन्य सब अपशु हैं। क्या इसका शब्दार्थ मात्र लिया जाएगा? तब अन्य पशुओं की उत्पत्ति व्यर्थ हो जाएगी? अथवा क्या उन्हें आर्यसमाजी कहा जाएगा? अथवा वे न पशु रहेंगे न आर्यसमाजी, तब क्या उन्हें मार डालने का आदेश इससे समझा जाएगा? हल्की नजर वाले आर्यसमाजी कुछ ऐसे ही भाव पुराणों से ग्रहण करते हैं, जबकि यहाँ स्पष्ट है कि गाय और घोड़े की विशिष्टता ही इष्ट है। इसी प्रकार कहा जाता है कि “जो घी से रहित है, वह भोजन ही नहीं”।

जैसे ये अर्थवाद के सरल उदाहरण हैं, वैसे ही पुराणों में एक-दूसरे देवताओं की निंदा अर्थवाद ही है।

मीमांसादर्शन में जर्तिल और गवीधूक से हवन की निंदा तथा अजाक्षीर (बकरी के दूध) की प्रशंसा की गई है। यह भी अर्थवाद का ही उदाहरण है, जो अन्य शाखाओं वालों के लिए है।

इसी प्रकार देवीभागवत में शक्ति को सबसे बड़ा बताना स्वाभाविक है, शिवपुराण में शिवजी को तथा विष्णुपुराण में श्रीविष्णु को सर्वोच्च बताना स्वाभाविक है । तब अपने इष्ट में निष्ठा बढ़ाने व स्थिर करने के लिए अर्थवाद का आश्रय लिया जाता है।

देवीभागवत में कहा गया - “धूर्तैः पुराणचतुरैः” यहाँ अन्य पुराणों की निंदा नहीं है, यह भी स्पष्ट अर्थवाद है। “विरोधे गुणवादः स्यात्” अर्थवाद की शास्त्रीय परिभाषा से देवी एवं देवीपुराण की ही महिमा यहाँ अपेक्षित है। क्योंकि यदि यहाँ पुराण की निंदा होती तो देवीभागवत भी तो एक पुराण ही है, वह भी धूर्तों द्वारा बनाया सिद्ध होता। अतः यहाँ “पुराणचतुरैः” शब्द का अर्थ “पुराण बनाने वाले” नहीं, बल्कि “पुराने चतुर लोग” है। सम्भवतः इसी श्लोक को पढ़कर अविद्वान् स्वामी दयानन्द भ्रमित हो गए थे तथा देवीभागवत को वैदिक एवं व्यासकृत मानने लगे थे तथा अन्य पुराणों की निंदा करने लगे थे। (स्वामी दयानन्द अधेड़ आयु के थे उस समय देवी भागवत को शुद्ध, वैदिक व महर्षि व्यास कृत बताकर इसकी महिमा गाया करते थे)

हमारे ऋषि समझते थे कि जो जिसका इष्ट है, वह उसी की उपासना करे, क्योंकि किसी अन्य की उपासना में लगेगा तो “इतो भ्रष्टस्ततो नष्टः” न्याय का उदाहरण बनेगा। अब इस अर्थवाद के उदाहरण वेदो में देखे - 

सामवेद के पवमानपर्व में सोम को सबसे बड़ा कहा गया है—“सोमः पवते जनिता मतीनां जनिता दिवः” (५.६.५)। यहाँ सोम को सब देवताओं का उत्पादक कहा है।

अथर्ववेद में ब्रह्मचारी को ही सबका उत्पादक कहा गया है—“ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्म अपो लोकम्” 

यजुर्वेद में रुद्र की अतिशयित स्तुति है, उन्हें सर्वोच्च कहा गया है। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में आदिशक्ति वाक् को सर्वोच्च कहा गया हैं।

ऋग्वेद में - “न ते विष्णो जायमानो न जातो देव...” - यहाँ विष्णु देवता की अतिशय स्तुति है। फिर अथर्ववेद ४.१६ में वरुण को सर्वशक्तिमान कहा गया है।

सामवेद में “न त्वावान् अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते” - में इन्द्र को सबसे बड़ा देव बताया गया है।

“कालो ह सर्वस्येश्वरः” (अथर्ववेद) - यहाँ काल को ही सबसे बड़ा तथा सबका ईश्वर कहा गया है।

ऋग्वेद में - “न वा ओजीयो रुद्र त्वदस्ति” - में रुद्र को ही सब देवों से बड़ा व बलवान् बताया गया है।

इस प्रकार के अनेक उदाहरण वेदों से प्राप्त होते हैं। कहीं ऋग्वेद में मन्यु देवता को बड़ा बताया है, तो कहीं प्राण की महिमा गाते हुए कहा गया कि प्राण से ही सब प्रतिष्ठित है।

क्या इसे विरोधाभास माना जाएगा? क्या यह कहा जाएगा कि वेद के इन भिन्न-भिन्न प्रकरणों को बनाने वाले भिन्न-भिन्न मनुष्य हैं? क्या कहा जाएगा कि इनमें एक-दूसरे की वास्तविक निंदा की गई है? क्या आर्यसमाजी वेदों का भी बहिष्कार करके हिन्दू एकता स्थापित करना चाहेंगे? जो इसका उत्तर है, वही उत्तर पुराणों के लिए है।

किसी एक को जब सबसे बड़ा बताया जाता है, तब दूसरे को स्वतः ही छोटा बनाकर निंदित कर दिया जाता है। वेदों में यह निंदा अप्रकट है, क्योंकि वे उच्च अधिकारियों के लिए हैं। पुराणों में यह शैली अधिक स्पष्टता से वर्णित है, क्योंकि वे मध्यम अधिकारियों के लिए हैं। शेष लौकिक काव्य साहित्य साधारण अधिकारियों के लिए है, उसमें रस द्वारा वह बात व्यक्त की जाती है।

अतः एक देव की अतिशयित प्रशंसा एवं दूसरे की निंदा अपने इष्टदेव में निष्ठा की स्थापना के लिए होती है, न कि उसका उद्देश्य वास्तविक निंदा होता है।

जैसे वेदों की भिन्न-भिन्न संहिताओं में एक जैसे मंत्रों में कुछ पाठभेद मिलते हैं और उनके ब्राह्मण अपने पाठ को ठीक तथा दूसरे पाठ को मानुष बताते हैं, वहाँ भी इसी एकनिष्ठता का तात्पर्य होता है। क्रमशः
✍️शचींद्र शर्मा 

Saturday, 28 March 2026

राम क्यों "राम" हुए ?

                  राम क्यों "राम" हुए ? 
    कर्म की महिमा और आदर्श पुरुष का चरित्र

शिव तो आदिदेव हैं, उनकी पूजा समझ आती है।

कृष्ण ने अनगिनत चमत्कार दिखाए, गीताज्ञान दिया, उनकी आराधना ठीक लगती है। 

पर राम, दशरथनन्दन श्रीराम में ऐसा क्या है कि राम का नाम ही ईश्वर का पर्याय बन गया, कि लोग वेदों में वर्णित देवताओं को भूल राम-राम करने लगे। उन्होंने तो बाकी देवताओं की तरह कभी चमत्कार नहीं दिखाया, न हलाहल विषपान किया, न मुख से ज्ञान का प्रसाद वितरित किया। फिर, फिर उन्होंने ऐसा क्या किया जो राम 'राम' हुए। 

उत्तर है उनके कर्म!

उच्च वर्ग में, बल्कि सत्ता, धन, अधिकार के सर्वोत्तम शिखर के घर जन्में उस महामानव ने किसी भी मानव के गुणों का सर्वोत्तम सोपान छू लिया था। 

सोचिए कि एक राजा का बेटा, जिसके एक आदेश पर सेनाएँ सज्ज हो जाती हों, जिसके कहने पर अनगिनत वीर मरने-मारने, प्राण त्यागने को उद्यत हो जाते हों, वह एक मामूली अंगरक्षक के रूप में, एक सुरक्षाकर्मी के रूप में अपनी ही प्रजा के एक वैज्ञानिक श्री विश्वामित्र की रक्षा हेतु चल पड़ता है। 

जिसने धर्म का पाठ पढ़ा हो, जिसका धर्म ही हो कि गौ, स्त्री और ब्राह्मण की रक्षा करनी है, वह बिना संकोच के देखते ही ताटका नामक स्त्री का वध कर देता है। वह अपराधी को देख हिचक नहीं जाता कि यह तो स्त्री है, और स्त्री का वध नहीं किया जाना चाहिए। उसका न्याय लिंगभेद नहीं करता।

वह सद्पुरुषों का रक्षण करता है, खलपुरुषों का वध करता है और तिसपर भी उसकी मुस्कान बनी रहती है। किसी के सम्मुख सिर झुकाते समय उसे संकोच नहीं होता, और किसी का सिर उतारने पर वह अहंकार से ग्रसित नहीं होता। वह चलता है तो धरती डोलती नहीं, बल्कि खिल उठती है। वह परमवीर है, पर उसे देख पुरजनों को भय नहीं अभय की प्राप्ति होती है। दुर्दमनीय धनुष को तोड़कर भी वह विनीत बना रहता है, क्रोधित दुर्दम्य परशुराम के सम्मुख भी वह विचलित नहीं होता। 

जितना सहज होकर वह पिता की आज्ञा से सिंहासन स्वीकारता है, उतनी ही सहजता से त्याग भी देता है। पिता की आज्ञा, माता की इच्छा और भाई के कल्याण के लिए वह अपना परंपरागत अधिकार छोड़ वक्कल वस्त्र पहन वनों में चला जाता है। 

राजमहलों का निवासी जंगलों में, वनवासियों के साथ घुलमिल कर रह रहा है। उनके जैसे वस्त्र, उनके जैसा भोजन, उनके जैसा श्रम। 

प्रियतमा के अपहरण पर उसका रूदन। उस युग में जब राजपुरुषों के लिए बहुविवाह मान्य था, स्वयं उसके पिता की कई स्त्रियाँ थी, वह एक स्त्री के लिए पेड़ों से लिपट कर रो रहा है। नदी और पर्वतों से पागलों की भाँति पूछ रहा है। सामान्य मनुष्य की भाँति, जब दुख अत्यधिक हो तो क्रोध बन जाता है, वह सब तहस-नहस करने पर उतारू हो जाता है, पर अंततः स्वयं को नियंत्रित कर लेता है और अपनी स्त्री को खोजने के लिए धरती-पाताल एक कर देता है। 

संसाधनहीन वनवासी शून्य से सेना का निर्माण करता है। अधर्मी को दण्डित करना ही धर्म है, अतः अधर्मी का छुपकर वध करते समय परंपरागत धर्म उसका बाधक नहीं बनता हैं।
संसार में जो पहले कभी न हुआ था, वह कर दिखाता है। समुद्र को बाँध लेता है। वह विनय की प्रतिमूर्ति है जो हाथ जोड़कर विनती करता है, परन्तु अवहेलना पर वही हाथ शस्त्र उठाकर दण्ड देने की क्षमता भी रखते हैं। वह सहिष्णु है, पर उसकी सहिष्णुता दुर्बलता के कारण नहीं है। वह जानता है कि वही विजयी होगा, फिर भी वह हाथ जोड़ना जानता है। 

सामने शत्रु है, ऐसा शत्रु जिससे संसार भय खाता है। जिसने देवताओं तक पर विजय प्राप्त की हुई है, वह उससे भिड़ जाता है। हिंसा अंतिम उपाय है, यह संदेश अवश्य देता है, पर जब प्रतिपक्ष को अहिंसा स्वीकार नहीं तो परम हिंसक होने में क्षण नहीं लगाता। 

वह, जो अपने राज्य से निर्वासित है, अपने राज्य से भी अधिक सम्पन्न राज्य जीतकर भी उसे तृण की भाँति त्याग देता है और उस स्त्री को, जो उसके शत्रु के घर वर्ष भर कैदी रही हो, गले लगा लेता है। 

जिसका चरित्र इतना पावन है कि उसके महाबलशाली भाई उसके अनुचर बने रहते हैं। वे भाई, जो अपने बड़े भाई के लिए कोई भी त्याग करने को प्रस्तुत हैं, जो बड़े भाई के हित के लिए माता-पिता, गुरु और स्वयं बड़े भाई की आज्ञा मानने से भी इंकार कर देते हैं। 

जिसका मन इतना निर्मल है कि हर वर्ग उसका अपना है। जिसका चरित्र इतना उज्ज्वल है कि तपस्यारत ऋषि भी उसके दर्शन को सौभाग्य मानते हैं। जिसका प्रेम इतना पावन है कि वनवासिनी बुढ़िया अपना मान उसे अपना जूठा खिला लेती है। जिसका क्रोध इतना भीषण है कि समुद्र भी थर-थर कांपता है। 

जो वन में वनवासी होकर भी राजा की भाँति रक्षण करता है, जो सिंहासन पर बैठकर भी वनवासियों की भाँति प्रकृति से जुड़ा रहता है, जो मानव होकर भी मानवेतर सामर्थ्य रखता है, मानवीय गुणों की पराकाष्ठा को सतत प्राप्त है, जो सच्चिदानन्द है, ऐसा महामानव है, ऐसा आदिपुरुष है कि आदिदेव महादेव भी उसके भक्त बन जाते हैं, ऐसे धृतिमान् महाबाहु को साक्षात ईश्वर न मानें तो क्या मानें ? 

               श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये।

           साभार भगवतगीता समूह

जब परिवार टूटते हैं, तभी बाजार फलते फूलते हैं— ये सिर्फ विचार नहीं, पूरी रणनीति है .... एक खतरनाक षड्यंत्र

 क्या आपको पता है कि हम भारतीय एक खतरनाक साजिश का शिकार हो चुके हैं⁉️ और वह साजिश है हमारे संयुक्त परिवारों को तोड़कर उन्हें उपभोक्ता बनाने की..???

 जब परिवार टूटते हैं, तभी बाजार फलते फूलते हैं— ये सिर्फ विचार नहीं, पूरी रणनीति है ....

भारत की सबसे मजबूत चीज क्या थी..???
भारत पर मुगल आए, अंग्रेज़ आए, और कई हमलावर आए लेकिन एक चीज कभी नहीं टूटी, वो थी एकता....??

  3 पीढ़ियाँ एक छत के नीचे रहती थी बुज़ुर्गों का अनुभव बच्चों में संस्कार खर्च में सामूहिकता और त्यौहारों में गर्माहट हुआ करती थी...

यह हमारी असली “Social Security” थी। कोई पेंशन की ज़रूरत नहीं थी, कोई अकेलापन नहीं, कोई Mental Health Crisis नहीं।

पश्चिमी देशों को यह चीज खटकने लगी और उन्होंने परिवारों को तोड़ने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया..???

क्योंकि पश्चिमी देश हमेशा से ही उपनिवेशवादी रहे हैं — उनके लिए बाज़ार सबसे बड़ा धर्म है??

लेकिन भारत जैसा देश, जहाँ लोग साझा करते हैं, कम खर्च करते हैं, और सामूहिक सोच रखते हैं — वहां वे अपने उत्पाद बेच ही नहीं पा रहे थे।

इसलिए एक शातिर रणनीति बनाई गई...???

इनके परिवार ही तोड़ दो, हर कोई अकेला हो जाएगा,और हर कोई ग्राहक बन जाएगा।

कैसे हुआ ये हमला..???

1.मीडिया का सहारा लेकर संयुक्त परिवारों को तोड़ने की शुरुआत...
संयुक्त परिवार को “झगड़ों का अड्डा”, “बोझ” और “रुकावट” के रूप में दिखाया गया।
न्यूक्लियर परिवार को “फ्रीडम”, “मॉर्डन”, “Self-made” बताकर  ग्लैमराइज किया गया।
याद कीजिए: टीवी पर आज भी कितने ही शो हैं जहां पूरे दिन बहू-सास की लड़ाई, नन्द भाभी की लड़ाई, देवरानी जिठानी की लड़ाई पूरे दिन दिखाई जाती है, और हमारे/आपके परिवार की घरेलू औरतें पूरे दिन यही धारावाहिकों को देखती है और इनका निष्कर्ष/सॉल्यूशन निकलता है – “अलग हो जाओ!”
 2. उपभोक्तावाद के ज़रिए...
जब हर जोड़ा अलग रहने लगा...
पश्चिमी देशों अपनी चाल में कामयाब हुए और हमारे परिवार विखर का उनका बाजार बन गए 
पहले 1 परिवार में चार भाई रहते थे, अब एक परिवार सिर्फ चार लोग (पति-पत्नी, और 2 बच्चे)
 पहले 4 भाईयों के बीच 1 टीवी, अब 4 भाईयों के बीच 4 टीवी
 पहले 4 भाईयों के बीच 1 रसोई, अब 4 भाईयों के बीच 4 किचन सेट
 पहले 4 भाईयों के बीच 1 कार और 1 मोटरसाइकिल, अब 4 भाईयों के बीच 4 कार, 4स्कूटी और 4 मोटरसाइकिल।
बाजार में बूम आ गया – और समाज में टूटन।
भारत में क्या हुआ इस “सोचलेवा हमले” के बाद?

 सामाजिक पतन...???
 बुज़ुर्ग अब बोझ हैं
 बच्चे अकेले हैं (और स्क्रीन में गुम)
 रिश्तेदार “उपलब्ध नहीं” हैं
 संस्कारों की जगह “Influencers” ने ले ली
मानसिक स्वास्थ्य संकट...???
 पहले जो बात नानी-दादी से होती थी, अब काउंसलर से होती है...
 अकेलापन अब इलाज़ मांगता है, पहले प्यार से दूर होता था
 बाजार का फायदे...????
 हर समस्या का एक उत्पाद
 हर भावना का एक ऐप
 हर उत्सव का एक“ *ऑनलाइन ऑर्डर”
“संस्कार की जगह सब्सक्रिप्शन ने ले ली है”
आज का सवाल — हम क्या बनते जा रहे हैं?
हमने “आधुनिकता” की दौड़ में...???
 संयुक्तता को “Old culture” कहा...
 माता-पिता को “Obstacles” कहा...
 परिवार को “फालतू भावना” कहा...
 रिश्तों को “Unfollow” कर दिया...
लेकिन क्या आपने सोचा..???
Amazon का फायदा तभी है जब आप Diwali पर अकेले हों — और Shopping करें, परिवार के साथ न बैठें।
Zomato तभी कमाता है जब कोई माँ का खाना नहीं खा रहा।
Netflix तभी देखेगा जब कोई दादी की कहानी नहीं सुन रहा।
समाधान: हम अभी भी वापसी कर सकते हैं???
 संयुक्त परिवार को पुनः “संपत्ति” मानें, बोझ नहीं।
 बच्चों को उपभोक्ता नहीं, संस्कारी इंसान बनाएं।
 बुज़ुर्गों को घर से बाहर न करें — उनके अनुभव हर Google Search से ऊपर हैं।
त्यौहार मनाएं, सामान नहीं।
अकेलापन कम करने के लिए App नहीं, अपनापन बढ़ाइए।
निष्कर्ष :--
“पश्चिम ने व्यापार के लिए परिवार तोड़े,और हम ‘आधुनिक’ बनने के लिए अपना वजूद बेच आए।”
अब समय है रुकने का, सोचने का, और अपने संस्कारों को फिर से अपनाने का — नहीं तो अगली पीढ़ी को ‘संयुक्त परिवार’ शब्द का अर्थ बताने के लिए भी शायद Google की जरूरत पड़ेगी l
क्या आपको नहीं लगता कि हम  ज़िन्दगी की सुख सुविधाओं के लिए अपने परिवारिक माहौल के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं हम अपनी असल जिंदगी खोते जा रहे हैं,हम स्वार्थी हो रहे हैं एक बार अपना 30 बर्ष पुराना जीवन याद करके देख लो, जहां सिर्फ भाईचारा था इमोशन था कोई सोसाइड नहीं करता था, सहयोग की भावना थी, संस्कार ऐसे कि गांव के हर आदमी को पिता जितना सम्मान दिया जाता था किन्तु आज तो पिता ही "यार पापा" हो गए , और आज यही संस्कार हमारी आधुनिकता को दर्शाती है और हमें घिन आती है ऐसी आधुनिकता पर, कृपया एक बार विचार अवश्य करें।

Friday, 27 March 2026

🔥 महा-नृसिंह उलट बाण प्रयोग "🔥

🔥 महा-नृसिंह उलट बाण प्रयोग "🔥
महा-नृसिंह उलट बाणः 
शत्रु, जादू-टोना, कीलन, भूत-प्रेत और ३३ कोटि देवी-देवता के बंधनों को क्षण भर में छिन्न-भिन्न करने वाली परम शक्तिक्षशत्रुओं के तंत्र को भस्म करने वाला अचूक अस्त्र ... पूरे विधि-विधान सहित ध्यान से पढ़ो

 जब शत्रु अदृश्य हो… तब प्रहार भी अदृश्य होना चाहिए।

समय: मंगलवार / शनिवार / अमावस्या रात्रि
दिशा: दक्षिणमुख
आसन: लाल आसन
दीपक: चमेली तेल
भोग: गुड़ + चना
जप: 5 माला (रुद्राक्ष/मूंगा) एक बार सिद्धि 


ॐ नमो आदेश गुरु को। सिंह चढ़े नरसिंह आवें, कड़क कड़क ब्रह्मांड हिलावें। उलटत काया, पलटत बाण, जाको भेजा वाही के प्राण। खैच-खैच अरि-दल को मार, जा उलट जा रे दुष्ट की धार। लोहे की लाठ, वज्र की कील, उलट जा टोना, पलट जा मील। जहं से आया वहीं को जाय, उलट-पलट बैरी को खाय। नृसिंह की दढ़, काल का ग्रास, कर दे बैरी का सत्यानाश। दुहाई नृसिंह देव की, दुहाई प्रहलाद की, शब्द साँचा, पिण्ड काँचा, फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा।



 तत्काल प्रयोग (Instant Use)
1. नींबू उतारा (शत्रु पलट वार)
नींबू पर “क्रूं” या शत्रु नाम लिखें
21 बार मंत्र जप
7 बार सिर से पैर तक उतारें
काटकर बाहर फेंक दें
2. सरसों-नमक प्रहार (तंत्र भस्म)
काली सरसों + नमक हाथ में लें
11 बार मंत्र जप
घर के बाहर फेंक दें

 परिणाम 
तंत्र, टोना, बंधन तुरंत कटता है
शत्रु की शक्ति उसी पर पलटती है
घर-परिवार पर नृसिंह कवच सक्रिय होता है
नियम: केवल आत्म-रक्षा हेतु प्रयोग करें
 जो नहीं टूटता साधारण उपायों से…
वो टूटता है महाकाली तंत्र की शक्ति से।

अमिताचार्य Supreme Guru of Mahakali Tantra