Pages

Thursday, 30 April 2026

सभी देवी-देवताओं के गायत्री मंत्र।

सभी देवी-देवताओं के गायत्री मंत्र। 

ॐ भूर्भुव स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
शिव गायत्री,,ॐ महादेवाय विद्महे, रुद्रमुर्तय धीमहि तन्नो शिव: प्रचोदयात
रूद्र गायत्री मन्त्र ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि, तन्नो रूद्र: प्रचोदयात!
ॐ पञ्चवक्त्राय विद्महे, सहस्राक्षाय महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात्
दत्तात्रय गायत्री,,,दत्तात्रेय हरे कृष्ण उन्मत्तानन्ददायक दिगंबर मुने बाल पिशाच ज्ञानसागर ॐ गुरु दत्त नमो नम:
ॐ दत्‍तात्रेयाय विद्महे अवधूताय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌
ॐ दत्‍तात्रेयाय विद्महे योगीश्वराय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌
ॐ दिगम्बराय विद्महे योगीश्वराय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌
ॐ दत्‍तात्रेयाय विद्महे दिगम्बराय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌
ॐ दत्‍तात्रेयाय विद्महे अत्रीपुत्राय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌
गणेश गायत्री...ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्र तुन्डाय धीमहि, तन्नो दन्ति प्रचोदयात!
षन्मुख गायत्री,,ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महासेनाय धीमहि, तन्नो षन्मुख: प्रचोदयात!
नन्दी गायत्री,,ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्र तुन्डाय धीमहि, तन्नो नन्दी: प्रचोदयात!

सूर्य गायत्री,,ॐ अदित्याय विद्महे भास्कराए धीमहि तन्नो भानु: प्रचोदयात

ॐ आदित्याय च विद्महे प्रभाकराय धीमहि, तन्नो सूर्य: प्रचोदयात

ॐ आदित्याय विद्महॆ दिवाकराय धीमही तन्नॊ सूर्यः प्रचॊदयात्

ॐ भास्कराय विद्महे महातेजाय धीमहि !तन्नो सूर्य: प्रचोदयात !

ॐ अश्वध्वजाय विद्महे पासहस्थाया धीमहि तन्नो सूर्य: प्रचोदयात !

चन्द्र गायत्री,,ॐ अमृतंग अन्गाये विद्ममहे कलारुपाय धीमहि,तन्नो सोम प्रचोदयात

ॐ अत्रि पुत्राय विद्महे सागरोद्भवाय धीमहि तन्नो चन्द्रः प्रचोदयात्

ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृत तत्वाय धीमहि, तन्नो चन्द्र: प्रचोदयात!

मंगल (भौम) गायत्री,,,ॐ अंगारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि, तन्नो भौम: प्रचोदयात

ॐ क्षिति पुत्राय विद्महे लोहितान्गाय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात्

बुध गायत्री,,ॐ सौम्यरुपाय विद्महे वानेशाय च धीमहि, तन्नो सौम्य प्रचोदयात

ॐ चन्द्र पुत्राय विद्महे रोहिनि प्रियाय धीमहि तन्नो बुधः प्रचोदयात्

गुरु गायत्र,,ॐ अन्गिर्साय विद्महे दिव्यदेहाय धीमहि, तन्नो जीव: प्रचोदयात

ॐ अंगिरोजाताय विद्महे वाचस्पतये धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात्

ॐ गुरु देवाय विद्महे परब्रह्माय धीमहि, तन्नो गुरु: प्रचोदयात!

शुक्र गायत्री,,ॐ भृगुजाय विद्महे दिव्यदेहाय, धीमहि तन्नो शुक्र: प्रचोदयात

ॐ भृगुपुत्राय विद्महे श्वेतवाहनाय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात्

शनि गायत्री,,ॐ भग्भवाय विद्महे मृत्युरुपाय धीमहि, तन्नो सौरी:प्रचोदयात

ॐ कृष्णांगाय विद्महॆ रविपुत्राय धीमही तन्नॊ सौरिः प्रचॊदयात्

राहू गायत्र,,,ॐ शिरोरुपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि, तन्नो राहू:प्रचोदयात

ॐ नील वर्णाय विद्महे सौंहिकेयाय धीमहि तन्नॊ राहुः प्रचोदयात्

केतु गायत्री,,,ॐ पद्मपुत्राय विद्महे अम्रितेसाय धीमहि तन्नो केतु: प्रचोदयात

ॐ धूम्र वर्णाय विद्महे कपोत वाहनाय धीमहि, तन्नो केतुः प्रचोदयात्

ब्रम्हा गायत्र,,,ॐ वेदात्मने च विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि, तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात!

नारायण गायत्री,,,ॐ नारायाणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।

विष्णु गायत्री ,,ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णु: प्रचोदयात !

ॐ नारायण: विद्महे वासुदेवाय धीमहि, तन्नो नारायण: प्रचोदयात !

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो नारायण प्रचोदयात् ।

श्री निवास गायत्री,,ॐ निरन्जनाय विद्महे निरापासाय धीमहि तन्नो श्रीनिवास प्रचोदयात् ।

कृष्ण गायत्री,,,ॐ देवकिनन्दनाय विद्ममहे, वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्ण:प्रचोदयात

ॐ दामोदराय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नः कृष्णः प्रचोदयात्। गोपाल गायत्री

ॐ गोपालाय विद्महे गोपीजन वल्लभाय धीमहि, तन्नो गोपाल: प्रचोदयात

परशुराम गायत्री,,,ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नो परशुराम प्रचोदयात नृसिंह गायत्री

ॐ उग्रनृसिंहाय (नरसिंहाय) विद्महे वज्रनखाय धीमहि, तन्नो नृसिंह: (नरसिंह) प्रचोदयात

ॐ वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि। तन्नो नृसिंहः (नरसिंह) प्रचोदयात

ॐ नरहसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात

ॐ नरहसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि। तन्नो सिंह प्रचोदयात हयग्रीव गायत्री

ॐ वाणीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हयग्रीव :प्रचोदयात

राम गायत्री,,,ॐ दाशरथये विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि, तन्नो राम: प्रचोदयात!

त्रैलोक्य गायत्रीॐ त्रैलोक्य मोहनाय विद्महे आत्मारामाय धीमहि, तन्नो विष्णु: प्रचोदयात!

हंसा गायत्री,,,ॐ परम्ह्न्साय विद्महे महा हंसाय धीमहि तन्नो हंस: प्रचोदयात

ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि। तन्नो हंसः प्रचोदयात्।

सुदर्शन गायत्री,,ॐ सुदर्शनाय विद्महे हेतिराजाय धीमहि। तन्नश्चक्रः प्रचोदयात्।

वराह गायत्री,,ॐ धनुर्धराय विद्महे वक्रदंष्ट्राय धीमहि तन्नो वराह प्रचोदयात्।

ॐ भू: रक्षकाय विद्महे श्रीकराय धीमहि तन्नो वराह प्रचोदयात्

ॐ भू-वराहाय विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो क्रोध प्रचोदयात्

मत्स्य गायत्री,,ॐ तत्पुरुशाय विद्महे माहा-मीनाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात ।

वेङ्कटेश गायत्री,,ॐ श्री निलायाय विद्महे वेङ्कटेशाय धीमहि तन्नो हारि: प्रचोदयात् ।

राजागोपाल गायत्री...ॐ तत्पुरुशाय विद्महे सन्तान पुत्राय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात् ।

कूर्म गायत्री,,ॐ कच्छपेसाय विद्महे माहाबलाय धीमहि तन्नो कूर्म प्रचोदयात् ।

वामन गायत्री,,ॐ तप रूपाय विद्महे श्रृष्टिकर्ताय धीमहि तन्नो वामन प्रचोदयात् ।

बलराम गायत्री..ॐ अश्त्रहस्ताय विद्महे पीताम्वराय धीमहि तन्नो बलराम प्रचोदयात् ।

कल्कि गायत्री,,ॐ भूमि नेत्राय विद्महे माहापुरुशाय धीमहि तन्नो कल्कि प्रचोदयात् ।

लक्ष्मी गायत्री,,ॐ महालाक्ष्मये विधमहे, विष्णु प्रियाय धीमहि तन्नो लक्ष्मी:प्रचोदयात

ॐ नमो भाग्य लक्ष्मी च विदमहे, अस्ट लक्ष्मी च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात

राधा गायत्री,,,ॐ वृषभानु: जायै विद्महे, कृष्णप्रियाय धीमहि तन्नो राधा :प्रचोदयात

ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि, तन्नो राधिका प्रचोदयात!

तुलसी गायत्री,,,ॐ श्री तुलस्यये विद्महे, विष्णुप्रियाय धीमहि तन्नो वृंदा:प्रचोदयात

ॐ त्रिपुराय विद्महे तुलसीपत्राय धीमहि, तन्नो तुलसी प्रचोदयात!

लक्ष्मी गायत्री,,ॐ महादेव्यै च विद्महे विष्णु पत्न्ये [यै] च धीमहि, तन्नो लक्ष्मी: प्रचोदयात! जानकी गायत्री

ॐ जनकजायै विद्महे राम प्रियायै धीमहि, तन्नो सीता प्रचोदयात!

सीता गायत्री,,ॐ जनक नंदिन्ये विद्महे भुमिजाय धीमहि तन्नो सीता :प्रचोदयात

लक्ष्मण गायत्री,,ॐ दासरथये विद्महे अलाबेलाय धीमहि, तन्नो लक्ष्मण प्रचोदयात!

हनुमान गायत्री,,ॐ अन्जनीजाय विद्महे वायु पुत्राय धीमहि, तन्नो हनुमान प्रचोदयात!

गरुड़ गायत्री,,ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्ण वरणाय धीमहि, तन्नो गरुड़: प्रचोदयात!

सरस्वती गायत्री,,ॐ वाग देव्यै विद्महे काम राज्या धीमहि तन्नो सरस्वती: प्रचोदयात|

ॐ ऐं वाग्देव्यै च विद्महे कामराजाय धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

इन्द्र गायत्री,,ॐ सहस्त्र नेत्राए विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्नो इन्द्र:प्रचोदयात

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सहत्राक्षाय धीमहि, तन्नो इंद्र: प्रचोदयात

अग्नि गायत्री,,ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्नि मध्ये धीमहि, तन्नो अग्नि प्रचोदयात!

जल गायत्री,,ॐ जलबिंबाय विद्महे नील पुरुषाय धीमहि, तन्नो अम्बु: प्रकोदयात!

आकाश गायत्री,,ॐ आकाशाय च विद्महे नभो देवाय धीमहि, तन्नो गगनं प्रचोदयात!

वायु गायत्,,ॐ पवन पुरुषाय विद्महे सहस्त्र मूर्त्ये च धीमहि, तन्नो वायु: प्रचोदयात!

यम् गायत्री,,ॐ सुर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नो यम् :प्रचोदयात

वरुण गायत्री,,ॐ जल बिम्बाय विद्महे नील पुरु शाय धीमहि तन्नो वरुण :प्रचोदयात

काम गायत्री,,ॐ मन्मथेशाय विद्महे काम देवाय धीमहि, तन्नो अनंग प्रचोदयात!

पृथ्वी गायत्री,,ॐ पृथ्वीदेव्यै विद्महे सहस्र मूरतयै धीमहि तन्नो पृथ्वी :प्रचोदयात

ॐ पृथ्वी देव्यै च विद्महे सहस्र मूर्त्ये च धीमहि, तन्नो मही प्रचोदयात

ॐम् तत् पुरुशाय विद्महए आम्रिथ कलस हस्ताय धेएमहि टन्नो ढन्वन्त्रि प्रसोदयात्

ॐम् आदिव्ऐध्याय विद्महए आरोग्य अनुग्रहाय धेएमहि टन्नो धन्वन्त्रि प्रसोदयात्

धन्वंतरी गायत्री मंत्र ॐ वासुदेवाय विघ्माहे वैधयाराजाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात्. ll

धन्वंतरी गायत्री मंत्र ॐ तत्पुरुषाय विद्‍महे अमृता कलसा हस्थाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात्.

1 ॐ गिरिजाये विद्महे शिवप्रियाय धीमहि तन्नो दुर्गा :प्रचोदयात

त्वरिता गायत्री मन्त्र या श्री: स्वयम स्वकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी:

पापात्मनां कृतधियां हृद्येशु बुद्धि: |

श्रृद्धा शतां कुलजन प्रभवस्य लज्जा,

ता त्वां नतास्म परिपालय देवि विश्वं ||

2 ॐ त्वरिता देव्यै च विद्महे महानित्यायै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

महिष मर्द्दिनी गायत्र मन्त्र 3 
ॐ महिषमर्द्दियै च दुर्गायै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

मातंगी गायत्री मन्त्र 4 
ॐ मातं गये मतंग्ये [यै] च उच्छिष्ट चाण्डाल्यै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

बागला मुखी गायत्री मन्त्र 5 
ॐ बागला मुख्यं च विद्महे स्तंभिन्यै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

धूमावती गायत्री मन्त्र 6 
ॐ धूमावत्यै च विद्महे संहारिन्यै च धीमहि, तन्नो धूमा प्रचोदयात !

छिन्नमस्ता गायत्री मन्त्र 7 
ॐ वैरोचन्यै च विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

भैरवी गायत्री मन्त्र 8 
ॐ त्रिपुरायै च विद्महे भैरव्यै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

भुवनेश्वरी गायत्री मन्त्र 9 
ॐ नारायन्यै च विद्महे भुवनेश्वर्यै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

त्रिपुर सुंदरी गायत्री मन्त्र 10
 ॐ त्रिपुरा दैव्यै विद्महे क्लीं कामेश्वर्यै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

तारा गायत्री मन्त्र 11 
ॐ तारायै च विद्महे महोग्रायै च धीमहि, सौस्तन्न: क्लिन्नै प्रचोदयात!

काली गायत्री मन्त्र 12 
ॐ कालिकायै च विद्महे श्मशान वासिन्यै धीमहि, तन्नो अगोरा प्रचोदयात!

अन्नपूर्णा गायत्र मन्त्र 13 
ॐ भगवत्यै च विद्महे माहेश्वर्यै च धीमहि, तन्नो अन्नपूर्णा प्रचोदयात!
गौरी गायत्री मन्त्र 14 
ॐ सुभगार्यै च विद्महे काम मालायै धीमहि, तन्नो गौरी प्रचोदयात!
देवी गायत्री मन्त्र 15 
ॐ देव्यै विद्महे महाशक्त्यै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

शक्ति गायत्री मन्त्र 16 
ॐ सर्व सम्मोहिन्यै विद्महे विश्वनन्यै धीमहि, शक्ति प्रचोदयात

शरभ तंत्र रहस्य

🌹शरभ तंत्रम रहस्य🌹
--------------------- 

भगवान श्री शरभेश्वर यह भगवान शिव का एक अत्यंत उग्र प्रचंड एवं गुप्त रुप है .. तंत्र क्षेत्र मे ये अत्यंत उच्च कोटी की देवता के रुप मे पूजे जाते है .. शत्रू बाधा निवारण हेतु , ग्रह बाधा निवारण हेतु , रोग बाधा एवं अकालमृत्यु निवारण हेतु , प्रेतबाधा तंत्र बाधा निवारण हेतु यह अत्यंत सटिक , अत्यंत उच्च कोटी की साधना मानी जाती है .. यह शिव का अत्यंत गुप्त रूप होने से बहुत कम लोग इनके बारे मे जानते है .. इनके मंदिर एवं विग्रह बहुत कम देखने को मिलते है .. आध्यात्मिक साधना क्षेत्र मे यह उच्च श्रेणी की साधना मानी जाती है .. दस महाविद्या साधना मे इनकी साधना का अपना एक महत्त्व है .. 
इनकी उत्पत्ती के बारे मे पुराणों मे बताया है की नृसिंह अवतार के समय जब भगवान नृसिंह ने हिरण्यकश्यपू का वध किया तो भगवान नृसिंह की उग्रता प्रचंड होने से वे शांत नही हो पा रहे थे तब देवताओं के प्रार्थना पर भगवान महादेव ने एक विचित्र पक्षी का रुप धारण किया जिसका मुंह उल्लु की तरह , नेत्र मे अग्नि सूर्य चंद्र और धड मनुष्य की तरह और चार हाथ जिसमे विशेष आयुध धारण किये हुये थे .. उनके नख वज्र के समान तीक्ष्ण , दो पंख जिनमे काली एवं दुर्गा का वास है तथा हृदय मे जठरानल और पेट मे वडवानल अग्नि विराजमान है .. कटिप्रदेश से बाद का अंग हिरण की तरह एवं पूंछ सिंह के समान लंबी है .. उरु प्रदेश मे उन्होंने व्याधि एवं मृत्यु को धारण किया है .. उन्हे शरभ , पक्षीराज , आकाशभैरव , शालुव आदि नामों से जाना जाता है .. 
ऐसे शरभ पक्षिराज रुपी शिव अवतार ने भगवान नृसिंह को चोंच मार उन्हे मूर्छित कर दिया .. अपनी पूंछ से उनके दोनो पैर बांध दिये और अपने दोनो पिछले पैर नृसिंह के पैरों पर रखे और अपने आगे के दो पैर भगवान नृसिंह के छाती पर रखे और अपने हाथों से नृसिंह के हाथो को पकडकर आकाश मे उडकर भगवान नृसिंह के उग्र स्वरुप से कई ज्यादा उग्र स्वरुप धारण किया जिससे भगवान नृसिंह शांत हुये और उन्होंने शरभरुपी शिव की प्रार्थना कर उनकी स्तुती की और अपने उग्र स्वरुप का विसर्जन किया तो शिवजी ने अपने शरभ स्वरुप मे भगवान नृसिंह के चर्म को प्रिय मानकर व्याघ्रांबर धारण किया .. 

भगवान श्री शरभेश्वर की साधना एक उच्च कोटी की है और साधारण साधक इस साधना को ना करे .. योग्य अधिकारी गुरु से शरभ दिक्षा और मंत्र प्राप्त कर उनके निर्देशन मे ही शरभ साधना करे .. बिना दिक्षा शरभ साधना करना घातक है क्योंकि इनकी साधना एक उग्र साधना है .. शत्रू बाधा निवारण हेतु शायद इससे बढकर साधना नही हो सकती .. शत्रू बाहर के और अपने काम क्रोध रुपी अपने अंदर के शत्रू भी .. अकालमृत्यु एवं रोग बाधा निवारण के लिये भी यह साधना काम करती है .. तंत्र प्रयोग का निवारण हेतु भी इनकी साधना सटिक फल देती है .. आत्मरक्षा हेतु इनकी साधना किसी भी बडे से बडे तंत्र प्रयोग या बाधा से आपका रक्षण करती है .. 

भगवान शरभेश्वर परम दयालु है .. वे अपने भक्तों को कष्ट देने वाले शत्रूओं का और अपनी भक्तों की समस्त बाधाओं का नाश करते है .. इनकी साधना मे "दारुण सप्तक " का पाठ एक अत्यंत सटिक फल प्रदान करनेवाली साधनाविधी है .. ऐसे अदभुत पराक्रमी श्री शरभेश्वर की उपासना बहुत विरले भक्त ही कर पाते है .. भगवान शरभ के उपासक पर बाकी देवता अपने आप कृपा करते है .. पुरे संसार मे गिने चुने साधक ही शरभ साधना कर पाते है यही एक गूढ रहस्य है .. दस महाविद्या साधना , शरभ साधना , प्रत्यंगिरा साधना , गुह्यकाली , कामकला काली , सिद्धिलक्ष्मी आदि सब साधनाएं वर्गीकृत है .. इनके आध्यात्मिक कोड खुलना सुलभ नही है .. इस लिये शायद गिने चुने लोग ही इस स्तर की साधना तक पहुंच पाते है .. 

शरभ का मंत्र बीज आकाश तत्त्व का है .. इनकी साधना से आकाशगमन प्राप्ती तथा कुंडलिनी जागरण सुलभ हो जाती है .. योग मार्ग मे इनकी साधना से गुप्त सिद्धिया प्राप्त होती है .. प्राचीन तंत्र ग्रंथ शरभ तंत्रम तथा आकाशभैरव तंत्र मे इनकी साधना का विस्तृत वर्णन है .. दतिया पीतांबरा पीठ के राष्ट्रगुरु महाराज जी ने शरभ साधना पर एक पुस्तक प्रकाशित की थी .. 

भारत वर्ष मे इनके साधक बहुत कम है और गुप्त रुप से साधनारत है .. अपने सदगुरु से प्राप्त विधी से ही इनकी साधना करे अपने मन से ना करे .. शारीरिक मानसिक शुद्धता रखे .. इस साधना की उच्च स्तर की श्रेणी को ध्यान रखकर ही इनकी साधना करे .. 

आध्यात्मिक साधना क्षेत्र मे इन्हे एक अत्यंत उच्च स्तर की साधना के रुप मे देखा जाता है .. दस महाविद्या की साधना मे शरभ साधना का अपना एक महत्त्व है .. अगर आपको आपके सदगुरु द्वारा शरभ मंत्र दिक्षा प्राप्त है तो निश्चित ही आप अत्यंत सौभाग्यशाली साधक है .. 

किसी भी अच्छे आध्यात्मिक गुरु से दिक्षित होकर उनके व्यक्तिगत मार्गदर्शन मे आध्यात्मिक क्षेत्र की दुर्लभ साधनाये संपन्न कर आध्यात्मिक उन्नती की ओर अग्रेसर होना और मनुष्य जन्म का यथार्थ रुप से कल्याण कर लेना हमारे ही हाथ मे है .. 

एक मनुष्य जन्म प्राप्त कर लेने के बाद व्यक्ती कुएं के मेंढक की तरह या तो साधारण स्तर का जीवन यापन कर अपने मानसिक स्तर पर अपने आप को गौरवान्वित महसुस कर सकता है या
 किसी योग्य आध्यात्मिक सदगुरु की शरण प्राप्त कर दस महाविद्या या शरभ प्रत्यंगिरा जैसी ब्रह्मांडीय साधना कर मनुष्य जन्म का यथार्थ रुप मे कल्याण कर सकता है ..

 मनुष्य के इतिहास मे प्राचीन आध्यात्मिक साधनाओं का अभ्यास बहुत कम देखा गया है शायद यह विराट आध्यात्मिक शक्तिया वर्गीकृत होने के कारण अपने साधक को चुनती है और उसे किसी ना किसी माध्यम से योग्य गुरु तक पहुंचा कर अपनी छाया मे लाकर उसे अपनी कृपा प्रदान करती है .. 

इस लिये आध्यात्मिक साधना क्षेत्र हमेशा से ही बहुत गूढ रहस्यपूर्ण रहा है .. 

आज शरभ साधना पर लिखते हुते यह एहसास होता कि वर्षों से आ रही साधना पद्धती के बावजूद कितने कम लोग भगवान शरभेश्वर से परिचित है ..

कितने लोग दस महाविद्याओं का नाम जानते है .. 

और भी ऐसी बहुत सारी आध्यात्मिक शक्तिया है जैसे प्रत्यंगिरा , गुह्यकाली ,कामकलाकाली , सिद्धीलक्ष्मी आदि जिन्होने अपना स्वरुप गूढ रहस्यपूर्ण ही रखा है और सामान्य लोग इनसे परिचित नही हो पाये ..  
और ऐसा क्यों इसका जवाब पता नही .. 

भारत वर्ष मे हिंदु परिवार मे जन्म लेकर भी अपनी आध्यात्मिक विरासत हम लोग पहचान नही पाते शायद यही भगवती की माया हो सकती है .. 
आज भगवान शरभेश्वर से यही प्रार्थना है की हमारी प्राचीन सभ्यता , हमारी प्राचीन संस्कृती एवं हमारे देवी देवता का मजाक उडाकर इस सभ्य संस्कृती से साथ खिलवाड करने वाले शत्रू तत्त्व को भगवान शरभ इस ऋषीमुनीयों की भारत वर्ष की पवित्र भूमी से जड से उखाडकर फेक दे .. 
जिस दिन हम सारे लोग वास्तविक साधक बनकर बगलामुखी साधना , शरभ साधना , प्रत्यंगिरा साधना , छिन्नमस्तिका साधना , धूमावती साधना करने लगेंगे तो किस शत्रू की मजाल है जो हमारी संस्कृती पर तिरछी नजर डालने की हिम्मत कर सके .. 

 उचित आध्यात्मिक साधनाये करते रहो .. 
सब उर्जा का खेल है . साधनाओं के माध्यम से आध्यात्मिक उर्जा का निर्माण होना चाहिये . यही उर्जा हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं का निराकरण कर सकती है . सिर्फ खयाली पुलाव से या बडी बडी बाते करने से कुछ नही होगा .
कितने लोग रोज कुछ अच्छी आध्यात्मिक साधना करते है ? हमे हमारे पूर्वज ऋषी मुनियों की आध्यात्मिक विरासत को पहचानना चाहिये . 

 आज इस दिवस पर भगवान शरशेश्वर एवं भगवती प्रत्यंगिरा देवी के चरणों मे यही निवेदन है कि वे हम सब पर अपनी कृपादृष्टी बनाये रखे .. यही उनसे हाथ जोडकर प्रार्थना है .. ॐ शम ..

शरभ माला मंत्र

🌹शरभ माला मंत्र🌹

ॐ नमो भगवते आकाशभैरवाय निखिललोकप्रियाय प्रणत जन परिताप विमोचनाय , सकल भूत निवारणाय सर्वाभीष्टप्रदाय नित्याय सच्चिदानंदविग्रहाय , सहस्रबाहवे सहस्रमुखाय सहस्रत्रिलोचनाय सहस्रचरणाय करालाय अखिलरिपुसंहारकारणाय , अनेककोटिब्रह्मकपाल माला अलंकृताय नररुधिरमांस भक्षणाय महाबलपराक्रमाय महदंतराय , विषमोचनाय परमंत्र यंत्र तंत्र विद्या विच्छेदनाय प्रसन्नवदनांबुजाय एहि एहि आगच्छागच्छ , ममाभीष्टमाकर्षयाकर्षय आवेशयावेशय मोहय मोहय भ्रामय भ्रामय द्रावय द्रावय तापय तापय सिद्धय सिद्धय बंधय बंधय भाषय भाषय क्षोभय क्षोभय भूतप्रेतादि पिशाचान्मर्दय भूतपिशाचान्मर्दय कुर्दय कुर्दय पाटय पाटय मोटय मोटय गुंफय गुंफय कंपय कंपय ताडय ताडय त्रोटय त्रोटय भेदय भेदय छेदय छेदय चंडवातातिवेगाय संतत गंभीर विजृंभणाय , संकर्षय संकर्षय संक्रामय संक्रामय प्रवेशय प्रवेशय स्तोभय स्तोभय स्तंभय स्तंभय तोदय तोदय खेदय खेदय तर्जय तर्जय गर्जय गर्जय नादय नादय रोदय रोदय घातय घातय वेतय वेतय सकल रिपु जनान छिंधि सकल रिपु जनान छिंधि भिंदय भिंदय अंधय अंधय रुंधय रुंधय नर्दय नर्दय बंधय बंधय श्रीं ह्रीं क्लीं कल्याणकारणाय श्मशानानंद महाभोगप्रियाय देवदत्तं आनय आनय दूनय दूनय केलय केलय मेलय मेलय प्रपन्न वत्सलाय प्रतिवदन दहनामृत किरण नयनाय सहस्रकोटि वेताल परिवृत्ताय मम रिपुन उच्चाटय उच्चाटय नेपय नेपय , तापय तापय सेचय सेचय मोचय मोचय लोटय लोटय स्फोटय स्फोटय ग्रहण ग्रहण अनंत वासुकि तक्षक कर्कोटक पद्म महापद्म शंख गुलिक महानागभूषणाय , स्थावर जंगमानां विषं नाशय नाशय प्राशय प्राशय भस्मी कुरु भस्मी कुरु भक्तजनवल्लभाय सर्गस्थितिसंहारकारणाय कथय कथय सर्व शत्रून उद्रेकय उद्रेकय विद्वेषय विद्वेषय उत्सादय उत्सादय उत्पाटय उत्पाटय बाधय बाधय साधय साधय दह दह पच पच शोषय शोषय पेषय पेषय दूरय दूरय मारय मारय भक्षय भक्षय शिक्षय शिक्षय समस्त भूतं शिक्षय शिक्षय श्रीं ह्रीं क्लीं क्ष्म्रयैं अनवरत तांडवाय आपदुद्धारणाय साधुजनान तोषय तोषय भूषय भूषय पालय पालय शीलय शीलय काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य शमय शमय दमय दमय त्रासय त्रासय शासय शासय क्षिति जल दहन मारुत गगन तरणि सोमात्मशरीराय शम दमोपरति तितिक्षा समाधानं श्रद्धां दापय दापय प्रापय प्रापय विघ्नं विच्छेदनं कुरु कुरु रक्ष रक्ष क्ष्म्रयैं क्लीं ह्रीं श्रीं ब्रह्मणे स्वाहा !!

Wednesday, 29 April 2026

प्राचीन अस्त्र-शस्त्र भी दिव्य रूप धारण करते थे।

क्या प्राचीन अस्त्र-शस्त्र भी दिव्य रूप धारण करते थे ? ..... 

अस्त्र शस्त्र की शिक्षा के ये महर्षि विश्वामित्र के पास गए राम और लक्ष्मण ने विश्वामित्र जी से पूछा तो उन्होंने बताया कि किसी समय में यहाँ मलद और करुष नाम की अत्यंत समृद्ध नगरियाँ हुआ करती थीं लेकिन ताड़का नाम की यक्षिणी ने सब बर्बाद कर दिया, वो अभी भी पूरे क्षेत्र को उजाड़ रही है। फिर विश्वामित्र जी ने उन दोनों किशोरवय राजकुमारों से कहा की क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए तुम उसका वध करो।

विश्वामित्र जी से ऐसी आज्ञा पाकर, राम और लक्ष्मण ने जो विद्याएँ सीखी थीं (जैसे बला और अतिबला) तथा जो अस्त्र उनके पास थे उसका प्रयोग करके उन्होंने ताड़का जैसी हज़ारों हांथियों के बल वाली यक्षिणी का वध किया।

विश्वामित्र जी उन दोनों राजकुमारों की विनम्रता, वीरता और युद्ध कौशल से प्रसन्न हुए और संतुष्ट होकर बोले – “हे महायशस्वी राजकुमारों मै तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ और तुमको प्रसन्नता पूर्वक सारे अस्त्र-शस्त्र देता हूँ। इन अस्त्रों से तुम सुर, असुर, गन्धर्व और नाग आदि अपने शत्रुओं को अपने वश में कर, जीत लोगे।

फिर सबसे पहले उन्होंने उनको महादिव्य दंड-चक्र दिया फिर धर्म-चक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र और फिर ऐन्द्रास्त्र। उनके द्वारा दिए गये अस्त्रों की सूची इस प्रकार है -:
1. वज्रास्त्र
2. महादेवास्त्र
3. ब्रह्मशिर
4. एषीक
5. मोदकी और शिखरी नाम की दो गदाएँ
6. धर्मपाश
7. कालपाश
8. वरुणपाश
9. शुष्क और अशनी नाम के दो वज्र (ये गदा या उसके जैसे किसी शस्त्र से भिन्न होता है)
10. पैनाकास्त्र
11. नारायणास्त्र
12. शिखर नाम का आग्न्येयास्त्र
13. प्रथम नाम का वायव्यास्त्र
14. हयशिरास्त्र
15. क्रौन्चारास्त्र
16. कंकाल और कपाल नाम की दो भयंकर शक्तियां
17. विद्याधरास्त्र
18. नंदन नाम की तलवार
19. गान्धर्वास्त्र
20. मानवास्त्र
21. प्रस्वापन
22. सौर दर्पण (ये एक यंत्र था)
23. संतापन
24. विलापन
25. मदनास्त्र
26. मोहनास्त्र
27. पैशाचास्त्र
28. तामस (मायावी अस्त्र)
29. महाबली सौमन
30. संवर्त
31. दुर्धर्ष
32. मौशल
33. सत्यास्त्र
34. परम अस्त्र ‘मायाधर’
35. तेजप्रभ (इसमें शत्रु का तेज़ खींचा जाता है)
36. शिशिर नामक सोमास्त्र
37. त्वाष्टास्त्र
38. शीतेशु
39. मानव (इस नाम का अस्त्र)
40. ब्रह्मास्त्र

इन सब अस्त्र-शस्त्रों को देने के बाद उन्होंने इन दोनों राजकुमारों से कहा कि इन शक्तियों को सूक्ष्म रूप से अपने अन्दर धारण करो फिर पूर्व की ओर मुख करके उन सम्पूर्ण अस्त्रों के मन्त्र (अर्थात चलाने और रोकने की विधि) बताये, जिन सब अस्त्रों का प्राप्त होना देवताओं के लिए भी दुर्लभ था।

फिर जैसे ही विश्वामित्र जी उन सारे मंत्रास्त्रों का उच्चारण किये, वे सारी शक्तियां अपना साक्षात रूप धारण करके उन दोनों के सामने हांथ जोड़कर सामने आ खड़ी हुईं और कहने लगीं – हे राघव हम आपके कार्य के लिए तत्पर हैं आप जो कार्य हमसे लेना चाहेंगे हम वही करेंगे तब राम ने उनको अपने हांथ से छुआ और बोले “मै जब तुम्हारा स्मरण करूँ तुम आकर मेरा कार्य कर जाना” फिर दोनों भाइयों ने महातेजस्वी विश्वामित्र जी को प्रणाम किया और फिर तीनो आगे बढ़े।

रास्ते में राम प्रसन्न होकर विश्वामित्र जी से बोले कि “हे भगवन आपके अनुग्रह से वे सारे अस्त्र-शस्त्र जो सुर और असुरों के लिए भी दुष्प्राप्य हैं हमें मिल गए, और उनको चलाने की विधि भी मालूम पड़ गयी अब कृपया हमें आप इनके संहार (अर्थात अस्त्र चलाकर उसे वापस लेने की विधि) की विधि भी बता दीजिये।| फिर विश्वामित्र जी ने उनका संहार भी उन दोनों को बताया और फिर उन दोनों को कुछ और मंत्रास्त्रों को चलाना सिखाया।

उनके नाम इस प्रकार है -:

1. सत्यवत
2. सत्यकीर्ति
3. धृष्ट
4. रभस
5. प्रतिहारतर
6. परान्ग्मुख
7. अवान्ग्मुख
8. लक्ष्य
9. अलक्ष्य
10. दृढ़नाभ
11. सुनाभ
12. दशाक्ष
13. शतवक्र
14. दशशीर्ष
15. शतोदर
16. पद्मनाभ
17. महानाभ
18. दुन्द्नाभ
19. ज्योतिष
20. कृशन
21. नैराश्य
22. विमल
23. योगंधर
24. हरिद्र
25. दैत्य प्रमथन
26. शुचिर्बाहू
27. महाबाहु
28. निश्कुल
29. विरुचि
30. सार्चिमाली
31. धृतिमाली
32. वृत्तिमान
33. रुचिर
34. पित्र्य
35. सौमनस
36. विधूत
37. मकर
38. करवीरकर
39. कामरूप
40. कामरूचि
41. मोह
42. आवरण
43. जृम्भक
44. सर्वनाभ
45. वरुण

विश्वामित्र जी कहने लगे “हे राम और लक्ष्मण ये सब कृशाश्व के पुत्र बड़े तेजस्वी और कामरूपी हैं। इनको तुम ग्रहण करो क्योकि तुम इनको ग्रहण करने के योग्य हो, तुम्हारा कल्याण हो !” 

तब दिव्य रूप, देदीप्यमान, मूर्तिमान और सुखप्रद वे सारे अस्त्र दोनों भाइयों के सामने उपस्थित हुए। उनमे कोई तो दहकते हुए अंगारे के समान था और कोई धुंए के समान रंग वाला, धुएं के जैसा था। कोई सूर्य और चन्द्र के सामान थे और कोई हांथ जोड़े हुए थे।

वे राम से बड़ी विनम्रता से बोले “हे राघव हम उपस्थित हैं, क्या आज्ञा है ?” इस पर राम ने उनसे कहा कि मेरे मन में वास करो और कार्य पड़ने पर मेरी सहायता करना, इसके बाद तुम जहाँ चाहे जा सकते हो।

रामचंद्र से ऐसा सुनकर उन्होंने उनकी प्रदक्षिणा की और “बहुत अच्छा” कहकर वे जहाँ, जिस लोक से आये थे वहीँ चले गए। इस प्रकार से विश्वामित्र जी से इन अस्त्रों को पाकर राम और लक्ष्मण अत्यन्त प्रसन्न हुए।
ऋषि कण्डवाल

मंदिर सोता नहीं है। रुद्रेश्वर नाथ मोहनगंज

गाँव के लोग कहते थे, उस मंदिर के पट छह बजे बंद हो जाते हैं, पर मंदिर सोता नहीं है।

मोहनगंज से बीस किलोमीटर अंदर, सई नदी के किनारे, एक टूटा-फूटा शिव मंदिर है। नाम है **रुद्रेश्वर नाथ**। नक्शे पर नहीं, सरकारी बोर्ड पर नहीं। बचपन में दादी कहती थीं, "बेटा, उधर रात में मत जाना, वहाँ आधी रात को मंदिर जागता है।"

मैं पिछले महीने गाँव गया था, पिताजी की तेरहवीं के बाद घर समेटने। शहर की नौकरी, लखनऊ की भागदौड़, मुझे इन बातों पर हँसी आती थी। पर तेरहवीं वाले दिन पंडित जी ने थाली में दक्षिणा लेते हुए धीरे से कहा, "रुद्रेश्वर के दर्शन कर आओ, तुम्हारे बाबा हर अमावस वहाँ दिया जलाते थे।"

मैं शाम को गया। मंदिर छोटा, गर्भगृह में काले पत्थर का शिवलिंग, नंदी का टूटा हुआ कान। पुजारी कोई नहीं। एक बूढ़ा कहार, रामसुमेर, ताला लगाता था। उसने मुझे देखकर कहा, "दर्शन कर लो, पर रुकना मत। साढ़े बारह बजे यहाँ घंटी अपने आप बजती है।"

मैंने पूछा क्यों। उसने कंधे उचकाए, "जागता है।"

मैं रुक गया।

पहली रात

मैंने टॉर्च, पावरबैंक, और एक छोटा कैमरा लिया। रामसुमेर ने छह बजकर दस मिनट पर भारी ताला लगाया, मुझे बाहर से प्रणाम किया और चला गया। मैं पीपल के नीचे चबूतरे पर बैठ गया।

गाँव की रात जल्दी गहरी होती है। नौ बजे तक सियार बोलने लगे। दस बजे नदी की हवा में ठंडक आई। ग्यारह बजे तक मेरा फोन नेटवर्क छोड़ गया।

ठीक बारह बजकर सत्रह मिनट पर पहला घंटा बजा।

मंदिर बंद था, ताला बाहर से लगा था, अंदर कोई नहीं। फिर भी पीतल की भारी घंटी, जो गर्भगृह के दरवाजे पर लटकी थी, तीन बार बजी। टन... टन... टन...

मैं उठा। ताले को छुआ, ठंडा। दरवाजे की झिरी से देखा, अंदर घना अंधेरा।

फिर दिया जला।

एक नहीं, गर्भगृह के चारों कोनों में रखे मिट्टी के दिये अपने आप सुलग उठे। बिना तेल, बिना बाती छुए। उनकी लौ नीली नहीं थी, बिल्कुल केसरिया, जैसे अभी किसी ने घी डाला हो।

उस रोशनी में मैंने देखा, शिवलिंग पर बेलपत्र नहीं थे, पर जल की धारा बह रही थी। ऊपर कोई कलश नहीं, फिर भी धार लगातार गिर रही थी।

तभी पीछे से आवाज आई, "जगह छोड़ दो।"

मैं पलटा। नंदी की मूर्ति, जो दिन में टूटी हुई थी, अब सीधी बैठी थी। और उसके पास, धुंध में, दस बारह लोग खड़े थे। धोती-कुर्ता, पगड़ी, कुछ के हाथ में लाठी, दो के पास पुरानी बंदूकें। उनके कपड़े फटे, पैरों में कीचड़।

वो मुझे देख नहीं रहे थे। वो मंदिर की तरफ देख रहे थे। एक बूढ़ा, जिसकी दाढ़ी सफेद थी, हाथ जोड़कर बोल रहा था, "भोलेनाथ, आज आखिरी रात है। फिरंगी सुबह आ जाएँगे। हमें अपने चरणों में जगह देना।"

मुझे समझ आया, ये 1857 के बागी थे। सई का ये इलाका तब विद्रोहियों का रास्ता था।

वे सब गर्भगृह के सामने बैठ गए। बिना आवाज के उनके होंठ हिल रहे थे, पर मुझे साफ सुनाई दे रहा था, "नमः शिवाय... नमः शिवाय..."। जैसे ही जाप तेज हुआ, दिये और भड़क उठे।

तभी मंदिर का घंटा फिर बजा, इस बार लगातार। और दरवाजा, जिस पर ताला लगा था, अंदर से खुला।

मैं पीछे हट गया।

अंदर शिवलिंग नहीं था। वहाँ एक गहरा कुंड था, और उसमें पानी नहीं, राख थी। सैकड़ों लोगों की राख। और उस राख के ऊपर वही बूढ़ा बागी खड़ा था, अब जवान चेहरे के साथ, मुस्कुरा रहा था।

उसने मेरी तरफ देखा और कहा, "डर मत। हम मरे नहीं, हम रुके हैं।"

जागने का मतलब

सुबह जब रामसुमेर ताला खोलने आया, तो मैं चबूतरे पर सोया मिला। उसने मुझे हिलाया, "देख लिया?"

मैंने पूछा, "ये हर रात होता है?"

उसने ताला खोला। अंदर सब वैसा ही था, शिवलिंग, टूटा नंदी, बुझे दिये। सिर्फ फर्श पर ताज़ा बेलपत्र पड़े थे, जबकि रात को वहाँ कोई नहीं आया था।

रामसुमेर बोला, "1857 में अंग्रेजों ने इस गाँव को घेर लिया था। तीस बागी इस मंदिर में छिपे। पुजारी ने कहा, भाग जाओ। उन्होंने कहा, हम महादेव की शरण में हैं। सुबह जब फिरंगी आए, तो मंदिर खाली मिला। न लाशें, न खून। बस शिवलिंग पर राख की परत। गाँव वाले कहते हैं, महादेव ने उन्हें अपने अंदर समा लिया। तब से हर रात साढ़े बारह बजे, वो अपनी संध्या पूरी करने आते हैं। मंदिर उनके लिए जागता है।"

मैं हँसा नहीं। मेरे कैमरे में रात की वीडियो थी, पर उसमें सिर्फ अंधेरा और तीन बार घंटी की आवाज। कोई आदमी नहीं।

मैं दोपहर में फिर गया। गर्भगृह में बैठा। तभी पुजारी की पुरानी बही मिली। 1952 की एक एंट्री, मेरे बाबा के हाथ की लिखावट, "रुद्रेश्वर नाथ में अमावस को दिया जलाया, बागी बाबाओं के नाम का।"

मैं समझ गया, बाबा क्यों हर अमावस यहाँ आते थे।

उस रात मैं फिर रुका, पर इस बार डरने नहीं, देखने। ठीक बारह सत्रह पर घंटी बजी। दिये जले। वही लोग आए। मैंने हाथ जोड़े। बूढ़े बागी ने मुझे देखा, इस बार पहचाना। उसने इशारा किया, बैठो।

मैं उनके साथ बैठ गया। जाप सुना। न कोई डरावनी परछाई, न कोई चीख। सिर्फ एक थकी हुई शांति, जैसे बहुत लंबे सफर के बाद कोई घर लौटा हो।

जाप खत्म हुआ तो सब उठे। जाते जाते बूढ़े ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, ठंडा नहीं, गर्म। बोला, "कह देना, हम जागते हैं इसलिए गाँव सोता है।"

सुबह मैंने रामसुमेर से कहा, ताला मत लगाओ। उसने कहा, "ताला चोरों के लिए है, उनके लिए नहीं। वो तो वैसे भी अंदर हैं।"

अब मैं हर महीने अमावस को जाता हूँ। दिया जलाता हूँ। बारह सत्रह पर घंटी बजती है, मैं आँखें बंद कर लेता हूँ। मुझे पता है, आधी रात का जागता मंदिर भूतों का नहीं है।

वो उन लोगों का मंदिर है जिन्हें इतिहास ने भुला दिया, पर महादेव ने नहीं। वो जागते हैं ताकि हम याद रखें, कुछ दरवाजे ताले से बंद नहीं होते, कुछ पहरेदार मरने के बाद भी पहरा देते हैं।

और जब कभी तुम मोहनगंज की तरफ जाओ, सई के किनारे उस पीपल वाले मंदिर के पास रुकना। छह बजे पट बंद मिलेंगे। पर अगर तुम चुपचाप बैठो, तो साढ़े बारह बजे तुम्हें भी सुनाई देगा, वो घंटी जो किसी हाथ से नहीं बजती, वो जाप जो किसी गले से नहीं निकलता।

क्योंकि कुछ मंदिर सोते नहीं, वो सिर्फ आँखें मूँदते हैं, ताकि आधी रात को पूरी तरह जाग सकें।

#hindi #post #stories #storytelling #storyofmylife #viral #trendingpost #storyviral #viralchallenge #storytime #storyteller #viralphotochallenge

Rakesh Bharti 
https://www.facebook.com/share/p/1Ky3qUTjTh/

आज्ञा चक्र

प्रश्न: लेकिन आज्ञा चक्र पर तो ॐ जप बताया गया है। 'ह‌ं' कंठ (विशुद्धि) पर बताया है, 'शं' ब्रह्मरंध्र पर। क्रम से चलें तो – लं, वं, रं, यं, हं, ॐ, शं।
यह गूढ़ प्रश्न आज्ञाचक्र: मास्टर चाबी, ध्वनियाँ और अन्य आयाम वाली पोस्ट पर आया है।

उत्तर: नमस्ते मित्र,
बहुत सुंदर और गहन प्रश्न उठाया है आपने। आभार।
आपने पारंपरिक क्रम बताया – लं, वं, रं, यं, हं, ॐ, शं – और यह सही भी है। पर यहाँ एक बारीक लेकिन बहुत ज़रूरी अंतर समझना होगा, जो अक्सर कंफ्यूजन पैदा करता है। मैं आपके साथ इसे खोलकर रखता हूँ, उसी पोस्ट "आज्ञाचक्र: मास्टर चाबी, ध्वनियाँ और अन्य आयाम" के संदर्भ में।

1. बीज मंत्र और पंखुड़ी की ध्वनियाँ – दो अलग चीज़ें हैं
आपने जो क्रम लिखा – लं (मूलाधार), वं (स्वाधिष्ठान), रं (मणिपूर), यं (अनाहत), हं (विशुद्धि), ॐ (आज्ञा), शं (सहस्रार या बिंदु) – यह हर चक्र का बीज मंत्र है। हर चक्र का अपना एक तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, महत्) और उस तत्व की ध्वनि-ऊर्जा है। यह मंत्र जप के लिए हैं, तत्व शुद्धि और चक्र जागरण की विधियों में काम आते हैं। विशुद्धि का बीज “हं” है, आज्ञा का बीज प्रमुख रूप से “ॐ” है। यह बिल्कुल शास्त्रसम्मत है।

2. आज्ञाचक्र का कमल और उसकी दो पंखुड़ियाँ – हं और क्षं
अब आज्ञाचक्र का जो प्रतीक है – दो पंखुड़ियों वाला कमल – उन दो पंखुड़ियों पर जो अक्षर लिखे हैं, वे हैं “हं” और “क्षं”। शास्त्रों में इसे स्पष्ट कहा गया है – हं (हं) और क्षं (क्षं) ये दो वर्ण आज्ञा दल के हैं। यह पंखुड़ियों की ध्वनि ऊर्जा है, बीज मंत्र नहीं। इसे हम “पंखुड़ी-ध्वनि” या “प्राण-धारा की ध्वनि” कह सकते हैं।

मेरी पोस्ट में जो “हं और क्षं” आया है, वह ठीक इसी को इंगित कर रहा है। मैंने लिखा है – “दो मुख्य ध्वनियाँ सामने आती हैं – हं और क्षं। ये दोनों कोई मंत्र नहीं, बल्कि प्राण की ही दो अलग-अलग धाराएँ हैं।” जब आप अनुभव के गहरे स्तर पर जाओगे ऐसा पाओगे।
अर्थात यहाँ जप करने का मंत्र नहीं बताया गया, बल्कि जब साधक भीतर गहराता है तो प्राण की फ्रीक्वेंसी स्वतः इन दो मूल ध्वनि-पैटर्न के रूप में सुनाई देने लगती है। यह कोई मानसिक उच्चार नहीं, अनाहत नाद का स्तर है।

3. फिर विशुद्धि के “हं” और आज्ञा के “हं” का क्या संबंध?
विशुद्धि का बीज मंत्र “हं” है, और आज्ञा दल का पहला अक्षर भी “हं” (हं) है। दोनों में ध्वनि समान है, पर ऊर्जा का स्तर भिन्न है। विशुद्धि पर “हं” आकाश तत्व की बीज ध्वनि के रूप में कंपन करता है, जबकि आज्ञा पर आते-आते वही “हं” प्राण की उस धारा में ढल जाता है जो पीले से नीले प्रकाश में बदलती है और अंततः ॐ में विलीन होती है। इसलिए पोस्ट में कहा कि ये दोनों ॐ के साथ ओवरलैप होती हैं, अनुनादित होती हैं।

हम यह भी कह सकते हैं – विशुद्धि का “हं” शुद्धि करता है, आज्ञा का “हं” आयामों को खोलता है।

4. “क्षं” और “शं” का भेद भी समझे
आपने लिखा “शं“ "ब्रह्मरंध्र” या सहस्रार के लिए है कुछ ग्रंथों में “शं” (शं) या “क्षं” दोनों का उल्लेख मिलता है, यह परंपरा पर निर्भर करता है। कई क्रमों में मूलाधार से विशुद्धि तक लं, वं, रं, यं, हं और फिर आज्ञा के लिए ॐ, उसके बाद “क्षं” सहस्रार या बिंदु का संकेत करता है। मेरी पोस्ट में “क्षं” आज्ञा की दूसरी पंखुड़ी का प्राण स्पंद है, कोई अंतिम बीज मंत्र नहीं।
यानी पारंपरिक बीज मंत्र क्रम – लं, वं, रं, यं, हं, ॐ – बिल्कुल अपनी जगह पर स्थापित है। और आज्ञा के भीतर के गहन अनुभव में हं और क्षं वो दो प्राण-धाराएँ हैं जो 48-48 फ्रीक्वेंसी में टूटकर प्रकाश बन जाती हैं। इसे कहीं से भी विरोध नहीं है।

5. 48-48 का राज़ और पंखुड़ियों का गणित भी समझे
पोस्ट में बताया गया कि हं के भीतर 48 सूक्ष्म ध्वनियाँ और क्षं के भीतर 48 – यह कोई यादृच्छिक संख्या नहीं है। योग शास्त्रों में भी मानव शरीर में कुल 96 अंगुलियाँ (उँगलियों के पोरुओं की संख्या) बताई गई हैं, जो 48-48 के जोड़े में नाड़ियों और चेतना की लय से जुड़ी हैं। जब आज्ञाचक्र जागता है, तो यह पूरी बायो-इलेक्ट्रिक व्यवस्था एक साथ प्रकाश-स्पंद में बदलती अनुभव होती है। यही कारण है कि कमल की दो पंखुड़ियाँ हैं – हर पंखुड़ी अपने भीतर 48 स्पंदनों को समेटे है।

6. तो क्या ओम का जप छोड़ दें? इसको भी समझे।
बिल्कुल नहीं
आपने कहा कि “आज्ञा चक्र पर तो ॐ जप बताया गया है” – और यह परम सत्य है। मेरी पूरी पोस्ट का निचोड़ ही यही है कि अंततः सब कुछ ॐ में ही समा जाता है। मैने लिखा है – “ये दोनों ध्वनियाँ ॐ ध्वनि ऊर्जा पैटर्न के साथ ओवरलैप होती हैं, अनुनादित होती हैं।” और गहरे में जाने पर “शेष रहता है केवल सफेद प्रकाश – वह कोरी ऊर्जा है, ही ॐ है, ही शून्य है।”
अर्थात हं और क्षं का स्वतः उठना और ॐ में विलय – यह साधना का आंतरिक अनुभव है। जप की विधि में आप ॐ का ही आश्रय लेंगे, यह सर्वथा उचित और प्रभावी भी है।

7. एक बात और समझे
उस पोस्ट का दूसरा अंश आयामों (डाइमेंशन) के बारे में है। जब आज्ञाचक्र पर हं और क्षं की ये दो धाराएँ अपनी पूरी 48-48 की गहराई में खुलती हैं, तो चेतना का फ्रीक्वेंसी बैंड इतना चौड़ा हो जाता है कि वह केवल तीन आयामों में कैद नहीं रहती। तब साधक अन्य आयामों के प्राणियों और लोकों का अनुभव कर सकता है। यह कोई मंत्र जप से थोड़े में होने वाली बात नहीं, यह वर्षों की साधना से प्राण की धाराओं के इस रूपांतरण का परिणाम है।
मित्र
आपका प्रश्न बीज मंत्र क्रम और आज्ञा की पंखुड़ियों की ध्वनियों के संगम पर खड़ा है, और इस अंतर को उजागर करना बहुत ज़रूरी है।

· बीज मंत्र : लं, वं, रं, यं, हं, ॐ – चक्र जप और तत्व शुद्धि के लिए।
· पंखुड़ी की प्राण-ध्वनियाँ (जो सिर्फ गूढ़ ध्यान में सुनाई देती हैं) : हं और क्षं – आज्ञा दल पर।
  ये दोनों आपस में टकराते नहीं, बल्कि एक ही सीढ़ी के दो स्तर हैं। बीज मंत्र से शुरू करके, एक दिन साधक जब पूर्ण मौन और प्राण के सूक्ष्म कंपनों में डूबता है, तो उसे हं और क्षं का यह द्वार खुलता है, जो उसे ॐ रूपी अनंत में ले जाता है।

आपकी जिज्ञासा उत्तम है। ऐसे प्रश्न ही साधना को कोरी मान्यता से उतारकर अनुभव की वास्तविकता में बदलते हैं।

ॐ शांति
साभार - टैलीपैथी 

Tuesday, 28 April 2026

जन्म_कुण्डली_में_सन्तान_भाव_का_एक_अज्ञात_रहस्य

#जन्म_कुण्डली_में_सन्तान_भाव_का_एक_अज्ञात_रहस्य 
सूर्य सिद्धांत का गुप्त अध्याय: #संतान_रहस्य – ब्रह्मांड का वह खगोलीय गणित जो 99% ज्योतिषी कभी नहीं छू पाए

कल्पना कीजिए... 6778 ईसा पूर्व की वह रात्रि, जब मायासुर को सूर्यदेव ने स्वयं वह ग्रंथ सौंपा जिसमें ग्रहों की गति का कोड छिपा था। #सूर्य_सिद्धांत। एक ऐसा ग्रंथ जो महायुग (43,20,000 वर्ष) में सूर्य की 43,20,000 परिक्रमाओं, चंद्र की 6,77,53,336 परिक्रमाओं और प्रत्येक ग्रह की #मंदा_सिंहरा_फल की जटिल #त्रिकोणमिति (साइन टेबल, एपिसाइकिल, बीज सुधार) से ग्रहों की सटीक स्पष्ट स्थिति निकालता है। 

यदि आप अपनी #कुण्डली_विश्लेषण चाहते हैं तो जन्म स्थान समय बताएं.....

आज के 99% ज्योतिषी पाराशर, फलित सूत्रों में फंसे रहते हैं। वे कुंडली देखते हैं, लेकिन खगोलीय गणित नहीं। वे #पंचम_भाव और गुरु देखते हैं, लेकिन सूर्य सिद्धांत का वह बीज-क्षेत्र स्फुट + दैनिक गति का सूक्ष्म समीकरण नहीं जानते जो #संतान को कब, क्यों, कितनी, पुत्र या कन्या – सब कुछ #ब्रह्मांड के साइन में लिख देता है।

यह लेख उस रहस्य को खोलता है। कोई सैद्धांतिक गलती नहीं, कोई मिसप्रिंट नहीं। शुद्ध सूर्य सिद्धांत + प्राचीन फलित + गहन शोध का सम्मिश्रण। पढ़ते-पढ़ते आप रुक नहीं पाएंगे, क्योंकि हर पैराग्राफ में एक नया रहस्य खुलता है।

1. #संतान_कब_होगी? – सूर्य सिद्धांत का “स्पष्ट दैनिक गति” सूत्र (Timing का गुप्त कोड)
सामान्य ज्योतिषी कहते हैं – “गुरु की दशा या #पंचमेश गोचर में बच्चा होगा।” लेकिन सूर्य सिद्धांत कहता है: सबसे पहले ग्रहों की सटीक स्पष्ट स्थिति (True Longitude) निकालो।

#सूर्य_सिद्धांत अध्याय 2 में मंद फल (Equation of Centre) और सिंहर फल (Equation of Conjunction) का सूत्र दिया है:
भुजफल = (बेस-साइन × एपिसाइकिल) / 360°
फिर हाइपोटेन्यूज H = √(R² ± कोटि फल²)
स्पष्ट गति = #मंद_सिनहर सुधार के बाद दैनिक गति × (H - R)/H

यह सूत्र #कुंडली के जन्म काल से लेकर वर्तमान तक प्रत्येक दिन की स्पष्ट स्थिति देता है। 
अब रहस्य:
#पंचम_भाव_का_स्वामी + गुरु की स्पष्ट लंबाई को सूर्य सिद्धांत के अहरगण (Sum of Days) से जोड़कर देखो। जब यह योग 5वें #नवांश में “बीज सुधार” (Bija Correction) के बाद 23°-27° के बीच पहुंचे और चंद्र की मंद गति (Moon's Anomaly) 90° के निकट हो, तब संतान का द्वार खुलता है।

यह 99% नहीं जानते क्योंकि वे Drik सिद्धांत (आधुनिक #एफेमरिस) यूज करते हैं, #सूर्य_सिद्धांत का बीज सुधार (1100 ई. के बाद 750 वर्ष पुराना, लेकिन मकरंद द्वारा अंतिम सुधार) भूल जाते हैं। परिणाम? गलत टाइमिंग। असली गणित बताता है – संतान उस ठीक तिथि पर होगी जब पुत्र तिथि स्फुट (Moon ×5 - Sun ×5 / 360 → तिथि शुभ_पक्ष में 5वें या 10वें करण में हो।

2. #संतान_होने_में_बाधा – बीज-क्षेत्र स्फुट का अंधकारमय रहस्य (Obstacles का खगोलीय डिटेक्टर)
सूर्य_सिद्धांत में ग्रहों की परिक्रमा संख्या (Revolutions in Mahayuga) बताती है कि हर ग्रह की “बीज शक्ति” (Seed Power) कितनी है। अब फलित में इसे संतान से जोड़ो:

#बीज_स्फुट (पुरुष) = सूर्य + शुक्र + गुरु की निरयन लंबाई जोड़ो → राशि + नवांश।
अगर दोनों विषम राशि/नवांश → बीज शक्तिशाली (संतान निश्चित)।
दोनों सम → पूर्ण बाधा (99% ज्योतिषी यही चूक जाते हैं)।
मिश्र → देरी, लेकिन सूर्य सिद्धांत के मंद फल सुधार (Mars 76° epicycle) से ठीक होता है।

क्षेत्र स्फुट (#स्त्री) = #२_भाव_का_वाणी_रहस्य चंद्र_मंगल_गुरु → दोनों सम राशि/नवांश → क्षेत्र उपजाऊ।
दोनों विषम → बांझपन या गंभीर बाधा।

रहस्य यह कि इन स्फुटों को सूर्य सिद्धांत के साइन इंटरपोलेशन (Sine Table 225' अंतर) से और सूक्ष्म बनाओ। अगर बीज स्फुट पर राहु/केतु की लंबाई 120' विक्षेप (Latitude) डाल रही हो, तो गर्भपात या देरी। अगर क्षेत्र स्फुट पर शनि की मंद गति (Saturn 49° epicycle) हावी, तो 7-12 वर्ष देरी। यह गणित इतना गहरा है कि आज के सॉफ्टवेयर भी पूरा नहीं करते – क्योंकि वे Drik यूज करते हैं, सूर्य का बीज नहीं।

3. #कितनी_संतान_होगी? – #नवांश_अष्टकवर्ग + महायुग गणित का सम्मिश्रण (Number का गणितीय रहस्य)
सामान्य नियम: पंचम भाव में जितने नवांश गुजरे, उतनी संतान। लेकिन सूर्य सिद्धांत का गुप्त लेयर:

#गुरु_चंद्र + सूर्य लंबाई जोड़ो → राशि का नवांश संख्या = संतान संख्या।
पंचमेश के नवांश + गुरु की अष्टकवर्ग बिंदु (5वें भाव से गुरु को देखते हुए) × 3 (अगर गुरु उच्च/वक्री)।

सूर्य सिद्धांत की महायुग परिक्रमा से एनालॉजी: जितनी “अंतरिम मास” (Intercalary Months = 15,93,336) पंचम भाव में प्रभावी, उतनी संतान।
उदाहरण: अगर पंचम नवांश 4 पूर्ण हो + गुरु अष्टकवर्ग 7 बिंदु + क्षेत्र स्फुट सम → 4 संतान (2 पुत्र, 2 कन्या संभावित)। यदि मंगल/शनि मालेफिक ड्रिस्टि → 1-2 कम। यह सूत्र इतना सटीक कि प्राचीन ऋषि इससे राजवंश की भविष्यवाणी करते थे।

4. #कितनी_कन्या_कितने_पुत्र? – विषम-सम + नर-स्त्री ग्रह + साइन पैरिटी (Gender का ब्रह्मांडीय कोड)
पंचम भाव विषम राशि + नर ग्रह (सूर्य, मंगल, गुरु, शनि) की ड्रिस्टि → पुत्र संख्या।
सम राशि + स्त्री ग्रह (चंद्र, शुक्र, बुध) → कन्या संख्या।

सूर्य सिद्धांत ट्विस्ट: स्फुट की राशि + नवांश की पैरिटी देखो। बीज स्फुट विषम → पुत्र प्रधान। क्षेत्र सम + चंद्र/शुक्र प्रभाव → कन्या प्रधान। D7 सप्तांश लग्न यदि मिथुन/कन्या/धनु/मीन (द्विस्वभाव) → जुड़वां या मिश्रित।

रहस्य: सूर्य सिद्धांत अध्याय 7 में ग्रहों का विक्षेप (Latitude) – अगर पंचम में चंद्र 270' विक्षेप डाल रहा हो → अधिक कन्या। मंगल 90' → पुत्र लेकिन स्वास्थ्य बाधा।

5. पूरा विश्लेषण कैसे करें? – एक कुंडली के लिए स्टेप-बाय-स्टेप (आपकी कुंडली पर लागू करो)
जन्म विवरण से सूर्य सिद्धांत अहरगण → सटीक स्पष्ट ग्रह।
बीज + क्षेत्र स्फुट → बाधा स्तर (0-100%)।
पंचम + गुरु + D7 → संख्या + लिंग।
दशा में सिंहर फल सुधार → ठीक वर्ष/माह।
यह विधि इतनी गहन है कि एक बार समझ लेने पर आप कभी सामान्य ज्योतिषी की तरह नहीं सोचेंगे। पढ़ने वाला मजबूर हो जाता है क्योंकि हर लाइन में “अरे! यह तो...” वाला अहसास होता है।

अंतिम रहस्य: सूर्य सिद्धांत कहता है – संतान ब्रह्मांड का “फल” है। अगर बीज-क्षेत्र कमजोर, तो संतान गोपाल मंत्र + पीला दान + गुरुवार व्रत से बीज सुधार (Bija) हो जाता है। लेकिन गणित सही हो तो कोई बाधा टिकती नहीं।

यह लेख समाप्त नहीं होता – क्योंकि अब आप जान गए कि संतान कोई संयोग नहीं, खगोलीय गणित का रहस्यमय नृत्य है। अपनी कुंडली पर इसे लागू करो, और देखो कैसे ब्रह्मांड जवाब देता है।

जो 99% नहीं जानते, वे अब जान गए। बाकी... पढ़कर रुक गए न? 😌
#SHRI_NARAYANA_JI
#Shri_Narayann_Ji