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Wednesday, 17 June 2026

बोली में मिनख रा संस्कार, व्यवहार, ग्यान अर सभाव रो अेकै सागै खुलासो हुवै।

:ः बाईजी रो बोलणो अर भलै घरां री राड़:ः
मिनखाजूण रै फळापै अर फुटरापै सारू आपणां बडेरां, संत-साहितकारां अर लोकनीत-व्यवहार रो ज्ञान करावणियां गुणीजणां खास कर इण बात पर जोर दियो है कै आ जीभ जकां रै बस में है, वां रो ई जीवण धन्य है। ‘बाई कैवतां रांड’ कहीजै जकां नैं जस री ठौड़ जूता ई पानै पड़ै। वाणी तो व्यक्तित्व री आरसी मानीजी है। आदमी नीं बोलै जितरै उणरो ठा नीं पड़ै पण जियां ई बोलै उणरो कद आपणै सामी आवणो सरू हुवै। बोली में मिनख रा संस्कार, व्यवहार, ग्यान अर सभाव रो अेकै सागै खुलासो हुवै। आदमी री ठीमरता, धीरज अर संयत व्यवहार री सूचना उणरी वाणी ई दिया करै। जियां ई मिनख बोलै आ ठा पड़ ज्यावै कै ओ कुणसी संगत अर संस्कारां में रैवणियो आदमी है। 

आपणै अठै कैबत है कै ‘बाबा बोलूं कै बोवूं’ मतलब ओ कै नीं बोलै जितरै तो मिनख रो खोळियो है जणां मिनख जिसो लागै ई है अर जियां ई बोलै जणां सगळो पोत चोड़ै आ ज्यावै। बोली रै कारण कई बार भोळा अर भोंदू मित्र हुवै जका दुस्मणां सूं ई बत्तो काम करज्यावै। महात्मा गांधीजी रो मानणो हो कै आदमी नै चुप रैय’र इत्तो पछताणो कोनी पड़ै जित्तो कै गड़बड़ बोल’र पछताणो पड़ै। ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ री कैबत इणी कारण बणी है। घणां मिनख इयांकला मिलै जका अपणै आपनै ‘बूझबूझाकड़जी’ समझै अर हरेक बात रा जाणीजाण बण्योड़ा फिरै। बां नै ठा कोनी कै ओ संसार सागर है अठै तो बडाबडी रा डेरूं बाजै। भाखर पर तो सगळा ई भोमिया है, कुण छोटो अर कुण मोटो। इण वास्तै घणां ग्यानचंद (बात-बात में ग्यान बघारणियां) अर रायचंद (बात-बात में बिना मांगी राय देवणियां) बणण री दरकार कोनी, आदमी जित्तो जरूरी हुवै बित्तो ई बोलै जणां ठीक रैवै।

बोली में लहजै रो घणो असर हुया करै। अेक आदमी बोलै जणां लागै इमरत झरै अर दूजो बोलै जणां लागै कै कानां में कील चुभोवै। बोलणो अर बोबीड़ मारणो दोनूं न्यारी-न्यारी बातां है। इण सारू आपणै अठै कैबत है कै ‘बाईजी रा बोलणां अर भलै घरां की राड़’। राड़ नाम लड़ाई-झगड़ै रो है। लड़तां तो बोली तीव्र अर कर्कश ई रैया करै। लड़ाई में तो गाळ्यां ई काढीजै कोई लाडू तो बांटीजै कोनी। इण खातर लड़ाई झगड़े में बोली रै आदर्श रूप री कोई अपेक्षा नीं करीजै। अठै तांई कै साहित्य सिरजण मांय भी युद्ध आद रै चित्रण में इण बात नैं स्वीकारीजै। पण कई लोगां री तो आदत ई पड़ ज्यावै कै बै बोलै जणां इयां लागै जाणै लड़ाई ई करै। 

इणी कारण कोई टेम में स्याणी समझदार भाभी आपरी नणद नैं समझावतां कैयो हुवैला कै बाईजीराज थांरी सामान्य बोली ई इयांकली है जाणै भलां घरां में राड़-झगड़ो हुवै। इणनैं कीं सुधारो नीं तो आगलै घरां जावोला तो फोड़ा ई फोड़ा पड़णा है। वाणी री तीव्रता, आपणां हाव-भाव, बात कैवण रै लारै जिम्मेदारी रो भाव, श्रोता रै साथै आपरा संबंध, सबद चयन आद आपणी बात री परख रा आधार है। बाकी तो बात-बात तो सगळी अेक ई है, कैवण रो ई फरक है। जियां सागण ई काजळ आंख में घालै तो आंख री सोभा बढै अर बो ई काजळ घड़ै का ठीकरी पर लगावै तो अपरोगो लागै - 

बात-बात सब अेक है, कहणै में कदु बैण।
बो ही काजळ ठीकरी, बो ही काजळ नैण।।   

बात अर उठाव (कमठाण) जित्ता चावो बित्ता ई बधै। बात अर भाटो तो बैठावै ज्यूं ई बैठै पण बैठावणियैं री ऊरमा तो चाईजै। कई बार बोलणो गुनैगारी हुज्यावै तो कई बार बोलणो वरदायी सिद्ध हुवै। बात कर्यां ई मिनख री खरी पिछाण हुवै पण बिनां सोच्यां समझ्यां कर्योड़ी बात घांदा कर न्हाखै। राजस्थानी लोकजीवण में बात री सीख रा घणां दूहा प्रचलण में है-

बातड़ल्यां बिगताळल्यां, जे कोई कहै बणाय।
बातां (तो) हाथी पायबो, बातां (ई) हाथी पाय।। 

मतलब ओ है कै बात करणी अर कोई नैं कीं समझावणो है तो उणरो कायदो आयां ई फायदो हुवै नीं तो है जिसी इज्जत रा ई कांकरा हुज्यावै। कोई टेम री बात है कोई राजा हाथी रै होदै किणी मारग पर आवै हो। सामनै कोई कवि आयो अर उण राजा नै इयांकली बात कैई जकी संू राजा रीझग्यो अर उण कवि नैं आपरो हाथी बगसीस में दे दियो। इणनै कैवै बातां हाथी पायबो मानै बात-बात में हाथी प्राप्त कर लियो। इण दरसाव नै देख’र अेक दूजै मिनख सोच्यो इयांकली बात तो आपां ई कैय सकां अर बो तैयार हुग्यो। 

दो-च्यार महीनां पाछै कोई दूजो राजा हाथी रै होदै निकळ्यो। बो देखादेखी कवि बण्योड़ो मिनख मारग में सामै आयो अर जियां लारलै कवि कैई बियां ई राजां नै बात कैयी पण टेम बदळग्यो हो, लारली उपमावां रा अरथ बदळग्या। राजा नै रीस आई अर राजा उण धिंगाणियै कवि नैं मारग पर चित्त न्हाख’र हाथी रो पांव उणरी छाती पर टिका दियो, जिणसूं बो मरग्यो। ओ है बातां हाथी पाय। सागो देख’र सासरो करणियां रा घर बस्योड़ा देख्या कोनी। बै तो इयां ई बारां घालता टेम बितावै। इणरो कारण ओ है कै भासा री विविधता अर क्षेत्र रै प्रभाव सूं कई बार सबदां में मोकळो फरक निगै आवै, इण वास्तै पराई जाग्यां जावां तो आपणां स्थानीय सबदां नैं सावळ सोच समझ’र बोलणां चाईजै। 

आपणै अठै सामान्य रूप सूं बोलीजण वाळो कोई सबद किणी क्षेत्र विशेष का जात-समाज विशेष मांय असंसदीय हो सकै। जियां राजस्थानी सामान्य लोकजीवण मांय मारण, पीटण, डरावण सारू आम सबद है - ठौकणो। लोगां रै घरै, परिवार में, लुगायां-पतायां तकात टाबरां नैं डांटै फटकारै तो ई बोलै कै ‘ठोकूंली, ठोकूंला’। टाबर ओळमो देवै तो बो ई आ ई कैवै कै म्हनैं फलांणै छोरै ठोक्यो। पण ओ ई ‘ठोकणो’ पिछमियै राजस्थान में अर खासकर राजपूत अर चारण समाज में असंसदीय अर अश्लील सबद मानीजै। आं रै घरां मांय इण सबद रो कदै ई सार्वजनिक उच्चारण नीं करीजै। इण वास्तै देस, काळ अर परिस्थितियां नैं देख’र ई बोलणो अर सबदां रो चयन करणो जरूरी है। इण बात री साख रो अेक दूहो देखो-

बात-बात रो आंतरो, बात-बात रो फरक्क।
थे तो कैवो फरिस्तो, (अर) म्है कैवां हां जरक्ख।। 

अबै बताओ फरिस्तै अर जरख नै अेक बताओ जणां खीर तो कुण जिमावै पछै तो डांगां ई बाजै। अेकर री बात है अेक गांव में गुवाड़ री हथाई चालतां बात चाली कै ठाकरां रै बेटै री बहू फलाणै आदमी रै झोळ्यां घाल्योड़ी है। झोळ्यां घालणै नै बीकानेरवाटी में खोळ्यां घालणो कहीजै। बारै सूं आयोड़ै अेक आदमी पूछ्यो कै थांरै ओ खोळ्यां घालणो कांई हुवै। हथाई में अेक बाताळ बैठ्यो हो, जाणै तो बो ई कोनी हो पण बोलणो जरूरी हो इण वास्तै बोलग्यो कै ‘थांरै तो नातो कैवै अर म्हांरै खोळो कैवै’। अबै बताओ खोळ्यां घालणो अर नातै भेजणो अेक कियां है। हाथोहाथ ई बाताळ रै जूतां री जुंवारी हुगी। बात अेकर गुडै उतरगी तो उतरगी पछै सागण चीलां ल्यांणी बेजां दौरो काम है। बात बीगड़्यां पछै सिवाय पिछतावण रै कीं नीं बचै। जणां ई तो कैवै बातां रा टक्का लागै। बात नीं बात री मरोड़ देखणी चाईजै। उचित अवसर हुवै तो फीकी बात ई नीको फळ देज्यावै अर जे अवसर ठीक नीं हुवै तो नीकी बात भी फीको फळ देवै। 

बातां नै छमकणी तो सौरी है पण पार घालणी बेजां दौरी हुवै। बातां में मजाक मसखरी साग में लूण जियां सुवाद अर रस रो काम करै पण कई बार मसखरी महंगी पड़ ज्यावै। अेकर अेक सरप समदर में पड़ग्यो। पाणी में दौरो-सौरो तिरतो किनारै पूगण री आफळ करै। उण बगत अेक मेंढकियो सरप रै आजू-बाजू उछळतो सरप सूं मसखरी करतो बोल्यो ‘सुण रे सरप! म्हनैं हथाई रो घणो कोड है, थोड़ी देर हथाई करां’। सरप नैं ठा पड़्ग्यो कै मेंढकियो उणरा मजा लेवै। वो जाणै हो कै अबार रीस कर्यां भी कीं कोनी हुवै क्योंकै पाणी में मेंढकियो ताबै आवै कोनी। बीं आपरी रीस नैं संभाळ’र मेंढकै नैं उत्तर दियो-

आवै न कोई ऊपजै, सरवर मज्झ थयांह।
बातां करस्यां डेडरा, तिरनै तीर गयांह।।

सरप बोल्यो डेडरा भाई अबार ई समदर रै बिचाळै तो म्हनैं कोई बात ऊकलै ई कोनी। तिर’र किनारै पूग्यां पछै आपां हथाई करस्यां। सरप होळै सी संकेत कर दियो कै जे किनारै रै सारै आयग्यो जणां स तो थारी जड़ में आक दे देस्यूं, थूं ई याद राखसी कै कोई नै बिनां बात तंग कियां कर्या करै। डेडरियै जाण बूझतै पंगो ले लियो। जियो जितरै ई समदर रै किनारै आवण में डरतो ई रैयो हुवैला। इण वास्तै ई कईजै कै बाताळ (वाचाल) रो घर पाताळ में जावै। 

घणो बोलणो, बिना सोच्यां-समझ्यां बोलणो, बिना मतलब बोलणो, बिन बतळायां बोलणो ज्यादातर फोड़ा ई घालै। जरूरी हुवै बठै बोलणो ई चाईजै। साच नै साच कैवण री हूंस अर हिम्मत राखणी चाईजै। चौराई लाख जूणियां मांय भटक्यां पाछै आ मिनखा जूण मिली है। मिनख री जीभ तो जगदीस अर जगदम्बा रा जसगान करण सारू है। भगवान रो नाम जपण सारू जीभ मिली है। इणसूं निकळण वाळो अेक अेक आखर अणमोल हुवै इण वास्तै तोल्यां बिनां नीं बोलणो चाईजै। आगली च्यार ओळियां साथै इण चर्चा नै इण आसा अर विस्वास रै साथै विराम देवां कै नयी पीढी आपरी जुबान नै सावळसर बरतण री हूंस लेवैली- 

लाख असी-चव जोनिय मांझल, जानिय मानव श्रेष्ठ जमारो। 
धीर विवेक तुला पर तोल, अमोल, सतोल, सुबोल उचारो।
तारन या भवसागर सौं गजराज न दीखत और सहारो।
बार हि बार उचार अलौकिक अंब सुनाम उबारन वारो।। 
✍️डॉ. गजादान चारण ‘‘शक्तिसुत’'

वयं राष्ट्रे जागृयाम 

होरा चक्र ( डी २ चार्ट )

कुंडली में छिपे धन का रहस्य: क्या कहता है आपका होरा (D2) चक्र?

नमस्कार दर्शकों! 'ज्योतिष: जीवन ज्योति जागृति' के इस विशेष लेख में आपका स्वागत है।
अक्सर हम सभी के मन में यह प्रश्न उठता है कि हमारे भाग्य में कितनी वित्तीय स्थिरता लिखी है? क्या हम अपने प्रयासों से एक मजबूत आर्थिक स्तर तक पहुँचेंगे, या जीवन भर संघर्ष बना रहेगा? जब भी धन की बात आती है, तो ज्यादातर लोग अपनी जन्म कुंडली (D1 या लग्न चक्र) का केवल दूसरा भाव देखते हैं। लेकिन वैदिक ज्योतिष में धन के सही प्रवाह और उसके आगमन का सबसे सटीक विश्लेषण 'होरा चक्र' यानी D2 चार्ट से होता है।

आइए, ज्योतिषीय गहराई में उतरते हैं और समझते हैं कि आपका D2 चार्ट आपकी आर्थिक नियति (Financial Destiny) के बारे में क्या अद्भुत रहस्य खोलता है।

D2 (होरा) चार्ट आखिर है क्या?
होरा चार्ट आपकी मुख्य कुंडली के दूसरे भाव का एक सूक्ष्म और विस्तृत रूप है। यह केवल आपके बैंक बैलेंस या तिजोरी के धन को नहीं दर्शाता, बल्कि यह आपके पारिवारिक संस्कारों, आपकी प्रारंभिक शिक्षा और यहां तक कि आपके खान-पान की आदतों (Food habits) का भी आईना है। होरा कुंडली का लग्न और लग्नेश जातक की वास्तविक आर्थिक स्थिति और वित्तीय क्षमता के मुख्य सूचक होते हैं। आप इस जीवन में कितनी संपत्ति और संसाधन अर्जित करने की क्षमता रखते हैं, इसका स्पष्ट चित्र D2 चार्ट ही देता है।

D2 चार्ट का एक विशेष रूप: 'लाभ मंडूक होरा' कैसे बनाते हैं?
ज्योतिष में D2 चार्ट के कई प्रकार होते हैं, लेकिन धनागम (पैसा आने के रास्ते) को समझने के लिए 'लाभ मंडूक होरा' का महत्व सबसे ज्यादा है। इसका नाम 'मंडूक' (मेंढक) इसलिए है क्योंकि इसमें ग्रह एक विशेष छलांग (Jump) लगाते हैं। इसे बनाना बहुत सरल है:
पहला चरण (0° से 15° तक): अगर कोई ग्रह अपनी राशि में 0 से 15 डिग्री के बीच है, तो वह लाभ मंडूक होरा में उसी राशि में रहेगा जिसमें वह आपकी लग्न (D1) कुंडली में है। इसे 'स्व-होरा' या स्थिरता का संकेत माना जाता है।

दूसरा चरण (15° से 30° तक): अगर ग्रह 15 डिग्री से ऊपर है, तो वह अपनी राशि से 11 घर आगे (लाभ स्थान) छलांग लगा जाता है। चूंकि 11वां घर 'लाभ' (Gains) का होता है, इसीलिए इसे 'लाभ मंडूक' कहते हैं।

उदाहरण: मान लीजिए आपकी लग्न कुंडली (जैसे कुंभ लग्न) में कोई ग्रह 20 डिग्री पर बैठा है। चूंकि यह 15 डिग्री से ज्यादा है, तो लाभ मंडूक होरा में वह ग्रह अपनी वर्तमान स्थिति से 11 घर आगे चला जाएगा। इसका सीधा अर्थ है कि उस ग्रह से जुड़े कार्य सीधे तौर पर आपके बड़े लाभ एकादश भाव में बदल जाएंगे।

धन के चार प्रमुख स्तंभ: 2, 5, 8 और 11 भाव
लाभ मंडूक होरा के सिद्धांत के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के D2 चार्ट में 2, 5, 8, और 11 भाव मजबूत हों और वहां शुभ या कारक ग्रह बैठे हों, तो वह व्यक्ति एक अत्यंत सुदृढ़ आर्थिक स्थिति, बेहतरीन वित्तीय स्थिरता और पर्याप्त समृद्धि का स्वामी बनता है:

द्वितीय भाव (2nd House): यह आपका 'संचित धन' है। वह पैसा, सोना, या संपत्तियां जो आपने समय के साथ धीरे-धीरे जोड़कर रखी हैं।

पंचम भाव (5th House): यह 'बड़े निवेश' (Big Money) का भाव है। शेयर मार्केट, बड़े निवेशों से मिलने वाला भारी मुनाफा या अपनी बुद्धि के बल पर अचानक से मिलने वाला बड़ा पैसा इसी भाव से देखा जाता है।

अष्टम भाव (8th House): यह वह धन है जिसके लिए आपने सीधी शारीरिक मेहनत नहीं की। जैसे- पैतृक संपत्ति (Inheritance), बीमा का पैसा, या ससुराल पक्ष से मिलने वाला लाभ।

एकादश भाव (11th House): यह आपकी इच्छा पूर्ति और 'नियमित आय' का भाव है। होरा कुंडली का 11वां भाव विशेष रूप से यह इंगित करता है कि आपकी कमाई का मुख्य जरिया या स्रोत (Source of Earning) क्या होगा।

विशेष सूत्र: यदि आपके D2 चार्ट में ये चारों भाव (2, 5, 8, 11) पूरी तरह खाली हैं, तो जीवन में धनार्जन के लिए काफी कड़ा संघर्ष करना पड़ सकता है।
लाभ मंडूक होरा के ८ अचूक और गुप्त नियम
होरा चार्ट को और अधिक सूक्ष्मता से डिकोड करने के लिए हमें इसके कुछ विशेष और प्रामाणिक नियमों को समझना होगा:

१. राहु-केतु का वित्तीय झटका (Sudden Loss)
यदि होरा कुंडली के लग्न (Hora Lagna), दूसरे भाव (2nd House) या ग्यारहवें भाव (11th House) में राहु-केतु का अक्ष (Axis) बन रहा हो, तो जातक को जीवन में अचानक बड़े आर्थिक नुकसान या 'सडन लॉस' का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों को जोखिम भरे सट्टेबाजी वाले कामों से बचना चाहिए।

२. प्रॉपर्टी से कमाई का योग
यदि होरा कुंडली में चौथे भाव का स्वामी (4th Lord) उठकर दूसरे या ग्यारहवें भाव में बैठ जाए, तो यह एक बेहतरीन योग है। ऐसा जातक भूमि, मकान, रियल एस्टेट या पुरानी संपत्तियों की खरीद-बिक्री के माध्यम से धन कमाता है।

३. खुद के दम पर संपत्ति का निर्माण (Own Efforts)
यदि होरा कुंडली का तीसरे भाव का स्वामी (3rd Lord) चौथे भाव में जाकर बैठ जाए, तो ऐसा जातक अपने पराक्रम, कड़ी मेहनत और खुद के प्रयासों (Own Efforts) के दम पर अपनी अचल संपत्ति (Properties) खड़ी करता है।

४. बाजार की पूंजी से व्यापार में लाभ
एक बहुत ही अद्भुत नियम यह है कि यदि छठे भाव का स्वामी (6th Lord) आपकी लग्न कुंडली (D1) या होरा कुंडली के ग्यारहवें भाव (11th House) में स्थित हो, तो ऐसा जातक यदि बाजार से कर्ज (Loan या Market Capital) लेकर अपना काम या बिजनेस शुरू करे, तो वह उसके लिए अत्यधिक फायदेमंद (Advantageous) साबित होता है।

५. ११वें भाव के स्वामी का १२वें भाव में खेल (Accumulation vs Struggle)
होरा कुंडली का ग्यारहवें भाव का स्वामी (11th Lord) यदि १२वें भाव (व्यय स्थान) में जाता है, तो इसके दो बिल्कुल अलग परिणाम होते हैं:
मित्र राशि में होना: यदि ११वें का स्वामी १२वें भाव में किसी मित्र राशि में बैठा हो, तो जातक की एक विशेष आदत होती है—वह खर्च करने से पहले धन का बड़ा संचय (First accumulate money then spend) करता है।

शत्रु राशि में होना: इसके विपरीत, यदि ११वें का स्वामी १२वें भाव में किसी शत्रु राशि में बैठ जाए, तो यह स्थिति आय के स्रोतों (Source of Earning) के लिए बहुत अच्छी नहीं मानी जाती और धन कमाने में निरंतर रुकावटें आती हैं।

शनि और राहु: धन के मामले में इनका मायाजाल
धन के मामले में ग्रहों का अपना अलग ही खेल होता है, विशेषकर वक्री और मंदगामी ग्रहों का:

शनि की धीमी लेकिन पक्की चाल: अक्सर लोग शनि के नाम से घबराते हैं, लेकिन D2 चार्ट में अगर शनि मजबूत हो तो वह स्थायी संपत्ति दे सकता है। शनि की बस एक शर्त है—वह बिना कड़ी मेहनत के कुछ नहीं देता। यह धीरे-धीरे और स्थिरता के साथ देता है, लेकिन जो देता है वह लंबे समय तक टिकता है।

राहु का छलावा: यदि D2 चार्ट के दूसरे या आठवें भाव में राहु बैठा हो, तो यह अचानक धन आने का भ्रम और उठापटक जरूर पैदा करता है। राहु का धन जितनी तेजी से आता है, उतनी ही तेजी से वाष्प (Evaporate) भी हो सकता है। पैतृक संपत्ति के मामले में राहु अक्सर व्यक्ति को धोखे या विवाद का शिकार भी बना देता है।

क्या आप सच में अपने धन का सुख भोग पाएंगे?
एक बहुत ही कड़वा सच यह है कि "धन होना" और "उस धन का सुख भोगना" दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं।
यदि आपके D2 चार्ट का चतुर्थ भाव (4th House) पाप ग्रहों से पीड़ित है, तो आपके पास पर्याप्त धन होने के बावजूद आप उस पैसे का आनंद अपने ऊपर या अपनी मानसिक शांति पर नहीं ले पाएंगे। या तो वह सारा पैसा परिवार की समस्याओं को सुलझाने में खर्च हो जाएगा, या आप धन कमाने की दौड़ में इतने उलझ जाएंगे कि जीवन के सुखों को जीने का समय ही नहीं बचेगा।

निष्कर्ष:
केवल लग्न कुंडली देखकर अपने आर्थिक भविष्य को लेकर निराश या अति-उत्साहित न हों। आपके कर्मों का असली आर्थिक फल आपके होरा (D2) चार्ट में छिपा है। जब ग्रह 'लाभ स्थान' और सही नियमों का संबंध बनाते हैं, तभी जीवन में वास्तविक आर्थिक वृद्धि और स्थायित्व देखने को मिलता है।

🙏 हर हर महादेव! अगर यह ज्योतिषीय जानकारी आपको ज्ञानवर्धक लगी हो, तो इसे अपने मित्रों और परिवार के साथ अवश्य साझा करें। अपनी कुंडली से जुड़े किसी भी प्रश्न या विश्लेषण के लिए 'ज्योतिष: जीवन ज्योति जागृति' के साथ जुड़े रहें।

Sunday, 14 June 2026

सम्मान पाने की इच्छा बड़ी स्वाभाविक है। लेकिन सम्मान की इच्छा कब, कैसे और किससे हो यह जानना आवश्यक और उपयोगी है ।

मैं भी चुनाव आयोग का एक कर्मचारी था 2005 में। सतना में ग्राम पंचायत चुनाव हो रहे थे। चुनाव से एक दिन पहले हम सभी कर्मचारी मतपत्र गिन कर गड्डियां लगा रहे थे कि तभी पूरे क्षेत्र की चुनाव व्यवस्था को संभालने वाले अधिकारी पहुंच गए। शायद जनपद सीईओ थे। 

मेरे सीनियर अधिकारी कोई 55 वर्ष के रहे होंगे। हेडमास्टर थे शायद। हड़बड़ाकर खड़े हो गए और अधिकारी महोदय को नमस्ते ठोंका। नमस्ते में सम्मान कम भय ज्यादा था। मैं बैठे-बैठे गिनती का कार्य करता रहा। सीईओ साहब को मेरा खड़े होकर नमस्ते ना करना नागवार गुजरा। 

बोले "क्या तुम्हें इतनी भी तमीज नहीं है कि अपने सीनियर अधिकारी का खड़े होकर सम्मान करो?"

मैंने बैठे-बैठे ही जवाब दिया, "क्या मेरे सीनियर अधिकारी को इतनी भी तमीज नहीं है कि रात आठ बजे वे तन्मयता से अपने कर्तव्य का पालन करने वाले कर्मचारी की तारीफ करने के बजाय उससे खड़े होने की अपेक्षा कर रहे हैं?"

सीईओ साहब अब आग बबूला होते हुए मुझे मेरी औकात दिखाते हुए बोले, "होगे कोई शिक्षाकर्मी!" 

मैं मतपत्रों की गिनती भूल चुका था। सो खड़ा हो गया और उनकी आंखों में आंखें डालकर कहा, "जी हां, संविदा शिक्षक हूं। नियमित शिक्षकों की नियुक्तियां पिछले कुछ सालों से नहीं निकली है। यदि निकलतीं तो मैं भी नियमित कर्मचारी होता।"

अब तो साहब लाजवाब होते हुए बोले, "ज्यादा बात न करो, तुम्हारी उम्र के मेरे दो लड़के हैं।" 

साहब ऊंचे थे। मैं ठिंगना था। साहब सर झुकाए हुए सुन रहे थे जब मैंने सर उठाकर कहा, "यह तो कोई योग्यता ना हुई सर। यदि मेरी उम्र आपके बराबर होती तो दो क्या, मैं चार बच्चे पैदा कर देता।"

साहब तमतमाते हुए चले गए। 

इस घटना का उल्लेख मैंने अपने मित्रों, रिश्तेदारों से कुछ एक बार किया। बड़े अभिमान और आत्मश्लाघा के साथ। 

पर अब मैं खुद भी जब एक अधिकारी/महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में दूसरे संस्थानों में जाता हूं, तो एक दुबकी, अलसाई, उनींदी सी इच्छा होती है सम्मान की। लेकिन यदि वे अपने कार्य में तन्मय है तो सम्मान पाने की इस उनींदी सी इच्छा को मैं सुला देता हूं फिर दोबारा कभी किसी अवसर पर अर्धचेतन होने के लिए।

सम्मान पाने की इच्छा बड़ी स्वाभाविक है। लेकिन सम्मान की इच्छा कब, कैसे और किससे हो यह जानना आवश्यक और उपयोगी है। 

सामान्यतः व्यक्ति परिचित लोगों से ही सम्मान की इच्छा करता है। परिचित लोगों से सम्मान मिलने से खुशी होती है। अपरिचित लोगों से सम्मान मिलने में अत्यंत खुशी होती है। अपने से छोटों से सम्मान प्राप्त करने में अच्छा लगता है। अपने से बड़े और प्रतिभाशाली लोगों से सम्मान प्राप्त करने में बहुत अच्छा लगता है। स्वार्थ सिद्धि हेतु किया गया सम्मान दिल को खटकता है। निःस्वार्थ भाव से किया गया सम्मान हृदय को स्पर्श करता है। 

यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि सम्मान किसका किया जा रहा है। एक अधिकारी बहुत खुश हो सकतीं है क्योंकि बहुत से लोग उनका सम्मान करते हैं। उन्हें यह समझना चाहिए कि यह सम्मान कदाचित उनके पद का हो, न कि उनके व्यक्तित्व का। इसलिए अक्सर ऐसा होता है की पद जाने के बाद सम्मान भी चला जाता है। जिन्होंने विचार, कर्म, और वाणी के माध्यम से सचमुच पद में रहते हुए अच्छा कार्य किया है, पद छूटने के बाद भी उनका सम्मान बना रहता है।

जब कोई अच्छा कार्य करें तो उसकी सम्मान प्राप्त करने की इच्छा स्वाभाविक है, मानवीय है। अच्छा कार्य करने के उपरांत भी सम्मान की इच्छा ना होना दैवीय है। बिना योग्यता अर्जित किए सम्मान की इच्छा एक विकार है, राक्षसी प्रवृत्ति है।

सम्मान करना और सम्मान की अभिव्यक्ति करना दोनों अलग-अलग हो सकते हैं। हो सकता है कि किसी व्यक्ति के प्रति आप सम्मान का भाव रखते हैं लेकिन आप अभिवादन या अन्य तरह से इसे अभिव्यक्त नहीं करते तो मैं समझता हूं यह सम्मान करना नहीं हुआ। इसे मैं कृपण प्रवृत्ति कहूंगा। 

उम्र के उस दौर में इसी कृपणतावश मैं सीईओ साहब का सम्मान करने में विफल रहा। उस पूरे घटनाक्रम को इस तरह भी देखा जा सकता था "मेरे वरिष्ठ अधिकारी कितने कर्तव्यनिष्ठ हैं कि रात आठ बजे हमारा कुशलक्षेम और व्यवस्था देखने के लिए स्वयं यहां आए हैं। चलूं, मैं खड़े होकर इनका सम्मान करूं।" 

कुछ सालों बाद मुझे ऐसा एहसास हो गया था। और तब से मैं अपरिचित लोगों से जी नमस्ते और राम-राम करने लगा हूं। और नमस्ते का अर्थ - मेरे भीतर का ईश्वर तुम्हारे भीतर थे ईश्वर को प्रणाम करता है - भी पता चल गया इसी दौरान।

लेख लिखते लिखते सम्मान की मूर्छित इच्छा फिर चेत आई है। इसलिए इसे प्रकाशन हेतु अपने मित्र को भेज रहा हूं।
-✍️प्रहलाद पाण्डेय
वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Friday, 12 June 2026

"कभी-कभी सबसे बड़ा त्याग सच बोलना नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी बचाने के लिए चुप रहना होता है।"

"जब पूरे गाँव ने बूढ़ी औरत को चोर कहा, तब उसने कुछ नहीं कहा... लेकिन मरने से एक दिन पहले पंचायत के बीच एक पुराना बक्सा रख दिया, और कहा— 'अब फैसला तुम करो।'"
बरसों पुरानी बात है।
मध्य प्रदेश के एक छोटे से गाँव में 72 साल की गोमती बाई रहती थीं।
पति का देहांत हुए पंद्रह साल हो चुके थे। एक बेटा था—रमेश। वही उनका सहारा था।
रमेश शहर में मजदूरी करता था और महीने में एक-दो बार घर आ जाता था।
गोमती बाई पूरे गाँव में अपनी ईमानदारी के लिए जानी जाती थीं।
लेकिन एक दिन ऐसा हुआ कि उनकी पूरी जिंदगी पर दाग लग गया।
गाँव के सबसे अमीर आदमी धर्मपाल चौधरी के घर से पाँच लाख रुपये और कुछ सोने के गहने गायब हो गए।
पूरा गाँव हैरान था।
चोरी किसने की?
कई दिन तक खोजबीन हुई।
फिर किसी ने बताया कि चोरी वाली रात गोमती बाई चौधरी के घर के पास दिखाई दी थीं।
बस...
इतनी सी बात ने आग में घी डाल दिया।
लोग फुसफुसाने लगे।
"गरीबी ने आखिर ईमानदारी हरा दी।"
"बुढ़ापे में लालच आ गया होगा।"
"कौन सोच सकता था कि गोमती ऐसा करेंगी?"
पंचायत बैठी।
सबके सामने गोमती बाई को बुलाया गया।
धर्मपाल चौधरी गरजकर बोले—
"सच-सच बता दो। पैसा कहाँ छिपाया है?"
गोमती बाई चुप रहीं।
सरपंच ने पूछा—
"तुम उस रात वहाँ थीं?"
गोमती बाई ने धीरे से कहा—
"हाँ।"
बस...
यही सुनते ही पूरा गाँव उनके खिलाफ हो गया।
"देखा! खुद मान रही है।"
"चोर है।"
"पुलिस को सौंप दो।"
लेकिन गोमती बाई ने न चोरी मानी, न सफाई दी।
सिर्फ इतना बोलीं—
"जिस दिन समय आएगा, सच खुद सामने आ जाएगा।"
लोगों ने इसे अपराधी की चाल समझा।
उस दिन के बाद उनका जीना मुश्किल हो गया।
कुएँ पर औरतें बात करना बंद कर देतीं।
बच्चे उन्हें देखकर "चोर दादी" कहकर भाग जाते।
दुकानदार उधार देना तो दूर, ठीक से बात तक नहीं करते।
सबसे ज्यादा दर्द उन्हें तब हुआ जब उनका अपना बेटा रमेश भी उनसे नाराज़ हो गया।
"अम्मा, अगर आपने कुछ किया है तो मुझे बता दो। मैं किसी तरह मामला संभाल लूँगा।"
गोमती बाई की आँखें भर आईं।
"बेटा, अगर तेरी माँ चोर होती तो तुझे ईमानदारी सिखाने का हक नहीं रखती।"
रमेश चुप हो गया, लेकिन उसके मन का शक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
समय गुजरता गया।
दो साल बीत गए।
गोमती बाई अकेली पड़ गईं।
फिर एक दिन अचानक उनकी तबीयत बहुत खराब हो गई।
डॉक्टर ने कहा—
"शायद ज्यादा समय नहीं है।"
यह खबर पूरे गाँव में फैल गई।
मरने से एक दिन पहले गोमती बाई ने सरपंच को बुलाया।
कहा—
"कल पूरे गाँव को बुला लेना। मुझे सबके सामने एक बात कहनी है।"
अगले दिन पंचायत चौपाल पर लगी।
पूरा गाँव जमा था।
बीच में गोमती बाई चारपाई पर लेटी थीं।
उनके पास एक पुराना लोहे का बक्सा रखा था।
धर्मपाल चौधरी भी आए हुए थे।
गोमती बाई ने काँपते हाथों से बक्से की चाबी सरपंच को दी।
"इसे सबके सामने खोलिए।"
बक्सा खुला।
अंदर पुराने कागज, कुछ तस्वीरें और एक कपड़े की पोटली थी।
पोटली खुली।
उसमें वही गहने थे जो दो साल पहले चोरी हुए थे।
पूरा गाँव सन्न रह गया।
धर्मपाल चौधरी उछल पड़े।
"देखा! मैं कहता था ना, चोरी इसी ने की थी!"
भीड़ में शोर मच गया।
लेकिन तभी गोमती बाई बोलीं—
"अभी सब कुछ नहीं देखा तुम लोगों ने।"
उन्होंने एक पुरानी डायरी निकलवाई।
डायरी के बीच में एक पत्र रखा था।
"इसे जोर से पढ़ो।"
सरपंच ने पढ़ना शुरू किया।
पत्र धर्मपाल चौधरी के छोटे बेटे महेन्द्र का था।
जो दो साल पहले घर छोड़कर कहीं चला गया था।
पत्र पढ़ते-पढ़ते सरपंच की आवाज काँपने लगी।
पत्र में लिखा था—
"पिताजी, मैं आपके गहने और पैसे लेकर जा रहा हूँ। मैंने जुए में बहुत कर्ज कर लिया है। अगर सच सामने आया तो आपकी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी।"
"गोमती काकी ने मुझे चोरी करते देख लिया था। उन्होंने मुझे पकड़ लिया। मैं उनके पैरों में गिर पड़ा। मैंने कहा अगर आप मुझे पुलिस के हवाले कर देंगी तो पिताजी सदमे से मर जाएँगे।"
"उन्होंने मुझे जाने दिया, लेकिन गहने और बाकी सामान अपने पास रख लिया ताकि एक दिन सच सामने ला सकें।"
"उन्होंने कहा— जब तक मैं खुद लौटकर अपने अपराध को स्वीकार न करूँ, तब तक वे किसी से कुछ नहीं कहेंगी।"
पूरा चौपाल सन्नाटे में डूब गया।
धर्मपाल चौधरी का चेहरा पीला पड़ गया।
गोमती बाई ने धीमे स्वर में कहा—
"उस रात मैंने चोरी नहीं की थी... मैंने एक बाप को टूटने से बचाया था।"
सबकी आँखें झुक गईं।
"अगर मैं सच बता देती, तो तुम्हारा बेटा जेल जाता। तुम शायद सदमे से मर जाते। मैंने सोचा था वह लौट आएगा और अपनी गलती मान लेगा।"
"लेकिन वह कभी नहीं लौटा।"
धर्मपाल चौधरी रो पड़े।
"गोमती... मैंने तुझे चोर कहा... पूरे गाँव के सामने अपमानित किया..."
गोमती बाई मुस्कुराईं।
"दर्द तो हुआ था चौधरी... बहुत हुआ था। लेकिन किसी की जिंदगी बचाने की कीमत अगर बदनामी थी... तो मुझे मंजूर थी।"
भीड़ में कई लोग रो रहे थे।
रमेश अपनी माँ के पैरों में गिर पड़ा।
"अम्मा... मैं भी आप पर शक करता रहा..."
गोमती बाई ने उसके सिर पर हाथ रखा।
"बेटा, दुनिया का सबसे भारी बोझ गलत इल्जाम नहीं होता... अपने लोगों का अविश्वास होता है।"
उस शाम पूरा गाँव रो रहा था।
और उसी रात...
गोमती बाई हमेशा के लिए दुनिया छोड़ गईं।
अगले दिन उनकी अंतिम यात्रा में पूरा गाँव शामिल हुआ।
धर्मपाल चौधरी नंगे पैर सबसे आगे चल रहे थे।
श्मशान पहुँचकर उन्होंने सबके सामने कहा—
"आज हमने एक औरत नहीं खोई... हमने इंसानियत की सबसे बड़ी मिसाल खो दी।"
कुछ महीनों बाद गाँव के चौक में गोमती बाई की एक छोटी सी प्रतिमा लगाई गई।
उसके नीचे सिर्फ एक पंक्ति लिखी गई—
"कभी-कभी सबसे बड़ा त्याग सच बोलना नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी बचाने के लिए चुप रहना होता है।"
और जब भी गाँव में किसी पर बिना सबूत आरोप लगाने की बात होती, लोग उस प्रतिमा की तरफ देखकर चुप हो जाते।
क्योंकि उन्हें याद आ जाता था कि एक बार उन्होंने एक देवी को चोर समझ लिया था। ❤️

Vandna Tripathi ✍️

Thursday, 11 June 2026

अजीत डोभाल (Ajit Doval) भारतीय सुरक्षा तंत्र का वह अभेद्य दुर्ग हैं।

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) और देश के सबसे सम्मानित 'जासूस' (Spymaster) माने जाने वाले अजीत डोभाल (Ajit Doval) भारतीय सुरक्षा तंत्र का वह अभेद्य दुर्ग हैं, जिनके नाम मात्र से ही सीमा पार हलचल मच जाती है। 1968 बैच (केरल कैडर) के पूर्व आईपीएस अधिकारी डोभाल जी ने अपनी बुद्धिमत्ता और रणनीतिक कौशल से भारत की सुरक्षा नीति को एक नई और आक्रामक दिशा दी है।
अजीत डोभाल जी का करियर साहस, गुप्त अभियानों (Covert Operations) और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा की एक ऐसी गाथा है, जो आने वाली कई पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

प्रमुख गौरवपूर्ण उपलब्धियाँ और योगदान:
 * कीर्ति चक्र विजेता: वे भारत के पहले ऐसे पुलिस अधिकारी हैं, जिन्हें सैन्य सम्मान 'कीर्ति चक्र' से नवाजा गया। यह सम्मान उन्हें उनकी अदम्य वीरता और शांति काल में किए गए असाधारण कार्यों के लिए दिया गया।
 * पाकिस्तान में 'अंडरकवर' (Undercover) मिशन: उनके करियर की सबसे चर्चित कहानियों में से एक यह है कि उन्होंने लगभग 7 वर्षों तक पाकिस्तान में एक मुस्लिम बनकर 'अंडरकवर' रहकर महत्वपूर्ण खुफिया जानकारियां जुटाईं। उनकी यह पहचान इतनी पुख्ता थी कि कोई उन्हें पहचान नहीं पाया।
 * ऑपरेशन ब्लू स्टार और स्वर्ण मंदिर: स्वर्ण मंदिर के भीतर छिपे आतंकवादियों की जानकारी जुटाने के लिए वे एक रिक्शा चालक बनकर अंदर गए और आतंकियों के बीच घुल-मिल गए। उनकी सटीक जानकारी ने सेना के अभियान को सफल बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।
 * मिजोरम और उग्रवाद का खात्मा: उन्होंने मिजो नेशनल फ्रंट के विद्रोह को शांत करने में अहम भूमिका निभाई। वे खुद उग्रवादियों के कैंप में गए और उनके नेताओं को मुख्यधारा में शामिल होने के लिए राजी किया।
 * 'डोभाल डॉक्ट्रिन' (Doval Doctrine): एनएसए के रूप में उन्होंने 'रक्षात्मक-आक्रामक' (Defensive-Offensive) नीति अपनाई। सर्जिकल स्ट्राइक (2016) और बालाकोट एयरस्ट्राइक (2019) उनकी इसी रणनीति का हिस्सा थे, जिसने दुनिया को भारत की नई ताकत का अहसास कराया।
"राष्ट्र की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता। शांति केवल बातों से नहीं, बल्कि अपनी शक्ति के प्रदर्शन और सुरक्षा की तैयारी से आती है।" — अजीत डोभाल जी का यह दर्शन 'नए भारत' की सुरक्षा नीति का आधार है।

संक्षिप्त आंकड़े (Quick Glance):
 * पहचान: 1968 बैच के आईपीएस अधिकारी, वर्तमान एनएसए (भारत)।
 * विशेषता: खुफिया रणनीति (Intelligence), काउंटर-टेररिज्म, कूटनीति, निडरता।
 * योगदान: आईबी प्रमुख (पूर्व), सर्जिकल स्ट्राइक की योजना, कश्मीर में शांति व्यवस्था, सीमा सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण।
 * विरासत: एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में जिन्होंने भारत की 'इंटेलिजेंस' (Intelligence) को दुनिया के सामने एक ताकतवर हथियार बनाया।
अजीत डोभाल जी का व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण है कि एक अकेला व्यक्ति अपनी बुद्धि और साहस से पूरे देश की किस्मत और सुरक्षा की दिशा बदल सकता है। वे भारत माता के वे रक्षक हैं, जो खामोशी से अपना काम करते हैं। उन्हें हमारा कोटि-कोटि नमन! 🙏

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Wednesday, 10 June 2026

चिकित्सा ज्योतिष एक अनूठा विषय

सबसे धनी वही है जो स्वस्थ हैं 
चिकित्सा ज्योतिष बहुत अनूठा विषय है ,इसमें ग्रहों की स्तिथि उनके आपसी सम्बन्ध से शरीर में जो ऊर्जा , वात पित्त और कफ जो प्रभावित होते है उसके कारण ही रोगों की उत्पति होती है । आम तौर पर आपको रोग हुआ आपको डॉक्टर बताएंगे आप ब्लड टेस्ट कराओ, आप xray कराओ , MRI कराओ फिर वह निष्कर्ष में पहुंचेगा कि रोग कौनसा है और क्यों आया । डॉक्टर जहां रोग का कारण आनुवंशिक ,स्वयं की लापरवाही , आदि कारण बताता है, वहीं ज्योतिष में हम इसको मानते है पूर्व जन्म के कारण हेतु। आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथों में आपको श्लोक मिल जाएंगे कि पूर्व जन्म के कर्मों के कारण ही रोग आते हैं।इसका एक दिलचस्प उदाहरण देता हूं , एक जातक ने हमसे प्रश्न किया कि हमारे परिवार में हर बच्चा बहुत देर से बोलता है , या तुतला के बोलता है,जुबान लगती है ,क्या आप बता सकते हैं ऐसा किस कर्म के कारण होगा । मैने पूर्व जन्म पत्रिका बनवाई ,उसमें पक्षी कष्ट आया। अर्थात याद रखें आपको जो भी स्वास्थ दिक्कत होगी वह पूर्व जन्म में किसी को देह कष्ट,हत्या ,जीव जंतु कष्ट, पेड़ो को काटने आदि के कारण आती है । उस पत्रिका में शनि सभी बच्चों की जुबान देर से खोल रहा था ,और वही पूर्व जन्म का कारक ग्रह बन रहा था । जातक ने बताया हमारे परिवार के एक वृद्ध ने कौवे को मारा था तथा उसकी जीभ काट दी थी , बाद में एक पीढ़ी बाद इसके कारण सभी के बच्चे ऐसे निकल रहे थे जिनकी जुबान ओर मुंह संबंधी कष्ट था।।
रोग पैदा होते है ग्रह की कमजोरी ओर क्रूर प्रभाव में आने से,
जैसे बाधक ग्रह रोग दे सकता है, 22वे ,64वे नवांश का स्वामी रोग दे सकता है ,लग्न ओर लग्नेश का 6,8,12 से संबंध ,शनि , राहु केतु आदि से सम्बन्ध ,साथ ही कारक सूर्य चन्द्र का पीड़ित होना रोग देता है। दो शत्रु ग्रह की युति हो वो आपस में जिस अंग के कारक हो वहां कमजोरी आ सकती है। बीमारी अरिष्ट दोष , मारक दशा में विशेष देखने को मिलती है।
। गीता में अर्जुन को वासुदेव बताते हैं अर्जुन तूं नहीं जानता तूने क्या क्या किया है, मैरे पास सबके जन्मों का हिसाब किताब है। 
आप जानते है ! सबसे अधिक उपायों में स्वास्थ्य पर शास्त्रों में उपाय दिए हैं। जैसा मैं कहता हूं हर समस्या का विशेष उपाय होता है जो सिर्फ उसके लिए बना है। स्वास्थ, कुंडली में लग्न ,सूर्य ,चन्द्रमा ,मंगल पर निर्भर करता है।सूर्य मजबूत होगा तो ऋतु परिवर्तन में बीमार नहीं रहेगा ,लग्नेश बलवान हो तो कभी गंभीर रोग नहीं आएंगे , सूर्य अच्छा हो तो बुखार भी 1,2 साल में एक बार आता है। मंगल देह कारक होने से जातक को युवा ,कसरत वाला बनाकर रूष्ट पुष्ट करता है। षष्ठ भाव हल्की बीमारी है ,अष्टम स्थान icu है, द्वादश भाव भर्ती हो जाने का है।
अग्नि तत्व राशि 1,5,9 इम्युनिटी के लिए अच्छी मानी गई है, 2,6,10 भी ठीक है । 3,7, 11 मध्यम ओर 4,8,12 कमजोर मानी जाती है।  वैद्यनाथ एक श्लोक में कहते है ,सूर्य अकेला ऐसा ग्रह है जो शेष सभी ग्रहों के जनित दोष अकेला काट सकता है । अर्थात सूर्य मजबूत हो तो कुंडली की जड़ें बहुत मजबूत होती है , शायद इसी कारण महर्षि पराशर सूर्य की कमजोरी होने पर कहते है कि राजयोग भंग हो जाया करते है। सूर्य स्वास्थ्य के लिए प्राण है। सूर्य का प्रकोप हो तो पौधे भी निष्फल हो जाएं।
जितने भी गंभीर रोग है ट्यूमर,कैंसर ये राहु ,केतु ,और अष्टम भाव से उपजते हैं। ये विशेषकर कोई भयंकर बाधा, पूर्व जन्म श्राप के कारण आते है। जब भी आपको रोग होगा तो शरीर को कवच चाहिए होते है।
 कोई आपको तीर मारेगा तो आप ढाल का कवच बनाएंगे उसी तरह शास्त्र में जितने कवच दिए हैं ये लग्न,षष्ठ अष्टम स्थान से सुरक्षा हेतु ही दिए हैं। जैसे मेष ,वृश्चिक लग्न का जातक है ये मंगल का लग्न है ये बीमार होगा तो राम रक्षा कवच दिया है शास्त्रों में । जैसे वृषभ , तुला लग्न है ये देवी का लग्न है तो दुर्गा कवच दिया है  दुर्गा सप्तशती में ।  जैसे सिंह लग्न है तो सूर्य के लिए याज्ञवल्क्य जी ने कवच बनाया है । मेरे कहने का अर्थ है मनुष्य को रोग आयेगा ये वह विद्वान भलीभांति जानते थे इसलिए विभिन्न धार्मिक ग्रंथों  में कवच दिए हैं । आप यहां स्तोत्र नहीं कर सकते ,स्तोत्र एक स्तुति है एक भव्यता है एक दिव्यता है एक प्रसन्नता है ,बीमारी में ये भाव अंदर से नहीं होता वहां ताकत चाहिए,साहस चाहिए , ईश्वर का साथ चाहिए इसलिए हर कवच में पढेंगे की भगवान मेरे इस अंग की रक्षा करें , मेरे मार्ग में रक्षा करें , आदि। परन्तु ये दुगना कार्य करता है जब खानपान अच्छा हो,सही उपाय मिले और अच्छा डॉक्टर का इलाज चल रहा हो तो ये त्रिभुज शक्ति बनकर उस समस्या को चोट करता है। सिर्फ कवच पढ़ें और दवाई न खाएं यह कार्य नहीं करेगा ।अब चिकित्सा ज्योतिष ,विभिन्न रोग , स्वास्थ संकट कब आयेगा ,कौनसे रोग होंगे , कब व्यक्ति ठीक हो सकता है ,क्या डॉक्टर बंदलना होगा , क्या पद्धति बदलनी होगी , शास्त्र में रोगों पर क्या क्या उपाय दिए हैं इसपर प्रश्न कुंडली बनाके सुंदर फल प्रकट होता है। 
 _ आरोग्यता हेतु प्रत्येक लग्न के लिए कवच
मेष ,वृश्चिक लग्न _ राम रक्षा कवच
वृषभ तुला लग्न _ दुर्गा कवच
मिथुन कन्या लग्न _ नारायण कवच
कर्क लग्न _ शिव कवच
सिंह लग्न _ सूर्य कवच
धनु मीन लग्न _ विष्णु सहस्रनाम       
मकर कुंभ लग्न _ महामृत्युंजय मंत्र
शुभ रात्रि 
Divinity of parashari jyotish

हाथी दीज्ये घोड़ा दीज्यै,... राजस्थानी कविता

हाथी दीज्ये घोड़ा दीज्यै, गधा गधेड़ी मत दीज्यै 
सुगरां री संगत दे दीज्यै, नशा नशैड़ी मत दीज्यै

घर दीज्यै घरवाली दीज्यै, खींचाताणीं मत दीज्यै
जूणं बलद री दे दीज्ये, तेली री घाणीं मत दीज्यै

काजल दीज्यै टीकी दीज्यै, पोडर वोडर मत दीज्यै
पतली नार पदमणीं दीज्यै, तूं बुलडोजर मत दीज्यै

टाबर दीज्यै टींगर दीज्यै, बगनां बोगा मत दीज्यै
जोगो एक देय दीज्यै पणं, दो नांजोगा मत दीज्यै

भारत री मुद्रा दै दीज्यै, डालर वालर मत दीज्यै
कामेतणं घर वाली दीज्यै, ब्यूटी पालर मत दीज्यै

कैंसर वैंसर मत दीज्यै, तूं दिल का दौरा दे दीज्यै
जीणों दौरो धिक ज्यावेला, मरणां सौरा दे दीज्यै

नेता और मिनिस्टर दीज्यै, भ्रष्टाचारी मत दीज्यै
भारत मां री सेवा दीज्यै, तूं गद्दारी मत दीज्यै

भागवत री भगती दीज्यै, रामायण गीता दीज्यै
नर में तूं नारायण दीज्यै, नारी में सीता दीज्यै

मंदिर दीज्यै मस्जिद दीज्यै, दंगा रोला मत दीज्यै
हाथां में हुन्नर दे दीज्यै, तूं हथगोला मत दीज्यै

दया धरम री पूंजी दीज्यै, वाणी में सुरसत दीज्यै
भजन करणं री खातर दाता, थौडी तूं फुरसत दीज्यै

घी में गच गच मत दीज्यै, तूं लूखी सूखी दे दीज्यै
मरती बेल्यां महर करीज्यै, लकड्यां सूखी दे दीज्यै

कवि नें कुछ भी मत दीज्यै, कविता नें इज्जत दीज्यै
जिवूं जठा तक लिखतो रेवूं, इतरी तूं हिम्मत दीज्यै॥

#anita_manoj_social_worker

@chetan sharma