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Saturday, 16 May 2026

Electronics चीजें अब 'टिकाऊ' नहीं, सिर्फ 'बिकाऊ' हैं! ब्रांड्स की इस Secret Strategy को समझिए!

Electronics चीजें अब 'टिकाऊ' नहीं, सिर्फ 'बिकाऊ' हैं! ब्रांड्स की इस Secret Strategy को समझिए! 

याद कीजिए 90s का वो दौर, जब हमारे घरों में पहला फ्रिज या डिब्बे वाला टीवी आता था। वो सिर्फ बाज़ार से खरीदी गई कोई मशीन नहीं होती थी, बल्कि उसे शुभ मुहूर्त देखकर, पूरे परिवार के साथ एक उत्सव की तरह घर लाया जाता था। वो घर का एक सदस्य बन जाता था! 15 साल, 20 साल... पीढ़ियाँ बदल जाती थीं, लेकिन उन गैजेट्स की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता था। हमें याद ही नहीं कि कभी फ्रिज की बांस आने, कम कूलिंग होने, गैस उड़ने या टीवी की स्क्रीन काली होने जैसी कोई समस्या भी होती थी।

उन दिनों चीजें कभी 'खराब' होकर कबाड़ में नहीं जाती थीं। होता यह था कि वक्त के साथ परिवार बड़ा हो जाता था, जरूरतें बढ़ जाती थीं, और वह सामान घर के लिए छोटा पड़ने लग जाता था। लेकिन तब भी उसे फेंकने या कौड़ियों के भाव बेचने की हमारी संस्कृति नहीं थी। हम बड़े आदर और प्रेम के साथ उस चालू फ्रिज या टीवी को अपने घर के वफादार काम वाले भाई-बहनों, किसी जरूरतमंद रिश्तेदार या गांव के किसी परिवार को सौंप देते थे। वहाँ भी वह सामान अगले 10 साल शान से चलता था! यानी एक सिंगल इन्वेस्टमेंट समाज के तीन अलग-अलग स्तरों पर 30 साल तक अपनी Value डिलिवर करता था। इसे कहते थे भारतीय मिजाज।

और आज? आज आप डेढ़ लाख का OLED TV या चमचमाता Smart AC खरीदिए, वारंटी का पीरियड खत्म होते ही उसकी सांसें फूलने लगती हैं। 5 साल पार करना तो आज के गैजेट्स के लिए 'पुनर्जन्म' जैसा है। कॉर्पोरेट की भाषा में इस गंदे और सोचे-समझे खेल को कहते हैं— Planned Obsolescence (सोची-समझी एक्सपायरी डेट)!

हाँ भाई साहब! आज की कंपनियाँ चीज़ें जानबूझकर ऐसी बनाती हैं जो वक्त पर खुद-ब-खुद दम तोड़ दें। क्योंकि अगर आपका AC और TV पहले की तरह 20 साल चल गया, तो इन बड़े ब्रांड्स के शोरूम पर ताले नहीं लग जाएँगे? उनकी अगली Sales कैसे होगी? उनका Profit Margin कैसे बढ़ेगा? उनका पूरा बिजनेस मॉडल ही इस बात पर टिका है कि आप हर 4 साल में नया सामान खरीदें।

कंपनियों का खतरनाक 'वारंटी ट्रैप' (Warranty Trap)

इस खेल को और मजबूत बनाने के लिए कंपनियों ने एक नया चक्रव्यूह बुना है, जिसे मैं Warranty Trap कहता हूँ। जब तक आपका सामान Under Warranty है, आप बंधक बन जाते हैं। आपको छोटी से छोटी दिक्कत के लिए भी उनके ऑथराइज्ड शोरूम या सर्विस सेंटर ही भागना पड़ता है।

लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू होता है! अगर वारंटी के दौरान या उसके तुरंत बाद भी आपने अपनी मर्जी से किसी लोकल मैकेनिक से उस सामान को छू भी दिया, तो कंपनी सीधे ब्लैकमेलिंग पर उतर आती है—"सर, आपने बाहर से गैजेट ओपन करवा लिया? अब हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं, आपकी वारंटी खत्म!" यानी आपके खुद के खरीदे हुए सामान पर आपका कोई हक नहीं रहता। वे आपको डराते हैं ताकि आप मजबूरन उनके महंगे पार्ट्स खरीदें और उनके सर्विस सेंटर को मोटी फीस दें। यह कंपनियों का बनाया हुआ एक बहुत बड़ा 'प्रिज़्न' (जेल) है, जिसमें हर ग्राहक फंसा हुआ है।

AC की गैस और TV का 'पैनल': जेब काटने का नया औजार!

आजकल के 80% AC मालिकों की गर्मियों की शुरुआत ठंडी हवा से नहीं, बल्कि मैकेनिक को "भाईसाहब, कूलिंग नहीं हो रही, शायद गैस लीक हो गई है" का रोना रोने से होती है। कॉपर कॉइल के नाम पर कंपनियां ऐसी घटिया और पतली क्वालिटी की पन्नियां दे रही हैं कि कुछ ही महीनों में उनमें बारीक छेद हो जाते हैं। मैकेनिक आता है, हाथ खड़े करता है और कहता है—"साहब, कॉइल बदलनी पड़ेगी।"

महंगे LED TV का हाल तो और भी बदतर है। उसकी स्क्रीन (पैनल) बहुत नाज़ुक होती है। ज़रा सा वोल्टेज का झटका लगा या स्क्रीन में खराबी आई नहीं कि कंपनी का ऑथराइज्ड सर्विस सेंटर आपको सीधे 15 से 20 हजार का Estimate हाथ में थमा देता है। मध्यमवर्गीय आदमी मन मसोसकर सोचता है—"यार, 20 हजार मरम्मत पर लगाने से अच्छा है कि 5 हजार और मिलाकर नया ही ले आता हूँ!" और यहीं पर आप कॉर्पोरेट के बुने हुए उस चक्रव्यूह में फंस जाते हैं, जिसकी स्क्रिप्ट बोर्ड रूम में बैठकर लिखी गई थी।

कहाँ गए हमारी कॉलोनी के 'टीवी वाले अंकल' और वो मोची?
जरा ठहरकर सोचिए, हमारी आत्मनिर्भरता को हमसे किसने छीना? पहले हमारी कॉलोनी के नुक्कड़ पर एक 'टीवी वाले अंकल' बैठते थे, जिनकी दुकान पर रेडियो, टेप रिकॉर्डर और टीवी का मेला लगा रहता था। चाहे खराबी कोई भी हो, वे आईसी (IC) बदलकर या एक छोटा सा टांका लगाकर अधिकतम ₹250 में टीवी को फिर से जिंदा कर देते थे। हमारे जूते-चप्पल भी तब तक मोची के पास जाकर सिलते रहते थे, जब तक वे पूरी तरह 'शहीद' न हो जाएँ।

आज कंपनियों ने इस Warranty और स्पेयर पार्ट्स को ब्लॉक करने के नियम से उन 'टीवी वाले अंकल' और लोकल मैकेनिकों को धीरे-धीरे बिजनेस से बाहर कर दिया। हमने अपनी मरम्मत की शानदार संस्कृति को खुद अपने हाथों से दफन कर दिया। आज हम पश्चिमी देशों की उस घातक 'Use and Throw' वाली बीमारी के पूरी तरह शिकार हो चुके हैं।

नतीजा देखना है तो हमारे महानगरों और शहरों के बाहर जाकर देखिए, जहाँ E-Waste (Electronic Waste) के ज़हरीले पहाड़ खड़े हो रहे हैं। ये पहाड़ सिर्फ पर्यावरण को ही नष्ट नहीं कर रहे, बल्कि आपकी जेब को भी खोखला कर रहे हैं। हम भारतीय, जिनकी रग-रग में Sustainable Life (टिकाऊ जीवन) और रीसाइक्लिंग का विज्ञान बसा था, आज दिखावे की अंधी दौड़ में सबसे आगे दौड़ रहे हैं।

 'बैलेंस शीट' और 'मासिक बजट' की सलाह:
एक Chartered Accountant होने के नाते जब मैं व्यापारियों और नौकरीपेशा लोगों की Personal Balance Sheet का ऑडिट करता हूँ, तो मुझे एक बहुत ही चौंकाने वाला सच दिखाई देता है। लोग अपनी मेहनत की कमाई (Hard-earned Money) का एक बहुत बड़ा हिस्सा हर साल जाने-अनजाने में सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स पर फूंक रहे हैं। कभी मोबाइल बदल रहे हैं, कभी नया टीवी ला रहे हैं, तो कभी लैपटॉप अपग्रेड कर रहे हैं।

लोग इसे 'वन-टाइम इन्वेस्टमेंट' समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, लेकिन हकीकत में यह आपकी सेविंग्स को दीमक की तरह चाट रहा है। मेरी सलाह है कि गैजेट्स पर होने वाले इस भारी-भरकम खर्चे को 'Asset' समझना बंद कीजिए। इसे अपने Monthly Expense (मासिक खर्च) के कॉलम में लेकर आइए!

जब आप सालभर में बदले गए मोबाइल, टीवी, एसी की मरम्मत और गैजेट्स के पूरे खर्च को 12 महीनों से डिवाइड (भाग) करके देखेंगे, तब आपको इसका Actual और डरावना गणित समझ में आएगा। आपको पता चलेगा कि आपकी कमाई का कितना बड़ा हिस्सा सिर्फ इन डब्बों को मेंटेन करने में जा रहा है। इसलिए, अगली बार कोई भी गैजेट खरीदने से पहले उसे अपने मंथली बजट में शामिल करके उसका वास्तविक बोझ ज़रूर नापें!

इस कॉर्पोरेट ट्रैप से बाहर निकलने के 3 अचूक रास्ते:

'Right to Repair' का समर्थन करें: भारत सरकार अब 'राइट टू रिपेयर' कानून लेकर आई है [Right to Repair India]। उपभोक्ता के तौर पर हमारा हक है कि हम कंपनियों के इस Warranty Blackmail के खिलाफ आवाज उठाएं। कंपनियों को मजबूर होना पड़ेगा कि वे स्पेयर पार्ट्स खुले बाज़ार में दें।

रिपेयर संस्कृति को जिंदा कीजिए: अगली बार घर का कोई गैजेट नखरे दिखाए, तो तुरंत Amazon या Flipkart खोलकर 'Buy Now' पर उंगली दबाने के बजाय, अपने लोकल मैकेनिक भाई की दुकान पर जाइए। उसे रोजगार भी मिलेगा और आपकी जेब भी बचेगी।

सामान की उम्र लंबी कीजिए: चीज की लाइफ बढ़ाना, उसे सहेजकर रखना और छोटी पड़ने पर किसी जरूरतमंद को चालू हालत में देना हमारी संस्कृति की खूबसूरती है। इसे ई-वेस्ट का हिस्सा मत बनने दीजिए।

असली समझदारी और टशन हर साल नया मॉडल बदलने में या दिखावे का शिकार होने में नहीं है। असली समझदारी कॉर्पोरेट की इस चालाकी को समझकर अपनी मेहनत की कमाई को सही जगह इन्वेस्ट करने और अपनी जड़ों की ओर लौटने में है!

पंकज 'चांडक' की कलम से...✍️
(एक सीए जो आपकी बैलेंस शीट भी देखता है और समाज का बदलता मिजाज भी)

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Friday, 15 May 2026

बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन और दीक्षा के इस मंत्र की 'सिद्धि' का प्रयास करना मानसिक संतुलन बिगाड़ सकता है या भारी नुकसान पहुंचा सकता है।


                  मां भगवती काली साधना 
                " ॐ क्रीं कालिकायै हूं फट् "
एक उग्र और सुरक्षात्मक तांत्रिक अस्त्र मंत्र है। इसकी साधना तीव्र फलदायी होती है, लेकिन इसके नियम अत्यंत कड़े हैं। बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन और दीक्षा के इस मंत्र की 'सिद्धि' का प्रयास करना मानसिक संतुलन बिगाड़ सकता है या भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

तंत्र ग्रंथों के अनुसार इस मंत्र की प्रामाणिक पुरश्चरण (सिद्धि) विधि नीचे दी गई है:-

साधना की प्राथमिक तैयारी 

अनुकूल समय:- इस साधना की शुरुआत किसी कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या या नवरात्रि की रातों में की जाती है। 

साधना का समय हमेशा रात्रि काल (रात 10 बजे से 2 बजे के बीच) होता है।

दिशा और आसन:- साधना के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। बैठने के लिए लाल रंग के ऊनी आसन का उपयोग करें।

वस्त्र और पूजन सामग्री:- साधक को लाल या काले रंग के बिना सिले वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा में मां काली का चित्र या महाकाली यंत्र, सरसों के तेल का दीपक और लाल फूल (विशेषकर गुड़हल) रखें।

माला: इस मंत्र के जाप के लिए केवल काली हकीक की माला या रुद्राक्ष की माला का ही उपयोग किया जाता है।

सिद्धि का मुख्य विधान (पुरश्चरण नियम)

संकल्प:- साधना के पहले दिन हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प लें कि आप किस उद्देश्य (आत्मरक्षा या शत्रु बाधा निवारण) के लिए यह साधना कर रहे हैं।

गुरु और भैरव पूजन:- महाकाली की साधना से पहले भगवान शिव (महाकाल) या बटुक भैरव और अपने गुरु का पूजन अनिवार्य है। उनकी आज्ञा के बिना ऊर्जा को संभालना असंभव होता है।

जप संख्या: इस मंत्र को सिद्ध करने के लिए 1,25,000 (सवा लाख) मंत्र जाप का पुरश्चरण करना होता है। इसे आप अपनी क्षमता के अनुसार 11, 21 या 41 दिनों में बांटकर रोज निश्चित संख्या में (जैसे प्रतिदिन 31 या 51 माला) जपें।

मंत्र प्रयोग तकनीक:- जब साधना पूरी हो जाए और आप किसी कार्य के लिए इसका प्रयोग करें, तो मंत्र के अंत में जहां "फट्" आता है, वहां दायें हाथ की पहली दो उंगलियों से बायें हाथ की हथेली पर ताली बजाई जाती है। यह नकारात्मक ऊर्जा को छिन्न-भिन्न करने की तांत्रिक मुद्रा है।

दशांश हवन और तर्पण: सवा लाख जप पूरा होने के बाद कुल जप संख्या का 10% (12,500 बार) मंत्र पढ़ते हुए हवन करना होता है। हवन में काली मिर्च, सरसों के दाने, गूगल और घी की आहुति दी जाती है।

कड़े अनिवार्य नियम (परहेज)साधना के दिनों में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है।भोजन में लहसुन, प्याज, मांस और मदिरा का पूरी तरह त्याग करना होगा।
साधना की बात को पूरी तरह गुप्त रखना होता है, किसी बाहरी व्यक्ति को इसकी जानकारी न दें।

सलाह: यदि आप गृहस्थ हैं और आपके पास गुरु नहीं हैं, तो इस उग्र मंत्र को सिद्ध करने के बजाय मां काली के परम सौम्य और सुरक्षित मंत्र ॐ क्रीं कालिकायै नमः का सामान्य रूप से रोज 1 या 11 माला जाप करें। इससे बिना किसी नुकसान के मां काली की पूर्ण कृपा और सुरक्षा प्राप्त होती है।

बगलामुखी_रोगमुक्तिप्रयोग

#बगलामुखी_रोगमुक्तिप्रयोग*
प्रयोग सामग्री :-
एक मिट्टी का छोटा सा कुल्हड़ (मटका) ,
सरसों का तेल ,काला तिल,
 सिंदूर एवं काला कपड़ा 

       प्रयोग विधि :-शनिवार के दिन शाम को ,4:30 बजे स्नान करके साधना में प्रयुक्त हो जाये.मिट्टी कि कुल्हड़ में सरसों का तेल भर दीजिये।उसी तेल मे 8काले तिल डाल दीजिये.और काले कपडे़ से कुल्हड़ का मुह को बंद कर दीजिये।.
अब 36 अक्षरीय बगलामुखी 
  👉 मंत्र:-ॐ ह्लींम (hleem) बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंम्भय जिव्हां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लींम (Hleem) ॐ स्वाहा ॥
               का एक माला जप कीजिये। 

और कुल्हड़ के उपर थोड़ा सा सिंदूर डाल दीजिये।और माँ बगलामुखी से भी रोग बाधा मुक्ति कि प्रार्थना कीजिये। 

और एक माला निम्न मंत्र का जप करेंगे 

 ॐ ह्लीम् श्रीम् ह्लीम् मम(अमुक) रोगबाधा नाशय नाशय फट्। 
Om hleem shreem hleem mam (amuk) 
Rog badha nashay nashay phat. 

मंत्र जप समाप्ति के बाद कुल्हड़ को जमींन में गाड़ दीजिये। जमीन में गड्ढा प्रयोग से पहिले ही खोद लें।यह प्रयोग स्वंय के लिए हो तो मन्त्र में मम शब्द का उच्चारण करें और किसी अन्य के लिए कर रहे है तो मन्त्र में मम अमुक की जगह व्यक्ति का नाम बोले और उस बीमार व्यक्ति से कुल्हड़ को स्पर्श करवाते हुये कुल्हड़ को जमींन मे गाढ़ दीजिये और स्वंय या बीमार व्यक्ति के स्वस्थ्य होने की प्रार्थना करेंगे।कुछ परिस्थितियों मे एक शनिवार में अनुभूतियाँ कम हो तो यह प्रयोग आगे भी किसी अन्य शनिवार को कर सकते हैं।
                 ~~~~```~~~```~~~~
भगवान दास वशिष्ठ 

उत्तराखंड की चारधाम यात्रा के सड़क मार्ग का एक विस्तृत मानचित्र ।

यह चित्र उत्तराखंड की चारधाम यात्रा के सड़क मार्ग का एक विस्तृत मानचित्र है। हिंदू धर्म में इस यात्रा का विशेष आध्यात्मिक महत्व है और इसे पारंपरिक रूप से पश्चिम से पूर्व के क्रम में किया जाता है। 
यात्रा का मुख्य मार्ग और क्रम (West to East)
परंपरा के अनुसार यात्रा का सही क्रम इस प्रकार है: 
यमुनोत्री (पहला धाम): यात्रा की शुरुआत दिल्ली या हरिद्वार/ऋषिकेश से होकर बड़कोट के रास्ते यमुनोत्री से होती है।
गंगोत्री (दूसरा धाम): यमुनोत्री के बाद श्रद्धालु उत्तरकाशी पहुँचते हैं और वहां से गंगोत्री धाम के दर्शन करते हैं।
केदारनाथ (तीसरा धाम): अगला पड़ाव गुप्तकाशी होते हुए केदारनाथ धाम है। यहाँ पहुँचने के लिए सोनप्रयाग/गौरीकुंड से लगभग 16-18 किमी की पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है।
बद्रीनाथ (चौथा धाम): अंतिम पड़ाव जोशीमठ के रास्ते बद्रीनाथ धाम है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है।


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Thursday, 14 May 2026

आखिरी पेन

🍃                             ॥ॐ॥                        🍃

         एक सच्ची घटना कभी मौका मिले तो अवश्य जाईयेगा देखने मदुरै में आज भी एक दुकान मिलेगी पेन की 

           कहानी का नाम है....आखिरी पेन...!!

स्थान का नाम है मदुरै, मीनाक्षी मंदिर का प्रवेश द्वार।

ये कहानी है एक ऐसे साउथ इंडियन ब्राह्मण की जो व्यक्ति विशेष तो नही थे मगर सोच बहुत विशाल था वो व्यक्ति पेरियासामी...आयु 60 वर्ष। 

प्रतिदिन सुबह 6 बजे वह मंदिर के प्रवेश द्वार पर बैठते थे।

 उनके सामने एक छोटा सा कपड़ा बिछा होता, जिस पर पेन, पेंसिल, रबर और कंपास बॉक्स जैसी चीजें सजी होतीं। 

एक फुटपाथ की दुकान। लेकिन खास कोई धंधा नहीं।

पेरियासामी का एक नियम था। जब भी कोई बच्चा पेन मांगने आता, तो वह पहले पूछते:
“बेटा... क्या परीक्षा देने जा रहे हो?”

“हाँ दादा। आज गणित का पेपर है।

 मैं पेन भूल गया हूँ।”

तुरंत पेरियासामी एक अच्छी पेन चुनकर उसे देते।

“ये लो। यह लकी पेन है। जाओ, 100 में से 100 नंबर लाना।”

“कितने पैसे हुए दादा?”

“पैसे बाद में। पहले परीक्षा देकर आओ। फिर वापस आकर अपने नंबर बताना, तब पैसे देना।”

बच्चे हँसते हुए दौड़ जाते। वे कभी वापस नहीं आते, और पेरियासामी ने कभी किसी से पूछा भी नहीं।

उनकी पत्नी थंगम उन्हें डाँटती:
“क्या आप पागल हो गए हैं...? 

एक पेन दस रुपये की आती है। अगर आप ऐसे मुफ्त में देते रहोगे, तो हम क्या खाएँगे? घर का किराया कौन देगा?”

पेरियासामी एक पुरानी डायरी निकालते। उसमें उन्होंने तारीख के अनुसार नोट लिखा था:

“12.03.2010 – रमेश – गणित की परीक्षा – पेन – बाकी”
“05.06.2011 – सुमति – हिंदी की परीक्षा – पेन – बाकी”
“18.09.2013 – मुरुगन – 10वीं बोर्ड परीक्षा – पेन – बाकी”

पूरी डायरी ऐसे ‘बाकी’ हिसाबों से भरी थी। गिनती की तो लगभग 3000 पेन। तीस हजार रुपये।

“देखो थंगम,” वह कहते, “यह कर्ज नहीं है, यह मेरा ‘निवेश’ है। 

एक दिन यह अवश्य वापस आएगा।”

थंगम आह भरती:
“तुम्हारा यह निवेश मिट्टी में मिल जाएगा। 

अब तुम बूढ़े हो गए हो, अब कौन वापस आने वाला है?”

बीस साल बीत गए। पेरियासामी अब 80 वर्ष के हो चुके थे। आँखों से धुंधला दिखता था और सुनाई भी कम देता था।

 फिर भी आज भी वही मंदिर का दरवाजा, वही कपड़ा बिछाकर बैठते थे। लेकिन अब बच्चे जेल पेन और ऑनलाइन चीजें इस्तेमाल करते थे, इसलिए उनका धंधा बिल्कुल बंद था।

एक सुबह मंदिर के दरवाजे पर एक बड़ी गाड़ी आकर रुकी। लगभग 35 साल का एक आदमी बाहर निकला—सूट-बूट पहने, हाथ में फूलों का गुलदस्ता।

वह सीधे पेरियासामी के पास गया और उनके चरण छुए।

“दादा... मुझे पहचाना?”

पेरियासामी ने आँखें सिकोड़कर देखने की कोशिश की।
“बेटा... मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता।”

“दादा... 18 साल पहले... 10वीं बोर्ड की परीक्षा थी। गणित का पेपर। उस सुबह मैं रोता हुआ आया था। मेरी पेन टूट गई थी और मेरे पास पैसे नहीं थे। आपने मुझे एक पेन दी थी और कहा था—‘यह लकी पेन है, जाओ 100 नंबर लाना।’ आपने पैसे नहीं लिए थे।”

पेरियासामी को धुंधली याद आई।
“बेटा... तू...”

“मैं मुरुगन हूँ, दादा। मैंने उसी पेन से परीक्षा लिखी और 98 नंबर लाया। मैं पास हुआ, कॉलेज गया और आज मेरी अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी है—‘पेन्ना टेक्नोलॉजीज़’। मेरी जिंदगी आपकी उस पेन से शुरू हुई थी।”

थंगम दरवाजे पर खड़ी यह सब सुन रही थी, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

मुरुगन ने एक लिफाफा निकाला।
“दादा... उस दिन मुझे आपको 10 रुपये देने थे। आज मैं ब्याज सहित वापस देता हूँ।”

अंदर दस लाख रुपये का चेक था।

पेरियासामी के हाथ काँपने लगे।
“बेटा... मुझे पैसे नहीं चाहिए। तू सफल हुआ, वही बहुत है।”

“नहीं दादा। यह पैसे नहीं हैं। यह आपका निवेश है—जो मुनाफे के साथ वापस आया है। अब आपको इस फुटपाथ पर बैठने की जरूरत नहीं। मैं आप दोनों की जिम्मेदारी लेता हूँ।”

अगले दिन अखबार में हेडलाइन थी:
“सॉफ्टवेयर उद्योगपति ने फुटपाथ पर बैठने वाले दादा को 10 लाख की गुरुदक्षिणा दी।”

यह खबर पढ़कर दूसरे दिन दूसरी गाड़ी आई।
“दादा, मैं सुमति हूँ। मैंने आपकी दुकान से हिंदी परीक्षा के लिए पेन ली थी। आज मैं हिंदी की शिक्षिका हूँ।”

फिर रमेश आया।
“दादा, मैं आज ऑडिटर हूँ। मेरी जिंदगी की पहली बैलेंस शीट आपकी पेन से लिखी गई थी।”

एक हफ्ते में तो मंदिर के दरवाजे पर जैसे शादी का माहौल बन गया। डॉक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर, पुलिस अफसर—सब लाइन में आए, पेरियासामी के पैर छुए और फूल, फल और लिफाफे भेंट में दिए।

थंगम ने पुरानी डायरी निकाली। 3000 एंट्री थीं, 30,000 रुपये बाकी थे। लेकिन आज जो वापस आया था उसकी कीमत 3 करोड़ से भी ज्यादा थी।

पेरियासामी रो पड़े और बोले:
“थंगम... मैंने तुमसे कहा था न। यह कर्ज नहीं था। यह तो बीज थे। मैंने इन्हें बोया था और आज यह एक बड़ा जंगल बन गए हैं।”

आज मीनाक्षी मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक बड़ी दुकान है:
“पेरियासामी पेन स्टोर।”

जिसका कोई किराया नहीं है, क्योंकि मुरुगन ने वह दुकान खरीद ली है।

दुकान में एक बोर्ड लगा है:

“यहाँ परीक्षा देने जाने वाले विद्यार्थियों के लिए पेन मुफ्त है। बस वापस आकर अपने नंबर बता देना। पैसे बाद में दे देना।”

उसके नीचे एक छोटी लाइन लिखी है:

“दस रुपये की एक पेन जिंदगी बदल सकती है। विश्वास रखिए।”

और आपको पता है आज वह दुकान कौन चलाता है?

मुरुगन—वही सॉफ्टवेयर कंपनी का मालिक। हफ्ते में दो बार वह अपना सूट उतारकर दुकान में बैठता है और बच्चों को पेन देता है:

“बेटा... यह लकी पेन है। जाओ, 100 में से 100 नंबर लाना।”

आप जो देते हैं, वह सिर्फ पेन नहीं होती—वह एक आशा होती है।

एक दिन वही आशा लौटकर आपके चरणों में झुकेगी।

उस दिन आपको समझ आएगा कि—
आप कभी गरीब नहीं थे।
आप सच में बहुत धनवान थे। 🌹
                                             
          🌸॥卐॥❀ शुभम् स्वस्ति ❀॥卐॥🌸
                     वंदे मातृसंस्कृतम्

श्री मयूरेश स्तोत्र का यह चमत्कारी पाठ, माना जाता है कि गणपति जी स्वयं हर विघ्न को दूर करते हैं।

।। ॐ श्री गणेशाय नमः ।।

घर में बार-बार बाधाएँ आ रही हैं? काम बनते-बनते रुक जाते हैं? तो बुधवार से शुरू करें श्री मयूरेश स्तोत्र का यह चमत्कारी पाठ, माना जाता है कि गणपति जी स्वयं हर विघ्न को दूर करते हैं।

मानसिक तनाव, रोग, कोर्ट-कचहरी, नौकरी की बाधा या घर की अशांति… श्री गणपति का यह सिद्ध स्तोत्र बदल सकता है आपके जीवन की दिशा।

।। श्री मयूरेश स्तोत्रम् ।।

“जब जीवन में हर ओर बाधाएँ बढ़ने लगें, कार्य रुकने लगें, मानसिक अशांति और रोग परेशान करने लगें, तब श्री गणपति के मयूरेश स्वरूप की उपासना चमत्कारी फल देने वाली मानी गई है।”

भगवान श्री गणेश सभी विघ्नों का नाश करने वाले, बुद्धि और सिद्धि के दाता हैं। 

श्री मयूरेश स्तोत्र अत्यंत प्रभावशाली, चैतन्य एवं सिद्ध स्तोत्र माना गया है।

 इसका नियमित पाठ जीवन की बाधाओं को दूर करके सुख, शांति, उन्नति और सफलता प्रदान करता है।

॥ प्रारम्भिक प्रार्थना ॥

वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

अर्थ : हे वक्रतुंड भगवान गणेश! आप करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी हैं। मेरे सभी कार्यों को सदा बिना विघ्न के पूर्ण करें।

॥ गणपति ध्यान ॥

सर्वस्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरम् । प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम् ॥ दन्ताघातविदारितारिरुधिरैः सिन्दूरशोभाकरम् । वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम् ॥

अर्थ : मैं माता पार्वती के पुत्र, गजमुख, सुन्दर स्वरूप वाले, सिद्धि और मनोकामना पूर्ण करने वाले श्री गणपति को प्रणाम करता हूँ।

॥ गणपति द्वादश नाम ॥

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः । लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥ धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः । द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥ विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥

अर्थ : जो व्यक्ति गणेश जी के इन 12 नामों का स्मरण करता है, उसके जीवन में शिक्षा, विवाह, यात्रा, नए कार्य तथा संकट के समय विघ्न नहीं आते।

।। श्रीमयूरेश स्तोत्रम् ।।

ब्रह्मोवाच

॥ 1 ॥
पुराणपुरुषं देवं नानाक्रीडाकरं मुदा । मायाविनं दुर्विभाव्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो आदिपुरुष, समस्त जगत के स्वामी, अनेक दिव्य लीलाएँ करने वाले तथा मायाशक्ति से युक्त हैं, जिनका स्वरूप समझ पाना अत्यंत कठिन है, उन मयूरेश गणपति को मैं प्रणाम करता हूँ।

॥ 2 ॥
परात्परं चिदानन्दं निर्विकारं हृदि स्थितम् । गुणातीतं गुणमयं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो परात्पर, चिदानंदस्वरूप, निर्विकार तथा सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं, जो गुणों से परे होकर भी गुणमय हैं, उन मयूरेश को मैं नमस्कार करता हूँ।

॥ 3 ॥
सृजन्तं पालयन्तं च संहरन्तं निजेच्छया । सर्वविघ्नहरं देवं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो अपनी इच्छा से सृष्टि की रचना, पालन और संहार करते हैं तथा सभी विघ्नों का नाश करते हैं, उन देव मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ।

॥ 4 ॥
नानादैत्यनिहन्तारं नानारूपाणि बिभ्रतम् । नानायुधधरं भक्त्या मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो अनेक दैत्यों का संहार करने वाले, अनेक रूप धारण करने वाले तथा विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले हैं, उन मयूरेश को मैं भक्ति सहित प्रणाम करता हूँ।

॥ 5 ॥
इन्द्रादिदेवतावृन्दैरभिष्टुतमहर्निशम् । सदसद्व्यक्तमव्यक्तं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जिनकी इन्द्र आदि देवता दिन-रात स्तुति करते हैं और जो व्यक्त-अव्यक्त, सत्-असत् सभी रूपों में विद्यमान हैं, उन मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ।

॥ 6 ॥
सर्वशक्तिमयं देवं सर्वरूपधरं विभुम् । सर्वविद्याप्रवक्तारं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो सर्वशक्तिमान, सर्वरूपधारी, सर्वव्यापक तथा समस्त विद्याओं के ज्ञाता और उपदेशक हैं, उन भगवान मयूरेश को मैं नमस्कार करता हूँ।

॥ 7 ॥
पार्वतीनदनं शम्भोरानन्दपरिवर्धनम् । भक्तानन्दकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो माता पार्वती के पुत्र और भगवान शिव के आनंद को बढ़ाने वाले हैं तथा अपने भक्तों को आनंद प्रदान करते हैं, उन मयूरेश को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ।

॥ 8 ॥
मुनिध्येयं मुनिनुतं मुनिकामप्रपूरकम् । समष्टिव्यष्टिरूपं त्वां मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जिनका मुनिजन ध्यान करते हैं, जिनकी स्तुति करते हैं तथा जो उनकी सभी इच्छाएँ पूर्ण करते हैं, उन समष्टि और व्यष्टि रूप भगवान मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ।

॥ 9 ॥
सर्वाज्ञाननिहन्तारं सर्वज्ञानकरं शुचिम् । सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो समस्त अज्ञान का नाश करने वाले, पूर्ण ज्ञान प्रदान करने वाले, पवित्र तथा सत्य-ज्ञान स्वरूप हैं, उन मयूरेश को मैं नमस्कार करता हूँ।

॥ 10 ॥
अनेककोटिब्रह्माण्डनायकं जगदीश्वरम् । अनन्तविभवं विष्णुं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो करोड़ों ब्रह्मांडों के स्वामी, सम्पूर्ण जगत के ईश्वर, अनंत वैभव से युक्त तथा सर्वव्यापी विष्णुरूप हैं, उन मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ।

॥ 11 ॥
इदं ब्रह्मकरं स्तोत्रं सर्वपापप्रणाशनम् । सर्वकामप्रदं नृणां सर्वोपद्रवनाशनम् ॥

अर्थ : यह स्तोत्र ब्रह्मभाव को प्राप्त कराने वाला, सभी पापों का नाश करने वाला, मनुष्य की सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाला तथा सभी प्रकार के कष्टों और उपद्रवों का नाश करने वाला है।

॥ 12 ॥
कारागृहगतानां च मोचनं दिनसप्तकात् । आधिव्याधिहरं चैव भुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम् ॥

अर्थ : यदि इस स्तोत्र का सात दिनों तक श्रद्धापूर्वक पाठ किया जाए तो यह कारागार जैसे संकटों से भी मुक्ति दिलाने वाला माना गया है। यह मानसिक चिंता, रोग और दुखों को दूर करके सुख, समृद्धि तथा मोक्ष प्रदान करता है।

॥ इति श्रीमयूरेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

॥ पाठ विधि ॥

प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें।

अपने सामने श्री गणेश जी की मूर्ति या गणपति यंत्र स्थापित करें।

दीपक, धूप, पुष्प और दूर्वा अर्पित करें।

बुधवार अथवा शुक्ल पक्ष से पाठ प्रारम्भ करना शुभ माना गया है।

पहले गणपति ध्यान एवं द्वादश नाम का स्मरण करें।

इसके बाद श्रद्धा और एकाग्रता से श्री मयूरेश स्तोत्र का पाठ करें।

पाठ के बाद भगवान गणेश से अपनी मनोकामना प्रार्थना करें।

॥ श्री मयूरेश स्तोत्र के लाभ ॥

• जीवन की बाधाएँ और विघ्न दूर होते हैं। 

• मानसिक तनाव और भय में राहत मिलती है।

 • रोग, शारीरिक कष्ट और नकारात्मकता कम होती है।

 • घर में सुख-शांति और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।

 • कार्यों में सफलता और उन्नति प्राप्त होती है। 

• शिक्षा, व्यापार और नौकरी में लाभ मिलता है।

 • कानूनी समस्याओं एवं संकटों से रक्षा होती है। 

• नियमित पाठ से मन को स्थिरता और आत्मबल प्राप्त होता है।

॥ विशेष महत्व ॥

शास्त्रों में कहा गया है कि यह स्तोत्र केवल स्तुति नहीं, बल्कि सिद्ध और चैतन्य शक्ति से युक्त है। 

श्रद्धा और नियमपूर्वक इसका पाठ करने से भगवान गणपति की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन के कठिन से कठिन मार्ग भी सरल होने लगते हैं।

।। श्री गणराज बिहारी आरती ।।

मैं आरती तेरी गाऊँ, मेरे गणराज बिहारी। 

मैं नित-नित शीश झुकाऊँ, मेरे गणराज बिहारी॥

तुम एकदन्त गणराजा, मैं शरण तुम्हारी आया। 

अब राखो लाज हमारी, मेरे गणराज बिहारी॥

तुम रिद्धि-सिद्धि के दाता, भक्तों के भाग्य विधाता।

 मैं आया शरण तिहारी, मेरे गणराज बिहारी॥

तुम माँ गौरी घर आये, और शिव के मन को भाये।

 अब मेरे घर भी आओ, मेरे गणराज बिहारी॥

कोई छप्पन भोग लगाये, कोई मोदक भोग जिमाये।

 मैं हरदिन तुम्हे मनाऊँ, मेरे गणराज बिहारी॥

मैं आरती तेरी गाऊँ, मेरे गणराज बिहारी॥

अर्थ:=
यह आरती भगवान श्री गणेश जी की भक्ति और समर्पण का सुंदर भाव प्रकट करती है। 

भक्त कहता है कि वह प्रतिदिन गणराज के चरणों में शीश झुकाकर उनकी आरती करता है। 

भगवान गणेश को रिद्धि-सिद्धि के दाता और भक्तों के भाग्य को संवारने वाला बताया गया है।

 भक्त उनसे अपनी लाज रखने, जीवन के कष्ट दूर करने और अपने घर में सुख-समृद्धि का वास कराने की प्रार्थना करता है। 

जैसे भगवान गणेश माता गौरी और भगवान शिव के प्रिय हैं, वैसे ही वे भक्तों के जीवन में भी मंगल और आनंद भरते हैं।

अगर आप भी चाहते हैं कि आपके घर में सुख, समृद्धि और विघ्नों का नाश हो, तो श्रद्धा से गाइए श्री गणराज बिहारी की यह दिव्य आरती।

     ॥ गणपति बाप्पा मोरया ॥ ॥ मंगलमूर्ति मोरया ॥
                  पंडित धनंजय पांडेय भारद्वाज 

                       वयं राष्ट्रे जागृयाम 

भोजन करने का शास्त्रिय विधान स्त्री के साथ भोजन करने का कोई प्रायश्चित नहीं ।

भोजन करने का शास्त्रिय विधान व
स्त्री के साथ भोजन करने का कोई प्रायश्चित नहीं ।
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● द्विज पैर धोकर -- पूर्वाभिमुख होकर -- दोनों पैर या एक पैर पृथ्वी पर रखते हुए भोजन के लिए आसन पर बैठे ।
= आर्द्रपादस्तु भुञ्जीयात् प्राङ्मुखश्चासने शुचौ ।
    पादाभ्याम् धरणीं स्पृष्टवा पादेनैकेन वा पुनः ।। 

● एक वस्त्र पहनकर तथा सारे शरीर को कपडे से ढककर भी भोजन न करें -- उल्टी पत्तल पर भी भोजन करने का निषेध है ।

● भोजन करते समय दृष्टि इधर-उधर न डालें - दृष्टि भोजन पर रहे -- और अन्न को नमस्कार करें -- परोसे हुए अन्न की निन्दा न करें -- क्योंकि जिस अन्न की निन्दा की जाती है उस अन्न को राक्षस खाते हैं।

         " जुगुप्सितं च यच्चान्नं राक्षसा एव भुञ्जते। "

● हाथ में जल लेकर उससे अन्न की प्रदक्षिणा कर आचमन करें -- फिर ' प्राणाय स्वाहा ' आदि मंत्रों से पाँच प्राणों को आहुति दें -- ( कारण कि भूख प्राणों को ही लगती है - प्राण वायुरूप हैं - जिससे उन प्राणों और उदरस्थ जठराग्नि में ही यहाँ अन्न का होम किया जाता है -- इससे अन्न के संग्रह - व पकाने आदि के पाप से निवृत्ति हो जाती है ) । और वायु और अग्नि का यजन हो जाता है।

        ' पञ्च प्राणाहुतीः कुर्यात् समन्त्रं तु पृथक् पृथक् ।

● इसके विपरित भोजन करने वाला मूर्ख ब्राह्मण अन्न के द्वारा असुर - प्रेत और राक्षसों को ही तृप्त करता है ।
= अतोऽन्यथा तु भुञ्जानो ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ।
    तेनान्नेनासुरान्  प्रेतान्   राक्षसांस्तर्पयिष्यति ।। 

● जो ग्रास मुँह में जाने की अपेक्षा बडा होने कारण एक बार में ना खाया जा सके - उसमें से बचा हुआ ग्रास अपना उच्छिष्ट कहा गया है ।

● ग्रास के बचे हुए तथा मुँह से निकले हुए अन्न को अखाद्य समझें और उसे खा लेने पर चान्द्रायण - व्रत का आचरण करें ।
= पिण्डावशिष्टमन्यच्च वक्त्रान्निस्सृतमेव च।
   अभोज्यं तद् विजानीयाद् भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्।। 

● जो अपना झूठा खाता है तथा एक बार खाकर छोडे हुए भोजन को फिर ग्रहण करता है उसको चान्द्रायण -- कृच्छ्र --  अथवा प्राजापत्य - व्रत का आचरण करना चाहिए ।

■ जो पापी स्त्री के भोजन किये हुए पात्र में भोजन करता है -- स्त्री का झूठा खाता है तथा स्त्री के साथ एक पात्र में भोजन करता है वह मानो मदिरा पान करता है -- तत्वदर्शी मुनियों ने उस पाप से छूटने का कोई प्रायश्चित ही नहीं देखा है ।        
= स्त्रीपात्रभुङ्नरः पापः स्त्रीणामुच्छिष्टभुक्तथा ।
   तया सह च यो भुङ्क्ते स भुङ्क्ते मद्यमेव हि ।।  
   न तस्य  निष्कृतिर्दृष्टा  मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।। 

● यदि पानी पीते - पीते उसकी बूँद मुँह से निकल कर भोजन पर गिर पडे तो वह खाने योग्य नहीं रह जाता -- जो उसे खा लेता है -- उस पुरुष को चान्द्रायण व्रत का आचरण करना चाहिए ।

● जिस भोजन में बाल या कोई कीडा पडा हो -- जिसे मुँह से फूँककर ठंडा किया गया हो -- उसको अखाद्य समझना चाहिए -- ऐसे अन्न को भोजन कर लेने पर चान्द्रायण व्रत का आचरण करना चाहिए ।

● भोजन करने के स्थान से उठ जाने के बाद जिसे छू दिया गया हो -- जो पैर से छू गया हो या लाँघ दिया गया हो -- वह राक्षस का खाने योग्य अन्न है -- ऐसा समझकर उसका त्याग कर देना चाहिए ।

● यदि आचमन किये बिना ही भोजन करने वाला द्विज भोजन के आसन से उठ जाये तो उसे तुरंत स्नान करना चाहिए -- अन्यथा वह अपवित्र हो जाता है ।

         [ महाभारत आश्वमेधिकपर्व के वैष्णवधर्मपर्व से ]