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Saturday, 20 June 2026

एक तस्वीर मे पांच सिंबल अपने आप में एक पावरफुल तस्वीर है।

राज्य पुष्प रोहिड़ा पर बैठा राष्ट्रीय पक्षी मोर ओर नीचे बैठे दोनों राज्य पशु ऊंट ओर चिंकारा।पीछे बैकग्राउंड में राज्य वृक्ष खेजड़ी भी दिखाई दे रहे है। एक तस्वीर जिसका हर कर्ता राष्ट्रीय या राज्य सिंबल है।एक तस्वीर मे पांच सिंबल अपने आप में एक पावरफुल तस्वीर है।
राजस्थान का हर राज्य सिंबल सिर्फ पश्चिमी राजस्थान से ही है फिर भी इसे विरान रेगिस्तान मानकर उजाड़ना कहां तक उचित होगा?

Friday, 19 June 2026

छेना पोड़ा ( हरिदास बाबा पर श्रीकृष्ण की कृपा )

      (((( फूटे दूध का प्रेम से बना छेना पोड़ा ))))
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     हरिदास बाबा पर श्रीकृष्ण की बरसती कृपा 
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पुरी की वह शांत और पवित्र सुबह थी जब मंदिर के ऊंचे शिखर पर लहराता पतितपावन ध्वज समुद्र की हवा के साथ धीरे-धीरे झूम रहा था। 
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बड़ा डांड पर अभी भीड़ कम थी, लेकिन मंदिर के भीतर शंखनाद और घंटियों की ध्वनि गूंजने लगी थी। भगवान जगन्नाथ के रसोईघर में उस दिन बहुत हलचल थी। 
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विशाल मिट्टी के चूल्हों पर बड़े-बड़े मटकों में दूध उबल रहा था। सेवक इधर-उधर भाग रहे थे क्योंकि आज महाप्रभु के लिए विशेष भोग तैयार होना था। 
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कहते हैं, पुरी की रसोई केवल भोजन पकाने की जगह नहीं, बल्कि स्वयं देवी अन्नपूर्णा का आशीर्वाद है। यहां बनने वाला हर व्यंजन पहले भगवान के प्रेम से भरता है, फिर भक्तों तक प्रसाद बनकर पहुंचता है।
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उसी विशाल रसोई के एक कोने में एक वृद्ध सेवक बैठा था जिसका नाम हरिदास था। वह बचपन से ही भगवान जगन्नाथ की सेवा करता आया था। उसके हाथों में अद्भुत स्वाद था और लोग कहते थे कि उसके बनाए भोग में कोई ऐसी दिव्यता होती थी जिसे खाकर मन को अजीब शांति मिलती थी। 
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उस दिन हरिदास बड़े प्रेम से दूध उबाल रहा था। उसके मन में बस एक ही इच्छा थी—आज वह महाप्रभु को ऐसी रबड़ी बनाकर खिलाएगा कि स्वयं भगवान भी प्रसन्न हो जाएंगे। 
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वह लगातार लकड़ी की बड़ी करछी से दूध चलाता जा रहा था और धीमे स्वर में गा रहा था—“जय जगन्नाथ स्वामी… नयनपथगामी भवतु मे…”
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लेकिन तभी अचानक तेज हवा का एक झोंका आया। चूल्हे की आग कुछ ज्यादा भड़क गई और उबलते हुए दूध में नींबू का पानी गिर पड़ा जो पास में रखा था। अगले ही पल पूरा दूध फट गया। 
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सफेद मलाईदार दूध टूटकर पानी और छेने में बदल गया। हरिदास कुछ पल के लिए वहीं स्तब्ध खड़ा रह गया। उसकी आंखें फैल गईं। इतने सारे दूध का खराब हो जाना उसके लिए किसी बड़े नुकसान से कम नहीं था। 
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वह घबराकर सिर पकड़कर बैठ गया। “अरे दयानिधि… यह क्या हो गया? मैं तो आपको रबड़ी का भोग लगाना चाहता था… अब क्या करूं?” उसकी आवाज भर्रा गई।
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कुछ देर तक वह टूटे हुए मन से उस फटे दूध को देखता रहा। लेकिन फिर अचानक उसके भीतर एक शांत विचार आया। 
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उसे लगा जैसे कोई मधुर आवाज उसके कानों में कह रही हो—“हरिदास… जो हुआ है, उसमें भी मेरी इच्छा छिपी है।” 
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उसने धीरे से आंसू पोंछे और भगवान की मूर्ति की तरफ हाथ जोड़ दिए। “प्रभु… अगर यह आपकी इच्छा है, तो अब इसी से कुछ अच्छा बनाऊंगा।”
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उसने बड़े प्रेम से फटे हुए दूध का सारा पानी अलग किया। अब उसके सामने मुलायम और ताजा छेना बचा था। वह इतना नरम था कि हाथ लगाते ही पिघलने लगता। 
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हरिदास के चेहरे पर हल्की मुस्कान लौट आई। उसने उस छेने को बड़े कांसे के थाल में रखा और उसमें खूब सारी देशी खांड और मिश्री मिलाई। फिर दोनों हाथों से उसे धीरे-धीरे मसलने लगा। 
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वह बार-बार ध्यान रख रहा था कि उसमें एक भी गांठ ना रह जाए। उसके हाथ चलते जा रहे थे और होंठों पर भजन बह रहा था। पूरा रसोईघर इलायची और ताजे छेने की मीठी खुशबू से भरने लगा।
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कुछ देर बाद उसने उस मिश्रण को घी लगी हुई बड़ी पीतल की थाली में फैलाया। ऊपर से थोड़ा और घी लगाया ताकि पकने के बाद उसका रंग सुंदर सुनहरा हो जाए। 
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फिर उसने उसमें इलायची पाउडर और थोड़ा सा कपूर मिलाया। जैसे ही वह मिश्रण चूल्हे की धीमी आंच पर रखा गया, उसकी खुशबू पूरे मंदिर में फैलने लगी। 
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आसपास के सेवक भी हैरान होकर उधर देखने लगे। धीरे-धीरे सफेद छेना अपना रंग बदलने लगा। ऊपर से हल्का भूरा और सुनहरा, किनारों से कुरकुरा और बीच में नरम। ऐसा लग रहा था जैसे साधारण छेना धीरे-धीरे किसी दिव्य प्रसाद में बदल रहा हो।
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हरिदास उस थाली को बड़ी श्रद्धा से देख रहा था। उसकी आंखों में चमक थी। “वाह प्रभु… आपकी लीला भी अद्भुत है। जो चीज मुझे नुकसान लग रही थी, उसी से इतना सुंदर भोग बन गया।” 
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थोड़ी देर बाद उसने सावधानी से वह गर्म और सुगंधित मिठाई बाहर निकाली। ऊपर हल्की दरारें पड़ चुकी थीं और भीतर से वह अभी भी रसदार थी। उसकी खुशबू इतनी मोहक थी कि लगता था जैसे पूरा वातावरण मीठे आनंद से भर गया हो।
#bhaktikathayenभक्तिकथायें
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जब वह भोग भगवान जगन्नाथ के सामने चढ़ाया गया, तो मंदिर के मुख्य पुजारी भी आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने ऐसा स्वाद पहले कभी नहीं चखा था। 
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बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी हुई थी और जैसे ही प्रसाद बांटा गया, हर कोई उसकी प्रशंसा करने लगा। किसी ने कहा, “इतना स्वादिष्ट प्रसाद मैंने जीवन में कभी नहीं खाया।” कोई बोला, “इसमें तो जैसे स्वयं महाप्रभु का आशीर्वाद घुला हुआ है।”
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उसी रात हरिदास को एक अद्भुत स्वप्न आया। उसने देखा कि भगवान जगन्नाथ अपने बाल रूप में मुस्कुरा रहे हैं। उनके हाथ में वही सुनहरा छेना पोड़ा था। 
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कान्हा ने हंसते हुए कहा, “हरिदास… तुम रबड़ी बनाना चाहते थे, लेकिन मुझे तो यह नया भोग ज्यादा प्रिय लगा। याद रखो, जब भक्त सच्चे मन से सेवा करता है, तब उसकी गलती भी मेरे लिए प्रसाद बन जाती है।”
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अगली सुबह जब हरिदास जागा तो उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन इस बार वे दुख के नहीं, आनंद के आंसू थे। उसी दिन से वह नया भोग “छेना पोड़ा” के नाम से प्रसिद्ध हो गया। 
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धीरे-धीरे उसकी महिमा पूरे ओडिशा में फैल गई। लोग दूर-दूर से उसे प्रसाद के रूप में पाने आने लगे। लेकिन बहुत कम लोग जानते थे कि इस प्रसिद्ध मिठाई का जन्म किसी शाही रसोई में नहीं, बल्कि एक भक्त की टूटी हुई उम्मीद और भगवान पर उसके अटूट विश्वास से हुआ था।
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कहते हैं, आज भी जब पुरी की गलियों में ताजा छेना पोड़ा पकता है और उसकी मीठी खुशबू हवा में फैलती है, तो ऐसा लगता है जैसे स्वयं महाप्रभु जगन्नाथ मुस्कुराकर अपने भक्तों से कह रहे हों.. “भक्ति में बनाई गई हर साधारण चीज मेरे लिए सबसे प्रिय प्रसाद बन जाती है…”
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साभार :- Hariya K Video 
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दिन के हर काम से पहले यह मंत्र अवश्य बोलें।

      दिन के हर काम से पहले यह मंत्र अवश्य बोलें

कार्य शुरू करते समय

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः। 
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

खाना बनाने से पूर्व

ॐ अन्नपूर्णे सदा पूर्णे शंकरप्राणवल्लभे।
 अन्नं देहि महेशानि जीवनं देहि च पार्वति ॥

भोजन के बाद 
अन्नदाता सुखी भव। अन्नं ब्रह्मा रसो विष्णुः॥

दीपक जलाते समय

शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते ॥

घर से बाहर निकलते समय

ॐ नमो नारायणाय। सर्वकार्येषु सिद्धिर्भवतु मे ॥

भोग लगाने का मंत्र

त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये। 
गृहाण समुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर ॥

वस्त्र धारण करते समय

वस्त्रं पुण्यं वितस्तं मे धारयामि नमोऽस्तु ते।

दिन समाप्ति / क्षमा प्रार्थना

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्धयात्मना वा प्रकृतिस्वभावात्।
 करोमि ययत्सकलं परस्मै नारायणाय इति समर्पयामि ॥

जीवन में कती ही मोटो संकट क्युं न होवे, जे थे उणने बल सूं नहीं बल्कि बुद्धि और सामने वाले री कमजोरी (मनोविज्ञान) सूं हल करो, तो बडे सूं बडो काम भी चुटकियों में पूरो हो जावे है।

पाली रे धोरा री तलहटी में एक गांव हो—"रूपावास"। उण गांव में एक **पन्ना** नाम रो अठारह-बीस साल रो राईका (चरवाहा) रहवतो। पन्ना पैदाइशी होशियार हो, उणने जंगळ रे हर जानवर री बोली, हवा रो रुख और मिनख रो चेहरो पढ़नो घणो आछो सूं आवतो। वे कवे नी कि—*"चरवाहे री आंख्यां में पूरो जंगळ होवे।"*
उण गांव रे ठाकुर सा'ब, **ठाकुर भानू प्रताप सिंह**, घणा कड़क मिजाज रा हा, पण न्यायप्रिय हा। ठाकुर सा'ब कनै एक घणो मोटो, काळो-शाह और भयंकर **'बाहुबली' सांड** हो। वो सांड ठाकुर सा'ब ने घणो प्यारो हो, पण उणरो मिजाज घणो नटखट और गुस्सैल हो।
एक दिन, उण सांड ने क्युं हुओ कि वो गांव री सीमा लांघकर पास वाले दूसरे गांव "भैंसवाड़ा" रे ठाकुर री बाड़ी (खेत) में घुस गयो और उणरी कती फसल खराब कर दीनी। भैंसवाड़ा रे ठाकुर इण बात सूं घणा रीस (गुस्सा) में आ गया और उण सांड ने अपणे अहाते में बंधवा लियो।
### **शर्त और ठाकुर सा'ब री मूंछ री बात**
भैंसवाड़ा रा ठाकुर कयो—*"जे रूपावास रा ठाकुर अपणो सांड पाछो चावे है, तो उणने खुद अठै आवणो पड़ेगा। और म्हारो एक नियम है—म्हारी सभा में जो भी मिनख उण सांड सूं बिना लाठी छुए, बिना रस्सा बांधे, सिर्फ बातां सूं उणने अठै सूं खड़ो कर देवेला, उणने ही सांड पाछो सुपुर्द करूँला। नहीं तो सांड म्हारे अठै ही चक्की पीसेला!"*
आ बात रूपावास रे ठाकुर सा'ब री मूंछ (इज्जत) माथे आ गई। गांव रे कती तगड़ा-तगड़ा मिनख गया, सांड सामी जाकर जोर-जोर सूं आवाज लगाई, पण सांड तो आंख्यां लाल करबा लागो और उठे सूं हिल्यो ही कोनी।
ठाकुर सा'ब घणा उदास हो गया। तब पन्ना चरवाहा ठाकुर सा'ब कनै आयो और बोल्यो—*"हुकम! जे थारी आज्ञा होवे, तो मैं उण दूसरे गांव जाऊं और सांड ने राजी-खुशी पाछो ले आऊं?"*
ठाकुर सा'ब देख्यो कि ओ छोटा सो लड़को काईं करेला, पण रस्तो कोई कोनी हो। उण कयो—*"जा पन्ना, जे तूं सांड लाय दियो, तो थने पांच बीघा जमीन इनाम में देऊंला।"*
### **पन्ना री चतुराई और 'सांड रो कान'**
पन्ना हाथ में सिर्फ अपणी बांस री बांसुरी (अळगोजा) लेकर भैंसवाड़ा गांव री सभा में पहुंच्यो। उठे कती लोग तमाशा देखबा वास्ते भेळा होय राख्या हा। सांड गुस्से में बीच मैदान में बैठ्यो हो।
भैंसवाड़ा रा ठाकुर हंसिया और बोल्या—*"अरे टाबर! इण सांड सूं दूर रहजै, ओ तने धोरा में फेंट देवेला।"*
पन्ना हँस्यो और बोल्यो—*"ठाकुर सा'ब, नेम (नियम) मुजब मैं इणने बिना हाथ लगाये अठै सूं खड़ो कर दूँ, तो ओ म्हारो हुओ नी?"* ठाकुर कयो—*"हां, बिलकुल!"*
पन्ना चुपचाप सांड कनै गयो। उणने कोई लाठी कोनी दिखाई, ना कोई डरायो। उण सांड रे बिलकुल कान कनै अपणो मूंडो कीनो और धीमे सूं कुछ कयो।
जैसे ही पन्ना उणरे कान में कुछ बोल्यो, सांड रे कान कड़क हुया, उण अपणी पूंछ हिलाई और वो झटके सूं खड़ो हो गयो! सिर्फ खड़ो ही कोनी हुओ, वो पन्ना रे लारे-लारे (पीछे-पीछे) ज्यूं सीधा गाय री त्यूं चालण लागगो।
पूरी सभा दंग रह गई! भैंसवाड़ा रा ठाकुर आंख्यां फाड़कर देखता रह गया। पन्ना सांड ने लेकर राजी-खुशी रूपावास पाछो आ गयो।
### **कान में काईं कयो हो?**
जब रूपावास में सांड पाछो आयो, तो ठाकुर सा'ब री छाती चौड़ी हो गई। उण पूरे गांव में मिठाई बंटवाई और पन्ना ने पांच बीघा जमीन रो पट्टो दियो।
ठाकुर सा'ब सूं रह्यो कोनी गयो, उण पन्ना ने पास बुलायो और धीरे सूं पूछ्यो—*"पन्ना, सब बातां एक कानी, पण म्हाने ओ तो बता कि तूं उण गुस्सैल सांड रे कान में ऐड़ो काईं कयो कि वो एक झटके में खड़ो हो गयो?"*
पन्ना हाथ जोड़कर हंसकर बोल्यो:
> *"हुकम! मैं उणरे कान में बस इत्ती सी बात साची-साची कह दीनी ही कि—'अरे काळू! अठै बैठो-बैठो काईं मूंछ मरोड़े? थारा मालिक ठाकुर सा'ब थने बेचकर थारे बदले **एक नई भैंस** लावण री बात कर रह्या है, जे अबार खड़ो नी हुओ, तो थारी जगह बा लेवेली!'"*
ठाकुर सा'ब ओ सुणकर जोर सूं हंस पड़्या। उण कयो कि सांड भी अपणी इज्जत वास्ते उठ गयो!
## **कहाणी री सीख**
**"अक्कल बड़ी कि भैंस (या सांड)!"** जीवन में कती ही मोटो संकट क्युं न होवे, जे थे उणने बल सूं नहीं बल्कि बुद्धि और सामने वाले री कमजोरी (मनोविज्ञान) सूं हल करो, तो बडे सूं बडो काम भी चुटकियों में पूरो हो जावे है।
कहाणी कीकर लागी भाई?

साभार - Sushimarwari 

Thursday, 18 June 2026

क्रेडिट खोर गांधी और महान लेखक आचार्य चतुरसेन

क्रेडिट खोर गांधी और महान लेखक आचार्य चतुरसेन
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'बापू, यह हैं आचार्य चतुरसेन, महान इतिहासकार और लेखक,'
जमनालाल बजाज ने महात्मा गांधी से चतुरसेन का परिचय कराते हुए आगे कहा, 'आपने कहा था ना नवजीवन के लिए संपादक चाहिए, यह सबसे योग्य पात्र हैं, इन्हें दे दीजिए यह कार्यभार।'

'नमस्ते बापू' आचार्य चतुरसेन ने गांधी का अभिवादन किया
'नमस्ते शब्द में वेदों की बू आती है, यह ठीक नहीं है।' गांधी बोले।

'जी,' आचार्य चतुरसेन आगे बोले, 'तो फिर राम—राम बापू।'
'देखे राम—राम बोलना हिन्दू—मुस्लिम एकता के लिए सही नहीं है।' गांधी जी ने फिर कहा।

'वंदेमातरम बापू।' आचार्य जी ने पुन: अभिवादन किया।
'नहीं वंदेमातरम् भी सही नहीं है, इसमें बुतपरस्ती की बू आती है। हमें आजादी चाहिए तो ऐसी भाषा का प्रयोग करना होगा, जिससे मुस्लिमों को ठेस न पहुंचे।'

'जय बापू।'
'हूं,' गांधी फिर आगे बोले, 'हम तुम्हें नवजीवन का संपादक बनाते हैं, एक हजार वेतन मिलेगा। सबकुछ तुम्हें ही करना होगा। मेरे नाम से लेख लिखने होंगे, न्यूज छापनी होंगी, मेरे भाषण लिखकर देने होंगे। और हां संपादक में मेरा नाम जाएगा, तुम किसी से यह नहीं कहोगे कि यह सब तुम करते हो।'

'बापू मैं सबकुछ करने को तैयार हूं, लेकिन संपादक में मेरा नाम जाना चाहिए, आपका नहीं।'

'नहीं यह नहीं हो सकता।' गांधी ने विरोध किया।

'तो फिर यह आचार्य चतुरसेन भी ऐसे स्वार्थी और तुष्टिकरण करने वाले को जीवन में कभी बापू नहीं कहेगा और तुम्हारे दर्शन आज के बाद नहीं करेगा।' कहकर आचार्य चतुरसेन चले गए।

आचार्य चतुरसेन ने जीवन में फिर कभी गांधी के दर्शन नहीं किए।

(आचार्य चतुरसेन की आत्मकथा का एक अंश)

देवी देवताओं की सवारी क्यों होते हैं पशु पक्षी ?

देवी देवताओं की सवारी क्यों होते हैं पशु पक्षी ?
हर देवी और देवता का एक वाहन होता है। खास बात ये है कि इनके वाहन के लिए पशु-पक्षियों को चुना गया है। क्या आप जानते हैं इसके पीछे क्या कहानी है क्यों देवी-देवता की सवारी के लिए पशु-पक्षियों को ही चुना गया।
अध्यात्मिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक कारणों से भारतीय मनीषियों ने देवताओं के वाहनों के रूप में पशु-पक्षियों को जोड़ा। माना जाता है कि देवताओं के साथ पशुओं को उनके व्यवहार के अनुरूप जोड़ा गया है।
अगर पशुओं को भगवान के साथ नहीं जोड़ा जाता तो शायद पशु के प्रति हिंसा का व्यवहार और ज्यादा होता। भारतीय मनीषियों ने प्रकृति और उसमें रहने वाले जीवों की रक्षा का एक संदेश दिया है। हर पशु किसी न किसी भगवान का प्रतिनिधि है, उनका वाहन है, इसलिए इनकी हिंसा नहीं करनी चाहिए।
ज्ञान की देवी मां सरस्वती के लिए का वाहन हंस माना जाता है। हंस पवित्र, जिज्ञासु और समझदार पक्षी होता है। हंस अपने चुने हुए स्थानों पर ही रहता है। तीसरी इसकी खासियत हैं कि यह अन्य पक्षियों की अपेक्षा सबसे ऊंचाई पर उड़ान भरता है और लंबी दूरी तय करने में सक्षम होता है।
     भगवान शिव का वाहन माना जाता है नंदी। विश्‍व की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में बैल को महत्व दिया गया है। सुमेरियन, बेबीलोनिया, असीरिया और सिंधु घाटी की खुदाई में भी बैल की मूर्ति पाई गई है। इससे प्राचीनकल से ही बैल को महत्व दिया जाता रहा है। भारत में बैल खेती के लिए हल में जोते जाने वाला एक महत्वपूर्ण पशु रहा है।
देवी-देवताओं ने अपनी सवारी बहुत सोच समझकर चुनी। उनके वाहन उनकी चारित्रिक विशेषताओं को भी बताते हैं। 
शिवपुत्र गणेशजी का वाहन है मूषक मूषक शब्द संस्कृत के मूष से बना है जिसका अर्थ है लूटना या चुराना।
सांकेतिक रूप से मनुष्य का दिमाग मूषक, चुराने वाले यानी चूहे जैसा ही होता है। यह स्वार्थ भाव से गिरा होता है। गणेशजी का चूहे पर बैठना इस बात का संकेत है कि उन्होंने स्वार्थ पर विजय पाई है और जनकल्याण के भाव को अपने भीतर जागृत किया है।
          विष्णु का वाहन गरूड़:- 
लुप्त हो रहा है गरूड़। माना जाता है कि गिद्धों (गरूड़) की एक ऐसी प्रजाति थी, जो बुद्धिमान मानी जाती थी और उसका काम संदेश को इधर से उधर ले जाना होता था, जैसे कि प्राचीनकाल से कबूतर भी यह कार्य करते आए हैं। भगवान विष्णु का वाहन है गरूड़। 
प्रजापति कश्यप की पत्नी विनता के 2 पुत्र हुए- गरूड़ और अरुण। गरूड़जी विष्णु की शरण में चले गए और अरुणजी सूर्य के सारथी हुए। सम्पाती और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे।
राम के काल में सम्पाती और जटायु की बहुत ही चर्चा होती है। ये दोनों भी दंडकारण्य क्षेत्र में रहते थे, खासकर मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में इनकी जाति के पक्षियों की संख्या अधिक थी। छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य में गिद्धराज जटायु का मंदिर है। स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे इसीलिए यहां एक मंदिर है।
दूसरी ओर मध्यप्रदेश के देवास जिले की तहसील बागली में ‘जटाशंकर’ नाम का एक स्थान है जिसके बारे में कहा जाता है कि गिद्धराज जटायु वहां तपस्या करते थे। जटायु पहला ऐसा पक्षी था, जो राम के लिए बलिदान हो गया था। जटायु का जन्म कहां हुआ, यह पता नहीं, लेकिन उनकी मृत्यु दंडकारण्य में हुई।
मां लक्ष्मी का वाहन उल्लू :-
उल्लू सबसे बुद्धिमान‍ निशाचारी प्राणी होता है। उल्लू को भूत और भविष्‍य का ज्ञान पहले से ही हो जाता है।
उल्लू को भारतीय संस्कृति में शुभता और धन संपत्ति का प्रतीक माना जाता है। उल्लू के बारे में देश-विदेश में कई तरह की विचित्र धारणाएं फैली हुई है।
रहस्यमी प्राणी उल्लू : 
जब पूरी ‍दुनिया सो रही होती है तब यह जागता है। यह रात्री में उड़ते समय पंख की आवाज नहीं निकालता है और इसकी आंखें कभी नहीं झपकती है। उल्लू का हू हू हू उच्चारण एक मंत्र है।
उल्लू में पांच प्रमुख गुण होते हैं : उल्लू की दृष्टि तेज होती है। दूसरा गुण उसकी नीरव’ उड़ान। तीसरा गुण शीतऋतु में भी उड़ने की क्षमता। चौथी उसकी योग्यता है उसकी विशिष्ट श्रवण-शक्ति। पांचवीं योग्यता अति धीमे उड़ने की भी योग्यता। उल्लू के ऐसे ऐसे गुण हैं जो अन्य किसी पक्षियों में नहीं है। उसकी इसकी योग्यता को देखकर अब वैज्ञानिक इसी तरह के विमान बनाने में लगे हैं।
उल्लू कैसे बना लक्ष्मी का वाहन :- प्राणी जगत की संरचाना करने के बाद एक रोज सभी देवी-देवता धरती पर विचरण के लिए आए जब पशु- पक्षियों ने उन्हें पृथ्वी पर घुमते हुए देखा तो उन्हें अच्छा नहीं लगा और वह सभी एकत्रित होकर उनके पास गए और बोले आपके द्वारा उत्पन्न होने पर हम धन्य हुए हैं। हम आपको धरती पर जहां चाहेंगे वहां ले चलेंगे। कृपया आप हमें वाहन के रूप में चुनें और हमें कृतार्थ करें। 
देवी-देवताओं ने उनकी बात मानकर उन्हें अपने वाहन के रूप में चुनना आरंभ कर दिया। जब लक्ष्मीजी की बारी आई तब वह असमंजस में पड़ गई किस पशु-पक्षी को अपना वाहन चुनें। इस बीच पशु-पक्षियों में भी होड़ लग गई की वह लक्ष्मीजी के वाहन बनें। इधर लक्ष्मीजी सोच विचार कर ही रही थी तब तक पशु पक्षियों में लड़ाई होने लगी गई।
इस पर लक्ष्मीजी ने उन्हें चुप कराया और कहा कि प्रत्येक वर्ष कार्तिक अमावस्या के दिन मैं पृथ्वी पर विचरण करने आती हूं। उस दिन मैं आपमें से किसी एक को अपना वाहन बनाऊंगी। कार्तिक अमावस्या के रोज सभी पशु-पक्षी आंखें बिछाए लक्ष्मीजी की राह निहारने लगे। रात्रि के समय जैसे ही लक्ष्मीजी धरती पर पधारी उल्लू ने अंधेरे में अपनी तेज नजरों से उन्हें देखा और तीव्र गति से उनके समीप पंहुच गया और उनसे प्रार्थना करने लगा की आप मुझे अपना वाहन स्वीकारें।
लक्ष्मीजी ने चारों ओर देखा उन्हें कोई भी पशु या पक्षी वहां नजर नहीं आया। तो उन्होंने उल्लू को अपना वाहन स्वीकार कर लिया। तभी से उन्हें उलूक वाहिनी कहा जाता है।
मां सरस्वती का वाहन हंस :- 
हंस पवित्र, जिज्ञासु और समझदार पक्षी होता है। यह जीवनपर्यन्त एक हंसनी के ही साथ रहता है। परिवार में प्रेम और एकता का यह सबसे श्रेष्ठ उदाहरण है। इसके अलावा हंस अपने चुने हुए स्थानों पर ही रहता है। तीसरी इसकी खासियत हैं कि यह अन्य पक्षियों की अपेक्षा सबसे ऊंचाई पर उड़ान भरता है और लंबी दूरी तय करने में सक्षम होता है। जो ज्ञानी होते हैं वे हंस के समान ही होते हैं और जो बुद्धत्व प्राप्त कर लेते हैं उनको परमहंस कहा गया है।
ज्ञान की देवी मां सरस्वती के लिए सबसे बेहतर वाहन हंस ही हो सकता था। मां सरस्वती का हंस परविराजमान होना यह बताता है कि ज्ञान से ही जिज्ञासा को शांत किया जा सकता है। ज्ञान से ही जीवन में पवित्रता,नैतिकता, प्रेम और सामाजिकता का विकास होता है। ज्ञान क्या है? जो-जो भी अज्ञान है उसे जान लेना ही ज्ञानी होने का प्रथम लक्षण है।
शिव का वाहन नंदी बैल :- 
शिव के एक गण का नाम है नंदी। प्राचीनकालीन किताब कामशास्त्र, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और मोक्षशास्त्र में से कामशास्त्र के रचनाकार नंदी ही थे।
विश्‍व की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में बैल को महत्व दिया गया है। सुमेरियन, बेबीलोनिया, असीरिया और सिंधु घाटी की खुदाई में भी बैल की मूर्ति पाई गई है। इससे प्राचीनकल से ही बैल को महत्व दिया जाता रहा है। भारत में बैल खेती के लिए हल में जोते जाने वाला एक महत्वपूर्ण पशु रहा है।
जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है उसी तरह बैलों में नंदी श्रेष्ठ है। आमतौर पर खामोश रहने वाले बैल का चरित्र उत्तम और समर्पण भाव वाला बताया गया है। इसके अलावा वह बल और शक्ति का भी प्रतीक है। बैल को मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला प्राणी भी माना जाता है। यह सीधा-साधा प्राणी जब क्रोधित होता है तो सिंह से भी भिड़ लेता है। यही सभी कारण रहे हैं जिसके कारण भगवान शिव ने बैल को अपना वाहन बनाया। शिवजी का चरित्र भी बैल समान ही माना गया है।
पौराणिक कथा अनुसार शिलाद ऋषि ने शिव की तपस्या के बाद नंदी को पुत्र रूप में पाया था। नंदी को उन्हों वेदादि ज्ञान सहित अन्य ज्ञान भी प्रदान किया। एक दिन शिलाद ऋषि के आश्रम में मित्र और वरुण नाम के दो दिव्य संत पधारे और नंदी ने पिता की आज्ञा से उनकी खुब सेवा की जब वे जाने लगे तो उन्होंने ऋषि को तो लंबी उम्र और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद दिया लेकिन नंदी को नहीं। तब शिलाद ऋषि ने उनसे पूछा कि उन्होंने नंदी को आशीर्वाद क्यों नहीं दिया ?
तब संतों ने कहा कि नंदी अल्पायु है। यह सुनकर शिलाद ऋषि चिंतित हो गए। पिता की चिंता को नंदी ने भांप कर पूछा क्या बात है तो पिता ने कहा कि तुम्हारी अल्पायु के बारे में संत कह गए हैं इसीलिए चिंतित हूं। यह सुनकर नंदी हंसने लगा और कहने लगा कि आपने मुझे भगवान शिव की कृपा से पाया है तो मेरी उम्र की रक्षा भी वहीं करेंगे आप क्यों नाहक चिंता करते हैं। इतना कहते ही नंदी भुवन नदी के किनारे शिव की तपस्या करने के लिए चले गए। कठोर तप के बाद शिवजी प्रकट हुए और कहा वरदान मांगों वत्स। तब नंदी के कहा कि मैं ताउम्र आपके सानिध्य में रहना चाहता हूं।
नंदी के समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने नंदी को पहले अपने गले लगाया और उन्हें बैल का चेहरा देकर उन्हें अपने वाहन, अपना दोस्त, अपने गणों में सर्वोत्तम के रूप में स्वीकार कर लिया।
मां पार्वती का वाहन बाघ :-
 माता पार्वती का वानह बाघ है तो मां दुर्गा का वहन शेर। मांता दुर्गा को शेरावाली कहा जाता है। बाघ माता पार्वती का वाहन है। बाघ अदम्य साहस, क्रूरता, आक्रामकता और शौर्यता का प्रतीक है। यह तीनों विशेषताएं मां पार्वती के आचरण में भी देखने को मिलती है। बाघ की दहाड़ के आगे संसार की बाकी सभी आवाजें कमजोर लगती हैं।
मां पार्वती का हृदय बहुत ही कोमल है। मां की पूजा यदि सच्चे मन और श्रृद्धा के साथ की जाएं तो हर बिगड़े कार्य बन जाते हैं, लेकिन यदि माता का किसी भी रूप में अपमान हो या उनसे वाद खिलाफी की गई हो तो फिर उनका क्रोध देखने लायक होता है।
एक दिन मां पार्वती और भगवान शिव साथ बैठे थे। मजाक में ही शिवजी ने माता को काली कह दिया। मां को बहुत लगा और वह कैलाश छोड़कर एक वन में चली गई और कठोर तपस्या में लीन हो गई। इस बीच एक भूखा शेर मां पार्वती को खाने की इच्छा से वहां पहुंचा, ले‌किन वह वहीं चुपचाप बैठ गया।
माता के प्रभाव के चलते वह बाघ भी तपस्या कर रही मां के साथ वहीं सालों चुपचाप बैठा रहा। मां ने हठ कर ली थी कि जब तक वह गौरी नहीं हो जाएगी तब तक वह यहीं तपस्या करेगी। तब शिवजी वहां प्रकट हुए और देवी को गौरा होने का वरदान देकर चले गए। फिर माता ने पास की ही नदी में स्नान किया और बाद में देखा की एक बाघ वहां चुपचाप बैठा माता को ध्यान से देख रहा है। माता पार्वती को जब यह पता चला कि यह बाघ उनके साथ ही तपस्या में यहां सालों से बैठा रहा है तो माता ने प्रसंन्न होकर उसे वरदान स्वरूप अपना वाहन बना लिया। तब से मां पार्वती का वाहन बाघ हो गया।
दूसरी कथा अनुसार संस्कृत भाषा में लिखे गए 'स्कंद पुराण' के तमिल संस्करण 'कांडा पुराणम' में उल्लेख है कि देवासुर संग्राम में भगवान शिव के पुत्र मुरुगन (कार्तिकेय) ने दानव तारक और उसके दो भाइयों सिंहामुखम एवं सुरापदम्न को पराजित किया था।
अपनी पराजय पर सिंहामुखम माफी मांगी तो मुरुगन ने उसे एक शेर में बदल दिया और अपना माता दुर्गा के वाहन के रूप में सेवा करने का आदेश दिया।
कार्तिकेय का वाहन मयूर :- 
मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है। यह पक्षी जितना राष्ट्रीय महत्व रखता है उतना ही धार्मिक महत्व भी, हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान मुरुगन या कहें कार्तिकेय का वाहन मोर है।
एक मान्यता अनुसार अरब में रह रहे यजीदी समुदाय (कुर्द धर्म) के लोग हिन्दू ही हैं और उनके देवता कार्तिकेय है जो मयूर पर सवार हैं। भारत में दक्षिण भारत में कार्तिकेय की अधिक पूजा होती है। कार्तिकेय को स्कंद भी कहा जाता है, जो शिव के बड़े पुत्र हैं।
कार्तिकेय का वाहन मयूर है। एक कथा के अनुसार कार्तिकेय को यह वाहन भगवान विष्णु ने उनकी सादक क्षमता को देखकर ही भेंट किया था। मयूर का मन चंचल होता है। चंचल मन को साधना बड़ा ही मुश्‍किल होता है। कार्तिकेय ने अपने मन को साथ रखा था। वहीं एक अन्य कथा में इसे दंभ के नाशक के तौर पर कार्तिकेय के साथ बताया गया है।
अपनी पराजय पर सिंहामुखम माफी मांगी तो मुरुगन ने उसे एक शेर में बदल दिया और अपना माता दुर्गा के वाहन के रूप में सेवा करने का आदेश दिया।
दूसरी ओर मुरुगन से लड़ते हुए सपापदम्न (सुरपदम) एक पहाड़ का रूप ले लेता है। मुरुगन अपने भाले से पहाड़ को दो हिस्सों में तोड़ देते हैं। पहाड़ का एक हिस्सा मोर बन जाता है जो मुरुगन का वाहन बनता है जबकि दूसरा हिस्सा मुर्गा बन जाता है जो कि उनके झंडे पर मुरुगन का प्रतीक बन जाता है। इस प्रकार, यह पौराणिक कथा बताती है कि मां दुर्गा और उनके बेटे मुरुगन के वाहन वास्तव में दानव हैं जिन पर कब्जा कर लिया गया है। इस तरह वो ईश्वर से माफी मिलने के बाद उनके सेवक बन गए।
संस्कृत भाषा में लिखे गए 'स्कंद पुराण' के तमिल संस्करण 'कांडा पुराणम' में उल्लेख है कि देवासुर संग्राम में भगवान शिव के पुत्र मुरुगन (कार्तिकेय) ने दानव तारक और उसके दो भाइयों सिंहामुखम एवं सुरापदम्न को पराजित किया था।
इंद्र का वाहन सफेद एरावत हाथी : 
आजकल सफेद हाथी तो बहुत कम पाए जाते हैं। मनुष्यों ने इनका कत्लेआम कर दिया है इनकी चर्बी और हाथी दांत के लिए। यह लगभग लुप्तप्राय है। 
इंद्र ने अपना वाहन ऐरावत नामक एक हाथी को बनाया। समुद्र मंथन के दोरान 14 रत्नों में से एक ऐरावत की भी उत्पत्ति हुई थी। हाथी शांत, समझदार और तेज बुद्धि का प्रतीक है। ऐरावत को चार दांतों वाला बताया गया है। 'इरा' का अर्थ जल है, अत: 'इरावत' (समुद्र) से उत्पन्न हाथी को ऐरावत नाम दिया गया है।
महाभारत, भीष्मपर्व के अष्ट्म अध्याय में भारतवर्ष से उत्तर के भू-भाग को उत्तर कुरु के बदले 'ऐरावत' कहा गया है। जैन साहित्य में भी यही नाम आया है। यह उत्तर कुरु दरअसल उत्तरी ध्रुव में स्थित था। संभवत: वहां प्राचीनकाल में इस तरह के हाथी होते होंगे जो बहुत ही सफेद और चार दांतों वाले रहे होंगे।
यमराज का वाहन भैंसा :-
 यम नामक एक वायु होती है। मरने के बाद व्यक्ति उक्त वाय में जाकर स्थिर हो जाता है और फिर प्राकृतिक चक्र अनुसार पुन: धरती पर जन्म ले लेता है। 
यम नामक एक देवता हैं ‍जिनको मृत्यु का देवता कहते हैं। ये दक्षिण दिशा के दिक् पाल कहे जाते हैं। यमराज को भैंसे पर सवार बताया गया है। भैंसा एक सामाजिक प्राणी होता है। सभी भैंसे मिलकर एक दूसरे की रक्षा करते हैं। यह एकता का प्रतीक है। भैंसा अपनी शक्ति और फूर्ति के लिए भी जाना जाता है। भैंसा अपनी शक्ति का कभी दुरुपयोग नहीं करता। भैंसा अपनी आत्मरक्षा में ही किसी पर हमला करता है। भैंसे का रूप जिस तरह से भयानक होता है उसी तरह यमराज का रूप भी भयानक है। अत: यमराज उसको अपने वाहन के तौर पर प्रयोग करते हैं।
गंगा का वाहन मगरमच्छ :- 
देवी गंगा का वाहन मगरमच्छ है सिंधु, गंगा, नर्मदा, ब्रह्मपुत्र, कावेरी आदि नदियों में जल में विचरण करने वाला प्रमुख प्राणी मगरमच्छ ही है। वैज्ञानिक कहते हैं कि मगरमच्छ हर परिस्थिति में जी लेते हैं। धरती पर इनका अस्तित्व लगभग 25 करोड़ साल से विद्यमान है।
शनि का वाहन कौआ : 
बहुत कम लोगों को पता होगा कि शनिदेव की सवारी कौवा या गिद्ध ही नहीं बल्कि पुरे 9 सवारी शनिदेव की है। 
जैसे- गिद्ध, घोड़ा, गधा, कुत्ता, शेर, सियार, हाथी, मोर और हिरण हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि शनिदेव जिस वाहन पर सवार होकर जिसके पास भी जाते हैं वह व्यक्ति उसी के हिसाब से फल का उत्तरदायी होता है। हालांकि कौवा को उनकी मुख्‍य सवारी माना जाता है।
कौआ एक बुद्धिमान प्राणी है। कौए को अतिथि-आगमन का सूचक और पितरों का आश्रम स्थल माना जाता है। पुराणों की एक कथा के अनुसार इस पक्षी ने अमृत का स्वाद चख लिया था इसलिए मान्यता के अनुसार इस पक्षी की कभी स्वाभाविक मृत्यु नहीं होती। कोई बीमारी एवं वृद्धावस्था से भी इसकी मौत नहीं होती है। इसकी मृत्यु आकस्मिक रूप से ही होती है।
जिस दिन किसी कौए की मृत्यु हो जाती है उस दिन उसका कोई साथी भोजन नहीं करता है। कौआ अकेले में भी भोजन कभी नहीं खाता, वह किसी साथी के साथ ही मिल-बांटकर भोजन ग्रहण करता है।
कौए की योग्यता : कौआ लगभग 20 इंच लंबा, गहरे काले रंग का पक्षी है जिसके नर और मादा एक ही जैसे होते हैं। कौआ बगैर थके मीलों उड़ सकता है। कौए को भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पहले से ही आभास हो जाता है।पितरों का आश्रय स्थल : श्राद्ध पक्ष में कौओं का बहुत महत्व माना गया है। 
भगवान भैरव का वाहन कुत्ता :- 
कुत्ता एक रहस्यमयी प्राणी है। कुछ धर्मों में इसे शैतानी माना गया है तो ‍हिन्दू धर्म में इसे कुशाग्र बुद्धि और रहस्यों को जानने वाला प्राणी माना गया है। कई मामलों में यह मनुष्यों की रक्षा करता है। भगवान भैरव ने इसे अपना वाहन तो नहीं बनाया लेकिन वे हमेशा इसे अपने साथ रखते हैं।
हिन्दू धर्म के पुराणों में कुत्ते को यम का दूत कहा गया है। ऋग्वेद में एक स्थान पर जघन्य शब्द करने वाले श्वानों का उल्लेख मिलता है, जो विनाश के लिए आते हैं।
भैरव महाराज का सेवक कुत्ते को हिन्दू देवता भैरव महाराज का सेवक माना जाता है। कुत्ते को भोजन देने से भैरव महाराज प्रसन्न होते हैं और हर तरह के आकस्मिक संकटों से वे भक्त की रक्षा करते हैं। मान्यता है कि कुत्ते को प्रसन्न रखने से वह आपके आसपास यमदूत को भी नहीं फटकने देता है। कुत्ते को देखकर हर तरह की आत्माएं दूर भागने लगती हैं।
कुत्ते की योग्यता : दरअसल कुत्ता एक ऐसा प्राणी है, जो भविष्‍य में होने वाली घटनाओं और ईथर माध्यम (सूक्ष्म जगत) की आत्माओं को देखने की क्षमता रखता है। कुत्ता कई किलोमीटर तक की गंध सूंघ सकता है। कुत्ते को हिन्दू धर्म में एक रहस्यमय प्राणी माना गया है, लेकिन इसको भोजन कराने से हर तरह के संकटों से बचा जा सकता है।
इसके अलावा आदित्य का वाहन सात घोड़े, वरुण का वाहन सात हंस, ब्रह्मा सात हंस, महेश्वरी का बैल, दुर्गा का सिंह है ।

Wednesday, 17 June 2026

बोली में मिनख रा संस्कार, व्यवहार, ग्यान अर सभाव रो अेकै सागै खुलासो हुवै।

:ः बाईजी रो बोलणो अर भलै घरां री राड़:ः
मिनखाजूण रै फळापै अर फुटरापै सारू आपणां बडेरां, संत-साहितकारां अर लोकनीत-व्यवहार रो ज्ञान करावणियां गुणीजणां खास कर इण बात पर जोर दियो है कै आ जीभ जकां रै बस में है, वां रो ई जीवण धन्य है। ‘बाई कैवतां रांड’ कहीजै जकां नैं जस री ठौड़ जूता ई पानै पड़ै। वाणी तो व्यक्तित्व री आरसी मानीजी है। आदमी नीं बोलै जितरै उणरो ठा नीं पड़ै पण जियां ई बोलै उणरो कद आपणै सामी आवणो सरू हुवै। बोली में मिनख रा संस्कार, व्यवहार, ग्यान अर सभाव रो अेकै सागै खुलासो हुवै। आदमी री ठीमरता, धीरज अर संयत व्यवहार री सूचना उणरी वाणी ई दिया करै। जियां ई मिनख बोलै आ ठा पड़ ज्यावै कै ओ कुणसी संगत अर संस्कारां में रैवणियो आदमी है। 

आपणै अठै कैबत है कै ‘बाबा बोलूं कै बोवूं’ मतलब ओ कै नीं बोलै जितरै तो मिनख रो खोळियो है जणां मिनख जिसो लागै ई है अर जियां ई बोलै जणां सगळो पोत चोड़ै आ ज्यावै। बोली रै कारण कई बार भोळा अर भोंदू मित्र हुवै जका दुस्मणां सूं ई बत्तो काम करज्यावै। महात्मा गांधीजी रो मानणो हो कै आदमी नै चुप रैय’र इत्तो पछताणो कोनी पड़ै जित्तो कै गड़बड़ बोल’र पछताणो पड़ै। ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ री कैबत इणी कारण बणी है। घणां मिनख इयांकला मिलै जका अपणै आपनै ‘बूझबूझाकड़जी’ समझै अर हरेक बात रा जाणीजाण बण्योड़ा फिरै। बां नै ठा कोनी कै ओ संसार सागर है अठै तो बडाबडी रा डेरूं बाजै। भाखर पर तो सगळा ई भोमिया है, कुण छोटो अर कुण मोटो। इण वास्तै घणां ग्यानचंद (बात-बात में ग्यान बघारणियां) अर रायचंद (बात-बात में बिना मांगी राय देवणियां) बणण री दरकार कोनी, आदमी जित्तो जरूरी हुवै बित्तो ई बोलै जणां ठीक रैवै।

बोली में लहजै रो घणो असर हुया करै। अेक आदमी बोलै जणां लागै इमरत झरै अर दूजो बोलै जणां लागै कै कानां में कील चुभोवै। बोलणो अर बोबीड़ मारणो दोनूं न्यारी-न्यारी बातां है। इण सारू आपणै अठै कैबत है कै ‘बाईजी रा बोलणां अर भलै घरां की राड़’। राड़ नाम लड़ाई-झगड़ै रो है। लड़तां तो बोली तीव्र अर कर्कश ई रैया करै। लड़ाई में तो गाळ्यां ई काढीजै कोई लाडू तो बांटीजै कोनी। इण खातर लड़ाई झगड़े में बोली रै आदर्श रूप री कोई अपेक्षा नीं करीजै। अठै तांई कै साहित्य सिरजण मांय भी युद्ध आद रै चित्रण में इण बात नैं स्वीकारीजै। पण कई लोगां री तो आदत ई पड़ ज्यावै कै बै बोलै जणां इयां लागै जाणै लड़ाई ई करै। 

इणी कारण कोई टेम में स्याणी समझदार भाभी आपरी नणद नैं समझावतां कैयो हुवैला कै बाईजीराज थांरी सामान्य बोली ई इयांकली है जाणै भलां घरां में राड़-झगड़ो हुवै। इणनैं कीं सुधारो नीं तो आगलै घरां जावोला तो फोड़ा ई फोड़ा पड़णा है। वाणी री तीव्रता, आपणां हाव-भाव, बात कैवण रै लारै जिम्मेदारी रो भाव, श्रोता रै साथै आपरा संबंध, सबद चयन आद आपणी बात री परख रा आधार है। बाकी तो बात-बात तो सगळी अेक ई है, कैवण रो ई फरक है। जियां सागण ई काजळ आंख में घालै तो आंख री सोभा बढै अर बो ई काजळ घड़ै का ठीकरी पर लगावै तो अपरोगो लागै - 

बात-बात सब अेक है, कहणै में कदु बैण।
बो ही काजळ ठीकरी, बो ही काजळ नैण।।   

बात अर उठाव (कमठाण) जित्ता चावो बित्ता ई बधै। बात अर भाटो तो बैठावै ज्यूं ई बैठै पण बैठावणियैं री ऊरमा तो चाईजै। कई बार बोलणो गुनैगारी हुज्यावै तो कई बार बोलणो वरदायी सिद्ध हुवै। बात कर्यां ई मिनख री खरी पिछाण हुवै पण बिनां सोच्यां समझ्यां कर्योड़ी बात घांदा कर न्हाखै। राजस्थानी लोकजीवण में बात री सीख रा घणां दूहा प्रचलण में है-

बातड़ल्यां बिगताळल्यां, जे कोई कहै बणाय।
बातां (तो) हाथी पायबो, बातां (ई) हाथी पाय।। 

मतलब ओ है कै बात करणी अर कोई नैं कीं समझावणो है तो उणरो कायदो आयां ई फायदो हुवै नीं तो है जिसी इज्जत रा ई कांकरा हुज्यावै। कोई टेम री बात है कोई राजा हाथी रै होदै किणी मारग पर आवै हो। सामनै कोई कवि आयो अर उण राजा नै इयांकली बात कैई जकी संू राजा रीझग्यो अर उण कवि नैं आपरो हाथी बगसीस में दे दियो। इणनै कैवै बातां हाथी पायबो मानै बात-बात में हाथी प्राप्त कर लियो। इण दरसाव नै देख’र अेक दूजै मिनख सोच्यो इयांकली बात तो आपां ई कैय सकां अर बो तैयार हुग्यो। 

दो-च्यार महीनां पाछै कोई दूजो राजा हाथी रै होदै निकळ्यो। बो देखादेखी कवि बण्योड़ो मिनख मारग में सामै आयो अर जियां लारलै कवि कैई बियां ई राजां नै बात कैयी पण टेम बदळग्यो हो, लारली उपमावां रा अरथ बदळग्या। राजा नै रीस आई अर राजा उण धिंगाणियै कवि नैं मारग पर चित्त न्हाख’र हाथी रो पांव उणरी छाती पर टिका दियो, जिणसूं बो मरग्यो। ओ है बातां हाथी पाय। सागो देख’र सासरो करणियां रा घर बस्योड़ा देख्या कोनी। बै तो इयां ई बारां घालता टेम बितावै। इणरो कारण ओ है कै भासा री विविधता अर क्षेत्र रै प्रभाव सूं कई बार सबदां में मोकळो फरक निगै आवै, इण वास्तै पराई जाग्यां जावां तो आपणां स्थानीय सबदां नैं सावळ सोच समझ’र बोलणां चाईजै। 

आपणै अठै सामान्य रूप सूं बोलीजण वाळो कोई सबद किणी क्षेत्र विशेष का जात-समाज विशेष मांय असंसदीय हो सकै। जियां राजस्थानी सामान्य लोकजीवण मांय मारण, पीटण, डरावण सारू आम सबद है - ठौकणो। लोगां रै घरै, परिवार में, लुगायां-पतायां तकात टाबरां नैं डांटै फटकारै तो ई बोलै कै ‘ठोकूंली, ठोकूंला’। टाबर ओळमो देवै तो बो ई आ ई कैवै कै म्हनैं फलांणै छोरै ठोक्यो। पण ओ ई ‘ठोकणो’ पिछमियै राजस्थान में अर खासकर राजपूत अर चारण समाज में असंसदीय अर अश्लील सबद मानीजै। आं रै घरां मांय इण सबद रो कदै ई सार्वजनिक उच्चारण नीं करीजै। इण वास्तै देस, काळ अर परिस्थितियां नैं देख’र ई बोलणो अर सबदां रो चयन करणो जरूरी है। इण बात री साख रो अेक दूहो देखो-

बात-बात रो आंतरो, बात-बात रो फरक्क।
थे तो कैवो फरिस्तो, (अर) म्है कैवां हां जरक्ख।। 

अबै बताओ फरिस्तै अर जरख नै अेक बताओ जणां खीर तो कुण जिमावै पछै तो डांगां ई बाजै। अेकर री बात है अेक गांव में गुवाड़ री हथाई चालतां बात चाली कै ठाकरां रै बेटै री बहू फलाणै आदमी रै झोळ्यां घाल्योड़ी है। झोळ्यां घालणै नै बीकानेरवाटी में खोळ्यां घालणो कहीजै। बारै सूं आयोड़ै अेक आदमी पूछ्यो कै थांरै ओ खोळ्यां घालणो कांई हुवै। हथाई में अेक बाताळ बैठ्यो हो, जाणै तो बो ई कोनी हो पण बोलणो जरूरी हो इण वास्तै बोलग्यो कै ‘थांरै तो नातो कैवै अर म्हांरै खोळो कैवै’। अबै बताओ खोळ्यां घालणो अर नातै भेजणो अेक कियां है। हाथोहाथ ई बाताळ रै जूतां री जुंवारी हुगी। बात अेकर गुडै उतरगी तो उतरगी पछै सागण चीलां ल्यांणी बेजां दौरो काम है। बात बीगड़्यां पछै सिवाय पिछतावण रै कीं नीं बचै। जणां ई तो कैवै बातां रा टक्का लागै। बात नीं बात री मरोड़ देखणी चाईजै। उचित अवसर हुवै तो फीकी बात ई नीको फळ देज्यावै अर जे अवसर ठीक नीं हुवै तो नीकी बात भी फीको फळ देवै। 

बातां नै छमकणी तो सौरी है पण पार घालणी बेजां दौरी हुवै। बातां में मजाक मसखरी साग में लूण जियां सुवाद अर रस रो काम करै पण कई बार मसखरी महंगी पड़ ज्यावै। अेकर अेक सरप समदर में पड़ग्यो। पाणी में दौरो-सौरो तिरतो किनारै पूगण री आफळ करै। उण बगत अेक मेंढकियो सरप रै आजू-बाजू उछळतो सरप सूं मसखरी करतो बोल्यो ‘सुण रे सरप! म्हनैं हथाई रो घणो कोड है, थोड़ी देर हथाई करां’। सरप नैं ठा पड़्ग्यो कै मेंढकियो उणरा मजा लेवै। वो जाणै हो कै अबार रीस कर्यां भी कीं कोनी हुवै क्योंकै पाणी में मेंढकियो ताबै आवै कोनी। बीं आपरी रीस नैं संभाळ’र मेंढकै नैं उत्तर दियो-

आवै न कोई ऊपजै, सरवर मज्झ थयांह।
बातां करस्यां डेडरा, तिरनै तीर गयांह।।

सरप बोल्यो डेडरा भाई अबार ई समदर रै बिचाळै तो म्हनैं कोई बात ऊकलै ई कोनी। तिर’र किनारै पूग्यां पछै आपां हथाई करस्यां। सरप होळै सी संकेत कर दियो कै जे किनारै रै सारै आयग्यो जणां स तो थारी जड़ में आक दे देस्यूं, थूं ई याद राखसी कै कोई नै बिनां बात तंग कियां कर्या करै। डेडरियै जाण बूझतै पंगो ले लियो। जियो जितरै ई समदर रै किनारै आवण में डरतो ई रैयो हुवैला। इण वास्तै ई कईजै कै बाताळ (वाचाल) रो घर पाताळ में जावै। 

घणो बोलणो, बिना सोच्यां-समझ्यां बोलणो, बिना मतलब बोलणो, बिन बतळायां बोलणो ज्यादातर फोड़ा ई घालै। जरूरी हुवै बठै बोलणो ई चाईजै। साच नै साच कैवण री हूंस अर हिम्मत राखणी चाईजै। चौराई लाख जूणियां मांय भटक्यां पाछै आ मिनखा जूण मिली है। मिनख री जीभ तो जगदीस अर जगदम्बा रा जसगान करण सारू है। भगवान रो नाम जपण सारू जीभ मिली है। इणसूं निकळण वाळो अेक अेक आखर अणमोल हुवै इण वास्तै तोल्यां बिनां नीं बोलणो चाईजै। आगली च्यार ओळियां साथै इण चर्चा नै इण आसा अर विस्वास रै साथै विराम देवां कै नयी पीढी आपरी जुबान नै सावळसर बरतण री हूंस लेवैली- 

लाख असी-चव जोनिय मांझल, जानिय मानव श्रेष्ठ जमारो। 
धीर विवेक तुला पर तोल, अमोल, सतोल, सुबोल उचारो।
तारन या भवसागर सौं गजराज न दीखत और सहारो।
बार हि बार उचार अलौकिक अंब सुनाम उबारन वारो।। 
✍️डॉ. गजादान चारण ‘‘शक्तिसुत’'

वयं राष्ट्रे जागृयाम