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Friday, 6 February 2026

अप्सराएँ : नर्तकी या देवियां ?

अप्सराएँ 

हिन्दू धर्म में अप्सराएँ सौंदर्य का प्रतीक मानी जाती है और बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। अप्सराओं से अधिक सुन्दर रचना और किसी की भी नहीं मानी जाती। पृथ्वी पर जो कोई भी स्त्री अत्यंत सुन्दर होती है उसे भी अप्सरा कह कर उनके सौंदर्य को सम्मान दिया जाता है। कहा जाता है कि देवराज इंद्र ने अप्सराओं का निर्माण किया था। कई अप्सराओं की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा ने भी की थी जिनमे से तिलोत्तमा प्रमुख है। इसके अतिरिक्त कई अप्सराएं महान ऋषिओं की पुत्रियां भी थी। भागवत पुराण के अनुसार अप्सराओं का जन्म महर्षि कश्यप और दक्षपुत्री मुनि से हुआ था। कामदेव और रति से भी कई अप्सराओं की उत्पत्ति बताई जाती है।

अप्सराओं का मुख्य कार्य इंद्र एवं अन्य देवताओं को प्रसन्न रखना था। विशेषकर गंधर्वों और अप्सराओं का सहचर्य बहुत घनिष्ठ माना गया है। गंधर्वों का संगीत और अप्सराओं का नृत्य स्वर्ग की शान मानी जाती है। अप्सराएँ पवित्र और अत्यंत सम्माननीय मानी जाती है। अप्सराओं को देवराज इंद्र यदा-कड़ा महान तपस्वियों की तपस्या भंग करने को भेजते रहते थे। पुराणों में ऐसी कई कथाएं हैं जब किसी तपस्वी की तपस्या से घबराकर, कि कहीं वो त्रिदेवों से स्वर्गलोक ही ना मांग लें, देवराज इंद्र ने कई अप्सराओं को पृथ्वी पर उनकी तपस्या भंग करने को भेजा।

अप्सराओं का सौंदर्य ऐसा था कि वे सामान्य तपस्वियों की तपस्या को तो खेल-खेल में भंग कर देती थी। हालाँकि ऐसे भी महान ऋषि हुए हैं जिनकी तपस्या को अप्सरा भंग ना कर पायी और उन्हें उनके श्राप का भाजन करना पड़ा। महान ऋषियों में से एक महर्षि विश्वामित्र की तपस्या को रम्भा भंग ना कर पायी और उसे महर्षि के श्राप को झेलना पड़ा किन्तु बाद में वही विश्वामित्र मेनका के सौंदर्य के आगे हार गए। उर्वशी ने भी कई महान ऋषियों की तपस्या भंग की किन्तु मार्कण्डेय ऋषि के समक्ष पराजित हुई।

अप्सराओं को उपदेवियों की श्रेणी का माना जाता है। वे मनचाहा रूप बदल सकती हैं और वरदान एवं श्राप देने में भी सक्षम मानी जाती है। कई अप्सराओं ने अनेक असुरों और दैत्यों के नाश में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। इसमें से तिलोत्तमा का नाम उल्लेखनीय है जो सुन्द-उपसुन्द की मृत्यु का कारण बनी। रम्भा को कुबेर के पुत्र नलकुबेर के पास जाने से जब रावण रोकता है और उसके साथ दुर्व्यहवार करता है तब वो रावण को श्राप देती है कि यदि वो किसी स्त्री को उसकी इच्छा के बिना स्पर्श करेगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। उसी श्राप के कारण रावण देवी सीता को उनकी इच्छा के विरुद्ध स्पर्श ना कर सका। उर्वशी ने अर्जुन को १ वर्ष तक नपुंसक रहने का श्राप दिया था। 

पुराणों में कुल १००८ अप्सराओं का वर्णन है जिनमे से १०८ प्रमुख अप्सराओं की उत्पत्ति देवराज इंद्र ने की थी। उन १०८ अप्सराओं में भी ११ अप्सराओं को प्रमुख माना जाता है। उन ११ अप्सराओं में भी ४ अप्सराओं का सौंदर्य अद्वितीय माना गया है। ये हैं - रम्भा, उर्वशी, मेनका और तिलोत्तमा। रम्भा सभी अप्सराओं की प्रधान और रानी है। कई अप्सराएं ऐसी भी हैं जिन्हे पृथ्वीलोक पर रहने का श्राप मिला था जैसे बालि की पत्नी तारा, दैत्यराज शम्बर की पत्नी माया और हनुमान की माता अंजना।

अप्सराएँ दो प्रकार की मानी गयी हैं:
दैविक: ऐसी अप्सराएँ जो स्वर्ग में निवास करती हैं। रम्भा सहित मुख्य ११ अप्सराओं को दैविक अप्सरा कहा जाता है। 
लौकिक: ऐसी अप्सराएँ जो पृथ्वी पर निवास करती हैं। जैसे तारा, माया, अंजना इत्यादि। इनकी कुल संख्या ३४ बताई गयी है। 
अप्सराओँ को सौभाग्य का प्रतीक भी माना गया है। कहते हैं अप्सराओं का कौमार्य कभी भंग नहीं होता और वो सदैव कुमारी ही बनी रहती है। समागम के बाद अप्सराओं को उनका कौमार्य वापस प्राप्त हो जाता है। उनका सौंदर्य कभी क्षीण नहीं होता और ना ही वे कभी बूढी होती हैं। उनकी आयु भी बहुत अधिक होती है। मार्कण्डेय ऋषि के साथ वार्तालाप करते हुए उर्वशी कहती है - हे महर्षि! मेरे सामने कितने इंद्र आये और कितने इंद्र गए किन्तु मैं वही की वही हूँ। जब तक १४ इंद्र मेरे समक्ष इन्द्रपद को नहीं भोग लेते मेरी मृत्यु नहीं होगी।

ये भी जानने योग्य है कि भारतवर्ष का सर्वाधिक प्रतापी पुरुवंश स्वयं अप्सरा उर्वशी की देन है। उनके पूर्वज पुरुरवा ने उर्वशी से विवाह किया जिससे आगे पुरुवंश चला जिसमे ययाति, पुरु, यदु, दुष्यंत, भरत, कुरु, हस्ती, शांतनु, भीष्म और श्रीकृष्ण पांडव जैसे महान राजाओं और योद्धाओं ने जन्म लिया। उन्ही के दूसरे वंशबेल में इक्षवाकु कुल में भगवान श्रीराम ने जन्म लिया। अन्य संस्कृतियों में जैसे ग्रीक धर्म में भी अप्सराओं का वर्णन है। इसके अतिरिक्त कई देशों जिनमे से इंडोनेशिया, कम्बोडिया, चीन और जावा में अप्सराओं का बहुत प्रभाव है।

आइये मुख्य अप्सराओं और उनके मन्त्रों के विषय में जानते हैं:
प्रधान अप्सरा - रम्भा: ॐ सः रम्भे आगच्छागच्छ स्वाहा
३ सर्वोत्तम अप्सराएँ:
उर्वशी: ॐ श्री उर्वशी आगच्छागच्छ स्वाहा
मेनका
तिलोत्तमा: ॐ श्री तिलोत्तामे आगच्छागच्छ स्वाहा
७ प्रमुख अप्सराएँ:
कृतस्थली
पुंजिकस्थला
प्रम्लोचा
अनुम्लोचा
घृताची
वर्चा
पूर्वचित्ति
अन्य प्रमुख अप्सराएँ:
अम्बिका
अलम्वुषा
अनावद्या
अनुचना
अरुणा
असिता
बुदबुदा
चन्द्रज्योत्सना
देवी
गुनमुख्या
गुनुवरा
हर्षा
इन्द्रलक्ष्मी
काम्या
कांचन माला: ॐ श्री कांचन माले आगच्छागच्छ स्वाहा
कर्णिका
केशिनी
कुण्डला हारिणि: ॐ श्री ह्रीं कुण्डला हारिणि आगच्छागच्छ स्वाहा
क्षेमा
लता
लक्ष्मना
मनोरमा
मारिची
मिश्रास्थला
मृगाक्षी
नाभिदर्शना
पूर्वचिट्टी
पुष्पदेहा
भूषिणि: ॐ वाः श्री वाः श्री भूषिणि आगच्छागच्छ स्वाहा
रक्षिता
रत्नमाला: ॐ श्री ह्रीं रत्नमाले आगच्छागच्छ स्वाहा
ऋतुशला
साहजन्या
समीची
सौरभेदी
शारद्वती
शुचिका
सोमी
सुवाहु
सुगंधा
सुप्रिया
सुरजा
सुरसा
सुराता
शशि: ॐ श्री शशि देव्या मा आगच्छागच्छ स्वाहा
उमलोचा
साभार - चरणामृत 
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बेटा नहीं सिर्फ वारिस...

“28 लाख का चेक और बेटे की नंगी सच्चाई”

“पापा…
अब और कितनी देर?
इतना छोटा सा अमाउंट है और पूरा बैंक सिर पर उठा रखा है।
किस फालतू बैंक में अकाउंट खुलवाया था आपने?”
पूरा हॉल सुन रहा था लोगों की नज़रें झुकीं,
लेकिन बुजुर्ग पिता की नजरें जमीन में गड़ गईं।

“दो मिनट…
बस दो मिनट बेटा,”
उन्होंने धीरे से कहा...हाथ कांप रहे थे... जब चेक मैनेजर के सामने पहुंचा मैनेजर ने जैसे ही चेक देखा उसकी भौंहें तन गईं।
₹28,00,000
और अकाउंट में बस यही आख़िरी पैसा।
यह वही चाचा जी थे जो हर महीने बैंक आते थे,
कभी अपनी दवा के लिए कभी पेंशन के लिए,
कभी बस दो बातें करने के लिए।

मैनेजर ने कुर्सी से उठकर कहा—
“चाचा जी, अंदर आइए।”
बेटा भी अकड़ कर अंदर घुस आया...
मैनेजर ने चेक मेज पर रखा और सीधे पूछा—
“इतनी बड़ी रकम एक साथ क्यों निकाल रहे हैं?”
बेटा तुरंत बोल पड़ा—
“आपको क्या दिक्कत है?
हमारे पैसे हैं...हम जो चाहें करेंगे।”
मैनेजर की आवाज सख्त हो गई—
“ये आपके पैसे नहीं हैं ये इनके जीवन की पूरी कमाई है।”
बेटा झल्लाया—
“तो?
मैं इनका बेटा हूँ!”
मैनेजर आगे झुका—
“बेटा होने का मतलब
सिर्फ पैसा लेना नहीं होता।”
कमरे में सन्नाटा।
मैनेजर ने बुजुर्ग की ओर देखा—
“चाचा जी, सच बताइए…
आपको ये पैसा क्यों चाहिए?”
बुजुर्ग की आवाज टूट गई—
“मैनेजर साहब …
बेटे को घर लेना है ..
कहता है—
‘या तो पैसा दो ...या रास्ते से हट जाओ।’”
बेटा चिल्लाया—
“ड्रामा बंद कीजिए!
मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा!”
मैनेजर ने मेज पर हाथ मारा—
“काफी है!”
“आप जानते हैं,
मैंने आपको कभी यहाँ इनके साथ नहीं देखा।
न बीमारी में,
न त्योहार में,
न अकेलेपन में।”
“लेकिन हम बैंक वाले हर दिन इनके साथ खड़े रहे।”
बेटा तिलमिला गया—
“तो आप लोग ही पाल लीजिए इन्हें!
पैसे नहीं देंगे तो इन्हीं से अंतिम संस्कार भी करवा लेना!”
वह दरवाजे की तरफ बढ़ा।
मैनेजर की आवाज पीछे से गूंजी—
“रुकिए!”
“आज आपने साबित कर दिया कि आप बेटे नहीं,
सिर्फ वारिस हैं।”
“आप सिर्फ पैसा लेने आए थे और पैसा लेकर
इन्हें यहीं छोड़ जाते।”
“इसलिए मैं यह पैसा नहीं दूँगा।”
बेटा पलटा,
आँखों में जहर था—
“याद रखिएगा ये बात।”
और चला गया।
दरवाजा बंद हुआ।
बुजुर्ग आदमी फूट-फूटकर रो पड़े...
मैंने आज अपना बेटा खो दिया।”
मैनेजर ने उनका हाथ थाम लिया—
“नहीं चाचा जी।
आज आपने बेटा नहीं खोया,
आज आपने सच्चाई देखी है।”
“जब तक हम हैं आप अकेले नहीं हैं।
आपका ख्याल हम रखेंगे।”
बैंक के कर्मचारी पास आए।
किसी ने पानी दिया,
किसी ने कुर्सी खिसकाई।
और बाहर…एक बेटा 28 लाख के बिना
जिंदगी में आगे बढ़ गया।
लेकिन अंदर…
एक बूढ़ा पिता आज भी मानवता के सहारे जिंदा था।

आरती गहरवार ✍🏼 
धन्यवाद 🙏🏼

आयुर्वेदिक घरेलू चिकित्सा दोहे

हरड़े भरड़े आँवले, लो तीनो सम तोल।
कूट पीस कर छानिए,त्रिफला है अनमोल।।

पाँच भाँति के नमक से,करो चूर्ण तैयार।
दस्तावर है औषधि, कहते पंचसकार।।

ताजे माखन में सखी, केसर लेओ घोल।
मुख व होठों पर लगा,रंग गुलाब अमोल।।

सूखी मेंथी लीजिए, खाएँ मन अनुसार।
किसी तरह पहुँचे उदर,मेटे बहुत विकार।।

ठंड जुकाम भारी लगे, नाक बंद हो जाय।
अजवायन को सेंक कर, सूंघे तो खुल जाय।।

चर्म रोग में पीसिए, अजवायन को खूब।
लेप लगाओ साथिया,मिलता लाभ बखूब।।

फोड़े फुंसी होय तो, अजवायन ले आय।
नींबू रस में पीस कर,औषध मान लगाय।।

अजवाइन गुड़ घी मिला,हल्का गर्म कराय।
वात पित्त कफ संतुलन, सर्दी में हो जाय।।

भारी सर्दी पोष की, करती बेदम हाल।
अदरक नींबू शहद को,पीना संग उबाल।।

मेंथी अजवायन उभय,हरती उदर विकार।
पाचन होता संतुलित, खाएँ किसी प्रकार।।

अदरक के रस में शहद, लेना सखे मिलाय।
पखवाड़े नियमित रखो,श्वाँस कास मिटजाय।

मक्का की रोटी भली,खूब लगाओ भोग।
पाचन के संग लाभ दे,क्षय में रखे निरोग।।

छाछ दही घी दूध ये, शुद्ध हमारा भोज।
गाय पाल सेवा करो ,मेवा पाओ रोज।।

गाजर रस मय आँवला,पीना पूरे मास।
रक्त बने भरपूर तो,नयनन भरे उजास।।

बथुआ केंहि विधि खाइए,मिले लाभ भरपूर।
पाचन भी अच्छा करे, रहे बुढ़ापा दूर।।

चौंलाई में गुण बहुत, रक्त बढ़े भरपूर।
हरी सब्जियों से रहे,मानुष तन मन नूर।।

पालक मेथी मूलियाँ,स्वास्थ्य रक्त दातार।
हरी सब्जियां नित्य लो,रहलो सदाबहार।।

जूस करेला पीजिए, प्रतिदिन बारहो मास।
मधुहारे तुमसे सदा, हो सुखिया आभास।।

दातुन करिए नीम की,होय न दंत विकार।
नीम स्वयं ही वैद्य है, समझो सही प्रकार।।
.
जामुन की दातुन करो, गुठली लेय चबाय।
मधुमेही को लाभ हो ,प्रदर प्रमेह नशाय।।

दातुन करो बबूल की,हिलते कभी न दंत।
तन मन शीतलता रहे, शूल बचाओ पंत।।

कच्ची पत्ती नीम की ,प्रातः नित्य चबाय।
रक्त साफ करके सखे,यह मधुमेह मिटाय।।

सदाबहारी फूल जो, प्रात चबालो आप।
दूर करे मधुमेह को, खाओ मधु को माप।।

तुलसी पत्ते औषधी, पीना सदा उबाल।
कितनी भी सर्दी पड़े,होय न बाँका बाल।।

चूर्ण बना कर आँवले, खाओ बारह मास।
नहीं जरूरत वैद्य की,जब तक तन में श्वाँस।

संध्या भोजन बाद में, थोड़ा सा गुड़ खाय।
पाचन भी अच्छा रहे, बुरी डकार न आय।।

लहसुन डालो तेल में,अजवायन अरु हींग।
जोड़ो में मलते रहो , नहीं चुभेंगे सींग।।

सब्जी में खाओ लहसुन, हरता कई विकार।
नेमी धर्मी डर रहे, खाएँ खूब विचार।।

कैसे भी खा लीजीए ,करे सदा ही लाभ।
ग्वार पाठा बल खूब दे,आए तन में आभ।।

दाल चीनि जल घोल कर,पीजिए दोनो वक्त।
पेचिस में आराम हो, मल हो जाए सख्त।।

दालचीनि मुख राखिए, जैसे पान सुबास।
मुख कभी न आएगी, गन्दी श्वाँस कुबास।।

दूध पियो नित ही भला,हल्का मीठा डाल।
ग्रीष्म ऋतु में पीजिए,संगत मिला रसाल।।

ग्वारपाठ रस आँवला ,करे पित्त को नष्ट।
नित्य निहारा पीजीए,स्वास्थ्य रहेगा पुष्ट।।

तीन भाग रस आँवला,एक भाग मधु साथ।
प्रातः सायं पीजिए, नेत्र नए हो जात।।

हल्दी डालें दूध में, छोटी चम्मच एक।
कफ खाँसी के शूल मिट,स्वस्थ रहोगे नेक।।
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हल्दी चम्मच एक भर, पीवे छाछ मिलाय।
खुजली फुन्शी दाद भी,जल्दी से मिटजाय।।
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बेसन नींबू नीर मधु, सबको लेय मिलाय।
चेहरे पर लेपन करो,सुन्दरता बढ़ि जाय।।

शहद मिला कर दूध पी,जीवन रहे निरोग।
दीर्घायु होकर करो, जीवन के सुखभोग।।

भोजन के संग छाछ तो,होती अमरित मान।
स्वस्थ पुष्ट तन मन रहे, बनी रहेगी शान।।

सौ रोगों की औषधी, देखी परखी मान।
पिए गुनगुना नीर तो,बनी रहे तन जान।।

दिन के भोजन में रखो, दही कटोरी एक।
पाचक रस निर्माण कर,मेटे व्याधि अनेक।।

अजवायन की भाप से,मिटे शीत के रोग।
गर्म भाप को सूँघिए ,रहना शीत निरोग।।

लो अजवायन छाछ से,पेट रहे तन्दरुस्त।
कीड़े मरते पेट के, भोजन करना मस्त।।

सौंफ हींग सेंधा नमक, पीपल उसमे डाल।
जीरा छाछ मिला य पी, रहे न उदर मलाल।।

भूतों को सावन पिला, कार्तिक पिला सपूत।
ग्रीष्मकाल में सब पियो,उत्तम छाछ अकूत।।

✍️अरकिता

Thursday, 5 February 2026

बिल्व फल – शिव का प्रतीक, तंत्र का रहस्य - रक्षा कवच

🌿 बिल्व फल – शिव का प्रतीक, तंत्र का रहस्य 🌿

१. आध्यात्मिक एवं तांत्रिक महत्व शिव से जुड़ाव

शिव पुराण में बिल्व को शिवद्रुम कहा गया है।
बिल्व फल मोक्ष का प्रतीक है – बाहर से कठोर, अंदर से दिव्य अमृत जैसा।
इसे शिवलिंग पर चढ़ाने या पूजा में रखने से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

तंत्र में इसे रक्षा कवच, लक्ष्मी प्राप्ति, शत्रु नाश, और नकारात्मक ऊर्जा हटाने के लिए प्रयोग किया जाता है।

२. चमत्कारी तांत्रिक प्रयोग एवं उपाय। अनुभव से युक्त। 

⚡ उपाय १: धन-लक्ष्मी प्राप्ति का सबसे शक्तिशाली बिल्व प्रयोग

एक ताजा बिल्व फल लें।
उसे साफ करके लाल कपड़े पर रखकर उसके सामने बैठकर ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः मंत्र 11 माला जप करें।

फल को लाल कपड़े में लपेटकर अपने तिजोरी/पर्स/धन स्थान में रखें।

हर पूर्णिमा को इसे बदलें और पुराने फल को किसी मंदिर में दान कर दें।

परिणाम: धन की तंगी दूर होती है, व्यापार में वृद्धि, अप्रत्याशित कमाई के योग बनते हैं। (लक्ष्मी प्राप्ति के लिए प्रसिद्ध उपाय)

⚡ उपाय २: शत्रु नाश + रक्षा कवच

बिल्व फल को आधा काटें (बिना बीज निकाले)।
अंदर थोड़ा कुमकुम/चंदन लगाकर ॐ नमः शिवाय 108 बार जप करें।

इसे किसी सुरक्षित स्थान पर रखें या घर के मुख्य द्वार के पास लटकाएँ।

परिणाम: घर-परिवार पर बुरी नजर, टोटका, शत्रु बाधा से रक्षा मिलती है।

⚡ उपाय ३: संकट निवारण + मनोकामना पूर्ति

सोमवार या प्रदोष काल में बिल्व फल को शिवलिंग पर चढ़ाएँ।

चढ़ाने से पहले बिल्वाष्टकम या ॐ त्र्यम्बकं यजामहे मंत्र का जाप करें।

फल चढ़ाने के बाद उसका गूदा प्रसाद के रूप में ग्रहण करें।

परिणाम: बड़े से बड़े संकट दूर होते हैं, इच्छाएँ पूरी होती हैं।

⚡ उपाय ४: व्यापार/नौकरी में बाधा दूर करने का उपाय

बिल्व फल का गूदा निकालकर सुखा लें → भस्म बना लें।
इस भस्म को थोड़ा चंदन मिलाकर तिलक लगाएँ या घर के मुख्य द्वार पर लगाएँ।

परिणाम: व्यापार में रुकावटें खत्म, नौकरी में प्रमोशन/स्थिरता।

⚡ विशेष ध्यान रखे: बिल्व फल कभी भी टूटा-फूटा न लें। पूर्ण, स्वस्थ और हरा-भरा ही प्रयोग करें।

 श्री सीताराम विजयते 🚩

संपर्क सूत्र। 
पूजा जी 9111610710
संजील जी 7665650133