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Sunday, 5 July 2026

धर्म की परीक्षा विपत्ति में होती ।

वर्ष 2003। सतना जिले का शासकीय माध्यमिक विद्यालय बीरपुर। विद्यालय का इसी वर्ष प्राथमिक से माध्यमिक स्तर पर उन्नयन हुआ है। एक नए शिक्षक की भर्ती हुई है। शिक्षक प्रतिभाशाली है। कुछ नैतिक भी है। उस विद्यालय के उससे कम योग्य शिक्षक को उससे लगभग 8 गुना अधिक वेतन मिल रहा है। यहां योग्यता का पैमाना शैक्षणिक डिग्री है। 

बच्चों को मध्यान भोजन दिया जा रहा है। बच्चों को बढ़िया मध्यान्ह भोजन मिल रहा है। यह नवनियुक्त शिक्षक मध्यान्ह भोजन का प्रभारी है। इस शिक्षक की पारिवारिक स्थिति मांग करती है कि इस ज्यादा पैसा कमाना चाहिए। लेकिन वेतन उस जरूरत को पूरी करने में समर्थ नहीं है।

प्रभारी शिक्षक कभी-कभी खुद से बात करता है। अपनी अंतरात्मा से बात करता है। उसने अपनी दुविधा का एक बढ़िया समाधान निकाला है। अंग्रेजी में इसे 'विन-विन सॉल्यूशन' कहते हैं।

इस सॉल्यूशन को समझने के लिए पहले स्कूल की स्थिति समझते हैं। ज्यादातर बच्चे अनुपस्थित रहते हैं। मध्यान भोजन की वजह से कुछ उपस्थिति बढ़ती है। लेकिन फिर भी गैरहाजिर बच्चों की संख्या काफी है। शिक्षा विभाग चाहता है कि ज्यादा बच्चों की उपस्थिति हो। 

शिक्षक ने जितने बच्चे वास्तव में उपस्थित हैं उससे बढ़ाकर रजिस्टर में उपस्थिति दिखा दी। बढ़ी हुई उपस्थिति से ज्यादा दाल खरीदना संभव हो सका। बिल बना ढ़ाई किलो दाल का‌। पर वास्तव में दाल सिर्फ दो किलो खरीदी गई। आधा किलो दाल के पैसे शिक्षक ने अपनी जेब में डाल लिए। ऐसा कुछ महीनों तक हुआ। 

इस दौरान शिक्षक के अंतरात्मा उससे उसे कठघरे में खड़ा करती थी। शिक्षक अपने बचाव में तकरीर करता "मैं इतना काबिल हूं। मेरे समान कार्य वाले को मुझे आठ गुना ज्यादा वेतन मिल रहा है। मेरी आर्थिक स्थिति मुझे ऐसा करने की मांग करती है। शिक्षा विभाग भी तो ज्यादा उपस्थिति की मांग करता है। सो, शिक्षा विभाग भी खुश। उस फर्जी उपस्थिति से खरीदे गए अतिरिक्त दाल के पैसे मेरे जेब में। मैं भी खुश। बच्चों के भोजन की गुणवत्ता में भी समझौता नहीं हुआ। सो उनके भी दुखी होने का कोई कारण नहीं। लिहाजा, मैं निर्दोष हूं।"

अर्धचेतन अंतरात्मा ने कोई निर्णय नहीं सुनाया। शिक्षक का तबादला कुछ दिनों बाद नजदीक के ही उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में हो गया। शिक्षक ने कुछ दिनों में वह नौकरी छोड़ दी। उसे उसकी योग्यता अनुसार नौकरी मिल गई। कुछ दिनों में शिक्षक की विपन्नता भी दूर हो गई। आज वह शिक्षक इंदौर में रहता है और अपनी आर्थिक स्थिति से संतुष्ट है।

वर्ष 2026। इंदौर का शासकीय माध्यमिक विद्यालय राऊ। वही शिक्षक आज अपनी बेटी का स्थानांतरण प्रमाण पत्र लेने आया है। विद्यालय में बच्चों को मध्यान्ह भोजन दिया जा रहा है। भोजन में दाल भी मिलनी चाहिए। लेकिन भोजन से दाल गायब है।

संयोग से विद्यालय में भोजन की गुणवत्ता का निरीक्षण करने वाली प्रभारी शिक्षिका भी मौजूद है। शिक्षक ने शिकायत दर्ज करवाई कि आज के भोजन में दाल नहीं दी गई है।

वह शिक्षक 'प्रहलाद पाण्डेय' लोगों से कुछ कहना चाहता है। 

धर्म की परीक्षा विपत्ति में ही होती है। क्योंकि तथाकथित विपत्ति के समय अपने धर्म की रक्षा करने में वह शिक्षक असफल रहा है इसलिए वह कहता है कि यदि आपके सामने विपत्ति आए तो आप अपने धर्म का साथ मत छोड़िए। क्योंकि विपत्ति एक दिन समाप्त हो जाएगी। आर्थिक तंगी समाप्त हो जाएगी। भोग करने की इच्छा समाप्त हो सकती है। यदि भोग करने की इच्छा रही भी, तो भोग करने के साधन, शरीर, शिथिल पड़ जाएंगे। पर आपके द्वारा किया गया अधर्म आपकी अंतरात्मा को तब तक झकझोरता रहेगा जब तक आप पश्चाताप की अग्नि में जलकर उस पाप से मुक्ति नहीं पा लेते। आप अपने धर्म को तर्कसंगत या न्याय संगत ठहरने के लिए कितने ही भंडारे, दान पुण्य क्यों न कर ले, उस अधर्म का अपराध बोध जीवनपर्यंत आप पर रहेगा। आप चाहेंगे कि आपको उसकी सजा मिले ताकि आप उससे उऋण हो सके। उस टीस को कम करने के लिए अपनी त्रुटि, पाप, अधर्म को स्वीकार करने पर कुछ कमी तो अवश्य आ जाएगी। 

इसके लिए पहला कदम है अपनी अंतरात्मा को जगाइए।
(फोटो इंदौर के शासकीय माध्यमिक विद्यालय श्रमिक कॉलोनी राऊ की है)
#जनधर्म 
#prahladpandey
✍️ प्रहलाद पांडे 
दिनांक 3/7/2026 ईस्वी 
शुक्रवार,मिति आषाढ़ कृष्ण ३ विक्रम संवत २०८३ 

ऋग्वेद के १।२।१ मंत्र का आर्याभिनव में अर्थ पर शचीन्द्र शर्मा के द्वारा ईश्वर और मूर्ति भोग पर शास्त्रार्थ रुपी पोस्ट

दयानन्द अपनी आर्याभिविनय नामक पुस्तक में ऋग्वेद के १।२।१ मंत्र के अर्थ में लिखते हैं - "हम लोगों ने अपनी अल्प-शक्ति से सोमवल्ली आदि औषधियों का उत्तम रस तैयार किया है, और जो कुछ भी हमारे श्रेष्ठ पदार्थ हैं, आपके लिए अलंकृत अर्थात् उत्तम रीति से हमने बनाए हैं, आपको समर्पित किए गए हैं। उनको आप स्वीकार करो, सर्वात्मा से पान करो।"

शचीन्द्र - अब इन अनार्यसमाजियों की मूर्खता व दोगलापन देखिए कि इनके अनुसार इनका ईश्वर इनके निवेदन करने पर इनका गिलोय का काढ़ा पीने मटकते हुए चला आएगा, किन्तु इनके अनुसार हमारे वेदोक्त सत्यसंकल्प, सर्वसमर्थ, भक्तवत्सल भगवान हमारे द्वारा निवेदित सुगंधित मिष्ठानों को स्वीकार करने नहीं आएँगे।

इस मंत्र के अर्थ में दयानन्द ईश्वर को गिलोय का काढ़ा, मालपुए, हलुआ, खीर और आदि समर्पित कर रहे हैं। दयानन्दी बताएँ कि क्या वह परमात्मा भूखा-प्यासा घूमता है? अतः इस वेदमंत्र के दयानन्द द्वारा किए गए अर्थ से ही हिन्दुओं के मूर्ति के माध्यम से परमात्मा को भोग आदि लगाने की वेदमूलकता सिद्ध होती है।

अनार्यसमाजी - "इस मंत्र में 'पाहि' है, इसका अर्थ पीना नहीं है। यहाँ यदि 'पा पाने' धातु का प्रयोग होता, तो 'पिब' लिखा जाता। 'पाहि' तो 'पा रक्षणे' का होता है, 'पा पाने' का नहीं। अतः यहाँ पीने की बात नहीं है।"

शचीन्द्र - यह आपने दयानन्द के लिखे पर जूता मारा। अब वेद में लौकिक व्याकरण क्यो घुसा रहे हो? 'व्यत्ययो बहुलम्' तथा 'बहुलं छन्दसि' आदि पाणिनीय सूत्रों के अनुसार वैदिक प्रयोगों में विकरणों आदि का व्यत्यय हो जाता है। उदाहरणार्थ, वेद में 'हनति' रूप में अदादिगणीय धातु होते हुए भी शप् का लुक् नहीं हुआ है। इसी प्रकार अदादिगण से भिन्न धातुओं के साथ भी कहीं-कहीं शप् का लुक् मान्य किया गया है। 'पाहि' उसी प्रकार का एक वैदिक प्रयोग है। यहाँ 'पिब' रूप में स्थित शप् का लुक् हो जाने तथा उसके शित् न रहने के कारण 'पिब' आदेश की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई और रूप 'पाहि' बन गया। अतः यहाँ मूल धातु 'पा (पाने)' ही है, इसलिए इसका अर्थ भी 'पिब' अर्थात् 'पियो' ही ग्रहण किया जाएगा।

निरुक्त में भी 'तेषां पिब, शृणु नो ह्वानम्' ऐसा पाठ प्राप्त होता है। यहाँ 'तान्' के स्थान पर 'तेषाम्' का प्रयोग 'चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि' इस पाणिनीय नियम के अनुसार षष्ठी-विभक्ति में हुआ माना गया है। इसलिए इस स्थल पर 'पिब' अर्थात् पीने का ही प्रसंग स्पष्ट रूप से उपस्थित है। इसके अतिरिक्त अगले मंत्र में 'वायो तव सोमपीतये' पद भी आया है, जहाँ 'सोमपीतये' स्वयं सोमपान का बोध कराता है। अतः यह स्पष्ट है कि स्वामी दयानन्द ने भी इस संदर्भ में पानार्थक अर्थ को ही स्वीकार किया है।

 निरुक्त में श्री यास्क कहते हैं - "दर्शनीया इमे सोमाः अलंकृताः, तेषां पिब।" यहाँ 'पाहि' का अर्थ 'पिब' है। अतः उक्त मंत्र में दयानन्द के भी अर्थ से परमात्मा का सोमरस और लड्डू-कचौड़ी खाने के लिए आवाहन करना सिद्ध हुआ।

सत्यार्थ प्रकाश के ११वें समुल्लास में दयानन्द ने लिखा है कि - "वेद में परमात्मा के आवाहन-विसर्जन करने का एक भी शब्द नहीं है।" दयानन्द की यह बात भी उनके किए इस अर्थ से ही झूठी सिद्ध हो गई, क्योंकि इस वेदमंत्र में सोमरस का पान कराने के लिए परमात्मा का आवाहन स्वयं दयानन्द ने ही किया है। निरुक्त भी इसका समर्थन कर रहा है।

वेद का अन्य प्रमाण भी देखे - ऋग्वेद ५।५१।५ का मंत्र हैं - "वायवायाहि वीतये जुषाणो हव्यदातये। पिबा सुतस्य।" । दयानन्द ने आर्याभिविनय में यहाँ 'वायु' का अर्थ परमात्मा किया है। इस मंत्र में 'पिबा सुतस्य' का सीधा अर्थ है - "हे वायो! आओ और सोमरस का पान करो।" यहाँ 'सुत' सोमरस का ही एक प्रसिद्ध नाम है। व्याकरण की दृष्टि से 'कर्मादीनामपि सम्बन्धमात्रविवक्षायां षष्ठ्येव' के अनुसार कर्म के अर्थ में भी षष्ठी-विभक्ति का प्रयोग स्वीकार किया गया है। इसलिए 'सुतस्य' का सम्बन्ध भी पान के विषय से ही है। इस प्रकार यह मंत्र भी स्पष्ट करता है कि 'पाहि' का अभिप्राय 'पिब' अर्थात् पीना ही है। और जब पान की क्रिया का उल्लेख है, तो वह मुख द्वारा ही संपन्न होती है। अतःइस वर्णन से परमात्मा का दिव्य आकार का होना भी सिद्ध होता हैं।

एवं एक स्थान पर रखे सोमरस को पीने के लिए परमात्मा को भी एकदेशी होना पड़ेगा। तो सर्वदेशी का सर्वदेशत्व भी बना रहे और उसे एकदेशी मानकर उसकी पूजा करना, यही मूर्तिपूजा का सिद्धान्त है। अतः इस वेदमंत्र से परमात्मा का आवाहन करना, उन्हें भोग लगाना, पेय पदार्थ समर्पित करना वेदसम्मत सिद्ध हुआ, और वह भी उस वेदमंत्र से ही, जिसका अर्थ स्वयं दयानन्द करके गए हैं।

अतः मूर्तिपूजा और परमात्मा का आवाहन तो वेदसम्मत सिद्ध होते हैं, और मूर्तिपूजा-अवतारवाद विरोधी दयानन्दी सिद्धान्त अवैदिक, विरोधाभाभासी और भ्रमपूर्ण सिद्ध होते हैं। आखिर झूठ को कहाँ तक बचाया जाए, सत्य को कहाँ तक छिपाया जाए?
✍️ शचीन्द्र शर्मा 
5/7/2026 फेसबुक पोस्ट रविवार आषाढ़ कृष्ण ५ विक्रय संवत २०८३ 
आर्याभिविनय पुस्तक में दयानन्द का लिखा हुआ अर्थ। यह भी ध्यान रहे कि "सर्वात्मा" शब्द भी इस पुस्तक में नहीं था, बाद में दयानंदियों ने जब ये छापी पुस्तक तो इसमें प्रक्षेप किया कि कही वैदिक सिद्धान्त सिद्ध न हो जाए , किन्तु इससे भी इनकी जान नहीं छूटती हैं। 
- शचीन्द्र शर्मा  @followers के लिए टिप्पणी 

Saturday, 4 July 2026

बूटाटी नाम लकवा रोग की निशुल्क चिकित्सा

खम्मा घणी सा! बुटाटी धाम रा संत चतुरदास जी महाराज री महिमा अपरम्पार है। आ म्हारे मारवाड़ री वो पावन धरती है जठै आज भी विज्ञान ऊंधे मूं धड़ाम पड़ जावै और महाराज रो परचो (चमत्कार) डंको बजावै।
### ## 1. राजा री फौज और अंधो सिपाही (पैलो मोटो परचो)
बात जुनाणी है, जणा महाराज चतुरदास जी बुटाटी रै झाड़-झांखां (जंगलों) में धुणी रमां'र तपस्या कर्यो करता। उण बखत उण रस्ते सूं एक राजा री फौज निकल रही ही। फौज रो एक सिपाही आँखों सूं आंधो हो और उण नै लकवो भी मार गयो हो, जणै उणने घोड़ा माथै बांध'र लाया करता।
फौज जणा बुटाटी कनै विश्राम कर्यो, तो राजा महाराज री धुणी माथै गयो और हाथ जोड़'र बोल्यो—*"हे संत! म्हारो आ सिपाही जंग रो मोटो सूरवीर है, पण आंख्यां री रोशनी चली गयी और आंग (शरीर) टूट गयो। कृपा करो।"*
महाराज चतुरदास जी आंख खोल्या, धुणी सूं **एक चिमटी भभूत** उठाई और उण सिपाही री आंख्यां माथै और लकवा वाळा आंग माथै लगा दी। चमत्कार ओ होयो सा, कि सिपाही उण इच पल में 'जय चतुरदास जी री' बोल'र बैठ गयो! उणरी आंख्यां री जोत पाछी आ गयी और हाथ-पग चालण ढुक गया। राजा ओ परचो देख'र महाराज रै चरणां में गिर गयो।
### ## 2. सात फेऱ्यां री रीत और बूढ़े मिनख री लाठी
एक बार एक बूढो मिनख, जको बिल्कुल खाट (पलंग) पकड़ रख्यो हो, उणरा बेटा उणने खाट समेत बुटाटी ले'र आया। मिनख रो आधा सूं बेसी शरीर पत्थर ज्यूँ कड़क हो गयो हो, न बोल सकतो न हिल सकतो।
मंदिर रा पुजारी कया—*"महाराज माथै भरोसो राखो और सात दिन री फेरी शुरू करो।"*
 * **पैली और दूजी फेरी:** बेटा बाप ने गोदी में उठा'र परिक्रमा दिलवाई।
 * **तीजी और चैथी फेरी:** बूढ़े मिनख रै शरीर में थोड़ी सुगबुगाहट हुई, उणरा हाथ हिलण ढुक गया।
 * **पाँचवी फेरी:** मिनख अपणै बेटां रो हाथ पकड़'र हळके-हळके पाँव धरती माथै टिकायो।
 * **छठी फेरी:** उण लाठी रो सहारो लियो।
 * **सातवीं फेरी:** ज्यूँ ही सातवीं फेरी पूरी हुई, बूढो मिनख लाठी ने फैंक दियो और खुद दौड़'र महाराज री समाधि रै ढोक दे दी! उणरी आँखों सूं आंसू बगण ढुक गया। ओ कोई एक दिन री बात कोनी सा, बुटाटी में आज भी हर महीने इणिया का सैंकड़ों परचा आँखों देख्या मिले है।
### ## 3. गूंगी जीभ रो बोलणो
लकवा सिर्फ हाथ-पग में ही कोनी आवै, कई बार जीभ माथै भी आ जावै, जण सूं मिनख गूंगो हो जावै। एक बार एक छोटी बच्ची ने लकवो मार गयो और उणरी जीभ बिल्कुल बंद हो गयी। घरका रो-रो'र बेहाल हो गयो। बिकानेर-जोधपुर का सगा डॉक्टर दिखा दिया, पण कोई आराम कोनी मिल्यो।
थक-हार'र वे बुटाटी आया। महाराज री आरती रो संपुट (भजन) चाल रह्यो हो। बच्ची समाधि कनै बैठी ही। पुजारी जी आरती रो दीवो फिरा'र **चमत्कारी तेल री दो बूंद** उण बच्ची री जीभ माथै टपकाई।
तेल री बूंद जीभ माथै गिरतां ही, उण बच्ची रै शरीर में एक करंट सो आयो और वा जोर सूं चिल्लाई—*"मां... म्हारा चतुरदास जी महाराज!"* जो बच्ची सालां सूं गूंगी ही, वा बोलण ढुक गयी। पूरा मंदिर परिसर में महाराज रा जयकारा गूंज गया।
> **"धिन-धिन तपोभूमि बुटाटी, जठै मिटै हर रोग री माटी।**
> **चतुरदास जी रा परचा भारी, चरणां में आवै दुनिया सारी।"**
### ## आज रो साच (2026 में भी परचो)
साचा मानो सा, आज सायन्स इतनी आगे बढ़ गयी है, पण बुटाटी धाम में आज भी न कोई डॉक्टर है, न कोई अंग्रेजी दवाई। बस महाराज री **आरती री भभूत, समाधि री पवित्र माटी (रज), तेल री मालिश और वो सात दिन री फेरी**। जका मिनख व्हीलचेयर माथै आवे है, वे सात दिन बाद हँसता-कूदता अपणै घराँ पाछा जावै है। ओ महाराज चतुरदास जी रो वो अमर आशीर्वाद है, जको सदियों बाद आज भी मारवाड़ री साख बढ़ा रह्यो है।

**चतुरदास जी महाराज और बुटाटी धाम** की कहानी राजस्थान के नागौर जिले (मेड़ता के पास) की एक ऐसी चमत्कारी और पावन गाथा है, जो आस्था, सेवा और असाध्य रोगों से मुक्ति का सबसे बड़ा केंद्र मानी जाती है। यह कहानी आज से लगभग 500 साल पुरानी है।
आइए जानते हैं संत चतुरदास जी महाराज के जीवन और बुटाटी धाम की महिमा की पूरी कहानी:
### ## 1. कौन थे संत चतुरदास जी महाराज?
संत चतुरदास जी महाराज का जन्म मारवाड़ की पावन धरती पर एक चारण परिवार में हुआ था। वे शुरुआत से ही सांसारिक मोह-माया से दूर, ईश्वर भक्ति और जन-सेवा में लीन रहते थे। घूमते-घूमते उन्होंने नागौर के **बुटाटी गाँव** को अपनी तपोभूमि बनाया।
वे एक सिद्ध संत थे। उन्होंने यहाँ के जंगलों में कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी साधना इतनी उच्च कोटि की थी कि उनके मुखमंडल पर एक अलौकिक तेज था।
### ## 2. सेवा का संकल्प और लकवे (Paralysis) का इलाज
एक बार बुटाटी गाँव और आसपास के क्षेत्रों में कई लोग लकवे (पैरालिसिस) की बीमारी से पीड़ित थे। उस दौर में इस बीमारी का कोई सटीक इलाज नहीं था और पीड़ित व्यक्ति पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता था।
संत चतुरदास जी महाराज से लोगों का यह कष्ट देखा नहीं गया। उन्होंने अपनी कठिन तपस्या से प्राप्त सिद्धियों और ईश्वर की भक्ति को पूरी तरह से इन बीमार लोगों की **सेवा** में समर्पित कर दिया। वे अपनी दिव्य शक्तियों, जड़ी-बूटियों और आशीर्वाद से लकवे के रोगियों को ठीक करने लगे। उन्होंने प्रण लिया कि वे जीते जी किसी भी लाचार को अपने दर से निराश नहीं लौटने देंगे।
### ## 3. जीवित समाधि और अमर आशीर्वाद
बरसों तक जन-सेवा करने के बाद, जब चतुरदास जी महाराज का अंतिम समय निकट आया, तो उन्होंने बुटाटी धाम में ही **जीवित समाधि** ले ली।
समाधि लेने से पहले उन्होंने अपने भक्तों को आशीर्वाद दिया कि—*"मैं भले ही सशरीर तुम्हारे बीच न रहूँ, लेकिन मेरी समाधि हमेशा जागृत रहेगी। जो भी कोई लकवे से पीड़ित व्यक्ति मेरी समाधि पर आएगा और श्रद्धा से फेरी (परिक्रमा) लगाएगा, वह पूरी तरह ठीक होकर अपने पैरों पर लौट जाएगा।"*
### ## 4. आज भी जारी है चमत्कार: बुटाटी धाम की महिमा
चतुरदास जी महाराज के समाधि लेने के सदियों बाद आज भी बुटाटी धाम में वही 'चमत्कार' और सेवा भाव देखने को मिलता है। यहाँ इलाज की एक अनोखी परंपरा है:
 * **7 दिनों की परिक्रमा (फेरी):** यहाँ लकवे से पीड़ित मरीजों को लगातार 7 दिनों तक सुबह और शाम महाराज जी की समाधि की परिक्रमा दिलवाई जाती है।
 * **भभूत और तेल की मालिश:** मंदिर की अखंड जोत की छाई (भभूत) और विशेष तेल से मरीज के प्रभावित अंगों पर मालिश की जाती है।
 * **पूरी तरह निशुल्क सेवा:** यहाँ न तो कोई डॉक्टर है, न कोई दवाई और न ही कोई फीस ली जाती है। मंदिर की तरफ से मरीजों और उनके परिजनों के रहने और खाने (निशुल्क भोजनशाला) की पूरी व्यवस्था की जाती है।
देश भर से जो मरीज स्ट्रेचर या व्हीलचेयर पर आते हैं, वे यहाँ 7 दिनों की फेरी पूरी होने के बाद अपने पैरों पर चलकर वापस लौटते हैं।
### ## निष्कर्ष
जहाँ मेड़ता की मीराबाई ने 'प्रेम और त्याग' की मिसाल पेश की, वहीं उनके पास ही बुटाटी धाम के चतुरदास जी महाराज ने **'सेवा और लोक-कल्याण'** का ऐसा दीप जलाया, जिसकी लौ सदियों बाद आज भी लाखों दुखी लोगों के जीवन में उजाला कर रही है।
ShusiMarwadi

Friday, 3 July 2026

विष्णु का प्रत्यक्ष रूप सूर्य है (भर्गो देवः) किन्तु वह तत् सविता नहीं है। यह (सूर्य) पृथ्वी का सविता है, उसका सविता ब्रह्माण्ड है जो स्वायम्भुव मण्डल से उत्पन्न है। उसका भी सविता अव्यक्त ब्रह्म ही तत् सविता हैं।

मित्र वरुण अर्यमा
१. विवाद-
२००६ ई में बंगलोर के भारतीय विज्ञान संस्थान (IISC) के एक सम्मेलन में एक भाषण के में मैंने ऋग्वेद के मन्त्र (१/२२/२०) में विष्णु के परम पद पर टिप्पणी की कि यह ब्रह्माण्ड के विषय में है जिसकी माप सूर्य सिद्धान्त (१२/९०) में है तथा लिखा है कि वह सूर्य किरण प्रसार की अन्तिम सीमा है। विष्णु का प्रत्यक्ष रूप सूर्य है (भर्गो देवः) किन्तु वह तत् सविता नहीं है। यह पृथ्वी का सविता है, उसका सविता ब्रह्माण्ड है जो स्वायम्भुव मण्डल से उत्पन्न है। उसका भी सविता अव्यक्त ब्रह्म ही तत् सविता है (गायत्री मन्त्र के प्रथम और द्वितीय पाद)। ब्रह्माण्ड की वही माप ऋक् (१/१६४/१२) तथा कठोपनिषद् (१/३/१) में है जहां परार्ध योजन कहा है। परा = १०घात १७, इसका आधा ब्रह्माण्ड की परिधि है, अतः इस संख्या परा को प्रायः परार्ध कहते हैं। (ऋक् (१/१२३/८) के अनुसार उषा सदा ३० योजन सदा वरुण (पश्चिम) दिशा में पीछे रहती है। भारत में सूर्य से १५ अंश पश्चिम तक उषा काल मानते हैं। विषुव रेखा पर यह ३० धाम होगा। अतः इस धाम योजन का मान विषुव परिधि का ७२० भाग = ५५.५ किमी होगा। इस तर्क के औचित्य पर विवाद हो सकता है। किन्तु अचानक कुछ व्यक्ति अपनी विख्यात शास्त्रार्थ शैली में मञ्च की तरफ आक्रमण के लिए बढ़े तथा हल्ला किया कि मैं सायण का भक्त तथा दयानन्द का शत्रु हूं। उसके कुछ पूर्व वहां के एक वैज्ञानिक की आतंकवादियों ने हत्या की थी, अतः सुरक्षा कर्मचारी दौड़े और कुछ शास्त्रार्थ महारथियों को रस्सी से बान्ध कर बाहर ले गये। बचे महारथियों से कहा कि सायण या दयानन्द ने इस विषय में कुछ नहीं कहा है तो उनकी भक्ति या शत्रुता का क्या अर्थ है। उस समय स्वामी दयानन्द सरस्वती की पुस्तक आर्याभिविनय स्तोत्र बांटी जा रही थी। उसमें प्रथम मन्त्र के सभी ६ पारिभाषिक शब्दों का एक ही अर्थ परमेश्वर किया गया था। ब्रह्म एक होने का यह अर्थ नहीं है कि वेद के सभी शब्दों का अर्थ केवल परमेश्वर किया जाय। केवल राम नाम जपना पर्याप्त था। तब मनुष्यों के भी अलग-अलग नाम नहीं होने चाहिये। सुरक्षा अधिकारियों के द्वारा छोड़े जाने पर मैंने कहा कि इन ६ शब्दों में किसी २ का अन्तर कोई बता दे तो उसके साथ शास्त्रार्थ का आनन्द आयेगा। १७ वर्ष के बाद भी कोई उनका अन्तर बताने के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि भक्ति में कमी हो जायेगी।
२. मन्त्र और अर्थ-
शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्यर्यमा।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुक्रमः॥
(ऋक्, १/९०/९, ऋक्, १९/९/६,७, वाज. यजु, ३६/९, तैत्तिरीय आरण्यक, ७/१/१)
सामान्य अर्थ है कि मित्र, वरुण, अर्यमा, इन्द्र, बृहस्पति, उरुक्रम विष्णु हमें शान्ति दें।
सभी ६ शान्ति दाताओं को परमेश्वर कहने पर इस मन्त्र में या अन्य वेद मन्त्र में एक ही शब्द का बारम्बार प्रयोग निरर्थक हो जाता है।
३. आकाश में अर्थ-
(क) आदित्य- आकाश के ३ धामों में मूल स्वरूप अन्तरिक्ष में दीखता है। मूल रूप से आदि हुआ था, अतः इनको आदित्य कहते हैं। स्वयम्भू मण्डल १०० अरब ब्रह्माण्डों का समूह है, जिसके भीतर अन्तरिक्ष (ब्रह्माण्डों के बीच खाली स्थान) अर्यमा है। जिस ऊर्जा से निर्माण होता है वह मित्र है, जिससे निर्माण नहीं होता वह वरुण है। या निकट (सौर मण्डल) का आदित्य मित्र है, दूर के ब्रह्माण्ड का आदित्य वरुण है। सबसे ऊपर अपरिवर्तित या स्थिर आदित्य अर्यमा है। वरुण वाः (वारि) का क्षेत्र है जहां जल जैसा बहुत विरल पदार्थ फैला हुआ है। उसके कुछ भाग में निर्माण होता है, वह मित्र है। आकाश में ब्रह्माण्ड के अप् का क्षेत्र वरुण है। सौर मण्डल के भीतर ऊर्जा का प्रसार मित्र है। स्वयम्भू मण्डल १०० अरब ब्रह्माण्डों का समूह है, जिसके भीतर अन्तरिक्ष (ब्रह्माण्डों के बीच खाली स्थान) अर्यमा है। ब्रह्माण्ड में १०० अरब ताराओं के बीच का स्थान वरुण है। सौर मण्डल का आदित्य मित्र है। ब्रह्माण्ड या ब्रह्माण्ड में तारा संख्या की गणना शतपथ ब्राह्मण (१२/३/२/५) में है।
ब्रह्मैव मित्रः (शतपथ बाह्मण, ४/१/४/१, ५/३/२/४)
मित्रः (एवैनं) सत्यानां (सुवते(। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/७/४/१)
क्रिया भाग दक्षिण तथा निष्क्रिय भाग वाम हस्त है। अतः मित्र को दक्षिण और वरुण को वाम कहा है।
मैत्रो वै दक्षिणः। वरुणः सव्यः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/७/१०/१)
अप्सु वै वरुणः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/६/५/६) 
आभिर्वा अहमिदं सर्वं आप्स्यामि यदिदं किं चेति। तस्मादापोऽभवन्। तदपामप्त्वम्। (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/१/२)
ता या अमू रेतः समुद्रं वृत्वातिष्ठंस्ताः प्राच्यो दक्षिणाच्यः प्रतीच्य उदीच्यः समवद्रवन्त। तद्यत्समवद्रवन्त तस्मात्समुद्र उच्यते। ता भीता अब्रुवन्। भगवन्तमेव वयं राजानं वृणीमह इति। यच्च वृत्वातिष्ठंस्तद्वरणोऽभवत्। तं वा एतं वरणं सन्तं वरुण इत्याचक्षते परोक्षेण। (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/१/७)
सबसे ऊपर अर्यमा-एषा वा ऊर्ध्वा बृहस्पतेः दिक् तदेष उपरिष्टाद् अर्यम्णः पन्थाः। (शतपथ ब्राह्मण, ५/५/१/१२)
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋग्वेद, २/२७/८)
(ख) सौर मण्डल-सूर्य विष्णु का प्रत्यक्ष रूप है अतः उसे जगत् की आत्मा कहा है। उसी से हमारा जीवन चल रहा है।
सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च (ऋक्, १/११५/१, अथर्व सं, १३/२/३५, २०/१०७/१४, वाज.यजु, ७/४२, १३/४६, तैत्तिरीय सं, १/४/४३/१, २/४/१४/४, मैत्रायणी सं, १/३/३७, काण्व सं, ४/९, २२/५)
विष्णु के कई विक्रम कहे गये हैं-
यज्ञो विष्णुः स देवेभ्य इमां विक्रान्तिं विचक्रमे यैषामियं विक्रान्तिरिदमेव प्रथमेन पदेन पस्पाराथेदमन्तरिक्षं द्वितीयमेन दिवमुत्तमेन। (शतपथ ब्राह्मण, १/९/३/९)
इमे वै लोका विष्णोर्विक्रमणं विक्रान्तं विष्णोः क्रान्तम्। (शतपथ ब्राह्मण, ५/४/२/६)
स (विष्णुः) इमाँल्लोकान्विचक्रमेऽथो वेदानथो वाचम् (ऐतरेय ब्राह्मण, ६/१५)
एतद्वै देवा विष्णुर्भूत्वेमाँल्लोकानक्रमन्त यद्विष्णुर्भूत्वा क्रमन्त तस्माद् विष्णुक्रमाः। (शतपथ ब्राह्मण, ६/७/२/१०)
तद्वाऽहोरात्रेऽएव विष्णुक्रमा भवन्ति। (शतपथ ब्राह्मण, ६/७/४/१०)
अथर्व वेद (८/१०) के ६‍ खण्डों में विराट् (दृश्य जगत् के विभिन्न रूप) का वर्णन है। इसमें विक्रान्त (विभाजन), उदक्राम (उत्क्रान्त-बाहर निकलना) न्यक्रामत् (परिणत होना) शब्दों के प्रयोग हैं। जैसे-
(१०/१)-विराड् वा इदमग्र आसीत् (पुरुष सूक्त, वाजसनेयि, ३१/५- ततो विराड् अजायत, विराजो अधिपूरुषः। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः। अथर्व, १९/६/९)-विराड् अग्रे समभवत्----)
स उदक्रामत् सा गार्हपत्ये न्यक्रामत्॥२॥
विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः (ऋक्, १/१५४/१, अथर्व, ७/२६/१, वाज.सं. ५/१८, तैत्तिरीय सं. १/२/१३/३, काण्व सं. २/१०, मैत्रायणी सं. १/२९/१९/९)
शं नो विष्णुरुरुक्रमः (ऋक्, १/९०/९) उरुक्रमः ककुहो यस्य पूर्वीर्न मर्धन्ति युवतयो जनित्रीः (ऋक्, ३/५४/१४) स चक्रमे महतो निरुरुक्रमः समानस्मात्सदस एवयामरुत् (ऋक्, ५/८७/४) विश्वेत्ता विष्णुराभरद् उरुक्रमः त्वेषितः। सतं महिषान् क्षीरपाकमोदनं एमृषम्॥ (ऋक्, ८/७७/१०) उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः॥ (ऋक्, १/१५४/५) इयं मनीषा बृहन्तोरुक्रमा तवसा वर्धयन्ती। (ऋक्, ७/९९/६)
(१०/२)-स उदक्रामत् सा अन्तरिक्षे चतुर्धा विक्रान्ता अतिष्ठत्॥१॥
विष्णु के बहुत से क्रमों की सूची अथर्ववेद (१०/५) में है। कुछ के अर्थ हैं-
(१) त्रिविक्रम-३ प्रकार के प्रभाव क्षेत्र या साम (विष्णु सहस्रनाम में त्रिसामा कहा है)। ताप, तेज, प्रकाश या अग्नि-वायु-रवि (अथर्व, ५/१०/२७, मनु स्मृति, १/२३) मनुष्य रूप विष्णु वामन द्वारा बलि के प्रति राजनीति के ३ नियमों का प्रयोग। राजनीति के ४ अंग हैं-साम, दाम, दण्ड भेद। यदि बल हो तो दण्ड दिया जा सकता है। बल नही है तो अन्य ३ नियम होंगें जिनको छल (त्रिविक्रम = तिकड़म) कहते हैं-साम, दाम, भेद। मनस्तेज (अथर्व, ५/१०/२८)
(२) उरुक्रम-इसका अर्थ सामान्यतः त्रिविक्रम करते हैं। उरु = बड़ा। शरीर में सबसे बड़ी हड्डी जंघा को भी उरु कहते है। विस्तृत होने के कारण पृथ्वी को उर्वी (स्त्रीलिङ्ग रूप) कहते हैं। क्रम = डिजाइन, विशेष क्रम में स्थापित करना। सबसे बड़ा निर्माण नगर का होता है, अतः नगर को दक्षिण भारत में उरु या उर कहते हैं, जैसे चित्तूर, बंगलोर, तंजाउर। मनुष्य विष्णु ने शिल्पशास्त्र के अनुसार सबसे पहले नगरों का निर्माण किया अतः उनको उरुक्रम कहा गया। बाद में राजा वरुण ने भी उरु बनाये, अतः इराक का सबसे पुराना नगर उर है जहां की उर्वशी थी। 
उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋक्, १/२४/८) शं नो विष्णुरुरुक्रमः (ऋक्, १/९०/१)
(४) यज्ञ के ३ सवन-प्रातः, माधन्दिन और सायं। (अथर्व, १०/५/३१)
(५) दिशा के ३ विक्रम-३ आयामी आकाश में गति या घूर्णन (चक्रम) (अथर्व, ५/१०/२८)
(६) औषधि या सोम (अथर्व, ५/१०/३२)-रेतः, यश, श्रद्धा।  
रेतो वै सोमः (कौषीतकि ब्राह्मण उप. १३/७, शतपथ ब्राह्मण, १/९/२/९, तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/७/४/२ आदि) 
यशो वै सोमः (शतपथ ब्राह्मण, ४/२/४/९)
(ऋक्, १०/७२/१०)-यशो वै सोमो राजा (ऐतरेय ब्राह्मण, १/१३)
श्रद्धस्य सोम्येति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं (छान्दोग्य उपनिषद्, ६/१२/३) 
(७) कृषि रूप (अथर्व, ५/१०/३४)-यज्ञ, पर्जन्य, अन्न। पर्जन्य वरुण तत्त्व है।
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्न सम्भवः। 
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥(गीता, ३/१४)
(ग) आकाश का इन्द्र-इन्द्र परब्रह्म का स्वरूप है, जिसे कई अन्य नामों से भी कहते हैं-
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥ 
(ऋक्, १/१६४/४६, अथर्व, ९/१०/२८)
अव्यक्त ब्रह्म निर्विशेष तथा निराकार है। सृष्टि के लिए उसके कई प्रकार के क्रियात्मक रूप हैं।
(१) इन्द्र सृष्टि निर्माण के लिए ऊर्जा है।
(देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे) इन्द्रियस्य इन्द्रियेण। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/६/५/३)
इन्द्रस्य इन्द्रियेण अभिषिंचामि (शतपथ ब्राह्मण, ५/४/२/२, ऐतरेय ब्राह्मण, ८/७)
(२) शुनः इन्द्र-ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहां इन्द्र नहीं हो-
नेन्द्रात् ऋते पवते धाम किञ्चन । (ऋक्, ९/६९/६) 
यह शून्य में भी वर्तमान है, अतः इसे शुनः इन्द्र कहते हैं इस इन्द्र से इद्दर, ईथर (Ether) हुआ है, जो शून्य में भी वर्तमान है। 
(३) मघवा-वह मेघ की तरह पूरे आकाश या देश में छाया हुआ है अतः मघवा है। इसका मूल है-महि (मंह) वृद्धौ (धातु पाठ, १/४२२) इसका अन्य अर्थ पूज्य करते हैं (मह पूजायाम्-१/४८५, ११/३२)। 
शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रम्। (ऋक्, ३/३०/२२)। 
(२) मनु तत्त्व-यन् मनः स इन्द्रः (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ४/११)
शून्य में वर्तमान मन का मूल रूप था श्वो-वसीयस (शून्य में वास करने वाला)-
असतोऽधि मनोऽसृज्यत। मनः प्रजापतिं असृजत। प्रजापतिः प्रजा असृजत। तद् वा इदं मनस्येव परमं प्रतिष्ठितम्। यदिदं किं च। तत् एतत् श्वोवस्यसं नाम ब्रह्म। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/२/९/१०)
उसके खण्ड १०० अरब ब्रह्माण्ड और हमारे ब्रह्माण्ड के १०० अरब तारा हैं। इनकी माप शतपथ ब्राह्मण (१२/३/२/१-५) में है। मुहूर्त्त (४८ मिनट) को ७ बार १५ से भाग देने पर लोमगर्त्त होगा (सेकण्ड का प्रायः ७५,००० भाग)। शतपथ ब्राह्मण (१०/४/४/२) के अनुसार १ संवत्सर में जितने लोमगर्त्त हैं, आकाश में उतने ही नक्षत्र हैं (स्वयम्भू मण्डल के लिए ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड के लिए तारा)। यह १० घात १२ है, पुरुष विश्व का १० गुणा है, अतः 
१० घात ११ (१०० अरब) = दृश्य जगत् में ब्रह्माण्ड संख्या 
= हमारे ब्रह्माण्ड में तारा संख्या
= मनुष्य मस्तिष्क में कलिल (लोमगर्त) संख्या।
इन संख्याओं का अनुमान आधुनिक ज्योतिष में १९८५ के बाद हुआ है।
मनुष्य मन का विराट् रूप ब्रह्माण्ड है, अतः उसका अक्ष भ्रमण काल मन्वन्तर है।
(३) क्रिया रूप-इन्द्र ऊर्जा से क्रिया होती है, उसका सञ्चालन केन्द्र हृदय है, कार्य का क्षेत्र वाक् है।
हृदयमेव इन्द्रः (शतपथ ब्राह्मण, १२/९/१/१५)
यन् मनः स इन्द्रः (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ४/११)
प्राण एव इन्द्रः (शतपथ ब्राह्मण, १२/९/१/१४)
वाक् इन्द्रः (शतपथ ब्राह्मण, ८/७/२/६)
इसकी प्रतिमा मनुष्य मन शरीर के अंगों को संचालित करता है, अतः उनको इन्द्रिय कहते हैं।
(४) १४ इन्द्र-ऊर्जा का घनीभूत रूप अग्नि है, जिसकी १४ जिह्वा हैं, अतः इन्द्र भी १४ है। अग्नि की ७ जिह्वा निगलने की (लेलायमाना) तथा ७ निकालने की (अर्चि) है। 
अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वेनो देवा अवसा गमन्निह। (ऋक्, १/९८/७, वाज. यजु, २५/२०)
काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा। 
स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः॥ (मुण्डकोपनिषद्, १/२/४) 
सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्, सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः (मुण्डकोपनिषद्, २/१/८)
शरीर के मन और उसका प्राण इन्द्र की भी १४ जिह्वा हैं-
तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा। (योग सूत्र, २/२७)
(५) इन्द्र और विष्णु-सूर्य इन्धन रूप में तेज का विकिरण करता है। इस अर्चि रूप के ३ क्षेत्र हैं-अग्नि, आदित्य, यम (मनु स्मृति, १/२३ के अनुसार अग्नि, वायु, रवि)। 
विष्णु रूप में आकर्षण करता है। यह भृगु है जिसके कारण घनत्व के ३ स्तर हैं।
अर्चिर्षि भृगुः सम्बभूव, अङ्गारेष्वङ्गिराः सम्बभूव। अथ यदङ्गारा अवशान्ताः पुनरुद्दीप्यन्त, तद् बृहस्पतिरभवत्। (ऐतरेय ब्राह्मण, ३/३४)
अग्निरादित्ययमा-इत्येतेऽङ्गिरसः ....वायुरापश्चन्द्रमा-इत्येते भृगवः (गोपथ ब्राह्मण पूर्व, २/९)।
दोनों में समन्वय से शान्ति और शक्ति होती है।
(६) वासव इन्द्र- ऊर्जा रूप इन्द्र विभिन्न पदार्थ रूपों में वास करता है, वह वसु या वासव इन्द्र है।
तत् सृष्ट्वा तदेव अनुप्राविशत्। तत् अनुप्रविश्य सत् च त्यत् च अभवत्। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/६)
ऊर्जा रूप ब्रह्म इन्द्र है, वह भी हर रूप में प्रविष्ट है-
रूपं रूपं वयो वयः (अथर्व सं, १३/१/४, काण्व सं, ८/१४)
= हर रूप एक वयन है-परस्पर सम्बन्ध का सूत्र या ऋषि (रस्सी) है, उनसे निर्माण वस्त्र बुनने जैसा वयन है। यह वयन जितने काल तक रहता है, वह भी वयः (वयस = आयु) है। 
रूपं रूपं अधुः सुते (वाज. सं, २०/६४)
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय।
इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दश॥ (ऋक्, ६/४७,१८, शतपथ ब्राह्मण, १४/५/१९)
= माया अर्थात् आवरण द्वारा फैली हुई इन्द्र ऊर्जा पुरु (पुर या रचना) रूप में आता है। वह रूप अलग से स्पष्ट दीखता है। सभी रूप उसके ही प्रतिरूप हैं, ये अनेक (सहस्रों) हैं।
(घ) बृहस्पति-सोम क्षेत्र ३ हैं-(१) चान्द्र मण्डल का देवसोम या राजसोम, (२) जहां तक सौर वायु जाती है वह पवमान सोम है। इसका केन्द्र बृहस्पति होने से यह बृहस्पति सोम है। (३) ब्रह्माण्ड सीमा तक ब्रह्मणस्पति सोम है।
निकट का सोम क्षेत्र चन्द्र कक्षा का गोल है जिसमें सूर्य का रौद्र तेज कुछ शान्त होने से यहां सृष्टि होती है। 
एतद्वै देवसोमं यत् चन्द्रमाः (ऐतरेय ब्राह्मण, ७/११)
सोमो राजा चन्द्रमाः (शतपथ ब्राह्मण, १०/४/२/१)
असौ वै सोमो राजा वोचक्षणश्चन्द्रमाः (कौषीतकि ब्राह्मण, ४/४, ७/१०)
ग्रहों में सबसे बड़ा बृहस्पति है, ग्रह कक्षाओं के बाद प्रायः खाली स्थान है जिसमें केवल इन्द्र या प्रकाश है। शून्य स्थान में भी इन्द्र है, वहां का पदार्थ पवमान सोम कहते हैं बृहस्पति (ग्रह) क्षेत्र में बृहस्पति सोम तथा ब्रह्माण्ड में ब्रह्मणस्पति सोम है। अतः २ भागों में विभाजन इन्द्र बृहस्पति है।
अग्निर्वाव पवित्रम्। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/३/७/१०) 
अयं वायुः पवमानः (शतपथ ब्राह्मण, २/५/१/५) 
(वायुः) यः पश्चाद् वाति। पवमान एव भूत्वा पश्चाद् वाति। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/३/९/६) 
तस्मादुत्तरत्ः पश्चादयं (वायुः) भूयिष्ठं पवते सवितृप्रसूतो ह्येष एतत् पवते। (ऐतरेय ब्राह्मण, १/७) 
सोमो वै पवमानः। (शतपथ ब्राह्मण, २/२/३/२२) 
बृहस्पतिर्ब्रह्म ब्रह्मपतिः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/५/७/४) 
वाग् वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः।(शतपथ ब्राह्मण, १४/४/१/२२) 
(यजु ३८/८) अयं वै बृहस्पतिर्योऽयं (वायुः) पवते। (शतपथ ब्राह्मण, १४२/२/१०)
बृहस्पतिर्वै देवानां ब्रह्मा (कौषीतकि ब्राह्मण, ६/१३, शतपथ ब्राह्मण, १/७/४/२१, ४/६/६/७)
४. लौकिक अर्थ-
भूगोल में भारत के पश्चिम भाग में निकट में मित्र (ईरान) तथा दूर में वरुण (ईराक, अरब) है। भारत का पूर्व भाग इन्द्र का क्षेत्र था (पूर्व के लोकपाल)। आज भी बर्मा से लेकर इण्डोनेसिया में इन्द्र सम्बन्धी वैदिक शब्द प्रचलित हैं। पूरा विश्व या उसका नियन्त्रक अर्यमा (अरबी में आजम) है।
व्यक्तिगत रूप से सहायक लोग मित्र हैं, शत्रु वरुण हैं, समाज या निरपेक्ष अर्यमा हैं।
क्षितिज के ऊपर गोल का पूर्व भाग मित्र, पश्चिम भाग वरुण है। इनको विभाजित करने वाली याम्योत्तर (उत्तर-दक्षिण) रेखा का उत्तर विन्दु वसिष्ठ तथा दक्षिण विन्दु अगस्त्य है। अतः इनको कुम्भज (आकाश रूपी कुम्भ से उत्पन्न) कहा है। स्थिर गोल अर्यमा है।
देव त्रिलोकी के मुख्य को इन्द्र कहते थे। इन्द्र तथा गरुड़ के भवन यवद्वीप सहित सप्त द्वीपों में थे। यहां द्वीप समुद्र, पर्वत, नदी या मरुस्थल से घिरा प्राकृतिक भूखण्ड है।
पूर्वस्यां दिशि निर्माणं कृतं तत् त्रिदशेश्वरैः (इन्द्र)॥५४॥
(जम्बूद्वीप = एसिया) की पूर्व दिशा के लिये वहां उदय पर्वत (पूर्व दिशा में पहले सूर्योदय) पर ३ सिर का ताल (स्तम्भ) इन्द्र का बनाया है। (४ त्रिभुजों से घिरा पिरामिड, या त्रिकोणाकार स्तम्भ)
तत्र पूर्वपदं कृत्वा पुरा विष्णुः त्रिविक्रमे। द्वितीयं शिखरे मेरोः चकार पुरुषोत्तमः॥५८॥
(वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड, अध्याय ४०)
पूर्व दिशा में प्रथम पाद यवद्वीप (सप्तद्वीप) के पूर्व भाग में गया जिसकी सीमा पर इन्द्र ने पिरामिड बनाया था। उसके बाद मेरु (उत्तर ध्रुव) तक द्वितीय पाद गया। तृतीय पद पुनः वापस भारत की पश्चिम सीमा (उज्जैन से ४५ अंश पश्चिम) तक गया जो राजा बलि के सिर पर था।   
यहां पूर्व पद का अर्थ है पूर्व दिशा में भू-परिधि का चतुर्थांश। उत्तर गोल में ४ पाद हैं-भारत वर्ष (उज्जैन मध्य रेखा के पूर्व पश्चिम ४५-४५ अंश, विषुव से उत्तर ध्रुव तक), पूर्व में भद्राश्व, पश्चिम में केतुमाल, विपरीत दिशा में कुरु वर्ष।
भद्राश्वं पूर्वतो मेरोः केतुमालं च पश्चिमे। 
वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठ तयोर्मध्यमिलावृतः॥२४॥
भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा। 
पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः॥४०॥ (विष्णु पुराण, २/२)
इस भारत वर्ष (भू पद्म का चतुर्थ अंश) में इन्द्र के ३ लोक थे-हिमालय से दक्षिण समुद्र तक भारत, मध्य में चीन ( वहां के लोग चीन को मध्य लोक कहते हैं), उत्तर में रूस, शिविर (साइबेरिया)। भारत का नेता (अग्रि) को अग्नि कहते थे। वह विश्व का भरण करने से भरत कहलाता था।
इन्द्र का काल वैवस्वत मनु (१३९०० ईपू) से १० युग = ३६०० वर्ष तक था। इस काल में १४ प्रमुख इन्द्र हुए। इन लोगों ने प्रायः १००-१०० वर्षों तक शासन किया अतः इन्द्र को शत-क्रतु या संक्षेप में शक्र कहते थे। 
नारद पुराण. अध्याय (१/४०) के अनुसार १४ मन्वन्तरों के १४ इन्द्र हैं-
(१) शचीपति, (२) विपश्चित्, (३) सुशान्ति, (४) शक्र, (५) विभु, (६) मनोजव, (७) पुरन्दर, (८) बलि, (९) अद्भुत्, (१०) शान्ति, (११) वृष, (१२) ऋभु, (१३) सुत्रामा, (१४) महावीर्य।   
बृहस्पति देवगुरु थे। वेद के अनुसार शब्द के लिए ब्रह्मा ने बृहस्पति को अधिकृत किया, जिन्होंने शब्द तथा उसके लिए चिह्न (दर्श वाक्) बनाये-
बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रं यत् प्रैरत् नामधेयं दधानाः॥१॥
उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचमुत त्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम्॥४॥ (ऋक्, १०/७१) 
वाग्वै बृहती तस्या एष पतिः तस्मादु बृहस्पतिः (शतपथ ब्राह्मण, १८/४/१/२२, बृहदारण्यक उपनिषद्, ३/२/३) 
बृहस्पति चीन के थे, अतः वहां हर शब्द के चिह्न रह गये। वहां ६० वर्ष का बार्हस्पत्य चक्र भी चल रहा है। शतपथ ब्राह्मण (१/२/३/२२-२६) के अनुसार इन्द्र ने उनको मनुष्य लोक (भारत) में भेजा था। उन्होंने यज्ञ विरोधी लोगों को पहले उल्टा उपदेश दिया जिससे वे यज्ञ के महत्त्व को समझें।
✍️ Arun Kumar Upadhyay fb post 28july2023
 (_वयं राष्ट्रे जागृयाम_ 4 July 2026 )

अंतरराष्ट्रीय चुटकुला दिवस

*।। अंतरराष्ट्रीय चुटकुला दिवस ।।*

हँसी और मुस्कान हमारे जीवन को खुशियों से भर देती हैं। *कल अंतरराष्ट्रीय चुटकुला दिवस था तो आइए हम हँसी के महत्व को समझें और इसे अपने जीवन में शामिल करें।*

*हँसी न केवल हमारे शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है, बल्कि यह हमारे मानसिक स्वास्थ्य को भी मजबूत करती है।* यह हमें तनाव और चिंता से मुक्ति दिलाती है और हमें जीवन के प्रति अधिक सकारात्मक बनाती है।

आइए हम हँसी को अपने जीवन में एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाएं और दूसरों को भी हँसाने का प्रयास करें। इससे न केवल हमारा जीवन खुशहाल होगा, बल्कि हम दूसरों के जीवन में भी खुशियाँ ला सकेंगे।

*हँसी के कुछ आध्यात्मिक लाभ:-*

1. *तनाव से मुक्ति*: हँसी हमें तनाव और चिंता से मुक्ति दिलाती है।
2. *सकारात्मकता*: हँसी हमें जीवन के प्रति अधिक सकारात्मक बनाती है।
3. *आत्म-विश्वास*: हँसी हमें आत्म-विश्वास बढ़ाती है और हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करती है।
4. *संबंधों में सुधार*: हँसी हमारे संबंधों में सुधार लाती है और हमें दूसरों के साथ बेहतर ढंग से जुड़ने में मदद करती है।

*आप सभी को अंतरराष्ट्रीय चुटकुला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!*

वर्ण व्यवस्था और वर्तमान स्थिति

देखिये आजकल कुछ बचा नहीं है ।
मूल बात को सबने खो दिया है ।
शास्त्र कहता है कि जिस पुरुष के वर्ण को बतलाने वाला जो लक्षण कहा गया है , वह यदि दूसरे वर्ण वाले में भी मिले तो उसे भी उसी वर्ण वाला जानना चाहिए ।।

पहले के समय में लक्षण और गुणों से एक ही पिता की संतानों को ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शुद्र हुआ करते थे , जिसे वर्ण बोला जाता था । 

अगर उसकी वृत्ति पवित्रता , शुद्ध आचरण , भगवद प्रेम , शास्त्रों का पठन पाठन इत्यादि है तो उसे ब्राह्मण बोला जाता था ।

अगर उसकी वृत्ति शासन करने की , युद्ध कला में माहिर , रक्षण आदि की वृत्ति है तो उसे क्षत्रिय ।

अगर उसकी उपरोक्त दोनों में से कोई न होकर धन उपार्जन में है और उसे व्यापार आदि में रुचि है तो वैश्य । 

और जिनकी रुचि उपरोक्त किसी में नहीं थी , जिनमें कोई गुण नहीं था , आचरण अपवित्र था , अपराधी स्वभाव वाले थे , उनका द्विज संस्कार नहीं किया गया , उसे शुद्र बोला गया ।

पहले ऐसे ही होता था ।
बहुत उदाहरण हैं शास्त्रों में । 

जैसे - 

राजा प्रियव्रत के 10 पुत्र हुए - आग्नीध्र , इध्मजिह्न , यज्ञबाहु , महावीर , हिरण्यरेता, धृतपृष्ठ, सवन , मेधातिथि , वीतिहोत्र और कवि । 

कवि , महावीर और सवन ये तीनों नैष्ठिक ब्रह्मचारी बनकर #ब्राह्मण हो गए । 

राजा प्रियव्रत के राजा आग्नीध्र हुए , उनके पुत्र राजा नाभि हुए , इनके पुत्र भगवान ऋषभ हुए ।
देखिये ये सब क्षत्रिय वृत्ति के ।

राजा ऋषभ ने राज्य किया तब तक वे क्षत्रिय थे , जब उन्होंने वन् में प्रस्थान किया तो #ब्राह्मणत्व धारण किया ।

अब इसमें देखिये ।

राजा ऋषभ के 100 पुत्र थे ।

सबसे बड़े भरत जिनके नाम पर भारतवर्ष पड़ा ।
इनके 9 पुत्र हुए जो योगीश्वर हो गए और #ब्राह्मण बन गए । 

81 पुत्र इनके कर्मकांडी ब्राह्मण हो गए । 
बाकी के 9 पुत्र क्षत्रिय हुए जिन्होंने राज्य किया और राजा बने । 

अब आगे और सुनिए ।

राजा प्राचीनबर्हि के 10 पुत्र हुए जिन्हें प्रचेता कहा जाता है , सब ब्राह्मण हो गए । देखिये #क्षत्रिय से #ब्राह्मण हो गए । 

मनुपुत्र करुष से कारूष नामक क्षत्रिय उत्पन्न हुए । वे बड़े ही ब्राह्मण भक्त और धर्मप्रेमी थे ।
मनुपुत्र धृष्ट से धार्ष्ट नामक क्षत्रिय हुए और अंत में वह इसी शरीर से #ब्राह्मण बन गए । 

कश्यप ऋषि के पुत्र हुए विवस्वान ।
विवस्वान के श्राद्धदेव मनु हुए ।  
मनु से 10 पुत्र हुए ।।

यहाँ देखते जाईये ब्राह्मण से क्षत्रिय , क्षत्रिय से ब्राह्मण , शूद्र , वैश्य सब बन रहे हैं ।

मनुपुत्र नरिष्यन्त हुए । इनसे चित्रसेन हुए ।
इनसे ऋक्ष हुए ।
ऋक्ष से मीढ़वान ।
मीढ़वान से कूर्च 
कूर्च से इन्द्रसेन 
इन्द्रसेन से वीतिहोत्र ।
वीतिहोत्र से सत्यश्रवा 
सत्यश्रवा से उरुश्रवा 
उरुश्रवा से देवदत्त 
देवदत्त से अग्निवेश्य 

अग्निवेश्य ब्राह्मण निकल गए । बहुत बड़े महर्षि हुए , ये जातुकर्णा के नाम से विख्यात हुए । 

ब्राह्मणों का अग्निवेश्यायन गोत्र उन्हीं से चला ।

अब आगे सुनिए और ।

मनुपुत्र दिष्ट हुए । इनसे नाभाग हुए ।
नाभाग वैश्य हो गए । 

नाभाग से वत्स्प्रीति । वतस्प्रीति से प्रांशु । 
प्रांशु से प्रमति ।
प्रमति से खनित्र ।
खनित्र से चाक्षुष । 
चाक्षुष से विविशन्ति 
इनसे रम्भ । रम्भ से खनिनेत्र ।
खनिनेत्र से क्रंधम । 
क्रंधम से अविक्षित । 
अविक्षित से राजा मरुत हुए जो चक्रवर्ती सम्राट हुए ।।

मतलब क्षत्रिय से वैश्य फिर वैश्य से क्षत्रिय ।

और बताऊँ तो सुनिए ।

राजा अक्रिय जो क्षत्रिय थे , उनके पुत्र से ब्राह्मण वंश चला ।

और सुनिए ।

विश्वामित्र क्षत्रिय थे , वह ब्राह्मण हो गए ।
इन्होंने ही गायत्री मंत्र को प्रकट किया था ।
और इन्हीं विश्वामित्र  के 49 पुत्र #म्लेच्छ हो गए ।

#शूद्र  भी नहीं , म्लेच्छ हो गए । मतलब और नीचे गिर गए ।।

और देखिये अभी । 

मन्युपुत्र गर्ग से शिनि और शिनि से गार्ग्य का जन्म हुआ ।
गार्ग्य क्षत्रिय था , फिर भी उससे ब्राह्मण वंश चला ।।

महावीर्य का पुत्र था दुरित्क्षय ।
इनके तीन पुत्र हुए । 
त्र्यारुणि , कवि और पुष्करिणी ।
ये तीनों ब्राह्मण हो गए । 

बृहत्क्षत्र का पुत्र हस्ती । 
इसी ने हस्तिनापुर बसाया ।

हस्ती के तीन पुत्र हुए । 

अजमीढ़ , द्विमीढ़  और पुरुमीढ़ ।

अजमीढ़ के पुत्र ब्राह्मण हो गए । 

भाग्यर्शव के पाँच पुत्र हुए । पांचों पांच देश का शासन करने में समर्थ थे , इसलिए पांचाल कहलाये ।।

इनमें से मुद्गल से मौद्गल्य नामक ब्राह्मण गोत्र की उत्पत्ति हुई ।।

नाभागारिष्ट का जो पुत्र हुआ , उसने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया ।
वह अपने क्षत्रिय वंश की स्थापना कर ब्राह्मण कर्म में प्रवृत्त हो गया ।

धृष्ट से धारष्ट हुए , वे क्षत्रिय थे लेकिन वह बाद में ब्राह्मण बन गए । 

करुष के पुत्र कारूष क्षत्रिय हो गए । 

राजा पृषध को ग़लती से बछड़े की हत्या करने पर उनके गुरु ने उन्हें शूद्र होने का शाप दे दिया ।।

ऐसे बहुत उदाहरण हैं ।

लेकिन क्या हुआ कालांतर में आते आते ब्राह्मण ब्राह्मण में ही विवाह करने लगे क्योंकि वह उनके आचार विचार से मेल खाते थे ।

ऐसे ही क्षत्रियों का हुआ ।
ऐसे ही वैश्यों का ।

फिर बचे शूद्र तो उन्होंने भी वैसे ही करना शुरू कर दिया ।

जिससे एक Blood की शुद्धता बनती चली गयी ।
blood clan या रक्त वर्ण के अनुसार सब हो गया ।

अब यह कलियुग में यह हो गया कि उसी प्रकार से सब जातियों में विभाजित हो गए ।

लोग मूल स्वरूप भूल गए और अपने ही clan में विवाह और आदान प्रदान हो गया ।।

आज उसी का यह विकृत रूप हो गया ।

आज ब्राह्मण वर्ग में जन्मे दारू , नशा , वेश्यावृत्ति करने पर भी यह शूद्र न होकर ब्राह्मण ही बने रहे । 

भले इनको एक शास्त्र की line तक न आती हो ।
बस यह है कि रक्त शुद्धता के कारण यह ब्राह्मण से सुशोभित किये जाते हैं ।

यह ऐसे ही हो गया कि किसी का पिता IAS बन गया तो उसका अनपढ़ पुत्र भी स्वयं को आईएएस मान रहा है ।
किसी के पिता प्रधानमंत्री जनता की मूर्खता और भावुकता के कारण बन गए तो उस राहुल गांधी को आज भी प्रधानमंत्री पद का दावेदार माना जाता है , यह जाति ही है जो जन्म लेने से आई है उस कुल में भले वह उसकी योग्यता न रखता हो ।

ये जितने POLITICIANS हैं , अखिलेश यादव , तेजस्वी यादव से लेकर अन्य जो परिवार के कारण अध्यक्ष पद लिए बैठे हैं , वह सब जाति ही तो पालन कर रहे हैं ।

रही सही कसर दम्भी लोगों ने जातियों के नाम पर उत्पात मचाना शुरू कर दिया और स्वयं की श्रष्ठता का दम्भ भरने लगे भले उनके पास एक भी लक्षण उस वर्ण के न हों ।

जब से यह जन्म पर आधारित हो गया , यह जातियाँ बन गयी और वर्ण ध्वस्त हो गया जो मूल तत्त्व था इसका ।

नहीं तो आज भी यह प्रथा है ।
आज हमारा गाँव ब्राह्मणों का है , लेकिन अगर किसी के चरित्र के विषय मे पता लग जाता है तो उसके यहाँ पानी तक पिया जाता ।।
उसको गाँव से बाहर तक निकाल दिया जाता है ।

आज भी हमारे यहाँ गांव में एक ब्राह्मण थे वह characterless थे , आज वह मर भी गए हैं तो उनके लड़के को जो अब 60 वर्ष की उम्र पहुंच गयी है , उनको आसन नहीं दिया जाता ।।
और पानी उनको मिट्टी के भरुके में दिया जाता है ।
अपने पात्र में उनको कोई पानी तक नहीं पिलाता । घर में किसी के वह घुस नहीं सकते ।।

तो ऐसा नहीं है कि यह शूद्रों के साथ ही किया जाता है ।
यह ब्राह्मणों में भी है ।

हमारे यहाँ के एक जानकार थे , युवावस्था में उन्होंने ग़लत लड़कों की संगति में आकर मांस खा लिया था ।
मुझे याद है उनकी माता जी ने उनको 28 दिन तक जब तक वीर्य शुद्ध नहीं हो जाता , तब तक उनको पत्तल में भोजन दिया जाता रहा । उनका खाट , बिस्तर सब अलग कर दिया गया था और वह खेत में सोते थे । 

तो यह रहा है शुरू से ।

यही कारण रहा कि शूद्रों को अलग थलग रखा जाता था । 
क्योंकि इनके आचरण में ही यह सब रहता ही रहता था ।।

लेकिन आज तो सब गड्डमगड्ड हो गया है ।

आज लक्षण , गुण और आचरण से नहीं बल्कि कुल से सब हो रहा है ।
भले शूद्र वर्ण में कोई सही आचरण या वृत्ति वाला व्यक्ति ही क्यों न पैदा हो रहा हो , वह भी गेहूं के साथ घुन की तरह पिस जाता है ।

लेकिन ऐसा भी नहीं रहा ।

संत रैदास जी चमार जाति से थे । 
लेकिन उन्हीं सन्त रैदास से हज़ारों ब्राह्मणों ने दीक्षा ली थी । 
और इनको भक्तमाल में स्थान मिला ।

यह सब जातियों का स्वरूप बिगड़ चुका है । 

अब वैसे भी लोग डरते हैं रक्त शुद्धता को लेकर । 

तो यह सब इसी तरह बन गया ।

लेकिन यह जातियाँ वर्ण इत्यादि का भगवद क्षेत्र में प्रवेश पूर्णतः वर्जित है ।

जातियाँ बस समाज तक है । 
इसके बाद भगवान के क्षेत्र में इनका कोई महत्व नहीं है ।

द्वापर युग मे जब युद्धिष्ठिर ने यज्ञ सम्पन्न किया तो भगवान श्रीकृष्ण ने एक शंख लाकर रख दिया कि जब आपके राज्य में सभी भगवद्प्रेमी और ब्राह्मण भोजन कर लेंगे तो यह स्वतः बजकर यज्ञ पूर्ण कर देगा ।

सभी राज्य के ब्राह्मणों  को भोजन करवा दिया गया लेकिन शंख नहीं बजा । 

तो भगवान तो अंतर्यामी हैं ही । उन्होंने युद्धिष्ठिर से कहा कि तुम्हारे राज्य में एक मेहतर है श्वपच वाल्मीकि । बस वही रह गया । भीम अर्जुन इत्यादि सब जायें और उसे आदरपूर्वक ले आएं ।।

भगवान की आज्ञा से भीम अर्जुन इत्यादि सब गए उसके झोपड़ी में । 
वह डर गया और रोने लगा कि मैं तो सड़क पर झाड़ू लगाने वाला व्यक्ति हूँ ।

लेकिन वह भगवान का बहुत बड़ा भक्त था बस छुपकर रहता था । 
कभी out नहीं होने दिया कि वह इस स्तर का है ।
लेकिन भीम अर्जुन उसे अपनी पालकी में स्वयं ढोकर राजमहल ले आये ।।

भगवान ने द्रौपदी से कहा कि इनके लिए तुम विभिन्न पकवान बनाओ ।
द्रौपदी ने ही परोसा । 
तो जब वह खाने लगे तो , शंख बजकर फिर चुप हो गया ।

अब श्रीकृष्ण ने कहा अरे अब क्या बात है ।
तो शंख की ओर क्रोध करके देखा तो शंख ने कहा कि भगवन मेरा कोई दोष नहीं , आप द्रौपदी से पूँछे ।

द्रौपदी ने बताया हाँ कि मेरे मन मे यह आया की पूरे दिन भर से मैं विभिन्न पकवान बना रही हूं और ये सभी पकवानों को एकसाथ मिलाकर खाने लगे तो इनको स्वाद कैसे पता लगेगा , मेरा परिश्रम बेकार जाते हुए देखकर मैंने सोचा कि है तो ये श्वपच वाल्मीकि जाति का ही न , इसे भोजन करना कहाँ आएगा ।

तो इसका कारण पूछा श्रीकृष्ण ने वाल्मीकि से कि भगवन आप बतायें आपने ऐसा क्यों किया कि सभी व्यंजनों को एक साथ मिलाकर खा रहे हैं ।

तो उन्होंने बताया कि प्रभु आपने पा लिया बस इसी को प्रसाद समझकर मैं इसे प्राप्त कर रहा था। अलग अलग भोजन करता तो सबका अलग अलग रस आता तो उसमें प्रसाद की भावना तिरोहित हो जाती और जिह्वा का रस ही रह जाता ।।

यह सुनकर द्रौपदी के मन में श्रद्धा हुई और उन्होंने प्रणाम किया ।

तब शंख ने बजकर यज्ञ की पूर्णाहुति की । 

इन्हीं शास्त्रों को सही सही न पढ़कर जय भीम प्रजाति जलाती , थूकती और चप्पल मारती है ।

अगर मन में कुछ जानने की अभिलाशा होती तो वह स्वयं किसी ब्राह्मण के पास जाकर इस सबका रहस्य पूछते ।।
आज इसीलिए यह सब इतनी वैमनस्यता आ गयी है ।

हाँ यह जानता हूँ कि हमारे यहाँ भी किसी को चाहे ब्राह्मण ही क्यों न हो , उसने कोई अपराध किया होता था तो सरपंच उसका घोड़ा पर बैठने का अधिकार , दाढ़ी मूंछ , पगड़ी पहनने का अधिकार छीन लिया जाता था और उन्हें गाँव से बहुत दूर कर दिया जाता था । उसको उसके वर्ण से भी च्युत कर दिया जाता था । 

यह उनका दंड होता था ।

जो आज एक प्रथा के रूप में विकसित हो गयी ।

अब उनके पूरे कुल को बहिष्कृत दृष्टि से देखा जाता है ।

जो कि पूरी तरह ग़लत है ।
ऐसा नहीं होता कि अपराधी के वंश में अपराधी ही जन्म लेगा ।।

इनको मंदिरों से प्रवेश वर्जित कर दिया गया था क्योंकि यह मंदिरों में बिना शुद्धता धारण किये हुए प्रवेश कर जाते थे । 
मांस रक्त चमड़ा आदि का कार्य करते हुए भी यह अशुचि अवश्था में ही मन्दिर की मर्यादा भंग कर देते थे ।
पहले शुद्र मन्दिर से स्वर्ण आदि चुरा ले जाते थे । 
इसीलिए स्वर्ण चोरी को 5 महापाप की श्रेणी में रखा गया ।

तभी से यह परम्परा के नाम पर विकसित होता चला गया और पूर्वजों के अपराधों को लेकर उनके सन्ततितियों को भी लपेट लिया गया ।

तो बस यही होता है कि सब चीजें समय के साथ स्वरूप बिगाड़ लेती हैं और एक ग़लत परम्परा के नाम पर बन जाती हैं ।

लेकिन अब वह बात नहीं रही है ।
धीरे धीरे यह सब समाप्त हो रहा है ।

आज भी सनातन धर्म सभी वर्णों को साथ लेकर चलती है ।।
शूद्र वर्णों का भी उतना ही महत्व है जितना सबका है ।
इनको प्रजा बोला जाता है ।
विवाह में यह जितना माँग ले , सब इनको दिया जाता है ।
अरे बस विवाह में थाली बजाने तक का इनको वस्त्र , सोने की अंगूठी , कई बोरे अनाज तक दिया जाता है ।

किसी का भी विवाह हो तो 1 लाख से ऊपर बटाई होती है प्रजा के लिए जिसमें इनको धोती साड़ी सब दिया जाता है ।

अगर 1 बीघा खेती होगी तो इनके लिए 1 बिस्सा ऐसे ही छोड़ दिया जाता है अनाज का कि ये इनका हिस्सा है ।

अस्तु । सार यही है कि कालांतर में सबका स्वरूप बिगड़ जाता है ।

मुख्य है भगवद भक्ति और भगवान के मार्ग पर जो चल गया , वह चांडाल उस ब्राह्मण से श्रेष्ठ है जो गुटखा खाकर पैर पूजवा रहा है ।।

बहुत से कथावाचक जो कि कई मेरे मित्र भी हैं , अपनी अज्ञानता का परिचय जातिगत श्रेष्ठता को लेकर कर रहे हैं और द्वेष फैला रहे हैं , वह बिचारे अपनी छोटी बुद्धि के मारे हैं । उनको कुछ नहीं पता , उनको जाति और वर्ण तक में भेद नहीं पता तो उनको क्या ही कहा जाय ।

लेकिन इससे कुछ नहीं मिलेगा ।
 कितना भी श्रेष्ठ बन लो , मरने के बाद यह नहीं पूछा जाएगा कि यह ब्राह्मण था या शूद्र । उसे उसके कर्मों के अनुसार दण्ड और पुरस्कार मिलेगा । अपितु 50 Extra कोड़े उस ब्राह्मण को लगाए जायेंगे जो ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बावजूद भी पशुवत कार्य करता रहा और समाज को जोड़ने की बजाय जातिगत विषमता फैलाकर लोगों को भगवद तत्त्व से विमुख करने में लगा रहा । 

मुझे अच्छी तरह पता है कि जातीय विदूषक और दम्भी इस पोस्ट पर गालियाँ देंगे और इसको पढ़कर भी इसको आगे प्रसारित नहीं करेंगे लेकिन यह सदा से होता आया है कि पूरे सोशल मीडिया पर यही पोस्ट घूमती मिलेगी विभिन्न नामों से और बड़े बड़े न्यूज channels पर इसी तथ्य को लेकर debate किये जाते हैं ।।

फिर भी बहुत से लोग हैं जो मुझे जानते हैं और वही इन सब बातों का प्रचार प्रसार करेंगे ।

इतना लंबा पढ़ने के लिए धन्यवाद ।

- @topfans 
(श्वेताभ पाठक)
30/6/2026 

Shwetabh Pathak Shwet Prem Ras 

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Thursday, 2 July 2026

घूस उपनिषद्(विकृतार्थ सहित)

घूस उपनिषद्
(विकृतार्थ सहित)
१. अथातो घूस जिज्ञासा।
= घूस तत्त्व तथा महत्व जानने की इच्छा है।
२. परिभाषा-अपना इच्छित कार्य कराने के लिए सरकारी कार्यालय में घुसने के लिए जो धन देना पड़ता है, उसे घूस कहते हैं।
राम दुआरे तुम रखवारे। 
होत न आज्ञा बिनु पैसा-रे॥
३. अन्य शब्द-
भेंटी = सरकारी अधिकारी से भेंट करने के लिए खर्च।
रिश्वत = अज्ञात अधिकारी से रिश्ता बनाने के लिए दिया धन। इसके विशेषज्ञ को सम्मान से रिश्वतश्री या रिशुश्री भी कहते हैं।
लांच (ओड़िया में प्रचलित) -कार्यालय अधिकारी को अपना काम कराने के लिए खिलाने को लांच कहते हैं। अतः कार्यालय समय के भोजन का नाम अंग्रेजी में लंच हो गया है।
४. धन का महत्त्व-रुपया (टंका) ही जीवन में सबकुछ है।
टका धर्मः टका स्वर्गः,टका हि परमां गतिः।
यस्य गृहे टका नास्ति, हा टके टकटकायते॥
(टका पर ध्यान केन्द्रित करने को टकटकी कहते हैं)।
यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः, स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः।
स एव वक्ता स च दर्शनीयः, सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति॥
५. सच्चा गुरु-विज्ञान, गणित, इंजीनियरिंग आदि पढ़ाने वाले असल गुरु नहीं हैं। परम गुरु वही है, जिसने अखण्ड मण्डलाकार (गोल सिक्का) पाने का मार्ग दिखाया।
अखण्ड मण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरवे नमः॥
६. सुकर्मी = सुकर्मी या सुकृति वह है, जिसके घर में रखी सम्पत्ति अभी तक छिपी हुई है, अर्थात् अलक्ष्मी है। उसी को बुद्धिमान भी कहा जा सकता है।
या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः।
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः।
(चण्डी पाठ, ४/५)
७. श्रेय मार्ग-जिससे श्री या प्रतिष्ठा मिले, उसी मार्ग पर चलना चाहिए। यह जिससे संपरेगा, वही धीर है।
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते॥
(कठोपनिषद्, १/२/२)
जिसके पास आय से अधिक सम्पत्ति (असम्भूति) है, वह अन्धकार में जाता है, कभी कभार निगरानी विभाग द्वारा पकड़ा जाता है। किन्तु वह पैसा दे कर छूट सकता है। उससे भी घने अन्धकार में वह जाता है, जिसके पास सीमित आय है, उसके पास घूस दे कर बचने के लिए कुछ नहीं है। नहीं भी पकड़ा जाए, तो वह धन के अभाव में सदा दुःखी तथा निन्दित रहता है।
✍️ Arun kumar Upadhyay 
2 july 2026 / Facebook post 
आषाढ़ कृष्ण २ विक्रम संवत २०८३ गुरुवार