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Thursday, 29 October 2026

संकष्ट चतुर्थी व्रत

जिस दिन एक आधुनिक स्त्री से यह कहा गया कि करवा चौथ केवल 'पुरुष की गुलामी' है, ठीक उसी दिन हमने ब्रह्मांड के सबसे प्रचंड क्वांटम भौतिकी और जैविक विज्ञान पर धूल फेंक दी। 

यह कथा किसी भूखी, लाचार नारी के गिड़गिड़ाने की नहीं है—यह उस महाशक्ति का सीधा तांडव है जो विधाता की लिखी तकदीर के पन्ने को बीच बाज़ार फाड़कर अपने पति के प्राण छीन लाती है। यदि आप इसे अब भी केवल एक अंधविश्वास और पाखंड मानते हैं, तो अपनी बौद्धिक समझ की कब्र पर माथा टेकने से पहले इस एक आलेख को पढ़ लीजिए; आपकी धारणाओं के परखच्चे उड़ने वाले हैं...

 क्या कभी आपने किसी हाड़-मांस की देह को काल (मृत्यु) की पुतलियों में सीधी आंखें डालकर बात करते देखा है? कार्तिक की उस घोर अंधियारी रात जब चांद निकलता है, तब छतों पर खड़ी लाल जोड़े वाली स्त्री दरअसल पानी के घूंट के लिए नहीं तरस रही होती—वह अपनी रीढ़ के भीतर सोई उस कॉस्मिक शक्ति को जगा रही होती है जो मृत्यु की दिशा बदल देती है। जिसे दुनिया 'उपवास' कहकर खारिज करती है, विज्ञान की आधुनिक प्रयोगशालाएं आज उसे 'बायो-इलेक्ट्रिकल शील्ड' कह रही हैं। रुकिए, और सांस थामकर जानिए कि जब छलनी के पार चांद देखा जाता है, तो असल में उस क्षण ब्रह्मांड में क्या घट रहा होता है...

नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों की रिसर्च, प्रकाश का विवर्तन, पृथ्वी की अर्थिंग और मस्तिष्क की अल्फा-तरंगें... क्या ये सब एक मिट्टी के करवे और छलनी में समा सकते हैं? जवाब है—हाँ। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जिस देश ने खगोल और देह-विज्ञान को एक धागे में पिरोकर 'करक चतुर्थी' जैसा अजूबा रचा, उसी देश की नई पीढ़ी इसे 'सामंती ढकोसला' समझकर हंस रही है। उपहास उड़ाने से पहले यह 1800 शब्दों का वैज्ञानिक दस्तावेज पढ़ लीजिए; दावा है कि इसके बाद आप इस परंपरा के आगे सिर झुकाने पर विवश हो जाएंगे।

जो लोग सनातन की कालजयी परंपराओं को आधुनिकता के छिछले और संकीर्ण चश्मे से देखकर करवा चौथ को केवल ‘स्त्री पर थोपा गया एक सामंती उपवास’ करार देते हैं, वे वस्तुतः ब्रह्मांड के उस सूक्ष्मतम ऊर्जा-विज्ञान, तात्विक संतुलन और प्रामाणिक शास्त्र-विधान से सर्वथा अनभिज्ञ हैं जिसे सहस्राब्दियों पूर्व भारत की ऋषि-प्रज्ञा ने आत्मसात किया था। करवा चौथ किसी अबला का विवश रुदन नहीं है, न ही यह किसी पुरुष-सत्ता के सम्मुख आत्मसमर्पण की कथा है। यह प्रकृति की उस मूल पराशक्ति का तांडव-विपरीत ‘महा-संकल्प’ है, जो जब अपनी चेतना के चरम पर जाग्रत होती है, तो काल के कपाल पर भी अमिट रेखा खींचकर नियति के विधान को उलट देने का सामर्थ्य रखती है।
जब कोई आधुनिक विमर्शकार यह प्रश्न उछाले कि "केवल स्त्री ही क्यों, क्या इसके पीछे कोई शास्त्रसम्मत आधार है अथवा यह केवल अंधविश्वास है?", तो उससे केवल भावुक संवाद मत कीजिए। उसे धर्मशास्त्र, पुराण, खगोलिकी, बायो-इलेक्ट्रिकल फिजिक्स, क्वांटम मैकेनिक्स और साइको-न्यूरो-इम्यूनोलॉजी के वे अकाट्य साक्ष्य दीजिए, जिनके आगे हर कुतर्क स्वतः भस्म हो जाए।

धर्मशास्त्रों और पुराणों में 'करक चतुर्थी' का प्रामाणिक विधान है।
करवा चौथ कोई मध्यकालीन लोक-रूढ़ि या आधुनिक सिनेमा द्वारा गढ़ी गई रस्म नहीं है। सनातन धर्मशास्त्रों, स्मृति-ग्रंथों और काल-निर्णय के निबंध-ग्रंथों में इसे अनादिकाल से ‘करक चतुर्थी’  के नाम से प्रतिष्ठा प्राप्त है। लोकभाषा में 'करक'—अर्थात् मिट्टी का वह विशिष्ट टोंटीदार पात्र जिससे अर्घ्य दिया जाता है—कालांतर में अपभ्रंश होकर 'करवा' कहलाया।
धर्मशास्त्र के सर्वोच्च प्रमाणिक काल-निर्णय ग्रंथ 'निर्णयसिन्धु' में महामहोपाध्याय कमलाकर भट्ट स्पष्ट निर्देश देते हैं:
 “कार्तिककृष्णचतुर्थ्यां करकचतुर्थीव्रतं भवति। तत्र पूर्वविद्धा ग्राह्या।”
अर्थात्—कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करक चतुर्थी का व्रत अनिवार्य रूप से किया जाता है, जिसमें चंद्रोदयव्यापिनी तिथि ही शास्त्रसम्मत मानी गई है।

इसी प्रकार 'धर्मसिन्धु' और 'व्रतराज' जैसे प्रामाणिक संहिता-ग्रंथों में इस दिन किए जाने वाले संकल्प का वह संस्कृत श्लोक आज भी सुरक्षित है, जो हर व्रती स्त्री के भीतर एक अलौकिक चेतना का संचार करता है:
 “मम सुखसौभाग्यपुत्रपौत्राद्यभीष्टसिद्धये करकचतुर्थीव्रतमहं करिष्ये।”
 (मेरे अखंड सौभाग्य, सुख, संतति और अभीष्ट की सिद्धि के लिए मैं यह करक चतुर्थी महाव्रत करती हूँ।)

स्कन्द पुराण के कार्तिक माहात्म्य और वामन पुराण में इस चतुर्थी का संबंध संकट-निवारण और पति के आरोग्य-आयुष्य से जोड़ा गया है।

 स्कन्द पुराण में मूल संस्कृत श्लोक एवं प्रमाण
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के माहात्म्य, करक (करवा) के दान और चंद्र-अर्घ्य का विधान करते हुए स्कन्द पुराण में कहा गया है।

कार्तिके कृष्णपक्षे तु चतुर्थी या भवेत्तिथिः।
तस्यां करकदानं च कर्तव्यं सुभगैः सदा॥
अर्घ्यं दद्याच्च विधिवच्चन्द्राय वरवर्णिनि।
सौभाग्यपुत्रवृद्ध्यर्थं स्वायुषो विजयाय च॥
अर्थात्:
हे वरवर्णिनि! कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की जो चतुर्थी तिथि होती है, उसमें सौभाग्यवती स्त्रियों द्वारा विधिपूर्वक ‘करक’ (करवा/पात्र) का दान सदैव कर्तव्य है। अपने सौभाग्य, पुत्र-पौत्र की वृद्धि, पति की दीर्घायु तथा समस्त बाधाओं पर विजय प्राप्त करने के लिए इस तिथि की रात्रि में विधिपूर्वक चंद्रमा को अर्घ्य प्रदान करना चाहिए।

चंद्रमा को अर्घ्य देने का शास्त्रसम्मत मंत्र (स्कन्द पुराणोक्त)
रात्रि में जब मिट्टी के करवे से चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है, तब स्कन्द पुराण में निर्दिष्ट इस प्रसिद्ध मंत्र का उच्चारण किया जाता है।

क्षीरोदार्णवसंभूत अत्रिनेत्रसमुद्भव।
गृहाणार्घ्यं शशाङ्केश रोहिण्या सहितो मम॥
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं ज्योतिषां पतये नमः।
नमस्ते रोहिणीकान्त सौभाग्यारोग्यवर्धनाय॥

अर्थात्:
क्षीरसागर से प्रकट हुए तथा महर्षि अत्रि के नेत्रों से उत्पन्न हुए, रोहिणी सहित हे शशांक (चंद्रदेव)! मेरे द्वारा अर्पित इस पावन अर्घ्य को स्वीकार कीजिए। हे ज्योत्स्ना (चांदनी) के स्वामी! समस्त नक्षत्र-ज्योतियों के अधिपति! हे रोहिणीकांत! आपको बारंबार नमस्कार है, आप मेरे सौभाग्य और आरोग्य की वृद्धि करें।

स्कन्द पुराण के अनुसार पूजन-विधान का मर्म
स्कन्द पुराण में स्पष्ट निर्देश है कि इस दिन केवल उपवास ही नहीं, बल्कि,
गौरी-गणेश और कार्तिकेय की प्रतिष्ठा: भगवान शिव, माता पार्वती, कार्तिकेय और गणेश का आवाहन कर संयुक्त पूजन किया जाता है।
करक (पात्र) की महत्ता: मिट्टी या तांबे के पात्र में मिष्ठान्न, अक्षत और जल भरकर उसे सुहाग की सामग्री के साथ दान करने का विधान है।
चंद्रोदयव्यापिनी ग्राह्यता: यह व्रत उसी दिन ग्राह्य होता है जिस दिन रात्रि में चतुर्थी तिथि विद्यमान हो और चंद्र दर्शन संभव हो।

 वहीं महाभारत के वनपर्व का वह अमर प्रसंग कौन भूल सकता है, जब अर्जुन तपस्या हेतु नीलगिरि पर्वत पर गए थे और शेष पांडवों पर चौतरफा संकट मंडरा रहा था? तब व्याकुल द्रौपदी के पूछने पर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के इसी ‘करक व्रत’ का उपदेश दिया था, जिसे पूर्वकाल में माता पार्वती ने देवाधिदेव महादेव की साक्षी में संपन्न कर समस्त अमंगलों का नाश किया था।

 वह भूखी नहीं, महाकाल की आंखों में आंखें डालती है। 
ऋग्वेद के दसवें मंडल में उद्घोषित ‘देवी सूक्त’ का वह अमर घोष स्मरण कीजिए—‘अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां...’—अर्थात् यह संपूर्ण ब्रह्मांडीय चेतना शक्ति (ऊर्जा) के ही स्पंदन से संचालित है। करवा चौथ का दिन वह क्षण है जब एक साधारण गृहस्थ नारी अपनी देह के क्षुधा-पिपासा जैसे समस्त भौतिक-जैविक बंधनों को एक ही झटके में त्याग देती है।
सूर्योदय से पूर्व तारों की छांव में 'सरगी' से आरंभ हुआ यह संकल्प जब दोपहर की तपिश को चीरता हुआ गोधूलि वेला में उतरता है, तब तक उस स्त्री का स्थूल शरीर पीछे छूट चुका होता है। कंठ सूखता है, रक्त की प्रत्येक कोशिका जल की पुकार करती है, किंतु उसके मस्तिष्क की तरंगें उस अलौकिक एकाग्रता में प्रवेश कर जाती हैं जिसे योगशास्त्र ‘धारणा’ और ‘समाधि’ का संधिकाल कहता है।
आधुनिक न्यूरोबायोलॉजी इसे मस्तिष्क की ‘अल्फा और थीटा अवस्था’  का चरम मानती है। यह वह मानसिक स्थिति है जहां मनुष्य की संकल्प-शक्ति अपने बायो-मैग्नेटिक फील्ड (Bio-field) को असीम विस्तार देकर कॉस्मिक ऊर्जा से एकाकार कर लेती है। वह दिन भर अन्न-जल का त्याग कर दुर्बल नहीं होती; वह अपनी आंतरिक प्राण-ऊर्जा को समेटकर अपने पति के मस्तक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा-कवच बुन रही होती है।

लोक-आख्यानों में जिस ‘करवा’ नाम की पतिव्रता की कथा सुनी जाती है, वह प्रतीकवाद का अप्रतिम शिखर है। कथा कहती है कि जब करवा के पति को नदी में एक ग्राह (मगरमच्छ) ने पकड़ लिया, तो उस नारी ने कच्चे सूत के धागे से उस ग्राह को बांध दिया और यमराज के द्वार पर जा खड़ी हुई। यमराज ने जब नियति का तर्क दिया, तो करवा ने स्पष्ट कहा—"यदि तुमने ग्राह को दंड देकर मेरे पति को जीवनदान नहीं दिया, तो मेरा सतीत्व और तपोबल तुम्हें भस्म कर देगा।" यमराज को नतमस्तक होकर उसके पति को दीर्घायु देनी पड़ी।
यमराज के सामने जाकर सत्यवान के प्राण लौटा लाने वाली पतिव्रता सावित्री हो या ग्राह को बांधने वाली करवा—ये कोई कपोल-कल्पनाएं नहीं हैं। सनातन का यह स्पष्ट दर्शन है कि 'काल' (समय और मृत्यु) भले ही सबसे बलवान हो, किंतु जब कोई जीवात्मा 'तप' और 'अनन्य निष्ठा' के चरम पर पहुंच जाती है, तो उसकी प्राण-ऊर्जा मृत्यु के भौतिक नियमों को शिथिल करने का सामर्थ्य रखती है।

स्त्री देह: चंद्रमा की साक्षात खगोलीय प्रयोगशाला है।
विज्ञान से पूछिए कि इस समूचे चराचर जगत में चंद्रमा की गति और आकर्षण से किसका सीधा और अटूट तालमेल है? उत्तर मिलेगा—महासागर के ज्वार-भाटे का, और केवल व केवल ‘स्त्री-शरीर’ का।
मानव शरीर और मस्तिष्क में 70 प्रतिशत से अधिक जल तत्व विद्यमान है। यजुर्वेद का शाश्वत सूत्र है—‘चन्द्रमा मनसो जातः’ (चंद्रमा मन का अधिष्ठाता है)। कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी की वह घोर अंधियारी निशा सामान्य नहीं होती। यह आश्विन और कार्तिक के संधिकाल में शरद ऋतु के अवसान और हेमंत के आगमन का वह समय है, जब पृथ्वी के वायुमंडल में सूक्ष्म विद्युत-तरंगों का संतुलन तेजी से बदलता है। स्त्री की जैविक घड़ी (Circalunar Rhythm) प्रकृति के उस 28 दिवसीय चंद्र-चक्र से जन्मजात जुड़ी होती है।
सरल उदाहरण: स्मार्टफोन और वायरलेस चार्जिंग पैड
आज की पीढ़ी वायरलेस चार्जर का उपयोग करती है। चार्जिंग पैड पर स्मार्टफोन रखते ही ऊर्जा का प्रवाह शुरू हो जाता है और बैटरी चार्ज होने लगती है। किंतु उसी पैड पर यदि चाबी, तांबे का सिक्का या पेन रख दिया जाए, तो वह चार्ज क्यों नहीं होता? क्योंकि चार्जिंग पैड से उत्सर्जित होने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणों को पकड़ने के लिए केवल फोन के भीतर एक विशेष ‘रिसीवर कॉइल’ बनाई गई है।
यही नियम देह-विज्ञान पर लागू होता है। चंद्रमा ब्रह्मांड का विशाल ट्रांसमीटर है और मनुष्य का शरीर एक जैविक उपकरण। पुरुष का शरीर टेस्टोस्टेरोन-प्रधान और रैखिक है, जबकि स्त्री का शरीर एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के कारण चंद्र-चक्र से प्राकृतिक रूप से जुड़ा हुआ ‘रिसेप्टर’ है। प्रकृति ने उस कॉस्मिक सिग्नल को आत्मसात करने का एंटीना केवल नारी-देह को दिया है। जब वह निर्जला रहकर अपनी फ्रीक्वेंसी ट्यून करती है, तो वह ऊर्जा सीधे ग्रहण होकर पूरे परिवार की आभा को आलोकित करती है।

 निर्जला तप: कोशिकीय शुद्धि और ऑटोफैगी का नोबेल विज्ञान है। 
उपवास को केवल 'भूखा रहना' समझना आधुनिक अल्पज्ञता है। यह देह के स्तर पर चलने वाला एक महान वैज्ञानिक शोधन-यज्ञ है।
प्रयाग फाइल्स में सरल उदाहरण से इसे समझिए। सिस्टम रीस्टार्ट और ऑटोफैगी है ये। 
जब कोई कंप्यूटर या मोबाइल अत्यधिक बैकग्राउंड डेटा लोड के कारण हैंग होने लगता है, तो हम क्या करते हैं? सारे ऐप्स बंद करके उसे रीस्टार्ट कर देते हैं। वर्ष 2016 में जापानी वैज्ञानिक योशिनोरी ओशुमी को 'ऑटोफैगी' की खोज के लिए चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार दिया गया। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने प्रमाणित किया कि जब मानव शरीर को 12 से 16 घंटे तक बाहर से अन्न-जल नहीं मिलता, तो शरीर की स्वस्थ कोशिकाएं भूखी होकर अंदर जमा कचरे, टॉक्सिन्स, मृत ऊतकों और बीमार कोशिकाओं को खुद ही भस्म करना शुरू कर देती हैं। इसे 'सेल्यूलर डिटॉक्स' कहा गया।
स्त्री जब निर्जला व्रत रखती है, तो भोजन पचाने में व्यय होने वाली शरीर की लगभग 70 प्रतिशत दैनिक ऊर्जा तत्काल मुक्त हो जाती है। शरीर का पूरा तंत्र स्वतः अपनी कोशिकाओं के नवीनीकरण और हीलिंग में लग जाता है। जब स्थूल भोजन में ऊर्जा का क्षरण नहीं होता, तो वही संचित प्राण-ऊर्जा उसके मन और संकल्प शक्ति को अप्रतिम तीव्रता प्रदान करती है। यह कमजोरी नहीं, बल्कि आंतरिक ऊर्जा का सुपर-चार्ज होना है।

षोडश शृंगार: सौंदर्य नहीं, बायो-इलेक्ट्रिकल सर्किट का परिरक्षण है।
अक्सर यह कुतर्क सुनने को मिलता है कि जब दिनभर उपवास है, तो स्त्रियों के लिए सोलह शृंगार करने, आभूषण लादने और सजने का क्या औचित्य है? क्या यह केवल बाह्य आडंबर है?
वस्तुतः षोडश शृंगार कोई फैशन शो नहीं है; यह निर्जला उपवास के दौरान शरीर की प्राण-ऊर्जा को रिसने से रोकने वाला एक 'बायो-इलेक्ट्रिकल सर्किट' है:
 
मांग में सिंदूर (पारा और हल्दी): सिंदूर में पारद (Mercury) और हल्दी का वैज्ञानिक सम्मिश्रण होता है। सिर का जो स्थान मांग कहलाता है, वह ठीक ‘आज्ञा चक्र’ और मस्तिष्क की ‘पीनियल ग्लैंड’ के ऊपर होता है। पारद विद्युत का सुचालक और शीतलक है, जो दिनभर के निर्जला उपवास में मस्तिष्क के तापमान को नियंत्रित रखता है और रक्तचाप को स्थिर करता है।
 
पैरों में चांदी की बिछिया और पायल: भौतिकी का नियम है कि पृथ्वी में ऋणात्मक ऊर्जा का असीम भंडार है। चांदी विद्युत की सर्वश्रेष्ठ संवाहक (Best Conductor) धातु है। पैर की दूसरी उंगली की नस सीधे गर्भाशय और हृदय से जुड़ी होती है। बिछिया का दबाव एक्यूप्रेशर के जरिए गर्भाशय के रक्त प्रवाह को संतुलित करता है, जबकि चांदी की पायल पृथ्वी से ऊर्जा खींचकर पूरे शरीर में सर्कुलेट करती है, जिसे आज का विज्ञान 'ग्राउंडिंग' (Earthing) कहता है।
 
 कांच की चूड़ियां और कंगन: कलाई पर शरीर के वे मर्म बिंदु (Acupressure Meridians) होते हैं जिनका संबंध थायरॉइड और प्रजनन ग्रंथियों से है। जब कांच की चूड़ियां कलाई पर टकराती हैं, तो उत्पन्न होने वाली सूक्ष्म ध्वनि और घर्षण परिधीय रक्त संचार (Peripheral Blood Circulation) को निर्बाध बनाए रखता है।
 
 हाथ-पांव में मेहंदी और महावर: निर्जला उपवास के कारण शरीर में आंतरिक ताप (Internal Heat/Metabolic Fire) बढ़ता है। मेहंदी और महावर प्राकृतिक शीतलक हैं, जो नसों के अंतिम सिरों (Nerve Endings) को शांत रखते हैं, जिससे सिरदर्द या बेचैनी नहीं होती।
सोलह शृंगार स्त्री देह को ऊर्जा के एक 'फैराडे केज' (Faraday Cage) की भांति सुरक्षित कर देता है, ताकि वातावरण की नकारात्मक तरंगें उसकी साधना को खंडित न कर सकें।

 'करवा' (पात्र) और अर्घ्य: पृथ्वी-जल का लैमिनार फ्लो और अर्थिंग है। 
करवा केवल जल भरने का लोटा नहीं है। शास्त्रों में स्पष्ट विधान है कि करवा मिट्टी का होना चाहिए, जिसमें एक विशिष्ट टोंटी (नलिका) हो।
पंचतत्वों का संतुलन और लैमिनार फ्लो:
मिट्टी पंचमहाभूतों में ‘पृथ्वी तत्व’ का प्रतिनिधित्व करती है। उस पकी हुई मिट्टी के पात्र में जब जल भरा जाता है, तो वह जल पृथ्वी तत्व के प्राकृतिक खनिजों से युक्त होकर चुंबकीय रूप से चार्ज हो जाता है।

जब चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है, तो उस संकीर्ण टोंटी से जल की एक पतली, अविच्छिन्न धार गिरती है। हाइड्रोडायनामिक्स में इसे 'लैमिनार फ्लो' कहते हैं। इस धार में कोई विक्षोभ (Turbulence) नहीं होता। जब यह जलधारा भूमि पर गिरती है, तो यह आकाशीय ऊर्जा और पृथ्वी के बीच एक जीवंत 'लिक्विड वायर' (तरल विद्युत तार) का निर्माण करती है। चंद्रमा से आने वाली विकिरण किरणें जब इस जलधारा से टकराकर धरती में समाती हैं, तो व्रती स्त्री के पैरों के पास एक शक्तिशाली ऊर्जा-मंडल बनता है। यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा को सीधे स्थूल जगत में उतारने की ‘ग्राउंडिंग’ प्रक्रिया है।

छलनी, दीपक और त्राटक: प्रकाश-भौतिकी और न्यूरो-बॉन्डिंग जो समझिए।
उस क्षण की कल्पना कीजिए, जब रात के नीरव सन्नाटे में सिंदूरी आंचल हवा में लहराता है और आकाश में श्वेत चंद्रमा उदित होता है। हाथ में तांबे या पीतल की छलनी है, और उस पर जलती हुई घृत-दीपक की स्वर्णिम शिखा। यह कोई साधारण लोक-कौतुक नहीं; यह योग के 'त्राटक' और ऑप्टिकल फिजिक्स का अद्भुत संगम है।

आप सोच रहे होंगे कि मनीष जी ने कोई उदाहरण दोबारा नहीं दिया तो परेशान मत होइए इसे सरल उदाहरण समझिए।   कैमरा लेंस का फिल्टर और विवर्तन (Diffraction) को लीजिए। 
कैमरे से जब आप सीधे सूर्य या किसी तीव्र प्रकाश पुंज की ओर लेंस घुमाते हैं, तो लेंस फ्लेयर (Lens Flare) उत्पन्न होता है और पूरी तस्वीर सफेद होकर धुंधली पड़ जाती है। किंतु जब उसी लेंस के आगे एक खास डिफ्यूजन ग्रिड या फिल्टर लगाया जाता है, तो वही तीक्ष्ण किरणें बिखरकर शांत और सुंदर तारों जैसी संरचनाओं में बदल जाती हैं।
भौतिक विज्ञान में इसे 'डिफ्रैक्शन' (Diffraction of Light) कहते हैं। दिनभर के तप के बाद जब स्त्री की आंखें सीधे चंद्रमा या पति को देखेंगी, तो आंखों का रेटिना अचानक तीखे प्रकाश से तनावग्रस्त हो सकता है। छलनी के सैकड़ों सूक्ष्म छिद्र उस प्रकाश को विखंडित और सौम्य कर देते हैं।
जब वह दृष्टि पहले अग्नि की लौ से छनती है, तो आंखों की पुतलियां एकाग्र होती हैं और आज्ञा चक्र जाग्रत होता है। इसके उपरांत जब वह उस छनित प्रकाश के पार अपने पति को देखती है, तो मस्तिष्क के विजुअल कॉर्टेक्स में कोई सांसारिक विक्षेप शेष नहीं रहता। मस्तिष्क में ऑक्सीटोसिन और एंडोर्फिन का वह प्रचंड स्राव होता है जो दांपत्य के सारे मानसिक तनाव को भस्म कर देता है। वह अग्नि की साक्षी में उस पुरुष के भीतर स्थित 'शिव' तत्व का साक्षात्कार करती है।

 पति की लंबी आयु का कार्डियोलॉजिकल व न्यूरोलॉजिकल सच को भी जानिए। 
तर्कवादी अक्सर उपहास उड़ाते हैं कि "पत्नी के भूखे रहने से पति के क्रोमोजोम या जीवन-काल की अवधि कैसे बढ़ सकती है?"
यह उपहास आधुनिक साइको-न्यूरो-इम्यूनोलॉजी (Psychoneuroimmunology - PNI) और हृदय-रोग विज्ञान (Cardiology) की अज्ञानता से उपजता है:
 
कॉर्टिसोल का शमन और दीर्घायु: आज चिकित्सा विज्ञान यह निर्विवाद रूप से स्वीकार करता है कि 80 प्रतिशत से अधिक पुरुषों में अकाल मृत्यु, स्ट्रोक और हार्ट अटैक का मुख्य कारण 'क्रॉनिक स्ट्रेस' (Chronic Stress) और तनाव हार्मोन 'कॉर्टिसोल' (Cortisol) का अनियंत्रित स्राव है।
 
 अगाध सुरक्षा और कृतज्ञता का न्यूरो-केमिकल प्रभाव: जब एक पुरुष अपनी आंखों के सामने यह देखता है कि एक स्त्री उसके अस्तित्व, उसके स्वास्थ्य और उसकी रक्षा के लिए पूरे दिन अन्न और जल की एक बूंद भी ग्रहण किए बिना खड़ी है, तो उसके अवचेतन मन में 'सुरक्षा', 'अहसास' और 'कृतज्ञता' की वह तीव्र अनुभूति जाग्रत होती है जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
 
हृदय गति की परिवर्तनशीलता (HRV - Heart Rate Variability): इस भावनात्मक अनुभूति के क्षण में पुरुष के मस्तिष्क से 'ऑक्सीटोसिन' (Love Hormone) और 'डोपामाइन' का विस्फोट होता है। यह हार्मोन तुरंत रक्त वाहिकाओं को शिथिल करता है, उच्च रक्तचाप को नीचे लाता है और पुरुष के हृदय गति की परिवर्तनशीलता (HRV) को संतुलित करता है। दांपत्य में मिलने वाली यह मानसिक शांति और भावनात्मक संबल पुरुष के इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है, जो सीधे तौर पर उसकी जैविक आयु (Biological Lifespan) को विस्तार देता है। पत्नी का यह महा-संकल्प पुरुष को अकाल मृत्यु के तनाव से बचाने वाली एक सजीव औषधि सिद्ध होता है।

"पुरुष क्यों नहीं?": पूरकता का शाश्वत सिद्धांत
जो यह पूछते हैं कि "पुरुष व्रत क्यों नहीं रखता?", वे भारतीय दांपत्य के पूरक दर्शन को समझ ही नहीं पाए, जहां पुरुष ने स्वयं नतमस्तक होकर स्त्री को ‘गृहिणी’, ‘अन्नपूर्णा’ और ‘प्राण-दात्री’ का सर्वोच्च आसन सौंपा है।

आप सोच रहे होंगे कि मनीष जी वैसे तो बहुत उदाहरण देते हैं लेकिन यहां कोई उदाहरण नहीं दे रहे हैं तो परेशान मत होइए इसे भी आप एकदम सरल उदाहरण: वाई-फाई राउटर और मोबाइल फोन से समझिए। 
घर में वाई-फाई (Wi-Fi) का राउटर एक स्थान पर स्थिर लगा रहता है, जबकि मोबाइल फोन को लेकर व्यक्ति बाहर गतिमान रहता है। क्या कोई यह कुतर्क कर सकता है कि राउटर भी सड़क पर घूमे और फोन दीवार पर टंग जाए? दोनों के आंतरिक सर्किट भिन्न हैं, और दोनों की उपयोगिता भी।
सृष्टि ने स्त्री और पुरुष को प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं, पूरकता के लिए गढ़ा है। पुरुष का व्रत इतिहास में रक्त और पसीने से लिखा गया। जब आक्रांताओं के संकट आते थे, तो पुरुष सीना तानकर रणभूमि में खड़ा होता था—वह उसका नित्य व्रत था। और स्त्री? वह उस युद्धरत पुरुष की आत्मिक रीढ़ बनकर घर की चौखट पर खड़ी रहती थी। वह जानती थी कि अस्त्र पुरुष का हो सकता है, किंतु विजय की शक्ति स्त्री के तपोबल से सिंचित होती है।
करवा चौथ पुरुष की पराधीनता का नहीं, बल्कि उसके प्रति उस संप्रभु, निर्भय और अगाध प्रेम का प्रमाण है जहां स्त्री काल (मृत्यु) की आंखों में आंखें डालकर कहती है—“जब तक मेरी सांसों का यह संकल्प-कवच जीवित है, तब तक मेरे सिंदूर की ओर देखने का साहस स्वयं काल भी नहीं कर सकता।”

सनातन की पौराणिक कथाएं वास्तव में ‘एलिगरी’ (Allegory - रूपक विज्ञान) हैं। हमारे ऋषियों ने अति-सूक्ष्म वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक सत्यों को जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए कथाओं का रूप दिया। जब आधुनिक पाठक इन दोनों कथाओं के वैज्ञानिक कोड को डिकोड करेगा, तो उसका संशय जड़ से समाप्त हो जाएगा।

करवा और 'ग्राह' (मगरमच्छ) की कथा: न्यूरोबायोलॉजी और बायो-एनेर्जेटिक रेजोनेंस है। 
पारंपरिक कथा में कहा जाता है कि जब करवा के पति को नदी में एक ग्राह (मगरमच्छ) ने अपने जबड़े में जकड़ लिया, तब करवा ने कच्चे सूत के धागे से ग्राह को बांध दिया और अपने तपोबल से यमराज को विवश कर पति के प्राण बचाए।
 
   कच्चा सूत भौतिक रूप से अत्यंत दुर्बल होता है, वह एक मगरमच्छ का भार भी नहीं सह सकता। यह इस बात का स्पष्ट वैज्ञानिक संकेत है कि बंधन स्थूल (Physical) नहीं, बल्कि सूक्ष्म ऊर्जा (Energetic Field) का था। भौतिकी का ‘क्वांटम एंटैंगलमेंट’ सिद्धांत कहता है कि जब दो कण गहरे रूप से जुड़े होते हैं, तो वे दूरी और भौतिक अवरोधों के पार भी एक-दूसरे की अवस्था को तुरंत प्रभावित करते हैं। करवा का वह 'कच्चा सूत' वास्तव में उसकी अपनी चेतना और प्राण-शक्ति का प्रक्षेपण (Energy Projection) था, जिसने उस परभक्षी के स्नायुतंत्र को स्तब्ध (Paralyze) कर दिया।
 

   जीवविज्ञान में मगरमच्छ 'रेप्टाइल' (Reptile) है। मानव मस्तिष्क का सबसे आदिम और क्रूर हिस्सा—जो केवल भय, आक्रामकता और संहार को नियंत्रित करता है—उसे आधुनिक न्यूरोसाइंस 'रेप्टिलियन ब्रेन' (Brainstem) कहता है। यह कथा बताती है कि जब पति बाह्य संसार के हिंसक, पाशविक संकटों (रेप्टिलियन प्रवृत्तियों) में घिर जाए, तब स्त्री की जाग्रत, शांत और उच्च चेतना (Higher Neocortex/ संकल्प-शक्ति) उस पाशविक शक्ति को निष्प्रभावी कर देती है।

 
   यमराज ब्रह्मांड के 'एन्ट्रॉपी' (Entropy - क्षय और मृत्यु का नियम) के अधिष्ठाता हैं। ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) का दूसरा नियम कहता है कि हर तंत्र क्षय (Decay) की ओर बढ़ता है। किंतु जब कोई चेतना 'एकाग्र तपोबल' से चरम गैर-एन्ट्रॉपिक अवस्था (Negative Entropy/Syntropy) में पहुंचती है, तो वह स्थानीय स्तर पर क्षय की गति को रोक देती है। करवा का संकल्प वही 'एंटी-एन्ट्रॉपी' बल था, जिसके आगे यमराज (मृत्यु का नियम) भी ठहर गया।

 सावित्री और सत्यवान की कथा: सेल्यूलर रिससिटेशन और इन्फॉर्मेशनल फील्ड (Morphic Resonance) है।
सावित्री का सत्यवान के मृत शरीर के पास बैठकर यमराज से संवाद करना और प्राण वापस लौटाना 'सेलुलर डेथ' और 'बायो-इन्फॉर्मेशन' का विज्ञान है।
 
   आधुनिक चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट करता है कि हृदय की धड़कन और सांस रुकने (Clinical Death) के तुरंत बाद शरीर की सारी कोशिकाएं एक साथ नहीं मरतीं। मस्तिष्क और कोशिकाओं में जीवन की सूचना (Cellular Information) कई घंटों तक प्रसुप्त अवस्था में जीवित रहती है। यदि उस संधिकाल में चेतना का तीव्र झटका (High-Frequency Electromagnetic Stimulus) दिया जाए, तो प्रणाली पुनर्जीवित हो सकती है—जैसे आज 'डीफिब्रिलेटर' (Defibrillator) से बिजली का झटका देकर रुकते हृदय को फिर से चालू किया जाता है।
 
   सावित्री कोई सामान्य स्त्री नहीं थी; उसने त्रिरात्र उपवास और घोर तप किया था। उसका हृदय-विद्युत क्षेत्र (Heart's Electromagnetic Field) अत्यंत सुसंगत (Highly Coherent) था। जब वह सत्यवान के अचेत शरीर के समीप बैठी, तो उसके शरीर से निकलने वाले उच्च-आवृत्ति के स्पंदनों ने सत्यवान के प्रसुप्त स्नायुतंत्र और माइटोकॉन्ड्रिया (कोशिकीय ऊर्जा केंद्र) को वह आवश्यक ऊर्जा-तरंग दी, जिसने प्राणों की सूचना को वापस शरीर में बांध लिया।
 
 
   यमराज से वरदान मांगना वास्तव में अवचेतन और सुपर-कॉन्शस माइंड (Superconscious Mind) का 'रीप्रोग्रामिंग' था। उसने यमराज से पहले सास-ससुर की दृष्टि, फिर खोया राज्य, और अंत में सौ पुत्रों का वरदान मांगा। सौ पुत्र बिना जीवित पति के संभव नहीं थे। यह लॉजिक-गेट (Logical Paradox) उस सार्वभौमिक बुद्धिमत्ता (Universal Intelligence) को यह संदेश देता है कि जीवन की निरंतरता अभी अपूर्ण है, अतः जैविक घड़ी को उल्टा घूमना ही होगा।

"कच्चे धागे से मगरमच्छ को बांधने वाली करवा और यमराज के पाश से प्राण खींच लाने वाली सावित्री—ये दोनों आख्यान यह सिद्ध करते हैं कि जब एक संकल्पबद्ध स्त्री की चेतना 'क्वांटम फील्ड' के चरम पर पहुँचती है, तो वह स्थूल भौतिकी के नियमों को धता बताकर क्षय (Entropy) और मृत्यु की गति तक को मोड़ देने की सामर्थ्य रखती है।"

यह परंपरा किसी के सम्मुख गिड़गिड़ाने की नहीं, यह उस महा-प्रकृति के जाग्रत होने की रात है जो विधाता के लिखे विधान को भी बदलने का सामर्थ्य रखती है। जब छलनी के पार चांद मुस्कुराता है और मिट्टी के करवे से अर्घ्य की पावन जल-धारा धरती को छूती है, तो वह केवल जल नहीं गिरता—उस क्षण सनातन का वह अमर विश्वास धरती को सींचता है, जो मृत्यु पर भी प्रेम और संकल्प की विजय का अनंत जयघोष करता है।

इसलिए अगली बार जब कार्तिक की उस शरद निशा में आप किसी छत पर सिंदूरी आंचल लहराते देखें... जब लाल जोड़े में सजी किसी स्त्री के हाथ में पीतल की छलनी कांपती दिखाई दे, और मिट्टी के करवे से टपकती जल-धारा धरती को छूती नजर आए—तो अपनी आंखें मूंदकर उसे बॉलीवुड के किसी रूमानी गाने का सीन मत समझ लेना। उसे फेमिनिज्म की सस्ती बहसों में घसीटकर किसी लाचार नारी का ढकोसला समझने की जहालत तो कतई मत करना।
सभ्यताओं के इतिहास में अपनी रीढ़ सीधी करके देखना—उस छत पर कोई दुर्बल स्त्री पानी के घूंट के लिए नहीं तरस रही; उस छत पर साक्षात 'प्रकृति' अपने पूरे शृंगार और प्रचंड ऊर्जा के साथ खड़ी होकर 'पुरुष' (चेतना) के प्राणों की परिक्रमा कर रही है!
वह छलनी प्लास्टिक का खिलौना नहीं, प्रकाश के विवर्तन का यंत्र है।
वह मिट्टी का करवा कोई बर्तन नहीं, पंचतत्वों की अर्थिंग का संवाहक है।
और उसकी सूखी अंतड़ियों से उठती वह मौन पुकार कोई लाचारी नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के नियमों को मोड़ देने वाला वह क्वांटम संकल्प है, जो सत्यवान के प्राण खींच लाया था और जिसने मगरमच्छ के जबड़े बांध दिए थे।
यह भारत के उन त्रिकालदर्शी ऋषि-वैज्ञानिकों का रचा हुआ वह अभेद्य 'कोड' है, जहां प्रेम और भौतिकी एक बिंदु पर आकर विलीन हो जाते हैं।
गर्व से भर लीजिए अपने सीने को कि आप उस माटी की संतान हैं जहां एक साधारण गृहस्थ नारी वर्ष में एक रात ऐसी जीती है, जब वह मृत्यु के देवता यमराज की आंखों में सीधी आंखें डालकर कह सकती है—
“पीछे हट जाओ काल! तुम्हारे नियम इस देहरी के बाहर चलते होंगे; इस सिंदूर की परिधि में प्रवेश करने का अधिकार स्वयं विधाता ने भी केवल मेरे संकल्प को सौंपा है।”
यह अंधविश्वास नहीं, यह महा-विज्ञान है।
यह विवशता नहीं, यह सनातन का अमर स्वाभिमान है!

आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ….। अगली कड़ी जल्द…….।

✍️अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज 

Wednesday, 28 October 2026

प्रकृति के अप्रकट रहस्य - कुछ सत्य ऐसे हैं जिन्हें सभी मनुष्य झुठलाने या बदलने के प्रयास में लगे रहते हैं ..

मनुष्य पाँच तत्त्वों से बना है। भूत-प्रेत चार तत्त्वों से बने होते हैं, उनमें पृथ्वी तत्त्व नहीं होता। देवताओं का शरीर तीन और दो तत्त्वों से बना होता है। परमात्मा केवल आकाश तत्त्व से बना होता है। इन सभी को इन्हीं बाहरी आँखों से देखा जा सकता है, परन्तु परमात्मा को अंतर्दृष्टि खुले बिना देखा ही नहीं जा सकता। आप मंत्र-सिद्धि मत कीजिए, केवल अपनी क्षमता बढ़ा लीजिए, दो तत्त्व तक के शरीर देख सकेंगे।
मैं देवघर में जिस होटल में रुकता हूँ, उसके कमरे की सारी खिड़कियाँ बाहर की ओर खुलती हैं। एक खिड़की के सामने एक पुरानी इमारत है, उस पर पानी की लोहे की एक पुरानी टंकी रखी है, जो शायद अब उपयोग में नहीं आती।
एक दिन एक दम्पत्ति अपनी दस वर्षीय पुत्री को लेकर आए। वह कुछ भी बोलती रहती थी। उन तीनों को कमरे में बैठाकर मैं नीचे होटल के रिसेप्शन पर चला गया। कुछ देर बाद ऊपर लौटा तो देखा, माँ अपनी बेटी को डाँट रही है। मैंने पूछा, क्या हुआ? वे बोले, कुछ नहीं, बस वह बीच-बीच में बाहर खिड़की की ओर देख रही थी।
मैंने उस लड़की को पास बुलाकर पूछा, क्या उस पानी की टंकी पर कोई खड़ा है? उसकी माँ बीच में ही बोल पड़ी, इसे पता नहीं क्या-क्या दिखता रहता है, हम तो परेशान हो गए हैं। वह छोटी बच्ची बोली, क्या आपको भी दिखा है।  मैंने कहा, मैं जब भी यहाँ आता हूँ, रोज़ ही देखता हूँ। यह दो-तीन बार यहाँ से कूदती है, परन्तु मरेगी नहीं, क्योंकि इसे मरे हुए कई वर्ष हो गए हैं। अब ऐसी बातें सभी को डराती हैं।उसके पश्चात मैंने उन दम्पत्ति को बाहर जाने के लिए कहा और उस बच्ची से डेढ़ घंटे तक बात की। सब कुछ सामान्य ही था। फिर उसके माता-पिता को बुलाकर कहा, यह बिल्कुल ठीक है, इसे कुछ नहीं हुआ है। यह केवल थोड़ा अधिक देख लेती है। अधिक से अधिक इतना कि यह चार तत्त्वों तक की वस्तुओं को देख लेती है। परन्तु माता-पिता को ऐसी बेटी नहीं चाहिए। यह समस्या हम सभी की है।हमें संतान तो चाहिए, परन्तु अपनी इच्छा के अनुसार। जबकि हमें यह भली-भाँति ज्ञात होना चाहिए कि पुत्र या पुत्री के रूप में जो भी मिला है, वह सब पहले से ही प्रोग्राम होकर मिला है। इस प्रकार की क्षमता प्राप्त करने के लिए लोग लम्बी तपस्या करते हैं। उस बच्ची को यह सब स्वाभाविक रूप से प्राप्त है। उस बच्ची के कुछ सिस्टम को लॉक कर दिया गया। लोगों की दृष्टि में वह ठीक हो गई, परन्तु मेरी दृष्टि में उसकी प्रगति रुक गई।
हम अपनी क्षमताओं को विकसित नहीं करना चाहते। हमें लगता है कि हम जिसकी साधना कर रहे हैं, वही सब कुछ करे। जो लोग प्रत्यक्षीकरण करना चाहते हैं, वे किसी योग्य व्यक्ति के सान्निध्य में त्राटक के सभी सात चरणों को गम्भीरता से पूरा करें। जिन्हें अपना माल बेचना है, मैं उनकी बात नहीं करता। बस गायत्री की प्रशंसा कर दी, लोग बिना सोचे-समझे उसे लेने के लिए मरे जाते हैं।
मनुष्य सत्य पर कितनी भी मिट्टी क्यों न डाल दे, सत्य को बदला नहीं जा सकता। उसे स्वीकार करना ही पड़ता है। एक बार सत्य को स्वीकार करने का स्वभाव बन जाए तो जीवन में परिवर्तन अपने आप आरम्भ हो जाता है। इसके लिए अलग से कोई टंटा-घंटा करने की आवश्यकता नहीं है।
कुछ सत्य ऐसे हैं जिन्हें सभी मनुष्य झुठलाने या बदलने के प्रयास में लगे रहते हैं, परन्तु जब से पृथ्वी बनी है तब से आज तक कोई ऐसा कर नहीं पाया। मैं यहाँ कुछ ऐसी ही बातों पर थोड़ा प्रकाश डाल रहा हूँ, जिन्हें हम सभी झुठलाने में लगे रहते हैं।
कुछ वर्ष पूर्व मैं राजधानी एक्सप्रेस से मुजफ्फरपुर से कामाख्या जा रहा था। सेकंड एसी में मेरी सीट के ठीक सामने एक ब्राह्मण की सीट थी। वहाँ कुछ विधायक भी थे। उन्हें देखकर ब्राह्मण कुछ अधिक ही सक्रिय हो गया। तुलसीदास ने क्या कहा है, यही उसके भीतर से उबाल मार रहा था। मैंने उसे दो-तीन बार रोककर कहा, शांत बैठो, परन्तु वह बिल्कुल नहीं माना।
अंततः मैंने उससे एक छोटा-सा प्रश्न किया - राम और सीता की विवाह-कुंडली किसने मिलाई थी? सीता के चरण जैसे ही अयोध्या में पड़े, राम को वनवास हो गया, ससुर दशरथ की मृत्यु हो गई, पूरा परिवार बिखर गया। उसके बाद जो कुछ हुआ, वह सबके सामने है। हम कैकेयी को दोष देते हैं, धोबी को दोष देते हैं, उस ब्राह्मण को दोष क्यों नहीं देते जिसने कुंडली मिलाई थी? हम उस ब्राह्मण से भी कुछ नहीं कहते जो द्वापर की जगह त्रेता ले आया था, उसने सब कुछ ठीक क्यों नहीं किया?यदि हमारे घरों में ऐसी बहू आई होती तो वह जीवन भर ताने सुनती।ब्राह्मण ने कई बार विषय बदलने का प्रयास किया, परन्तु मैं नहीं माना। मैंने कहा, अब पूरी रात इसी विषय पर बात करूँगा। मुझे तुम्हारे रामचरितमानस के ज्ञान को देखना है। वहाँ विधायक थे, भीड़ तो थी ही, और भी काफी भीड़ एकत्र हो गई। अंततः तीन घंटे बाद रात ग्यारह बजे ब्राह्मण सीट बदलकर थर्ड एसी में चला गया। उसके बाद वहाँ उपस्थित लोगों के साथ जो सत्संग हुआ, उसी के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं।
वास्तविकता को स्वीकार करने में हमारा साहस क्यों मर जाता है ?
राम एक आदर्श व्यक्तित्व हैं। जिन तथ्यों को हम नकारते हैं, वही उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाते हैं। हम राम को मानते तो हैं, परन्तु राम ने जो करके दिखाया, उसमें हमारी आस्था नहीं है। ईश्वर ने कृष्ण के रूप में कहा कि जीवन की वास्तविकता क्या है, और राम के रूप में जीकर दिखाया कि मनुष्य को जीवन कैसे जीना चाहिए। परन्तु हमने इन सबसे बचने के बहाने खोज रखे हैं।
राम ने सारा जीवन अपमान, पीड़ा और संघर्ष में जिया। यह सब समाज का ही दिया हुआ था। मंच पर बैठे लोग कहते हैं, वे लीला कर रहे थे। लीला तो नौटंकी को कहा जाता है। लोगों ने राम के सम्पूर्ण जीवन-चरित्र को ही मजाक बना दिया है। यही कारण है कि हम राम को आदर्श मानते तो हैं, परन्तु उनके जीवन जीने की शैली का अनुसरण नहीं करते।

विधेहि देवी कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

वेदोऽहम् अवेदोऽहम्। विद्याहम् अविद्याहम्।
*अजाहम् अनजाहम्। अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक् चाहम्॥

                  #अष्टावक्रवैदिकविज्ञानशोध
          साभार ✍️ हिमालयन घुमक्कड़ विक्रम गिरी
          Himalayan Ghumkkad Vikram Giri 

                         वयं राष्ट्रे जागृयाम 

विद्या और अविद्या में अंतर

                 🍃                ॥ॐ॥                🍃

                       विद्या और अविद्या का अंतर

• विद्या वह सच्चा ज्ञान है जो इस अज्ञान के आवरण को हटाकर जीव को मोक्ष और मुक्ति की ओर ले जाता हैं।
• अविद्या वह भ्रांति या पर्दा है जो वास्तविक सत्य (ब्रह्म या आत्मा) को ढक लेती है और मनुष्य को संसार एवं जन्म-मृत्यु के चक्र में बांधे रखती है।

                               ❀  विद्या  ❀
   श्रुति अनुसार विद्या मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं -

(१) परा विद्या (आध्यात्मिक या पारलौकिक ज्ञान)
  • यह वह ज्ञान है जो ब्रह्म (परम सत्य) और आत्मा की एकता का बोध कराता है।
  • इससे माया और संसार के बंधनों से मुक्ति मिलती है।
  • इसे जीवन जीने का ज्ञान भी कहा जाता है। 
(२)  अपरा विद्या (लौकिक या भौतिक ज्ञान)
  • यह संसार, प्रकृति, विज्ञान और जीविका से जुड़ी विद्या है।
  • इसमें चारों वेद, वेदांग, दर्शन, इतिहास-पुराण, न्याय, ज्योतिष और विभिन्न व्यावहारिक विषयों का अध्ययन आता है।
  • इसे जीविका चलाने का ज्ञान भी कहा जाता है। 
                     विद्या के अन्य वर्गीकरण
  • 14 विद्याएँ: भारतीय ग्रंथों के अनुसार मुख्य रूप से 14 विद्याएँ मानी गई हैं। इनमें 4 वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद), 4 उपवेद (आयुर्वेद, धनुर्र्वेद, गंधर्ववेद, अर्थवेद या स्थापत्य), और 6 वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष) शामिल हैं। 
  • 18 विद्याएँ: विष्णुपुराण और लोकनीति के अनुसार कुल 18 विद्याएँ बताई गई हैं (जिसमें 4 वेद, 6 वेदांग, पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, धनुर्र्वेद, गंधर्ववेद और अर्थशास्त्र शामिल हैं)।
  • शुक्रनीति के अनुसार: इसमें 32 मुख्य विद्याएँ और 64 कलाओं का वर्णन मिलता है। 

                             ❀ अविद्या ❀
 श्रुतिनुसार अविद्या भी मुख्य रुप से दो प्रकार की होती हैं-

   (१) महर्षि पतंजलि के योगसूत्र के अनुसार अविद्या

योगदर्शन (साधन पाद, सूत्र २.५ ) के अनुसार अविद्या चार प्रकार की होती है: -
अनित्यशुचिदुःखात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥

• अनित्य में नित्य की प्रतीति: जो चीज़ नाशवान या बदलने वाली है, उसे शाश्वत या सदा रहने वाली समझना (जैसे इस नश्वर शरीर को हमेशा रहने वाला मानना)।
• अशुचि में शुचि की प्रतीति: अशुद्ध या गंदी वस्तु को पवित्र या सुंदर समझना (जैसे शरीर और संसार की मलिनाता को सुंदर मानकर उसमें अत्यधिक आसक्ति रखना)।
• दुःख में सुख की प्रतीति: जिससे वास्तव में दुःख मिलने वाला है, उसे सुख का साधन समझना (संसार के भोग-विलासों को सच्चा सुख मानना)।
• अनात्मा में आत्म-बुद्धि: जो आत्मा नहीं है (जैसे शरीर, मन, इंद्रियां या अहंकार), उसे ही अपनी 'आत्मा' या 'मैं' समझना।

 (२)  आध्यात्मिक दृष्टि से जीव की अविद्या के पाँच स्तर 

अध्यात्मिक दृष्टिकोण से जीव की अविद्या को पाँच स्तरों में बांटा गया है: -
• स्वरूप-विस्मृति: जीव का अपने मूल, दिव्य और सत्य स्वरूप को भूल जाना।
• देहाध्यास: आत्मा होते हुए भी खुद को केवल नाशवान 'देह' (शरीर) मान लेना और देहभिमानी हो जाना।
• इंद्रियाध्यास: स्वयं को आंख, कान, नाक आदि इंद्रियों के रूप में देखना और उनके सुख-दुःख को अपना मानना।
• प्राणाध्यास: प्राण की क्रियाओं और ऊर्जा के उतार-चढ़ाव को ही अपना जीवन या अस्तित्व समझ लेना।
• अंतःकरणाध्यास: मन, बुद्धि और अहंकार के विचारों को ही अपना 'सत्य रूप' मान लेना।

                      साभार - सनातन ज्ञान महासागर 
                          ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा 
                           ❀ वयं राष्ट्रे जागृयाम ❀

Monday, 26 October 2026

पर्जन्यों के आकर्षण केन्द्र वृक्षों में देवताओं का निवास

               🍃                *॥ॐ॥*                 🍃     

                          *** वृक्षों में देवता निवास ***

बिल्व वृक्ष में भगवान् शिव का निवास तथा अश्वत्थ में विष्णु का निवास होता है l शिरीष वृक्ष में इन्द्र देव का तथा निम्ब और अर्क (मदार) में सूर्य देव का निवास होता है l ये वृक्ष इन देवों के विग्रह माने गए हैं l अतः इनका विनाश वर्जित है—-
               तत्र बिल्वे स्थितः शम्भु: अश्वत्थे हरिरव्ययः l 
                 शिरीषेऽभूत् सहस्रक्षो निम्बे देवः प्रभाकर: ll 
                 स तु तन्मयताँ यातः तस्मात् तं न विनाशयेत् ll ( पद्म पुराण )

ऋग्वेद के अनुसार बिल्व वृक्ष श्रीदेवी का वृक्ष है - 
                            वनस्पतिस्तव वृक्षोथ बिल्व: ll 
 देवासुर युद्ध के समय संकट काल में इन वृक्षों में इन देवों ने गुप्त रूप से निवास किया था l  अतः इन वृक्षों का छेदन वर्जित है l 
ग्रहों की समिधा के वैदिक वृक्ष निम्नवत् हैं— 
सूर्य का मदार, चंद्र का पलाश, मंगल का खदिर, बुध का अपामार्ग (चिड़चिड़ा),गुरु का अश्वत्थ,शुक्र का औदुम्बर (गूलर), शनि का शमी, राहु का दूर्वा तथा केतु का कुशा l 
तिल अन्न को विष्णु का प्रत्यक्ष प्रकटी करण माना गया है l पृथ्वी को तिल तिल में व्याप्त कर विष्णु ने अपने को तिल रूप में प्रकट किया था l अतः इसे हवनीय माना गया है l 
इसी तरह से २७ नक्षत्रों के २७ वनस्पति प्रसिद्धि को प्राप्त हैं l 
   वेदों में अथवा ब्राह्मण ग्रंथों में किस वृक्ष से हवन करने से क्या मिलता है यह वर्णित है जैसे खदिर से हवन से बल तेज की वृद्धि, पलाश से हवन से विद्या वृद्धि तथा गूलर से हवन से वंश वृद्धि होती है l देवी के निवास के लिए निम्ब वृक्ष लोक प्रसिद्ध है ही l 
प्रेत निवास वृक्ष के रूप में विभीतक (बहेड़ा) माना गया है l 
ये वृक्ष पृथ्वी के रोम माने गये हैं l ये पृथ्वी की सम्पदा हैं l देवता के निवास स्थान हैं l पर्जन्यों के आकर्षण केन्द्र हैं l

                               ✍️ कमलेश्वर उपाध्याय 

                           ❀ *_वयं राष्ट्रे जागृयाम_* ❀*

गायत्री_मंत्र_पाठ_करने_के_विशेष_नियम

#गायत्री_मंत्र_पाठ_करने_के_विशेष_नियम :
गायत्री मंत्र का पाठ करने का अधिकार किसको है, इसे लेकर शास्त्रों में दो तरह के मत मिलते हैं - 
1. परम्परागत शास्त्रीय मत और 
2. आधुनिक/सुधारवादी मत !
1. परम्परागत शास्त्रीय मत के अनुसार
परम्परागत स्मृति और धर्मशास्त्रों में गायत्री मंत्र को वैदिक मंत्र माना गया है, इसलिए इसका पाठ करने के कुछ खास नियम बताये गए हैं :
किसे पाठ करने का अधिकारी माना जाता है :
• जिसका यज्ञोपवीत संस्कार/उपनयन संस्कार हुआ हो ! इसीलिए इसे द्विज मंत्र भी कहा जाता है !
• जो शारीरिक और मानसिक शुचिता का पालन करता हो !
- स्नान के बाद, पवित्र स्थान पर, सात्विक अवस्था में पाठ करता हो !
• जिसने किसी योग्य गुरु से गायत्री मंत्र की दीक्षा ली हो ! बिना दीक्षा लिए केवल गायत्री मंत्र को सुनना और मानसिक स्मरण करने का विधान है, वाचिक जप का नहीं !
नियम/निषेध के रूप में जो बताया गया है --
• अशौच अवस्था में होने पर पाठ नहीं करना चाहिए!
- जन्म-मरण का सूतक होने, मासिक धर्म, या अपवित्र अवस्था में होने पर पाठ का निषेध किया गया है !
• बिना उच्चारण शुद्धि के भी पाठ नहीं करना चाहिए !
- गायत्री मंत्र में उदात्त-अनुदात्त स्वर का बहुत महत्व है, अशुद्ध उच्चारण से विपरीत फल मिल सकता है !
• मांस-मदिरा का सेवन करके, क्रोध में होने पर, असत्य के साथ पाठ नहीं करना चाहिए !
- मंत्र-जप के समय संयम रखना अनिवार्य माना गया है !
• कुछ आचार्य ग्रंथों में स्त्रियों और यज्ञोपवीत-रहित वर्णों द्वारा वैदिक स्वर में गायत्री के वाचिक जाप को निषिद्ध बताया है, उनके लिए पौराणिक गायत्री - जैसे "या देवी सर्वभूतेषु..."  या  "ऊँ गायत्र्यै नमः" जैसे नाम-जप का विधान बताया है !
यह मत मीमांसा, मनुस्मृति और कई पुराने भाष्यों पर आधारित हैं !
2. आधुनिक और दूसरा शास्त्रीय मत
यह मत वेद, उपनिषद और पुराणों के दूसरे प्रमाणों को सामने रखता है :
• यजुर्वेद श्लोक 26.2 में कहा गया है - "यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः!" - यह कल्याणी वाणी सभी जनों के लिए है !
 • देवी भागवत और कई तंत्र ग्रंथों में गायत्री को आदिशक्ति - वेदमाता कहा गया है, न कि केवल एक वैदिक छंद !शक्ति रूप में उसकी उपासना पर किसी का प्रतिबंध नहीं होता है !
• आर्य समाज, गायत्री परिवार (शांतिकुंज) और अधिकांश आधुनिक संत मानते हैं कि गायत्री मंत्र प्राण-शक्ति और सद्बुद्धि का मंत्र है, इसलिए श्रद्धा, पवित्रता और सही उच्चारण के साथ स्त्री-पुरुष, सभी वर्ण, सभी आयु के लोग इसका जाप कर सकते हैं !
• बालकों के लिए मानसिक जप या 3-5-11 बार का लघु जाप करना पर्याप्त बताया जाता है, लम्बी माला का पाठ नहीं !
 गायत्री मंत्र का पाठ कैसे नहीं करना चाहिए पर अधिक जोर दिया गया है !
व्यवहार में क्या ध्यान रखना चाहिए  -
यदि आप परम्परागत पद्धति से पाठ करना चाहते हैं तो --
1. योग्य गुरु से दीक्षा लेकर, जनेऊ धारण करके, प्रातः सायं संध्या के समय शुद्ध उच्चारण के साथ गायत्री मंत्र का जप करें !
2. यदि अपने गुरु से दीक्षा नहीं ली गयी है या किसी विशेष परम्परा से बंधे नहीं हैं, तो बिना तेज स्वर के, शुद्ध मन से, मानसिक या मधुर वाचिक रूप में इसका पाठ सभी कर सकते हैं - 
ऐसा आज अधिकांश पंचांग और ज्योतिर्विद मानते हैं !
3. सूतक-पातक, अपवित्र स्थान, और बिना स्नान के जप करने से बचें !
4. गायत्री का जप क्रोध, द्वेष या किसी का अहित करने के संकल्प से कभी नहीं करना चाहिए !
संक्षेप में - 
अधिकारी वह है जो -- पुरानी मर्यादा रक्षा के लिए कुछ विशेष नियम और उनके पालन करते हुए पाठ करे, ऐसा भेद बताया गया है और उपासना-परक परम्परा गायत्री को माता मानकर सभी को पाठ करने का अधिकारी मानती है !आप जिस परम्परा का अनुसरण करते हैं, उसी के अनुसार आचरण करना उचित होता है !
हाँ, यह बात ध्यान देने योग्य अवश्य है कि गायत्री को केवल मंत्र नहीं, महामंत्र माना गया है, इसलिए इसके जप के साथ कुछ विशेष नियम शास्त्रों में बताये गए हैं 
 संक्षेप में गायत्री मंत्र पाठ का मुख्य नियम यह हैं :
1. समय और दिशा का नियम :
• सर्वोत्तम समय : ब्राह्म मुहूर्त ( सूर्योदय से लगभग 1.5 घंटा पहले ) और तीनों संध्या - प्रातः, मध्याह्न, व सायं !
गृहस्थ के लिए प्रातः और सायं ही पर्याप्त माना गया है !
• दिशा: -- प्रातःकाल पूर्वमुखी, सायंकाल पश्चिममुखी या उत्तरमुखी बैठकर जप करना चाहिए !
दक्षिण मुख करके पाठ करने का निषेध है "
• चलते-फिरते, लेटे हुए, या जूते पहनकर जप नहीं करना चाहिए !
2. शुचिता और आसन :
• स्नान, आचमन, पवित्री धारण करने के उपरांत ही जप करना चाहिए !
 • आसन: कुश का आसन सर्वश्रेष्ठ होता है, उसके बाद ऊनी या सूती आसन प्रयोग कर सकते हैं !
नंगे भूमि पर या बिस्तर पर बैठकर जप करने का फल नकारात्मक फल मिलता है, ऐसा माना जाता है !
• वस्त्र शुद्ध और हल्के रंग के हों, विशेषकर सफेद या पीले !
3. माला और संख्या :
• माला तुलसी, रुद्राक्ष या स्फटिक की होनी चाहिए ! गायत्री मंत्र के लिए 108 दानों की माला से जप की गणना होती है !
• माला को गोमुखी में या दायें हाथ में रखकर, मध्यमा उंगली से चलाना चाहिए ! तर्जनी उंगली से माला छूना निषेध है !
• जप की संख्या - कम से कम 11, 27, 54 या 108 बार जप करना चाहिए !अनुष्ठान में 1000, 24000 (एक पुरश्चरण) तक का विधान है ! बीच में संख्या गिनने के लिए बोलना नहीं चाहिए !  
4. उच्चारण और विधि :
• गायत्री के तीन पाद हैं, इसलिए बीच में बिना रुके, लय और स्वर के साथ स्पष्ट उच्चारण करना चाहिए !
  ॐ भूर्भुवः स्वः! तत्सवितुर्वरेण्यं! भर्गो देवस्य धीमहि! धियो यो नः प्रचोदयात् !
• जप से पहले प्राणायाम, आचमन और गायत्री का आवाहन और अंत में क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए !
• जप तीन प्रकार का होता है - 
1. वाचिक (बोलकर), 2. उपांशु (होंठ हिलाकर धीरे) और; 3. मानसिक (मन में) बिना होंठ हिलाए ! 
गृहस्थ के लिए उपांशु और मानसिक को अधिक फलदायी माना गया है !
5. आहार-विहार का नियम :
• जप के दिन सात्विक भोजन करना चाहिए, लहसुन-प्याज, मांस-मदिरा से परहेज रखना चाहिए !
• सत्य, संयम, और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना चाहिए ! जप के दौरान क्रोध, चुगली, झूठ और अधिक बातचीत से बचना चाहिए !
• ब्रह्मचर्य का पालन करना अनुष्ठान के दिनों में विशेष रूप से बताया गया है !
 6. क्या न करें :
• अशौच, सूतक के समय, बिना स्नान किए, अपवित्र हाथों से जप नहीं करना चाहिए !
• दूसरे की माला से भी जप न करें !
• जप का प्रदर्शन या फल की चर्चा करके अहंकार न करें !
शास्त्र कहते हैं - गायत्री का तेज गुप्त रखने से बढ़ता है !
गृहस्थ व्यक्ति के लिए सार यह है - **श्रद्धा + शुचिता + नियमितता** !! यदि रोज 108 बार भी शांत मन से, सही उच्चारण के साथ, एक निश्चित समय पर गायत्री मंत्र का पाठ कर लिया जाए तो यह पूर्ण अनुष्ठान के समान फल देता है !     
  #सौजन्य से पंडित रज्जी राम उपाध्याय हनुमान गढं जं 
                                   💐🌷💐

Thursday, 22 October 2026

आदमी को वोटर बना दिया, नागरिक बनाना भूल गए।

78 सालों में तुम्हें 5 किलो राशन देकर, 500 रुपये गैस में छोड़ कर, 2 हजार खाते में डालकर ऐसे दिखाया जाता है जैसे सरकार ने जनता पर कोई एहसान कर दिया हो। जबकि सच यह है कि एक आम आदमी जिंदगी भर टैक्स देता है। 🤷

पेट्रोल में टैक्स, मोबाइल रिचार्ज में टैक्स, साबुन में टैक्स, कपड़ों में टैक्स, बिजली में टैक्स, घर बनाओ तो टैक्स, मर जाओ तो लकड़ी तक में टैक्स। आदमी पैदा होने से लेकर मरने तक सरकार को पैसा देता रहता है 

बदले में उसे क्या मिलता है। राशन की थैली और चुनावी भाषण में एक नया नारा। लोकतंत्र को भिखारी योजना बना दिया गया है।

अगर कोई पढ़ी-लिखी और मस्तिष्क वाली सरकार हो तो वह जनता को मुफ्त की आदत नहीं लगाएगी बल्कि ऐसा सिस्टम बनाएगी जिससे आदमी स्वयं कमाने लायक बने। असली सरकार वह होती है जो आदमी को लाइन में खड़ा नहीं करती बल्कि उसके हाथ में काम देती है।

भारत की केंद्र सरकार का वार्षिक बजट लगभग 48 से 50 लाख करोड़ रुपये का है। राज्यों का अलग बजट है। उत्तर प्रदेश अकेले लगभग 7 लाख करोड़ का बजट चलाता है। राजस्थान करीब 4 से 5 लाख करोड़ का। 

मतलब पैसा कम नहीं है, सोच छोटी है। नेता जनता को गरीब रखकर राजा बने रहना चाहते हैं। गरीब आदमी 500 रुपये के लिए वोट बेच देता है, आत्मनिर्भर आदमी सवाल पूछता है। यही असली खेल है।

अगर कोई समझदार प्रधानमंत्री हो तो वह हर जिले में कम से कम 200 से 300 सरकारी इंडस्ट्रियल यूनिट खोल सकता है। टेक्सटाइल, मेडिकल इक्विपमेंट, फूड प्रोसेसिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, खेती आधारित फैक्ट्री, डेयरी प्लांट, सोलर पैनल यूनिट। लगा सकता है 

एक जिले में 50 हजार से 1 लाख रोजगार पैदा हो सकते हैं। देश के 700 से ज्यादा जिलों में यह मॉडल लागू हो जाए तो करोड़ों लोगों को सीधा रोजगार मिल सकता है। लेकिन यहां फैक्ट्री खोलने से ज्यादा ध्यान चुनावी रैली में कुर्सी भरने पर है।

केंद्र सरकार चाहे तो हर युवा को 2 लाख रुपये तक का ब्याज मुक्त बिजनेस स्टार्टअप फंड दे सकती है। कोई कपड़े की दुकान खोले, कोई डेयरी, कोई मेडिकल स्टोर, कोई मोबाइल रिपेयर, कोई ट्रैक्टर सर्विस सेंटर। 

10 करोड़ युवाओं को भी 2 लाख दिए जाएं तो 20 लाख करोड़ लगेंगे, लेकिन यह पैसा खर्च नहीं निवेश होगा क्योंकि आदमी कमाएगा तो टैक्स वापस आएगा। और इसकी जगह अभी क्या हो रहा है। बेरोजगार को 2 हजार भत्ता देकर शांत रखो और पांच साल बाद फिर वही फोटो खिंचवा लो।

एक पढ़ी-लिखी सरकार गांव मे मिनी हॉस्पिटल, सरकारी कोल्ड स्टोरेज, खेती, मशीन बैंक, फ्री वाईफाई टावर, स्किल, ट्रेनिंग सेंटर, डेयरी प्लांट, सोलर बिजली , यूनिट, स्पोर्ट्स ग्राउंड, डिजिटल लाइब्रेरी, लड़कियों के लिए हॉस्टल, लोकल फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगा सकतीं हैं 

एक गांव पर साल के 20 से 30 करोड़ खर्च हों तो गांव की पूरी तस्वीर बदल सकती है। लेकिन यहां पंचायत भवन की टूटी कुर्सी पर ही विकास खत्म हो जाता है।

राज्य सरकार चाहे तो हर जिले में फ्री कोचिंग यूनिवर्सिटी खोल सकती है
हर तहसील में 24 घंटे ट्रॉमा सेंटर बना सकती है सरकारी स्कूलों को प्राइवेट से बेहतर बना सकती है किसानों के लिए फसल खरीद की गारंटी दे सकती है हर गरीब परिवार को 300 यूनिट मुफ्त बिजली दे सकती है महिलाओं को लोकल रोजगार मिशन से जोड़ सकती है

हर शहर में सरकारी किराये के मकान बना सकती है सोचो अगर सरकार हर जिले में 1000 करोड़ की इंडस्ट्री लगाए और 50 जिले हों तो 50 हजार करोड़ लगेंगे। नेताओं के कर्ज माफ करने, चुनावी विज्ञापन, फालतू परियोजनाओं और भ्रष्टाचार में इससे ज्यादा पैसा उड़ जाता है।

आज हमें क्या मिल रहा है 5 किलो राशन, गैस सिलेंडर में सब्सिडी, 1000-3000 भत्ता, चुनाव से पहले मुफ्त घोषणा, फिर पांच साल की चुप्पी ..

अगर तुम चाहो तो बहुत कुछ मिल सकता है स्थायी रोजगार, फ्री स्किल शिक्षा, सस्ता इलाज, मजबूत सरकारी स्कूल, लोकल फैक्ट्री, ब्याज मुक्त बिजनेस लोन, गांव में उद्योग, युवाओं को तकनीकी ट्रेनिंग, किसानों के लिए प्रोसेसिंग यूनिट, महिलाओं के लिए घर के पास काम लेकिन यह सब नहीं हो रहा

दुनिया के कई देशों ने यही किया। चीन ने गांव-गांव फैक्ट्री पहुंचाई। जर्मनी ने स्किल सिस्टम मजबूत किया। जापान ने लोकल इंडस्ट्री बचाई। भारत में क्या हुआ। 

यहां नेता हेलीकॉप्टर से उतरकर गरीब के घर खाना खाकर फोटो खिंचवा लेते हैं और अगले दिन वही गरीब आदमी मजदूरी पर चला जाता है।

असल विकास वह नहीं जो पोस्टर में दिखे। असली विकास वह है जिसमें आदमी को किसी नेता के आगे हाथ न फैलाना पड़े। लोकतंत्र का मतलब मुफ्त राशन नहीं, मजबूत नागरिक होता है। 

लेकिन मजबूत नागरिक नेताओं को पसंद नहीं आते। उन्हें भीड़ चाहिए, सोचने वाले लोग नहीं। आदमी को वोटर बना दिया, नागरिक बनाना भूल गए।

#foryouシ #post
... ✍️Suman Gupta 

लकार - संस्कृत में यह दस लकार होते हैं।

*लकार*  
संस्कृत में लट् , लिट् , लुट् , लृट् , लेट् , लोट् , लङ् , लिङ् , लुङ् , लृङ् – ये दस लकार होते हैं। वास्तव में ये दस प्रत्यय हैं जो धातुओं में जोड़े जाते हैं। इन दसों प्रत्ययों के प्रारम्भ में 'ल' है इसलिए इन्हें 'लकार' कहते हैं (ठीक वैसे ही जैसे ॐकार, अकार, इकार, उकार इत्यादि)। इन दस लकारों में से आरम्भ के छः लकारों के अन्त में 'ट्' है- लट् लिट् लुट् आदि इसलिए ये टित् लकार कहे जाते हैं और अन्त के चार लकार ङित् कहे जाते हैं क्योंकि उनके अन्त में 'ङ्' है। व्याकरणशास्त्र में जब धातुओं से पिबति, खादति आदि रूप सिद्ध किये जाते हैं तब इन टित् और ङित् शब्दों का बहुत बार प्रयोग किया जाता है।

इन लकारों का प्रयोग विभिन्न कालों की क्रिया बताने के लिए किया जाता है। जैसे – जब वर्तमान काल की क्रिया बतानी हो तो धातु से लट् लकार जोड़ देंगे, परोक्ष भूतकाल की क्रिया बतानी हो तो लिट् लकार जोड़ेंगे।

(१) लट् लकार (= वर्तमान काल) जैसे :- श्यामः खेलति । ( श्याम खेलता है।)

(२) लिट् लकार (= अनद्यतन परोक्ष भूतकाल) जो अपने साथ न घटित होकर किसी इतिहास का विषय हो । जैसे :-- रामः रावणं ममार । ( राम ने रावण को मारा ।)

(३) लुट् लकार (= अनद्यतन भविष्यत् काल) जो आज का दिन छोड़ कर आगे होने वाला हो । जैसे :-- सः परश्वः विद्यालयं गन्ता । ( वह परसों विद्यालय जायेगा ।)

(४) लृट् लकार (= सामान्य भविष्य काल) जो आने वाले किसी भी समय में होने वाला हो । जैसे :--- रामः इदं कार्यं करिष्यति । (राम यह कार्य करेगा।)

(५) लेट् लकार (= यह लकार केवल वेद में प्रयोग होता है, ईश्वर के लिए, क्योंकि वह किसी काल में बंधा नहीं है।)

(६) लोट् लकार (= ये लकार आज्ञा, अनुमति लेना, प्रशंसा करना, प्रार्थना आदि में प्रयोग होता है ।) जैसे :- भवान् गच्छतु । (आप जाइए ) ; सः क्रीडतु । (वह खेले) ; त्वं खाद । (तुम खाओ ) ; किमहं वदानि । (क्या मैं बोलूँ ?)

(७) लङ् लकार (= अनद्यतन भूत काल ) आज का दिन छोड़ कर किसी अन्य दिन जो हुआ हो । जैसे :- भवान् तस्मिन् दिने भोजनमपचत् । (आपने उस दिन भोजन पकाया था।)

(८) लिङ् लकार = इसमें दो प्रकार के लकार होते हैं :--

(क) आशीर्लिङ् (= किसी को आशीर्वाद देना हो) जैसे :- भवान् जीव्यात् (आप जीओ ) ; त्वं सुखी भूयात् । (तुम सुखी रहो।)
(ख) विधिलिङ् (= किसी को विधि बतानी हो ।) जैसे :- भवान् पठेत् । (आपको पढ़ना चाहिए।) ; अहं गच्छेयम् । (मुझे जाना चाहिए।)
(९) लुङ् लकार (= सामान्य भूत काल) जो कभी भी बीत चुका हो । जैसे :- अहं भोजनम् अभक्षत् । (मैंने खाना खाया।)

(१०) लृङ् लकार (= ऐसा भूत काल जिसका प्रभाव वर्तमान तक हो) जब किसी क्रिया की असिद्धि हो गई हो । जैसे :- यदि त्वम् अपठिष्यत् तर्हि विद्वान् भवितुम् अर्हिष्यत् । (यदि तू पढ़ता तो विद्वान् बनता।)

इस बात को स्मरण रखने के लिए कि धातु से कब किस लकार को जोड़ेंगे, निम्नलिखित श्लोक स्मरण कर लीजिए-

लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्‍तथा ।
विध्‍याशिषोर्लिङ् लोटौ च लुट् लृट् लृङ् च भविष्‍यति ॥
(अर्थात् लट् लकार वर्तमान काल में, लेट् लकार केवल वेद में, भूतकाल में लुङ् लङ् और लिट्, विधि और आशीर्वाद में लिङ् और लोट् लकार तथा भविष्यत् काल में लुट् लृट् और लृङ् लकारों का प्रयोग किया जाता है।)
 *लकारों के नाम याद रखने की विधि-* 
ल् में प्रत्याहार के क्रम से ( अ इ उ ऋ ए ओ ) जोड़ दें और क्रमानुसार ( ट् ) जोड़ते जाऐं । फिर बाद में ( ङ् ) जोड़ते जाऐं जब तक कि दश लकार पूरे न हो जाएँ । जैसे लट् लिट् लुट् लृट् लेट् लोट् लङ् लिङ् लुङ् लृङ् ॥ इनमें लेट् लकार केवल वेद में प्रयुक्त होता है । लोक के लिए नौ लकार शेष रहे । अब इन नौ लकारों में लङ् के दो भेद होते हैं :-- आशीर्लिङ् और विधिलिङ् । इस प्रकार लोक में दश के दश लकार हो गए ।

जगदीश डाभी