रुद्राक्ष उत्पत्ति एवं जागृति शाबर मंत्रयह एक अत्यंत प्रभावशाली और पारंपरिक शाबर मंत्र है:-
शुद्ध और स्पष्ट मंत्र
"सत नमो आदेश, गुरुजी को आदेश। ओम गुरुजी, मुख में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु, लिंग नाम महेश्वर, सर्वदेव नमस्कारम्, रुद्राक्षाय नमो नमः।गगनमंडल में धुंधुकारा, पापरहित निरंजन निराकार। निराकार में चरण-पादुका, चरण-पादुका में पिंडी, पिंडी में वासुकि, वासुकि में कासुकि, कासुकि में कूर्म, कूर्म में मारी, मारी में नागफनी। अलख पुरुष ने बैल के सींग पर राई ठहराई। धीरज-धर्म की धुनी जमाई। वहाँ पर रुद्राक्ष सुमेरु पर्वत पर जमाया, उसमें से फूटीं छह डालियाँ।एक गया पूर्व, एक गया दक्षिण, एक गया पश्चिम, एक गया उत्तर, एक गया आकाश, एक गया पाताल।उसमें लगा एक-मुखी रुद्राक्ष, श्री रुद्र पर चढ़ाइए श्री ओंकार आदिनाथ जी को।दो-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए चंद्र-सूर्य को।तीन-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए त्रिलोकी को।चार-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए चारों वेदों को।पंच-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए पंच पांडवों को।छह-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए षट् (छह) दर्शन को।सात-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए सप्त समुद्रों को।आठ-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए अष्ट कुली नागों को।नव-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए नवग्रहों को।दस-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए दसों दिशाओं को।ग्यारह-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए ग्यारह रुद्रों को।द्वादश (बारह) मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए बारह पंथों (सूर्य) को।तेरह-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए तैंतीस कोटि देवताओं को।चौदह-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए चौदह भुवनों (चौदह रत्नों) को।पंद्रह-मुखी रुद्राक्ष सोहे (शोभा दे) श्रृंगार को।सोलह-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए सोलह कलाओं को।सत्रह-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए श्री सीता माता को।अठारह-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए अठारह भार वनस्पतियों को।उन्नीस-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए अलख पुरुष को।बीस-मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए विष्णु भगवान को।इक्कीस-मुखी रुद्राक्ष चंद्रकाय शिव को।रुद्राक्ष मंत्र संपूर्ण भया। श्री नाथ जी के चरण कमल में आदेश, आदेश!"
मंत्र का सरल अर्थ (यह मंत्र क्या कहता है?)यह नाथ संप्रदाय का एक पारंपरिक रुद्राक्ष महिमा शाबर मंत्र है। इसमें बताया गया है कि:-
शुरुआत में:- गुरु, ब्रह्मा, विष्णु और शिव (महेश्वर) को प्रणाम किया गया है।सृष्टि की उत्पत्ति: जब संसार में कुछ नहीं था (धुंधुकारा था), तब निराकार भगवान से लेकर सुमेरु पर्वत तक की रचना हुई। उस सुमेरु पर्वत पर रुद्राक्ष का वृक्ष उगा, जिसकी छह डालियाँ छह दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आकाश, पाताल) में फैल गईं।रुद्राक्ष का महत्व: इसके बाद १ मुखी से लेकर २१ मुखी तक के रुद्राक्षों का महत्व बताते हुए उन्हें अलग-अलग देवी-देवताओं, वेदों, ग्रहों और शक्तियों को समर्पित (अर्पित) किया गया है।
यहाँ इस रुद्राक्ष शाबर मंत्र की सरल साधना विधि, नियम और इससे मिलने वाले विशेष लाभ दिए गए हैं:-
मंत्र जाप की सरल विधि शुभ दिन:-
इस मंत्र की साधना किसी भी सोमवार, प्रदोष व्रत, शिवरात्रि या सावन के सोमवार से शुरू करना सबसे उत्तम होता है।
समय: सुबह सूर्योदय के समय या शाम को पूजा के समय।
आसन और कपड़े: साफ-सुथरे या पीले/सफेद रंग के कपड़े पहनें। कुशा (घास) या ऊन के आसन पर बैठें।
दिशा: मंत्र पढ़ते समय आपका मुख उत्तर या पूर्व दिशा की तरफ होना चाहिए।
पूजन सामग्री: भगवान शिव (या नवनाथ जी) की मूर्ति/तस्वीर के सामने शुद्ध घी का दीपक और अगरबत्ती जलाएं। एक तांबे के पात्र में साफ जल रखें।
जाप संख्या: इस मंत्र का प्रतिदिन १, ५ या ११ बार श्रद्धापूर्वक पाठ करें। यदि आपके पास कोई रुद्राक्ष है, तो उसे हाथ में रखकर यह पाठ करना और भी लाभकारी होता है।
साधना के जरूरी नियम पवित्रता:-
शाबर मंत्रों में शुद्धता का बहुत महत्व है। तन और मन दोनों से पवित्र रहें।खान-पान: साधना के दिनों में तामसिक भोजन (प्याज़, लहसुन, मांस, मदिरा) का पूरी तरह त्याग करें।
रुद्राक्ष का सम्मान: यदि आप रुद्राक्ष धारण करते हैं, तो उसे कभी भी अशुद्ध हाथों से न छुएं और सोते समय या श्मशान भूमि में जाते समय उतार दें।
विश्वास: शाबर मंत्र सीधे और सरल होते हैं, इसलिए इन पर पूर्ण विश्वास (श्रद्धा) रखना जरूरी है।
इस मंत्र के चमत्कारी लाभ रुद्राक्ष की शुद्धि:-
यदि आप नया रुद्राक्ष पहनने जा रहे हैं, तो इस मंत्र को पढ़ते हुए उस पर गंगाजल छिड़कने से वह सिद्ध और जागृत हो जाता है।
नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा:- इसके नियमित पाठ से घर की नकारात्मक शक्तियां, नजर दोष और तंत्र-मंत्र का असर खत्म होता है।
ग्रह दोष शांत होना:- इस मंत्र में १ से २१ मुखी रुद्राक्ष का नाम लेकर सभी देवताओं और नवग्रहों को याद किया गया है। इसलिए इसका पाठ करने से कुंडली के सभी ग्रह दोष शांत होते हैं।
मानसिक शांति और एकाग्रता:-
भगवान शिव और गुरु गोरखनाथ की कृपा से मन का तनाव दूर होता है और एकाग्रता बढ़ती है।