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Saturday, 14 February 2026

महाशिवरात्रि शिव- साधना , उपवास और आत्मशुद्धि का महान् परात्पर पर्व

॥ॐ॥ 
महाशिवरात्रि शिव- साधना , उपवास और आत्मशुद्धि का महान् परात्पर पर्व
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 आशुतोष महादेव की उपासना और फलस्वरूप सद्य:फल प्राप्ति का पर्व और व्रत महाशिवरात्रि है।इस वर्ष महाशिवरात्रि का पर्व 15 फरवरी 2026 रविवार को है। देवाधिदेव महादेव की उपासना अत्यन्त प्राचीन है। मंगल- मूर्ति शिव का स्वरूप लोक-मंगल स्वरूप हैं। यद्यपि उनकी प्रसिद्धि प्रलयंकर के रूप में भी है, किन्तु शिव का यह आगमिक रूप लोकाभिमत नहीं हो पाया। इसीलिए शिव की उपासना आदि काल से लोकदेवता और लोकगुरु के रूप में सदैव एवं सर्वत्र होती रही है। इसमें कभी पूर्व और पश्चिम तथा उत्तर और दक्षिण का भेद नहीं रहा।मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के उत्खनन में योगस्थ ध्यानमग्न शिव प्रतिमा प्राप्त हुई है। शिव परम योगीश्वर और आदियोगी कहे जाते हैं।वैदिक काल में शिव की पूजा रुद्र के रूप में होती थी। कालान्तर में रुद्र का स्वरूप शिव के रूप में क्रमशः कैसे बदलता गया ,यह उपनिषदों, आरण्यकों,ब्राह्मण ग्रन्थों,वाल्मीकि रामायण और महाभारत से स्पष्ट होता है। उपनिषदों में कहा गया है कि शिव ही जगत् के आदि कारण हैं और वही परब्रह्म हैं।             
  तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम्।
पतिं पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम्।  
श्वेता० उपनिषद् 3/4।          
महाप्रलय रूप समाधि में अद्वितीय और एकमात्र रुद्र ही थे-
एको हि रुद्र न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाॅल्लोकानीशत ईशनीभि:।
श्वेता ०3/2
तैत्तिरीय आरण्यक में रुद्र को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सर्व व्यापी और सर्वगुण बताते हुए कहा गया है कि -
सर्वो वै रुद्रस्तस्मै रुद्राय नमो अस्तु।
10/16
         महाशिवरात्रि -व्रत को नित्य और काम्य दोनों प्रकार का व्रत माना गया है ।प्रति वर्ष इस व्रत को करने पर यह नित्य व्रत की श्रेणी में और जब किसी विशिष्ट कामना की पूर्ति हेतु किया जाता है ,तब यह काम्य व्रत कहा जाता है ।ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के अर्धरात्रिमें ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य हुआ था, इसलिए इसे शिव की महारात्रि कहा जाता है ।कुछ विद्वानों के अनुसार महाशिवरात्रि के अर्धरात्रि को शिव और पार्वती दोनों गार्हस्थ जीवन में प्रवेश किये थे, इसलिए इसे महाशिवरात्रि कहा जाता है और शिवार्चन में इसका सर्वाधिक महत्त्व है।
महाशिवरात्रि के व्रत के काल के सम्बन्ध में शास्त्रकारों पर्याप्त मतभेद है। कुछ विद्वान् प्रदोष व्यापिनी चतुर्दशी पर बल देते हैं तो कुछ निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी पर जोर देते हैं। वैसे चतुर्दशी अर्धरात्रि के पूर्व और उपरान्त भी रहे तो अति उत्तम है।
महाशिवरात्रि की पूजा का संकल्प शिव पुराण में इस प्रकार बताया गया है-
देव देव महादेव नीलकण्ठ नमोsस्तु ते ।
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव ।
तव प्रभावाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति ।
कामाद्याः शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि ।।
उपर्युक्त संकल्प करके शिवलिंग के पास जाकर विधि विधान से शिवजी की आराधना पूजा करे ।
यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है कि शिवजी को जलधारा अत्यन्त प्रिय है, अस्तु शिवजी की पूजा में शिवलिंग का जलाभिषेक अवश्य करे ।
जलधारा प्रियो शिव: । ऋग्वेद 7/35/6 में रुद्र को जलधारा प्रिय कहा गया है -शं नो रुद्रो रुद्रेभिर्जलाष : ।शिवजी को जलाभिषेक चाँदी या तांबे के पात्र से करें ।खडे होकर जलाभिषेक करना उचित नहीं है ।शिवजी को विल्वपत्र और धतूरे का फल अत्यन्त प्रिय है ।अतः शिवार्चन में श्वेत अर्क पुष्प, बिल्वपत्र और धतूरे का फल अवश्य चढाना चाहिए ।
भगवान् शिव आदि देव हैं । देवाधिदेव महादेव हैं । आशुतोष हैं।शिवजी के समस्त उपासना और अर्चना प्रकारों में शिवरात्रि के दिन उपवास , जागरण और पूजा का अतिशय एवं विशेष महत्त्व है।शिवप्रिया रात्रिःइति शिवरात्रिः अर्थात् जो रात्रि शिवजी को सर्वाधिक प्रिय हो।इसे शिव चतुर्दशी भी कहते हैं । स्कन्द पुराण में कहा गया है कि यदि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी रविवार या मंगलवार को पडे तो शिवरात्रि व्रत का महत्त्व और अधिक बढ जाता है ।ईशान संहिता में भगवान् शिव का वचन है -
फाल्गुने कृष्णपक्षस्य या तिथिः स्याच्चतुर्दशी ।
तस्यां या तामसी रात्रिः सोच्यते शिवरात्रिका ।।
तत्रोपवासं कुर्वाणः प्रसादयति मां ध्रुवम् ।
न स्नानेन न वस्त्रेण न धूपेन न चार्चया।
तुष्यामि तु तथा पुष्पैर्यथा तत्रोपवासतः ।।
इस प्रकार स्पष्ट है कि शिवरात्रि पूजा का प्रधान अङ्ग उपवास ही है ।
इसके अतिरिक्त ईशान संहिता में शिवरात्रि के दिन शिव की चार मूर्तियों ईशान, अघोर,वामदेव और सद्योजात मूर्ति को क्रमशः दुग्ध, दधि, घृत और मधु से स्नान कराने का महत्त्व वर्णित है ।शंकर जी की पूजा के समय मस्तक पर भस्म लेपन और गले में रुद्राक्ष की माला अवश्य धारण करना चाहिए । शिवपुराण विश्वेश्वर संहिता 25/47 में कहा गया है कि शिवजी की आज्ञा है कि सभी आश्रमों एवं वर्णों तथा स्त्री और शूद्रों को सदैव रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। सर्वाश्रमाणां वर्णानां स्त्रीशूद्राणां। शिवाज्ञया धार्या: सदैव रुद्राक्षा:। यदि कोई शिव साधक भस्म का त्रिपुण्ड धारण करता है ,तब उसे सब तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त हो जाता है।कालाग्निरुद्रोपनिषद् में तो यहां तक कहा गया है कि भस्म से त्रिपुण्ड धारण करने वाले को सभी वेदों के अध्ययन का फल मिलता है।               
  शिवार्चन में सर्वप्रथम श्री गणेश पूजन और गौरी स्मरण करना चाहिए। शिवजी को कनेर, मौलसिरी , धतूरा,मदार, चमेली,कमल,शमी, नागकेसर,मगर,बेला ,पलाश,केसर, गूलर आदि के पुष्प प्रिय हैं। इसी प्रकार शिव पूजा में निषिद्ध पुष्पों में केतकी,शिरीष,कुंद,जूही ,कपास और सेमल के पुष्प मुख्य हैं। वैसे त्रिदल अर्थात् विल्व पत्र का शिवार्चन में सर्वाधिक महत्त्व शास्त्रों में अनेकशः वर्णित है। शिवपुराण में आठ नाम मन्त्रों द्वारा शंकर जी को पुष्प समर्पित करने का निर्देश है - शिव के वे आठ नाम हैं - भव ,शर्व, रुद्र,पशुपति, उग्र, महान्,भीम और ईशान।पूजा के अन्त में शिवलिंग के समक्ष साष्टांग लेट कर प्रार्थना करनी चाहिए और क्षमा मांगनी चाहिए ।
शिवरात्रि व्रत को सर्वपाप- प्रणाशक और भुक्ति -मुक्ति को देने वाला बताया गया है ।
शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापप्रणाशनम् 
आचाण्डालमनुष्याणां भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ।।
शिवरात्रि व्रत करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता ।
गरुडपुराण में भी कहा गया है कि 
चतुर्दश्यां निराहारो भूत्वा शम्भो परेsहनिभोक्ष्येsहं भुक्तिमुक्त्यर्थं शरणं मे भवेश्वर।
अब यहाँ प्रश्न यह है कि उपवास क्या है? 
उपवास शब्द की व्युत्पत्ति उप + वस + घञ् से होती है ।
उपवास का धातुमूलक अर्थ किसी के समीप रहना है ।अतः यहाँ उपवास का अर्थ शिव के समीप रहने से है ।
अग्निपुराण में उपवास का अर्थ बताते हुए लिखा है कि पापों से उपावृत अर्थात् निवृत्त होकर ,सभी प्रकार के भोगो का त्याग करते हुए जो सद्गुणों के साथ वास करता है , उसको उपवास कहते हैं ।उपवास करने वाले व्यक्तियों को बहुत से कार्य और वस्तुओं जैसे मांस, शहद , नमक,पराया अन्न,मैथुन, मसूर, चना , सुगन्ध, अंगराग, पान, शाक , लोभ , क्रोध आदि का त्याग करना चाहिए और सत्य, अहिंसा, शौच, दया, दान , सन्तोष , इन्द्रिय- संयम , क्षमा इन सद्गुणों के साथ रहना चाहिए ।उपवासी को तैलाभ्यंग, दिन में सोना, व्यायाम, लोभ, सुरापान, द्यूतक्रीडा आदि का भी त्याग करना चाहिए ।
भविष्य पुराण में भी उपवास शब्द की निरुक्ति में भी ऐसा ही लिखा है-
उपावृत्तस्य पापेभ्योयश्च वासो गुणैः सह।उपवासः स विज्ञेयः सर्वभोगविवर्जितः ।।
सामान्य रूप से आहार से निवृत्ति को लोग उपवास कहते हैं ।मन , बुद्धि या इन्द्रियों द्वारा जो कुछ भी बाहर से अन्दर आहृत अर्थात् लिया जाता है उसे आहार कहते हैं ।यह आहार स्थूल और सूक्ष्म के भेद से दो प्रकार का होता है।
स्थूल आहार में अन्न आदि और सूक्ष्म आहार में मन आदि एकादश इन्द्रियों द्वारा शब्द, रूप , रस ,गन्ध, स्पर्श और चिन्तन आदि विषय आते हैं ।
इस प्रकार उपवास के दिन उपवासी को स्थूल अन्नादि आहार को त्यागने के साथ साथ मन और वाणी सहित समस्त इन्द्रियों की पवित्रता बनाये रखनी चाहिए ।
शिवरात्रि के दिन शिव के स्वरूप का ध्यान, उनका नाम- जप , पंचाक्षरी मन्त्र नमः शिवाय , षडक्षर मन्त्र ओम् नमः शिवाय का जप करना चाहिए ।शिवरात्रि के प्रथम प्रहर का मन्त्र क्रमशः ह्रीं ईशानाय नमः,द्वितीय प्रहर का मन्त्र ह्रीं अघोराय नमः, तृतीय प्रहर का मन्त्र ह्रीं वामदेवाय नमः और चतुर्थ प्रहर का मन्त्र ह्रीं सद्योजाताय नमः है।
शिवरात्रि व्रत के पारण के विषय में शास्त्रकारो में मतभेद है ।कुछ विद्वानों के अनुसार चतुर्दशी के अन्त में ही पारण करना चाहिए ,जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार व्रत के समाप्ति पर पारण करना उचित है ।
शिवरात्रि व्रत सम्पन्न करने के पश्चात् प्रार्थना और विसर्जन के लिए शिवमहापुराण में अधोलिखित स्तुति बतायी गयी है -
नियमो यो महादेव कृतश्चैव त्वदाज्ञया।
विसृज्यते मया स्वामिन् व्रतं जातमनुत्तमम्।
व्रतेनानेन देवेश यथाशक्तिकृतेन च।
सन्तुष्टो भव शर्वाद्य कृपां कुरु ममोपरि।
शिवरात्रि के व्रत का उद्यापन 12वर्ष या 14 वर्ष के बाद करने का निर्देश है । स्कन्द पुराण में बारह वर्षों तक शिवरात्रि व्रत रखने का फल बताते हुए लिखा है - एवं द्वादशवर्षाणि शिवरात्रिमुपोषक:।यो मां जागरयते रात्रिं मनुज: स्वर्गमारुहेत्। शिवं च पूजयित्वा यो जागर्ति चतुर्दशीम्।
मातु: पयोधररसं न पिबेत् से कदाचन।
नागर खण्ड।
अर्थात् चौदह वर्षों तक रात्रि जागरण सहित शिव रात्रि का व्रत करने वाला स्वर्ग जाता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता।
उद्यापन के समय शिवजी की षोडशोपचार पूजा करके हवन आदि करे और सुवर्ण का दान और गोदान कर ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक भोजन करा कर यथा - शक्ति द्रव्यदान देना चाहिए ।प्रत्येक व्रत में अन्तः शुद्धि और बाह्य शुद्धि, इन्द्रियों का संयम, श्रद्धा और दान ये अनिवार्य अंग माने गये हैं ।
शिवरात्रि के दिन गंगा स्नान का भी शास्त्रों में अतिशय महत्त्व वर्णित है । गङ्गा स्नान हरिद्वार, प्रयागराज या काशी में करने का अवसर मिले तो उसका अनन्त फल होता है। इस समय प्रयागराज में कुम्भ महापर्व के अवसर पर करोड़ों श्रद्धालु गङ्गा और संगम में महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर दिव्य स्नान कर अक्षय पुण्य के भागी होंगे। यदि यह कहा जाय कि शिव - तत्त्व में समस्त सनातन योग - तत्त्व समाहित हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। शिव की इयत्ता का निर्वचन परम दुष्कर है।तप और व्रत ही शिव साधना का अपरिहार्य अंग और शिव प्राप्ति का साधन है।शिव की तपस्या में रत पार्वती जी के शब्दों में -
तप: किलेदं तदवाप्तिसाधनम्।
कुमारसम्भव।
इस प्रकार महाशिवरात्रि के दिन शरीर को स्थूल रूप अन्नादि आहार को त्यागने के साथ साथ सूक्ष्म रूप आहार काम,क्रोध, लोभ ,असत्य भाषण ,परनिन्दा आदि का त्याग करना चाहिए ।व्रती को केवल शिव स्मरण, शिवकीर्तन , शिव विषयक मन्त्रों का जप, शिव सहस्त्रनाम का पाठ,शिवस्तोत्र और रुद्रसूक्त का पाठ करना चाहिए ।
महाशिवरात्रि व्रत से श्रेष्ठ कोई व्रत नहीं है।शिवतत्त्व को आत्मसात करने का यह व्रत परात्पर है। स्कन्द पुराण में स्पष्ट रूप से कहा गया है -
परात् परतरं नास्ति शिवरात्रिपरात् परम्।
सभी पर आशुतोष भगवान भोलेनाथ की कृपा बनी रहे ।
इसी सदिच्छा के साथ 
सादर,
महामहोपाध्याय आचार्य डॉ • सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय
आई•ए•एस• ( सेवानिवृत्त)प्रयागराज

_वयं राष्ट्रे जागृयाम_

शरीर में चंद्रमा की कलाएं के अनुसार कामुकता का विज्ञान

#शरीर चंद्रमा और कामुकता; चंद्रकला और कामुकता का #अद्भुत विज्ञान!
भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में, मानव शरीर को ब्रह्मांड का ही एक सूक्ष्म रूप माना गया है "यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे"(जो शरीर में है, वही ब्रह्मांड में है)। जिस प्रकार आकाश में स्थित चंद्रमा अपनी कलाओं से विशाल समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पन्न करने की शक्ति रखता है, उसी प्रकार वह मानव शरीर के भीतर बहने वाले रसों और भावनाओं को भी गहराई से प्रभावित करता है।
11वीं शताब्दी रचित ग्रंथ रति रहस्य में पंडित कोक्कोक ने इस संबंध को और अधिक स्पष्टता से समझाया। इस ग्रंथ ने यौन संबंधों को केवल शारीरिक आवश्यकता से ऊपर उठाकर एक #मनोवैज्ञानिक_कला का दर्जा दिया। रति रहस्य का सबसे क्रांतिकारी सिद्धांत #चंद्रकला_सिद्धांत है, जो यह बताता है कि स्त्री की कामुकता स्थिर नहीं होती, बल्कि चंद्रमा की गति के साथ शरीर के विभिन्न अंगों में भ्रमण करती है।
आधुनिक दौर में, जहाँ रिश्ते अक्सर तनाव और यांत्रिक जीवनशैली का शिकार हो रहे हैं, यह प्राचीन विज्ञान हमें अपने साथी को बेहतर समझने और दांपत्य जीवन में नवीनता लाने का एक अद्भुत मार्ग दिखाता है। इस लेख में, हम रति रहस्य के उसी दुर्लभ ज्ञान, चंद्रकला और मर्मस्थानों(erotic zone) के रहस्य को विस्तार से जानेंगे।

#रति_रहस्य के अनुसार, कामदेव (कामुकता) का वास स्त्री के शरीर में एक जगह नहीं रहता। यह चंद्रमा की कलाओं (तिथियों) के अनुसार, शरीर के अंगों में ऊपर चढ़ता और नीचे उतरता है। इसे दो पक्षों में विभाजित किया गया है।
#शुक्ल_पक्ष जब चाँद बढ़ता है (अमावस्या से पूर्णिमा तक), तो कामुकता पैरों से शुरू होकर सिर की ओर चढ़ती है।
#कृष्ण_पक्ष जब चाँद घटता है (पूर्णिमा से अमावस्या तक), तो कामुकता सिर से शुरू होकर पैरों की ओर उतरती है।

रति रहस्य में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि किस तिथि को कामुकता (कास-वास) किस अंग में होती है। इसे जानकर आप रति-क्रीड़ा को अधिक प्रभावी बना सकते हैं।
#शुक्ल_पक्ष(बढ़ता चाँद नीचे से ऊपर)
#प्रतिपदा पैर का अंगूठा
शुरुआत यहाँ से होती है।
#द्वितीया तलवे/पंजे
मालिश या गुदगुदी से आनंद मिलता है।
#तृतीया टखने (Ankles)
यहाँ स्पर्श संवेदनशील होता है।
#चतुर्थी घुटने (Knees)
घुटनों के पीछे का हिस्सा।
#पंचमी जांघें (Thighs)
यह एक प्रमुख कामुक क्षेत्र है।
#षष्ठी नाभि (Navel)
यहाँ चुंबन या स्पर्श गहरा असर करता है।
#सप्तमी कटि/कमर (Waist)
आलिंगन का महत्व बढ़ जाता है।
#अष्टमी वक्षस्थल/छाती
स्पर्श और मर्दन के लिए उपयुक्त।
#नवमी कक्षा/बगल (Armpits)
यहाँ गुदगुदी या चुंबन उत्तेजक होता है।
#दशमी कंठ/गला (Throat)
गले पर चुंबन (Love bites) का दिन।
#एकादशी गाल (Cheeks)
कोमल स्पर्श और चुंबन।
#द्वादशी होंठ (Lips)
गहरा चुंबन (Deep Kissing)।
#त्रयोदशी आँखें (Eyes)
पलकों पर चुंबन।
#चतुर्दशी ललाट/माथा (Forehead)
माथे को चूमना और सहलाना।
#पूर्णिमा सिर/केश (Head/Hair)
इस दिन कामुकता पूरे शरीर में चरम पर होती है, जिसका केंद्र सिर होता है। बालों में उंगलियां फेरना बहुत सुखदायी होता है।
#कृष्ण_पक्ष (घटता चाँद ऊपर से नीचे)
कृष्ण पक्ष में यह क्रम उल्टा हो जाता है। पूर्णिमा के बाद पहले दिन (प्रतिपदा) कामुकता वापस सिर/बालों में होती है और अमावस्या तक धीरे-धीरे पैरों के अंगूठे में वापस चली जाती है।

#चंद्रकला_के_विज्ञान_का_महत्व
रति रहस्य का यह ज्ञान केवल शारीरिक सुख के लिए नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक जुड़ाव के लिए भी महत्वपूर्ण है।
▪️आधुनिक समय में रति-क्रिया अक्सर केवल जननांगों (Genitals) तक सीमित रह जाती है। चंद्रकला का सिद्धांत सिखाता है कि पूरा शरीर कामुक है। यह दृष्टिकोण साथी को यह महसूस कराता है कि आप उनके पूरे अस्तित्व को प्रेम करते हैं।
▪️यदि आप रोज एक ही तरह का व्यवहार करेंगे, तो संबंध नीरस हो जाएगा। चंद्रकला आपको हर दिन एक नया फोकस पॉइंट देती है। एक दिन पैरों की मालिश, तो दूसरे दिन गले पर ध्यान; यह विविधता (Variety) बनाए रखता है।▪️यदि आप सही तिथि पर सही अंग को स्पर्श करते हैं, तो साथी बहुत कम समय में उत्तेजित हो जाता है और पूर्ण संतुष्टि प्राप्त करता है।
#व्यावहारिक_प्रयोग
इस प्राचीन ज्ञान को आज के जीवन में लागू करने के लिए आप निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं;
▪️तिथि की जानकारी रखें
आपको ज्योतिषी बनने की जरूरत नहीं है। आजकल मोबाइल एप्स या कैलेंडर में आसानी से पता चल जाता है कि आज कौन सी तिथि (शुक्ल पक्ष की पंचमी है या कृष्ण पक्ष की दशमी) है।
फोरप्ले (Foreplay) की योजना
मुख्य रति-क्रिया से पहले, कम से कम 10-15 मिनट उस दिन के विशेष अंग को समर्पित करें।
#उदाहरण: यदि आज 'दशमी' है, तो रति रहस्य कहता है कि कामुकता 'गले' में है। आप गले को चूमने, सहलाने या हल्के दंत-प्रयोग पर ध्यान दें। आप देखेंगे कि साथी की प्रतिक्रिया सामान्य दिनों से अधिक तीव्र है।
स्पर्श की कला
रति रहस्य केवल छूने के लिए नहीं कहता, बल्कि भाव के साथ छूने को कहता है। शुक्ल पक्ष में (जब ऊर्जा ऊपर चढ़ रही हो) स्पर्श थोड़ा अधिक ऊर्जावान हो सकता है, जबकि कृष्ण पक्ष में (जब ऊर्जा नीचे उतर रही हो) स्पर्श अधिक कोमल और शांत होना चाहिए।
#सावधानी
#अमावस्या के दिन ऊर्जा सबसे निचले स्तर पर होती है। रति रहस्य और कामशास्त्र, दोनों ही इस दिन संभोग से बचने या बहुत संयमित रहने की सलाह देते हैं, ताकि शरीर की ऊर्जा संचित रहे।

रति रहस्य और इसके चंद्रकला सिद्धांत का अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि हमारे पूर्वज न केवल शरीर विज्ञान के ज्ञाता थे, बल्कि वे मानव मनोविज्ञान की भी गहरी समझ रखते थे। कोक्कोक का यह सिद्धांत हमें सिखाता है कि प्रेम और रति-क्रीड़ा कोई हड़बड़ी में किया जाने वाला कृत्य नहीं, बल्कि धैर्य और संवेदना का एक अनुष्ठान है।
जब हम अपनी जीवनशैली और अंतरंगता को प्रकृति की लय के साथ जोड़ते हैं, तो रिश्ते में ऊर्जा का प्रवाह सहज और सुखद हो जाता है।
इस प्राचीन ज्ञान को अंधविश्वास मानकर त्यागने के बजाय, इसे एक जीवन जीने की कला के रूप में अपनाना चाहिए। जब आप अपने साथी के शरीर और भावनाओं के इस चक्र को समझकर व्यवहार करते हैं, तो आपका रिश्ता केवल शारीरिक नहीं रह जाता, बल्कि वह आत्मिक गहराई और परम आनंद की ओर अग्रसर होता है। यही रति रहस्य का वास्तविक सार है।
क्या आप अपनी दिनचर्या में तिथियों और चंद्रकलाओं पर ध्यान देते हैं? भारतीय ज्ञान परंपरा के इस अद्भुत विज्ञान को अपने जीवन में उतारें और बदलाव स्वयं महसूस करें।
साभार - Unique Quote ( फेसबुक पेज )
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#रतिरहस्य #कामसूत्र #facebook

Wednesday, 11 February 2026

दानवीर ..

जब युद्ध के चरम पर अचानक कर्ण के रथ का पहिया धरती में धंस गया। नियति ने अपना खेल दिखाया। विवश कर्ण रथ से नीचे उतरा और अर्जुन से बोला— "ठहरो अर्जुन!
युद्ध के नियमों को स्मरण करो।
एक निहत्थे और रथहीन योद्धा पर प्रहार करना अधर्म है।
जब तक मैं पहिया निकाल न लूँ, तुम बाण नहीं चला सकते।"

अर्जुन के हाथ ठिठक गए।
गांडीव की प्रत्यंचा ढीली पड़ गई।
तभी सारथी बने श्रीकृष्ण का अट्टहास गूँजा:

> "नियम, कर्ण?
आज तुम्हें धर्म और नियमों की याद आ रही है?
कहाँ था तुम्हारा धर्म जब तुम छह महारथियों के साथ मिलकर बालक अभिमन्यु को घेरकर मार रहे थे?
कहाँ गए थे नियम जब भरी सभा में द्रौपदी को अपशब्द कहे गए और तुमने मौन रहकर उसका अपमान देखा?"
केशव के इन तीखे वाक्यों ने अर्जुन के भीतर की अग्नि को प्रज्वलित कर दिया।
क्रोधित अर्जुन ने भगवान शिव का दिया हुआ अस्त्र संधान किया और एक ही वार में दानवीर कर्ण को मृत्यु की शैय्या पर सुला दिया।

#दानवीरता की अंतिम परीक्षा:

कर्ण लहूलुहान पड़ा अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था।
सूर्यास्त होने को था, लेकिन श्रीकृष्ण यह सिद्ध करना चाहते थे कि मृत्यु के द्वार पर खड़ा यह योद्धा वास्तव में 'महादानवीर' है। श्रीकृष्ण ने एक वृद्ध ब्राह्मण का भेष धरा और कर्ण के पास जाकर विलाप करने लगे।
"#हे #दानवीर!
मेरी पुत्री का विवाह है और मेरे पास दान देने को कुछ नहीं है। क्या तुम इस निर्धन की सहायता करोगे?"

मृत्यु के करीब पहुँच चुके कर्ण ने क्षीण स्वर में कहा,
"हे #ब्राह्मण, मैं रणभूमि में निहत्था पड़ा हूँ, मेरे पास आपको देने के लिए अब कुछ नहीं बचा।"

#ब्राह्मण रूपी #कृष्ण बोले, "नहीं कर्ण!
तुम्हारे दांतों में स्वर्ण जड़ा है, वह मुझे दे दो।"

कर्ण ने पास पड़ा एक पत्थर उठाया और बिना हिचकिचाए अपना दांत तोड़ दिया।
जब उसने वह दांत ब्राह्मण को दिया, तो ब्राह्मण ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, "यह तो रक्त से सना और अशुद्ध है, मैं इसे नहीं ले सकता।"

तब कर्ण ने अपना धनुष उठाया और धरती पर बाण चलाया। धरती की कोख फाड़कर 'बाण गंगा' की निर्मल धारा फूट पड़ी। कर्ण ने दांत को उस गंगा जल में शुद्ध किया और ब्राह्मण को अर्पित कर दिया।
इस अद्भुत त्याग को देख श्रीकृष्ण अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और उनकी आँखों में आंसू भर आए।
> #श्रीकृष्ण ने कहा: "कर्ण, जब तक यह सृष्टि रहेगी, तुम्हारी दानवीरता का गुणगान तीनों लोकों में होगा।
तुम जैसा न कोई हुआ है, न होगा।"
#तीन #वरदान और कुंवारी भूमि का रहस्य:

प्रभु को सामने देख कर्ण ने अपने जीवन के दुखों को याद किया और तीन वरदान माँगे:

#सामाजिक #न्याय: "प्रभु, अगले जन्म में जब आप आएं, तो पिछड़े और उपेक्षित वर्ग के उत्थान के लिए कार्य करें।"

 #साहचर्य: "अगले जन्म में आप मेरे ही राज्य में जन्म लें।"

#अंतिम #संस्कार: "मेरा अंतिम संस्कार ऐसी भूमि पर हो जो 'कुंवारी' हो, जहाँ आज तक किसी का दाह संस्कार न हुआ हो।"

कर्ण की मृत्यु के पश्चात श्रीकृष्ण स्वयं उनके पार्थिव शरीर को लेकर निकल पड़े।
पूरी पृथ्वी पर ऐसी भूमि मिलना असंभव था।
अंततः सूरत (गुजरात) में ताप्ती नदी के किनारे उन्हें मात्र एक इंच ऐसी भूमि मिली जो शुद्ध थी।
इतने छोटे टुकड़े पर संस्कार असंभव था, इसलिए श्रीकृष्ण ने अपना एक बाण रखा और उस पर कर्ण का दाह संस्कार किया।
आज इस स्थान को 'तुलसीबाड़ी मंदिर' के नाम से जाना जाता है।

तीन पत्तों वाला वट वृक्ष: एक जीवित चमत्कार

जब पांडवों ने उस भूमि की पवित्रता पर संदेह किया, तो आकाशवाणी हुई कि ताप्ती नदी कर्ण की बहन हैं और अश्विनी कुमार उनके भाई, अतः यह स्थान उनके लिए ही सुरक्षित था।
साक्ष्य के रूप में श्रीकृष्ण ने वहाँ एक वट वृक्ष (बरगद) को स्थापित किया।

हैरानी की बात यह है कि:

सूरत के इस मंदिर में मौजूद वह बरगद का पेड़ हजारों साल पुराना है, लेकिन उस पर हमेशा सिर्फ तीन पत्ते ही रहते हैं।
ये तीन पत्ते ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक माने जाते हैं। मान्यता है कि जो भी यहाँ अटूट श्रद्धा के साथ आता है, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है।

Tuesday, 10 February 2026

सौभाग्य यंत्र

यह यंत्र सौभाग्य यंत्र है। ऐसे मनुष्यों के लिए यह यंत्र है।जिनका सौभाग्य जागृत नहीं रहता है।# इस यंत्र को भोज्य पत्र पर बनाकर सिंदूर और घी मिला मिलकर बनाना है लाल कपड़े से दाहिने हाथ में पहन लेना है। ऐसा करने से सौभाग्य की वृद्धि होती है।

जन्मजात शत्रु को अपना मित्र कभी नहीं बनाना चाहिए ।

      एक जंगल में मंदविष नामक सांप रहता था और बहुत बूढ़ा हो चुका था । बूढ़ा और कमजोर होने के कारण अपना शिकार करने में असमर्थ था । एक दिन रेंगता हुआ वह तालाब के किनारे पहुँच गया और वहीं लेट गया और कुछ दिनों तक वह इसी तरह लेटा रहा ।

       उसी तालाब में बहुत सारे मेंढक भी रहते थे उन्होंने तालाब किनारे लेटे हुए सांप की हालत के बारे में मेंढकों के राजा जालपाद को बतलाया । मेंढकों का राजा जालपाद उस सर्प के बारे में जानने के लीये सर्प के पास पहुंचा और जालपाद बोला – “ हे सर्पराज ! मैं मेंढकों के राजा जालपाद हूँ और इसी तालाब में रहता हूँ।| आपकी हालत के बारे में कुछ मेंढकों ने मुझे बतलाया था । आप इतने सुस्त क्यूँ पड़े हुए हो, आपकी यह हालत किसने की है, क्या आप हमें कुछ बतलाओगे ।”

      मेंढकों के राजा से इस प्रकार के प्रश्न सुनकर सर्प ने बनावटी कहानी बनाई और बोला- “ हे मेंढकों के राजा ! मैं एक गाँव के पास रहता था । एक दिन एक ब्राम्हण के पुत्र का पैर मेरे ऊपर रखा गया था और मैंने उसे काट दिया जिससे उस ब्राम्हण पुत्र की मृत्यु हो गई थी । उस ब्राम्हण ने मुझे श्राप दिया कि मुझे किसी तालाब के किनारे जाकर मेंढकों की सेवा करनी होगी और उन्हें अपनी पीठ पर बैठकर घुमाना होगा ।“

     सर्प के मुंह से इस प्रकार के बातें सुनकर मेंढकों का राजा जालपाद बहुत खुश हुआ उसने सोचा कि अगर इस सर्प से मेरी दोस्ती हो जाती है और मैं इस सर्प की पीठ पर बैठकर सबारी करूँगा तो दल का कोई भी दूसरा शक्तिशाली मेंढक मेरे खिलाफ विद्रोह भी नहीं कर सकेगा ।

     जालपाद को कुछ सोचता हुआ देख सर्प बोला – 
“ भद्र ! मैं सोच रहा था कि मुझे उस ब्राम्हण का श्राप भोगना पड़ेगा किसी और मेंढक को अपनी पीठ पर बैठाकर घुमाने से अच्छा है मैं मेंढकों के राजा को अपनी पीठ पर बिठ्लाऊ । अगर आप चाहें तो मेरी पीठ पर बैठ कर देख सकते हैं ।”

     मेंढकों के राजा जालपाद ने सांप की बात पर विश्वास कर लिया और झिझकते हुए सांप की पीठ पर बैठ गया। सांप ने उसे पूरा तालाब घुमाया और लाकर पुनः उसी स्थान पर छोड़ दिया। मेंढक ( जालपाद ) को सांप की गुदगुदी पीठ पर बैठने में बहुत आनंद आया और वह रोज सांप की पीठ पर बैठकर तालाब में घूमने का आनंद लेता और अपने सजातियों को सांप का भय दिखलाता ।

     एक दिन जब वह सांप की पीठ पर सवारी कर रहा था तब सर्प बहुत धीरे-धीरे चल रहा था । मेंढक (जालपाद ) ने पूछा – “ आज आप इतने धीरे-धीरे क्यूँ चल रहे हो ? आज सवारी में मजा नहीं आ रहा हैं। "

     सर्प बोला – “ मित्र ! मुझे कई दिनों से भोजन नहीं मिला है इसीलिए कमजोरी आ गई है और मुझसे चला नहीं जा रहा है।"

    सर्प की बात सुनकर मेंढकों का राजा जालपाद बोला – “ अरे मित्र ! इतनी छोटी सी बात हैं, इस तालाब में हजारो मेंढक है जो तुम्हार प्रिय आहार हैं तुम चाहो इनको अपना आहार बना लिया करो ।"

     मंदविष सांप के मानो मन की हो गई वह तो यही चाहता था अब वह प्रतिदिन कुछ बिना मेहनत किये कुछ मेंढकों को खा लेता था ।इधर मूर्ख जालपाद यह भी नहीं समझ सका कि अपने क्षणिक आनंद के लिए अपने वंश का नाश करवा रहा हैं।

     अब मेंढकों का राजा जालपाद प्रतिदिन सांप के पीठ पर बैठकर तालाब की सबारी करता और सांप तालाब में रहने वाले मेंढकों को खाकर अपना पेट भरता था ।

     एक दिन एक दूसरे सांप ने मेंढक को सांप की सवारी करते देखा तो उसे अच्छा नहीं लगा और कुछ देर बाद मंदविष के पास आकर बोला – “ मित्र तुम यह प्रकृति विरुद्ध कार्य क्यूँ कर रहे हो ? ये मेंढक तो हमारे भोजन हैं और तुम इन्हें अपनी पीठ बार बैठा कर सवारी करवा रहे हो ?”

     मंदविष बोला- “ ये सारी बातें तो मैं भी जानता हूँ और अपने लिए उपयुक्त समय का इन्जार कर रहा हूँ जब इस तालाब में कोई भी मेंढक नहीं बचेगा ।”

      बहुत दिनों तक इसी प्रकार चलता रहा एक दिन ऐसा आया कि तालाब में जालपाद के परिवार को छोड़ कर कोई दूसरा मेंढक नहीं बचा । मंदविष सांप को भूख लगी और वो जालपाद से बोला – “ अब इस तालाब में कोई मेंढक नहीं बचा है और मुझे बहुत भूख लग रही है ।”

     जालपाद बोला- “ इसमें मैं क्या कर सकता हूँ इस तालाब में मेरे सगे-संबंधियों को छोड़ का तुम सारे मेंढकों को खा चुके हो । अब तुम अपने भोजन की व्यवस्था खुद करो ।"

    जालपाद की बात सुनकर मंदविष सांप बोला – 
“ ठीक है मुझे तो बहुत भूख लग रही है मैं तुम्हारे परिवार को छोड़ देता हूँ पर मुझे अपनी भूख मिटाने के लिए तुम्हे खाना पड़ेगा ।"

      मंदविष सांप की बात सुनकर जालपाद के पैरो तले जमीन खिसक गई और उसने अपनी जान बचाने के लिए अपने सगे संबंधियों तक को खाने की अनुमति दे दी । देखते ही देखते सांप ने जालपाद के सभी रिश्तेदारों और परिवारों वालों को खा लिया । अब तालाब में मेंढकों सिर्फ जलपाद बचा था । मंदविष सांप जलपाद से बोला – “ अब इस तालाब में तुम्हें छोड़कर कोई भी मेंढक नहीं बचा है और मुझे बहुत भूख लगी है अब तुम ही बतलाओ मैं क्या करूँ ?” मंदविष सांप की बात सुनकर जालपाद मेंढक डर गया और बोला – 
“मित्र ! तुम्हारी मित्रता में मुझे अपने वंश और परिवार के लोगों को खो दिया है अब तुम कहीं और जाकर अपना भोजन देख लो ।”

      जालपाद की बात सुनकर मंदविष सांप बोला -
“ मित्र ! तुम्हारा कहना मैं मान लूँगा । तुमने अपने स्वार्थ के कारण अपने जन्मजात शत्रु को अपना मित्र बनाया और अपने सगे संबंधियों को मेरा भोजन बनवाया अब तुम अकेले इस दुनियां में रहकर क्या करोगे ?”
     इतना बोलकर सांप ने जालपाद मेंढ़क को भी मारकर अपना आहार बना लिया ।

शिक्षा –
(१) इस कथा को आज के राजनीतिक परिदृश्य में देखे तो मंदविष नमक सर्प इस्लामी ताकत है जो पूरी दुनिया में अल्लाह का राज स्थापित करना चाहते हैं । वही मेंढकों के राजा जालपाद वामपंथी सेक्पयूलर विचारों वाले पक्ष-विपक्ष के राजनेता, मिडिया और विभिन्न क्षेत्रीय जातिवादी पार्टियां हैं, जो मंदविष रूपी इस्लाम की क्षुधा पूर्ति अपने देश के नागरिकों को बांटकर आपस में भेद-भाव बढ़ा कर लड़ा रहे है और उनकी सदियों पुरानी एकता और परस्पर सद्भावना की बलि दे रहे हैं जिससे कि वह शासन सत्ता के मजे कर सकें । स्पष्ट हैं तालाब के अन्य मेढ़क हिंदू हैं ।
 ( ११ फरवरी २०२६ ईस्वी )
साभार ✍️ _वैदिक सनातन प्रहरी_

शीशम महिलाओं के लिए अमृत से कम नहीं है।।

शीशम महिलाओं के लिए अमृत से कम नहीं है।।

शीशम का पेड़ काफी बड़ा वृक्ष होता है, जो औषधीय गुणों का भंडार है, इस पौधे में कई ऐसे पोषण तत्व होते हैं, जो शरीर के लिए काफी फायदेमंद होते हैं,इस पेड़ मे कई औषधीय गुण पाए जाते हैं।

हमारे आसपास ऐसे कई प्रकार के औषधीय पेड़ और झाड़ियां हैं, जो शरीर के लिए काफी फायदेमंद होते हैं,यह हमारे स्वास्थ्य को ठीक करने में अपना एक अहम योगदान रखते हैं, क्योंकि इन औषधीयों का आयुर्वेद में काफी बड़ा महत्व है।

जो पेड़ आसानी से हर जगह आपको देखने के लिए मिल जाएगा। इस पेड़ के फल, फूल, छाल और पत्तियां, हर चीज काफी महत्व है।
अगर पेट में जलन हो रही हो, तो शीशम के पत्तों का रस या काढ़ा पीना बहुत लाभदायक होता है।

 और इसके पत्तों का शरबत पीने से सेहत को कई लाभ होते हैं, शीशम के पत्तों का शरबत बनाकर पीने से पाचन शक्ति बेहतर होती है, इसके साथ ही नियमित रूप से इसका सेवन करने से गैस, अपच और एसिडिटी में आराम मिलता है।

 इसका रस पीने से ओरल हेल्थ में सुधार होता है और जिन लोगों को मुंह से बदबू आती है या दांतों का दर्द व मसूड़ों में तकलीफ होती है, तो वो लोग भी इसके पत्तों को चबाकर समस्या ठीक कर सकते हैं।

आंखों की बीमारी जैसे आंखों में होने वाली जलन , सूजन आंखो का लाल होना इन सबमें में शीशम का इस्तेमाल फायदा पहुंचाता है। शीशम के पत्ते के रस में मधु मिलाकर 1-2 बूंदें आंखों में डालने से आंखों के रोग में आराम मिलता है।

शीशम का तेल चर्म रोगों पर लगाने से लाभ पहुँचता है। इससे खुजली भी ठीक हो जाती है।
शीशम के पत्तों के लुआब को तिल के तेल में मिला लें। इसे त्वचा पर लगाने से त्वचा की बीमारियों में लाभ होता है।

महिलाएं स्तनों में सूजन की बीमारी में भी शीशम का इस्तेमाल कर सकती हैं। शीशम के पत्तों को गर्म कर स्तनों पर बांधें। इससे और इसके काढ़े से स्तनों को धोने से स्तनों की सूजन मिट जाती है।
हैजा के इलाज के लिए 5 ग्राम शीशम के पत्ते में 1 ग्राम पिप्पली, 1 ग्राम मरिच तथा 500 मिग्रा इलायची मिलाएं। इसे पीसकर 500 मिग्रा की गोली बना लें। 2-2 गोली सुबह और शाम देने से हैजा में लाभ होता है।

आप दस्त को रोकने के लिए भी शीशम का उपयोग कर सकते हैं। शीशम के पत्ते, कचनार के पत्ते तथा जौ लें। तीनों को मिलाकर काढ़ा बनाएं। 
अब 10-20 मिली काढ़ा में मात्रानुसार घी तथा दूध मिला लें। इसे मथकर पिच्छावस्ति देने से दस्त पर रोक लगती है।
मूत्र रोग जैसे पेशाब का रुक-रुक कर आना, पेशाब में जलन होना, पेशाब में दर्द होना आदि में भी शीशम उपयोगी साबित होता है। 20-40 मिली शीशम के पत्ते का काढ़ा बनाएं। इसे दिन में 3 बार पिलाएं। इससे पेशाब का रुक-रुक कर आना, पेशाब में जलन होना, पेशाब में दर्द होना आदि में लाभ होता है। इसके साथ ही 10-20 मिली पत्ते काढ़ा का सेवन करने से वसामेह में लाभ होता है।

रक्त संचार को सही रखने में भी शीशम का प्रयोग करना अच्छा रहता है। 5 मिली शीशम के पत्ते के रस में 10 ग्राम चीनी तथा 100 मिली दही मिलाकर सेवन करने से रक्त संचार या ब्लड शर्कुलेशन ठीक रहता है।
रक्त विकार को ठीक करने के लिए शीशम के 3-6 ग्राम सूखे चूर्ण का शरबत बनाकर पिलाएं। इससे रक्त विकार का ठीक होता है।
त्वचा रोगों के लिए फायदेमंद है,शीशम के पत्तों का पेस्ट त्वचा पर लगाने से फोड़े, मुंहासे और फुंसियां दूर होती हैं। साथ ही यह त्वचा की रंगत को भी सुधारता है

इंफेक्शन से बचाव में मददगार है,शीशम के पत्तों में मौजूद एंटी-बैक्टीरियल गुण शरीर को इंफेक्शन से बचाने में मदद करते हैं। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाने का काम करते हैं।
 शीशम का रस शरीर को अंदर से साफ करने यानी डिटॉक्स करने में मदद करता है। इससे शरीर हल्का महसूस होता है और त्वचा भी साफ दिखाई देती है।

अर्थराइटिस के दर्द में आराम जोड़ों के दर्द और सूजन में शीशम के पत्तों का काढ़ा पीने से राहत मिलती है। पत्तों का पेस्ट सीधे जोड़ों पर लगाना भी असरदार होता है।

चोट और घाव में राहत चोट लगने या घाव होने पर शीशम के पत्तों का पेस्ट लगाने से दर्द कम होता है और घाव जल्दी भरता है। यह प्राकृतिक हीलिंग में मददगार है।

महिलाओं के लिए शीशम बेहद गुणकारी है इसके 20 पत्ते लेकर मिश्री मिलाकर पीस लें और पी जाएं तो लिकोरिया सफेद पानी को खत्म कर देगा
अधिक माहवारी आती है तो भी यही प्रयोग करें लाभ होगा
उसी तरह से पुरुषों के लिए काम करता है विधि वही है जो ऊपर वर्णित है

विशेष टिप्पणी - ये पोस्ट सिर्फ जानकारी देती है शीशम का सेवन किसी आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही करें 🙏,,,

बहुत कम लोग आंसुओं की निजता को समझते हैं ..

वे मोबाइल के प्रचलन में आने के शुरुआती दिन थे । आउट गोइंग कॉल के छह रूपये एक मिनिट के और इनकमिंग कॉल का एक रुपया चार्ज होता था । एस.टी.डी की दरें इससे कुछ सस्ती हुआ करती थीं।

एक छोटे से शहर के एक एस.टी.डी बूथ पर रोज एक लड़की शाम के के ठीक सात बजे आया करती थी । दिनभर की दौड़-भाग से थकी हुई, क्लांत और उदास चेहरे वाली लड़की पुलिस की वर्दी में होती जिस पर नेमप्लेट नहीं होती थी लेकिन कंधे के दो स्टार बताते थे कि वह सब-इंस्पेक्टर है।

लड़की अपनी सरकारी जीप खुद ड्राइव करती हुई आती और लगभग पन्द्रह से बीस मिनिट एक नम्बर पर फोन करती । बूथ के अंदर एक छोटा सा ग्लास का केबिन बना हुआ था जिसे वह अंदर से चिटकनी लगाकर बंद कर लिया करती और लगभग फुसफुसाते हुए बड़ी धीमी आवाज में बात करती।

कोई नहीं जान पाता कि वो रोज किससे बातें करती है सिवाय उस एस.टी.डी के मालिक के जो लगभग तेईस चौबीस साल का नौजवान था । पारदर्शी केबिन के बाहर से लड़की की आवाज सुनाई न देती लेकिन लड़के की ओर पीठ किये बात करती लड़की के लगातार बहते आंसू और भिंची हुई सिसकियों से कांपते कंधे उससे न छुप पाते।

लड़की उससे और अपनी बारी का इंतजार करते केबिन के बाहर खड़े अन्य ग्राहकों से अपने आंसू छिपाने का भरसक प्रयास करती और झेंपती हुई बाहर निकलती और सीधे काउंटर पर पैसे देने आकर खड़ी हो जाती और पैसे चुकाकर सीधे अपनी जीप स्टार्ट कर चली जाती।

लगभग पन्द्रह दिन लगातार फोन करते रहने के बाद लड़की जब सोलहवें दिन एस.टी.डी बूथ पर आई थी तो उस कांच के केबिन में तीनों तरफ एक मोटा नीला पर्दा लगा हुआ था।

लड़की ने उस दिन फोन करते हुए अपने आंसू बहने दिए थे ! फोन रखकर रूमाल से ठीक से चेहरा पोंछा था और बाहर निकल आई थी।
पैसे चुकाते वक्त उसकी आँखों में एक भीगा हुआ शुक्रिया था।

एस.टी.डी वाला नौजवान अपने इश्केक  अश्कों वाले मौसमों को याद करता हुआ मन ही मन दुआ मांग रहा था –
" हे ईश्वर ... इस लडकी के आंसू जल्द बीतें और इसके होंठों पर मुस्कानों का मौसम आये "  

चार महीने तक यह सिलसिला चलता रहा था फिर अचानक एक दिन लड़की ने आना बंद कर दिया। शायद उसका ट्रांसफर हो गया था। एस.टी.डी वाले नौजवान ने कुछ दिन उसका इंतजार किया था फिर अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गया था।

ठीक दस साल बाद उस नौजवान के पास कोतवाली से एक कॉल आया था। उसे थाने बुलाया गया था। वह थोड़ा घबराया हुआ सा तुरंत उठकर थाने चल दिया था।टी आई के चेंबर में उसे बैठाया गया था।
मामले को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि तभी टी आई साहब ने कमरे में प्रवेश किया और उससे हाथ मिलाया।

" आज सुबह ही कोतवाली में ज्वाइन किया और सबसे पहले तुम्हारा शुक्रिया अदा करना चाहता था " कहते हुए उन्होंने चाय लाने का ऑर्डर दिया। चुस्त वर्दी में सौम्य व्यक्तित्व के टी आई साहब मुस्कुराकर उससे मुखातिब थे !

"लेकिन मुझे किस बात का शुक्रिया .....? " वह अभी भी अचकचाया हुआ था !

"शायद अब तुम समझ जाओ कि किस बात का शुक्रिया" पीछे से आती एक मीठी आवाज ने उसका ध्यान खींचा !

वही दस साल पहले की दुबली पतली उदास लड़की इंस्पेक्टर की वर्दी में दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा रही थी ! बदन थोड़ा भरा हुआ चेहरा खुशी और अच्छी सेहत से दमकता हुआ।
वर्दी पर तीन स्टार और नेमप्लेट पर नाम " मंदिरा मेहरा "

" इनसे मिलो ...ये मेरी उत्तमार्ध " टी आई साहब ने लड़की के कंधे थामते हुए परिचय कराया !

" मुझसे ही बात किया करती थीं ये तुम्हारी एस.टी.डी. से ! बहुत कम लोग आंसुओं की निजता को समझते हैं और तुम उन चन्द लोगों में से एक हो जो मन के सबसे कच्चे कोने को सार्वजनिक होने की लज्जा से बचाना जानते हो। हम दोनों तुम्हारे कृतज्ञ हैं। "

तीनों ने साथ चाय पी थी और देर तक बातें कीं थीं। उस लड़के की प्रार्थना स्वीकार हुई थी।
 मुस्कानों का मौसम बाहर प्रांगण में लगे अमलतास के पेड़ पर पीले झुमके बनकर मुस्कुरा रहा था !
                              ❤️❤️❤️
                         .. ✍️ साभार 
                   -----पल्लवी त्रिवेदी------
        [ 'जिक्र ए यार चले - लवनोट्स' में संकलित]
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                    वयं राष्ट्रे जागृयाम