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Saturday, 7 March 2026

कुंवारेपन का विस्फोट, समाज अंधी दौड़ में कहाँ पहुँच रहा है ?

*कुंवारेपन का विस्फोट, समाज अंधी दौड़ में कहाँ पहुँच रहा है ?*

अब वक्त आ गया है कि चीज़ों को मीठे शब्‍दों में कहना बंद किया जाए।
दुनिया जिस आज़ादी की जय-जयकार कर रही है, वही आज़ादी धीरे-धीरे *परिवार, रिश्तों,* और *सामाजिक संतुलन,* सब कुछ निगलने लगी है।
अंतरराष्ट्रीय सर्वे कहता है कि आने वाले कुछ वर्षों में *युवतियों में 45% तक विवाह से दूरी बना सकती हैं।* पहली नज़र में यह *प्रगति* लगती है, पर असल में यह *भविष्य के लिए एक टाइम-बम* है।
1.*कैरियर, पैसे और अकेलापन….यह कैसी प्रगति?*
आज की बेटी डॉक्टर, इंजीनियर, सीए, उद्यमी, सब बन रही है। बहुत अच्छा। शानदार। पर क्या कैरियर पूरा जीवन है?
*पैसा साथी नहीं बनता। पद वृद्धावस्था में हाथ नहीं पकड़ता। मोबाइल और लैपटॉप बुढ़ापे में बात नहीं करते।* लेकिन समाज को इस सच्चाई से फर्क नहीं पड़ता, सबको दौड़ लगानी है… बस लगानी है।
2.*परिवार ढह रहे हैं…. कोई देख भी रहा है?*
कुँवारे लड़के बढ़ रहे हैं, अविवाहित युवतियाँ बढ़ रही हैं, जनसंख्या गिर रही है,
और *अकेलेपन उद्योग* (counsellor, therapy, depression pills) फल-फूल रहा है। पर हम फिर भी कहते हैं, *सब ठीक है, यह आधुनिकता है।* यह *आधुनिकता नहीं, धीमी मौत* है, परिवार, समाज और मानवीय संबंधों की।
3.*सर्वाधिक खतरनाक स्थिति.....*
आज माता-पिता रिश्ता ढूंढते हैं, पर लड़की कहती है, *अभी नहीं।*
फिर *अभी नहीं* धीरे-धीरे *कभी नहीं* में बदल जाता है और जब एहसास होता है तो मेडिकल रिपोर्ट सामने होती है, हार्मोनल इश्यू, कंसिव न होना, मानसिक तनाव, अकेलापन। पर तब कौन जिम्मेदार? *कोई नहीं, क्योंकि फैसला स्वतंत्रता का था।*
4.*समाज के सफेदपोश लोग चुप क्यों हैं????*
क्योंकि सच्चाई बोलने से उन्हें आधुनिकता-विरोधी कहलाने का डर है। पर सच्चाई यह है कि अगर 21–25 की उपयुक्त उम्र में विवाह नहीं हुए तो समाज जल्द ही *दिसंबर की ठंडी रात जैसा सूना* हो जाएगा।
5.*अंतिम बात…..*
प्रगति वो नहीं जो हमें अकेला कर दे। अगर हमारा भविष्य कुंवारा, अकेला और भावहीन होने वाला है, तो समाज के लिए यह गर्व की नहीं,*खतरे की घंटी* है।
 ✍️. ..गीता त्यागी 
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वयंराष्ट्रेजागृयाम

निर्भीक सन्यासी स्वामी ओमानंद जी महाराज का प्रभाव

निर्भीक सन्यासी
स्वामी ओमानंद जी महाराज का प्रभाव


                लगभग १९३६ की बात है, में चित्तौड़गढ़ गुरुकुल (राजस्थान) में पढ़ा करता था। गुरुदेव श्री पं० शंकरदेव जो उन दिनों गुरुकुल के उपाचार्य थे। वे महावेैयाकरण माने जाते थे। गुरुकुल के संस्था- पक और आचार्य श्री स्वामी व्रतानन्द जी का भरसक प्रयास रहता था कि उद्भट विद्वान् उनके गुरुकुल में अध्यापक हों और छात्र भी कुशाग्रमति हों। इस लक्ष्य को दृष्टि में रखकर आचार्य स्वामी व्रतानन्द जी ने अच्छे से अच्छे आय दृढ़व्रता अध्यापक गुरुकुल में नियुक्त किये तथा जो छात्र उन्हें कहीं सर्वोत्तम दीख पड़ते थे, अपने यहां लाने का प्रयत्न किया, उसमें वे सफल भी होते थे। इसी सन्दर्भ में श्री स्वामी ओमानन्द जी (तत्कालीन ब्रह्मचारी भगवान्देव जी) उच्च भावनाओं से अभिषिक्त ब्रह्मचर्य को लग्न से सम्पन्न, तेजस्वी सहाध्यायियों के साथ चित्तौड़गढ़ गुरुकुल पहुंचे। भगवान्देव, भद्रसेन, सुखदेव और सत्यवीर जब ये चारो ब्रह्मचारी मास्टर धर्मसिंह जी के संरक्षकता में गुरुकुल में विराजमान हुए तो एकदम वातावरण परिवर्तित-सा दीख पड़ा। इनमें कुछ ब्रह्मचारी आयु में वहां के पूर्ववर्ती ब्रह्मचारियों से बड़े थे । जाड़ों में भी अल्पवस्त्रधारी थे। शरीर सुघटित दर्शनीय कान्तिमान् था, चेहरा ब्रह्मचर्य को दीप्ति से ओजस्वी, तेजस्वी था। गाल लालरंग के थे। ब्रह्मचारी भगवान्देव जी का माथा बहुत चमकता था। चारों में ब्रह्मचारी भगवान्देव बड़े थे एवं सब के निदेशक थे। हम सब इनकी ओर बहुत आकर्षित हुए। ये सभी नमक और मीठा भी न खाते थे और गी के दुग्ध, घृत का ही सेवन करते थे। यह बात हमें अति अनोखी दीखी। केवल एक नींद सोते थे, रात्री को जब भी आंख खुल गई फिर न सोते थे। अपने नित्य-कर्मों में लग जाते, व्यायाम बहुत करते थे। ब्रह्मचयपालन सम्बन्धी कुछ विशिष्ट निर्देश भी हम ब्रह्मचारियों को दिया करते थे।

              मैं आपकी दिनचर्या और खान-पान से प्रभावित हुआ । मैंने भी उस समय नमक छोड़ दिया था। तब मेरा और ब्रह्मचारी भगवान्देव जी का छोटे-बड़े भाई जंसा सम्बन्ध बन गया। सस्कारों का आकर्षण कहें अथवा कुछ और हम दोनों आज तक आबद्ध चले आरहे हैं। हमारी परस्परा की आज तक मेल की कोई बात नहीं हुई। मैं स्वतः ही आपकी आज्ञा का पालन शिरोधार्य समझता हूँ। जब चित्तौड़गढ़ गुरुकुल से स्नातक बनकर आया तो जैसे ही आपने मुझे पं० श्री स्वामी आत्मानन्द जी के सान्निध्य में जान को कहा, मैं एकपदे तैयार हो गया । स्वामी आत्मानन्द जी का मैंने पहले नाम सुना था, न जानता ही था किन्तु मैंने वहां पहुंचकर जो तृप्ति पायी, वह मेरे जीवन नौका की खेवनहार बनी। इस दृष्टि से मैं श्री स्वामी ओमानन्द जी महाराज का अत्यन्त कृतज्ञ एवं आभारी हूँ। आपके और मेरे विचारों में कुछ मतभेद हो सकता है, फिर भी मैं कह नहीं सकता कि वह कौन-सी अदृष्ट शक्ति है, जो मुझसे आपके आदेश का पालन करा देती है। गुरुकुल रावलपिण्डी रहते हुये आपने पूज्य श्री स्वामी आत्मानन्द जी महाराज को आद्योपान्त जीवन घटनाओं को संकलित करने का मुझे आदेश दिया। मैंने उसे स्वीकार कर पूर्ण कर बिया । १९६४ में जीवन-चरित लिखने को कहा, मैंने लिख दिया। श्रीमद्ददयानन्दार्ष विद्यापीठ का परीक्षायें चलाने का निर्देश किया, मैं तैयार होगया। मैं आज देख रहा हूँ कि जिन से मेरे बड़े भाई श्री रामदेव जी एम० ए० आर्टिस्ट का सम्बन्ध रहा, उनसे आपका भी सम्बन्ध चला आरहा है। अथवा जिन से मेरा सम्बन्ध रहा है, उनसे आपका भी सम्बन्ध पहले से ही चला आरहा है। बिना किसी प्रयास के ये बातें चलती आई हैं। ऐसा लगता है आजीवन अब ऐसा ही चलेगा। यदि कदाचित् विछोह हुआ भी तो अटूट सम्बन्ध बना ही रहेगा। कुछ हम एक-दूसरे के पूरक से बन गये हैं।

            कई बार कुछ व्यक्तियों ने मुझ से कहा है कि आप उनके समीप कैसे रहते हैं। जब मुझे ही इस बात का ज्ञान नहीं है तो उत्तर क्या दूं। मैं मन में यही सोचकर मूक रह जाता हूं कि सम्भवतः हम दोनों के उद्देश्य समान हैं। कार्य-क्षेत्र भले ही कुछ पृथक् पृथक् हैं किन्तु वह कार्य परस्पर में विरोधी नहीं हैं। महर्षि दयानन्द वा आर्ष-शैली एवं ईश्वरादेशानुगामी दोनों हैं। ये ही कुछ भावनायें हैं, जो सम्भवतः हमें जोड़े हुये हैं। कुछ जन श्री स्वामी ओमानन्द जी को क्रोधी बताते हैं। पर मैं यह बात उनमें नहीं देखता । क्रोध प्रतीत होता है, पर है नहीं। जन्म-जात एक तो ध्वनि में कड़क है, दूसरे नेतृत्व का गुण है। 'क्षणे रुष्टः क्षणे तुष्टः' अभी क्रोध की झलक और दूसरे ही क्षण प्रसन्नता का आभास । ये आंतरिक लक्षण आप में कल्याणभावना के द्योतक हैं। बेसमझ व्यक्ति ही ऐसे अवसरों पर क्रोध को अनुभूति करते हैं। लोग सब जगह प्रिय-प्रिय ही सुनते हैं, भले ही वह झूठ क्यों न हो, पर स्वामी ओमानन्द जी महाराज यथार्थ कह देते हैं, अतः वह कड़वी लगती है। मन में दुर्भावना तनिक भी नहीं होती। इसीलिये वे समझा-बुझाकर किसी रुष्ट को फिर अपनी तरफ खींच लेते हैं ओर व्यक्ति भी अपनी म्लानता भुला देता है ।

आप ब्रह्मचर्यपालन के धनी माने गये हैं अतः आपने तत्सम्बन्धी पुस्तकें लिखकर युवकों को सहारा दिया है। बालकों का ब्रह्म चर्यपालन एक आश्रम कहा गया है। आश्रम का अर्थ होता है-भरपूर श्रम करना । सारे ही आश्रम ऐसे हैं। अपने-अपने आश्रमों में रहते हुये गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी को भी भरसक प्रयास अपने निर्दिष्ट कत्र्तव्यों के संरक्षण में करना चाहिये । ब्रह्मचारी भगवान्देव जी ने अन्यों के समान इस आश्रम को ऐसे ढीला नहीं छोड़े रखा, अपितु उसमें शास्त्रविधि से पूर्णतया अपने कर्त्तव्यों का अभ्यास किया है।

अपने ब्रह्मचर्य काल में आप में यह विशिष्टता रही है कि ब्रह्मचारी, त्यागी, निःस्पृह, विरक्त, कार्य-कुशल और प्रतिभावान् विद्वान् संन्यासियों को आपने अपना पथ-प्रदशक माना है एवं उनके प्रत्येक निर्देश का आंख मूंदकर पालन किया है। ऐसे यति संन्यासियों में आपने स्वामा आत्मानन्द (५० मुक्तिराम उपाध्याय), स्वामी स्वतन्त्रानन्द और स्वामी वेदानन्द तीर्थ को चुना था। तीनों ही साघु आर्यसमाज में सितारों के मध्य चन्द्रमा के समान देदीप्यमान थे। तीनों अत्यन्त कर्मठ थे। तीनों के गुण ब्रह्मचारी भगवान्दव में प्रविष्ट हुये। कार्य करने को लग्न एवं साहस गुण तो जन्मजात-सा ही था, पर जब इन विचित्र साधुओं की छाप आप पर पड़ी तो जीवन निहाल होगया ओर आपने वह कार्य किया, जिसका गुणगान आज हरयाणावासी करते हैं। कार्य करनेवाले का प्रेरक मिलना चाहिए। फिर कोई कसर नहीं रहती । पूज्य श्री स्वामी आत्मानन्द जी ने आपको प्रेरणा दी कि जब तक इधर हिन्दू प्रदेश हरयाणा में कुछ नहीं करोगे, पंजाब (भविव्यतु के पाकिस्तान) में अल्पसंख्यक हिन्दू बच नहीं सकते। इस आदेश का पालन आपने एक सैनिक के तुल्य किया। विजय, पराजय तो सेनापति वा राजा का ही होता है। पाप-पुण्य का भागी भी वही बनता है, पर सैनिक को गौरव प्राप्ति से भी इन्कार नहीं किया जाता।

         हिन्दी आंदोलन छिड़ जाने पर जितने सत्याग्रही देने का आपको आदेश दिया गया, आपने उससे कहीं अधिक जेल भिजवाये।। इन कार्यों में आपको अनेक असुविधायें एवं कठिनाइयां हुई किन्तु आपने स्वीकृत आदेश से एक पग भी पाछे नहीं हटाया। तपस्या का प्रतिफल स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने इन शब्दों में व्यक्त किया है-

कड़ी धूप हो, शीत हो व झड़ी हो,दुधारा लिए राजसत्ता खड़ी हो।
छुरे से पड़े पेट चाहे चिराना, नहीं धर्म से पैर पीछे हटाना ।। तपस्या यही धार ऊंचे कहाओ, उठो जाति को देशवालो उठाओ।

यह लक्षण आचार्य भगवान्देव जी में पूरा उतरा है। "कार्य वा साधयेयम् देहं वा पातयेयम्" का ध्वज हाथ में लेकर राजसत्ता द्वारा लगाये गये गुप्तचरों आदि की आपने किसी भी आन्दोलन में कोई चिन्ता नहीं की। कुछ भी करना पड़ा, पर राजसत्ता की पकड़ में नहीं आये और अपने कार्य में सफल हुये। इन अप्रत्याशित बलिदानों को देखकर सम्पूर्ण हरयाणा स्वामी ओमानन्द जी सरस्वती के पीछे है।

झज्जर गुरुकुल १९१५ स्थापना काल से १९४२ तक लड़खड़ाता रहा। "दृढ़व्रती एकव्रत-निष्ठ, त्यागी, तपस्वी कोई अप्रतिम पुरुष ही इस शिक्षण संस्थान में अपनी फिर आहुति प्रदान कर इसे जीवित रख सकता है।" ऐसा अनुभव कर जगदेवसिंह जी सिद्धान्ती आदि की दृष्टि आचार्य भगवान्- देव जी पर गयी। प्रयत्न करके गुरुकुल आपको सम्भलवा दिया गया। आप गुरुकुल के आजीवन आचार्य बने । आपने अपने आचार्यत्व में कहां से कहां तक गुरुकुल को पहुँचा दिया है, यह सर्वविदित है। यहां के सुपठित कुछ स्नातकों ने अन्यत्र गुरुकुल खोले और वैदिक-धर्म का प्रचार भी किया।

स्वामी ओमानन्द जी सरस्वती अपनी अदम्य सेवायों से शिखामणि बने हैं। वर्तमानकाल में भी आार्य साहित्य प्रकाशित करना, वितरण करना, हरयाणावासियों को मांस, शराब से मुक्ति दिलाकर सच्चे आर्य बनाना, सच्ची ऐतिहासिक पृष्ठ-भूमि में रंगे अपने पूर्वजों को स्मृति कराना विशेषतः आपका रात-दिन लक्ष्य है। इस प्रकार में देखता हूं कि आप में ब्रह्मचर्य संरक्षण की भावना एवं उसके लिए पूर्ण प्रयास, महर्षि दयानन्द और पूर्ववर्ती ऋषि, महर्षि , आप्तपुरुषों के एक-एक शब्द पर विश्वास, आर्यसमाज के कार्यों में अनन्य लग्न, उसके लिये प्राणान्त तक का बाजी लगाना, पथ-प्रदर्शकों में अत्यन्त निष्ठा, घृणितकार्यों में फंसे लोगों को उबारने की तड़प आदि कुछ ऐसे गुण हैं जो स्वामी ओमानन्द जी को "लोह पुरुष" की संज्ञा देने में प्रेरित करते हैं। आर्य जनता शताब्दियों तक आपके उपकार स्मरण करती रहेगी।

लेखक - वेदानन्द वेदवागीश
पुस्तक - स्वामी ओमानंद अभिनन्दन ग्रंथ
प्रस्तुति - अमित सिवाहा
साभार - Vivek Ary 

Friday, 6 March 2026

वात पित्त कफ ..

➡️इसे सेव कर सुरक्षित कर लें, ऐसी पोस्ट कम ही आती है

👉वात पित्त कफ के दोष तीनों को संतुलित करे इस आयुर्वेदिक उपाय 

➡️वात पित्त और कफ के दोष⬇️

👉पोस्ट को ध्यान से 2 बार पढ़े

👉शरीर 3 दोषों से भरा है
#वात(GAS) -लगभग 80 रोग
#पित्त(ACIDITY)- लगभग 40 रोग
#कफ(COUGH) -लगभग 28 रोग

➡️यहां सिर्फ त्रिदोषो के मुख्य लक्षण बतये जायेगे और वह रोग घरेलू चिकित्सा से आसानी से ठीक होते है

➡️सभी परहेज विधिवत रहेंगे 

➡️जिस इंसान की बड़ी आंत में कचड़ा होता है बीमार भी केवल वही होता है

➡️एनीमा एक ऐसी पद्धति है जो बड़ी आंत को साफ करती है और किसी भी रोग को ठीक करती है

➡️संसार के सभी रोगों का कारण इन तीन दोष के बिगड़ने से होता है

👉वात(#GAS) अर्थात वायु:⬇️

➡️शरीर मे वायु जहां भी रुककर टकराती है, दर्द पैदा करती है, दर्द हो तो समझ लो वायु रुकी है
➡️पेट दर्द, कमर दर्द, सिर दर्द, घुटनो का दर्द ,सीने का दर्द आदि
👉डकार आना भी वायू दोष है
➡️चक्कर आना,घबराहट और हिचकी आना भी इसका लक्षण है

➡️कारण👉गैस उत्तपन्न करने वाला भोजन जैसे कोई भी दाल आदि गैस और यूरिक एसिड बनाती ही है

👉यूरिक एसिड जहां भी रुकता है उन हड्डियों का तरल कम होता जाता है हड्डियां घिसना शुरू हो जाती है ,उनमे आवाज आने लगती है, उसे डॉक्टर कहते है कि ग्रीस ख़त्म हो गई, या फिर स्लिप डिस्क या फिर स्पोंडलाइटिस, या फिर सर्वाइकल आदि
👉प्रोटीन की आवश्यकता सिर्फ सेल्स की मरम्मत के लिए है जो अंकुरित अनाज और सूखे मेवे कर देते है

👉मैदा औऱ बिना चोकर का आटा खांना
👉बेसन की वस्तुओं का सेवन करना
👉दूध और इससे बनी वस्तुओं का सेवन करना
 👉आंतो की कमजोरी इसका कारण व्यायाम न करना

➡️निवारण👉अदरक का सेवन करें,यह वायु खत्म करता है, रक्त पतला करता है कफ भी बाहर निकालता है, सोंठ को लेकर रात में गुनगने पानी से आधा चम्मच खायेँ
👉लहसुन किसी भी गैस को बाहर निकालता है,
यदि सीने में दर्द होने लगे तो तुरन्त 8-10 कली लहसुन खा ले, ब्लॉकेज में तुरंत आराम मिलता है

👉लहसुन कफ के रोग और टीबी के रोग भी मारता है
👉सर्दी में 2- 2 कली सुबह शाम, और गर्मी में 1-1 कली सुबह शाम ले, और अकेला न खायेँ सब्जी या फिर जूस , चटनी आदि में कच्चा काटकर डालकर ही खायेँ
👉मेथीदाना भी अदरक लहसुन की तरह ही कार्य करता है

➡️प्राकृतिक उपचार👉गर्म ठंडे कपड़े से सिकाई करे, अब उस अंग को पहले छुएं यदि वो गर्म है तो ठंडे सिकाई करे और वह अंग अगर ठंडा है तो गर्म सिकाई करे औऱ अगर न गर्म है और न ठंडा तो गर्म ठंडी सिकाई करे एक मिनट गर्म एक मिनट ठंडा

➡️कफ(#COUGH)⬇️

👉मुंह नाक से आने वाला बलगम इसका मुख्य लक्षण है
👉सर्दी जुखाम खाँसी टीबी प्लूरिसी निमोनिया आदि इसके मुख्य लक्षण है
👉सांस लेने में तकलीफ अस्थमा आदि या सीढी चढ़ने में हांफना

➡️कारण👉तेल एव चिकनाई वाली वस्तुओं का अधिक सेवन
👉दूध और इससे बना कोई भी पदार्थ
👉ठंडा पानी औऱ फ्रिज की वस्तुये खांना
👉धूल ,धुंए आदि में अधिक समय रहना
👉धूप का सेवन न करना

➡️निवारण👉विटामिन C का सेवन करे यह कफ का दुश्मन है यह संडास के रास्ते कफ निकालता है, जैसे आवंला
👉लहसुन, यह पसीने के रूप में कफ को गलाकर निकालता है
👉Bp सामान्य हॉगा
👉ब्लड सर्कुलेशन ठीक हॉगा
👉नींद अच्छी आएगी
👉अदरक भी सर्वश्रेष्ठ कफ नाशक है

➡️प्राकृतिक उपचार👉एक गिलास गुनगने पानी मे एक चम्मच नमक डालकर उससे गरारे करे
👉गुनगने पानी मे पैर डालकर बैठे, 2 गिलास सादा।पानी पिये और सिरर पर ठंडा कपड़ा रखे, रोज 10 मिनट करे
👉रोज 30-60 मिनट धूप ले

➡️पित्त(#ACIDITY):-पेट के रोग

👉वात दोष और कफ दोष में जितने भी रोग है उनको हटाकर शेष सभी रोग पित्त के रोग है, BP, शुगर, मोटापा, अर्थराइटिस, आदि
👉शरीर मे कही भी जलन हो जैसे पेट मे जलन, मूत्र त्याग करने के बाद जलन ,मल त्याग करने में जलन, शरीर की त्वचा में कही भी जलन, 
👉खट्टी डकारें आना
👉शरीर मे भारीपन रहना

➡️कारण👉गर्म मसाले, लाल मिर्च, नमक, चीनी, अचार 
👉चाय ,काफी,सिगरेट, तम्बाकू, शराब,
👉मांस ,मछली ,अंडा
👉दिनभर में सदैव पका भोजन करना
👉क्रोध, चिंता, गुस्सा, तनाव
👉दवाइयों का सेवन
👉मल त्याग रोकना
➡️सभी 13 वेग को रोकना जैसे छींक, पाद, आदि

➡️निवारण👉फटे हुए दूध का पानी पिये, गर्म दूध में नीम्बू डालकर दूध को फाड़े, वह पानी छानकर पिए, पेट का सभी रोग में रामबाण है, सभी प्रकार का बुखार भी दूर करता है
👉फलो व सब्जियों का रस, जैसे अनार का रस, लौकी का रस, पत्ता गोभी का रस आदि

👉निम्बू पानी का सेवन

➡️प्राकृतिक उपचार👉पेट को गीले कपड़े से ठंडक दे

👉रीढ़ की हड्डी को ठंडक देना, लकवा इसी रीढ़ की हड्डी की गर्मी से होता है, गीले कपड़े से रीढ़ की हड्डी पर पट्टी रखें
👉व्यायाम ,योग करे
👉गहरी नींद ले

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सफेद पलाश प्रतीक है समृद्धि का: कहते हैं कि इसमें माता अन्नपुर्णा का वास है।

सफेद पलाश प्रतीक है समृद्धि का: कहते हैं कि इसमें माता अन्नपुर्णा का वास है। दावा किया जाता है कि इसके नीचे जाने पर दिन में तारे दिखाई देने लगते हैं। 
           सफेद पलाश एक बहुत ही दुर्लभ, चमत्कारिक और रहस्यमई वनस्पति है। इसमें बारे में जितने मुँह उतनी ही बातें सुनाई देती हैं। मेरी दिलचस्पी सफेद पलाश पर इसीलिए भी है कि अब तक कई रहस्यमई पौधों को ढूंढकर उनकी पहचान की है या फिर उनके विषय में कही सुनी बातों के पीछे के तर्क -वितर्क और कारण समझकर विज्ञान से उनका संबंध समझा है। बचपन में ही घाट छिंदवाड़ा - जबलपुर मार्ग पर घाट परासिया के समीप सफेद पलाश देख चुका हूँ तो इसके अस्तित्व को नकारने की गलती भी नहीं कर सकता। अभी तक सामान्य केसरिया, गहरा केसरिया, हल्का पीला, गहरा पीला, क्रीम (पीला-केसरिया) रंग के पलाश खोज चुका हूँ तो हौसला और भी बढ़ गया कि अभी भी घने जंगलों के बीच कहीं न कहीं सफेद पलाश के वृक्ष अवश्य बचे हैं। आइए जानते हैं कि सफेद पलाश आखिर इतना रहस्यमई क्यों है...?

सभी पलाश की तरह सफेद पलाश भी एक झाड़ीदार वृक्ष है। लेकिन सफेद पलाश की ही बात करूं तो यह भी 4 किस्म का होता है।
1) एक तो अन्य रंगों के पलाश की ही तरह लेकिन इनके पुष्प बाहर से देखने पर रोएंदार आवरण के कारण सफेद दिखाई देते हैं जबकि भीतर से हल्के पीले या नारंगी रंग का होता है।
2) दूसरा हल्के नारंगी रंग की आभा लिए होता है किंतु इनके पेड़ विशाल लताओं के रूप में होते हैं। ये पुष्प झाड़ीदार पलाश से आकार में कुछ छोटे होते हैं। 
3) तीसरा पूरी तरह से सफेद पलाश जो मैने बचपन में देखा था, सड़क निर्माण में अब वह पेड़ समाप्त हो चुका है, बिल्कुल वैसी ही एक फोटो Anjney Sharma जी की पोस्ट से लेकर एल्बम में शामिल की है। 
4) इन सबके अलावा जो चौथा सफेद पलाश है उसके पुष्प काफी छोटे होते हैं, वास्तव में यह पलाश नहीं है, लेकिन हूबहू पलाश की तरह दिखाई देता है। गांव देहात में इसे तिनसा के नाम से जाना जाता है। 
           ऊपर वर्णित 4 में से 3 प्रकार के सफेद पलाश आपके समक्ष प्रस्तुत हैं। चौथे लता पलाश में अभी पुष्प आने शेष हैं जल्द ही उसकी अलग और विस्तृत पोस्ट करूंगा। कोलाज में शामिल केवल एक को छोड़कर सभी फोटो मेरे द्वारा ही संकलित और खींची गई हैं अतः शंका की कोई गुंजाइश नहीं है। केवल एक फोटो जो मैने स्वयं नहीं खींची है, उसकी सत्यता की गारंटी में नहीं दे सकता। आइए अब रंगो और पहचान की दुनिया से दूर सफेद पलाश की रहस्यमई चर्चा वाली दुनिया में कदम रखते हैं। 

कहते हैं पलाश वृक्ष में त्रिदेव की शक्ति होती है। तंत्र शक्ति के जानकारों का तो मानना है कि इससे धन वर्षा तक की सकती है। लेकिन मेरी दादी माँ कहती है- इसमें देवी अन्नपूर्णा का वास है, उन्होंने भी शायद इसे उनकी दादी माँ से सुना होगा। पीढ़ी दर पीढ़ी यह ज्ञान इसी तरह निरंतर आगे बढ़ रहा है। 
               केसरिया पलाश की खूबसूरती से भला कौन परिचित नहीं होगा? ये पलाश पुष्प तो जैसे होली का पर्याय ही बन गए है। पहले गाँव देहात में खुशियों का उत्सव होली पलाश के फूल से ही मनाया जाता था। धीरे धीरे रासायनिक रंगों ने रायता फैला दिया और लोग रंग खेलने से कतराने लगे। लेकिन चर्चाओं के बाजार की बात करें तो सबसे मजेदार है सफेद पलाश की चर्चा, इसके कुछ किस्से रोचक हैं तो कुछ विवादास्पद। लेकिन यकीन मानिये कि जिसे कोई एक सही कहेगा उसे दूसरा गलत ठहरा देगा, और दूसरा जिसे सही समझेगा पहला उसे गलत साबित कर देगा। अब ये तो आपको तय करना है कि आप किसके पक्ष में खड़े हैं...              
                 
वैसे पलाश सिर्फ सुंदर और धार्मिक महत्व वाला पेड़ नही है, बल्कि यह बेशकीमती और उपयोगी भी है। इसके औषधीय गुणों का तो कोई तोड़ ही नही है। इसकी गोंद कमरकश कहलाती है। सफेद पलाश की कमरकश बेशकीमती है। यह प्रसव के बाद ढीली पड़ चुकी मांसपेशियों में पहले जैसी कसावट लाने का कार्य करती है। कमर दर्द और जोड़ों के दर्द की भी यह रामबाण औषधि है।
               पंद्रह से बीस बरस पहले पलाश की छाल मजबूत रस्सियाँ बनाने का बेहतरीन स्त्रोत थी, जिससे कृषि उपयोग के कार्यों में प्रयोग लिया जाता था। अरे भाई #कुची याद है न...? दीवाली के समय चूने और गेरू की पुताई के लिए बनाये जाने वाले हर्बल ब्रश/ कूची इसी पेड़ की जड़ों से बनाये जाते है। और इसकी लकड़ियों से तैयार फावड़े, गैंती के बेंसो का तो कोई तोड़ ही नही था। इतना ही नही ठनका लगने पर यही शांति देता था। अब आप पूछेंगे ये ठनका क्या है, देहाती लब्ज है साहेब, पेशाब में जलन नही बल्कि रुक रुक कर थोड़ी मात्रा में मूत्र विसर्जन को ठनका कहते हैं। बहुत बैचेन कर देने वाली अवस्था होती है। इसकी छाल या पत्तियों का काढ़ा इसकी बेहतरीन औषधी है। इसके पत्तों पर चिकोड़ी पापड़ बनते थे, जो हमारा क्षेत्रीय पारंपरिक व्यंजन है। पापड़ के खौलते हुए मिश्रण में इन पत्तों के रस के रसायन मिलकर जरूर कोई न कोई औषधीय गुण हमारे शरीर मे पहुँचाते रहे होंगे, तभी तो इनके रहते कोई बड़ी बीमारियां गाँव देहात में जाने से परहेज करती रही।
               
जितना यह वृक्ष अपनी खूबसूरती के लिये चर्चा में है, उससे कहीं ज्यादा यह तांत्रिक प्रयोगों के लिए जाना जाता है। हालांकि इसके हजारों औषधीय महत्व भी हैं, किंतु आजकल ये उपयोग में नहीं रह गए हैं। ज्यादातर लोग सफेद पलाश ढूंढते हैं, वो भी इसीलिये कि इसके मिल जाने से वे धनवर्षा करवा लेंगे। इससे मैं सहमत नही हूँ, लेकिन धार्मिक परिवेश में मेरी परवरिश हुयी है, तो बचपन से सुनता आया हूँ। कि इसके पेड़ के नीचे बनाया गया भोजन कभी कम नही पड़ता है, मतलब अन्नपूर्णा देवी का वरदान है इसमें, इसीलिए यह समृद्धि का प्रतीक भी है। घर मे इसे लगाकर नित्य पूजन करने से अच्छा भाग्य, सकारात्मक विचार और मन को शांति मिलती है।
                  इसके विषय में एक और मान्यता है - कहते हैं कि सफेद पलाश के नीचे जाने पर दिन में भी तारे दिखने लगते हैं। असली तारे का तो पता नही, परंतु मेरा आंकलन यह है कि इसकी छाल के बीच के गढ्ढो पर एक विशेष प्रकार की चमचमाते रंग के पंखों वाली मक्खी आराम फरमाती है, जब कोई इसे स्पर्श करता है, तो वे छोटी छोटी मख्खियाँ उड़ने लगती हैं, जिनके पंख बिल्कुल छोटे लाइट या आईने की तरह चमकने लगते हैं। अन्य शब्दो मे कहें तो तारों की तरह चमकते हैं, शायद इसी वजह से भ्रम उत्पन्न हो गया होगा। यह कीट इसके पेड़ में निवास के लिए एक बायोलॉजिकल इंडिकेटर हो, ऐसी भी संभावना है।
                 
पलास की लगभग सभी प्रजातियों में चाहे वह, लाल हो, सफेद हो, पीला हो या क्रीम रंग का, सभी मे पत्तियाँ "ढाक के तीन पात " वाली कहावत को चरितार्थ करती हैं। कबीर दास जी भी पलास के मोह से बच न सके थे, उन्होंने इसे अपने दोनों में प्रयोग किया था। आपसे साझा कर रहा हूँ...
कबीरा गरब न कीजिए, इस जोबन की आस।
टेसू फूले दिवस दस, खांखर भया पलास।।
                ब्रम्हा-विष्णु-महेश त्रिदेवों की शक्तियाँ समेटे यह वृक्ष आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। कभी सड़क के दोनो ओर का क्षेत्र इनका आवास हुआ करता था, किन्तु आजकल कुछ अपरिपक्व हरियाली योद्धा विदेशी मूल के जल्दी विकसित होने वाले ऐसे पौधे रोप रहे हैं जिनमे कई तो विदेशी वनस्पतियाँ भी शामिल हैं। इसीलिए अब देशी वनस्पतियाँ समाप्त हो रही हैं। इन पढ़े लिखे आधुनिक विद्वानों ने सबसे अधिक नुकसान पलास पेड़ का ही किया है। उनकी इन हरकतों का दुष्परिणाम भी अब धीरे धीरे देखने को मिल रहा है। विदेशी पौधे अर्थात एलियन स्पीसीज के पौधे आजकल सड़क के दोनो किनारों पर खूब दिख रहे हैं। स्वर्गीय गुरूदेव डॉ. Deepak Acharya जी ने कई बार इस विषय को उठाया लेकिन लोगों पर आधुनिकता का भूत सवार है, तो फिर भला कौन सीधे? 😥
यह जानकारी आपको कैसी लगी बताइएगा...
फिर मिलेंगे, काले पलाश और लता पलाश के साथ...
धन्यवाद ..!

डॉ विकास शर्मा
प्राध्यापक वनस्पति शास्त्र विभाग
शासकीय महाविद्यालय चौरई 
जिला छिंदवाड़ा (म.प्र.)

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