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Wednesday, 11 February 2026

दानवीर ..

जब युद्ध के चरम पर अचानक कर्ण के रथ का पहिया धरती में धंस गया। नियति ने अपना खेल दिखाया। विवश कर्ण रथ से नीचे उतरा और अर्जुन से बोला— "ठहरो अर्जुन!
युद्ध के नियमों को स्मरण करो।
एक निहत्थे और रथहीन योद्धा पर प्रहार करना अधर्म है।
जब तक मैं पहिया निकाल न लूँ, तुम बाण नहीं चला सकते।"

अर्जुन के हाथ ठिठक गए।
गांडीव की प्रत्यंचा ढीली पड़ गई।
तभी सारथी बने श्रीकृष्ण का अट्टहास गूँजा:

> "नियम, कर्ण?
आज तुम्हें धर्म और नियमों की याद आ रही है?
कहाँ था तुम्हारा धर्म जब तुम छह महारथियों के साथ मिलकर बालक अभिमन्यु को घेरकर मार रहे थे?
कहाँ गए थे नियम जब भरी सभा में द्रौपदी को अपशब्द कहे गए और तुमने मौन रहकर उसका अपमान देखा?"
केशव के इन तीखे वाक्यों ने अर्जुन के भीतर की अग्नि को प्रज्वलित कर दिया।
क्रोधित अर्जुन ने भगवान शिव का दिया हुआ अस्त्र संधान किया और एक ही वार में दानवीर कर्ण को मृत्यु की शैय्या पर सुला दिया।

#दानवीरता की अंतिम परीक्षा:

कर्ण लहूलुहान पड़ा अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था।
सूर्यास्त होने को था, लेकिन श्रीकृष्ण यह सिद्ध करना चाहते थे कि मृत्यु के द्वार पर खड़ा यह योद्धा वास्तव में 'महादानवीर' है। श्रीकृष्ण ने एक वृद्ध ब्राह्मण का भेष धरा और कर्ण के पास जाकर विलाप करने लगे।
"#हे #दानवीर!
मेरी पुत्री का विवाह है और मेरे पास दान देने को कुछ नहीं है। क्या तुम इस निर्धन की सहायता करोगे?"

मृत्यु के करीब पहुँच चुके कर्ण ने क्षीण स्वर में कहा,
"हे #ब्राह्मण, मैं रणभूमि में निहत्था पड़ा हूँ, मेरे पास आपको देने के लिए अब कुछ नहीं बचा।"

#ब्राह्मण रूपी #कृष्ण बोले, "नहीं कर्ण!
तुम्हारे दांतों में स्वर्ण जड़ा है, वह मुझे दे दो।"

कर्ण ने पास पड़ा एक पत्थर उठाया और बिना हिचकिचाए अपना दांत तोड़ दिया।
जब उसने वह दांत ब्राह्मण को दिया, तो ब्राह्मण ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, "यह तो रक्त से सना और अशुद्ध है, मैं इसे नहीं ले सकता।"

तब कर्ण ने अपना धनुष उठाया और धरती पर बाण चलाया। धरती की कोख फाड़कर 'बाण गंगा' की निर्मल धारा फूट पड़ी। कर्ण ने दांत को उस गंगा जल में शुद्ध किया और ब्राह्मण को अर्पित कर दिया।
इस अद्भुत त्याग को देख श्रीकृष्ण अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और उनकी आँखों में आंसू भर आए।
> #श्रीकृष्ण ने कहा: "कर्ण, जब तक यह सृष्टि रहेगी, तुम्हारी दानवीरता का गुणगान तीनों लोकों में होगा।
तुम जैसा न कोई हुआ है, न होगा।"
#तीन #वरदान और कुंवारी भूमि का रहस्य:

प्रभु को सामने देख कर्ण ने अपने जीवन के दुखों को याद किया और तीन वरदान माँगे:

#सामाजिक #न्याय: "प्रभु, अगले जन्म में जब आप आएं, तो पिछड़े और उपेक्षित वर्ग के उत्थान के लिए कार्य करें।"

 #साहचर्य: "अगले जन्म में आप मेरे ही राज्य में जन्म लें।"

#अंतिम #संस्कार: "मेरा अंतिम संस्कार ऐसी भूमि पर हो जो 'कुंवारी' हो, जहाँ आज तक किसी का दाह संस्कार न हुआ हो।"

कर्ण की मृत्यु के पश्चात श्रीकृष्ण स्वयं उनके पार्थिव शरीर को लेकर निकल पड़े।
पूरी पृथ्वी पर ऐसी भूमि मिलना असंभव था।
अंततः सूरत (गुजरात) में ताप्ती नदी के किनारे उन्हें मात्र एक इंच ऐसी भूमि मिली जो शुद्ध थी।
इतने छोटे टुकड़े पर संस्कार असंभव था, इसलिए श्रीकृष्ण ने अपना एक बाण रखा और उस पर कर्ण का दाह संस्कार किया।
आज इस स्थान को 'तुलसीबाड़ी मंदिर' के नाम से जाना जाता है।

तीन पत्तों वाला वट वृक्ष: एक जीवित चमत्कार

जब पांडवों ने उस भूमि की पवित्रता पर संदेह किया, तो आकाशवाणी हुई कि ताप्ती नदी कर्ण की बहन हैं और अश्विनी कुमार उनके भाई, अतः यह स्थान उनके लिए ही सुरक्षित था।
साक्ष्य के रूप में श्रीकृष्ण ने वहाँ एक वट वृक्ष (बरगद) को स्थापित किया।

हैरानी की बात यह है कि:

सूरत के इस मंदिर में मौजूद वह बरगद का पेड़ हजारों साल पुराना है, लेकिन उस पर हमेशा सिर्फ तीन पत्ते ही रहते हैं।
ये तीन पत्ते ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक माने जाते हैं। मान्यता है कि जो भी यहाँ अटूट श्रद्धा के साथ आता है, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है।

Tuesday, 10 February 2026

सौभाग्य यंत्र

यह यंत्र सौभाग्य यंत्र है। ऐसे मनुष्यों के लिए यह यंत्र है।जिनका सौभाग्य जागृत नहीं रहता है।# इस यंत्र को भोज्य पत्र पर बनाकर सिंदूर और घी मिला मिलकर बनाना है लाल कपड़े से दाहिने हाथ में पहन लेना है। ऐसा करने से सौभाग्य की वृद्धि होती है।

जन्मजात शत्रु को अपना मित्र कभी नहीं बनाना चाहिए ।

      एक जंगल में मंदविष नामक सांप रहता था और बहुत बूढ़ा हो चुका था । बूढ़ा और कमजोर होने के कारण अपना शिकार करने में असमर्थ था । एक दिन रेंगता हुआ वह तालाब के किनारे पहुँच गया और वहीं लेट गया और कुछ दिनों तक वह इसी तरह लेटा रहा ।

       उसी तालाब में बहुत सारे मेंढक भी रहते थे उन्होंने तालाब किनारे लेटे हुए सांप की हालत के बारे में मेंढकों के राजा जालपाद को बतलाया । मेंढकों का राजा जालपाद उस सर्प के बारे में जानने के लीये सर्प के पास पहुंचा और जालपाद बोला – “ हे सर्पराज ! मैं मेंढकों के राजा जालपाद हूँ और इसी तालाब में रहता हूँ।| आपकी हालत के बारे में कुछ मेंढकों ने मुझे बतलाया था । आप इतने सुस्त क्यूँ पड़े हुए हो, आपकी यह हालत किसने की है, क्या आप हमें कुछ बतलाओगे ।”

      मेंढकों के राजा से इस प्रकार के प्रश्न सुनकर सर्प ने बनावटी कहानी बनाई और बोला- “ हे मेंढकों के राजा ! मैं एक गाँव के पास रहता था । एक दिन एक ब्राम्हण के पुत्र का पैर मेरे ऊपर रखा गया था और मैंने उसे काट दिया जिससे उस ब्राम्हण पुत्र की मृत्यु हो गई थी । उस ब्राम्हण ने मुझे श्राप दिया कि मुझे किसी तालाब के किनारे जाकर मेंढकों की सेवा करनी होगी और उन्हें अपनी पीठ पर बैठकर घुमाना होगा ।“

     सर्प के मुंह से इस प्रकार के बातें सुनकर मेंढकों का राजा जालपाद बहुत खुश हुआ उसने सोचा कि अगर इस सर्प से मेरी दोस्ती हो जाती है और मैं इस सर्प की पीठ पर बैठकर सबारी करूँगा तो दल का कोई भी दूसरा शक्तिशाली मेंढक मेरे खिलाफ विद्रोह भी नहीं कर सकेगा ।

     जालपाद को कुछ सोचता हुआ देख सर्प बोला – 
“ भद्र ! मैं सोच रहा था कि मुझे उस ब्राम्हण का श्राप भोगना पड़ेगा किसी और मेंढक को अपनी पीठ पर बैठाकर घुमाने से अच्छा है मैं मेंढकों के राजा को अपनी पीठ पर बिठ्लाऊ । अगर आप चाहें तो मेरी पीठ पर बैठ कर देख सकते हैं ।”

     मेंढकों के राजा जालपाद ने सांप की बात पर विश्वास कर लिया और झिझकते हुए सांप की पीठ पर बैठ गया। सांप ने उसे पूरा तालाब घुमाया और लाकर पुनः उसी स्थान पर छोड़ दिया। मेंढक ( जालपाद ) को सांप की गुदगुदी पीठ पर बैठने में बहुत आनंद आया और वह रोज सांप की पीठ पर बैठकर तालाब में घूमने का आनंद लेता और अपने सजातियों को सांप का भय दिखलाता ।

     एक दिन जब वह सांप की पीठ पर सवारी कर रहा था तब सर्प बहुत धीरे-धीरे चल रहा था । मेंढक (जालपाद ) ने पूछा – “ आज आप इतने धीरे-धीरे क्यूँ चल रहे हो ? आज सवारी में मजा नहीं आ रहा हैं। "

     सर्प बोला – “ मित्र ! मुझे कई दिनों से भोजन नहीं मिला है इसीलिए कमजोरी आ गई है और मुझसे चला नहीं जा रहा है।"

    सर्प की बात सुनकर मेंढकों का राजा जालपाद बोला – “ अरे मित्र ! इतनी छोटी सी बात हैं, इस तालाब में हजारो मेंढक है जो तुम्हार प्रिय आहार हैं तुम चाहो इनको अपना आहार बना लिया करो ।"

     मंदविष सांप के मानो मन की हो गई वह तो यही चाहता था अब वह प्रतिदिन कुछ बिना मेहनत किये कुछ मेंढकों को खा लेता था ।इधर मूर्ख जालपाद यह भी नहीं समझ सका कि अपने क्षणिक आनंद के लिए अपने वंश का नाश करवा रहा हैं।

     अब मेंढकों का राजा जालपाद प्रतिदिन सांप के पीठ पर बैठकर तालाब की सबारी करता और सांप तालाब में रहने वाले मेंढकों को खाकर अपना पेट भरता था ।

     एक दिन एक दूसरे सांप ने मेंढक को सांप की सवारी करते देखा तो उसे अच्छा नहीं लगा और कुछ देर बाद मंदविष के पास आकर बोला – “ मित्र तुम यह प्रकृति विरुद्ध कार्य क्यूँ कर रहे हो ? ये मेंढक तो हमारे भोजन हैं और तुम इन्हें अपनी पीठ बार बैठा कर सवारी करवा रहे हो ?”

     मंदविष बोला- “ ये सारी बातें तो मैं भी जानता हूँ और अपने लिए उपयुक्त समय का इन्जार कर रहा हूँ जब इस तालाब में कोई भी मेंढक नहीं बचेगा ।”

      बहुत दिनों तक इसी प्रकार चलता रहा एक दिन ऐसा आया कि तालाब में जालपाद के परिवार को छोड़ कर कोई दूसरा मेंढक नहीं बचा । मंदविष सांप को भूख लगी और वो जालपाद से बोला – “ अब इस तालाब में कोई मेंढक नहीं बचा है और मुझे बहुत भूख लग रही है ।”

     जालपाद बोला- “ इसमें मैं क्या कर सकता हूँ इस तालाब में मेरे सगे-संबंधियों को छोड़ का तुम सारे मेंढकों को खा चुके हो । अब तुम अपने भोजन की व्यवस्था खुद करो ।"

    जालपाद की बात सुनकर मंदविष सांप बोला – 
“ ठीक है मुझे तो बहुत भूख लग रही है मैं तुम्हारे परिवार को छोड़ देता हूँ पर मुझे अपनी भूख मिटाने के लिए तुम्हे खाना पड़ेगा ।"

      मंदविष सांप की बात सुनकर जालपाद के पैरो तले जमीन खिसक गई और उसने अपनी जान बचाने के लिए अपने सगे संबंधियों तक को खाने की अनुमति दे दी । देखते ही देखते सांप ने जालपाद के सभी रिश्तेदारों और परिवारों वालों को खा लिया । अब तालाब में मेंढकों सिर्फ जलपाद बचा था । मंदविष सांप जलपाद से बोला – “ अब इस तालाब में तुम्हें छोड़कर कोई भी मेंढक नहीं बचा है और मुझे बहुत भूख लगी है अब तुम ही बतलाओ मैं क्या करूँ ?” मंदविष सांप की बात सुनकर जालपाद मेंढक डर गया और बोला – 
“मित्र ! तुम्हारी मित्रता में मुझे अपने वंश और परिवार के लोगों को खो दिया है अब तुम कहीं और जाकर अपना भोजन देख लो ।”

      जालपाद की बात सुनकर मंदविष सांप बोला -
“ मित्र ! तुम्हारा कहना मैं मान लूँगा । तुमने अपने स्वार्थ के कारण अपने जन्मजात शत्रु को अपना मित्र बनाया और अपने सगे संबंधियों को मेरा भोजन बनवाया अब तुम अकेले इस दुनियां में रहकर क्या करोगे ?”
     इतना बोलकर सांप ने जालपाद मेंढ़क को भी मारकर अपना आहार बना लिया ।

शिक्षा –
(१) इस कथा को आज के राजनीतिक परिदृश्य में देखे तो मंदविष नमक सर्प इस्लामी ताकत है जो पूरी दुनिया में अल्लाह का राज स्थापित करना चाहते हैं । वही मेंढकों के राजा जालपाद वामपंथी सेक्पयूलर विचारों वाले पक्ष-विपक्ष के राजनेता, मिडिया और विभिन्न क्षेत्रीय जातिवादी पार्टियां हैं, जो मंदविष रूपी इस्लाम की क्षुधा पूर्ति अपने देश के नागरिकों को बांटकर आपस में भेद-भाव बढ़ा कर लड़ा रहे है और उनकी सदियों पुरानी एकता और परस्पर सद्भावना की बलि दे रहे हैं जिससे कि वह शासन सत्ता के मजे कर सकें । स्पष्ट हैं तालाब के अन्य मेढ़क हिंदू हैं ।
 ( ११ फरवरी २०२६ ईस्वी )
साभार ✍️ _वैदिक सनातन प्रहरी_

शीशम महिलाओं के लिए अमृत से कम नहीं है।।

शीशम महिलाओं के लिए अमृत से कम नहीं है।।

शीशम का पेड़ काफी बड़ा वृक्ष होता है, जो औषधीय गुणों का भंडार है, इस पौधे में कई ऐसे पोषण तत्व होते हैं, जो शरीर के लिए काफी फायदेमंद होते हैं,इस पेड़ मे कई औषधीय गुण पाए जाते हैं।

हमारे आसपास ऐसे कई प्रकार के औषधीय पेड़ और झाड़ियां हैं, जो शरीर के लिए काफी फायदेमंद होते हैं,यह हमारे स्वास्थ्य को ठीक करने में अपना एक अहम योगदान रखते हैं, क्योंकि इन औषधीयों का आयुर्वेद में काफी बड़ा महत्व है।

जो पेड़ आसानी से हर जगह आपको देखने के लिए मिल जाएगा। इस पेड़ के फल, फूल, छाल और पत्तियां, हर चीज काफी महत्व है।
अगर पेट में जलन हो रही हो, तो शीशम के पत्तों का रस या काढ़ा पीना बहुत लाभदायक होता है।

 और इसके पत्तों का शरबत पीने से सेहत को कई लाभ होते हैं, शीशम के पत्तों का शरबत बनाकर पीने से पाचन शक्ति बेहतर होती है, इसके साथ ही नियमित रूप से इसका सेवन करने से गैस, अपच और एसिडिटी में आराम मिलता है।

 इसका रस पीने से ओरल हेल्थ में सुधार होता है और जिन लोगों को मुंह से बदबू आती है या दांतों का दर्द व मसूड़ों में तकलीफ होती है, तो वो लोग भी इसके पत्तों को चबाकर समस्या ठीक कर सकते हैं।

आंखों की बीमारी जैसे आंखों में होने वाली जलन , सूजन आंखो का लाल होना इन सबमें में शीशम का इस्तेमाल फायदा पहुंचाता है। शीशम के पत्ते के रस में मधु मिलाकर 1-2 बूंदें आंखों में डालने से आंखों के रोग में आराम मिलता है।

शीशम का तेल चर्म रोगों पर लगाने से लाभ पहुँचता है। इससे खुजली भी ठीक हो जाती है।
शीशम के पत्तों के लुआब को तिल के तेल में मिला लें। इसे त्वचा पर लगाने से त्वचा की बीमारियों में लाभ होता है।

महिलाएं स्तनों में सूजन की बीमारी में भी शीशम का इस्तेमाल कर सकती हैं। शीशम के पत्तों को गर्म कर स्तनों पर बांधें। इससे और इसके काढ़े से स्तनों को धोने से स्तनों की सूजन मिट जाती है।
हैजा के इलाज के लिए 5 ग्राम शीशम के पत्ते में 1 ग्राम पिप्पली, 1 ग्राम मरिच तथा 500 मिग्रा इलायची मिलाएं। इसे पीसकर 500 मिग्रा की गोली बना लें। 2-2 गोली सुबह और शाम देने से हैजा में लाभ होता है।

आप दस्त को रोकने के लिए भी शीशम का उपयोग कर सकते हैं। शीशम के पत्ते, कचनार के पत्ते तथा जौ लें। तीनों को मिलाकर काढ़ा बनाएं। 
अब 10-20 मिली काढ़ा में मात्रानुसार घी तथा दूध मिला लें। इसे मथकर पिच्छावस्ति देने से दस्त पर रोक लगती है।
मूत्र रोग जैसे पेशाब का रुक-रुक कर आना, पेशाब में जलन होना, पेशाब में दर्द होना आदि में भी शीशम उपयोगी साबित होता है। 20-40 मिली शीशम के पत्ते का काढ़ा बनाएं। इसे दिन में 3 बार पिलाएं। इससे पेशाब का रुक-रुक कर आना, पेशाब में जलन होना, पेशाब में दर्द होना आदि में लाभ होता है। इसके साथ ही 10-20 मिली पत्ते काढ़ा का सेवन करने से वसामेह में लाभ होता है।

रक्त संचार को सही रखने में भी शीशम का प्रयोग करना अच्छा रहता है। 5 मिली शीशम के पत्ते के रस में 10 ग्राम चीनी तथा 100 मिली दही मिलाकर सेवन करने से रक्त संचार या ब्लड शर्कुलेशन ठीक रहता है।
रक्त विकार को ठीक करने के लिए शीशम के 3-6 ग्राम सूखे चूर्ण का शरबत बनाकर पिलाएं। इससे रक्त विकार का ठीक होता है।
त्वचा रोगों के लिए फायदेमंद है,शीशम के पत्तों का पेस्ट त्वचा पर लगाने से फोड़े, मुंहासे और फुंसियां दूर होती हैं। साथ ही यह त्वचा की रंगत को भी सुधारता है

इंफेक्शन से बचाव में मददगार है,शीशम के पत्तों में मौजूद एंटी-बैक्टीरियल गुण शरीर को इंफेक्शन से बचाने में मदद करते हैं। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाने का काम करते हैं।
 शीशम का रस शरीर को अंदर से साफ करने यानी डिटॉक्स करने में मदद करता है। इससे शरीर हल्का महसूस होता है और त्वचा भी साफ दिखाई देती है।

अर्थराइटिस के दर्द में आराम जोड़ों के दर्द और सूजन में शीशम के पत्तों का काढ़ा पीने से राहत मिलती है। पत्तों का पेस्ट सीधे जोड़ों पर लगाना भी असरदार होता है।

चोट और घाव में राहत चोट लगने या घाव होने पर शीशम के पत्तों का पेस्ट लगाने से दर्द कम होता है और घाव जल्दी भरता है। यह प्राकृतिक हीलिंग में मददगार है।

महिलाओं के लिए शीशम बेहद गुणकारी है इसके 20 पत्ते लेकर मिश्री मिलाकर पीस लें और पी जाएं तो लिकोरिया सफेद पानी को खत्म कर देगा
अधिक माहवारी आती है तो भी यही प्रयोग करें लाभ होगा
उसी तरह से पुरुषों के लिए काम करता है विधि वही है जो ऊपर वर्णित है

विशेष टिप्पणी - ये पोस्ट सिर्फ जानकारी देती है शीशम का सेवन किसी आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही करें 🙏,,,

बहुत कम लोग आंसुओं की निजता को समझते हैं ..

वे मोबाइल के प्रचलन में आने के शुरुआती दिन थे । आउट गोइंग कॉल के छह रूपये एक मिनिट के और इनकमिंग कॉल का एक रुपया चार्ज होता था । एस.टी.डी की दरें इससे कुछ सस्ती हुआ करती थीं।

एक छोटे से शहर के एक एस.टी.डी बूथ पर रोज एक लड़की शाम के के ठीक सात बजे आया करती थी । दिनभर की दौड़-भाग से थकी हुई, क्लांत और उदास चेहरे वाली लड़की पुलिस की वर्दी में होती जिस पर नेमप्लेट नहीं होती थी लेकिन कंधे के दो स्टार बताते थे कि वह सब-इंस्पेक्टर है।

लड़की अपनी सरकारी जीप खुद ड्राइव करती हुई आती और लगभग पन्द्रह से बीस मिनिट एक नम्बर पर फोन करती । बूथ के अंदर एक छोटा सा ग्लास का केबिन बना हुआ था जिसे वह अंदर से चिटकनी लगाकर बंद कर लिया करती और लगभग फुसफुसाते हुए बड़ी धीमी आवाज में बात करती।

कोई नहीं जान पाता कि वो रोज किससे बातें करती है सिवाय उस एस.टी.डी के मालिक के जो लगभग तेईस चौबीस साल का नौजवान था । पारदर्शी केबिन के बाहर से लड़की की आवाज सुनाई न देती लेकिन लड़के की ओर पीठ किये बात करती लड़की के लगातार बहते आंसू और भिंची हुई सिसकियों से कांपते कंधे उससे न छुप पाते।

लड़की उससे और अपनी बारी का इंतजार करते केबिन के बाहर खड़े अन्य ग्राहकों से अपने आंसू छिपाने का भरसक प्रयास करती और झेंपती हुई बाहर निकलती और सीधे काउंटर पर पैसे देने आकर खड़ी हो जाती और पैसे चुकाकर सीधे अपनी जीप स्टार्ट कर चली जाती।

लगभग पन्द्रह दिन लगातार फोन करते रहने के बाद लड़की जब सोलहवें दिन एस.टी.डी बूथ पर आई थी तो उस कांच के केबिन में तीनों तरफ एक मोटा नीला पर्दा लगा हुआ था।

लड़की ने उस दिन फोन करते हुए अपने आंसू बहने दिए थे ! फोन रखकर रूमाल से ठीक से चेहरा पोंछा था और बाहर निकल आई थी।
पैसे चुकाते वक्त उसकी आँखों में एक भीगा हुआ शुक्रिया था।

एस.टी.डी वाला नौजवान अपने इश्केक  अश्कों वाले मौसमों को याद करता हुआ मन ही मन दुआ मांग रहा था –
" हे ईश्वर ... इस लडकी के आंसू जल्द बीतें और इसके होंठों पर मुस्कानों का मौसम आये "  

चार महीने तक यह सिलसिला चलता रहा था फिर अचानक एक दिन लड़की ने आना बंद कर दिया। शायद उसका ट्रांसफर हो गया था। एस.टी.डी वाले नौजवान ने कुछ दिन उसका इंतजार किया था फिर अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गया था।

ठीक दस साल बाद उस नौजवान के पास कोतवाली से एक कॉल आया था। उसे थाने बुलाया गया था। वह थोड़ा घबराया हुआ सा तुरंत उठकर थाने चल दिया था।टी आई के चेंबर में उसे बैठाया गया था।
मामले को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि तभी टी आई साहब ने कमरे में प्रवेश किया और उससे हाथ मिलाया।

" आज सुबह ही कोतवाली में ज्वाइन किया और सबसे पहले तुम्हारा शुक्रिया अदा करना चाहता था " कहते हुए उन्होंने चाय लाने का ऑर्डर दिया। चुस्त वर्दी में सौम्य व्यक्तित्व के टी आई साहब मुस्कुराकर उससे मुखातिब थे !

"लेकिन मुझे किस बात का शुक्रिया .....? " वह अभी भी अचकचाया हुआ था !

"शायद अब तुम समझ जाओ कि किस बात का शुक्रिया" पीछे से आती एक मीठी आवाज ने उसका ध्यान खींचा !

वही दस साल पहले की दुबली पतली उदास लड़की इंस्पेक्टर की वर्दी में दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा रही थी ! बदन थोड़ा भरा हुआ चेहरा खुशी और अच्छी सेहत से दमकता हुआ।
वर्दी पर तीन स्टार और नेमप्लेट पर नाम " मंदिरा मेहरा "

" इनसे मिलो ...ये मेरी उत्तमार्ध " टी आई साहब ने लड़की के कंधे थामते हुए परिचय कराया !

" मुझसे ही बात किया करती थीं ये तुम्हारी एस.टी.डी. से ! बहुत कम लोग आंसुओं की निजता को समझते हैं और तुम उन चन्द लोगों में से एक हो जो मन के सबसे कच्चे कोने को सार्वजनिक होने की लज्जा से बचाना जानते हो। हम दोनों तुम्हारे कृतज्ञ हैं। "

तीनों ने साथ चाय पी थी और देर तक बातें कीं थीं। उस लड़के की प्रार्थना स्वीकार हुई थी।
 मुस्कानों का मौसम बाहर प्रांगण में लगे अमलतास के पेड़ पर पीले झुमके बनकर मुस्कुरा रहा था !
                              ❤️❤️❤️
                         .. ✍️ साभार 
                   -----पल्लवी त्रिवेदी------
        [ 'जिक्र ए यार चले - लवनोट्स' में संकलित]
      #लवनोट्स #valentines #zikreyaarchale
Refrence - https://www.facebook.com/share/p/1DZwXbzhHH/
                    वयं राष्ट्रे जागृयाम 

श्रीकुलदेवी स्तोत्रम् - एक स्त्रोत्र से होंगी कुलदेवी प्रसन्न

                       श्रीकुलदेवी स्तोत्रम् 
     यह कुलदेवी स्तोत्र प्रत्येक कुल (परिवार/वंश) की अधिष्ठात्री दिव्य शक्ति "कुलदेवी" की स्तुति का पावन ग्रंथ है। कुलदेवी वह आदि शक्ति हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवार की रक्षा, मार्गदर्शन एवं समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। इस स्तोत्र के नित्य पाठ से कुलदेवी प्रसन्न होकर साधक के पूरे परिवार पर अपनी कृपा बरसाती हैं, कुल की प्रतिष्ठा बढ़ाती हैं, आंतरिक एकता मजबूत करती हैं और सभी प्रकार के कुलदोषों एवं बाधाओं का निवारण करती हैं। यह स्तोत्र घर-परिवार में सुख-शांति, संपत्ति, स्वास्थ्य और सद्भावना लाने वाला माना गया है।

मूल स्तोत्र पाठ (नित्य एक बार अवश्य पढ़ें या सुनें)

नमस्ते श्रीकुलदेवी कुलाराध्या कुलेश्वरी।
कुलसंरक्षणी माता कौलिक ज्ञान प्रकाशिनी॥१॥

वन्दे श्री कुल पूज्या त्वाम् कुलाम्बा कुलरक्षिणी।
वेदमाता जगन्माता लोक माता हितैषिणी॥२॥

आदि शक्ति समुद्भूता त्वया ही कुल स्वामिनी।
विश्ववंद्यां महाघोरां त्राहिमां शरणागतम्॥३॥

त्रैलोक्य ह्रदयं शोभे देवी त्वं परमेश्वरी।
भक्तानुग्रह कारिणी कुलदेवी नमोस्तुते॥४॥

महादेव प्रियंकरी बालानां हितकारिणी।
कुलवृद्धि करी माता त्राहिमां शरणागतम्॥५॥

चिदग्निमण्डल संभुता राज्य वैभव कारिणी।
प्रकटितां सुरेशानी वन्दे त्वां "कुल गौरवम्"॥६॥

त्वदीये कुले जात: त्वामेव शरणम गत:।
त्वत वत्सलोऽहं आद्ये त्वं रक्ष रक्षाधुना॥७॥

पुत्रं देहि धनं देहि साम्राज्यं प्रदेहि मे।
सर्वदास्माकं कुले भूयात् मंगलानुशासनम्॥८॥

कुलाष्टकमिदं पुण्यं नित्यं य: सुकृति पठेत्।
तस्य वृद्धि कुले जात: प्रसन्ना कुलेश्वरी॥९॥

कुलदेवी स्तोत्रमिदं सुपुण्यं ललितं तथा।
अर्पयामि भवत भक्त्या त्राहिमां शिव गेहिनी॥१०॥

॥ श्री कुलदेव्यार्पणमस्तु ॥
॥ श्री कुलदेव्यार्पणमस्तु ॥
॥ श्री कुलदेव्यार्पणमस्तु ॥

॥ इति श्रीकुलदेवी स्तोत्रम्॥

🚩स्तोत्र का सरल अर्थ एवं भावार्थ
1. श्लोक १: उस कुलदेवी को नमन है, जो कुल द्वारा पूजित हैं, कुल की ईश्वरी हैं, कुल की संरक्षक माता हैं और कौलिक ज्ञान को प्रकट करने वाली हैं।
2. श्लोक २: मैं उस पूजनीय कुलमाता को प्रणाम करता हूँ, जो कुल की रक्षा करती हैं, वेदों की माता, संसार की माता और सभी प्राणियों का हित चाहने वाली हैं।
3. श्लोक ३: आप आदि शक्ति से प्रकट हुई हैं और आप ही कुल की स्वामिनी हैं। समस्त विश्व द्वारा वंदनीय, महाभयंकर (शत्रुओं के लिए) देवी! इस शरणागत की रक्षा कीजिए।
4. श्लोक ४: हे देवी! आप तीनों लोकों के हृदय में विराजमान हैं, परमेश्वरी हैं, भक्तों पर अनुग्रह करने वाली हैं। हे कुलदेवी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
5. श्लोक ५: आप महादेव (शिव) को प्रिय करने वाली, बालकों का हित करने वाली और कुल की वृद्धि करने वाली माता हैं। इस शरणागत की रक्षा कीजिए।
6. श्लोक ६: आप चेतना रूपी अग्नि मंडल से उत्पन्न हुई हैं, राज्य और वैभव प्रदान करने वाली हैं। हे देवों की ईशानी! मैं आपको "कुल के गौरव" के रूप में वंदन करता हूँ।
7. श्लोक ७: आपके ही कुल में उत्पन्न हुआ, मैं आपकी ही शरण में आया हूँ। हे आद्य शक्ति! आप वात्सल्य स्वरूपा हैं, अब मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए।
8. श्लोक ८: (हे माता!) मुझे सुपुत्र दीजिए, धन दीजिए और साम्राज्य (उत्तम जीवन/सफलता) प्रदान कीजिए। हमारे कुल में सदा मंगल ही मंगल का शासन हो।
9. श्लोक ९: यह पवित्र कुलाष्टक (कुलदेवी स्तोत्र) जो नित्य पुण्यात्मा व्यक्ति पढ़ता है, उसके कुल में उत्पन्न सभी (साधक सहित) की वृद्धि होती है, क्योंकि कुलेश्वरी प्रसन्न हो जाती हैं।
10. श्लोक १०: हे शिवगेहिनी (पार्वती)! मैं आपकी भक्ति से इस पुण्यदायी और सुंदर कुलदेवी स्तोत्र को आपको अर्पित करता हूँ। मेरी रक्षा कीजिए।

पाठ की विधि एवं लाभ
· समय: प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर या सायंकाल घर के पूजा स्थल पर। नित्य एक बार अवश्य पढ़ें।
· विधि: शुद्ध आसन पर बैठकर, कुलदेवी या देवी दुर्गा/पार्वती के चित्र के समक्ष दीप जलाकर, पुष्प अर्पित करके इस स्तोत्र का पाठ करें। अंत में "श्री कुलदेव्यार्पणमस्तु" बोलकर स्तोत्र को समर्पित कर दें।
· लाभ:
  1. कुलदेवी की विशेष कृपा एवं सुरक्षा प्राप्त होती है।
  2. पारिवारिक कलह, वंशानुगत समस्याएँ (कुलदोष) दूर होती हैं।
  3. घर-परिवार में सुख-शांति, समृद्धि एवं मंगलमय वातावरण बनता है।
  4. संतान, धन, स्वास्थ्य एवं मान-सम्मान में वृद्धि होती है।
  5. आध्यात्मिक ज्ञान (कौलिक ज्ञान) की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

साभार - Bhagwan Das Vashisht 

सार (क्षार), सत्व, घनसार और घनसत्व


क्षार- किसी भी वनौषधि के पंचांग को जलाकर राख को पानी में भिगोकर ऊपर का साफ पानी निथार कर उस पानी को जलाकर नीचे बर्तन में जो बच जाता है खुरच कर निकल कर रखे ।
 सत्व - किसी औषधि जैसे गिलोय आंवला आदि को कुचल कर रस निकाल कर रख देने से जो नीचे बैठ जाये सत्व कहलाता है ।

घनसार और घनसत्व - औषधि पंचांग का काढ़ा बनाकर फिर काढ़े को शहद जैसा गाढ़ा होने पर घनसार और सुखाने पर घनसत्व कहलाता है ।

साभार -  वैद्य सुधीर आर्य