मेरी दादी 95 साल की। बिस्तरों में ही पेशाब कर देती है। बोल सकती है लेकिन बताती नहीं है कभी कभी कमरे में ही पेशाब कर देती है। उनकी सेवा मेरी मां कर रही है। दादी अभी भी माया जाल में फंसी है। मल मूत्र से अपवित्रता रहती है दादी हर कहीं कर देती है। वो भगवान का सुमिरन भी नहीं करती है। मुझे हर समय मल मूत्र से अपवित्रता का भय रहता है और मैं दादी की सेवा नहीं करती हूं। उनकी सेवा मां ही करती है।
क्या मुझे पाप लगेगा?
उत्तर
यह सभी लोग मन से बिल्कुल निकाल दें कि बुढ़ापे में भगवान का स्मरण या भजन होगा ।
बिल्कुल नहीं होगा , चाहे नाक के बाल के बल पर भले ही कोई खड़ा हो जाये ।
जब तक बचपन से वह स्मरण भगवान के लिए प्रेम या वृत्ति नहीं होगी , तब तक असम्भव है कि बुढ़ापे में भजन हो जाये ।
एक बार को हाथी को आप सुई के छेद से साबूत भले निकाल लें , लेकिन जिसने अपने युवावस्था , किशोरावस्था , बाल्यावस्था में भगवद सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त कर भगवान का चिंतन नहीं किया है , वह कभी भी बुढापे में स्मरण चिंतन नहीं कर सकता ।
क्योंकि बुढापे में तो और अधिक बन्धन हो जाता है ।
जैसे Spider का web होता है न जाला , बस उसी तरह वह cocoon में बंधता चला जाता है ।
उस पर माया और अधिकार जमा लेती है । उसकी वृत्तियों से लेकर इन्द्रियाँ तक तत्त्व ज्ञान ग्रहण करने में असक्षम हो जाती हैं ।
और ज्ञान नहीं होगा तो प्रेम उपज नहीं सकता ।
प्रेम नहीं होगा तो स्मरण चिंतन भजन कुछ नहीं होगा ।
विषय और वृत्तियाँ दोनों बुढ़ापे में बाँध लेती हैं ।
कोई महापुरुष भी बुढ़ापे में कुछ नहीं कर सकता ।
अधेड़ की अवस्था में अगर कोई सन्त महापुरुष मिल गया तो थोड़ी बहुत साधना करवा लें जाता है लेकिन बुढ़ापे में तो और घोर आसक्ति आ जाती है ।
और रही बात आपके दादी की तो अब उनकी पशुवत वृत्ति आ चुकी है ।
ऐसा नहीं है कि वह जानबूझकर नहीं बताती , उनको पता ही नहीं लगता कि कब मूत्र या मल हो गया ।
क्योंकि वृद्धावस्था में सभी इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं ।
जिस इन्द्रिय का अधिक उपयोग किया जाता है , वह इन्द्रिय सबसे पहले साथ छोड़ती हैं ।
तो उन्हें नहीं पता लगता होगा ।
मल मूत्र से भगवान नहीं अपवित्र होते ।
मल मूत्र के कण कण में भगवान हैं ।
अपवित्र हम लोग होते हैं । अपवित्रता हमारे उद्वेगों पर पड़ता है ।
अपवित्र और पवित्र हमारे लिए बनाए गए हैं ताकि हमारी वृत्ति , सोच , विचार इत्यादि सात्विक हो सके और वह शुद्ध तत्त्व का चिंतन कर सके ।
और आपको सेवा अवश्य करनी चाहिए ।
क्योंकि यही अवसर है , अपने प्रारब्ध को कम या काट लेने का ।
जितनी सेवा करेंगी , उतनी सहनशीलता और आपके बुरे कर्म जो प्रारब्ध में बदलने वाले हैं , वह कटते हैं ।
अतः हो सके तो सेवा अवश्य करिये ।
उनमें भगवान की भावना डालकर कि भगवान ने मुझे एक अवसर दिया है ताकि मैं अपने कोई कर्मफल को नष्ट कर सकूँ ।।
पाप तो नहीं लगेगा क्योंकि आप किसी को दुःख नहीं दे रही हैं लेकिन अगर थोड़ा बहुत लौकिक पुण्य कमाना है तो पूत कर्म कर लीजिए , आगे के जीवन के लिए ठीक रहेगा ।
फिर कुछ करने लायक न बचे सिवाय लाठी खटिया पकड़ने के , उसके पहले मूल मंत्र पकड़ लीजिए
भज गोविंदम भज गोविंदम गोविंदम भज मूढ़ मते
- Shwetabh Pathak - श्वेताभ पाठक
Shwet Prem Ras
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