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Monday, 20 July 2026

बच्चे सबसे ज्यादा सुरक्षित अपने मा बाप के साथ होते है

चाहे आधा पेट खाए या ख़ाली पेट ही सो जाए " अगर औकात नहीं है कॉन्वेंट में पढ़ाने की तो सरकारी में ही पढ़ाए पर अपने बच्चे को अपने पास ही रखे किसी नानी मामा के यहां न रखे! बदमाशी तो सारे बच्चे करते है मगर इनमें एक अलग लेबल का ही एग्रेशन रहता है! कुछ दिन पहले दो बच्चों में झगड़ा हुआ हमलोगो ने समझा के शांत कर दिया लेकिन कल हो के पता चला कि एक बच्चे ने रास्ते में दूसरे का हाथ तोड़ दिया जब उसका मामा आया तो आ के हमी लोग से उलझ गया कि जरूर उस लड़के ने कुछ किया होगा मतलब कुछ करेगा तो क्या किसी की जान के लेगा! ऐसे ही पिछले साल एक लड़के का अचानक से 8th में एडमिशन हुआ उसकी प्रॉब्लम थी कि वो बोलता बहुत था हर टाइम बक बक! पहले तो थोड़ा प्यार से कोशिश की लेकिन उसका मुंह बंद नहीं हुआ एक दिन गुस्से में बोली कि नाम काट के हटा देंगे तो मासूम सा मुंह बना के बोला कि मैडम यहां न बोले तो कहा बोलो घर में एक दम चुप ही तो रहते है मामा को उसको शोर शराबा पसंद नहीं! थोड़ा बात की तो पता चला कि उसके मामा उसको बहुत पीटते थे घर के बाहर भी क्योंकि उसे ।डिसिप्लिन्ड रखना चाहते थे अनजाने में ही सही रिश्तेदारी में पलने वाले बच्चे या तो एकदम हिंसक होगे नहीं तो डिप्रेशन में! । मुझे याद है जब मै न्यू न्यू ज्वाइन की थी तो एक फोर्थ क्लास की प्यारी सी बच्ची थी मैने उसे मजाक में पूछा कि बोलो आज क्या कर के आई हो तो बोली कि मैडम दाल भात तरकारी बना के आई हु मुझे लगा मजाक कर रही है लेकिन और बच्चे बोले कि सही बोल रही है उसकी नानी बूढ़ी है खाना यही बनाती है वो भी चूल्हे पे!! आजके समय में ज्यादातर बच्चे अपने रिश्तेदारों से ही एब्यूज हो रहे है और डर के मारे किसी से बोल भी नहीं पाते!। मै उन महिलाओं से भी कहना चाहती हु अगर शादी में 1 परसेंट भी उम्मीद बची है और आप को लग रहा है कि आपके बच्चे की परवरिश सही से रही है तो पहले अपने बच्चे के फ्यूचर के बारे में सोचे! अभी इंडिया में लोगों के माइंड इतना डेवलपल्ड नहीं है जो किसी और के बच्चे को अपना ले यहां तक कि खुद के मां भाई भी नहीं उन्हें भी आपके बच्चे बस 2 4 के लिए ही प्यारे लगते है! यकीन मानिए अगर किसी का पार्टनर गलत है मानती हु तकलीफ होती है लेकिन अगर बच्चे लायक और संस्कारी निकल जाए तो आप का जीवन को खुशहाल होने से कोई नहीं रोक सकता लेकिन आप के पास सबकुछ है मगर बच्चे लायक नहीं हुए तो फिर अंतिम सांस ले आपको सुकून नहीं! बच्चे सबसे ज्यादा सुरक्षित अपने मा बाप के साथ होते है #childsafetyawareness

सख्ती के बिना अनुशासन नहीं आता।

डॉ समित शर्मा ने सहकारिता की बैलगाड़ी की रफ्तार को बुलेट ट्रेन की स्पीड में बदला

देश-प्रदेश के अति प्रतिष्ठित IAS अधिकारी #डॉसमितशर्मा के प्रेरणादायी नेतृत्व में राजस्थान के सहकारिता आंदोलन की गाड़ी (बैलगाड़ी) न केवल पटरी पर लौट आयी है, बल्कि #बुलेटट्रेन की स्पीड से सरपट दौड़ने लगी है। एक साल पहले तक, जिस #सहकारीआंदोलन की गति और रीति-नीति, बैलगाड़ी के बराबर आ गयी थी, अब उसने बुलेट ट्रेन की रफ्तार पकड़ ली है। यह डॉ. समित शर्मा के चमत्कारी नेतृत्व का ही परिणाम है कि एक विभाग, जिसमें कुछ माह पहले तक मार्गदर्शन के नाम पर 'नियमानुसार कार्य किया जाए', अंकित कर चिट्ठियां नीचे भेज दी जाती थी, अब वही विभाग, वही अधिकारी, वही कर्मचारी मनोयोग से कार्य संस्कृति के विकास में अपना सतत योगदान देने लगे हैं। जिनकी नीयत योगदान देने की नहीं थी, या जिन्हें डॉ. समित शर्मा (#DrSamitSharma) भी पूर्ववर्ती रजिस्ट्रार/शासन सचिव की भांति 'लापरवाही' को नजरअंदाज करने वाले आईएएस लगते थे, उनकी गलतफहमी को दूर करने के लिए, कठोर अनुशासनात्मक कार्यवाही करते हुए, उन्हें उनके घर से बाड़मेर, जैसलमेर, उदयपुर जैसे सुदूर क्षेत्रों में भेजा गया। इससे यह बात एक बार पुनः प्रमाणित हुई की सख्ती के बिना अनुशासन नहीं आता। अब सब अनुशासित नजर आ रहे हैं।

अधिकारी हो या कर्मचारी, दिन में दो बार, सबकी उपस्थिति अंकित की जाती है। कुछ माह पहले तक ही बात करें, तो अधिकारी सीटों पर होते थे लेकिन अधिनस्थ स्टाफ का अता-पता नहीं होता था। अधिकारी को यह भी ज्ञात नहीं होता था कि स्टाफ अधिकृत तौर पर अवकाश का उपभोग कर रहा है, अथवा फरलो पर है, कार्यालय में आया भी है या नहीं, और आया है और गायब है, तो सीट पर कब आयेगा। सहकारिता विभाग के कार्यालय हो या सहकारी संस्थाएं, अधिकारी फरियादी की भांति फोन कर-करके अधीनस्थ स्टाफ से पूछा करते थे कि कहां हो, आओगे या नहीं। कुल मिलाकर बड़ी ही दयनीय स्थिति थी। कारण, अधिकांश तबादलों एवं पदस्थापन में राजनीतिक हस्तक्षेप रहता था और शीर्ष स्तर से अंकुश लगाने की प्रवृत्ति का त्याग किया जा चुका था।

अनुभाग अधिकारी तो दूर, रजिस्ट्रार और ज्वाइंट रजिस्ट्रार प्रशासन की हिम्मत नहीं थी कि किसी बाबू को भी सहकार भवन से बाहर भेज सकें या उसकी मर्जी के खिलाफ कार्यालय में बुला सकें। संस्थाओं में हालत कुछ ठीक थी, लेकिन प्रधान कार्यालय और जिला कार्यालयों में खाली कुर्सियों फरियादियों, परिवादियों का मुंह चिढ़ाया करती थी।

कोई कानून नहीं बदला, कोई नियम नहीं बदला, कोई सरकार नहीं बदली, विभाग का मंत्री नहीं बदला, लेकिन कमांडर के बदलते ही हालात एकदम से बदल गये हैं, अनुकूल हो गये हैं। कार्य संस्कृति में सुधार के लिए डॉ. समित शर्मा द्वारा एबीएएस (आधार आधारित उपस्थित प्रणाली) लागू करते ही विभाग में प्रातः 9.30 बजे तक और संस्थाओं में प्रातः 10.05 बजे तक प्रायः-प्रायः सभी कुर्सियां फुल हो जाती हैं। विभाग में यह सिलसिला सायंकाल 6 बजे तक चलता है, जबकि संस्थाओं में निर्धारित समयानुसार 5.30 बजे अथवा 5 बजे तक ऐसा ही एकरूप दृश्य देखने को मिलता है, जिसे देखकर बहुत ही सुखद अनुभूति हो रही है। 
इससे सबसे अधिक राहत अनुभाग अधिकारियों, जिला अधिकारियों और संस्था प्रमुखों को मिली हैं। पहले जिनके निर्देश की अधिनस्थ स्टाफ को परवाह नहीं होती थी और काम के लिए बार-बार कहने पर अक्सर नाराजगी देखने को मिलती थी, वहीं अब किसी को कुछ नहीं कहना पड़ता। सब लोग समय पर आते-जाते हैं और कार्यालय पहुंचते ही काम में जुट जाते हैं। कार्य की नियमित समीक्षा और रियल टाइम मॉनिटरिंग का दौर शुरू होने से अधिकारी हो या अधिनस्थ स्टाफ, दोनों ही कार्य में शिथिलता और लापरवाही का अंजाम जानते हैं। 
डॉ. समित शर्मा ने सुविधाओं के दृष्टि से प्रधान कार्यालय के अधिकारियों, कर्मचारियों की पीड़ा को समझते हुए, साल भर से बंद पड़ा वातानुकुलित सिस्टम पुनः शुरू करवा दिया है, जिस पर 70 लाख रुपये से अधिक लागत आयी है। एक साल से वातानुकूलित सिस्टम खराब होने से नेहरू सहकार भवन में संचालित #सहकारिताविभाग के कार्यालयों में अधिकारियों, कर्मचारियों को पूरा ग्रीष्मकाल और चौमासा, भयंकर गर्मी व उसम के विपरीत मौसम में व्यतीत करना पड़ा। इससे कार्यक्षमता भी प्रभावित हुई, और कार्य की गति-प्रगति भी। अब कार्मिकों की सुविधा के लिए सहकार भवन में नई लिफ्ट्स लगाई जा रही हैं। प्रधान कार्यालय सहित जिला कार्यालयों में बेकार और अनुपयोगी रिकार्ड को हटाकर, कार्य लायक माहौल बनाया गया है। सहकार भवन का रंग-पोत कर, खूबसूरती प्रदान की गयी है। अच्छा काम करने वालों का उत्साहवर्धन किया जाता है।
सुविधाओं से परिपूर्ण वातावरण होने एवं एक मजबूत, निष्ठावान, कर्तव्यपरायण एवं साहसी कमांडर की छत्रछाया में, सहकारिता विभाग और सहकारी संस्थाओं के कार्यों को गति मिल रही है, सरकारी योजनाओं की क्रियान्विति गतिमान हो रही है, पेंडेसी समाप्ति की ओर है। "सहकार से समृद्धि" का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। इन सकारात्मक परिस्थितियों को साकार करने वाले डॉ. समित शर्मा के लिए हम इतना ही कह सकते हैं कि -         अपना जमाना आप बनाते हैं अहल-ए-दिल, 
     हम वो नहीं जिनको जमाना बना गया ।
साभार ✍️ सहकार गौरव
( फेसबुक पोस्ट दिनांक 20/7/2026 )



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“जहाँ सम्मान न मिले, वहाँ समझौता नहीं, साहस चुनो।”

हनीमून से लौटते ही पति ने हाथ उठाने की कोशिश की, लेकिन खेल शिक्षिका के पास ऐसा सबूत था जिसने पूरे परिवार की साज़िश उजागर कर दी!
शादी के सात दिन बाद, मसूरी से लौटते ही आदित्य ने गाज़ियाबाद वाले फ्लैट का मुख्य दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया।
उसने कुंडी चढ़ाई।
धीरे-धीरे अपनी चमड़े की बेल्ट निकाली।
फिर नई-नवेली दुल्हन सिया से बोला,
“अब तुम्हें सिखाना पड़ेगा कि इस घर की बहू कैसे बनकर रहती है।”
सिया वहीं ठिठक गई।
उसके हाथ में अभी भी पहाड़ों से लाया हुआ छोटा सूटकेस था।
माथे की बिंदी हल्की धुंधली हो चुकी थी।
हाथों की मेहंदी अभी पूरी तरह फीकी भी नहीं पड़ी थी।
कुछ घंटे पहले तक जो पति हर जगह उसका हाथ थामे घूम रहा था, अब उसी के हाथ में बेल्ट थी।
सिया की उम्र 25 वर्ष थी।
वह गाज़ियाबाद के एक सरकारी विद्यालय में खेल शिक्षिका थी।
बच्चे उसका सम्मान करते थे क्योंकि वह अनुशासन, आत्मविश्वास और आत्मरक्षा की ट्रेनिंग भी देती थी।
उसका स्वभाव शांत था।
कम बोलती थी।
यही कारण था कि लोग अक्सर उसकी चुप्पी को उसकी कमजोरी समझ बैठते थे।
लेकिन सच्चाई बिल्कुल अलग थी।
सिया का बचपन उत्तराखंड के एक छोटे कस्बे में बीता था।
उसके पिता रघुवीर ठाकुर पूर्व सैनिक थे।
सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने बेटियों के लिए आत्मरक्षा प्रशिक्षण केंद्र शुरू किया था।
आठ साल की उम्र से ही सिया ने कराटे, जूडो और ननचाकू का अभ्यास शुरू कर दिया था।
विवाह से पहले आदित्य ने सिर्फ उसकी सादगी देखी थी।
उसकी ताकत नहीं।
रिश्ता तय करते समय आदित्य हमेशा कहता था,
“मुझे पढ़ी-लिखी लेकिन संस्कारी लड़की चाहिए। शादी बराबरी का रिश्ता है।”
उसकी बातें इतनी मीठी थीं कि किसी को शक ही नहीं हुआ।
मसूरी में बिताए छह दिन किसी सपने जैसे थे।
लेकिन घर लौटते ही असली चेहरा सामने आ गया।
आदित्य बोला,
“कल से तुम्हारी पूरी सैलरी मेरे खाते में जाएगी।”
“स्कूल के बाद कहीं नहीं जाओगी।”
“मेरी माँ जैसा कहेंगी, वैसा ही होगा।”
“और अगर मेरी बात नहीं मानी…”
उसने बेल्ट हवा में घुमाई।
सिया ने बिना घबराए अपना स्पोर्ट्स बैग खोला।
उसमें रखा लकड़ी का ननचाकू हाथ में लिया।
सिर्फ एक बार हवा में घुमाया।
उसकी तेज़ आवाज़ सुनकर आदित्य एक पल को ठिठक गया।
लेकिन गुस्से में उसने बेल्ट उठाकर वार करने की कोशिश की।
अगले ही पल…
बेल्ट उसके हाथ से छूट चुकी थी।
आदित्य की कलाई सिया की पकड़ में थी।
वह दर्द से कराह उठा।
सिया ने उसे चोट नहीं पहुँचाई।
सिर्फ इतना कहा—
“मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, किसी की गुलाम नहीं।”
“सम्मान दोगे तो सम्मान मिलेगा।”
“डराकर रिश्ता नहीं चलता।”
उसने बेल्ट उठाकर कूड़ेदान में फेंक दी।
फिर अपने कमरे में चली गई।
उसे लगा कि शायद यही इस रिश्ते की सबसे बड़ी सच्चाई है।
लेकिन वह गलत थी।
असल खेल तो अभी शुरू हुआ था।
अगली सुबह स्कूल पहुँचते ही उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से ऐसा वीडियो आने वाला था, जिसमें आदित्य, उसकी माँ और एक रिश्तेदार शादी से पहले ही उसकी सैलरी, जेवर और संपत्ति पर कब्ज़ा करने की पूरी योजना बनाते हुए दिखाई दे रहे थे…
और वही वीडियो इस कहानी का सबसे बड़ा मोड़ बनने वाला था।

अगली सुबह सिया हमेशा की तरह समय पर स्कूल पहुँची।
चेहरे पर हल्की थकान थी, लेकिन उसने किसी सहकर्मी को घर की बात नहीं बताई।
पहला पीरियड खत्म ही हुआ था कि उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से संदेश आया।
उसमें सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी—
"अगर अपनी शादी बचानी है तो यह वीडियो पूरा देखना। अगर अपनी ज़िंदगी बचानी है, तो इसे कभी डिलीट मत करना।"
सिया का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
उसने स्टाफ रूम के एक शांत कोने में बैठकर वीडियो चलाया।
वीडियो देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वीडियो किसी कैफ़े का था।
टेबल पर आदित्य, उसकी माँ कमला, और उनका रिश्तेदार संदीप बैठे थे।
रिकॉर्डिंग साफ़ थी।
कमला की आवाज़ सुनाई दी—
“लड़की सरकारी नौकरी करती है। हर महीने पक्का वेतन आएगा।”
संदीप हँसते हुए बोला—
“पहले प्यार दिखाओ, फिर शादी के बाद सैलरी अपने खाते में करवा लेना।”
आदित्य मुस्कुराया।
“अगर मानेगी नहीं तो थोड़ा सख्त होना पड़ेगा। दो-चार बार डर जाएगी तो खुद सीधी हो जाएगी।”
कमला ने बिना झिझक कहा—
“और अगर फिर भी ज़्यादा बोलने लगे तो दहेज का मामला बना देंगे। लड़की वाले खुद समझौता कर लेंगे।”
वीडियो यहीं खत्म नहीं हुआ।
आगे आदित्य कह रहा था—
“उसे लगता है कि शादी बराबरी का रिश्ता है... लेकिन शादी के बाद नियम हमारे होंगे।”
सिया की आँखों में आँसू नहीं थे।
सिर्फ़ एक अजीब-सी शांति थी।
अब उसे समझ आ चुका था कि पिछली रात की बेल्ट कोई अचानक आया गुस्सा नहीं था।
वह पहले से बनाई गई योजना का हिस्सा थी।
वीडियो के साथ एक और संदेश आया—
"मैं इस कैफ़े में वेटर था। आपकी बातें सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगा था, इसलिए रिकॉर्ड कर लिया। अब मुझे पता चला कि उसी लड़की से आपकी शादी हुई है। इसलिए सच आपको भेज रहा हूँ। अपना नाम मत पूछिए। बस सावधान रहिए।"
सिया ने तुरंत वीडियो की कई कॉपियाँ बना लीं।
एक अपने ईमेल पर भेजी।
एक पेन ड्राइव में सेव की।
एक अपने पिता रघुवीर ठाकुर को भेज दी।
फिर उसने केवल एक संदेश लिखा—
"पापा, अभी फोन मत कीजिए। शाम तक सब समझाऊँगी।"
उधर शाम को घर पहुँचते ही आदित्य ऐसे व्यवहार करने लगा जैसे पिछली रात कुछ हुआ ही न हो।
वह मुस्कुराकर बोला—
“आज से नई शुरुआत करते हैं।”
लेकिन इस बार सिया उसकी मुस्कान के पीछे छिपा सच देख चुकी थी।
रात के खाने पर कमला भी आ गई।
बैठते ही उसने पहला सवाल पूछा—
“बहू, इस महीने की सैलरी कब आएगी?”
सिया ने शांत स्वर में जवाब दिया—
“सैलरी आएगी... लेकिन इस बार उसका हिसाब भी साथ आएगा।”
आदित्य और कमला एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस मोबाइल को वे सिर्फ़ एक साधारण फोन समझ रहे थे, उसी में उनकी पूरी साज़िश कैद हो चुकी थी।
और अगले दिन, परिवार की बैठक में, वही वीडियो सबके सामने चलने वाला था… जिससे उनके वर्षों से बनाए गए सम्मान का नकाब हमेशा के लिए उतरने वाला था।

अगले दिन रविवार था।

आदित्य की माँ कमला ने पूरे परिवार को घर बुला लिया।

चाचा, ताऊ, बुआ, मामा—करीब पंद्रह लोग बैठक में बैठे थे।

कमला के चेहरे पर आत्मविश्वास था।

उसे लगा था कि आज सबके सामने सिया पर दबाव बनाकर उसकी सैलरी और नौकरी दोनों अपने नियंत्रण में करवा लेगी।

चाय के बाद उसने बात शुरू की।

“हमारे घर की एक परंपरा है,” कमला बोली, “बहू की पूरी कमाई परिवार के खाते में जाती है। अब सिया भी यही करेगी।”

कुछ रिश्तेदारों ने सिर हिलाकर हामी भर दी।

आदित्य ने भी गंभीर चेहरा बनाते हुए कहा,

“अगर परिवार के नियम नहीं माने जाएँगे, तो घर नहीं चल पाएगा।”

सिया अब तक शांत बैठी थी।

फिर उसने अपने बैग से मोबाइल निकाला और बोली,

“नियम सबके लिए बराबर होने चाहिए। लेकिन पहले मैं आप सबको पाँच मिनट की एक रिकॉर्डिंग सुनाना चाहती हूँ।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

वीडियो चल पड़ा।

स्क्रीन पर आदित्य, कमला और संदीप साफ़ दिखाई दे रहे थे।

उनकी आवाज़ पूरे कमरे में गूँजने लगी—

> “पहले प्यार दिखाओ… फिर शादी के बाद पूरी सैलरी अपने कब्ज़े में करवा लेना।”

> “न माने तो डराना… ज़रूरत पड़े तो झूठा दहेज का मामला भी बना देंगे।”

> “सरकारी नौकरी वाली लड़की हाथ से नहीं निकलनी चाहिए।”

वीडियो खत्म होते ही पूरे कमरे में ऐसी खामोशी छा गई कि घड़ी की टिक-टिक तक सुनाई देने लगी।

आदित्य का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

कमला के हाथ काँपने लगे।

सबसे पहले आदित्य के ताऊ जी बोले,

“क्या यह सच है?”

आदित्य के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला।

संदीप, जो बैठक में मौजूद था, सिर झुकाकर बैठ गया।

उसी समय दरवाज़े की घंटी बजी।

सिया के पिता रघुवीर ठाकुर अंदर आए।

उन्होंने किसी पर गुस्सा नहीं किया।

सिर्फ़ अपनी बेटी के पास जाकर खड़े हो गए।

उन्होंने शांत स्वर में कहा,

“बेटी, अब फैसला तुम्हारा होगा। किसी दबाव में मत आना।”

सिया ने आदित्य की ओर देखा।

“कल तुम बेल्ट से मुझे डराना चाहते थे।”

“आज सच तुम्हें डरा रहा है।”

आदित्य पहली बार हाथ जोड़कर बोला,

“मुझसे गलती हो गई… एक मौका दे दो।”

लेकिन इस बार सिया चुप नहीं रही।

उसने अपने बैग से एक और कागज़ निकाला।

“यह घरेलू हिंसा की शिकायत का मसौदा है।”

“और यह वीडियो उसकी सबसे बड़ी गवाही है।”

कमला घबराकर बोली,

“बहू, घर की बात घर में ही रहने दो।”

सिया ने दृढ़ आवाज़ में जवाब दिया,

“जिस दिन आपने मुझे बहू नहीं, कमाई का साधन समझा था… उसी दिन यह मामला घर का नहीं रहा।”

बैठक में मौजूद हर रिश्तेदार समझ चुका था कि वर्षों से संस्कारों का दिखावा करने वाला यह परिवार भीतर से लालच और नियंत्रण की मानसिकता पर खड़ा था।

और अब उनके पास अपनी सफाई देने के लिए कोई शब्द नहीं बचे थे।

लेकिन सिया का अंतिम फैसला अभी बाकी था…

वह फैसला जो आदित्य की पूरी ज़िंदगी की दिशा बदलने वाला था।

बैठक में बैठे सभी लोग सिया की ओर देखने लगे।

आदित्य की आँखों में पहली बार डर साफ़ दिखाई दे रहा था।

उसने धीमे स्वर में कहा,

“सिया… एक गलती की इतनी बड़ी सज़ा मत दो। मैं बदल जाऊँगा।”

सिया ने बिना गुस्से के उसकी ओर देखा।

“गलती वह होती है जो अनजाने में हो जाए।”

“लेकिन किसी की ज़िंदगी पर कब्ज़ा करने की योजना बनाना, शादी से पहले साज़िश रचना और शादी के सातवें दिन बेल्ट उठाना… यह गलती नहीं, सोच होती है।”

कमला बीच में बोली,

“बहू, लोग क्या कहेंगे? हमारी इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी।”

सिया ने शांत स्वर में उत्तर दिया,

“इज़्ज़त सच बोलने से नहीं, गलत काम करने से जाती है।”

इतने में दरवाज़े पर घंटी बजी।

दो पुलिसकर्मी और एक महिला अधिकारी अंदर आए।

सिया ने पहले ही महिला हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कर दी थी और वीडियो सहित सभी साक्ष्य सुरक्षित जमा करा दिए थे।

महिला अधिकारी ने आदित्य से पूछा,

“क्या यह वीडियो आपका है?”

आदित्य ने एक पल के लिए झूठ बोलने की कोशिश की, लेकिन कमरे में बैठे रिश्तेदारों के सामने उसकी हिम्मत जवाब दे गई।

उसने सिर झुका दिया।

कमला भी रोने लगी।

पुलिस ने दोनों के बयान दर्ज किए और आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी।

जाते-जाते महिला अधिकारी ने सिया से कहा,

“आपने समय रहते आवाज़ उठाई। अक्सर लोग डर या समाज के दबाव में चुप रह जाते हैं।”

कुछ सप्ताह बाद…

सिया फिर से अपने स्कूल के मैदान में बच्चों को आत्मरक्षा का अभ्यास करा रही थी।

बच्चों ने पूछा,

“मैम, सबसे बड़ी ताकत क्या होती है?”

सिया मुस्कुराई और बोली,

“अपने सम्मान के लिए सही समय पर सही निर्णय लेना।”

उसने अपने पिता के आत्मरक्षा केंद्र में सप्ताहांत पर महिलाओं के लिए निःशुल्क आत्मरक्षा प्रशिक्षण शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे वहाँ कई छात्राएँ, गृहिणियाँ और कामकाजी महिलाएँ आने लगीं।

एक दिन प्रशिक्षण केंद्र की दीवार पर उसके दादा की कही हुई बात बड़े अक्षरों में लिखी गई—

“जहाँ सम्मान न मिले, वहाँ समझौता नहीं, साहस चुनो।”

सिया ने उस पंक्ति को पढ़ा, मुस्कुराई और अपने नए जीवन की ओर बढ़ गई।

उसने सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं छोड़ा था…

उसने डर पर साहस की जीत लिखी थी।

समाप्त।
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विदेशी 'चोर' और हमारी सोई हुई विरासत: पायथागोरस से सदियों पहले नारद पुराण का गणित...

भाग-1
विदेशी 'चोर' और हमारी सोई हुई विरासत: पायथागोरस से सदियों पहले नारद पुराण का गणित! 

हमारे दिमागों में यह बात इतनी गहराई से ठूंस-ठूंस कर भर दी गई है कि हमारे धर्मग्रंथ केवल धूप-दीप जलाने, घंटी बजाने और कर्मकांड करने के लिए हैं। यह सनातन इतिहास का सबसे बड़ा और सुनियोजित झूठ है! हमारे पुराण केवल परलोक की काल्पनिक बातें नहीं करते, वे इस भूलोक के सर्वोच्च विज्ञान, खगोल और गणित के जीते-जागते प्रामाणिक दस्तावेज हैं।

विडंबना देखिए, आज सनातन का बच्चा-बच्चा पश्चिमी वैज्ञानिकों के नाम रटकर डिग्री ले रहा है, लेकिन उसे यह नहीं पता कि जिन सिद्धांतों को आज हम 'पश्चिम की महान खोज' कहकर चाव से पढ़ रहे हैं, वह और कुछ नहीं बल्कि 'विदेशी चोरों द्वारा की गई हमारे ज्ञान की खुली डकैती' है!

हाँ, मैं इन्हें 'चोर' ही कहूँगी। इन विदेशी विचारकों ने हमारे पावन ग्रंथों से ज्ञान चुराया, उस पर अपने नाम का ठप्पा लगाया, पेटेंट कराया और दुनिया के सामने 'महान खोजकर्ता' बन बैठे। जो चोर हैं, उन्हें इतिहास में चोर ही कहा जाएगा! दुख इस बात का नहीं कि उन्होंने चोरी की, दुख इस बात का है कि हम अपनी ही तिजोरी की चाबी विदेशियों के हाथ में सौंपकर, अपनी अनमोल धरोहर को भूलकर, मानसिक रूप से गुलाम बन बैठे हैं। अब समय आ गया है कि हम अपनी धरोहर के प्रति केवल अंधी आस्था न रखें, बल्कि वैज्ञानिक चेतना के साथ अपनी साख वापस मांगें।

धारावाहिकों और लोककथाओं ने नारद मुनि की एक ऐसी छवि बना दी है जैसे वे केवल 'नारायण-नारायण' करके इधर की बात उधर करने वाले एक संदेशवाहक थे। लेकिन जब आप नारद पुराण के 'वेदांग खंड' को खोलेंगे, तो आपकी आँखें फटी की फटी रह जाएंगी। नारद पुराण वास्तव में ज्ञान का वो अगाध महासागर है जहाँ रेखागणित (Geometry), अंकगणित और खगोल विज्ञान के ऐसे अचूक सूत्र हैं जिन्हें देखकर आधुनिक कंप्यूटर भी पानी मांगने लगें।
इस महापुराण में जटिल आकृतियों का सटीक क्षेत्रफल निकालना, वर्ग को वृत्त में बदलना, 'परार्ध' (1 के बाद 17 शून्य) जैसी अंतरिक्ष को नापने वाली खगोलीय संख्याएं और समय की सबसे सूक्ष्म इकाई 'त्रुटि' (सेकंड का हजारवां हिस्सा) से लेकर अरबों साल के 'महायुग' का ऐसा सटीक गणित है जो पश्चिम की सोच से परे था।

एक इकलौता लेख इस अगाध ज्ञान के साथ न्याय नहीं कर सकता। इसलिए, मैं इस चुराए गए ज्ञान की एक-एक कड़ी को खोलूँगी। हम वारी-वारी से (एक-एक करके) छोटे और तीखे लेखों के माध्यम से इन चोरियों का पर्दाफाश करेंगे। आज इस कड़ी का पहला प्रहार है—पायथागोरस थ्योरम (Pythagoras Theorem) की डकैती!

द राइट एंगल ट्रायंगल: पायथागोरस से सदियों पुराना 'शुल्ब सूत्र' और नारद पुराण का अकाट्य श्लोक
कक्षा छठी से ही बच्चों के दिमाग में एक नाम ठूंस दिया जाता है—Pythagoras Theorem (a^2 + b^2 = c^2)। हमें रटाया जाता है कि एक समकोण त्रिभुज (Right-angled triangle) में आधार और लम्ब के वर्गों का योग उसके कर्ण (Hypotenuse) के वर्ग के बराबर होता है। और यह महान खोज ईसा पूर्व छठी शताब्दी में यूनान के वैज्ञानिक पायथागोरस ने की थी।

अब सुनिए सनातन का वो सच, जो आपसे छुपाया गया:
पायथागोरस के पैदा होने से भी सदियों पहले, जब दुनिया में सभ्यताएं ठीक से सांस लेना भी नहीं सीखी थीं, हमारे ऋषि बौधायन ने अपने 'बौधायन शुल्ब सूत्र' (1.48) में इस सिद्धांत को रेखागणित के व्यावहारिक गद्य रूप में पहले ही लिख दिया था:

"दीर्घचतुरस्रस्याक्ष्णया रज्जुः पार्श्वमानी तिर्यङ्मानी च यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति।"
यानी: एक आयत (Rectangle) का विकर्ण (Diagonal/कर्ण) उतना ही क्षेत्रफल बनाता है, जितना उसकी लंबाई और चौड़ाई वाली भुजाएं अलग-अलग मिलकर बनाती हैं। 

चोरों ने इस व्यावहारिक सूत्र को तो चुराया ही, लेकिन हमारी तिजोरी में इसका एक और चमचमाता हुआ सबूत मौजूद था, जिसे वे देख नहीं पाए। अगर किसी को कल्प-सूत्रों के व्यावहारिक गणित पर संदेह हो, तो वह सीधे नारद पुराण (पूर्वभाग, द्वितीय पाद, श्लोक ४४) खोलकर देख ले। वहाँ यही सिद्धांत बेहद संक्षिप्त और सीधे तौर पर श्लोक में पिरोकर रख दिया गया है:

"भुजकोटिकृतेर्योगमूलं कर्णश्च दोर्भवेत।"
इसका सीधा, सरल और अचूक गणितीय अर्थ समझिए:
'भुज' (Base/आधार) और 'कोटि' (Perpendicular/लम्ब) के 'कृते' (वर्ग) के 'योग' का 'मूल' (Square Root) ही 'कर्ण' (Hypotenuse) होता है!

ऋषि यहीं नहीं रुके, उन्होंने इसके आगे समकोण त्रिभुज की तीनों भुजाओं का मान निकालने का पूरा गणितीय नियम समझाते हुए लिखा कि भुज और कर्ण के वर्ग के अंतर का मूल 'कोटि' होता है, और कोटि और कर्ण के वर्ग के अंतर का मूल 'भुज' होता है। (इसी अचूक सिद्धांत को सदियों बाद भास्कराचार्य ने अपनी प्रसिद्ध गणितीय पुस्तक 'लीलावती' में भी दर्ज किया)।

अब आप ही बताइए, जिसे आज की दुनिया 'पायथागोरस प्रमेय' कहकर एक विदेशी का महिमामंडन कर रही है, उसे हमारा शास्त्र पढ़ने वाला व्यक्ति 'चोर और डकैत' नहीं तो और क्या कहेगा? हमारे पूर्वज जिस गणित से ब्रह्मांडीय वेदियों का निर्माण कर रहे थे, भव्य मंदिरों के ऊंचे शिखरों का सटीक संतुलन बना रहे थे, उसे पश्चिम ने चुराया, अपना नाम दिया और हमें ही हमारी धरोहर पर भिखारी बना दिया। अपनी ही साख और अपनी ही विरासत पर इतनी बेरुखी अब और नहीं चलेगी!

अगले भाग में क्या रहेगा?
चोरी सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं थी। अगली कड़ी में हम पश्चिम के एक और बड़े झूठ का पर्दाफाश करेंगे। १७वीं शताब्दी में ब्लेज पास्कल ने जिस 'पास्कल ट्रायंगल' (Pascal's Triangle) को अपने नाम पर पेटेंट कराया, वह वास्तव में हमारे छंद शास्त्रों और नारद पुराण में सदियों पहले 'मेरु प्रस्तार' के नाम से दर्ज था।
अगले भाग में जानेंगे कि कैसे पहाड़ों की आकृतियों से हमारे ऋषियों ने बाइनरी कॉम्बिनेशन्स का गणित रच दिया था। जुड़े रहिएगा!

रश्मि रति
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(61003)
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नारद पुराण का 'मेरु प्रस्तार', जिसे दुनियाने'पास्कल त्रिकोण' मान लिया ..

भाग-2
नारद पुराण का 'मेरु प्रस्तार', जिसे दुनिया
ने'पास्कल त्रिकोण' मान लिया!

जब भी हम गणित की किताबों में संख्याओं के उस सुंदर, त्रिकोणीय पिरामिड को देखते हैं जिसके किनारे हमेशा '१' से घिरे होते हैं और हर भीतर की संख्या अपने ठीक ऊपर की दो संख्याओं का जोड़ होती है, तो हमारे दिमाग में तुरंत फ्रांस के महान गणितज्ञ ब्लेज पास्कल का नाम कौंध जाता है। हमें सिखाया गया कि १७वीं शताब्दी में पास्कल ने इस जादुई त्रिकोण को दुनिया के सामने रखा, जो आज 'पास्कल ट्रायंगल' के नाम से प्रोबेबिलिटी (संभावना सिद्धांत) और कॉम्बिनेटोरिक्स (क्रमचय-संचय) की रीढ़ बना हुआ है।

​लेकिन अपनी गौरवशाली धरोहर के पन्नों को पलटें तो एक अलग ही सत्य मुस्कुराता हुआ सामने आता है। इतिहास की इस यात्रा में जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि पास्कल से सदियों पहले हमारे ऋषियों और आचार्यों ने इस त्रिकोणीय रहस्य को पूरी तरह सुलझा लिया था। आचार्य पिंगल के 'छंद शास्त्र' और बाद में 'नारद पुराण' में इसी अद्भुत रचना को 'मेरु प्रस्तार' के नाम से विस्तार से पढ़ाया गया था। 'मेरु' यानी पर्वत की तरह उठती हुई एक विशाल संरचना, जिसे संख्याओं के माध्यम से कागज पर उतारा गया था।

​अक्सर आधुनिक मानस में यह धारणा घर कर गई है कि हमारे प्राचीन ग्रंथ और पुराण केवल पूजा-पाठ, कथा-कहानियों और कर्मकांडों की पोटली हैं। लेकिन यह हमारी सबसे बड़ी भूल है। पुराण केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं, बल्कि अपने समय के उन्नत विज्ञान और गणित के जीवंत दस्तावेज हैं। जरा सोचिए, जब पश्चिम बुनियादी गिनती के सामान्य सिद्धांतों को व्यवस्थित करने के लिए संघर्ष कर रहा था, तब भारत के गणितज्ञ छंदों के लघु और गुरु (मात्राओं के संयोजन) को समझने के लिए इस जटिल त्रिकोणीय श्रृंखला का सहजता से उपयोग कर रहे थे। 'मेरु प्रस्तार' की हर पंक्ति में छिपी संख्याएं यह बताती थीं कि किसी भी छंद को कितने अलग-अलग तरीकों से रचा जा सकता है। यह केवल कोरी गणना नहीं थी, बल्कि कला, संगीत और गणित का वह अनुपम संगम था जो हमारी संस्कृति की सूक्ष्म बौद्धिक गहराई को दर्शाता है।

मेरु प्रस्तार और पास्कल त्रिकोण: एक ही सत्य के दो नाम

​जब हम आधुनिक गणित के सूत्रों को प्राचीन मेरु प्रस्तार के साथ रखकर देखते हैं, तो सदियों की दूरी पल भर में मिट जाती है। जिसे आज दुनिया 'पास्कल ट्रायंगल' कहती है, वह असल में आचार्य पिंगल के 'मेरु प्रस्तार' का ही आधुनिक समीकरण रूप है। दोनों की आत्मा, संरचना और सूत्र बिल्कुल एक हैं।

​आइए इसे सीधे गणित के दर्पण में देखते हैं:

​१. त्रिकोण बनाने का नियम
​पास्कल ट्रायंगल बनाने का सबसे बुनियादी नियम यह है कि किसी भी पंक्ति (Row) की संख्या अपने ठीक ऊपर की दो संख्याओं का जोड़ होती है।

पिंगल का नियम (ईसा पूर्व दूसरी सदी):

​आचार्य पिंगल ने इसे अत्यंत सरल शब्दों में संस्कृत सूत्र के रूप में लिखा था:

​"परे पूर्णमिति"

(अर्थात् पिछले दो खानों की संख्याओं को जोड़कर अगला पूर्ण करो)

पास्कल का सूत्र (१७वीं शताब्दी):
​इसी प्राचीन नियम को आज आधुनिक बीजगणित (Algebra) में इस सूत्र से दर्शाया जाता है:

{n /k} = {n-1/ k-1} + {n-1 k}
      (देखें चित्र :1)

यहाँ n पंक्ति को और k उसके स्थान को दिखाता है। दोनों ही नियमों का परिणाम बिल्कुल एक समान है—एक ऐसा सुंदर त्रिकोण जिसमें हर संख्या अपने ऊपर के दो कंधों का भार उठाती है:
       (देखें चित्र:2)

२.संयोजनों का गणित (Combinatorics)

​चाहे कविता के छंदों में अक्षरों का उतार-चढ़ाव देखना हो या आधुनिक गणित में 'कॉम्बिनेशंस' (सयोंजन) का पता लगाना हो, दोनों का गणितीय आधार एक ही है।

​आधुनिक सूत्र:
​गणित में n वस्तुओं में से r वस्तुओं को चुनने का सूत्र है:
       (देखें चित्र:3)

मेरु प्रस्तार का सामंजस्य:

​आचार्य पिंगल ने इसका उपयोग छंदों के वर्गीकरण के लिए किया था। यदि हमें 4 अक्षरों के कुल छंद बनाने हों, तो मेरु प्रस्तार की चौथी पंक्ति हमें सीधे कुल संयोजन बता देती है:
       (देखें चित्र:4)

​३. द्विपद प्रमेय (Binomial Expansion) का रहस्य
​जब १०वीं शताब्दी में गणितज्ञ हलायुध ने पिंगल के सूत्रों की व्याख्या की, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि मेरु प्रस्तार का उपयोग समीकरणों के गुणांक (coefficients) निकालने के लिए किया जाता है:
        (देखें चित्र 5)

जब हम इन समीकरणों को खोलते हैं, तो मेरु प्रस्तार की संख्याएं अपने आप बाहर आ जाती हैं:
         (देखें चित्र:6)

पिंगल का 'मेरु प्रस्तार' और पास्कल का 'ट्रायंगल' गणितीय रूप से पूरी तरह समान हैं। पिंगल ने इसे कविता और संगीत की लयबद्धता को मापने के लिए खोजा था, और पास्कल ने इसे शुद्ध गणितीय संभावनाओं के लिए। यह एक ही सत्य के दो छोर हैं, जो हमारी प्राचीन बौद्धिक क्षमता का लोहा मनवाते हैं।

अपनी इस अतुल्य थाती को पहचानना और उस पर गर्व करना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जब हम 'मेरु प्रस्तार' के इस गणितीय सौंदर्य को देखते हैं, तो हमारा मस्तक गर्व से ऊंचा हो जाता है कि हमारे पूर्वजों ने ज्ञान के उस स्तर को छुआ था जो आज भी आधुनिक विज्ञान को विस्मित करता है। यह धरोहर हमारी है, और इसका गौरव भी हमारा ही है।

​अगले भाग की एक झलक:
मेरु प्रस्तार की इस सुंदर यात्रा के बाद, गणित के अगले भाग में हम चलेंगे उस रहस्यमयी खोज की ओर, जिसके बिना ब्रह्मांड के गोल चक्कर और पहिये अधूरे हैं। क्या सचमुच 'पाई' की खोज और वृत्त के क्षेत्रफल का वह सूक्ष्म गणित केवल पश्चिम की देन है? या फिर हमारे पुराणों में 'चौकोर वेदी' को 'गोल वेदी' में बदलने का वह सटीक रहस्य पहले से दर्ज था, जिसे आज 'Squaring the Circle' कहा जाता है? जानेंगे अगले लेख में!

रश्मि रति
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(61021)
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Sunday, 19 July 2026

व्यवहार की सिद्धि आयु एवं ओज की वृद्धि के लिए श्रेष्ठ नाम होना चाहिए।

#बच्चों का नाम रखने के #विषय में समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को न जाने हो क्या गया है? लगता है जैसे #वर्तमान समाज #पथभ्रष्ट एवं #दिग्भ्रमित हो गया है........

एक #सज्जन ने अपने बच्चों से परिचय करवाया, और बताया कि मेरी पोती का नाम "#अवीरा" रखा है, बड़ा ही यूनिक नाम रखा है........

यह पूछने पर कि इसका #अर्थ क्या है, वे बोले कि बहादुर, ब्रेव, कॉन्फिडेंशियल, सुनते ही मेरा दिमाग चकरा गया, फिर वे बोले अब कृपा करके बतायें आपको कैसा लगा? ..........

मैंने कहा बन्धु #अवीरा तो बहुत ही #अशोभनीय नाम है नहीं रखना चाहिए #मैंने उनको बताया कि..........

1. जिस #स्त्री के पुत्र और पति न हों, पुत्र और पतिरहित (स्त्री) को अवीरा कहते है।

2. #स्वतंत्र स्त्री का नाम होता है अवीरा। जिसके बारे में शास्त्रों में लिखा गया है कि........

"नास्ति वीरः #पुत्त्रादिर्यस्याः सा अवीरा"...........

उन्होंने बच्ची के नाम का अर्थ सुना तो बेचारे मायूस हो गये, बोले महोदय क्या करें अब तो स्कूल में भी यही नाम हैं बर्थ सर्टिफिकेट में भी यही नाम है, क्या करें?......

#आजकल लोग कुछ नया करने की ट्रेंड में कुछ भी अनर्गल करने लग गये हैं जैसे कि पुत्री हो तो मियारा, शियारा, कियारा, नयारा, मायरा तो अल्मायरा आदि। और पुत्र हो तो वियान, कियान, गियान, केयांश, रेयांश आदि आदि, और तो और जब इन शब्दों के अर्थ पूछो तो कुछ अता पता नहीं है।

और उत्तर आएगा "इट मीन्स रे ऑफ लाइट" "इट मीन्स गॉड्स फेवरेट" "इट मीन्स ब्ला ब्ला"। नाम को यूनिक रखने के फैशन के दौर में एक सज्जन ने अपनी गुड़िया का नाम रखा "#श्लेष्मा"........

#स्वाभाविक था कि नाम सुनकर मैं सदमें जैसी अवस्था में पहुंच गया था। सदमे से बाहर आने के लिए मन में विचार किया कि हो सकता है इन्होंने कुछ और बोला हो या इनको इस शब्द का अर्थ पता नहीं होगा तो मैं पूछ बैठा "अच्छा? श्लेष्मा! इसका अर्थ क्या होता है? 

तो महानुभाव नें बड़े ही कॉन्फिडेंस के साथ उत्तर दिया "श्लेष्मा" का अर्थ होता है "जिस पर मां की कृपा हो", मैं सर पकड़ कर मौन बैठा रहा।

मेरे भाव देख कर उनको यह लग चुका था कि कुछ तो गड़बड़ कह दिया है, तो पूछ बैठे, क्या हुआ मैंने कुछ गलत तो नहीं कह दिया? 

#मैंने कहा बन्धु तुरन्त प्रभाव से बच्ची का नाम बदलो क्योंकि श्लेष्मा का अर्थ होता है "नाक का बहता हुआ कचरा" उसके बाद जो होना था सो हुआ............

#यही हालात है समाज के एक बहुत बड़े वर्ग की। फैशन के दौर में फैंसी, फटे और अधनंगे कपड़े पहनते पहनते अर्थहीन, अनर्थकारी, बेढंगे शब्द समुच्चयों का प्रयोग समाज अपने कुलदीपकों के नामकरण हेतु करने लगा है।

#अशास्त्रीय नाम न केवल सुनने में विचित्र लगता है, बालकों के व्यक्तित्व पर भी अपना विचित्र प्रभाव डालकर व्यक्तित्व को लुंज पुंज करता है। इसके तात्कालिक कुप्रभाव भी हैं, साथ ही भाषा की संकरता और दरिद्रता इसका दूरस्थ कुप्रभाव है।

#परंपरागत रूप से, नाम रखने का अधिकार दादा-दादी, बुआ, तथा गुरुओं का होता था। यह कार्य उनके लिए ही छोड़ देना हितकर है।

#आप जब दादा दादी बनेंगे, तब यह कर्तव्य ठीक प्रकार से निभा पाएं उसके लिए आप अपनी मातृभाषा पर कितनी पकड़ रखते हैं अथवा उस पर पकड़ बनाने के लिए क्या कर रहे हैं, यह विचार अवश्य करें। अन्यथा आने वाली पीढ़ियों में आपके परिवार में भी कोई "श्लेष्मा" हो सकती है, कोई अवीरा भी हो सकती है।

#शास्त्रों में लिखा है कि व्यक्ति का जैसा नाम है, समाज में उसी प्रकार उसका सम्मान और उसका यश कीर्ति बढ़ाने में वह महत्वपूर्ण कारक होता है, जैसे........

#नामाखिलस्य व्यवहारहेतु: शुभावहं कर्मसु भाग्यहेतु:।
नाम्नैव कीर्तिं लभते #मनुष्य-स्तत: प्रशस्तं खलु नामकर्म।

स्मृति संग्रह में बताया गया है कि व्यवहार की सिद्धि आयु एवं ओज की वृद्धि के लिए श्रेष्ठ नाम होना चाहिए।

#आयुर्वर्चो sभिवृद्धिश्च सिद्धिर्व्यवहृतेस्तथा,
नामकर्मफलं त्वेतत् समुद्दिष्टं मनीषिभि:।

नाम कैसा हो, नाम की संरचना कैसी हो इस विषय में गृह्यसूत्रों एवं स्मृतियों में विस्तार से प्रकाश डाला गया है। #पारस्करगृह्यसूत्र 1/7/23 में बताया गया है कि...

द्व्यक्षरं चतुरक्षरं वा घोषवदाद्यंतरस्थं।
दीर्घाभिनिष्ठानं कृतं कुर्यान्न तद्धितम्।
#अयुजाक्षरमाकारान्तम् स्त्रियै तद्धितम्॥

इसका तात्पर्य यह है कि #बालक का नाम दो या चार अक्षरयुक्त होना चाहिए। पहला अक्षर घोष वर्ण युक्त, वर्ग का तीसरा चौथा पांचवा वर्ण, मध्य में अंतस्थ वर्ण, य र ल व आदि और नाम का अंतिम वर्ण दीर्घ एवं कृदन्त हो तद्धितान्त न हो। तथा कन्या का नाम विषमवर्णी तीन या पांच अक्षर युक्त, दीर्घ आकारांत एवं तद्धितान्त होना चाहिए।

धर्मसिंधु में चार प्रकार के नाम बताए गए हैं 1-देवनाम 2-मासनाम 3-नक्षत्रनाम 4-व्यावहारिक नाम। 

उनमें ऐसा भी जोर देकर कहा गया है कि कुंडली के नाम को व्यवहार में बोलता नाम नहीं रखना चाहिए। जो नक्षत्र नाम होता है उसको गुप्त रखना चाहिए। क्योंकि यदि कोई हमारे ऊपर अभिचार कर्म मारण, मोहन, वशीकरण इत्यादि दुर्भावना से कार्य करना चाहता है तो उसके लिए नक्षत्र नाम की, यानि जन्म के समय के नक्षत्र अनुसार नाम की आवश्यकता होती है। जबकि व्यवहार नाम पर तंत्र का असर नहीं होता, इसीलिए कुंडली का जन्म नाम गुप्त होना चाहिए।

हमारे शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि बच्चे का नाम मंगल सूचक, आनंद सूचक, बल रक्षा और शासन क्षमता का सूचक, ऐश्वर्य सूचक, पुष्टियुक्त अथवा सेवा आदि गुणों से युक्त होना चाहिए।

शास्त्रीय नाम की हमारे सनातन धर्म में बहुत उपयोगिता है। मनुष्य का जैसा नाम होता है वैसे ही गुण उसमें विद्यमान होते हैं या विकसित होने की संभावना प्रबल होती है।

बच्चों का नाम लेकर पुकारने से उनके मन पर उस नाम का बहुत असर पड़ता है और प्रायः उसी के अनुरूप चलने का प्रयास भी होने लगता है। इसीलिए नाम में यदि उदात्त भावना होती है तो बालकों में यश एवं भाग्य का उदय अवश्य ही संभव है।

हमारे धर्म में अधिकांश लोग अपने पुत्र पुत्रियों का नाम भगवान के नाम पर रखना शुभ समझते हैं, ताकि इसी बहाने प्रभु के नाम का उच्चारण हो जाए।

भाय कुभाय अनख आलसहू।
नाम जपत मंगल दिसि दसहू॥

विडंबना यह है की आज पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण में नाम रखने का संस्कार मूलरूप से प्रायः समाप्त होता जा रहा है। सयुंक्त परिवार में रहने कि प्रथा अब लगभग अंतिम साँसे ले रही है। अन्यथा मुझे याद है कि घरों में नाम रखे जाने की भी एक विशेष रस्म होती थी जिसमे घर में दादा, दादी, बुआ अथवा उनकी अनुपस्थिति में घर का अन्य कोई वरिष्ठ, बच्चे को गोद में लेकर, श्री गणेश का स्मरण करते हुए, छोटी घंटी बजाते हुए, बच्चे के कान के पास अपना मुंह ले जाकर, उसका निर्धारित किया हुआ नाम पुकारते थे ताकि अपने नाम का पहला श्रोता वो बच्चा खुद रहे।

अब चूंकि घर में वरिष्ठों की उपस्थिति या दखलंदाजी न के बराबर है और अगर है भी, तो भी उनका सुझाया हुआ नाम, या मार्गदर्शन को सुनता ही कौन है।

फिर भी अगर नई पीढ़ी में कोई आपकी सुन रहा है तो उसे जरूर बताएं कि नाम ऐसा रखना ठीक होता है जो सकारात्मक और अर्थपूर्ण हो, उल्लासमय हो, आसानी से उच्चारित हो सके और लिखा जा सके।

बालकों के नाम ईश्वर और प्रकृति के विभिन्न सुंदर भावों का समावेश या प्रतिनिधित्व करने वाला हों, इसी में समाज की भलाई है, इसी में कल्याण है।

                 🙇 #जयश्रीसीताराम 🙇

Saturday, 18 July 2026

रिपीटेशन ( बार बार दोहराने) का प्रभाव

जब कोई व्यक्ति एक ही विचार को बार-बार सोचता है, एक ही वाक्य को बार-बार दोहराता है, एक ही प्रार्थना को रोज़ बोलता है, एक ही मंत्र का जप करता है या किसी इच्छा को बार-बार महसूस करता है, तब वह केवल शब्द नहीं दोहरा रहा होता, बल्कि अपने मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र और अवचेतन मन के भीतर एक नया मार्ग बना रहा होता है। मनुष्य का मस्तिष्क स्थिर नहीं है। उसमें अरबों न्यूरॉन्स होते हैं और ये न्यूरॉन्स आपस में निरंतर नए संबंध बनाते और पुराने संबंधों को तोड़ते रहते हैं। न्यूरोसाइंस में एक सिद्धांत है—"जो न्यूरॉन्स साथ सक्रिय होते हैं, वे साथ जुड़ जाते हैं।" इसका अर्थ है कि जिस विचार, भावना या विश्वास को आप बार-बार दोहराते हैं, मस्तिष्क उसे महत्वपूर्ण मानकर उसके लिए एक मजबूत न्यूरल मार्ग बनाना शुरू कर देता है। यही कारण है कि यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक स्वयं से कहता रहे, "मैं योग्य नहीं हूँ", "मेरे साथ अच्छा नहीं होता", "मैं असफल हूँ", तो धीरे-धीरे यह केवल एक विचार नहीं रहता, बल्कि उसकी पहचान बन जाता है। उसका अवचेतन मन इसे सत्य मान लेता है और उसका व्यवहार, निर्णय, संबंध और प्रतिक्रियाएँ उसी विश्वास के अनुसार चलने लगती हैं। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति प्रेम, आत्मविश्वास, समृद्धि और शांति से जुड़े विचारों को बार-बार दोहराता है और उन्हें भावनात्मक रूप से महसूस भी करता है, तो धीरे-धीरे उसके भीतर नई मानसिक संरचना बनने लगती है। यही कारण है कि केवल एक बार कोई सकारात्मक वाक्य बोल देने से जीवन नहीं बदलता, लेकिन निरंतर दोहराव धीरे-धीरे अवचेतन मन की मिट्टी में एक नया बीज बो देता है। लेकिन यहाँ एक और गहरा रहस्य है। केवल रिपीटेशन पर्याप्त नहीं है; उसके साथ भावना का जुड़ना आवश्यक है। अवचेतन मन तर्क की भाषा से अधिक भावनाओं की भाषा समझता है। यदि कोई व्यक्ति सौ बार कहे, "मैं खुश हूँ", लेकिन भीतर दुख, भय और असुरक्षा महसूस कर रहा हो, तो अवचेतन मन शब्दों की नहीं, बल्कि भावनात्मक अवस्था की छाप ग्रहण करेगा। इसी कारण दो लोग एक ही पुष्टि-वाक्य बोलते हैं, लेकिन परिणाम अलग होते हैं। एक व्यक्ति उसे केवल शब्द की तरह दोहराता है, जबकि दूसरा व्यक्ति उसे महसूस भी करता है। अवचेतन मन के लिए भावना एक प्रकार का संकेत है, जो उसे बताता है कि यह अनुभव महत्वपूर्ण है और इसे स्मृति तथा पहचान का भाग बनाना चाहिए। इसी कारण जीवन की सबसे गहरी स्मृतियाँ वे होती हैं जिनसे कोई प्रबल भावना जुड़ी होती है। बचपन की कोई घटना, कोई अपमान, कोई प्रेम, कोई दुर्घटना या कोई बड़ी सफलता वर्षों बाद भी याद रहती है, क्योंकि उसके साथ गहरी भावना जुड़ी थी। भावना मस्तिष्क पर एक गहरी छाप छोड़ती है और वही छाप अवचेतन मन का हिस्सा बन जाती है। यही सिद्धांत मंत्रों के पीछे भी कार्य करता है। बहुत लोग सोचते हैं कि मंत्रों में केवल शब्दों का जादू है, लेकिन मंत्र का विज्ञान इससे कहीं अधिक गहरा है। जब कोई व्यक्ति किसी मंत्र का बार-बार जप करता है, तब तीन बातें एक साथ घटित होती हैं। पहली, उसका ध्यान बार-बार एक ही ध्वनि पर लौटता है, जिससे मन की भटकती हुई ऊर्जा एक दिशा में आने लगती है। दूसरी, एक ही ध्वनि की पुनरावृत्ति मस्तिष्क की तरंगों को धीरे-धीरे शांत करती है। तीसरी, यदि मंत्र श्रद्धा, भाव और समर्पण के साथ किया जाए, तो उसके साथ जुड़ी भावनाएँ अवचेतन मन पर गहरी छाप छोड़ने लगती हैं। यही कारण है कि हजारों वर्षों से विभिन्न परंपराओं में मंत्र-जप को केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि मानसिक रूपांतरण की प्रक्रिया माना गया है। मंत्र के पीछे ध्वनि का विज्ञान भी कार्य करता है। इस ब्रह्मांड में सब कुछ कंपन है और ध्वनि स्वयं एक कंपन है। जब एक विशेष ध्वनि को बार-बार दोहराया जाता है, तो उसका प्रभाव केवल कानों तक सीमित नहीं रहता। वह मन की गति, श्वास की लय और तंत्रिका तंत्र की अवस्था को भी प्रभावित करता है। यदि आपने कभी लंबे समय तक "ॐ" का उच्चारण किया हो, तो आपने अनुभव किया होगा कि कुछ समय बाद मन अधिक शांत, स्थिर और विस्तृत महसूस होने लगता है। इसका कारण यह है कि रिपीटेशन मन की बिखरी हुई ऊर्जा को एक केंद्र देता है और भावना उसे गहराई प्रदान करती है। यहाँ एक और रहस्य समझना आवश्यक है। हमारा अवचेतन मन दिन-रात रिपीटेशन के आधार पर ही काम करता है। आपकी आदतें रिपीटेशन हैं, आपका व्यक्तित्व रिपीटेशन है, आपकी प्रतिक्रियाएँ रिपीटेशन हैं और यहाँ तक कि आपका आत्म-चित्र भी रिपीटेशन का परिणाम है। यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक स्वयं को कमजोर मानता रहा है, तो उसने वास्तव में कमजोरी का मानसिक अभ्यास किया है। यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक भय में जीता रहा है, तो उसने भय के न्यूरल मार्गों को मजबूत किया है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन शांति, आत्मविश्वास और जागरूकता का अभ्यास करता है, तो वह अपने मस्तिष्क और अवचेतन मन को नए ढंग से प्रशिक्षित कर रहा होता है। रिपीटेशन और भावना का एक और गहरा प्रभाव हमारी पहचान पर पड़ता है। मनुष्य वह नहीं बनता जो वह कभी-कभी सोचता है; वह वही बनता है जिसे वह बार-बार सोचता, महसूस करता और जीता है। यदि किसी विचार को लंबे समय तक दोहराया जाए, तो वह विश्वास बन जाता है; विश्वास लंबे समय तक बना रहे, तो वह पहचान बन जाता है; और पहचान धीरे-धीरे व्यवहार तथा जीवन का रूप ले लेती है। यही कारण है कि बचपन में बार-बार सुनी गई बातें हमारे व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित करती हैं। यदि किसी बच्चे से बार-बार कहा जाए कि वह बुद्धिमान है, योग्य है और प्रेम के योग्य है, तो उसका आत्म-चित्र अलग बनता है। यदि उससे बार-बार कहा जाए कि वह अयोग्य है, कमजोर है या किसी काम का नहीं है, तो उसका आत्म-चित्र अलग बनता है। इसीलिए आध्यात्मिक परंपराओं में जप, प्रार्थना, संकल्प और ध्यान में पुनरावृत्ति को इतना महत्व दिया गया है। बार-बार दोहराई गई ध्वनि मन को एकाग्र करती है, बार-बार दोहराया गया संकल्प अवचेतन मन में नया बीज बोता है और बार-बार महसूस की गई भावना हमारे भीतर नई पहचान का निर्माण करती है। लेकिन इसका सबसे गहरा उद्देश्य केवल इच्छाएँ पूरी करना नहीं है। इसका अंतिम उद्देश्य मन की बिखरी हुई ऊर्जा को एक केंद्र देना है। जब मन एक दिशा में बार-बार लौटता है, तब उसके भीतर शांति आने लगती है। जब शांति आती है, तब व्यक्ति पहली बार अपने विचारों और भावनाओं से थोड़ा अलग होकर उन्हें देख पाता है। और जब वह उन्हें देखने लगता है, तब उसके भीतर साक्षीभाव का जन्म होता है।
अंततः रिपीटेशन का सबसे बड़ा रहस्य यह नहीं कि हम किसी वाक्य को हजार बार दोहराएँ, बल्कि यह है कि हम अपने भीतर किस अवस्था को बार-बार जी रहे हैं। क्योंकि अवचेतन मन शब्दों से कम और अनुभवों से अधिक सीखता है। आप जिस भावना को बार-बार जीते हैं, आप जिस विचार को बार-बार महत्व देते हैं, आप जिस पहचान को बार-बार महसूस करते हैं, धीरे-धीरे वही आपका आंतरिक सत्य बन जाती है। इसलिए यदि मनुष्य सचेत रूप से अपने विचारों, भावनाओं, मंत्रों, प्रार्थनाओं और संकल्पों का उपयोग करना सीख ले, तो वह केवल अपनी आदतें ही नहीं बदलता, बल्कि अपने पूरे मानसिक संसार को बदलने की दिशा में कदम रखता है। और जब भीतर का संसार बदलने लगता है, तब जीवन को देखने, जीने और अनुभव करने का पूरा तरीका भी बदलने लगता है।

Adity Thakur