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Friday, 19 June 2026

जीवन में कती ही मोटो संकट क्युं न होवे, जे थे उणने बल सूं नहीं बल्कि बुद्धि और सामने वाले री कमजोरी (मनोविज्ञान) सूं हल करो, तो बडे सूं बडो काम भी चुटकियों में पूरो हो जावे है।

पाली रे धोरा री तलहटी में एक गांव हो—"रूपावास"। उण गांव में एक **पन्ना** नाम रो अठारह-बीस साल रो राईका (चरवाहा) रहवतो। पन्ना पैदाइशी होशियार हो, उणने जंगळ रे हर जानवर री बोली, हवा रो रुख और मिनख रो चेहरो पढ़नो घणो आछो सूं आवतो। वे कवे नी कि—*"चरवाहे री आंख्यां में पूरो जंगळ होवे।"*
उण गांव रे ठाकुर सा'ब, **ठाकुर भानू प्रताप सिंह**, घणा कड़क मिजाज रा हा, पण न्यायप्रिय हा। ठाकुर सा'ब कनै एक घणो मोटो, काळो-शाह और भयंकर **'बाहुबली' सांड** हो। वो सांड ठाकुर सा'ब ने घणो प्यारो हो, पण उणरो मिजाज घणो नटखट और गुस्सैल हो।
एक दिन, उण सांड ने क्युं हुओ कि वो गांव री सीमा लांघकर पास वाले दूसरे गांव "भैंसवाड़ा" रे ठाकुर री बाड़ी (खेत) में घुस गयो और उणरी कती फसल खराब कर दीनी। भैंसवाड़ा रे ठाकुर इण बात सूं घणा रीस (गुस्सा) में आ गया और उण सांड ने अपणे अहाते में बंधवा लियो।
### **शर्त और ठाकुर सा'ब री मूंछ री बात**
भैंसवाड़ा रा ठाकुर कयो—*"जे रूपावास रा ठाकुर अपणो सांड पाछो चावे है, तो उणने खुद अठै आवणो पड़ेगा। और म्हारो एक नियम है—म्हारी सभा में जो भी मिनख उण सांड सूं बिना लाठी छुए, बिना रस्सा बांधे, सिर्फ बातां सूं उणने अठै सूं खड़ो कर देवेला, उणने ही सांड पाछो सुपुर्द करूँला। नहीं तो सांड म्हारे अठै ही चक्की पीसेला!"*
आ बात रूपावास रे ठाकुर सा'ब री मूंछ (इज्जत) माथे आ गई। गांव रे कती तगड़ा-तगड़ा मिनख गया, सांड सामी जाकर जोर-जोर सूं आवाज लगाई, पण सांड तो आंख्यां लाल करबा लागो और उठे सूं हिल्यो ही कोनी।
ठाकुर सा'ब घणा उदास हो गया। तब पन्ना चरवाहा ठाकुर सा'ब कनै आयो और बोल्यो—*"हुकम! जे थारी आज्ञा होवे, तो मैं उण दूसरे गांव जाऊं और सांड ने राजी-खुशी पाछो ले आऊं?"*
ठाकुर सा'ब देख्यो कि ओ छोटा सो लड़को काईं करेला, पण रस्तो कोई कोनी हो। उण कयो—*"जा पन्ना, जे तूं सांड लाय दियो, तो थने पांच बीघा जमीन इनाम में देऊंला।"*
### **पन्ना री चतुराई और 'सांड रो कान'**
पन्ना हाथ में सिर्फ अपणी बांस री बांसुरी (अळगोजा) लेकर भैंसवाड़ा गांव री सभा में पहुंच्यो। उठे कती लोग तमाशा देखबा वास्ते भेळा होय राख्या हा। सांड गुस्से में बीच मैदान में बैठ्यो हो।
भैंसवाड़ा रा ठाकुर हंसिया और बोल्या—*"अरे टाबर! इण सांड सूं दूर रहजै, ओ तने धोरा में फेंट देवेला।"*
पन्ना हँस्यो और बोल्यो—*"ठाकुर सा'ब, नेम (नियम) मुजब मैं इणने बिना हाथ लगाये अठै सूं खड़ो कर दूँ, तो ओ म्हारो हुओ नी?"* ठाकुर कयो—*"हां, बिलकुल!"*
पन्ना चुपचाप सांड कनै गयो। उणने कोई लाठी कोनी दिखाई, ना कोई डरायो। उण सांड रे बिलकुल कान कनै अपणो मूंडो कीनो और धीमे सूं कुछ कयो।
जैसे ही पन्ना उणरे कान में कुछ बोल्यो, सांड रे कान कड़क हुया, उण अपणी पूंछ हिलाई और वो झटके सूं खड़ो हो गयो! सिर्फ खड़ो ही कोनी हुओ, वो पन्ना रे लारे-लारे (पीछे-पीछे) ज्यूं सीधा गाय री त्यूं चालण लागगो।
पूरी सभा दंग रह गई! भैंसवाड़ा रा ठाकुर आंख्यां फाड़कर देखता रह गया। पन्ना सांड ने लेकर राजी-खुशी रूपावास पाछो आ गयो।
### **कान में काईं कयो हो?**
जब रूपावास में सांड पाछो आयो, तो ठाकुर सा'ब री छाती चौड़ी हो गई। उण पूरे गांव में मिठाई बंटवाई और पन्ना ने पांच बीघा जमीन रो पट्टो दियो।
ठाकुर सा'ब सूं रह्यो कोनी गयो, उण पन्ना ने पास बुलायो और धीरे सूं पूछ्यो—*"पन्ना, सब बातां एक कानी, पण म्हाने ओ तो बता कि तूं उण गुस्सैल सांड रे कान में ऐड़ो काईं कयो कि वो एक झटके में खड़ो हो गयो?"*
पन्ना हाथ जोड़कर हंसकर बोल्यो:
> *"हुकम! मैं उणरे कान में बस इत्ती सी बात साची-साची कह दीनी ही कि—'अरे काळू! अठै बैठो-बैठो काईं मूंछ मरोड़े? थारा मालिक ठाकुर सा'ब थने बेचकर थारे बदले **एक नई भैंस** लावण री बात कर रह्या है, जे अबार खड़ो नी हुओ, तो थारी जगह बा लेवेली!'"*
ठाकुर सा'ब ओ सुणकर जोर सूं हंस पड़्या। उण कयो कि सांड भी अपणी इज्जत वास्ते उठ गयो!
## **कहाणी री सीख**
**"अक्कल बड़ी कि भैंस (या सांड)!"** जीवन में कती ही मोटो संकट क्युं न होवे, जे थे उणने बल सूं नहीं बल्कि बुद्धि और सामने वाले री कमजोरी (मनोविज्ञान) सूं हल करो, तो बडे सूं बडो काम भी चुटकियों में पूरो हो जावे है।
कहाणी कीकर लागी भाई?

साभार - Sushimarwari 

Thursday, 18 June 2026

क्रेडिट खोर गांधी और महान लेखक आचार्य चतुरसेन

क्रेडिट खोर गांधी और महान लेखक आचार्य चतुरसेन
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'बापू, यह हैं आचार्य चतुरसेन, महान इतिहासकार और लेखक,'
जमनालाल बजाज ने महात्मा गांधी से चतुरसेन का परिचय कराते हुए आगे कहा, 'आपने कहा था ना नवजीवन के लिए संपादक चाहिए, यह सबसे योग्य पात्र हैं, इन्हें दे दीजिए यह कार्यभार।'

'नमस्ते बापू' आचार्य चतुरसेन ने गांधी का अभिवादन किया
'नमस्ते शब्द में वेदों की बू आती है, यह ठीक नहीं है।' गांधी बोले।

'जी,' आचार्य चतुरसेन आगे बोले, 'तो फिर राम—राम बापू।'
'देखे राम—राम बोलना हिन्दू—मुस्लिम एकता के लिए सही नहीं है।' गांधी जी ने फिर कहा।

'वंदेमातरम बापू।' आचार्य जी ने पुन: अभिवादन किया।
'नहीं वंदेमातरम् भी सही नहीं है, इसमें बुतपरस्ती की बू आती है। हमें आजादी चाहिए तो ऐसी भाषा का प्रयोग करना होगा, जिससे मुस्लिमों को ठेस न पहुंचे।'

'जय बापू।'
'हूं,' गांधी फिर आगे बोले, 'हम तुम्हें नवजीवन का संपादक बनाते हैं, एक हजार वेतन मिलेगा। सबकुछ तुम्हें ही करना होगा। मेरे नाम से लेख लिखने होंगे, न्यूज छापनी होंगी, मेरे भाषण लिखकर देने होंगे। और हां संपादक में मेरा नाम जाएगा, तुम किसी से यह नहीं कहोगे कि यह सब तुम करते हो।'

'बापू मैं सबकुछ करने को तैयार हूं, लेकिन संपादक में मेरा नाम जाना चाहिए, आपका नहीं।'

'नहीं यह नहीं हो सकता।' गांधी ने विरोध किया।

'तो फिर यह आचार्य चतुरसेन भी ऐसे स्वार्थी और तुष्टिकरण करने वाले को जीवन में कभी बापू नहीं कहेगा और तुम्हारे दर्शन आज के बाद नहीं करेगा।' कहकर आचार्य चतुरसेन चले गए।

आचार्य चतुरसेन ने जीवन में फिर कभी गांधी के दर्शन नहीं किए।

(आचार्य चतुरसेन की आत्मकथा का एक अंश)

देवी देवताओं की सवारी क्यों होते हैं पशु पक्षी ?

देवी देवताओं की सवारी क्यों होते हैं पशु पक्षी ?
हर देवी और देवता का एक वाहन होता है। खास बात ये है कि इनके वाहन के लिए पशु-पक्षियों को चुना गया है। क्या आप जानते हैं इसके पीछे क्या कहानी है क्यों देवी-देवता की सवारी के लिए पशु-पक्षियों को ही चुना गया।
अध्यात्मिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक कारणों से भारतीय मनीषियों ने देवताओं के वाहनों के रूप में पशु-पक्षियों को जोड़ा। माना जाता है कि देवताओं के साथ पशुओं को उनके व्यवहार के अनुरूप जोड़ा गया है।
अगर पशुओं को भगवान के साथ नहीं जोड़ा जाता तो शायद पशु के प्रति हिंसा का व्यवहार और ज्यादा होता। भारतीय मनीषियों ने प्रकृति और उसमें रहने वाले जीवों की रक्षा का एक संदेश दिया है। हर पशु किसी न किसी भगवान का प्रतिनिधि है, उनका वाहन है, इसलिए इनकी हिंसा नहीं करनी चाहिए।
ज्ञान की देवी मां सरस्वती के लिए का वाहन हंस माना जाता है। हंस पवित्र, जिज्ञासु और समझदार पक्षी होता है। हंस अपने चुने हुए स्थानों पर ही रहता है। तीसरी इसकी खासियत हैं कि यह अन्य पक्षियों की अपेक्षा सबसे ऊंचाई पर उड़ान भरता है और लंबी दूरी तय करने में सक्षम होता है।
     भगवान शिव का वाहन माना जाता है नंदी। विश्‍व की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में बैल को महत्व दिया गया है। सुमेरियन, बेबीलोनिया, असीरिया और सिंधु घाटी की खुदाई में भी बैल की मूर्ति पाई गई है। इससे प्राचीनकल से ही बैल को महत्व दिया जाता रहा है। भारत में बैल खेती के लिए हल में जोते जाने वाला एक महत्वपूर्ण पशु रहा है।
देवी-देवताओं ने अपनी सवारी बहुत सोच समझकर चुनी। उनके वाहन उनकी चारित्रिक विशेषताओं को भी बताते हैं। 
शिवपुत्र गणेशजी का वाहन है मूषक मूषक शब्द संस्कृत के मूष से बना है जिसका अर्थ है लूटना या चुराना।
सांकेतिक रूप से मनुष्य का दिमाग मूषक, चुराने वाले यानी चूहे जैसा ही होता है। यह स्वार्थ भाव से गिरा होता है। गणेशजी का चूहे पर बैठना इस बात का संकेत है कि उन्होंने स्वार्थ पर विजय पाई है और जनकल्याण के भाव को अपने भीतर जागृत किया है।
          विष्णु का वाहन गरूड़:- 
लुप्त हो रहा है गरूड़। माना जाता है कि गिद्धों (गरूड़) की एक ऐसी प्रजाति थी, जो बुद्धिमान मानी जाती थी और उसका काम संदेश को इधर से उधर ले जाना होता था, जैसे कि प्राचीनकाल से कबूतर भी यह कार्य करते आए हैं। भगवान विष्णु का वाहन है गरूड़। 
प्रजापति कश्यप की पत्नी विनता के 2 पुत्र हुए- गरूड़ और अरुण। गरूड़जी विष्णु की शरण में चले गए और अरुणजी सूर्य के सारथी हुए। सम्पाती और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे।
राम के काल में सम्पाती और जटायु की बहुत ही चर्चा होती है। ये दोनों भी दंडकारण्य क्षेत्र में रहते थे, खासकर मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में इनकी जाति के पक्षियों की संख्या अधिक थी। छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य में गिद्धराज जटायु का मंदिर है। स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे इसीलिए यहां एक मंदिर है।
दूसरी ओर मध्यप्रदेश के देवास जिले की तहसील बागली में ‘जटाशंकर’ नाम का एक स्थान है जिसके बारे में कहा जाता है कि गिद्धराज जटायु वहां तपस्या करते थे। जटायु पहला ऐसा पक्षी था, जो राम के लिए बलिदान हो गया था। जटायु का जन्म कहां हुआ, यह पता नहीं, लेकिन उनकी मृत्यु दंडकारण्य में हुई।
मां लक्ष्मी का वाहन उल्लू :-
उल्लू सबसे बुद्धिमान‍ निशाचारी प्राणी होता है। उल्लू को भूत और भविष्‍य का ज्ञान पहले से ही हो जाता है।
उल्लू को भारतीय संस्कृति में शुभता और धन संपत्ति का प्रतीक माना जाता है। उल्लू के बारे में देश-विदेश में कई तरह की विचित्र धारणाएं फैली हुई है।
रहस्यमी प्राणी उल्लू : 
जब पूरी ‍दुनिया सो रही होती है तब यह जागता है। यह रात्री में उड़ते समय पंख की आवाज नहीं निकालता है और इसकी आंखें कभी नहीं झपकती है। उल्लू का हू हू हू उच्चारण एक मंत्र है।
उल्लू में पांच प्रमुख गुण होते हैं : उल्लू की दृष्टि तेज होती है। दूसरा गुण उसकी नीरव’ उड़ान। तीसरा गुण शीतऋतु में भी उड़ने की क्षमता। चौथी उसकी योग्यता है उसकी विशिष्ट श्रवण-शक्ति। पांचवीं योग्यता अति धीमे उड़ने की भी योग्यता। उल्लू के ऐसे ऐसे गुण हैं जो अन्य किसी पक्षियों में नहीं है। उसकी इसकी योग्यता को देखकर अब वैज्ञानिक इसी तरह के विमान बनाने में लगे हैं।
उल्लू कैसे बना लक्ष्मी का वाहन :- प्राणी जगत की संरचाना करने के बाद एक रोज सभी देवी-देवता धरती पर विचरण के लिए आए जब पशु- पक्षियों ने उन्हें पृथ्वी पर घुमते हुए देखा तो उन्हें अच्छा नहीं लगा और वह सभी एकत्रित होकर उनके पास गए और बोले आपके द्वारा उत्पन्न होने पर हम धन्य हुए हैं। हम आपको धरती पर जहां चाहेंगे वहां ले चलेंगे। कृपया आप हमें वाहन के रूप में चुनें और हमें कृतार्थ करें। 
देवी-देवताओं ने उनकी बात मानकर उन्हें अपने वाहन के रूप में चुनना आरंभ कर दिया। जब लक्ष्मीजी की बारी आई तब वह असमंजस में पड़ गई किस पशु-पक्षी को अपना वाहन चुनें। इस बीच पशु-पक्षियों में भी होड़ लग गई की वह लक्ष्मीजी के वाहन बनें। इधर लक्ष्मीजी सोच विचार कर ही रही थी तब तक पशु पक्षियों में लड़ाई होने लगी गई।
इस पर लक्ष्मीजी ने उन्हें चुप कराया और कहा कि प्रत्येक वर्ष कार्तिक अमावस्या के दिन मैं पृथ्वी पर विचरण करने आती हूं। उस दिन मैं आपमें से किसी एक को अपना वाहन बनाऊंगी। कार्तिक अमावस्या के रोज सभी पशु-पक्षी आंखें बिछाए लक्ष्मीजी की राह निहारने लगे। रात्रि के समय जैसे ही लक्ष्मीजी धरती पर पधारी उल्लू ने अंधेरे में अपनी तेज नजरों से उन्हें देखा और तीव्र गति से उनके समीप पंहुच गया और उनसे प्रार्थना करने लगा की आप मुझे अपना वाहन स्वीकारें।
लक्ष्मीजी ने चारों ओर देखा उन्हें कोई भी पशु या पक्षी वहां नजर नहीं आया। तो उन्होंने उल्लू को अपना वाहन स्वीकार कर लिया। तभी से उन्हें उलूक वाहिनी कहा जाता है।
मां सरस्वती का वाहन हंस :- 
हंस पवित्र, जिज्ञासु और समझदार पक्षी होता है। यह जीवनपर्यन्त एक हंसनी के ही साथ रहता है। परिवार में प्रेम और एकता का यह सबसे श्रेष्ठ उदाहरण है। इसके अलावा हंस अपने चुने हुए स्थानों पर ही रहता है। तीसरी इसकी खासियत हैं कि यह अन्य पक्षियों की अपेक्षा सबसे ऊंचाई पर उड़ान भरता है और लंबी दूरी तय करने में सक्षम होता है। जो ज्ञानी होते हैं वे हंस के समान ही होते हैं और जो बुद्धत्व प्राप्त कर लेते हैं उनको परमहंस कहा गया है।
ज्ञान की देवी मां सरस्वती के लिए सबसे बेहतर वाहन हंस ही हो सकता था। मां सरस्वती का हंस परविराजमान होना यह बताता है कि ज्ञान से ही जिज्ञासा को शांत किया जा सकता है। ज्ञान से ही जीवन में पवित्रता,नैतिकता, प्रेम और सामाजिकता का विकास होता है। ज्ञान क्या है? जो-जो भी अज्ञान है उसे जान लेना ही ज्ञानी होने का प्रथम लक्षण है।
शिव का वाहन नंदी बैल :- 
शिव के एक गण का नाम है नंदी। प्राचीनकालीन किताब कामशास्त्र, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और मोक्षशास्त्र में से कामशास्त्र के रचनाकार नंदी ही थे।
विश्‍व की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में बैल को महत्व दिया गया है। सुमेरियन, बेबीलोनिया, असीरिया और सिंधु घाटी की खुदाई में भी बैल की मूर्ति पाई गई है। इससे प्राचीनकल से ही बैल को महत्व दिया जाता रहा है। भारत में बैल खेती के लिए हल में जोते जाने वाला एक महत्वपूर्ण पशु रहा है।
जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है उसी तरह बैलों में नंदी श्रेष्ठ है। आमतौर पर खामोश रहने वाले बैल का चरित्र उत्तम और समर्पण भाव वाला बताया गया है। इसके अलावा वह बल और शक्ति का भी प्रतीक है। बैल को मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला प्राणी भी माना जाता है। यह सीधा-साधा प्राणी जब क्रोधित होता है तो सिंह से भी भिड़ लेता है। यही सभी कारण रहे हैं जिसके कारण भगवान शिव ने बैल को अपना वाहन बनाया। शिवजी का चरित्र भी बैल समान ही माना गया है।
पौराणिक कथा अनुसार शिलाद ऋषि ने शिव की तपस्या के बाद नंदी को पुत्र रूप में पाया था। नंदी को उन्हों वेदादि ज्ञान सहित अन्य ज्ञान भी प्रदान किया। एक दिन शिलाद ऋषि के आश्रम में मित्र और वरुण नाम के दो दिव्य संत पधारे और नंदी ने पिता की आज्ञा से उनकी खुब सेवा की जब वे जाने लगे तो उन्होंने ऋषि को तो लंबी उम्र और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद दिया लेकिन नंदी को नहीं। तब शिलाद ऋषि ने उनसे पूछा कि उन्होंने नंदी को आशीर्वाद क्यों नहीं दिया ?
तब संतों ने कहा कि नंदी अल्पायु है। यह सुनकर शिलाद ऋषि चिंतित हो गए। पिता की चिंता को नंदी ने भांप कर पूछा क्या बात है तो पिता ने कहा कि तुम्हारी अल्पायु के बारे में संत कह गए हैं इसीलिए चिंतित हूं। यह सुनकर नंदी हंसने लगा और कहने लगा कि आपने मुझे भगवान शिव की कृपा से पाया है तो मेरी उम्र की रक्षा भी वहीं करेंगे आप क्यों नाहक चिंता करते हैं। इतना कहते ही नंदी भुवन नदी के किनारे शिव की तपस्या करने के लिए चले गए। कठोर तप के बाद शिवजी प्रकट हुए और कहा वरदान मांगों वत्स। तब नंदी के कहा कि मैं ताउम्र आपके सानिध्य में रहना चाहता हूं।
नंदी के समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने नंदी को पहले अपने गले लगाया और उन्हें बैल का चेहरा देकर उन्हें अपने वाहन, अपना दोस्त, अपने गणों में सर्वोत्तम के रूप में स्वीकार कर लिया।
मां पार्वती का वाहन बाघ :-
 माता पार्वती का वानह बाघ है तो मां दुर्गा का वहन शेर। मांता दुर्गा को शेरावाली कहा जाता है। बाघ माता पार्वती का वाहन है। बाघ अदम्य साहस, क्रूरता, आक्रामकता और शौर्यता का प्रतीक है। यह तीनों विशेषताएं मां पार्वती के आचरण में भी देखने को मिलती है। बाघ की दहाड़ के आगे संसार की बाकी सभी आवाजें कमजोर लगती हैं।
मां पार्वती का हृदय बहुत ही कोमल है। मां की पूजा यदि सच्चे मन और श्रृद्धा के साथ की जाएं तो हर बिगड़े कार्य बन जाते हैं, लेकिन यदि माता का किसी भी रूप में अपमान हो या उनसे वाद खिलाफी की गई हो तो फिर उनका क्रोध देखने लायक होता है।
एक दिन मां पार्वती और भगवान शिव साथ बैठे थे। मजाक में ही शिवजी ने माता को काली कह दिया। मां को बहुत लगा और वह कैलाश छोड़कर एक वन में चली गई और कठोर तपस्या में लीन हो गई। इस बीच एक भूखा शेर मां पार्वती को खाने की इच्छा से वहां पहुंचा, ले‌किन वह वहीं चुपचाप बैठ गया।
माता के प्रभाव के चलते वह बाघ भी तपस्या कर रही मां के साथ वहीं सालों चुपचाप बैठा रहा। मां ने हठ कर ली थी कि जब तक वह गौरी नहीं हो जाएगी तब तक वह यहीं तपस्या करेगी। तब शिवजी वहां प्रकट हुए और देवी को गौरा होने का वरदान देकर चले गए। फिर माता ने पास की ही नदी में स्नान किया और बाद में देखा की एक बाघ वहां चुपचाप बैठा माता को ध्यान से देख रहा है। माता पार्वती को जब यह पता चला कि यह बाघ उनके साथ ही तपस्या में यहां सालों से बैठा रहा है तो माता ने प्रसंन्न होकर उसे वरदान स्वरूप अपना वाहन बना लिया। तब से मां पार्वती का वाहन बाघ हो गया।
दूसरी कथा अनुसार संस्कृत भाषा में लिखे गए 'स्कंद पुराण' के तमिल संस्करण 'कांडा पुराणम' में उल्लेख है कि देवासुर संग्राम में भगवान शिव के पुत्र मुरुगन (कार्तिकेय) ने दानव तारक और उसके दो भाइयों सिंहामुखम एवं सुरापदम्न को पराजित किया था।
अपनी पराजय पर सिंहामुखम माफी मांगी तो मुरुगन ने उसे एक शेर में बदल दिया और अपना माता दुर्गा के वाहन के रूप में सेवा करने का आदेश दिया।
कार्तिकेय का वाहन मयूर :- 
मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है। यह पक्षी जितना राष्ट्रीय महत्व रखता है उतना ही धार्मिक महत्व भी, हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान मुरुगन या कहें कार्तिकेय का वाहन मोर है।
एक मान्यता अनुसार अरब में रह रहे यजीदी समुदाय (कुर्द धर्म) के लोग हिन्दू ही हैं और उनके देवता कार्तिकेय है जो मयूर पर सवार हैं। भारत में दक्षिण भारत में कार्तिकेय की अधिक पूजा होती है। कार्तिकेय को स्कंद भी कहा जाता है, जो शिव के बड़े पुत्र हैं।
कार्तिकेय का वाहन मयूर है। एक कथा के अनुसार कार्तिकेय को यह वाहन भगवान विष्णु ने उनकी सादक क्षमता को देखकर ही भेंट किया था। मयूर का मन चंचल होता है। चंचल मन को साधना बड़ा ही मुश्‍किल होता है। कार्तिकेय ने अपने मन को साथ रखा था। वहीं एक अन्य कथा में इसे दंभ के नाशक के तौर पर कार्तिकेय के साथ बताया गया है।
अपनी पराजय पर सिंहामुखम माफी मांगी तो मुरुगन ने उसे एक शेर में बदल दिया और अपना माता दुर्गा के वाहन के रूप में सेवा करने का आदेश दिया।
दूसरी ओर मुरुगन से लड़ते हुए सपापदम्न (सुरपदम) एक पहाड़ का रूप ले लेता है। मुरुगन अपने भाले से पहाड़ को दो हिस्सों में तोड़ देते हैं। पहाड़ का एक हिस्सा मोर बन जाता है जो मुरुगन का वाहन बनता है जबकि दूसरा हिस्सा मुर्गा बन जाता है जो कि उनके झंडे पर मुरुगन का प्रतीक बन जाता है। इस प्रकार, यह पौराणिक कथा बताती है कि मां दुर्गा और उनके बेटे मुरुगन के वाहन वास्तव में दानव हैं जिन पर कब्जा कर लिया गया है। इस तरह वो ईश्वर से माफी मिलने के बाद उनके सेवक बन गए।
संस्कृत भाषा में लिखे गए 'स्कंद पुराण' के तमिल संस्करण 'कांडा पुराणम' में उल्लेख है कि देवासुर संग्राम में भगवान शिव के पुत्र मुरुगन (कार्तिकेय) ने दानव तारक और उसके दो भाइयों सिंहामुखम एवं सुरापदम्न को पराजित किया था।
इंद्र का वाहन सफेद एरावत हाथी : 
आजकल सफेद हाथी तो बहुत कम पाए जाते हैं। मनुष्यों ने इनका कत्लेआम कर दिया है इनकी चर्बी और हाथी दांत के लिए। यह लगभग लुप्तप्राय है। 
इंद्र ने अपना वाहन ऐरावत नामक एक हाथी को बनाया। समुद्र मंथन के दोरान 14 रत्नों में से एक ऐरावत की भी उत्पत्ति हुई थी। हाथी शांत, समझदार और तेज बुद्धि का प्रतीक है। ऐरावत को चार दांतों वाला बताया गया है। 'इरा' का अर्थ जल है, अत: 'इरावत' (समुद्र) से उत्पन्न हाथी को ऐरावत नाम दिया गया है।
महाभारत, भीष्मपर्व के अष्ट्म अध्याय में भारतवर्ष से उत्तर के भू-भाग को उत्तर कुरु के बदले 'ऐरावत' कहा गया है। जैन साहित्य में भी यही नाम आया है। यह उत्तर कुरु दरअसल उत्तरी ध्रुव में स्थित था। संभवत: वहां प्राचीनकाल में इस तरह के हाथी होते होंगे जो बहुत ही सफेद और चार दांतों वाले रहे होंगे।
यमराज का वाहन भैंसा :-
 यम नामक एक वायु होती है। मरने के बाद व्यक्ति उक्त वाय में जाकर स्थिर हो जाता है और फिर प्राकृतिक चक्र अनुसार पुन: धरती पर जन्म ले लेता है। 
यम नामक एक देवता हैं ‍जिनको मृत्यु का देवता कहते हैं। ये दक्षिण दिशा के दिक् पाल कहे जाते हैं। यमराज को भैंसे पर सवार बताया गया है। भैंसा एक सामाजिक प्राणी होता है। सभी भैंसे मिलकर एक दूसरे की रक्षा करते हैं। यह एकता का प्रतीक है। भैंसा अपनी शक्ति और फूर्ति के लिए भी जाना जाता है। भैंसा अपनी शक्ति का कभी दुरुपयोग नहीं करता। भैंसा अपनी आत्मरक्षा में ही किसी पर हमला करता है। भैंसे का रूप जिस तरह से भयानक होता है उसी तरह यमराज का रूप भी भयानक है। अत: यमराज उसको अपने वाहन के तौर पर प्रयोग करते हैं।
गंगा का वाहन मगरमच्छ :- 
देवी गंगा का वाहन मगरमच्छ है सिंधु, गंगा, नर्मदा, ब्रह्मपुत्र, कावेरी आदि नदियों में जल में विचरण करने वाला प्रमुख प्राणी मगरमच्छ ही है। वैज्ञानिक कहते हैं कि मगरमच्छ हर परिस्थिति में जी लेते हैं। धरती पर इनका अस्तित्व लगभग 25 करोड़ साल से विद्यमान है।
शनि का वाहन कौआ : 
बहुत कम लोगों को पता होगा कि शनिदेव की सवारी कौवा या गिद्ध ही नहीं बल्कि पुरे 9 सवारी शनिदेव की है। 
जैसे- गिद्ध, घोड़ा, गधा, कुत्ता, शेर, सियार, हाथी, मोर और हिरण हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि शनिदेव जिस वाहन पर सवार होकर जिसके पास भी जाते हैं वह व्यक्ति उसी के हिसाब से फल का उत्तरदायी होता है। हालांकि कौवा को उनकी मुख्‍य सवारी माना जाता है।
कौआ एक बुद्धिमान प्राणी है। कौए को अतिथि-आगमन का सूचक और पितरों का आश्रम स्थल माना जाता है। पुराणों की एक कथा के अनुसार इस पक्षी ने अमृत का स्वाद चख लिया था इसलिए मान्यता के अनुसार इस पक्षी की कभी स्वाभाविक मृत्यु नहीं होती। कोई बीमारी एवं वृद्धावस्था से भी इसकी मौत नहीं होती है। इसकी मृत्यु आकस्मिक रूप से ही होती है।
जिस दिन किसी कौए की मृत्यु हो जाती है उस दिन उसका कोई साथी भोजन नहीं करता है। कौआ अकेले में भी भोजन कभी नहीं खाता, वह किसी साथी के साथ ही मिल-बांटकर भोजन ग्रहण करता है।
कौए की योग्यता : कौआ लगभग 20 इंच लंबा, गहरे काले रंग का पक्षी है जिसके नर और मादा एक ही जैसे होते हैं। कौआ बगैर थके मीलों उड़ सकता है। कौए को भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पहले से ही आभास हो जाता है।पितरों का आश्रय स्थल : श्राद्ध पक्ष में कौओं का बहुत महत्व माना गया है। 
भगवान भैरव का वाहन कुत्ता :- 
कुत्ता एक रहस्यमयी प्राणी है। कुछ धर्मों में इसे शैतानी माना गया है तो ‍हिन्दू धर्म में इसे कुशाग्र बुद्धि और रहस्यों को जानने वाला प्राणी माना गया है। कई मामलों में यह मनुष्यों की रक्षा करता है। भगवान भैरव ने इसे अपना वाहन तो नहीं बनाया लेकिन वे हमेशा इसे अपने साथ रखते हैं।
हिन्दू धर्म के पुराणों में कुत्ते को यम का दूत कहा गया है। ऋग्वेद में एक स्थान पर जघन्य शब्द करने वाले श्वानों का उल्लेख मिलता है, जो विनाश के लिए आते हैं।
भैरव महाराज का सेवक कुत्ते को हिन्दू देवता भैरव महाराज का सेवक माना जाता है। कुत्ते को भोजन देने से भैरव महाराज प्रसन्न होते हैं और हर तरह के आकस्मिक संकटों से वे भक्त की रक्षा करते हैं। मान्यता है कि कुत्ते को प्रसन्न रखने से वह आपके आसपास यमदूत को भी नहीं फटकने देता है। कुत्ते को देखकर हर तरह की आत्माएं दूर भागने लगती हैं।
कुत्ते की योग्यता : दरअसल कुत्ता एक ऐसा प्राणी है, जो भविष्‍य में होने वाली घटनाओं और ईथर माध्यम (सूक्ष्म जगत) की आत्माओं को देखने की क्षमता रखता है। कुत्ता कई किलोमीटर तक की गंध सूंघ सकता है। कुत्ते को हिन्दू धर्म में एक रहस्यमय प्राणी माना गया है, लेकिन इसको भोजन कराने से हर तरह के संकटों से बचा जा सकता है।
इसके अलावा आदित्य का वाहन सात घोड़े, वरुण का वाहन सात हंस, ब्रह्मा सात हंस, महेश्वरी का बैल, दुर्गा का सिंह है ।

Wednesday, 17 June 2026

बोली में मिनख रा संस्कार, व्यवहार, ग्यान अर सभाव रो अेकै सागै खुलासो हुवै।

:ः बाईजी रो बोलणो अर भलै घरां री राड़:ः
मिनखाजूण रै फळापै अर फुटरापै सारू आपणां बडेरां, संत-साहितकारां अर लोकनीत-व्यवहार रो ज्ञान करावणियां गुणीजणां खास कर इण बात पर जोर दियो है कै आ जीभ जकां रै बस में है, वां रो ई जीवण धन्य है। ‘बाई कैवतां रांड’ कहीजै जकां नैं जस री ठौड़ जूता ई पानै पड़ै। वाणी तो व्यक्तित्व री आरसी मानीजी है। आदमी नीं बोलै जितरै उणरो ठा नीं पड़ै पण जियां ई बोलै उणरो कद आपणै सामी आवणो सरू हुवै। बोली में मिनख रा संस्कार, व्यवहार, ग्यान अर सभाव रो अेकै सागै खुलासो हुवै। आदमी री ठीमरता, धीरज अर संयत व्यवहार री सूचना उणरी वाणी ई दिया करै। जियां ई मिनख बोलै आ ठा पड़ ज्यावै कै ओ कुणसी संगत अर संस्कारां में रैवणियो आदमी है। 

आपणै अठै कैबत है कै ‘बाबा बोलूं कै बोवूं’ मतलब ओ कै नीं बोलै जितरै तो मिनख रो खोळियो है जणां मिनख जिसो लागै ई है अर जियां ई बोलै जणां सगळो पोत चोड़ै आ ज्यावै। बोली रै कारण कई बार भोळा अर भोंदू मित्र हुवै जका दुस्मणां सूं ई बत्तो काम करज्यावै। महात्मा गांधीजी रो मानणो हो कै आदमी नै चुप रैय’र इत्तो पछताणो कोनी पड़ै जित्तो कै गड़बड़ बोल’र पछताणो पड़ै। ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ री कैबत इणी कारण बणी है। घणां मिनख इयांकला मिलै जका अपणै आपनै ‘बूझबूझाकड़जी’ समझै अर हरेक बात रा जाणीजाण बण्योड़ा फिरै। बां नै ठा कोनी कै ओ संसार सागर है अठै तो बडाबडी रा डेरूं बाजै। भाखर पर तो सगळा ई भोमिया है, कुण छोटो अर कुण मोटो। इण वास्तै घणां ग्यानचंद (बात-बात में ग्यान बघारणियां) अर रायचंद (बात-बात में बिना मांगी राय देवणियां) बणण री दरकार कोनी, आदमी जित्तो जरूरी हुवै बित्तो ई बोलै जणां ठीक रैवै।

बोली में लहजै रो घणो असर हुया करै। अेक आदमी बोलै जणां लागै इमरत झरै अर दूजो बोलै जणां लागै कै कानां में कील चुभोवै। बोलणो अर बोबीड़ मारणो दोनूं न्यारी-न्यारी बातां है। इण सारू आपणै अठै कैबत है कै ‘बाईजी रा बोलणां अर भलै घरां की राड़’। राड़ नाम लड़ाई-झगड़ै रो है। लड़तां तो बोली तीव्र अर कर्कश ई रैया करै। लड़ाई में तो गाळ्यां ई काढीजै कोई लाडू तो बांटीजै कोनी। इण खातर लड़ाई झगड़े में बोली रै आदर्श रूप री कोई अपेक्षा नीं करीजै। अठै तांई कै साहित्य सिरजण मांय भी युद्ध आद रै चित्रण में इण बात नैं स्वीकारीजै। पण कई लोगां री तो आदत ई पड़ ज्यावै कै बै बोलै जणां इयां लागै जाणै लड़ाई ई करै। 

इणी कारण कोई टेम में स्याणी समझदार भाभी आपरी नणद नैं समझावतां कैयो हुवैला कै बाईजीराज थांरी सामान्य बोली ई इयांकली है जाणै भलां घरां में राड़-झगड़ो हुवै। इणनैं कीं सुधारो नीं तो आगलै घरां जावोला तो फोड़ा ई फोड़ा पड़णा है। वाणी री तीव्रता, आपणां हाव-भाव, बात कैवण रै लारै जिम्मेदारी रो भाव, श्रोता रै साथै आपरा संबंध, सबद चयन आद आपणी बात री परख रा आधार है। बाकी तो बात-बात तो सगळी अेक ई है, कैवण रो ई फरक है। जियां सागण ई काजळ आंख में घालै तो आंख री सोभा बढै अर बो ई काजळ घड़ै का ठीकरी पर लगावै तो अपरोगो लागै - 

बात-बात सब अेक है, कहणै में कदु बैण।
बो ही काजळ ठीकरी, बो ही काजळ नैण।।   

बात अर उठाव (कमठाण) जित्ता चावो बित्ता ई बधै। बात अर भाटो तो बैठावै ज्यूं ई बैठै पण बैठावणियैं री ऊरमा तो चाईजै। कई बार बोलणो गुनैगारी हुज्यावै तो कई बार बोलणो वरदायी सिद्ध हुवै। बात कर्यां ई मिनख री खरी पिछाण हुवै पण बिनां सोच्यां समझ्यां कर्योड़ी बात घांदा कर न्हाखै। राजस्थानी लोकजीवण में बात री सीख रा घणां दूहा प्रचलण में है-

बातड़ल्यां बिगताळल्यां, जे कोई कहै बणाय।
बातां (तो) हाथी पायबो, बातां (ई) हाथी पाय।। 

मतलब ओ है कै बात करणी अर कोई नैं कीं समझावणो है तो उणरो कायदो आयां ई फायदो हुवै नीं तो है जिसी इज्जत रा ई कांकरा हुज्यावै। कोई टेम री बात है कोई राजा हाथी रै होदै किणी मारग पर आवै हो। सामनै कोई कवि आयो अर उण राजा नै इयांकली बात कैई जकी संू राजा रीझग्यो अर उण कवि नैं आपरो हाथी बगसीस में दे दियो। इणनै कैवै बातां हाथी पायबो मानै बात-बात में हाथी प्राप्त कर लियो। इण दरसाव नै देख’र अेक दूजै मिनख सोच्यो इयांकली बात तो आपां ई कैय सकां अर बो तैयार हुग्यो। 

दो-च्यार महीनां पाछै कोई दूजो राजा हाथी रै होदै निकळ्यो। बो देखादेखी कवि बण्योड़ो मिनख मारग में सामै आयो अर जियां लारलै कवि कैई बियां ई राजां नै बात कैयी पण टेम बदळग्यो हो, लारली उपमावां रा अरथ बदळग्या। राजा नै रीस आई अर राजा उण धिंगाणियै कवि नैं मारग पर चित्त न्हाख’र हाथी रो पांव उणरी छाती पर टिका दियो, जिणसूं बो मरग्यो। ओ है बातां हाथी पाय। सागो देख’र सासरो करणियां रा घर बस्योड़ा देख्या कोनी। बै तो इयां ई बारां घालता टेम बितावै। इणरो कारण ओ है कै भासा री विविधता अर क्षेत्र रै प्रभाव सूं कई बार सबदां में मोकळो फरक निगै आवै, इण वास्तै पराई जाग्यां जावां तो आपणां स्थानीय सबदां नैं सावळ सोच समझ’र बोलणां चाईजै। 

आपणै अठै सामान्य रूप सूं बोलीजण वाळो कोई सबद किणी क्षेत्र विशेष का जात-समाज विशेष मांय असंसदीय हो सकै। जियां राजस्थानी सामान्य लोकजीवण मांय मारण, पीटण, डरावण सारू आम सबद है - ठौकणो। लोगां रै घरै, परिवार में, लुगायां-पतायां तकात टाबरां नैं डांटै फटकारै तो ई बोलै कै ‘ठोकूंली, ठोकूंला’। टाबर ओळमो देवै तो बो ई आ ई कैवै कै म्हनैं फलांणै छोरै ठोक्यो। पण ओ ई ‘ठोकणो’ पिछमियै राजस्थान में अर खासकर राजपूत अर चारण समाज में असंसदीय अर अश्लील सबद मानीजै। आं रै घरां मांय इण सबद रो कदै ई सार्वजनिक उच्चारण नीं करीजै। इण वास्तै देस, काळ अर परिस्थितियां नैं देख’र ई बोलणो अर सबदां रो चयन करणो जरूरी है। इण बात री साख रो अेक दूहो देखो-

बात-बात रो आंतरो, बात-बात रो फरक्क।
थे तो कैवो फरिस्तो, (अर) म्है कैवां हां जरक्ख।। 

अबै बताओ फरिस्तै अर जरख नै अेक बताओ जणां खीर तो कुण जिमावै पछै तो डांगां ई बाजै। अेकर री बात है अेक गांव में गुवाड़ री हथाई चालतां बात चाली कै ठाकरां रै बेटै री बहू फलाणै आदमी रै झोळ्यां घाल्योड़ी है। झोळ्यां घालणै नै बीकानेरवाटी में खोळ्यां घालणो कहीजै। बारै सूं आयोड़ै अेक आदमी पूछ्यो कै थांरै ओ खोळ्यां घालणो कांई हुवै। हथाई में अेक बाताळ बैठ्यो हो, जाणै तो बो ई कोनी हो पण बोलणो जरूरी हो इण वास्तै बोलग्यो कै ‘थांरै तो नातो कैवै अर म्हांरै खोळो कैवै’। अबै बताओ खोळ्यां घालणो अर नातै भेजणो अेक कियां है। हाथोहाथ ई बाताळ रै जूतां री जुंवारी हुगी। बात अेकर गुडै उतरगी तो उतरगी पछै सागण चीलां ल्यांणी बेजां दौरो काम है। बात बीगड़्यां पछै सिवाय पिछतावण रै कीं नीं बचै। जणां ई तो कैवै बातां रा टक्का लागै। बात नीं बात री मरोड़ देखणी चाईजै। उचित अवसर हुवै तो फीकी बात ई नीको फळ देज्यावै अर जे अवसर ठीक नीं हुवै तो नीकी बात भी फीको फळ देवै। 

बातां नै छमकणी तो सौरी है पण पार घालणी बेजां दौरी हुवै। बातां में मजाक मसखरी साग में लूण जियां सुवाद अर रस रो काम करै पण कई बार मसखरी महंगी पड़ ज्यावै। अेकर अेक सरप समदर में पड़ग्यो। पाणी में दौरो-सौरो तिरतो किनारै पूगण री आफळ करै। उण बगत अेक मेंढकियो सरप रै आजू-बाजू उछळतो सरप सूं मसखरी करतो बोल्यो ‘सुण रे सरप! म्हनैं हथाई रो घणो कोड है, थोड़ी देर हथाई करां’। सरप नैं ठा पड़्ग्यो कै मेंढकियो उणरा मजा लेवै। वो जाणै हो कै अबार रीस कर्यां भी कीं कोनी हुवै क्योंकै पाणी में मेंढकियो ताबै आवै कोनी। बीं आपरी रीस नैं संभाळ’र मेंढकै नैं उत्तर दियो-

आवै न कोई ऊपजै, सरवर मज्झ थयांह।
बातां करस्यां डेडरा, तिरनै तीर गयांह।।

सरप बोल्यो डेडरा भाई अबार ई समदर रै बिचाळै तो म्हनैं कोई बात ऊकलै ई कोनी। तिर’र किनारै पूग्यां पछै आपां हथाई करस्यां। सरप होळै सी संकेत कर दियो कै जे किनारै रै सारै आयग्यो जणां स तो थारी जड़ में आक दे देस्यूं, थूं ई याद राखसी कै कोई नै बिनां बात तंग कियां कर्या करै। डेडरियै जाण बूझतै पंगो ले लियो। जियो जितरै ई समदर रै किनारै आवण में डरतो ई रैयो हुवैला। इण वास्तै ई कईजै कै बाताळ (वाचाल) रो घर पाताळ में जावै। 

घणो बोलणो, बिना सोच्यां-समझ्यां बोलणो, बिना मतलब बोलणो, बिन बतळायां बोलणो ज्यादातर फोड़ा ई घालै। जरूरी हुवै बठै बोलणो ई चाईजै। साच नै साच कैवण री हूंस अर हिम्मत राखणी चाईजै। चौराई लाख जूणियां मांय भटक्यां पाछै आ मिनखा जूण मिली है। मिनख री जीभ तो जगदीस अर जगदम्बा रा जसगान करण सारू है। भगवान रो नाम जपण सारू जीभ मिली है। इणसूं निकळण वाळो अेक अेक आखर अणमोल हुवै इण वास्तै तोल्यां बिनां नीं बोलणो चाईजै। आगली च्यार ओळियां साथै इण चर्चा नै इण आसा अर विस्वास रै साथै विराम देवां कै नयी पीढी आपरी जुबान नै सावळसर बरतण री हूंस लेवैली- 

लाख असी-चव जोनिय मांझल, जानिय मानव श्रेष्ठ जमारो। 
धीर विवेक तुला पर तोल, अमोल, सतोल, सुबोल उचारो।
तारन या भवसागर सौं गजराज न दीखत और सहारो।
बार हि बार उचार अलौकिक अंब सुनाम उबारन वारो।। 
✍️डॉ. गजादान चारण ‘‘शक्तिसुत’'

वयं राष्ट्रे जागृयाम 

होरा चक्र ( डी २ चार्ट )

कुंडली में छिपे धन का रहस्य: क्या कहता है आपका होरा (D2) चक्र?

नमस्कार दर्शकों! 'ज्योतिष: जीवन ज्योति जागृति' के इस विशेष लेख में आपका स्वागत है।
अक्सर हम सभी के मन में यह प्रश्न उठता है कि हमारे भाग्य में कितनी वित्तीय स्थिरता लिखी है? क्या हम अपने प्रयासों से एक मजबूत आर्थिक स्तर तक पहुँचेंगे, या जीवन भर संघर्ष बना रहेगा? जब भी धन की बात आती है, तो ज्यादातर लोग अपनी जन्म कुंडली (D1 या लग्न चक्र) का केवल दूसरा भाव देखते हैं। लेकिन वैदिक ज्योतिष में धन के सही प्रवाह और उसके आगमन का सबसे सटीक विश्लेषण 'होरा चक्र' यानी D2 चार्ट से होता है।

आइए, ज्योतिषीय गहराई में उतरते हैं और समझते हैं कि आपका D2 चार्ट आपकी आर्थिक नियति (Financial Destiny) के बारे में क्या अद्भुत रहस्य खोलता है।

D2 (होरा) चार्ट आखिर है क्या?
होरा चार्ट आपकी मुख्य कुंडली के दूसरे भाव का एक सूक्ष्म और विस्तृत रूप है। यह केवल आपके बैंक बैलेंस या तिजोरी के धन को नहीं दर्शाता, बल्कि यह आपके पारिवारिक संस्कारों, आपकी प्रारंभिक शिक्षा और यहां तक कि आपके खान-पान की आदतों (Food habits) का भी आईना है। होरा कुंडली का लग्न और लग्नेश जातक की वास्तविक आर्थिक स्थिति और वित्तीय क्षमता के मुख्य सूचक होते हैं। आप इस जीवन में कितनी संपत्ति और संसाधन अर्जित करने की क्षमता रखते हैं, इसका स्पष्ट चित्र D2 चार्ट ही देता है।

D2 चार्ट का एक विशेष रूप: 'लाभ मंडूक होरा' कैसे बनाते हैं?
ज्योतिष में D2 चार्ट के कई प्रकार होते हैं, लेकिन धनागम (पैसा आने के रास्ते) को समझने के लिए 'लाभ मंडूक होरा' का महत्व सबसे ज्यादा है। इसका नाम 'मंडूक' (मेंढक) इसलिए है क्योंकि इसमें ग्रह एक विशेष छलांग (Jump) लगाते हैं। इसे बनाना बहुत सरल है:
पहला चरण (0° से 15° तक): अगर कोई ग्रह अपनी राशि में 0 से 15 डिग्री के बीच है, तो वह लाभ मंडूक होरा में उसी राशि में रहेगा जिसमें वह आपकी लग्न (D1) कुंडली में है। इसे 'स्व-होरा' या स्थिरता का संकेत माना जाता है।

दूसरा चरण (15° से 30° तक): अगर ग्रह 15 डिग्री से ऊपर है, तो वह अपनी राशि से 11 घर आगे (लाभ स्थान) छलांग लगा जाता है। चूंकि 11वां घर 'लाभ' (Gains) का होता है, इसीलिए इसे 'लाभ मंडूक' कहते हैं।

उदाहरण: मान लीजिए आपकी लग्न कुंडली (जैसे कुंभ लग्न) में कोई ग्रह 20 डिग्री पर बैठा है। चूंकि यह 15 डिग्री से ज्यादा है, तो लाभ मंडूक होरा में वह ग्रह अपनी वर्तमान स्थिति से 11 घर आगे चला जाएगा। इसका सीधा अर्थ है कि उस ग्रह से जुड़े कार्य सीधे तौर पर आपके बड़े लाभ एकादश भाव में बदल जाएंगे।

धन के चार प्रमुख स्तंभ: 2, 5, 8 और 11 भाव
लाभ मंडूक होरा के सिद्धांत के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के D2 चार्ट में 2, 5, 8, और 11 भाव मजबूत हों और वहां शुभ या कारक ग्रह बैठे हों, तो वह व्यक्ति एक अत्यंत सुदृढ़ आर्थिक स्थिति, बेहतरीन वित्तीय स्थिरता और पर्याप्त समृद्धि का स्वामी बनता है:

द्वितीय भाव (2nd House): यह आपका 'संचित धन' है। वह पैसा, सोना, या संपत्तियां जो आपने समय के साथ धीरे-धीरे जोड़कर रखी हैं।

पंचम भाव (5th House): यह 'बड़े निवेश' (Big Money) का भाव है। शेयर मार्केट, बड़े निवेशों से मिलने वाला भारी मुनाफा या अपनी बुद्धि के बल पर अचानक से मिलने वाला बड़ा पैसा इसी भाव से देखा जाता है।

अष्टम भाव (8th House): यह वह धन है जिसके लिए आपने सीधी शारीरिक मेहनत नहीं की। जैसे- पैतृक संपत्ति (Inheritance), बीमा का पैसा, या ससुराल पक्ष से मिलने वाला लाभ।

एकादश भाव (11th House): यह आपकी इच्छा पूर्ति और 'नियमित आय' का भाव है। होरा कुंडली का 11वां भाव विशेष रूप से यह इंगित करता है कि आपकी कमाई का मुख्य जरिया या स्रोत (Source of Earning) क्या होगा।

विशेष सूत्र: यदि आपके D2 चार्ट में ये चारों भाव (2, 5, 8, 11) पूरी तरह खाली हैं, तो जीवन में धनार्जन के लिए काफी कड़ा संघर्ष करना पड़ सकता है।
लाभ मंडूक होरा के ८ अचूक और गुप्त नियम
होरा चार्ट को और अधिक सूक्ष्मता से डिकोड करने के लिए हमें इसके कुछ विशेष और प्रामाणिक नियमों को समझना होगा:

१. राहु-केतु का वित्तीय झटका (Sudden Loss)
यदि होरा कुंडली के लग्न (Hora Lagna), दूसरे भाव (2nd House) या ग्यारहवें भाव (11th House) में राहु-केतु का अक्ष (Axis) बन रहा हो, तो जातक को जीवन में अचानक बड़े आर्थिक नुकसान या 'सडन लॉस' का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों को जोखिम भरे सट्टेबाजी वाले कामों से बचना चाहिए।

२. प्रॉपर्टी से कमाई का योग
यदि होरा कुंडली में चौथे भाव का स्वामी (4th Lord) उठकर दूसरे या ग्यारहवें भाव में बैठ जाए, तो यह एक बेहतरीन योग है। ऐसा जातक भूमि, मकान, रियल एस्टेट या पुरानी संपत्तियों की खरीद-बिक्री के माध्यम से धन कमाता है।

३. खुद के दम पर संपत्ति का निर्माण (Own Efforts)
यदि होरा कुंडली का तीसरे भाव का स्वामी (3rd Lord) चौथे भाव में जाकर बैठ जाए, तो ऐसा जातक अपने पराक्रम, कड़ी मेहनत और खुद के प्रयासों (Own Efforts) के दम पर अपनी अचल संपत्ति (Properties) खड़ी करता है।

४. बाजार की पूंजी से व्यापार में लाभ
एक बहुत ही अद्भुत नियम यह है कि यदि छठे भाव का स्वामी (6th Lord) आपकी लग्न कुंडली (D1) या होरा कुंडली के ग्यारहवें भाव (11th House) में स्थित हो, तो ऐसा जातक यदि बाजार से कर्ज (Loan या Market Capital) लेकर अपना काम या बिजनेस शुरू करे, तो वह उसके लिए अत्यधिक फायदेमंद (Advantageous) साबित होता है।

५. ११वें भाव के स्वामी का १२वें भाव में खेल (Accumulation vs Struggle)
होरा कुंडली का ग्यारहवें भाव का स्वामी (11th Lord) यदि १२वें भाव (व्यय स्थान) में जाता है, तो इसके दो बिल्कुल अलग परिणाम होते हैं:
मित्र राशि में होना: यदि ११वें का स्वामी १२वें भाव में किसी मित्र राशि में बैठा हो, तो जातक की एक विशेष आदत होती है—वह खर्च करने से पहले धन का बड़ा संचय (First accumulate money then spend) करता है।

शत्रु राशि में होना: इसके विपरीत, यदि ११वें का स्वामी १२वें भाव में किसी शत्रु राशि में बैठ जाए, तो यह स्थिति आय के स्रोतों (Source of Earning) के लिए बहुत अच्छी नहीं मानी जाती और धन कमाने में निरंतर रुकावटें आती हैं।

शनि और राहु: धन के मामले में इनका मायाजाल
धन के मामले में ग्रहों का अपना अलग ही खेल होता है, विशेषकर वक्री और मंदगामी ग्रहों का:

शनि की धीमी लेकिन पक्की चाल: अक्सर लोग शनि के नाम से घबराते हैं, लेकिन D2 चार्ट में अगर शनि मजबूत हो तो वह स्थायी संपत्ति दे सकता है। शनि की बस एक शर्त है—वह बिना कड़ी मेहनत के कुछ नहीं देता। यह धीरे-धीरे और स्थिरता के साथ देता है, लेकिन जो देता है वह लंबे समय तक टिकता है।

राहु का छलावा: यदि D2 चार्ट के दूसरे या आठवें भाव में राहु बैठा हो, तो यह अचानक धन आने का भ्रम और उठापटक जरूर पैदा करता है। राहु का धन जितनी तेजी से आता है, उतनी ही तेजी से वाष्प (Evaporate) भी हो सकता है। पैतृक संपत्ति के मामले में राहु अक्सर व्यक्ति को धोखे या विवाद का शिकार भी बना देता है।

क्या आप सच में अपने धन का सुख भोग पाएंगे?
एक बहुत ही कड़वा सच यह है कि "धन होना" और "उस धन का सुख भोगना" दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं।
यदि आपके D2 चार्ट का चतुर्थ भाव (4th House) पाप ग्रहों से पीड़ित है, तो आपके पास पर्याप्त धन होने के बावजूद आप उस पैसे का आनंद अपने ऊपर या अपनी मानसिक शांति पर नहीं ले पाएंगे। या तो वह सारा पैसा परिवार की समस्याओं को सुलझाने में खर्च हो जाएगा, या आप धन कमाने की दौड़ में इतने उलझ जाएंगे कि जीवन के सुखों को जीने का समय ही नहीं बचेगा।

निष्कर्ष:
केवल लग्न कुंडली देखकर अपने आर्थिक भविष्य को लेकर निराश या अति-उत्साहित न हों। आपके कर्मों का असली आर्थिक फल आपके होरा (D2) चार्ट में छिपा है। जब ग्रह 'लाभ स्थान' और सही नियमों का संबंध बनाते हैं, तभी जीवन में वास्तविक आर्थिक वृद्धि और स्थायित्व देखने को मिलता है।

🙏 हर हर महादेव! अगर यह ज्योतिषीय जानकारी आपको ज्ञानवर्धक लगी हो, तो इसे अपने मित्रों और परिवार के साथ अवश्य साझा करें। अपनी कुंडली से जुड़े किसी भी प्रश्न या विश्लेषण के लिए 'ज्योतिष: जीवन ज्योति जागृति' के साथ जुड़े रहें।

Sunday, 14 June 2026

सम्मान पाने की इच्छा बड़ी स्वाभाविक है। लेकिन सम्मान की इच्छा कब, कैसे और किससे हो यह जानना आवश्यक और उपयोगी है ।

मैं भी चुनाव आयोग का एक कर्मचारी था 2005 में। सतना में ग्राम पंचायत चुनाव हो रहे थे। चुनाव से एक दिन पहले हम सभी कर्मचारी मतपत्र गिन कर गड्डियां लगा रहे थे कि तभी पूरे क्षेत्र की चुनाव व्यवस्था को संभालने वाले अधिकारी पहुंच गए। शायद जनपद सीईओ थे। 

मेरे सीनियर अधिकारी कोई 55 वर्ष के रहे होंगे। हेडमास्टर थे शायद। हड़बड़ाकर खड़े हो गए और अधिकारी महोदय को नमस्ते ठोंका। नमस्ते में सम्मान कम भय ज्यादा था। मैं बैठे-बैठे गिनती का कार्य करता रहा। सीईओ साहब को मेरा खड़े होकर नमस्ते ना करना नागवार गुजरा। 

बोले "क्या तुम्हें इतनी भी तमीज नहीं है कि अपने सीनियर अधिकारी का खड़े होकर सम्मान करो?"

मैंने बैठे-बैठे ही जवाब दिया, "क्या मेरे सीनियर अधिकारी को इतनी भी तमीज नहीं है कि रात आठ बजे वे तन्मयता से अपने कर्तव्य का पालन करने वाले कर्मचारी की तारीफ करने के बजाय उससे खड़े होने की अपेक्षा कर रहे हैं?"

सीईओ साहब अब आग बबूला होते हुए मुझे मेरी औकात दिखाते हुए बोले, "होगे कोई शिक्षाकर्मी!" 

मैं मतपत्रों की गिनती भूल चुका था। सो खड़ा हो गया और उनकी आंखों में आंखें डालकर कहा, "जी हां, संविदा शिक्षक हूं। नियमित शिक्षकों की नियुक्तियां पिछले कुछ सालों से नहीं निकली है। यदि निकलतीं तो मैं भी नियमित कर्मचारी होता।"

अब तो साहब लाजवाब होते हुए बोले, "ज्यादा बात न करो, तुम्हारी उम्र के मेरे दो लड़के हैं।" 

साहब ऊंचे थे। मैं ठिंगना था। साहब सर झुकाए हुए सुन रहे थे जब मैंने सर उठाकर कहा, "यह तो कोई योग्यता ना हुई सर। यदि मेरी उम्र आपके बराबर होती तो दो क्या, मैं चार बच्चे पैदा कर देता।"

साहब तमतमाते हुए चले गए। 

इस घटना का उल्लेख मैंने अपने मित्रों, रिश्तेदारों से कुछ एक बार किया। बड़े अभिमान और आत्मश्लाघा के साथ। 

पर अब मैं खुद भी जब एक अधिकारी/महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में दूसरे संस्थानों में जाता हूं, तो एक दुबकी, अलसाई, उनींदी सी इच्छा होती है सम्मान की। लेकिन यदि वे अपने कार्य में तन्मय है तो सम्मान पाने की इस उनींदी सी इच्छा को मैं सुला देता हूं फिर दोबारा कभी किसी अवसर पर अर्धचेतन होने के लिए।

सम्मान पाने की इच्छा बड़ी स्वाभाविक है। लेकिन सम्मान की इच्छा कब, कैसे और किससे हो यह जानना आवश्यक और उपयोगी है। 

सामान्यतः व्यक्ति परिचित लोगों से ही सम्मान की इच्छा करता है। परिचित लोगों से सम्मान मिलने से खुशी होती है। अपरिचित लोगों से सम्मान मिलने में अत्यंत खुशी होती है। अपने से छोटों से सम्मान प्राप्त करने में अच्छा लगता है। अपने से बड़े और प्रतिभाशाली लोगों से सम्मान प्राप्त करने में बहुत अच्छा लगता है। स्वार्थ सिद्धि हेतु किया गया सम्मान दिल को खटकता है। निःस्वार्थ भाव से किया गया सम्मान हृदय को स्पर्श करता है। 

यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि सम्मान किसका किया जा रहा है। एक अधिकारी बहुत खुश हो सकतीं है क्योंकि बहुत से लोग उनका सम्मान करते हैं। उन्हें यह समझना चाहिए कि यह सम्मान कदाचित उनके पद का हो, न कि उनके व्यक्तित्व का। इसलिए अक्सर ऐसा होता है की पद जाने के बाद सम्मान भी चला जाता है। जिन्होंने विचार, कर्म, और वाणी के माध्यम से सचमुच पद में रहते हुए अच्छा कार्य किया है, पद छूटने के बाद भी उनका सम्मान बना रहता है।

जब कोई अच्छा कार्य करें तो उसकी सम्मान प्राप्त करने की इच्छा स्वाभाविक है, मानवीय है। अच्छा कार्य करने के उपरांत भी सम्मान की इच्छा ना होना दैवीय है। बिना योग्यता अर्जित किए सम्मान की इच्छा एक विकार है, राक्षसी प्रवृत्ति है।

सम्मान करना और सम्मान की अभिव्यक्ति करना दोनों अलग-अलग हो सकते हैं। हो सकता है कि किसी व्यक्ति के प्रति आप सम्मान का भाव रखते हैं लेकिन आप अभिवादन या अन्य तरह से इसे अभिव्यक्त नहीं करते तो मैं समझता हूं यह सम्मान करना नहीं हुआ। इसे मैं कृपण प्रवृत्ति कहूंगा। 

उम्र के उस दौर में इसी कृपणतावश मैं सीईओ साहब का सम्मान करने में विफल रहा। उस पूरे घटनाक्रम को इस तरह भी देखा जा सकता था "मेरे वरिष्ठ अधिकारी कितने कर्तव्यनिष्ठ हैं कि रात आठ बजे हमारा कुशलक्षेम और व्यवस्था देखने के लिए स्वयं यहां आए हैं। चलूं, मैं खड़े होकर इनका सम्मान करूं।" 

कुछ सालों बाद मुझे ऐसा एहसास हो गया था। और तब से मैं अपरिचित लोगों से जी नमस्ते और राम-राम करने लगा हूं। और नमस्ते का अर्थ - मेरे भीतर का ईश्वर तुम्हारे भीतर थे ईश्वर को प्रणाम करता है - भी पता चल गया इसी दौरान।

लेख लिखते लिखते सम्मान की मूर्छित इच्छा फिर चेत आई है। इसलिए इसे प्रकाशन हेतु अपने मित्र को भेज रहा हूं।
-✍️प्रहलाद पाण्डेय
वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Friday, 12 June 2026

"कभी-कभी सबसे बड़ा त्याग सच बोलना नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी बचाने के लिए चुप रहना होता है।"

"जब पूरे गाँव ने बूढ़ी औरत को चोर कहा, तब उसने कुछ नहीं कहा... लेकिन मरने से एक दिन पहले पंचायत के बीच एक पुराना बक्सा रख दिया, और कहा— 'अब फैसला तुम करो।'"
बरसों पुरानी बात है।
मध्य प्रदेश के एक छोटे से गाँव में 72 साल की गोमती बाई रहती थीं।
पति का देहांत हुए पंद्रह साल हो चुके थे। एक बेटा था—रमेश। वही उनका सहारा था।
रमेश शहर में मजदूरी करता था और महीने में एक-दो बार घर आ जाता था।
गोमती बाई पूरे गाँव में अपनी ईमानदारी के लिए जानी जाती थीं।
लेकिन एक दिन ऐसा हुआ कि उनकी पूरी जिंदगी पर दाग लग गया।
गाँव के सबसे अमीर आदमी धर्मपाल चौधरी के घर से पाँच लाख रुपये और कुछ सोने के गहने गायब हो गए।
पूरा गाँव हैरान था।
चोरी किसने की?
कई दिन तक खोजबीन हुई।
फिर किसी ने बताया कि चोरी वाली रात गोमती बाई चौधरी के घर के पास दिखाई दी थीं।
बस...
इतनी सी बात ने आग में घी डाल दिया।
लोग फुसफुसाने लगे।
"गरीबी ने आखिर ईमानदारी हरा दी।"
"बुढ़ापे में लालच आ गया होगा।"
"कौन सोच सकता था कि गोमती ऐसा करेंगी?"
पंचायत बैठी।
सबके सामने गोमती बाई को बुलाया गया।
धर्मपाल चौधरी गरजकर बोले—
"सच-सच बता दो। पैसा कहाँ छिपाया है?"
गोमती बाई चुप रहीं।
सरपंच ने पूछा—
"तुम उस रात वहाँ थीं?"
गोमती बाई ने धीरे से कहा—
"हाँ।"
बस...
यही सुनते ही पूरा गाँव उनके खिलाफ हो गया।
"देखा! खुद मान रही है।"
"चोर है।"
"पुलिस को सौंप दो।"
लेकिन गोमती बाई ने न चोरी मानी, न सफाई दी।
सिर्फ इतना बोलीं—
"जिस दिन समय आएगा, सच खुद सामने आ जाएगा।"
लोगों ने इसे अपराधी की चाल समझा।
उस दिन के बाद उनका जीना मुश्किल हो गया।
कुएँ पर औरतें बात करना बंद कर देतीं।
बच्चे उन्हें देखकर "चोर दादी" कहकर भाग जाते।
दुकानदार उधार देना तो दूर, ठीक से बात तक नहीं करते।
सबसे ज्यादा दर्द उन्हें तब हुआ जब उनका अपना बेटा रमेश भी उनसे नाराज़ हो गया।
"अम्मा, अगर आपने कुछ किया है तो मुझे बता दो। मैं किसी तरह मामला संभाल लूँगा।"
गोमती बाई की आँखें भर आईं।
"बेटा, अगर तेरी माँ चोर होती तो तुझे ईमानदारी सिखाने का हक नहीं रखती।"
रमेश चुप हो गया, लेकिन उसके मन का शक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
समय गुजरता गया।
दो साल बीत गए।
गोमती बाई अकेली पड़ गईं।
फिर एक दिन अचानक उनकी तबीयत बहुत खराब हो गई।
डॉक्टर ने कहा—
"शायद ज्यादा समय नहीं है।"
यह खबर पूरे गाँव में फैल गई।
मरने से एक दिन पहले गोमती बाई ने सरपंच को बुलाया।
कहा—
"कल पूरे गाँव को बुला लेना। मुझे सबके सामने एक बात कहनी है।"
अगले दिन पंचायत चौपाल पर लगी।
पूरा गाँव जमा था।
बीच में गोमती बाई चारपाई पर लेटी थीं।
उनके पास एक पुराना लोहे का बक्सा रखा था।
धर्मपाल चौधरी भी आए हुए थे।
गोमती बाई ने काँपते हाथों से बक्से की चाबी सरपंच को दी।
"इसे सबके सामने खोलिए।"
बक्सा खुला।
अंदर पुराने कागज, कुछ तस्वीरें और एक कपड़े की पोटली थी।
पोटली खुली।
उसमें वही गहने थे जो दो साल पहले चोरी हुए थे।
पूरा गाँव सन्न रह गया।
धर्मपाल चौधरी उछल पड़े।
"देखा! मैं कहता था ना, चोरी इसी ने की थी!"
भीड़ में शोर मच गया।
लेकिन तभी गोमती बाई बोलीं—
"अभी सब कुछ नहीं देखा तुम लोगों ने।"
उन्होंने एक पुरानी डायरी निकलवाई।
डायरी के बीच में एक पत्र रखा था।
"इसे जोर से पढ़ो।"
सरपंच ने पढ़ना शुरू किया।
पत्र धर्मपाल चौधरी के छोटे बेटे महेन्द्र का था।
जो दो साल पहले घर छोड़कर कहीं चला गया था।
पत्र पढ़ते-पढ़ते सरपंच की आवाज काँपने लगी।
पत्र में लिखा था—
"पिताजी, मैं आपके गहने और पैसे लेकर जा रहा हूँ। मैंने जुए में बहुत कर्ज कर लिया है। अगर सच सामने आया तो आपकी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी।"
"गोमती काकी ने मुझे चोरी करते देख लिया था। उन्होंने मुझे पकड़ लिया। मैं उनके पैरों में गिर पड़ा। मैंने कहा अगर आप मुझे पुलिस के हवाले कर देंगी तो पिताजी सदमे से मर जाएँगे।"
"उन्होंने मुझे जाने दिया, लेकिन गहने और बाकी सामान अपने पास रख लिया ताकि एक दिन सच सामने ला सकें।"
"उन्होंने कहा— जब तक मैं खुद लौटकर अपने अपराध को स्वीकार न करूँ, तब तक वे किसी से कुछ नहीं कहेंगी।"
पूरा चौपाल सन्नाटे में डूब गया।
धर्मपाल चौधरी का चेहरा पीला पड़ गया।
गोमती बाई ने धीमे स्वर में कहा—
"उस रात मैंने चोरी नहीं की थी... मैंने एक बाप को टूटने से बचाया था।"
सबकी आँखें झुक गईं।
"अगर मैं सच बता देती, तो तुम्हारा बेटा जेल जाता। तुम शायद सदमे से मर जाते। मैंने सोचा था वह लौट आएगा और अपनी गलती मान लेगा।"
"लेकिन वह कभी नहीं लौटा।"
धर्मपाल चौधरी रो पड़े।
"गोमती... मैंने तुझे चोर कहा... पूरे गाँव के सामने अपमानित किया..."
गोमती बाई मुस्कुराईं।
"दर्द तो हुआ था चौधरी... बहुत हुआ था। लेकिन किसी की जिंदगी बचाने की कीमत अगर बदनामी थी... तो मुझे मंजूर थी।"
भीड़ में कई लोग रो रहे थे।
रमेश अपनी माँ के पैरों में गिर पड़ा।
"अम्मा... मैं भी आप पर शक करता रहा..."
गोमती बाई ने उसके सिर पर हाथ रखा।
"बेटा, दुनिया का सबसे भारी बोझ गलत इल्जाम नहीं होता... अपने लोगों का अविश्वास होता है।"
उस शाम पूरा गाँव रो रहा था।
और उसी रात...
गोमती बाई हमेशा के लिए दुनिया छोड़ गईं।
अगले दिन उनकी अंतिम यात्रा में पूरा गाँव शामिल हुआ।
धर्मपाल चौधरी नंगे पैर सबसे आगे चल रहे थे।
श्मशान पहुँचकर उन्होंने सबके सामने कहा—
"आज हमने एक औरत नहीं खोई... हमने इंसानियत की सबसे बड़ी मिसाल खो दी।"
कुछ महीनों बाद गाँव के चौक में गोमती बाई की एक छोटी सी प्रतिमा लगाई गई।
उसके नीचे सिर्फ एक पंक्ति लिखी गई—
"कभी-कभी सबसे बड़ा त्याग सच बोलना नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी बचाने के लिए चुप रहना होता है।"
और जब भी गाँव में किसी पर बिना सबूत आरोप लगाने की बात होती, लोग उस प्रतिमा की तरफ देखकर चुप हो जाते।
क्योंकि उन्हें याद आ जाता था कि एक बार उन्होंने एक देवी को चोर समझ लिया था। ❤️

Vandna Tripathi ✍️