किन्तु जैसे ही कोई पत्थर दयानन्द का आकार धारण करता है, वह 'सत्य' की मूर्ति बन जाता है और उसके सामने श्रद्धा व सम्मान प्रकट करना वैदिक हो जाता है।
इनके अनुसार, देवताओं की मूर्तियाँ अंधविश्वास हैं, दयानन्द की मूर्ति प्रेरणा है। देवताओं की मूर्तियों के आगे हाथ जोड़ना अज्ञान है, दयानन्द की मूर्ति के आगे हाथ जोड़ना जागृति है।
कैसा विलक्षण दोगलापन है!
दयानन्द की प्रत्येक मूर्ति, आर्यसमाजियों द्वारा दयानन्द के मुँह पर मारा जाने वाला तमाचा है। इस मूर्ति के प्रति प्रकट की जाने वाली श्रद्धा दयानन्द को गाली है। हाथ जोड़ना, पुष्प चढ़ाना, दीप जलाना तो मानो दयानंदियों द्वारा ही स्वामी जी की लात-घूँसों से की जा रही पूजा है।
दयानन्द में इतनी समझ थी कि वे जानते थे कि भविष्य में मूर्ख दयानंदी उनकी मूर्ति बनाकर पूजने लगेंगे। इसीलिए उन्होंने मूर्ति तो छोड़िए, अपने चित्र बनाने और टाँगने का भी निषेध कर दिया था। स्पष्ट कहा था कि - "आर्यसमाज के मंदिरों में मेरे चित्र मत टाँगना।"
लेकिन दयानंदियों ने अपने हर स्थान दयानन्द के चित्र और मूर्तियों से पाट डाले।
दयानन्द की हर मूर्ति, दयानन्द और दयानन्द के सिद्धान्त की हार है तथा सनातन धर्म के सिद्धान्त की विजय है।
अदृश्य और अमूर्त के प्रति श्रद्धा को व्यक्त करने का सबसे सरल-सहज माध्यम उसका कोई दृश्य, मूर्त प्रतीक ही होता है। यही मूर्तिपूजा है।
शचीन्द्र शर्मा
( 27/7/2026) फेसबुक पोस्ट से