आर्यसमाजियों की वेदो के प्रति बिलकुल भी श्रद्धा या निष्ठा नहीं है। ये आर्यसमाजी मूर्खचर, स्वामी दयानन्द की ही बात को वेद-वाक्य मानकर, वेद-विरुद्ध सिद्धांतो को मानते है और वेदसम्मत सिद्धांतो को नकारते है। इसका उदाहरण देखिये ---
अथर्ववेद के अनेको मंत्रो में सूर्य आदि ग्रहों से सुख, शान्ति व रोगों को दूर करने की प्रार्थना की गयी हैं। अथर्ववेद के कई वेद-मंत्रो में स्पष्ट ही ग्रह-शान्ति की बात की गयी है। अब अगर हम वेदो से इन्हे प्रमाण दिखाये तो ये मूर्ख कहेंगे कि - ये गलत अर्थ है । इसलिए हम इसका प्रमाण, आर्यसमाज से प्रकाशित वेदभाष्य से ही दिखाएंगे।
अथर्ववेद का मंत्र है ----
"अपेतों वायो सविता च दुष्कृतमप रक्षान्सि शिमिदां च सेघतम् । ४ ।
अर्थात -- हे पृथ्वी और सूर्य , तुम दोनों यहा से मलिन काम को हटा दो। निवारणीय रोगो और कर्म छेदन करने वाली पीड़ा को नष्ट कर दो । तुम दोनों हमे कष्ट से छुड़ाओ ।
अथर्ववेद के ही मंत्र -
"रयि मे पोष सवितोत वायुस्तन दक्षमा सुवतां सुशेवम्।"
में सूर्य और पवन से प्रार्थना की गयी है कि वे सुखदायक धन, पुष्टि और बल प्रदान करे व कष्टो से छुड़ावे ।
रक्षतु त्वा द्यौ रक्षतु पृथ्वी सूर्येश्च त्वा रक्षतां चंद्रमाश्च ॥
अर्थात -- ईश्वर तेरी रक्षा करे, पृथ्वी रक्षा करे, सूर्य और चंद्रमा तेरी रक्षा करे । और रक्षा किससे करे ??
क्रव्यादभि - - अर्थात पशु , रोग आदि से और --- स्तौमि द्यावापृथिवि नाथितों जाहवीमि ते नो मुश्चतमंहस: ---॥
अर्थात --- शोक के अधीन होकर में सूर्य और पृथ्वी की स्तुति करता हून, और बार बार पुकारता हूं , तुम दोनों हमे कष्ट से छुड़ाओ।
यह अर्थ आर्यसमाज से प्रकाशित वेदभाष्य से है, जिनमे स्पष्ट ही सूर्य,चन्द्र आदि से प्रार्थनाए की गयी हैं, कष्टो से छुड़ाने की। इसी प्रकार के अनेक मंत्र ग्रहो से प्रार्थना के वेदो में मिलते है। आर्यसमाजी अब इन्हे ईश्वर बोधक भी नहीं कह सकते क्यो कि, मंत्र में ईश्वर का बोलने के बाद, सूर्य चंद्रमा आदि से रक्षा की प्रार्थना की गयी है। और 'स्तौमि ... " मंत्र में कहा गया - "तुम दोनों हमे कष्टो से छुड़ाओ। जिससे ये स्पष्ट है कि प्रार्थना , इन्ही ग्रहो से की जा रही है । जिन्हे कि मूर्ख वेदविरोधी आर्यसमाजी जड़ बताते है।
अब ऋषियों के प्रति भी इनकी निष्ठा देखिये - आयुर्वेद को उपवेद माना जाता हैं, तो आयुर्वेद की प्राचीन संहिताओ में भी ग्रह-पीड़ा का स्पष्ट वर्णन है, जैसे सुश्रुत-संहिता चरक संहिता में स्पष्ट कहा गया है कि –
“ग्रहों और नक्षत्रो के प्रभाव से बड़े बड़े जनपद उजड़ जाते हैं।"
“जिस व्यक्ति के ग्रह गर्हित स्थान में आ जाते हैं , वह विनष्ट हो जाता हैं । “
क्या यह भी गलत है, केवल दयानंद सही ?
याज्ञवल्क्य-स्मृति के आचाराध्याय में, वेद-मंत्रो का ग्रहशांति हेतु नव-ग्रहों की पूजा में विनियोग बताया गया हैं. क्या याज्ञवल्क्य भी वेद-मंत्रो के अर्थ नहीं जानते थे ?
बृहत्पराशर स्मृति में भी वेद-मंत्रो का विनियोग नवग्रहों की पूजा के लिए हुआ हैं।
“बोधायन गृह्सूत्र में भी वेदमंत्रो का ग्रहपूजा के लिए विनियोग है, तो क्या बोधायन भी वेदमंत्रो का अर्थ नहीं जानते थे ?
जैमिनी गृह्सूत्र में व वैखानस गृह्सूत्र के भी गृह-शान्ति प्रकरण में वेद-मंत्रो का विनियोग किया गया हैं..
इसके अतिरिक्त भी अनेको प्रमाण दिए जा सकते है किन्तु इतने से ही प्रत्यक्ष सिद्ध है कि – वेदों से, उपवेदों से, श्रौत-सूत्रों से, गृह्सूत्रों से सिद्ध ग्रह-पूजा का प्राचीन ऋषियों ने विधान किया हैं। किन्तु अवैदिक आर्यसमाजी किसी को नहीं मानते , वह वेदों को, वैदिक-ग्रंथो को, ऋषियों को केवल वही तक मानते है, जहा तक दयानंद का उनसे विरोध न हो ...जहा जहा वेदों तक का स्वामी दयानन्द की बात से विरोध दिखे, तो ये वेदों को किनारे रखकर , स्वामी दयानन्द के वचन को ही ‘स्वतः प्रमाण’ मानते है।
ये आर्यसमाज के क्षेमकरण दास त्रिवेदी का भाष्य हैं, जिसमें स्पष्ट ही सूर्य और वायु से प्रार्थना की जा रही हैं। ऐसे सैकड़ो मंत्र वेद में है, जिनमें इन ग्रहों से प्रार्थना की गई हैं। श्रौत सूत्रों गृह्यसूत्रों में इन वेद मंत्रो का विनियोग ग्रह शांति आदि हेतु किया गया हैं। आप देखे इतने स्पष्ट वेद प्रमाणों और ऋषि कृत ग्रंथो के प्रमाण को भी आर्यसमाजी स्वीकार नहीं करते हैं। बल्कि वे क्या करते है - इन मंत्रो के उल्टे अर्थ करके वेद मत को छिपाना चाहते हैं, जैसा कि आर्यसमाज के कई भाष्यकारों ने किया। ऐसे वेदमंत्रो के अर्थ व्याकरण निरुक्त ब्राह्मण ग्रंथ आदि सभी के विरुद्ध जाकर मनमाने कर दिए, ताकि स्वामी जी का सिद्धान्त बचा रहे , वेद और ऋषियों के सिद्धान्त की चाहे हत्या करनी पड़े।
साभार - शचींद्र शर्मा