जय श्री बाल कृष्ण
Friday, 4 September 2026
!!कर्षति आकर्षति इति कृष्णः!!
!!कर्षति आकर्षति इति कृष्णः!!
कृष्ण के अनंत स्वरूप हैं। अपनी अपनी मूल प्रकृति के अनुसार भारत की हर भाषा, हर बोली, हर सांस्कृतिक-समूह, हर उपासना पद्धति, हर प्रान्त-जनपद ने कृष्ण को बारम्बार सुमिरा है।
हर दर्शन परम्परा, हर एक आयातित निर्यातित विचारधारा ने कृष्ण को येन केन प्रकारेण भजा है।
अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत हो या आधुनिक लेफ्टिस्म, फेमिनिज्म़ जैसे वाद। कृष्ण का संक्रामक आकर्षण सबको है।
शांकर दार्शनिकों को लुभाता कृष्ण-काली ऐक्य हो या राधा-कृष्ण अद्वैत हो। तनिक स्त्रैण सौंदर्य वाले, तीन माताओं वाले सौभाग्यशाली त्रयम्बक 'मम्मास् ब्वाय' मातृशक्तियों को लुभाते हैं।तो एंटी इस्टेब्लिशमैंट प्रकृति वालों को इन्द्र,वरुण,कुबेर,अग्नि,ब्रह्मा,काम,नाग का मानमर्दन करने वाले क्रांतिकारी देवदमन श्रीकृष्ण पसंद आते हैं। नागरों को द्वारिकाधीश, ग्राम्यों को गोकुल का लल्ला,बौद्धिकों को गीता-गीतकार, प्रेमियों को राधावल्लभ, नीतिज्ञों को महाभारत-सूत्रधार पसंद हैं। संगीत-रस मर्मज्ञ वंशी पर मोहित हैं, टैगोर कह चुके 'तोमार वांशि आमार प्राणे बेजे छे'। मल्ल योद्धा को चाणूर-मुष्टिक मर्दनम् पर आसक्ति है। और सुकुमारियों के आकर्षण पर कहने ही क्या।
अनासक्त योगीश्वर महादेव तक तो आसक्त हैं।
यशोदा का आदेशात्मक स्वर पहचानिए शिव के लिए:-" जब-जब मेरौ लाला रोबै,तब-तब दरसन दीजै।"
मिथक और इतिहास की परिधि से बहुत बाहर कृष्ण का एक रूप भारत भाव-रूप भी है। गोप संस्कृति का गोपाल दक्षिण में कण्णन है। भारतीय कलाओं का मादन-मोहन-रमण-आकर्षण तत्व उड़िया में जगन्नाथ है।वही दक्षिण में तिरुपति, वेणुगोपाल और वरदराज हैं तो उत्तराखंड में बदरीनाथ हैं ।मराठों के बिठोवा गर्वीले गुजरातियों के द्वारकानाथ और राजपूताने में श्रीनाथ हैं।
कृष्ण के राष्ट्र-नायक स्वरूप और राष्ट्र-निर्माण की रचना प्रक्रिया को समझना होगा। युगधर्म का यही संदेश है।
ध्यान रहे कि उस समय अश्वमेध राजसूय आदि यज्ञ श्रेष्ठता की स्वीकृति थे कोई स्वामित्व या दास्य बोध नहीं। कब्जा करने की परिपाटी तो संभवतः मगध के नन्द वंश से शुरू हुई। उसके पहले एक राज्य की पहचान उसके देवता, ध्वज, संस्कृति, गुरू, भोजन शैली, समृद्धि,कला आदि से अधिक थी भौगोलिक स्थिति से कम।
एक तरफ जैसे जैसे सरस्वती का जल सूखता जाता है वैसे ही मगध और मथुरा की शत्रुता और प्रगाढ़ होती जाती है। हिरण्यवती की स्वामिनी अन्नवती सरस्वती के प्रवाह-क्षेत्र में क्रमशः आती रिक्तता के कारण एक बड़ी जनसंख्या गंगा-आप्लावित भूभाग की तरफ शनैः शनैः 'पलायन' कर रही है। मथुरा और मगध के वैवाहिक संबंधों ने वैमनस्य कम जरूर किया है पर यह पर्याप्त नहीं। इस वैमनस्य के मूल में शक्ति असंतुलन है। मगध मध्य भारत के अपने यादव सहयोगियों चेदिराज(बुंदेलखंड), विदर्भराज भीष्मक, रूक्मी, करवीर-राज (आज का कोल्हापुर) आदि के कारण अति महत्वाकांक्षी है।
दूसरी तरफ 'कुरु' राजवंश है जिसपर अनेक राजा रजवाड़ों रियासतों की भृकुटि पहले से ही टेढ़ी है। गांधार क्रुद्ध हैं कि अन्धे धृतराष्ट्र से गांधारी का विवाह उनके साथ विद्रूप छल है। उनका श्रेष्ठतम रणनीतिकार 'राजकुमार शकुनि' उसी छल के बदले के लिए हस्तिनापुर में ही विराज रहा है। काशीनरेश स्पष्टतः खिन्न और अप्रसन्न हैं कि उनकी तीन अनिंद्य सुंदरी राजकुमारियों को भीष्म अपहृत कर ले गए। अपहरण के बाद का अपमान तो किसी भी स्त्री का भयंकरतम भीषणतम अपमान होगा।
कुरुवंश का अर्थ तंत्र 'आदिबद्री' से निकलने वाली वेदस्मृति सरस्वती पर निर्भर है। वेदवती सरस्वती की कलाएं दिन प्रतिदिन क्षीण हो रही हैं। मुख्य धारा के सूखने से इसकी सहायिकाएं कालिन्दी यमुना और सदानीरा शतद्रु अर्थात सतलुज भी क्षीणकाय होती जा रही हैं। और क्षीण हो रही है 'कुरु' की आभा। एक जड़त्व घेर रहा है उसे।
उधर जड़मति किंकर्तव्यविमूढ 'पांचाल'! कभी यह कुरु और मगध के बीच 'बफर स्टेट' रहे। अभी इनकी स्थिति इन दो महाशक्तियों के बीच 'स्विंग स्टेट' की है। पर जैसा कि द्रौपदी के स्वयंवर के समय मागध सामंतों, राजकुमारों और राज्याश्रयी गुप्तचरों की उपस्थिति से सिद्ध होता है कि पांचाल अब मगध की तरफ झुकने लगे थे। तिस पर द्रोण द्वारा अपने पुराने मित्र पांचालनरेश को बलपूर्वक दण्डित करना।
हालांकि इस दण्डित करने के प्रयास में पाण्डुपुत्र राजकुमार युधिष्ठिर एक अलग स्तर का राजनीतिक 'एक्यूमेन' प्रदर्शित करते हैं जब वह दुर्योधन के पांचालों द्वारा परास्त होने के बाद अर्जुन भीम के साथ बिना कुरु-वंश के ध्वज के लड़ते हैं।
यहाँ दो सगे वृष्णिवंशी भाई जो सहोदर भी हैं और नहीं भी। संकर्षण बलराम और कृष्ण जो महाविलासी अभिमानी कंस के भान्जे हैं अपने आततायी मामा का वध कर देते हैं। कृष्ण दोनों मामियों को ससम्मान गिरिव्रज (आधुनिक राजगीर) भेजते हैं। मथुरा में एक रिक्तता का निर्माण हो जाता है। नए राजा 'एक रबर स्टैम्प' हैं और बहुत हद तक 'प्रो-मगध साफ्ट पालिसी' रखते हैं।
उधर चालाक मगध मथुरा पांचाल और कुरु की वास्तविकता को समझता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार जरासन्ध मथुरा पर कुल सत्रह बार आक्रमण करता है। पर हलधर-चक्रधर वृष्णि-बंधु हर बार उसके आक्रमण को विफल करते हैं। अन्तिम अठारहवें आक्रमण की योजना जरा अलग है। पश्चिम से पर्शियन म्लेच्छराज कालयवन जो लूटपाट की नीयत रखता है और पूर्व से मागध जरासंध जो यदुकुल के विनाश और मथुरा पर अधिकार की मंशा रखता है, दोनों एक साथ आक्रमण करते हैं।
'रणछोड़' तपस्वी मुचुकुन्द की सहायता से कालयवन का वध करते हैं फिर दोनों भाई दक्षिण दिशा में भाग लेते हैं। 'यदु' की प्रभाव सीमा के बाहर जाकर वह मगध के हितैषी करवीर-नरेश श्रगाल का वध करते हैं। मागध सैन्य-शक्ति से बचने छिपने के क्रम में दोनों भाई गोमांतक प्रदेश यानि कि आज के गोवा और कोंकण पहुंचते हैं।
एक घनघोर तटीय वन में मागध सेना को घेर वहाँ आग लगा देते हैं। हताश निराश जरासंध वापस मगध लौट जाता है।
यहाँ से दक्षिणापथ मार्ग पर यह दोनों वृष्णिवंशी श्रीविद्यापरमाचार्य विष्णु के छठे अवतार'जामदग्नेय परशुराम' से मिले। श्री हरिवंश के अनुसार तो कृष्ण को सुदर्शन चक्र भी यहीं परशुराम से ही प्राप्त हुआ।
बार बार के आक्रमणों से प्रजा की रक्षा के लिए यदुकुल की राजधानी द्वारिका स्थानांतरित की गई।शूरसेन यादव पूरे सौराष्ट्र, पश्चिमी घाट, दक्खिनी पठार और सिंध तक फैल गए। बिल्कुल जैसा विस्तार बहुत बाद में मराठों का हुआ था एक बार।
यमुना सरस्वती का लगभग बंजर इलाका पांडवों को दिया और गंगा बेसिन रिजर्व का उपजाऊ क्षेत्र दुर्योधन ने अपने पास रखा था। यही समय था जब भारतीय राजनीति में इन दो वृष्णि वंशी भाइयों का शानदार पदार्पण हुआ। वाचाल छलिया अनुज को पता है कितना कैसे कहाँ कब बोलना है उधर महीधर अग्रज कब चुप रह जाना है यह जानते हैं, सुभद्रा हरण और महाभारत युद्ध इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
कृष्ण बलराम ने वंचित पाण्डवों के साथ सहृदयता का संबंध बना लिया। यहीं योगेश्वर श्रीकृष्ण को एक सुयोग्य 'निमित्तमात्र सव्यसाचिन्' भी मिल जाते हैं। यह वृष्णि-पाण्डव गठबंधन प्रजा की अभिलाषाओं के अनुरूप ' खाण्डव दाह' भी करते हैं। 'कृष्णार्जुन' से भयभीत अनार्य 'नाग' और असुर सिंधु घाटी की उपरी उपत्यकाओं की तरफ भागने को विवश होते हैं जहाँ 'तक्षक' के नेतृत्व में तक्षशिला नगर बसाया जाता है।
खाण्डवप्रस्थ की इस घटना के समय ही युद्ध बंदी 'मयासुर' को अभयदान देकर कृष्ण अनार्यों का भी हृदय जीत लेते हैं। इन्हीं अनार्यों के विश्वकर्मा के माध्यम से इंद्रप्रस्थ और द्वारिका का निर्माण कराया जाता है जो भारतीय स्थापत्य के अद्भुत उदाहरण बने।
यह द्वारिका-इंद्रप्रस्थ गठबंधन वैसे तो माधवी राजनीतिक शैली थी पर इसे कृष्णार्जुनी आक्रमण समझा गया जो कुरु के विरोध तथा मगध के विकल्प के तौर पर उभर रही थी। भ्रमित पांचाल सदा के लिए इनके साथ हो लिए।
उधर जरासंध का प्रभाव अवन्तिका तक पहुँच रहा था जहां उसके पक्षधर विन्द और अनुविन्द का राज्य था। मगध कुरू और द्वारका को घेरने के प्रयास में था तो उधर कृष्ण ने विदर्भ की राजकुमारी रूक्मिणी, उज्जैन की राजकुमारी तथा अपने वंश की भी एक कन्या से विवाह संबंध बनाकर अपनी स्थिति बहुत मजबूत कर ली।
पाण्डव अभी भी कुरू वंश के ही भाग थे। तो,दुर्योधन भी कहाँ कम रणनीतिकार थे। मित्र कर्ण को अंग देश (उत्तरी बंगाल/उड़ीसा) ही क्यों दिया? क्योंकि मगध को वहाँ से नियंत्रित किया जा सकता था और सूर्यपुत्र कर्ण कलिंग में हुए एक द्वन्द युद्ध में पहले ही जरासन्ध को परास्त कर चुके थे।
यहाँ से कृष्ण के राजनीतिक कौशल का असल खेल शुरू होता है। कृष्ण अपने हर स्वरूप में अतुलनीय हैं पर थोड़ी 'पोएटिक फ्रीडम' के साथ उनकी तुलना चाणक्य या फिर गाडफादर-१ के डान कार्लियोन से कर सकते हैं।
कृष्ण के उद्देश्य और द्वारिका-इन्द्रप्रस्थ धुरी के लिए तात्कालिक चुनौती थी कि मगध नरेश जरासंध को भारत के राजनीतिक परिदृश्य से सदा सदा के लिए हटा दिया जाए। यहाँ कृष्ण-अर्जुन-भीम की तिकड़ी ने लगभग वैसा ही गेम प्लान बनाया जैसा कि शिवाजी ने शाइस्ता खान के लाल महल में अंजाम दिया।
जरासंध और भीम को द्वन्द युद्ध के लिए तैयार कर लेना एक बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक के ही वश की बात थी। लक्षणा में कहा जाए तो एक तरफ साठ हजार हाथियों के बल वाला वृद्ध जरासंध जिसकी मृत्यु का तरीका रहस्य है दूसरी तरफ दस हजार गजशक्ति युक्त युवा भीम जिसे आश्वस्त किया गया है कि जरासंध अपराजेय नहीं है क्योंकि कुछ वर्ष पहले कर्ण के हाथों वह पहले पराभव फिर क्षमादान प्राप्त कर चुका है।
भीम के हाथों जरा की मृत्यु के बाद कृष्ण कामरूप (असम) के आततायी शासक नरकासुर को मारकर उसके पुत्र भगदत्त को वहाँ प्रतिष्ठित करते हैं। जरासंध के पुत्र सहदेव की भगिनी का विवाह सुंदर नकुल से कराने का प्रस्ताव भी होता है। पश्चात, पौंड्र प्रदेश(मध्य बंगाल) के नकलची राजा पौंड्रक का वध करते हैं।
चंद्रवंश और सूर्यवंश ने भी एक बड़े समय तक जिस यज्ञ के आयोजन का साहस न किया उस 'राजसूय' के लिए महाराज युधिष्ठिर कैसे तैयार हो गए? इस रहस्य के सूत्रधार भी कृष्ण ही थे। अर्जुन भीम सात्यकि धृष्टद्युम्न आदि के भुजबल कृष्ण के चातुर्य और युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा ने अंग को छोड़ समूचे पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्र को अपना बना लिया। नागकन्या उलूपी, मणिपुर की चित्रांगदा आदि से अर्जुन के विवाहों ने भी इन्हें शक्ति दी। राजसूय के समय शिशुपाल वध ने इनकी शक्ति को आधिकारिक प्रतिष्ठा दी।
दूसरे वृष्णि वंशीय शेषावतार संकर्षण की तीर्थयात्राओं ने भारत को और मजबूती से जोड़ने का काम किया। वह वर्तमान पाकिस्तान के अटक में सिन्धु-कुभा संगम तक गए।
रोहिणीनन्दन सीरपाणी अपने प्रतिलोम सरस्वती यात्रा के क्रम में प्रभास, पृथुदक, त्रितकूप, बिंदुसर, चक्रतीर्थ नैमिष, विशाल, ब्रह्मतीर्थ, सरयू, हरिद्वार, गोंती, गंडकी,गया, शोणभद्र, विपाशा,परशुराम क्षेत्र,वेणा, पंपा, सप्तगोदावरी,दुर्गा देवी, त्रिगर्त, केरल,श्रीरंग, मदुरै, दण्डकारण्य, अर्या देवी, कांची, कावेरी, कामोष्णी, सेतुबंध, कृतमाला,पयोष्णी, ताम्रपर्णी, नर्मदा अनेकानेक स्थानों को एकसूत्र जोड़ते चले गए।
सम्पूर्ण भारत और भारतवंशी उन वृष्णिवंशी भाइयों का ऋणी है।
धूमधाम से इनका जन्मोत्सव मनाया जाए।
सभी को शुभकामनाएं, बधाई
गोपिका-वृन्द-मध्यस्थं, रास-क्रीडा-स-मण्डलम्।
क्लम प्रसति केशालिं, भजेऽम्बुज-रूचि हरिम्।।
😋मधुसूदन
कृष्ण जन्माष्टमी, वि. सं. २०७६
( पुनः शेयर कृष्ण जन्माष्टमी वि. सं. २०८३ )
एक कथानक और सारांश ! "
" श्रीकृष्ण जन्म के साथ योगमाया का जन्म "
एक कथानक और सारांश ! "
श्रीकृष्ण के प्राण बचाने के लिए उसी दिन जन्मी हुई जिस बालिका को उनसे बदला गया था, उसे कोई स्मरण नहीं करता। बालक की जान का मोल था, लेकिन उस बच्ची का जन्म ही अपने प्राणों का बलिदान करने के लिए हुआ था। आज का दिन न केवल श्रीकृष्ण का जन्मदिन है, बल्कि उस योगमाया का भी जन्मदिन है।
कहा जाता है कि योगमाया कंस की पकड़ से छूटकर स्वर्ग चली गई थी और उन्होंने कंस से कहा था कि तुम्हारा काल (तुम्हें मारने वाला) पैदा हो चुका है। धर्मग्रंथों में साफ तौर पर यह नहीं बताया गया है कि श्रीकृष्ण के दूसरे भाई-बहनों की तरह उसकी भी हत्या कर दी गई थी ? हालाँकि, जो लोग इस प्रकरण या कथानक के बारे में ज्यादा जानते हैं, उनसे मेरा अनुरोध है कि वे इस पर प्रकाश डालें। क्योंकि ये योगमाया वाला प्रकरण और जेल के भारी भरकम लोहे के दरवाजों और बेड़ियों आदि का अपने आप खुल जाना एक काल्पनिक बात के साथ अंधश्रद्धा रूपी तत्व को बढ़ावा देना अवश्य लगता है। तथापि कोई तो घटना है इस योगमाया के संदर्भ में ?
योगमाया भी शक्ति का ही एक अवतार थी, जो भगवान विष्णु के अवतार के साथ एक पुराना वचन पूरा करने के लिए पैदा हुई थी। जब कंस ने उस योगमाया को पैरों से पकड़कर जमीन पर पटका, तो वे यह कहते हुए आकाश की ओर उड़ गईं कि "कंस, तेरा वध करने वाला तो पहले ही जन्म ले चुका है। मैं भी तुझे मार सकती थी, लेकिन चूँकि तूने मुझे मेरे पैरों से पकड़ा, इसलिए मैं इसे तेरी विनम्रता मानती हूँ और तुझे क्षमा करती हूँ।"
[ये सब कुछ पृथक व्याख्या मांगता है]
कृष्ण का जन्म मध्य रात्रि के अंधेरे में, जेल की बंद कोठरी में हुआ था। लेकिन, उनके जन्म के समय सभी पहरेदार सो गए, बेड़ियाँ टूट गईं और सलाखों वाले दरवाजे धीरे से खुल गए। ठीक वैसे ही, जैसे ही हमारे दिलों में कृष्ण (चेतना) का जन्म होता है, सारा अंधेरा (नकारात्मकता) मिट जाता है। सारी बेड़ियाँ (अहंकार, 'मैं' की भावना) टूट जाती है। और वे सभी जेल के दरवाजे जिनमें हम स्वयं को कैद रखते हैं (जाति, धर्म, पेशा, रिश्ते आदि), वे खुल जाते हैं।
यही जन्माष्टमी का असली संदेश और सार है।
पहली गाली पर सर काटने की शक्ति होने बाद भी यदि 99 और गाली सुनने का 'सामर्थ्य' है, तो वो श्रीकृष्ण हैं।
'सुदर्शन' जैसा शस्त्र होने के बाद भी यदि हाथ में हमेशा 'मुरली' है, तो वो श्रीकृष्ण हैं।
'द्वारिका' का वैभव होने के बाद भी यदि 'सुदामा' मित्र है, तो वो कृष्ण हैं।
'मृत्यु' रुपी नाग के फन पर उपस्थित होने पर भी यदि 'नृत्य' है, तो वो श्रीकृष्ण हैं।
'सर्व-सामर्थ्य' होने पर भी यदि 'सारथी' बने थे, तो वो श्रीकृष्ण हैं।
आप सभी को सपरिवार सुदर्शन चक्रधारी, योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र के आज जन्मोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ..!!!!
साभार - श्री सुधीर बंसल, फरीदाबाद
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🙏 सादर 🙏
*_❀ वयं राष्ट्रे जागृयाम ❀_*
Wednesday, 2 September 2026
गीता का उपदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
॥ॐ॥
*श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष-*
गीता का उपदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है
सफेद घोड़ों से जुते हुए विशाल रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अपने दिव्य शंख बजाये, अभिप्राय था कि यदि कौरव युद्घ का शंखनाद कर चुके हैं तो पाण्डव भी अब युद्घ के लिए तैयार हैं। कृष्ण ने अपना पांचजन्य, अर्जुन ने अपना देवदत्त भीम ने अपना पौण्ड्र, युधिष्ठिर ने अपना अनन्त विजय, नकुल व सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए। इसी प्रकार की शंखध्वनि अन्य महारथियों ने अपने-अपने रथों से करनी आरम्भ की।
इसी समय अर्जुन ने अपने सारथी श्रीकृष्ण को आदेश दिया कि ”हे अच्युत! आप मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाकर खड़ा कीजिए। जिससे मैं युद्घ के लिए उपस्थित योद्घाओं को अपनी आंखों से देख सकूं। मैं यह भी देखना चाहता हूं कि कौन-कौन लोग हैं जिनसे मुझे युद्घ करना पड़ेगा?”तब श्रीकृष्ण जी ने भीष्म, द्रोण व अन्य उपस्थित राजाओं के समक्ष अपना रथ खड़ा करके अर्जुन को कहा कि-
सम्मुख तेरे सब खड़े राजा, भूप, नरेश।
रणचण्डी बलि मांगती सुनो वीर गुडाकेश।।
युद्घ के लिए सन्नद्घ खड़े योद्घा स्वेच्छा से अपनी-अपनी बलि देने या किसी की बलि चढ़ाने के लिए यहां आये थे। स्वाभाविक था कि दोनों पक्षों के योद्घाओं की बलि रणचण्डी की भेंट चढऩी थी। प्रत्येक योद्घा अपनी-अपनी जीत सुनिश्चित मानकर युद्घ के लिए यहां पर उपस्थित है। दोनों पक्ष के योद्घा यह मानकर युद्घक्षेत्र में आये हैं कि युद्घ के पश्चात अपने शत्रु पक्ष को हराकर वह ही इस भूमण्डल पर राज करेगा।
इसी समय एक दूसरी घटना घटित हो गयी कि अपने सगे सम्बन्धियों को इस कार्य के लिए उद्यत खड़े देखकर अर्जुन के शरीर में कंपकंपी सी आने लगी। उसने अपने सगे सम्बन्धियों को अपने आपसे ही लडऩे के लिए इस प्रकार खड़े देखकर आश्चर्य व्यक्त किया। उसे यह अपेक्षा नहीं थी कि तुझे यहां इतने सारे अपनों से युद्घ करना पड़ेगा ?ऐसी द्वन्द्वात्मक मानसिकता में फंसा अर्जुन श्रीकृष्णजी से कहने लगा कि-”मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुंह सूखा जा रहा है। शरीर में कंपकंपी उठ रही है, रोम खड़े हो रहे हैं। मेरे हाथ से गांडीव फिसला जा रहा है, त्वचा में दाह हो रहा है, मुझसे खड़ा नहीं रहा जाता, और मुझे चक्कर से आ रहे हैं। हे केशव! मुझे सारे लक्षण उल्टे ही दिखायी दे रहे हैं। युद्घ में अपने बन्धु-बान्धवों की हत्या करके कुछ भला होने वाला नहीं है। जिससे अब मुझे अपनों को मारकर ही मिलने वाली किसी विजय की अभिलाषा भी नहीं रही है। इतना ही नहीं, यदि मेरे अपनों से लडक़र ही मुझे राज्य मिलेगा तो मुझे ऐसे किसी राज्य की इच्छा नहीं रही है। मुझे सुखों की इच्छा भी नहीं है। सचमुच ऐसा राज्य लेकर क्या करना और सुखों का उपभोग करके भी क्या करना है ? -जो अपनों को मारकर ही प्राप्त किये जाते हैं।
हे केशव! जिनसे राज्य भोग तथा सुख की इच्छा की थी वे सब प्राण तथा धन का मोह त्यागकर युद्घ में आ खड़े हुए हैं। आचार्य, पिता, पुत्र, पितामह, मामा, श्वसुर, पौत्र, साले तथा अन्य सम्बन्धी युद्घभूमि में आ खड़े हैं। यदि इन लोगों के द्वारा मैं मार भी दिया जाऊं या तीनों लोकों के राज्य के हेतु भी मैं इनको मारने की इच्छा नहीं करता, फिर इस पृथ्वी के राज्य का तो कहना ही क्या है?”
अर्जुन को आज ‘अपनों’ का सामना करना पड़ रहा है। वह नहीं चाहता कि इन अपनों को मारकर किसी प्रकार का राज्य भोगा जाए या कोई किसी प्रकार का सुख प्राप्त किया जाए। यही कारण है कि वह अपने ताऊजात भाईयों अर्थात धृतराष्ट्र पुत्रों को भी मारने में स्वयं को असमर्थ और असहाय अनुभव कर रहा है। वह कहता है कि अपनों को ही मारकर हम किस प्रकार सुखी रह सकते हैं? अर्जुन कहता है कि अपनों को मारना कुल क्षय करने के समान है। कुल क्षय होने से, पुरूषों का नाश होने से कुल की परम्पराएं बिगड़ जाती हैं, मर्यादाएं नष्ट हो जाती हैं, जिससे सम्पूर्ण कुटुम्ब और सम्पूर्ण समाज में अधर्म का बोलबाला हो जाता है। कुटुम्ब की महिलाएं बिगड़ जाती हैं, भ्रष्ट हो जाती हैं, जिससे वर्ण संकर हो जाता है, विभिन्न जातियों का मिश्रण हो जाता है। अन्तत: जाति-धर्म और राष्ट्र सब दूषित हो जाते हैं। नष्ट हो जाते हैं। ऐसा विनाश मचाने वाले लोग अनन्त काल तक नरक में बसते हैं। इसलिए मैं ऐसा पाप नहीं करूंगा जिससे समाज कुल व राष्ट्र की मर्यादाएं बिगड़ें।
ऐसा कहकर अर्जुन ने अपने हथियार रख दिये और वह अपने रथ के पिछले भाग में जाकर बैठ गया।
बस, यही वह स्थिति है जिसने ‘गीता’ का उपदेश देने के लिए कृष्ण जी को विवश कर दिया था। गीताकार ने इस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए जितने भी श्लोक रचे वे सब हमें कुछ न कुछ मौलिक सन्देश देते हैं। यह सन्देश जितना महाभारत के समय उपयोगी था-उतना ही आज भी है। गीताकार ने स्थिति को स्पष्ट करने के लिए विषय को विस्तार दिया है। इस बात को ध्यान में रखते हुए हमें स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए। 70 श्लोकी गीता में यह विषय विस्तार नहीं है। वह सीधे इस श्लोक से आरम्भ हो जाती है-
दृष्टवेमं स्वजनं कृष्णयुयुत्सु समुपस्थितम्।
न च श्रेयो अनुपश्यामि हत्वा स्वजन माहवे।
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्य सुखानि च।।
अर्थात हे कृष्ण! अपने इष्ट मित्र, बन्धु बान्धवों को युद्घ की इच्छा से यहां पर एकत्र हुए देखकर मैं असीम दु:ख की अनुभूति कर रहा हूं। इन अपनों को मारकर मैं अपना कोई लाभ होता नहीं देख रहा। हे कृष्ण ! इस प्रकार की विजय राज्य और सुख की मुझे थोड़ी सी भी इच्छा नहीं है।
अगले श्लोक में अर्जुन कहता है कि ऐसी स्थिति में यदि मुझको धृतराष्ट्र की सन्तानें मार भी दें तो भी मेरा कल्याण ही होगा।इस पर कृष्ण जी ने अर्जुन को मानसिक अवसाद की इस स्थिति से उबारने के लिए गीतोपदेश देना आरम्भ किया।उन्होंने हथियार फेंक कर रथ के पृष्ठभाग में जा बैठे अर्जुन के भीतर व्याप्त हो गए कायरता के भावों को निकालने का प्रयास करते हुए गीता का उपदेश देना आरंभ किया। अर्जुन को समझाया कि तू आज जिस प्रकार की बचकानी हरकत कर रहा है, यह तेरे धर्म के अनुकूल नहीं है। ऐसी हरकत तेरी वीरता को कलंकित कर रही है। आज जब राक्षसों के संहार का सही समय आ गया है तो तुझे इस प्रकार का आचरण न करके उनके संहार के लिए स्वयं को प्रस्तुत करना चाहिए ।
बस, यही वह भाव है जो गीता को सनातन बनाता है। गीता का यह उपदेश राष्ट्र के संदर्भ में आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना श्री कृष्ण जी के काल में प्रासंगिक था। इसीलिए गीता हमारे लिए प्रेरणास्पद ग्रंथ बन जाता है।
डॉ राकेश कुमार आर्य
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
वयं राष्ट्रे जागृयाम
यह वह दर्द है जो गोस्वामी तुलसीदास की वाणी में उभर कर आया था ।
गोस्वामी तुलसीदास का लोटा चुराया, सोटा चुराया और उनकी भाँति भाँति से निन्दा भी की !..
यह वह दर्द है जो गोस्वामी तुलसीदास की वाणी में उभर कर आया था ।
मैं अपनी दिस कीन्ह निहोरा ,
तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा ।
बायस पलिअहिं अति अनुरागा ,
होंहि निरामिस कबहुं कि कागा ॥
मैंने तो अपनी ओर से विनती ही की है , किन्तु क्या वे दुष्टता से चूकेंगे ? आप कौओं को पालियेगा किन्तु वे मांसाहार नहीं त्यागेंगे।
गगन चढहिं रज पवन प्रसंगा ,
कीचहिं मिलहि नीच जल संगा ।
साधु असाधु सदन सुक सारी ,
सुमिरहिं राम देंहि गनि गारी ॥
हवा का संग पा कर धूल आकाश में चढ़ जाती है और वही धूल पानी के संग में कीच बन जाती है !
साधु के यहाँ के तोता-मैना राम राम रटते हैं और दुष्ट के घर के तोता-मैना गिन गिन कर गालियाँ देते हैं !
बूंद अघात सहहि गिरि कैसे.
खल के बचन सन्त सहि जैसे।
पर्वत पर वर्षा की बूंदें आघात कर रही हैं सन्त भी इसी प्रकार से खलवचन को सहन कर लेते हैं ।
हरि हर जस राकेस राहु से ,
पर अकाज भट सहसबाहु से ।
जे पर दोष लखहिं सहसाखी ,
पर हित घृत जिनके मन माखी ॥
सामान्य व्यक्ति की तो बात ही क्या ? वे हरि और हर के भी यश के लिए उसी प्रकार हैं , जैसे चन्द्रमा के लिए राहु ! किसी के भी यश के लिए वे राहु की तरह ग्रसने वाले हैं ! दूसरों के हित के विरुद्ध वे सहस्रबाहु की तरह हैं !
दूसरों के दोष देखने के लिए वे सहस्र आँख वाले हैं , दूसरों के हित के लिए वे ऐसे हैं , जैसे घी में मक्खी !
पर अकाज लगि तनु परिहरहीं ,
जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं ।
बन्दउँ खल जस सेष सरोषा ,
सहस बदन बरनहिं पर दोषा ॥
गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि मैं उन दुष्टजन की वन्दना करता हूँ , वे क्रोध के साथ दूसरों के दोष का बखान करने के लिए शेष नाग के समान हजार मुख वाले हैं ! जो परमार्थ में विघ्न करने के लिए अपने प्राण भी दे सकते हैं , जैसे ओले खेत का नाश कर के स्वयं भी नष्ट हो जाते हैं !
बहुरि बंदि खल गन सति भाँए ,
जे बिनु काज दाहिने बाँए ।
पर हित हानि लाभ जिन केरें ,
उजरे हरख बिसाद बसेरें ॥
गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि मैं सच्चे भाव से उन दुष्टों की वन्दना करता हूँ , जो बिना प्रयोजन के ही दाहिने बाँए लगे रहते हैं !
गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि दूसरों की हित-हानि ही जिनके जीवन का एक मात्र पुरुषार्थ है , दूसरों को उजाड़ कर जिनको प्रसन्नता होती है और दूसरा कोई बस जाता है तो वे दुखी हो जाते हैं !
भलौ भलाइह पै लहइ ,
लहइ निचाइह नीच ।
सुधा सराहिय अमरता
गरल सराहिय मीच ॥
भला भलाई को ग्रहण करता है और नीच नीचता को ही प्राप्त करता है ,अमृत की प्रसिद्धि अमरता के लिए है और विष की प्रसिद्धि मृत्यु के लिए ।
उपजहिं एक संग जग माँहीं ,
जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं ।
सुधा सुरा सम साधु असाधू ,
जनक एक जग जलधि अगाधू ॥
कमल और जोंक जल में ही पैदा हुए किन्तु एक सुख देता है और दूसरा खून चूसता है । अमृत और शराब हालाँकि समुद्र से ही जनमे हैं , किन्तु दोनों में कितना अन्तर है ? शराब मोह प्रमाद और जड़ता में जकड़ देती है और अमृत जीवन की शक्ति हैं।
रंजन चतुर्वेदी
योगविद्या द्वारा व्यक्तित्व और समाज का सर्वांगीण तेज
योगविद्या द्वारा व्यक्तित्व और समाज का सर्वांगीण तेज
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आत्मने मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व।
ओजसे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व।
आयुषे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व।
विश्वाभ्यो मे प्रजाभ्यो वर्चोदसौ वर्चसे पवेथाम्॥
(यजुर्वेद : अध्याय ७ मन्त्र २८)
• अर्थ : हे (वर्चोदाः) योग और ब्रह्मविद्या देने वाले विद्वन्! आप (मे) मेरे (आत्मने) इच्छादि गुणयुक्त चेतन के लिये (वर्चसे) अपने आत्मा के प्रकाश को (पवस्व) प्राप्त कीजिये। हे (वर्चोदाः) उक्त विद्या देने वाले विद्वन्! आप (मे) मेरे (ओजसे) आत्मबल होने के लिये (वर्चसे) योगबल को (पवस्व) जनाइये। हे (वर्चोदाः) बल देने वाले! (मे) मेरे (आयुषे) जीवन के लिये (वर्चसे) रोग छुड़ाने वाले औषध को (पवस्व) प्राप्त कीजिये। हे (वर्चोदसौ) योगविद्या के पढ़ने-पढ़ाने वालो! तुम दोनों (मे) मेरी (विश्वाभ्यः) समस्त (प्रजाभ्यः) प्रजाओं के लिये (वर्चसे) सद्गुण प्रकाश करने को (पवेथाम्) प्राप्त कराया करो। भावार्थ : योगविद्या के विना कोई भी मनुष्य पूर्ण विद्यावान् नहीं हो सकता और न पूर्णविद्या के विना अपने स्वरूप और परमात्मा का ज्ञान कभी होता है और न इसके विना कोई न्यायाधीश सत्पुरुषों के समान प्रजा की रक्षा कर सकता है, इसलिये सब मनुष्यों को उचित है कि इस योगविद्या का सेवन निरन्तर किया करें।
(संदर्भ ग्रन्थ स्वामी दयानन्द कृत यजुर्वेद भाष्य)
• अर्थ-चिंतन : इस मन्त्र का मुख्य भाव यह है कि मनुष्य परमात्मा से अपने आत्मिक, मानसिक, शारीरिक तथा सामाजिक जीवन में वर्चस् और सामर्थ्य की वृद्धि की प्रार्थना करे। यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य का विकास किसी एक पक्ष तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसके आत्मिक, मानसिक, शारीरिक और सामाजिक - सभी आयामों का संतुलित उत्थान आवश्यक है। इसी उद्देश्य से मन्त्र बार-बार "वर्चोदाः" और "वर्चसे पवस्व" जैसे पदों का प्रयोग करता है।
मन्त्र का आरम्भ "आत्मने मे" से होता है। इसका आशय है कि मनुष्य का अन्तःकरण, उसका विवेक और आत्मचेतना ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हों। "वर्चोदाः" का अर्थ है - तेज, ज्ञान और आध्यात्मिक प्रकाश प्रदान करने वाला। मन्त्र में यह सम्बोधन ऐसे विद्वान् आचार्य के लिए है जो योगविद्या और ब्रह्मविद्या का उपदेश देता है। ऐसा गुरु शिष्य के भीतर आत्मज्ञान का दीप प्रज्वलित करता है, जिससे वह अपने वास्तविक स्वरूप, कर्तव्य और परमात्मा के साथ अपने सम्बन्ध को समझ सके। यही कारण है कि मन्त्र में "वर्चसे पवस्व" कहकर उस ज्ञानमय प्रकाश की प्राप्ति की प्रार्थना की गई है।
इसके बाद मन्त्र कहता है - "ओजसे मे वर्चादा वर्चसे पवस्व।" यहाँ ओजस् का अर्थ है शारीरिक बल, जीवनी-शक्ति, उत्साह और कार्यक्षमता। ज्ञान तभी फलदायी बनता है जब उसके साथ स्वस्थ शरीर और सशक्त व्यक्तित्व भी जुड़ा हो। योग, संयमित जीवन, उचित आहार, नियमित व्यायाम तथा अनुशासित दिनचर्या मनुष्य के ओज को बढ़ाते हैं। आधुनिक स्वास्थ्य-विज्ञान भी स्वीकार करता है कि नियमित योगाभ्यास, शारीरिक सक्रियता और मानसिक संतुलन शरीर की प्रतिरोधक क्षमता, ऊर्जा तथा कार्यक्षमता को बढ़ाते हैं।
अगला पद है - "आयुषे मे वर्चादा वर्चसे पवस्व।" इसका अभिप्राय दीर्घ, स्वस्थ और उपयोगी जीवन की कामना है। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ रोगों को दूर करने वाली औषधियों का सेवन आदि स्वास्थ्य-संरक्षण के व्यावहारिक उपाय भी अपनाने चाहिए। आयु का महत्त्व उसकी लम्बाई से अधिक उसके स्वास्थ्य, सदुपयोग और लोकहितकारी कर्मों में निहित है। योग, ब्रह्मचर्य, सात्त्विक जीवन, उचित चिकित्सा और औषधि - ये सभी दीर्घ एवं स्वस्थ जीवन के साधन हैं।
मन्त्र का अंतिम भाग - "विश्वाभ्यो मे प्रजाभ्यो वर्चोदसौ वर्चसे पवेथाम्" - व्यक्ति से आगे बढ़कर समाज की ओर संकेत करता है। यहाँ प्रार्थना की गई है कि समस्त प्रजा, समस्त संतति और समाज के सभी वर्ग ज्ञान, सद्गुण, चरित्र और तेज से सम्पन्न हों। एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण तभी होता है जब उसके नागरिक शिक्षित, स्वस्थ, नैतिक और कर्तव्यनिष्ठ हों। इसलिए वैदिक शिक्षा का लक्ष्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं, बल्कि समस्त समाज का उत्थान है।
वेदभाष्यकार ने मन्त्र के भावार्थ में विशेष रूप से कहा है कि योगविद्या के बिना मनुष्य पूर्ण विद्वान् नहीं बन सकता। योग के अभाव में आत्मा और परमात्मा का यथार्थ ज्ञान प्राप्त नहीं होता, और न ही मनुष्य न्याय, विवेक तथा उत्तरदायित्व के साथ समाज का नेतृत्व कर सकता है। इस प्रकार योग आत्मानुशासन, मनोनिग्रह, ज्ञान और ईश्वर-साक्षात्कार की ओर ले जाने वाली समग्र साधना है; शारीरिक व्यायाम उसका एक अंग मात्र है।
यह मन्त्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है। आधुनिक शिक्षा यदि ज्ञान के साथ चरित्र, स्वास्थ्य, आत्मबल और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करे, तभी उसका उद्देश्य पूर्ण होगा। वैदिक दृष्टि में सच्चा तेज वही है जो व्यक्ति को भीतर से प्रकाशित करे, उसके जीवन को स्वस्थ और उद्देश्यपूर्ण बनाए तथा उसके माध्यम से परिवार, समाज और राष्ट्र का भी कल्याण हो। यही इस मन्त्र का ऐसा सिद्धान्त है, जो देश, काल और परिस्थिति से परे सदैव प्रासंगिक रहता है।
-- ✍️भावेश मेरजा
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साभार डॉ विवेक आर्य
वयं राष्ट्रे जागृयाम
Sunday, 30 August 2026
मनुष्य पर पड़ने वाले ग्रहो के प्रभाव ।
स्वामी दयानन्द , मनुष्य पर पड़ने वाले ग्रहो के प्रभाव को नहीं मानते थे,इसी कारण वे ग्रहशांति, ग्रहपूजा को भी पाखंड और मूर्खता कहा करते थे। अब स्वामी दयानन्द की किसी भी उलजुलूल बात को ब्रह्म-वाक्य और अंतिम सत्य मानते हुये आर्यसमाजी भी मूर्खतापूर्ण उदाहरण देकर इस वेद-विरोधी बात का समर्थन करते है।
आर्यसमाजियों की वेदो के प्रति बिलकुल भी श्रद्धा या निष्ठा नहीं है। ये आर्यसमाजी मूर्खचर, स्वामी दयानन्द की ही बात को वेद-वाक्य मानकर, वेद-विरुद्ध सिद्धांतो को मानते है और वेदसम्मत सिद्धांतो को नकारते है। इसका उदाहरण देखिये ---
अथर्ववेद के अनेको मंत्रो में सूर्य आदि ग्रहों से सुख, शान्ति व रोगों को दूर करने की प्रार्थना की गयी हैं। अथर्ववेद के कई वेद-मंत्रो में स्पष्ट ही ग्रह-शान्ति की बात की गयी है। अब अगर हम वेदो से इन्हे प्रमाण दिखाये तो ये मूर्ख कहेंगे कि - ये गलत अर्थ है । इसलिए हम इसका प्रमाण, आर्यसमाज से प्रकाशित वेदभाष्य से ही दिखाएंगे।
अथर्ववेद का मंत्र है ----
"अपेतों वायो सविता च दुष्कृतमप रक्षान्सि शिमिदां च सेघतम् । ४ ।
अर्थात -- हे पृथ्वी और सूर्य , तुम दोनों यहा से मलिन काम को हटा दो। निवारणीय रोगो और कर्म छेदन करने वाली पीड़ा को नष्ट कर दो । तुम दोनों हमे कष्ट से छुड़ाओ ।
अथर्ववेद के ही मंत्र -
"रयि मे पोष सवितोत वायुस्तन दक्षमा सुवतां सुशेवम्।"
में सूर्य और पवन से प्रार्थना की गयी है कि वे सुखदायक धन, पुष्टि और बल प्रदान करे व कष्टो से छुड़ावे ।
रक्षतु त्वा द्यौ रक्षतु पृथ्वी सूर्येश्च त्वा रक्षतां चंद्रमाश्च ॥
अर्थात -- ईश्वर तेरी रक्षा करे, पृथ्वी रक्षा करे, सूर्य और चंद्रमा तेरी रक्षा करे । और रक्षा किससे करे ??
क्रव्यादभि - - अर्थात पशु , रोग आदि से और --- स्तौमि द्यावापृथिवि नाथितों जाहवीमि ते नो मुश्चतमंहस: ---॥
अर्थात --- शोक के अधीन होकर में सूर्य और पृथ्वी की स्तुति करता हून, और बार बार पुकारता हूं , तुम दोनों हमे कष्ट से छुड़ाओ।
यह अर्थ आर्यसमाज से प्रकाशित वेदभाष्य से है, जिनमे स्पष्ट ही सूर्य,चन्द्र आदि से प्रार्थनाए की गयी हैं, कष्टो से छुड़ाने की। इसी प्रकार के अनेक मंत्र ग्रहो से प्रार्थना के वेदो में मिलते है। आर्यसमाजी अब इन्हे ईश्वर बोधक भी नहीं कह सकते क्यो कि, मंत्र में ईश्वर का बोलने के बाद, सूर्य चंद्रमा आदि से रक्षा की प्रार्थना की गयी है। और 'स्तौमि ... " मंत्र में कहा गया - "तुम दोनों हमे कष्टो से छुड़ाओ। जिससे ये स्पष्ट है कि प्रार्थना , इन्ही ग्रहो से की जा रही है । जिन्हे कि मूर्ख वेदविरोधी आर्यसमाजी जड़ बताते है।
अब ऋषियों के प्रति भी इनकी निष्ठा देखिये - आयुर्वेद को उपवेद माना जाता हैं, तो आयुर्वेद की प्राचीन संहिताओ में भी ग्रह-पीड़ा का स्पष्ट वर्णन है, जैसे सुश्रुत-संहिता चरक संहिता में स्पष्ट कहा गया है कि –
“ग्रहों और नक्षत्रो के प्रभाव से बड़े बड़े जनपद उजड़ जाते हैं।"
“जिस व्यक्ति के ग्रह गर्हित स्थान में आ जाते हैं , वह विनष्ट हो जाता हैं । “
क्या यह भी गलत है, केवल दयानंद सही ?
याज्ञवल्क्य-स्मृति के आचाराध्याय में, वेद-मंत्रो का ग्रहशांति हेतु नव-ग्रहों की पूजा में विनियोग बताया गया हैं. क्या याज्ञवल्क्य भी वेद-मंत्रो के अर्थ नहीं जानते थे ?
बृहत्पराशर स्मृति में भी वेद-मंत्रो का विनियोग नवग्रहों की पूजा के लिए हुआ हैं।
“बोधायन गृह्सूत्र में भी वेदमंत्रो का ग्रहपूजा के लिए विनियोग है, तो क्या बोधायन भी वेदमंत्रो का अर्थ नहीं जानते थे ?
जैमिनी गृह्सूत्र में व वैखानस गृह्सूत्र के भी गृह-शान्ति प्रकरण में वेद-मंत्रो का विनियोग किया गया हैं..
इसके अतिरिक्त भी अनेको प्रमाण दिए जा सकते है किन्तु इतने से ही प्रत्यक्ष सिद्ध है कि – वेदों से, उपवेदों से, श्रौत-सूत्रों से, गृह्सूत्रों से सिद्ध ग्रह-पूजा का प्राचीन ऋषियों ने विधान किया हैं। किन्तु अवैदिक आर्यसमाजी किसी को नहीं मानते , वह वेदों को, वैदिक-ग्रंथो को, ऋषियों को केवल वही तक मानते है, जहा तक दयानंद का उनसे विरोध न हो ...जहा जहा वेदों तक का स्वामी दयानन्द की बात से विरोध दिखे, तो ये वेदों को किनारे रखकर , स्वामी दयानन्द के वचन को ही ‘स्वतः प्रमाण’ मानते है।
ये आर्यसमाज के क्षेमकरण दास त्रिवेदी का भाष्य हैं, जिसमें स्पष्ट ही सूर्य और वायु से प्रार्थना की जा रही हैं। ऐसे सैकड़ो मंत्र वेद में है, जिनमें इन ग्रहों से प्रार्थना की गई हैं। श्रौत सूत्रों गृह्यसूत्रों में इन वेद मंत्रो का विनियोग ग्रह शांति आदि हेतु किया गया हैं। आप देखे इतने स्पष्ट वेद प्रमाणों और ऋषि कृत ग्रंथो के प्रमाण को भी आर्यसमाजी स्वीकार नहीं करते हैं। बल्कि वे क्या करते है - इन मंत्रो के उल्टे अर्थ करके वेद मत को छिपाना चाहते हैं, जैसा कि आर्यसमाज के कई भाष्यकारों ने किया। ऐसे वेदमंत्रो के अर्थ व्याकरण निरुक्त ब्राह्मण ग्रंथ आदि सभी के विरुद्ध जाकर मनमाने कर दिए, ताकि स्वामी जी का सिद्धान्त बचा रहे , वेद और ऋषियों के सिद्धान्त की चाहे हत्या करनी पड़े।
साभार - शचींद्र शर्मा
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