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Tuesday, 10 February 2026

शीशम महिलाओं के लिए अमृत से कम नहीं है।।

शीशम महिलाओं के लिए अमृत से कम नहीं है।।

शीशम का पेड़ काफी बड़ा वृक्ष होता है, जो औषधीय गुणों का भंडार है, इस पौधे में कई ऐसे पोषण तत्व होते हैं, जो शरीर के लिए काफी फायदेमंद होते हैं,इस पेड़ मे कई औषधीय गुण पाए जाते हैं।

हमारे आसपास ऐसे कई प्रकार के औषधीय पेड़ और झाड़ियां हैं, जो शरीर के लिए काफी फायदेमंद होते हैं,यह हमारे स्वास्थ्य को ठीक करने में अपना एक अहम योगदान रखते हैं, क्योंकि इन औषधीयों का आयुर्वेद में काफी बड़ा महत्व है।

जो पेड़ आसानी से हर जगह आपको देखने के लिए मिल जाएगा। इस पेड़ के फल, फूल, छाल और पत्तियां, हर चीज काफी महत्व है।
अगर पेट में जलन हो रही हो, तो शीशम के पत्तों का रस या काढ़ा पीना बहुत लाभदायक होता है।

 और इसके पत्तों का शरबत पीने से सेहत को कई लाभ होते हैं, शीशम के पत्तों का शरबत बनाकर पीने से पाचन शक्ति बेहतर होती है, इसके साथ ही नियमित रूप से इसका सेवन करने से गैस, अपच और एसिडिटी में आराम मिलता है।

 इसका रस पीने से ओरल हेल्थ में सुधार होता है और जिन लोगों को मुंह से बदबू आती है या दांतों का दर्द व मसूड़ों में तकलीफ होती है, तो वो लोग भी इसके पत्तों को चबाकर समस्या ठीक कर सकते हैं।

आंखों की बीमारी जैसे आंखों में होने वाली जलन , सूजन आंखो का लाल होना इन सबमें में शीशम का इस्तेमाल फायदा पहुंचाता है। शीशम के पत्ते के रस में मधु मिलाकर 1-2 बूंदें आंखों में डालने से आंखों के रोग में आराम मिलता है।

शीशम का तेल चर्म रोगों पर लगाने से लाभ पहुँचता है। इससे खुजली भी ठीक हो जाती है।
शीशम के पत्तों के लुआब को तिल के तेल में मिला लें। इसे त्वचा पर लगाने से त्वचा की बीमारियों में लाभ होता है।

महिलाएं स्तनों में सूजन की बीमारी में भी शीशम का इस्तेमाल कर सकती हैं। शीशम के पत्तों को गर्म कर स्तनों पर बांधें। इससे और इसके काढ़े से स्तनों को धोने से स्तनों की सूजन मिट जाती है।
हैजा के इलाज के लिए 5 ग्राम शीशम के पत्ते में 1 ग्राम पिप्पली, 1 ग्राम मरिच तथा 500 मिग्रा इलायची मिलाएं। इसे पीसकर 500 मिग्रा की गोली बना लें। 2-2 गोली सुबह और शाम देने से हैजा में लाभ होता है।

आप दस्त को रोकने के लिए भी शीशम का उपयोग कर सकते हैं। शीशम के पत्ते, कचनार के पत्ते तथा जौ लें। तीनों को मिलाकर काढ़ा बनाएं। 
अब 10-20 मिली काढ़ा में मात्रानुसार घी तथा दूध मिला लें। इसे मथकर पिच्छावस्ति देने से दस्त पर रोक लगती है।
मूत्र रोग जैसे पेशाब का रुक-रुक कर आना, पेशाब में जलन होना, पेशाब में दर्द होना आदि में भी शीशम उपयोगी साबित होता है। 20-40 मिली शीशम के पत्ते का काढ़ा बनाएं। इसे दिन में 3 बार पिलाएं। इससे पेशाब का रुक-रुक कर आना, पेशाब में जलन होना, पेशाब में दर्द होना आदि में लाभ होता है। इसके साथ ही 10-20 मिली पत्ते काढ़ा का सेवन करने से वसामेह में लाभ होता है।

रक्त संचार को सही रखने में भी शीशम का प्रयोग करना अच्छा रहता है। 5 मिली शीशम के पत्ते के रस में 10 ग्राम चीनी तथा 100 मिली दही मिलाकर सेवन करने से रक्त संचार या ब्लड शर्कुलेशन ठीक रहता है।
रक्त विकार को ठीक करने के लिए शीशम के 3-6 ग्राम सूखे चूर्ण का शरबत बनाकर पिलाएं। इससे रक्त विकार का ठीक होता है।
त्वचा रोगों के लिए फायदेमंद है,शीशम के पत्तों का पेस्ट त्वचा पर लगाने से फोड़े, मुंहासे और फुंसियां दूर होती हैं। साथ ही यह त्वचा की रंगत को भी सुधारता है

इंफेक्शन से बचाव में मददगार है,शीशम के पत्तों में मौजूद एंटी-बैक्टीरियल गुण शरीर को इंफेक्शन से बचाने में मदद करते हैं। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाने का काम करते हैं।
 शीशम का रस शरीर को अंदर से साफ करने यानी डिटॉक्स करने में मदद करता है। इससे शरीर हल्का महसूस होता है और त्वचा भी साफ दिखाई देती है।

अर्थराइटिस के दर्द में आराम जोड़ों के दर्द और सूजन में शीशम के पत्तों का काढ़ा पीने से राहत मिलती है। पत्तों का पेस्ट सीधे जोड़ों पर लगाना भी असरदार होता है।

चोट और घाव में राहत चोट लगने या घाव होने पर शीशम के पत्तों का पेस्ट लगाने से दर्द कम होता है और घाव जल्दी भरता है। यह प्राकृतिक हीलिंग में मददगार है।

महिलाओं के लिए शीशम बेहद गुणकारी है इसके 20 पत्ते लेकर मिश्री मिलाकर पीस लें और पी जाएं तो लिकोरिया सफेद पानी को खत्म कर देगा
अधिक माहवारी आती है तो भी यही प्रयोग करें लाभ होगा
उसी तरह से पुरुषों के लिए काम करता है विधि वही है जो ऊपर वर्णित है

विशेष टिप्पणी - ये पोस्ट सिर्फ जानकारी देती है शीशम का सेवन किसी आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही करें 🙏,,,

बहुत कम लोग आंसुओं की निजता को समझते हैं ..

वे मोबाइल के प्रचलन में आने के शुरुआती दिन थे । आउट गोइंग कॉल के छह रूपये एक मिनिट के और इनकमिंग कॉल का एक रुपया चार्ज होता था । एस.टी.डी की दरें इससे कुछ सस्ती हुआ करती थीं।

एक छोटे से शहर के एक एस.टी.डी बूथ पर रोज एक लड़की शाम के के ठीक सात बजे आया करती थी । दिनभर की दौड़-भाग से थकी हुई, क्लांत और उदास चेहरे वाली लड़की पुलिस की वर्दी में होती जिस पर नेमप्लेट नहीं होती थी लेकिन कंधे के दो स्टार बताते थे कि वह सब-इंस्पेक्टर है।

लड़की अपनी सरकारी जीप खुद ड्राइव करती हुई आती और लगभग पन्द्रह से बीस मिनिट एक नम्बर पर फोन करती । बूथ के अंदर एक छोटा सा ग्लास का केबिन बना हुआ था जिसे वह अंदर से चिटकनी लगाकर बंद कर लिया करती और लगभग फुसफुसाते हुए बड़ी धीमी आवाज में बात करती।

कोई नहीं जान पाता कि वो रोज किससे बातें करती है सिवाय उस एस.टी.डी के मालिक के जो लगभग तेईस चौबीस साल का नौजवान था । पारदर्शी केबिन के बाहर से लड़की की आवाज सुनाई न देती लेकिन लड़के की ओर पीठ किये बात करती लड़की के लगातार बहते आंसू और भिंची हुई सिसकियों से कांपते कंधे उससे न छुप पाते।

लड़की उससे और अपनी बारी का इंतजार करते केबिन के बाहर खड़े अन्य ग्राहकों से अपने आंसू छिपाने का भरसक प्रयास करती और झेंपती हुई बाहर निकलती और सीधे काउंटर पर पैसे देने आकर खड़ी हो जाती और पैसे चुकाकर सीधे अपनी जीप स्टार्ट कर चली जाती।

लगभग पन्द्रह दिन लगातार फोन करते रहने के बाद लड़की जब सोलहवें दिन एस.टी.डी बूथ पर आई थी तो उस कांच के केबिन में तीनों तरफ एक मोटा नीला पर्दा लगा हुआ था।

लड़की ने उस दिन फोन करते हुए अपने आंसू बहने दिए थे ! फोन रखकर रूमाल से ठीक से चेहरा पोंछा था और बाहर निकल आई थी।
पैसे चुकाते वक्त उसकी आँखों में एक भीगा हुआ शुक्रिया था।

एस.टी.डी वाला नौजवान अपने इश्केक  अश्कों वाले मौसमों को याद करता हुआ मन ही मन दुआ मांग रहा था –
" हे ईश्वर ... इस लडकी के आंसू जल्द बीतें और इसके होंठों पर मुस्कानों का मौसम आये "  

चार महीने तक यह सिलसिला चलता रहा था फिर अचानक एक दिन लड़की ने आना बंद कर दिया। शायद उसका ट्रांसफर हो गया था। एस.टी.डी वाले नौजवान ने कुछ दिन उसका इंतजार किया था फिर अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गया था।

ठीक दस साल बाद उस नौजवान के पास कोतवाली से एक कॉल आया था। उसे थाने बुलाया गया था। वह थोड़ा घबराया हुआ सा तुरंत उठकर थाने चल दिया था।टी आई के चेंबर में उसे बैठाया गया था।
मामले को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि तभी टी आई साहब ने कमरे में प्रवेश किया और उससे हाथ मिलाया।

" आज सुबह ही कोतवाली में ज्वाइन किया और सबसे पहले तुम्हारा शुक्रिया अदा करना चाहता था " कहते हुए उन्होंने चाय लाने का ऑर्डर दिया। चुस्त वर्दी में सौम्य व्यक्तित्व के टी आई साहब मुस्कुराकर उससे मुखातिब थे !

"लेकिन मुझे किस बात का शुक्रिया .....? " वह अभी भी अचकचाया हुआ था !

"शायद अब तुम समझ जाओ कि किस बात का शुक्रिया" पीछे से आती एक मीठी आवाज ने उसका ध्यान खींचा !

वही दस साल पहले की दुबली पतली उदास लड़की इंस्पेक्टर की वर्दी में दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा रही थी ! बदन थोड़ा भरा हुआ चेहरा खुशी और अच्छी सेहत से दमकता हुआ।
वर्दी पर तीन स्टार और नेमप्लेट पर नाम " मंदिरा मेहरा "

" इनसे मिलो ...ये मेरी उत्तमार्ध " टी आई साहब ने लड़की के कंधे थामते हुए परिचय कराया !

" मुझसे ही बात किया करती थीं ये तुम्हारी एस.टी.डी. से ! बहुत कम लोग आंसुओं की निजता को समझते हैं और तुम उन चन्द लोगों में से एक हो जो मन के सबसे कच्चे कोने को सार्वजनिक होने की लज्जा से बचाना जानते हो। हम दोनों तुम्हारे कृतज्ञ हैं। "

तीनों ने साथ चाय पी थी और देर तक बातें कीं थीं। उस लड़के की प्रार्थना स्वीकार हुई थी।
 मुस्कानों का मौसम बाहर प्रांगण में लगे अमलतास के पेड़ पर पीले झुमके बनकर मुस्कुरा रहा था !
                              ❤️❤️❤️
                         .. ✍️ साभार 
                   -----पल्लवी त्रिवेदी------
        [ 'जिक्र ए यार चले - लवनोट्स' में संकलित]
      #लवनोट्स #valentines #zikreyaarchale
Refrence - https://www.facebook.com/share/p/1DZwXbzhHH/
                    वयं राष्ट्रे जागृयाम 

श्रीकुलदेवी स्तोत्रम् - एक स्त्रोत्र से होंगी कुलदेवी प्रसन्न

                       श्रीकुलदेवी स्तोत्रम् 
     यह कुलदेवी स्तोत्र प्रत्येक कुल (परिवार/वंश) की अधिष्ठात्री दिव्य शक्ति "कुलदेवी" की स्तुति का पावन ग्रंथ है। कुलदेवी वह आदि शक्ति हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवार की रक्षा, मार्गदर्शन एवं समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। इस स्तोत्र के नित्य पाठ से कुलदेवी प्रसन्न होकर साधक के पूरे परिवार पर अपनी कृपा बरसाती हैं, कुल की प्रतिष्ठा बढ़ाती हैं, आंतरिक एकता मजबूत करती हैं और सभी प्रकार के कुलदोषों एवं बाधाओं का निवारण करती हैं। यह स्तोत्र घर-परिवार में सुख-शांति, संपत्ति, स्वास्थ्य और सद्भावना लाने वाला माना गया है।

मूल स्तोत्र पाठ (नित्य एक बार अवश्य पढ़ें या सुनें)

नमस्ते श्रीकुलदेवी कुलाराध्या कुलेश्वरी।
कुलसंरक्षणी माता कौलिक ज्ञान प्रकाशिनी॥१॥

वन्दे श्री कुल पूज्या त्वाम् कुलाम्बा कुलरक्षिणी।
वेदमाता जगन्माता लोक माता हितैषिणी॥२॥

आदि शक्ति समुद्भूता त्वया ही कुल स्वामिनी।
विश्ववंद्यां महाघोरां त्राहिमां शरणागतम्॥३॥

त्रैलोक्य ह्रदयं शोभे देवी त्वं परमेश्वरी।
भक्तानुग्रह कारिणी कुलदेवी नमोस्तुते॥४॥

महादेव प्रियंकरी बालानां हितकारिणी।
कुलवृद्धि करी माता त्राहिमां शरणागतम्॥५॥

चिदग्निमण्डल संभुता राज्य वैभव कारिणी।
प्रकटितां सुरेशानी वन्दे त्वां "कुल गौरवम्"॥६॥

त्वदीये कुले जात: त्वामेव शरणम गत:।
त्वत वत्सलोऽहं आद्ये त्वं रक्ष रक्षाधुना॥७॥

पुत्रं देहि धनं देहि साम्राज्यं प्रदेहि मे।
सर्वदास्माकं कुले भूयात् मंगलानुशासनम्॥८॥

कुलाष्टकमिदं पुण्यं नित्यं य: सुकृति पठेत्।
तस्य वृद्धि कुले जात: प्रसन्ना कुलेश्वरी॥९॥

कुलदेवी स्तोत्रमिदं सुपुण्यं ललितं तथा।
अर्पयामि भवत भक्त्या त्राहिमां शिव गेहिनी॥१०॥

॥ श्री कुलदेव्यार्पणमस्तु ॥
॥ श्री कुलदेव्यार्पणमस्तु ॥
॥ श्री कुलदेव्यार्पणमस्तु ॥

॥ इति श्रीकुलदेवी स्तोत्रम्॥

🚩स्तोत्र का सरल अर्थ एवं भावार्थ
1. श्लोक १: उस कुलदेवी को नमन है, जो कुल द्वारा पूजित हैं, कुल की ईश्वरी हैं, कुल की संरक्षक माता हैं और कौलिक ज्ञान को प्रकट करने वाली हैं।
2. श्लोक २: मैं उस पूजनीय कुलमाता को प्रणाम करता हूँ, जो कुल की रक्षा करती हैं, वेदों की माता, संसार की माता और सभी प्राणियों का हित चाहने वाली हैं।
3. श्लोक ३: आप आदि शक्ति से प्रकट हुई हैं और आप ही कुल की स्वामिनी हैं। समस्त विश्व द्वारा वंदनीय, महाभयंकर (शत्रुओं के लिए) देवी! इस शरणागत की रक्षा कीजिए।
4. श्लोक ४: हे देवी! आप तीनों लोकों के हृदय में विराजमान हैं, परमेश्वरी हैं, भक्तों पर अनुग्रह करने वाली हैं। हे कुलदेवी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
5. श्लोक ५: आप महादेव (शिव) को प्रिय करने वाली, बालकों का हित करने वाली और कुल की वृद्धि करने वाली माता हैं। इस शरणागत की रक्षा कीजिए।
6. श्लोक ६: आप चेतना रूपी अग्नि मंडल से उत्पन्न हुई हैं, राज्य और वैभव प्रदान करने वाली हैं। हे देवों की ईशानी! मैं आपको "कुल के गौरव" के रूप में वंदन करता हूँ।
7. श्लोक ७: आपके ही कुल में उत्पन्न हुआ, मैं आपकी ही शरण में आया हूँ। हे आद्य शक्ति! आप वात्सल्य स्वरूपा हैं, अब मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए।
8. श्लोक ८: (हे माता!) मुझे सुपुत्र दीजिए, धन दीजिए और साम्राज्य (उत्तम जीवन/सफलता) प्रदान कीजिए। हमारे कुल में सदा मंगल ही मंगल का शासन हो।
9. श्लोक ९: यह पवित्र कुलाष्टक (कुलदेवी स्तोत्र) जो नित्य पुण्यात्मा व्यक्ति पढ़ता है, उसके कुल में उत्पन्न सभी (साधक सहित) की वृद्धि होती है, क्योंकि कुलेश्वरी प्रसन्न हो जाती हैं।
10. श्लोक १०: हे शिवगेहिनी (पार्वती)! मैं आपकी भक्ति से इस पुण्यदायी और सुंदर कुलदेवी स्तोत्र को आपको अर्पित करता हूँ। मेरी रक्षा कीजिए।

पाठ की विधि एवं लाभ
· समय: प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर या सायंकाल घर के पूजा स्थल पर। नित्य एक बार अवश्य पढ़ें।
· विधि: शुद्ध आसन पर बैठकर, कुलदेवी या देवी दुर्गा/पार्वती के चित्र के समक्ष दीप जलाकर, पुष्प अर्पित करके इस स्तोत्र का पाठ करें। अंत में "श्री कुलदेव्यार्पणमस्तु" बोलकर स्तोत्र को समर्पित कर दें।
· लाभ:
  1. कुलदेवी की विशेष कृपा एवं सुरक्षा प्राप्त होती है।
  2. पारिवारिक कलह, वंशानुगत समस्याएँ (कुलदोष) दूर होती हैं।
  3. घर-परिवार में सुख-शांति, समृद्धि एवं मंगलमय वातावरण बनता है।
  4. संतान, धन, स्वास्थ्य एवं मान-सम्मान में वृद्धि होती है।
  5. आध्यात्मिक ज्ञान (कौलिक ज्ञान) की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

साभार - Bhagwan Das Vashisht 

सार (क्षार), सत्व, घनसार और घनसत्व


क्षार- किसी भी वनौषधि के पंचांग को जलाकर राख को पानी में भिगोकर ऊपर का साफ पानी निथार कर उस पानी को जलाकर नीचे बर्तन में जो बच जाता है खुरच कर निकल कर रखे ।
 सत्व - किसी औषधि जैसे गिलोय आंवला आदि को कुचल कर रस निकाल कर रख देने से जो नीचे बैठ जाये सत्व कहलाता है ।

घनसार और घनसत्व - औषधि पंचांग का काढ़ा बनाकर फिर काढ़े को शहद जैसा गाढ़ा होने पर घनसार और सुखाने पर घनसत्व कहलाता है ।

साभार -  वैद्य सुधीर आर्य  

सबसे बड़ा धर्म -माता पिता की सेवा करना।

🌹सबसे बड़ा धर्म -माता पिता की सेवा करना भारत वर्ष में एक से बढ़कर एक जीवात्मा पैदा हुए है , भारत की मिटटी में जन्म लेना ही इश्वर की बहुत बड़ी कृपा है ,लेकिन इस धराधाम में जिसने जन्म लेकर भी कुछ पुण्य नहीं कमाया उसका जीवन पशु के सामान है , भारत की मिटटी में जन्म लेने के लिए देवता भी कितने जप तप करते है , लेकिन आज के समाज में कोई किसी का नहीं है , उसे सिर्फ अपने सुख से मतलब है , जिस मिटटी में जन्म लिया है उसी को आज बेच रहे है , जिस माँ ने नौ महीने अपने गर्भ में पाला है आज वो दर -दर की ठोकरे खा रही है ..

""""""""""वेदों में कहा गया है की -पिता धर्म है ,पिता स्वर्ग है तथा पिता ही तप है ,

"""""""""" आज भारतीय युवाओं के पास अपने बुजुर्गों के लिए समय नहीं है |जबकि भारतीय समाज में माता-पिता की सेवा को समस्त धर्मों का सार है |समस्त धर्मों में पुण्यतम् कर्म :माता-पिता की सेवा ही है ,

"""""""""""पाँच महायज्ञों में भी माता -पिता की सेवा को सबसे अधिक महत्व प्रदान किया है पिता के प्रसन्न हो जाने पर सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं |माता में सभी तीर्थ विद्यमान होते हैं |जो संतान अपने माता -पिता को प्रसन्न एवम संतुष्ट करता है उसे गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है |जो माता -पिता की प्रदक्षिणा करता है उसके द्वारा समस्त पृथ्वी कीप्रदक्षिणा हो जाती है |जो नित्य माता -पिता को प्रणाम करता है उसे अक्षय सुख प्राप्त होता है |जब तक माता -पिता की चरण रज पुत्र के मस्तक पर लगी रहती है तब तक वह शुद्ध एवम पवित्र रहता है |माता पिता का आशीर्वाद न हो तो हम जीवन में कभी भी सफल नहीं हो सकते है.

"""""""""""""आज भी भारतीय समाज में श्रवण कुमार का नाम आदर से लिया जाता है, स्वय भागवान श्री राम अपने पिता की प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए चौदह वर्ष वन में रहे .संतान के पालन – पोषण में माता का सर्वाधिक कार्य होता है, मॉ संतान के प्रत्येक सुख-दुःख का ध्यान रखती है ,पिता को परिवार को संचालित करने के लिए व्यवस्था तथा भविष्य की व्यवस्था केलिए अपने कर्तव्य कार्य मजूदरी मेहनत करना होती है। जो पुत्र अपने रोगी ,जीविकाहीन एवम अपाहिज माता पिता को त्याग देता है , वो अपने कई जन्मो के पुण्य को नस्ट कर देता है |

""""""""""""""""" माता -पिता का अनादर करने पर उसके समस्त पुण्य क्षीण हो जाते हैं | जो मनुष्य अपने माता -पिता की अवज्ञा करता है वह महा प्रलय तक नरक में निवास करता है वो चाहे कितने व्रत पूजा पाठ करले उसके पापों का प्राश्चित नहीं हो सकता है ,जो अपने माता पिता को वृद्धाश्रमों में भेजते हैं, जो उन्हें बोझ समझते हैं कि वह कभी भी सुख नहीं पा सकते।

रोगिणं चापि वृधंच पितरम वृत्ति कर्शितं |
विकलं नेत्र कर्णाभ्याम त्यक्त्वा ग्च्झेच्च रौरवं ||

"""""""""""""""""" ज्योतिष शास्त्र में भी मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण प्रमुख माने गए हैं- पितृ ऋण, देव ऋण तथा ऋषि ऋण। इनमें पितृ ऋण सर्वोपरि है। पितृ ऋण में पिता के अतिरिक्त माता तथा वे सब बुजुर्ग भी सम्मिलित हैं, जिन्होंने हमें अपना जीवन धारण करने तथा उसका विकास करने में सहयोग दिया। इस ऋण को ही आज कल के ज्योतिषियों ने कालशर्प दोष का नाम दे दिया है जबकि वास्तव में ये पितृ ऋण, देव ऋण तथा ऋषि ऋण है . इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं। राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा जी को स्वर्ग से धरती पर ला दिया।

""""""""""""""""""" जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है।जो अपने पितरों को तिल-मिश्रित जल की तीन-तीन अंजलियाँ प्रदान करते हैं, उनके जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है।भागवत में एक कथा के अनुसार एक राजा हुए नाम था उनका चित्रकेतु, राजा चित्रकेतु के इकलौते पुत्र की मृत्यु हो जाती है। इकलौते पुत्र की मृत्यु से चित्रकेतु को गहरा आघात पहुंचता है। उस समय देवर्षि नारद चित्रकेतु को वैराग्य का उपदेश देते हैं। नारदजी ने बताया राजन पुत्र चार प्रकार के होते हैं- शत्रु पुत्र, ऋणानुबंध पुत्र, उदासीन और सेवा पुत्र।

1.) शत्रु पुत्र: जो पुत्र माता-पिता को कष्ट देते हैं, कटु वचन बोलते हैं और उन्हें रुलाते हैं, शत्रुओं सा कार्य करते हैं वे शत्रु पुत्र कहलाते हैं।

2.) ऋणानुबंध पुत्र: पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार शेष रह गए अपने ऋण आदि को पूर्ण करने के लिए जो पुत्र जन्म लेता है वे ऋणानुबंध पुत्र कहलाते हैं।

3.)उदासीन पुत्र: जो पुत्र माता-पिता से किसी प्रकार के लेन-देन की अपेक्षा न रखते विवाह के बाद उनसे विमुख हो जाए, उनका ध्यान ना रखे, वे उदासीन पुत्र कहलाते हैं।

4.) सेवा पुत्र: जो पुत्र माता-पिता की सेवा करता है, माता-पिता का ध्यान रखते हैं, उन्हें किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होने देते, ऐसे पुत्र सेवा पुत्र अर्थात् धर्म पुत्र कहलाते हैं। नारदजी कहते हैं कि मनुष्य का वास्तविक संबंध किसी से नहीं होता। इसलिए आत्मचिंतन में रमना ही उसका परम कर्तव्य है।भारतीय संस्कृति में माता-पिता का ऋण कोई संतान नही उतार पाती है लेकिन प्रत्येक संतान यही प्रयास करता है कि माता -पिता को हम अच्छी सेवा करें उन्हे सम्मान से जीने केलिए ऐसी व्यवस्था बनायें । जब तक संतान स्वंय माता-पिता नही बन जाता है जब तक वह माता-पिता के दायित्य को नही समझ पाते हे 

एक प्रसंग सभी को मालूम होगा, जब भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों कार्तिकेय जी और गणेशजी के समक्ष ब्रह्मांड का चक्कर लगाने की प्रतियोगिता रखी कि दोनों में से कौन पहले ब्रह्मांड का चक्कर लगाता है। गणेश जी और कार्तिकेयजी दोनों एक साथ रवाना हुए। कार्तिकेयजी का वाहन था मोर जबकि गणेश जी का मूषक। कार्तिकेयजी क्षण भर में मोर पर बैठकर आँखों से ओझल हो गए जबकि गणेशजी अपनी सवारी पर धीरे-धीरे चलने लगे।थोड़ी देर में गणेशजी फिर लौट आए और माता-पिता से क्षमा माँगी और उनकी 3 बार परिक्रमा कर कहा- लीजिए मैंने आपका काम कर दिया। दोनों गद्‍गद्‍ हो गए और पुत्र गणेश की बात से सहमत भी हुए। गणेश का कहना था ‍कि माता-पिता के चरणों में ही संपूर्ण ब्रह्मांड होता है।गणेशजी के भक्तों को उनकी इसी सीख को आत्मसात करते हुए अपने माता-पिता की सेवा करनी चाहिए। हर हाल में माता-पिता को अपने साथ रख उनका ध्यान रखना चाहिए। हमें अपने आसपास देखने में आता है कि धीरे-धीरे हम पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रंगते जा रहे हैं। माता-पिता वृद्ध हुए कि उन्हें उनका घर (वृ्द्धाश्रम) दिखा देते हैं। गणेश चतुर्थी पर गणपति बप्पा मोरया के साथ-साथ अपने माता-पिता की सेवा का भी अवसर न चूकें। यही गणेशजी के प्रति आपकी सच्ची श्रद्धा होगी। दुर्वा गणेशजी को चढ़ाएँ और मोदक का भोग लगाएँ जो कि उनको बहुत‍ प्रिय हैं। गणेश चतुर्थी पर गणपति बप्पा मोरया के साथ-साथ अपने माता-पिता की सेवा का भी अवसर न चूकें। यही गणेशजी के प्रति आपकी सच्ची श्रद्धा होगी। दुर्वा गणेशजी को चढ़ाएँ और मोदक का भोग लगाएँ जो कि उनको बहुत‍ प्रिय हैं। इसे अर्पित करने के बाद आपकी दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की के रास्ते में कोई बाधा नहीं आएगी और गणपति बप्पा भी कभी आपसे नहीं रूठेंगे।
साभार - पुजारी मनीष भारद्वाज 
संदर्भ -https://www.facebook.com/share/p/1DLaBXJpHd/

अज्ञानता वश या जानबूझकर वेद मंत्र या पुराणों के श्लोकों के गलत अर्थ ( भाष्य ) कर हमें अपने शास्त्रों से भटकाने का काम किया है।

इस अंश को देखें-
श्लोक संख्या 99 का अर्थ है- प्रतिदिन गोमांस खाना चाहिए और अमरवारुणी पीनी चाहिए। वही कुलीन कहलाता है, अन्य व्यक्ति कुलघातक कहे जाते हैं।
अब इस श्लोक को उद्धृत कर गोमांस तथा वारुणी का मनमाना अर्थ लगाकर सनातन धर्म पर खासकर, तन्त्र पर उँगली उठायी जा सकती है कि तान्त्रिक लोग दारू पीते थे तथा गोमांस खाते थे।
अब यहाँ गोमांस तथा अमरवारुणी ये दो पारिभाषिक शब्द हैं, जिनका उल्लेख अगले श्लोक में किया गया है कि जिह्वा को 'गो' कहते हैं और उसे तालु में प्रवेश कराने की प्रक्रिया को गोमांसभक्षण कहते हैं, इस खेचरी मुद्रा के करने से महान् पापों का नाश होता है।
इसी प्रकार, तालु के मूल में इस जिह्वाप्रवेश के कारण जो रस निकलता है वही अमरवारुणी है।
यूरोपीय विद्वान के वेष में ईसाइयों ने तथा दयानन्द ने यही काम किया है। चार श्लोकों में से एक को उद्धृत कर अपना उल्लू सीधा करने का काम किया है, हमें अपने शास्त्रों से भटकाने का काम किया है।
हम मूर्ख लोग उनकी बातों पर भरोसा कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते रहे हैं।https://www.facebook.com/share/p/1CEzme6vL2/

21mmˈ की पथरी को भी बर्फ की तरह गला देगी ये 50 रुपए वाली सस्ती सी चीज मात्र 5 दिन में दर्द से दिला देगी ऐसा राहत भरा आराम।

➡️ 21mmˈ की पथरी को भी बर्फ की तरह गला देगी ये 50 रुपए वाली सस्ती सी चीज मात्र 5 दिन में दर्द से दिला देगी ऐसा राहत भरा आराम।
➡️‎आजकल की व्यस्त जीवनशैली और गलत खानपान के कारण गुर्दे की पथरी (Kidney Stone) और गाल ब्लैडर स्टोन की समस्या आम हो गई है। पथरी से होने वाला दर्द असहनीय होता है और यह कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती है।
➡️‎इसके बढ़ते मामलों के बावजूद, आयुर्वेद में इसके लिए एक बेहद सरल, किफायती और प्रभावी उपाय मौजूद है-गुड़हल का पाउडर।
➡️‎आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. नीरज कौशिक के अनुसार, गुड़हल का पाउडर पथरी को जड़ से खत्म करने में मदद करता है। आइए जानते हैं इसका इस्तेमाल कैसे किया जाए और इससे जुड़ी जरूरी सावधानियां।
➡️‎गुड़हल का पाउडर: गुण और फायदे
‎पथरी को तोड़ने में सहायक:
‎गुड़हल के फूलों में प्राकृतिक अम्लीय गुण होते हैं, जो पथरी को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने में मदद करते हैं।
➡️‎इस पीली तरल चीज की एक चम्मच भी गठिया के दर्द को कर देगी चुटकियों में खत्म…सांस फूलना, पुरानी खांसी आदि 80 रोगों का एक इलाज है ये उपाय?
➡️‎शरीर को डिक्स करता है और गुर्दों से विषैले पदारहर निकालने में सहायक है।
➡️‎पाचन में सुधार👉‎गुड़हल पाचन तंत्र को भी स्वस्थ रखता है और एसिडिटी को नियंत्रित करता है।
➡️‎गुणकारी तत्व👉‎इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स, विटामिन C, और प्राकृतिक एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो संक्रमण से भी बचाव करते हैं।
➡️‎गुड़हल पाउडर का सही उपयोग⬇️
➡️‎सामग्री👉👉‎1 चम्मच गुड़हल का पाउडर
👉‎1 गिलास गर्म पानी
➡️‎सेवन करने का तरीका ⬇️ 
👉‎रात के भोजन के एक घंटे बाद 1 चम्मच गुड़हल का पाउडर लें।
👉‎इसे गर्म पानी के साथ निगल लें।
👉‎इसके बाद कुछ और न खाएं या पीएं।
👉‎चाहे कितना भी सड़ गया हो लिवर इस एक देसी घरेलू 👉चीज को खाते ही रिफ्रेश हो जाएगा आपका लिवर, बस जान ले सेवन का सही तरीका!
➡️‎ध्यान रखने योग्य बातें⬇️
➡️‎इसका स्वाद थोड़ा कड़वा हो सकता है, लेकिन इसे पानी के साथ आसानी से लिया जा सकता है।
➡️‎नियमित रूप से इसे सेवन करने पर धीरे-धीरे पथरी ➡️टूटकर मूत्र मार्ग से बाहर आ जाएगी।

➡️‎परहेज और सावधानियां ⬇️ 
➡️‎गुड़हल के पाउडर के साथ निम्नलिखित चीजें न खाएं:
‎👉‎चुकंदर
👉‎पालक
👉‎भिंडी
👉‎टमाटर

➡️‎ परहेज रखना क्यों जरूरी है ⬇️ 
👉‎इन खाद्य पदार्थों में ऑक्सालेट की मात्रा अधिक होती है, जो पथरी को बढ़ा सकते हैं या नई पथरी बनने की संभावना बढ़ा सकते हैं।
➡️‎अगर आपका लिवर भी लगा है सड़ने, तो कर लें ये घरेलु उपाय, अस्पताल के लाखों के खर्चे से मिलेगी राहत!
➡️‎संभावित दुष्प्रभाव और उपाय⬇️
➡️‎पथरी टूटने पर दर्द👉‎अगर पथरी बड़ी है, तो उसके छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटने से दर्द हो सकता है। इस स्थिति में अधिक पानी पीएं और डॉक्टर की सलाह लें।
➡️‎पानी का सेवन👉‎दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी (8-10 गिलास) पीना जरूरी है ताकि पथरी के टुकड़े मूत्र मार्ग से आसानी से बाहर निकल सकें।
➡️‎गुड़हल पाउडर कैसे बनाएं👉‎अगर आपके घर में गुड़हल का पौधा है, तो आप खुद भी इसका पाउडर बना सकते हैं।
➡️‎ताजे गुड़हल के फूलों को तोड़ें और धो लें।
➡️‎इन्हें छाया में सुखा लें।
➡️‎सूखने के बाद इन्हें पीसकर बारीक पाउडर बना लें।
➡️‎शरीर के अंदर सड़ चुके लिवर जवान बना देती है ये हरी चीज, पुराणों में भी लिखा है इसका नाम?
➡️‎गुड़हल का पाउडर एक प्राकृतिक, किफायती और प्रभावी उपाय है,
➡️ जो पथरी की समस्या को जड़ से खत्म करने में मदद करता है।
➡️ यदि सही तरीके और नियमितता से इसका सेवन किया जाए, तो न केवल पथरी से राहत मिलेगी बल्कि आपकी किडनी और गाल ब्लैडर लंबे समय तक स्वस्थ रहेंगे।
‎अगर पथरी से संबंधित समस्या गंभीर हो या दर्द असहनीय हो, तो डॉक्टर से परामर्श जरूर लें। आयुर्वेदिक उपाय के साथ चिकित्सा का सही संतुलन बनाना हमेशा बेहतर होता है।

आयुर्वेद अपनाओं रोग भगाओ 
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साभार - Dharmendra Vaidh ji

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