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Friday, 6 February 2026

बेटा नहीं सिर्फ वारिस...

“28 लाख का चेक और बेटे की नंगी सच्चाई”

“पापा…
अब और कितनी देर?
इतना छोटा सा अमाउंट है और पूरा बैंक सिर पर उठा रखा है।
किस फालतू बैंक में अकाउंट खुलवाया था आपने?”
पूरा हॉल सुन रहा था लोगों की नज़रें झुकीं,
लेकिन बुजुर्ग पिता की नजरें जमीन में गड़ गईं।

“दो मिनट…
बस दो मिनट बेटा,”
उन्होंने धीरे से कहा...हाथ कांप रहे थे... जब चेक मैनेजर के सामने पहुंचा मैनेजर ने जैसे ही चेक देखा उसकी भौंहें तन गईं।
₹28,00,000
और अकाउंट में बस यही आख़िरी पैसा।
यह वही चाचा जी थे जो हर महीने बैंक आते थे,
कभी अपनी दवा के लिए कभी पेंशन के लिए,
कभी बस दो बातें करने के लिए।

मैनेजर ने कुर्सी से उठकर कहा—
“चाचा जी, अंदर आइए।”
बेटा भी अकड़ कर अंदर घुस आया...
मैनेजर ने चेक मेज पर रखा और सीधे पूछा—
“इतनी बड़ी रकम एक साथ क्यों निकाल रहे हैं?”
बेटा तुरंत बोल पड़ा—
“आपको क्या दिक्कत है?
हमारे पैसे हैं...हम जो चाहें करेंगे।”
मैनेजर की आवाज सख्त हो गई—
“ये आपके पैसे नहीं हैं ये इनके जीवन की पूरी कमाई है।”
बेटा झल्लाया—
“तो?
मैं इनका बेटा हूँ!”
मैनेजर आगे झुका—
“बेटा होने का मतलब
सिर्फ पैसा लेना नहीं होता।”
कमरे में सन्नाटा।
मैनेजर ने बुजुर्ग की ओर देखा—
“चाचा जी, सच बताइए…
आपको ये पैसा क्यों चाहिए?”
बुजुर्ग की आवाज टूट गई—
“मैनेजर साहब …
बेटे को घर लेना है ..
कहता है—
‘या तो पैसा दो ...या रास्ते से हट जाओ।’”
बेटा चिल्लाया—
“ड्रामा बंद कीजिए!
मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा!”
मैनेजर ने मेज पर हाथ मारा—
“काफी है!”
“आप जानते हैं,
मैंने आपको कभी यहाँ इनके साथ नहीं देखा।
न बीमारी में,
न त्योहार में,
न अकेलेपन में।”
“लेकिन हम बैंक वाले हर दिन इनके साथ खड़े रहे।”
बेटा तिलमिला गया—
“तो आप लोग ही पाल लीजिए इन्हें!
पैसे नहीं देंगे तो इन्हीं से अंतिम संस्कार भी करवा लेना!”
वह दरवाजे की तरफ बढ़ा।
मैनेजर की आवाज पीछे से गूंजी—
“रुकिए!”
“आज आपने साबित कर दिया कि आप बेटे नहीं,
सिर्फ वारिस हैं।”
“आप सिर्फ पैसा लेने आए थे और पैसा लेकर
इन्हें यहीं छोड़ जाते।”
“इसलिए मैं यह पैसा नहीं दूँगा।”
बेटा पलटा,
आँखों में जहर था—
“याद रखिएगा ये बात।”
और चला गया।
दरवाजा बंद हुआ।
बुजुर्ग आदमी फूट-फूटकर रो पड़े...
मैंने आज अपना बेटा खो दिया।”
मैनेजर ने उनका हाथ थाम लिया—
“नहीं चाचा जी।
आज आपने बेटा नहीं खोया,
आज आपने सच्चाई देखी है।”
“जब तक हम हैं आप अकेले नहीं हैं।
आपका ख्याल हम रखेंगे।”
बैंक के कर्मचारी पास आए।
किसी ने पानी दिया,
किसी ने कुर्सी खिसकाई।
और बाहर…एक बेटा 28 लाख के बिना
जिंदगी में आगे बढ़ गया।
लेकिन अंदर…
एक बूढ़ा पिता आज भी मानवता के सहारे जिंदा था।

आरती गहरवार ✍🏼 
धन्यवाद 🙏🏼

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