सत्य संसार का सबसे बड़ा और अमर मूल्य है। झूठी जीभ स्वभाव से झूठ ही बोलती है, किंतु दृढ़ संकल्प, संयम और साहस के साँचे में ढलकर वही जीभ सत्य की साधिका बन जाती है। झूठ मनुष्य को भीतर से कुंठित करता है और समाज में अनेक प्रकार के भ्रम फैलाता है। वहीं सत्यवादी का प्रत्येक संवाद न्याय की तुला पर सबसे बड़ा और विश्वसनीय उपहार होता है। पितामह भीष्म युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए कहते हैं:-
सत्येन चाग्निर्दहति स्वर्ग: सत्ये प्रतिष्ठित:।
सत्यं यज्ञस्तपो वेदा: स्तोभा मन्त्रा: सरस्वती॥
( महाभारत, शांतिपर्व १९९/६८ )
अर्थात् - सत्य के कारण ही अग्नि जलती-प्रज्वलित होती है, स्वर्ग सत्य पर ही प्रतिष्ठित है। यज्ञ जैसी महान संस्था, समस्त तपस्याएँ, श्रेष्ठ स्तोत्र, महान मंत्र और वाग्देवी सरस्वती—ये सभी सत्य के साक्षात् स्वरूप हैं।
प्राचीन काल में सत्य के इस मूल्य को इतना महत्व दिया जाता था कि राजा हरिश्चंद्र की कथा गाँव-गाँव में नाटकों के माध्यम से दिखाई जाती थी। प्रजा से लेकर शासक तक सभी से अपेक्षा की जाती थी कि वे सत्यवादी, सत्यप्रेमी, सत्यानुशील और सत्यमार्गी बनें। सत्य को देवता मानकर सत्यनारायण की कथा-पूजा भी की जाती थी। सत्य को जीवन का आधार, धर्म का मूल और मोक्ष का द्वार माना जाता था।किंतु आज स्थिति विपरीत है। भारतीय संस्कृति और आत्मिक मूल्यों में सबसे अधिक क्षरण यदि किसी का हुआ है, तो वह सत्य का ही हुआ है। झूठ को अब मूल्यवान, चतुराईपूर्ण और सफलता की सीढ़ी मान लिया गया है। राजनीति, व्यापार, सामाजिक संबंध, मीडिया—हर क्षेत्र में सत्य की जगह छल, कपट और माया ने ले ली है।फिर भी सत्य की ज्योति कभी पूरी तरह बुझ नहीं सकती। क्योंकि सत्य ही वह शक्ति है जो अग्नि को जलाती है, स्वर्ग को आधार देती है और सरस्वती को वाणी प्रदान करती है। आज के इस झूठ के युग में हमें पुनः सत्य की साधना करनी होगी—संकल्प से, संयम से और साहस से। क्योंकि सत्य ही वह एकमात्र मूल्य है जो मनुष्य को कुंठा से मुक्त करता है, न्याय की स्थापना करता है और अंततः अमरत्व प्रदान करता है।
"सत्यमेव जयते"—सत्य की ही सदा विजय होती है।
साभार - भगवतगीता समूह
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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