एक दिन माँ ने बेटे से कहा- “बेटा ! यहाँ से बहुत दूर तपोवन में एक महाज्ञानी सिद्ध मुनि पधारे हैं। तुम उनके पास जाओ और पूछो कि हमारे ये दु:ख के दिन और कब तक चलेंगे। इसका अंत कब होगा।”
बेटा घर से चला। पुराने समय में यातायात की सुविधा नहीं थी। वह पद यात्रा कर रहा था। चलते-चलते सांझ हो गई। गाँव में एक सेठ के घर पर रात्रि विश्राम करने रुक गया। वह सुबह उठकर वह आगे की यात्रा पर चलने लगा तो घर की सेठानी ने पूछा- “बेटा कहाँ जा रहे हो?” तो उसने अपनी यात्रा का कारण सेठानी को बताया। सेठानी ने कहा- “बेटा! मेरी एक पुत्री है और ये बोल नहीं पातीं तो मुझे चिंता है कि इससे विवाह कौन करेगा। मेरी इस समस्या का समाधान भी पूछ लेना।” युवक ने सहमति दे दी और आगे बढ़ गया।
दिन बीता तो उसे एक संत मिले। वह रात्रि विश्राम हेतु अपने साथ ले आए। गंतव्य पूछने पर उसने मुनि से मिलने और समस्याओं के समाधान के बारे में बताया। संत ने कहा कि भगवान की साधना मैं कर तो रहा हूँ मगर मुझे अभी तक संतत्व का स्वाद नहीं आया। मुझे कब संतत्व का स्वाद आयेगा, मेरा कल्याण कब होगा। बस इतना सा पूछ लेना।”
युवक ने कहा- “ठीक है।” और संत को प्रणाम करके आगे चल पड़ा।
नवयुवक ने अगला एक पड़ाव एक किसान के घर पर किया तो रात में चर्चा के दौरान किसान ने उससे कहा- “मेरे खेत के बीच में एक विशाल वृक्ष है। मैं बहुत परिश्रम और मेहनत करता हूँ, लेकिन उस बड़े वृक्ष के आस-पास दूसरे वृक्ष पनपते नहीं हैं। पता नहीं क्या कारण है।”
किसान ने युवक से कहा कि मेरी भी इस समस्या का समाधान कर लेना। युवक ने स्वीकृति में सिर हिला दिया और सुबह आगे बढ़ गया।
अगले दिन वह मुनिराज के चरणों में पहुँच गया। मुनिराज के दर्शन किये। दर्शन कर उसने अपने जीवन को धन्य माना और मुनिराज से प्रार्थना की- “प्रभु! मेरी कुछ समस्याएं हैं, जिनका मैं समाधान चाहता हूँ। आप आज्ञा दें तो श्री चरणों में निवेदन करूं।”
मुनि ने कहा- “ठीक है ! मगर एक बात का विशेष ख्याल रखना कि मैं तुम्हारे किन्हीं भी केवल तीन प्रश्नों का ही समाधान दूंगा।”
युवक बड़े धर्म-संकट में फंस गया। अब क्या करूं, अपने प्रश्न सहित कुल प्रश्न तो चार हैं। अब किसका प्रश्न छोड़ दूं। क्या लड़की का प्रश्न छोड़ दूं ? नहीं, यह तो ठीक नहीं है, यह उसकी जिन्दगी का सवाल है। तो क्या महात्मा के प्रश्न को छोड़ दूं ? यह भी नहीं हो सकता। तो क्या किसान का प्रश्न छोड़ दूं ? नहीं, यह भी ठीक नहीं है। बेचारा खून-पसीना एक करता है, तब भी उसे कुछ भी नहीं मिलता है।
अंत में काफी उहापोह के बाद उसने तय किया कि वह खुद का प्रश्न नहीं पूछेगा।उसने अपना प्रश्न छोड़ दिया और शेष तीनों प्रश्नों का समाधान लेकर वापिस अपने घर की ओर चल दिया।
रास्ते में सबसे पहले किसान से मुलाकात हुई। किसान से युवक ने कहा- “मुनिराज ने कहा है कि तुम्हारे खेत में जो विशाल वृक्ष है, उसके नीचे चारों तरफ सोने के कलश दबे हुए हैं। इसी कारण से तुम्हारी मेहनत सफल नहीं होती है।” किसान ने वहाँ खोदा तो सचमुच सोने के कलश निकले।
किसान ने कहा- “बेटा! यह सब धन-सम्पदा तेरे कारण से ही निकली है। इसलिए इसका आधा भाग तू भी रख ले।” और किसान ने आधा धन उस युवक को दे दिया।
युवक आगे बढ़ा।अब संत के आश्रम पर आया तो संत ने पूछा- “मेरे प्रश्न का क्या समाधान बताया है?”
युवक ने कहा- “स्वामी जी! क्षमा कीजिए। मुनिराज ने कहा है कि आपने अपनी जटाओं में कोई कीमती मणि छुपा रखी है। जब तक आप उस मणि का मोह नहीं छोड़ेंगे, तब तक आपका कल्याण नहीं होगा।”
साधु ने कहा- “बेटा तू ठीक ही कहता है। सच में मैंने एक मणि अपनी जटाओं में छिपा रखी है और मुझे हर समय इसके खो जाने का, चोरी हो जाने का भय बना रहता है। इसलिए मेरा ध्यान भजन-सुमिरण में भी नहीं लगता। अब इसे तू ही इसे ले जा।” और साधु ने वह मणि उस युवक को दे दी।
युवक दोनों चीजों को लेकर फिर आगे बढ़ा। अब वह सेठानी के घर पहुँचा तो सेठानी दौड़ी-दौड़ी आई और पूछा- “बेटा ! बोल क्या कहा है मुनिराज ने?”
युवक ने कहा- “माँ जी मुनिजी ने कहा है कि तुम्हारी बेटी जिसको देखकर बोल पड़ेगी, वही इसका पति होगा।”
अभी सेठानी और युवक की बात चल ही रही थी कि वह लड़की अन्दर से बाहर आई और उस युवक को देखते ही एकदम से बोल पड़ी।
सेठानी ने कहा- “बेटा! आज से तू ही इसका पति हुआ और उसने अपनी बेटी का विवाह उस युवक से कर दिया।
अब वह युवक धन, मणि और कन्या को साथ लेकर अपने घर पहुँचा तो माँ ने पूछा- “बेटा हमें इन दु:खों से कब मुक्ति मिलेगी?”
बेटा ने कहा- “माँ! मुक्ति मिलेगी नहीं, मुक्ति मिल गई। मुनिराज के दर्शन कर मैं धन्य हो गया। उनके तो दर्शन मात्र से ही जीवन के दु:ख, पीड़ाएं और दर्द खो जाते हैं।”
माँ ने पूछा- “तो क्या मुनि ने हमारी समस्याओं का समाधान कर दिया है?”
बेटे ने कहा- “हाँ माँ ! मैंने तो अपनी समस्या उनसे पूछी ही नहीं और समाधान भी हो गया।”
माँ ने पूछा- “वो कैसे बेटा ?”
बेटे ने कहा- “माँ मैंने सबकी समस्या को अपनी समस्या समझा तो मेरी समस्या का समाधान स्वत: हो गया।”
जब दूसरों की समस्या अपनी खुद की समस्या बनने लगती है तो फिर अपनी कोई समस्या ही नहीं रहती। जो दूसरों के लिए सोचता है। ईश्वर स्वयं उसका कल्याण करते हैं।
साभार: सोशल मीडिया