शाम का धुंधलका शहर की तंग गलियों में उतरने लगा था। 'दीनानाथ एंड संस' नाम की पुरानी कपड़े की दुकान का शटर पिछले पंद्रह दिनों से गिरा हुआ था। उस शटर पर बैंक का एक सफेद नोटिस चिपका था, जो हवा में फड़फड़ाते हुए दीनानाथ जी की इज़्ज़त की धज्जियां उड़ा रहा था। घर के आंगन में उदासी की चादर बिछी थी। दीनानाथ जी अपनी चारपाई पर सिर झुकाए बैठे थे और उनकी पत्नी, सुमित्रा जी, पल्लू से अपने आंसू पोंछ रही थीं।
उनके सामने उनका इकलौता बेटा, मयंक खड़ा था। मयंक के चेहरे पर पिता की इस बदहाली का कोई अफ़सोस नहीं था, बल्कि एक अजीब सी झुंझलाहट थी।
"मैंने आपको पहले ही कहा था पापा कि इस आउटडेटेड दुकान में अब कुछ नहीं रखा है। पर आपको तो अपना पुश्तैनी गुरूर प्यारा था। अब देखिए, बीस लाख का कर्ज़ा हो गया है और बैंक ने दुकान सील कर दी है। अगले हफ्ते इस घर की भी नीलामी है," मयंक ने बहुत ही रूखे स्वर में कहा।
सुमित्रा जी ने रोते हुए हाथ जोड़े, "बेटा, तेरे पापा की तबीयत पहले ही ख़राब है। ऐसे मत बोल। तेरी तो अच्छी खासी नौकरी है। अगर तू बैंक में जाकर कुछ बात कर ले, अपनी सैलरी से कुछ ईएमआई बंधवा ले, तो शायद हमारा ये सिर छिपाने का ठिकाना बच जाए।"
मयंक ने तुरंत अपना पल्ला झाड़ लिया, "माँ, आप कैसी बातें कर रही हैं? मेरी पत्नी, तान्या, इस माहौल में नहीं रह सकती। हम लोगों ने पहले ही शहर के नए इलाके में एक फ्लैट बुक कर लिया है। मेरी सैलरी वहां की किश्त भरने में जाएगी या आपके इस मलबे को बचाने में? आप लोग इस घर को नीलाम होने दीजिए। जो पैसे बचेंगे, उससे किसी छोटे से किराए के कमरे में शिफ्ट हो जाइयेगा। मैं और तान्या कल ही अपना सामान लेकर जा रहे हैं।"
दीनानाथ जी का दिल किसी ने मुट्ठी में भींच लिया हो, ऐसा दर्द उठा। जिस बेटे को उन्होंने बुढ़ापे की लाठी समझकर अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई से पढ़ाया-लिखाया था, वो आंधी आने पर उन्हें बीच भंवर में छोड़कर अपनी कश्ती अलग कर रहा था।
तभी लोहे के भारी गेट के खुलने की चरमराहट हुई। दरवाजे पर उनकी बेटी, काव्या खड़ी थी। काव्या की शादी को तीन साल हो चुके थे और वह दूसरे शहर में एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर मैनेजर के पद पर काम कर रही थी। उसने मयंक की सारी बातें सुन ली थीं।
काव्या ने अपना सूटकेस एक तरफ रखा और सीधे मयंक के सामने आकर खड़ी हो गई।
"भैया, जब पापा की दुकान से मुनाफा आता था, तब तो आप उसी पैसों से अपने लिए नई बाइक और महंगे फोन खरीदते थे। तब तो ये दुकान आपको मलबा नहीं लगती थी? आज जब इन पर मुसीबत आई है, तो आप इन्हें बेघर करके जा रहे हैं?" काव्या की आँखों में गुस्सा और निराशा दोनों थे।
मयंक ने चिढ़ते हुए कहा, "काव्या, तू अब इस घर की बेटी नहीं, मेहमान है। तू ससुराल की हो चुकी है। हमारे घर के मामलों में दखल मत दे। ये व्यवहारिक दुनिया है, जज़्बातों से कर्ज़े नहीं चुकाए जाते। अगर तुझे इतनी ही फिक्र है तो पिला दे इन्हें पानी, मैं तो जा रहा हूँ।"
मयंक बिना मुड़कर देखे अंदर चला गया। काव्या ने अपने पिता की ओर देखा। दीनानाथ जी नज़रे नहीं मिला पा रहे थे। उन्हें हमेशा लगता था कि बेटियां तो पराई होती हैं, असली वारिस तो बेटा ही होता है। आज उनका वो भ्रम टूट चुका था।
काव्या ने पिता के पैरों के पास बैठकर उनके कांपते हाथों को थाम लिया। "पापा, आप चिंता मत कीजिए। जब तक आपकी बेटी ज़िंदा है, न ये घर बिकेगा और न ही आपकी पुश्तैनी दुकान नीलाम होगी।"
दीनानाथ जी ने भर्राए गले से कहा, "बेटा, तू पागल हो गई है क्या? बीस लाख का कर्ज़ा है। तू अपने ससुराल वालों को क्या जवाब देगी? समाज क्या कहेगा कि एक दामाद की कमाई से ससुर का कर्ज़ चुकाया जा रहा है? मैं जीते जी ये कलंक नहीं ले सकता। तू अपने घर जा बेटा।"
काव्या ने बहुत ही कोमल लेकिन दृढ़ स्वर में जवाब दिया, "पापा, समाज की इसी सड़ी-गली सोच ने तो आज आपको इस चारपाई पर लाचार कर दिया है। किसने कहा कि मैं अपने पति से पैसे मांगूंगी? मैंने खुद पढ़ाई की है, मैं खुद कमाती हूँ। वो मेरी अपनी मेहनत की कमाई है। और दूसरी बात, जब एक बेटा शादी के बाद अपने माता-पिता की ज़िम्मेदारी उठा सकता है, तो एक सक्षम बेटी क्यों नहीं? क्या कन्यादान के बाद मेरे खून का रंग बदल गया है? या मेरे फ़र्ज़ खत्म हो गए हैं?"
अगले दिन सुबह होते ही काव्या सीधे बैंक पहुँची। उसने अपनी पिछले कई सालों की सेविंग्स, जो उसने अपने भविष्य के लिए जोड़ी थी, उसमें से पंद्रह लाख रुपये निकालकर बैंक का आधा कर्ज़ा एक मुश्त चुका दिया और बाकी बचे पांच लाख के लिए अपनी सैलरी स्लिप के आधार पर पर्सनल गारंटी देकर लोन को रीस्ट्रक्चर करवा लिया।
शाम को जब काव्या घर लौटी, तो उसके हाथ में दुकान की चाबियां थीं। दीनानाथ जी और सुमित्रा जी अवाक रह गए। मयंक अपना सामान लेकर जा चुका था, लेकिन काव्या ने उस खालीपन को अपनी ममता और हौसले से भर दिया था।
काव्या ने अपने पति, समीर को फोन करके सारी बात बताई। समीर ने मुस्कुराते हुए कहा, "काव्या, मुझे तुम पर गर्व है। शादी का मतलब यह नहीं होता कि तुम अपने माता-पिता को भूल जाओ। अगर मेरी ज़िम्मेदारी मेरे माता-पिता हैं, तो तुम्हारे माता-पिता भी मेरी ही ज़िम्मेदारी हैं। तुम वहां रहकर दुकान का काम देखो, मैं वीकेंड्स पर आकर तुम्हारी मदद करूँगा।"
अगले दो महीनों में काव्या ने ऑफिस से छुट्टी ली। उसने उस पुरानी कपड़े की दुकान का कायाकल्प कर दिया। उसने पुराने डिज़ाइन्स की जगह ऑनलाइन मार्केटिंग का सहारा लिया। दीनानाथ जी के पुराने ग्राहकों को वापस जोड़ा और धीरे-धीरे दुकान फिर से चल पड़ी।
एक दिन जब दीनानाथ जी अपनी उसी पुरानी गद्दी पर बैठे थे, तो उनकी आँखों से आंसू बहने लगे। काव्या उनके लिए चाय लेकर आई।
"क्या हुआ पापा? अब तो सब ठीक है न?" काव्या ने पूछा।
दीनानाथ जी ने काव्या के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, "मुझे माफ़ कर दे बेटा। मैंने ज़िंदगी भर यही सोचा कि बेटा मेरा 'अभिमान' है और बेटी मेरा 'कन्यादान'। लेकिन आज तूने साबित कर दिया कि एक बेटी सिर्फ आंगन की चिड़िया नहीं होती, वो उस आंगन को तूफानों से बचाने वाली ढाल भी होती है। जिस समाज ने यह नियम बनाया है कि लड़कियां अपने माता-पिता की ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकतीं, उस समाज की सोच को आज तूने बदल दिया है। तू मेरा पराया धन नहीं, मेरे बुढ़ापे का सबसे बड़ा गुरूर है।"
काव्या मुस्कुराई। उसने उस दिन सिर्फ अपने पिता की दुकान और घर ही नहीं बचाया था, बल्कि समाज के उस दोहरे मापदंड को भी तोड़ दिया था जहाँ बेटियों को विवाह के बाद पराया कर दिया जाता है। बदलाव की शुरुआत हमेशा किसी एक घर से होती है, और काव्या ने वो शुरुआत कर दी थी।
आज के समय में जब बेटियां हर क्षेत्र में बेटों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, तो माता-पिता की ज़िम्मेदारी उठाने में वे पीछे क्यों रहें? सक्षम बेटियां सिर्फ अपने ससुराल का ही नहीं, बल्कि अपने मायके का भी मान और सहारा बन सकती हैं, बशर्ते उन्हें वो अधिकार और सम्मान दिया जाए।
क्या आपको भी लगता है कि आज के समाज को अपनी मानसिकता बदलने की सख्त जरूरत है और बेटियों को उनके माता-पिता की ज़िम्मेदारी उठाने का पूरा हक़ होना चाहिए? अपने विचार हमें कमेंट करके जरूर बताएं।
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