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Monday, 2 March 2026

"घर की रसोई में केवल मसाले नहीं, संस्कार भी पकते हैं।”

“माँ, ये कोई साधारण मेहमान नहीं हैं। उन्हें पकोड़े और चाय परोसेंगे?”सुधा जी मुस्कुरा दीं, “बेटी, मेहमान बड़े हों या छोटे, हृदय से परोसा गया खाना ही याद रहता है।”
शिखा के विवाह को अभी चार महीने ही हुए थे। नगर के सबसे पॉश इलाके में उसका ससुराल था—ऊँची बिल्डिंग, लिफ्ट, मॉड्यूलर किचन, हर कमरे में एसी और दीवारों पर महंगे पेंटिंग्स। मायके में उसने हमेशा सादगी देखी थी—छोटा सा घर, माँ की सिलाई मशीन की आवाज और शाम को सबका साथ बैठकर चाय पीना। मगर विवाह के बाद उसकी दुनिया जैसे अचानक बदल गई थी। अब हर चीज में “स्टैंडर्ड” और “स्टेटस” शब्द जुड़ गए थे।
उसकी ननद रिद्धि अक्सर कहती, “भाभी, यहाँ सब क्लासी होना चाहिए। साधारण चीजें अच्छी नहीं लगतीं।” शिखा कोशिश करती कि वो भी उसी माहौल में ढल जाए। उसने अपनी पुरानी आदतें बदल दीं—साधारण सूती साड़ियों की जगह ब्रांडेड ड्रेसेज, घर की चाय की जगह कैफे की कॉफी। धीरे-धीरे उसे भी लगने लगा कि सादगी शायद पिछड़ापन है।
एक दिन समाचार आया कि उसके ससुराल में एक विशेष अतिथि आने वाले हैं—उसके पति आर्यन के बॉस और उनकी पत्नी। रिद्धि ने तुरंत प्लान बनाया, “भाभी, इस बार कुछ हटके होना चाहिए। बाहर से केटरिंग मंगा लेते हैं। पाँच तरह के स्नैक्स, इटालियन पास्ता, थाई सूप, और डेजर्ट में चीजकेक। सब इंप्रेस हो जाएंगे।”
शिखा ने हामी भर दी। उसे भी लगा कि यही सही तरीका है। उसने किचन में कदम ही नहीं रखा। शाम को टेबल पर तरह-तरह के पैकेट सजे थे। सब कुछ महंगा और दिखने में शानदार था।
लेकिन उसी दिन एक छोटा सा हादसा हो गया। केटरिंग वाले का आधा सामान ट्रैफिक में फँस गया। अतिथियों आने में केवल आधा घंटा बचा था। रिद्धि घबरा गई, “अब क्या होगा? इतने बड़े लोगों के सामने क्या रखेंगे?”
शिखा का हृदय तेज धड़कने लगा। तभी उसकी सास, सुधा जी, जो अब तक चुप थीं, धीरे से बोलीं, “घर में आटा है, बेसन है, आलू हैं… और चाय पत्ती तो हमेशा रहती है। क्यों न हम खुद कुछ बना लें?”
रिद्धि ने भौंहें चढ़ाईं, “माँ, ये कोई साधारण मेहमान नहीं हैं। उन्हें पकोड़े और चाय परोसेंगे?”
सुधा जी मुस्कुरा दीं, “बेटी, मेहमान बड़े हों या छोटे, मन से परोसा गया भोजन ही याद रहता है।”
शिखा के भीतर कुछ हिला। उसे अपनी माँ की याद आई, जो हर मेहमान के लिए झटपट बेसन के पकोड़े और इलायची वाली चाय बना देती थीं। उसने तुरंत दुपट्टा कमर में खोंसा और किचन में उतर गई।
सुधा जी ने आटा गूंथा, शिखा ने आलू काटे, बेसन में मसाले मिलाए। गैस पर कढ़ाही चढ़ी और थोड़ी ही देर में पकोड़ों की खुशबू पूरे घर में फैल गई। साथ ही शिखा ने अदरक-इलायची वाली चाय चढ़ा दी।
दरवाजे की घंटी बजी। मेहमान आ चुके थे। टेबल पर अब महंगे पैकेट नहीं, बल्कि गरमा-गरम पकोड़े और मिट्टी के कुल्हड़ों में चाय सजी थी।
रिद्धि के चेहरे पर अभी भी चिंता थी, लेकिन शिखा के चेहरे पर अजीब सा आत्मविश्वास था। उसने मुस्कुराकर प्लेट आगे बढ़ाई, “घर के बने हैं, अवश्य चखिएगा।”
आर्यन के बॉस ने पहला कौर लिया और मुस्कुराए, “वाह! इतने दिनों बाद असली स्वाद मिला। आजकल तो सब बाहर का खाना ही खिलाते हैं। घर का बना कुछ मिल जाए तो लगता है जैसे अपने घर आ गए।”
उनकी पत्नी ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, “इसमें जो खुशबू है ना, वो किसी कैफे में नहीं मिलती।”
रिद्धि की आँखें फैल गईं। जो चीज उसे ‘साधारण’ लग रही थी, वही आज सबसे खास बन गई थी।
शाम हँसी-खुशी बीती। जाते-जाते बॉस ने आर्यन से कहा, “तुम खुशकिस्मत हो, तुम्हारे घर में इतना अपनापन है।”
मेहमानों के जाते ही घर में सन्नाटा छा गया। रिद्धि धीरे से बोली, “भाभी… आज समझ आया कि क्लास सिर्फ महंगे खाने से नहीं आती।”
सुधा जी ने शिखा के सिर पर हाथ रखा, “बेटा, घर की रसोई में केवल मसाले नहीं, संस्कार भी पकते हैं।”
उस रात शिखा देर तक सोचती रही। उसे एहसास हुआ कि वह दिखावे की दौड़ में कहीं अपनी असली पहचान खो रही थी। सादगी कमजोरी नहीं, ताकत है।
कुछ दिन बाद जब शिखा मायके गई, तो माँ ने पूछा, “कैसी हो बेटा?”
शिखा ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “अब ठीक हूँ माँ… अब समझ आ गया कि असली स्टेटस क्या होता है।”
उसने माँ के हाथ की चाय पी और आँखें बंद कर लीं। वही स्वाद, वही सुकून—जो किसी महंगे कैफे में नहीं मिल सकता था।
धीरे-धीरे शिखा ने घर में एक नई परंपरा शुरू की। हर रविवार को “घर वाली चाय” का समय तय हुआ। सब लोग साथ बैठते, पकोड़े या साधारण बिस्कुट के साथ चाय पीते और हँसी-मजाक करते।
अब रिद्धि भी कहती, “भाभी, आज आपकी वाली चाय बना दो।”
शिखा हर बार चाय बनाते हुए एक बात याद रखती—
स्टेटस चीजों से नहीं, रिश्तों से बनता है।
क्योंकि जब चाय में अदरक और इलायची के साथ अपनापन घुल जाए, तो वो सिर्फ पेय नहीं, याद बन जाती है।
सीख:
दिखावे की चमक पल भर की होती है, लेकिन सादगी की गरमाहट उम्र भर साथ रहती है। घर का स्वाद कभी छोटा नहीं होता, बस उसे पहचानने की नजर चाहिए।
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Writer ✍️
Shanvi Sharma

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