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( सभी प्रमुख प्राचीन एवं मध्ययुगीन संस्कृत ग्रन्थों में “चित्त” के बारे में जो कुछ भी है उस सबका निचोड़ प्रस्तुत है जो आधुनिक लेखकों द्वारा “चित्त” की भ्रामक परिभाषा आदि पर भ्रान्तियों का निवारण करेगा,प्रस्तुत वस्तु में एक भी विचार मेरा नहीं है किन्तु संस्कृत ग्रन्थों का सन्दर्भ नहीं दे रहा हूँ ताकि विस्तार न हो । )
प्रकृति के तीनों गुणों − सत रज तम − में साम्य रहता है तो प्रकृति अव्यक्त हो जाती है और पुरुष से सम्बन्ध टूट जाता है जिसे मोक्ष कहते हैं । प्रकृति के तीनों गुणों में साम्य नहीं रहता तो वह व्यक्त होती है जो जीवावस्था देती है । बुद्धि अहं मन − इन तीन अन्तःकरणो और दस बाह्य करणों — पाँच कर्मेन्द्रियों और पाँच ज्ञानेन्द्रियों — में जब ईच्छायें जागती हैं तब प्रकृति विषम हो जाती है । ये सारे करण प्रकृति के तत्व हैं,चित्त कोई तत्व नहीं बल्कि दर्पण है जिसपर ईच्छाओं के कारण बाह्य संसार से प्राप्त अथवा मनसंकल्पित वृत्तियाँ उभरती है जिसे जीव देखकर भ्रमित होता रहता है और आत्मज्ञान को भूलकर अहं को आत्म समझकर चित्त का कर्ताभाव से “भोग” करता है,किन्तु इस अस्मिता के टूटने पर जीव में कर्ताभाव नहीं रहता और साक्षीभाव से चित्त को पराया समझकर केवल दर्शन करता है तो वृत्तियाँ क्षीण होने लगती है और अन्ततः चित्त का जाल टूटने लगता है । साक्षीभाव से दर्शन ही समस्त वैदिक दर्शनों का सार है।
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🔶 चित्त के मूलभूत लक्षण🔶
क्रमांक-लक्षण
❄ व्याख्या
1️⃣ प्रख्या-शीलता
❄ चित्त ज्ञान-प्रदर्शनशील है, अर्थात विषयों को प्रकट करता है
2️⃣ प्रवृत्ति-शीलता
❄ चित्त गति में प्रवृत्त होता है — संकल्प, विकल्प, स्पन्दन
3️⃣ स्थिति-शीलता
❄ चित्त में स्थित होने की प्रवृत्ति है — वह विषयों को धारण कर टिकता है
4️⃣ त्रिगुणात्मकता
❄ चित्त सत्त्व, रजस, तमस् — इन तीन गुणों से बना है, और उनके अनुपात से बदलता है
5️⃣ परिणामी
❄ चित्त परिणामशील है — उसमें अवस्थाएँ आती-जाती हैं (क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र, निरुद्ध)
6️⃣ दर्श्यत्व
❄ चित्त दृश्य (object) है — यह स्वप्रकाश नहीं, अपितु पुरुष द्वारा प्रकाशित होता है
7️⃣ अनात्मा
❄ चित्त स्व नहीं है, आत्मा नहीं है — यह केवल "प्रकाश में दिखने वाला परदा" है
8️⃣ परार्थत्व
❄ चित्त स्वार्थहीन है — इसका निर्माण केवल पुरुष (भोक्ता) के भोग/मोक्ष हेतु होता है
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🔶 चित्त के कार्य🔶
क्रमांक - कार्य
❄ विवरण
1️⃣ वृत्तियों का क्षेत्र
❄ चित्त में ५ वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं : प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति
2️⃣ प्रतिबिम्बदर्शी
❄ चित्त पुरुष के चैतन्य का प्रतिबिंब धारण करता है — चैतन्य उसमें प्रतिबिम्बित होता है
3️⃣ विषय-धारक
❄ चित्त शब्द, रूप, रस आदि इन्द्रियविषयों को ग्रहण करता है और उनमें रूपान्तरित होता है
4️⃣ स्मृति-आधार
❄ चित्त संस्कार और स्मृतियों का भण्डार है (इसी कारण इसे लोग कभी-कभी ‘चित्त’ को अलग मान लेते हैं)
5️⃣ वासनाओं का आश्रय
❄ चित्त संख्याहीन वासनाओं का आश्रय है — वही इसके विविध परिणामों को जन्म देती हैं
6️⃣ द्रष्टा से भेद में भ्रम
❄ चित्त स्वयं को द्रष्टा समझ लेता है, जब पुरुष उसमें प्रतिबिम्बित होता है, यही अविद्या है
7️⃣ विपरीत बोध का कारण
❄ जब चित्त में रजस् और तमस् प्रधान हो जाते हैं, तब अधर्म, अज्ञान, अनैश्वर्य जैसे क्लेश उत्पन्न होते हैं
8️⃣ सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि का माध्यम
❄ चित्त की वृत्तियों के निरोध से सम्प्रज्ञात समाधि, और वासनाओं के पूर्ण क्षय से असम्प्रज्ञात समाधि प्राप्त होती है
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🔶 चित्त की अवस्थाएँ🔶
अवस्था ..........गुण-विकास ....विशेषता
① क्षिप्त ........रजस् प्रधान ....चञ्चल, विषयासक्त
② मूढ़ ..........तमस् प्रधान .....मोहग्रस्त, अज्ञानपूर्ण
③ विक्षिप्त ...मिश्रित ..............कभी चञ्चल, कभी रुचि, ध्यान नहीं टिके
④ एकाग्र .....सत्त्व प्रधान ......एकाग्रता, आरम्भिक समाधि
⑤ निरुद्ध .....सत्त्व शुद्ध ........वृत्तिनिरोध, समाधिस्थ
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🔶 चित्त बनाम चैतन्य🔶
चित्त ...................चैतन्य (पुरुष)
परिणामी ...........अपरिणामी
दृश्य ...................द्रष्टा
त्रिगुणात्मक .......निर्गुण
वासनामय .........स्वभावतः शुद्ध
परार्थ .................स्व-स्वरूप में स्थित
अनुभूति नहीं ...केवल साक्षी
बिम्ब-धारक .....बिम्बदाता
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🔶 दर्शन की अन्तर्ध्वनि🔶
"चित्त केवल दर्पण है। उसकी वृत्तियाँ लहरें हैं। जब पुरुष उनमें उलझता है, तब वह स्वयं को भूल जाता है।
जब चित्त शान्त होता है, तब द्रष्टा अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।"
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🔱 चित्त–तत्त्व–विवेचनम्
(संस्कृत-संलिप्त श्लोकपंक्ति श्रृंखला)
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१. **त्रिगुणैः प्रकृतिः व्यक्ता, सम्यग् साम्ये तु सा अव्यक्ता।
तदा मोक्षः स्फुरति हि चेत, यदा च पुरुषात् सैव निवृत्ता॥**
🪔 प्रकृति जब सत्त्व–रजस्–तमस् के असंतुलन में रहती है, तो वह व्यक्त रूप धारण करती है — यही जीवावस्था है। परंतु जब तीनों गुण साम्य को प्राप्त होते हैं, तब प्रकृति पुनः अव्यक्त हो जाती है, और पुरुष से उसका सम्बन्ध टूट जाता है — यही मोक्ष है।
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२. **बुद्धिर्बोधप्रदाता स्यात्, अहङ्कारः 'अहं' स्मृतिः।
मनः संकल्पविकल्पात्मा, चित्तं तु केवलं दर्पणः॥**
🪔 बुद्धि निर्णय करती है, अहंकार ‘मैं’ की भावना है, मन विकल्पों की गूँज है — परन्तु चित्त कोई तत्व नहीं है, वह केवल दर्पण है, जो अनुभवों को परावर्तित करता है।
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३. **इच्छाजागरणे कर्मेन्द्र्यादिभिः, चित्ते वृत्तयः स्फुरन्ति।
प्रकृतिविकाराः ते, पुरुषदर्शने भ्रमं जनयन्ति॥**
🪔 जब इन्द्रियाँ और करण इच्छाओं से संचालित होती हैं, तब चित्त पर अनेक वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं — ये वृत्तियाँ ही जीव को भ्रमित करती हैं, क्योंकि वह उन्हें अपना अनुभव समझ बैठता है।
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४. **साक्षिणं पुरुषं त्यक्त्वा, चित्तं चात्मा इति मन्यते।
अस्मिता जायते तेन, कर्तृत्वभोगयोः कारणम्॥**
🪔 जब पुरुष अपने साक्षीस्वरूप को भूलकर चित्त को ही आत्मा मान लेता है, तब अस्मिता उत्पन्न होती है — यही कर्ता और भोक्ता बनने की प्रवृत्ति है।
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५. **यदा अस्मिता विनश्यति, साक्षिभावः स्फुरति पुनः।
तदा चित्तवृत्तिनाशः, आत्मबोधः उदेति हि॥**
🪔 जब यह झूठा 'मैं' टूटता है, तब साक्षीभाव जागता है। इस साक्षीभाव से चित्त की वृत्तियाँ क्षीण होती हैं, और आत्मज्ञान का उदय होता है।
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६. **वृत्तिक्षये चित्तं शान्तं, गुणसाम्यं प्रकृतौ भवेत्।
प्रकृतेः निवृत्त्याः क्षणे तस्मिन्, मुक्तः स्यात् पुरुषोऽखिलः॥**
🪔 जब चित्त की वृत्तियाँ लुप्त हो जाती हैं, तब प्रकृति के गुण साम्य को प्राप्त होते हैं। उस क्षण प्रकृति पुरुष से निवृत्त हो जाती है, और वही मोक्ष की सिद्धि है।
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📜 समापनश्लोकः
**नाहं चित्तं न बुद्धिर्मनः, नाहं कर्ता न भोक्ता च।
साक्षी केवल आत्मा सन्, मुक्तः स्यां यदा वृत्तिशून्यः॥
🪔 “मैं न तो चित्त हूँ, न मन, न बुद्धि, न कर्ता, न भोक्ता — जब मैं केवल साक्षी रूप में स्थित हो जाता हूँ, तब वृत्तिशून्यता के माध्यम से पूर्ण मुक्ति प्राप्त होती है।”
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✍️ साभार - विनय झा
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वयं राष्ट्रे जागृयाम
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