देखो भई... किसी कुल से सम्बन्ध का निर्णय हम गोत्र के आधार पर दो तरह से कर सकते है क्यूंकि जैसे कि मैंने कई बार बताया है, गोत्र दो तरह से होता है-
प्रथम प्रकार - " किसी कुल में जन्म लेने से रक्त संबंध वाला गोत्र।"
कुल-गोत्र - जिस कुल शाखा में जो महान पूर्वज हुआ होता है उस कुल शाखा के लोग उस महान पूर्वज से अपना सम्बन्ध बताने के लिए उसके नाम को अपने गोत्र के रूप में प्रयोग लेते है...
द्वितीय प्रकार - " किसी गुरु ऋषि से विद्या प्राप्त करने से गुरु - शिष्य वाला गोत्र।"
गुरु-गोत्र - पहले के समय में शिष्य जिस ऋषि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करते थे, उस ऋषि से अपना विद्या सम्बन्ध बताने के लिए उस ऋषि के नाम को अपने गोत्र के रूप में प्रयोग लेते थे..
जैसे गुर्जर गौड़ ब्राह्मण - गौड़ ब्राह्मणों की वह शाखा जिसने गुर्जर देश में गौतम ऋषि के आश्रम में रहकर अपनी वंश परंपरा का विस्तार किया वो कहलाये गुर्जर गौड़ ब्राह्मण l विद्या के संबंध से इनके पूरे कुल का गोत्र गौत्तम हुआ।
इसी प्रकार कई होते है लेकिन पोस्ट बड़ी हो जायेगी इसीलिए नहीं लिख रही हूं... फिर कभी चर्चा होगी तब बता दूंगी...
अब ये स्पष्ट है कि आप किसी व्यक्ति विशेष से सम्बंधित तब कहे जा सकते हैं, जब या तो आपने उस व्यक्ति विशेष के कुल में जन्म लिया हो या शिक्षा ग्रहण की हो..
अब जांगिड़ ब्राह्मणों में कुल अठारह गोत्र कहे जाते है यथा -
कश्यप, भारद्वाज, गौतम, विद, जातूकर्ण्य, शांडिल्य, ऋक्षु, दीर्घतमा,वशिष्ठ, वात्स्य, वत्स, वामदेव, अघमर्षण, गाविष्टर, कौडिन्य, लोंगाक्षी, मुद्गल, उपमन्यु।
एक शासन और होता है शासन मतलब ग्राम जिस ऋषि गोत्र के जांगिड ब्राह्मण जिस गाँव में बसाये गए वो उनका शासन कहलाया शासन को ग्राम या खेड़ा या अवंटक या अल्लह या उपगोत्र आदि भी कहते है जैसे - खुड़ाणियां, राजोतिया, राजोरा, डेरोलिया, रोलीवाल, तोनगरिया, बांस, कूकसवाल,शिवाड, सहदवाल आदि जांगिड़ ब्राह्मणों के 1444 शासन होते हैं।
अब हमें विश्वकर्मा जी से जांगिड़ समाज के संबंध पर गोत्र पर बात करनी थी तो आओ शुरू करते है।
अब हम जांगिड़ ब्राह्मणों के अठारह गोत्रों के गोत्रकार ऋषियों की उत्पत्ति पर चर्चा करेंगे।
कश्यप- ये ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक मारीचि के पुत्र हुए।
भारद्वाज - ये ब्रह्मा के दस मानस पुत्रो में से एक अंगिरा(अंगिरस) के पुत्र बृहस्पति के पुत्र हुए।
गौत्तम - ये ब्रह्मा के दस मानस पुत्रो में से एक अंगिरा(अंगिरस) के पुत्र रहूगण के पुत्र हुए।
विद - ये ब्रह्मा के दस मानस पुत्रो में से एक भृगु के कुल में हुए थे।
जातूकर्ण्य - ये ब्रह्मा के दस मानस पुत्रो में से एक वशिष्ठ के पुत्र शक्ति के पुत्र जातूकर्ण्य हुए।
शांडिल्य - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रो में से एक मारीचि के पुत्र कश्यप हुए जिनके आगे शांडिल्य ऋषि हुए।
ऋक्षु - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रो में से एक अंगिरस या अंगिरा के बृहस्पति और बृहस्पति के भारद्वाज और भारद्वाज के कुल में कई विख्यात शिल्पाचार्य हुए जिनमे वंदन के मतवचस, मतवचस के अजमीढ़ और पुरमिड हुए, अजमीढ़ के पुत्र ऋक्षु हुए।
दीर्घतमा - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक अंगिरस या अंगिरा हुए तथा वायुपुराण के अनुसार जिनके पुत्र दीर्घतमा हुए।
वशिष्ठ - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक महर्षि वशिष्ठ हुए।
वात्स्य - वैवस्त मनु के पोते नाभाग के पुत्र अंबरीश ने विद्या सम्बन्ध से अंगिरस गोत्र को स्वीकार कर लिया था इनके पुत्र युवनाश्व, युवनाश्व के पुत्र वात्स्य हुए।
वत्स - भृगु के च्यवन, च्यवन के अप्नवान, अप्नवान के और्व, और्व के ऋचीक, ऋचीक के जमदग्नि और जमदग्नि के कुल में वत्स हुए।
वामदेव - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक अंगिरस या अंगिरा हुए तथा वायुपुराण के अनुसार जिनके पुत्र वामदेव हुए।
अघमर्षण - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक अत्रि हुए, अत्रि के सोम, सोम के बुध,बुध के पुरुरवा, पुरुरवा के विजय, विजय के आगे गाधी और गाधी के विश्वामित्र, विश्वामित्र के मधुच्छन्दा,मधुच्छन्दा के अघमर्षण हुए ।
गाविष्टर- इनका जन्म ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक अत्रि के कुल में हुआ।
कौडिन्य - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक वशिष्ठ के कुल में कुण्डिन, कुण्डिन के कौडिन्य हुए।
लोंगाक्षी - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक अंगिरा के कुल में लोंगाक्षी हुए।
मुद्गल - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक अंगिरा के भृम्म्याश्वन भृम्म्याश्वन के मुद्गल हुए।
उपमन्यु - ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक वशिष्ठ के व्याघ्रपाद और व्याघ्रपाद के महर्षि उपमन्यु हुए।
इस प्रकार स्पष्ट है जांगिड़ ब्राह्मणों के पूर्वज (गोत्रकारक) विश्वकर्मा के वंशज कभी थे ही नहीं (कभी नहीं थे)... इनकी उत्पत्ति विश्वकर्मा वंश (कुल) में नहीं हुई...
जब जांगिड़ ब्राह्मणों के पूर्वज (गोत्र कारक) विश्वकर्मा के वंशज नहीं है, तो आज जो जांगिड़ खुद को विश्वकर्मा की संतान बताने का दावा कर रहे हैं शायद वो जांगिड़ पगला गए है...
अब तुम्हारी आखिरी उम्मीद विद्या सम्बन्ध वाला गोत्र-
जैसे गुर्जर गौड़ ब्राह्मण, गुर्जर देश के वैसे ही जांगिड़ ब्राह्मण जाङ्गल देश के...
अब पुनः जैसे गुर्जर गौड़ ब्राह्मण गौत्तम ऋषि के आश्रम में रहे वैसे ही जांगिड़ ब्राह्मण अंगिरा (जांगिड़) ऋषि के आश्रम में रहे...
अच्छा ये कैसे पता की जांगिड़ ब्राह्मण विश्वकर्मा के आश्रम में नहीं रहे...?
विद्वानों अगर जांगिड़ ब्राह्मण विश्वकर्मा के आश्रम में रहे होते तो जांगिड़ (अंगिरा) के स्थान पर जांगिड़ ब्राह्मणों के पूरे कुल का विद्या के सम्बन्ध से गोत्र विश्वकर्मा या विश्वकर्मा के पुत्रों मनु, मय, त्वष्ठा, शिल्पी, या देवज्ञ नल या नील या इनके वंशज एक सौ पच्चीस गोत्र के नाम आदि के नाम पे रहा होता....!
और हमारी जाति (कुल या वंश) का नाम जांगिड़ है, हमारी जाति की पहचान जांगिड़ शब्द से हैं, फिर जांगिड़ का मतलब अंगिरा होता है न कि विश्वकर्मा।
इसिलए जांगिड़ ब्राह्मणों का विद्या का सम्बन्ध वाला गोत्र हुआ "अंगिरा" ।
इसी प्रकार हमारा सुधन्वा नामक विश्वकर्मा से भी संबंध नहीं है क्योंकि हमारे गोत्रकारक पूर्वजों में सुधन्वा विश्वकर्मा नाम नहीं है। ना ही हमारी जाति का नाम सुधन्वा या विश्वकर्मा के नाम पर है। हमारी जाति का नाम अंगिरा या जांगिड़ है।
वशिष्ठ पुराण आदि के अनुसार विश्वकर्मा ब्राह्मणों के 125 गोत्र होते हैं। जो विश्वकर्मा पुराण से मैं बता रही हूं। मैंने विश्वकर्मा पुराण का तेरहवां अध्याय पढ़ा हैं उसमे भी ये गोत्र है।
विश्वकर्मा पुराण से विश्वकर्मा वंशी पांचाल ब्राह्मण के 125 गोत्र।👇
http://www.jangidbrahminsamaj.com/puran/puran.asp?i=123
इस लिंक पर विश्वकर्मा पुराण का तेरहवां अध्याय दिया हुआ हैं। यहा विश्वकर्मा वंशी पांचाल ब्राह्मणों के एक सौ पच्चीस गोत्र दिए हैं। Blog पर मैं विश्वकर्मा पुराण कैसे दिखाऊं इसीलिए लिंक दिया है कृपया अपने पास उपलब्ध विश्वकर्मा पुराण के तेरहवें अध्याय में विश्वकर्मा वंशी पांचाल ब्राह्मण के गोत्र अवश्य देखे।
जांगिड़ ब्राह्मण गोत्रावली में लिखा है की "विश्वकर्मा ब्राह्मण टूट गए जिससे उनके 125 गोत्र अलग अलग जातियों में आ गए जिनमे जांगिड़ जाति भी एक है" मतलब जांगिड़ ब्राह्मण गोत्रावली के हिसाब से इन्ही विश्वकर्मा ब्राह्मणों के गोत्र हममें हैं भाई कौनसा गोत्र हैं हम में ? 😹🤷🏻♀️... गांजा फूंकते हो क्या... ??
इनके ये 125 गोत्र तो हमसे अलग है।
विश्वकर्मा परमात्मा को भी कहा गया है तो ऐसे तो सारी सृष्टि ही विश्वकर्मा वंशी हो जाएगी। तो फिर सभी विश्वकर्मा ब्राह्मण हो गए। 😹🤷🏻♀️🤫...
बात ये है कि जिनको शास्त्रों में अलग से बता रक्खा है कि हां ये विश्वकर्मा जी के वंशज हैं, उनको ही विश्वकर्मा ब्राह्मण माना जाएगा। 😏🤫...
तो न तो जांगिड़ ब्राह्मण विश्वकर्मा वंशी हैं और न ही विश्वकर्मा से शिक्षा ली... तो फिर जांगिड़ ब्राह्मण समाज विश्वकर्मा जी से संबंधित कैसे हुआ...?
फिर... जांगिड़ ब्राह्मणों में कुल में जन्म लेने से पहचाने जाने वाले पूरे 20 गोत्र आपको गौड़ ब्राह्मणों में मिल जाएंगे , लेकिन विश्वकर्मा के कुल से 1 भी नहीं मिलेगा...
स्पष्ट है जांगिड़ ब्राह्मणों का विश्वकर्मा से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं...मैं सही बोल रही थी ।
इस लेख की शोधकर्ता, लेखिका कोई अज्ञात महिला है। उनको बहुत बहुत साधुवाद, धन्यवाद, बधाई।
लेख से जाँगिड़ ब्राह्मणों की आंखें खोली। सही परिष्कृत करके पुनः भेजा।
साभार - छैल बिहारी शर्मा "आंगिरस" जयपुर
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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