Pages

Thursday, 30 April 2026

यह कहानी सीता माता कहती थी और श्रीराम इसे सुना करते थे..

यह कहानी सीता माता कहती थी और श्रीराम इसे सुना करते थे। एक दिन श्रीराम भगवान को किसी काम के लिए बाहर जाना पड़ गया तो सीता माता कहने लगी कि भगवान मेरा तो बारह वर्ष का नितनेम (नित्य नियम) है। अब आप बाहर जाएंगे तो मैं अपनी कहानी किसे सुनाऊंगी? श्रीराम ने कहा कि तुम कुएं की पाल पर जाकर बैठ जाना और वहां जो औरतें पानी भरने आएंगी उन्हें अपनी कहानी सुना देना। 

 
सीता माता कुएं की पाल पर जाकर बैठ जाती हैं। एक स्त्री आई उसने रेशम की जरी की साड़ी पहन रखी थी और सोने का घड़ा ले रखा था। सीता माता उसे देख कहती हैं कि बहन मेरा बारह वर्ष का नितनेम सुन लो। पर वह स्त्री बोली कि मैं तुम्हारा नितनेम सुनूंगीं तो मुझे घर जाने में देर हो जाएगी और मेरी सास मुझसे लड़ेगी। उसने कहानी नहीं सुनी और चली गई। उसकी रेशम जरी की साड़ी फट गई, सोने का घड़ा मिट्टी के घड़े में बदल गया।  
सास ने देखा तो पूछा कि ये किस का दोष अपने सिर लेकर आ गई है? बहू ने कहा कि कुएं पर एक औरत बैठी थी उसने कहानी सुनने के लिए कहा लेकिन मैने सुनी नही जिसका यह फल मिला। 
 
बहू की बात सुनकर अगले दिन वही साड़ी और घड़ा लेकर सास कुएं की पाल पर गई। सास को वहीं माता सीता बैठी मिलीं तो माता सीता ने कहा कि बहन मेरी कहानी सुन लीजिए... सास बोली कि एक बार छोड़, मैं तो चार बार कहानी सुन लूंगी... . 
 
राम आए लक्ष्मण आए देश के पुजारी आए 
 
नितनेम का नेम लाए आओ राम बैठो राम

 
तपी रसोई जियो राम, माखन मिसरी खाओ राम
 
दूध बताशा पियो राम,सूत के पलका मोठो राम
 
शाल दुशाला पोठो राम, शाल दुशाला ओढ़ो राम
 
जब बोलूं जब राम ही राम, राम संवारें सब के काम
 
खाली घर भंडार भरेंगे सब का बेड़ा पार करेंगे
 
श्री राम जय राम जय-जय राम
 
सास बोली कि बहन कहानी तो बहुत अच्छी लगी। कहानी सुनकर सास घर चली गई और उसकी साड़ी फिर से रेशम जरी की बन गई। मिट्टी का घड़ा फिर सोने के घड़े में बदल गया। बहू कहने लगी सासू मां, आपने ये सब कैसे किया? सास ने कहा कि बहू तू दोष लगा के आई थी और मैं अब दोष उतारकर आ रही हूं. . . बहू ने फिर पूछा कि वह कुएं वाली स्त्री कौन है? सास बोली कि वे सीता माता थीं... वे पुराने से नया कर देती हैं, खाली घर में भंडार भर देती हैं, वह लक्ष्मी जी का वास घर में कर देती हैं, आदमी की जो भी इच्छा हो उसे पूरा कर देती हैं.... बहू बोली कि ऎसी कहानी मुझे भी सुना दो.... सास बोली कि ठीक है तुम भी सुनो और सास ने कहानी शुरु की...  

 
राम आए लक्ष्मण आए देश के पुजारी आए 
 
नितनेम का नेम लाए आओ राम बैठो राम
 
तपी रसोई जियो राम, माखन मिसरी खाओ राम
 
दूध बताशा पियो राम,सूत के पलका मोठो राम
 
शाल दुशाला पोठो राम, शाल दुशाला ओढ़ो राम
 
जब बोलूं जब राम ही राम, राम संवारें सब के काम
 
खाली घर भंडार भरेंगे सब का बेड़ा पार करेंगे
 
श्री राम जय राम जय-जय राम

 
कहानी सुनकर बहू बोली कि कहानी तो बहुत अच्छी है.. .. सास ने कहा कि ठीक है इस कहानी को रोज कहा करेगें। अब सास-बहू रोज सवेरे उठती, नहाती-धोती और पूजा करने के बाद नितनेम की सीता की कहानी कहती। एक दिन उनके यहां एक पड़ोस की औरत आई और बोली कि बहन जरा सी आंच देना तो वह बोली कि आंच तो अभी हमने जलाई ही नहीं। पड़ोसन ने कहा कि तुम सुबह चार बजे से उठकर क्या कर रही हो फिर? उन्होंने कहा कि सुबह उठकर हम पूजा करते हैं फिर सीता माता की नितनेम की कहानी कहते हैं। 
 
पड़ोसन ने उनकी बात सुनकर फिर कहा कि सीता माता की कहानी कहने से तुम्हें क्या मिला? वे बोली कि इनकी कहानी कहने से घर में भंडार भर जाते हैं। सारे काम सिद्ध होते हैं, मन की इच्छा भी पूरी होती है। पड़ोसन कहती है कि बहन ऎसी कहानी तो मुझे भी सुना दो फिर। वह बोली कि ठीक है तुम भी यह कहानी सुन लो... 
 
राम आए लक्ष्मण आए देश के पुजारी आए 
 
नितनेम का नेम लाए आओ राम बैठो राम ……………..
 
सारी कहानी सुनने के बाद पड़ोसन कहने लगी बहन कहानी तो मुझे बहुत अच्छी लगी। अब वह पड़ोसन भी नितनेम सीता माता की कहानी कहने लगी। कहानी कहने से सीता माता ने पड़ोसन के भी भंडार भर दिए। अब तो पूरे मोहल्ले में नितनेम की कथा चल पड़ी.. हर किसी की मनोकामना पूरी होने लगी...

 हे सीता माता ! जैसे आपने उनके भंडार भरे, वैसे ही आप हमारे भी भंडार भरना। कहानी सुनने वाले के भी और कहानी कहने वाले के भी।
 
उत्तरप्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में आज भी यह कथा सीता जयंती पर चाव से सुनाई जाती है।

पितृ दोष

🌹(पितृ से मुक्ति कैसे संभव है)🌹 

हजारों यथार्थ सत्य दृष्टांतों में से आप लोगों को दो दृष्टांत बताने की कोशिश करता हूँ !

1 :- भगवान राम जब लंका पर जाने के लिए समुन्द्र (सागर ) से रास्ता मांग रहे थे, तब सागर ने रास्ता नही दिया!

तब रामचंद्र जी को क्रोध आया और समुन्द्र को सुखाने के लिए अपनी कमान से बाण निकाल लिया (बाण यहां प्रतीक है)

लेकिन उन्होंने कृत्या नामक महा शक्ति का आवाहन कर लिए संकल्प ले लिए समुद्र को सुखाने के लिए)

जैसे ही भगवान राम समुन्द्र पर कृत्या का प्रहार करने लगे सागर ( सगर ) समुन्द्र के रूप में श्रापित पड़े हुये थे, 
अनंत वर्षों से अचानक समुन्द्र में से प्रकट हो गये,
और कहने लगे हे राम तुम ये क्या कर रहे हो, क्या करने जा रहे हो,
मै तुम्हारे तात का भी तात हूँ सगर जो इस समुद्र के रूप में श्रापित पड़ा हुआ हूँ,
अगर ये कृत्या नामक की शक्ति का प्रहार समुन्द्र पर कर दिया तो अनंत जीव-जंतु नष्ट हो जायेगे पहले से ही तुम्हारा वंश श्रापित है,

कोई सागर के रूप में तो कोई पर्वत कोई नदी के रूप में इस धरती पर पड़े हुये है, औऱ अपनी मुक्ति के लिए तड़प रहे है,

हे राम तुम हमारी मुक्ति के लिए पित्रेष्ठि साधना अनुष्ठान करो, 
औऱ इस कृत्या नामक शक्ति को उत्तर की तरफ़ हिमालय में एक विशाल कुंड है,
जिसमे एक राक्षस रहता है, वो किसी भी जीव जंतु को जीवित नही छोड़ता है,
तुम इस संकल्प की दिशा मोड़ कर उस तालाब पर छोड़ दो , जिससे उस राक्षस का अंत हो जायेगा और जीव हत्या बंद हो जायेगी !

जो नेपाल उसी तालाब में बसा हुआ है !
हे राम तुम्हारी सेना में दो विचित्र शक्ति लिए हुये दो बालक है, वो किसी भी पत्थर को छुएंगे वह पत्थर पानी मे तैरना शुरू कर देंगे !
तब जाकर राम ने रामेश्वरम शिवलिंग की स्थापना कर अपने पितृ दोष मुक्ति के लिए साधना अनुष्ठान किया !

2 :- भगवान श्री कृष्ण के 47 वर्ष की अवस्था तक कोई भी संतान नही थी !
*रुक्मणि कहती है, हे प्रभु आप तो द्वारका धीश हो, त्रिलोकी नाथ हो, तीनों लोकों के स्वामी हो !
मुझे एक संतान दे दो , वर्ना ये संसार मुझे बाँझ की संज्ञा देगा, 
मै बिन संतान के ये शरीर नही छोड़ना चाहाती, 
वार्ना लोग मुझे कलंकित कर देंगे!

तब भगवान श्री कृष्ण कहते है, हे देवी में तीनों लोक तुम्हें दे सकता हूँ लेकिन संतान में तुम्हें नही दे सकता,
तब रुक्मणि कहती है प्रभु कोई तो उपाय होगा,
तब श्री कृष्ण और रुक्मणि अपने गुरु सांदीपनि ऋषि के आश्रम उज्जैन जाते है, 
(संदीपिनी ऋषि) कहते है, हे कृष्ण, तुम्हारे पितृ ही तुम्हे संतान प्रदान कर सकते है,
इसलिए तुम पितृ दोष निवारण औऱ आशीर्वाद प्राप्ति अनुष्ठान करो,

भगवान श्री कृष्ण ने अपने गुरु सांदीपन ऋषि के बताए अनुसार 3 दिवसीय पित्रेष्ठि साधना अनुष्ठान किया उसके बाद हि (प्रधुम्न) का जन्म हुआ !

सोचिए पितृ दोष ने जब भगवानों को भी नही छोड़ा तो सामान्य व्यक्ति की क्या विसाद, इसलिए हर व्यक्ति को सांदीपनि ऋषि प्रणीत पितृ दोष निवारण साधना करनी चाहिए?

संक्षिप्त शरभ पूजन

🌹संक्षिप्त शरभ पूजन🌹 -
---------------------------

ॐ गुं गुरुभ्यो नमः 
ॐ श्री गणेशाय नमः 
ॐ श्री सांब सदाशिवाय नम: 
ॐ ह्रीं दूं दुर्गायै नमः
ॐ श्री शरभेश्वराय नम: 

फिर आचमनी या चमच से चार बार बाए हाथ से दाहिने हाथ पर पानी लेकर पिए 

ॐ आत्मतत्वाय स्वाहा 
ॐ विद्या तत्वाय स्वाहा 
ॐ शिव तत्वाय स्वाहा 
ॐ सर्व तत्वाय स्वाहा

उसके बाद गुरु मंडल का ध्यान कर पूजन के स्थान पर पुष्प अक्षत अर्पण करे 

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः 
ॐ श्री परम गुरुभ्यो नमः 
ॐ श्री पारमेष्ठी गुरुभ्यो नमः

गुरु मंत्र का कमसे कम 5 बार जाप करे 

उसके बाद अपने आसन का स्पर्श करे और पुष्प अक्षत अर्पण करे

ॐ पृथ्वीव्यै नमः

अब तीन बार सर से पाँव तक हाथ फेरे 

ॐ श्री शरभेश्वराय नमः आत्मानं रक्ष रक्ष

अब जल के पात्र को गंध लगाकर अक्षत पुष्प अर्पण करे

ॐ कलश मण्डलाय नमः

अब गणेशजी का ध्यान करे और पुष्प अक्षत अर्पण करे 

वक्रतुंड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ 
निर्विघ्नं कुरु में देव सर्व कार्येषु सर्वदा

ॐ श्री गणेशाय नमः का 11 या 21 बार जाप करे

अब भगवान शिव का ध्यान कर पुष्प अक्षत या बेल अर्पण करे 

ॐ नम: शंभवाय च मयोभवाय च 
नम: शंकराय च मयस्कराय च 
नम: शिवाय च शिवतराय च 

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात् 

ॐ नम: शिवाय का 5 या 11 बार जाप करे 

फिर भैरव जी का स्मरण करे और पुष्प अक्षत अर्पण करे 

ॐ भं भैरवाय नमः

अब शरभेश्वर का ध्यान करे 

शरभेश्वर ध्यान मंत्र :- 
-------------------------

चंद्रार्काग्निस्त्रिदृष्टि: कुलिशवर नखश्चन्चलो अतिउग्रजिव्ह: ! 
काली दुर्गा च पक्षौ हृदय जठरगो भैरवो वाडवाग्नि : ! 
उरुस्थौ व्याधि मृत्यु शरभवरखगश्चंड वाताति वेग: ! 
संहर्ता सर्वशत्रून सजयति शरभ: शालुव: पक्षिराज: !!

( यहाँ पर आप भगवान शरभेश्वर के आवाहन हेतु शरभ हृदय स्तोत्र का
 श्रद्धापूर्वक पाठ कर सकते है ) 

आवाहन कर उनका पंचोपचार पूजन करे 

ॐ श्री शरभेश्वराय नम: गंधं समर्पयामि 

ॐ श्री शरभेश्वराय नम: पुष्पं समर्पयामि 

ॐ श्री शरभेश्वराय नम: धूपं समर्पयामि 

ॐ श्री शरभेश्वराय नम: दीपं समर्पयामि 

ॐ श्री शरभेश्वराय नम: नैवेद्यं समर्पयामि

अब भगवान शरभेश्वर के लिये पुष्प अक्षत या बेल अर्पण करते जाये .. 

 ॐ नमो भगवते महाशिवाय पक्षिराजाय शरभेश्वराय हुं फट स्वाहा 

ॐ पक्षीराजाय नम: 
ॐ आकाशभैरवाय नम: 
ॐ शालुवेषाय नम: 
ॐ अष्टपादाय नम: 
ॐ आशुगरुडाय नम: 
ॐ महाशिवाय नम: 
ॐ शरभेश्वराय नम: 

अब भगवान शरभ के स्तोत्र का पाठ करे 

शरभ अष्टक स्तोत्र 

देवादिदेवाय जगन्मयाय शिवाय नालिक निभाननाय !
शर्वाय भीमाय शराधिपाय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!१!! 

हराय भीमाय हरिप्रियाय भवाय शांताय परात्पराय ! 
मृडाय रुद्राय त्रिलोचनाय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!२!! 

शीतांशुचूडाय दिगंबराय सृष्टिस्थितीध्वंसन कारणाय !
जटाकलापाय जितेंद्रियाय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!3!! 

कलंककंठाय भवांतकाय कपालशूलात्त करांबुजाय !
भुजंगभूषाय पुरांतकाय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!4!! 

शमादिषटकाय यमांतकाय यमादियोगाष्टक सिद्धिदाय ! 
उमाधिनाथाय पुरातनाय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!5!! 

घृणादिपाशाष्टक वर्जिताय खिलीकृतास्मत्पथिपूर्वगाय ! 
गुणादिहिनाय गुणत्रयाय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!6!! 

कालायवेदामृत कंदलाय कल्याणकौतुहल कारणाय ! 
स्थूलाय सूक्ष्माय स्वरुपगाय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!7!! 

पंचाननायनिलभास्कराय पंचाशदावर्णाद्य पराक्षराय ! 
पंचाक्षरेशाय जगद्धिताय नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !! ८!!

नीलकंठाय रुद्राय शिवाय शशिमौलिने ! 
भवाय भवनाशाय पक्षिराजाय ते नम: !! 

परात्पराय घोराय शंभवे परमात्मने !
शर्वाय निर्मलांगाय सालुवाय नमो नम: !! 

गंगाधराय सांबाय परमानंद तेजसे ! 
सर्वेश्वराय शांताय शरभाय नमो नम: !! 

वरदाय वरांगाय वामदेवाय शूलिने ! 
गिरीशाय गिरीशाय गिरिजापतये नम: !! 

सर्वेश सर्वाधिक शांतमूर्ते कृतापराधान मरानथान्यान ! 
विनिय विश्व विधायिनिते नमोस्तु तुभ्यं शरभेश्वराय !!

अब भगवान शरभेश्वर को अर्घ्य दे 

ॐ पक्षिराजाय विद्महे आकाशभैरवाय धीमहि तन्नो शरभ: प्रचोदयात् 

ॐ शालुवेषाय विद्महे पक्षिराजाय धीमहि तन्नो शरभ: प्रचोदयात्

यहाँ पर आप चाहे तो भगवान शरभेश्वर के अष्टोत्तर शत नामावली(108 नाम ) के एकेक नाम को पढते हुते पुष्प अक्षत या बेल अर्पण कर सकते है  

अब नीचे दिये हुये शरभ माला मंत्र को पढकर पुष्पांजली प्रदान करे 

शरभ माला मंत्र

ॐ नम: पक्षिराजाय निशि कुलिश वर दंष्ट्रा नखायानेक कोटि ब्रह्म कपाल मालालंकृताय सकल कुल महानागभूषणाय सर्वभूतनिवारणाय नृसिंहगर्व निर्वापण कारणाय सकलरिपु रंभाटवी विमोटन महानिलाय शरभ सालुवाय ह्रां ह्रीं ह्रूं प्रवेशय प्रवेशय रोग ग्रहं बंधय बंधय बालग्रहं बंधय बंधय आवेशय आवेशय भाषय भाषय मोहय मोहय कंपय कंपय बंधय बंधय भूतग्रहं बंधय रोगग्रहं बंधय यक्षग्रहं बंधय पातालग्रहं बंधय चातुर्थग्रहं बंधय भीमग्रहं बंधय अपस्मारग्रहं बंधय उन्मत्तग्रहं बंधय राक्षसग्रहं बंधय ग्रहं बंधय ज्वालामुख ग्रहं बंधय तमोहार ग्रहं बंधय भूचरग्रहं बंधय खेचरग्रहं बंधय वेतालग्रहं बंधय कूष्मांडग्रहं बंधय स्त्रीग्रहं बंधय पापग्रहं बंधय विक्रमग्रहं बंधय व्युत्क्रमग्रहं बंधय प्रेतग्रहं बंधय पिशाचग्रहं बंधय आवेशग्रहं बंधय अनावेश ग्रहं बंधय सर्वग्रहान मर्दय सर्वग्रहान त्रोटय त्रोटय प्रैं त्रैं हैं मारय शीघ्रं मारय मुंच मुंच दह दह पच पच नाशय नाशय सर्वदुष्टान नाशय ह्रूं फट स्वाहा !! 

फिर एक आचमनी जल अर्पण करे 

अनेन पूजनेन श्री शरभेश्वर देवता प्रीयतां मम .. ॐ तत्सत ..

माता मातंगी साधना विधि (31 दिन, 21 माला प्रतिदिन)

माता मातंगी साधना विधि (31 दिन, 21 माला प्रतिदिन)
लेखक: रामकली शास्त्री

---

माता मातंगी, दशमहाविद्याओं में नवम स्वरूप, तंत्र और ज्ञान की अत्यंत गूढ़ एवं रहस्यमयी देवी मानी जाती हैं। ये वाणी, संगीत, कला, आकर्षण और राजसी प्रभाव की अधिष्ठात्री हैं। जो साधक उनकी सच्ची निष्ठा से उपासना करता है, उसकी वाणी में सम्मोहन, व्यक्तित्व में तेज और जीवन में अप्रतिम सफलता का संचार होता है।

यह साधना विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत प्रभावशाली है जो कला, राजनीति, वाणी, नेतृत्व या आकर्षण शक्ति को बढ़ाना चाहते हैं।

नीचे 31 दिनों की संपूर्ण साधना विधि दी जा रही है, जिसमें प्रतिदिन 21 माला जप करना अनिवार्य है।

---

🕉️ साधना का संकल्प

साधना आरंभ करने से पहले शुद्ध मन और स्पष्ट उद्देश्य होना आवश्यक है।
पहले दिन स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।

अपने दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प लें:
“मैं (अपना नाम), माता मातंगी की कृपा प्राप्ति हेतु 31 दिनों तक प्रतिदिन 21 माला जप करूँगा/करूँगी।”

जल को भूमि पर छोड़ दें।

---

🪔 आवश्यक सामग्री

- हरे या काले रंग का आसन
- माता मातंगी की तस्वीर या यंत्र
- रुद्राक्ष या हकीक की माला
- दीपक (घी या सरसों का तेल)
- अगरबत्ती या धूप
- पुष्प (विशेषतः हरे या पीले)
- नैवेद्य (मिठाई या फल)
- ताम्बूल (पान) – विशेष तांत्रिक साधना में उपयोगी

---

🔱 साधना का समय

- ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4–6 बजे) सर्वोत्तम
- या रात्रि 10 बजे के बाद (तांत्रिक प्रभाव के लिए अधिक शक्तिशाली)

एक ही समय का पालन पूरे 31 दिन करना अत्यंत आवश्यक है।

---

🧘 आसन एवं दिशा

- हरे या काले आसन पर बैठें
- रीढ़ सीधी रखें
- ध्यान स्थिर रखें
- उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख रखें

---

🔥 पूजन विधि

1. दीपक जलाएं 🪔
2. धूप अर्पित करें
3. माता मातंगी का ध्यान करें

ध्यान मंत्र:
“श्यामा वर्णा, त्रिनेत्रा, वीणा वादिनी, वरद मुद्रा धारण किए हुए माता मातंगी का मैं ध्यान करता हूँ।”

4. पुष्प अर्पित करें 🌸
5. नैवेद्य अर्पित करें 🍎

---

📿 मुख्य मंत्र जप

आपको प्रतिदिन 21 माला जप करना है।

मूल मंत्र:
“ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा”

या सरल साधना के लिए:
“ॐ ह्रीं मातंग्यै नमः”

---

⚠️ जप के नियम

- प्रत्येक माला में 108 मंत्र जप करें
- कुल 21 माला = 2268 मंत्र प्रतिदिन
- माला को कपड़े से ढककर जप करें
- जप के दौरान किसी से बात न करें
- मन भटके तो पुनः मंत्र पर ध्यान लाएं

---

🌿 31 दिनों का अनुशासन

यह साधना अनुशासन आधारित है। नीचे दिए गए नियमों का पालन अनिवार्य है:

🚫 क्या न करें:

- झूठ बोलना
- नकारात्मक सोच
- क्रोध और अपशब्द
- मांस, शराब, तामसिक भोजन

✅ क्या करें:

- सात्विक भोजन 🥗
- ब्रह्मचर्य का पालन
- मौन या कम बोलना
- प्रतिदिन स्नान और स्वच्छता

---

🌙 विशेष निर्देश (तांत्रिक प्रभाव हेतु)

- रात्रि साधना अधिक प्रभावी होती है
- यदि संभव हो तो एकांत स्थान चुनें
- 11वें, 21वें और 31वें दिन विशेष ध्यान करें

---

🔮 साधना के अनुभव

यदि साधना सही ढंग से की जाए, तो निम्न अनुभव हो सकते हैं:

- वाणी में आकर्षण बढ़ना 🎤
- लोगों पर प्रभाव बढ़ना
- अचानक अवसर मिलना
- कला और रचनात्मकता में वृद्धि 🎨
- स्वप्न में संकेत मिलना

---

💫 सिद्धि के संकेत

31 दिनों के अंत में यदि आपको निम्न संकेत मिलते हैं, तो समझिए साधना सफल हो रही है:

- आत्मविश्वास में वृद्धि
- लोगों का आपकी ओर आकर्षित होना
- शब्दों में शक्ति आना
- मानसिक स्पष्टता

---

🛑 साधना के दौरान सावधानियां

- किसी को अपनी साधना के बारे में न बताएं
- बीच में साधना न छोड़ें
- यदि किसी दिन जप छूट जाए, तो अगले दिन पूर्ति करें
- मानसिक शुद्धता बनाए रखें

---

🌺 31वें दिन की पूर्णाहुति

अंतिम दिन विशेष पूजन करें:

- 108 बार हवन करें (यदि संभव हो) 🔥
- ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराएं 🍛
- माता को धन्यवाद दें

---

🧿 साधना का गुप्त तत्व

माता मातंगी की साधना केवल मंत्र जप नहीं है, यह वाणी, विचार और ऊर्जा को नियंत्रित करने की प्रक्रिया है।

यदि आप अपने शब्दों को नियंत्रित कर लेते हैं, तो आप अपने भाग्य को नियंत्रित कर सकते हैं।

---

✨ निष्कर्ष

यह साधना अत्यंत शक्तिशाली है, लेकिन उतनी ही संवेदनशील भी।
इसे केवल गंभीर साधक ही करें।

माता मातंगी की कृपा से:

- वाणी सिद्ध होती है
- आकर्षण बढ़ता है
- धन और यश प्राप्त होता है

---

जय माता मातंगी 🙏

— रामकली शास्त्री

जनेऊ पहनते के क्या है लाभ, और क्यों पहनते हैं ?

जनेऊ पहनते के क्या है लाभ, और क्यों पहनते हैं
ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम अर्थात ब्राह्मण ब्रह्म ,ईश्वर, तेज से युक्‍त हो।
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। उपनयन' का अर्थ है, 'पास या सन्निकट ले जाना।' किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। हिन्दू समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। कालांतर में इस संस्कार को दूसरे धर्मों में धर्मांतरित करने के लिए उपयोग किया जाने लगा। हिन्दू धर्म में प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। हर हिन्दू जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।
क्यों पहनते हैं जनेऊ : हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों में से एक 'उपनयन संस्कार' के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे यज्ञोपवीत संस्कार' भी कहा जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। प्राचीनकाल में पहले शिष्य, संत और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। इस दीक्षा देने के तरीके में से एक जनेऊ धारण करना भी होता था। प्राचीनकाल में गुरुकुल में दीक्षा लेने या संन्यस्त होने के पूर्व यह संकार होता था।
यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध भी कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है।
दीक्षा देना : दीक्षा देने का प्रचलन वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ किया था। प्राचीनकाल में पहले शिष्य और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। माता-पिता अपने बच्चों को जब शिक्षा के लिए भेजते थे तब भी दीक्षा दी जाती थी। हिन्दू धर्मानुसार दिशाहीन जीवन को दिशा देना ही दीक्षा है। दीक्षा एक शपथ, एक अनुबंध और एक संकल्प है। दीक्षा के बाद व्यक्ति द्विज बन जाता है। द्विज का अर्थ दूसरा जन्म। दूसरा व्यक्तित्व।
अन्य धर्मों में यह संस्कार : हिन्दू धर्म से प्रेरित यह उपनयन संस्कार सभी धर्मों में मिल जाएगा। यह दीक्षा देने की परंपरा प्राचीनकाल से रही है, हालांकि कालांतर में दूसरे धर्मों में दीक्षा को अपने धर्म में धर्मांतरित करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। इस आर्य संस्कार को सभी धर्मों में किसी न किसी कारणवश भिन्न-भिन्न रूप में अपनाया जाता रहा है। मक्का में काबा की परिक्रमा से पूर्व यह संस्कार किया जाता है।
सारनाथ की अति प्राचीन बुद्ध की प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है। जैन धर्म में भी इस संस्कार को किया जाता है। वित्र मेखला अधोवसन (लुंगी) का सम्बन्ध पारसियों से भी है। सिख धर्म में इसे अमृत संचार कहते हैं। बौद्ध धर्म से इस परंपरा को ईसाई धर्म ने अपनाया जिसे वे बपस्तिमा कहते हैं। यहूदी और इस्लाम धर्म में खतना करके दीक्षा दी जाती है।
जनेऊ पहनने के 9 लाभ
जनेऊ को हर उस हिन्दू को धारण करना चाहिए जो मांस और शराब को छोड़कर सादगीपूर्ण जीवन यापन करना चाहता है। हम यहां जनेऊ पहनने के आपको लाभ बता रहे हैं। जनेऊ के नियमों का पालन करके आप निरोगी जीवन जी सकते हैं।
1.जीवाणुओं-कीटाणुओं से बचाव : जो लोग जनेऊ पहनते हैं और इससे जुड़े नियमों का पालन करते हैं, वे मल-मूत्र त्याग करते वक्त अपना मुंह बंद रखते हैं। इसकी आदत पड़ जाने के बाद लोग बड़ी आसानी से गंदे स्थानों पर पाए जाने वाले जीवाणुओं और कीटाणुओं के प्रकोप से बच जाते हैं।
2.गुर्दे की सुरक्षा : यह नियम है कि बैठकर ही जलपान करना चाहिए अर्थात खड़े रहकर पानी नहीं पीना चाहिए। इसी नियम के तहत बैठकर ही मूत्र त्याग करना चाहिए। उक्त दोनों नियमों का पालन करने से किडनी पर प्रेशर नहीं पड़ता। जनेऊ धारण करने से यह दोनों ही नियम अनिवार्य हो जाते हैं।
3.हृदय रोग व ब्लडप्रेशर से बचाव : शोधानुसार मेडिकल साइंस ने भी यह पाया है कि जनेऊ पहनने वालों को हृदय रोग और ब्लडप्रेशर की आशंका अन्य लोगों के मुकाबले कम होती है। जनेऊ शरीर में खून के प्रवाह को भी कंट्रोल करने में मददगार होता है। ‍चिकित्सकों अनुसार यह जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।
4.लकवे से बचाव : जनेऊ धारण करने वाला आदमी को लकवे मारने की संभावना कम हो जाती है क्योंकि आदमी को बताया गया है कि जनेऊ धारण करने वाले को लघुशंका करते समय दांत पर दांत बैठा कर रहना चाहिए। मल मूत्र त्याग करते समय दांत पर दांत बैठाकर रहने से आदमी को लकवा नहीं मारता।
5.कब्ज से बचाव : जनेऊ को कान के ऊपर कसकर लपेटने का नियम है। ऐसा करने से कान के पास से गुजरने वाली उन नसों पर भी दबाव पड़ता है, जिनका संबंध सीधे आंतों से है। इन नसों पर दबाव पड़ने से कब्ज की श‍िकायत नहीं होती है। पेट साफ होने पर शरीर और मन, दोनों ही सेहतमंद रहते हैं।
6.शुक्राणुओं की रक्षा : दाएं कान के पास से वे नसें भी गुजरती हैं, जिसका संबंध अंडकोष और गुप्तेंद्रियों से होता है। मूत्र त्याग के वक्त दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से वे नसें दब जाती हैं, जिनसे वीर्य निकलता है। ऐसे में जाने-अनजाने शुक्राणुओं की रक्षा होती है। इससे इंसान के बल और तेज में वृद्ध‍ि होती है।
7.स्मरण शक्ति‍ की रक्षा : कान पर हर रोज जनेऊ रखने और कसने से स्मरण शक्त‍ि का क्षय नहीं होता है। इससे स्मृति कोष बढ़ता रहता है। कान पर दबाव पड़ने से दिमाग की वे नसें एक्ट‍िव हो जाती हैं, जिनका संबंध स्मरण शक्त‍ि से होता है। दरअसल, गलतियां करने पर बच्चों के कान पकड़ने या ऐंठने के पीछे भी मूल कारण यही होता था।
8.आचरण की शुद्धता से बढ़ता मानसिक बल : कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है। पवित्रता का अहसास होने से आचरण शुद्ध होने लगते हैं। आचरण की शुद्धत से मानसिक बल बढ़ता है।
9.बुरी आत्माओं से रक्षा : ऐसी मान्यता है कि जनेऊ पहनने वालों के पास बुरी आत्माएं नहीं फटकती हैं। इसका कारण यह है कि जनेऊ धारण करने वाला खुद पवित्र आत्मरूप बन जाता है और उसमें स्वत: ही आध्यात्म‍िक ऊर्जा का विकास होता है।
अलगे पन्ने पर कान में ही क्यों लपेटते हैं जनेऊ
क्यों कान पर लपेटते हैं जनेऊं : मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसें, जिनका संबंध पेट की आंतों से होता है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है, जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय के रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते।
कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है। कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है। जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है। इसी कारण जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है। वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।
माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।
विद्यालयों में बच्चों के कान खींचने के मूल में एक यह भी तथ्य छिपा हुआ है कि उससे कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है। इसलिए भी यज्ञोपवीत को दायें कान पर धारण करने का उद्देश्य बताया गया है।
जनेऊ का धार्मिक महत्व : यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है। जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है।
धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि जनेऊ धारण करने से शरीर शुद्घ और पवित्र होता है। शास्त्रों अनुसार आदित्य, वसु, रुद्र, वायु, अग्नि, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में माना गया है। अत: उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। आचमन अर्थात मंदिर आदि में जाने से पूर्व या पूजा करने के पूर्व जल से पवित्र होने की क्रिया को आचमन कहते हैं। इस्लाम धर्म में इसे वजू कहते हैं।
द्विज : स्वार्थ की संकीर्णता से निकलकर परमार्थ की महानता में प्रवेश करने को, पशुता को त्याग कर मनुष्यता ग्रहण करने को दूसरा जन्म कहते हैं। शरीर जन्म माता-पिता के रज-वीर्य से वैसा ही होता है, जैसा अन्य जीवों का। आदर्शवादी जीवन लक्ष्य अपना लेने की प्रतिज्ञा करना ही वास्तविक मनुष्य जन्म में प्रवेश करना है। इसी को द्विजत्व कहते हैं। द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म।
सामाजिक महत्व : आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है। धारण करने के बाद उसे बताता है कि उसे दो लोगों का भार या जिम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का। अब एक-एक जनेऊ में 9-9 धागे होते हैं जो हमें बताते हैं कि हम पर पत्नी और पत्नी पक्ष के 9-9 ग्रहों का भार ये ऋण है उसे वहन करना है। अब इन 9-9 धागों के अंदर से 1-1 धागे निकालकर देखें तो इसमें 27-27 धागे होते हैं। अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के 27-27 नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है। अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो 27+9 = 36 होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर 36= 3+6 = 9 आता है, जो एक पूर्ण अंक है। अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 2 और जोड़ दें तो 9+2= 11 होगा जो हमें बताता है की हमारा जीवन अकेले अकेले दो लोगों अर्थात् पति और पत्नी (1 और 1) के मिलने से बना है। 1+1 = 2 होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है। जब हम अपने दोनों पक्षों का ऋण वहन कर लेते हैं तो हमें अशीम शांति की प्राप्ति हो जाती है।
यज्ञोपवीत धारण करने के नियम
यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता। मैला होने पर उतारने के बाद तुरंत ही दूसरा जनेऊ धारण करना पड़ता है।
लड़की भी पहन सकती है जनेऊ : वह लड़की जिसे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।
कब पहने जनेऊ : जिस दिन गर्भ धारण किया हो उसके आठवें वर्ष में बालक का उपनयन संस्कार किया जाता है। जनेऊ पहनने के बाद ही विद्यारंभ होता है, लेकिन आजकल गुरु परंपरा के समाप्त होने के बाद अधिकतर लोग जनेऊ नहीं पहनते हैं तो उनको विवाह के पूर्व जनेऊ पहनाई जाती है। लेकिन वह सिर्फ रस्म अदायिगी से ज्यादा कुछ नहीं, क्योंकि वे जनेऊ का महत्व नहीं समझते हैं।
यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत।।
अर्थात : अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है। हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके ही इसे उतारें।
किसी भी धार्मिक कार्य, पूजा-पाठ, यज्ञ आदि करने के पूर्व जनेऊ धारण करना जरूरी है।
विवाह तब तक नहीं होता जब तक की जनेऊ धारण नहीं किया जाता है।
जब भी मूत्र या शौच विसर्जन करते वक्त जनेऊ धारण किया जाता है।
यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।
यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।
जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी यज्ञोपवीत संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।
यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।
देव प्रतिमा की मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।
अंत में जानिए आखिर जनेऊ क्या है, कैसे बनती और धारण करते हैं
जनेऊ क्या है : आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।
तीन सूत्र क्यों : जनेऊ में मुख्‍यरूप से तीन धागे होते हैं। प्रथम यह तीन सूत्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। द्वितीय यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और तृतीय यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है। चतुर्थ यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है। पंचम यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।
नौ तार : यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं। हम मुख से अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से अच्छा सुने।
पांच गांठ : यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है।
जनेऊ की लंबाई : यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि।
जनेऊ धारण वस्त्र : जनेऊ धारण करते वक्त बालक के हाथ में एक दंड होता है। वह बगैर सिला एक ही वस्त्र पहनता है। गले में पीले रंग का दुपट्टा होता है। मुंडन करके उसके शिखा रखी जाती है। पैर में खड़ाऊ होती है। मेखला और कोपीन पहनी जाती है।
मेखला, कोपीन, दंड : मेखला और कोपीन संयुक्त रूप से दी जाती है। कमर में बांधने योग्य नाड़े जैसे सूत्र को मेखला कहते हैं। मेखला को मुंज और करधनी भी कहते हैं। कपड़े की सिली हुई सूत की डोरी, कलावे के लम्बे टुकड़े से मेखला बनती है। कोपीन लगभग 4 इंच चौड़ी डेढ़ फुट लम्बी लंगोटी होती है। इसे मेखला के साथ टांक कर भी रखा जा सकता है। दंड के लिए लाठी या ब्रह्म दंड जैसा रोल भी रखा जा सकता है। यज्ञोपवीत को पीले रंग में रंगकर रखा जाता है।
जनेऊ धारण : बगैर सिले वस्त्र पहनकर, हाथ में एक दंड लेकर, कोपीन और पीला दुपट्टा पहनकर विधि-विधान से जनेऊ धारण की जाती है। जनेऊ धारण करने के लिए एक यज्ञ होता है, जिसमें जनेऊ धारण करने वाला लड़का अपने संपूर्ण परिवार के साथ भाग लेता है। यज्ञ द्वारा संस्कार किए गए विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है।
गायत्री मंत्र : यज्ञोपवीत गायत्री मंत्र से शुरू होता है। गायत्री- उपवीत का सम्मिलन ही द्विजत्व है। यज्ञोपवीत में तीन तार हैं, गायत्री में तीन चरण हैं। ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ प्रथम चरण, ‘भर्गोदेवस्य धीमहि’ द्वितीय चरण, ‘धियो यो न: प्रचोदयात्’ तृतीय चरण है। गायत्री महामंत्र की प्रतिमा- यज्ञोपवीत, जिसमें 9 शब्द, तीन चरण, सहित तीन व्याहृतियां समाहित हैं।
यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।
आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।
ऐसे करते हैं संस्कार : यज्ञोपवित संस्कार प्रारम्भ करने के पूर्व बालक का मुंडन करवाया जाता है। उपनयन संस्कार के मुहूर्त के दिन लड़के को स्नान करवाकर उसके सिर और शरीर पर चंदन केसर का लेप करते हैं और जनेऊ पहनाकर ब्रह्मचारी बनाते हैं। फिर होम करते हैं। फिर विधिपूर्वक गणेशादि देवताओं का पूजन, यज्ञवेदी एवं बालक को अधोवस्त्र के साथ माला पहनाकर बैठाया जाता है। फिर दस बार गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करके देवताओं के आह्‍वान के साथ उससे शास्त्र शिक्षा और व्रतों के पालन का वचन लिया जाता है।
फिर उसकी उम्र के बच्चों के साथ बैठाकर चूरमा खिलाते हैं फिर स्नान कराकर उस वक्त गुरु, पिता या बड़ा भाई गायत्री मंत्र सुनाकर कहता है कि आज से तू अब ब्राह्मण हुआ अर्थात ब्रह्म ,,सिर्फ ईश्वर को मानने वाला,, को माने वाला हुआ।
इसके बाद मृगचर्म ओढ़कर मुंज (मेखला) का कंदोरा बांधते हैं और एक दंड हाथ में दे देते हैं। तत्पश्चात्‌ वह बालक उपस्थित लोगों से भीक्षा मांगता है। शाम को खाना खाने के पश्चात्‌ दंड को साथ कंधे पर रखकर घर से भागता है और कहता है कि मैं पढ़ने के लिए काशी जाता हूं। बाद में कुछ लोग शादी का लालच देकर पकड़ लाते हैं। तत्पश्चात वह लड़का ब्राह्मण मान लिया जाता है।
जनेऊ संस्कार का समय : माघ से लेकर छ: मास उपनयन के लिए उपयुक्त हैं। प्रथम, चौथी, सातवीं, आठवीं, नवीं, तेरहवीं, चौदहवीं, पूर्णमासी एवं अमावस की तिथियां बहुधा छोड़ दी जाती हैं। सप्ताह में बुध, बृहस्पति एवं शुक्र सर्वोत्तम दिन हैं, रविवार मध्यम तथा सोमवार बहुत कम योग्य है। किन्तु मंगल एवं शनिवार निषिद्ध माने जाते हैं।
मुहूर्त : नक्षत्रों में हस्त, चित्रा, स्वाति, पुष्य, घनिष्ठा, अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, श्रवण एवं रवती अच्छे माने जाते हैं। एक नियम यह है कि भरणी, कृत्तिका, मघा, विशाखा, ज्येष्ठा, शततारका को छोड़कर सभी अन्य नक्षत्र सबके लिए अच्छे हैं।
पुनश्च: : पूर्वाषाढ, अश्विनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, ज्येष्ठा, पूर्वाफाल्गुनी, मृगशिरा, पुष्य, रेवती और तीनों उत्तरा नक्षत्र द्वितीया, तृतीया, पंचमी, दसमी, एकादसी, तथा द्वादसी तिथियां, रवि, शुक्र, गुरु और सोमवार दिन, शुक्ल पक्ष, सिंह, धनु, वृष, कन्या और मिथुन राशियां उत्तरायण में सूर्य के समय में उपनयन यानी यज्ञोपवीत यानी जनेऊ संस्कार शुभ होता है।
जनेऊ धारण के नियम
मल-मूत्र विसर्जन के दौरान जनेऊ को दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका मूल भाव यह है कि जनेऊ कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। यह बेहद जरूरी होता है।
अगर जनेऊ का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।
घर में जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी जनेऊ संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।
जनेऊ शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।
बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत संस्कार करना चाहिए।
जनेऊ का वैज्ञानिक महत्व
1. बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से ऐसे स्वप्न नहीं आते।
जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।
जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति सफाई नियमों में बंधा होता है। वयह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है।
4. जनेऊ को दायें कान पर धारण करने से कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है।
दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।
कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।
कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।
जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह रेखा नियंत्रित रहती है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।🌹🌹🌹 जय श्री राम🌹🌹🌹

                   🙏 हे महादेव ॥🙏

प्रेत-पितृ-तंत्रबाधा से मुक्ति

🌹प्रेत-पितृ-तंत्रबाधा से मुक्ति🌹
============================

   कुटुंब कलेश , आर्थिक तंगी , अविवाहित या दुखी दाम्पत्य जीवन , निःसंतान या बेरोजगार , भूत प्रेत की सवारी आना या किसीने ईर्ष्या भाव या वैरभाव से करवाई तांत्रिक क्रिया .. इन सब कारणों से अनेक परिवार पायमाल हो रहे है । अपनी समस्याओ से मुक्ति केलिए अनेक प्रकार के विधान पूजा करवाते है । पर कोई उपाय नही सूझते , कोई परिणाम नही पाते ओर सब व्यर्थ हो जाता है । 

   किसीने पूछा था कि हमारे पितृ जो हमारे पूर्वज है वो क्यों नुकसान करेंगे ? पहले ये प्रेत ओर पितृ का फर्क समझना होगा। पहले के लोग आसुरी वृतियो से दूर रहकर घर , परिवार , कुटुंब , गांव का भला हो ऐसे सद्भाव विचार वाले थे । उनके जीव की किसी कारणवश गति नही हुई तो वो पितृलोक को प्राप्त होते थे । पितृ बनने के बाद भी वो हमेशा घर परिवार गांव का भला ही करते थे। केयुकी जो वृति जीवंत शरीर के साथ थी बादमे भी वही रहती है। और जो काम क्रोध , कपट , प्रपंच , ईर्ष्या , अहंकार जैसी आसुरी वृति के साथ मृत्यु को प्राप्त करते है हो वो प्रेतयोनि को प्राप्त होते है। अब सोचिए कि आजकल ज्यादातर लोग किस वृति के है ? वो मृत्यु के बाद किस योनि को प्राप्त करेंगे ? वो आप केलिए पितृ है पर मूल रूप तो प्रेत ही है । 

" जो दया करे वो देव और दमन करे वो प्रेत " 

  10 साल से बड़ी हरेक कन्या ओर स्त्रियां मस्तिष्क को ढंक के रखते थे । मासिकधर्म के समय और अमावस्या या ग्रहण जैसे कालमे ओर सूर्यास्त के बाद घर से बाहर नही जाते थे । आजके आधुनिक युग्म खुल्ले बाल , पहेरवेश ओर लावण्य दिखाते हुवे सब बाहर घूमते है । तो लोग बुरी दृष्टि से देखते है और मौका मिले तो पकड़के बलात्कार करते है ऐसे किस्से आएदिन सुनते है । ऐसी स्थितिमे आसुरी वृति की प्रेत शक्तियां भी साथमे हो जाती है और उनके साथ ही घरमे प्रवेश कर लेती है । 

  पहले के समयमे ऋषिमुनियों ने गोत्र मुजब आपके देहमे जो स्थित है वो ऊर्जा शक्तिओ को ही कुलदेवी , इष्टदेव,गोत्रीज देव स्वरूप स्थापित करवाया था और सतयुग से आजतक उनकी उपासना होती थी और उनका रक्षा कवच था तो परिवार की हर आसुरी शक्तिओ से रक्षा होती थी । कलियुग व्याप्त होते ही अनेक तर्कटि सम्प्रदाय आये । लोगो पर हावी रहने केलिए भव्य मंदिरों , भ्रमजाल की ऐसी भाषा की बुद्धिजीवी लोग भी भ्रमित होकर अपनी मूल परंपराओं का त्याग करके ऐसे जुठे सम्प्रदाय ओर उनके धर्माचार्यो के दीवाने बन गए । रक्षा कवच हट गया और आसुरी शक्तिओ को घरमे प्रवेश मिल गया। जिस सम्प्रदाय ओर उनके महापुरुषों को भगवान का दरज्जा दे रहे हो कभी कोई भूत , प्रेत बाधा का कार्य करने कहिए ओर देखिए वो कितने बड़े महापुरुष है । 

   ऐसा लिखना तो अच्छा नही लगता पर कही लोगो को देखकर जो अनुभूत हुवा की अनेक परिवार मूल ऋषि गोत्र से नही है पर ऐसी आसुरी शक्तिओ से चले वंश है । अब इनकेलिये कौन कुलदेवी ओर कौन इष्टदेव कैसे तय करे और उनको क्या मार्ग दिखाए ? 

   ऐसे तो आसुरी शक्तिओ ओर तंत्रबाधा से मुक्ति केलिए उग्र देवी देवताओं की उपासना के अनेक विधान है । दुर्गा माता , कालीमाता , हनुमानजी , भैरव विगेरे उपासना है । पर समस्या से ग्रस्त व्यक्ति या परिवार विधान करवाते करवाते थक चुके होते है और अब किसी विधानमे उनको पूर्ण विस्वास नही होता । और ये तो सहज ही है कि भाव के बिगैर किया कोई विधान , मंत्र , यज्ञ , पूजा कभी फलदायी नही होता। पर फिर भी ऐसे निराश लोग मुक्ति पा सके और स्वयं ही बिना खर्च कर सके ऐसा कुछ सरल विधान दिखाते है । सम्भव है अगर भाव हुवा तो अवश्य ही फलदायी होगा।

    ऊपर बताई कोई भी समस्या से पीड़ित परिवार अति शीघ्र ही रुद्राक्ष धारण करे। घरके हरेक परिवार जन को रुद्राक्ष धारण करवा दीजिए । आसुरी शक्तियां भागने लगेगी । हो सके तो नित्य या संभव न हो तो सप्ताहमे एकबार शिवलिंग की दक्षिण दिशा पर बैठकर शिवलिंग पर जल अभिषेक कीजिये और मिल सके तो बिल्वपत्र शिवलिंग पर धाराएं । शिवलिंग के सन्मुख बैठकर शिव गायत्री मंत्र के 11 जाप कीजिये । 

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहितन्नो रुद्रः प्रचोदयात्!

महादेव का गायत्री मंत्र है सर्वशक्तिशाली माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जो व्यक्ति इसका नियमित रूप से जाप करता है उसे हर सुख की प्राप्ति होती है उसके जावन में शांति बनी रहती है।

 शिवजी को वंदन करके अपनी समस्या से मुक्ति की प्रार्थना करे। 

  शिवलिंग पर धाराएं बिल्वपत्र में से एक बिल्वपत्र घर लेकर जलपत्रमे डाल दीजिए ताकि घरके हरेक सदस्य को शिवजी का चरणामृत मिले।
घरमे नित्य कुलदेवी के नाम दीप जलाए। 

  हरदिन सूर्यास्त के बाद आप जब भी घर आने का जो समय हो तब घर पहुचकर हनुमानजी के नाम एक तेल का दिया लगाइए। आसन पर बैठकर हनुमान चालीसा का एक पाठ कीजिये । पाठ करने के बाद 20 मिनिट तक आंखे बंद करे और रदयमे हनुमानजी बैठे है ऐसा ध्यान करिए ।ध्यान कीजिये कि हनुमानजी सीताराम सीताराम नाम का जाप कर रहे है और आप भी हनुमानजी के साथ साथ सीताराम सीताराम नाम का जाप कीजिये। सतत 20 मिनिट तक हनुमानजी का ध्यान और उनके साथ साथ सीताराम नाम जाप। 

   जाप के बाद हनुमानजी के समक्ष अपनी समस्या और उनसे कैसे मुक्ति मिल सके ये प्रार्थना कीजिये । थोड़े ही दिनमे हनुमानजी आप केलिए जो श्रेष्ठ होगा ऐसा संजोग पैदा करेंगे । जो आप केलिए कल्याणकारी होगा आपको वो मिलने लगेगा । 

   ये विधान ऐसे सरल लगेगा पर ये शीघ्र फलदायी होते हमने कही बार देखा है । पूर्ण श्रद्धा से कीजिये

  महादेव आप सभी धर्मप्रेमी जनो पर कृपा करें यही प्रार्थना सह .. श्री मात्रेय नमः

सभी देवी-देवताओं के गायत्री मंत्र।

सभी देवी-देवताओं के गायत्री मंत्र। 

ॐ भूर्भुव स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
शिव गायत्री,,ॐ महादेवाय विद्महे, रुद्रमुर्तय धीमहि तन्नो शिव: प्रचोदयात
रूद्र गायत्री मन्त्र ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि, तन्नो रूद्र: प्रचोदयात!
ॐ पञ्चवक्त्राय विद्महे, सहस्राक्षाय महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात्
दत्तात्रय गायत्री,,,दत्तात्रेय हरे कृष्ण उन्मत्तानन्ददायक दिगंबर मुने बाल पिशाच ज्ञानसागर ॐ गुरु दत्त नमो नम:
ॐ दत्‍तात्रेयाय विद्महे अवधूताय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌
ॐ दत्‍तात्रेयाय विद्महे योगीश्वराय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌
ॐ दिगम्बराय विद्महे योगीश्वराय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌
ॐ दत्‍तात्रेयाय विद्महे दिगम्बराय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌
ॐ दत्‍तात्रेयाय विद्महे अत्रीपुत्राय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌
गणेश गायत्री...ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्र तुन्डाय धीमहि, तन्नो दन्ति प्रचोदयात!
षन्मुख गायत्री,,ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महासेनाय धीमहि, तन्नो षन्मुख: प्रचोदयात!
नन्दी गायत्री,,ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्र तुन्डाय धीमहि, तन्नो नन्दी: प्रचोदयात!

सूर्य गायत्री,,ॐ अदित्याय विद्महे भास्कराए धीमहि तन्नो भानु: प्रचोदयात

ॐ आदित्याय च विद्महे प्रभाकराय धीमहि, तन्नो सूर्य: प्रचोदयात

ॐ आदित्याय विद्महॆ दिवाकराय धीमही तन्नॊ सूर्यः प्रचॊदयात्

ॐ भास्कराय विद्महे महातेजाय धीमहि !तन्नो सूर्य: प्रचोदयात !

ॐ अश्वध्वजाय विद्महे पासहस्थाया धीमहि तन्नो सूर्य: प्रचोदयात !

चन्द्र गायत्री,,ॐ अमृतंग अन्गाये विद्ममहे कलारुपाय धीमहि,तन्नो सोम प्रचोदयात

ॐ अत्रि पुत्राय विद्महे सागरोद्भवाय धीमहि तन्नो चन्द्रः प्रचोदयात्

ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृत तत्वाय धीमहि, तन्नो चन्द्र: प्रचोदयात!

मंगल (भौम) गायत्री,,,ॐ अंगारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि, तन्नो भौम: प्रचोदयात

ॐ क्षिति पुत्राय विद्महे लोहितान्गाय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात्

बुध गायत्री,,ॐ सौम्यरुपाय विद्महे वानेशाय च धीमहि, तन्नो सौम्य प्रचोदयात

ॐ चन्द्र पुत्राय विद्महे रोहिनि प्रियाय धीमहि तन्नो बुधः प्रचोदयात्

गुरु गायत्र,,ॐ अन्गिर्साय विद्महे दिव्यदेहाय धीमहि, तन्नो जीव: प्रचोदयात

ॐ अंगिरोजाताय विद्महे वाचस्पतये धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात्

ॐ गुरु देवाय विद्महे परब्रह्माय धीमहि, तन्नो गुरु: प्रचोदयात!

शुक्र गायत्री,,ॐ भृगुजाय विद्महे दिव्यदेहाय, धीमहि तन्नो शुक्र: प्रचोदयात

ॐ भृगुपुत्राय विद्महे श्वेतवाहनाय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात्

शनि गायत्री,,ॐ भग्भवाय विद्महे मृत्युरुपाय धीमहि, तन्नो सौरी:प्रचोदयात

ॐ कृष्णांगाय विद्महॆ रविपुत्राय धीमही तन्नॊ सौरिः प्रचॊदयात्

राहू गायत्र,,,ॐ शिरोरुपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि, तन्नो राहू:प्रचोदयात

ॐ नील वर्णाय विद्महे सौंहिकेयाय धीमहि तन्नॊ राहुः प्रचोदयात्

केतु गायत्री,,,ॐ पद्मपुत्राय विद्महे अम्रितेसाय धीमहि तन्नो केतु: प्रचोदयात

ॐ धूम्र वर्णाय विद्महे कपोत वाहनाय धीमहि, तन्नो केतुः प्रचोदयात्

ब्रम्हा गायत्र,,,ॐ वेदात्मने च विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि, तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात!

नारायण गायत्री,,,ॐ नारायाणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।

विष्णु गायत्री ,,ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णु: प्रचोदयात !

ॐ नारायण: विद्महे वासुदेवाय धीमहि, तन्नो नारायण: प्रचोदयात !

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो नारायण प्रचोदयात् ।

श्री निवास गायत्री,,ॐ निरन्जनाय विद्महे निरापासाय धीमहि तन्नो श्रीनिवास प्रचोदयात् ।

कृष्ण गायत्री,,,ॐ देवकिनन्दनाय विद्ममहे, वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्ण:प्रचोदयात

ॐ दामोदराय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नः कृष्णः प्रचोदयात्। गोपाल गायत्री

ॐ गोपालाय विद्महे गोपीजन वल्लभाय धीमहि, तन्नो गोपाल: प्रचोदयात

परशुराम गायत्री,,,ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नो परशुराम प्रचोदयात नृसिंह गायत्री

ॐ उग्रनृसिंहाय (नरसिंहाय) विद्महे वज्रनखाय धीमहि, तन्नो नृसिंह: (नरसिंह) प्रचोदयात

ॐ वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि। तन्नो नृसिंहः (नरसिंह) प्रचोदयात

ॐ नरहसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात

ॐ नरहसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि। तन्नो सिंह प्रचोदयात हयग्रीव गायत्री

ॐ वाणीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हयग्रीव :प्रचोदयात

राम गायत्री,,,ॐ दाशरथये विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि, तन्नो राम: प्रचोदयात!

त्रैलोक्य गायत्रीॐ त्रैलोक्य मोहनाय विद्महे आत्मारामाय धीमहि, तन्नो विष्णु: प्रचोदयात!

हंसा गायत्री,,,ॐ परम्ह्न्साय विद्महे महा हंसाय धीमहि तन्नो हंस: प्रचोदयात

ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि। तन्नो हंसः प्रचोदयात्।

सुदर्शन गायत्री,,ॐ सुदर्शनाय विद्महे हेतिराजाय धीमहि। तन्नश्चक्रः प्रचोदयात्।

वराह गायत्री,,ॐ धनुर्धराय विद्महे वक्रदंष्ट्राय धीमहि तन्नो वराह प्रचोदयात्।

ॐ भू: रक्षकाय विद्महे श्रीकराय धीमहि तन्नो वराह प्रचोदयात्

ॐ भू-वराहाय विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो क्रोध प्रचोदयात्

मत्स्य गायत्री,,ॐ तत्पुरुशाय विद्महे माहा-मीनाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात ।

वेङ्कटेश गायत्री,,ॐ श्री निलायाय विद्महे वेङ्कटेशाय धीमहि तन्नो हारि: प्रचोदयात् ।

राजागोपाल गायत्री...ॐ तत्पुरुशाय विद्महे सन्तान पुत्राय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात् ।

कूर्म गायत्री,,ॐ कच्छपेसाय विद्महे माहाबलाय धीमहि तन्नो कूर्म प्रचोदयात् ।

वामन गायत्री,,ॐ तप रूपाय विद्महे श्रृष्टिकर्ताय धीमहि तन्नो वामन प्रचोदयात् ।

बलराम गायत्री..ॐ अश्त्रहस्ताय विद्महे पीताम्वराय धीमहि तन्नो बलराम प्रचोदयात् ।

कल्कि गायत्री,,ॐ भूमि नेत्राय विद्महे माहापुरुशाय धीमहि तन्नो कल्कि प्रचोदयात् ।

लक्ष्मी गायत्री,,ॐ महालाक्ष्मये विधमहे, विष्णु प्रियाय धीमहि तन्नो लक्ष्मी:प्रचोदयात

ॐ नमो भाग्य लक्ष्मी च विदमहे, अस्ट लक्ष्मी च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात

राधा गायत्री,,,ॐ वृषभानु: जायै विद्महे, कृष्णप्रियाय धीमहि तन्नो राधा :प्रचोदयात

ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि, तन्नो राधिका प्रचोदयात!

तुलसी गायत्री,,,ॐ श्री तुलस्यये विद्महे, विष्णुप्रियाय धीमहि तन्नो वृंदा:प्रचोदयात

ॐ त्रिपुराय विद्महे तुलसीपत्राय धीमहि, तन्नो तुलसी प्रचोदयात!

लक्ष्मी गायत्री,,ॐ महादेव्यै च विद्महे विष्णु पत्न्ये [यै] च धीमहि, तन्नो लक्ष्मी: प्रचोदयात! जानकी गायत्री

ॐ जनकजायै विद्महे राम प्रियायै धीमहि, तन्नो सीता प्रचोदयात!

सीता गायत्री,,ॐ जनक नंदिन्ये विद्महे भुमिजाय धीमहि तन्नो सीता :प्रचोदयात

लक्ष्मण गायत्री,,ॐ दासरथये विद्महे अलाबेलाय धीमहि, तन्नो लक्ष्मण प्रचोदयात!

हनुमान गायत्री,,ॐ अन्जनीजाय विद्महे वायु पुत्राय धीमहि, तन्नो हनुमान प्रचोदयात!

गरुड़ गायत्री,,ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्ण वरणाय धीमहि, तन्नो गरुड़: प्रचोदयात!

सरस्वती गायत्री,,ॐ वाग देव्यै विद्महे काम राज्या धीमहि तन्नो सरस्वती: प्रचोदयात|

ॐ ऐं वाग्देव्यै च विद्महे कामराजाय धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

इन्द्र गायत्री,,ॐ सहस्त्र नेत्राए विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्नो इन्द्र:प्रचोदयात

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सहत्राक्षाय धीमहि, तन्नो इंद्र: प्रचोदयात

अग्नि गायत्री,,ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्नि मध्ये धीमहि, तन्नो अग्नि प्रचोदयात!

जल गायत्री,,ॐ जलबिंबाय विद्महे नील पुरुषाय धीमहि, तन्नो अम्बु: प्रकोदयात!

आकाश गायत्री,,ॐ आकाशाय च विद्महे नभो देवाय धीमहि, तन्नो गगनं प्रचोदयात!

वायु गायत्,,ॐ पवन पुरुषाय विद्महे सहस्त्र मूर्त्ये च धीमहि, तन्नो वायु: प्रचोदयात!

यम् गायत्री,,ॐ सुर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नो यम् :प्रचोदयात

वरुण गायत्री,,ॐ जल बिम्बाय विद्महे नील पुरु शाय धीमहि तन्नो वरुण :प्रचोदयात

काम गायत्री,,ॐ मन्मथेशाय विद्महे काम देवाय धीमहि, तन्नो अनंग प्रचोदयात!

पृथ्वी गायत्री,,ॐ पृथ्वीदेव्यै विद्महे सहस्र मूरतयै धीमहि तन्नो पृथ्वी :प्रचोदयात

ॐ पृथ्वी देव्यै च विद्महे सहस्र मूर्त्ये च धीमहि, तन्नो मही प्रचोदयात

ॐम् तत् पुरुशाय विद्महए आम्रिथ कलस हस्ताय धेएमहि टन्नो ढन्वन्त्रि प्रसोदयात्

ॐम् आदिव्ऐध्याय विद्महए आरोग्य अनुग्रहाय धेएमहि टन्नो धन्वन्त्रि प्रसोदयात्

धन्वंतरी गायत्री मंत्र ॐ वासुदेवाय विघ्माहे वैधयाराजाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात्. ll

धन्वंतरी गायत्री मंत्र ॐ तत्पुरुषाय विद्‍महे अमृता कलसा हस्थाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात्.

1 ॐ गिरिजाये विद्महे शिवप्रियाय धीमहि तन्नो दुर्गा :प्रचोदयात

त्वरिता गायत्री मन्त्र या श्री: स्वयम स्वकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी:

पापात्मनां कृतधियां हृद्येशु बुद्धि: |

श्रृद्धा शतां कुलजन प्रभवस्य लज्जा,

ता त्वां नतास्म परिपालय देवि विश्वं ||

2 ॐ त्वरिता देव्यै च विद्महे महानित्यायै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

महिष मर्द्दिनी गायत्र मन्त्र 3 
ॐ महिषमर्द्दियै च दुर्गायै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

मातंगी गायत्री मन्त्र 4 
ॐ मातं गये मतंग्ये [यै] च उच्छिष्ट चाण्डाल्यै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

बागला मुखी गायत्री मन्त्र 5 
ॐ बागला मुख्यं च विद्महे स्तंभिन्यै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

धूमावती गायत्री मन्त्र 6 
ॐ धूमावत्यै च विद्महे संहारिन्यै च धीमहि, तन्नो धूमा प्रचोदयात !

छिन्नमस्ता गायत्री मन्त्र 7 
ॐ वैरोचन्यै च विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

भैरवी गायत्री मन्त्र 8 
ॐ त्रिपुरायै च विद्महे भैरव्यै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

भुवनेश्वरी गायत्री मन्त्र 9 
ॐ नारायन्यै च विद्महे भुवनेश्वर्यै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

त्रिपुर सुंदरी गायत्री मन्त्र 10
 ॐ त्रिपुरा दैव्यै विद्महे क्लीं कामेश्वर्यै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

तारा गायत्री मन्त्र 11 
ॐ तारायै च विद्महे महोग्रायै च धीमहि, सौस्तन्न: क्लिन्नै प्रचोदयात!

काली गायत्री मन्त्र 12 
ॐ कालिकायै च विद्महे श्मशान वासिन्यै धीमहि, तन्नो अगोरा प्रचोदयात!

अन्नपूर्णा गायत्र मन्त्र 13 
ॐ भगवत्यै च विद्महे माहेश्वर्यै च धीमहि, तन्नो अन्नपूर्णा प्रचोदयात!
गौरी गायत्री मन्त्र 14 
ॐ सुभगार्यै च विद्महे काम मालायै धीमहि, तन्नो गौरी प्रचोदयात!
देवी गायत्री मन्त्र 15 
ॐ देव्यै विद्महे महाशक्त्यै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात!

शक्ति गायत्री मन्त्र 16 
ॐ सर्व सम्मोहिन्यै विद्महे विश्वनन्यै धीमहि, शक्ति प्रचोदयात

शरभ तंत्र रहस्य

🌹शरभ तंत्रम रहस्य🌹
--------------------- 

भगवान श्री शरभेश्वर यह भगवान शिव का एक अत्यंत उग्र प्रचंड एवं गुप्त रुप है .. तंत्र क्षेत्र मे ये अत्यंत उच्च कोटी की देवता के रुप मे पूजे जाते है .. शत्रू बाधा निवारण हेतु , ग्रह बाधा निवारण हेतु , रोग बाधा एवं अकालमृत्यु निवारण हेतु , प्रेतबाधा तंत्र बाधा निवारण हेतु यह अत्यंत सटिक , अत्यंत उच्च कोटी की साधना मानी जाती है .. यह शिव का अत्यंत गुप्त रूप होने से बहुत कम लोग इनके बारे मे जानते है .. इनके मंदिर एवं विग्रह बहुत कम देखने को मिलते है .. आध्यात्मिक साधना क्षेत्र मे यह उच्च श्रेणी की साधना मानी जाती है .. दस महाविद्या साधना मे इनकी साधना का अपना एक महत्त्व है .. 
इनकी उत्पत्ती के बारे मे पुराणों मे बताया है की नृसिंह अवतार के समय जब भगवान नृसिंह ने हिरण्यकश्यपू का वध किया तो भगवान नृसिंह की उग्रता प्रचंड होने से वे शांत नही हो पा रहे थे तब देवताओं के प्रार्थना पर भगवान महादेव ने एक विचित्र पक्षी का रुप धारण किया जिसका मुंह उल्लु की तरह , नेत्र मे अग्नि सूर्य चंद्र और धड मनुष्य की तरह और चार हाथ जिसमे विशेष आयुध धारण किये हुये थे .. उनके नख वज्र के समान तीक्ष्ण , दो पंख जिनमे काली एवं दुर्गा का वास है तथा हृदय मे जठरानल और पेट मे वडवानल अग्नि विराजमान है .. कटिप्रदेश से बाद का अंग हिरण की तरह एवं पूंछ सिंह के समान लंबी है .. उरु प्रदेश मे उन्होंने व्याधि एवं मृत्यु को धारण किया है .. उन्हे शरभ , पक्षीराज , आकाशभैरव , शालुव आदि नामों से जाना जाता है .. 
ऐसे शरभ पक्षिराज रुपी शिव अवतार ने भगवान नृसिंह को चोंच मार उन्हे मूर्छित कर दिया .. अपनी पूंछ से उनके दोनो पैर बांध दिये और अपने दोनो पिछले पैर नृसिंह के पैरों पर रखे और अपने आगे के दो पैर भगवान नृसिंह के छाती पर रखे और अपने हाथों से नृसिंह के हाथो को पकडकर आकाश मे उडकर भगवान नृसिंह के उग्र स्वरुप से कई ज्यादा उग्र स्वरुप धारण किया जिससे भगवान नृसिंह शांत हुये और उन्होंने शरभरुपी शिव की प्रार्थना कर उनकी स्तुती की और अपने उग्र स्वरुप का विसर्जन किया तो शिवजी ने अपने शरभ स्वरुप मे भगवान नृसिंह के चर्म को प्रिय मानकर व्याघ्रांबर धारण किया .. 

भगवान श्री शरभेश्वर की साधना एक उच्च कोटी की है और साधारण साधक इस साधना को ना करे .. योग्य अधिकारी गुरु से शरभ दिक्षा और मंत्र प्राप्त कर उनके निर्देशन मे ही शरभ साधना करे .. बिना दिक्षा शरभ साधना करना घातक है क्योंकि इनकी साधना एक उग्र साधना है .. शत्रू बाधा निवारण हेतु शायद इससे बढकर साधना नही हो सकती .. शत्रू बाहर के और अपने काम क्रोध रुपी अपने अंदर के शत्रू भी .. अकालमृत्यु एवं रोग बाधा निवारण के लिये भी यह साधना काम करती है .. तंत्र प्रयोग का निवारण हेतु भी इनकी साधना सटिक फल देती है .. आत्मरक्षा हेतु इनकी साधना किसी भी बडे से बडे तंत्र प्रयोग या बाधा से आपका रक्षण करती है .. 

भगवान शरभेश्वर परम दयालु है .. वे अपने भक्तों को कष्ट देने वाले शत्रूओं का और अपनी भक्तों की समस्त बाधाओं का नाश करते है .. इनकी साधना मे "दारुण सप्तक " का पाठ एक अत्यंत सटिक फल प्रदान करनेवाली साधनाविधी है .. ऐसे अदभुत पराक्रमी श्री शरभेश्वर की उपासना बहुत विरले भक्त ही कर पाते है .. भगवान शरभ के उपासक पर बाकी देवता अपने आप कृपा करते है .. पुरे संसार मे गिने चुने साधक ही शरभ साधना कर पाते है यही एक गूढ रहस्य है .. दस महाविद्या साधना , शरभ साधना , प्रत्यंगिरा साधना , गुह्यकाली , कामकला काली , सिद्धिलक्ष्मी आदि सब साधनाएं वर्गीकृत है .. इनके आध्यात्मिक कोड खुलना सुलभ नही है .. इस लिये शायद गिने चुने लोग ही इस स्तर की साधना तक पहुंच पाते है .. 

शरभ का मंत्र बीज आकाश तत्त्व का है .. इनकी साधना से आकाशगमन प्राप्ती तथा कुंडलिनी जागरण सुलभ हो जाती है .. योग मार्ग मे इनकी साधना से गुप्त सिद्धिया प्राप्त होती है .. प्राचीन तंत्र ग्रंथ शरभ तंत्रम तथा आकाशभैरव तंत्र मे इनकी साधना का विस्तृत वर्णन है .. दतिया पीतांबरा पीठ के राष्ट्रगुरु महाराज जी ने शरभ साधना पर एक पुस्तक प्रकाशित की थी .. 

भारत वर्ष मे इनके साधक बहुत कम है और गुप्त रुप से साधनारत है .. अपने सदगुरु से प्राप्त विधी से ही इनकी साधना करे अपने मन से ना करे .. शारीरिक मानसिक शुद्धता रखे .. इस साधना की उच्च स्तर की श्रेणी को ध्यान रखकर ही इनकी साधना करे .. 

आध्यात्मिक साधना क्षेत्र मे इन्हे एक अत्यंत उच्च स्तर की साधना के रुप मे देखा जाता है .. दस महाविद्या की साधना मे शरभ साधना का अपना एक महत्त्व है .. अगर आपको आपके सदगुरु द्वारा शरभ मंत्र दिक्षा प्राप्त है तो निश्चित ही आप अत्यंत सौभाग्यशाली साधक है .. 

किसी भी अच्छे आध्यात्मिक गुरु से दिक्षित होकर उनके व्यक्तिगत मार्गदर्शन मे आध्यात्मिक क्षेत्र की दुर्लभ साधनाये संपन्न कर आध्यात्मिक उन्नती की ओर अग्रेसर होना और मनुष्य जन्म का यथार्थ रुप से कल्याण कर लेना हमारे ही हाथ मे है .. 

एक मनुष्य जन्म प्राप्त कर लेने के बाद व्यक्ती कुएं के मेंढक की तरह या तो साधारण स्तर का जीवन यापन कर अपने मानसिक स्तर पर अपने आप को गौरवान्वित महसुस कर सकता है या
 किसी योग्य आध्यात्मिक सदगुरु की शरण प्राप्त कर दस महाविद्या या शरभ प्रत्यंगिरा जैसी ब्रह्मांडीय साधना कर मनुष्य जन्म का यथार्थ रुप मे कल्याण कर सकता है ..

 मनुष्य के इतिहास मे प्राचीन आध्यात्मिक साधनाओं का अभ्यास बहुत कम देखा गया है शायद यह विराट आध्यात्मिक शक्तिया वर्गीकृत होने के कारण अपने साधक को चुनती है और उसे किसी ना किसी माध्यम से योग्य गुरु तक पहुंचा कर अपनी छाया मे लाकर उसे अपनी कृपा प्रदान करती है .. 

इस लिये आध्यात्मिक साधना क्षेत्र हमेशा से ही बहुत गूढ रहस्यपूर्ण रहा है .. 

आज शरभ साधना पर लिखते हुते यह एहसास होता कि वर्षों से आ रही साधना पद्धती के बावजूद कितने कम लोग भगवान शरभेश्वर से परिचित है ..

कितने लोग दस महाविद्याओं का नाम जानते है .. 

और भी ऐसी बहुत सारी आध्यात्मिक शक्तिया है जैसे प्रत्यंगिरा , गुह्यकाली ,कामकलाकाली , सिद्धीलक्ष्मी आदि जिन्होने अपना स्वरुप गूढ रहस्यपूर्ण ही रखा है और सामान्य लोग इनसे परिचित नही हो पाये ..  
और ऐसा क्यों इसका जवाब पता नही .. 

भारत वर्ष मे हिंदु परिवार मे जन्म लेकर भी अपनी आध्यात्मिक विरासत हम लोग पहचान नही पाते शायद यही भगवती की माया हो सकती है .. 
आज भगवान शरभेश्वर से यही प्रार्थना है की हमारी प्राचीन सभ्यता , हमारी प्राचीन संस्कृती एवं हमारे देवी देवता का मजाक उडाकर इस सभ्य संस्कृती से साथ खिलवाड करने वाले शत्रू तत्त्व को भगवान शरभ इस ऋषीमुनीयों की भारत वर्ष की पवित्र भूमी से जड से उखाडकर फेक दे .. 
जिस दिन हम सारे लोग वास्तविक साधक बनकर बगलामुखी साधना , शरभ साधना , प्रत्यंगिरा साधना , छिन्नमस्तिका साधना , धूमावती साधना करने लगेंगे तो किस शत्रू की मजाल है जो हमारी संस्कृती पर तिरछी नजर डालने की हिम्मत कर सके .. 

 उचित आध्यात्मिक साधनाये करते रहो .. 
सब उर्जा का खेल है . साधनाओं के माध्यम से आध्यात्मिक उर्जा का निर्माण होना चाहिये . यही उर्जा हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं का निराकरण कर सकती है . सिर्फ खयाली पुलाव से या बडी बडी बाते करने से कुछ नही होगा .
कितने लोग रोज कुछ अच्छी आध्यात्मिक साधना करते है ? हमे हमारे पूर्वज ऋषी मुनियों की आध्यात्मिक विरासत को पहचानना चाहिये . 

 आज इस दिवस पर भगवान शरशेश्वर एवं भगवती प्रत्यंगिरा देवी के चरणों मे यही निवेदन है कि वे हम सब पर अपनी कृपादृष्टी बनाये रखे .. यही उनसे हाथ जोडकर प्रार्थना है .. ॐ शम ..

शरभ माला मंत्र

🌹शरभ माला मंत्र🌹

ॐ नमो भगवते आकाशभैरवाय निखिललोकप्रियाय प्रणत जन परिताप विमोचनाय , सकल भूत निवारणाय सर्वाभीष्टप्रदाय नित्याय सच्चिदानंदविग्रहाय , सहस्रबाहवे सहस्रमुखाय सहस्रत्रिलोचनाय सहस्रचरणाय करालाय अखिलरिपुसंहारकारणाय , अनेककोटिब्रह्मकपाल माला अलंकृताय नररुधिरमांस भक्षणाय महाबलपराक्रमाय महदंतराय , विषमोचनाय परमंत्र यंत्र तंत्र विद्या विच्छेदनाय प्रसन्नवदनांबुजाय एहि एहि आगच्छागच्छ , ममाभीष्टमाकर्षयाकर्षय आवेशयावेशय मोहय मोहय भ्रामय भ्रामय द्रावय द्रावय तापय तापय सिद्धय सिद्धय बंधय बंधय भाषय भाषय क्षोभय क्षोभय भूतप्रेतादि पिशाचान्मर्दय भूतपिशाचान्मर्दय कुर्दय कुर्दय पाटय पाटय मोटय मोटय गुंफय गुंफय कंपय कंपय ताडय ताडय त्रोटय त्रोटय भेदय भेदय छेदय छेदय चंडवातातिवेगाय संतत गंभीर विजृंभणाय , संकर्षय संकर्षय संक्रामय संक्रामय प्रवेशय प्रवेशय स्तोभय स्तोभय स्तंभय स्तंभय तोदय तोदय खेदय खेदय तर्जय तर्जय गर्जय गर्जय नादय नादय रोदय रोदय घातय घातय वेतय वेतय सकल रिपु जनान छिंधि सकल रिपु जनान छिंधि भिंदय भिंदय अंधय अंधय रुंधय रुंधय नर्दय नर्दय बंधय बंधय श्रीं ह्रीं क्लीं कल्याणकारणाय श्मशानानंद महाभोगप्रियाय देवदत्तं आनय आनय दूनय दूनय केलय केलय मेलय मेलय प्रपन्न वत्सलाय प्रतिवदन दहनामृत किरण नयनाय सहस्रकोटि वेताल परिवृत्ताय मम रिपुन उच्चाटय उच्चाटय नेपय नेपय , तापय तापय सेचय सेचय मोचय मोचय लोटय लोटय स्फोटय स्फोटय ग्रहण ग्रहण अनंत वासुकि तक्षक कर्कोटक पद्म महापद्म शंख गुलिक महानागभूषणाय , स्थावर जंगमानां विषं नाशय नाशय प्राशय प्राशय भस्मी कुरु भस्मी कुरु भक्तजनवल्लभाय सर्गस्थितिसंहारकारणाय कथय कथय सर्व शत्रून उद्रेकय उद्रेकय विद्वेषय विद्वेषय उत्सादय उत्सादय उत्पाटय उत्पाटय बाधय बाधय साधय साधय दह दह पच पच शोषय शोषय पेषय पेषय दूरय दूरय मारय मारय भक्षय भक्षय शिक्षय शिक्षय समस्त भूतं शिक्षय शिक्षय श्रीं ह्रीं क्लीं क्ष्म्रयैं अनवरत तांडवाय आपदुद्धारणाय साधुजनान तोषय तोषय भूषय भूषय पालय पालय शीलय शीलय काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य शमय शमय दमय दमय त्रासय त्रासय शासय शासय क्षिति जल दहन मारुत गगन तरणि सोमात्मशरीराय शम दमोपरति तितिक्षा समाधानं श्रद्धां दापय दापय प्रापय प्रापय विघ्नं विच्छेदनं कुरु कुरु रक्ष रक्ष क्ष्म्रयैं क्लीं ह्रीं श्रीं ब्रह्मणे स्वाहा !!

Wednesday, 29 April 2026

प्राचीन अस्त्र-शस्त्र भी दिव्य रूप धारण करते थे।

क्या प्राचीन अस्त्र-शस्त्र भी दिव्य रूप धारण करते थे ? ..... 

अस्त्र शस्त्र की शिक्षा के ये महर्षि विश्वामित्र के पास गए राम और लक्ष्मण ने विश्वामित्र जी से पूछा तो उन्होंने बताया कि किसी समय में यहाँ मलद और करुष नाम की अत्यंत समृद्ध नगरियाँ हुआ करती थीं लेकिन ताड़का नाम की यक्षिणी ने सब बर्बाद कर दिया, वो अभी भी पूरे क्षेत्र को उजाड़ रही है। फिर विश्वामित्र जी ने उन दोनों किशोरवय राजकुमारों से कहा की क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए तुम उसका वध करो।

विश्वामित्र जी से ऐसी आज्ञा पाकर, राम और लक्ष्मण ने जो विद्याएँ सीखी थीं (जैसे बला और अतिबला) तथा जो अस्त्र उनके पास थे उसका प्रयोग करके उन्होंने ताड़का जैसी हज़ारों हांथियों के बल वाली यक्षिणी का वध किया।

विश्वामित्र जी उन दोनों राजकुमारों की विनम्रता, वीरता और युद्ध कौशल से प्रसन्न हुए और संतुष्ट होकर बोले – “हे महायशस्वी राजकुमारों मै तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ और तुमको प्रसन्नता पूर्वक सारे अस्त्र-शस्त्र देता हूँ। इन अस्त्रों से तुम सुर, असुर, गन्धर्व और नाग आदि अपने शत्रुओं को अपने वश में कर, जीत लोगे।

फिर सबसे पहले उन्होंने उनको महादिव्य दंड-चक्र दिया फिर धर्म-चक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र और फिर ऐन्द्रास्त्र। उनके द्वारा दिए गये अस्त्रों की सूची इस प्रकार है -:
1. वज्रास्त्र
2. महादेवास्त्र
3. ब्रह्मशिर
4. एषीक
5. मोदकी और शिखरी नाम की दो गदाएँ
6. धर्मपाश
7. कालपाश
8. वरुणपाश
9. शुष्क और अशनी नाम के दो वज्र (ये गदा या उसके जैसे किसी शस्त्र से भिन्न होता है)
10. पैनाकास्त्र
11. नारायणास्त्र
12. शिखर नाम का आग्न्येयास्त्र
13. प्रथम नाम का वायव्यास्त्र
14. हयशिरास्त्र
15. क्रौन्चारास्त्र
16. कंकाल और कपाल नाम की दो भयंकर शक्तियां
17. विद्याधरास्त्र
18. नंदन नाम की तलवार
19. गान्धर्वास्त्र
20. मानवास्त्र
21. प्रस्वापन
22. सौर दर्पण (ये एक यंत्र था)
23. संतापन
24. विलापन
25. मदनास्त्र
26. मोहनास्त्र
27. पैशाचास्त्र
28. तामस (मायावी अस्त्र)
29. महाबली सौमन
30. संवर्त
31. दुर्धर्ष
32. मौशल
33. सत्यास्त्र
34. परम अस्त्र ‘मायाधर’
35. तेजप्रभ (इसमें शत्रु का तेज़ खींचा जाता है)
36. शिशिर नामक सोमास्त्र
37. त्वाष्टास्त्र
38. शीतेशु
39. मानव (इस नाम का अस्त्र)
40. ब्रह्मास्त्र

इन सब अस्त्र-शस्त्रों को देने के बाद उन्होंने इन दोनों राजकुमारों से कहा कि इन शक्तियों को सूक्ष्म रूप से अपने अन्दर धारण करो फिर पूर्व की ओर मुख करके उन सम्पूर्ण अस्त्रों के मन्त्र (अर्थात चलाने और रोकने की विधि) बताये, जिन सब अस्त्रों का प्राप्त होना देवताओं के लिए भी दुर्लभ था।

फिर जैसे ही विश्वामित्र जी उन सारे मंत्रास्त्रों का उच्चारण किये, वे सारी शक्तियां अपना साक्षात रूप धारण करके उन दोनों के सामने हांथ जोड़कर सामने आ खड़ी हुईं और कहने लगीं – हे राघव हम आपके कार्य के लिए तत्पर हैं आप जो कार्य हमसे लेना चाहेंगे हम वही करेंगे तब राम ने उनको अपने हांथ से छुआ और बोले “मै जब तुम्हारा स्मरण करूँ तुम आकर मेरा कार्य कर जाना” फिर दोनों भाइयों ने महातेजस्वी विश्वामित्र जी को प्रणाम किया और फिर तीनो आगे बढ़े।

रास्ते में राम प्रसन्न होकर विश्वामित्र जी से बोले कि “हे भगवन आपके अनुग्रह से वे सारे अस्त्र-शस्त्र जो सुर और असुरों के लिए भी दुष्प्राप्य हैं हमें मिल गए, और उनको चलाने की विधि भी मालूम पड़ गयी अब कृपया हमें आप इनके संहार (अर्थात अस्त्र चलाकर उसे वापस लेने की विधि) की विधि भी बता दीजिये।| फिर विश्वामित्र जी ने उनका संहार भी उन दोनों को बताया और फिर उन दोनों को कुछ और मंत्रास्त्रों को चलाना सिखाया।

उनके नाम इस प्रकार है -:

1. सत्यवत
2. सत्यकीर्ति
3. धृष्ट
4. रभस
5. प्रतिहारतर
6. परान्ग्मुख
7. अवान्ग्मुख
8. लक्ष्य
9. अलक्ष्य
10. दृढ़नाभ
11. सुनाभ
12. दशाक्ष
13. शतवक्र
14. दशशीर्ष
15. शतोदर
16. पद्मनाभ
17. महानाभ
18. दुन्द्नाभ
19. ज्योतिष
20. कृशन
21. नैराश्य
22. विमल
23. योगंधर
24. हरिद्र
25. दैत्य प्रमथन
26. शुचिर्बाहू
27. महाबाहु
28. निश्कुल
29. विरुचि
30. सार्चिमाली
31. धृतिमाली
32. वृत्तिमान
33. रुचिर
34. पित्र्य
35. सौमनस
36. विधूत
37. मकर
38. करवीरकर
39. कामरूप
40. कामरूचि
41. मोह
42. आवरण
43. जृम्भक
44. सर्वनाभ
45. वरुण

विश्वामित्र जी कहने लगे “हे राम और लक्ष्मण ये सब कृशाश्व के पुत्र बड़े तेजस्वी और कामरूपी हैं। इनको तुम ग्रहण करो क्योकि तुम इनको ग्रहण करने के योग्य हो, तुम्हारा कल्याण हो !” 

तब दिव्य रूप, देदीप्यमान, मूर्तिमान और सुखप्रद वे सारे अस्त्र दोनों भाइयों के सामने उपस्थित हुए। उनमे कोई तो दहकते हुए अंगारे के समान था और कोई धुंए के समान रंग वाला, धुएं के जैसा था। कोई सूर्य और चन्द्र के सामान थे और कोई हांथ जोड़े हुए थे।

वे राम से बड़ी विनम्रता से बोले “हे राघव हम उपस्थित हैं, क्या आज्ञा है ?” इस पर राम ने उनसे कहा कि मेरे मन में वास करो और कार्य पड़ने पर मेरी सहायता करना, इसके बाद तुम जहाँ चाहे जा सकते हो।

रामचंद्र से ऐसा सुनकर उन्होंने उनकी प्रदक्षिणा की और “बहुत अच्छा” कहकर वे जहाँ, जिस लोक से आये थे वहीँ चले गए। इस प्रकार से विश्वामित्र जी से इन अस्त्रों को पाकर राम और लक्ष्मण अत्यन्त प्रसन्न हुए।
ऋषि कण्डवाल

मंदिर सोता नहीं है। रुद्रेश्वर नाथ मोहनगंज

गाँव के लोग कहते थे, उस मंदिर के पट छह बजे बंद हो जाते हैं, पर मंदिर सोता नहीं है।

मोहनगंज से बीस किलोमीटर अंदर, सई नदी के किनारे, एक टूटा-फूटा शिव मंदिर है। नाम है **रुद्रेश्वर नाथ**। नक्शे पर नहीं, सरकारी बोर्ड पर नहीं। बचपन में दादी कहती थीं, "बेटा, उधर रात में मत जाना, वहाँ आधी रात को मंदिर जागता है।"

मैं पिछले महीने गाँव गया था, पिताजी की तेरहवीं के बाद घर समेटने। शहर की नौकरी, लखनऊ की भागदौड़, मुझे इन बातों पर हँसी आती थी। पर तेरहवीं वाले दिन पंडित जी ने थाली में दक्षिणा लेते हुए धीरे से कहा, "रुद्रेश्वर के दर्शन कर आओ, तुम्हारे बाबा हर अमावस वहाँ दिया जलाते थे।"

मैं शाम को गया। मंदिर छोटा, गर्भगृह में काले पत्थर का शिवलिंग, नंदी का टूटा हुआ कान। पुजारी कोई नहीं। एक बूढ़ा कहार, रामसुमेर, ताला लगाता था। उसने मुझे देखकर कहा, "दर्शन कर लो, पर रुकना मत। साढ़े बारह बजे यहाँ घंटी अपने आप बजती है।"

मैंने पूछा क्यों। उसने कंधे उचकाए, "जागता है।"

मैं रुक गया।

पहली रात

मैंने टॉर्च, पावरबैंक, और एक छोटा कैमरा लिया। रामसुमेर ने छह बजकर दस मिनट पर भारी ताला लगाया, मुझे बाहर से प्रणाम किया और चला गया। मैं पीपल के नीचे चबूतरे पर बैठ गया।

गाँव की रात जल्दी गहरी होती है। नौ बजे तक सियार बोलने लगे। दस बजे नदी की हवा में ठंडक आई। ग्यारह बजे तक मेरा फोन नेटवर्क छोड़ गया।

ठीक बारह बजकर सत्रह मिनट पर पहला घंटा बजा।

मंदिर बंद था, ताला बाहर से लगा था, अंदर कोई नहीं। फिर भी पीतल की भारी घंटी, जो गर्भगृह के दरवाजे पर लटकी थी, तीन बार बजी। टन... टन... टन...

मैं उठा। ताले को छुआ, ठंडा। दरवाजे की झिरी से देखा, अंदर घना अंधेरा।

फिर दिया जला।

एक नहीं, गर्भगृह के चारों कोनों में रखे मिट्टी के दिये अपने आप सुलग उठे। बिना तेल, बिना बाती छुए। उनकी लौ नीली नहीं थी, बिल्कुल केसरिया, जैसे अभी किसी ने घी डाला हो।

उस रोशनी में मैंने देखा, शिवलिंग पर बेलपत्र नहीं थे, पर जल की धारा बह रही थी। ऊपर कोई कलश नहीं, फिर भी धार लगातार गिर रही थी।

तभी पीछे से आवाज आई, "जगह छोड़ दो।"

मैं पलटा। नंदी की मूर्ति, जो दिन में टूटी हुई थी, अब सीधी बैठी थी। और उसके पास, धुंध में, दस बारह लोग खड़े थे। धोती-कुर्ता, पगड़ी, कुछ के हाथ में लाठी, दो के पास पुरानी बंदूकें। उनके कपड़े फटे, पैरों में कीचड़।

वो मुझे देख नहीं रहे थे। वो मंदिर की तरफ देख रहे थे। एक बूढ़ा, जिसकी दाढ़ी सफेद थी, हाथ जोड़कर बोल रहा था, "भोलेनाथ, आज आखिरी रात है। फिरंगी सुबह आ जाएँगे। हमें अपने चरणों में जगह देना।"

मुझे समझ आया, ये 1857 के बागी थे। सई का ये इलाका तब विद्रोहियों का रास्ता था।

वे सब गर्भगृह के सामने बैठ गए। बिना आवाज के उनके होंठ हिल रहे थे, पर मुझे साफ सुनाई दे रहा था, "नमः शिवाय... नमः शिवाय..."। जैसे ही जाप तेज हुआ, दिये और भड़क उठे।

तभी मंदिर का घंटा फिर बजा, इस बार लगातार। और दरवाजा, जिस पर ताला लगा था, अंदर से खुला।

मैं पीछे हट गया।

अंदर शिवलिंग नहीं था। वहाँ एक गहरा कुंड था, और उसमें पानी नहीं, राख थी। सैकड़ों लोगों की राख। और उस राख के ऊपर वही बूढ़ा बागी खड़ा था, अब जवान चेहरे के साथ, मुस्कुरा रहा था।

उसने मेरी तरफ देखा और कहा, "डर मत। हम मरे नहीं, हम रुके हैं।"

जागने का मतलब

सुबह जब रामसुमेर ताला खोलने आया, तो मैं चबूतरे पर सोया मिला। उसने मुझे हिलाया, "देख लिया?"

मैंने पूछा, "ये हर रात होता है?"

उसने ताला खोला। अंदर सब वैसा ही था, शिवलिंग, टूटा नंदी, बुझे दिये। सिर्फ फर्श पर ताज़ा बेलपत्र पड़े थे, जबकि रात को वहाँ कोई नहीं आया था।

रामसुमेर बोला, "1857 में अंग्रेजों ने इस गाँव को घेर लिया था। तीस बागी इस मंदिर में छिपे। पुजारी ने कहा, भाग जाओ। उन्होंने कहा, हम महादेव की शरण में हैं। सुबह जब फिरंगी आए, तो मंदिर खाली मिला। न लाशें, न खून। बस शिवलिंग पर राख की परत। गाँव वाले कहते हैं, महादेव ने उन्हें अपने अंदर समा लिया। तब से हर रात साढ़े बारह बजे, वो अपनी संध्या पूरी करने आते हैं। मंदिर उनके लिए जागता है।"

मैं हँसा नहीं। मेरे कैमरे में रात की वीडियो थी, पर उसमें सिर्फ अंधेरा और तीन बार घंटी की आवाज। कोई आदमी नहीं।

मैं दोपहर में फिर गया। गर्भगृह में बैठा। तभी पुजारी की पुरानी बही मिली। 1952 की एक एंट्री, मेरे बाबा के हाथ की लिखावट, "रुद्रेश्वर नाथ में अमावस को दिया जलाया, बागी बाबाओं के नाम का।"

मैं समझ गया, बाबा क्यों हर अमावस यहाँ आते थे।

उस रात मैं फिर रुका, पर इस बार डरने नहीं, देखने। ठीक बारह सत्रह पर घंटी बजी। दिये जले। वही लोग आए। मैंने हाथ जोड़े। बूढ़े बागी ने मुझे देखा, इस बार पहचाना। उसने इशारा किया, बैठो।

मैं उनके साथ बैठ गया। जाप सुना। न कोई डरावनी परछाई, न कोई चीख। सिर्फ एक थकी हुई शांति, जैसे बहुत लंबे सफर के बाद कोई घर लौटा हो।

जाप खत्म हुआ तो सब उठे। जाते जाते बूढ़े ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, ठंडा नहीं, गर्म। बोला, "कह देना, हम जागते हैं इसलिए गाँव सोता है।"

सुबह मैंने रामसुमेर से कहा, ताला मत लगाओ। उसने कहा, "ताला चोरों के लिए है, उनके लिए नहीं। वो तो वैसे भी अंदर हैं।"

अब मैं हर महीने अमावस को जाता हूँ। दिया जलाता हूँ। बारह सत्रह पर घंटी बजती है, मैं आँखें बंद कर लेता हूँ। मुझे पता है, आधी रात का जागता मंदिर भूतों का नहीं है।

वो उन लोगों का मंदिर है जिन्हें इतिहास ने भुला दिया, पर महादेव ने नहीं। वो जागते हैं ताकि हम याद रखें, कुछ दरवाजे ताले से बंद नहीं होते, कुछ पहरेदार मरने के बाद भी पहरा देते हैं।

और जब कभी तुम मोहनगंज की तरफ जाओ, सई के किनारे उस पीपल वाले मंदिर के पास रुकना। छह बजे पट बंद मिलेंगे। पर अगर तुम चुपचाप बैठो, तो साढ़े बारह बजे तुम्हें भी सुनाई देगा, वो घंटी जो किसी हाथ से नहीं बजती, वो जाप जो किसी गले से नहीं निकलता।

क्योंकि कुछ मंदिर सोते नहीं, वो सिर्फ आँखें मूँदते हैं, ताकि आधी रात को पूरी तरह जाग सकें।

#hindi #post #stories #storytelling #storyofmylife #viral #trendingpost #storyviral #viralchallenge #storytime #storyteller #viralphotochallenge

Rakesh Bharti 
https://www.facebook.com/share/p/1Ky3qUTjTh/

आज्ञा चक्र

प्रश्न: लेकिन आज्ञा चक्र पर तो ॐ जप बताया गया है। 'ह‌ं' कंठ (विशुद्धि) पर बताया है, 'शं' ब्रह्मरंध्र पर। क्रम से चलें तो – लं, वं, रं, यं, हं, ॐ, शं।
यह गूढ़ प्रश्न आज्ञाचक्र: मास्टर चाबी, ध्वनियाँ और अन्य आयाम वाली पोस्ट पर आया है।

उत्तर: नमस्ते मित्र,
बहुत सुंदर और गहन प्रश्न उठाया है आपने। आभार।
आपने पारंपरिक क्रम बताया – लं, वं, रं, यं, हं, ॐ, शं – और यह सही भी है। पर यहाँ एक बारीक लेकिन बहुत ज़रूरी अंतर समझना होगा, जो अक्सर कंफ्यूजन पैदा करता है। मैं आपके साथ इसे खोलकर रखता हूँ, उसी पोस्ट "आज्ञाचक्र: मास्टर चाबी, ध्वनियाँ और अन्य आयाम" के संदर्भ में।

1. बीज मंत्र और पंखुड़ी की ध्वनियाँ – दो अलग चीज़ें हैं
आपने जो क्रम लिखा – लं (मूलाधार), वं (स्वाधिष्ठान), रं (मणिपूर), यं (अनाहत), हं (विशुद्धि), ॐ (आज्ञा), शं (सहस्रार या बिंदु) – यह हर चक्र का बीज मंत्र है। हर चक्र का अपना एक तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, महत्) और उस तत्व की ध्वनि-ऊर्जा है। यह मंत्र जप के लिए हैं, तत्व शुद्धि और चक्र जागरण की विधियों में काम आते हैं। विशुद्धि का बीज “हं” है, आज्ञा का बीज प्रमुख रूप से “ॐ” है। यह बिल्कुल शास्त्रसम्मत है।

2. आज्ञाचक्र का कमल और उसकी दो पंखुड़ियाँ – हं और क्षं
अब आज्ञाचक्र का जो प्रतीक है – दो पंखुड़ियों वाला कमल – उन दो पंखुड़ियों पर जो अक्षर लिखे हैं, वे हैं “हं” और “क्षं”। शास्त्रों में इसे स्पष्ट कहा गया है – हं (हं) और क्षं (क्षं) ये दो वर्ण आज्ञा दल के हैं। यह पंखुड़ियों की ध्वनि ऊर्जा है, बीज मंत्र नहीं। इसे हम “पंखुड़ी-ध्वनि” या “प्राण-धारा की ध्वनि” कह सकते हैं।

मेरी पोस्ट में जो “हं और क्षं” आया है, वह ठीक इसी को इंगित कर रहा है। मैंने लिखा है – “दो मुख्य ध्वनियाँ सामने आती हैं – हं और क्षं। ये दोनों कोई मंत्र नहीं, बल्कि प्राण की ही दो अलग-अलग धाराएँ हैं।” जब आप अनुभव के गहरे स्तर पर जाओगे ऐसा पाओगे।
अर्थात यहाँ जप करने का मंत्र नहीं बताया गया, बल्कि जब साधक भीतर गहराता है तो प्राण की फ्रीक्वेंसी स्वतः इन दो मूल ध्वनि-पैटर्न के रूप में सुनाई देने लगती है। यह कोई मानसिक उच्चार नहीं, अनाहत नाद का स्तर है।

3. फिर विशुद्धि के “हं” और आज्ञा के “हं” का क्या संबंध?
विशुद्धि का बीज मंत्र “हं” है, और आज्ञा दल का पहला अक्षर भी “हं” (हं) है। दोनों में ध्वनि समान है, पर ऊर्जा का स्तर भिन्न है। विशुद्धि पर “हं” आकाश तत्व की बीज ध्वनि के रूप में कंपन करता है, जबकि आज्ञा पर आते-आते वही “हं” प्राण की उस धारा में ढल जाता है जो पीले से नीले प्रकाश में बदलती है और अंततः ॐ में विलीन होती है। इसलिए पोस्ट में कहा कि ये दोनों ॐ के साथ ओवरलैप होती हैं, अनुनादित होती हैं।

हम यह भी कह सकते हैं – विशुद्धि का “हं” शुद्धि करता है, आज्ञा का “हं” आयामों को खोलता है।

4. “क्षं” और “शं” का भेद भी समझे
आपने लिखा “शं“ "ब्रह्मरंध्र” या सहस्रार के लिए है कुछ ग्रंथों में “शं” (शं) या “क्षं” दोनों का उल्लेख मिलता है, यह परंपरा पर निर्भर करता है। कई क्रमों में मूलाधार से विशुद्धि तक लं, वं, रं, यं, हं और फिर आज्ञा के लिए ॐ, उसके बाद “क्षं” सहस्रार या बिंदु का संकेत करता है। मेरी पोस्ट में “क्षं” आज्ञा की दूसरी पंखुड़ी का प्राण स्पंद है, कोई अंतिम बीज मंत्र नहीं।
यानी पारंपरिक बीज मंत्र क्रम – लं, वं, रं, यं, हं, ॐ – बिल्कुल अपनी जगह पर स्थापित है। और आज्ञा के भीतर के गहन अनुभव में हं और क्षं वो दो प्राण-धाराएँ हैं जो 48-48 फ्रीक्वेंसी में टूटकर प्रकाश बन जाती हैं। इसे कहीं से भी विरोध नहीं है।

5. 48-48 का राज़ और पंखुड़ियों का गणित भी समझे
पोस्ट में बताया गया कि हं के भीतर 48 सूक्ष्म ध्वनियाँ और क्षं के भीतर 48 – यह कोई यादृच्छिक संख्या नहीं है। योग शास्त्रों में भी मानव शरीर में कुल 96 अंगुलियाँ (उँगलियों के पोरुओं की संख्या) बताई गई हैं, जो 48-48 के जोड़े में नाड़ियों और चेतना की लय से जुड़ी हैं। जब आज्ञाचक्र जागता है, तो यह पूरी बायो-इलेक्ट्रिक व्यवस्था एक साथ प्रकाश-स्पंद में बदलती अनुभव होती है। यही कारण है कि कमल की दो पंखुड़ियाँ हैं – हर पंखुड़ी अपने भीतर 48 स्पंदनों को समेटे है।

6. तो क्या ओम का जप छोड़ दें? इसको भी समझे।
बिल्कुल नहीं
आपने कहा कि “आज्ञा चक्र पर तो ॐ जप बताया गया है” – और यह परम सत्य है। मेरी पूरी पोस्ट का निचोड़ ही यही है कि अंततः सब कुछ ॐ में ही समा जाता है। मैने लिखा है – “ये दोनों ध्वनियाँ ॐ ध्वनि ऊर्जा पैटर्न के साथ ओवरलैप होती हैं, अनुनादित होती हैं।” और गहरे में जाने पर “शेष रहता है केवल सफेद प्रकाश – वह कोरी ऊर्जा है, ही ॐ है, ही शून्य है।”
अर्थात हं और क्षं का स्वतः उठना और ॐ में विलय – यह साधना का आंतरिक अनुभव है। जप की विधि में आप ॐ का ही आश्रय लेंगे, यह सर्वथा उचित और प्रभावी भी है।

7. एक बात और समझे
उस पोस्ट का दूसरा अंश आयामों (डाइमेंशन) के बारे में है। जब आज्ञाचक्र पर हं और क्षं की ये दो धाराएँ अपनी पूरी 48-48 की गहराई में खुलती हैं, तो चेतना का फ्रीक्वेंसी बैंड इतना चौड़ा हो जाता है कि वह केवल तीन आयामों में कैद नहीं रहती। तब साधक अन्य आयामों के प्राणियों और लोकों का अनुभव कर सकता है। यह कोई मंत्र जप से थोड़े में होने वाली बात नहीं, यह वर्षों की साधना से प्राण की धाराओं के इस रूपांतरण का परिणाम है।
मित्र
आपका प्रश्न बीज मंत्र क्रम और आज्ञा की पंखुड़ियों की ध्वनियों के संगम पर खड़ा है, और इस अंतर को उजागर करना बहुत ज़रूरी है।

· बीज मंत्र : लं, वं, रं, यं, हं, ॐ – चक्र जप और तत्व शुद्धि के लिए।
· पंखुड़ी की प्राण-ध्वनियाँ (जो सिर्फ गूढ़ ध्यान में सुनाई देती हैं) : हं और क्षं – आज्ञा दल पर।
  ये दोनों आपस में टकराते नहीं, बल्कि एक ही सीढ़ी के दो स्तर हैं। बीज मंत्र से शुरू करके, एक दिन साधक जब पूर्ण मौन और प्राण के सूक्ष्म कंपनों में डूबता है, तो उसे हं और क्षं का यह द्वार खुलता है, जो उसे ॐ रूपी अनंत में ले जाता है।

आपकी जिज्ञासा उत्तम है। ऐसे प्रश्न ही साधना को कोरी मान्यता से उतारकर अनुभव की वास्तविकता में बदलते हैं।

ॐ शांति
साभार - टैलीपैथी 

Tuesday, 28 April 2026

जन्म_कुण्डली_में_सन्तान_भाव_का_एक_अज्ञात_रहस्य

#जन्म_कुण्डली_में_सन्तान_भाव_का_एक_अज्ञात_रहस्य 
सूर्य सिद्धांत का गुप्त अध्याय: #संतान_रहस्य – ब्रह्मांड का वह खगोलीय गणित जो 99% ज्योतिषी कभी नहीं छू पाए

कल्पना कीजिए... 6778 ईसा पूर्व की वह रात्रि, जब मायासुर को सूर्यदेव ने स्वयं वह ग्रंथ सौंपा जिसमें ग्रहों की गति का कोड छिपा था। #सूर्य_सिद्धांत। एक ऐसा ग्रंथ जो महायुग (43,20,000 वर्ष) में सूर्य की 43,20,000 परिक्रमाओं, चंद्र की 6,77,53,336 परिक्रमाओं और प्रत्येक ग्रह की #मंदा_सिंहरा_फल की जटिल #त्रिकोणमिति (साइन टेबल, एपिसाइकिल, बीज सुधार) से ग्रहों की सटीक स्पष्ट स्थिति निकालता है। 

यदि आप अपनी #कुण्डली_विश्लेषण चाहते हैं तो जन्म स्थान समय बताएं.....

आज के 99% ज्योतिषी पाराशर, फलित सूत्रों में फंसे रहते हैं। वे कुंडली देखते हैं, लेकिन खगोलीय गणित नहीं। वे #पंचम_भाव और गुरु देखते हैं, लेकिन सूर्य सिद्धांत का वह बीज-क्षेत्र स्फुट + दैनिक गति का सूक्ष्म समीकरण नहीं जानते जो #संतान को कब, क्यों, कितनी, पुत्र या कन्या – सब कुछ #ब्रह्मांड के साइन में लिख देता है।

यह लेख उस रहस्य को खोलता है। कोई सैद्धांतिक गलती नहीं, कोई मिसप्रिंट नहीं। शुद्ध सूर्य सिद्धांत + प्राचीन फलित + गहन शोध का सम्मिश्रण। पढ़ते-पढ़ते आप रुक नहीं पाएंगे, क्योंकि हर पैराग्राफ में एक नया रहस्य खुलता है।

1. #संतान_कब_होगी? – सूर्य सिद्धांत का “स्पष्ट दैनिक गति” सूत्र (Timing का गुप्त कोड)
सामान्य ज्योतिषी कहते हैं – “गुरु की दशा या #पंचमेश गोचर में बच्चा होगा।” लेकिन सूर्य सिद्धांत कहता है: सबसे पहले ग्रहों की सटीक स्पष्ट स्थिति (True Longitude) निकालो।

#सूर्य_सिद्धांत अध्याय 2 में मंद फल (Equation of Centre) और सिंहर फल (Equation of Conjunction) का सूत्र दिया है:
भुजफल = (बेस-साइन × एपिसाइकिल) / 360°
फिर हाइपोटेन्यूज H = √(R² ± कोटि फल²)
स्पष्ट गति = #मंद_सिनहर सुधार के बाद दैनिक गति × (H - R)/H

यह सूत्र #कुंडली के जन्म काल से लेकर वर्तमान तक प्रत्येक दिन की स्पष्ट स्थिति देता है। 
अब रहस्य:
#पंचम_भाव_का_स्वामी + गुरु की स्पष्ट लंबाई को सूर्य सिद्धांत के अहरगण (Sum of Days) से जोड़कर देखो। जब यह योग 5वें #नवांश में “बीज सुधार” (Bija Correction) के बाद 23°-27° के बीच पहुंचे और चंद्र की मंद गति (Moon's Anomaly) 90° के निकट हो, तब संतान का द्वार खुलता है।

यह 99% नहीं जानते क्योंकि वे Drik सिद्धांत (आधुनिक #एफेमरिस) यूज करते हैं, #सूर्य_सिद्धांत का बीज सुधार (1100 ई. के बाद 750 वर्ष पुराना, लेकिन मकरंद द्वारा अंतिम सुधार) भूल जाते हैं। परिणाम? गलत टाइमिंग। असली गणित बताता है – संतान उस ठीक तिथि पर होगी जब पुत्र तिथि स्फुट (Moon ×5 - Sun ×5 / 360 → तिथि शुभ_पक्ष में 5वें या 10वें करण में हो।

2. #संतान_होने_में_बाधा – बीज-क्षेत्र स्फुट का अंधकारमय रहस्य (Obstacles का खगोलीय डिटेक्टर)
सूर्य_सिद्धांत में ग्रहों की परिक्रमा संख्या (Revolutions in Mahayuga) बताती है कि हर ग्रह की “बीज शक्ति” (Seed Power) कितनी है। अब फलित में इसे संतान से जोड़ो:

#बीज_स्फुट (पुरुष) = सूर्य + शुक्र + गुरु की निरयन लंबाई जोड़ो → राशि + नवांश।
अगर दोनों विषम राशि/नवांश → बीज शक्तिशाली (संतान निश्चित)।
दोनों सम → पूर्ण बाधा (99% ज्योतिषी यही चूक जाते हैं)।
मिश्र → देरी, लेकिन सूर्य सिद्धांत के मंद फल सुधार (Mars 76° epicycle) से ठीक होता है।

क्षेत्र स्फुट (#स्त्री) = #२_भाव_का_वाणी_रहस्य चंद्र_मंगल_गुरु → दोनों सम राशि/नवांश → क्षेत्र उपजाऊ।
दोनों विषम → बांझपन या गंभीर बाधा।

रहस्य यह कि इन स्फुटों को सूर्य सिद्धांत के साइन इंटरपोलेशन (Sine Table 225' अंतर) से और सूक्ष्म बनाओ। अगर बीज स्फुट पर राहु/केतु की लंबाई 120' विक्षेप (Latitude) डाल रही हो, तो गर्भपात या देरी। अगर क्षेत्र स्फुट पर शनि की मंद गति (Saturn 49° epicycle) हावी, तो 7-12 वर्ष देरी। यह गणित इतना गहरा है कि आज के सॉफ्टवेयर भी पूरा नहीं करते – क्योंकि वे Drik यूज करते हैं, सूर्य का बीज नहीं।

3. #कितनी_संतान_होगी? – #नवांश_अष्टकवर्ग + महायुग गणित का सम्मिश्रण (Number का गणितीय रहस्य)
सामान्य नियम: पंचम भाव में जितने नवांश गुजरे, उतनी संतान। लेकिन सूर्य सिद्धांत का गुप्त लेयर:

#गुरु_चंद्र + सूर्य लंबाई जोड़ो → राशि का नवांश संख्या = संतान संख्या।
पंचमेश के नवांश + गुरु की अष्टकवर्ग बिंदु (5वें भाव से गुरु को देखते हुए) × 3 (अगर गुरु उच्च/वक्री)।

सूर्य सिद्धांत की महायुग परिक्रमा से एनालॉजी: जितनी “अंतरिम मास” (Intercalary Months = 15,93,336) पंचम भाव में प्रभावी, उतनी संतान।
उदाहरण: अगर पंचम नवांश 4 पूर्ण हो + गुरु अष्टकवर्ग 7 बिंदु + क्षेत्र स्फुट सम → 4 संतान (2 पुत्र, 2 कन्या संभावित)। यदि मंगल/शनि मालेफिक ड्रिस्टि → 1-2 कम। यह सूत्र इतना सटीक कि प्राचीन ऋषि इससे राजवंश की भविष्यवाणी करते थे।

4. #कितनी_कन्या_कितने_पुत्र? – विषम-सम + नर-स्त्री ग्रह + साइन पैरिटी (Gender का ब्रह्मांडीय कोड)
पंचम भाव विषम राशि + नर ग्रह (सूर्य, मंगल, गुरु, शनि) की ड्रिस्टि → पुत्र संख्या।
सम राशि + स्त्री ग्रह (चंद्र, शुक्र, बुध) → कन्या संख्या।

सूर्य सिद्धांत ट्विस्ट: स्फुट की राशि + नवांश की पैरिटी देखो। बीज स्फुट विषम → पुत्र प्रधान। क्षेत्र सम + चंद्र/शुक्र प्रभाव → कन्या प्रधान। D7 सप्तांश लग्न यदि मिथुन/कन्या/धनु/मीन (द्विस्वभाव) → जुड़वां या मिश्रित।

रहस्य: सूर्य सिद्धांत अध्याय 7 में ग्रहों का विक्षेप (Latitude) – अगर पंचम में चंद्र 270' विक्षेप डाल रहा हो → अधिक कन्या। मंगल 90' → पुत्र लेकिन स्वास्थ्य बाधा।

5. पूरा विश्लेषण कैसे करें? – एक कुंडली के लिए स्टेप-बाय-स्टेप (आपकी कुंडली पर लागू करो)
जन्म विवरण से सूर्य सिद्धांत अहरगण → सटीक स्पष्ट ग्रह।
बीज + क्षेत्र स्फुट → बाधा स्तर (0-100%)।
पंचम + गुरु + D7 → संख्या + लिंग।
दशा में सिंहर फल सुधार → ठीक वर्ष/माह।
यह विधि इतनी गहन है कि एक बार समझ लेने पर आप कभी सामान्य ज्योतिषी की तरह नहीं सोचेंगे। पढ़ने वाला मजबूर हो जाता है क्योंकि हर लाइन में “अरे! यह तो...” वाला अहसास होता है।

अंतिम रहस्य: सूर्य सिद्धांत कहता है – संतान ब्रह्मांड का “फल” है। अगर बीज-क्षेत्र कमजोर, तो संतान गोपाल मंत्र + पीला दान + गुरुवार व्रत से बीज सुधार (Bija) हो जाता है। लेकिन गणित सही हो तो कोई बाधा टिकती नहीं।

यह लेख समाप्त नहीं होता – क्योंकि अब आप जान गए कि संतान कोई संयोग नहीं, खगोलीय गणित का रहस्यमय नृत्य है। अपनी कुंडली पर इसे लागू करो, और देखो कैसे ब्रह्मांड जवाब देता है।

जो 99% नहीं जानते, वे अब जान गए। बाकी... पढ़कर रुक गए न? 😌
#SHRI_NARAYANA_JI
#Shri_Narayann_Ji

ईशनिंदा पर ईसाई इस्लाम की कठोर शारीरिक दण्ड व्यस्था और मनुस्मृति में उदारता (केवल आर्थिक दण्ड)

मनुस्मृति ( ६८) 

अदण्ड्यश्चैव दण्ड्यश्च दण्ड्योऽपि च यथाक्रमम् ।  
दण्डे दण्ड्ये च विज्ञेयं न्यायतोऽन्यायतोऽपि वा॥ 

यानी कुछ लोग दंड के योग्य नहीं होते, कुछ योग्य होते हैं, और कुछ विशेष रूप से दंडनीय होते हैं; इस सबका निर्णय न्यायपूर्वक करना चाहिए।

कभी मनुस्मृति के इस श्लोक की तुलना चर्च के उस सिद्धांत से कीजिए कि Error non habet ius" (गलती या भटकाव को कोई अधिकार नहीं होता)। चर्च का मानना था कि एक गलत विचार को जिंदा छोड़ना हज़ारों लोगों को नर्क भेजने जैसा है, इसलिए अपराधी को खत्म करना 'करुणा' का काम है। जैसे राजा के खिलाफ विद्रोह करने पर मौत मिलती थी, वैसे ही गॉड के नियमों (Dogma) को चुनौती देना "दिव्य राजद्रोह" माना जाता था, जिसके लिए सबसे कठोर सजा अनिवार्य थी। चर्च का मानना था कि ईशनिंदा एक संक्रामक रोग (Gangrene) की तरह है। अगर एक अंग (अपराधी ) को नहीं काटा गया, तो वह पूरे समाज की आत्मा को नर्क ले जाएगा। शरीर को जलाना नर्क की आग का पृथ्वी पर पूर्वाभ्यास माना जाता था ताकि शायद मरने वाला आखिरी पल में पश्चाताप कर ले।

मनुस्मृति में देवनिन्दा (देवताओं/ईश्वर की निंदा) के लिए कोई विशिष्ट “राजकीय दंड” (जैसे जुर्माना या शारीरिक सजा) का सीधा प्रावधान नहीं है। यह मुख्य रूप से धार्मिक/नैतिक पाप (pāpa) माना गया है, जिसके परिणाम कर्मफल, नरक या सामाजिक/आध्यात्मिक हानि के रूप में बताए गए हैं। मनुस्मृति 4.163 कहती है कि: नास्तिक्यं वेदनिन्दा च देवतानां च कुत्सनम् ॥ द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं च वर्जयेत् ॥ यानी नास्तिकता, वेदों की निंदा, देवताओं की निंदा (कुत्सन), द्वेष, दंभ आदि से बचना चाहिए।यहाँ देवनिन्दा को नैतिक रूप से वर्जित बताया गया, लेकिन कोई दंड निर्दिष्ट नहीं किया गया। 

जबकि चर्च के इतिहास से इस अपराध के लिए दंडों के वास्तव में घटे उदाहरण लूँ तो मन में खौफ पैदा हो जाता है। मैं आगे जब जब भी अपराध का नाम लूँ तो वह अपराध यही है। 

मसलन जीवित जलाना (Burning at the Stake) चर्च की सबसे मानक सजा थी। जियोर्डानो ब्रूनो और जान हस को चर्च के आदेश पर इसी तरह खत्म किया गया ताकि उनका शरीर (Relic) न बचे। जॉन हस का अपराध यह था कि उसने कहा चर्च का असली मुखिया ईसा मसीह हैं, न कि पोप अहिंसा का नाटक" (Ecclesia abhorret a sanguine) यहां था। चर्च का नियम था कि वह "खून नहीं बहा सकता"। इसलिए जलाने की सजा चुनी गई क्योंकि इसमें खून नहीं बहता था और शरीर पूरी तरह खत्म हो जाता था। मारिया बारबरा कार्लो (Maria Barbara Carillo, 1721) को 95 वर्ष की आयु में जिंदा जला दिया गया (वह स्पेनिश इनक्विजिशन द्वारा जलाई गई सबसे बुजुर्ग व्यक्तियों में से एक थीं)।उन पर "जुडाइजिंग" (ईसाई होने के बावजूद यहूदी रीति-रिवाजों का पालन करना) का आरोप था। मार्गेरिट पोरटे (Marguerite Porete, 1310) अपनी रहस्यमयी किताब के साथ पेरिस में जिंदा जला दी गईं। उन्होंने 'द मिरर ऑफ सिंपल सोल्स' लिखी थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि एक पूर्ण आत्मा को चर्च के नियमों की आवश्यकता नहीं होती।

स्ट्रैपाडो (Strappado) में अपराधी के हाथ पीछे बांधकर उसे ऊपर लटकाया जाता था और फिर झटके से नीचे गिराया जाता था। इससे कंधे के जोड़ पूरी तरह उखड़ जाते थे।

द रैक (The Rack) पर चढ़ाये जाने की सज़ा ऐन एस्क्यू को मिली थी । बेलन (Rollers) की मदद से शरीर को तब तक खींचा जाता था जब तक कि नसें और जोड़ फट न जाएं। एन एस्क्यू का अपराध यह था कि उन्होंने 'ट्रांसबस्टैंशिएशन' (Transubstantiation) से इनकार किया—यानी उन्होंने यह मानने से मना कर दिया कि चर्च की रोटी सच में मसीह का मांस बन जाती है।

मरणोपरांत मुकदमा (Posthumous Trial) भी चलता था। चर्च ने जॉन वाइक्लिफ की मौत के 44 साल बाद उनकी कब्र खुदवाई, उनकी हड्डियों पर मुकदमा चलाया और फिर उन्हें जलाकर राख को नदी में फेंक दिया। पिएत्रो डी अबानो (Pietro d'Abano, 1316) की 
मुकदमे के दौरान उनकी मृत्यु हो गई, तो चर्च ने उनकी लाश को खोदकर निकाला और सार्वजनिक रूप से जलाया।

जिह्वा छेदन (Piercing the Tongue) भी हुआ। जो लोग चर्च के खिलाफ बोलते थे, उनकी जीभ में लोहे की कील ठोक दी जाती थी या उसे काट दिया जाता था ताकि वे 'ईशनिंदा' न कर सकें। ब्रूनो वैज्ञानिक ने तर्क दिया था कि ब्रह्मांड अनंत है और कई अन्य संसार भी हो सकते हैं, जो चर्च की 'धरती ही केंद्र है' वाली बात के खिलाफ था। उन्हें लोहे की कील जीभ में ठोककर जिंदा जलाया गया (1600) था। 

हेरेटिक फोर्क (The Heretic's Fork) एक दोमुंहा कांटा था जो गले और छाती के बीच बांध दिया जाता था। गर्दन जरा भी झुकने पर वह गले को चीर देता था। यह सोने न देने की एक यातना थी।

दीवार में चुनवाना (Immurement) सिर्फ मुगलों तक सीमित न था। कई अपराधियों को ताउम्र के लिए चर्च की कालकोठरी की दीवारों के पीछे बंद कर दिया जाता था, जहाँ उन्हें बस एक छोटे छेद से खाना मिलता था।

पीला क्रॉस पहनना (The Yellow Cross) भी एक सज़ा थी। पश्चाताप' करने वाले अपराधियों को उम्र भर अपने कपड़ों पर बड़े पीले क्रॉस सिलकर घूमने पड़ते थे ताकि समाज उनका बहिष्कार करे।

लोहे का अस्त्र (Iron Maiden) से भी सजा मिलती थी। इनक्विजिशन के संग्रहालयों में इसे एक डरावने यंत्र के रूप में दिखाया जाता है, जिसमें अंदर की तरफ कीलें होती थीं।

जूडस क्रेडल (Judas Cradle) की सजा और क्रूर थी। संदिग्ध अपराधी को रस्सियों से एक नुकीले पिरामिड पर धीरे-धीरे उतारा जाता था ताकि वह उसे अंदर से फाड़ दे।

गला घोंटना और जलाना (Garrote) की सजा भी थी। विलियम टिंडेल जैसे लोगों को पहले लोहे के तार से गला घोंटकर मारा गया, फिर उनके शव को जलाया गया।

संपत्ति की जब्ती (Confiscation) भी की जाती थी। किसी को अपराधी घोषित करते ही चर्च उसकी सारी जमीन और धन छीन लेता था, जिससे उसका परिवार सड़कों पर आ जाता था।

सार्वजनिक कोड़े मारना (Public Scourging) भी था। कम अपराध वाले अपराधियों को हर रविवार चर्च के दरवाजे पर नग्न कर कोड़े मारे जाते थे।

पुनः बपतिस्मा पर मृत्युदंड मिलता था। एनाबैप्टिस्ट' (Anabaptists) जो चर्च के बाल-बपतिस्मा को नहीं मानते थे, उन्हें 'तीसरा बपतिस्मा' देने के नाम पर नदी में डुबोकर मार दिया जाता था।

लोहे के जूते (Iron Boots) वाली सजा और क्रूर थी। इसमें पैरों को लोहे के जूतों में डालकर उन्हें गर्म किया जाता था या कीलों से कस दिया जाता था जिससे हड्डियाँ चकनाचूर हो जाती थीं।

घुटने तोड़ना (Knee Splitter) भी सज़ा का एक प्रकार था। एक औजार से घुटने की कटोरी और जोड़ों को तब तक दबाया जाता था जब तक वे हमेशा के लिए बेकार न हो जाएं।

वाटर टॉर्चर (Toca) में आरोपी के मुंह में कपड़ा ठूंसकर ऊपर से पानी डाला जाता था ताकि उसे डूबने और दम घुटने का एहसास हो (आज का वॉटरबोर्डिंग)।

कैथर्स का नरसंहार (Albigensian Crusade) करने हेतु चर्च ने पूरे के पूरे 'कैथर' समुदाय को खत्म करने के लिए सेना भेजी और हजारों लोगों को एक साथ जला दिया गया।

अंगूठे दबाना (Thumb Screws) तो सस्ती सजा थी। इसमें लेखकों और विचारकों के अंगूठों को लोहे के शिकंजे में कसकर कुचल दिया जाता था ताकि वे दोबारा न लिख सकें।हमारे यहाँ के एकलव्य की तो बड़ी चर्चा मिश न रि यों ने की करवाई, अपनी इस सज़ा के बारे में बतलाने में चूक गये। 

ऑटो-डा-फे (Auto-da-fé) की चर्चा मैंने पिछली एक पोस्ट में की थी। यह एक सार्वजनिक उत्सव जैसा होता था जहाँ सैकड़ों अपराधियों को एक साथ जुलूस में ले जाकर सामूहिक रूप से जलाया जाता था।

ह्युजेस एम्ब्रायट (Hugues Aubriot, 1381) को मिली सजा ‘मुरस स्ट्रेक्टस' (Murus Strictus) यानी जीवन भर के लिए अंधेरी कालकोठरी में केवल रोटी और पानी पर रखा जाना। उस पर यहूदियों के प्रति सहानुभूति रखने और चर्च के नियमों की अवहेलना करने का आरोप था। 

फ्रा डोलसिनो (Fra Dolcino, 1307) ने एक क्रांतिकारी पंथ चलाया था जो चर्च की अमीरी के खिलाफ था। उन्हें गरम चिमटों से धीरे-धीरे नोंचकर मारा गया और फिर उनके शरीर के अंगों को जला दिया गया।

सर्वेंटस जैसे रक्त संचार वैज्ञानिक को मारने में जल्लादों ने जानबूझकर गीली लकड़ी (Green oak wood) का उपयोग किया था। गीली लकड़ी धीरे जलती है और बहुत धुआं पैदा करती है, जिससे आग की लपटें धीमी रहती हैं। इसका उद्देश्य मृत्यु की प्रक्रिया को लंबा खींचना था ताकि अपराधी अधिक समय तक तड़पे। उसके सिर पर तिनकों का एक मुकुट रखा गया था जिस पर सल्फर (गंधक) छिड़का गया था। जब आग की लपटें ऊपर पहुँचीं, तो सल्फर ने भीषण गर्मी पैदा की जिससे उसका सिर जलने लगा, लेकिन वह तुरंत मरा नहीं।जहाँ सामान्य तौर पर सूखी लकड़ी से व्यक्ति कुछ ही मिनटों में दम घुटने या जलने से मर जाता था, सर्वेंटस को मरने में 30 मिनट से लेकर लगभग 2 घंटे तक का समय लगा। वह पूरी प्रक्रिया के दौरान होश में था और दया की भीख मांगता रहा। उसकी प्रसिद्ध किताब 'Christianismi Restitutio' (जिसके कारण उसे अपराधी माना गया था) को उसकी जांघ से बांध दिया गया था ताकि वह भी उसके साथ भस्म हो जाए। सर्वेंटस पश्चिमी दुनिया के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने यह बताया कि रक्त (Blood) हृदय के दाहिने हिस्से से फेफड़ों (Lungs) में जाता है, वहां ऑक्सीजन लेकर शुद्ध होता है, और फिर वापस हृदय के बाएं हिस्से में आता है। उनसे पहले यह माना जाता था कि रक्त हृदय के बीच की एक दीवार से होकर सीधे गुजरता है। उस समय चर्च का मानना था कि "आत्मा" (Soul) रक्त में निवास करती है। सर्वेंटस का यह कहना कि रक्त फेफड़ों में हवा से मिलने जाता है, चर्च को ऐसा लगा जैसे वह आत्मा के दैवीय रहस्य को एक भौतिक या मैकेनिकल प्रक्रिया बता रहे हैं।

ल्यसिलो वानिनी को उनकी पुस्तकों Amphitheatrum Aeternae Providentiae Divino-Magique ( ईश्वरीय और जादुई शाश्वत विधान का रंगमंच) और De Admirandis Naturae Reginae Deaeque Mortalium Arcanis(मृत्युलोक की रानी और देवी प्रकृति के अद्भुत रहस्यों पर) के लिए लकड़ी के एक फ्रेम से चर्च तक घसीट कर लाया गया। फिर उसकी शर्ट फाड़ी गई, फिर उसे एक जलती मशाल पकड़ाई गई, उसकी जीभ काटी गई, उसका गला घोंटा गया और उसे जला दिया गया। 

इस्लामी दंड विधान का भी पुराना इतिहास रहा। का'ब इब्न अल-अशरफ (624 ईस्वी): एक कवि था जिसने मदीना में पैगंबर और मुसलमानों के खिलाफ अपमानजनक कविताएं लिखीं। उसे मौत की सजा दी गई।
असमा बिंत मरवान (624 ईस्वी) को पैगंबर मोहम्मद की आलोचना करने और कबीलों को भड़काने के आरोप में दंडित किया गया।अबू अफक (624 ईस्वी) एक वृद्ध कवि था जिसे पैगंबर के अपमान के आरोप में मार दिया गया।
जाद इब्न दिरहम (742 ईस्वी) उमेय्यद काल का एक विद्वान था जिसने कुरान के नाजिल होने पर बहस की। उसे ईद-उल-अजहा के दिन सार्वजनिक रूप से वध किया गया।बशर अल-मरीसी (9वीं सदी) एक मुअतज़िला विद्वान था जिसे अब्बासिद काल में कट्टरपंथियों ने ईशनिंदा के आरोप में प्रताड़ित किया।मंसूर अल-हल्लाज (922 ईस्वी) सबसे प्रसिद्ध सूफी शहीद हुए। उन्होंने "अनल हक" (मैं ही सत्य हूँ) कहा था। उन्हें पहले सार्वजनिक रूप से कोड़े मारे गए, फिर उनके हाथ-पैर काटे गए और अंत में फांसी देकर उनके शरीर को जला दिया गया। इमाद अल-दीन नसिमी (1417 ईस्वी) सूफी कवि था जिस पर ईशनिंदा का आरोप लगा और अलेप्पो (सीरिया) के बाजार में उनकी जिंदा खाल उतार दी गई (Flaying alive)। ऐन अल-कुज़ात हमदानी (1131 ईस्वी)को हमदान की जेल में गला घोंटकर मारा गया और फिर उनके शव को चटाई में लपेटकर खौलते हुए तेल में डाल दिया गया।

परफेक्टस (850 ईस्वी) कोर्डोबा का एक पादरी था जिसने पैगंबर के बारे में अपमानजनक शब्द कहे थे। उसे सिर काटकर मौत की सजा दी गई। इसाक ऑफ कोर्डोबा (851 ईस्वी) एक ईसाई भिक्षु था जिसने सार्वजनिक रूप से इस्लाम की आलोचना की। उसे फांसी दी गई। फ्लोरा और मारिया (851 ईस्वी) दो ईसाई महिलाएं थीं जिन्हें ईशनिंदा और इस्लाम छोड़ने के लिए मृत्युदंड दिया गया। यूलागियस (859 ईस्वी) कोर्डोबा के 'शहीद' आंदोलन के नेता थे। उन्हें ईसाइयों को ईशनिंदा के लिए उकसाने के आरोप में सिर काटकर मार दिया गया। जाद इब्न दिरहम (742 ईस्वी) को उमेय्यद गवर्नर खालिद अल-कसरी ने ईद-उल-अजहा की नमाज के बाद मिंबर के नीचे भेड़ की तरह ज़बह (गला काटना) कर दिया। शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी (1191 ईस्वी) को अलेप्पो के किले में तब तक भूखा रखा गया जब तक उनकी मृत्यु नहीं हो गई। बशर अल-हफी के अनुयायियों को ऊंची मीनारों से नीचे फेंककर मारा गया था। इब्न मुक़फ़्फ़ा (756 ईस्वी) एक प्रसिद्ध लेखक थे जिस पर ईशनिंदा का आरोप लगा। उसे भट्टी के पास ले जाया गया और उसके शरीर के अंगों को एक-एक करके काट कर उसी के सामने आग में भून दिया गया।मैं भारतीय उदाहरण देना नहीं चाह रहा था पर फिरोज शाह तुगलक के काल में एक ब्राह्मण को यह कहने पर कि 'इस्लाम और हिंदू धर्म दोनों सच्चे हैं', चर्च की तरह लकड़ियों के ढेर पर जिंदा जला दिया गया। 18वीं-19वीं सदी में दरगाहों पर जाने या 'बिदत' (नवाचार) को ईशनिंदा मानकर सार्वजनिक रूप से कोड़े मारना और सिर काटना आम था।

ये सब नाम मात्र के उदाहरण हैं वरना ऐसी सजाओं को भुगतने का इतिहास लाखों लोगों का है। 

मनु का दंड विधान इस पर एकदम मौन है। मनुस्मृति में सीधा उल्लेख न होने पर भी प्राचीन भारतीय व्यवस्था में देवनिन्दा को वाक्पारुष्य (मौखिक अपमान) की श्रेणी में देखा जाता था। याज्ञवल्क्य स्मृति (2.211) देवताओं, राजा या त्रिवेदी ब्राह्मण की निंदा पर उत्तम साहस दंड (भारी जुर्माना — लगभग 500-1000 पण या अधिक, शास्त्र अनुसार) का प्रस्ताव करती है। कौटिल्य अर्थशास्त्र (3.18.12) में देवताओं या चैत्य की निंदा पर उत्तम साहस दंड(500-1000 पण का जुर्माना) था। यह जुर्माना राजा द्वारा लगाया जाता था, लेकिन शारीरिक सजा (जैसे अंग-भंग) नहीं थी। मुख्यतः आर्थिक दंड था। चार्वाक, बौद्ध, जैन, आजीवक — ये सब वैदिक विरोधी थे। फिर भी इनके अनुयायियों को राज्य-दण्ड नहीं मिला। आधुनिक उदारवादी लोकतन्त्र, UN का Article 18 (UDHR), John Stuart Mill का “On Liberty” — सब यही कहते हैं कि विचार और अन्तःकरण की स्वतन्त्रता राज्य-दण्ड से परे होनी चाहिए।इस मानदण्ड पर मनुस्मृति की परम्परा — और व्यापक हिन्दू परम्परा — Inquisition और apostasy-law से निःसन्देह श्रेष्ठतर रही। चार्वाक ने ईश्वर को नकारा — जीवित रहे। बृहस्पति ने वेदों को “धूर्त-प्रपञ्च” कहा — उनके विचार संरक्षित रहे। बौद्धों ने आत्मा को नकारा — सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया। यह intellectual tolerance वास्तविक और ऐतिहासिक है।अजितकेशकंबली, संजय बेलठिपुत्त, पकुद्ध कात्यायन जैसे कितने ही वेदनिंदक हुए, किसी को कुछ नहीं हुआ। ‘न परमेश्वरोऽपिकश्चित्’ कहने वाले को भी कुछ नहीं हुआ और ‘काम एवैक: पुरुषार्थ:’ कहने वाले को भी छेड़ा नहीं गया। ‘प्रत्यक्षमेव प्रमाणम्’ कहने वाले का किसी ने कुछ नहीं बिगाड़ा। 

पर इसके दुष्परिणाम भी हुए। आज नव-बौद्धों सहित बहुत से प्रतिद्वंद्वी रिलीजन मनु के द्वारा दिखाई गई उदारता का भारत में दुरुपयोग धड़ल्ले से कर रहे हैं ।

फिर भी मनु की ओर दुनिया क्रमशः बढ़ रही है। 21वीं सदी में न्यूजीलैंड (2019), कनाडा, आइसलैंड, आयरलैंड, माल्टा, नॉर्वे और स्कॉटलैंड जैसे देशों ने अपने ईशनिंदा कानूनों को पूरी तरह से हटा दिया है। प्यू रिसर्च सेंटर' (Pew Research Center) के अनुसार, 2019 तक दुनिया के लगभग 79 देशों (करीब 40%) में ईशनिंदा के खिलाफ कानून मौजूद थे। मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका (MENA) क्षेत्र में स्थिति सबसे सख्त है, जहाँ लगभग 90% देशों में ऐसे कानून लागू हैं।

मनुस्मृति और तत्जनित भारतीय औदार्य की आधुनिकता देखकर आश्चर्य होता है।

मनोज श्रीवास्तव 
https://www.facebook.com/100007830646528/posts/pfbid08yHE3GihaTWHTM1cyYxyv7YzgWMNku9u44fsCgoBTPBhbT3dH5D8KBG1nBNMv2fDl/?mibextid=CDWPTG