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Friday, 30 May 2025

किशोर और युवा पीढ़ी को भटकाव से बचाएं -

*॥ॐ॥*
       आइये मिलकर भारत के किशोर और युवा पीढ़ी को भटकाव से बचाएं -

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*-वयं राष्ट्रे जागृयाम_*

आज एक संवेदनशील विषय पर बात करते हैं !!
Orkut से Reels तक – कैसे तकनीक ने युवा पीढ़ी को कामुकता और भटकाव की अंधी गली में धकेला…??

जहाँ तकनीक और इंटरनेट ने दुनिया को एक सूत्र में बाँधा, वहीं एक और सत्य यह भी है कि इसने हमारे युवाओं की सोच, संवेदनाओं, और नैतिकता को झकझोर कर रख दिया। Orkut के ज़माने से लेकर आज के Reels, Tinder और Telegram तक – एक सुनियोजित और अंधी दौड़ चली, जिसमें कामुकता, त्वरित संतुष्टि, और शारीरिक आकर्षण को सबसे ऊपर रख दिया गया।

यह ब्लॉग उस यात्रा को समझने का प्रयास है – कैसे तकनीक ने एक पूरी पीढ़ी को मन, मस्तिष्क और मूल्यों से हटाकर 'वासना और दिखावे' की तरफ मोड़ा।

1. Orkut – ‘इंटरनेट पर पहला रोमांच’
साल 2004-2005 में जब Orkut आया, तब पहली बार किशोर और युवा वर्ग को यह महसूस हुआ कि वे किसी भी अजनबी से बात कर सकते हैं, चैट कर सकते हैं, उनकी तस्वीरें देख सकते हैं और खुद को आकर्षक साबित कर सकते हैं।

Friend Requests, Scraps, और Communities के माध्यम से एक अनकही डिजिटल नजदीकी शुरू हुई।
स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राएं रात-रात भर Orkut पर लगे रहते।
उस उम्र में जहाँ कैरियर, अध्ययन और चरित्र निर्माण होना चाहिए था, वहाँ दिखावे, रोमांटिक फैंटेसी और डिजिटल इम्प्रेशन पर ज़ोर बढ़ गया।

2. Facebook और Virtual Identity की शुरुआत
Orkut के बाद आया Facebook – और यहीं से शुरू हुआ 'दूसरों को दिखाने की ज़िंदगी' का युग।

हर तस्वीर को 'सेक्सी', 'हॉट', 'क्यूट' कहने का चलन शुरू हुआ।
Like और Comment पाने के लिए लड़के-लड़कियाँ अपने प्रोफाइल को 'परफेक्ट बॉय/गर्ल' की तरह बनाने लगे।
किशोर मन धीरे-धीरे आत्मसम्मान की जगह “online validation” पर आश्रित हो गया।
भावनात्मक परिपक्वता से पहले ही रिलेशनशिप्स, ब्रेकअप्स, डिप्रेशन और कभी-कभी आत्महत्या जैसे ट्रेंड्स आम हो गए।

3. WhatsApp और छुपी हुई सेक्सुअलिटी की दुनिया
WhatsApp ने संवाद को जितना आसान बनाया, उतना ही खतरनाक भी।

School और कॉलेज के ग्रुप्स में वायरल MMS, अर्धनग्न तस्वीरें, जोक्स और डबल मीनिंग चैट्स ने किशोर मस्तिष्क को उत्तेजना की आदत डाल दी।
Blue Tick और Last Seen जैसी चीज़ों ने रिश्तों में असुरक्षा और अत्यधिक निजी जासूसी पैदा की।
युवाओं ने अपने मन के भीतर एक ‘छुपी हुई दुनिया’ बनानी शुरू की, जो माता-पिता, शिक्षक और समाज से अलग थी।

4. Instagram, Reels और Self-Objectification का दौर
आज Instagram पर लाखों युवक-युवतियाँ खुद को केवल "दिखाने लायक वस्तु" के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

लड़कियाँ अंग प्रदर्शन करती Reels बनाती हैं क्योंकि उन्हें मालूम है – "views" तभी मिलेंगे।
लड़के बॉडी बिल्डिंग, बाइक, या ब्रांडेड कपड़ों के ज़रिए दिखाते हैं कि वे "लायक" हैं।
यहां मूल्य नहीं, रूप मायने रखता है। आत्मसम्मान नहीं, लाइक्स मायने रखते हैं।
यही नहीं, Reels पर इस्तेमाल होने वाला संगीत, डायलॉग्स और हाव-भाव अक्सर इतने उत्तेजक होते हैं कि युवाओं की सोच को पूरी तरह से भटका देते हैं।

5. Dating Apps – स्वीकृत वासना की मार्केटिंग
Tinder, Bumble, Hinge जैसे ऐप्स ने अब यौन संबंधों को न केवल सामान्य बनाया, बल्कि एक 'स्टेटस सिंबल' बना दिया।

आज किशोर भी 18 की उम्र से पहले यह जानने को आतुर होते हैं कि "डेटिंग ऐप पर कैसे मैच करें?"
संबंधों की गहराई नहीं, उनकी गिनती मायने रखती है।
Gleeden जैसे ऐप्स ने तो सीधे तौर पर यह कह दिया – "अगर आप बोर हो चुके हैं, तो नई भावनात्मक/शारीरिक दुनिया में आइए।"

6. पोर्नोग्राफी और मस्तिष्क का अधःपतन
मुफ्त पोर्न साइट्स और OTT प्लेटफॉर्म्स पर अश्लीलता की भरमार ने एक पीढ़ी को आंतरिक रूप से खोखला किया।
किशोर मन अब पहले की तुलना में ज़्यादा तत्काल संतुष्टि, कल्पना आधारित यौन विचारों और व्यावहारिक असंतोष से भरा हुआ है।
इसके दुष्परिणाम:
जल्दी ब्रेकअप्स
मानसिक अस्थिरता
असंयमित यौन व्यवहार
अपराधों में वृद्धि (molestation, revenge porn, sextortion)

7. माता-पिता और शिक्षा व्यवस्था की विफलता
माता-पिता ने बच्चों को स्मार्टफोन तो दे दिए, पर संस्कार नहीं दिए।
शिक्षक "डिजिटल नैतिकता" जैसे विषयों पर चुप रहे।
Sex education का मतलब केवल शरीर का विज्ञान बना दिया गया, मानसिक और नैतिक विकास की बात नहीं की गई।

8. समाधान की राह – नैतिकता, शिक्षा और संवाद
डिजिटल डिटॉक्स और संयम का अभ्यास।
माता-पिता को संवाद में सुधार लाना होगा – डर नहीं, दोस्ती से।
स्कूलों में डिजिटल संस्कार और मूल्यों की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।
संवेदनशीलता और चरित्र निर्माण को तकनीक से ऊपर रखना होगा।
निष्कर्ष
तकनीक ने हमारे जीवन को सरल बनाया, पर अगर हमने विवेक और संस्कार नहीं जोड़े, तो यही तकनीक हमारे चरित्र, समाज और भविष्य को खा जाएगी।

युवाओं को आज सबसे ज़्यादा ज़रूरत है आदर्शों की, प्रेरणाओं की, और सही मार्गदर्शन की।

क्योंकि स्क्रीन से झलकती चमकती दुनिया, जीवन की सच्चाई नहीं होती।

अगर यह लेख आपके विचारों से मेल खाता है, तो कृपया इसे साझा करें। आइए मिलकर युवा भारत को भटकाव से बचाएं।
साभार - Acharya Kashyap 
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कुछ मेरी कलम से…
Vikas Tiwari

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