अग्निर्वायु तथा सूर्यस्तेभ्य एव हि जेनिरे।
स एताः व्याहृतीयर्हु वाः सर्व वेदं जुहोति वै।
-वृद्धहारीति
अग्नि, वायु, सूर्य इन्हीं व्याहृतियों से उत्पन्न हुए। जो व्याहृतियों से जप करता है वह समस्त वेदों के पाठ का फल प्राप्त करता है।
इसे वही जान सकता है , जिसे स्वयं परम शक्ति अपना कृपापात्र समझ जतला दे।
सोई जानई जेहि देई जनाई। जानत तुमही तुम्हाहि होई जाई॥
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_वयं राष्ट्रे जागृयाम_
अग्निर्वायु तथा सूर्यस्तेभ्य एव हि जेनिरे।
स एताः व्याहृतीयर्हु वाः सर्व वेदं जुहोति वै।
-वृद्धहारीति
अग्नि, वायु, सूर्य इन्हीं व्याहृतियों से उत्पन्न हुए। जो व्याहृतियों से जप करता है वह समस्त वेदों के पाठ का फल प्राप्त करता है।
वृद्धहारीति के इन पंक्तियों से वेद का सीधा संबंध इन व्याहृतियों से सिद्ध होता है।
गायत्री की पहली पंक्ति में प्रणव ॐ के बाद तीन उच्चारण हैं...!
भू , भुवः और सुवः..!
जिन्हें व्याहृतियाँ कहते हैं।
व्याहृति (या व्याहार ) शब्द का शाब्दिक अर्थ है अच्छी तरह से व्यक्त किया गया भाषण या एक सुविचारित कथन।
इन्हें रहस्यमय महत्व के अक्षरों के रूप में भी लिया जाता है। व्याहृति को वह भी समझा जाता है जो...
ब्रह्मांड के बारे में हमारे ज्ञान पर प्रकाश डालता है ।
( विशेषेणः आहितिः सर्व विराट प्रह्लानां प्रकाश-करणः व्याहृति इति)।
व्याहृतियों के बारे में विभिन्न धर्म सूत्रआदि स्मृतियों में, उपनिषद में, विभिन्न विषयोंके रूप में चर्चा की गई है।
छांदोग्य उपनिषद में कहा गया है कि -
सत्य के अवतार प्रजापति ने सभी अस्तित्व का ध्यान किया ( लोकान् अभ्यापत )।
उनके ध्यान से तीन वेद उत्पन्न हुए ( त्रयी विद्या )।
जिन वेदों का उन्होंने ध्यान किया, उनसे ये अक्षर ( एतानि अक्षराणि ) उत्पन्न हुए: भू , भुवः और सुवः ।
जैसे ही प्रजापति ने आगे चिंतन किया ( तानि अभ्यतापात ),
इन ( व्याहत्रियों ) से ओम ( ओंकार संप्रस्रवत् ) शब्द का उदय हुआ।
तब उन्हें एहसास हुआ कि ओम वाणी के हर रूप में व्याप्त है ( ओंकारा सर्व वाच समत्रन्न ), ठीक उसी तरह जैसे शिराओं का जाल ( संकुना ) पूरे पत्ते पर फैला हुआ है ( सर्वाणी पर्णनै )।
प्रजापति ने कहा, 'वास्तव में यह सब ओम है!
सचमुच यह सब ॐ ही है!
'( ओंकार एव इदं सर्वम्; ओंकार एव इदं सर्वम् )'।
विभिन्न ग्रंथों और उन पर हुई टिप्पणियों में, व्याहृतियों की व्याख्या लगभग हर उस चीज़ के साथ की गई या उनकी पहचान की गई जिसे तीन के समूह में बांधा जा सकता था।
व्याहृतियाँ की व्याख्या तीन व्याहृतियों में से प्रत्येक को निम्नलिखित से संबंधित करने का प्रयास करते हैं:-
- प्रणव (ॐ) की मात्राएँ ;
- तीन वेद; वैदिक देवता - अग्नि, वायु और आदित्य;
- तीन क्षेत्र (लोक);
- तीन महत्वपूर्ण ऊर्जाएँ ( प्राण, अपान और व्यान );
- शक्तियों या अभिव्यक्तियों के तीन तरीके ( इच्छा, क्रिया और ज्ञान );
- ब्रह्मा, विष्णु और शिव की त्रिमूर्ति;
- सांख्य में बताए गए तीन अस्तित्व संबंधी कारक ( प्रधान , पुरुष और काल );
- योग के तीन चक्र ( मूलाधार , विशुद्ध और सहस्रार ); और,
- ब्रह्म के तीन पहलू (सत, चित् और आनन्द) आदि।
जौनपुर में मेरे अत्यंत ही प्रिय एवं मुझ पर बड़े भाई सा स्नेह रखने वाले ब्रह्मलीन हो चुके , संस्कृत महाविद्यालय के अवकाश प्राप्त प्राचार्य श्री शुक्ल जी जो देवरहवा बाबा के भी नजदीक रहे, जीवन पर्यंत गौसेवा करने वाले एवं मां ललिता के साधक रहे, ने अपने जीवन के आखिरी दो दिन पहले अनायास ही अपने आवास पर बड़ी गंभीर मुद्रा में ॐ पर चर्चा प्रारंभ की और उस समय में मुझसे कहा था कि प्रणव को उसके वास्तविक स्वरूप में बिना ध्यान योग के और बिना व्याहृतियों के नहीं जाना जा सकता है । साथ ही यह भी कहा कि इन के बारे में बतलाने वाले भी न के बराबर हैं , जो हैं भी तो वो रट्टा मार हैं, अनुभव से शून्य है।
लेकिन जो अनुभव से युक्त हैं उन्हें किसी को बतलाने की आवश्यकता नहीं, ऐसे में इसे वही जान सकता है , जिसे स्वयं परम शक्ति अपना कृपापात्र समझ जतला दे।
सोई जानई जेहि देई जनाई। जानत तुमही तुम्हाहि होई जाई।।
आज जब कभी भी इस विषय पर कुछ भी चिंतन करने बैठता हूं , तो उनके वाक्य कानों में गूंजने लगते हैं।
आज का विज्ञान भी इन्हीं व्याहृतियों को ध्यान में रखकर ही विश्व ब्रह्माण्ड को थ्री डायमेंशनल कहता है।
इस त्रिआयामी विश्व ब्रह्माण्ड के बारे में उसके पास अभी भी कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं ।
लेकिन मजे की बात यह कि आधुनिक वैज्ञानिक जानबूझ कर इसे स्वीकार नहीं करता है, और यदि कर भी ले तो अपने भारत में ही उसके शोध को मान्यता नहीं मिलेगी।।
फिर भी आधुनिक विज्ञान की प्रशंसा करनी पड़ेगी कि वह धीरे धीरे ही सही पुरातन विज्ञ ज्ञान का प्रकाशन आज के दृष्टि से कर रही है। बहुत संभव है कि कल को कोई वेद का और आधुनिक विज्ञान पद्धति का सामंजस्य बैठाते हुए सब तथ्यों को उनके वास्तविक स्वरूप में यथावत प्रकट करे ।।
।।ॐ भूर्भुवःस्वः ॐ।।
श्री नारायण हरिः।।
आत्म चैतन्य।।
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