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Thursday, 23 January 2025

मानव शरीर में सप्तचक्रों के प्रभाव

                                   ॥ॐ॥

       मानव शरीर में सप्तचक्रों के प्रभाव का रहस्य

                         1. मूलाधारचक्र : 
यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच 4 पंखुरियों वाला यह 'आधार चक्र' है। 99.9% लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है। 
                                  मंत्र : लं 
                          चक्र जगाने की विधि : 
मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है इसीलिए भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है- यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना। 
                                प्रभाव : 
 इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतर वीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है।

                         2. स्वाधिष्ठानचक्र- 
यह वह चक्र है, जो लिंग मूल से 4 अंगुल ऊपर स्थित है जिसकी 6 पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है तो आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।

                                मंत्र : वं
                            कैसे जाग्रत करें : 
जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है। फिल्म सच्ची नहीं होती लेकिन उससे जुड़कर आप जो अनुभव करते हैं वह आपके बेहोश जीवन जीने का प्रमाण है। नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते।
                               प्रभाव : 
इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हों तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी।

                           3. मणिपुरचक्र : 
नाभि के मूल में स्थित यह शरीर के अंतर्गत मणिपुर नामक तीसरा चक्र है, जो 10 कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।
                                मंत्र : रं
                         कैसे जाग्रत करें : 
आपके कार्य को सकारात्मक आयाम देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।
                                 प्रभाव : 
इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं। आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं।

                          4. अनाहतचक्र- 
हृदयस्थल में स्थित द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से सुशोभित चक्र ही अनाहत चक्र है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है तो आप एक सृजनशील व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं। आप चित्रकार, कवि, कहानीकार, इंजीनियर आदि हो सकते हैं।

                                   मंत्र : यं
                             कैसे जाग्रत करें : 
हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और सुषुम्ना इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है।
                                 प्रभाव : 
इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है। व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता है। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है।

                           5. विशुद्धचक्र- 
कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां विशुद्ध चक्र है और जो 16 पंखुरियों वाला है। सामान्य तौर पर यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है तो आप अति शक्तिशाली होंगे।
                              मंत्र : हं
                         कैसे जाग्रत करें : 
कंठ पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। 
                                प्रभाव :
सक्रिय है तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। इसे बौद्धिक सिद्धि कहते हैं।
                           6. आज्ञाचक्र -
मस्तिष्क के बीच दोनों नेत्रों पर मोहों के बीच स्थित होता हैं। इस कारण इसे तीसरा नेत्र भी कहते हैं। आज्ञाचक्र स्पष्टता और बुद्धि का केंद्र हैं। यह मानवीय और दैवीय चेतना के मध्य की सीमा निर्धारित करता है। यह तीन प्रमुख नाड़ियों इड़ा ( चंद्र नाड़ी ) पिंगला ( सूर्य नाड़ी ) सुषुम्ना ( केंद्रीय, मध्य नाड़ी ) के मिलने का स्थान है । जब इन तीनों नाड़ियों की ऊर्जा यहां मिलती हैं और आगे ऊपर की ओर उठती हैं तब हमें समाधि - सर्वोच्च चेतना प्राप्त होती हैं।
                              मंत्र : उ 
                       कैसे जाग्रत करें : 
भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।
                             प्रभाव : 
यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं और व्यक्ति सिद्धपुरुष बन जाता है।

                         7. सहस्रारचक्र :
सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।

                                मंत्र : ॐ
                           कैसे जाग्रत करें : 
 मूलाधार से होते हुए ही सहस्रार तक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह चक्र जाग्रत हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।
                                प्रभाव :
 शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही मोक्ष का द्वार है।

          साभार: श्री ललिता महात्रिपुरा सुंदरी समूह
                          संजीव सिन्हा 
                        वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Wednesday, 22 January 2025

शुभ - विवाह के मंगल अवसर पर वर-वधु प्रतिज्ञा

                            ॥ ॐ ॥
            इस मन्त्र वर-वधु प्रतिज्ञा कर रहे है कि :

समञ्जन्तु विश्वे देवाः समापो हृदयानि नौ ।
सं मातारिश्वा सं धाता समु देष्ट्री दधातु नौ ॥
 [ऋग्वेद 10.85.47]
यज्ञशाला में बैठे हुए विद्वान लोगों! हम प्रसन्नता पूर्वक गृहस्थाश्रम में साथ रहने के लिए एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं। हम दोनों के ह्रदय जाल के समान शांत और मिले रहेंगे; जैसे प्राणवायु सबको प्रिय है वैसे हम दोनों एक-दूसरे में सदा प्रसन्न रहेंगे; जैसे सबमें स्थित परमात्मा सारे जगत को धारण करता है वैसे ही हम दोनों एक-दूसरे को धारण करेंगे; जैसे उपदेशक श्रोताओं से प्रीति करता है वैसे हम दोनों की आत्मा एक-दूसरे के साथ दृढ़ प्रेम को धारण करे।

ओम् गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः ‌
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं तवादुर्गार्हपत्याय देवाः ॥ [ऋग्वेद 10.85.56]
हे वरानने! मैं ऐश्वर्य और सुसंतानादि सौभाग्य की वृद्धि के लिए तेरे हाथ को ग्रहण करता हूँ। तू मुझ पति के साथ जरावस्था को सुखपूर्वक प्राप्त हों। तथा; हे वीर! मैं सौभाग्य की वृद्धि के लिए आपके हाथ को ग्रहण करती हूँ। आप मुझ पत्नी के साथ वृद्धावस्था पर्यंत प्रसन्न ए़वं अनुकूल रहिये। आपको मैं और मुझे आप आजसे पति-पत्नी भाव से प्राप्त हुए हैं। परमात्मा और सभामंडप में। बैठे हुए विद्वान लोग गृहस्थाश्रम-कर्म के अनुष्ठान के लिए मुझे तुमको देते हैं।  

अघोरचक्षुरपतिघ्न्येधि शिवा पशुभ्यः सुमनाःसुवर्चाः।
वीरसूर्देवृकामा स्योना शं नो भव द्विपदेशं चतुष्पदे ॥ [ऋग्वेद 10/85/44]
परमात्मा की कृपा से हे वरानने! तू पति से विरोध न करने वाली और प्रिय दृष्टी हो। मंगलकारी, सब पशुओं को सुखदाता, पवित्र अंत:करण युक्त, सुन्दर शुभ गुण-कर्म-स्वाभाव और विद्या से सुप्रकाशित, उत्तम वीर पुत्रों को उत्पन्न करनेहारी, परमात्मा की उपासना करानेहारी, हमारे लोगों और गे आदि पशुओं को सुख देने वाली हो।

                  ( ये तीनों ऋग्वेद के मन्त्र हैं। )

अब अथर्ववेद पति-पत्नी को परस्पर प्रेम निर्वाह के लिए
                    इस प्रकार प्रेरणा देता है:-

भगस्ते हस्तमग्रभीत् सविता हस्तमग्रभीत् ।
पत्नी त्वमसि धर्माणाहं गृहपतिस्तव ॥
[अथर्ववेद 14/1/51]
वर वधु से कहता है कि ऐश्वर्ययुक्त! मैं तेरे हाथ को ग्रहण करता हूँ और धर्मयुक्त मार्ग में प्रेरक मैं तेरे हाथ को ग्रहण करता हूँ। तू धर्म से मेरी पत्नी है और मैं धर्म से तेरा गृहपति हूँ।

ममेयमस्तु पोष्या मह्य त्वदाद् बृहस्पति: ।
मया पत्या प्रजावति सं जीव शरदः शतम् ॥
[अथर्ववेद 14/1/52]
बृहस्पति (परमात्मा) ने तुझको मुझे दिया है कि तू जगत भर में मेरी पोषण कारी पत्नी हो। तू मुझ पति के साथ सौ वर्ष तक सुखपूर्वक जीवन धारण कर।

त्वष्टा वासो व्यदधाच्छुभे कं बृहस्पते: प्रशिषा कविनाम्।
तेनेमन नहीं सविता भगश्च सूर्यामिव परि …..॥
[ अथर्ववेद 14/1/53 ]
हे शुभानाने! परमात्मा और विद्वानों की शिक्षा से हम दम्पति होते हैं। तू मेरी प्रसन्नता के लिए सुन्दर वस्त्र और आभूषण तथा सुख को प्राप्त हो। हम दोनों की इच्छा को परमात्मा सिद्ध करे। जैसे इस नारी को ईश्वर संतान से सुशोभित करे, इसी प्रकार सूर्य की किरण के समान तुझको मैं भी सुशोभित करूँ।

अहं विष्यामि मयि रूपमस्या वेददित पश्यन्मनस: कुलायम्।
न स्तेयमद्मि मनसोदमुच्ये स्वयं श्रथ्नानो वरुणस्य पाशान्॥
[अथर्ववेद 14/1/58]
जैसे मान से कुल की वृद्धि को देखता हुआ मैं इस तेरे रूप को प्रीति से प्राप्त और इसमें प्रेम द्वारा व्याप्त होता हूँ, वैसे तू मेरी वधु मुझमें प्रेम से व्याप्त होकर अनुकूल व्यवहार को प्राप्त होवे। जैसे मैं उत्तम पदार्थों का वधु से चोरी से भोग नहीं करता हूँ वैसे ही यह वधु भी किया करे।

वेद मन्त्रों की ये भावनाएँ गुह्यासूत्रों में भी पाई गई है:-

यदैसि मनसा दूरं दिशोऽनुपवमानो वा ।
हिरण्यपर्णो वैकर्ण: स त्वा मन्मनसां करोतु ॥
[पाराoकाo 1 व 4]
जैसे पवित्र वायु और तेजोमय जल आदि को किरणों से ग्रहण करनेवाला सूर्य दुरस्थ पदार्थो और ...।

मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनु चितं ते अस्तु |
मम वाचमेकमना जुषरच प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम् || [पाराoकाo 1 -8/8]
हे वधु! तेरे अन्त:करण और आत्मा को मैं अपने व्रत के अनुकूल धारण करता हूँ। मेरे चित्त के अनुकूल सदा तेरा चित्त रहे, मेरी वाणी तू एकाग्रचित्त से सेवन करे। परमात्मा तुझे मेरे अनुकूल रखे।

अन्नपाशेन मणिना प्राणसुत्रेण प्रिश्निना। 
बध्नामि सत्यग्रन्थिना मनश्च हृदयं च ते॥
 [मैत्रिय ब्राo 1/3/8]
हे वर या वधु! जैसे अन्न के साथ प्राण, प्राण के साथ अन्न, तथा अन्न और प्राण का अंतरिक्ष के साथ सम्बन्ध हैवैसे तेरे ह्रदय, मान और चित्त को सत्य की गाँठ से बांधती/बांधता हूँ।

यदेत हृदयं तव तदस्तु हृदयं मम ।
यदिदं हृदयं मम तदस्तु हृदयं तव ॥
[मैत्रिय ब्राo 1/3/9]
हे वर या वधु! तेरी आत्मा या अन्त:करण मेरी आत्मा या अन्त:करण के तुल्य प्रिय हो और मेरी आत्मा, प्राण और मन तेरी आत्मा के तुल्य प्रिय रहे।

वेद के इन मन्त्रों से पुष्टि होती है कि गृहस्थ सुख के लिए पति-पत्नी का प्रेम आवश्यक है।

                     साभार ✍️ सुगम पथ
              ‌             शुभम् स्वस्ति
                       वयं राष्ट्रे जागृयाम

Friday, 17 January 2025

पतंगोत्सव २०२५ पर संदर्भित नाम पतंग संबंधी वेद मंत्र

                पतङ्ग / पतंग उड़ाने का मन्त्र 

                                  (1) 
         सबसे पहले पौराणिक मन्तर :--
 ॐ पतङ्गाय विद्महे, तन्तु धाराय धीमहि, तन्नो पतङ्ग प्रचोदयात् ॥
                                    🌸
यदि आप इस 👆मन्तर का जाप 14 जनवरी पतंगोत्सव के दिन सबेरे-सबेरे करेंगे तो आपकी पतंग उड़ती रहेगी । 
लेकिन
ध्यान रहे, मन्तर पढ़कर अन्त में भूल से भी यदि आपने "इदं न मम" कहा तो पतंग कट जायेगी इसलिए सावधान रहें । 
                        🍂       🌸      🍂
                                    (2)
                   अब पतंग का वैदिक मन्त्र :--

त्रि॒ꣳश॒द्धाम॒ विरा॑जति॒ वाक् *प॑त॒ङ्गाय॑* धीयते। प्रति॒ वस्तो॒रह॒ द्युभिः॑॥                       (यजुर्वेद ३/८)

       (यजुर्वेद का तृतीय अध्याय मन्त्र संख्या 8 )

👆इस मन्त्र का जाप, पाठ व हवन करने से पतंग अच्छी उड़ेगी, मजा आयेगा, 108 बार आहुति दें लेकिन सावधानी वही ऊपर वाली रखनी है । 
                                 🌸
                           😇😇😇😇
                           🤔🤔🤔🤔
                           😳😳😳😳

       ऊपर दिये दो में से एक पौराणिक मन्तर है और उसका रचनाकार/मन्तर-द्रष्टा मैं स्वयं हूँ । पौराणिकों ने ऐसे अनेक मन्तर कल्पना से बना लिए हैं जिसके कारण लोग भ्रम में रहते हैं, उनकी उलझन उन्हें किसी पण्डत से लुटने तक भी ले जाती है । अतः कृपया किसी भी प्रकार के मनुष्य के द्वारा बनाये मन्तर पर भरोसा न करें, सदा वेद मन्त्र ही पढ़ें, स्वाध्याय करें । 
🌸
दूसरा मन्त्र है यजुर्वेद का परन्तु ध्यान रहे :- वेद में कर्मकाण्ड नहीं है अतः इस मन्त्र के जाप-पाठ से हवन करने पर भी सिद्धि नहीं मिलनी । यजुर्वेद कर्म का वेद है, ज्ञान पा कर कर्म करने से सिद्धि मिलती है । धार्मिक विद्वानों का संग, शिल्पक्रिया सहित विद्याओं की सिद्धि, श्रेष्ठ विद्या-गुण का दान आदि का नाम यजुर्वेद है ।
🌸
तो अब प्रश्न है कि वेद मन्त्र में आये पतंग पद का अर्थ क्या है ??
उत्तर :-
महर्षि दयानन्द जी ने इस पतङ्गाय पद का अर्थ किया है "पतति गच्छतीति पतङ्गस्तस्मा अग्नये (धीयते) धार्यताम्" अर्थात् चलने चलाने आदि गुणों से प्रकाशयुक्त अग्नि के लिए / पतन-पातन आदि गुणों से प्रकाशित एवं गतिशील अग्नि के लिए |  
🌸
मनुस्मृति के श्लोक (1/21) के अनुसार 
“ संसार की सारी वस्तुओं के नाम, कर्मों के नाम का मूल-आदि-स्रोत वेद हैं। " वेद में से ले लेकर सारे पदार्थों वस्तुओं स्थानों का नामकरण हुआ क्योंकि उस-उसमें वह समान गुण था/है ।
वर्त्तमान में जो पतंग दिखती या उड़ती हैं उनका नाम इसलिए है क्यों की उसमें निम्न गुण हैं :-
१) चलने चलाने का गुण / पतन-पातन आदि गुण
२) गतिशील 
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तो आइये ! एक बार फिर मन्त्र पाठ करें 
🌸
त्रि॒ꣳश॒द्धाम॒ विरा॑जति॒ वाक् प॑त॒ङ्गाय॑ धीयते। प्रति॒ वस्तो॒रह॒ द्युभिः॑॥ ( यजुर्वेद ३/८)
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🌸
कृपया जब भी आप "पतंग" देखें या उड़ायें तो इस मन्त्र का स्मरण अवश्य कीजियेगा | अन्यों को बताइयेगा भी की ये जो पतंग आप उड़ा रहे हैं यह पतंग शब्द वैदिक है ....इस प्रकार छोटी छोटी बातों में भी आप वेद प्रचार कर सकते हैं, आवश्यक नहीं की आप व्याख्यान ही दें |
🌸
       मुझे प्रसन्नता है कि मैंने आपको इस पोस्ट के माध्यम से एक वेद मन्त्र पढ़वाया ।
सादर धन्यवाद🙏
                      साभार ✍️ विश्वप्रिय वेदानुरागी
                              वयं राष्ट्रे जागृयाम

Saturday, 11 January 2025

स्वादिष्ट चाय मसाला


                                  ॥ॐ॥
घर पर बना हुआ चाय का मसाला बनाने मिलावट के जहर से स्वयं को बचायें -

सामग्री 
3 बड़े चम्मच लौंग 
1/4 कप इलाइची 
1/2 कप काली मिर्च 
2 टुकड़े दालचीनी 
1/4 कप सौंठ 
1 चम्मच जायफल 
2 चम्मच सौंफ 
1 चम्मच सूखी तुलसी 
2 बड़ी इलायची 

विधि 
1.चाय का मसाला बनाने के लिए, एक चौड़े नॉन-स्टिक पॅन में लौंग, इलायची, काली मिर्च और दालचीनी डालकर 1 मिनट के लिए मध्यम आँच पर सूखा भुन लीजिए।
2.एक प्लेट में पलटकर उसे पूरी तरह से ठंडा होने के लिए एक तरफ रख दीजिए।
3. ठंडा होने के पश्चात उसमें सौंठ जायफल और तुलसी डालकर मिक्सर में मुलायम होने तक पीस लीजिए।
4.चाय का मसाला हवा-बंद डिब्बें मे भर कर रख दीजिए और आवश्यकतानुसार प्रयोग कीजिए।

महत्वपूर्ण सुझाव
हवा-बंद डिब्बें में भरकर रखा हुआ यह चाय का मसाला 4 महीनों तक ताज़ा रहता है।

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साभार 
वंदे मातृसंस्कृतम्