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Wednesday, 22 January 2025

शुभ - विवाह के मंगल अवसर पर वर-वधु प्रतिज्ञा

                            ॥ ॐ ॥
            इस मन्त्र वर-वधु प्रतिज्ञा कर रहे है कि :

समञ्जन्तु विश्वे देवाः समापो हृदयानि नौ ।
सं मातारिश्वा सं धाता समु देष्ट्री दधातु नौ ॥
 [ऋग्वेद 10.85.47]
यज्ञशाला में बैठे हुए विद्वान लोगों! हम प्रसन्नता पूर्वक गृहस्थाश्रम में साथ रहने के लिए एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं। हम दोनों के ह्रदय जाल के समान शांत और मिले रहेंगे; जैसे प्राणवायु सबको प्रिय है वैसे हम दोनों एक-दूसरे में सदा प्रसन्न रहेंगे; जैसे सबमें स्थित परमात्मा सारे जगत को धारण करता है वैसे ही हम दोनों एक-दूसरे को धारण करेंगे; जैसे उपदेशक श्रोताओं से प्रीति करता है वैसे हम दोनों की आत्मा एक-दूसरे के साथ दृढ़ प्रेम को धारण करे।

ओम् गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः ‌
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं तवादुर्गार्हपत्याय देवाः ॥ [ऋग्वेद 10.85.56]
हे वरानने! मैं ऐश्वर्य और सुसंतानादि सौभाग्य की वृद्धि के लिए तेरे हाथ को ग्रहण करता हूँ। तू मुझ पति के साथ जरावस्था को सुखपूर्वक प्राप्त हों। तथा; हे वीर! मैं सौभाग्य की वृद्धि के लिए आपके हाथ को ग्रहण करती हूँ। आप मुझ पत्नी के साथ वृद्धावस्था पर्यंत प्रसन्न ए़वं अनुकूल रहिये। आपको मैं और मुझे आप आजसे पति-पत्नी भाव से प्राप्त हुए हैं। परमात्मा और सभामंडप में। बैठे हुए विद्वान लोग गृहस्थाश्रम-कर्म के अनुष्ठान के लिए मुझे तुमको देते हैं।  

अघोरचक्षुरपतिघ्न्येधि शिवा पशुभ्यः सुमनाःसुवर्चाः।
वीरसूर्देवृकामा स्योना शं नो भव द्विपदेशं चतुष्पदे ॥ [ऋग्वेद 10/85/44]
परमात्मा की कृपा से हे वरानने! तू पति से विरोध न करने वाली और प्रिय दृष्टी हो। मंगलकारी, सब पशुओं को सुखदाता, पवित्र अंत:करण युक्त, सुन्दर शुभ गुण-कर्म-स्वाभाव और विद्या से सुप्रकाशित, उत्तम वीर पुत्रों को उत्पन्न करनेहारी, परमात्मा की उपासना करानेहारी, हमारे लोगों और गे आदि पशुओं को सुख देने वाली हो।

                  ( ये तीनों ऋग्वेद के मन्त्र हैं। )

अब अथर्ववेद पति-पत्नी को परस्पर प्रेम निर्वाह के लिए
                    इस प्रकार प्रेरणा देता है:-

भगस्ते हस्तमग्रभीत् सविता हस्तमग्रभीत् ।
पत्नी त्वमसि धर्माणाहं गृहपतिस्तव ॥
[अथर्ववेद 14/1/51]
वर वधु से कहता है कि ऐश्वर्ययुक्त! मैं तेरे हाथ को ग्रहण करता हूँ और धर्मयुक्त मार्ग में प्रेरक मैं तेरे हाथ को ग्रहण करता हूँ। तू धर्म से मेरी पत्नी है और मैं धर्म से तेरा गृहपति हूँ।

ममेयमस्तु पोष्या मह्य त्वदाद् बृहस्पति: ।
मया पत्या प्रजावति सं जीव शरदः शतम् ॥
[अथर्ववेद 14/1/52]
बृहस्पति (परमात्मा) ने तुझको मुझे दिया है कि तू जगत भर में मेरी पोषण कारी पत्नी हो। तू मुझ पति के साथ सौ वर्ष तक सुखपूर्वक जीवन धारण कर।

त्वष्टा वासो व्यदधाच्छुभे कं बृहस्पते: प्रशिषा कविनाम्।
तेनेमन नहीं सविता भगश्च सूर्यामिव परि …..॥
[ अथर्ववेद 14/1/53 ]
हे शुभानाने! परमात्मा और विद्वानों की शिक्षा से हम दम्पति होते हैं। तू मेरी प्रसन्नता के लिए सुन्दर वस्त्र और आभूषण तथा सुख को प्राप्त हो। हम दोनों की इच्छा को परमात्मा सिद्ध करे। जैसे इस नारी को ईश्वर संतान से सुशोभित करे, इसी प्रकार सूर्य की किरण के समान तुझको मैं भी सुशोभित करूँ।

अहं विष्यामि मयि रूपमस्या वेददित पश्यन्मनस: कुलायम्।
न स्तेयमद्मि मनसोदमुच्ये स्वयं श्रथ्नानो वरुणस्य पाशान्॥
[अथर्ववेद 14/1/58]
जैसे मान से कुल की वृद्धि को देखता हुआ मैं इस तेरे रूप को प्रीति से प्राप्त और इसमें प्रेम द्वारा व्याप्त होता हूँ, वैसे तू मेरी वधु मुझमें प्रेम से व्याप्त होकर अनुकूल व्यवहार को प्राप्त होवे। जैसे मैं उत्तम पदार्थों का वधु से चोरी से भोग नहीं करता हूँ वैसे ही यह वधु भी किया करे।

वेद मन्त्रों की ये भावनाएँ गुह्यासूत्रों में भी पाई गई है:-

यदैसि मनसा दूरं दिशोऽनुपवमानो वा ।
हिरण्यपर्णो वैकर्ण: स त्वा मन्मनसां करोतु ॥
[पाराoकाo 1 व 4]
जैसे पवित्र वायु और तेजोमय जल आदि को किरणों से ग्रहण करनेवाला सूर्य दुरस्थ पदार्थो और ...।

मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनु चितं ते अस्तु |
मम वाचमेकमना जुषरच प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम् || [पाराoकाo 1 -8/8]
हे वधु! तेरे अन्त:करण और आत्मा को मैं अपने व्रत के अनुकूल धारण करता हूँ। मेरे चित्त के अनुकूल सदा तेरा चित्त रहे, मेरी वाणी तू एकाग्रचित्त से सेवन करे। परमात्मा तुझे मेरे अनुकूल रखे।

अन्नपाशेन मणिना प्राणसुत्रेण प्रिश्निना। 
बध्नामि सत्यग्रन्थिना मनश्च हृदयं च ते॥
 [मैत्रिय ब्राo 1/3/8]
हे वर या वधु! जैसे अन्न के साथ प्राण, प्राण के साथ अन्न, तथा अन्न और प्राण का अंतरिक्ष के साथ सम्बन्ध हैवैसे तेरे ह्रदय, मान और चित्त को सत्य की गाँठ से बांधती/बांधता हूँ।

यदेत हृदयं तव तदस्तु हृदयं मम ।
यदिदं हृदयं मम तदस्तु हृदयं तव ॥
[मैत्रिय ब्राo 1/3/9]
हे वर या वधु! तेरी आत्मा या अन्त:करण मेरी आत्मा या अन्त:करण के तुल्य प्रिय हो और मेरी आत्मा, प्राण और मन तेरी आत्मा के तुल्य प्रिय रहे।

वेद के इन मन्त्रों से पुष्टि होती है कि गृहस्थ सुख के लिए पति-पत्नी का प्रेम आवश्यक है।

                     साभार ✍️ सुगम पथ
              ‌             शुभम् स्वस्ति
                       वयं राष्ट्रे जागृयाम

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