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Wednesday, 8 January 2025

मस्तिष्क की नियमावली (Manual Of Mind)

                                 ॥ॐ॥
                         ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ॥
                       ( Manua Of Mind )

          यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
          ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥
                                              ( गीता ४/३७ )
   अर्थात -  जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है। उसी तरह हे अर्जुन ज्ञान रूपी अग्नि भौतिक कर्मों के फल को भस्म कर देती है।

        अब यह बात शब्द के रूप में सबको समझ में आ जाती है। परंतु कृष्ण कह क्या रहे हैं इसे समझना दुरूह है। 
     "ज्ञानाग्नि" 
अब यह क्या बला है ? कोई समझाए तो समझाए कैसे ?

     समस्त कर्मों के परिणाम होते हैं यह तो सर्वकालिक सत्य है। कर्मों के परिणाम के कारण ही जन्म जन्मांतर का बंधन निर्मित होता है। परंतु यह कौन सी आग है जिसे भस्म करने की बात योगेश्वर श्री कृष्ण कर रहे हैं? 

     चक्रों के अनुसार आज्ञा चक्र होता है दो भृकुटियों के मध्य में। मेडिकल साइंस के अनुसार वहीं पर prefrontal cortex होता है जिससे समस्त कॉग्निटिव ( संज्ञानात्मक ) या perceptional विचारों का जन्म होता है। अर्थात सोच विचार, गुना भाग, उचित अनुचित, भूत भविष्य सब का सब मस्तिष्क के उसी हिस्से में चलता है। 

       परंतु हमें यह पता नहीं चलता या संभवत: कभी कभार यह पता चलता है कि हम सोच क्या रहे हैं?
है न यह आश्चर्य की बात।

       कभी ध्यान दिया आपने इस बात पर ? इसे अचेतन मन कहा जाता है अध्यात्म की भाषा में। हमारे जीवन का लगभग 99 प्रतिशत भाग अचेतन अवस्था में गुजरता है। 

      कृष्ण कह रहे हैं कि यदि आप चैतन्य रहते हैं और आपको यह पता चलता रहता है कि आपके भौतिक शरीर और मानसिक चेतना में क्या क्या चल रहा है, तो मात्र उसे देखने या जानने से समस्त कर्मों के फलों का दहन हो जाता है जैसे आग में कोई लकड़ी डालने से उकसा दहन हो जाता है।

    पतंजलि ने इसे कहा हैं " स्वाध्याय " । 
यह नियम का अंग है । नियम पांच हैं - 
       शौच, संतोष, तप स्वाध्याय, ईश्वर प्रणनिधान। 

      "स्वाध्याय"  अर्थात अपने मन में क्या चल रहा है निरंतर उसको देखते रहना। 
       मानसिक क्लेशों से घिरे इस संसार में इससे बड़ा उपयोगी कोई मंत्र नहीं है। मेरी बात पर विश्वास न करना। करके देखना। 
        जब कभी भी परेशान हो किसी बात को लेकर, क्लेषित हो किसी कारण वश। आंख मूंदकर बैठ जाओ। और देखो क्या चल रहा है तुम्हारे मन में। मात्र देखो, उसको न छेड़ो न उसका विश्लेषण करो, न उसके बारे में गलत सही का निर्णय लो। मात्र देखो। 
        परेशानी तो खत्म नहीं होगी, क्योंकि संसार में चुनौतियां हैं जिनको तुम्हें जीतना ही है। इसी की दौड़ है जीवन भर में। परंतु उन परेशानियों से परेशान होना कम हो जायेगा। या समाप्त हो जायेगा। इतना निश्चित है। 

                   साभार - ✍️भगवद्गीता समूह 
                          वयं राष्ट्रे जागृयाम

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