**दमा चर्म रोगों आंतों व पाचनतंत्र के अल्सर व कोलाइटिस तथा बालों के लिए चमत्कारी औषधि है छोटी दूधी **
एक औषधीय पौधा है जिसमें अनेकों पोषक तत्व और औषधीय गुण पाए जाते हैं। यह विटामिन सी, टैनिन, फ्लेवोनोइड्स, विटामिन ए, विटामिन के, और कैल्शियम जैसे पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत है. इसके अलावा, इसमें यूफोरबिन ए, बी, सी, डी, हेप्टाकोसेन, शिकमिक एसिड, कोलीन, कैम्फोल, एन-नोनाकोसेन, टिनियाटॉक्सिन, क्वेरसिटॉल जैसे यौगिक भी पाए जाते हैं,
इसका इस्तेमाल खून को साफ, डायरिया, डिसेंटरी, पेट फूलना, कब्ज, पूरानी खांसी के इलाज के लिए किया जाता आ रहा है। इसमें कई ऐसे पदार्थ होते हैं, जो पेनफुल ब्लीडिंग पाइल्स, कफ, स्किन रोग और पैरासिटिक इंफेक्शन में भी यह बेहद उपयोगी है। इसमें एप्रोडिसिएक और एंटी पायरेटिक प्रॉपर्टीज होती हैं, जिस वजह से इसे क्रोनिक कोल्ड, मेंस्ट्रूअल डिसऑर्डर, यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस पौधे क पीसकर हेयर ग्रोथ के लिए सिर पर लगाया जाता है।
संस्कृत-लघु दुग्धिका, गोरक्षदुग्धी, ताम्रदुग्धी, रसायनी, मृताजीवी, राजक्षव, क्षीरावी, क्षीरिका, शीता, स्वादुपुष्पिका; हिन्दी-छोटी दुद्धी; कन्नड़-केम्पुनन हक्की गुजराती-दोधक नानही दुधेली तमिल-चीन्मम्पटच्यौसी सित्रपलादि तेलुगु-मनुबला कहा जाता है
छोटी दूधी, जिसे यूफोरबिया थाइमिफोलिया (Euphorbia thymifolia) भी कहा जाता है, एक छोटा, रेंगने वाला पौधा है जो आमतौर पर नम जगहों पर पाया जाता है. इसकी पहचान इसके छोटे, अंडाकार, विपरीत पत्तों और तने से निकलने वाले सफेद दूधिया रस से की जा सकती है जो तोड़ने पर बूंद के रूप में तने से निकलता है
घास को सुखाकर चूर्ण बनाकर 1 से 3 ग्राम तक सेवन करना होता है. इस घास को अस्थमा प्लांट भी कहते हैं. इससे अस्थमा के रोगी को काफी फायदा मिलता है. अस्थमा ब्रोंकाइटिस का सबसे बिगड़ैल रूप है इस प्लांट में एंटी एलर्जिक एंटी इंफलामेटरी गुणों का खजाना होता है जिससे यह फेफड़ों से संक्रमण और सूजन को उतार देता है एलर्जिक रिएक्शन रोकता है र धीरे धीरे दमा रोग समाप्त हो जाता है
पेट में कीड़े होने पर कई प्रकार की समस्या का सामना करना पड़ सकता है. ऐसी अवस्था में छोटी दूधी का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसमें एंथेलमिंटिक्स गुण होता है. एंथेलमिंटिक्स एक प्रकार की दवा होती है, जो शरीर में परजीवी कीड़ों को मारकर या जीवित ही बाहर निकाल देती है.
एंटी-बैक्टीरियल व लैक्सेटिव गुण होने के कारण छोटी दूधी का सेवन पाचन संबंधी रोगों में राहत दिलाता है. यह कब्ज व पेट से जुड़ी अन्य समस्या को ठीक करने में मदद कर सकती है.
इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट एंटी इंफलामेटरी गुण फ्री-रेडिकल्स को दूर करके इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में मदद करते हैं। ये एंटीऑक्सीडेंट फ्री-रेडिकल्स को बेअसर कर कोलन कैंसर पनपने से रोकते हैं तथा अल्सरेटिव कोलाइटिस में भी जबरदस्त लाभ देते हैं
छोटी दुद्धी में उपस्थित एंटी-इनफलामेटरी गुण सूजन से निजात दिलाने में मददगार है।
दूधी घास के पत्तों को सुखाकर इसके 1 ग्राम चूर्ण को पानी के साथ देने पर बच्चों के पेट में कीड़े मर जाते हैं. बच्चों के अतिसार (दस्त) रोकने के लिए इसका उपयोग किया जाता है. 2 ग्राम दूधी की जड़ को पान में रखकर चूसने से बच्चों का हकलाना बंद हो सकता है.
महिलाओं में माहवारी से संबंधित समस्या में हरी दूधी को छाया में सुखाकर कूटकर देने से मासिक स्राव नियंत्रित होता है। खूनी दस्त और आंव में भी दूधी से काफी लाभ मिलता है। महिलाओं में होने वाली लिकोरिया (श्वेतप्रदर) की समस्या में भी दूधी काफी लाभ देती है। इसकी जड़ को साफ कर 3 से 5 ग्राम की मात्रा में छानकर दिन में दो से तीन बार देने से श्वेतप्रदर की समस्या में काफी लाभ मिलता है।
दूधी घास की चाय पीने या इसके पाउडर का सेवन करने से शरीर में रक्त संचार बेहतर होता है, जिससे डायबिटीज रोगियों को पैरों में दर्द, थकान और कमजोरी जैसी समस्याओं में राहत मिलती है। इस घास में मौजूद एंटी-डायबिटिक प्रॉपर्टीज ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। आयुर्वेद में इसे एक उपयोगी हर्ब माना जाता है, जो मधुमेह के लक्षणों को नियंत्रित करने में कारगर है। दूधी घास का सेवन डायबिटीज रोगियों के लिए अत्यंत लाभकारी होता है।
छोटी दूधी पञ्चाङ्ग के स्वरस तथा कनेर के पत्तों के रस को मिलाकर सिर की गंज पर घिसने से बाल सफेद होना बंद होकर गंजापन दूर होता है।
मुहांसों और दाद पर इसका दूध लगाने से आराम होता है। ताजी दूधी या सूखी हुई दूधी 20 ग्राम लेकर बारीक पीसकर इसमें 10 ग्राम गाय का मक्खन घोल लें। इसका लेप खुजली के स्थान पर करें और चार घण्टे बाद साबुन से धो डालें। कुछ दिन के सेवन से ही सब प्रकार की खुजली दूर हो जाती है।
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डॉ० जयवीर सिंह
अवधूत आयुर्विज्ञान संस्थान
पिंडारा फ्लाईओवर गोहाना रोड नजदीक राजमहल पैलेस
जींद हरियाणा
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