Pages

Tuesday, 19 August 2025

क्या अशोक सचमुच महान थे ?

              क्या अशोक सचमुच महान थे ?

इतिहास की किताबों के अनुसार अशोक शुरू में एक क्रूर शासक थे लेकिन कलिंग युद्ध के बाद शांति के समर्थक बन गए। युद्ध के मैदान में क्षत-विक्षत पड़े हजारों शवों को देखकर वे बहुत व्यथित हुए। वे सैनिकों और उनके प्रियजनों का दर्द सहन नहीं कर सके। और शांति की प्यास बुझाने के लिए उन्होंने बौद्ध धर्म की शरण ली। अहिंसा और सहिष्णुता को अपना आदर्श माना और जीवन भर धम्म का प्रचार किया। इतिहासकारों ने अशोक को "महान" कहा और प्राचीन भारत के सबसे शक्तिशाली सम्राटों में से एक के रूप में प्रचारित किया।
क्या यह सब सच है? क्या प्राथमिक स्रोत भी यही बताते हैं? क्या यह बात सत्यापित है?
इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए आधुनिक इतिहासकारों की पुस्तकों के बजाय शिलालेखों और समकालीन लोगों के वृत्तांतों का सहारा लिया जाना उचित है।

शिलालेखों से स्पष्ट है कि अशोक ने कलिंग युद्ध से बहुत पहले ही बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। यहाँ तक कि बौद्ध ग्रंथों में भी कलिंग युद्ध का अशोक से कोई संबंध नहीं बताया गया है। इसके कारण आध्यात्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक थे। चंद्रगुप्त का राजपरिवार जैनियों के प्रभाव में था। बिंदुसार आजीवकों से प्रभावित था। ब्राह्मण प्रशासन का हिस्सा थे लेकिन बौद्ध समाज में प्रभाव बढ़ा रहे थे। बिंदुसार की मृत्यु के बाद जैन, ब्राह्मण, आजीवक अशोक के समर्थन में नहीं थे। अशोक मौर्य सिंहासन का उत्तराधिकारी नहीं था। लेकिन अशोक को हर हाल में सत्ता चाहिए था। सत्ता पाने के लिए अशोक ने बौद्ध भिक्षुओं की मदद ली। बदले में उसने बौद्ध धर्म के प्रभाव को बढ़ाने में उनकी मदद करने का वादा किया। 273 ईसा पूर्व में जब युवराज आक्रमणकारियों से लड़ने के लिए बाहर गए हुए थे अशोक ने पाटलिपुत्र पर कब्ज़ा कर लिया। यूनानी भाड़े के सैनिकों के साथ उसने असली उत्तराधिकारी की हत्या कर दी, उसे ज़िंदा जला दिया और उसके 99 भाइयों को भी मार दिया। केवल अशोक का सगा भाई तिस्स ही जीवित बचा। अब सवाल कि क्या अशोक कलिंग युद्ध के बाद खेद प्रकट करते हुए बौद्ध बने? तो ऐसे कुछ शिलालेख हैं जिनमें अशोक ने कलिंग के युद्ध पर खेद व्यक्त किया है। लेकिन ये ओडिशा से सैकड़ों किलोमीटर दूर मगध के पास है। कलिंग में ऐसा कोई शिलालेख नहीं है जो इस बारे में बताता हो। हालाँकि कलिंग में भी अशोक के कई शिलालेख हैं। कलिंग पर लगभग 261 ईसा पूर्व आक्रमण हुआ था। ऐसा लगता है कि युद्ध के बाद भी कलिंग को स्थानीय लोगों को कभी नहीं लौटाया गया। क्योंकि अगर वास्तव में अहिंसा की रास्ते पर चल पड़े थे तो यह करना असंभव नहीं था। मगध के शिलालेख नागरिकों की उनके प्रति धारणा को सुधारने का एक छद्म रूप प्रतीत होता है। अशोक ने बौद्ध धर्म को कलिंग के बाद नहीं, बल्कि युद्ध से पहले अपनाया था। अशोक का दरबार विभाजित था- जैन, आजीवक और वैदिक में। अशोक का धर्म परिवर्तन राजनीतिक अवसरवाद था, नैतिक परिवर्तन नहीं।

अशोक ने मृत्युदंड को कभी समाप्त नहीं किया। अशोक ने अपने जीवन के अंत तक एक विशाल सेना बनाए रखा। उसने पड़ोसी राज्यों के साथ-साथ अन्य धार्मिक समुदायों के लिए भी भयावह शिलालेख जारी किए हैं।
कलिंग के बाद अशोक ने बड़े पैमाने पर धार्मिक नरसंहार किए-
• बंगाल में 18,000 आजीवकों का वध
• व्यंग्य के लिए एक जैन परिवार को ज़िंदा जला दिया गया
• अशोक ने एक जैन का सिर सिर्फ़ इसलिए काट दिया क्योंकि उसने महावीर के सामने बुद्ध को नमस्कार मुद्रा में चित्रित किया था।
• अशोक ने प्रत्येक जैन व्यक्ति के लिए एक स्वर्ण मुद्रा की पेशकश की, जब तक कि किसी ने उनके अपने भाई तिस्सा को जैन समझकर मार नहीं डाला तभी नरसंहार रुका।

सावरकर ने अपनी पुस्तक "इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठ" में लिखा कि कैसे अशोक के बौद्ध अतिवाद ने सैन्य मनोबल को नष्ट कर दिया। उत्तर भारत एक विशाल मठ में बदल गया। योद्धा भिक्षु बन गए। जब डेमेट्रियस के नेतृत्व में यूनानियों ने आक्रमण किया (लगभग 180 ईसा पूर्व) तो किसी ने भी इसका विरोध नहीं किया। सम्राट बृहद्रथ भी नहीं।
अशोक की मृत्यु के 10 वर्षों के भीतर, कलिंग और आंध्र जैसे वैदिक राज्यों ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। जैन राजा खारवेल के नेतृत्व में कलिंग फिर से उठ खड़ा हुआ। उसने एक विशाल सेना तैयार की और बाद में मगध को पराजित कर पाटलिपुत्र से जैन मूर्तियाँ पुनः प्राप्त की। भुवनेश्वर के पास खारवेल के हाथीगुम्फा शिलालेख में दावा किया गया है: "मैंने मगध के राजा को पराजित किया और कलिंग से लूटी गई चीज़ों को वापस लाया।"

संदर्भ: "मंथन का सागर: हिंद महासागर ने मानव इतिहास को कैसे आकार दिया" पुस्तक - संजीव सान्याल।
साभार - Avnish Kumar 
https://www.facebook.com/share/1NVA7qYgts/
                  वयं राष्ट्रे जागृयाम 

No comments:

Post a Comment