तन्त्र प्रयोगों में कस्तूरी का एक विशेष स्थान है और ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं होगा जो कि इसके विषय में जानता न हो परन्तु यह असली मिलती ही नहीं। इसी कारण तन्त्र प्रयोग करने पर इससे मिलने वाले लाभ प्रश्न ही बने रहते हैं।
कस्तूरी प्रायः सर्वत्र उपलब्ध है और कस्तूरी कहने मात्र से पन्सारी दे देता है। यह असली है या नकली ? यह प्रश्न बना ही रहता है क्योंकि इसके विषय में बहुत अधिक किसी को मालूम नहीं रहता और न ही कोई बताता है।
कस्तूरी एक विशेष प्रकार के हिरण के निश्राववाही का सूखा हुआ रस है। यह विशेष प्रकार का हिरण लगभग आठ हजार फुट की ऊँचाई पर पाया जाता है। मुख्यतः यह मृग हिमालय, दार्जिलिंग, नेपाल, आसाम, चीन तथा सोवियत देश में अधिकता से पाया जाता है। कस्तूरी नामक कीमती औषधि केवल पुरुष जाति के हिरण में ही बनती है। इसकी महक की दीवानी होकर स्त्री जाति की हिरणी पुरुष हिरण के पास आकर दीवानेपन में उससे विषय-भोग करती है। कस्तूरी का पूर्ण निर्माण हो जाने के पश्चात हिरण के शरीर में लगभग एक महीने तक ही रहती है। इसी एक महीने में हिरण को पकड़ करके कस्तूरी प्राप्त की जाती है। इस एक महीने के पश्चात कस्तूरी प्राप्त नहीं होती। हिरण के बच्चों में कस्तूरी नहीं होती। इनके बच्चे जब दो बर्ष के हो जाते हैं तब लगभग डेढ़ से तीन तोला तक कस्तूरी बनती है। यह कस्तूरी इस हालत में होती है कि इसका प्रयोग नहीं किया जाता। जब हिरण पूरी तरह जवान हो जाता है तब इसमें लगभग डेढ़ औंस से लेकर कम-से-कम दो औंस तक कस्तूरी पायी जाती है। इस विवरण के अलावा भी प्रत्येक हिरण में एक से डेढ़ इन्च के व्यास वाली गोल या चौकोर थैली में बन्द होती है। इस थैली के ऊपर का धरातल कुछ चिकना तथा चपटा होता है। इसी पर कुछ सख्त बाल होते हैं। इस थैली का थोड़ा-सा मुख रहता है। कुछ विद्वानों का विचार है कि कस्तूरी की ही भाँति का कुछ है जो अन्य जानवरों से भी प्राप्त किया जाता है।जैसे कि
एक साँड होता है जिसे कि ओबीबस मस्केटस कहते हैं। इस साँड के सारे शरीर से कस्तूरी की महक आती है।
एक बत्तख होती है जिसे कि अनास मस्काटा कहते हैं। इसमें कस्तूरी की तीव्र महक पायी जाती है।
एक बकरा होता है जिसे कि कपरा आइवेक्स कहते हैं। इसके रक्त से कस्तूरी की महक आती है।
एक और हिरण होता है जिसे कि एन्टीकोप डोर्क्स के नाम से जानते हैं। इसके रक्त से कस्तूरी की तीव्र महक आती है।
एक मगरमच्छ होता है जिसे कि क्रोको डिप्लस वेल्ोरिस कहते हैं। इसके शरीर से तो कस्तूरी की शानदार महक आती है।
उपरोक्त विवरण से आप समझ रहे होंगे कि यदि इनका रक्त सुखा करके बेचा जाय तो कस्तूरी कही जा सकती है जबकि कस्तूरी के अन्य गुण इनमें नहीं होते हैं।
बाजार में मुख्यतः तीन भाँति की कस्तूरी आती है-
१. रूस की कस्तूरी,
२. आसाम की कस्तूरी (इसे कामरूप कस्तूरी भी कहते हैं),
३. चीन की कस्तूरी।
आइये कस्तूरी पहचाने
एक गिलास में पानी भर करके कस्तूरी का एक दाना इसमें गिरा दें। यह दाना पानी में जाकर गिलास के तले पर जाकर बैठ जाये और गले या ढीला न हो तो कस्तूरी को असली समझें।
एक अंगीठी में कोयले दहकायें। कुछ अंगारे लेकर कस्तूरी का एक दाना अंगारे के ऊपर डाल दें। यदि यह कस्तूरी का दाना जलकर राख हो जाये तो कस्तुरी नकली जानना चाहिये। यदि कस्तूरी का दाना अंगारे पर पिघल करके बुलबुले छोडे तो कस्तूरी को असली जानें।
एक धागे को हींग से भिंगो करके तर कर लें। कस्तूरी को लेकर इसके बीच से धागा गुजार करके निकालें। यदि हींग की महक बनी रहे तो कस्तूरी को नकली समझें। मेरे विचार से इस प्रयोग को करने से असली कस्तूरी की परख नहीं होगी। क्योंकि कस्तूरी जब बाजार में बिकती है तब अपनी महक खो देती है और जब महक न होगी तो हींग की महक को मारेगा कौन ? यदि आपको कोई महकती हुई कस्तूरी दे तो आप यह प्रयोग करके असल नकल का भेद जान सकते हैं।
एक पदार्थ होता है जिसका कि नाम ट्रिनीट्रोब्यूटिल टोलबल है। इस पदार्थ की महक कस्तूरी की भाँति होती है और यह महक अधिक समय तक टिकती है।
कस्तूरी भारी होती है।
कस्तूरी छूने में चिकनी होती है।
कस्तूरी कपड़े में रखने से कपड़ा पीला हो जाता है।
कस्तूरी प्राप्त करने के लिये हिरण को मार करके उसकी नाभि काट लेते हैं। इस हिस्से को कस्तूरी नाभा कहते हैं।
कस्तूरी मक्का के चून की भाँति होती है। यह तिलों की भाँति भी होती है। यह कुलथ के बीज की भाँति भी होती है। यह मटर के दाने के भाँति भी होती है। कहीं-कहीं पर यह इलायची के दानों की भाँति पायी जाती है।कस्तूरी को तन्त्र प्रयोगों में अनगिनत कार्यों में लिया जाता है। मन्त्र लिखने के लिये इसकी परम आवश्यकता पड़ती है।
नोट 🚫 उपर्युक्त वनस्पति और उसके प्रयोग का मेरा कोई निजी अनुभव नहीं है क्योंकि ये मुझे प्राप्त नहीं हुई,अतः किसी भी सज्जन को इनके प्रयोग करना हो स्वयं कीजिये कितने प्रमाणिक है या नहीं
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श्री नाथजी गुरूजी
की चरण कमल पादुका
को आदेश
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