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Friday, 27 June 2025

शास्त्र ही कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्धारण में प्रमाण है।

                                ॥ॐ॥
      "तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ"
 (शास्त्र ही कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्धारण में प्रमाण है)।

         शास्त्रों में वर्णित कथाओं की समीक्षा या उन पर निर्णय केवल आधुनिक मानवीय दृष्टिकोण से नहीं लिया जा सकता। इसके लिए शास्त्रीय दृष्टिकोण आवश्यक है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई युवक किसी कन्या से संभोग करता है, तो उसे व्यभिचार माना जाता है। लेकिन यदि वही युवक वैदिक मंत्र-संस्कार द्वारा उस कन्या से विवाह कर संभोग करता है, तो यह व्यभिचार नहीं, बल्कि धर्मसम्मत व्यवहार माना जाएगा। शास्त्रों में श्रद्धा रखने वाले लोग इसे व्यभिचार नहीं मानेंगे।

यहाँ विचारणीय है कि कन्या और युवक वही हैं, संभोग में भी कोई अंतर नहीं है, फिर भी विवाह से पहले किया गया संभोग व्यभिचार समझा जाता हैं तथा अनुकरणीय नहीं माना जाता, जबकि मंत्र-संस्कार के बाद वही व्यवहार धर्मसम्मत और अनुकरणीय हो जाता है। दोनों स्थितियों में व्यवहार (संभोग) समान है, किंतु एक को अन्याय और दूसरे को न्याय माना जाता है। इसका कारण क्या है?

इसका कारण हैं कि - शास्त्रानुमोदित व्यवहार धर्म है, और शास्त्रनिषिद्ध व्यवहार त्याज्य है। अतः यहाँ स्पष्ट होता है कि लोक की अपेक्षा शास्त्र अधिक बलवान है। आधुनिक शारीरिक विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युवक और कन्या की शारीरिक जाँच कर लें, तो दोनों स्थितियों में कोई अंतर नहीं मिलेगा। उनके गुप्तांगों की जाँच से भी कोई भेद नहीं पाया जाएगा। विज्ञान या शारीरिक विज्ञान के नियमों से इसे व्यभिचार सिद्ध नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में आप आधुनिक विज्ञान को मानेंगे या शास्त्र को? अतः यह सिद्ध होता है कि लोक से शास्त्र अधिक बलवान है। 

आगे विचार करें कि गृहस्थ आश्रम स्वीकार करने वाला युवक मंत्र-संस्कार द्वारा विवाह के पश्चात कन्या से संभोग करता है, तो यह धर्मसम्मत व्यवहार है। लेकिन यदि कोई सन्यासी मंत्र-संस्कार द्वारा विवाह कर कन्या से संभोग करता है, तो यह धर्मसम्मत नहीं, बल्कि दुष्ट व्यवहार माना जाएगा। यहाँ मंत्र-संस्कार होने के बावजूद यह अधर्म क्यों है? क्योंकि शास्त्रों में सन्यासी के लिए विवाह और संभोग का निषेध है। ऐसा करने वाले को शास्त्रों में "वांताशी" (उगले हुए को खाने वाला) कहा गया है, और यह व्यवहार अनुचित माना जाता है। अतः कर्तव्य और अकर्तव्य, धर्म और अधर्म में शास्त्र की स्वतःप्रमाणता सिद्ध होती है। भगवान श्रीकृष्ण का यह कथन प्रसिद्ध है: "तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ" (शास्त्र ही कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्धारण में प्रमाण है)।

अब यदि शास्त्र ही परम प्रमाण है, और शास्त्रीय व्यवहार ही धर्म है, तो महर्षि पाराशर जैसे ऋषियों का मत्स्यगंधा आदि कन्याओं से समागम, यदि शास्त्रानुमोदित हो, तो उसे व्यभिचार नहीं माना जाएगा।

तपस्वियों की तपस्या सभी दोषों का नाश करती है। विशिष्ट तप, अयोनिज उत्पत्ति, या अयोनिज उत्पत्ति में समर्थ ऋषियों और देवताओं को दोष नहीं लगता। उनके लिए नियम भिन्न हैं, और उनके कार्य साधारण मनुष्यों के लिए अनुकरणीय नहीं होते। शास्त्रों में कहा गया है: "धर्मव्यतिक्रमो दृष्टः ईश्वराणां च साहसम्। तेजीयसां न दोषाय वह्नेः सर्वभुजो यथा" अर्थात् तेजस्वी अग्नि विष्ठा को भी ग्रहण कर लेती है, सूर्य और चंद्र पंक से भी रस ग्रहण करते हैं, किंतु वे दूषित या अपवित्र नहीं होते। रामचरितमानस में इसे सरलता से कहा गया: "भानु कृशानु सर्व रस खाही, तिन्ह कह मंद कहत कोउ नाही। सुभ अरु अशुभ सलिल सब बहई, सुरसरि कोउ अपुनीत कहई।" अर्थात् तेजस्वी ऋषि-मुनियों का धर्मव्यतिक्रम देखने में आए, तो भी उन्हें दोष नहीं लगता, किंतु साधारण मनुष्यों को ऐसा नहीं करना चाहिए। शास्त्र यह भी कहते हैं: "नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्वनीश्वरः। विनश्यत्याचरन् मौढ्याद् यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम्।" अर्थात् भगवान शिव ने विषपान किया, और उन्हें कोई हानि नहीं हुई, किंतु साधारण मनुष्य ऐसा करने पर हानि को प्राप्त होता है। आपस्तंब धर्मसूत्र में भी कहा गया: "दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च पूर्वेषाम्।" तुलसीदास जी ने इसे सरल शब्दों में कहा: "समरथ को नहि दोष गोसाई, रवि पावक सुरसरि की नाई।"

महर्षि पाराशर का ही उदाहरण लें। वे दिव्य बल से संपन्न ऋषि थे। उनका मत्स्यगंधा से संयोग भी दिव्य विधि से हुआ। यही कारण है कि मत्स्यगंधा का कन्यात्व दूषित नहीं हुआ, उसकी कौमार्यता बनी रही। यह महाभारत में स्पष्ट कहा गया है। इसी प्रकार, कुन्ती का कौमार्य भी भंग नहीं हुआ, क्योंकि वहाँ भी मानवीय संभोग नहीं, बल्कि दिव्य-संयोग हुआ था।

इस प्रकरण को पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि मत्स्यगंधा को ऋषि के तपोबल पर विश्वास था। उसे विश्वास था कि ऋषि के कहने से दिव्य संयोग के कारण उसका कन्यात्व नष्ट नहीं होगा, न ही कोई दोष लगेगा। इसलिए वह सहमत हुई। यदि यह साधारण मानवीय संभोग होता, तो उसे गर्भवती होने, नौ माह तक गर्भ धारण करने, और संसार में निंदित होने की चिंता होती। लेकिन क्या ऐसा हुआ? नहीं, क्योंकि मत्स्यगंधा ऋषि के तपोबल को जानती थी।

महाभारत में इस प्रकरण में पाराशर ऋषि के लिए "अद्भुतकर्मा" (लोकोत्तर कार्य करने वाले), "भगवान", "प्रभु", और "परमऋषि" जैसे विशेषण प्रयुक्त हुए हैं। शास्त्रों में विशेषणों का विशेष अभिप्राय होता है। मुनि ने तत्क्षण कोहरे की सृष्टि कर दी, क्या यह लौकिक कार्य है?

क्या साधारण मनुष्य ऐसा कर सकता है? क्या साधारण मनुष्य इस प्रकार संभोग करने में समर्थ है कि कन्या का कन्यात्व, कौमार्य, या योनि क्षतिग्रस्त न हो? क्या साधारण मनुष्य के एक बार के संयोग से स्त्री तत्क्षण गर्भवती हो सकती है, और उसी क्षण गर्भ का ज्ञान हो सकता है? सामान्यतः प्रसव नौ माह बाद होता है, और संतान को डेढ़-दो वर्ष तक पालने पर वह चलना सीखता है। लेकिन पाराशर ऋषि के इस प्रकरण में तो विचित्रता ही विचित्रता है, लोकोत्तरता ही लोकोत्तरता हैं।

यहाँ ऐसा दिव्य-संयोग हुआ कि कन्या का कन्यात्व नष्ट नहीं हुआ, उसकी कौमार्यता और पवित्रता बनी रही। वह तत्क्षण गर्भवती हुई, और गर्भ का बालक तत्काल बड़ा और विद्वान हो गया। इतना शक्तिशाली कि वह कहता है: "स्मृतोऽहं दर्शयिष्यामि कृत्येष्विति च सोऽब्रवीत्" अर्थात् माता के स्मरण करते ही, चाहे कितनी भी दूरी हो, वह तत्काल उपस्थित हो जाएगा। "समुत्पन्नः स तु महान् सह पित्रा ततो गतः" अर्थात् वह बालक उत्पन्न होते ही बड़ा होकर पिता पाराशर के साथ वन में तपस्या करने चला गया।

इन विलक्षणताओं से स्पष्ट है कि पाराशर और मत्स्यगंधा का संयोग साधारण नहीं था। प्राकृतिकता न होने से विलक्षणता प्रकट होती है। जहाँ ऐसी विलक्षणता हो, वहाँ साधारण मानवीय बुद्धि से घटना की समीक्षा कर निर्णय निकालना मूर्खता है। अतः व्यास जी की ऐसी विलक्षण उत्पत्ति को साधारण संभोग-मूलक नहीं, बल्कि दिव्य संयोग मूलक माना जाएगा। वहाँ पर कहा गया: "कन्यैव त्वं भविष्यसि" अर्थात् तू कन्या ही रहेगी। और ऐसा ही हुआ। शान्तनु ने बाद में सत्यवती से विवाह किया। साथ ही, व्यास जी को भी इस लोकोत्तरता के कारण वैध माना गया: "विधानविहितः स त्वं यथा मे प्रथमः सुतः।" यदि यह व्यभिचार होता, तो अवैध संतान मानी जाती, किंतु व्यास जी सबके पूज्य कहे गए।

अतः सिद्ध होता है कि अयोनिज उत्पत्तियों, देवताओं, और तपोबल से अलौकिक शक्तिशाली व्यक्तियों पर साधारण मनुष्यों के दोष लागू नहीं होते। वे शास्त्रों और प्रकृति के नियमों के बंधन में नहीं हैं, किंतु हम हैं। इसलिए शास्त्रों में वर्णित ऐसे समागमों को साधारण लौकिक संभोग नहीं समझना चाहिए।

अब प्रश्न यह है कि ऐसे प्रकरणों को लेकर कुछ आर्यसमाजी, नास्तिक, या स्वयं को धर्मध्वजी समझने वाले मूर्ख हिन्दू यदि इन अलौकिक घटनाओं को नहीं मानते, तो क्या वे अपनी मनमानी उत्पत्ति को शास्त्रों से सिद्ध कर सकते हैं? यदि नहीं, तो किसी घटना के एक भाग को आक्षेप लगाने हेतु मानना और उसी घटना के दूसरे भाग को स्वीकार न करना, यह अर्धजरतीय न्याय और मूर्खता के सिवाय क्या है? या तो किसी प्रकरण को पूर्ण रूप से स्वीकार करें, या पूर्ण रूप से अस्वीकार करें। जहाँ आक्षेप लगाया जा सके, उसे तो प्रमाण रूप में प्रस्तुत करना, किंतु जहाँ आक्षेप का निवारण हो, उसे अस्वीकार करना, यह कैसी बुद्धिमानी और कैसा न्याय है?

अतः बुद्धिमानो को , शास्त्रों और भगवान के प्रति श्रद्धा रखने वाले लोगों को सावधान रहना चाहिए। ऐसे प्रकरणों को मूर्खों द्वारा उठाए जाने पर शास्त्र, ऋषि, या देवता के प्रति अश्रद्धा नहीं करनी चाहिए। उस युग का समय भिन्न था, उनकी शक्ति भिन्न थी। हमारे पूर्वज मूर्ख नहीं थे, जिन्होंने इन घटनाओं को यथावत् लिखा। मूर्खों की बातों में आकर अपना परलोक बिगाड़ने से बचें। हम इस युग में अधिक धर्म करने में समर्थ नहीं हैं, अतः पूर्ण पतन से बचने के लिए शास्त्रों के प्रति, देवताओ के प्रति , अपने ऋषि मुनियो -पूर्वजो के प्रति अटल श्रद्धा बनाए रखनी चाहिए।
✍️शचीन्द्र शर्मा जी
साभार - आचार्य कश्यप 

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