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कल्प कल्पान्तर में अनेकों बार जिस तरह भगवान के विविध अवतार होते हैं
उसी तरह वेदादि ग्रंथों का वर्गीकरण तथा रामायण आदि ग्रंथों के लेखन के लिए ऋषियों का भी प्रदुर्भाव होता है।
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महर्षि वाल्मीकि का तीन कल्प में हुए जन्म के अनुसार वे तीनों में ही ब्राह्मण थे।
१_____
चौबीसवें त्रेता युग में भृगु वंश में अग्निशर्मा नाम के ब्राह्मण का जन्म हुआ।
जिनके पिता ब्राह्मण सुमति एवं माता कोशिकी थीं।
सप्तऋषियों के कृपा कटाक्ष से अग्निशर्मा ने तपस्या की और वाल्मीकि नाम पाया।
२_____
कल्प भेद से ब्राह्मण कुल में उत्पन्न मृगव्याध नामक एक ब्राह्मण हुए, ब्रह्मा जी की आज्ञा से सप्तऋषियों द्वारा इन्हें भी ज्ञानोपदेश हुआ और ये वाल्मीकि कहलाए।
३____
एक अन्य कल्प में वैशाख नामक ब्राह्मण का वर्णन है जिनके पिता का नाम शमीमुख था।
ये भी सप्तऋषियों की कृपा से बाद में वाल्मीकि नाम से प्रसिद्ध हुए।
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रामायण ग्रन्थ में जब लवकुश और सीता जी को लेकर वाल्मीकि जी श्री राम के सम्मुख उपस्थित हुए तो उन्होंने श्रीराम से कहा कि हे राम! मैं प्रचेता का दशवां पुत्र हूं।
मैने जीवन में कोई भी निंद्य कार्य नहीं किया है,
मैने कभी झूठ नहीं बोला है।
सीताजी परम पवित्र है और ये दोनों बालक आपके पुत्र हैं।
यदि मैने असत्य कहा हो तो मुझे सारे पाप लग जाएं और मेरी तपस्या नष्ट हो जाय।
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ऐसे परम पुनीत श्री वाल्मीकि जी को आज जो लोग शूद्र कह कर, व्याध कहकर प्रचारित करते हैं उन्हें निश्चित ही मन और वाणी से पाप ही लगेगा।
इसी तरह के प्रमाण श्री व्यास जी के लिए भी उपस्थित हैं।
दिए गए प्रमाण आपको कई पुराणों के अध्ययन से प्राप्त होंगे या किसी सद् गुरु से प्राप्त होंगे।
आप इसे मानने और न मानने के लिए स्वतंत्र हैं।
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जय जय श्रीराम
हर हर महादेव
✍️ आचार्य कश्यप
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