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Friday, 27 June 2025

जगन्नाथ ( रथ यात्रा)

जगन्नाथ
१. जगत् और विश्व-लोकभाषा में दोनों एक ही हैं। किन्तु पुराण-वेद की विज्ञान भाषा में दोनों के अर्थ कुछ भिन्न हैं। विश्वनाथ शिव को कहते हैं, जगन्नाथ विष्णु को। 
विश्व वह रचना है जो एक सीमा के भीतर प्रायः पूर्ण है तथा हृदय केन्द्र से संचालित है। 
वालाग्रमात्रं हृदयस्य मध्ये विश्वं देवं जातरूपं वरेण्यं (अथर्वशिर उपनिषद्, ५)
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । 
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व पाशैः ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ५/१३)
मनुष्य शरीर एक विश्व है। उससे बड़े विश्व के ५ स्तर हैं, जो क्रमशः मनुष्य आकार से कोटि-कोटि गुणा बड़े हैं। ३ प्रकार की पृथ्वी कही गयी है, जो सूर्य-चन्द्र से प्रकाशित है-पृथ्वी ग्रह, सूर्य प्रकाश क्षेत्र सौर मण्डल, सूर्य प्रकाश की अन्तिम सीमा सूर्यों का समूह या ब्रह्माण्ड। तीनों पृथ्वी से उनके आकाश उतने ही बड़े हैं, जितना मनुष्य तुलना में पृथ्वी। 
रवि चन्द्रमसोर्यावन्मयूखैरवभास्यते । स समुद्र सरिच्छैला पृथिवी तावती स्मृता ॥
यावत्प्रमाणा पृथिवी विस्तार परिमण्डलात् । 
नभस्तावत्प्रमाणं वै व्यास मण्डलतो द्विज ॥ (विष्णु पुराण, २/७/३-४)
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। (ऋक्, १/२२/२०) 
अन्य प्रकार से कहा है कि पृथ्वी के बाहर वायु के ७ स्तर क्रमशः १०-१० गुणा बड़े हैं। (नारद पुराण, १/६०, ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/२२ अध्याय) कोटि का अर्थ सीमा है। हमारे लिए विश्व की सीमा पृथ्वी है जिसका व्यास हमारी ऊचाई चौड़ाई के औसत (१.२८ मीटर) का १०० लाख गुणा है। अतः १०० लाख को कोटि (सीमा) कहते हैं। इसी प्रकार पृथ्वी से कोटि-कोटि गुणा बड़े सौर मण्डल (उसका आकर्षण क्षेत्र जिसमें कोई पिण्ड उसकी कक्षा में रह सकता है), ब्रह्माण्ड, तथा दृश्य जगत्। चेतन रूप में दृश्य विश्व को पुरुष सूक्त में पुरुष कहा गया है, जो पूर्ण विश्व रूपी पूरुष का १/४ भाग है। पूरुष पूरे विश्व का १० गुणा है। 
स भूमिं विश्वतो वृत्त्वा अत्यत् तिष्ठत् दशाङ्गुलम्।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि। एतावान् अस्य महिमा अतो ज्यायांश्च पूरुषः। (पुरुष सूक्त, १, ३,४) 
आज की भाषा में कहते हैं कि प्रायः ९ अरब प्रकाशवर्ष व्यास का दृश्य विश्व ९ अरब वर्ष पूर्व का है। क्रमशः विस्तार के कारण यह १० गुणा फैल चुका है। जीव जगत् के लिये चन्द्र कक्षा का गोल भी विश्व है। अतः मनुष्य तथा उससे बड़े विश्व के ६ स्तर हैं। मनुष्य से छोटे विश्व के ७ स्तर हैं, जो क्रमशः १-१ लाख भाग छोटे हैं। 
वालाग्र शत साहस्रं तस्य भागस्य भागिनः। तस्य भागस्य भागार्धं तत्क्षये तु निरञ्जनम् ॥ (ध्यानविन्दु उपनिषद् , ४) 
ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितॄभ्यो देव दानवाः। देवेभ्यश्च जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः॥ (मनुस्मृति, ३/२०१)
आज की भाषा में इनका नाम इस प्रकार है-कलिल (Cell), परमाणु (atom), कुण्डलिनी (nucleus), जगत् कण (चर = lepton, स्थाणु = baryon, अनुपूर्व = meson), देव-दानव (क्रियाशील तथा निष्क्रिय ऊर्जा), पितर (prototype, quark?), ऋषि (रस्सी, string). मनुष्य आकार को ७ बार १-१ लाख भाग छोटा करने पर १.३ मीटर का १० घात ३५ भाग होगा जो आज के क्वाण्टम मेकानिक्स में सबसे छोटी प्लांक दूरी है। अतः विश्व के १३ स्तर हुए और गणित ज्योतिष में विश्व का अर्थ १३ अंक होता है।
जगत् क्रियाशील वस्तु है, जो दीखता नहीं है। 
जगदव्यक्तमूर्तिना (गीता, ९/४) जगज्जीवनं जीवनाधारभूतं (नारद परिव्राजक उपनिषद्,४/५०)
जगत् या चेतना के १४ स्तर हैं, जिनको १४ भुवन कहते हैं। आकाश में ८ दिव्य सृष्टि है, ब्रह्म मूल रूप है, उससे ७ लोकों के चेतना या प्राण के ७ स्तर दिव्य सृष्टि हैं। पृथ्वी पर ६ प्रकार की सृष्टि है, ब्रह्म का प्रतिरूप मनुष्य, जल, स्थल, वायु के जीव, अर्ध संज्ञक वृक्ष, सुप्त संज्ञक मिट्टी (मृत या मृदा)। 
चतुर्दश विधो भूत सर्गः (सांख्य तत्त्व समास, १८)
अष्ट विकल्पो देवः, तैर्यक् योनयश्च पञ्चधा भवति। मानुष्यः च एकविधः, समासतो भौतिक सर्गः। (सांख्य कारिका, ५३)
= ८ देव योनि, मनुष्य, ५ तिर्यक् योनि।
२. ब्रह्म रूप- (१) निर्विशेष ब्रह्म- इसका वर्णन नहीं हो सकता है क्योंकि इसका कोई रूप, रंग, भेद नहीं है। इसे नेति नेति कहा गया है, अर्थात् कोई भी वर्णन पूर्ण नहीं है, नेति = न + इति = पूरा नहीं हुआ। तुलसीदास ने नेति शब्द का प्रयोग किया ह-निगम नेति शिव अन्त न पावा, ताहि धरहिं जननी हठि धावा (रामचरितमानस, १/२०२/८)। किन्तु यह अर्थ वेद में नहीं है, भागवत पुराण में गजेन्द्र स्तुति में है। 
स वै न देवासुर मर्त्य तिर्यङ् न स्त्री न षण्ढो न पुमान् न जन्तुः।
नायं गुणं कर्म न सन्न चासन्, निषेधशेषो जयतादशेषः॥ (भागवत पुराण, ८/३/२४)
निर्विशेष का वर्णन नहीं होता, केवल उपवर्णन होता है। यजुर्वेद में इसे पर्यगात् कहा है। जिनका स्वरूप या लिङ्ग है, उसी का वर्णन या सम्बोधन हो सकता है।
एवं गजेन्द्रमुपवर्णित निर्विशेषं, ब्रह्मादयो विविधलिङ्गभिधाभिमानाः।
नैते यदोपससृपुः निखिलात्मकत्वात्--॥३०॥
छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमानः, चकायुधोभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः॥३१॥ (भागवत पुराण, ८/३)
जिसका शरीर है, वह सर्प की तरह क्रमशः आगे बढ़ेगा। इसे संसर्प गति कहा है। अव्यक्त ब्रह्म सबकी आत्मा है, वह तत्क्षण कहीं भी प्रकट हो सकता है। इसे अभिगमन कहा है। ईशावास्योपनिषद् में भी (वाज. यजु, अध्याय ४०)-स पर्यगात्, शुक्रं अकायं अव्रणं, अपापविद्धम् (८)-अकाय का पर्यगात्, शब्दों से घेर कर ही वर्णन हो सकता है।
वह बिना चले देवों से पहले पहुंचता है-अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्, तस्मिन् अपो मातरिश्वा दधाति॥ (४)
छन्द रूपी गरुड से गति-गरुड को पक्षी कहा गया है। जगन्नाथ मन्दिर के बाहर गरुड़ स्तम्भ भी है। जो स्वयं सर्वत्र व्याप्त है उसका वाहन कैसे? निर्विशेष ब्रह्म के भीतर अप् जैसे पदार्थ में आन्तरिक गति हो रही है जिससे सृष्टि होती है। इस आन्तरिक गति को मातरिश्वन् कहा गया है। जैसे कई चीजों को मिला कर जल में पकाते हैं, तो सभी मिलकर भोजन बनाते हैं।
एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश स इदं भुवनं वि चष्टे ।
तं पाकेन मनसापश्यमन्तितस्तं, माता रेऴ्हि स उ रेऴ्हि मातरम् ॥ (ऋक्, १०/११४/४)
इस आन्तरिक गति को सुपर्ण, गरुत्मान्, मातरिश्वन् कहा गया है जो गरुड के कई रूप हैं।
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥ (ऋक्, १/१६४/४६, अथर्व, ९/१०/२८)
सुपर्ण पक्षी की तरह ७ ऋषियों (रस्सी = आकर्षण) का मिलन है। ४ आकर्षण बल पक्षी का चौकोर शरीर बनाते हैं। २ पक्ष समरूपता हैं। पुच्छ निर्माण है, मुख स्रोत है। एक निर्माण अगले चक्र में स्रोत होता है। इस मिलन को सुपर्ण चिति कहते हैं (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/२-६)।
ब्रह्म या व्यक्ति रूप में सुपर्ण के २ रूप हैं, एक साक्षी (निर्विशेष ब्रह्म), दूसरा भोक्ता (विशिष्ट ब्रह्म) है। मनुष्य मस्तिष्क में इनको आत्मा तथा जीव कहा गया है जिनको बाइबिल में आदम और ईव कहा है।
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते। 
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्यो अभिचाकषीति॥
(मुण्डक उप. ३/१/१, श्वेताश्वतर उप. ४/६, ऋक्, १/१६४/२०, अथर्व, ९/९/२०)
पिप्पल को बाइबिल में ऐप्पल लिखा है जिसमें मन लगा रहता है। (applying mind)
स्तम्भ के २ अर्थ हैं-स्थिर केन्द्र, मापदण्ड। यज्ञ स्तम्भ अर्यमा का रूप है जो मूल आदित्य (आदि रूप, अभी अन्तरिक्ष में दृश्य) है। ब्रह्माण्ड का आदित्य वरुण, सौरमण्डल का आदित्य मित्र है। इन ३ आदित्यों से ३ धामों की सृष्टि हुई।
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋक्, २/२७/८)
माप छन्द से होती है। सुपर्ण की गति मातरिश्वा से मिश्रण हो रहा है, इसलिये इनको वयः छन्द कहते हैं। वयन = बुनना, वयस = आयु, पक्षी। मुख्य १९ प्रकार के वयः छन्द है, जिनको मूर्धावयः कहा गया है (वाज. यजु, १४/९-१०)। इनकी व्याख्या करना कठिन है, अभी तक सृष्टि विज्ञान रूप में किसी ने अर्थ नहीं किया है।
(२) विष्णु रूप-गायत्री मन्त्र के ३ पाद ब्रह्म के सृष्टि, कर्ता, ज्ञान रूप का वर्णन करते हैं, जिनको ब्रह्मा, विष्णु, शिव कहते हैं। ये आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक विश्वों का भी वर्णन करते हैं, जो परस्पर की प्रतिमा हैं। इनकी सूर्य केन्द्रित व्याख्या की जाती है। सूर्य से पृथ्वी तथा उस पर जीवन का निर्माण हुआ है, अतः उसे सविता कहते हैं। किन्तु वह मूल स्रष्टा नहीं है, जिसे तत् सविता कहते हैं। वह परब्रह्म है, जिससे दृश्य जगत्, ब्रह्माण्ड, और उसके भीतर सूर्य बने। सूर्य रूपी विष्णु को ही प्रायः ब्रह्म या पुरुष रूप कहते हैं। सूर्य से जो तेज निकलता है, वह इन्द्र है, जो खाली स्थान में भी भरा हुआ है। 
नेन्द्रात् ऋते पवते धाम किञ्चन । (ऋक्, ९/६९/६)  
(देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे) इन्द्रियस्य इन्द्रियेण। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/६/५/३)
सूर्य के आकर्षण से पृथ्वी उसकी कक्षा में स्थित है, यह विष्णु रूप है-
पृथिवी त्वया धृता लोकाः, देवि त्वं विष्णुना धृता (भूमि पूजन मन्त्र)। 
उभा जिग्यथुर्न पराजयेथे, न पराजिज्ञे कतरश्च नैनोः।
इन्द्रश्च विष्णू यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम्॥ (ऋक्, ६/६९/८)
किं तत् सहस्रमिति? इमे लोकाः, इमे वेदाः, अथो वागिति ब्रूयात्। (ऐतरेय ब्राह्मण, ६/१४)
सूर्य से हमारा जीवन चल रहा है, यह जगन्नाथ रूप है। इसे ज्योतिष में आत्मा कारक कहा है-
सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च (ऋक्, १/११५/१, अथर्व, १३/२/३५, २०/१०७/१४, वाज. यजु, ७/४२, १३/४६ आदि)।
हमारी चेतना ब्रह्म रन्ध्र से हो कर सूर्य तक प्रकाश गति से जाती है तथा १ मुहूर्त में ३ बार जा कर लौट आती है। ३ लाख किमी प्रति सेकण्ड की गति से सूर्य तक प्रायः १५ करोड़ किमी जाने में प्रायः ८ मिनट लगता है। हृदय से ब्रह्मरन्ध्र तक अणु पथ (हर व्यक्ति के लिए भिन्न) तथा वहां से सूर्य तक महापथ (सबके लिए एक) है।
अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलाणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येत्यसौ वा आदित्यः पिङ्गल एष शुक्ल एष नील एष लोहितः॥१॥ तद्यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादित्यात्प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः॥२॥ ..... अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामति अथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रामते स ओमिति वा होद्वामीयते स यावत्क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्यतद्वै खलु लोकद्वारं विदुषा प्रपदनं निरोधोऽवदुषाम् ॥५॥ (छान्दोग्य उपनिषद्, ८/६/१,२,५) बृहदारण्यक उपनिषद् (४/४/८-९) भी।
रूपं रूपं मघवाबोभवीति मायाः कृण्वानस्तन्वं परि स्वाम्। 
त्रिर्यद्दिवः परिमुहूर्त्तमागात् स्वैर्मन्त्रैरनृतुपा ऋतावा॥(ऋक्, ३/५३/८)
त्रिर्ह वा एष (मघवा=इन्द्रः, आदित्यः = सौर प्राणः) एतस्या मुहूर्त्तस्येमां पृथिवीं समन्तः पर्य्येति। (जैमिनीय ब्राह्मण उपनिषद् १/४४/९)
चण्डी पाठ, प्रथम अध्याय में सुप्त रूप को विष्णु तथा जाग्रत रूप को जगन्नाथ कहा गया है। यह काली चरित्र है, जगन्नाथ को दक्षिणाकाली भी कहते हैं। दक्षिणा का अर्थ है देना जिससे दक्षता हो। दक्षिणा काली रूपी अव्यक्त विश्व से विश्व का जन्म होता है, महाकाली में पुनः लय होता है। यह ब्रह्म की परिभाषा है कि उससे जगत् की उत्पत्ति, विकास, लय आदि होता है-जन्माद्यस्य यतः (ब्रह्म सूत्र, १/१/२) शिव भी रुद्र रूप में वामदेव, गुरु रूप में दक्षिणामूर्ति हैं। दुर्गा सप्तशती, अध्याय, १-
विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ। स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः॥६८॥
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥७१॥ विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च॥८४॥
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ॥९०॥ जाग्रत होने के बाद-उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तत्या मुक्तो जनार्दनः॥९१॥
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥८६॥
३. दारु ब्रह्म- जगन्नाथ या ब्रह्म के विविध रूपों की उपमा दारु से दी जाती है।
(१) सृष्टि निर्माण की सामग्री, उसका आधार, निर्मित पदार्थ आदि सभी ब्रह्म है, जैसे वृक्ष वन में है, उससे काट छांट कर घर, सामग्री आदि बनते हैं।
किं स्विद् वनं क उ स वृक्ष आस यतो द्यावा पृथिवी निष्टतक्षुः।
मनीषिणो मनसा पृचतेदु तत् यदध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन्॥ 
(ऋक्, १०/८१/४, तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/८/९/१५, तैत्तिरीय संहिता, ४/६/२/१२) 
ब्रह्म वनं ब्रह्म स वृक्ष आसीत् यतो द्यावा पृथिवी निष्टतक्षुः।
मनीषिणो मनसा विब्रवीमि वो ब्रह्माध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन्॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/८/९/१६) 
इस अर्थ में ब्रह्म को सुकृत् कहा गया है, जो कर्ता, कर्म, सामग्री, निर्माण आदि सब कुछ है।
असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत। तदात्मानँ स्वयमकुरुत तस्मात्तत्सुकृतम् उच्यत इति। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/१) = स्वयं ही निर्माण किया अतः सुकृत् कहते हैं।
ताभ्यः पुरुषम् आनयत् ता अब्रुवन्-सुकृतं बत इति। पुरुषो वाव सुकृतम्। ता अब्रवीत्-यथा आयतनं प्रविशत इति। (ऐतरेय उपनिषद्, १/२/३) = उससे पुरुष लाये और कहा कि यही सुकृत् है। यह सभी में प्रवेश करता है।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥ (गीता, ४/२४)
= ब्रह्म ही अर्पण, हवि, अग्नि, हवन करने वाला, कर्म, तथा अन्तिम क्रिया है और अन्त में सभी ब्रह्म में ही मिलते हैं।
(२) वृक्ष का वन रूप-एक वृक्ष का जन्म मरण आदि होता है। किन्तु वन में कुल वृक्ष संख्या समान रहती है। इसी प्रकार जगत् में सदा पूरुष का १/४ भाग विश्व बना रहता है।
(३) जीवन का स्रोत-वृक्षों से उत्पन्न अन्न द्वारा ही जीवों का निर्माण तथा पालन होता है। उसी प्रकार जगन्नाथ जीवन के मूल स्रोत हैं।
तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नं अभिजायते।
अन्नात् प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम्॥ (मुण्डक उपनिषद्, १/१/८)
आकाशाद् वायुः, वायोः अग्निः, अग्नेः आपः, अद्भ्यः पृथिवी, पृथिव्या ओषधयः, ओषधीभ्यो अन्नः, अन्नात् पुरुषः। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/१/१)
(४) निरपेक्ष द्रष्टा-निर्विशेष ब्रह्म रूप में जगन्नाथ कुछ करते नहीं हैं, केवल देख रहे हैं, जिस रूप को साक्षी सुपर्ण भी कहा है। इसी प्रकार मार्ग पर स्थित वृक्ष लोगों को चलते हे देखता है।
यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्, यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्।
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/९) 
(५) सृष्टि निर्माण का क्रम-मूल को ऊर्ध्व तथा उससे विभिन्न प्रकार की निर्माण दिशाओं को शाखा कहा है। यह अविनाशी अश्वत्थ है, अर्थात् क्रिया चलती रहती है। कोई एक वस्तु या पिण्ड वृक्ष के पत्ते की तरह झड़ जाता है, वृक्ष बना रहता है।
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्। (गीता, १५/१)
(६) कर्म वासना-वृक्ष में बीज, अंकुर, वृक्ष, फल आदि का क्रम शाश्वत है। इसी प्रकार मनुष्य का कर्म और वासना चक्र शाश्वत है-संकल्प, क्रिया, फल, उसमें वासना। मुक्ति के लिए इस वृक्ष को काटना पड़ता है।
 वासना वशतः प्राणस्पन्दस्तेन च वासना। क्रियते चित्तबीजस्य तेन बीजाङ्कुरक्रमः॥२६॥
द्वे बीजे चित्तवृक्षस्य प्राणस्पन्दनवासने। एकस्मिँश्च तयोः क्षीणे क्षिप्रं द्वे अपि नश्यतः॥२७॥
द्वे बीजे चित्तवृक्षस्य वृत्तिव्रततिधारिणः। एक प्राण परिस्पन्दो द्वितीयं दृढ़भावना॥४८॥ (मुक्तिकोपनिषद्, अध्याय २)
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः। अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥२॥
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते, नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा। अश्वत्थमेनं सुविरूढ़मूलमसङ्गशस्त्रेण दृढ़ेन छित्वा॥३॥ (गीता, अध्याय १५)  
४. जगन्नाथ के अन्य रूप-इनका निर्देश भागवत पुराण में है जो विस्तार से वेदों में भी वर्णित है-
तत्र गत्वा जगन्नाथं वासुदेवं वृषाकपि। पुरुषं पुरुषसूक्तेन उपतस्थे समाहिताः॥ (भागवत पुराण, १०/१/२०) 
पृथ्वी पर असुरों का अत्याचार बढ़ गया तो पृथ्वी रूपी गौ ब्रह्मा जी के साथ, जगन्नाथ के पास गयी जो वासुदेव, वृषाकपि, तथा पुरुष भी हैं। गौ का अर्थ ३ तत्त्व युक्त हैं-(क) इन्द्रिय-कर्म, ज्ञान, मन, (ख) किरण-तेज, गति, ज्ञान, (ग) यज्ञ-वेदी, कर्ता, पदार्थ। (घ) पृथ्वी-यज्ञ अर्थात् उत्पादन, स्थान, चक्रीय गति (दिन, मास. वर्ष आदि)।
अथैष गोसवः स्वाराजो यज्ञः। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १९/१३/१)
इमे वै लोका गौः यद् हि किं अ गच्छति इमान् तत् लोकान् गच्छति। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/२/३४)
इमे लोका गौः। (शतपथ ब्राह्मण, ६/५/२/१७) 
धेनुरिव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्येभ्यः सर्वान् कामान् दुहे माता धेनुर्मातेव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्यान् बिभर्त्ति। (शतपथ ब्राह्मण, २/२/१/२१) 
पिण्ड रूप में पृथ्वी पर ७ समुद्र हैं। गो रूप में उत्पादन के ४ स्रोत ४ समुद्र हैं-(क) स्थल मण्डल, (ख) जल मण्डल, (ग) वायु मण्डल. (घ) जीव मण्डल (जीव, वृक्ष)। (वायु पुराण, उत्तर, १/१६८-१८६)- पयोधरी भूतचतुः समुद्रां जुगोप गोरूप धरामिवोर्वीम्। (रघुवंश, २/३) 
विष्णु यज्ञ रूप हैं, अतः असुरों द्वारा यज्ञ में बाधा होने पर विष्णु के पास गये, जिनके जाग्रत रूप जगन्नाथ हैं।
(१) पुरुष-यह रूप पुरुष सूक्त में वर्णित है, अतः पुरुष सूक्त से उनकी स्तुति हुई। पुरुष सूक्त के कुछ रूपों के क्रम हैं-(१) पूरुष = ४ पाद का मूल स्वरूप, (२) सहस्रशीर्ष-उससे १००० प्रकार के सृष्टि विकल्प या धारा, (३) सहस्राक्ष = हर स्थान अक्ष या केन्द्र मान सकते हैं, (३) सहस्रपाद-३ स्तरों की अनन्त पृथ्वी, (४) विराट् पुरुष-दृश्य जगत् जिसमें ४ पाद में १ पाद से ही सृष्टि हुई। १ अव्यक्त से ९ प्रकार के व्यक्त हुए जिनके ९ प्रकार के कालमान सूर्य सिद्धान्त (१५/१) में दिये हैं। अतः विराट् छन्द के हर पाद में ९ अक्षर हैं। (५) अधिपूरुष (६) देव, साध्य, ऋषि आदि, (६) ७ लोक का षोडषी पुरुष, (७) सर्वहुत यज्ञ का पशु पुरुष, (८) आरण्य और ग्राम्य पशु, (९) यज्ञ पुरुष (१०) अन्तर्यामी आदि।
(२) वासुदेव-पाञ्चरात्र दर्शन के अनुसार सृष्टि के ४ क्रम हैं-वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध। सूर्य सिद्धान्त के अध्याय १२ में सांख्य, पाञ्चरात्र, पुरुष सूक्त को मिला कर सृष्टि की व्याख्या है। रामानुजाचार्य जी ने ४ व्यूह रूप में इनकी व्याख्या है। सृष्टि क्रम के अनुसार इन के अर्थ हैं-(क) वासुदेव = सृष्टि का वास रूप आकाश, (ख) सङ्कर्षण = सभी के परस्पर आकर्षण से बड़े द्रप्स (ब्रह्माण्ड, उनके भीतर तारा गण)-(ऋक्, ६/४१/३, ७/८७/६, वाज, १/२६, ७/२६ आदि), (ग) प्रद्युम्न = प्रकाशित। जब तारा पिण्ड गर्म हो कर प्रकाश देने लगे। (घ) अनिरुद्ध-अनन्त रूप जिनको चित्राणि कहा गया है (वाज. यजु, २५/९, अथर्व, १९/७/१, ऋक्, ४/२२/१०, ४/३२/५ आदि)। अतः संवत्सर चक्र के प्रथम मास को चैत्र कहते हैं। चान्द्र मास की परिभाषा अनुसार इस मास की पूर्णिमा तिथि को चन्द्र चित्रा नक्षत्र में रहेगा। किन्तु चित्रा एकमात्र नक्षत्र है, जिसमें केवल १ ही तारा है।
(३) वृषाकपि-इसका अर्थ कई प्रकार से किया गया है, पुरुष वानर (वृषा = पुरुष, कपि = वानर), इन्द्र का मित्र जिसके साथ मद्यपान करने के कारण इन्द्राणी क्रुद्ध हुयी थी (ऋक्, १०/८६).
सृष्टि प्रसंग में इसका अर्थ है कि अप् के समुद्रों से द्रप्स रूप विन्दुओं की वर्षा होती है, इस रूप में स्रष्टा को वृषा कहते है। इसके लिए वह ’क’ = जल का पान करता है, अतः कपि है।
तद् यत् कम्पाय-मानो रेतो वर्षति तस्माद् वृषाकपिः, तद् वृषाकपेः वृषा कपित्वम्। ... आदित्यो वै वृषाकपिः। (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/१२) 
असौ वा आदित्यो द्रप्सः (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/१/२०) स्तोको वै द्रप्सः। (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, २/१२)
एष द्रप्सो वृषभो विश्वरूप इन्द्राय वृष्णे समकारि सोमः॥ (ऋक्, ६/४१/३)
अव सिन्धुं वरुणो द्यौरिव स्थाद् द्रप्सो न श्वेतो मृगस्तुविष्मान्। (ऋक्, ६/८७/६)
द्रप्सश्चस्कन्द प्रथमाँ अनु द्यूनिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः (ऋक्, १०/१७/११)
यस्ते द्रप्सः स्कन्दति यस्ते अंशुर्बाहुच्युतो धिषणाया उपस्थात्। (ऋक्, १०/१७/१२) 
यहां वृषा कपि का सहयोगी तेज रूप इन्द्र है, जिसकी सहायता से वह अप् या सोम पान कर सृष्टि करता है।
अन्य अर्थ है, कि सदा पहले जैसी सृष्टि होती है, अतः नकल करने वाले पशु को कपि कहते हैं-
प्रथमं सर्वशास्त्राणां पुराणं ब्रह्मणा स्मृतम् । अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः ॥ 
(वायु पुराण, १/६१, मत्स्य पुराण, ५३/३)
सूर्या चन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत् । (ऋक्, १०/१९०/३)
५. जगन्नाथ क्षेत्र-(१) परात्पर पुरुष रूप में सम्पूर्ण जगत् और उसका अव्यक्त स्रष्टा जगन्नाथ हैं। अनुभव योग्य रूप अव्यय पुरुष है। यह क्षर और अक्षर दोनों से उत्तम होने के कारण पुरुषोत्तम है। जगन्नाथ के २ मुख्य अवतारों में श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, जिन्होंने कभी पुरुष की सीमा नहीं पार की। श्रीकृष्ण ने जन्म लेते ही कई चमत्कार किये, अतः उनको भगवान् कहते हैं- अन्ये चांश कला भूताः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। पुरुषोत्तम रूप में जगन्नाथ प्रथित हैं, अतः एक का विशेषण प्रथम होता है, और गिनती आरम्भ करने के लिए एक के बदले पुरुषोत्तम राम कहते हैं।
यस्मात् क्षरमतीतोऽहं अक्षरादपि चोत्तमः। अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥ (गीता, १५/१५)
(२) जगन्नाथ धाम-वेद रूपी ज्ञान का केन्द्र होने से भारत विश्व का हृदय है। हृदय का प्रचलित संकेत भी भारत के मुख्य खण्ड का नक्शा है। दक्षिण भाग अधोमुख त्रिकोण है, उत्तर भाग अर्धचन्द्राकार हिमालय है। दोनों को मिलाने पर हृदय का प्रचलित संकेत चिह्न बनता है। भारत का हृदय स्थान पुरी है, जो ९ खण्डों के भारतवर्ष का उत्तर-दक्षिण और पूर्व पश्चिम दिशा में केन्द्र भाग है। विश्व को नियन्त्रित करने के लिए जगन्नाथ उसके हृदय में रहते हैं, अतः भारत के हृदय स्थान पुरी में जगन्नाथ का स्थान है।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति (गीता, १८/६१) उषा सूक्त में धाम का अर्थ विषुव वृत्त का ७२० भाग है (उषा वरुण की पश्चिम दिशा में ३० धाम चलती है, सूर्योदय से १५ अंश तक पूर्व उषा काल है)\ अतः १ धाम ४०,००० /७२० = ५५.५ किमी है। अतः जगन्नाथ मन्दिर से ५ योजन = ५५.५ किमी ( १ धाम) उत्तर और उतना ही दक्षिण तक जगन्नाथ धाम है। स्कन्दपुराण, वैष्णव, ऊत्कल खण्ड, अध्याय ३-
पञ्चक्रोशमिदं क्षेत्रं समुद्रान्तर्व्यवस्थितम्। द्विक्रोशं तीर्थराजस्य तट भूमौ सुनिर्मलम्॥५२॥
सुवर्ण बालुकाकीर्णं नीलपर्वत शोभितम्। योऽसौ विश्वेश्वरो देवः साक्षान्नारायणात्मकः॥५३॥
अध्याय १-अहो तत् परमं क्षेत्रं विस्तृतं दश योजनम्॥११॥ नीलाचलेन महता मध्यस्थेन विराजितम्॥१२॥
सागरस्योत्तरे तीरे महानद्यास्तु दक्षिणे॥३१॥ एकाम्र काननाद् यावद् दक्षिणोदधि तीरभूः॥३३॥
ब्रह्म पुराण, अध्याय ४३-दक्षिणस्योदधेस्तीरे न्यग्रोधो यत्र तिष्ठति। 
दश योजन विस्तीर्णं क्षेत्रं परम दुर्लभम्॥५३॥
यह शंख जैसा आकार होने के कारण शंख क्षेत्र है। कम्बोडिया भी कम्बुज = शंख है। जापान को पञ्चजन अर्थात् ५ द्वीपों का समूह कहा गया है (जम्बू द्वीप के उपद्वीप, भागवत पुराण, ५/१९/२९-३०)। वहां का शंख पाञ्चजन्य था जो विष्णु भगवान् का है।
(३) रथ यात्रा-गतिशील पुर को रथ कहते हैं। सौर मण्डल में शनि तक के ग्रहों की गति का प्रभाव हम तक आता है, अतः वहां तक के ग्रहों का चक्र सूर्य रथ का चक्र है। यह १,००० योजन दूर है (परिधि = ९००० योजन, त्रिज्या १४२३.७, सूर्य व्यास = योजन). इसे पुरुष सूक्त में सहस्राक्ष कहा गया है (अक्ष = आंख, या धुरी)। इसके भीतर शनि तक के ग्रहों का संयुक्त चक्र ज्योतिषीय युग है (४३,२०,००० वर्ष)। अहर्गण माप में यह २० से कुछ अधिक है (पृथ्वी त्रिज्या x २ घात (२०-३)) अतः २० अंश उत्तर अक्षांश पर रथ यात्रा होती है।
रथ यात्रा तथा उसके लौटने का चक्र दशमी तक है। सृष्टि के ९ सर्ग हैं, अव्यक्त को मिला कर १० चक्र। हर चक्र का काल १ रात्रि है, रात्रि अर्थात शान्त स्थिति में ही सृजन होता है। इसे दशम अहः, संवत्सर भी कहा है।
अथ यद् दशमं अहः उपयन्ति। संवत्सरमेव देवतां यजन्ते। (शतपथ ब्राह्मण, १२/१/३/२०)
श्रीः वै दशमं अहः (ऐतरेय ब्राह्मण, ५/२२)
मितं एतद् देव कर्म यद दशमं अहः (कौषीतकि बाह्मण, २७/१)
अथ यद् दशरात्रं उपयन्ति। विश्वान एव देवान देवतां यजन्ते। (शतपथ ब्राह्मण, १२/१/३/१७)
एवा नूनं उप स्तुहि वैयश्व दशमं नवम् (ऋक्, ८/२४/२३, अथर्व, २०/६६/२)
(९ व्यक्त स्तरों के ऊपर दशम अव्यक्त।
मनुष्य का गर्भ में जन्म चन्द्र की १० परिक्रमा (२७३ दिन) में होता है। प्रेत शरीर चन्द्र मण्डल का है, उसका जन्म पृथ्वी की १० परिक्रमा में होता है।
७. जगन्नाथ परम्परा-(१) अदिति के पुत्र वामन का ही नाम विष्णु था। उस समय अदिति के नक्षत्र पुनर्वसु से वर्ष का अन्त और नये वर्ष का आरम्भ होता था। आज भी शान्ति पाठ में कहते हैं-अदितिर्जातम्, अदितिर्जनित्वम् (ऋक्, १/८९/१० आदि)। यह १७५०० ईपू. में था।
(२) वराह अवतार में इन्द्रनीलमणि की मूर्ति बनती थी-स्कन्द पुराण, वैष्णव, उत्कल खण्ड, अध्याय २-
दंष्ट्रोद्धृतक्षितिभृते त्रयीमूर्तिमते नमः। नमो यज्ञवराहाय चन्द्र-सूर्या-ग्नि-चक्षुषे ॥२३॥
नरसिंहाय दंष्ट्रोग्रमूर्तिद्रावितशत्रवे। यदपाङ्गविलासैकसृष्टिस्थित्युपसंहृतिः॥२४॥
तममुं नीलमेघाभं नीलाश्ममणि विग्रहम्॥२५॥
(३) कार्त्तिकेय समय में अभिजित् का पतन हुआ और धनिष्ठा से वर्ष आरम्भ हुआ (महाभारत, वन पर्व, २३०/८-१०)। यह प्रायः १५८०० ईपू में हुआ। धनिष्ठा से ऋक ज्योतिष में वर्ष आरम्भ होता है, जिसमें १९ वर्ष का युग होता है। अतः १९ वर्ष बाद नव कलेवर होता है। कार्त्त्तिकेय काल में माघ शुक्ल सप्तमी को क्रौञ्च विजय उपलक्ष्य में रथ यात्रा आरम्भ हुई। (स्कन्द पुराण, माहेश्वर खण्ड, कुमारिका खण्ड, अध्याय ३५)
(४) वैवस्वत यम के काल में जल प्रलय के काल में नील मूर्ति बालू में दब गयी। जल प्रलय के समय का आधुनिक अनुमान भी वही है-प्रायः १०,००० ईपू.। ब्रह्म पुराण, अध्याय ४३-
इन्द्रनीलमयी श्रेष्ठा प्रतिमा सार्वकामिकी॥७१॥ यम तां गोपयिष्यामि सिकताभिः समन्ततः॥७४॥ 
लुप्तायां प्रतिमायां तु इन्द्रनीलस्य भो द्विजाः॥७७॥
(५) इन्द्रद्युम्न द्वारा उद्धार-जल प्रलय के बाद सत्ययुग (९१०२ ई.पू.) के पूर्व सूर्य वंशी राजा इन्द्रद्युम्न द्वारा विद्यापति शबर की सहायता से नरसिंह की मूर्ति खोजी गई। उसके बाद दारु (काठ) मूर्ति का पूजन आरम्भ हुआ। स्कन्द पुराण, वैष्णव, उत्कल खण्ड, अध्याय ७-
आसीत् कृतयुगे विप्रा इन्द्रद्युम्नो महानृपः। सूर्यवंशे स धर्मात्मा स्रष्टुः पञ्चमपुरुषः॥६॥
(६) इक्ष्वाकु वंश-इक्ष्वाकु (१-११-८५७६ ई.पू) से भगवान् राम तक जगन्नाथ उनके कुलदेवता रहे। यह सूर्यवंशी इन्द्रद्युम्न परम्परा में था। राम ने निर्वाण के पूर्व विभीषण को जगन्नाथ पूजा का भार दिया। अतः विभीषण के बड़े भाई रावण का उड्डीश तन्त्र यहां प्रचलित था। वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड, अध्याय १०८-
आराधय जगन्नाथमिक्ष्वाकु-कुल-दैवतम्॥२८॥ 
तथेति प्रतिजग्राह रामवाक्यं विभीषणः। राजा राक्षसमुख्यानां राघवाज्ञामनुस्मरन्॥२९॥
(७) खारावेल काल-खारावेल के उदयगिरि शिलालेख अनुसार नन्द अभिषेक (१६३४ ईपू) के ८०३ (त्रि-वसु-शत) वर्ष बाद उनके राज्य का चतुर्थ वर्ष था। अर्थात् ८३५ ईपू में उनका शासन आरम्ब हुआ। राज्य के तृतीय वर्ष में गन्धर्व वेद के विद्वानों को बुलाया तथा प्राचीन विद्याधर निवास की मरम्मत करायी। ये दोनों जगन्नाथ पूजा से सम्बन्धित है (इन्द्रद्युम्न काल में विद्यापति शबर ने मूर्ति खोजी थी)।
(८) शङ्कराचार्य काल (५०९-४७७ ईपू)-४८३ ईपू. में राजा सुधन्वा की सहायता से पुरी के गोवर्धन पीठ सहित ३ अन्य पीठों की स्थापना हुई। पुरी के शंकराचार्य को मुख्य पूजक तथा पुरी राजा को मुख्य सेवक कहा गया। इसके अतिरिक्त केवल नेपाल राजा को राजा रूप में दर्शन की अनुमति मिली क्योंकि तत्कालीन नेपाल राजा वृषदेव वर्मन ने मन्दिर स्थापना में सहायता की थी।
(९) हर्षवर्धन काल (६०५-६४७ ई) इस काल में हर्षवर्धन का ओड़िशा पर अधिकार था अतः उसने ६३७ ई तथा ६४२ ई. में नव कलेवर का आयोजन किया। पूर्व के लोकपाल इन्द्र हैं, अतः असम के राजा भास्करवर्मन् इसमें इन्द्र रूप में सम्मिलित हुए थे।
(१०) राजा अनङ्ग भीमदेव ने प्रायः ११०० ई. में वर्तमान जगन्नाथ मन्दिर का निर्माण किया। मन्दिर में प्राण प्रतिष्ठा के लिये रामानुजाचार्य (१०१७-११३७ ई.) आये थे। जगन्नाथ-स्थल-वृत्तान्तम् (जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, पुरी, २००५) के अनुसार यह ३ वर्ष में १२.४७ करोड़ स्वर्ण मुद्रा खर्च से बना था। इसके लिये मिट्टी भर कर भूमि उठाई गयी जिसमें पुराने मन्दिर का एक शिखर प्रायः डूबा हुआ है। उस समय ओड़िशा राज्य की वार्षिक आय ५० करोड़ स्वर्ण मुद्रा थी। पूरे भारत से आये तीर्थयात्रियों के लिये निःशुल्क भोजन और चिकित्सा की व्यवस्था थी।
(११) मुस्लिम तथा ब्रिटिश शासन काल में रथ यात्रा प्रतिबन्धित हुई या दर्शन के लिए भारी कर देना पड़ता था। १७५१ से १८०३ ई. तक मराठा शासन में जगन्नाथ यात्रा सभी हिन्दुओं के लिये सुलभ तथा कर-मुक्त हो गई। १८०३ ई. में अंग्रेजों ने ओड़िशा पर अधिकार करते ही १८०६ से लोथियन कमिटी की रिपोर्ट के अनुसार तीर्थयात्रियों पर भारी कर लगा दिया। यात्रियों को ४ श्रेणियों में बांटा-उत्तर के धनी (लाल) यात्रियों पर १० रुपये प्रति व्यक्ति, (२) दक्षिण के धनी यात्रियों पर ६ रुपये, (३) मध्यम वर्ग से २ रुपये, (४) निम्न वर्ग का प्रवेश मना तथा कोई फीस नहीं।  
(१२) १९४७ ई. में स्वाधीनता के बाद रथ यात्रा या दर्शन के लिए कोई कर नहीं है।
✍️ अरुण कुमार उपाध्याय।

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