दिल्ली 28.5 डिग्री अक्षांश पर स्थित है, और सूरज आज के दिन मध्याह्न के समय कर्क रेखा जो कि 23.5 डिग्री है, उसके ठीक ऊपर रहता है। कुतुबमीनार 5 डिग्री कोण से दक्षिण की ओर झुका है, तो सूरज ठीक इसके ऊपर चमकता है, ठीक इसकी लाइन में, और छाया इसीकारण धरती पर नजर नहींं आती।
कुतुबमीनार जैसा सब जानते हैं, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के खगोलविज्ञ वराहमिहिर के समय उनके निर्देश के अनुसार बनाया गया था, खगोलीय गणना के लिए, और इसीकारण इसका झुकाव 5 डिग्री दक्षिण की ओर रखा गया। इस मीनार के चारों ओर 27 मंदिर थे, नक्षत्र या तारामंडलों के लिए, जिसके ऊपर गोल गुंबद थे, और उनमें से 7-8 अभी भी बचे हैं। वराहमिहिर के नाम पर ही इस वेधशाला के इलाके का नाम मिहिरावली रखा गया, जो अब महरौली कहा जाता है।
ये एक छोटे से पर्वत के शिखर पर बनाया गया था, जिसे विष्णु गिरि कहा गया, और इस मीनार को विष्णु स्तंभ कहा जाता था।
भारतीय धातुकर्म जो उस समय अपने उत्कर्ष पर था, उसका इस्तेमाल करते हुए मंदिर के सामने धातु का जो स्तम्भ बना है, जो 1600 बरसों से बिना जंग लगे खड़ा होकर आज भी मेटालर्जी के आधुनिक वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य का विषय है, उसे गरुड़ स्तंभ कहा जाता था, जो विष्णु मंदिर का दीप स्तंभ भी था, उसपर ये जानकारियां ब्राह्मी लिपि में ढली है, जिसे इतिहास को मोड़ने के प्रेमी, मिटा नहींं पाए।
पहले ये विष्णु स्तंभ सात मंजिला था, जो भूकंप और रखरखाव के अभाव में 1200 ईस्वी तक आते आते टूटकर दो तीन मंजिला ही बच गया था। अब 800 बरस बिना मेन्टेनेंस के क्या चीज बच पाएगी?
एक टूटे हुए विष्णु स्तंभ को कुतुबमीनार में बदलने की प्रक्रिया 1192 में शुरु हुई, पर उसका 5 डिग्री का झुकाव बरकरार रखने की मजबूरी रही, और इसी कारण आज भी 21 जून को सूरज इसकी रेखा का आदर करते हुए धरती पर इसकी छाया गायब कर देता है।
(पुरानी पोस्ट है, पर हर बरस याद करना जरुरी है, कि कितना कुछ छीन लिया गया है, हमसे।)
Manish Soni ji 🙏
साभार- पलल्वी त्रिपाठी

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