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Wednesday, 2 September 2026

गीता का उपदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

॥ॐ॥

*श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष-*

  गीता का उपदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है

सफेद घोड़ों से जुते हुए विशाल रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अपने दिव्य शंख बजाये, अभिप्राय था कि यदि कौरव युद्घ का शंखनाद कर चुके हैं तो पाण्डव भी अब युद्घ के लिए तैयार हैं। कृष्ण ने अपना पांचजन्य, अर्जुन ने अपना देवदत्त भीम ने अपना पौण्ड्र, युधिष्ठिर ने अपना अनन्त विजय, नकुल व सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए। इसी प्रकार की शंखध्वनि अन्य महारथियों ने अपने-अपने रथों से करनी आरम्भ की।
  इसी समय अर्जुन ने अपने सारथी श्रीकृष्ण को आदेश दिया कि ”हे अच्युत! आप मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाकर खड़ा कीजिए। जिससे मैं युद्घ के लिए उपस्थित योद्घाओं को अपनी आंखों से देख सकूं। मैं यह भी देखना चाहता हूं कि कौन-कौन लोग हैं जिनसे मुझे युद्घ करना पड़ेगा?” तब श्रीकृष्ण जी ने भीष्म, द्रोण व अन्य उपस्थित राजाओं के समक्ष अपना रथ खड़ा करके अर्जुन को कहा कि-

सम्मुख तेरे सब खड़े राजा, भूप, नरेश।
 रणचण्डी बलि मांगती सुनो वीर गुडाकेश।।

युद्घ के लिए सन्नद्घ खड़े योद्घा स्वेच्छा से अपनी-अपनी बलि देने या किसी की बलि चढ़ाने के लिए यहां आये थे। स्वाभाविक था कि दोनों पक्षों के योद्घाओं की बलि रणचण्डी की भेंट चढऩी थी। प्रत्येक योद्घा अपनी-अपनी जीत सुनिश्चित मानकर युद्घ के लिए यहां पर उपस्थित है। दोनों पक्ष के योद्घा यह मानकर युद्घक्षेत्र में आये हैं कि युद्घ के पश्चात अपने शत्रु पक्ष को हराकर वह ही इस भूमण्डल पर राज करेगा।
  इसी समय एक दूसरी घटना घटित हो गयी कि अपने सगे सम्बन्धियों को इस कार्य के लिए उद्यत खड़े देखकर अर्जुन के शरीर में कंपकंपी सी आने लगी। उसने अपने सगे सम्बन्धियों को अपने आपसे ही लडऩे के लिए इस प्रकार खड़े देखकर आश्चर्य व्यक्त किया। उसे यह अपेक्षा नहीं थी कि तुझे यहां इतने सारे अपनों से युद्घ करना पड़ेगा ? ऐसी द्वन्द्वात्मक मानसिकता में फंसा अर्जुन श्रीकृष्णजी से कहने लगा कि-”मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुंह सूखा जा रहा है। शरीर में कंपकंपी उठ रही है, रोम खड़े हो रहे हैं। मेरे हाथ से गांडीव फिसला जा रहा है, त्वचा में दाह हो रहा है, मुझसे खड़ा नहीं रहा जाता, और मुझे चक्कर से आ रहे हैं। हे केशव! मुझे सारे लक्षण उल्टे ही दिखायी दे रहे हैं। युद्घ में अपने बन्धु-बान्धवों की हत्या करके कुछ भला होने वाला नहीं है। जिससे अब मुझे अपनों को मारकर ही मिलने वाली किसी विजय की अभिलाषा भी नहीं रही है। इतना ही नहीं, यदि मेरे अपनों से लडक़र ही मुझे राज्य मिलेगा तो मुझे ऐसे किसी राज्य की इच्छा नहीं रही है। मुझे सुखों की इच्छा भी नहीं है। सचमुच ऐसा राज्य लेकर क्या करना और सुखों का उपभोग करके भी क्या करना है ? -जो अपनों को मारकर ही प्राप्त किये जाते हैं। 
  हे केशव! जिनसे राज्य भोग तथा सुख की इच्छा की थी वे सब प्राण तथा धन का मोह त्यागकर युद्घ में आ खड़े हुए हैं। आचार्य, पिता, पुत्र, पितामह, मामा, श्वसुर, पौत्र, साले तथा अन्य सम्बन्धी युद्घभूमि में आ खड़े हैं। यदि इन लोगों के द्वारा मैं मार भी दिया जाऊं या तीनों लोकों के राज्य के हेतु भी मैं इनको मारने की इच्छा नहीं करता, फिर इस पृथ्वी के राज्य का तो कहना ही क्या है?”
   अर्जुन को आज ‘अपनों’ का सामना करना पड़ रहा है। वह नहीं चाहता कि इन अपनों को मारकर किसी प्रकार का राज्य भोगा जाए या कोई किसी प्रकार का सुख प्राप्त किया जाए। यही कारण है कि वह अपने ताऊजात भाईयों अर्थात धृतराष्ट्र पुत्रों को भी मारने में स्वयं को असमर्थ और असहाय अनुभव कर रहा है। वह कहता है कि अपनों को ही मारकर हम किस प्रकार सुखी रह सकते हैं? अर्जुन कहता है कि अपनों को मारना कुल क्षय करने के समान है। कुल क्षय होने से, पुरूषों का नाश होने से कुल की परम्पराएं बिगड़ जाती हैं, मर्यादाएं नष्ट हो जाती हैं, जिससे सम्पूर्ण कुटुम्ब और सम्पूर्ण समाज में अधर्म का बोलबाला हो जाता है। कुटुम्ब की महिलाएं बिगड़ जाती हैं, भ्रष्ट हो जाती हैं, जिससे वर्ण संकर हो जाता है, विभिन्न जातियों का मिश्रण हो जाता है। अन्तत: जाति-धर्म और राष्ट्र सब दूषित हो जाते हैं। नष्ट हो जाते हैं। ऐसा विनाश मचाने वाले लोग अनन्त काल तक नरक में बसते हैं। इसलिए मैं ऐसा पाप नहीं करूंगा जिससे समाज कुल व राष्ट्र की मर्यादाएं बिगड़ें।
   ऐसा कहकर अर्जुन ने अपने हथियार रख दिये और वह अपने रथ के पिछले भाग में जाकर बैठ गया।
  बस, यही वह स्थिति है जिसने ‘गीता’ का उपदेश देने के लिए कृष्ण जी को विवश कर दिया था। गीताकार ने इस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए जितने भी श्लोक रचे वे सब हमें कुछ न कुछ मौलिक सन्देश देते हैं। यह सन्देश जितना महाभारत के समय उपयोगी था-उतना ही आज भी है। गीताकार ने स्थिति को स्पष्ट करने के लिए विषय को विस्तार दिया है। इस बात को ध्यान में रखते हुए हमें स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए। 70 श्लोकी गीता में यह विषय विस्तार नहीं है। वह सीधे इस श्लोक से आरम्भ हो जाती है-

दृष्टवेमं स्वजनं कृष्णयुयुत्सु समुपस्थितम्। 
न च श्रेयो अनुपश्यामि हत्वा स्वजन माहवे।
 न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्य सुखानि च।।

अर्थात हे कृष्ण! अपने इष्ट मित्र, बन्धु बान्धवों को युद्घ की इच्छा से यहां पर एकत्र हुए देखकर मैं असीम दु:ख की अनुभूति कर रहा हूं। इन अपनों को मारकर मैं अपना कोई लाभ होता नहीं देख रहा। हे कृष्ण ! इस प्रकार की विजय राज्य और सुख की मुझे थोड़ी सी भी इच्छा नहीं है। 
  अगले श्लोक में अर्जुन कहता है कि ऐसी स्थिति में यदि मुझको धृतराष्ट्र की सन्तानें मार भी दें तो भी मेरा कल्याण ही होगा। इस पर कृष्ण जी ने अर्जुन को मानसिक अवसाद की इस स्थिति से उबारने के लिए गीतोपदेश देना आरम्भ किया। उन्होंने हथियार फेंक कर रथ के पृष्ठभाग में जा बैठे अर्जुन के भीतर व्याप्त हो गए कायरता के भावों को निकालने का प्रयास करते हुए गीता का उपदेश देना आरंभ किया। अर्जुन को समझाया कि तू आज जिस प्रकार की बचकानी हरकत कर रहा है, यह तेरे धर्म के अनुकूल नहीं है। ऐसी हरकत तेरी वीरता को कलंकित कर रही है। आज जब राक्षसों के संहार का सही समय आ गया है तो तुझे इस प्रकार का आचरण न करके उनके संहार के लिए स्वयं को प्रस्तुत करना चाहिए ।
 बस, यही वह भाव है जो गीता को सनातन बनाता है। गीता का यह उपदेश राष्ट्र के संदर्भ में आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना श्री कृष्ण जी के काल में प्रासंगिक था। इसीलिए गीता हमारे लिए प्रेरणास्पद ग्रंथ बन जाता है। 
डॉ राकेश कुमार आर्य 
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )

वयं राष्ट्रे जागृयाम

यह वह दर्द है जो गोस्वामी तुलसीदास की वाणी में उभर कर आया था ।

गोस्वामी तुलसीदास का लोटा चुराया, सोटा चुराया और उनकी भाँति भाँति से निन्दा भी की !..
यह वह दर्द है जो गोस्वामी तुलसीदास की वाणी में उभर कर आया था ।

मैं अपनी दिस कीन्ह निहोरा ,
 तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा ।
बायस पलिअहिं अति अनुरागा ,
 होंहि निरामिस कबहुं कि कागा ॥

 मैंने तो अपनी ओर से विनती ही की है , किन्तु क्या वे दुष्टता से चूकेंगे ? आप कौओं को पालियेगा किन्तु वे मांसाहार नहीं त्यागेंगे।

गगन चढहिं रज पवन प्रसंगा , 
कीचहिं मिलहि नीच जल संगा ।
साधु असाधु सदन सुक सारी ,
 सुमिरहिं राम देंहि गनि गारी ॥

हवा का संग पा कर धूल आकाश में चढ़ जाती है और वही धूल पानी के संग में कीच बन जाती है !
साधु के यहाँ के तोता-मैना राम राम रटते हैं और दुष्ट के घर के तोता-मैना गिन गिन कर गालियाँ देते हैं !

बूंद अघात सहहि गिरि कैसे. 
 खल के बचन सन्त सहि जैसे।

पर्वत पर वर्षा की बूंदें आघात कर रही हैं सन्त भी इसी प्रकार से खलवचन को सहन कर लेते हैं ।

हरि हर जस राकेस राहु से ,
 पर अकाज भट सहसबाहु से ।
जे पर दोष लखहिं सहसाखी , 
पर हित घृत जिनके मन माखी ॥

 सामान्य व्यक्ति की तो बात ही क्या ? वे हरि और हर के भी यश के लिए उसी प्रकार हैं , जैसे चन्द्रमा के लिए राहु ! किसी के भी यश के लिए वे राहु की तरह ग्रसने वाले हैं ! दूसरों के हित के विरुद्ध वे सहस्रबाहु की तरह हैं ! 
दूसरों के दोष देखने के लिए वे सहस्र आँख वाले हैं , दूसरों के हित के लिए वे ऐसे हैं , जैसे घी में मक्खी !

पर अकाज लगि तनु परिहरहीं ,
 जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं ।
बन्दउँ खल जस सेष सरोषा ,
  सहस बदन बरनहिं पर दोषा ॥

गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि मैं उन दुष्टजन की वन्दना करता हूँ , वे क्रोध के साथ दूसरों के दोष का बखान करने के लिए शेष नाग के समान हजार मुख वाले हैं ! जो परमार्थ में विघ्न करने के लिए अपने प्राण भी दे सकते हैं , जैसे ओले खेत का नाश कर के स्वयं भी नष्ट हो जाते हैं !

बहुरि बंदि खल गन सति भाँए ,
 जे बिनु काज दाहिने बाँए ।
पर हित हानि लाभ जिन केरें , 
उजरे हरख बिसाद बसेरें ॥

गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि मैं सच्चे भाव से उन दुष्टों की वन्दना करता हूँ , जो बिना प्रयोजन के ही दाहिने बाँए लगे रहते हैं !
गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि दूसरों की हित-हानि ही जिनके जीवन का एक मात्र पुरुषार्थ है , दूसरों को उजाड़ कर जिनको प्रसन्नता होती है और दूसरा कोई बस जाता है तो वे दुखी हो जाते हैं !

भलौ भलाइह पै लहइ , 
 लहइ निचाइह नीच ।
सुधा सराहिय अमरता 
गरल सराहिय मीच ॥
भला भलाई को ग्रहण करता है और नीच नीचता को ही प्राप्त करता है ,अमृत की प्रसिद्धि अमरता के लिए है और विष की प्रसिद्धि मृत्यु के लिए ।

उपजहिं एक संग जग माँहीं , 
जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं ।
सुधा सुरा सम साधु असाधू , 
जनक एक जग जलधि अगाधू ॥

कमल और जोंक जल में ही पैदा हुए किन्तु एक सुख देता है और दूसरा खून चूसता है । अमृत और शराब हालाँकि समुद्र से ही जनमे हैं , किन्तु दोनों में कितना अन्तर है ? शराब मोह प्रमाद और जड़ता में जकड़ देती है और अमृत जीवन की शक्ति हैं।

रंजन चतुर्वेदी 

योगविद्या द्वारा व्यक्तित्व और समाज का सर्वांगीण तेज

योगविद्या द्वारा व्यक्तित्व और समाज का सर्वांगीण तेज 
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            आत्मने मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व। 
            ओजसे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व। 
            आयुषे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व। 
     विश्वाभ्यो मे प्रजाभ्यो वर्चोदसौ वर्चसे पवेथाम्॥
             (यजुर्वेद : अध्याय ७ मन्त्र २८)

• अर्थ :  हे (वर्चोदाः) योग और ब्रह्मविद्या देने वाले विद्वन्! आप (मे) मेरे (आत्मने) इच्छादि गुणयुक्त चेतन के लिये (वर्चसे) अपने आत्मा के प्रकाश को (पवस्व) प्राप्त कीजिये। हे (वर्चोदाः) उक्त विद्या देने वाले विद्वन्! आप (मे) मेरे (ओजसे) आत्मबल होने के लिये (वर्चसे) योगबल को (पवस्व) जनाइये। हे (वर्चोदाः) बल देने वाले! (मे) मेरे (आयुषे) जीवन के लिये (वर्चसे) रोग छुड़ाने वाले औषध को (पवस्व) प्राप्त कीजिये। हे (वर्चोदसौ) योगविद्या के पढ़ने-पढ़ाने वालो! तुम दोनों (मे) मेरी (विश्वाभ्यः) समस्त (प्रजाभ्यः) प्रजाओं के लिये (वर्चसे) सद्गुण प्रकाश करने को (पवेथाम्) प्राप्त कराया करो। भावार्थ : योगविद्या के विना कोई भी मनुष्य पूर्ण विद्यावान् नहीं हो सकता और न पूर्णविद्या के विना अपने स्वरूप और परमात्मा का ज्ञान कभी होता है और न इसके विना कोई न्यायाधीश सत्पुरुषों के समान प्रजा की रक्षा कर सकता है, इसलिये सब मनुष्यों को उचित है कि इस योगविद्या का सेवन निरन्तर किया करें। 
(संदर्भ ग्रन्थ स्वामी दयानन्द कृत यजुर्वेद भाष्य)

• अर्थ-चिंतन : इस मन्त्र का मुख्य भाव यह है कि मनुष्य परमात्मा से अपने आत्मिक, मानसिक, शारीरिक तथा सामाजिक जीवन में वर्चस् और सामर्थ्य की वृद्धि की प्रार्थना करे। यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य का विकास किसी एक पक्ष तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसके आत्मिक, मानसिक, शारीरिक और सामाजिक - सभी आयामों का संतुलित उत्थान आवश्यक है। इसी उद्देश्य से मन्त्र बार-बार "वर्चोदाः" और "वर्चसे पवस्व" जैसे पदों का प्रयोग करता है।

मन्त्र का आरम्भ "आत्मने मे" से होता है। इसका आशय है कि मनुष्य का अन्तःकरण, उसका विवेक और आत्मचेतना ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हों। "वर्चोदाः" का अर्थ है - तेज, ज्ञान और आध्यात्मिक प्रकाश प्रदान करने वाला। मन्त्र में यह सम्बोधन ऐसे विद्वान् आचार्य के लिए है जो योगविद्या और ब्रह्मविद्या का उपदेश देता है। ऐसा गुरु शिष्य के भीतर आत्मज्ञान का दीप प्रज्वलित करता है, जिससे वह अपने वास्तविक स्वरूप, कर्तव्य और परमात्मा के साथ अपने सम्बन्ध को समझ सके। यही कारण है कि मन्त्र में "वर्चसे पवस्व" कहकर उस ज्ञानमय प्रकाश की प्राप्ति की प्रार्थना की गई है।

इसके बाद मन्त्र कहता है - "ओजसे मे वर्चादा वर्चसे पवस्व।" यहाँ ओजस् का अर्थ है शारीरिक बल, जीवनी-शक्ति, उत्साह और कार्यक्षमता। ज्ञान तभी फलदायी बनता है जब उसके साथ स्वस्थ शरीर और सशक्त व्यक्तित्व भी जुड़ा हो। योग, संयमित जीवन, उचित आहार, नियमित व्यायाम तथा अनुशासित दिनचर्या मनुष्य के ओज को बढ़ाते हैं। आधुनिक स्वास्थ्य-विज्ञान भी स्वीकार करता है कि नियमित योगाभ्यास, शारीरिक सक्रियता और मानसिक संतुलन शरीर की प्रतिरोधक क्षमता, ऊर्जा तथा कार्यक्षमता को बढ़ाते हैं।

अगला पद है - "आयुषे मे वर्चादा वर्चसे पवस्व।" इसका अभिप्राय दीर्घ, स्वस्थ और उपयोगी जीवन की कामना है। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ रोगों को दूर करने वाली औषधियों का सेवन आदि स्वास्थ्य-संरक्षण के व्यावहारिक उपाय भी अपनाने चाहिए। आयु का महत्त्व उसकी लम्बाई से अधिक उसके स्वास्थ्य, सदुपयोग और लोकहितकारी कर्मों में निहित है। योग, ब्रह्मचर्य, सात्त्विक जीवन, उचित चिकित्सा और औषधि - ये सभी दीर्घ एवं स्वस्थ जीवन के साधन हैं।

मन्त्र का अंतिम भाग - "विश्वाभ्यो मे प्रजाभ्यो वर्चोदसौ वर्चसे पवेथाम्" - व्यक्ति से आगे बढ़कर समाज की ओर संकेत करता है। यहाँ प्रार्थना की गई है कि समस्त प्रजा, समस्त संतति और समाज के सभी वर्ग ज्ञान, सद्गुण, चरित्र और तेज से सम्पन्न हों। एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण तभी होता है जब उसके नागरिक शिक्षित, स्वस्थ, नैतिक और कर्तव्यनिष्ठ हों। इसलिए वैदिक शिक्षा का लक्ष्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं, बल्कि समस्त समाज का उत्थान है।

वेदभाष्यकार ने मन्त्र के भावार्थ में विशेष रूप से कहा है कि योगविद्या के बिना मनुष्य पूर्ण विद्वान् नहीं बन सकता। योग के अभाव में आत्मा और परमात्मा का यथार्थ ज्ञान प्राप्त नहीं होता, और न ही मनुष्य न्याय, विवेक तथा उत्तरदायित्व के साथ समाज का नेतृत्व कर सकता है। इस प्रकार योग आत्मानुशासन, मनोनिग्रह, ज्ञान और ईश्वर-साक्षात्कार की ओर ले जाने वाली समग्र साधना है; शारीरिक व्यायाम उसका एक अंग मात्र है।

यह मन्त्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है। आधुनिक शिक्षा यदि ज्ञान के साथ चरित्र, स्वास्थ्य, आत्मबल और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करे, तभी उसका उद्देश्य पूर्ण होगा। वैदिक दृष्टि में सच्चा तेज वही है जो व्यक्ति को भीतर से प्रकाशित करे, उसके जीवन को स्वस्थ और उद्देश्यपूर्ण बनाए तथा उसके माध्यम से परिवार, समाज और राष्ट्र का भी कल्याण हो। यही इस मन्त्र का ऐसा सिद्धान्त है, जो देश, काल और परिस्थिति से परे सदैव प्रासंगिक रहता है।

                     -- ✍️भावेश मेरजा
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                      साभार डॉ विवेक आर्य 
                           वयं राष्ट्रे जागृयाम