प्रस्तुत लेख में स्वामी दयानन्द कृत पुस्तक ‘संस्कार-विधि’ से ही मृतक-पितर एवं श्राद्ध की सिद्धि की गई है। साथ ही विषयगत आर्ष-ग्रंथों के प्रमाण भी दिए गए हैं। तथा आर्यसमाज के आचार्यो को चुनौती हैं वे लेख में दिए तथ्यो को गलत सिद्ध करके दिखाएँ, इन प्रश्नों के उत्तर देकर दिखाएँ।
अपनी पुस्तक ‘संस्कार-विधि’ के ‘समावर्तन-प्रकरण’ में स्वामी दयानन्द लिखते हैं -
“इस मन्त्र से स्पर्श करके हाथ में जल ले, अपसव्य हो और दक्षिण की ओर मुख करके ‘ॐ पितरः शुन्धध्वम्’ इस मन्त्र से जल को भूमि पर छोड़ दे।” (पृष्ठ संख्या ९३)
अब प्रश्न उठते हैं कि -
१- अगर यहाँ स्वामी दयानन्द को जीवित पितर इष्ट होते, तो उन जीवित पितरों के शरीर पर ही जल फेंकते। मन्त्र पढ़कर, पितरों के नाम से जल को भूमि पर छोड़ना सिद्ध करता है कि स्वामी जी को मृतक पितर ही अभीष्ट हैं।
२- यहाँ पर ‘पितरः’ यह बहुवचन है, अर्थात् बहुत से पितरों की बात है। फिर अंजुलि-भर जल से आर्यसमाजियों के बहुत सारे जीवित पितर कैसे शुद्ध हो सकते हैं? अतः स्वामी जी को मृतक पितर ही अभीष्ट हैं।
३- स्वामी दयानन्द इस जल को भूमि पर छोड़ते समय अपसव्य, अर्थात् यज्ञोपवीत को बाएँ से दाएँ कंधे पर करने का आदेश देते हैं। भला जीवित पितरों को शुद्ध करने के लिए अपसव्य की क्या आवश्यकता है? अतः स्वामी जी को मृतक पितर ही अभीष्ट हैं।
४- स्वामी जी यह कार्य दक्षिणाभिमुख होकर करने की बात कहते हैं। क्या आर्यसमाजियों के सभी जीवित पितर दक्षिण दिशा में खाट बिछाए बैठे हैं? किसी अन्य दिशा में नहीं बैठते ?
५- स्वामी जी ने ‘ॐ पितरः शुन्धध्वम्’ मन्त्र का यजुर्वेद-भाष्य में अर्थ किया है - “हे विद्वानो, आप लोग शुद्ध होकर हमको शुद्ध कीजिए।” तब प्रश्न यह भी उठता है कि - यहाँ अपसव्य करके, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, एक अंजुलि-भर जल भूमि पर डालकर आर्यसमाजी भूमि को शुद्ध कर रहे हैं अथवा अपने जीवित पितरों को? आर्यसमाजी इन सभी प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास कर सकते हैं। किन्तु स्पष्ट ही यहाँ स्वामी दयानन्द के कथन से मृतक पितरों की सिद्धि होती है।
इसके उत्तर में आर्यसमाजी यदि कहें कि ‘पितृ’ पद से जल, अग्नि या सूर्य की किरणों का ग्रहण है, तब वे बताएँ कि एक अंजुलि जल भूमि पर डालने से इनको क्या लाभ? जनेऊ दाहिने कंधे पर करने और दक्षिण की ओर मुख करने का क्या उत्तर है? यहाँ स्वामी जी ने ‘शुद्ध’ करने की बात कही, तो क्या ये सूर्य, अग्नि, जल आदि पहले अशुद्ध थे और आपके जल छिड़कने से शुद्ध हो गए?
अतः स्पष्ट है कि जिन मृतक तथा दिव्य पितरों का शास्त्रानुसार दक्षिण दिशा से सम्बन्ध है और अपसव्य (जनेऊ दाएँ-बाएँ) करने का निर्देश है, जिससे कि वे सूक्ष्म होने से खिंचे आते हैं और सूक्ष्मतावश थोड़े से ही जल से जिनका संस्कार व तर्पण हो जाता है, यहाँ उन पितरों का ही ग्रहण सिद्ध होता है।
गोभिलगृह्यसूत्र में कहा गया है -
“सव्यं बाहुमुद्धृत्य शिरोऽवधाय दक्षिणांसे प्रतिष्ठापयति, सव्यं कक्षमन्ववलम्बं भवति, एवं प्राचीनावीती भवति।” (१।२।३)
यह प्राचीनावीती (अपसव्य) की परिभाषा है। आगे कहा गया है -
“पितृयज्ञे त्वेव प्राचीनावीती भवति।” (१।२।४)
यहाँ पितरों के कार्य में जनेऊ अपसव्य करना पड़ता है। और श्राद्ध-प्रकरण में ‘पितृ’ शब्द मृत पितरों का वाचक है।
“त्रेधा भागो निहितो यः पुरा वो देवानां पितॄणां मर्त्यानाम्।” (अथर्ववेद ११।१।१५) में पितरों, देवताओं और मनुष्यों को ‘त्रेधा’ पद से तीन बताकर भिन्न-भिन्न सिद्ध किया है। इस अथर्ववेद के प्रमाण से पितर जीवित मनुष्य से भिन्न सिद्ध होते हैं।
“देवकृतस्यैनसोऽवयजनमसि मनुष्यकृतस्यैनसोऽवयजनमसि पितृकृतस्यैनसोऽवयजनमसि।” (यजुर्वेद ८।१३) तथा “वशेदं सर्वमभवद्देवा मनुष्या३ असुराः पितर ऋषयः।” (अथर्ववेद १०।१०।२६) यहाँ भी मनुष्यों और पितरों का भेद स्पष्ट है।
मनुस्मृति में भी प्रमाण है - “पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनम्।” (मनु. १२।९४)
तथा “पितरश्चैव साध्याश्च द्वितीया सात्त्विकी गतिः।” (मनुस्मृति १२।४९)
अर्थात् पितर तथा साध्य - यह सत्त्वगुण से उत्पन्न गति बताई गई है। ये मनुष्यों से सर्वथा भिन्न सिद्ध होते हैं।
“तानि वा एतानि चत्वार्यम्भांसि देवा मनुष्याः पितरोऽसुराः।” (तैत्तिरीय ब्राह्मण २।३।८) इन स्थलों में देवता, मनुष्य और पितर तीनों को भिन्न माना गया है।
स्वामी दयानन्द भी संस्कार-विधि के पितृयज्ञ में “पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः” कहकर पितरों को स्वधा-योग्य और शालाकर्म-विधि में “देवेभ्यः ... स्वाहा” कहकर देवताओं को स्वाहा-योग्य बताकर देव, पितर और मनुष्य का भेद स्पष्ट कर देते हैं।
“अथैनं पितरः प्राचीनावीतिनः सव्यं जानु आच्य उपासीदीन्।” (शतपथ २।४।२।२) आदि प्रमाणों से मृतक-पितृकर्म का प्राचीनावीती (अपसव्य) होकर करने का विधान है।
आपस्तम्ब गृह्यसूत्र का भी प्रमाण है - “अपरपक्षे पित्र्याणि प्राचीनावीतिना।” (१।१।७।८)
आश्वलायन श्रौतसूत्र - “तेषां दक्षिणत उत्तानाङ्गुलीः करोति, प्राचीनावीती तूष्णीं ‘स्वधा पितृभ्यः’ इति वा।” (२।३)
वैखानस गृह्यसूत्र में - “प्राचीनावीती पित्र्याणि करोति।” (१।४)
यहाँ प्राचीनावीती का लक्षण है -
“दक्षिणहस्तमुद्धृत्य उपवीतं धारयेदिति उपवीती। वामभुद्-धृत्य प्राचीनावीती। कण्ठसक्ते निवीती भवति।” (वैखानस गृह्य १।५)
मनुस्मृति में -
“सव्ये प्राचीन आवीती।” (२।६)
यदि पितर और मनुष्य आदि भिन्न योनियों के न होते, तो “निवीतं मनुष्याणाम्, प्राचीनावीतं पितृणाम्, उपवीतं देवानाम्।” (मीमांसादर्शन ३।४।१) उनकी क्रियाओं में भेद नहीं होता।
अतः उपरोक्त समस्त प्रमाणों से पितृकर्म में प्राचीनावीती होने के विधान से पितर, मनुष्यों से भिन्न सिद्ध होते हैं। मृतक ही इस लोक से पितृलोक में जाकर भिन्न योनि प्राप्त करते हैं, पितर कहे जाते हैं। मीमांसा शाबर ३।४।७ एवं ३।४।९ में यह निर्दिष्ट है। तथा “उपवीतं लिङ्गदर्शनात्” इस मीमांसा-सूत्र में प्राप्त वृत्तिकार के सूत्र के वार्तिक में - “मृताग्निहोत्रे हि पितृदेवत्ये श्रूयते, प्राचीनावीती दोहयते, यज्ञोपवीती देवेभ्यो दोहयते।” यहाँ पितृदेव-संबंधी कर्म में ‘मृत’ शब्द प्रत्यक्ष दिखाई देता है।
यह सब जानते हुए ही, सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम संस्करण में स्वामी दयानन्द ने कहा है -
“देव कर्मों को उपवीती होकर करे, पूर्व दिशा की ओर मुख करके देव-तर्पण करे। ... दक्षिण की ओर मुख करके प्राचीनावीती और पितृतीर्थ से पितृकर्म तर्पण और श्राद्ध करना चाहिए। देव-तर्पण में एक बार एक मन्त्र पढ़के एक अंजुलि देवे और पितृतर्पण में एक बार मन्त्र पढ़के एक अंजुलि देवे, दूसरी बार मन्त्र पढ़के दूसरी अंजुलि देवे आदि आदि।” (सत्यार्थ प्रकाश)
अतः स्वामी दयानन्द के कथन और शास्त्र-वाक्यों से मृतक-पितृकर्म में अपसव्य और दक्षिणाभिमुख होकर करना सिद्ध है। स्वामी दयानन्द ने भी संस्कार-विधि में वह मृतक पितरों के लिए लिखा है, यह अधिक स्पष्ट हुआ, क्योंकि जीवित पितरों के लिए तो यह सब कुछ व्यर्थ ही सिद्ध होता है।
संस्कार-विधि के ‘नामकरण-संस्कार’ में
स्वामी दयानन्द लिखते हैं - “जिस तिथि नक्षत्र में बालक का जन्म हो, उस तिथि और उस नक्षत्र के नाम से तथा उस तिथि के देवता के नाम से घृत की आहुति अग्नि में दे।”
इसी पृष्ठ की टिप्पणी में अमावस्या तिथि तथा मघा नक्षत्र के देवता ‘पितर’ बताए गए हैं।
१- अब आर्यसमाजी बताएँ कि ये जो तिथि और नक्षत्र के देवता पितर हैं, ये जीवित हैं या मृत? यदि कहें कि मृत, तो अग्नि में आहुति देने से मृतक-श्राद्ध सिद्ध हो गया। अगर कहें कि ‘ये जीवित पितर हैं’, तब उनका अमावस्या तिथि और मघा नक्षत्र के साथ क्या सम्बन्ध है? क्या आर्यसमाजियों के ये जीवित पितर अन्य तिथियों में कहीं और चले जाते हैं? यदि नहीं, तो फिर ये अन्य तिथियों के भी देवता क्यों नहीं माने गए? यज्ञ में घी की आहुति देने पर ये जीवित पितर कैसे तृप्त होंगे? यदि जीवित पितर ही यहाँ इष्ट थे, तो अग्नि में आहुति क्यों? सीधे कटोरी लगाकर अपने जीवित पितरों के मुँह में घी उड़ेल देते? और ऐसा करते समय मन्त्र-पाठ की क्या आवश्यकता है? इस कर्म का कारण और फल क्या है? ये वे प्रश्न हैं, जिनके सीधे उत्तर आर्यसमाजियों से देते नहीं बनते।
कुछ आर्यसमाजी इज्जत बचाने के लिए कह देते हैं कि यहाँ ऋतुओं को पितर कहा गया है। अगर ऐसा मानें, तो भी उन्हें उत्तर देना चाहिए कि तब इसका क्या फल है? ऋतुएँ अमावस्या की देवता कैसे हैं? क्या अन्य तिथियों में ऋतुएँ नहीं होतीं? क्या ऋतुएँ आपके दिए हुए घी को खाएँगी? मन्त्र-पाठ से क्या ऋतुएँ आ जाएँगी? कितना भी प्रयास कर लें, तर्कप्रधान बनने वाले आर्यसमाजी यहाँ जीवित पितर सिद्ध नहीं कर सकते।
“ये च जीवा ये च मृता ये जाता ये च यज्ञियाः। तेभ्यो घृतस्य कुल्यैतु मधुधाराव्युन्दती।” (अथर्ववेद १८।४।५७) में मृत पितरों के नाम से घृत-प्रवाह डालने से उनकी तृप्ति लिखी है।
इसके अतिरिक्त - संस्कार-विधि पुस्तक के ही गृहाश्रम-प्रकरण में स्वामी दयानन्द पितृयज्ञ की बलिवैश्वदेव-विधि में पूर्व दिशा में इन्द्र के नाम से घी-मिश्रित भात या जो कुछ भी पूरी, हलवा आदि बने हों, उनका ग्रास रखवाते हैं। दक्षिण दिशा में यम के नाम का, पश्चिम में वरुण के नाम का, उत्तर में सोमदेव के नाम का ग्रास रखते हैं। इस प्रकार भिन्न-भिन्न देवताओं के नाम के ग्रास वे भिन्न-भिन्न दिशाओं में रखते हैं। यहीं पर स्वामी दयानन्द “ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः” इस मन्त्र के साथ पितरों के लिए दक्षिण दिशा में ग्रास रखते हैं। यहाँ स्पष्ट ही स्वामी दयानन्द मृतक पितरों के लिए अन्न रखवा रहे हैं।
आगे स्वामी दयानन्द लिखते हैं कि - “यदि इन्हें रखते समय कोई अतिथि आ जाए तो उसे ये दे दे, अन्यथा अग्नि में धर दे।”
इससे सिद्ध होता है कि स्वामी जी द्वारा निकलवाया गया ग्रास अतिथि के माध्यम से पितरों के पास पहुँचेगा। हिन्दू भी ब्राह्मण को ही खिलाते हैं। और अगर कोई ब्राह्मण उपस्थित न हो, तो ग्रास निकालकर हिन्दू भी अग्नि में ही डालते हैं, स्वामी जी भी अग्नि में ही डलवा रहे हैं।
यहाँ पर स्वामी दयानन्द को मृतक पितर ही अभीष्ट हैं। यह पूर्णतः सिद्ध होता है, क्योंकि यदि स्वामी दयानन्द को यहाँ जीवित पितर इष्ट होते, तो पितरों के नाम से निकाले गए ग्रास वे सीधे जीवित पितरों को क्यों नहीं खिलवा रहे? उनके स्थान पर पितरों के नाम से निकाला अन्न-ग्रास किसी अतिथि को क्यों खिलवा रहे हैं या अग्नि में क्यों डलवा रहे हैं?
इसके आगे स्वामी दयानन्द ने मनुस्मृति का श्लोक भी लिखा है, जिसके अर्थ में वे लिखते हैं - “कुत्ता, पतित, चण्डाल, पापरोगी, कौवा और कृमि, इन छह नामों से छह भाग (अन्न के) पृथ्वी पर धरे और ये छह भाग जिस-जिस के नाम के हैं, उसी को देने चाहिए।”
यहाँ पर कुत्ता, रोगी, कौवा आदि जीवित हैं, इसलिए स्वामी जी उनका ग्रास केवल उनको ही दिलवा रहे हैं। किन्तु देवता और मृतक पितर सदेह उपस्थित नहीं हैं, इसलिए उनके नाम से निकाले गए ग्रास स्वामी जी अतिथियों को खिलवा रहे हैं या अग्नि में डलवा रहे हैं।
इस प्रकार स्वामी दयानन्द की ही पुस्तक से, उनके कहे विधान से मृतक-पितरों का श्राद्ध सिद्ध होता है। तब प्रश्न उठता हैं कि - स्वामी दयानन्द ने अपना मत बदल क्यो लिया ?
बात यह हैं कि स्वामी दयानन्द भ्रांत पुरुष थे, वे विभिन्न विषयों पर अपना मत आए दिन बदला करते थे। प्रथम सत्यार्थ प्रकाश लिखने के कई वर्ष बाद तक ये श्राद्ध को वैदिक माना करते थे, फिर ईसाइयों के प्रभाव में आकर इन्हौने कुछ वर्ष श्राद्ध को मानना बंद कर दिया , किन्तु थोड़े समय बाद फिर यह मृतक पितरों का श्राद्ध मानने लगे थे। इसीलिए इनकी पुस्तकों में दोनों ही पक्षों के समर्थन वाक्य मिला करते हैं। किन्तु यह संस्कार विधि पुस्तक दयानन्द स्वामी ने सबसे अंत में लिखी है अतः इससे स्पष्ट होता है कि मरने से पहले वे श्राद्ध तर्पण आदि को स्वीकार करने लगे थे। अतः आर्यसमाजियों को चाहिए कि दयानन्द के कहे अनुसार वे पितरों का श्राद्ध तर्पण आदि किया करे। क्यो कि वेद आदि शास्त्रो को तो ये प्रमाण मानते नहीं हैं।
✍️ शचीन्द्र शर्मा
( फेसबुक पोस्ट दिनांक 30 सितंबर 2026 ईस्वी
बुधवार आश्विन कृ ४ विक्रम संवत २०८३ )