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Wednesday, 2 September 2026

यह वह दर्द है जो गोस्वामी तुलसीदास की वाणी में उभर कर आया था ।

गोस्वामी तुलसीदास का लोटा चुराया, सोटा चुराया और उनकी भाँति भाँति से निन्दा भी की !..
यह वह दर्द है जो गोस्वामी तुलसीदास की वाणी में उभर कर आया था ।

मैं अपनी दिस कीन्ह निहोरा ,
 तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा ।
बायस पलिअहिं अति अनुरागा ,
 होंहि निरामिस कबहुं कि कागा ॥

 मैंने तो अपनी ओर से विनती ही की है , किन्तु क्या वे दुष्टता से चूकेंगे ? आप कौओं को पालियेगा किन्तु वे मांसाहार नहीं त्यागेंगे।

गगन चढहिं रज पवन प्रसंगा , 
कीचहिं मिलहि नीच जल संगा ।
साधु असाधु सदन सुक सारी ,
 सुमिरहिं राम देंहि गनि गारी ॥

हवा का संग पा कर धूल आकाश में चढ़ जाती है और वही धूल पानी के संग में कीच बन जाती है !
साधु के यहाँ के तोता-मैना राम राम रटते हैं और दुष्ट के घर के तोता-मैना गिन गिन कर गालियाँ देते हैं !

बूंद अघात सहहि गिरि कैसे. 
 खल के बचन सन्त सहि जैसे।

पर्वत पर वर्षा की बूंदें आघात कर रही हैं सन्त भी इसी प्रकार से खलवचन को सहन कर लेते हैं ।

हरि हर जस राकेस राहु से ,
 पर अकाज भट सहसबाहु से ।
जे पर दोष लखहिं सहसाखी , 
पर हित घृत जिनके मन माखी ॥

 सामान्य व्यक्ति की तो बात ही क्या ? वे हरि और हर के भी यश के लिए उसी प्रकार हैं , जैसे चन्द्रमा के लिए राहु ! किसी के भी यश के लिए वे राहु की तरह ग्रसने वाले हैं ! दूसरों के हित के विरुद्ध वे सहस्रबाहु की तरह हैं ! 
दूसरों के दोष देखने के लिए वे सहस्र आँख वाले हैं , दूसरों के हित के लिए वे ऐसे हैं , जैसे घी में मक्खी !

पर अकाज लगि तनु परिहरहीं ,
 जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं ।
बन्दउँ खल जस सेष सरोषा ,
  सहस बदन बरनहिं पर दोषा ॥

गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि मैं उन दुष्टजन की वन्दना करता हूँ , वे क्रोध के साथ दूसरों के दोष का बखान करने के लिए शेष नाग के समान हजार मुख वाले हैं ! जो परमार्थ में विघ्न करने के लिए अपने प्राण भी दे सकते हैं , जैसे ओले खेत का नाश कर के स्वयं भी नष्ट हो जाते हैं !

बहुरि बंदि खल गन सति भाँए ,
 जे बिनु काज दाहिने बाँए ।
पर हित हानि लाभ जिन केरें , 
उजरे हरख बिसाद बसेरें ॥

गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि मैं सच्चे भाव से उन दुष्टों की वन्दना करता हूँ , जो बिना प्रयोजन के ही दाहिने बाँए लगे रहते हैं !
गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि दूसरों की हित-हानि ही जिनके जीवन का एक मात्र पुरुषार्थ है , दूसरों को उजाड़ कर जिनको प्रसन्नता होती है और दूसरा कोई बस जाता है तो वे दुखी हो जाते हैं !

भलौ भलाइह पै लहइ , 
 लहइ निचाइह नीच ।
सुधा सराहिय अमरता 
गरल सराहिय मीच ॥
भला भलाई को ग्रहण करता है और नीच नीचता को ही प्राप्त करता है ,अमृत की प्रसिद्धि अमरता के लिए है और विष की प्रसिद्धि मृत्यु के लिए ।

उपजहिं एक संग जग माँहीं , 
जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं ।
सुधा सुरा सम साधु असाधू , 
जनक एक जग जलधि अगाधू ॥

कमल और जोंक जल में ही पैदा हुए किन्तु एक सुख देता है और दूसरा खून चूसता है । अमृत और शराब हालाँकि समुद्र से ही जनमे हैं , किन्तु दोनों में कितना अन्तर है ? शराब मोह प्रमाद और जड़ता में जकड़ देती है और अमृत जीवन की शक्ति हैं।

रंजन चतुर्वेदी 

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