Pages

Monday, 1 June 2026

दरिद्रता नाशक " श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र "

✨ क्या आपने कभी ऐसा स्तोत्र पढ़ा है जिसे शास्त्रों में दारिद्र्य-शमन, भय-नाश, सौभाग्य-वृद्धि और दिव्य ऐश्वर्य का आह्वान करने वाला बताया गया है?

✨सर्वप्रथम इस दिव्य स्तोत्र का परिचय सह विधि✨

नन्दी जी ने मनुष्यो की दरिद्रता नाश करने के लिये महर्षि मार्कण्डेय जी से इस स्तोत्रका वर्णन किया था और कहा था कि जिनकी कुण्डली में धन भाव का सम्बन्घ क्रूर ग्रहों से है, अनेक अनुष्ठानों के बाद भी धन की परेशानी खत्म नही हो रही है तो उसे नित्य ४१ दिन तक साधना नियमों के साथ निम्नलिखित पाठ करके ५ माला मंत्र जप करना चाहिये | ऐसा करने से निश्चय ही उत्तम धन लाभ होगा | 
इस “श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र ” की चर्चा “रूद्र यामल तन्त्र” में शिव जी ने नन्दी जी से की थी।
जब १०० वर्षो तक देवासुर संग्राम में युद्धके कारण कुबेर जी को जब धन की भारी हानि हुई और उसी समय इस युद्ध से माँ लक्ष्मी जी भी धनहीन हो गयी, तव यह दोनों देव भगवान शिव की शरण में गये |
सभी देवताओं सहित नन्दी जी ने यक्षराज कुबेर जी एवं माता लक्ष्मी जी को पुनः धनवान बनाने के लिये शिव जी से प्रश्न किया कि कुबेर व लक्ष्मी के खाली स्वर्ण भण्डार फिर से कैसे भरे जा सकते हैं ?
तब भगवान शिव ने नन्दी जी को माध्यम से भगवति के अविनाशी धाम “श्री मणिद्वीप” के कोषाध्यक्ष “श्री स्वर्णाकर्षण भैरव नाथ भगवान” की महिमा और उनके वैभव का वर्णन किया और उनकी शरण में जाने को कहा । 
फिर लक्ष्मी जी और कुबेर जी ने विशालातीर्थ (बद्रीविशाल धाम) में भीषण तप किया तब “भगवान स्वर्णाकर्षण भैरव नाथ जी” ने स्वयं प्रगट होकर उन्हें दर्शन दिये तथा चारों भुजाओं से धन की वर्षा की जिससे पुनः सभी देवता श्री सम्पन्न हो गए।
वही साधना विधान नीचे बतलाया जा रहा है |
धार्मिक पुस्तकों में मिले वर्णन के अनुसार स्वर्णाकर्षण भैरव पाताल में निवास करते हैं। इनकी उपासना का समय रात्रि १२ बजे से ३ बजे तक है। उपासकों का कहना है कि इनकी उपस्थिति का अनुमान गंध के माध्यम से किया जाता है। इसी कारण श्वान को इनकी सवारी बताया गया है जो गंध सूंघने में माहिर होता है।

॥ रुद्रयामल तन्त्रोक्त श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र ॥

यह स्तोत्र केवल बाहरी धन का नहीं…
यह भीतर की स्थिरता, तेज, सुरक्षा, निर्भयता, कृपा और दिव्य समृद्धि का भी आह्वान है।  
जो साधक भैरव उपासना की गंभीरता को समझते हैं, वे जानते हैं कि कुछ स्तोत्र केवल पढ़े नहीं जाते — उन्हें श्रद्धा से ग्रहण किया जाता है, जिया जाता है, और साधना में उतारा जाता है।

🔸 शास्त्रीय संकेत: यह स्तोत्र शुचिता, श्रद्धा, गुरु-भक्ति और मर्यादित भाव से पाठ करने योग्य माना गया है।
🔸 इसलिए इसे केवल पोस्ट की तरह नहीं, साधना-स्मृति की तरह सहेजें।
🔸 पोस्ट को Save करें, ताकि आवश्यकता पड़ने पर यह दिव्य पाठ आपके पास सुरक्षित रहे।

॥ विनियोग ॥
ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-स्तोत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-देवता, ह्रीं बीजं, क्लीं शक्ति, सः कीलकम्, मम-सर्व-काम-सिद्धयर्थे पाठे विनियोगः ।

॥ ध्यान ॥
मन्दार-द्रुम-मूल-भाजि विजिते रत्नासने संस्थिते ।
दिव्यं चारुण-चञ्चुकाधर-रुचा देव्या कृतालिंगनः ।।
भक्तेभ्यः कर-रत्न-पात्र-भरितं स्वर्ण दधानो भृशम् ।
स्वर्णाकर्षण-भैरवो भवतु मे स्वर्गापवर्ग-प्रदः ।।

॥ स्तोत्रम् ॥
।। श्री मार्कण्डेय उवाच ।।
भगवन् ! प्रमथाधीश ! शिव-तुल्य-पराक्रम !
पूर्वमुक्तस्त्वया मन्त्रं, भैरवस्य महात्मनः ।१।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि, तस्य स्तोत्रमनुत्तमं ।
तत् केनोक्तं पुरा स्तोत्रं, पठनात्तस्य किं फलम् ।२।
तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि, ब्रूहि मे नन्दिकेश्वर ! ।३।

।। श्री नन्दिकेश्वर उवाच ।।
इदं ब्रह्मन् ! महा-भाग, लोकानामुपकारक !
स्तोत्रं वटुक-नाथस्य, दुर्लभं भुवन-त्रये ।।४।।
सर्व-पाप-प्रशमनं, सर्व-सम्पत्ति-दायकम् ।
दारिद्र्य-शमनं पुंसामापदा-भय-हारकम् ।।५।।
अष्टैश्वर्य-प्रदं नृणां, पराजय-विनाशनम् ।
महा-कान्ति-प्रदं चैव, सोम-सौन्दर्य-दायकम् ।।६।।
महा-कीर्ति-प्रदं स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः ।
न वक्तव्यं निराचारे, हि पुत्राय च सर्वथा ।।७।।
शुचये गुरु-भक्ताय, शुचयेऽपि तपस्विने ।
महा-भैरव-भक्ताय, सेविते निर्धनाय च ।।८।।
निज-भक्ताय वक्तव्यमन्यथा शापमाप्नुयात् ।
स्तोत्रमेतत् भैरवस्य, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मनः ।।९।।
श्रृणुष्व ब्रूहितो ब्रह्मन् ! सर्व-काम-प्रदायकम् ।।१०।।

ॐ नमस्तेऽस्तु भैरवाय, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मने,
नमः त्रैलोक्य-वन्द्याय, वरदाय परात्मने ।।१२।।
रत्न-सिंहासनस्थाय, दिव्याभरण-शोभिने ।
नमस्तेऽनेक-हस्ताय, ह्यनेक-शिरसे नमः ।
नमस्तेऽनेक-नेत्राय, ह्यनेक-विभवे नमः ।।१३।।
नमस्तेऽनेक-कण्ठाय, ह्यनेकान्ताय ते नमः ।
नमोस्त्वनेकैश्वर्याय, ह्यनेक-दिव्य-तेजसे ।।१४।।
अनेकायुध-युक्ताय, ह्यनेक-सुर-सेविने ।
अनेक-गुण-युक्ताय, महा-देवाय ते नमः ।।१५।।
नमो दारिद्रय-कालाय, महा-सम्पत्-प्रदायिने ।
श्रीभैरवी-प्रयुक्ताय, त्रिलोकेशाय ते नमः ।।१६।।
दिगम्बर ! नमस्तुभ्यं, दिगीशाय नमो नमः ।
नमोऽस्तु दैत्य-कालाय, पाप-कालाय ते नमः ।।१७।।
सर्वज्ञाय नमस्तुभ्यं, नमस्ते दिव्य-चक्षुषे ।
अजिताय नमस्तुभ्यं, जितामित्राय ते नमः ।।१८।।
नमस्ते रुद्र-पुत्राय, गण-नाथाय ते नमः ।
नमस्ते वीर-वीराय, महा-वीराय ते नमः ।।१९।।
नमोऽस्त्वनन्त-वीर्याय, महा-घोराय ते नमः ।
नमस्ते घोर-घोराय, विश्व-घोराय ते नमः ।।२०।।
नमः उग्राय शान्ताय, भक्तेभ्यः शान्ति-दायिने ।
गुरवे सर्व-लोकानां, नमः प्रणव-रुपिणे ।।२१।।
नमस्ते वाग्-भवाख्याय, दीर्घ-कामाय ते नमः ।
नमस्ते काम-राजाय, योषित्कामाय ते नमः ।।२२।।
दीर्घ-माया-स्वरुपाय, महा-माया-पते नमः ।
सृष्टि-माया-स्वरुपाय, विसर्गाय सम्यायिने ।।२३।।
रुद्र-लोकेश-पूज्याय, ह्यापदुद्धारणाय च ।
नमोऽजामल-बद्धाय, सुवर्णाकर्षणाय ते ।।२४।।
नमो नमो भैरवाय, महा-दारिद्रय-नाशिने ।
उन्मूलन-कर्मठाय, ह्यलक्ष्म्या सर्वदा नमः ।।२५।।
नमो लोक-त्रेशाय, स्वानन्द-निहिताय ते ।
नमः श्रीबीज-रुपाय, सर्व-काम-प्रदायिने ।।२६।।
नमो महा-भैरवाय, श्रीरुपाय नमो नमः ।
धनाध्यक्ष ! नमस्तुभ्यं, शरण्याय नमो नमः ।।२७।।
नमः प्रसन्न-रुपाय, ह्यादि-देवाय ते नमः ।
नमस्ते मन्त्र-रुपाय, नमस्ते रत्न-रुपिणे ।।२८।।
नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, सुवर्णाय नमो नमः ।
नमः सुवर्ण-वर्णाय, महा-पुण्याय ते नमः ।।२९।।
नमः शुद्धाय बुद्धाय, नमः संसार-तारिणे ।
नमो देवाय गुह्याय, प्रबलाय नमो नमः ।।३०।।
नमस्ते बल-रुपाय, परेषां बल-नाशिने ।
नमस्ते स्वर्ग-संस्थाय, नमो भूर्लोक-वासिने ।।३१।।
नमः पाताल-वासाय, निराधाराय ते नमः ।
नमो नमः स्वतन्त्राय, ह्यनन्ताय नमो नमः ।।३२।।
द्वि-भुजाय नमस्तुभ्यं, भुज-त्रय-सुशोभिने ।
नमोऽणिमादि-सिद्धाय, स्वर्ण-हस्ताय ते नमः ।।३३।।
पूर्ण-चन्द्र-प्रतीकाश-वदनाम्भोज-शोभिने ।
नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, स्वर्णालंकार-शोभिने ।।३४।।
नमः स्वर्णाकर्षणाय, स्वर्णाभाय च ते नमः ।
नमस्ते स्वर्ण-कण्ठाय, स्वर्णालंकार-धारिणे ।।३५।।
स्वर्ण-सिंहासनस्थाय, स्वर्ण-पादाय ते नमः ।
नमः स्वर्णाभ-पाराय, स्वर्ण-काञ्ची-सुशोभिने ।।३६।।
नमस्ते स्वर्ण-जंघाय, भक्त-काम-दुघात्मने ।
नमस्ते स्वर्ण-भक्तानां, कल्प-वृक्ष-स्वरुपिणे ।।३७।।
चिन्तामणि-स्वरुपाय, नमो ब्रह्मादि-सेविने ।
कल्पद्रुमाधः-संस्थाय, बहु-स्वर्ण-प्रदायिने ।।३८।।
भय-कालाय भक्तेभ्यः, सर्वाभीष्ट-प्रदायिने ।
नमो हेमादि-कर्षाय, भैरवाय नमो नमः ।।३९।।
स्तवेनानेन सन्तुष्टो, भव लोकेश-भैरव !
पश्य मां करुणाविष्ट, शरणागत-वत्सल !
श्रीभैरव धनाध्यक्ष, शरणं त्वां भजाम्यहम् ।
प्रसीद सकलान् कामान्, प्रयच्छ मम सर्वदा ।।४०।।

॥ फलश्रुति ॥
श्रीमहा-भैरवस्येदं, स्तोत्र सूक्तं सु-दुर्लभम् ।
मन्त्रात्मकं महा-पुण्यं, सर्वैश्वर्य-प्रदायकम् ।।४१।।
यः पठेन्नित्यमेकाग्रं, पातकैः स विमुच्यते ।
लभते चामला-लक्ष्मीमष्टैश्वर्यमवाप्नुयात् ।।४२।।
चिन्तामणिमवाप्नोति, धेनुं कल्पतरुं ध्रुवम् ।
स्वर्ण-राशिमवाप्नोति, सिद्धिमेव स मानवः ।।४३।।
संध्याय यः पठेत्स्तोत्र, दशावृत्त्या नरोत्तमैः ।
स्वप्ने श्रीभैरवस्तस्य, साक्षाद् भूतो जगद्-गुरुः ।
स्वर्ण-राशि ददात्येव, तत्क्षणान्नास्ति संशयः ।
सर्वदा यः पठेत् स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः ।।४४।।
लोक-त्रयं वशी कुर्यात्, अचलां श्रियं चाप्नुयात् ।
न भयं लभते क्वापि, विघ्न-भूतादि-सम्भव ।।४५।।
म्रियन्ते शत्रवोऽवश्यम लक्ष्मी-नाशमाप्नुयात् ।
अक्षयं लभते सौख्यं, सर्वदा मानवोत्तमः ।।४६।।
अष्ट-पञ्चाशताणढ्यो, मन्त्र-राजः प्रकीर्तितः ।
दारिद्र्य-दुःख-शमनं, स्वर्णाकर्षण-कारकः ।।४७।।
य येन संजपेत् धीमान्, स्तोत्र वा प्रपठेत् सदा ।
महा-भैरव-सायुज्यं, स्वान्त-काले भवेद् ध्रुवं ।।४८।।

॥ इति रुद्रयामल तन्त्रोक्त श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र संपूर्णम् ॥
मूल-मन्त्रः-
“ॐ ऐं क्लां क्लीं क्लूं ह्रां ह्रीं ह्रूं सः वं आपदुद्धारणाय अजामल-बद्धाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षण-भैरवाय मम दारिद्र्य-विद्वेषणाय श्रीं महा-भैरवाय नमः ।
🙏🔱🚩
✨“ॐ स्वर्णाकर्षण भैरवाय नमः”✨

✍️ मेरे आराध्य शिव 

सृष्टि में वो कौन है जिसकी सहनशीलता अपार हैं ?

बहुत काल पहले विद्वानों की एक सभा में शास्त्रार्थ चल रहा था। उसी समय एक प्रश्न उठा कि सृष्टि में वो कौन है जिसकी सहनशीलता अपार है? तब कई विद्वानों ने अलग-अलग तर्क रखे। एक ने कहा कि जल सबसे सहनशील है क्यूंकि उसपर चाहे कितने प्रहार करो वो अंततः शांत हो जाता है। तब दूसरे ने वायु को सहनशील बताया जो जीव मात्र को जीने की शक्ति प्रदान करता है। तीसरे की दृष्टि में अग्नि सर्वाधिक सहनशील थी क्यूंकि वो संसार की समस्त अशुद्धिओं को नष्ट कर देती है। किसी ने आकाश को सहनशील बताया कि कितने आपदाओं से वो हमारी रक्षा करती है और जीवन के लिए जल भी प्रदान करती है।

तब अंततः ऋषि होत्र ने कहा - "हे महानुभावों! आपने जिन तत्वों के बारे में कहा है वो निश्चय ही सहनशील है किन्तु मेरे विचार से पृथ्वी इन सब से अधिक सहनशील है।" सभी के पूछने पर उन्होंने इस प्रकार इसकी व्याख्या की:

"आप सभी विद्वान इसी लिए जानते है। जल में उफान आ सकता है, वायु में तूफ़ान, अग्नि दावानल का रूप ले सकती है और आकाश चक्रवातों को जन्म दे सकता है। किन्तु धरती, एक माता की भांति सभी कष्टों को सहते हुए समस्त प्राणियों की रक्षा करती है। मेघ से बरसने वाले जल को भी वो सोखती है ताकि जल मनुष्य के काम आ सके। हल के कष्ट को सहती है ताकि मनुष्यों को भोजन प्राप्त हो सके। स्वयं शेषनाग के फण पर स्थित होने के कारण अपने भीतर इतने हलचलों के पश्चात भी स्थिर रहती है ताकि सभी को आधार प्राप्त हो सके। सम्पूर्ण वनस्पतियों को धारण करती है ताकि सृष्टि का क्रम चलता रहे। मनुष्यों की क्या बात है, वो तो सभी पशु-पक्षियों और यहाँ तक कि कीटों को भी स्वयं पर आश्रय देती है। इसी लिए पृथ्वी ही सर्वाधिक सहनशील है।" इस पर वहाँ उपस्थित सभी विद्वानों ने ऋषि होत्र की भूरि-भूरि प्रसंशा की। 

वेदों में निम्न मन्त्र को प्रतिदिन प्रातःकाल धरती पर चरण रखने से पहले कहने को कहा गया है:

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते। 
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व में।।

अर्थात: हे धरती माता, आप समुद्र और पर्वतों को अपने ह्रदय में धारण करती हैं। आप स्वयं नारायण की अर्धांगिनी हैं। मैं आपके ऊपर चरण रखने जा रहा हूँ, कृपया मुझे क्षमा करें।

साभार - ✍️ प्रो० अनिल खिगवान 
वयं राष्ट्रे जागृयाम