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Friday, 26 December 2025

उलटबासी

#उलटबासी :

पहले दही जमाइए पीछे दुहिये गाय।
बछड़ा वाके पेट में माखन हाट बिकाय।।
- कबीरदास 
हमारे हिंदीबाजों ने slaves और गुलामों की हिंदीबाजी दास में करके, अपने यूरोपियन आकाओं का अनुसरण किया और अरबी और यूरोपीय लुटेरी संस्कृति को भारत में खोज निकाला। 

कबीर किसके दास हो सकते हैं?
कबीर तो मालिक हैं अपने। स्वामी। 

उनकी उलटबासियों की यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर किस तरह व्याख्या कर पाते होंगे, मैं मात्र इसकी कल्पना कर सकता हूँ, उनकी व्याख्या से सिहर सकता हूँ। सहमत नहीं हो सकता। 

कबीर कहते हैं कि पहले दही जमाइए। अर्थात पहले मन को एकाग्र कीजिये या निरुद्ध कीजिये। दूध तो हल्के से धक्के से छलक जाता है। दही हल्के धक्के से छलकता नहीं हिलता डुलता नहीं। यह योगी के  मनोस्थिति का वर्णन है। 
कृष्ण इसी को कहते हैं :
योगस्थ कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय। 

प्रायः हमारे मन की क्या दशा होती है। जैसे ही मन में कोई विचार आया, हम उसी विचार के साथ बहने लगते हैं। विचार के साथ हम इस तरह का तादात्म्य (आइडेंटिफिकेशन) स्थापित कर लेते हैं कि हम विचार ही बन जाते हैं। उसी विचार के साथ हम चिपक जाते हैं। उसका विश्लेषण चलने लगता है हमारे मन में। 

या हम कोई काम कर रहे हैं। और मन में कुछ और चल रहा है। कभी कभी ऐसा होता है कि पूरा का पूरा पेज पढ़ गए और समझ में ही नहीं आया कि क्या पढ़ा था। क्योंकि मन या चित्त कहीं और था।

 सड़क पर चलते हुए आदमी को देखो। वह चला जा रहा है और मन में उसके कुछ न कुछ चल रहा है। कभी कभी तो वह स्फुट स्वर में कुछ बोल बैठता है। 

या हम गाड़ी चला रहे हैं। गाड़ी चली जा रही है और हमारे मन में सैकड़ो विचार और योजनाएं बन बिगड़ रही हैं। शरीर और मन एक स्थान पर नहीं है।

 कृष्ण कहते हैं योगस्थ होकर या ध्यानस्थ होकर काम करो।

 संग त्यक्तवा - विचारों की आंधी में न बहो। ध्यान से काम करो। हमने बचपन से यह सुना है अपने अभिभावकों से शिक्षकों से कि - ध्यान से खाओ, ध्यान से पढ़ो, ध्यान से काम करो। लेकिन क्या वे इसका अर्थ जानते थे? जब जानते नहीं थे, तो बताते क्या कि ध्यान क्या है? 

फिर कबीर कहते हैं कि पीछे दुहिये गाय। इंद्रियों के निग्रह के बारे में उसके बाद सोचो। हम उल्टा करने लगते हैं। पहले इन्द्रिय निग्रह करने का प्रयास करते हैं। उसका स्वरूप कुछ भी हो सकता है।
उपनिषद में वर्णन है कि मन का अर्थ है पगहा - अर्थात लगाम। और इन्द्रिय है घोड़ा, जो जहां चाहता हैं वहीं चरता और विचरता है। 
तो नियंत्रण किसका किया जाय ? घोड़े का या मन का, जो उसकी लगाम है ?

 कई योगियों की जीवन यात्रा में जैसे कि विश्वामित्र की जीवन यात्रा में हमने अप्सराओं की बात सुनी है। यह कोई भौतिक स्त्रियां नहीं थी। यह मन की कल्पना से उपजी स्त्रियां थीं।

 क्योंकि इन्द्रिय निग्रह के द्वारा उन्होंने ब्रम्हचर्य का पालन करना शुरू तो कर दिया परंतु मन में स्त्री बसी रही। उसी ने अप्सरा का रूप धर लिया। यह बात अपने मन में झांके बिना समझना असंभव है। 

कृश्ण इसे मिथ्याचार कहते हैं।
कर्मेन्द्रिय संयम्य या आस्ते मनसा स्मरण। 
इन्द्रियार्थेषु विमूढात्मा मिथ्याचार स उच्यते। 
कर्मेन्द्रियों का संयम करके जो लोग मन में विषयों के बारे में सोचते रहते हैं, वे विमूढ़ और मिथ्याचारी कहलाते हैं। 

गांधी के तीन बंदरो को सोचिये - बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो। 
अब बिना देखे तो पता न चलेगा कि कोई चीज अच्छी है या बुरी? देखना तो पड़ेगा। लेकिन देखने के बाद यदि आंख बंद भी कर लिया तो वह बुरी बात मन के अंदर चलने लगेगी। वही बात बुरी बात सुनने के संदर्भ में भी है। बुरी बात एक बार सुन लिया और कान बन्द कर लिया तो अब बुरी बात मष्तिष्क से निकलने भी न पाएगी। बुरा मत बोलो। तो गूंगा तो बोल नहीं सकता, लेकिन क्या उसके अंदर बुरे विचार नहीं बनते? 

यह मिथ्याचार है, दिखावा है। कर्म का स्रोत है मन। मन में विचार का बीज बोया जाय तो वह कर्म रूपी पौधे को जन्म देता है। अंग्रेजी में कई लोग बोलते हैं - Thought becomes thing. अमूर्त से मूर्त का जन्म। यद्यपि विचार अमूर्त नहीं होते, वे मूर्त ही होते हैं लेकिन इतने शूक्ष्म कि उनकी मूर्ति बनती नहीं। मेडिकल साइंस भी सिर्फ विचार की तरंगों को पकड़ पाता है, विचारों को नहीं, जिसे वह ब्रेन वेव्स कहता है। 

 जब तक मन पर नियंत्रण न होगा वह कर्म में परिणित होता ही रहेगा। भले वह कर्म मानसिक कर्म तक ही सीमित रहे। समाज उससे अप्रभावित रह सकता है लेकिन हम स्वयं उससे अप्रभावित नहीं रह सकेंगे। 

फिर आता है बछड़ा वाके पेट में।

मन पर नियंत्रण सम्भव है क्या? 
यह बहुत बड़ा प्रश्न है। 
किसी चीज पर नियंत्रण कब सम्भव है? 
यदि उसका अतिक्रमण कर सके तो ही यह सम्भव है। मन का तो स्वभाव और धर्म ही चंचलता है जैसे अग्नि का स्वभाव है उसमें निहित उष्णता। यदि अग्नि उष्ण न हो तो वह अग्नि नहीं हो सकती। उसी तरह मन यदि चंचल न हो तो वह मन नहीं हैं। तो मन पर नियंत्रण संभव नहीं है। हां मन का अतिक्रमण संभव है। अर्थात एक ऐसी स्थिति जब आप मन में चल रहे विचारों को देख तो सकते हैं, लेकिन उससे लिप्त नहीं होते, उन विचारों के प्रभाव में आकर उसके साथ बहते नहीं। उसी स्थिति में साक्षी भाव का जन्म होता है। द्रस्टा का जन्म होना। मन के पार जाना। विचारों से अलिप्त होना, जिसका वर्णन शास्त्रों में किया गया है कि कमल का पत्ता रहता तो जल में है लेकिन जल से अलिप्त, जल से अछूता। 

यहीं से जन्म होता है - द्विजता का। दूसरा जन्म जिसे कहा गया है। साक्षी भी इसे ही कहा जाता है। द्विजता का जन्म होते ही उसकी सुवास चारों दिशाओं में फैलने लगती है। कबीर कहते हैं इसे - माखन हाट बिकाय।  

ॐ 
©त्रिभुवन सिंह