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Sunday, 22 December 2024

योग दर्शन - आचार्य प्रभामित्र जी (३)

                               ॥ॐ॥
                             योग दर्शन
     योग दर्शन पर तृतीय दिन का व्याख्यान/ प्रवचन 
       ( आचार्य प्रभामित्र जी - पंचकूला चंडीगढ़ से ) 
        शनिवार मार्गशीर्ष कृ ८ विक्रम संवत २०८१ 
                   23नवंबर 2024 ईस्वी
      (आर्यो का महाकुंभ कुंभ  - अंतर्जाल सभा )

आज हम सब तीसरे दिन में योग दर्शन पर चर्चा सुनेंगे आइये सबसे पहले मंत्र पाठ करते हैं-
ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवाव है।
         तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है।
                ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
              सभी को सादर अभिवादन। 
योग दर्शन के विषय में हम सब सुन रहे हैं योग दर्शन को हम आगे देखते हैं क्योंकि चार-पांच 6 दिन 7 दिन का सत्र में पूरा योगदर्शन तो नहीं कर पाएंगे कुछ मुख्य सूत्रों पर हम चर्चा करेंगे और अभी तक तो दो दिन लगातार जो आरंभिक सूत्र था उसे पर हमने देखा तो आज इसी प्रथम पाद में ही कुछ विशेष सूत्रों का दिग्दर्शन करते हुए आगे बढ़ेंगे तो आप अभी तक की समझ पाए कि योग दर्शन का प्रथम पाद जो सामाधि पाद है इसमें वृतियां कितने प्रकार की होती है और उसका निरोध कैसे किया जाए यह सारी बातों की चर्चा की सुनी अब प्रश्न आ कर खड़ा होता हैं योग का कोई टाइम पीरियड होता है की योग कितने दिनों में सिद्धि मिलेगी ? अवधी क्या हैं तो यह निश्चित नहीं हैं .. आपको 1 मिनट में भी समाधि लगा सकती है और कई जन्म लग जाने पर भी समाधि नहीं मिल सकती है । उसमें कोई टाइम फिक्स नहीं होता है अब 3 घंटे आप ध्यान में बैठे हैं वह आपका अच्छा है अभ्यास है लेकिन यह आवश्यक नहीं कि 3 घंटे बैठे और समाधि लग गई । आपको आधे घंटे में भी समाधि आ सकती हैं, तो इसको कैसे दृढ़ किया जाए और पक्का किया जाए कितने दिनों तक किया जाए तो ऋषि ने एक सूत्र कहा  -
" स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः। "

अपने साधना को स्थिर करनी है पक्का करना है तो लंबे कल तक करना पड़ेगा अब 10 वर्ष से लेकर के 15 - 20 - 50 - 100 वर्ष या पूरा जीवन, दो चार जीवन लंबे समय की जब तक हमें सफलता न मिले तब तक हमें अभ्यास करना है जब तक मुक्ति ना मिल जाए समाधि असंप्रज्ञात ना मिले तब तक हमें साधना नहीं छोड़नी, यह लंबा समय कह दिया ऋषि ने कि जब तक हमें सफलता न मिले तब तक अभ्यास करना है जब तक मुक्ति न मिल जाएं समाधिअसंप्रज्ञात न मिले तक हमें साधना नहीं छोड़नी है। लंबा समय का यह अर्थ निकलेगा।और कहा नैरंतर्य .. निरंतरता होनी चाहिए साधना में गैप यदि हम देते हैं जैसे अपना आर्यों का महाकुंभ इसमें निरंतर प्रवचन शंका समाधान भजन चलाता रहा तो इसमें बहुत कुछ लोगों को मिला और आगे भी मिलता रहेगा ।
तो अभ्यास को हमें नहीं छोड़ना, निरंतरता साधना में निरंतरता बहुत आवश्यक है । अब घर में विवाह है, किसी की मृत्यु हो गई है तो भी साधना नहीं छोड़नी है यह अभिप्राय है लगातार हमें साधना करनी होगी एक दिन यदि गैप हो गया साधना छूटगई तो हम मास डेढ़ मास ( मास = महीने) पीछे हो गये ।
अभ्यास निरंतरता और ऋषि एक बहुत बड़ी बात कहते हैं सत्कार तो यहां सत्कार का अभिप्राय होता है श्रद्धा 
सत सत्य दधाति सा क्रिया श्रद्धा क्या जो सत्य को धारण किया जाए। तो यहां पर सत्कार शब्द लिखा हुआ है सत करोति जो सत कार्य है अर्थात सत्य को धारण करना श्रद्धा है । सत्कार का अर्थ यहां पर श्रद्धा से है कि आपके हमारे मन में श्रद्धा होनी चाहिए किसके प्रति साधना के प्रति और किसके प्रति श्रद्धा होनी चाहिए - ईश्वर के प्रति।
श्रद्धा - अब श्रद्धा को समझने के लिए दो तीन बातों को ध्यान में रखना पड़ता है । तो सबसे पहले लाभ आपके मन में होनी चाहिए, किसी व्यक्ति के प्रति श्रद्धा रखनी है किसी वस्तु के प्रति श्रद्धा रखनी है, किसी पदार्थ के प्रति श्रद्धा रखनी हैं, उस व्यक्ति वस्तु पदार्थ से हमें लाभ क्या हैं? लाभ को ध्यान रखना है । लाभ होगा तो प्रेम होगा उस पदार्थ के प्रति प्रेम होगा तो श्रद्धा होगी श्रद्धा होगी तो फिर अनुराग होगा। तो अब ये सब क्रम से है तो परमात्मा के प्रति श्रद्धा अनुराग परमात्मा का नाम सुनते ही आंख में आंसू आ जाए, रोये खड़े हो जाए इतना प्रेम इतना प्यार और इतना प्रेम प्यार और श्रद्धा कब बनेगी जब परमात्मा के उपकारों को परमात्मा से मिल रहे लाभ की हमें स्मृति रहती है हमें याद रहता है। आप रोमांचित हो जाए इस बात को महर्षि वेदव्यास जी ने योग दर्शन के भाष्य को करते हुए इस बात का स्पष्टीकरण किया कि जिस व्यक्ति के जीवन में अश्रुपात  होता है परमात्मा की चर्चा सुनकर कि मोक्ष की बात सुनकर के रोंये खड़े हो जाते हैं आंख में आंसू आने लगते हैं तो इसी जीवन में मुक्ति संभव है समाधि संभव है संस्कार प्रबल है और हमारे माथे के ऊपर से जा रहा है,  क्या यह आध्यात्म की बात करते मोक्ष और ईश्वर अरे कुछ और सांसारिक बात करते तो समझिए हमारा संस्कार अभी सात्विक प्रबल साधना वाली नहीं है साधना के प्रति रोमांच पैदा होता है आंख में अश्रु का हाथ हो रहा है ईश्वर के नाम चर्चा सुनकर के एकदम गुदगुदी सी लगती है व रोमांस होता है तो यह समझिए कि हमारा पिछले जीवन का साधना है स्वाध्याय है, तो इस बात को थोड़ा संकेत किया कि श्रद्धा होनी चाहिए ईश्वर के प्रति और साधना के प्रति प्रातःकाल कब होगा जो मैं ध्यान में बैठूंगा ऐसे मन में उत्साह हो मैं आनंद की अनुभूति करूंगा परमात्मा से दीदार होगा । प्रातः काल कब होगा । प्रातः काल की प्रतीक्षा है, और परमात्मा के प्रति साधना के प्रति और आर्ष ग्रंथ ऋषीकृत ग्रंथ या वेद के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए ।
     एक शब्द है "परब्रह्म" एक है "अपर ब्रह्म" ।
परब्रह्म क्या होता है ? परब्रह्म "परमेश्वर" जो परे हैं संसार से, अदृश्य है, अप्रत्यक्ष है उसको परब्रह्म कहते हैं ।
ईश्वर शक्ति, ईश्वरीय सत्ता ईश्वर की सामर्थ को ईश्वर की सत्ता को परब्रह्म कहते हैं ।और अपरब्रह्म क्या है ? अपरब्रह्म वेद है , सृष्टि है ये संसार जो भी दिखाई दे रहा है अपरब्रह्म है।
ब्रह्म से जो उत्पन्न हुआ है अब इस सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्म से हुई है - ब्रह्म उपादान कारण नहीं है निमित्त कारण हैं। और ब्रह्म के द्वारा संचालित है ब्रह्म की शक्ति से चल रहा है वेद ज्ञान है अपरब्रह्म है, शब्द ब्रह्म है वेद प्रत्यक्ष है वेद मंत्र को हम पढ़ सकते हैं वेद मंत्र को हम इन कर्ण इंद्रियों से सुन सकते हैं इंद्रिय ग्रहीय है तो ब्रह्म शब्दब्रह्म अपर ब्रह्म तो वेद मंत्रों के प्रति श्रद्धा, वेद के माध्यम से परमात्मा का संदेश हमारे कानों में पड़ रहा है उनके संदेशों को मैं अपनी वाणी से बोल पा रहा हूं और बढ़िया से सुंदर कपड़े में लपेटकर के बडे श्रद्धा से उसेपर फूल ना चढ़ाएं लेकिन श्रद्धा सुमन जरूर चढ़ा दीजिए वेद भगवान है वेद ब्रह्म है वेद परमात्मा की वाणी है परमात्मा का साक्षात्कार मैं उस वाणी को पढ़ पा रहा हूं सुन पा रहा हूँ वेद के प्रति श्रद्धा आर्षग्रंथ के प्रति श्रद्धा, ईश्वर के प्रति श्रद्धा । मोक्ष प्राप्ति में जिन जिन साधनों का प्रयोग होता है या हम करते हैं आवश्यक हैं उन सारे पदार्थो के प्रति श्रद्धा रखनी है । और परमात्मा को मैं पदार्थ बार-बार कह रहा हूं महर्षि दयानंद का सबसे प्रिय दर्शन वैशेषिक दर्शन रहा सत्यार्थ प्रकाश उठाकर के देखिए अधिक प्रमाणों का दर्शनों में अधिक प्रमाण वैशेषिक दर्शन का प्रमाण ऋषिवर ने संग्रहित किया हैं।
अक्षरब्रह्म- जैसे शब्दब्रह्म होता है इस तरह से अक्षर से ही शब्द बनता है "अक्षरम नक्षरम विद्या दर्शते ... "  दर्शन ॐ तो अक्षर जो लिपि है अकर उकार मकार तो अक्षर ।
वहां अक्षर को भी ब्रह्म कहा हैं, "अक्षरम नक्षरम .."
जिसका नाश नहीं होता है तो अक्षर ब्रह्म उस वर्ण लिपि को भी कहते हैं और अक्षर ब्रह्म अर्थात जिसका क्षय नहीं होता है "ना क्षयती अक्षरं नाशं न भवती.."  तो वह परमात्मा को भी अक्षर ब्रह्म कहते हैं नाशरहित होने से परमात्मा को ही अक्षर-ब्रह्म और शब्द के साथ यदि अक्षर को जोड़कर के अर्थ समझ रहे हैं तो वह लिपि अक्षरब्रह्म फिर उसी से जो शब्द बना है वह शब्दब्रह्म है । तो अपरब्रह्म को समझिए कि जो परमात्मा के पास ले जाने में सहायक है, यह संसार संसार भी अपरब्रह्म है ।
यह जो सृष्टि देख रहे हैं ( नेचर ) प्रकृति यह सूर्य चंद्र आदि यह सब अपरब्रह्म है इसके माध्यम से हम उस ब्रह्म तक जाने में समर्थ होते हैं । 
तो परमात्मा की रचना वेद भी और सृष्टि भी अपरब्रह्म है, और इसी में अक्षर-ब्रह्म शब्द-ब्रह्म और अंत में परब्रह्म जो परे होते हैं जो अप्रत्यक्ष है स्वयं ईश्वर तो वह परब्रह्म है ।
तो इस प्रकार से यहां पर मैं चर्चा कर रहा था कि वैशेषिक दर्शन में ईश्वर को पदार्थ कहा गया है ब्रह्म को पदार्थ ऐसे छह पदार्थ वैषेशिक दर्शन में आया हुआ है द्रव्य गुण ऐसे छह पदार्थ में वैशैषिक दर्शन में आया हुआ है -
    द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और  समवाय
कभी वैषेशिक दर्शन पर चर्चा आरंभ करेंगे तो यह छह पदार्थ महर्षि कणाद ने माना और इन छह पदार्थ में जो पहले द्रव्य है वह 9 हैं -  5 महाभूत पृथ्वी जल अग्नि वायु और आकाश तथा 4 मन,आत्मा, दिशा और काल ।
तो आत्मा शब्द से वहां पर परमात्मा भी ग्रहण होता है आत्मा जैसे द्रव्य है पहले पदार्थ है इस तरह से आत्मा से ब्रह्म भी परमात्मा भी पदार्थ हैं और महर्षि दयानंद जी के वेद भाष्य यजुर्वेद उठा लीजिए सत्यार्थ प्रकाश को उठा लीजिए अनेक जगह आपको मिलेंगे तिनके से लेकर के परमेश्वर पर्यंत पदार्थ । आर्य समाज का नियम उठा लीजिए -
"जो सत्य विद्या और पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सब का आदि मूल परमेश्वर है ।" 
 तो यह सब पदार्थ विद्या से जाने जाएंगे तो परमात्मा को पदार्थ इस रूप में देखा जाता है । चेतन पदार्थ को परमात्मा के प्रति श्रद्धा रखने और एक विशेष बात यह है कि परमात्मा हम सबको सुन रहा है देख रहा है जान रहा है और महर्षि जी का वाक्य है -परमात्मा ईश्वर ब्रह्म हमारे नाम स्थान जन्मों को जानता है ।  इस पर हम कभी चिंतन नहीं करते हमारा क्या नाम है? लोग किस नाम से पुकारते हैं ? हम कहां रहते हैं  ? और हमारा जन्म  कहां हुआ है ? नाम स्थान और जन्म लेकिन हम इस पर विचार नहीं करते कि प्रभु हमको जान रहा है सुन रहा है देख रहा है समझ रहा है हर पल तो इस प्रकार से ब्रह्म के प्रति श्रद्धा होने पर 
   " श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ।"
तो सेवन किया हुआ । जो साधना है उसमें श्रद्धा हो दीर्घकालता हो लगातारता हो तो दृढ़ता हो आपका दृढ़ भूमि वाला बनेगा और दृढ़ भूमि वाला जब हो जाता है तो कोई भी कार्य आसान होता है आपको जब अभ्यास हो गया इतना परफेक्ट प्रेक्टिस है आपके जीवन में कि आप चलते फिरते ईश्वर का चिंतन कर पाते हैं। ईश्वर के प्रति श्रद्धा समाधि साधना भाव में रह पाते हैं तो इसका अभ्यास आपको निरंतर से करते-करते फिर हमारी वृत्तियां वैसी बन जाती है ।  अच्छा जी तो अब यहां पर वैराग्य को समझातेहुए ऋषि ने वैराग्य दो प्रकार के होते एक पर वैराग्य और एक अपर वैराग्य ।  इसको समझ लेते हैं की पर वैराग्य क्या हैं - बाद वाला वैराग्य । और अपर वैराग्य पहले वाला वैराग्य । अपर - पहल, पर बाद में । तो अपर वैराग्य पहला है ।
" दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्।" 
देखिए मेरे मन में एक बात आती हैं कि संसार में लोगों को समस्याएं कहां-कहां आती है -
तो जैसा जीवन में हमारा ज्ञान होता है जितना कम ज्ञान होगा उतनी समस्याएं हमारे पास ज्यादा होगी जितना ज्ञान अधिक होगा, गहरा ज्ञान होंगा, तत्व का ज्ञान होंगा, उतना समस्याएं कम होगी । तो अब बच्चे की समस्या ले लीजिए उदाहरण समझने के लिए बच्चों की क्या समस्या होती छोटे बालक की समस्या होती है वह खेल खिलौने के लिए  रोता रहेगा छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई झगड़ा करेगा अब बड़े लोग कहते हैं कि इसकी क्या समस्या है भाई इतना क्यों परेशान हो रहा है कि लोगों को परेशान कर रखा है अब उनकी बाल बुद्धि है आपके लिए समस्या नहीं है बड़े लोगो के लिए, परंतु वह छोटे बालक के लिए समस्या है, उसको वो चाहिए जिसके लिए जिद कर रहा है । तो अब आप विचार करें कि आप हम बड़े लोगों को घर चाहिए तो घर नहीं किसी के पास वह समस्या है, किसी के पास नौकरी नहीं है तो नौकरी समस्या हैं, किसी का विवाह नहीं हुआ तो विवाह करना भी समस्या है ।उसके बाद बच्चा नहीं हुआ यह भी समस्या है ।समस्या बनाया क्यों ? विवाह नहीं करते समस्या खत्म ।
हम जंगल में रहेंगे घर बनाने की समस्या खत्म, हम पत्ते खा लेंगे वेद पढ़ लेंगे पैसे टके की समस्या खत्म। आप हमने समस्या को निर्मित ( क्रिएट ) किया हैं, व्यक्ति की समस्या यह बनाई हुई है हमने समस्या पैदा कर लिया अब समस्या को हमने मान लिया कि मेरी समस्या है। समस्या को मूर्खता से अज्ञान से हम लोगों ने क्रिएट कर लेते हैं और उसमें उलझते रहते हैं मुझे नौकरी करनी है मुझे बड़ी गाड़ी चाहिए बड़ा घर चाहिए
क्यों चाहिए ? हम बिना गाड़ी के रह सकते हैं बिना घर के रह सकते हैं, पत्ते खा कर रह सकते हैं पर समस्या पैदा कर रखा है । तो जैसा हम समाज में देखते हैं, जैसा हमारे पास संस्कार है उसी का अनुरुप अपनी समस्याओं को हम पैदा करते हैं और उसी में उलझते हैं। मैं तत्व ज्ञान की ज्ञान की दृष्टि से चर्चा कर रहा हूं, अन्यथा नहीं लेंगे कोई यहां पर, क्योंकि योग दर्शन पढ़ रहे हैं तो योग दर्शन की दृष्टि से आपको सोचना पड़ेगा ।
 तो समस्याएं का छुटकारा वैराग्य है,  वह यह है कि भौतिक समस्याओं का समाधान कर लेना अपरवैराग्य मुझे कोई स्वाद नहीं चाहिए गंध शब्द रूप रस स्पर्श आदि सुख नहीं लेना ।
जीने के लिए तो कुछ भी पत्ता भी खा सकते हैं कंद मूल फल भगवान ने इतना दिया हैं .. कुत्ते भी अपना पेट पाल लेते हैं तो मैं तो मनुष्य हूं  मैं किसी को पढ़ा दूंगा किसी की सेवा कर दूंगा तो रोटी मिल जाएगी भिक्षा मांगने की वैदिक परंपरा है एक रोटी एक घर से तो दो घर से दो रोटी मिल जाएगी। तो भोजन की समस्या कहा हैं ? 
       "दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा
                            वैराग्यम् ।"
देखें हुए सुने हुए विषयों के प्रति जो इंद्रियों से उसमें जो राग पैदा हुआ कि मुझे वह चाहिए उस पर नियंत्रण कर लेना भौतिक विषयों से उपराम हो जाना अलग हो जाना उसमें अटैचमेंट का ना रहना - मिल गया ठीक है, नहीं मिला ठीक है,  मस्त रहना यह अपर वैराग्य है। अपरवैराग्य यदि साधक के जीवन में आ गया दृष्ट संसार से यदि वैराग्य हो गया तो यह समझ जाइए की एक बहुत बड़ी उपलब्धि एक बहुत बड़ा लक्ष्य (टारगेट) अचीवमेंट हमने कर लिया है । लेकिन हमें जब सांसारिक वस्तुओं से वैराग्य नहीं होता तो अपरवैराग्य नहीं होगा तो फिर पर वैराग्य भी नहीं होगा, पर वैराग्य नहीं तो मोक्ष की कल्पना नहीं कर सकते मुक्ति कैसे मिलेगी ? जब संसार के वस्तुओं में राग ना रहे ..मिल गया ठीक है नहीं मिला तो भी ठीक  जैसे स्वामी दयानंद  - स्वामी दयानंद जी ने अपने भौतिक ऐश्वर्य को ठुकराकर घर बार छोड़कर के और  बीच में उन्हें कितने  प्रलोभन आए पर कोई उनको प्रलोभित नहीं कर पाया।
तो  अपरवैराग्य तो पहले से ऋषिवर को प्राप्त था । और साधना करके फिर पर वैराग्य भी प्राप्त कर लिया ।
पर वैराग्य क्या हैं उसको समझ लेते हैं - 
अपर वैराग्य की समस्याओं को चुटकी में यू आप समाधान कर सकते हैं तो फिर कहेंगे कैसे करेंगे भाई ? भाई यह तो ज्ञान के ऊपर है अपने मान रखा है कि यह मेरा है मैं इसका हूं । जिस दिन यह मान लीजिए मैं किसी का नहीं न मेरा कोई । ना मेरा कोई ना मैं किसी का मान लीजिए सब समस्या खत्म हो जाएगी तो अपरवैराग्य जैसे ही  हो गया ( सन गया) है।
फिर पर वैराग्य पर काम करना होगा पर मेरा क्या है-
         "तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्।"  
अब आपको भौतिक जो विषय था उसके प्रति वैराग्य हो गया वह आपको आकर्षित नहीं करता है लेकिन शरीर के प्रति लगाव (अटैचमेंट) है अपने इंद्रियों के प्रति अटैचमेंट है यह शरीर मेरा ना छूट जाए शरीर में कोई रोग ना हो इतना तक तो ठीक है शरीर रहे क्योंकि हम मोक्ष प्राप्त कर सके इतना तो ठीक है लेकिन राग रखता यह मै जो दिखाई दे रहा हूं वह मैं हूं यह राग है । और यदि आप हम अपने शरीर के प्रति मन इंद्रियों के प्रति राग रखेंगे तो परमात्मा तक न जा पाएंगे आपको यह वहां पर जो तमोगुण रजोगुण सतोगुण से निर्मित जो हमारा शरीर है हमारा चित्त है मन बुद्धि है उनमें भी दोष दर्शन करना कि यह भी हमारे काम का नहीं है यह हमें दुख देगा क्योंकि जब तक शरीर रहेगा जब तक इंद्रीयां रहेगी तो हमें सर्दी गर्मी भूख प्यास और यह रोज सोना है रोज उठाना है रोज उसको खिलाना है रोज नहलाना है यह समस्याएं लगी रहेगी । कि बुढ़ापा आ रहा है फिर मृत्यु का भय है कि जल्दी मृत्यु हो जाएगी फिर से मोक्ष में नहीं जा पाएंगे यह जो समस्याएं हैं यह शरीर के प्रति चित्त के प्रति हम चाहते हैं सतोगुण को लेकिन रजोगुण उभरा  हुआ है अब यह भी एक समस्या हम ध्यान में बैठते हैं कि प्रभु मुझे सतोगुण दो जो मैं समाधि लगा पाऊं लेकिन रजोगुण उभरा हुआ है तो हम डिस्टर्ब हो जाते हैं तो गुणो के प्रति सतोगुण रजोगुण तमोगुण गुणो के प्रति तृष्णा रहित होना वैराग्य होना इसमें अटैचमेंट नहीं रखना इससे उपराम / पृथक/अलग होने की चेष्टा करना भाव बनाना भावना रखना यह परवैराग्य है।
और पर वैराग्य मिल गया तो उसी क्षण मुक्ति मिल गई जीवन मुक्त हो गए बस पर वैराग्य होना ही जीवन मुक्त होना है।यह बहुत गहरी बात है कभी गहराई से समझे तो व्यास जी की सुंदर सी पंक्तियां और बहुतअच्छी-अच्छी बाते‌ पर वैराग्य के बारे में मिलेगी। अब इस पर और चर्चा न करके आगे बढ़ते हैं - 
योगी कितने प्रकार के होते हैं ?
योगी दो प्रकार के होते हैं - अब कहा है कि
        "भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्।"  
एक योगी होते हैं भव प्रत्यय, एक होता है उपाय प्रत्यय ।
(बीच में एक श्रोता - उपाय प्रत्यय नहीं लिखा )
आचार्य जी - अच्छा उपाय प्रत्यय नहीं लिखा है योग दर्शन में कोई पास में पुस्तक रख कर ढूंढे उपाय प्रत्यय सूत्र निकालिए तो मैं भी नहीं बता पाऊंगा तो यहां पर है देखिए सूत्र संख्या 19 है समाधि पाद का की  "भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्" है और मैंने कोई उपाय प्रत्यय अगले सूत्र में  "श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ।"
अब इतरेषाम् जो शब्द है उसे अर्थापट्टी के आधार पर मैंने आपको बताया उपाय प्रत्यय और यह उपाय प्रत्यय शब्द महर्षि वेदव्यास का है, वेदव्यास का भाष्य जब आप पढ़ेंगे वहां पर उपाय प्रत्यय शब्द आ जायेगा। तो आप यहां पर समझने का प्रयास करें कि दो प्रकार के योगी होते हैं।
-  भव प्रत्यय योगी क्या है ?
भव प्रत्यय योगी वो होते हैं जो संसार को देखता है और संसार से विरक्त हो जाता है । संसार को देखा भवति संसार भवसागर है, संसार समस्याओं से घिरा हुआ है, जिस व्यक्ति को देखिए, अपने आसपास देखें, अपने स्वयं को देखिए इतनी सारी समस्याएं और अंगारे पर बैठा हुआ जैसे जल रहा व्यक्ति आग पर लपटें आ रही उसमें जल रहा है ऐसे छटपटा रहे हैं हम सब संसार के दुख को देखकर के संसारकी इस भवसागर को क्लेश क्लिष्ट को देखकर के व्यक्ति को वैराग्य हो गया । ओहो मैं नहीं जा सकता संसार में ..
परंतु हम लोग तो मूढ़ आत्मा है संसार में फंसे हुए हैं चिड़िया शिकारी आएगा जाल बिछाएगा दाना डालेगा खुद से फंसना मत उसी में प्रभामित्र हैं हम तो सुना रहे हैं आप सुन रहे हैं हम सब हैं जाल में फंसे हैं लेकिन हम फंसना नहीं चाहते फंसे हुए हम लोगों की क्या कथा करनी ..
भव प्रत्यय वो ऋषि थे महर्षि दयानंद जी जो संसार को देखा और संसार में जाने से डर गये कि मुझे नहीं जाना संसार में इतना सारा दुःख है और वैराग्य को प्राप्त करके मुक्ति का द्वार खोल लेते हैं ऐसे योगी का नाम है "भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्।" अर्थात संसार को देखकर के अपनी प्रकृति को चित्त को लय कर दिया और समाधि में चले गए ऐसे योगी जन्मो जन्मानतर के पुण्य कर्म शुभ कर्म या निष्काम कर्म कर पवित्र ह्रदय वाले शुद्ध अंतःकरण वाले योगी भव प्रत्यय प्रकृति लय कर देता है प्रकृति में लय कर देता है अपने चित्त को । फिर ऋषि कहते हैं महर्षि पतंजलि कि भाई जो संसार को देखकर के भी बैराग उत्पन्न नहीं होता है, इतने सारे कष्ट को देखकर के भी वह दुःखी नहीं होता है बैरागी नहीं होता है उसका क्या होगा हम आप लोगों का क्या होगा.. हम मूढ़-मति आत्मा है, हम सब मूढ़ आत्मा तो हमारी क्या गति होगी ? तो उसमें ऋषि कहते हैं - श्रद्धा वीर्य, स्मृति, समाधि, प्रज्ञा पूर्वक इसको समझिएगा प्रज्ञा जो है ऐसे अलग से इसको कह सकते श्रद्धा अलग है वीर्य है श्रद्धालु उत्साह है समाधि और प्रज्ञा पांच है लेकिन मेरा चिंतन अभी 2 दिन पहले सूत्र पर आया था की प्रज्ञा को सब में जोड़ना पड़ेगा श्रद्धा-प्रज्ञा वीर्य-प्रज्ञा स्मृति-प्रज्ञा समाधि-प्रज्ञा और प्रज्ञा भी है, ऐसे व्याख्या करते हैं तो श्रद्धा वीर्य स्मृति समाधि प्रज्ञा ये पांच (5 )  माने ।
अर्थात् श्रद्धा होनी चाहिए प्रज्ञा पूर्वक विशेष ज्ञानपूर्वक श्रद्धा अंधश्रद्धा नहीं, वीर्य यानि उत्साह - उत्साह होना चाहिए विवेक पूर्वक उत्साह होना चाहिए ज्ञान पूर्वक, और स्मृति - स्मृति किसकी स्मृति ? क्या खाने पीने की स्मृति ? नहीं ईश्वर की स्मृति समाधि प्राप्ति की स्मृति, समाधि की भावना रखने की स्मृति, मुक्ति में जाने की स्मृति, हम भूल जाते हैं मुझे मुक्ति में जाना है, यह प्रज्ञा पूर्वक होनी चाहिए और समाधि - समाधि भी कहा समाधि किसमें ? क्या भौतिक पदार्थों में समाधि लग गई ? पृथ्वी में समाधि लगेगी जल में भी समाधि लगेगी नहीं समाधि प्रज्ञापूर्वक विवेक पूर्वक आत्मा परमात्मा में होना चाहिए ।
तो यहां पर कहा जो व्यक्ति इन सब बातों को ध्यान रखते हुए कि वह श्रद्धा भी रखता है ईश्वर के प्रति आत्मा के प्रति आर्ष ग्रन्थों के प्रति .. वीर्य भी अर्थात् उत्साह वो बहुत उत्साहित भी है अलसी नहीं हैं और स्मृति भी है अर्थात वह कभी भूलता नहीं मोक्ष को, परमात्मा को ।  हमेशा चेष्टा करता समाधी मिले और ज्ञान यथार्थ हो विवेक, तो व्यक्ति इसी जीवन में मुक्ति में जा सकता है । यह सारे उपाय करने हैं - इसको उपाय प्रत्यय कहते हैं । आपको क्या-क्या उपाय करना है ? ऋषि ने गिना दिया है तो ऋषि ने जो बातें कही है इन सब बातों पर एक-एक शब्दों पर विचार करिए और वह व्यवहार में हमारे जीवन में कितना है इस पर भी हम-आप विचार करते हुए अपना परीक्षण करना चाहिए कि मेरे अंदर श्रद्धा कितनी है मेरे अंदर वीर्य उत्साह कितना है मुझे याद कितना रहता है और समाधि समाधि लेना इसी जीवन में । एक शब्द आएगा आगे जब आपके पढ़ेंगे -
 "समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च।" 
समाधि की भावना और क्लेश तनु करनार्थ क्लेश को क्षीण करने की भावना आपको हमेशा करते रहना चाहिए समाधि प्राप्त करना हैं-  मुझे समाधि प्राप्त करना है यह भावना आपको बनानी पड़ेगी अपने अंदर जो अविद्या, अस्मिता राग द्वेष अभिनवेश आदि क्लेश है उसको क्षीण करना पड़ेगा । तो इस प्रकार की सारी बातों को व्यवहारों को याद रखते हुए अपने जीवन में कितना हमने आगे बढ़े इस पर कितना हमने अचीवमेंट किया कितनी हम ने कितनी उपलब्धि की इस बात का हमें ध्यान रखना होगा। तो दो प्रकार के योगीयो में "उपाय-प्रत्यय" योगी हम लोग बन सकते हैं और "भव-प्रत्यय" योगीजो संसार को देखा और झट से वैराग्य हो गया ।
तो आगे परमात्मा के बारे में आप सब जानते हैं मैं परमात्मा की चर्चा यहां पर थोड़ी सी करके फिर आगे बढ़ जाऊंगा जो बहुत आज सुंदर विषय है इसको एक्सप्लेन में जरूर करना चाहता हूं ।
परमात्मा के पास जाना हैं ... तो जहां जाना है वहां का जीपीएस (GPS) आपके पास होना चाहिए रोड मैप और आपके पास यदि वह जीपीएस नहीं है तो मुश्किल है कि आप वहां पहुंच पाएंगे । तो आपको परमात्मा तक जाना है ?
"हां जाना है।" तो आपको परमात्मा के बारे में आपको पता होनी चाहिए - वह कैसा हैं ? रहता कहां है ??  तो ऋषि ने परमात्मा के बारे में दो सूत्रों के द्वारा स्पष्ट कर दिया जो आप सब जानते हैं मैं केवल रिपीट कर रहा हूं -  क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः।
और दूसरा सूत्र है - तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्।
अब संक्षेप से बोलूंगा आप सबको पता है याद भी है सूत्र मुझे यह सब क्लेश कर्म विपाक आश्य क्लेश पांच है और अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनवेश और कर्म विपाक = कर्मफल कुछ भी हम करते हैं उसका फल हमें मिलता है, वह कर्म-विपाक है। और आशय का मतलब होता है अटैचमेंट । तो कर्मफल के साथ परमात्मा का कोई चाहना नहीं है आश्य नहीं है कर्म फल नहीं चाहता अपरामिष्ठ है अलग है कर्म फल के आशय सेअलग है और क्लेश से अलग है अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनवेश परमात्मा को टच नहीं करता । और पुरुष विशेष है, विश्वात्मा है । एक आत्मा हमारे शरीर में आपके शरीर में है ; एक विश्वात्मा जो आत्मा का भी आत्मा है, और पुरुष का भी पुरुष है परमपुरुष है, ब्रह्मांड रुपी पुरी में जिसका निवास होता है तो परमात्मा कोई रूप में व्याख्या किया है महर्षि पतंजलि ने कि परमात्मा में कलेश नहीं है परमात्मा कर्म करते हैं पांच, जैसा कि हमारे स्मृति शेष प्रेरणा स्रोत आचार्य ज्ञानेश्वर जी अपने प्रवचन में कहा करते थे और मैंने उनसे ही सुना कि परमात्मा सृष्टि को बनाता है सृष्टि को चलाता है सृष्टि का प्रलय करता है सृष्टि के आरंभ में विवेक ज्ञान देता है और जीवात्मा उचित कर्म फल देता है प्रथम बार में उनके मुख से सुना था पर ऐसा किसी शास्त्र में वर्णित हैं अभी तक मिला नहीं हैं । तो मोटे-मोटे पांच कर्म हम जानते हैं इसके बदले परमात्मा को कोई कर्मफल नहीं मिलता कर्म तो करते हैं पर उन्हें इनका फल नहीं मिलता है - क्योंकि वे निष्काम कर्म करते हैं । अटेचमेंट नहीं है क्योंकि अविद्या नहीं हैं तो आशय नहीं रहेगा । अपरामिष्ठ है तो अलग रहेगा । अंतिम ये जो दूसरे सूत्र में परमात्मा के बारे में  बताया वो बड़ा गजब का है कि "तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्।" अब इसको देखिए कहते हैं कि परमात्मा जो है तत्र उसमें किसमें ब्रह्म में ब्रह्म में निरतिशयम् तत्र वहां पर निर अतिशयं निश्चय करके अधिक से अधिक सर्वज्ञ सब ज्ञान का बीजम् .. बीज हैं । एक बात और मैं बताऊं की वेद पूर्ण है या अपूर्ण हैं ?
तो यहां पर अपेक्षाकृत आत्माओं मनुष्यों की अपेक्षा से वेद पूर्ण हैं , परमात्मा की अपेक्षा से वेद अपूर्ण हैं । यदि मनुष्य की दृष्टि से वेद को देखते हैं तो वेद पूर्ण है परमात्मा की दृष्टि से वेद कहेंगे तो अपूर्ण है । सारा ज्ञान नहीं दिया वेद में जितनी आवश्यक था जीवात्मा के कल्याण में उतना दें दिया परमात्मा ने और यह सूत्र कहता है कि "सर्वज्ञबीजम् "  क्या कहता है सब प्रकार के ज्ञान का बीज परमात्मा में है । और महर्षि दयानंद जी ने सत्यार्थ प्रकाश में एक बहुत बड़ी बात कही की मुक्ति में उसे आत्मा का आनंद उतना उतना बढ़ता जाता है जिसका ज्ञान जितना अधिक होता है उसका आनंद उतना ही बढ़ता जाता है अब देखिए की मुक्ति में भी ज्ञान बढ़ता रहता है यह मत समझिए कि मैं मोक्ष में चला गया तो मेरा ज्ञान बस इतिश्री हो गया, जैसे जल में प्रवेश कर गए नदी में प्रवेश कर गए तो आप नदी में आ गए तो जल में आप हैं आनंद में हैं जल आनंद को मान लीजिए आनंद जल है जैसे-जैसे गहराई में जाएंगे तैरना जो जितना जानेगा उतना गहराई में जाएगा तो उतना उसका आनंद बढ़ता जाएगा । तो परमात्मा अनंत अनादि है मुक्ति में भी आत्मा परमात्मा का अंत नहीं पा सकता 31 नील 10 खराब 40 अब वर्ष भी दौड़ते रहे आत्मा परमात्मा में तो अंत पा लेंगे ?
पा नहीं सकता क्योंकि अंत है ही नहीं अनंत का । तो अब यह विचार करिए कि परमात्मा इतना बड़ा ज्ञानी है सर्वज्ञ सब प्रकार के ज्ञान जहां परमात्मा में है और वह ज्ञान  थोड़ा सा वेद रूप में हमें दिया हमारे कल्याण के लिए हम धर्म अर्थ काम मोक्ष को प्राप्त कर सके इतना ही ज्ञान वेद में परमात्मा ने दे दिया उसके आधार पर हमें मुक्ति मिल जाए और जितना ज्ञान हमारा बढ़ता जाएगा आनंद बढ़ता जाएगा । तो परमात्मा को यहां पर सर्व विद्याओं का बीज कहा और जैसे आप ध्यान करेंगे आपका ज्ञान बढ़ेगा आपका अंदर से ज्ञान उत्पन्न होता चला जाएगा । और परमात्मा का नाम क्या हैं  ? इस पर चर्चा करें और कल मैं चर्चा करूंगा कि परमात्मा के ध्यान से क्या-क्या लाभ होता है ? मैं आज करना चाह रहा था पर समय आदेश नहीं दे रहा है लेकिन नाम पर चर्चा करके मैं अपनी वाणी को विराम करना चाहूंगा तो अब नाम परमात्मा का क्या है "ॐ" या "ओ३म" अर्थात् प्रणव "तस्य वाचक : प्रणव । " अब कहते है प्रणव परमात्मा का नाम है । परमात्मा नहीं है वह, इस बात पर हमेशा बांध करके चलिए मन में । शब्द अर्थ संबंध और ज्ञान । अब आप सब जानते हैं शब्दार्थ संबंध और ज्ञान इसे कैसे समझेंगे तो जैसे गौ शब्द आपने कहा ।  क्या कहा ? गौ ( गऊ ) । "गौ" शब्द है और यह शब्द किसको कह रहा है गौ कमल शासना युक्तमलांगुलम्  जिसके गले में शासन हो मांस लटकता है का कमुद है शासन वह पूछ है तो वह जो गौ (गऊ) गौशाला में बंधी हुई है वह अर्थ हो गया । शब्द मुख में बोला जीभ से और अर्थ है गौशाला में गाय बंधी हुई है चार पैर वाली वो 
अर्थ हो गया -  शब्दार्थ = शब्द अर्थ। 
अब कहते हैं संबंध तो संबंध जो है वह व्यक्ति का संबंध जो बोल रहा है वह गौ के साथ संबंध करें गौशाला में बंधी गाय को जाकर छुए वह संबंध बनेगा और ज्ञान मस्तिष्क में है शब्द मुख में है ज्ञान मन में है गाय अर्थ गौशाला में बंधी हुई है । अब देखिए तीनों तीन जगह यह सब मिश्रित होकर के प्रतिभाषित होता है तीनों में अंतर नहीं कर पाते । शब्द अर्थ ज्ञान । तो इन तीनों में जब अंतर करना सीख जाएंगे तब आपको विशेष ज्ञान होगा की ज्ञान चीज अलग है, शब्द अलग है और अर्थ अलग हैं । तो आप ओम शब्द को लीजिए ओम शब्द हैं - "अकार उकार मकार" इससे ब्रह्म का कोई लेना देना नहीं हैं । अब मैं एक बहुत बड़ी बात कह रहा हूं कि शब्द के साथ अर्थ का नित्य संबंध होता है और नहीं भी होता है ।
 फिर आप कहेंगे दो बात क्यों बोल रहे हैं ? दोनों बातों को एक्सप्लेन करता हूं संक्षिप्त में समझा देता हूँ -
वेद में जो शब्द हैं उसका अर्थ निश्चित (फिक्स) होता है, निश्चित होता है। जैसे अग्नि शब्द के लिए अग्नि के लिए अग्नि शब्द है जल के लिए जल है आप है उस शब्द का अर्थ वही होगा आप हम जल को कह सकते अग्नि को नहीं कह सकते । आग को ही अग्नि कह सकते हैं जल को अग्नि नहीं कह सकते इस रूप में जिस शब्द का जो अर्थ है वैदिक शब्दों का लौकिक शब्दों का अर्थ तो थोड़ा सा आगे पीछे हो जाता है वैदिक शब्दों का अर्थ फिक्स होता है । उसका प्रसंग के अनुसार अर्थ बदलेगा लेकिन प्रायः शब्द का अर्थ फिक्स होता है इसके अर्थ निश्चित है लेकिन शब्दों के साथ अर्थ का संबंध यह निश्चित नहीं हैं ।
यदि शब्द के साथ अर्थ का संबंध शब्द का अर्थ निश्चित है पर संबंध नहीं रहता यदि शब्द और अर्थ का संबंध रहता तो आग कहते ही मुख जलने लग जाता, जल कहते ही हमारी प्यास बुझ जाती । तो संबंध नित्य अनित्य है और अर्थ निश्चित है । तो शब्द आपने कहा "ओम् " शब्द केवल व्यवहार के लिए है कि "ओम् " आपको डायरेक्शन दिया किसको कह रहा है जो सर्वव्यापक हैं, अर्थ अलग हैं - अर्थ के साथ आपको जुड़ना पड़ेगा अर्थ के साथ आपके संबंध बनाना पड़ेगा शब्द ने केवल आपको डायरेक्शन दे दिया इशारा कर दिया अब "ओम्" बोले और रुक जाइए अर्थ पर विचार करिए अर्थ के साथ संबंध बनाइये शब्द को भूल जाइए और अर्थ जो सर्वव्यापक सत्ता है उसके साथ संबंध बनाने के लिए आपको कुछ उहा करनी पड़ेगी कुछ तकनीक अपनानी पड़ेगी ( लोकभाषा में जोगाड़ या जुगाड़ ) । कुछ ऐसा जो उहा  शब्द मैने प्रयोग किया तो टेक्निक अपनाने के लिए अंकुश लगाना कि किस तकनीक से हम परमात्मा से कनेक्ट हो सकते हैं, ध्यान में गहराई जा सकते हैं । तो आपको परमात्मा के साथ संबंध बनाने के लिए कुछ उहा /तकनीक / जुगाड़ अपनाना पड़ता हैं, उस तकनीक को आप डेवलप करें या किसी के द्वारा गाइडेंस के आधार प्राप्त करें जिससे परमात्मा से आपका संबंध बन जाए और वह संबंध बनाने के लिए जैसे मैं अपना चिंतन ले आता हूं कि बीच में लाभ को ले लिए परमात्मा के उपकारों को याद रखिए परमात्मा जो बेनिफिट्स हो रहा है उसको मन में उठाइए आपका संबंध बन जाएगा । तो उसी तरह से आपकी मन में और कोई तकनीक डेवलप हुआ है कि परमात्मा कैसे कनेक्ट हो जाए वह उसे कर सकते हैं तो आप संबंध परमात्मा के साथ बनाएं अर्थ जो परमात्मा है उसके साथ आप कैसे जुड़ पा रहे हैं शब्द केवल डायरेक्शन देगा शब्द के साथ अर्थ का संबंध नित्य नहीं रहता यह बात मैं स्पष्ट किया और बाकी परमात्मा के ध्यान से हमें क्या-क्या लाभ मिलेगा यह कल के प्रसंग में चर्चा करते हुए कल साधना पाद पर हम आएंगे ।
साधना पाद में अष्टांग योग की संक्षिप्त चर्चा करते हुए कुछ और विशेष बात इसमें होगी उस पर चर्चा कर लेंगे कुछ आप लोगों का प्रश्न भी आएंगे अभी भी आ जाए तो उस पर हम चर्चा कर सकते हैं तो कल हम ध्यान करने से, परमात्मा के नाम का जाप करने से हमें क्या-क्या लाभ मिलेगा कौन-कौन से दुख व्याधि आदि संशय कैसे मिटता है उसका क्या-क्या प्रयोजन है कैसे उसका हमें लाभ मिलता है उसे पर थोड़ी चर्चा करते हुए आगे बढ़ेंगे।
    बहुत-बहुत धन्यवाद नमस्ते। शेष कल चर्चा करेंगे । 
                              क्रमशः 

         योग दर्शन उपदेश - आचार्य प्रभामित्र जी 
               लेखन ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा


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