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Sunday, 22 December 2024

योग दर्शन - आचार्य प्रभामित्र जी (४)

                              ॥ॐ॥
                            योग दर्शन
   योग दर्शन पर चतुर्थ दिन का व्याख्यान/ प्रवचन 
  ( आचार्य प्रभामित्र जी - पंचकूला चंडीगढ़ से ) 
      रविवार मार्गशीर्ष कृ ९ विक्रम संवत २०८१ 
                  24 नवंबर 2024 ईस्वी
        (आर्यो का महाकुंभ कुंभ  - अंतर्जाल सभा )

सभी को सादर अभिवादन आइये मंत्र पाठ करलें -
  ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवाव है।
            तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है।
                  ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। 

सभी को पुनः अभिवादनयोग दर्शन पर जो चर्चा हम सुन रहे हैं उसको आगे बढ़ाते हुए आज के प्रसंग को हम आगे ले चलते हैं तो कल हमने यहां पर छोड़ा था कि परमात्मा का नाम ओम है, और ओम को प्रणव भी कहते हैं ओम भी कहते हैं प्रणव उसका अर्थ सहित हमें जप करना चाहिए ।
       तस्य वाचक: प्रणव । जपतदर्थ भावनम् ॥ 
यहां तक बातें आई थी तो परमात्मा के ओम का नाम का अर्थ के साथ जप करने से क्या लाभ होगा ? आज इस विषय पर चर्चा करेंगे।
अब प्रश्न यहां पर खड़ा होता है कि ओम का जप हमें करना चाहिए अर्थ के साथ तो अर्थ के साथ ओम का जप करने की विधा क्या है ? कैसे जप करें ? 
तो कल हमने थोड़ी सी बात संकेत की थी शब्द अर्थ संबंध के बारे में कि जिस शब्द का अर्थ हमें पता नहीं होता है तो उस शब्द में ही हम अटके रहते हैं, अर्थ में हम नहीं जाते ओम शब्द का अर्थ यदि हम रट भी ले स्मृति में ले भी आए हैं तो भी वह जिसको हमने रटा है वह भी शब्द ही होता हैं । 
जैसे ओम का अर्थ होता है रक्षक, सर्व व्यापक, आनंदघन। अब यह आनंद भी शब्द ही है सर्व रक्षक भी शब्द ही है व्यापक के शब्द में ही हम रहते तो ओम का जप प्रणव का जप हमें करना है और थोड़ा सा गैप देना चाहिए, यह मैं अपने अनुभूति से बता रहा हूं कि ओम का जप करें और थोड़ा रुक जाए उसके अर्थ पर विचार करें कि वह रक्षक है तो रक्षक में ना अटके रक्षक से आगे बढ़े कि वो मेरी रक्षा कर रहा है, मैं सुरक्षित हूं ; यह अनुभूति में ले आइये तो अर्थ के साथ आप जुड़ गए परमात्मा का जप करें  तो ओम बोले मानसिक या उपांशु और रुक जाए फिर आनंदघन है अब यहां नहीं रुकना है मुझे आनंद मिल रहा है मैं आनंदित हूं ऐसा अनुभव करिए तो अर्थ के साथ आपको अभ्यास करेंगे तो अर्थ के साथ जुड़ेंगे और फिर वह आनंद का अनुभूति भी अनुभव थोड़ी-थोड़ी होने लग जाएगी अभ्यास से तो महर्षि पतंजलि कहते हैं तस्यवाचक: प्रणव तत: जपस्त तदभावनम् । प्रणव का जप करें अर्थ की भावना के साथ । अर्थ के साथ नहीं कहा अर्थ-भावनम्  अब इस पर  विचार करते हैं भावना अनुभूति फीलिंग यह अर्थ की फीलिंग यदि आपको हो रही है आनंद की फीलिंग सुरक्षा की भावना आप ध्यान में बैठे हैं कोई रोग है आप चिंतित है कि मेरा शरीर छूट न जाए या मैं दुखी ना हो जाऊं यह रोग से और  ग्रसित ना हो जाऊं आप डर रहे हैं ओम का जप कर रहे हैं तो डर यदि है तो फिर ओम का अर्थ हमसे जुड़ा नहीं हैं । मैं उससे जुड़ा नहीं,  सुरक्षा के भाव ईश्वर जो करेगा वह मेरे हित में करेगा ईश्वर मेरी रक्षा के लिए करेगा ईश्वर मेरे कल्याण के लिए करेगा ऐसे भाव साधक के मन में आने चाहिए। 
यदि ऐसा अभ्यास लंबे समय तक किया जाए तो उसका फल क्या होगा ?  तो फल के बारे में
      "ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च।"
अब इस सूत्र में देखिए तत: उससे (किससे ?) प्रणव के अर्थ सहित ओम के अर्थ सहित भावना के साथ जप करने से प्रत्ये चेतन: अब चेतन कितने हैं ? चेतन दो है - एक आत्मा और एक परमात्मा इसका अधिगम: अधिकार पूर्वक ज्ञान होगा । जान पाएंगे प्रणव के जप से अपने चेतन सत्ता को और परमात्मा रूपी चेतन सत्ता को । प्रत्येक चेतन जितने चेतन है दोनों चेतनों को हम अधिकार पूर्वक जान पाएंगे । और क्या करेंगे ?
च अपि = और भी अंतराय अभावस्य, अंतराय का अभाव होगा । अंतराय = विध्न बाधाएं डिस्टर्बेंस इसका अभाव होगा । यह हमसे दूर हो जाएगा । तो आप कहेंगे अंतराय क्या है ? तो फिर सूत्रकार अर्थ बताएगा कि अंतराय क्या हैं , तो अंतराल के बारे में महर्षि पतंजलि ने स्वयं कहा 
" व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरति
भ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः। "
अब देखिए कितने लंबे सूत्र में नौ अंतराय की बात आ गई और नौ प्रकार के अंतराय में पहला शब्द महर्षि पतंजलि का है व्याधि ।  तो व्याधि आधि उपाधि पहले भी कभी चर्चा में हमने इन तीनों शब्दों की चर्चा की थी आज मैं फिर रिपीट कर रहा हूं यह 
व्याधि - हमारे शरीर में जो रोग है वात पित्त कफ इसके विषमता से विकृत होने से जो रोग पैदा होता है उसे व्याधि कहते हैं ।
आधि यहां पर नहीं पढ़ा है लेकिन मैं अनुषांगिक बातों को जोड़कर के व्याख्या कर रहा हूं आधि का मतलब अन्य ग्रंथों से मुझे समझ में आया मानसिक परेशानी काम क्रोध लोभ मोह आदि मानसिक चिंताएं और जिसको आज के अंग्रेजी की भाषा में डिप्रैशन एंजायटी आदि आदि जो मानसिक परेशानियां ज्यादा लोगों में हो रही है तो इसको आधि शब्द से शास्त्रों में वर्णित किया - "आधि" । और उपाधि तो आप सब जानते हैं उपाधि से कोई नहीं बचा श्री श्री १०८, श्री श्री १००८, आचार्य, शास्त्री, डॉक्टर, अजी, यह सब, प्रधान, मंत्री  यह सारे अधिकारी पद प्रतिष्ठा डिग्रियां यह सब उपाधि हैं , और उपाधि में नाम भी एक ले ले "नाम" "पद" "प्रतिष्ठा" । तो यह उपाधि भी एक बीमारी है । 
यह तीन प्रकार की बीमारियों को - एक शारीरिक बीमारी है एक मानसिक बीमारी है एक सामाजिक बीमारी ।
तो सामाजिक बीमारी भी यदि हमारे पास है पद प्रतिष्ठा की चाहना है तो हम मोक्ष के अधिकारी नहीं होंगे भक्ति नहीं कर सकते साधक नहीं बन सकते । पद प्रतिष्ठा को हटा देना पड़ता है अपने को छोटा मान करके एक आत्मा मान करके जीना पड़ता हैं । सभी आत्माओं को एक जैसा अनुभव करने की आवश्यकता होती है बालक में भी आत्मा वही है, बड़ों में भी आत्मा वही आत्मभाव और मानसिक जो आधि है उसे भी उससे भी हमें बचाना होगा और व्याधि यह तो हमें ठीक रखना ही पड़ेगा तो व्याधि को ठीक रखना है आधि को ठीक रखना है, उपाधि से बचाना है । तीनों बिमारियों से बचना हैं। मैं एक बार इस बात की चर्चा अशोक बिहार आर्य समाज में कर रहा था तो वहां पर डॉक्टर सोमदेव शास्त्री जी भी आए हुए थे तो मेरे मुख से यह बातें निकली की साधना करने से ओम का जप करने से शारीरिक रोग भी ठीक होता है । इसका उन्होंने बड़े जोर से खंडन किया था कहा था कि इस बात को जो प्रभामित्र जी कह रहे हैं वह गलत हैं ।शारीरिक रोग तो औषधि से ही ठीक होगा केवल ईश्वर भक्ति करें और रोग ठीक हो जाए यह बिल्कुल अवैदिक बात है ।
तो फिर मैं मंच पर तो मैंने कुछ नहीं कहा था उनसे लेकिन बड़े हैं पितृ तुल्य है तो एकांत में कमरे में थे तब जाकर मिला कहा कि इस सूत्र का क्या अर्थ करेंगे यह महर्षि पतंजलि ने लिखा है - व्याधिस्त्यान संशय..  व्याधि पहले पड़ा है और व्याधि का अर्थ व्यास जी ने भी किया है वात पित्त कफ की विषमता से जो परेशानी है वह अंतराय का समापन होना, किस से ? तद जपत ततर्थ भावनम् ..  ओम् के जप से अर्थ सहित जप करने से व्याधि ठीक होता है अंतराय है ।
कहते हैं मैं इस बात को नहीं मानता । मैंने कहा शास्त्र की बात नहीं मानते आप खैर इस पर अधिक वाद न करके कि वे बड़े हैं उनका आदर किया । कोई बात नहीं ..
तो मैंने यहां पर इस बात का संकेत इसलिए किया कि हमेशा शास्त्र की बातें माननी चाहिए यदि हम साधक हैं ।
उन्होंने उदाहरण भी दिये कई साधकों का कि उनको तो यह रोग हुआ और ईश्वर की भक्ति करते रहे कहां ठीक हुए ।
तो देखिए यदि हमारी साधना ठीक है ईश्वर की भक्ति यदि हम शास्त्र के अनुसार और बिल्कुल विधिवत कर रहे हैं उसका लाभ मिलेगा और हम स्वस्थ होंगे औषधि भी लेनी पड़ेगी औषधि का मानो हम नहीं करते लेकिन औषधि के साथ-साथ यदि ईश्वर-प्राणिधान की भावना से अर्थ सहित ओम का जप साधना आदि व्यक्ति करता है उसको बहुत शीघ्र लाभ मिलेगा और रोग उसे छुटकारा मिलेगा ।
मैं एक उदाहरण आपके बीच में रखना चाहूंगा एक सिडनी के डॉक्टर हैं कैंसर के बहुत बड़े डॉक्टर हैं, साइंटिस्ट भी कहते हैं प्रोफेसर हैं वे हमारे मित्र है उन्होंने महर्षि दयानंद के जीवन चरित्र को अंग्रेजी में अनुवाद किया है और वो वर्षों दर्शन आदि हमसे पढ़ते रहे, उन्होंने अपने अनुभव बताएं कि मैं एक डॉक्टर हूं और कैंसर के रोगीयों का मैं इलाज करता हूं दवाई बताता हूं। लेकिन पहले उनको मेडिटेशन बताता हूं ओम का जप, गायत्री मंत्र का जप, अर्थ के साथ ध्यान करो और यह दवाई भी खाओ । उन्होंने इस बात को कहा कि जो मरीज रोगी यह हमारी बात को मान लेता है वह गायत्री मंत्र ओम का जप ध्यान भी करता प्राणायाम भी करता है योगाभ्यास और एक्सरसाइज आसन वगैराह भी करता है और दवाई भी ले लेता है उसमें जो स्वास्थ्य लाभ है बहुत तेजी से वह स्वस्थ होते हैं उसका इंप्रूवमेंट बहुत जल्दी होता है और जो केवल दवाई लेता है वह बहुत स्लो चलता है ।
तो उन्होंने इस बात को अनुभव किया डॉक्टर होते हुए भी, कि योगाभ्यास का फल मेडिटेशन प्राणायाम और आसन आदि का फल तो बहुत ज्यादा है और दवाई साथ में लिया जाए । तो हमें इस बात को ऋषि की बात को माननी चाहिए और उसे खानपान औषधि का सेवन बिना रोग के भी औषधि का सेवन करते रहना चाहिए । अब आपके मन में यह आ रहा होगा कि बिना रोग के औषधि क्यों लें ? 
 मैं यह कह रहा हूं कि बिना रोग के भी दवाई/औषधि खाते रहना चाहिए तो प्रश्न आ के खड़ा होता हैं कि हमें रोग ही नहीं है तो औषधि क्यों लें ? तो रसायन का प्रयोग करें।
रसायन में जैसे अभी ठंड का समय है तो आंवला का खूब सेवन करिए, आप आंवले का जूस बना कर ले, चटनी बना कर लें या उबाल कर खायें मुरब्बा खा ले जैसे भी आप च्वयनप्राश में ले लेकिन आंवला खायें रसायन है वो।
त्रिफला ले - कोई रोग नहीं है तो भी लेते रहे। और खान पान ही हमारी औषधि है । तो निश्चित रूप से हम रोग से बचने के लिए पथ्य अपथ्य का ध्यान रखते हुए और योगाभ्यास प्राणायाम ध्यान करते रहे, तो बड़ी से बड़ी बिमारी कोई हैं तो उससे छुटकारा मिलेगा और रोग नहीं है तो हम स्वस्थ रहेंगे।
तो व्यधि शब्द यहां ऋषि पतंजलि ने पढ़ा है - ओम् के जप अर्थ के साथ करने से व्याधि ठीक हो जाती है । और आधि उपाधि से भी हम बचने लग जाते हैं।
अब अगला शब्द है स्त्यान -
स्त्यान - अकर्मण्यता किसी भी कार्य को  करने की इच्छा न होना । (अच्छे कार्य) को धर्मानुसार वेदानुसार - यज्ञ करना धर्म है ना करने से पाप होता है। लेकिन हम अकर्मण करने की इच्छा ही नहीं होती हैं । प्रातः हो गया चलो ध्यान करें यज्ञ कर लें स्वाध्याय कर लें इच्छा ही नहीं हो रही । हमको पता है कि यह धर्म है लेकिन करने की इच्छा न होना यह " स्त्यान "। 
और यह भी अंतराय है यदि आप ओम् का जप गायत्री मंत्र का जप अर्थ के साथ भावना के साथ आप करते हैं तो आपके मन में जो अकर्मण्यता हैं, धर्म के कार्यो में रुचि नहीं होती अरुचि है, वह रुचि बनने लग जायेगी । नहीं नहीं मुझे साधना करनी चाहिए मुझे यज्ञ करना चाहिए, यज्ञ नहीं छोड़ना है सब कुछ छूट जाए लेकिन हवन नहीं छोड़ सकते ईश्वर का ध्यान नहीं छोड़ सकते वेद का स्वाध्याय नहीं छोड़ सकते आपकी रुचि बन जायेंगी। स्त्यान रुपी जो बिमारी है वो दूर हो जाएगी। अगला शब्द - व्याधि स्त्यान संशय 
संशय का मतलब होता है भ्रांति दर्शन । हम भ्रम में रहते हैं, हमारे अंदर एक बहुत बड़ी बिमारी है कि मोक्ष होता है या नहीं? इसमें भ्रम पैदा हैं । 
किसने देखा मोक्ष ? किसको मिला है ? हमारे मन में इस प्रकार की भावना आती है। अगला जीवन किसने देखा?
मैंने बड़े बड़े आर्य परिवारों को देखा - अगला जीवन किसने देखा ? इस जीवन में करना है जो कर लो । तो यह जो अगले जीवन को न मानना, ईश्वर को न मानना, मोक्ष में भ्रम पैदा करना - यह जो हमारी एक मानसिक समस्या है ।
यदि आप ओम् का जप अर्थ के साथ लंबे समय तक करने लग जाए तो यह संशय अपने आप मिट जाता है, विश्वास अंदर से आने लगता है कि परमात्मा है, मुक्ति है, और पूर्व जन्म, पर जन्म होता हैं । ये अब तक शब्द में जानते या मानते हैं अब अनुभूति होने लग जाएगी। तो हम संशय करते हैं वेद आदि शास्त्रों के बारे में, अपने जीवन के बारे में वो सब संशय मिट जायेगा।
व्याधि स्त्यान संशय और प्रमाद 
प्रमाद  - प्रमाद हैं लापरवाही देखिए वहां अकर्मण्यता में धर्म आचरण कर्म करने की इच्छा नहीं होती थी । यहां प्रमाद में धर्म आचरण कर्म करने की इच्छा तो है लेकिन लापरवाही हैं। जैसे बच्चे को भेजा कोई सामान लाने के लिए और वो खेलने लग गया पूंछा की भाई कहां भेजा था तू कहां आ गया ? भूल गया जी । लापरवाह 
तो लापरवाह अलंग है लापरवाह का मतलब होता है प्रमाद और प्रमाद हैं लापरवाह । हमें प्रतिदिन हवन करना है ध्यान करना है स्वाध्याय करना है अपने शरीर का ध्यान रखना है। अब इसमें लापरवाही करते हैं खाने पीने में लापरवाही करते हैं । अब हमें डाक्टर ने बता दिया ये खाना है ये नहीं खाना है लेकिन जिव्हा पर नियंत्रण नहीं लापरवाह है जो सामने आया खा लिया हमने यह लापरवाही हो गई।  ध्यान करना चाहिए लेकिन आज हमने छोड़ दिया कहीं घूमने चले गए आज नहीं करना लापरवाही कर दिया, तो यह प्रमाद है ।
तो प्रमाद भी हमारे जीवन से हटने लगेगा यदि आप ओंकार का जप अर्थ के साथ करते हैं तो । अब है आलस्य - आलस्य और प्रमाद को लोग एक ही मानते है आलस्य अलग हैं। आलस्य है शरीर में भारीपन का होना तमोगुण का बढ़ना शरीर में ऐसे टूट रहा है लग रहा है कि मैं पड़ा रहूं बहुत दर्द हो रहा है इसको कहते आलस्य । शारीरिक विकार को तमोगुण आदि के बढ़ जाने से थकावट आदि, अधिक परिश्रम आदि करने से जो शरीर में कमजोरी आदि आती है उसको कहते आलस्य । और प्रमाद हो गया लापरवाही / लापरवाह हम ठीक हैं, हम बैठ सकते हैं ध्यान में, यज्ञ-हवन कर सकते हैं, समय भी है सब साधन भी है हमारे पास पर छोड़ो आज क्या करना हैं कल कर लेगें आज छोड़ देते हैं , थोड़ा लेट हो गये । आलस्य में शरीर में जो कष्ट हैं तमोगुण आदि बढ़ने से वह भी ठीक होने लगता है ईश्वर की भक्ति करने से इसलिए हमें आलस्य से बचने के लिए भी ओम का जप करना चाहिए । 
तो आलस्य प्रमाद अविरति ..
अविरति एक बहुत बड़ी समस्या है अविरति है- विषयासक्ति ( विषयों में आसक्ति ) पांच विषय है रुप रस गंध स्पर्श शब्द इन पांचो विषयों के प्रति अनुराग होना अनुरक्त होना । कोई न कोई एक दो विषय के प्रति तो हम कमजोर होते ही हैं चाहते हुए भी नहीं छूटता है, काम क्रोध लोभ मोह में सब भी आसक्ति हैं। विषयासक्ति - अविरति और जो व्यक्ति विषय में आसक्त होगा तो वह साधक कैसे बनेगा ? खाने जीव्हापर नियंत्रण नहीं है, नेत्र पर नियंत्रण नहीं है, नासिका पर नियंत्रण नहीं है, स्पर्श इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं है, तो नियंत्रण रखना ना रखना अविरति और नियंत्रण रखना अविरति से दूर होना । तो ओम का जप को अर्थ के साथ यदि लंबे समय तक हम आप करते हैं तो आपको विषयों के प्रति अरुचि पैदा हो जाएगी, जो आसक्ति थी उसे चाह कर भी नहीं छोड़ सकते थे उसकी गिरफ्त में थे ।आप साधना के कठोर नियम का पालन करें, ओम का जप करें एक व्रत अनुष्ठान के रूप में, अर्थ के साथ आप देखेंगे कुछ ही दिनों में मास दो मास (माह महिने ) के अंदर आप में इतना चेंज आएंगे इतना बदलाव .. अरे हमारे मन में इन विषयों के प्रति इतना अनुराग हुआ करता था देखो मैं इससे अलग होने में सक्षम हो गया । ऋषि का यह उपदेश है योग दर्शन इसमें कहा अविरति से भी निजात हम पा लेते हैं, छुटकारा मिल जाता हैं । तो यह भी हमारे एक अंतराय है एक विध्न है एक बाधा है । अविरति अब अगला है भ्रांति दर्शन यह तो हो गया था संशय, संशय हो गया कि यह चीज है या नहीं ।
भ्रांति दर्शन का मतलब होता है मिथ्या ज्ञान या उल्टा ज्ञान संशय हो गया कि यह है या नहीं है ?  मोक्ष होता है या नहीं होता है ? और भ्रांति दर्शन को समझ लें कि जो वस्तु जैसा है उसे उल्टा मानना, अविद्या विपरीत ज्ञान यह भी समाप्त हो जाता है । 
अलब्ध-भूमिकत्व का अर्थ यहां पर यह लेना चाहिए कि लंबे समय से हम साधना कर रहे हैं और कुछ हाथ नहीं लग रहा है कुछ पल्ले नहीं पड़ रहा हैं , तो निराशा आ जाती और व्यक्ति साधना करना छोड़ देता है । तो ऋषि कहते हैं अलब्ध-भूमिकत्व ( अलब्ध =अन लब्ध  = प्राप्त न होना लंबे समय से प्रयास कर रहे हैं। ) तो आप साधना करते रहे श्रद्धा से निराश ना हो,  धैर्य पूर्वक यह स्थिति समाप्त हो जाएगी एक दिन प्राप्त हो जाएगी ।और अनवस्थितत्व यानी प्राप्त तो होता है लेकिन थोड़ी देर के लिए जैसे आकाश में बिजली कौंधती हैं ,चमकती है और प्रकाश एक सेकंड के लिए आया और फिर प्रकाश समाप्त हो जाता हैं । साधना करते हैं हम आज 20 -25 साल हो गए तो एक बार कभी ऐसी स्थिति बनती है कि लगता हैं - वाह .. ! हम आनंद में खो गए !! वह स्थिति फिर से प्राप्त हो इसमें 15 दिन, 20 दिन, मास ही लग जाते फिर परमात्मा की कभी कृपा हो जाती हैं तो ऐसे आनंद की पुनः प्राप्ति होती हैं।
यहां अनुभव की बात बताऊं.. साधना में भी राग हो जाता है  अविद्या भी जुड़ जाती हैं कि मैं तो इस स्थिति को प्राप्त करके ही रहूंगा तो यह अहंकार आ गया बीच में, फिर नहीं मिलेगा । 
( क्या नहीं मिलेगा? उत्तर हैं परमात्मा का आनंद - कृपा )
मैं ऐसा करता था पहले .. अभी भी कभी-कभी हो जाता हैं , तो फिर बाद में पश्चाताप होता है कि मैं साधना में राग  अविद्या  राग तो अविद्या है राग पैदा कर दिया या द्वेष पैदा कर दिया। और नहीं हुआ तो बहुत दुखी होने लग गए मन उदास हो गया कि इतने दो-तीन घंटे बैठे स्थिति अच्छी नहीं बनी उदास हो गए, दुखी होना द्वेष होना यह अविद्या हैं ।
मैं कर लूंगा ऐसे आज तो प्राप्त करके ही रहूंगा यह अहंकार आ गया यह राग हो गया तो यह समझ में बातें बहुत दिन के बाद आई कि ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए मैं तो यत्न किया प्रयास किया और ईश्वर का आनंद है ईश्वर की जब कृपा होगी जब मुझे पात्र समझेगा जिस समय जिस दिन उसे दिन अपना आनंद वह दे देगा, नहीं दिया तो ईश्वर ने आज हमें पात्र नहीं समझा इसलिए आज नहीं दिया कोई बात नहीं मैं अपना प्रयास नहीं छोडूंगा तो स्थिति थोड़ी बनती है और फिर वह स्थिति स्टेबल नहीं रहती है हट जाती है तो लंबे समय तक यदि ओम का जाप करते रहें पहले तो प्राणायाम करें प्रणायाम से अपने मन को एकाग्रचित्त करने का प्रयास करें प्रणायाम के बाद फिर आप ईश्वर प्राणिधान के भाव में आ कर आप एक प्रकाश दिव्य आनंद की अनुभूति करें कि मन वहां हृदय में कितने देर तक टिक पाता हैं और फिर उसके बाद आपका मन भाग रहा है नहीं टिक पा रहा है तो उसे ओम् जप में लगा दें अर्थ की भावना के साथ करते रहें गायत्री मंत्र के जप में लगादे अर्थ के साथ । घटा दो घंटा करें एकदम तपस्या पूर्वक तो स्थिति अच्छी बनती हैं, व्यर्थ नहीं जाएगा यह, और हमें और लंबे समय के बाद उसका फल भी मिलेगा। 
  अब विक्षेपसहभुवः । विक्षेप जो‌ चार है -
दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः।
( समाधि पाद १/३१)
विक्षेप/उपविध्न हैं -  दुःख: , दौर्मनस्य , अङ्गमेजयत्व , श्वास -प्रश्वास। 
दुःख - तो दुःख तीन प्रकार के होते हैं - आधिदैविक, अधिभौतिक ओर आध्यात्मिक। 
और योग दर्शन आप पढ़ रहे हैं यह तो मैंने सांख्य दर्शन की बात कर दी सांख्य दर्शनकार ने तीन प्रकार के दुख बताएं और महर्षि पतंजलि योग दर्शनकार ने दुख चार प्रकार के बताएं । अब चार प्रकार और तीन प्रकार .. तो तीन प्रकार के दुख हम सबको पता है सांख्य में दर्शन पढ़े हैं । आधिदैविक आधिभौतिक अध्यात्मिक यह तीन दुख होते हैं।
आधिदैविक दुःख - जो सृष्टि जन्य दुख हैं, अति गर्मी, अति वृष्टि अधिक सर्दी आदि और अधिभौतिक भूत प्राणियों से  दुःख। आध्यात्मिक मानसिक शारीरिक रोग यह आध्यात्मिक दुख हैं। लेकिन योग दर्शन अभी हम पढ़ रहे हैं योगदर्शनकार ने दुख को कहा कि - अगले अध्याय में, अगले पाद में हम पढ़ेंगे परिणाम ताप संस्कार गुणवृत्ति विरोध 
परिणाम दुख, ताप दुख, संस्कार दुख, और गुणवृत्ति विरोध दुख ।
आगे चर्चा आएगी वहां सूत्र आएगा वहीं पर करेंगे चर्चा ।
तो दुख से किसे ( कैसे  ) छुटकारा मिलेगा ? 
दौर्मनस्य मन की जो चंचलता है वह आपका मिट जाएगा अंगमेंजायत्वा हमारे शरीर में कंपन जो होता हैं, ओम के जप से और लाभ बता रहे हैं - कि शरीर में हम कभी भी स्थिर से नहीं बैठते हैं आप देखेंगे कोई व्यक्ति नाखून अपना कुरेद रहा हैं, कोई पैर हिला रहें हैं कोई भजन गाते है ( या प्रायः बोलते बतलाते हैं तो हिलते डोलते हैं जैसे हमारे पंडित व्यास नंदन शास्त्री जी ) कभी स्थिर नहीं बैठते। और जो व्यक्ति मूर्ति/स्टैचू के तरह (मूर्तिवत = स्टेच्यू की तरह) बैठ नहीं सकता तो फिर वह तो डिस्टर्ब हैं , फिर समाधि कैसे लगेगी  ? अंगमेंजायत्वा । और श्वास - प्रश्वास जिसको अस्थमा के रोग होते हैं या नहीं भी होते हैं तो बहुत शीघ्र शीघ्र श्वास - प्रश्वास चलता हैं, यह सब भी परेशानी जो शारीरिक मानसिक है यह दूर होने लग जाता हैं ।
केवल ओम के जब अर्थ के साथ जप करने से कितना बड़ा लाभ हैं । यदि हमें मोक्ष ना भी मिले तो हम स्वस्थपूर्वक प्रसन्नतापूर्वक जी सकते हैं लंबी आयु प्राप्त कर सकते हैं , यह क्या कम उपलब्धि हैं? बहुत बड़ी उपलब्धि है ।
साधना करिए दोनों हाथ में लड्डू है मोक्ष नहीं मिलेगा तो स्वस्थ जीवन मिलेगा मन प्रसन्न चित्त रहेगा और हंसते मुस्कुराते शरीर को छोड़ेंगे और लंबी आयु भी रहेगी और कहीं अच्छी साधना हो गई तो मुक्ति भी मिल जाएगी तो दोनों हाथ में लड्डू है । साधना करने में कोई घाटा नहीं ।
आगे चलते हैं की 
    " तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः। " 
         ( समाधि पाद १/३२)
.अब यहां -  तत् , प्रतिषेधार्थम् , एकतत्त्व , अभ्यासः ।
उन विक्षेपों को दूर करने के लिए एक तत्त्व का अभ्यास करना चाहिए ।
    एकतत्व से तात्पर्य हम एकतत्व अभ्यास।  अब यहां पर हमें विचार करना चाहिए ।
कि एक तत्व कौन हैं ? तीन - क्योंकि हम त्रैतवादी हैं ईश्वर जीव और प्रकृति को मानने वाले लोग हैं, अब इन तीनों में (यहां तीन पदार्थ हैं ) तीनों में एक तत्व कौन है ? तो ईश्वर हैं । 

ईश्वर एक है, जीवात्मा अनंत है, प्रकृति तीन भाग में विभक्त (डिवाइड) हैं - सतोगुण रजोगुण तमोगुण । 
परमात्मा अखंड एकरस एकतत्व अभ्यास: । तो महर्षि पतंजलि बहुत बड़े दार्शनिक थे वैज्ञानिक थे उन्होंने शब्द का जो चयन किया है तत्  प्रतिषेधार्थम् वह विध्न उपविध्न अंतराय जो डिस्टरबेंस ऊपर में बताया गया उसका प्रतिषेध करना चाहते हैं उससे बचाना चाहते हैं एक तत्व का अभ्यास ओम् का अर्थ सहित प्रणव परमात्मा जो आनंदघन हैं, उसका अभ्यास करना पड़ेगा, उसका ध्यान करना पड़ेगा, एक तत्व यदि ब्रह्म है तो यह प्रतिषेध हो जाएगा । तो परमात्मा और ओ३म् भी एका-अक्षर "ॐ" हैं, यह आप लोग जानते हैं। ऐसे तीन अक्षर से ओउम् बना है अकार उकार मकार लेकिन अभी हमने कहा एकाक्षर ओम एक तत्व । एकाक्षर ओम् क्यों कह रहे हैं क्योंकि अ और उ दोनों स्वर वर्ण है दोनों को मिला करके एक हो जाता है और म् जो है वह हलंत्  है उसका काउंटिंग नहीं होगी उसकी गिनती नहीं करेंगे क्योंकि हलंत् वर्ण की गणना नहीं की जाती हैं।
दो स्वर मिलकर एक अक्षर हो गया एक अक्षर " ॐ " 
एक अक्षर को तोड़ेंगे तो तीन भाग में डिवाइड हो जाएगा - अकार, उकार, मंकार ।
एक तत्व का अभ्यास हमें करना चाहिए । ब्रह्म का अभ्यास। ब्रह्म सर्वव्यापक है एक तत्व है एक रस है और हमारे हृदय में है वह तो है सब जगह है ।
अब मन को प्रसन्न किए बिना, मन को प्रसन्न रखे बिना, हम ओम् का जप नहीं कर सकते । जिस व्यक्ति का मन दुखी हैं , परेशान है, वह ओम की साधना कैसे कर लेंगे ? ओम का जाप कैसे करेंगे ? तो मन की प्रसन्नता रखने के लिए महर्षि जी ने सूत्र बना दिया - चित्त प्रसाधनम् तो चित् की प्रसन्नता रखती है तो कहा -
मैत्रीकरूणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्त प्रसादनम्। (1/ 33 पा०यो०सू०)
यदि आप साधक हैं साधना करना चाहते हैं तो इनि बातों को, ऋषि की बातों को ध्यान रखना चाहिए जीवन में अपनाना चाहिए । 
मैत्री = मित्रता करना । किस करेंगे मित्रता ? तो सुखी व्यक्ति के साथ । 
करुणा = दया / करुणा की भावना रखना करुणा के भाव में जीना । करुणा करना किसके साथ ?  दुखी व्यक्ति के साथ । और मुदित = प्रसन्न भाव में रहना । पुण्य आत्माओं को देखकर खुश होना ।‌ और उपेक्षा = अवहेलना या अनदेखा करना। उपेक्षा की भावना रखना । किनके प्रति ? पाप आत्माओं के प्रति पाप आत्माओं का दुरात्माओं का कभी दर्शन हो जाता है तो उससे दूरी बना लेना उपेक्षा करना ।
यदि आप साधना करना चाहते हैं ऋषि के बातों को गांठ बांधनी पड़ेगी । इन चार बातों को हमें ध्यान रखना है अपने चित्त की प्रसन्नता के लिए और चित्त हमारा जब प्रसन्न होगा तो हम साधना कर पाएंगे ओम का जप कर पाएंगे और ऊपर जो लाभ बताएं है वो लाभ हम ले पाएंगे । तो मित्रता करनी है सुखी व्यक्तित्व के साथ संसार में सुखी कौन है ?
तो मैं तो यही कहता हूं कि संसार में जिनके पास चार चीजें हैं वह संसार में सुखी होते हैं - (१) जो शरीर से बलवान है, स्वस्थ हैं।
(२) आत्मा से बलवान हैं (३)  ऐश्वर्य से बलवान है और (४) धर्मात्मा हैं।
मन कहते हैं जो व्यक्ति अपने जीवन में चार गुणो को धारण कर रखा है वह संसार में सुखी हैं। और यदि यह तीन है शारीरिक बल है आत्मिक बल है और आत्मिक बल का मतलब आत्मा का ज्ञान तत्व ज्ञान वेदांत को समझने वाला और शरीर में भी रोग रहित बलवान और वह व्यक्ति भौतिक ऐश्वर्य से संपन्न भी हो यह तीन गुण हो और एक चौथा गुण ना हो धर्मात्मा नहीं है तो वह सुखी नहीं हो सकता । 
रावण के पास तीन गुण बताए गए कि वह विद्वान भी थे आत्मा का बल भी था ज्ञानी थे और वह बलवान भी थे ऐश्वर्यशाली भी थे भौतिक धन संपदा भी थी लेकिन वह धर्मात्मा नहीं था इसलिए वह सुखी नहीं था । जो व्यक्ति सुखी होना चाहते हैं उन्हें धर्मात्मा होना ही पड़ेगा ।
और महर्षि देव दयानंद जी ने तो इस बात को बड़े बल देते हुए कहा  कि कोई व्यक्ति कितना ही बलवान विद्वान धनवान क्यों न हो परन्तु धर्मात्मा ना हो उनसे ना डरें उनका मान ना करें उनकी हानी हो ऐसा उपाय करें । और धर्मात्मा चाहे वह विद्या से शून्य हो बल से रहित हो या वह भौतिक धन संपदा से रहित हो परन्तु धर्मात्मा हो उनसे डरें उनका मान करें उनका आदर करें । तो ऋषिवर का यह वाक्य एक स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना चाहिए, ऋषि ने कितनी बड़ी बात कही तो जो सुखी व्यक्ति है इन तीन गुणों के साथ-साथ धर्मात्मा भी हो उनसे हमें मित्रता करनी चाहिए । 
और यदि आप साधना करना चाहते हैं आप दुखियों को देखकर के मुख फेर लेते हैंआंख मीचकर के आगे बढ़ जाते हैं रोड़ पर हम जा रहे हैं किसी का एक्सीडेंट हुआ और हमारा कर्तव्य बनता है कि उसकी सहायता करें, हम कर सकते हैं लेकिन कहते आप कौन पचड़े में पड़े .. चलो आगे। तो हम कभी हम साधना में आगे नहीं बढ़ सकते ।
हमें तो करुण दुखी व्यक्ति और अहसाय व्यक्ति की उस अवस्था में हमें मदद करने की चेष्टा करनी हैं। महर्षि देव दयानंद के जीवन चरित्र को पढ़ने से पता चलता है वह करुणा-निधान थे, दया के सागर थे, तो हम सब भी ऋषिवर के शिष्य हैं और साधना की भावना रखते हैं तो करुणा के भाव की ऋषि पतंजलि भी कह रहे हैं हमें करुणा के भाव रखते हुए करुणा करनी चाहिए।
 मैत्री और करुणा के पश्चात् "मुदित" को समझें -
"मुदित" का मतलब प्रसन्नता कि धर्मात्माओं को देख कर प्रसन्नता । हमारे बीच आचार्य आनंदपुरुषार्थी भ्राता जी जुड़े हैं, आपका बहुत धन्यवाद है, हमारे परम मित्र हैं मॉरीशस में हम लोग कई बार मिले, भारत में मिलते रहते हैं । तो यह जो आर्यों का महाकुंभ है और इनमें अच्छे-अच्छे विद्वान धर्मात्मा और त्यागी तपस्वियों का दर्शन हमें कर देते हैं आर्य रत्न श्री लखन जी तो आप बड़े धन्यवाद के पात्र हैं जो पुण्य आत्माओं का दर्शन होता है और इसमें हमें प्रसन्नता मिलती हैं । आज मेरा सौभाग्य है ऐसे लोगों का आज दर्शन हुआ ऐसे लोगों की अच्छी बातें हमें सुनने को मिली तो यह मुदित की भावना रखने और जो दुरात्मा पाप-आत्मा है जो गलत कार्यों में लगे हुए हैं उनके प्रति उपेक्षा की भाव रखना दूरी बनाकर रहना यदि इस प्रकार से यदि चार बातों को व्यक्ति ध्यान रखना है तो उसका चित्त हमेशा प्रसन्न रहेगा और चित्त प्रसन्न होने से वह साधना कर पाएगा तो इन बातों को हमें ध्यान रखना चाहिए तो अब मैं कुछ बात संक्षेप से दो-तीन मिनट में कह करके विराम करता हूं योग दर्शन को समझना हो एक शब्दों में आप समझ सकते हैं वह एक शब्द है "ईश्वर प्राणिधान " केवल ईश्वर प्राणिधान करने से आप अपने जीवन को सफल कर सकते हैं जोगी (योगी ) बन सकते हैं। यह बहुत पिछले जीवन के पुण्य संस्कार जिनके पास है वह व्यक्ति ऐसा करने में सक्षम हो सकता है । यह इसको हम कहेंगे भव प्रत्यय विदेह प्रकृति लयानाम् ऐसे योगी जो पिछले जीवन के पुण्य कर्म शुभ कर्म तपस्या त्याग साधना से परिपूर्ण होते हैं और जीवन में केवल ईश्वर प्राणिधान करके विदेह बन जाते हैं प्रकृति लय कर लेते हैं और कैवल्य लेकर जैसा अनुभव करने लगते हैं, मुक्ति के अनुभव अनुभूति होने लगती है वह एक शब्द के ही धारण से ।
और फिर मध्यम कोटि के जो लोग होते हैं उन्हें तीन शब्दों के ऊपर बल देना पड़ता है वह हैं - तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान। इसे क्रिया योग कहते हैं । यह दूसरे साधना पाद में आया है पहला सूत्र है - तप: स्वाध्याय ईश्वर प्राणिधानानि क्रियायोग: । कल इस पर आगे चर्चा करेंगें कि क्रिया योग के अनुष्ठान से तप स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान से हम मुक्ति तक पहुंच सकते हैं, क्रिया योग अनुष्ठान मध्यम कोटि के व्यक्ति ।
और जो साधारण हम आप जैसे मूढ़ आत्मा है उनके लिए 8 शब्द जो है आठ अंग है यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि इन सबको अनुसरण ( आचरण) में लाते हुए जीवन में धारण करते हुए जब हम चलेंगे कठोर तपस्या करेंगे मुक्ति तक अवश्य पहुंचेंगे और मैं आपको विश्वास दिलाना चाहूंगा जो लोग इस बात को कहते हैं की मुक्ति पाने में कई  जन्म लग जाते हैं इस बात में मुझे संशय नहीं है उनकी बात ठीक है लेकिन मैं अपने तरफ से इस बात को खंडन करते हुए इस बात को कहना चाहूंगा कि अभी इसी क्षण हमें मुक्ति मिल सकती हैं ।
आप संध्या के मंत्र को पढ़ते हैं -
हे ईश्वर दयानिधे ! भवत्कृपयानेन जपोपासनादिकर्मणा धर्मार्थकाममोक्षाणां सद्यः सिद्धिर्भवेन्नः॥
सध्य माने आज ही अभी शीघ्र आज ही अभी इसी समय मुझे सिद्धि प्राप्त हो। तो हम उसे भाव से जिए भले का एक जीवन लग जाए इस बात पर हमें निराशा नहीं लानी है और यह जीवन मिला है हमें आर्य परिवार में जन्म मिला हैं या आर्य हम बने हैं और वेद शास्त्र को हम समझ पा रहे हैं और हमारे पास सभी कुछ आयु शेष है तो इसका लाभ हमें ले लेना चाहिए अगला जीवन पता नहीं हमें कहां मिलेगा मनुष्य का मिलेगा या नहीं मिलेगा ? मिलेगा तो किस कुल में जाएंगे कहां जाएंगे अगले जन्म का अनिश्चित पर हमें विश्वास नहीं रखना । निश्चित जो है जो मिला है उसका उपयोग करना चाहिए आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद आप सबका प्यार सदैव हमें हमेशा मिलता रहता है इसलिए मैं आप सबका आभारी हूं ।
   विशेष आचार्य आनंदपुरुषार्थी जी जुड़े हुए हैं हम चाहते हैं भ्राता जी आपको सुनकर हमे प्रसन्नता होगी । 

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                - आचार्य आनंद पुरुषार्थी जी - 
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्, आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥ - ( श्वेताश्वतरोपनिषत् ३-८)
इस पावन कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में सम उपस्थित मेरे बड़े अच्छे मित्र भ्राता आचार्य प्रभामित्र जी, और इस सभा में अपनी गरिमा में उपस्थिति दर्ज कर रहे धर्म प्रेमी महानुभावों मैं आप सबका अभिनंदन करता हूँ।

 भ्राता जी का प्रवचन बड़ा मार्मिक चल रहा था और बड़े आध्यात्मिक विषय पर चल रहा था ।आज हम सब लोग जो परेशान है दुखी है आकलांत है उसका एक ही समाधान है कि हमारी जो गति है वह आध्यात्म की ओर हो जाए । प्रायः हमारी जो गति होती हैं लोभ की ओर होती हैं पतन की ओर होती हैं ।
हमारा खाना पीना ऐसा होता है हमारा बोलना उठाना ऐसा होता है हमारे मित्र मंडली ऐसी होती है और हमारी दिनचर्या का अधिकतम समय संसार की ऊहापोह में ही प्रायः जाता हैं कई जन्म बात कभी कोई ऐसा अच्छा दिव्य भाव हमारा बन जाता है और हम थोड़े-थोड़े अध्यात्म पर चलते हैं, और फिर इस राह पर चलते हैं तो यात्रा सफल सी हो जाती हैं। हमारे जो क्लेश है उनसे हम बहुत आक्लांत रहते हैं। 
और क्लेशों की अनेक अवस्थाएं शास्त्रकार ने कही हैं। 
एक तो इसमें उदार अवस्था होती हैं हमारे सामने रसगुल्ला आया मिठाई आई कोई स्त्री आई कोई पैसा-थेला और लोभ का कोई कारण कुछ आया और हम एकदम से फिसल गये।ये क्लेश की उदार अवस्था है ये हमारे जीवन में बनी रहती हैं ।
यदि हम साधक नहीं हैं तो यह बहुत नचाती हैं उदार अवस्था इससे थोड़ा सा अलग हुए तो विछिन्न स्थिति में भी हम आते हैं।
विछिन्न स्थिति का मतलब है कि या तो हम रसगुल्ला को देखकर हम फिसल गये जब रसगुल्ले को देख कर हम फिसल रहे थे उससे आक्लांत हो रहे थे उसमें उलझ रहे थे उसी समय कोई दूसरी मिठाई हैं कोई खीर हैं कोई हलवा है उसे समय उसको देखकर हम नहीं फिसल रहे, तो किसी विषय को देखकर हम फिसलते हैं तो कोई दूसरा विषय उसको दबाता रहता है या उपेक्षित सा रहता है । जब हमारे अंदर काम वासना भड़कती हैं तो फिर लोभ की भावना थोड़ी सी दबी रहती है जब हम लोभ में फंसते हैं तो थोड़ा क्रोध से कहीं थोड़े से बचें रहते हैं। 
ये हमारे जीवन में चलता रहता है कभी लोभ है कभी क्रोध है कभी मोह है कभी ईर्ष्या हैं कभी छल हैं कभी कपट हैं पता नहीं कितना मानव जीवन में हमने जन्म जन्म पर की यात्रा में यह हमारी क्लेशों की विछिन्न अवस्था होती हैं ।
एक में फंसे तो दूसरे भाव में वो हमारा दबा है तो वो आ गया तो ये दस गया.. ये चलता रहता है।
तीसरा है तन ( संसाधन) हम साधक बन गए हमने साधना की हम ध्यान चिंतन मनन करने लगे भ्राता प्रभामित्र जैसे विद्वानों को हम ज्यादा सुनाने लगे, हम योग शिविरों में जाने लगे, हमने सत्संगों में ज्यादा से ज्यादा आना-जाना शुरू किया, एकांत सेवन शुरू किया तो हमारे जो क्लेश है वो थोड़े थोड़े कम होने लगते हैं ।
यद्यपि कई करोड़ो जन्मों के है इतनी जल्दी कम नहीं होते लेकिन फिर भी अंतर आने लगता है साधना से समाधि से विचारों से निसिध्यासन से अंतर आता है।  कई बार जिन चीजों के पीछे हम बिल्कुल पागल रहते थे उनको हम थोड़ा कमजोर कर लेते हैं।
और फिर थोड़ी सी स्थिति हमारी बन जाती है ।
और एक होती है - प्रसुप्त स्थिति।  प्रसुप्त स्थिति का मतलब हैं कि एक छोटा बच्चा है लोभ है मोह है क्रोध हैं ईर्ष्या द्वेष सब हैं उसके अंदर लेकिन यह सब दबा रहता है, ये सब भाव हमारे बचपन में दबे रहते हैं जब हम बड़े होते हैं तो दुनिया के समरागण में तो ये हमको जो हमारे सोये हुए से है जाग्रत हो जाते है । ये चार स्थिति क्लेशों की होती हैं।
और एक दग्धबीज अवस्था होती है जिसकी चर्चा योग दर्शनकार ने अपने ढंग से कही है और शास्त्रकार ने भी अपने ढंग से कही है कि हम समाधि लगा लेते हैं और जैसे कोई चने को भून देता है तो फिर वह उपजाऊ नहीं रह जाता है ऐसे हमारे जन्म-जन्म अंतर की इस यात्रा में आर्य सज्जनों हम हमारे क्लेशों को दग्धबीज करदे तो फिर हमारी यात्रा बहुत ही हमें शांति दायक होती है मोक्ष इस मार्ग के ठीक अनुयाई बन पाते हैं भगवान ऐसी कृपा करें किभ्राता जी के उपदेशों को हम लोग सुनते हुए इस पावन राह के पथिक बने ।
आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।
 ओम शांति ! शांति !! शांति !!!🙏

योग दर्शन उपदेश - आचार्य प्रभामित्र जी 
                          एवं आचार्य आनंद पुरुषार्थी जी
लेखन द्वारा ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा, जयपुर।

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