Pages

Sunday, 22 December 2024

योगदर्शन - आचार्य प्रभामित्र जी (६)


                           ॥ॐ॥
                          योग दर्शन
   योग दर्शन पर पष्ठम् दिन का व्याख्यान/ प्रवचन 
     ( आचार्य प्रभामित्र जी - पंचकूला चंडीगढ़ से ) 
      मंगलवार मार्गशीर्ष कृ ११विक्रम संवत २०८१ 
                26 नवंबर 2024 ईस्वी
        (आर्यो का महाकुंभ कुंभ  - अंतर्जाल सभा )

आज हम सब षष्ठम दिन के योग दर्शन पर चर्चा करें 
इससे पूर्व आचार्य आवृत्ति जी का भजन 

ये मन न क्या-क्या दिखाएं कुछ बन न पाया है मेरे बनाएं।
हे नाथ ! अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए॥ 

संसार में ही दिन रात आसक्त रहकर, दिन रात अपनी ही मतलब की कहकर ।
सुख के लिए लाख दुःखों को सहकर, ये दिन अब तक यूं ही बिताये ।
हे नाथ ! अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए।
ये मन न क्या-क्या दिखाएं कुछ बन न पाया है मेरे बनाएं‌ ॥
हे नाथ ! अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए। 
ऐसा जगा दो फिर सो न जाऊं अपने को निष्काम प्रेमी बनाऊं।
ऐसा जगा दो फिर सो ना जाऊं अपने को निष्काम प्रेमी बनाऊं ।
तुम को ही चाहूं तुम को ही पाऊं, संसार का भय कुछ रह न जाये ।
तुम को ही चाहूं तुम को ही पाऊं, संसार का भय कुछ रह न जाये ।
हे नाथ ! अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए। ये मन न क्या-क्या दिखाएं कुछ बन न पाया है मेरे बनाएं‌ ॥
हे नाथ अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए। 

वो योग्यता दो सद्कर्म कर लूं अपने हृदय में सद्भाव भर लूं
वो योग्यता दो सद्कर्म कर लूं अपने हृदय में सद्भाव भर लूं ।
नर तन हैं साधन भव सिंधु तर लूं ऐसा समय फिर आये न आये।
नर तन हैं साधन भव सिंधु तर लूं ऐसा समय फिर आये न आये।
हे नाथ अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए। यह मन न जाने क्या-क्या दिखाएं कुछ बन न पाया है मेरे बनाएं।
है यह नाथ अब तो ऐसी दया हो जीवन निरर्थक जाने ना पाए। 

                     नमस्ते धन्यवाद।
                --- ---- --- ००००० --- --- ----
आइए आरंभ करते हैं।  मंत्र पाठ सभी मिलकर करेंगे - 
ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवाव है।
        तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है।
              ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।


सभी श्रेष्ठ मनीषी महान पुरुषों महानुभावों को नमन ।
योग दर्शन की चर्चा में हम यहां तक आए थे की हेय दुख
हेय का मतलब दुख और दुख का कारण और दूसरा था सुख और सुख का उपाय यहां जो हान शब्द आया हैं -
 योग दर्शन में हेय, हेयहेतु हान हानोपाय 
हान हानोपाय हेय हेतु  । तो यह जो हान है जिसको सुख कहा गया हैं यह परमात्मा का सुख है हान आनंद ।
सांसारिक सुख को योग दर्शनकार ने दुख की कोटी में रखा है । संसार में सुख नहीं है, वैसे सांसारिक दृष्टि से विचार करेंगे तो संसार में सुख है, क्योंकि प्रकृति के तीन अवस्थाएं हैं तीन गुण हैं सतोगुण रजोगुण तमोगुण। इन तीन गुणों के आधार पर हम विचार करेंगे तो सुख की प्रतिती होगी और इन तीन गुणों के बारे में महर्षि पतंजलि में यहां पर कहा हैं -
प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थ दृश्यम्।  ( योग दर्शन २/१८)
तो इस दृश्य इस जगत को इस संसार को इस रूप में ऋषि कहते हैं कि प्रकाश, प्रकाश का मतलब है ज्ञान प्रकाश का मतलब रोशनी आप भी सब जानते हैं । तो वह सतोगुण जो होते हैं वह प्रकाशशील है । स्वभाव सत्व का कैसा है प्रकाश।  तो जब हमारे चित्त में सतोगुण प्रधान होता है तो हम सत्य सत्यता यथार्थ को जानते हैं । प्रकाशित होता है सब बातें सही कौन है ? गलत कौन है ? यह हमें प्रतीत होने लगता है ।और फिर कहा क्रिया, रजोगुण का क्रिया है, की राजोगुण यदि बढ़ा हुआ है चित्त में जीवन में तो व्यक्ति बड़े चंचल होते हैं क्रियाशील होते हैं बहुत एक्टिव होते हैं । और रजोगुण दुःख भी प्रदान करता है । और सतोगुण सुख देता हैं । दुख देता है रजोगुण चंचलता को लाता है क्रियाशीलता को लाता है खूब व्यक्ति भागता है दो चार दस प्रकार के बिजनेस भी करेंगे कि भागेंगे भी राजनीति में भी जाएंगे 
वहां जाएंगे बहुत .. तो कहते कि इसमें रजोगुण उभरा हुआ है । और सतोगुण वाले व्यक्ति होते हैं वह शांत चित्त होकर के एकांत में रहना पसंद करते हैं विवेक भाव से किसी कार्य को करते हैं इस कार्य को करने में क्या लाभ है क्या हानि हैं ?और हमें क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए ? इन सारी बातों का प्रकाश उसके मन में रहता है । 
लेकिन तमोगुण वाले व्यक्ति - तो तमोगुण का जो फल है वह स्थिति वाला है मूढ़ अवस्था । "प्रकाश क्रिया स्थिति"  स्थिति का मतलब यहां पर पड़े रहना । तो तमोगुण यदि बढ़ा हुआ है व्यक्ति के अंदर तो किंकर्तव्यविमूढ़म् वह क्या करें ? क्या ना करें ? उसको वह समझ नहीं रहता उसके पास मूढ़ अवस्था में मूर्छित अवस्था जैसा बना रहता है तो ना कुछ करने की इच्छा है ना कुछ करेगा । तो इस प्रकार से यह तमोगुण की बात यहां पर आई है । फिर कहा यह जो तीनों गुण मिलकर के "भूत इंद्रियात्मक" भूत क्या है ? इन तीनों गुणों से ही यह सृष्टि की रचना हुई तो यह जो पंचमहाभूत है तो यह भी त्रिगुणात्मक है और जो इंद्रियां है, इंद्रियां हमारी यह भी त्रिगुणात्मक हैं। लेकिन विचार करके देखेंगे तो यह संसार जो है तमोगुण प्रधान है भूत । अब हम थोड़ा सा सांख्य दर्शन में ले चलेंगे आपको तो सांख्य दर्शनकार ने यहां पर क्या कहा की
  सत् रज तम साम साम्यवस्था प्रकृति:
प्रकृतय महान महत्व अहंकारों अहंकारत पंचतत्व मात्राणि उभय इंद्रियं स्थूलभूतानि पुरुषेरिति पंच - त्रिगुणां ..  सूत्र के आधार पर अब सत् रज तम साम यहां पर आप देखेंगे तो क्योंकि प्रकृति की चर्चा आई तो सत्व रज तम तीनों की जो साम्यावस्था होती है इसको हम प्रकृति कहते हैं, प्रकृति में समता होती हैं । मूल कारण में जो आंख का विषय नहीं बनेगा और जब वह प्रकृति निर्माण कार्य के रूप में आगे बढ़ती है परमात्मा की शक्ति से परमात्मा उसको जब आगे बढ़ता डेवलपमेंट करता है तो वहां पर वै-साम्यावस्था आती है साम्यावस्था नहीं रहती है । इसको समझिए की प्रकृति के निर्माण में जब प्रकृति सम भाव में रहेगा अपने-अपने स्वरूप में सतोगुण तमोगुण रहेगा तो वह प्रलय की स्थिति होगी मूल कारण होगा और सृष्टि निर्माण जब आरंभ होता है तो परमात्मा की शक्ति उसमें काम करती है और वह वैसमव्य  अवस्था में आ जाता है वैसमव्य का मतलब विक्षोभ ।
जैसे नदी में एक पत्थर फेंके तो देखिये पानी में लहरें उठती है विक्षोभ होता है उथल-पुथल होता है । तो सत्व रज तम  में जब उथल-पुथल होता है परमात्मा जब उसको मिक्स करता है कम ज्यादा करके निर्माण करता है तो फिर सृष्टि बनना आरंभ हो जाता है । तो पहला स्टेप जब बनता है पहले कार्य जो है वह सांख्य दर्शन के आधार पर क्योंकि यहां पर भूत और इंद्रिय शब्द आया है उसकी व्याख्या करने के लिए मैं वहां पर सांख्य दर्शन में गया उसको समझते हुए आज को हम समझेंगे तो पहले कार्य जो बनता है उसकी मह तत्व कहते हैं । क्या कहते हैं ? महतत्व और महतत्व पहला सृष्टि का कार्य है उसको बुद्धि तत्व भी कहते हैं।
बुद्धि इसी महतत्व के द्वारा हम आत्मा सत्या-सत्य का निर्णय कर पाते हैं । तो सत्या-सत्य निर्णय करने का जो इंस्ट्रूमेंट है साधन है उसे महतत्व कहते है वह बुद्धि तत्व है और बुद्धि से महतत्व से सृष्टि जब और आगे बढ़ी अहंकार बन गया। अहंकार.. फिर इसको अहंकार को दो प्रकार से देखेंगे फिर यह चर्चा जब विषय बढ़ जाएगा,क्योंकि विषय को हम यहां योग दर्शन पर केंद्रित करना चाहते हैं ।
अहंकार एक पदार्थ है अहंकार एक सृष्टि का कार्य है अहंकार से व्यक्ति जो अपना सत्ता का बोध कराता है अपने आत्मा का बोध करता है अपने कर्तव्य का बोध करता है ।
अहंकारत पंचतत्व मात्राणि ..तो अहंकार से दो विभाग बन गये इसको समझिए ..
अहंकार से दो विभाग बना अहंकार में सत्व गुण की प्रधानता से इंद्रियों का निर्माण हुआ और इंद्रियां कितने हैं? तो इंद्रियां 10 इंद्रियां और एक मन इंद्रियों है और ये 11 हैं ।
इंद्रियों का निर्माण सत्व अहंकार से हुआ और सत्व अहंकार से परमात्मा ने इंद्रियों को बनाया है तो विचार करके देखिए यह जो इंद्रियां हमारी है सात्विक है मन सात्विक हैं, मन का जो स्वरूप है सतोगुण प्रधान है । इंद्रियों का जो सामर्थ्य है वह सत्व प्रधान है । लेकिन आपके मन में प्रश्न आ गया होगा की मन चंचल होता है मन को रोके भी नहीं रुकता ।
तो मन सतोगुण कैसे माना जाए तो आप सोचेंगे कि मन को चंचल करने के लिए जो रजोगुण उसमें उभरा है उसका कारण हमारा आहार है, हमारा व्यवहार है, हमारी आदतें हैं, बहुत सारे ऐसी आदतें ऐसा आहार ऐसा व्यवहार जो मन को जीवन को रजोगुण - तमोगुण से भर देता है । तो अब मन में रजोगुण प्रधान हो गया या तमोगुण प्रधान हो गया उसका कारण हम मनुष्य हम आत्मा हैं कि हमारा खान-पान कैसा है व्यवहार कैसा है । यदि आप मन को अपने स्वरूप में रहने देना चाहते हैं की मन को जैसा परमात्मा ने डिजाइन किया है इंद्रियों को जैसा डिजाइन किया है निर्माण किया है उसको हम छेड़छाड़ ना करें तो आपको उसके अनुरुप सतोगुण के अनुसार यदि आहार आदि व्यवहार करते हैं तो मन इंद्रियों अपने स्वरूप में रहती है नहीं तो अपने स्वरूप को छोड़ देती है । तो यहां पर इंद्रियां शब्द पढ़ा हुआ है योग दर्शन में तो इंद्रियां सातोगुण है और उसमें मन भी एक इंद्रिय है वह आंतरिक इंद्रिय उभय इंद्रिय है । मन को क्या कहा "उभय इंद्रिय" क्यों कहा ? आप सायंकाल और प्रातःकाल जो हवन करते हैं दैनिक उसके अलग-अलग मंत्र हैं लेकिन आठ मंत्र उभय कालीन मंत्र उसको आप सब जानते हैं कि वह प्रातः कालीन वाले मंत्र के साथ भी जुड़ते है और सांयकालीन मंत्रों के साथ भी वही मंत्र जुड़ते है इसलिए वह उभय-कालीन हैं , वह अलग नहीं है, सेम है । तो मन जो है वह उभय इंद्रिय इसलिए मन को कहा जाता है की मन जो है ज्ञान-इंद्रियों के साथ भी जुड़ता है और कर्म-इंद्रियों के साथ भी मन जुड़ जाता है इसलिए मन का नाम उभय इंद्रिय है और जिस जिस इंद्रिय के साथ मन जुड़ेगा वही इंद्रिय काम करेगी ।
मन का स्वभाव है मन का धर्म है कि एक बार में एक ही काम मन करता है दो काम नहीं करेगा । तो मन जिस इंद्रिय के साथ जुड़ता है वह इंद्रिय एक्टिव होती है वह विषय को ग्रहण कर पाती है और जिसके साथ मन नहीं जुड़ेगा वह इंद्रिय ग्रहण नहीं करेगी विषय को । तो अब इस पर प्रश्नआएगा की मन तो एक बार में कितने काम हम कर लेते हैं कितने इंद्रियों से काम कर लेते हैं तो यह विषय आप सब जानते हैं कि मन इतना सूक्ष्म है इतना गतिमान है इतना पावरफुल है कि उसके अंदर इतना सामर्थ्य है कि वह बहुत कम समय में अपने कई इंद्रियों को प्रयोग कर सकता हैं।
और हमें लगता है कि एक साथ वह कई पर कार्य कर रहा है, लेकिन उसमें क्रमभेद हैं । उसमें क्रम भेद हैं जैसे हाथ में आप पांच बॉल उछालें अभ्यास हो तो पांचों बॉल्स को आप गिरने नहीं देंगे इतनी तेज गति से आपका अभ्यास है कि आप क्रम से एक के बाद एक पांचों गैंदो को क्रम से पकड़ कर उछाल देते हैं और गिरने नहीं देते हैं तो मन का इतना सामर्थ्य है कि वह क्रम से होने दें रहा है लेकिन हमें लगता है एक साथ हो रहा हैं । पंखा जब घर में चलाते हैं तो पंखुड़ियां तीन या चार होती है लेकिन जब वह घूमते हुए गति पकड़ लेती है तो लगता है एक ही हैं, वो तीन या चार नहीं दिखाई देती तो मन जब स्पीड में काम करता है तो हम साधारण मनुष्यों को ऐसा प्रतीत होता है कि मन एक साथ कई कामों को कर रहा है, लेकिन वो क्रम से हो रहा है वो क्रम इतना फास्ट है कि लगता है मन सबके साथ जुड़ रहा है।
तो इंद्रियां मन यह सात्विक है परमात्मा ने सात्विक बनाया है, इसको सात्विक ही रहने देना चाहिए और वह यदि हम व्यवहार आहार सात्विक करेंगे तो मन सात्विक रहेगा ।
फिर कहा "भूत और इंद्रियां"  तो भूत क्या है ?  भूत का निर्माण जो पंच महाभूत हैं अग्नि वायु जल आकाश पृथ्वी की यह पांचो महाभूत तमस अहंकार से बनाएं । क्योंकि पहले सूक्ष्म भूत है रुप रस गंध स्पर्श शब्द, इससे फिर पंचमहाभूत बना है अग्नि वायु जल आकाश पृथ्वी ।
तो यह तमस अहंकार से इसकी उत्पत्ति हुई तो यह संसार तमोगुण प्रधान और इंद्रियां सत्गुण प्रधान है ।
अब कहेंगे तो रजोगुण प्रधान क्या है ? तो रजोगुण जिसके साथ जुड़ जाए । तमोगुण में रजोगुण चला जाए तो उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा । सतोगुण में रजोगुण चला जाए तो प्रभावित कर देता है अर्थात चंचल कर देता है ।
तो इस प्रकार से सृष्टि के बारे में थोड़ा सा हमने चर्चा आपके बीच में थोड़ी रखी। 

तो ऋषि कहते हैं महर्षि पतंजलि कि - भोग अपवर्ग दृश्य..
  आप के मन में प्रश्न आ रहा होगा कि परमात्मा में संसार बनाया इंद्रियां बनाई और यह सब कुछ दिया । पिंड और ब्रह्मांड । यह क्यों बनाया ? कई लोगों के मन में ऐसा प्रश्न आता है कि परमात्मा ने संसार बना करके हमको दुख में डाल दिया संसार नहीं बनता तो हम बढ़िया से पड़े रहते आत्मा अपना मुर्छित अवस्था में रहे, सोए हुए रहे, जैसे रहे इतना घर बनाओ, धन कमाओ, भोजन पकाओ, रोज भोजन करो यह फिर बुढ़ापा रोग इतना दुख है तो यह क्यों परमात्मा ने आत्मा को झंझट में डाल दिया ? इस प्रश्न का उत्तर यही है कि यदि एक व्यक्ति मुर्छित अवस्था में एक आत्मा पड़ी हो तो वह कोई मुर्छित अवस्था में पड़ा रहना नहीं चाहता है । सभी अपने आप को जानना चाहते हैं, संसार को देखना चाहते है या अपने स्वरूप को जानना चाहते है प्रकाश में रहना चाहते हैं अंधकार में पड़ना नहीं चाहते है रात्रि कोई पसंद नहीं करता है रात्रि कितना ही सुखद क्यों ना हो किसी को अच्छा क्यों नहीं लगता हो लेकिन रात्रि जो है वह सुख कारक नहीं होता दिन शुभ कारक होता जहां प्रकाश और जहां अंधकार है वह तो दुख कारक होता है । तो आत्मा यदि मूर्छित अवस्था में पड़ी रहती तो ना तो आत्मा का प्रयोजन सिद्ध होता कुछ जान पाती और परमात्मा का ज्ञान परमात्मा का सामर्थ्य उसका भी कोई प्रयोजन नहीं रहता क्योंकि परमात्मा का जो सामर्थ्य है शक्ति है परमात्मा का जो ज्ञान है परमात्मा का क्रिया-बल है यह सब परोपकार के लिए है, दूसरे के हित के लिए है।  तो परमात्मा ने कल्याण की भावना से आत्मा के कल्याण हो जाए तो सृष्टि निर्माण कर दिया की आत्मा मुर्छित हैं, सोयी हुई है, समर्थ तो है लेकिन वह चल नहीं सकती है, देख नहीं सकती है, तो चलो हम इसके लिए कुछ हेल्प करते हैं सहायता करते हैं - तो परमात्मा ने सृष्टि बना करके आत्मा को दे दिया अब आत्मा के पास जैसे सृष्टि को जोड़ा अब आत्मा चलने लगी दौड़ने लगी बोलने लगी कि देखने लगी और वेद आदि पढ़ करके अपने को समझने लग गई कि मैं कौन हूं परमात्मा कौन है यदि मूर्छित अवस्था में आत्मा रहती है सृष्टि निर्माण नहीं होता इंद्रियां हमें प्राप्त नहीं होती, संसार नहीं होता तो अपने को तो नहीं जानते परमात्मा को भी नहीं जानते। परमात्मा का कितना बड़ा आनंद है " मोक्ष " उसको भी नहीं जान पाते।
परमात्मा करुणानिधान है तो उन्होंने यह इंद्रियां दी यह शरीर और संसार बना कर दिया कि तुम मुर्छित मत रहो मेरे आनंद को भोगों । स्वछंद होकर निश्चिंत हो कर जहां जाना है घूमों 
३१ नील ४० खरब १० अरब वर्ष तक ये परमात्मा की कितनी बड़ी कृपा है उपकार है आत्माओं पर मोक्ष प्राप्ति के लिए। तो संसार क्यों बनाया परमात्मा ने ? भोग अपवर्ग दृश्यम् .. अब यह मैं नहीं कह रहा हूं यह महर्षि पतंजलि कह रहे हैं कि भोग और अपवर्ग के लिए परमात्मा ने इस दृश्य को इस संसार को बनाया। भोग क्या हैं? सुख और दुःख।
संसार के विषय जो है भोग है रुप रंग गंध स्पर्श शब्द इसमें हम कोई सुखी होते हैं तो कोई दुःखी होते हैं। 

भोग या फल को भोगने के लिए संसार का होना जरूरी है, शरीर का होना जरूरी है, नहीं तो कर्म फल नहीं मिलेगा भोग नहीं मिलेगा अब अच्छा भी होगा, बुरा भी हो सकता है।
और अपवर्ग मोक्ष भी हमें नहीं मिलता यदि यह संसार ना होता यदि हमारे पास शरीर ना होता क्योंकि शरीर है तभी हम मोक्ष के लिए तैयारी करते हैं तो शरीर हमारा साधन है मोक्ष के लिए और कर्म फल को सुख और दुख को भोगने का एक साधन है यह शरीर यह दोनों प्रकार की फलों को चाहे मोक्ष प्राप्त करना चाहे चाहे संसार के सुख और दुख को भोगना हो तो शरीर का होना अनिवार्य है, इसलिए परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना की । 
फिर कहते हैं कि इस संसार की रचना करके परमात्मा ने हम आत्माओं का कल्याण किया अब हम इस संसार के भोग से हम बचना चाहते हैं सुख-दुख से बचना चाहते हैं, जो बुद्धिमान होगा जो बुद्धिमान व्यक्ति है संसार में वह स्थाई सुख चाहता है और जो अज्ञानी है कम बुद्धि वाले हैं वह तात्कालिक सुख चाहता है विचार करके देखिए की दो प्रकार के लोग हैं संसार में - कल किसने देखा है ? आज खूब खाओ छककर के खाओ चाट-पकोड़े जो भी मिला खूब बढ़िया भोजन खाओ । 

तो अभी एक इंटरव्यू में देख रहा था वह सिद्धू जी जो है अपनी पत्नी के कैंसर को जैसे उनकी पत्नी हरा दिया,  फोर्थ स्टेज का कैंसर और वह क्लीयर हो गया, समाप्त हो गया तो लोगों ने पूछा मीडिया वालों ने की कैसे हुआ,क्या खाया  आपने तो उन्होंने कहा कि कैंसर का दो रीजन है एक तो गेहूं का जो प्रयोग करते हैं की उसमे कैंसर होने की खतरा अधिक रहती है तो गेहूं की रोटी अधिक नहीं खाए गेहूं तो सदा के लिए छोड़ दे तो अच्छा है और मोदी जी को धन्यवाद करिए क्योंकि श्री अन्न का उन्होंने प्रोत्साहन किया है श्री अन्न जो मोटे अनाज है जौ बाजरा कोदो समा चावल और फिर मक्का यह जो मोटे अनाज है उसका प्रयोग हमें करना चाहिए । खाली गेहूं ( केवल गेहूं) नहीं खाना चाहिए । गेहूं तो ना खाए तो अच्छा है । और फिर उन्होंने कहा कि रिसर्च में यह भी आया है कि जो चीनी है शुगर तो शुगर हमारे बॉडी में कैंसर का सेल्स डेवलप करता है तो शुगर को भी न ले और जो फिर मिल्क प्रोडक्ट और मिल्क वह भी दूध यदि शुद्ध मिलता है अपने घर का और वह भी गाय का हैं और देशी गाय का दूध तो अमृत है। वह हमारे बॉडी के लिए लाभदायक है, परंतु मार्केट में जो दूध आ रहा है प्रायः हानिकारक हैं  ..।

 तो मैंने यहां पर भोग की बात आई थी कि व्यक्ति अपने खान-पान के कारण अपने जीवन को दुख में डाल देता है ।जो मन में आने सो खाओ चाहे मिठाई खा लो चाहे पूरी खा लो खूब तेल वाली सब्जी का खा लो खूब खाइये तो आपको दुख मिलेगा रोग होगा इससे बच नहीं सकते तो रोगों से बचने के लिए यह तो रोग का कारण बताया कैंसर अधिक सेल्स डेवलप होते बॉडी में लेकिन इसका फिर बचाव क्या है नीम का पत्ता कच्ची हल्दी आंवला और फिर एक आता है वह नींबू का पानी का नींबू का पानी भी पीना चाहिए सुबह-सुबह खाली पेट जितना उपवास करेंगे उतना कैंसर का सेल्स मर जाता है तो यह कितनी बड़ी बात है कि हम खाये चले जाते हैं खाते जाते खाते जाते हैं और यह हमारी बीमारी है कि भूखा रहना नहीं चाहते खूब भूख लग रही है ना उपवास करिए व्रत करिए पानी पर रहिए पेट साफ रखिए तो वह अपने आप हमारा बॉडी रिकवर करता है तो इस प्रकार से भोग जो है यदि सुखी होना चाहते हैं तो अच्छा भोग हमें मिले सुख मिले और स्वस्थ रहें तो खान-पान पर अपने को ध्यान रखना होगा यदि खान पान का बिगाड़कर लिया आदत हमने बिगाड़ ली - भूख नहीं है लेकिन फिर भी खा रहे हैं ... जीव्हा पर नियंत्रण नहीं है हमने बचपन में , आज मैंने गलती कर दी मैं बचपन में मक्की की रोटी और दूध और उसके साथ गुड़ खा लेता था आज जबकि मैंने पेट सफाई की आज क्लोलिंग भी किया और जीव्हा पर, मन पर नियंत्रण नहीं किया आया अभी जस्ट आपके से जुड़ने से पहले मक्के की रोटी दिख गई और दूध गाय का और फिर वह गुड़ डाल करके मैं खा
लिया और खाने के बाद तत्काल मुझे लगा कि मैंने बड़ी गलती की आज तो मुझे  खाना नहीं था फल फ्रूट पर रहना चाहिए था तो अब यह क्यों ऐसा हुआ क्योंकि आदत बचपन में खाया था मां हमको खूब खिलाती थी संस्कार था और वह दिख गया और अपने पर नियंत्रण नहीं रख पाया और जब खाया तब पश्चाताप हुआ तो व्यक्ति की आदतें कुछ ऐसी बन जाती है कि हम अपने गलती को समझ नहीं पाते हैं अपने इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं उसका परिणाम फिर हमें दूरगामी भोगना पड़ता है । महानुभावों मैं इस बात को इसलिए बता रहा हूं कि हमारे जीवन में दुख आता क्यों है ? यह सुख आएगा कैसे ? यह आएगा अपने जीवन में सुख वाणी इंद्रियां और मन आदि के नियंत्रण करने से ।
आपको वही चीज लेना है विचार करके "बिना विचारे जो करें सो पाछे पछताय.. " कहावत हैं आपको किसी भी काम को करने से पहले हजार बार सोचना पड़ेगा और चाहिए कि हम इस कार्य को करने जा रहे हैं इसका दूरगामी परिणाम कितना होगा  ? और महर्षि पतंजलि इसी बात को आगे कहेंगे -
 " वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् । " ( सा० पा० ३३)
वितर्क बाधने प्रतिपक्ष भावनम् तो वितर्क क्या है ?
अगला सूत्र है साधन पाद का-  
वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ।
( सा०पा०३४ )
तो यहां पर महर्षि पतंजलि कहते हैं वितर्क हैं  कि व्यक्ति अपने जीवन में जो लोभ हैं क्रोध है यह बुराई है कमजोरी है यह वितर्क है । तो वितर्क को रोकने के लिए क्या करना चाहिए ? तो ऋषि कहते हैं प्रतिपक्ष भावनम् . तो प्रतिपक्ष भावनम् का क्या अभिप्राय है ? कैसे समझेंगे उसको?? समझते हैं एक उदाहरण से समझेंगे जैसे मन में यदि किसी विषय को भोगने की इच्छा हो जाए और वह संस्कार है हमने उसको भोग रखा है, खा रखा है, चख रखा है,  देख रखा है वह संस्कार है । तो उसके पीछे और क्या परिणाम हो सकता है मुझे रामायण कुछ बात की स्मृति आ रही है मैं उसको कहना चाहता हूं एक बार ऐसा एक कहानी बनाई गई की माता सीता को हनुमान जी और जामवंत जी, अंगद आदि वानर सैना बनाई और को खोजने के लिए निकले और सुग्रीव ने उनको आदेश दिया था कि माता सीता को यदि ढूंढ करके नहीं लाये एक महीने के अंदर तो तुम्हें मृत्यु दंड दिया जाएगा । ऐसे यह बात रामायण में नहीं है यह लोगों ने बनाया है लेकिन प्रतिपक्ष भावनाम् पर घटना है मुझे बड़ा अच्छा लगा,  इसलिए बोल रहा हूं क्योंकि कोई भी कहानी जो होती है वह किसी अच्छी बात को किसी अच्छे मैसेज को देने के लिए की शिक्षा मिल जाए कहीं सुनी जाती हैं।
तो एक महीने का डेडलाइन दिया गया तो अब एक महीना गुजर गया माता सीता नहीं मिली समुद्र किनारे जाकर के सभी ने आमरण अनशन कर दिया कि अब लौट करके खाली हाथ नहीं जाना यहीं पर प्राण त्याग देंगे अन्न जल छोड़कर के । क्योंकि वहां जाएंगे तो सुग्रीव राजा है हमें उसका काम किया नहीं माता सीता को खोज नहीं पाया तो मृत्यु दंड देंगे तो वहां भी मरना है यहां भी मरना है और वहां मारेंगे तो और हानि होगी । क्या क्या हानि होगी वहां करने से वहां जाने से रिपोर्ट मिलेगा भगवान राम को कि सीता जी मिली  नहीं, भगवान राम सीता से बहुत स्नेह करते हैं तो वह भी प्राण त्याग देंगे अपनी पत्नी के वियोग में और भगवान राम प्राण त्याग देंगे तो फिर लक्ष्मण भी प्राण त्याग देंगे तो दोनों भाई भरत और शत्रुघ्न भी प्राण त्याग देंगे।  अच्छा भाई नहीं रहेंगे तो तीनों माताएं जब महाराज दशरथ भी नहीं अब संसार में है तो तीनों माताएं प्राण त्याग देंगे और यह तीनों माताएं सारे भाई प्राण त्याग देंगे तो अयोध्या के नर नारी प्राण त्याग देंगे अयोध्या के नर नारी प्राण त्याग देंगे तो पशु पक्षी भी उतनी भगवान राम से प्यार करते हैं पशु पक्षी भी प्राण त्याग देंगे पेड़ पौधे वनस्पतियां यह सूख जाएंगे तो बहुत नहीं प्रेम करते कितनी बड़ी आग लग जाएगी और हमें तो मरना ही है असफल होने पर राजा छोड़ेंगे नहीं, यदि हम यहां पर प्राण त्यागते हैं समुद्र किनारे भूखे प्यासे रह करके तो यह सूचना है वहां तक नहीं जाएगी माता-सीता नहीं मिली तो पता मिलने की आस में तो कम से कम भगवान राम तो बैठे रहेंगे मरेंगे नहीं और  इतनी बड़ी आग तो नहीं लगेगी हानी तो नहीं होगी हम मरेंगे तो हम लोग ही केवल मरेंगे तो यह अच्छा है कि यहीं पर हमें इसको आग को बुझा देनी चाहिए आगे बढ़ने नहीं देना चाहिए ।
तो इससे हमें क्या शिक्षा मिलती है -
हमें यह शिक्षा मिलती है कि जो हमारी आदतें हैं बुरी आदतें अपने इंद्रियों पर हम नियंत्रण नहीं कर पाते फिसल जाते तो उससे होने वाली हानि का विचार व्यक्ति को बार-बार करें हानि पर हानि हानि पर हानि उसके बाद इसके बाद यह हानि उसके बाद यह हानि उ इस प्रकार से यदि हानि होने का उससे होने वाले विनाश का यदि अधिक दिग्दर्शन मन में किया जाए तो संभव है कि हम उस कमजोरी से बच सकते हैं, और विचार करेंगे मुझे कोई भी काम करने से पहले हजार बार सोचना चाहिए कि मैं यह करूं या ना करूं यह करूं या ना करु  चाहे वह भोजन हो, व्यवहार हो, कोई विषय हो, उसका लाभ और हानि पर विचार बार-बार करना चाहिए यह प्रतिपक्ष भाव है । तो यदि वितर्क हिंसा आदि काम क्रोध लोभ मोह आदि जो हमारी कमजोरी है क्या यह हमें बाधित करता है हमें मजबूर करता है आदत के कारण संस्कार के कारण तो प्रतिपक्ष भावनम् यदि हम उठाते हैं तो उसका लाभ हमें यह मिलेगा कि हम उस बुराई से उस कमजोरी से अपने को बचा सकते हैं । और यदि प्रतिपक्ष विचार नहीं करते उससे होने वाले साइड इफेक्ट हानि पर विचार नहीं करते तो हम फिसल जाएंगे और पतंगे की तरह जो आग पर जल करके मरता है इस तरह से हम भी जल करके मर जाएंगे तो विचार करना चाहिए मनुष्य को जो हमारी कमजोरी है उसे मैं कैसे बचे और उसका कमजोर पक्ष को ढूंढते रहो हानि पक्ष को मन में लाते रहे जिससे हम बच सके । तो यहां पर भोग की बात चल रही थी यह ।
अब अपवर्ग क्या है ? अपवर्ग "मोक्ष" हैं।
संसार में यह केवल कहानी नहीं है यह केवल किस्सा नहीं है कि किसी ने कहा होगा पता नहीं होता है कि नहीं ? पर यह रियलिटी है, वास्तविकता है कि मोक्ष होता है ।
और मोक्ष क्यों होता है ?  हम ऐसा क्यों कहते हैं, मोक्ष को हमने देखा नहीं परमात्मा को हमने देखा नहीं लेकिन हम यह कह रहे हैं तो आपको शब्द प्रमाण से ऋषि के भजन गा रहे थे आदरणीय प्रेम जी की " ऋषियों की बात मान लो कि हम अपने जीवन को सुंदर बनाना चाहते हैं ... ।" तो ऋषि कभी असत्य भाषण नहीं करते योग दर्शन को लिखने वाले महर्षि पतंजलि वह असत्य भाषण कैसे करेंगे ? क्योंकि वह समाधि में थे आत्म दृष्टा थे और आत्म दृष्टा होने से वह जो कुछ भी लिखा है वह शब्द प्रमाण के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि हमें कि हमारा "मोक्ष" होता है, और यह यथार्थ है, ईश्वर है । तो अब आज कल के आधुनिक जो बच्चे हैं वह बच्चे कहते हैं कि जी मैं नहीं मानता इस बात को वेद में लिखा हुआ है दर्शन में लिखा हुआ है मैं नहीं मानता वहां तो ऐसे ही लिख दिया होगा क्या इसका प्रमाण है कि इसका यह मोक्ष होता होगा ?  परमात्मा है  ? 
यह जो बातें लिखी है वह सही है तो उनको समझाइए कि देखो शब्द प्रमाण को आप भी मानते हो ।
हम जितने लोग हैं बिना शब्द प्रमाण के अपने जीवन का व्यवहार नहीं कर सकते, तो फिर कहेंगे शब्द प्रमाण के बिना जीवन व्यवहार नहीं चलेगा । अब हम जन्म लिए उदाहरण समझिए हमने जन्म लिया और बाल्यावस्था में अबोध अवस्था हमारी कौन माता है ? कौन पिता है ? कौन दादा है ? कौन दादी है ? माता-पिता यह कहते हैं कि देखो बड़ा हो गया तो मैंने तुम्हें जन्म दिया है मैं तुमहारा पिता हूं मां कहती है मैं तेरी मां हूं अच्छा अरे तुम्हें जन्म दिया है अब यह उस बालक को शब्द के आधार पर जन्म देते समय तो बोलना नहीं क्योंकि अबोध था तो अब बड़ा हुआ तो मां कहती है कि मैं तुम्हारी मां हूं यह तुम्हारे वह दादा है और परदादा, दादा के दादा परदादा और उसके भी पीछे दादा का वह फोटो लगे हैं वह दादा है तो अब इस पर हम विश्वास करते हैं। यह सही बात है तो आप विचार करिए दादा परदादा को हमने नहीं देखा अब मां बाप तो चलो प्रत्यक्ष है वह कह रहे हैं तो मान लेते हैं, आपने मुझे जन्म दिया है इसलिए माता-पिता हो आपके शब्दों पर विश्वास करते हैं आप प्रत्यक्ष भी हो। अब जो नहीं है उस पर विचार करें तो वही दादा है परदादा है कैसे माने ? हमारे साथ माता-पिता ने कहा तो झूठ नहीं बोलेंगे वहां उनके शब्द पर आप विश्वास कर रहे हैं, तो क्या ऋषि जो बात कह गये, जो पिता के समान हमारे ऋषि थे जिन्होंने आप्त-भाव से, कल्याण की भावना से ग्रंथ लिखा वेद का आधार पर प्रमाण देते हुए तो वह कभी झूठ बोल सकते है?  वह समाधि में जाकर के उन्होंने प्रत्यक्ष किया और मैं इस बात को यहां पर सिद्धि के प्रकरण में इस बात को स्पष्ट करूंगा कल थोड़ी सिद्धि की बातें आएगी कि जैसे इन इंद्रियों से आंख आदि इंद्रियों से हम सांसारिक वस्तुओं को प्रत्यक्ष करते हैं तो ठीक उसी प्रकार से ऋषि लोग समाधिस्थ आप्तजन अपने ज्ञान चक्षु से अदृश्य सत्ता का प्रत्यक्ष करता है उसके लिए असंभव नहीं हैं। वह प्रत्यक्ष अनुभव करता है तो आत्मा का प्रत्यक्ष, परमात्मा का प्रत्यक्ष  "प्रत्यक्ष = प्रति अक्षर प्रत्यक्ष: ।" जो कहते हैं कि अक्षय इति आंख, तो इस प्रकार से प्रत्यक्ष जैसे साधारण मनुष्य अपने इंद्रियों से करता है इस तरह से ऋषि लोग अपने आत्मज्ञान से प्रत्यक्ष करता है और उस प्रत्यक्ष को जान करके वह जो बातें लिखता है उसे शब्द प्रमाण कहते है और शब्द प्रमाण हम जैसे लोक व्यवहार में हम प्रयोग का आधार पर मानते हैं और उसको अनुभव करते हैं इस तरह से ऋषि की बातों का अनुभव करना चाहिए ।
अब आगे थोड़े से बढ़ेंगे कि अब जो आठ शब्दों में योग दर्शन की बातें आई थी यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि योग की चर्चा हो और अष्टांग आठ अंगों की चर्चा ना हो तो बात अधूरी रह जाएगी क्योंकि अब इतने कम समय में पूरे योगदर्शन के सारे सूत्र पर हम चर्चा नहीं कर पाएंगे क्योंकि 195 सूत्र हैं। इन 195 सूत्र पांच-सात दिन में नहीं कर सकते 
( क्योंकि यहां पर एक दिन में लगभग एक घंटे ही व्याख्यान हो रहा है ) तो मुख्य या मूल मूल सूत्र हम ले रहे हैं तो इस दूसरे पद में (साधन पाद में) अष्टांग योग में जो आया है जो आठ अंग वाले अष्टांग योग। 
तो आठ अंग वाले जो आठ हैं उसमें से आरंभ के पांच अंग बहिरंग है और अंत के तीन अंग अंतरंग हैं।
बहिरंग जो पांच है यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार यह बहिरंग इसलिए है कि यह शरीर से संबंध रखते है स्थूल शरीर से स्थूल इंद्रियों से यहां इनका व्यवहार संबंध होता हैं ।और धारणा, ध्यान, समाधि यह मन का विषय है, आंतरिक भाग से सूक्ष्म शरीर से इसका संबंध हैं इसलिए इसको अंतरंग कहा जाता है ।
अब मैं सीधे वहां ले चलता हूं समय हो गया हैं कुछ मिनट और है तो मैं इस आठ अंगों की व्याख्या नहीं करूंगा आप सबको पता है क्योंकि इतना तो हम आर्यों को पता ही होता नाम भी याद है और यम पांच है नियम पांच है नाम भी याद है उनका व्याख्या भी परिभाषा भी हमें पता है भले व्यवहार में कितना लेते हैं वह अपना व्यक्तिगत विषय होगा लेकिन शाब्दिक रूप से तो अवश्य सबको पता हैं। तो उसके रिजल्ट (परिणाम) की थोड़ी-थोड़ी चर्चा करके मैं आज समापन करता हूं। 
परिणाम (रिजल्ट) क्या है तो पहले यम है और नियम है तो यम नियम की थोड़ी महत्वता बता दे -  दो शब्दों में कहते हैं कि जो व्यक्ति केवल यम का सेवन करता है और नियम का सेवन नहीं करता है उसके भी हाथ कुछ नहीं लगता जो कोई नियम का सेवन करता है यम का पालन नहीं करता उसको भी कोई हाथ नहीं लगता, कुछ भी हाथ में लगता है क्योंकि दोनों आपस में जुड़ा हुआ है ।
नियम व व्यक्तिक है व्यष्टि है और यम सामाजिक हैं समष्टि है।
इसको समझिए - यह जो मनुष्य समाज है मनुष्य समाज की भित्तियां / दीवार/ वॉल वह क्या है ? तो यम और नियम है । इसी पर मनुष्य समाज टिका हुआ है । 
तो यम और नियम यह हमारे समाज की दीवार है, आधार है। यदि भित्ति को तोड़ दिया जाए तो घर गिर जाएगा तो उसी तरह से समाज यदि ध्वस्त होता है यम नियम का पालन न होने से सत्य आदि आचरण न करने से व्यक्ति का जीवन दोषपूर्ण हो जाता है और उस समाज की स्थिति चरमरा जाती है ।
तो यम-नियम बड़ा ही महत्वपूर्ण हैं, जोगियो ( योगीयो ) के लिए तो और भी महत्वपूर्ण है । महर्षि दयानंद का जीवन यम-नियम से ओतप्रोत था उनको यम-नियम का पालन करने की इस पर फोकस करने की आवश्यकता ही नहीं थी उनको तो जीवन ही  यम-नियम था ।
अब यम-नियम के बाद है - "आसन" आसन तो आप सब जानते हैं आसन बहुत प्रकार के होते 350, 500 प्रकार के 600 प्रकार के आसन..
लेकिन एक आसन जो महर्षि पतंजलि ने बताया -
              " स्थिरसुखमासनम् । " ( सा०पा० ४६ )
इस तरह सुखपूर्वक यदि एक आसन में बैठा जाए और एक अभ्यास कर लिया जाए उसी से सिद्धि मिलेगी समाधि मिलेगी अन्यथा नहीं मिल सकती ।
तो यम के बारे में आया है अहिंसा - अहिंसा में यदि प्रतिष्ठित हो जाए तो क्या मिलेगा तो महर्षि कहते हैं 
    " अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः । " 
        ( योगदर्शन २/३५)
अहिंसा में प्रतिष्ठित होने से आस-पड़ोस के लोगों का प्राणियों का वैर त्याग हो जाता है । तो प्रश्न तो बहुत आएगें पर समय नहीं हैं जो मैं यहां बोलूं .. 
अहिंसा क्या है ?अहिंसा..
तो देखिए 81प्रकार की हिंसा , 81 टाइप्स हिंसा का योगदर्शन में वर्णन किया गया है, और उसका विश्लेषण करेंगे तो आपको अलग से फिर थोड़ा समय निकालना होगा एक - एक घंटा उस पर चर्चा चलेगी 81 टाइप्स हिंसा क्या है उसके ऑपोजिट अहिंसा है तो अहिंसा का पालन करने से अहिंसा क्या है ? अब मैं इसमें इस बात को जोड़ दूंगा कि यम का जो पहला पाठ अहिंसा है वह अहिंसा को ही पुष्ट करता है अहिंसा को ही पूर्ण करता है सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यह जो अगले चार चरण है वह अहिंसा को पक्का करता है अहिंसा के लिए ही है यदि आप अहिंसा को अलग मानेंगे सत्य को अलग मानेंगे तो नहीं बात बनेगी , सत्य जो अहिंसा को पूर्ण करता है जैसे पांच क्लेश में अविद्या मूल है और अविद्या का ही विस्तार राग द्वेष आदी है तो उसी तरह से अहिंसा मूल है अहिंसा का ही विस्तार है सत्य , अस्तेय ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ।आगे आया है - 
     " सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् । " 
        ( योगदर्शन २/३६)
अब आज का प्रसंग समापन कर रहा हूं " सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् । " महर्षि  पतंजलि का सूत्र हैं - सत्य में व्यक्ति प्रतिष्ठित हो जाए तो सब क्रियाओं की सिद्धि होती हैं।
आप व्यवहार भानु में पढ़िए -  बजाज और एक झूठे ग्राहक कैसे कपड़े खरीदने गए और कैसे लड़ाई झगड़ा हुआ। व्यवहार भानु में बड़े सुंदर ढंग से ऋषिवर ने लिखा है अब कहानी कहानी कहां हैं दृष्टांत ही दृष्टांत हैं व्यवहार भानु में । तो लोग कहते हैं कि बिजनेस करने वाले को झूठ बोलना पड़ता है तो ऋषि दयानंद ने सब बातों को खोल कर रख दी कि झूठ पर तो कुछ भी बात टिकती नहीं है जो सत्यनिष्ठ होगा उसी का बिजनेस चलता है और सत्य व्यवहार करने वाला व्यक्ति वह सब क्रियाओं की सिद्धि कर लेता है जो चाहता है जिस कार्य में हाथ डालेगा उसको सफलता मिलेगी सत्य पर जो व्यक्ति चलेगा "सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् । "  कि सत्य में प्रतिष्ठित होने वाला व्यक्ति जो भी काम करेगा उसका फल प्राप्त होगा वह निष्फल नहीं हो सकता वह कभी व्यर्थ नहीं जाएगा,वह फल मिलेगा उसको असफल नहीं होगा । फिर कहते हैं - 
        "अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ।" 
                     (योगदर्शन २/३७)
अस्तेय में प्रतिष्ठित हो गए तो सारे रत्न अर्थात सब प्रकार की आवश्यकता की पूर्ति व्यक्ति को होता हैं ।
अस्तेय मतलब चोरी त्याग यदि चोरी का त्याग कर दिया चोरी नहीं करते हम तो आपको किसी चीज की कमी नहीं रहेगी अभाव नहीं रहेगा यह मैं नहीं कह रहा हूं  यह महर्षि पतंजलि का सूत्र हैं। अब आगे देखें ब्रह्मचर्य पालन से लाभ 
         " ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः । " 
                  ( योगदर्शन २/३८)
ब्रह्मचर्य में प्रतिष्ठित होते हैं तो शक्तिशाली होंगे बलशाली होंगे । अब अंतिम बात  -
        " अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोधः ।" 
                ( योगदर्शन २/३९)
अब इसको विचार कर लीजिए - मैं कौन हूं? और मेरे पिछले मां-बाप कौन थे ?  यह जानना चाहते हैं आगे मैं मरकर के फिर शरीर में किस कुल में जाऊंगा ? इस विषय को समझना चाहते हैं , आपके मन में यह प्रश्न यदि आ रहा है तो इसका समाधान ऋषि ने कर दिया‌ - "अपरिग्रहस्थैर्ये जन्म कथा संबोध: ।" अपरिग्रह में स्थित हो जाए । अपरिग्रह का मतलब होता है कि जितनी आवश्यकता है उतने ही विचार व्यवहार साधन उसको आप लाए । अब इतने सारे कपड़े इतने बड़े-बड़े घर इतनी सारी व्यवस्थाएं इतने सारे विचार इतने प्रकार के भोजन व्यंजन तो यह अपरिग्रह नहीं है, परिग्रह हैं और परिग्रह करने वाले व्यक्ति को समय कहां है इस संसाधनों में उलझा हुआ है उनके विचारों में उलझा हुआ है उनके पास समय कहां है कि मैं विचार करूं कि मेरे पिछले के मां-बाप कौन थे ? मेरा स्वरूप क्या है ? मैं आगे जब शरीर छूटेगा मेरी आत्मा किस कुल में जाएगी किस शरीर में जाएगी ? इसको काम कब करेगा वर्कआउट कब करेगा समाधि कब लगाएगा ध्यान कब करेगा इतने सारे काम उलझा रखा है विचार व्यवहार साधन यह सारे राजनीति यह पार्टियों वह पार्टियां यह वह, अब कैसे बैठेंगे 2 घंटा 3 घंटा ध्यान लगाने पर कम से कम एक घंटा सुबह एक घंटा शाम पर समय ही नहीं हमारे पास ध्यान करने का .. तो ऋषि कहते हैं आप अपरिग्रह में स्थित हो जाइए आपको सारा परिचय मिल जाएगा पिछले 100 जीवन पीछे मेरे बाबा कौन थे किस-किस योनि में मैं गया आगे मैं किस-किस योनि में जाऊंगा इसका परिचय आपको दिग्दर्शन होगा समाधि प्राप्त होगी इसी जीवन में यदि सूत्रों पर विश्वास पूर्वक आचरण करें तो ।
 इसलिए आर्य महानुभावों आप सबसे मेरा एक निवेदन है प्रार्थना है कि आप संसार की समस्याओं को सुलझाने में महारत हासिल कर लिए अपने जीवन में पारिवारिक सामाजिक समस्याओं को सुलझाते रहते हैं लेकिन अपनी समस्या को सुलझा लो कि मैं कौन हूं ?  कहां से आया हूं ?  आगे कहां जाऊंगा ? इस प्रश्न पर काम किया जाए थोड़ा सा भी समय लगाया जाए तो जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है और यह मानव जीवन सफल होगा आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद कल कुछ सिद्धियों की बात करूंगा विभूतियां और केवल्य दो पाद विभूति पाद और कैवल्य पाद उस पर कुछ दो-चार सूत्र आपके बीच में प्रमुखता से रख करके अपनी बात रखेंगे और समापन इस विषय का करेंगे ।
           आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद ।
क्रमशः        

योग दर्शन उपदेश - आचार्य प्रभामित्र जी 
लेखन द्वारा ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा, जयपुर।

No comments:

Post a Comment