योग दर्शन
योग दर्शन पर सप्तम एवं इस सत्र के अंतिम दिन का
व्याख्यान/ प्रवचन
( आचार्य प्रभामित्र जी - पंचकूला चंडीगढ़ से )
बुधवार मार्गशीर्ष कृ १२ विक्रम संवत २०८१
27 नवंबर 2024 ईस्वी
(आर्यो का महाकुंभ कुंभ - अंतर्जाल सभा )
आज हम सब सप्तम और इस सत्र के अंतिम दिन योग दर्शन पर चर्चा करें । इससे पूर्व आचार्य आवृत्ति जी का भजन सुनेंगे।
पाप करने से जो डर गये उनकी रोशन कहानी रहेगी।
काम नेकी का जो कर गये उनकी रोशन कहानी रहेगी॥
मोह संसार का छोड़ कर ईश भक्ति में लाई लगन ।
शोक सागर से जो तर गये उनकी रोशन कहानी रहेगी ॥
काम नेकी का ... पाप करने से जो ..॥
यूं तुम मरते हैं लाखों यहां कायरों की तरह आदमी ।
देश-जाति पर जो मर गए उनकी रोशनी कहानी रहेगी ॥
काम नेकी का ... पाप करने से जो ..॥
जिंदगी के सुलभ पाथ में भी कुछ तो कांटे हैं बोकर गये ।
झोली फूलों से जो भर गए उनकी रोशन कहानी रहेगी ॥
काम नेकी का ... पाप करने से जो ..॥
अपने सुख-दुख में बेमोल तू खूब हंसता है रोता भी तू।
कष्ट औरों के जो हर गए उनकी रोशन कहानी रहेगी ॥
पाप करने से जो डर गये उनकी रोशन कहानी रहेगी।
काम नेकी का जो कर गये उनकी रोशन कहानी रहेगी॥
धन्यवाद ! नमस्ते
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आइये आरंभ करते हैं। मंत्र पाठ सभी मिलकर करेंगे -
ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवाव है।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
आज योग दर्शन की अंतिम कक्षा है और विगत 6 दिनों से हम योग दर्शन पर चर्चा सुन रहे हैं और आज हम प्रयास करेंगे योग दर्शन के कुछ मुख्य बातों की चर्चा करते हुए आज विषय को विराम करेंगे ।
तो योग दर्शन के दो पाद के कुछ प्रमुख सूत्रों की चर्चा संक्षेप से करते हुए आपके बीच में रखा और अब दो पाद आज कुछ समय के लिए हम सुनेंगे और ये दो पाद को संक्षिप्त से संक्षेप में सुन पाएंगे तो पहले है विभूति पाद और फिर है कैवल्य पाद। तो विभूति पाद में जो बातें आई है वह अंतरंग की बात आई हैं - धारणा ध्यान और समाधि ।
बहिरंग की चर्चा दूसरे पाद में हो गई और कुछ भूमिका के रूप में प्रथम पाद में समाधि पाद में और अब अंतरंग की चर्चा महर्षि पतंजलि यहां कर रहे हैं धारणा ध्यान समाधि जो अंतरंग है जो मन का विषय है तो
" देशबन्धश्चित्तस्य धारणा । "
(विभूति पाद /१)
"धारणा" क्या है ? इसको समझना चाहिए की धारणा देशबंध किसी देश में अपने चित्त से चित्त को बांधना चित्त को रोक देना अब देश कोई स्थान भी हो सकता है और कोई शरीर के अंग विशेष भी हो सकता है देश स्थान शरीर के अंग नाभि हृदय नासिकाग्र भृकुटी जिसको आज्ञा चक्र बोलते हैं ब्रह्मरंद्र सहस्रार चक्र तो इन स्थानों पर या कहीं पर शरीर के किसी देश विशेष में या फिर कोई स्थान कोई बिंदु लगा ले या ओम कहीं लिखकर दीवाल पर टांग दे या कोई स्टैचू कोई बना लेते हैं अपने आइडियल पर्सन के गुरु का या किसी का उस पर जो साकारवादी लोग हैं ईश्वर को साकार मानते हैं -गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः। मानते हैं इसमें यह नहीं कह सकते कि वे इसको धरणा का विषय नहीं बना सकते हैं, बना सकते हैं । लेकिन अंततोगत्वा आपको अपने शरीर में ही आना पड़ेगा क्योंकि हमारी आत्मा शरीर से बाहर नहीं है प्रेक्टिस करने के लिए अभ्यास के लिए आप बहरी कोई स्थान विशेष ओ३म् लिख दें और वहां पर आप अपने मन को टिका दें एक दीपक जला दें वहां पर मन को टिका दें तो वह करना हो तो कर सकते हैं प्रेक्टिस करने के लिए, लेकिन अपने शरीर में आना पड़ेगा और शरीर में भी एक स्थान महत्वपूर्ण है धरणा के लिए जैसा कि महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने कहा हृदय प्रतिष्ठं जज्ञिरे यद् जीवं प्रतिष्ठम् अर्थात वेद के आधार पर की ह्रदय प्रदेश, हृदय प्रदेश कोई लोग हृदय ब्रह्मरंध्र को भी मानते हैं सह्रसार चक्र को भी हृदय मानते हैं कई लोगों से मैंने चर्चा की यह भी हृदय हैं ? लेकिन वह हृदय नहीं हो सकता हृदय के बारे में महर्षि देव दयानंद जी ने वह चौहद्दी बता दी दोनों स्तनों के मध्य अंगुष्ठ मात्र जो गड्ढा है उसी का नाम हृदय है और उस हृदय देश में आत्मा रहती है आत्मा का स्थान हृदय देश है।
तो हृदय में आत्मा का निवास स्थान है और जहां पर मैं हूं वहीं पर ब्रह्म की खोज करेंगे तो ब्रह्म का साक्षात्कार होगा अपना स्वरूप का भी दर्शन होगा तो धरणा यदि अनुभवी तपस्वियों के कथन अनुसार यदि विचार करें तो हृदय में ही लगाना चाहिए और महर्षि पतंजलि ने खुली छूट दे दिया है किसी देश विशेष में स्थान विशेष में चित्त को रोकना धरणा हैं। अब कहा उसी जगह पर ध्यान करना है अब ध्यान करना है - ध्यान क्या है ? ध्यान के बारे में सूत्र ऋषि ने बनाया
" तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।"
( विभूति पाद /२ )
तत्र प्रत्यय एक तांता ध्यानम् तत्र तो कहां पर ? आप कह रहे हैं तो कहां ? जहां धारणा किया है चित्त का । अब समझिए आप हम गलती क्या करते मैं भी गलती करता हूं प्राय: कभी-कभी मन भागता रहता है इधर उधर विचारों में विषयों में तो मन रोकेंगे धारणा करेंगे मन को यहां हृदय में या आज्ञा चक्र में मन को यहां रोकेंगे।
अब मन को हमने फिक्स किया जहां अब वहीं पर विचार करेंगे, अब मन को कहीं हम डोर से बांधेगें नहीं, स्थान से बांधेंगे नहीं मन तो भागता ही रहेगा उसमें कुछ विचार लायेगें और उनको भगाते रहेंगे ..
तो धरणा पहले आवश्यक है। मन को एक जगह पर रोकना बांधना अति आवश्यक है फिर वही तत्र वही उसी जगह पर चित्त में अब आपको एक तांता बनाना है तथा तत्र प्रत्यय एक तांता ..प्रत्येय का मतलब क्या हो गया ? प्रत्यय का अर्थ यहां पर जान लेना है अब किसी भी थॉट्स/ विचार/ ज्ञान के बारे में सोचना है वह अग्नि हो सकती है पृथ्वी हो सकती है जल हो सकता है आप जिसको साक्षात्कार करना चाहते हैं जिसके बारे में जानना चाहते हैं उस ज्ञान को वहां पर उत्पन्न (क्रिएट) करें अब वहां पर ब्रह्म भी हो सकता आत्मा भी हो सकता है क्योंकि समाधि तो अनेकों विषय में लगाएंगे आप । तो हम बेहतर समझते हैं कि हमारा विषय (सब्जेक्ट) ब्रह्म बने । तो ब्रह्म का ज्ञान, ईश्वर का ज्ञान के बारे में वहीं पर जहां पर चित्त को रोका है उसी जगह पर इस चित्त के द्वारा इस जगह पर आप प्रत्यय ध्यान ईश्वर का, ज्ञान ईश्वर का एकतांता लगातार उसी के बारे में सोचेंगे कि वह सर्वव्यापक है सर्वव्यापक कैसे हैं ? कण-कण में है सब को जानता है। आनंदकंद है हमको आनंद मिल रहा है वह सर्वरक्षक है मुझे रक्षा (प्रोटेक्शन) मुझे मिल रहा है। इस प्रकार से आप एक अनुभव (फीलिंग) करेंगे उसी के ज्ञान की अनुभूति एकतांता लगातार भले ही शब्द बदलेगा अब यहां हमने कहा कि सर्वव्यापक तो परमात्मा सर्वव्यापक भी है हमने कहा सर्वज्ञ हैं परमात्मा सर्वज्ञ भी हैं तो परमात्मा से संबंधित (रिलेटेड) ज्ञान ही चलें भले ही आप शब्द परिवर्तन (चेंज) कर रहे हैं उनके विषय में जितनी जानकारी है उसमें आपका विचार परिचिंतन परमात्मा से ही संबंधित ज्ञान हो और एक-तांता ( लगातार ) हो ईश्वर परमात्मा का ही ज्ञान हो अन्य विषय का ज्ञान नहीं आना चाहिए तो उसको हम ध्यान कहेंगे ।
फिर कहा उसी ध्यान के करते-करते समाधि अवस्था प्राप्त होगी। अब समाधि के बारे में सुन ले
" तदेवार्थमात्रनिर्भासे स्वरूपशून्यमिव समाधिः। "
( वि०पा०/ ३)
यह सूत्र आ गया तद एव उस प्रत्यय के ज्ञान के आधार पर ही अर्थ मात्रम् निर्वासम् .. अर्थ की केवल प्रतीति हो और प्रतिभाषित हो स्वरूप को शून्य अपना स्वरूप भौतिक स्थिति इसको भुला देना इसको विस्मित कर देना सुन्न/शून्य सा हो जाना मैं स्त्री हूं पुरुष हूं मैं घर में बैठा हूं आपके जो भी अपने जीवन से संबंधित स्वरूप से संबंधित समझ है उसको शून्य कर देना अर्थ की केवल प्रतीति हो यह समाधि है । समाधि के बारे में थोड़ी और दो-तीन बात कर दूं एक होता है ध्याता, एक होता है ध्यान, एक होता है ध्येय । इसको समझ लीजिए तो संभवतः क्लियर हो सकता है । ध्याता, ध्यान, ध्येय और कर्ता, क्रिया कर्म तो अब कर्ता ध्याता आत्मा मैं हूं । क्या कर रहा हूं ? क्रिया ध्यान कर रहा हूं, अभी प्रवचन सुन रहे हैं । क्या कर रहे हैं - क्रिया प्रवचन हो रही है प्रवचन रूपी क्रिया को आप सुन रहे हैं अब प्रवचन का विषय क्या है ? मैं ध्यान कर रहा हूं मैं कर्ता ध्याता क्या कर रहा हूं ध्यान क्रिया और यह किसका कर रहा किस विषय में कर रहा हूं वह विषय ध्येय बन गया । यह तीनों की प्रतीति है तो धरणा की स्थिति है उसमें से एक क्रिया हट जाए केवल कर्ता और कर्म बच जाए ध्यता और ध्यान बच जाए, ध्याता और ध्येय बच जाए तो ध्यान बन गया और केवल ध्येय बच जाए ध्याता भी कर्ता भी हट जाए तो समाधि बन जाती है । ध्यान में दो विषय रहेगा मैं क्या कर रहा हूं इसका बोध नहीं रहेगा यदि यह बोध रह है कि मैं ध्यान कर रहा हूं मैं बैठा हूं अपने घर में अपना भी बोध है, ध्यान करने की क्रिया का भी बोध है किस विषय का ध्यान करना है? ईश्वर का । ईश्वर का भी समझ थोड़ा बन पा रहे हैं तो धारणा में है। और अभ्यास करते-करते करते-करते आप देखेंगे कि मैं क्या कर रहा हूं सुध-बुध खो गया, यह पता नहीं चलता है केवल मैं का बोध है और ध्येय विषय का बोध है तो ध्यान लग गया । और अपना भी बोध फीलिंग हट जाए केवल ध्येय बच जाएगा, अर्थ बच गया तो आप समझिए समाधि लग गई । चलिए आप विचार करेंगे मेरे जो समझ था वह आपके बीच में रखने का प्रयास कर रहा हूं । आज जो विषय हैं यह विभूति पाद इन्हीं तीनों पर टिका हुआ है - धारणा ध्यान समाधि । इन तीनों को इन तीनों को एक साथ कर दें -
" त्रयमेकत्र संयमः। "
(वि०पा०/ ४)
त्रयम एकत्र संयम - संयम क्या हैं ? कहते संयम करना संयम शब्द शास्त्रीय है - धारणा ध्यान समाधि एकत्व हो जाए, अलग-अलग ना रहे - तो संयम होता है । और उस संयम से सिद्धि होती है । यदि धारणा ध्यान और समाधि
अलग-अलग है तो सिद्धि नहीं आएगी ।
अब वह समाधि अंतिम में जो समाधि है लास्ट धरणा पहले सेकंड नंबर ध्यान अंतिम समाधि तो धारणा गायब हो गई ध्यान हट गया केवल समाधि बची और उस समाधि में धारणा भी है ध्यान भी है और समाधि तो है ही तो उस अवस्था में संयम कहलाता है और संयम का प्रयोग जिस विषय में करेंगे तो उस विषय की सिद्धि हो जाएगी उस विषय को हम जान लेंगे । अब संयम का प्रयोग करेंगे तो अब संयम का प्रयोग करते हुए -
" एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्था- परिणामा
व्याख्याताः ।"
( योगदर्शन ३/१३ )
और इसमें आया है परिणाम -
" परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् । "
( यो०द०३/१६ )
एक उदाहरण दे रहा हूं मैं सारे सूत्रों की व्याख्या नहीं करूंगा क्योंकि इतने सारे विभूतियां हैं उपलब्धियां हैं तो उसको कैसे गिनाऊंगा इतने कम समय में लेकिन कुछ मुख्य जो मेरे हृदय को छूता है कुछ सिद्धियां जो हमें समझ में आता है वह मैं बता रहा हूं -
""परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ।"" विभूति पाद का १६वां सूत्र है परिणाम त्रय संयमात् अतीत अनागत ज्ञानम् अब योगी भविष्य को भी जानता है भूत को भी जानता है अब आपके मन में यह प्रश्न आ रहा होगा कि कौन सी ऐसी विद्या है जो मैं भी अपने भविष्य को जान लूं हर व्यक्ति अपने भविष्य को जानना चाहता है मेरी मृत्यु कैसे होगी कल क्या घटना घटने वाली है यह पता चल जाए बहुत अच्छा आवृत्ति जी भी इस बात में बड़ी रुचि लेती है तो यह हमसे कभी कोई पूछते रहती है रहती है कि हमें पता चल जाये कि कल क्या होगा तो बहुत खुशी मिलेगी.. हर व्यक्ति के अंदर चाहे वह साधना करते हो या ना करते हो भविष्य को जानने की जिज्ञासा रहती है और इसी कारण से समाज में एक पाखंड चल पड़ा है तो फलित ज्योतिष और लोग फलित ज्योतिष के नाम पर इमोशनल ब्लैकमेलिंग करते हैं और इमोशनल ब्लैकमेलिंग हम लोग होते हैं । वह होता कुछ नहीं फलित मिथ्या है वह एक अवधारणा है उसमें कुछ सच्चाई नहीं है, ऋषि दयानंद ने इसका खंडन किया है। हां गणित ज्योतिष सार्थक है।
ज्योतिष एक आर्ष विषय का ग्रंथ हैं। तो अब भविष्य को जानने के लिए अतीत अनागत ज्ञानम् यदि अपना जानना चाहते हैं अपने परिजनों का जानना चाहते हैं भविष्य का ज्ञान भूत का ज्ञान वर्तमान को तो सबको पता होता है कि वर्तमान में हम कहां है क्या कर रहे हैं हमारी क्या पोजीशन है यह तो हमें पता होता है तो देखिए विचार करते हैं इस पर कैसे जानेंगे योगी लोग कैसे जानता है तो आया है १३ वें सूत्र में धर्म लक्षण अवस्था परिमाण व्याख्याता पीछे आया था धर्म परिणाम अवस्था परिणाम लक्षण परिणाम । तो अब परिणाम को समझते हैं तीन प्रकार के परिणाम होते हैं, आप ध्यान से सुनेंगे तो थोड़ी कुछ बात समझ में आएगी बहुत गहरा विषय है क्योंकि योगदर्शन है और बड़ा सूक्ष्म विषय है यहां पर परिणाम तीन होते धर्म परिणाम लक्षण परिणाम अवस्था परिणाम तो आप किसी भी विषय में आप उसके अतीत को जान सकते हैं कि यह किसी वस्तु जैसे पत्थर कितना पुराना है कितने दिन तक यह चलेगा इसके जो तत्ववेत्ता होते हैं गवेशक होते हैं पुराने से पुराने वस्तु का आकलन करते हैं, इसकी आयु कितनी पुरानी हो सकती है एक अनुमान से वह करते हैं उस पर कुछ अपनी उनकी पढ़ाई होती है । योग में क्या होता है इसको हम योगी की दृष्टि से समझने का प्रयास करते हैं तो तीन परिणाम को हम समझ लेते हैं । तीन परिणाम क्या है ?
धर्म लक्षण अवस्था । तीनों एक है लेकिन उसको अंतर करके समझेंगे -
धर्म परिणाम - स्वरूप में परिवर्तन होना यह धर्म परिणाम हैं ।और लक्षण परिणाम - स्वरूप जिस स्वरूप में है वह लक्षण परिणाम है ।
अवस्था परिणाम - धर्म और लक्षण के रूप में आने में जो बीच में समय लगता है उसको अवस्था या अवस्था परिणाम कहते हैं । अब इसको मैं स्पष्ट (क्लियर) करके समझाता हूं उदाहरण से समझ आए शायद आपको जैसे मिट्टी ले लीजिए मिट्टी का पिंड लीजिए लूथरा लीजिए मिट्टी का पिंड कुंभकार घड़ा बनाने वाला एक मिट्टी का पिंड लिया तो अब उसे मिट्टी का पिंड का धर्म क्या है धर्म परिणाम है तो धर्म अभी मिट्टी रूप ह वह और अब उसे धर्म को उसे मिट्टी रूपी धर्म को एक आकार (शेप ) दे दिया गया, माना अब वह घड़ा बन गया तो अब क्या हो गया प्रकट हो गया तो अब कौन सा लक्षण वाला हो गया घट धर्म घट लक्षण वाला हो गया उसको मिट्टी नहीं कहेंगे, अब क्या कहेंगे ? अब घड़ा कहेंगे - क्यों कि मिट्टी में हम जल नहीं रख सकते घड़े में पानी रख सकते हैं। तो एक धर्म मिट्टी धर्म था अब घट धर्म में बदल गया जो बदल करके दूसरा रूप आया है तो वह लक्षण घड़ा घट लक्षण वाला हो गया तो घट धर्म से लक्षण परिणाम हो गया घट लक्षण वाला अब समझेंगे मिट्टी से घड़ा बनने में जो समय (टाइम) लगा जो प्रक्रियाएं लगी अवस्थाओं में परिवर्तन (चेंज) किया गया वह अवस्था परिणाम है । जैसे घड़ा बना 10 साल के बाद, उसमें जो टाइम लगा 10 साल बाद उसमें जो परिवर्तन आया (चैंनजेज आया) वह पुराना हो गया तो अब वह टूटने कि स्थिति में हैं ।
तो वह अब टूटने की स्थिति में है, टूट गया तो आप यह कह सकते हैं कि अब वह घड़ा नहीं रहा वह मिट्टी धर्म वाला होगा मिट्टी लक्षण वाला हो गया अब मैं इसको आपको समझाने का प्रयास कर रहा हूं कि शायद बात समझ में आ जाए खुल जाए बात है यह तीन परिणाम है धर्म परिणाम लक्षण परिणाम अवस्था परिणाम इन तीनों में एक-एक करके योगी संयम करता है अतीत अनागत और वर्तमान अब मिट्टी धर्म वर्तमान में था घड़ा भविष्य में आएगा तो आप भविष्य में जो घड़ा रूप बनेगा वह धर्म बनेगा तो घट जब बन गया भविष्य में मिट्टी से तो वह घट लक्षण वाला परिणाम हो गया और घड़ा से मिट्टी या मिट्टी से घड़ा बनने में जो टाइम पीरियड लगा उसमें जो चेंजेज हैं वह अवस्था परिणाम है ।
अवस्था में संयम करेगा धारणा ध्यान समाधि लगाएगा या फिर घट या मिट्टी स्वरूप में उसको संयम करेगा धारणा ध्यान समाधि लगाएगा यह घट में धारणा ध्यान समाधि लगाएगा तो उसमे अलग-अलग करके लक्षण में धर्म में और अवस्था में संयम करने से उस वस्तु का कि कितना पुराना है कितने दिन तक चलेगा योगी को ज्ञान हो जाता है । अपने शरीर के बारे में भी अपने चित्त के बारे में भी योगी को बोध हो जाता है हमारा शरीर कब तक चलेगा और हम आगे हमारे कितनी आयु और बीत गई कितनी आयु हमारी शेष है अपने जीवन में जान जाएंगे दूसरे जीवन में कोई वस्तु के बारे में भी जान सकते हैं इस प्रकार से भूत भविष्य का ज्ञान योगी करते हैं । फिर यहां पर एक आता हैं सूत्र -
" शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्सङ्कर-
स्तत्प्रविभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम् । "
(योग दर्शन ३/१७)
अब यहां पर एक बात और मैं समझाना चाहता हूं की योगी अपने मृत्यु के बारे में जान सकता है कि मेरी मृत्यु कब होगी और मृत्यु कब होगी इसके लिए कुछ चिन्ह भी प्रकाशित होता है 22वां सूत्र है -
"सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म
तत्संयमादपरान्तज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ।"
(योग दर्शन ३/२२)
अभी जो भूत भविष्य का ज्ञान योगी को होता है धर्म परिणाम लक्षण परिणाम अवस्था परिणाम में संयम करने से तो आप इस आधार पर योगी अपने जीवन के कर्मों को ध्यान में जाकर समाधि में जाकर देखा है अब यह सूत्र आया पहले को सूत्र आगे में बोला था उसकी व्याख्या करने से पहले मेरे मन में आए किसकी व्याख्या करें जो उसकी संगति उसके साथ है की सोप क्रमम् निरुप क्रमम् च संयमात् इसको समझते हैं सोप क्रमम् कर्म योगी अपने कर्म जो कर्म व्यवस्थित है उसको सोप क्रमम् कहते हैं जो कर्म अनावशिष्ठित अव्यवस्थित है उसको निरुप क्रमम् कहते है ।जैसे अपने कपड़ा धोया कपड़े को धो करके अपने फैला करके धूप में डाल दिया प्रतिदिन हम नहाते हैं कपड़े धोते तो सोप क्रमम् कपड़े को हमने कैसे किया फैला करके धूप में टांग दिया और वह कपड़ा जल्दी सूख जाएगा सोप क्रमम् हो गया क्योंकि कपड़े के धागे और उसकी जो व्यवस्था है वह सोप क्रमम् में व्यवस्थित है उसमें धूप ठीक से लगेगा और वह सूख जाएगा गिला से सूखा हो जाएगा आपने कपड़े धोए और ऐसे लुंज-पुंज पिंड बनाकर के कपड़े का गोला बनाकर के रख दिया तो 2 दिन में भी कपड़ा नहीं सुखेगा वह हो गया निरुप क्रमम् । समझिएगा बात को तो अब जल्दी फल किसका मिला जो सोप क्रमम् में और निरुप क्रमम् जो देर से फल मिलेगा कपड़ा अव्यवस्थित है, जैसे जंगल में एक क्रम से तिनका सूखा हुआ घास एक दूसरे से टच किया हुआ लगा हुआ है एक चिनगारी एक माचिस की तिल्ली आपने कोई लिया और ऐसे जला करके उस पर रख दिया अब सोप क्रमम् है तो वह घास में तिनके में आग लग जाएगी और विकराल रूप धारण कर लेगा सब मिनटों में जल जाएगा लेकिन इस घास के गट्ठर को आप निरुप क्रमम् करके टाइट करके बिल्कुल गोला बना दीजिए गेंद बना दीजिए और फिर उसमें आग लगाया जाए , ये महर्षि वेदव्यास जी का भाष्य में उदाहरण आया है जो मैं बात बोल रहा हूँ, उस गोले में आग तो लगेगी पर जलानें में टाईम लगेगा, क्योंकि निरुप क्रमम् हैं।
अब ठीक उसी प्रकार से आप व्यवस्था करें कि अपनी मृत्यु के बारे में अपरांत ज्ञान अर्थात मृत्यु का ज्ञान हमें कैसे होगा ? तो योगी अपने कृत कर्मों में संयम करता है वर्तमान जीवन के कर्मों में बाल्यावस्था से लेकर अभी तक हमने जो कर्म किया है उसमें से कितने कर्म सोप क्रमम् है और कितने कर्म निरुफ क्रमम् है उन कर्मों में सोप क्रमम् की संख्या कितनी है उसमें समाधि लगाएगा संयम करेगा धारणा ध्यान समाधि और निरूप क्रमम् जो कभी-कभी हुआ है व्यवस्थित नहीं हुआ है तो उसमें भी संयम करेगा उसके आधार पर, अपने कर्माशय के आधार पर योगी अपनी अपरांत मृत्यु के बारे में जान लेता है कि मैं इतने दिन के बाद और इतने समय में चला जाऊंगा शरीर मेरा छूट जाएगा अब आप कहेंगे इसमें कैसे घटाया जाता आप शरीर में अपने ऊहा से कुछ आपकी बात आपके बीच बात रख रहा हूं हमारे जीवन में एक व्यवस्थित क्रम होता है कोई व्यक्ति लगातार स्मोकिंग करता है सिगरेट पीता है चैन-स्मोकर है, कोई व्यक्ति लगातार शराब पीता है आदत हो गई वह उसको तो वो शराब पीनालगातार बिना शराब रह नहीं सकता वो, बिना सिगरेट के रह नहीं सकता बिना व्यविचार किए हुए रह नहीं सकता, रूप रस गंध स्पर्श शब्द काम क्रोध लोभ मोह कोई डेली क्रोध करता है कोई डेली काम में लिप्त होता है तो अब जिस व्यक्ति कर्म कंटीन्यूअस है लगातार है बुरे कर्म जो हमारे शरीर को हानि पहुंचते है वह कर्म बहुत शीघ्र फल देगा क्योंकि मृत्यु जल्दी संनिकट आएगा यह सोप क्रमम् है ।
अब कोई व्यक्ति सिगरेट तो पीता है कभी पी लेता है ऐसे कभी नहीं पीना चाहिए शराब पी लेता है कभी पी लेता है डेली नहीं पीता । तो जो डेली पीता है उसका रिजल्ट जल्दी आयेगा और जो डेली नहीं पीता कभी कभी पीता है उसका रिजल्ट देर से आयेगा। जो नहीं पीता उसका और देर से आयेगा। तो काम क्रोध लोभ मोह आदि जो हमारे जीवन में सोप क्रमम् का रूप ले लिया कंटीन्यूअस ले लिया है यदि उन कर्मों को हम संयम करके ध्यान जाकर के देखे तो अपनी मृत्यु का ज्ञान हो जाएगा कब मेरी मृत्यु इतने दिन के बाद होगी पक्का है ये तो मैं बुरे कर्म का उदाहरण दे रहा हूं। अब योगी में तो बुरा कर्म होते नहीं कुछ अच्छे कर्म है सोप क्रमम् है जो भी वह कंटिन्यू होता है उसके आधार पर भी शरीर का सेल्स कितना डेट हुआ कितना हमारा बच्चा हुआ है कितना हमारे शरीर के आयु एक्सपायरी डेट कब होगा यह सब कर्म अच्छे कर्म में भी सोप क्रमम् निरुप क्रमम् होता है । मैं तो बुरे कर्म का उदाहरण इसलिए दे रहा हूं की बातें समझ में आ जाए आसानी से, बाकी योगी के जीवन में बुरे कर्म नहीं होते । तो बुरे कर्म या अच्छे कर्म कुछ ऐसे हमारे शरीर से रिलेटेड होते हैं कर्माशय में जो सोप क्रमम् लगातार होता है, कोई कभी-कभी होता है अब योगी की बात करते हैं हम मनुष्य साधारण मनुष्य अपने काम क्रोध लोभ मोह पर नियंत्रण नहीं कर पाते कितने बार इस शरीर को हम टॉर्चर करते हैं अग्नि के जैसे बिजली का शॉर्ट सर्किट लगते हैं इसको इसके सेल्स हमारा डेड होता है अपनी आयु कम हो रही है मृत्यु ओर जा रहे हैं । योगी काम उसके जीवन में समाप्त हो गया क्षीण कर दिया लोभ है नहीं क्रोध है नहीं वह ध्यान में बैठा प्राण वायु को रोककर संयम करके 1 मिनट में 2 मिनट में एक से दो बार प्राण लेता है वह भी नहीं लेता लंबे समय तक प्राणायाम कर रखा है।
हम लोग काम क्रोध में प्रतिदिन किया जाता है लिप्त है खान पान बिगड़ रहा हैं, भाग रहे हैं तो हमारी आयु कम होगी और योगी की आयु लंबी होगी ।
तो फिर भी योगी अपने मृत्यु के बारे में जान लेता है।
मैंने थोड़ा विस्तार से बताने का प्रयास किया है । यहां पर एक शब्द आया है वो है "अरिष्टभ्य वा "अरिष्ट क्या है?
ये तो योगी अपनी मुत्यु के बारे में जानेगा जो साधक हैं, धारणा ध्यान समाधि लगाया है । लेकिन साधारण मनुष्य को भी मृत्यु का ज्ञान हो जाता है महर्षि पतंजलि को नमन करिए कि उन्होंने कुछ अच्छी बातें हमारे लिए लिख दिए की साधारण मनुष्य को अपने मृत्यु का ध्यान कैसे होगा अरिष्टभ्योवा = अरिष्ट का चिन्ह । महर्षि दयानंद जी का एक पुस्तक है योगी का आत्म चरित्र अज्ञात जीवनी पहले बोल करके छपी थी एक पुस्तक अभी योगी के आत्म चरित्र नाम से छपा है अंग्रेजी में अब ट्रांसलेट हो गया है योगी माइंड करके तो इस प्रकार से कई नाम से वह पुस्तक छपते रहे और कई लोगों ने उसको विवादित पुस्तक भी कहा ।
उसमे मैंने पढ़ा लगभग 100 प्रकार के अरिष्ट का वर्णन महर्षि दयानंद जी ने किया है की मृत्यु का चिन्ह, की मृत्यु का समझ इससे बन सकता है जिसमें कुछ का उन्होंने ऋषि ने दिया तो उसमें से दो-चार मुझे याद भी है और यहां व्यास जी भी लिख रहे हैं की व्यास जी इस सूत्र का भाष्य करते हुए कहा कि अरिष्ट का पहचान अर्थात अरिष्ट के द्वारा अपरांत मृत्यु का बोध हम कर सकते कान में उंगली डाल लेते और कान में उंगली डालने के बाद यदि सनसनाहट की आवाज आना बंद हो जाए तो समझिए मृत्यु बड़ी सन्निकट है और महर्षि वेदव्यास जी ने भी इसमें लिखा है इसी सूत्र पर की आंख को दबाने से जो 2 - 4 चंद्रमाएं बन जाते हैं रोशनी डिवाइड हो करके दिखती है वह ना दिखाना तो मृत्यु सन्ननिकट है और इससे और भी संबंधित है कि जैसे जाग्रत अवस्था में अपने पितरों को देखना जब बूढ़े अवस्था में जब हम चले जाते कोई रोग ऐसा आ जाता है तो कहते अपने पितरों आदि को देखने की देखो हमारे दादा परदादा यह आ रहे हैं और वह हमें बुला रहे हैं तो लोग पूछते हैं कहां है अपने पितरों को देखना और वह मुझे बुला रहे हैं अरिष्ट का चिन्ह है और स्नान करके सीने का पानी शीघ्र सुख जाए तो वह अरिष्ट का चिन्ह है शीघ्र मृत्यु का चिन्ह है ।
इस प्रकार से कुछ अरिष्टों का जो पहचान है उसे साधक लोगों ने किया है और उसकी चर्चित चर्चा योगी के आत्मचरित्र पुस्तक में भी आया है । यहां व्यास जी ने भी दो तीन बातों की आधिभौतिक आधिदैविक और आध्यात्मिक अरिष्टों के नाम से किया है जिसको हम जान सकते हैं तो इस सूत्र पर चर्चा करते हुए की योगी अपने अपरांत मृत्यु के बारे में जान लेता है सोप क्रमम् और निरुप क्रमम् कर्मों में संयम करने से ।
अब यहां पर एक और सिद्धियों की बात आती है -
"शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्सङ्कर-
स्तत्प्रविभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम् ।"
( योगदर्शन ३/१७ )
अब इसको समझते हैं इस सूत्र में ऋषि ने क्या कहा कहते हैं कि शब्द अर्थ और प्रत्यय इन तीनों में इतरेतरअध्यासा यह तीनों एक सा संकरस्य मिला हुआ रहता है मिश्रित रहता है एक दूसरे से जुड़ा हुआ रहता है। शब्द अर्थ और ज्ञान ।
अब उदाहरण समझिए - गौ शब्द हमने कहा, "गौ" शब्द है और गौ शब्द का अर्थ गौशाला में बंधे हुए गोकुमल युक्त तो जो गाय हैं, चार पैर वाली गौशाला में बंधी हुई है, वह अर्थ हैं ।
गौ शब्द है और जो पिंड गौशाला में बंधी हुई गाय है वो अर्थ है, और गौ शब्द हमारे बुद्धि में जो समझ बना हुआ है उसी को वह कहा जाता है वह प्रत्यय है वह ज्ञान है, तो महर्षि पतंजलि कहना चाहते हैं कि शब्द गौ शब्द और गौ शब्द का अर्थ गाय और उसका ज्ञान या समझ यह तीनों संकरस्य मिश्रित इतरेतरअध्यासा एक दूसरे से मिक्स भाव में रहता है इस कारण से हम किसी भी शब्दों के अर्थ को नहीं जान पाते अलग-अलग नहीं कर पाते अलग-अलग बोध नहीं होता है । जैसे तोता ने बोला कौवे ने बोला और किसी पक्षी पशु ने गाय ने कुछ आवाज लगाई वह भी एक शब्द है उस शब्द का भी एक अर्थ होता है उसका एक समझ ज्ञान भी होता है तो योगी शब्द सुना उसे शब्द को अलग किया उस शब्द के अर्थ को अलग करके संयम किया उसके ज्ञान में अलग-अलग ज्ञान में अलग संयम अर्थ में अलग संयम और शब्दों में अलग संयम धारणा ध्यान समाधि लगाएंगे तो उन शब्दों का अर्थ सर्वभूतरुतज्ञानम् की गौ ( गाय ) क्या कह रही है यह पक्षी क्या कह रहा है यह अननोन कोई भी पशु-पक्षी प्राणी किसी भी भाषा में बोले उसका वह ज्ञान कर सकता है उसको वह समझ सकता है समाधि में जाकर के योगी किसी भी शब्दों का अर्थ पशु पक्षियानम सर्वभूतरुतज्ञानम् सभी भूत प्राणियों के शब्द जो बोले गए उसके अर्थ शब्द प्रत्यय में संयम करने से उसका ज्ञान योगी को हो जाता है । यह बात यहां पर ऋषि कह रहे हैं यह बहुत बड़ी बात है। साधारण लोग हम लोग अनुमान लगा सकते कि कौवा क्या बोल रहा है यह तोता क्या बोल रहा है गाय क्या बोल रही है तो पशु पक्षियों की आवाज को भी योगी जान लेता है उसके अर्थों को समझ लेता है इस प्रकार से बहुत प्रकार के सिद्धियां यहां पर दी गई है तो समय अभाव है आदरणीय डॉक्टर व्यास नंदन शास्त्री जी भी हमारे बीच दिख रहे आपका अभिनंदन है सादर नमस्ते तो हम इनका भी विचार सुनेंगे आदरणीय शास्त्री जी का।
तो यहां पर है सूत्र है
"प्रातिभाद् वा सर्वम् । " (३/३३)
और
"मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्। " (३/३२)
मूर्धा ज्योति दर्शन करने से सिद्ध पुरुषों का दर्शन होता है और कहते हैं सूर्य में संयम करने से भुवनों का ज्ञान होता है भुवन ज्ञानम सूर्य में संयम करने से संसार का ज्ञान कर लेगा अब है प्रातिभाद् वा सर्वम् । अर्थात प्रतिभा जब उत्पन्न होती है अपनी प्रतिभा रूपी सामर्थ्य को योगी उत्पन्न करता है सब कुछ जान लेता है तो इसमें कोई शक नहीं है तो सिद्धियों की बात करें तो बहुत विस्मयता होती है आश्चर्य होता है कि क्या हैं यह सब ? जल पर पानी पर पैदल योगी चल सकता है कांटों पर पैदल चल सकता है कांटे नहीं चुभेंगे जल में स्पर्श नहीं करेगा किचड़ स्पर्श नहीं होगा और यह सारी बातें या सिद्धियां आई है लेकिन हम कुछ लोग ऐसा इन सिद्धियों के विषय को सुनना नहीं पसंद करते कि यह चमत्कार है जी यह चमत्कार तो अपने वैदिक परंपरा में नहीं है लेकिन सिद्धियां हैं और इन सिद्धियों की चर्चा ऋषियों ने की है और यह सिद्धियां साधारण रूप में समान रूप में एक सिद्धि है लेकिन साधना मार्ग में एक बाधक भी है, उपसर्ग है। इसलिए ऋषि ने कहा इसको समझ करके प्रयोग करें।
तो कैवल्य पाद में पहला सूत्र आया कैवल्य पाद को लेकर मैं समापन की ओर चल रहा हूं -
"जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धयः।" (४/१)
पांच प्रकार की बातें यहां पर है - जन्म औषधि मंत्र तप और समाधि से जो उत्पन्न होती है सिद्धियां , सिद्धियां बहुवचन की सिद्धियां जो होती है सफलताएं सिद्धियां जो होती है जीवन में जन्म से भी होती है कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं पिछले के जीवनके पुण्य तपस्या साधना से उनको जन्म से ही सिद्धि होती है । और औषधि से भी सिद्धि होती हैं औषधि खाकर अपनी वाणी को अमोघ कर लेते हैं हमारे आदरणीय आचार्य सनत कुमार जी कहते हैं औषधीयों पर काम कर रहे की 300 वर्ष तक हम जी सकते हैं औषधीयों का सेवन करके उस पर काम भी कर रहे हैं की औषधियां से भी सिद्धियां प्राप्त की जा सकती है वाणी को अमोघ बनाया जा सकता आयु को लंबी किया जा सकता है बहुत प्रकार की चीजों को प्राप्त कर सकते हैं मंत्र जप गायत्री मंत्र या ओम् प्रणव जप से भी सिद्धियों को प्राप्त किया जा सकता है । और तप, तप है द्वंद सहकर के कठोर तपस्या करके आप सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं, सिद्ध पुरुष बन सकते हैं और अंत में है समाधि समाधि जो अष्टांग योग है यम नियम आदि का पालन करते हुए समाधि को प्राप्त करते हैं तो उससे भी सिद्धियां त्रयं एकम् संयमात् तो संयम करने से धारणा ध्यान समाधि लगाने से सिद्धियां आती है तो महर्षि पतंजलि ने इस कैवल्य पाद के प्रथम सूत्र में यह पांच प्रकार से सिद्धियां होती हैं जिस बात की चर्चा कर दी है अब उसमें हमें कौन सा अनुकूल है जन्म से तो हमें है नहीं सिद्धि वह औषधि के बारे में हमें उतना समझ है नहीं फिर मंत्र पाठ यदि विधिवत करें तो उससे , कुछ तपस्या से लाभ मिल जाए तपस्या से मंत्र से समाधि से तीन ऑप्शन हमारे पास है जो - राज राम ..
वर्तमान जीवन में अपना करके हम सिद्धि को प्राप्त कर सकते हैं तो अंतिम सूत्र है -पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं
स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति । (४/३४)
योग दर्शन का अंतिम सूत्र अब सिद्धियां मोक्ष प्राप्ति करायेगी क्या ? नहीं कराएगी । सामान्य दशा में सिद्धि कहलाती है लेकिन योग मार्ग पर समाधि दशा में जाते समय यह उपसर्ग है बाधक है कि यह हमें बाधा उत्पन्न करती हैं ।लोकैषणा वित्तैषणा पुत्रैषणा में ला करके पटक देता है यह सिद्धियां ।
इसलिए महर्षि दयानंद को हम ऐसा समझते हैं कि सैकड़ो प्रकार की सिद्धियां उनको थी अनेक प्रकार की ऐसा हम कह सकते हैं लेकिन वह दिखाते नहीं थे किसी को कहते नहीं थे आवश्यकता पड़ने पर किसी के परोपकारार्थ उसका प्रयोग योगी करते हैं ऋषि दयानंद जी ने भी किया हैं ।
तो सिद्धियां यह बाधक है तो अब सिद्धियों को हम अपने सेवा के लिए अपने आवश्यकता के लिए दूसरी परोपकार के लिए प्रयोग कर सकते हैं । बिना सिद्धियों के भी हम मुक्ति में जा सकते हैं सिद्धि प्राप्त करना कोई जरूरी नहीं है सिद्धियों के लिए अलग से पुरुषार्थ करना पड़ता हैं पर योगी के पास ये अपने आप आ जाती है प्रतिभा से ।
तो अब कहते हैं यहां पर पुरुषार्थ क्या है ?
महर्षि कपिल ने भी कहा कि
अथ त्रिवृति दुखम अत्यंत अनुवर्ती अत्यंत पुरुषार्थ:
तीन प्रकार के दुखों से छूटना अत्यंत पुरुषार्थ है पुरुषार्थ शून्यानाम हम पुरुषार्थ करते हैं बहुत तरह के पुरुषार्थ करते हैं लेकिन हमारा पुरुषार्थ शून्य नहीं होता है एक के बाद एक कोई न कोई समस्या बनी रहती है। तीनों प्रकार के दुखों से छूट जाना पुरुषार्थ की शून्यता आ जाएगी पुरुषार्थ शून्यानाम गुणानाम प्रतिप्रसव: अब हमारा कोई पुरुषार्थ नहीं बचा तीनों दुखों से हट गए अब यह गुण जो है सतोगुण रजोगुण तमोगुण यह प्रतिप्रसव अपने कारण में चला गया हमारे लिए नष्ट हो गया नष्टम प्रति अनष्टम हमारे योगी के लिए जो योगी पुरुषार्थ शून्य हो गया तीन प्रकार के दुखों से छुटकारा पा लिया अब कोई पुरुषार्थ उसके जीवन में नहीं रहा उनके लिए प्रकृति अपने कारण में चली गई प्रसव हो गई लेकिन अन्य आत्मा केलिए जो अभी मुक्ति प्राप्त नहीं किया उनके लिए उपादेय है उनके लिए तो कारण है उनके लिए तो साधन है तो कहा " कैवल्य स्वरूप प्रतिष्ठा " अब स्वरूप में प्रतिष्ठित होना चित्ति शक्ति या चेतन स्वरूप में जाना यह कैवल्य है अपने स्वरूप में जाना या परमात्मा के स्वरूप में अवस्थित होना दोनों बातें सन्निहित है योग दर्शन के तीसरें सूत्र पर जाइए
तदा दष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् । (१/३).
तो तीसरा सूत्र कहा के अपने स्वरूप प्रतिष्ठा अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होना कि मैं आत्मा हूं और अपने स्वरूप में चले गए तो परमात्मा का दर्शन हो जाएगा परमात्मा भी अपना स्वरूप दिखा देता है जो मैं यह हूं तुम अपना स्वरूप में आ जाओ मैं अपना स्वरूप तुम्हें दिखा दूंगा तो अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होना हमारा कर्तव्य है हमारा पुरुषार्थ है हम परमात्मा के स्वरूप में प्रतिष्ठित नहीं हो सकते परमात्मा अपनी कृपा से अपने स्वरूप को दिखाता है अपने स्वरूप को प्रदान करता हैं आनंद को देता है ।
तो ...
स्वरूप प्रतिष्ठा ही कैवल्य है अपने स्वरूप में चले जाए यह डेडलाइन है यह होमवर्क हमने पूरा कर लिया हम मुक्ति को प्राप्त कर लेंगे परमात्मा हमें उस नोबेल प्राइज जो परम आनंद है मुक्ति अपना स्वरूप प्रदान कर देता है । यही चित्ति शक्ति है।
यह योग दर्शन आज हमने गत सात दिनों तक आपके बीच में संक्षेप से कुछ चर्चाएं की कुछ मुख्य मुख्य बातों को कहने का प्रयास किया । धन्यवाद ।
यह योग दर्शन आज हमने गत सात दिनों तक आपके बीच में संक्षेप से कुछ चर्चाएं की कुछ मुख्य मुख्य बातों को कहने का प्रयास किया । धन्यवाद ।
( समापन )
योग दर्शन उपदेश - आचार्य प्रभामित्र जी
लेखन द्वारा ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा, जयपुर।
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