योग दर्शन
योग दर्शन पर पंचम दिन का व्याख्यान/ प्रवचन
( आचार्य प्रभामित्र जी - पंचकूला चंडीगढ़ से )
सोमवार मार्गशीर्ष कृ १०विक्रम संवत २०८१
25 नवंबर 2024 ईस्वी
(आर्यो का महाकुंभ कुंभ - अंतर्जाल सभा )
आज हम सब पंचम दिन में योग दर्शन पर चर्चा करें
इससे पूर्व बहन आचार्य आवृत्ति जी द्वारा
नश्वर शरीर पर भजन
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा ।
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा ।
मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा ।
मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा।
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा ।
मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा ।
रूठ जाएगी जब तुझ से खुशियां रूठ जाएगी जब तुझ से खुशियां । गम के सांचे में ढ़लना पड़ेगा
रूठ जाएगी जब तुझ से खुशियां गम के सांचे में ढ़लना पड़ेगा
वक्त ऐसा भी आएगा माना वक्त ऐसा भी आएगा माना तुझको कांटों पर चलना पड़ेगा वक्त ऐसा भी आएगा माना तुझको कांटों पर चलना पड़ेगा ।
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा मौत
जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा ।
बाप बेटे यह भाई भतीजे , बाप बेटे यह भाई भतीजे
तेरे साथी है जीते जी के
मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा ।
बाप बेटे यह भाई भतीजे, बाप बेटे यह भाई भतीजे तेरे साथी है जीते जी के अपने आंगन से उठाना पड़ेगा अपने आंगन से उठाना पड़ेगा अपनी चौखट से चलना पड़ेगा अपनेआंगन से उठाना पड़ेगा अपनी चौखट से चलना पड़ेगा
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा
मौत जब तुझको आवाज देगी मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा
ऐसी हो जाएगी तेरी हालत ऐसी हो जाएगी तेरी हालत काम आएगी दौलत ना ताकत ऐसी हो जाएगी तेरी हालत काम आएगी दौलत ना ताकत
छोड़कर अपनी ऊंची हवेली छोड़कर अपनी ऊंची हवेली तुझको बाहर निकलना पड़ेगा छोड़कर अपनी ऊंची हवेली तुझको बाहर निकलना पड़ेगा
जिंदगी एक किराए का घर है एक न एक दिन बदलना पड़ेगा
मौत जब तुझको आवाज देगी मौत जब तुझको आवाज देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा घर से बाहर निकलना पड़ेगा ॥
इसी कटुसत्य के साथ धन्यवाद।
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आचार्य प्रभामित्र जी
आइये आरंभ करते हैं। मंत्र पाठ सभी मिलकर करेंगे -
ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवाव है।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
सभी को सादर नमस्ते ।
आइये हम सब मिलकर योग दर्शन के ऊपर अपनी बात को सुने कि महर्षि पतंजलि ने हमारे लिए क्या-क्या कहा ? कल के चर्चा में हमने आपके बीच में बातें रखी थी योग दर्शन को एक शब्दों में समझना हो तो "ईश्वर प्राणिधान " शब्द से समझ सकते हैं। तीन शब्दों में यदि योग दर्शन को समझने का प्रयास किया जाए - तो "तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्राणिधान क्रियायोग:" तो तीन शब्दों के द्वारा हम योगदर्शन को समझ सकते हैं। आत्मसात कर सकते हैं योग को, और सामान्य लोगों के लिए आठ शब्दों में यम,नियम,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ये आठ शब्दों में हम योग दर्शन को समझ सकते हैं । तो द्वितीय पाद जो साधना पाद है किन-किन साधनों का उपाय करने से हमें मुक्ति मिलेगी मोक्ष का द्वारा खुलेगा तो आज साधना पाद का प्रथम सूत्र आया है -
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥
क्रिया योग के अनुष्ठान से हम ईश्वर तक पहुंच सकते हैं । जीवन के दुखों से छूट सकते हैं, जन्म मरण के चक्र से हम छूट सकते हैं।
तप क्या है ? इस बात को आप सब भलीभांति जानते हैं। महर्षि दयानंद के शब्दों में मैं कहना चाहूंगा की श्रेष्ठ कार्यों को करते हुए जो विघ्न बाधा उपस्थित हो उसे सह लेना यह तप कहलाता हैं ।
श्रेष्ठ कार्य क्या हैं ? तो श्रेष्ठ कार्य यज्ञ है, श्रेष्ठ कार्य साधना है, श्रेष्ठ कार्य वेद-विद्या का अध्ययन है, तो इन कार्यों को करते हुए जो कुछ कष्ट आता है उसको सहन करना यह तप है । तो तप शरीर का, वाणी का और मन का-यह तीन प्रकार के तप है, इसका अनुष्ठान करना चाहिए । मौन रहते हैं-वाणी का तप है, मन पर नियंत्रण करते हैं-यह मन का तप है, शरीर में जो भोजन आदि से अपने शरीर को साधते हैं-यह शारीरिक तप है।
तो हम सभी प्रकार के तपस्याओं को करते हुए अपने इस साधन रूपी शरीर मन आदि को अनुकूल बनाएं । और स्वाध्याय ..
स्वाध्याय जैसा कि आप सब जानते हैं की अपना अध्ययन करना, अपने जीवन को पढ़ना, यह स्वाध्याय है। स्व्श्च अध्ययनम् स्वाध्याय।
प्रतिदिन अपने कमियों को ढूंढना और उन कमियों को बार-बार अपने विवेक से समझकर के उसे निकालने का प्रयास करना महर्षि दयानंद जी का प्रिय मंत्र -
ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव ।
यद् भद्रं तन्न आ सुव ॥
इस मंत्र को जब हम समझते हैं तो ऋषि को यह मंत्र प्रिय क्यों था ? तो जब तक हमारे अंदर कमियां रहेगी तब तक हम इस संसार में दुःख भोगते रहेंगे या सांसारिक सुख को हम भोगते रहेंगे दुख मिलता रहेगा क्षणिक सुख मिलता रहेगा, इससे यदि परे होना चाहते हैं तो एक भी बुराई हमारे अंदर ना हो । दुरितानि परासुव विश्वानी दुरितानी
जो भी जितने भी दुरित है दुर्गुण हैं वो सब हमसे दूर हो जाए। अब यहां पर यदि व्याकरण की दृष्टि से देखा जाए तो सर्वानी दुरितानी परासुव ऐसा भी मंत्र में आ सकता था, सर्वानी शब्द नहीं विश्वानी शब्द हैं यहां पर विश्वानी शब्द विश्ववरी व्याप्तो शब्द से बना इसका प्रयोग करेंगे तो विश्वानी शब्द बनेगा जो व्याप्त है तो विश्वानी दुरितानी का मतलब हमें यह समझना चाहिए कि वह दुरित चाहे आत्मिक दोष हो या मानसिक दोष हो या शारीरिक वाचिक दोष हो उन सभी दोषों में विश्वानी जो व्याप्त दोष है जिसको हम स्थूल रुप से नहीं समझ सकते हमें पता भी नहीं चलता कि हमारे अंदर क्या डिमेरिट (दुर्गुण) दोष हैं । तो विश्वानी का मतलब जो व्याप्त है मन में आत्मा में शरीर में वाणी में सूक्ष्म रुप से हैं उन सारे जो दुरित दुर्गुण हैं वो दूर हो जाए।
और यद् भद्रं जो भद्र हैं, अच्छाई है कल्याणकारी है जो भी है यद् भद्रं .. तन्न आ सुव अर्थात् हममें आ जाये। तो अब हम यह समझ सकते हैं कि मनुष्य जब तक पूर्ण रुप से पवित्र न हो जाए मनसा वाचा कर्मणा आत्मा से पवित्र हो जाए तभी वे मोक्ष के अधिकारी होते हैं। तो स्वाध्याय का पहला मतलब मैं आपको समझा रहा हूं - कि यह अपना अध्ययन करना कि मुझ में कौनसी कमियां हैं खाने पीने के दोष है, बोलने का दोष है सोचने का दोष है या व्यवहार दोष है - बहुत सारे दोष हैं । इन दोषों को बारीकी से निकलना।और स्वाध्याय मोक्ष शास्त्रों को पढ़ना । मोक्ष शास्त्र - महर्षि वेदव्यास जी कहते हैं कि -
जपो प्रणवों वा मोक्ष शास्त्र अध्ययनं वा । अर्थात् प्रणव का जप करना भी स्वाध्याय है और मोक्ष शास्त्रों का अध्ययन करना भी स्वाध्याय है। तो मोक्ष शास्त्र जो वेद है, योगदर्शन है, उपनिषद हैं, सत्यार्थ प्रकाश जो ऋषि कृत ग्रंथ हैं आर्ष ग्रन्थों का स्वाध्याय करना चाहिए। और स्वाध्याय एक तो यह विचार करके देखें कि अपने से पढ़ना यह स्वाध्याय है। और गुरुमुख से भी पढ़ना यह भी एक प्रकार का विद्या प्राप्ति का एक मार्ग है ।
महाभाष्यकार ने कहा- "चतुर्भी प्रकारेण विद्या उपयोगिता भवति" चार प्रकार से विद्या आती है- और वह पहले आगम कालेन, स्वाध्याय कालेन, प्रवचन कालेन, व्यवहार कालेन इति। महाभाष्य की उक्ति हैं यह । कि महाभाष्यकार महर्षि पतंजलि और महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन की रचना की महर्षि पतंजलि ने ही महाभाष्य की रचना की और महर्षि पतंजलि ने आयुर्वेद शास्त्र की भी रचना की । अब कहते हैं ऐसे ऋषि को नमन हैं जिन्होंने योगदर्शन की रचना करके चित् के मन के मलो को धो दिया। आयुर्वेद शास्त्र की रचना करके शरीर के मलों को धो दिया और व्याकरण शास्त्र महाभाष्य की रचना करके वाणी के मलों को धो दिया ऐसे ऋषि को नमन हैं। तो महर्षि पतंजलि ने महाभाष्य में क्या कहा " विद्या चतुर्भी प्रकारेण उपयुक्ता भवति "
विद्या चार प्रकार से आती हैं (आगम, स्वाध्याय, प्रवचन और व्यवहार कालेन); पहले आगम काल
(१) आगम काल का अभिप्राय है की गुरु मुख से पढ़ना "आगम इति वेद:" अगम-निगम तो वेद को आप गुरु मुख से पढ़ रहे हैं और यह आगम काल है और फिर है
(२) स्वाध्याय काल - स्वाध्याय काल में विद्या कैसे आती है कि आपने एक शब्द भी सुना होगा "श्रवण मनन निदिध्यासन और साक्षात्कार" यह इसमें घट जाएगा । श्रवण होता है गुरु मुख से सुनना यह हो गया आगम काल और मनन हो गया स्वाध्याय काल कि आप केवल गुरु मुख से विद्या को आपने सुना श्रवण किया और उसको स्वाध्याय नहीं किया मनन नहीं किया तो लाभ नहीं होता । इसलिए एकांत में बैठकर के पढ़े हुए सुने हुए विषयों पर मनन करना चिंतन करना यह स्वाध्याय काल है। अलग हटकर के पढ़ना, अपने आप पढ़ना यह स्वाध्याय है। ध्यान रहे गुरु मुख से पढ़ना स्वाध्याय काल नहीं वह आगम काल हैं, वह श्रवण में आयेगा। और फिर कहा गया प्रवचन काल।
(३) प्रवचन काल - प्रवचन काल क्या है ? महर्षि दयानंद जी ने व्यवहार भानु पुस्तक में इस बात को स्पष्ट से लिखा है इसको पढ़ा जाए ऋषिवर ने कहा कि प्रवचन कालेन - प्रवचन भी करना चाहिए, आप हम सब एक उपदेशक हैं प्रवचन का मतलब यह पढ़ाना जो कुछ अपने गुरुमुख से आगम काल में पढा है एकांत में बैठकर कर आपने चिंतन किया है मनन किया है विचार किया है और उसको आप प्रवचन कर दीजिए, दूसरे को पढ़ा दीजिए । तो पढ़ाना चाहिए आप जो कुछ भी पढ़ते हैं वह दूसरे को पढ़ाइए दूसरे को बताइए प्रवचन करिए तो प्रवचन करने से भी विद्या आती है । इसलिए लिखा ऋषि दयानंद जी ने लिखा प्रवचन करने से पढ़ने से जितनी अधिक विद्या आती है उतनी पढ़ने से नहीं.. पढ़ने से कम विद्या आती, पढ़ाने से विद्या अधिक आती है यह महाभाष्यकार ने कहा और ऋषि दयानंद जी ने इसकी व्याख्या की । तो हमें प्रवचन भी करना चाहिए पढ़ाना भी चाहिए पकड़-पकड़ के पढ़ाइए और यह तो अच्छा अवसर हैं आर्यों का महाकुंभ है यह वर्षों से चल रहा है इसमें सबको अवसर मिलता है क्योंकि यह लंबे काल से चल रहा है हमारे आदरणीय भ्राता आर्य लखन जी ने यह हम सबको बहुत ही सुअवसर प्रदान किया है प्रवचन करने का ... तो हम सबको भी प्रवचन करते रहना चाहिए जो कुछ आप पढ़ते हैं दूसरे को पढ़ाइए उससे विद्या पक्की हो जाएगी तो यह हैं प्रवचन कालेन । फिर है व्यवहार कालेन
(४) व्यवहार कालेन - "व्यवहार कालेन विद्या उपयुक्ता भवति" व्यवहार काल में आप उस विद्या को कितना जीवन में उतारते हैं ।
इस पर हमें ध्यान रखना चाहिए, उस पर हम कितना आचरण या अमल में लाते हैं, व्यवहार में लाते हैं । यह साक्षात्कार होगा ।
श्रवण, मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार इस प्रकार से भी कह सकते हैं या आगम काल, स्वाध्याय काल प्रवचन काल और व्यवहार काल महाभाष्यकार के शब्दों में।
तो व्यवहार में जब आप उस विद्या को लाने लग जाते हैं, उससे भी विद्या आती हैं और वो पक्की होती है, जीवन में उसका लाभ फल हमें मिलने लगता हैं। तो स्वाध्याय के बारे में आपने सुना - मोक्ष शास्त्रों को पढ़ना, ओम् का जप करना, अपना आत्मनिरीक्षण करना ये सारी व्यवस्थाएं हैं जो स्वाध्याय काल में आ जाती हैं।
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि
ईश्वर प्राणिधान - ईश्वर प्राणिधान का अभिप्राय आप सब समझ रहे होंगे कि समर्पण कर देना सरेंडर बोल देना समर्पित कर दिजिए ।
" तुभ्यं वस्तु -तुभ्यं समर्पयामि " मेरा कुछ भी नहीं । अभी भजन आवृत्ति जी बड़ा सुंदर गा रही थी कि "एक दिन निकालना पड़ेगा मौत जब तुमको आवाज देगी .." तो मैं और मेरापन इसको छोड़ दीजिए, समर्पण कर दिजिए कि हे प्रभु! ये शरीर भी मेरा नहीं हैं।और जो कुछ भी साधन आपने दिया है ईश्वर के द्वारा हमें मिला है - धन परिवार व्यवस्थाएं ये सब ईश्वर का हैं ईश्वर अर्पण अपने आप को कुछ भी न समझना शून्य समझना और अपने कर्तव्य में कि हे प्रभु हम आपके आनंद को पाना चाहते हैं , आपके आनंद के लिए ही मेरा जीवन है । और मुझे धन नहीं चाहिए पद नहीं चाहिए आयु नहीं चाहिए संसार का सुख नहीं चाहिए कुछ नहीं चाहिए बस एक ही इच्छा मन में हो कि प्रभु अपनी गोद में ले लो अपने आनंद रुपी अमृत का पान करा दो । ये भाव मन में ला करके सरेंडर बोल दीजिए सम्पूर्ण समर्पण कर दीजिए और ईश्वर के आदेश अनुसार व्यवहार करें वेद के अनुसार आप चले और अपने हर एक पल को जीये तो उसकी आज्ञा में अपने को चलाते हुए यही ईश्वर प्राणिधान हैं । और ईश्वर प्राणिधान जिन्होंने कर दिया अपने प्रकृति लय योगी कहते हैं न कि अपने चित्त को लय कर देता है उसके मन में काम क्रोध लोभ संसारिक कोई चाहना है ही नहीं । ईश्वर प्राणिधान इस प्रकार से हमें जीने का प्रयास करना चाहिए - तप करें स्वाध्याय करें ईश्वर प्राणिधान। अब कहते हैं कि ये जो आप तप स्वाध्याय ईश्वर प्राणिधान करते हैं इसका फल क्या मिलेगा? तो समाधि की भावना बनेगी । वैसे अभी तक यहां पर सच्चे हृदय से अपने आप को पूछिए कि कितने व्यक्ति हैं यहां मैं अपने आप को भी जोड़ता हूं कि समाधि की भावना से जीते हैं? कि मुझे जीवन में समाधि प्राप्त करना हैं ।
तो यह भावनाएं नहीं बनती है। वैसे साधना के समय तो मेरी भावना बन जाती है मैं बनाता हूं मुझे समाधि प्राप्त करनी है मोक्ष में जाना है फिर भूल जाते हैं दिनभर फिर सांसारिक कार्य में ये वो.. याद नहीं रहता कि समाधि में जाना है।
(टिप्पणी -" तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग" का फल क्या हैं ? - "तप स्वाध्याय" से समाधि लगने का भाव और मार्ग सुगमता पूर्वक प्रशस्त होगा ..और "ईश्वर प्राणिधान" से तात्पर्य है स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर देना .. तेरा तुझको को अर्पण भाव से रहना।
तो प्रश्न यह हैं कि यहां मुझ सहित कितने श्रोता /पाठक हैं जो समाधि भाव में रहने का सुख निरंतर लेना चाहते हैं ? सत्य यह हैं कि चाहते हम सब हैं परंतु महत्वपूर्ण यह हैं कि इस ओर जाने का प्रयास हम कितना करते हैं .. मैं स्वयं का अनुभव कहूं तो साधना के समय समाधि में जाने का भाव मेरा बनता हैं पर सामान्य जीवन में लौटने पर यह समाधि भाव क्षीण हो जाता हैं अर्थात लगभग नहीं रहता और मै संसार के व्यवहार में संलग्न हो जाता हूँ ।. ..)
तो तप करेंगे स्वाध्याय करेंगे ईश्वर प्राणिधान करेंगे तो समाधि की भावना बनेगी ।
" समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च " कल आचार्य आनंद पुरुषार्थी जी बड़ी अच्छी बात कह रहे थे कि क्लेश जो है उदार विच्छिन्न तनु और प्रक्षिप्त यह चार बातें आई थी यहां पर तनु आया है "अविद्याक्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् "- यदि आप तप स्वाध्याय ईश्वर प्राणिधान का अनुष्ठान करते हैं यह लाभ होगा एक तो समाधि की भावना बन जाएगी कि मुझे समाधि प्राप्त करना है दूसरा लाभ होगा कि क्लेश जो है यह तनु हो जाएगा छोटा हो जाएगा तनु का मतलब होता है छोटा होना, क्षीण हो जाना, दुर्बल हो जाना, तो क्लेश "अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः" अविद्या राग द्वेष अभिनिवेश यदि यह क्षीण हो जाता है । यह उदार नहीं है उभरा हुआ नहीं है वरन् दबा हुआ है कमजोर पड़ा हुआ है जैसे जब घोड़ा बेलगाम हो जाता है उसको दो-चार दिन भोजन देना बंद कर दे अर्थात् घोड़े को पालन करने वाला या जो घुड़सवारी करता है वह सज्जन वह जब घोड़े को भोजन उसको देना बंद कर दे तो वह बेलगाम घोड़ा कमजोर हो जाता हैं अब उसे आराम से पकड़ सकते हैं तो उसी प्रकार से यह मन जब भी बेलगाम होता है अविद्या जब उठी हुई थी तो यह मन अपने आप में तांडव नृत्य करता है तो तप स्वाध्याय ईश्वर प्राणिधान करने से मन एकदम दुर्बल हो जाता है क्षीण हो जाता है यह अविद्या अस्मिता राग द्वेष आदि क्षीण हो जाते है, सब कमजोर हो जाता है और चाह के भी आप विषय सुखों को लेना चाहेंगे इच्छा नहीं होगी क्यों क्योंकि तप कर रहे हैं स्वाध्याय कर रहे हैं ईश्वर प्राणिधान कर रहे हैं तो यह मन जो कभी उभरा हुआ होता था अब यह क्षीण पड़ गया दुर्बल हो गया । तो यह ऋषि की दी एक बहुत अच्छी (टेक्निक) तरकीब एक विज्ञान यहां पर प्रदान कर रहे हैं बता रहे हैं । अब वह क्लेश क्या है मैं इसकी चर्चा नहीं करूंगा क्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश) आप सब जानते हैं।
यहां अविद्या की थोड़ी चर्चा करेंगे फिर आगे बढ़ेंगे .. तो अविद्या क्या हैं? ऋषि के शब्दों में "अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या। "
अनित्य , अशुचि , दुःख , अनात्मसु , नित्य , शुचि , सुख , आत्म-ख्याति: , अविद्या इसमें यह बात समझनी हैं कि अनित्य को नित्य समझना, अशुचि को शुचि समझना, दुःख को सुख समझना और अनात्मा को आत्मा समझना यह अविद्या हैं। ये चार विभाग वाले अविद्या हैं, अविद्या को चार भागों में बांट कर ऋषि ने बता दिया -
अनित्य को नित्य समझना इसका उदाहरण लें लिजिए एक भजन है कि - " जब तुमको मृत्यु आवाज देगी.. " अर्थात् यह शरीर मरण-धर्मा है और इस संसार का नाम मृत्युलोक हैं तो मृत्युलोक में हम सब आये है एक दिन मरने के लिए, सदा के लिए जीवित रहने के लिए नहीं आये.. परंतु सामान्य लोगों से आप मृत्यु की बात बोलिए.. कहेंगे कि क्या अशुभ बोल रहे हैं ? यह मृत्यु न बोलिए यह मृत्यु अशुभ है.. तो वह सुनना नहीं चाहते .. हैं मृत्युलोक में शरीर मिला है मरने के लिए.. लेकिन मृत्यु को सुनना पसंद नहीं करते क्यों ?
किसी कवि ने बड़ी अच्छी बात कही है -
" दो बातो को भूल मत जो चाहे कल्याण ।
नारायण एक मौत को दूजे श्री भगवान॥ "
ये दो बातों को लोग भूले हुए रहते हैं- एक तो ईश्वर को भूले हुए रहते हैं और दूसरी मृत्यु को भूले हुए रहते हैं। तो अपना कल्याण कैसे होगा? तो कवि ने बड़ी अच्छी बातें कही हैं की यह मृत्युलोक हैं इसमें हम मरने के लिए आये है और प्रतिदिन हम थोड़ा थोड़ा मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं.. एक ही दिन में श्मशान भूमि नहीं पहुंच जाते .. एक कदम हमारा प्रतिदिन बढ़ रहा है आज का दिन आपका निकल गया रात्रि हो गई तो एक दिन आप मृत्यु की ओर बढ़ गये, आपके जीवन से एक दिन कम हो गया और मृत्यु की ओर एक पग बढ गया .. आप - हम इस बात को नहीं समझते ? आज हम मर गये ( आयु का एक दिन बीत गया ) अर्थात् आज का दिन हमारे लिए मर ( बीत ) गया । हमारे शरीर के सेल समाप्त हो रहें हैं .. उदाहरण के लिए एक मिट्टी का घड़ा ले लिजिए .. माना आप आज कुंभकार से एक नया घट जल भरने के लिए खरीद कर लाते है, एक वर्ष, दो वर्ष तीन.. चार पांच वर्ष.. ऐसे कुछ वर्ष बीतने पर जब एक दिन घड़े को भर कर ऊपर से किनारा पकड़ कर उठाते समय ऊपर का भाग आपके हाथ में रह जाता है और नीचे का भाग टूट कर नीचे रह जाता हैं.. ध्यान दें जब घट नया खरीद कर लाये थे तो यह मजबूत था और ऐसे उठाने पर नहीं टूटा .. और जब तक नहीं टूटा जब-तक इसमें पर्याप्त मजबूती बनी रही .. पर एक दिन यह टूट गया इससे समझना चाहिए कि प्रतिदिन उस घट में क्षय हो रहा था, परिवर्तन हो रहा था उसमें विघटन हो रहा था कमजोर पड़ रहा था और एक दिन ऐसा आया कि उसको छूते ही अलग अलग हो गया।
ऐसे वस्त्र, पुस्तक के कागज भी लंबे समयांतराल के बाद क्षीण हो कर कट फट जाते है।
ये सब पदार्थ एक दिन में कमजोर नहीं हुए प्रतिदिन कमजोर होते होते क्षय होते होते एक दिन ऐसी स्थिति इस अवस्था में आये हैं ठीक उसी प्रकार से हमारा यह शरीर है, हम एक दिन में बूढ़े नहीं हो रहे है धीरे-धीरे मन शरीर में इंद्रियों में क्षीणता आ रही हैं यह कमजोर हो रहा है और अंत में एक दिन हमें यह मृत्यु की स्थिति में लाकर खड़ा कर देता है, तो हम प्रतिदिन मृत्यु को प्राप्त कर रहे हैं । लेकिन मृत्यु को सुनना नहीं चाहते, अनित्य पदार्थों को नित्य मान करके जीना यह महा मूर्खता है अब मैं कठोर शब्दों का प्रयोग कभी-कभी करता हूं क्योंकि ऋषि दयानंद का प्रभाव कुछ ज्यादा ही मेरे ऊपर आ जाता है आज मैं व्यवहार भानु पढ़ा रहा था कि किन्हीं सज्जन को तो पढ़ते-पढ़ते वहां पर कई एक बार "महामूर्ख" का शब्द आया तो ऋषि दयानंद जैसे कड़वा सत्य बोलते थे । तो हम लोग को महामूर्ख हैं ।
क्यों है ? क्योंकि इस सत्य को स्वीकार नहीं करते की अनित्य साधनों को हम नित्य मानकर के जी रहे हैं कि मैं कभी मरुंगा ही नहीं यह मेरा घर "यह हवेली.." भजन में आया था, यह हमारे पास हमेशा रहेगा ऐसा मान करके ऐसी भावना से शब्दो में भले कह देते जी यह तो धर्मशाला है हमें तो भगवान का दिया हुआ है, लेकिन अंतरात्मा मन से अपना मानता हैं । सब तेरा है मैं रहूंगा ऐसी तैयारी करते तो अनित्य साधनों से नित्य साधनों की उपलब्धि करना ही बुद्धिमानी हैं ।हम सबको बड़ा चिंतित होना चाहिए बहुत बेचैन होना चाहिए कि मैं आज मेरा दिन चला गया एक दिन मैं मृत्यु की तरफ बढ़ गया आज मैंने क्या किया कितने घंटे साधना की कितने घंटे स्वाध्याय किया या हमने आज कौन से पुण्य इकट्ठा किया 50-50 का बैलेंस बनाना पड़ेगा हमारे एक मित्र हैं आदरणीय वशिष्ट जी वह पढ़ते रहते हैं और वह कहते है आचार्य जी इस पर चर्चा होनी चाहिए कि महर्षि दयानंद जी ने यह कहा सत्यार्थ प्रकाश में 50% शुभ कर्म और 50% अशुभ कर्म और दोनों बराबर होगा तो फिर से मनुष्य जीवन मिलेगा । शुभ कर्म अधिक होगा तो बहुत अच्छी बात है देवता के जीवन मिलेंगे और शुभ कर्म कम हो गया तो पशु-पक्षी के जीवन में जाना पड़ेगा । तो पुण्य कर्म कैसे अधिक से कमाये इस पर विचार किया जाए पुण्य कर्माशय कैसे बनाया जाए, और पुण्य कर्म से वह क्या होगा आज हमने कौन-कौन से पुण्य कर्म किए तो व्यवहार-भानु में महर्षि दयानंद जी ने बड़े स्पष्ट शब्दों में लिखा आज ही प्रसंग में आया था कि जो मनुष्य दूसरे के दुख को अपना दुख समझ करके उसके दुख को दूर करने का प्रयास करता है, और अपना तन मन धन विद्या की वृद्धि में अपने संतानों को और दूसरे मनुष्यों को वेद विद्या की प्राप्ति में लगता है वह मनुष्य बड़े भाग्यशाली है वह अपने पुण्यात्मा है वह अपने पुण्य को बढ़ा रहा हैं ।अब विचार करके देखे ऋषि ने एक मोती की तरह अपने पुस्तकों में चाहे छोटी पुस्तक हो या बड़ी पुस्तक हो शब्दों को पिरो दिया कि पुण्य हमें कितना अधिक से अधिक इकट्ठा करना चाहिए, क्योंकि पुण्य यदि हम इकट्ठा नहीं करते, माना साधन नहीं कर पा रहे हैं चलिए कोई बात नहीं । यह सुक्ष्म विषय है । तो पुण्य तो इकट्ठा करिए ना क्योंकि पुण्य इकट्ठा नहीं होगा तो मनुष्य जीवन छिनते ही आपको दोबारा फिर मनुष्य जीवन नहीं मिलेगा पशु पक्षी की योनि में जाना पड़ेगा । अब आप पूछेंगे इस बात को मैं क्यों कहता हूं क्योंकि बड़े दार्शनिक विद्वानों से भी आप सुनेंगे हमारे गुरुजी हैं आदरणीय मुनि सत्यजीत जी वह भी कहा करते हैं इस बात को की एक बार मनुष्य जीवन यदि हमें प्राप्त हो गया तो करोड़ों की संख्या में लाखों करोड़ों की संख्या में पुण्य कर्मों का समूह घाटे में (माईनस में) चला गया क्योंकि परमात्मा ने फ्री में/ मुफ्त में मनुष्य जीवन नहीं दिया है, मनुष्य जीवन पाने के लिए हमारा पुण्य कर्म व्यय हुआ है, पुण्य कर्म था और वह पुण्य कर्म फल जाति आयु भोग के रूप में आ गया ... बोले यहां योग दर्शन में लिखा हुआ है जाति आयु भोग में, जो हमारा कर्माशय में था वह पुण्य कर्म वो विपाक रूप में आ गया जाति आयु भोग में ।
तो जाति आयु भोग प्राप्त हुआ तो अब वह पुण्य कर्म कर्माशय में बैलेंस था वह समाप्त हो गया क्योंकि फल मिल गया, मुझे मनुष्य जीवन ( जाति ) मिल गया, आयु मिल गई भोग सामग्री मिल गई अब वह तो माईनस में / घाटे में चला गया पहले तो बैलेंस में था बैंक बैलेंस था और मनुष्य जीवन में आकर के हम ना साधना की, ना निष्काम कर्म किया, ना पुण्य प्राप्ति के लिए सकाम-कर्म किया । हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहे, धन को बैंक-बैलेंस में, बैंक में पड़े रहने दिया उससे बड़े-बड़े यज्ञ नहीं किये, विद्या - वेदविद्या के वृद्धि में दान नहीं किया, वेद का प्रचार नहीं किया, गरीबों की सेवा नहीं की, असहाय निर्धन लोगों की रक्षा नहीं की, अपने परिजनों की हित सहायता नहीं की तो फिर हम जैसे महामूर्ख महाअज्ञानी कौन होगा ? क्योंकि उसे यह समझेंगे निष्काम कर्म करके साधना भी नहीं की तो मनुष्य जीवन तो मिलना मुश्किल है - इसलिए हमें मोक्ष में नहीं जाने की इच्छा है नहीं जाने की भावना बनती है उतना समझ नहीं है तो पुण्य कर्म का तो समझ है। हमें अपने जीवन में पुण्य कर्म को बढ़ाकर के अपने जीवन को फिर से सुरक्षित कर ले आप रिजर्व कर ले कि हमें नेक्स्ट जीवन अगला जीवन फिर से मनुष्य का ही मिलेगा क्योंकि हमने बैलेंस को बनाया है । और एक दिन में हजारों पाप कर्म हो गए आप विचार करके देखिए ना आज आप अपने हमने यज्ञ नहीं किया यज्ञ किया भी तो शुद्ध घी सामग्री का प्रयोग नहीं किया पाप हो गया, पुण्य की जगह हमसे पाप हो गया और संध्या नहीं की पाप हो गया अपने समय का प्रयोग उसे नहीं किया पाप हो गया अपनी ड्यूटी नहीं की पाप हो गया कितना पाप हुआ दिन भर में हजारों पाप हम कर जाते हैं हमें पता भी नहीं चलता है और पुण्य तो बहुत प्रयास पूर्वक थोड़ा सा कर पाते हैं, वह भी नहीं करते तो इस प्रकार से हमें विचार करना चाहिए।
तो मैं चर्चा कर रहा था कि हम सब विवेकी बने अनित्य साधनों से नित्य ।। ऋषि दयानंद का वाक्य है अनित्य साधनों से नित्य सत्ता की उपलब्धि करें और नित्य है आत्म स्वरूप, नित्य है परमात्मा का स्वरूप उसको उपलब्ध करना उसको जानना या आप पुण्य कर्म को बढ़ाएं जिससे अगला जीवन मनुष्य का सुरक्षित हो जाए । क्योंकि यह सब कुछ अनित्य है हमारे पास नहीं रहेगी यह व्यवस्थाएं । फिर कहा अनित्य साधनों के बाद अनित्य असुचि - असुचि क्या है ? असुचि हैं कि यह शरीर अपवित्र है ।
"शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः।"
शौैचात संसर्ग प्रेरक संसर्गा.. आगे आएगा साधना पाद के अंत में आएगा सूत्र ४०।
शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः का क्या अर्थ होता है ? इसका क्या अर्थ होता है कि योगी जन साधक अपने शरीर का शोधन करता है और जब शरीर का शोधन करता है तो अपने शरीर से घृणा हो जाती है । अभी मैं अपने एक माह से लगभग संजीवनी क्रिया जिसको एनीमा कहते हैं अंग्रेजी में वो लेता हूं और अन्न लगभग प्रायः नहीं ले रहे हैं फल फ्रूट या कुछ स्प्राउट्स आदि साग ले लेते हैं सब्जी लेते हैं । एनिमा लेते ही इतना मल निकलता था मुझे लगता था की मलका कारखाना है। वाह प्रभु यह कहां मल मूत्र बैठा रखा है ? तो आप विचार करें कि यह मल मूत्र का पिंड इतना गंद है इस शरीर में इतनी बदबू आती है मुख से आ रही है नाक से अपान वायु से पेट साफ नहीं है इतनी गंदगीयां भरी पड़ी हैं ।अब हम सब इस शरीर को देवालय, शिवालय पता नहीं क्या-क्या मान करके बैठे हैं यह शुद्ध है वाह वाह कितना अच्छा है मधुबन है मधु टपक रहा है यह सब मानना तो यह एक प्रकार से मोक्ष मार्ग में अविद्या है ।
जब योगी को साधक को अपने शरीर से घृणा हो जाती हैं, से प्रभु इतनी गंद हैं हमारा शरीर गंद का घर है दूसरे शरीर से स्पर्श कैसे करु ? असंसर्ग वैराग्य होता है अपने शरीर से वैराग्य होता है घृणा हो जाती हैं। आशुचि और इसको शुचि मानकर के और मैं तो कह रहा हूं कि यह दुनिया में धोखा का कोई प्रकाष्ठा नहीं हद कर दी लोगों ने आप जितने भी ब्यूटी पार्लर यह सब लोगों को धोखा देना यह शरीर उसकी सजा करके परफ्यूम लगाकर के इतना अच्छा पैकिंग करके परफ्यूम लगाकर सेंट लगा घूम रहे हैं क्या मायाजाल है लोगों को फंसा रहें है लोग फंस रहे हैं। और अपने शरीर को सजा कर प्रेस करके चश्मा लगा कर के सेंट परफ्यूम लगा कर घूम रहे हैं ..भाई यह गंदगी है लोगों को धोखा दे रहे हो उसको ऐसे .. क्या करें जी ?
तो यही तो है कि गलत चीजों को, अपने कमजोरी को छुपा रहे हैं, सच्चाई को जब आप उसको देखेंगे इसके अंदर जाकर के तो पता चलेगा की सच्चाई कुछ और है इसको चमक धमक करके रंग रोगन करके इसको दुनिया को दिखाया कुछ और जा रहा है ।
वाह .. संसार की क्या माया है, क्या धोखा है इस संसार में तो यह धोखे में जो पडझ रहे हैं हम सब सच्चाई को जाने स्वीकार करें यह शरीर अशुचि है और इसको हम शुचि पवित्र मान करके जी रहे हैं, तो यह है अविद्या दूसरा रूप अनित्य शुचि दुःख - दुःख को सुख मानकर जी रहे हैं, अब मैं लोगों से यह कहता हूं तो कई लोग यह कहते हैं कि संसार में सुख भी है मैं कहता हूं दयानंद जी ने भी तो लिखा है थोड़ा सा सुख है - अच्छा सतोगुण हो जाता है तो थोड़ा सुख है, सांसारिक चर्चा में ऋषिवर ने लिखा है मैं मानता हूं लेकिन विवेकी की दृष्टि से तत्व ज्ञान की दृष्टि से यदि चर्चा सुन रहे हैं, योग दर्शन पढ़ रहे हैं तो यहां पर अभी आया है 15 वां सूत्र है - "परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः"
सब कुछ दुख ही है विवेक की दृष्टि में, तत्वज्ञान की दृष्टि से यह संसार दुःख ही है । "ही" शब्द लगा हुआ हैं और "ही" जहां लग जाए निश्चयात्मक हो जाता है, फिक्स हो जाता है, उसमें कोई अपवाद नहीं रहता । तो यह संसार दुःख है, और इसको सुख समझ कर के जीना यह कितनी बड़ी अज्ञानता है हम जीव्हा का स्वाद, नासिक का सुख या स्पर्श सुख यह सब सुख हमारा माना हुआ है सुख की अनुभूति सुखाभाष है, सुख नहीं है । यह मृगतृष्णा है, संसार दुःख और इसको सुख मान करके जी रहे हैं । तो यह अविद्या का तीसरा रूप हैं । और अविद्या की बात करें, अंतिम बात तो कहा अनात्म सु आत्म सु आत्म ख्याति .. अनात्मा को आत्मा मान कर जी रहे हैं।
अब वह क्या है ? उदाहरण से समझते हैं - मन जड़ हैं, बुद्धि जड़ है लेकिन इसको चेतन मान रहे हैं । कोई कहे मैं तो नहीं मानता मैं तो आर्यसमाजी हूं मैं तो दर्शन पढ़ा हूं .. मैं तो मन को जड़ ही मानता हूं। अच्छा जी तो आपको कहा जाये कि मन जड़ हैं, तो आप ध्यान करिए मन को एक घंटा समाधि लगा लीजिए आत्म भाव में रोक दीजिए । मन को एक विषय में रोक दीजिए। तो कहते है मन नहीं रुकता जी तो मन जड़ कहां हैं? ये तो चेतन हो गया न । मन को आप नहीं रोक पा रहे हैं तो वह चेतन हो गया न इसका मतलब वह अपने आप भाग रहा है ।
मन जड़ होता .. गाड़ी को अपने ब्रेक लगा दी माना आप कार चला रहे हैं और ब्रेक लगा दिया तो क्या गाड़ी आगे चली जाएगी, बंद कर दिया है स्टार्ट नहीं है तो क्या गाड़ी चलेगी..
आप कहेंगे की गाड़ी को कार को इतनी ऊंचाई पर ले गए कि अब वह ढ़लान पर है गाड़ी बंद भी है ब्रेक भी लगा दी फिर भी फिसलता जा रहा है आगे जो जड़ है। तो अभ्यास हो गया मन को भगाने का प्रेक्टिस हो गया ऑलरेडी मन जड़ है तो मन जड़ है उसको चेतन मान करके की मन पर नियंत्रण नहीं कर पाता हूं जी ।
तन्न्मे मन शिव संकल्प अस्तु .. भूत भविष्य में जाने वाला मन शिव संकल्प वाला हो जाए प्रार्थना कर रहे हैं परमात्मा से वेद में
तो अब यह मन जड़ है इसको चेतन मान कर व्यवहार कर रहे हैं, बुद्धि जड़ हैं इसको चेतन मान कर व्यवहार कर रहे हैं शरीर जड़ है इसको चेतन मान कर व्यवहार कर रहे हैं अनात्म ..
और एक उदाहरण दे दूं - एक सेठ जी थे तो सेठ जी की फैक्ट्री में आग लग गई। तो उनको सूचना मिली कि फैक्ट्री में आग लग गई
और वो छाती पीट पीट कर रोने लगे मर गया मर गया मर गया
बगल में कुछ लोग थे बोले सेठ जी तो जिंदा है कहते हैं मर गया ?
तो बोले भाई मेरी फैक्ट्री जल गई मैं जल गया.. फैक्ट्री में आत्मभाव..इतना अटैचमेंट ।
अभी अभी अपने 50 लाख का कार शो रूम से लिया है और थोड़ा सा तो कुछ लग स्क्रेच जाए तो लगता हैं हृदय पर तलवार चल गया हो, बाप रे बाप अरे वह कितना नाश हो गया हो तो आत्म भाव जड़ वस्तु में आत्मभाव आ गया अनात्मा में आत्म भाव आ जाता हैं , खरोंच लगी कार पर स्क्रेच आया कार पर और आत्मा में पीड़ा और सीने में दर्द शुरू हो गया परेशान हो रहे हैं हम आत्मभाव ..
अनात्मा में आत्मा बुद्धि करना जड़ में चेतन भाव ले आना यह अविद्या का चौथा रुप हैं।अटेचमेंट .. एक दिन तो निकलना पड़ेगा घर छोड़ कर इसलिए घर को जो जड़ है, जड़ समझा जाए .. नष्ट हो गया हो गया करोड़ों रुपए गये तो गये ये सब जड़ हैं नाशवान है ऐसे नहीं तो वेसे नाश होता..तो इस भाव से हमें रहना चाहिए।
तो समय भी आगे बढ़ रहा है और अविद्या के स्वरूप की चर्चा मैंने आपके बीच में थोड़ी विस्तार से रखने का प्रयास किया ।
तो दुख संसार है और इसको सुख ना समझा जाए तो अभी तो चार प्रकार के हम लोगों ने समझा लेकिन क्लेश की दृष्टि से राग द्वेष अस्मिता अभिनिवेश यह सब आप जानते हैं ।
अभिनिवेश का मतलब है मृत्यु का भय । तो यह सब जो दुख है अविद्या है क्लेश है । यह संसार ही दुःख सागर है तो अंतिम बात मैं यह आपसे निवेदन करके आज के सत्संग को आज की कक्षा को अब विराम करेंगे । तो यहां पर है चार बातें मैं आपको बोलता हूं -
चार पैर वाले योग दर्शन है चार पंखों वाले चार विभाग वाले एक है
हेय, दूसरा हैं भेय, तीसरा है हान और चौथा है हानोपाय ।
इसलिए रोग, रोग का कारण और उसका उपचार और उसकी औषधि तो अब यहां योगदर्शन में देखिए कि पहले दुख है । हेय का मतलब होता है छोड़ने योग्य । हेय क्या है ? किसको छोड़ जाए ? दुःख को छोड़ा जाये । दुःख हेय हैं उस दुख का कारण क्या है ? पहला है दुःख, हेय का मतलब दुख जिसको हमे छोड़ना है ।
तो दुख होगा हेय त्याज्य । कारण क्या हैं जिसको हम छोड़ना चाहते हैं ? अब हैं हान = सुख । उस सुख का उपाय क्या है ? सुख का कारण क्या है ?ये चार चीजो को व्यक्ति यदि को समझ लिया तो योगदर्शन की यथार्थता को समझ लिया। इसमें चार सूत्र आये इसी द्वितीय पाद में साधना पाद में -
पहला हैं - " हेयं दुखं अनागतम् "और बड़े मजे की बात है क्योंकि दर्शन जो है यह फिलासफी अंग्रेजी में रहते हैं इसमें दार्शनिक बात लिखा हुआ है एक दुःख जो अभी हमको मिल गया उसको ऋषि ने दुःख नहीं माना .. कि अनागतम् - आने वाले को दुःख मानते
अब कहेंगे आने वाले क्या ? अब ज्वर हमें हो गया, कोई कष्ट रोग आ गया तो वह तो भोग ही लिया आपने दुःख तो आ ही गया और भोग लिया आपने । दुःख वो जो अभी आने वाला अभी भी बस एक मिनट के बाद थोड़ी देर के बाद वह दुख जो आएगा फ्यूचर में उसको वह दुख है तो कहते हैं हेयं दुखं अनागतम् कौन से दुख को हेय किया जाएगा , छोड़ा जाएगा तो कहा है जो आने वाला है जो दुख भोग लिया है उसको तो भोग करके ही छूटेगा जो जाति आयु भोग प्राप्त हो गया है तो वह तो मिल गया आपको आप चाहकर भी नहीं भाग सकते आप जो भोग फल कर्मफल कर्म विपाकि जाति के रूप में आयु के रूप में भोग के रूप में मिल गया मनुष्य जीवन के रुप में कैसे भाग जाएंगे आप ? मनुष्य जीवन कैसे छोड़कर भाग जाएंगे मां-बाप को कैसे बदल लेंगे ? अपने जो बुद्धि शरीर व्यवस्था भोग है कर्माशय हैं कैसे बदल लेंगे? इसको तो भोगना ही पड़ेगा ।
योगी भी यदि असंप्रज्ञात समाधि में चला जाए वेदेही भी बन जाए तो भी इसको इग्नोर नहीं कर सकता है इसको छोड़ नहीं सकता इस शरीर को त्याग नहीं कर सकता उसको भोगना पड़ेगा शरीर के रहने तक रहना पड़ता हैं , प्रतीक्षा ( वेट ) करना पड़ता है ।
तो जो दुख हमें मिल गया/ आ गया है उसके लिए तो कुछ चिंता ही नहीं करें क्योंकि आ गया तो भोग लो ।
अब जो भोग के रूप में अभी आया नहीं है अभी कर्माशय में है बीज रुप में हैं वह फल रुप में ना आए उसके तैयारी अनागतम् तो पीछे जो हमारी प्रिवियस लाइफ में जो पहले का हमारा जीवन हुआ उसमें कितना अपराध हुआ पाप इस जीवन में पीछे हमने कितना पाप किया तो उसको बिना भोगे मैं फिर बोल रहा हूं, अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश को समाप्त कर दिया जाये तो उसको नष्ट किया जा सकता है ।
फिर कहते हैं परमात्मा अन्यायकारी हो जायेगा। प्रश्न उठना चाहिए।
हेयं दुखंअनागतं जो दुख आने वाला है जो कर्म से बीज रूप में है उसको बिना भोगे उससे छुटकारा पाया जा सकता है वह योग मार्ग पर चलकर के अविद्या को नाश करके व्यक्ति को उससे छुटकारा मिल जाएगा। परमात्मा न्यायकारी ही रहेगा क्यों रहेगा या आप लोग प्रश्न करेंगे तो इसका उत्तर में समाधान देंगे ।
तो दुःख समझ में आया। अब दुःख के बाद आता है हेय हेतु
दुख का कारण, उसका हेतु क्या है ? तो कहां दृष्टि दृश्यो संयोगो हेय हेतु अब इसको समझिए एक तो कहा दुःख है।और एक आने वाले दुःख को दुःख कहा और उसका कारण क्या है ?
दृष्टिर दृश्यो संयोग:
आत्मा और दृष्टिर कहते हैं आत्मा को अदृश्य कहते हैं प्रकृति को आत्मा और प्रकृति का संयोग, आत्मा और चित्त का संयोग आत्मा और शरीर का संयोग - संयोग होगा हेय हेतु ।
हेय माने दुःख हेतु माने कारण ऋषि ने कह दिया कि दुख का कारण है जन्म । प्रकृति के साथ संयोग । आत्मा का दृश्य के साथ जगत के साथ प्रकृति के साथ संयोग होना दुख का कारण है ।
अब इस बात को समझिए दुख क्या है तो दुख कह दिया जो आने वाला है वह दुख है । जो आ गया उसको भोग लिया इसलिए दुःख नहीं माना जाता । और दुख का कारण प्राकृतिक के साथ आत्मा का संयोग ।
अब हान क्या है ? तो कहते हैं हान - आइये अब अगला सूत्र है 25 नंबर
"तदभावात् संयोगाभावो हानं तद् दृशेः कैवल्यम्। "
तो किसका अभाव दृष्टिर दृश्य के संयोग का अभाव ।
आत्मा दृष्टिर, दृश्य माने जगत संसार । आत्मा और जगत के संयोग का अभाव मतलब संयोग हट जाना ये हान है ।
तद् दृशे कैवल्यम् ये कैवल्य रुप है ।
तद् दृशे कैवल्यम् इस जगत में केवल्य क्या है ?
इस संसार में सुख क्या है ? तो कहा कि हान है ।
हान को सुख कहा , आत्मा और प्रकृति का संयोग का अभाव हो जाए इसका और फिर कहा अंतिम इसका यह जो सुख है संयोग का अभाव हो जाए आत्मा और प्रकृति अलग-अलग हो जाए तो सुख मिलने लग जाएगा। तो कहेंगे इसमें कौनसा सुख है ये कैसा सुख है ?
आपके पेट मे मल भरा पड़ा है, उदाहरण दे देता हूं और ...? दबाव लगा हैं चार घंटे से आप बस में बैठे हुए थे और बस कहीं रुकी नहीं और टायलेट भी नहीं.. तो जैसे ही बस रुकी या आपको टायलेट की व्यवस्था मिली अब वहां आपने टायलेट में मल को विसर्जित किया मूत्र त्याग किया आपको उस समय कैसा अनुभव हुआ?
मल या मूत्र को बहुत देर से रोके हुए थे ऐसी विकट परिस्थितियों में फंस गए थे और जैसे ही व्यवस्था मिली आप गये टायलेट लेट्रिंग गये.. आ हा हा बहुत सुख मिला त्याग दिया अलग हो गए तो सुख मिला । तो आत्मा और शरीर के संयोग का जो वियोग होता है एक विशेष सुख मिलता हैं वो विशेष सुख वहीं सुख है इत्याग अलग हो जाना विमुंजति तो उसका अब इसका अलंग होने का , आत्मा और संसार का अलग होना सुख हैं । अलग होने का हेतु क्या हैं? उपाय क्या हैं? अलग कैसे होंगे तो ऋषि ने कह दिया-
"विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः"
तो ऋषि ने अंतिम बात यह कह दी कि विवेकख्याति मतलब यथार्थ ज्ञान यथार्थ बोध अविप्लव
एक होता हैं विप्लव और विप्लव का मतलब होता है उथल-पुथल कि विप्लव हो गया जी, जल विप्लव हो गया अच्छा, जल प्रलय हो गया। विप्लव का मतलब उथल-पुथल होना और अविप्लव का मतलब उथल-पुथल न होना । विवेकख्याति (कंटीन्यू) लगातार बने रहना तो हम कभी-कभी मूढ़ अवस्था में चलें जाते हैं, विछिन्न अवस्था में चलें जाते हैं कभी उदार अवस्था में आ जाते हैं कभी तनु अवस्था में आ जाते हैं क्लेश कभी हम विवेकी बन जाते हैं कभी अविवेकी बन जाते हैं कभी किंकर्तव्यविमूढ़ बन जाते हैं। क्या करें क्या न करें? तो विवेकख्याति में बाधा (डिस्टरबेंस) न आना । विवेकख्याति विवेक अवस्था में लागातार बने रहना अविप्लव रहना हमेशा विवेक की स्थिति में बने रहना हान जो मोक्ष है जो सुख है उसका उपाय हैं कि विवेक को न डिगने देना, हमेशा विवेक की स्थिति में बने रहना चाहे लाख परिस्थिति आ जाये अपने को न खोना विवेक को बनाएं रखना वह अभ्यास से होता है - ऋतंभरा प्रज्ञा वो स्थिति बनती है। तो सुख का हान का उपाय है विवेकख्याति कि विवेक का लगातार बने रहना और हान है आत्मा और प्रकृति का अलग हो जाना ही ये सुख है हान है कैवल्य हैं मोक्ष हैं परमधाम हैं परम आनंद है।
बहुत बहुत धन्यवाद ।
ओम् शम् 🙏
योग दर्शन उपदेश - आचार्य प्रभामित्र जी
लेखन द्वारा ✍️ पं० चंद्रशेखर शर्मा, जयपुर।
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