( महर्षि पतंजलि योग दर्शन १/२)
मन के स्थिर और शांत होने पर ही
सत्य का प्रकाश प्रकट होता हैं।
तनाव व रोगों से बचने का सशक्त उपाय है मंत्र आचार्य हरिओम शास्त्री मंत्र ब्रह्ममय होने के कारण मंत्रशक्ति का मूल्यांकन आज तक कोई नहीं कर सका है इसमें साधक की इच्छा शक्ति काम करती है... गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि अपने अधीन किये हुए अंतःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई रागद्वेष से रहित इंद्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अंतःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है। अंतःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके संपूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है आजकल प्रायः देखा जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति तनाव से ग्रस्त रहता है, क्यों? और उसके कारण क्या हैं? वस्तुतः वर्तमान में व्यक्ति की भौतिक आवश्यकताएं इतनी बढ़ गई हैं, कि उनकी पूर्ति होना संभव नहीं हो पाने की स्थिति में वह तनावग्रस्त रहने लगता है। दूसरा कारण है प्रदूषित वातावरण जिससे व्यक्ति का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, इसलिए स्वास्थ्य को लेकर, धन को लेकर, नौकरी, पद, प्रतिष्ठा, भूमि, भवन को लेकर तनावग्रस्त रहने लगता है। तीसरा कारण भगवान श्रीकृष्ण गीता के द्वितीय अध्याय के श्लोक ६२-६३ वे में कहते हैं कि किसी भी विषय का निरंतर चिंतन करने से उसमें आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से व्यक्ति की चेष्टाएं उसको पाने की होती है और जब कामना पूर्ति नहीं हो पाती, तब क्रोध की उत्पत्ति होती है, क्रोध से व्यक्ति पहले मूढ़भाव और स्मृति-भ्रम की स्थिति को प्राप्त हो जाता है। स्मृति-भ्रम हो जाने से बुद्धि यानी ज्ञान-शक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश होने से पुरुष गिर जाता है। यथा
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
(गीता २/६२)
क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृति-विभ्रमः ।
स्मृति-भ्रंशाद् बुद्धि-नाशो बुद्धि-नाशात् प्रणश्यति ॥
(गीता २/६३)
जब बुद्धि का नाश हो जाता है तो व्यक्ति मानसिक रूप से विक्षिप्त तथा तनावग्रस्त रहने लगता है। चैथा कारण हम देखते हैं कि व्यक्ति हमेशा भूत के चिंतन तथा भविष्य की चिंता के कारण भी तनावग्रस्त रहता है। रोग व तनाव से बचने के उपाय इस तनाव से दूर रहने के लिए यदि व्यक्ति वर्तमान परिस्थिति में जीते हुए अपने को व्यस्त कर दे तो निश्चित ही शक्ति-संपन्न तथा तनावों से मुक्त रहता है। इस संबंध में गीता में भगवान कहते हैं कि अपने अधीन किये हुए अंतःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई रागद्वेष से रहित इंद्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अंतःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है। अंतःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके संपूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्न चित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभांति स्थिर हो जाती है यथा-
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् । आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥
(गीता २/६४)
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥ ( गीता २/६५)
जब बुद्धि स्थिर हो जाती है तब सारे तनाव दूर हो जाते हैं। व्यक्ति जब भजन-कीर्तन करता है तब दोनों हाथों से तालियां बजाता है जिसके कारण एक्यूप्रेशर स्वतः हो जाता है और व्यक्ति का स्वास्थ्य ठीक रहता है, तनावों से मुक्ति मिल जाती है। हम देखते हैं कि जब व्यक्ति सत्संग में जाता है तब बहुत चिंताओं से ग्रस्त होकर जाता है लेकिन जब वह सत्संग में पहुंचता है तो सारी चिंताएं समाप्त होकर सत्संग में तल्लीन हो जाता है और मानसिक तनावों का अभाव देखने में आता है। ज्योतिष के अनुसार देखें तो मन, वाणी व माता का कारक चंद्रमा है। जब चंद्रमा की स्थिति ठीक न हो, यानी नीच राशिगत, शत्रु राशिगत व पापाक्रांत होकर बैठा हो तो ऐसे व्यक्ति मानसिक तनाव से ग्रस्त तथा मानसिक रोगी होते हैं, तो इसमें चंद्रमा के वैदिक मंत्र, बीज मंत्र या तांत्रिक मंत्र का जप करने से अथवा श्वेत वस्तुओं का दान करने से, मिठास भरी वाणी बोलने से, माता-पिता की सेवा करने से भी तनाव या मनोरोग में लाभ मिलता है। तनाव व रोगों के शमन में मंत्रों का बड़ा योगदान है। तनाव एवं रोगों से मुक्ति पाने तथा जीवन को शक्ति संपन्न बनाने के लिए मंत्र-साधना सर्वश्रेष्ठ है, इतना ही नहीं मानव जीवन की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं मंत्र। मंत्र का अर्थ ही यह होता है कि जिसका मनन करने मात्र से हमारी रक्षा हो जाये, उसको कहते हैं मंत्र। यथा-
‘‘ मननात् त्रायते इति मंत्रः। ’’
ध्वनि तरंगों के बारे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण मंत्रों मंे अलग-अलग ध्वनियां होती हैं, वैज्ञानिकों ने तरंगों पर कई परीक्षण किये हैं। उन्होंने देखा कि चिकित्सा के क्षेत्र में ऊंची फ्रीक्वेंसी वाली ध्वनि का प्रयोग मांसपेशियों व मानसिक तनाव की पीड़ा के उपचार में बहुत उपयोगी है। एक ऐसे उपकरण की सहायता से जिससे प्रति सैकेण्ड लगभग १० लाख चक्रों की रफ्तार से ध्वनि तरंगें निःसृत होती हैं डाॅक्टर मानव शरीर के रुग्ण भाग में ध्वनि धारायें भेजते हैं, ताकि उसमें ताप उत्पन्न हो। यह ताप आरोग्यकारी होता है, किंतु शब्द-ध्वनि का सबसे क्रांतिकारी प्रयोग मानसिक रोगियों की चिकित्सा में किया जाता है। प्रथम उदाहरण ‘‘यूट’’: कालेज ऑफ मेडीसन के डाॅ. पैटर लिडस्ट्राय ने गंभीर रोग वाले १९२ मानसिक रोगियों के मस्तिष्क में अतिस्वन ध्वनि धारायें पहुंचाईं। इनमें से १३२ स्नायु रोगियों में तथा ६० विक्षिप्त में कोई भी काम नहीं कर पाते थे, उन्हें असाध्य रोगी समझा जाता था। बिजली मनोविज्ञान या औषधि की चिकित्सा पद्धतियों से उन्हें लाभ नहीं हुआ था किंतु अतिस्वन (ध्वनि धारा) चिकित्सा से ३१ विक्षिप्त और १०७ स्नायु रोगियों की स्थिति में इतना सुधार हुआ कि वे फिर से रोजगार करने लायक हो गये।
द्वितीय उदाहरण डाॅ. क्रिस्टलव ने ‘‘आल्ट्रा सोनोटेनर’’ नाम के यंत्र का आविष्कार किया है जिसमें दो रासायनिक द्रव्यों को मिलाने में सफलता प्राप्त की है। इससे ध्वनि कंपन इतनी तीव्रता से उत्पन्न होते हैं कि बर्तन में भरे जल का मंथन होने लगता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में किसी भाग के किसी भी प्राकृतिक परमाणु की पथ-गणना संभव हो जाये।
साभार - एस्ट्रो अशोक दुआ
वयं राष्ट्रे जागृयाम

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