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Monday, 29 September 2025

घर में किसी पर किया- कराया, नजरदोष, शरीर दर्द, रात्रि में घबराहट, डाकिनी- शाकिनी दोष निवारणार्थ प्रायोगिक प्रयोग!!

॥ॐ॥

घर में किसी पर किया- कराया, नजरदोष, शरीर दर्द, रात्रि में घबराहट, डाकिनी- शाकिनी दोष निवारणार्थ प्रायोगिक प्रयोग!! 

¶- मंगलवार, या शनिवार को, जोत करे-
जोत में, ॐ शिवाय नमः 21 आहुति, ॐ गोरक्षनाथाय नमः 21 आहुति, ॐ काल भैरवनाथाय नमः 21,,ॐ कालिकाये नमः 21,ॐ हं हं हनुमते नमः 21 आहुति- लगाकर, फिर कालीऊन एवं मोली साथ में दोनों बराबर लेकर पेर के अंगुठे से ललाट तक नापकर उपरोक्त मंत्रों से, कालीमाता की 09 गांठ, भैरव की 10 गाँठ, शिव की 03 गाँठ, गोरक्षनाथ की 06 गांठ, लगाकर जोत में से उस डोरे को 21 बार निकालकर गले में या दाईं भूजा में बांधे 🚩


🌹शिवशक्ति सर्व भक्तों की मनोकामनाएँ परिपूर्ण करें🌹

          ☘️☘️☘️ॐशिवगोरक्षॐ ☘️☘️☘️

_वयं राष्ट्रे जागृयाम_

Sunday, 28 September 2025

मारवाड़ी कहावत

*'सटीक मारवाड़ी कहावत '*
थोथी हथाई,
पाप री कमाई,
उळझोड़ो सूत,
माथे चढ़ायोड़ो पूत.... *फोड़ा घणा घाले।*

झूठी शान,
अधुरो ज्ञान,
घर मे कांश,
मिरच्यां री धांस.... *फोड़ा घणा घाले।*

बिगड़ोडो ऊंट,
भीज्योड़ो ठूंठ,
हिडकियो कुत्तो,
पग मे काठो जुत्तो.... *फोड़ा घणा घाले।*

दारू री लत,
टपकती छत,
उँधाले री रात,
बिना रुत री बरसात.... *फोड़ा घणा घाले।*

कुलखणी लुगाई,
रुळपट जँवाई,
चरित्र माथे दाग,
चिङपणियो सुहाग.... *फोड़ा घणा घाले।*

चेहरे पर दाद,
जीभ रो स्वाद,
दम री बीमारी,
दो नावाँ री सवारी.... *फोड़ा घणा घाले।*

अणजाण्यो संबन्ध,
मुँह री दुर्गन्ध,
पुराणों जुकाम,
पैसा वाळा ने 'नाम'.... *फोड़ा घणा घाले।*

घटिया पाड़ोस,
बात बात में जोश,
कु ठोड़ दुखणियो,
जबान सुं फुरणियो.... *फोड़ा घणा घाले।*

ओछी सोच,
पग री मोच,
कोढ़ मे खाज,
"मूरखां रो राज" .... *फोड़ा घणा घाले।*
मुंह लगैइडी साळी,
सडक पै लटकती डाळी,
घर में राखैडो साळो,
पडोसियां कानै आळौ...
*फोडा घणा घालै*!!*

कम पूंजी रो व्यापार,
घणी देयोड़ी उधार,
बिना विचारों काम,
फसलां रौ थौडों दाम .... *फोड़ा घणा घाले !*

फाट्योडो नोट*
मुर्ख न सपोर्ट*
नियत मे खोट,
बिना सोच्या दियोडो वोट     
                *फोड़ा घणा घालै.*🙏🏻🙏🏻

Tuesday, 23 September 2025

देव के सौम्य और उग्र रुप का भोग तदानुसार

कोपीड आलेख।।
"शाक्त परंपरा की उपासना पद्धति और उसके शास्त्रों की व्याख्या और उसका तात्पर्य विवेचन शाक्त ही करेंगे ना, वैष्णव अपने मत पूजा पद्धति के लिए स्वतंत्र हैं, शाक्त में भी कई लोग बलि का अलग अर्थ लेते हैं, दक्षिणाचार का मार्ग लेते हैं, लेकिन इसका अर्थ वामाचार को बंद करना अथवा उनपर बल प्रयोग नहीं है... यह प्रथाएं यूं ही नहीं हैं, कांतार सिनेमा में इसको दिखाया गया है, हमारे तरफ लगभग हर गांव में आप इसको स्पष्ट अनुभव कर सकते हैं...

आप कह रहे हैं ये भगवती की इच्छा है, तो ये प्रारंभ से ही इच्छा क्यों नहीं थी, श्यामा मंदिर दरभंगा महाराज जैसे महान राजर्षि द्वारा स्थापित है, क्या वो मूर्ख थे या उनसे अधिक शास्त्र का तात्पर्य आप जान गए हैं?
वह मंदिर परिसर राजपरिवार का श्मशान है, चिताभूमि है, चिताओं पर बना है सारा मंदिर... श्मसान में उग्र रूप की ही पूजा होती है...असुरों का संहार करने वाली देवी को रक्त नहीं चढ़ेगा तो क्या मूली गाजर से अभिषेक करेंगे?

इसी कारण से कुछ जड़बुद्धि टाइप के वैष्णवो की कुटाई होती थी भूतकाल में...

यह पोस्ट कहीं दिखी थी - दुनिया के सभी धर्मो में हिंदू धर्म सच्चे अर्थ में लोकतांत्रिक है... काहे कि यहां ईश्वर के स्वरूप और उपासना प्रतीकों में आपको चुनने की आजादी है। शैव, वैष्णव, गणपति या शाक्त मत में से आप अपनी मर्जी के देवी देवता और उपासना पद्धति चुन सकते हैं। हां , आपने जिस स्वरूप को चुना है, पूजन और आचार व्यवहार वैसा ही रखिए उनको प्रसन्न रखने के लिए!

आप शैव हैं और शिव को सौम्य रूप में पूजना चाहते हैं तो गृहस्थ शिवजी को चुन लीजिए और पेड़े का भोग लगाइए, आप उग्र रूप में शिव को पूजना चाहते हैं भैरव बाबा की पूजा कर लीजिए, प्रसाद शराब का चढ़ेगा। आप निराकार शिव को पूजना चाहते हैं तो शिवलिंग में बेल पत्र चढ़ाते हुए सदाशिव का ध्यान रखिए। ऐसे ही वैष्णव संप्रदाय में आप सात्विक प्रभु श्रीराम को पूज सकते हैं राजसिक श्रीकृष्ण को पूज सकते हैं। श्रीकृष्ण को बालक मानकर पूजना है तो बालकृष्ण की लीला में रमिए और मक्खन मिश्री का भोग लगाइए, किशोरवय कृष्ण की प्रेम लीला में राधाकृष्ण का मनन कर सकते हैं या फिर ब्रह्मांड में स्वयं अथवा स्वयं में ब्रह्मांड को जानना है तो गीता पढ़ लीजिए! फिर विष्णुजी के सौम्य गृहस्थ रूप लक्ष्मीनारायण की पूजा कर सकते हैं। यहां तक कि आपको अगर विष्णु भगवान के ही उग्र रूप को पूजना है तो नरसिंह देव हैं। पूजिए जो रूप आपको पसंद हो! गणेश जी के ही 30 से अधिक रूप हैं जिसमे अलग अलग रूपों की अलग अलग पद्धति से पूजा की जाती है, मांत्रिक तांत्रिक हर तरीके से।
शाक्तों में तो सबसे अधिक पूजन की विविधता है, देवी मां के इतने रूप हैं, इतनी तरह की शक्तिरूप की अभिव्यक्ति है कि कोई सोच भी नही सकता। दसों महाविद्या अलग अलग रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं और सबकी पूजा अलग अलग तरह से होती है, आपको सात्विक पूजन करना है , आप करिए।

परंतु यदि कोई व्यक्ति देवी देवता के उग्र रूप की पूजा करना चाहता है या उसकी ये कुल परंपरा है तो उसमें बलि तो होगी ही। जिसको नही पसंद , वो न करे उस रूप की पूजा , पर किसी रूप की पूजा प्रथा पर घृणा करना या उसे अहिंदु करार देने का अधिकार किसको है?
बाहर गली-गली में मटन दुकानें हैं मांसाहारी होटल हैं, लेकिन विरोध केवल मंदिर में बली से है....शेर के रूप में प्राणी घास खायेगा क्या? असुरों का संहार करने वाले रूप में देवी को मिष्ठान नही रक्त चढ़ता है। शमशान तारा की पूजा मंदिर नही शमशान में ही होती है। ये विभिन्न राज्यों के सरकारी धार्मिक न्यास किस आधार पर बलि प्रथा पर रोक लगा सकते हैं जबकि अन्य धर्मों जैसे मुस्लिम धर्म में कुर्बानी पर कोई रोक नहीं है?

हनुमान जी को पान का भोग लगता है, अब कोई अड़ जाए कि पान खाना ठीक नहीं तो पान चढ़ाने पर रोक लगाओ! ऐसा होता है क्या? 

ज्यादा तकलीफ है तो ईश्वर के अन्य रूप की पूजा कर लो! 
वाया Pritam

तांत्रोक्त दुर्गासप्तशती

#तांत्रोक्त_दुर्गासप्तशती!!
              तांत्रिक बीजमंत्रात्मक दुर्गा सप्तशती में प्रत्येक अध्याय में कुछ बिशेष बीज मंत्र दिये गये है। जो अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली है।लेकिन इनका पाठ गुरु के निर्देश पर संरक्षण में दीक्षित होकर शुद्ध स्पष्ट उच्चारण सीखकर ही करना चाहिएअन्यथा हानि की संभावना होती है ।
बीजात्मक तंत्र दुर्गा सप्तशती अर्थात् दुर्गा सप्तशती के सभी 700 श्लोकों का बीजमंत्र रूप। ब्रह्माण्ड में तीन मुख्य तत्व है- सत्, रज् व तम्। उसी प्रकार देवों में भी तीन ही मुख्य हैं- ब्रह्मा, विष्णु और महेश। सप्तशती को भी तीन ही मुख्य भागों में बांटा गया है –प्रथम चरित्र ,मध्यम चरित्र व उत्तम चरित्र । सप्तशती के तीन मुख्य देवता है- महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती। सप्तशती में जप किया जाने वाला मंत्र नवार्णमन्त्र भी 3×3 ही है और इनके तीन ही मुख्य बीज है- ऐं , ह्रीं और क्लीं। 

इनका विस्तार सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् में दिया गया है। यहाँ ऐं- वाग बीज है जो ज्ञान अर्थात् सरस्वती का बोधक है। ह्रीं- माया बीज है जो धन अर्थात् महालक्ष्मी का बोधक है। क्लीं - काम बीज है जो गतिशीलता अर्थात् महाकाली का बोधक है। हमारे धर्म शास्त्रों में बीजात्मक तंत्र दुर्गा सप्तशती को इन्ही तीन मुख्य बीज ऐं, ह्रीं और क्लीं को आधार बनाते हुए और दुर्गा सप्तशती के सभी 700 श्लोकों को  तीन मुख्य भाग में बाँट कर बनाया गया है अर्थात् नवार्णमन्त्र के जो प्रथम बीजाक्षर ऐं है उनको प्रारम्भ में रख ह्रीं बीज का विस्तार करते हुए दुर्गा सप्तशती के प्रत्येक श्लोक का एक मुख्य बीज मंत्र बनाया गया है।जैसे महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती तीन अलग-अलग देवी होते हुए भी एक ही पराशक्ति है । अब अंत में क्लीं जो कामबीज है उसे नम: रूप से कार्य करते बनाया गया है। 

इस प्रकार तीन मुख्य भागों में सम्पूर्ण दुर्गासप्तशती को बीजात्मक तंत्र दुर्गा सप्तशती बनाया गया है और प्रारम्भ में महाशून्य अर्थात् ॐ प्रणव लिखा गया है । यहाँ मै उन महान ज्ञानी आचार्यों जिन्होने अपने ज्ञान व अथक परिश्रम से इस प्रकार कि कृति हमारे बीच रखा - पं॰ शिवदत्त शास्त्रीजी, पं॰ गिरीशचंद्र जी, पं॰ भैरव प्रसाद जी, पं॰ रामचंद्र पुरी जी महाराज व अन्य पूज्यपाद वैदिक आचार्यों को नमन करते हुए बीजात्मक तंत्र दुर्गा सप्तशती वेदों के प्रचार-प्रसार उद्देश्य से रखता हूँ। 

यह बीजात्मक तंत्र दुर्गा सप्तशती उन कर्मकांडी  आचार्यों के लिए बहुत ही प्रभावी है जिन्हे कि  नवरात्रि या अन्य अवसरो में एक से अधिक बार सप्तशती का पाठ करना होता है इनके अलावा भी जिन साधकों को  सप्तशती के बड़े श्लोकों को पढ़ने में दिक्कत होती है और विशेष कर तंत्रिकों के लिए विशेष लाभप्रद है।    
 
 विशेष:-- बीजमंत्रात्म  तांत्रिक सप्तशती पाठवहीं कर सकता है जो पहले कभी मूल दुर्गा सप्तशती का कम से कम 21  संपूर्ण पाठ किया हो अथवा जिसके गुरु ने आदेश दिया हो तब सीधे पाठ कर सकते हैं।

🪷बीजात्मक तंत्रदुर्गासप्तशती पाठ विधि !!   तंत्रदुर्गा सप्तशती  के पाठ में षडंग (कवच, अर्गला, कीलक, प्रधानिक  रहस्य, वैकृतिक रहस्य तथा मूर्ति रहस्य) पाठ  की आवश्यकता नहीं है। सबसे पहले दुर्गाजी का पूजन कर शापोद्धार आदि की क्रिया संपन्न कर लेनी चाहिए। अब तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम् का पाठ कर  आदि एवं अन्त में नर्वाण मंत्र का 108 बार जप करें व अंत में देवीसूक्तम् का पाठ करें।
पाठ से पहले
ॐ ह्रौम् जूम् स: सिद्धगुरूवे नमः।।
ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षिणी स्वाहा।
इन दोनों मंत्रों का जितना संभव हो जाप करें।

।। बीजात्मक तंत्रदुर्गा सप्तशती ।।
1.गुरूकृपा मंत्र:- ॐ ह्रौम् जूम् स: सिद्धगुरूवे नमः।
2.ॐ ग्लौम् गं गणपतये नमः।
3. रक्षाकवचम् मंत्र:- ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षिणी स्वाहा।
4.ॐ हं हंनुमंताय नमः। 5.ॐ भ्रं भैरवाय नमः।
उपरोक्त सभी मंत्रों का यथासंभव जप करें।

फिर गुरु गणेश नवग्रह त्रिदेव त्रिदेवी सहित
कुलदेव, ईष्टदेव, पितृदेव, आदि का स्मरण कर
पाठ करें।

🪷॥ अथ बीजात्मक तंत्र दुर्गा सप्तशती ॥🪷
   🍂शापोद्धार मंत्र- शापोद्धार के लिए नीचे वर्णित मंत्र का  7 बार आदि व अन्त में जप करना चाहिये।

'ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशानुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा'।

🍂उत्कीलन मंत्र-  शापोद्धार के बाद उत्कीलन-मंत्र का 21 बार आदि व अन्त में जप करना चाहिये।

⚜️ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा'।

🌲मृतसंजीवनी मंत्र - उत्कीलन के उपरान्त मृतसंजीवनी मंत्र का 7 बार आदि व अन्त में पाठ करना चाहिये।

🍂'ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनि विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा'

शापोद्धारादि के पश्चात् तंत्र दुर्गासप्तशती के निम्नांकित तंत्रोक्त रात्रिसूक्त का पाठ  करना चाहिये।

~तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम्~
ॐ ऐं ह्रीं नमः॥१॥  ॐ ऐं स्रां(स्त्रां) नमः॥२॥  
ॐ ऐं स्लूं नमः॥३॥   ॐ ऐं क्रैं नमः॥४॥  

ॐ ऐं त्रां नम:॥५॥  ॐ ऐं फ्रां नम:॥६॥  
ॐ ऐं जीं नम:॥७॥  ॐ ऐं लूं नमः॥८॥  

ॐ ऐं स्लूं नमः॥९॥  ॐ ऐं नों नम:॥१०॥  
ॐ ऐं स्त्रीं नमः॥११॥  ॐ ऐं प्रूं नमः॥१२॥  

ॐ ऐं सूं नमः॥१३॥ ॐ ऐं जां नमः॥१४॥  
ॐ ऐं बौं नमः॥१५॥  ॐ ऐं ओं नमः॥१६॥

नवार्णमन्त्र जपविधि:
     तांत्रिक रात्रिसूक्त के पाठ या जप के उपरान्त नवार्ण मंत्र का कम से कम 108 बार जप किया जाना चाहिये । नवार्ण मंत्र के जप के पहले विनियोग, न्यास आदि सम्पन्न करें।

विनियोग:--ॐ अस्य श्रीनवार्णमन्त्रस्य ब्रह्मविष्णु रुद्रा ऋषय:, गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छदांसि, 
श्रीमहाकाली महालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवता:, ऐं बीजम्, ह्रीं शक्ति:, क्लीं कीलकम्, श्रीमहाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती प्रीत्यर्थे जपे विनियोग:।

तत्पश्चात् मंत्रों द्वारा इस भावना से की शरीर के समस्त अंगों में मंत्ररूप से देवताओं का वास हो रहा है , न्यास करें। ऐसा-करने से पाठ या जप करने वाला व्यक्ति मंत्रमय हो जाता है तथा मंत्र में अधिष्ठित देवता उसकी रक्षा करते हैं। इसके अतिरिक्त न्यास द्वारा उसके बाहर-भीतर की शुद्धि होती है और साधना निर्विघ्न पूर्ण होती है । 

ऋष्यादिन्यास:---
ब्रह्मविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नम: शिरसि । गायत्र्युष्णिण-गनुष्टुप्छन्दोभ्यो नम: मुखे । 
महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वतीदेवताभ्यो नम: हृदि। 
ऐं बीजाय नम: गुह्ये । 
ह्रीं शक्तये नम: पादयो: । 
क्लीं कीलकाय नम: नाभौ । 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै सर्वाङ्गे।

करन्यास:---
ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नम: । 
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नम: । 
ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नम: । 
ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नम: ।
ॐ विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नम: । 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतल-करपृष्ठाभ्यां नम: ।

हृदयादिन्यास:---
ॐ ऐं हृदयाय नम: । 
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा । 
ॐ क्लीं शिखायै वषट् । 
ॐ चामुण्डायै कवचाय हुम् । 
ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट् । 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट् ।

अक्षरन्यास:---
ॐ ऐं नम: शिखायाम् । ॐ ह्रीं नम: दक्षिणनेत्रे । 
ॐ क्लीं नम: वामनेत्रे । ॐ चां नम: दक्षिणकर्णे । 
ॐ मुं नम: वामकर्णे । ॐ डां नम: दक्षिणनासायाम् । 
ॐ यैं नम: वामनासायाम् । ॐ विं नम: मुखे । 
ॐ च्चें नम: गुह्ये । 

एवं विन्यस्य ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’  इति नवार्णमन्त्रेण अष्टवारं व्यापकं कुर्यात् ।

दिङ्न्यास:---
ॐ ऐं प्राच्यै नम: । ॐ ऐं आग्नेय्यै नम: । 
ॐ ह्रीं नैऋत्यै नम: । ॐ क्लीं प्रतीच्यै नम: । 
ॐ क्लीं वायव्यै नम: । ॐ चामुण्डायै उदीच्यै नम: । 
ॐ चामुण्डायै ऐशान्यै नम: ।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ऊर्ध्वायै नम: । 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे भूम्यै नम: ।

ध्यानम्
खड्‌गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥१॥

अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।

शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥२॥

घण्टाशूलहलानि शङ्‌खमुसले चक्रं धनुः सायकं हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।

गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा- पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥३॥

~माला प्रार्थना~
फिर "ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः" इस मन्त्र से माला की पूजा करके प्रार्थना करें-

ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणि। चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव॥

ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे। जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये॥

ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि सर्वमन्त्रार्थसाधिनि साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा।

इसके बाद "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" इस मन्त्र का 108 बार जप करें और-

गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्महेश्वरि॥

इस श्लो्क को पढ़कर देवी के वामहस्त में जप निवेदन करें ।

।। बीजात्मक तंत्रदुर्गासप्तशती न्यासः।।
विनियोगः-
प्रथममध्यमोत्तरचरित्राणां ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः, श्रीमहाकाली महालक्ष्मी महासरस्वत्यो देवताः, गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छंन्दांसि, नन्दाशाकम्भरीभीमाः शक्तयः, रक्तदन्तिकादुर्गाभ्रामर्यो बीजानि, अग्नि वायु सूर्यास्तत्त्वानि, ऋग्यजुः सामवेदा ध्यानानि, सकलकामनासिद्धये श्रीमहाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती देवताप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।

इसे पढ़कर जल गिरायें ।

अंगन्यासः- 
ॐ ऐं स्लूं अंगुष्ठाभ्यां नमः। 
ॐ ऐं फ्रें तर्जनीभ्यां नमः। 
ॐ ऐं क्रीं मध्यमाभ्यां नमः। 
ॐ ऐं म्लूं अनामिकाभ्यां नमः। 
ॐ ऐं घ्रें कनिष्ठिकाभ्यां नमः । 
ॐ ऐं श्रूं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

ऋष्यादिन्यासः- 
ॐ ऐं स्लूं हृदयाय नमः। ॐ ऐं फ्रें शिरसे स्वाहा । 
ॐ ऐं क्रीं शिखायै वषट् । ॐ ऐं म्लूं कवचाय हुं। 
ॐ ऐं घ्रें नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ ऐं श्रूं अस्त्राय फट् ।

।।ध्यानमंत्र।।
या चण्डी मधुकैटभादि दैत्यदलनी या महिषोन्मूलिनी,
या धूम्रेक्षणचण्डमुण्ड मथनी या रक्तबीजाशिनी।
शक्तिः शुम्भनिशुम्भदैत्यदलनी या सिद्धि लक्ष्मीः परा,
सा दुर्गा नवकोटि मूर्तिसहिता मां पातु विश्वेश्वरी।।

🌹बीजात्मक तंत्र दुर्गा सप्तशती प्रारम्भ🌹
🍁।।प्रथम चरित्र।।🍁

।।प्रथमोऽध्यायः।।
विनियोगः-ॐ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः,नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम्, ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहाकाली प्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः।

ध्यानम्
ॐ खड्‌गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥

 ‘ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।’ 
‘ॐ बीजाक्षरायै विद्महे तत् प्रधानायै धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात्।’

ॐ ऐं श्रीं नमः॥१॥ ॐ ऐं ह्रीं नम:॥२॥ 
ॐ ऐं क्लीं नम:॥३॥  ॐ ऐं श्रीं नम:॥४॥ 
ॐ ऐं प्रीं नम:॥५।।  ॐ ऐं ह्रां नम:॥६॥ 
ॐ ऐं ह्रीं नम:॥७॥ ॐ ऐं स्रौं नमः॥८।।  
ॐ ऐं प्रें नम:॥९॥ ॐ ऐं  म्रीं नमः॥१०।।  

ॐ ऐं ह्लीं नमः॥११॥ ॐ ऐं म्लीं नमः॥१२॥ ॐ ऐं स्त्रीं नमः॥१३॥  ॐ ऐं क्रां नमः॥१४॥  ॐ ऐं ह्स्लीं नमः॥१५॥

ॐ ऐं  क्रीं नमः॥१६॥  ॐ ऐं चां नमः॥१७॥  ॐ ऐं भें नमः॥१८॥  ॐ ऐं क्रीं नमः॥१९॥  ॐ ऐं वैं नमः॥२०॥  

ॐ ऐं ह्रौं नमः॥२१॥  ॐ ऐं युं नमः॥२२॥  ॐ ऐं जुं नमः॥२३॥  ॐ ऐं हं नमः॥२४॥  ॐ ऐं शं नमः॥25॥ 

ॐ ऐं रौं नमः॥26॥ ॐ ऐं यं नमः॥27॥  ॐ ऐं विं नमः॥२८॥  ॐ ऐं वैं नमः॥२९॥  ॐ ऐं चें नमः॥३०॥  

ॐ ऐं  ह्रीं नमः॥३१॥  ॐ ऐं क्रूं नमः॥३२॥ ॐ ऐं सं नमः॥३३॥  ॐ ऐं कं नमः॥३४॥  ॐ ऐं श्रां नमः॥३५॥ 

ॐ ऐं  त्रों नमः॥३६॥ ॐ ऐं स्त्रां नमः॥३७॥ ॐ ऐं ज्यं नमः॥३८॥  ॐ ऐं रौं नमः॥३९॥  ॐ ऐं द्रों नमः॥४०॥  

ॐ ऐं ह्रां नमः॥४२॥ ॐ ऐं द्रूं नमः॥४३॥  ॐ ऐं शां नमः॥४४॥ ॐ ऐं म्रीं नमः॥४५॥ ॐ ऐं श्रौं नमः॥४६॥  

ॐ ऐं जुं नमः॥४७॥ ॐ ऐं ह्ल्रूं नमः॥४८॥ ॐ ऐं श्रूं नमः॥४९॥ ॐ ऐं प्रीं नमः॥५०॥ ॐ ऐं  रं नमः॥५१॥ 

ॐ ऐं वं नमः॥५२॥ ॐ ऐं व्रीं नमः॥५३॥ ॐ ऐं ब्लूं नमः॥५४॥  ॐ ऐं स्त्रौं नमः॥५५॥  ॐ ऐं  व्लां   नमः॥५६॥ 

ॐ ऐं लूं नमः॥५७॥ ॐ ऐं सां नमः॥५८॥  ॐ ऐं रौं  नमः॥५९॥ ॐ ऐं स्हौं नमः॥६०॥  ॐ ऐं क्रूं नमः॥६१॥  

ॐ ऐं शौं नमः॥६२॥  ॐ ऐं श्रौं नमः॥६३॥  ॐ ऐं वं नमः॥६४॥ ॐ ऐं त्रूं  नमः॥६५॥ ॐ ऐं क्रौं नमः॥६६॥  

ॐ ऐं क्लूं  नमः॥६७॥ ॐ ऐं क्लीं नमः॥६८॥  ॐ ऐं श्रीं नमः॥६९॥  ॐ ऐं ब्लूं नमः॥७०॥ ॐ ऐं ठां नमः॥७१॥ 

ॐ ऐं ठ्रीं  नमः॥७२॥ ॐ ऐं स्त्रां नमः॥७३॥  ॐ ऐं स्लूं नमः॥७४॥  ॐ ऐं  क्रैं नमः॥७५॥  ॐ ऐं च्रां नमः॥७६॥ 

ॐ ऐं फ्रां नमः॥७७॥  ॐ ऐं ज्रीं नमः॥७८॥ ॐ ऐं लूं नमः॥७९॥  ॐ ऐं स्लूं नमः॥८०॥  ॐ ऐं नों नमः॥८१॥  

ॐ ऐं स्त्रीं नमः॥८२॥ ॐ ऐं प्रूं नमः॥८३॥  ॐ ऐं स्रूं नमः॥८४॥  ॐ ऐं ज्रां नमः॥८५॥  ॐ ऐं वौं नमः॥८६॥

ॐ ऐं ओं नमः॥८७॥ ॐ ऐं श्रौं नमः॥८८॥  ॐ ऐं ऋं नमः॥८९॥  ॐ ऐं रूं  नमः॥९०॥ ॐ ऐं क्लीं नमः॥९१॥ 

ॐ ऐं दुं नमः॥९२॥ ॐ ऐं ह्रीं  नमः॥९३॥ ॐ ऐं गूं नमः॥९४॥ ॐ ऐं लां नमः॥९५॥ ॐ ऐं ह्रां नमः॥९६॥ 

ॐ ऐं गं  नमः॥९७॥ ॐ ऐं ऐं नमः॥९८॥ ॐ ऐं श्रौं नमः॥९९॥  ॐ ऐं जूं नमः॥१००॥  ॐ ऐं डें नमः॥१०१॥ 

ॐ ऐं श्रौं नमः॥१०२॥  ॐ ऐं छ्रां नमः॥१०३॥ ॐ ऐं क्लीं नमः॥१०४॥

ॐश्रीं क्लीं ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा॥
          ।।इति: प्रथमोध्यायः॥  

🌹🌹बीजात्मक तंत्र दुर्गा सप्तशती🌹🌹
🍁।।मध्यम चरित्र।।🍁।।द्वितीयोऽध्यायः।।

विनियोगः- ॐ मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्ऋषिः, महालक्ष्मीर्देवता, उष्णिक् छन्दः, शाकम्भरी शक्तिः, 
दुर्गा बीजम्, वायुस्तत्त्वम्, यजुर्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थं मध्यमचरित्रजपे विनियोगः।

ध्यानम्
ॐ अक्षस्रक्‌परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥

ॐ ऐं श्रौं नमः॥१॥  ॐ ऐं श्रीं नमः॥२॥  ॐ ऐं ह्सूं नमः॥३॥  ॐ ऐं हौं नमः॥४॥  ॐ ऐं ह्रीं नमः॥५॥  

ॐ ऐं अं नमः॥६॥  ॐ ऐं क्लीं नमः॥७॥  ॐ ऐं चां नमः॥८॥  ॐ ऐं मुं नमः॥९॥  ॐ ऐं डां नमः॥१०॥  

ॐ ऐं यैं नमः॥११॥  ॐ ऐं विं नमः॥१२॥ ॐ ऐं च्चें नमः॥१३॥  ॐ ऐं ईं नमः॥१४॥ ॐ ऐं सौं नमः॥१५॥  

ॐ ऐं व्रां नमः॥१६॥  ॐ ऐं त्रौं नमः॥१७॥  ॐ ऐं लूं नमः॥१८॥  ॐ ऐं वं नमः॥१९॥  ॐ ऐं ह्रां नमः॥२०॥  

ॐ ऐं क्रीं नमः॥२१॥  ॐ ऐं सौं नमः॥२२॥  ॐ ऐं यं नमः॥२३॥  ॐ ऐं ऐं नमः॥२४॥  ॐ ऐं मूं नमः॥२५॥  

ॐ ऐं सं नमः॥२६॥  ॐ ऐं हं नमः॥२७॥  ॐ ऐं सं नमः॥२८॥  ॐ ऐं सों नमः॥२९॥ ॐ ऐं शं नमः॥३०॥ 

ॐ ऐं हं नमः॥३१॥  ॐ ऐं ह्रौं नमः॥३२॥  ॐ ऐं म्लीं नमः॥३३॥  ॐ ऐं युं नमः॥३४॥ ॐ ऐं त्रूं नमः॥३५॥  

ॐ ऐं स्त्रीं नमः॥३६॥ ॐ ऐं आं नम:॥३७॥  ॐ ऐं प्रें नम:॥३८॥  ॐ ऐं शं नमः॥३९॥  ॐ ऐं ह्रां नम:॥४०॥  

ॐ ऐं स्लूं नमः॥४१॥  ॐ ऐं ऊं नमः॥४२॥  ॐ ऐं गूं नमः॥४३॥  ॐ ऐं व्यं नमः॥४४॥ ॐ ऐं ह्रं नमः॥४५॥ 

ॐ ऐं भैं नमः॥४६॥  ॐ ऐं ह्रां नमः॥४७॥  ॐ ऐं क्रूं नमः॥४८॥  ॐ ऐं मूं नमः॥४९॥  ॐ ऐं ल्रीं नमः॥५०॥  

ॐ ऐं श्रां नमः॥५१॥  ॐ ऐं द्रूं नमः॥५२॥  ॐ ऐं ह्रूं नमः॥५३॥  ॐ ऐं ह्सौं नमः॥५४॥  ॐ ऐं क्रां नमः॥५५॥  

ॐ ऐं स्हौं नमः॥५६॥  ॐ ऐं म्लूं नमः॥५७॥  ॐ ऐं श्रीं नमः॥५८॥  ॐ ऐं गैं नमः॥५९॥  ॐ ऐं क्रीं नमः॥६०॥  

ॐ ऐं त्रीं नमः॥६१॥  ॐ ऐं क्सीं नमः॥६२॥  ॐ ऐं कं नमः॥६३॥  ॐ ऐं फ्रौं नमः॥६४॥  ॐ ऐं ह्रीं नमः॥६५॥  

ॐ ऐं शां नमः॥६६॥  ॐ ऐं क्ष्म्रीं नमः॥६७॥  ॐ ऐं रों नमः॥६८॥  ॐ ऐं ङूं नमः॥६९॥

 ॐ ऐं क्रीं क्रां सौं स: फट् स्वाहा ॥
।। इति द्वितीयोऽध्यायः।।
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🌹॥बीजात्मक तंत्रदुर्गासप्तशती-तृतीयोऽध्यायः॥

ध्यानम्
ॐ उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्।

हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं देवीं बद्धहिमांशुरत्ननमुकुटां वन्देऽरविन्दस्थिताम्॥

ॐ ऐं श्रौं नमः॥१॥  ॐ ऐं क्लीं नमः॥२॥  ॐ ऐं सां नम:॥३॥  ॐ ऐं त्रों नम:॥४॥  ॐ ऐं प्रूं नमः॥५॥ 

ॐ ऐं म्लीं नमः॥६॥  ॐ ऐं क्रौं नम:॥७॥  ॐ ऐं व्रीं नम:॥८॥  ॐ ऐं स्लीं नम:॥९॥  ॐ ऐं ह्रीं नमः॥१०॥  

ॐ ऐं ह्रौं नम:॥११॥ ॐ ऐं श्रां नमः॥१२॥  ॐ ऐं ग्रों नमः॥१३॥  ॐ ऐं क्रूं नम:॥१४॥ ॐ ऐं क्रीं नमः॥१५॥  

ॐ ऐं यां नम:॥१६॥  ॐ ऐं द्लूं नमः॥१७॥ ॐ ऐं द्रूं नम:॥१८॥  ॐ ऐं क्षं नमः॥१९..  ॐ ऐं ओं नमः॥२०॥ 

ॐ ऐं क्रौं नमः॥२१॥  ॐ ऐं क्ष्म्क्ल्रीं नम:॥२२॥ ॐ ऐं वां नम:॥२३॥  ॐ ऐं श्रूं नमः॥२४॥  ॐ ऐं ब्लूं नमः॥२५॥

ॐ ऐं ल्रीं नमः॥२६॥  ॐ ऐं प्रें नम:॥२७॥  ॐ ऐं हूं नम:॥२८॥  ॐ ऐं ह्रौं नमः॥२९॥  ॐ ऐं दें नम:॥३०॥ 

ॐ ऐं नूं नमः॥३१॥  ॐ ऐं आं नमः॥३२॥  ॐ ऐं फ्रां नम:॥३३॥  ॐ ऐं प्रीं नम:॥३४॥  ॐ ऐं दूं नम:॥३५॥  

ॐ ऐं फ्रीं नमः॥३६॥  ॐ ऐं ह्रीं नम:॥३७॥  ॐ ऐं गूं नम:॥३८॥  ॐ ऐं श्रौं नम:॥३९॥  ॐ ऐं सां नम:॥४०॥  

ॐ ऐं श्रीं नम:॥४१॥  ॐ ऐं जुं नम:॥४२॥  ॐ ऐं हं नम:॥४३॥  ॐ ऐं सं नम:॥४४॥  

'ॐ ह्रीं श्रीं कुं फट् स्वाहा'
इति तृतीयोऽध्यायः
***********
🌹॥बीजात्मक तंत्रदुर्गासप्तशती -चतुर्थोऽध्यायः
~ध्यानम्~
ॐ कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां शड्‌खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्।

सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः॥

ॐ ऐं श्रौं नमः॥१॥ ॐ ऐं सौं नमः॥२॥  ॐ ऐं दों नम:॥३॥  ॐ ऐं प्रें नमः॥४॥  ॐ ऐं यां नम:॥५॥  

ॐ ऐं रूं नमः॥६॥  ॐ ऐं भं नम:॥७॥  ॐ ऐं सूं नमः॥८॥  ॐ ऐं श्रां नमः॥९॥  ॐ ऐं औं नमः॥१०॥  

ॐ ऐं लूं नमः॥११॥  ॐ ऐं डूं नमः॥१२॥  ॐ ऐं जूं नमः॥१३॥  ॐ ऐं धूं नम:..१४॥  ॐ ऐं त्रें नमः॥१५॥  

ॐ ऐं ह्रीं नमः॥१६॥  ॐ ऐं श्रीं नमः॥१७॥  ॐ ऐं ईं नमः॥१८॥ ॐ ऐं ह्रां नमः॥१९॥  ॐ ऐं ह्ल्रुं नमः॥२०॥ 

ॐ ऐं क्लूं नम:॥२१॥  ॐ ऐं क्रां नमः॥२२॥ ॐ ऐं ल्लूं नम:..२३॥  ॐ ऐं फ्रें नम:॥२४॥  ॐ ऐं क्रीं नम:॥२५॥  

ॐ ऐं म्लूं नम:॥२६॥  ॐ ऐं घ्रें नम:॥२७॥ ॐ ऐं श्रौं नम:॥२८॥ ॐ ऐं ह्रौं नम:॥२९॥  ॐ ऐं व्रीं नम:॥३०॥  

ॐ ऐं ह्रीं नम:॥३१॥  ॐ ऐं त्रौं नम:॥३२॥  ॐ ऐं हसौं नम:॥३३॥  ऐं गीं नम:॥३४॥  ॐ ऐं यूं नमः ॥३५॥  

ॐ ऐं ह्रीं नमः ॥३६॥  ॐ ऐं ह्लूं नमः॥३७॥  ॐ ऐं श्रौं नम:॥३८॥  ॐ ऐं ओं नम:॥३९॥  ॐ ऐं अं नम:॥४०॥ 

ॐ ऐं म्हौं नम:॥४१॥  ॐ ऐं प्रीं नम:॥४२॥  

ॐ अं ह्रीं श्रीं हंसः फट् स्वाहा'
!!इति चतुर्थोऽध्यायः!!
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🌹बीजात्मक तंत्रदुर्गासप्तशती पंचमअध्याय ॥
॥उत्तरचरित्र॥॥पञ्चमोऽध्यायः॥

विनियोगः-ॐ अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य रूद्र ऋषिः, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप् छन्दः, भीमा शक्तिः, 
भ्रामरी बीजम्, सूर्यस्तत्त्वम्, सामवेदः स्वरूपम्, महासरस्वतीप्रीत्यर्थे उत्तरचरित्रपाठे विनियोगः।

~ध्यानम्~    
ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्‌खमुसले चक्रं धनुः सायकं हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥

ॐ ऐं श्रौं नमः१॥ ॐ ऐं प्रीं नमः२॥ ॐ ऐं आं नम:३। ॐ ऐं ह्रीं नम:४। ॐ ऐं ल्रीं नम:५। 

ॐ ऐं त्रों नम: । ॐ ऐं क्रीं नम:। ॐ ऐं ह्सौं नमः८। ॐ ऐं ह्रीं नमः। ॐ ऐं श्रीं नमः१०। 

ॐ ऐं हूं नमः११। ॐ ऐं क्लीं नमः१२।ॐ ऐं रौं' नमः१३। ॐ ऐं स्त्रीं नमः१४। ॐ ऐं म्लीं नमः१५।

ॐ ऐं प्लूं नमः१६। ॐ ऐं स्हां नमः१७। ॐ ऐं स्त्रीं नमः१८। ॐ ऐं. ग्लूं नमः१९ । ॐ ऐं व्रीं नम:२०। 

ॐ ऐं सौं नम:२१ । ॐ ऐं लूं नमः२२। ॐ ऐं ल्लूं नमः२३। ऐं द्रां नमः२४। ॐ ऐं क्सां नम:२५ । 

ॐ ऐं क्ष्म्रीं नम:२६। ॐ ऐं ग्लौं नमः२७। ॐ ऐं स्कूं नमः२८। ॐ ऐं त्रूं नम:२९ । ॐ ऐं स्क्लूं नमः३०। 

ॐ ऐं क्रौं नम:३१ । ॐ ऐं छ्रीं नम:३२॥ ॐ ऐं म्लूं नम:३३ । ॐ ऐं क्लूं नमः३४। ॐ ऐं शां नम:३५। 

ॐ ऐं ल्हीं नम:३६ । ॐ ऐं स्त्रूं नम:३७। ॐ ऐं ल्लीं नमः३८॥ ॐ ऐं लीं नम:३९। ॐ ऐं सं नम:४०।

ॐ ऐं लूं नमः ४१। ॐ ऐं ह्सूं नमः४२। ॐ ऐं श्रूं नम:४३। ॐ ऐं जूं नम:४४। ॐ ऐं ह्स्ल्रीं नम:४५। 

ॐ ऐं स्कीं नम:४६ । ॐ ऐं क्लां नम:४७। ॐ ऐं श्रूं नम:४८। ॐ ऐं हं नम:४९। ॐ ऐं ह्लीं नम:५०। 

ॐ ऐं क्स्रूं नमः५१। ॐ ऐं द्रौं नम:५२। ॐ ऐं क्लूं नम:५३। ॐ ऐं गां नम:५४। ॐ ऐ सं नम:५५। 

ॐ ऐं ल्स्रां नम:५६। ॐ ऐं फ्रीं नम:५७ । ॐ ऐं स्लां नम:५८। ॐ ऐं ल्लूं नमः५९। ॐ ऐं फ्रें नमः६०। 

ॐ ऐं ओं नमः६१ । ॐ ऐं स्म्लीं नमः६२। ॐ ऐं ह्रां नम:६३। ॐ ऐं ओं नम:६४। ॐ ऐं ह्लूं नम:६५।

ॐ ऐं हूं नम:६६। ॐ ऐं नं नम:६७। ॐ ऐं स्रां नम:६८। ॐ ऐं वं नमः६९। ॐ ऐं मं नम:७०। 

ॐ ऐं म्क्लीं नम:७१ । ॐ ऐं शां नम:७२। ॐ ऐं लं नम:७३। ॐ ऐं भैं नम:७४। ॐ ऐं ल्लूं नम:७५ ।

ॐ ऐं हौं नम:७६।। ॐ ऐं ईं नम:७७। ॐ ऐं चें नम:७८। ॐ ऐं ल्क्रीं नम:७९। ॐ ऐं ह्ल्रीं नम:८०। 

ॐ ऐं क्ष्म्ल्रीं नम:८१। ॐ ऐं यूं नमः८२। ॐ ऐं श्रौं नम:८३। ॐ ऐं ह्रौं नमः८४। ॐ ऐं भ्रूं नमः८५। 

ॐ ऐं क्स्त्रीं नमः८६ । ॐ ऐं आं नमः८७। ॐ ऐं क्रूं नम:८८। ॐ ऐं त्रूं नमः८९। ॐ ऐं डूं नम:९०। 

ॐ ऐं जां नम:९१ । ॐ ऐं ह्ल्रूं नम:९२। ॐ ऐं फ्रौं नमः९३। ॐ ऐं क्रौं नम:९४। ॐ ऐं किं नम:९५। 

ॐ ऐं ग्लूं नमः९६ ।ॐ ऐं छ्रक्लीं नम:९७। ॐ ऐं रं नमः९८॥ ॐ ऐं क्सैं नमः९९। ॐ ऐं स्हुं नमः१००। 

ॐ ऐं श्रौं नमः१०१। ॐ ऐं ह्श्रीं नमः१०२। ॐ ऐं ओं नमः१०३। ॐ ऐं लूं नमः१०४। ॐ ऐं ल्हूं नमः१०५। 

ॐ ऐं ल्लूं नमः१०६। ॐ ऐं स्क्रीं नम:१०७। ॐ ऐं स्स्रौं नमः१०८। ॐ ऐं स्श्रूं नमः१०९। ॐ ऐं क्ष्म्क्लीं नम:११०।

ॐ ऐं व्रीं नम:१११। ॐ ऐं सीं नमः११२। ॐ ऐं भ्रूं नमः११३। ॐ ऐं लां नमः११४। ॐ ऐं श्रौं नमः११५।

ॐ ऐं स्हैं नमः११६ । ॐ ऐं ह्रीं नमः११७। ॐ ऐं श्रीं नमः११८। ॐ ऐं फ्रें नमः११९। ॐ ऐं रूं नमः१२०॥ 

ॐ ऐं च्छूं नमः१२१। ॐ ऐं ल्हूं नमः१२२। ॐ ऐं कं नमः१२३। ॐ ऐं द्रें नमः१२४। ॐ ऐं श्रीं नमः१२५। 

ॐ ऐं सां नमः१२६ । ॐ ऐं ह्रीं नमः१२७। ॐ ऐं ऐं नमः१२८। ॐ ऐं स्क्लीं नमः१२९॥

‘ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे स्वाहा॥   
!!इति पंचमोऽध्यायः!!

🌹बीजात्मक तंत्रदुर्गासप्तशती - षष्ठोऽध्यायः🌹
~ध्यानम्~
ॐ नागाधीश्वसरविष्टरां फणिफणोत्तंसोरुरत्नावली- भास्वद्देहलतां दिवाकरनिभां नेत्रत्रयोद्भासिताम्।
मालाकुम्भकपालनीरजकरां चन्द्रार्धचूडां परां सर्वज्ञेश्वारभैरवाङ्‌कनिलयां पद्मावतीं चिन्तये॥

ॐ ऐं श्रौं नमः। ॐ ऐं ओं नमः। ॐ ऐं त्रूं नम:। ॐ ऐं ह्रौं नम:४। ॐ ऐं क्रौं नम:५। 

ॐ ऐं श्रौं नमः । ॐ ऐं त्रीं नम:। ॐ ऐं क्लीं नम:८ । ॐ ऐं प्रीं नम:। ॐ ऐं ह्रीं नम:१०। 

ॐ ऐं ह्रौं नम:११। ॐ ऐं श्रौं नमः१२। ॐ ऐं ऐं नम:१३। ॐ ऐं ओं नमः१४। ॐ ऐं श्रीं नमः१५। 

ॐ ऐं क्रां नमः१६ । ॐ ऐं हूं नम:१७। ॐ ऐं छ्रां नमः१८। ॐ ऐं क्ष्म्क्ल्रीं नमः१९। ॐ ऐं ल्लूं नमः२० । 

ॐ ऐं सौं नमः२१। ॐ ऐं ह्लौं नमः२२। ॐ ऐं क्रूं नमः२३। ॐ ऐं सौं नम:२४।

'ॐ श्रीं यं ह्रीं क्लीं ह्रीं फट् स्वाहा इति षष्ठोऽध्यायः
******

🌹॥बीजात्मक तंत्रदुर्गासप्तशती सप्तमोऽध्यायः॥
~ध्यानम्~
ॐ ध्यायेयं रत्नपीठे शुककलपठितं शृण्वतीं श्यामलाङ्‌गीं
न्यस्तैकाङ्‌घ्रिं सरोजे शशिशकलधरां वल्लकीं वादयन्तीम्।
कह्लाराबद्धमालां नियमितविलसच्चोलिकां रक्तवस्त्रां
मातङ्‌गीं शङ्खमपात्रां मधुरमधुमदां चित्रकोद्भासिभालाम्॥

ॐ ऐं श्रौं नमः। ॐ ऐं कूं नमः। ॐ ऐं ह्लीं नम:३। ॐ ऐं ह्रं नम:४। ॐ ऐं मूं नम:। ॐ ऐं त्रौं नमः६ ।

ॐ ऐं ह्रौं नम:। ॐ ऐं ओं नमः । ॐ ऐं ह्सूं नमः। ॐ ऐं क्लूं नमः१०। ॐ ऐं कें नमः११। ॐ ऐं नें नमः१२। 

ॐ ऐं लूं नमः१३। ॐ ऐं ह्स्लीं नमः१४। ॐ ऐं प्लूं नमः१५। ॐ ऐं शां नमः१६। ॐ ऐं स्लूं नमः१७।

ॐ ऐं प्लीं नमः१८। ॐ ऐं प्रैं नमः१९। ॐ ऐं अं नम:२० । ॐ ऐं औं नम:२१ । ॐ ऐं म्ल्रीं नम:२२। 

ॐ ऐं श्रां नम:२३। ॐ ऐं सौं नम:२४। ॐ ऐं श्रौं नम:२५। ॐ ऐं प्रीं नम:२६ । ॐ ऐं ह्स्व्रीं नम:२७।

 'ॐरं रं रं कं कं कं जं जं जं चामुण्डायै फट् स्वाहा'
।।इति सप्तमोऽध्यायः।
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🌹॥ बीजात्मक तंत्रदुर्गासप्तशती-अष्टमोऽध्यायः॥
~ध्यानम्~
ॐ अरुणां करुणातरङ्‌गिताक्षीं धृतपाशाङ्‌कुशबाणचापहस्ताम्।
अणिमादिभिरावृतां मयूखै-रहमित्येव विभावये भवानीम्॥

ॐ ऐं श्रौं नमः१ । ॐ ऐं म्ह्ल्रीं नम:२। ॐ ऐं प्रूं नम:३। ॐ ऐं ऐं नम:४। ॐ ऐं क्रों नम:५। 

ॐ ऐं ईं नमः६। ॐ ऐं ऐं नम:७। ॐ ऐं ल्रीं नमः८। ॐ ऐं फ्रौं नमः९। ॐ ऐं म्लूं नमः१०॥ 

ॐ ऐं नों नमः११। ॐ ऐं हूं नमः१२। ॐ ऐं फ्रीं नमः१३। ॐ ऐं ग्लौं नमः१४। ॐ ऐं स्मौं नमः१५। 

ॐ ऐं सौं नमः१६ । ॐ ऐं श्रीं नमः१७। ॐ ऐं स्हौं नमः१८। ॐ ऐं ख्सें नमः१९। ॐ ऐं क्ष्म्लीं नम:२० । 

ॐ ऐं ह्रां नम:२१। ॐ ऐं वीं नम:२२ । ॐ ऐं लूं नम:२३। ॐ ऐं ल्सीं नमः२४। ॐ ऐं ब्लों नमः२५।

ॐ ऐं त्स्रों नमः२६ । ॐ ऐं ब्रूं नम:२७। ॐ ऐं श्ल्कीं नमः२८॥ ॐ ऐं श्रूं नम:२९। ॐ ऐं ह्रीं नमः३०। 

ॐ ऐं शीं नम:३१। ॐ ऐं क्लीं नम:३२। ॐ ऐं क्लौं नमः३३। ॐ ऐं प्रूं नम:३४। ॐ ऐं ह्रूं नम:३५। 

ॐ ऐं क्लूं नम:३६ । ॐ ऐं तौं नम:३७। ॐ ऐं म्लूं नमः३८। ॐ ऐं हं नम:३९। ॐ ऐं स्लूं नमः४०॥ 

ॐ ऐं औं नम:४१। ॐ ऐं ल्हीं नम:४२॥ ॐ ऐं.श्ल्रीं नम:४३॥ ॐ ऐं यां नम:४४। ॐ ऐं थ्लीं नम:४५। 

ॐ ऐं ल्हीं नम:४६ । ॐ ऐं ग्लौं नम:४७। ॐ ऐं ह्रौं नम:४८। ॐ ऐं प्रां नम:४९। ॐ ऐं क्रीं नम:५०। 

ॐ ऐं क्लीं नम:५१। ॐ ऐं नस्लूं नम:५२। ॐ ऐं हीं नम:५३। ॐ ऐं ह्लौं नमः५४। ॐ ऐं ह्रैं नम:५५।

ॐ ऐं भ्रं नम:५६। ॐ ऐं सौं नम:५७। ॐ ऐं श्रीं नम:५८ । ॐ ऐं सूं नमः५९। ॐ ऐं द्रौं नम:६०। 

ॐ ऐं स्स्रां नमः६१।  ॐ ऐं ह्स्लीं नम:६२। ॐ ऐं स्ल्ल्रीं नमः६३।

'ॐ शां सं श्रीं श्रं अं अः क्लीं ह्लीं फट् स्वाहा'।
।इत्यष्टमोऽध्यायः।।

🌹॥ बीजात्मक तंत्रदुर्गासप्तशती- नवमोऽध्यायः॥
!!ध्यानम्!!
ॐ बन्धूककाञ्चननिभं रुचिराक्षमालां पाशाङ्कुशौ च वरदां निजबाहुदण्डैः।

बिभ्राणमिन्दुशकलाभरणं त्रिनेत्र- मर्धाम्बिकेशमनिशं वपुराश्रयामि॥

ॐ ऐं रौं नमः। ॐ ऐं क्लीं नमः । ॐ ऐं म्लौं नम:। ॐ ऐं श्रौं नम:४। ॐ ऐं ग्लीं नम:५। ॐ ऐं ह्रौं नम:६ ।

ॐ ऐं ह्सौं नम:। ॐ ऐं ईं नम:८ । ॐ ऐं ब्रूं नम:। ॐ ऐं श्रां नमः१०। ॐ ऐं लूं नम:११। ॐ ऐं आं नमः१२। 

ॐ ऐं श्रीं नमः१३। ॐ ऐं क्रौं नमः१४। ॐ ऐं प्रूं नमः१५। ॐ ऐं क्लीं नम:१६ । ॐ ऐं भ्रं नमः१७।

ॐ ऐं ह्रौं नम:१८। ॐ ऐं क्रीं नम:१९। ॐ ऐं म्लीं नम:२०॥ ॐ ऐं ग्लौं नमः२१। ॐ ऐं ह्सूं नम:२२ ।

ॐ ऐं ल्पीं नम:२३। ॐ ऐं ह्रौं नम:२४। ॐ ऐं ह्स्रां नम:२५। ॐ ऐं स्हौं नमः२६। ॐ ऐं ल्लूं नम:२७।

ॐ ऐं क्स्लीं नम:२८। ॐ ऐं श्रीं नम:२९। ॐ ऐं स्तूं नमः३०। ॐ ऐं च्रें नम:३१। ॐ ऐं वीं नम:३२।

ॐ ऐं क्ष्लूं नमः३३। ॐ ऐं श्लूं नम:३४। ॐ ऐं क्रूं नम:३५। ॐ ऐं क्रां नमः३६ । ॐ ऐं ह्रौं नमः३७।

ॐ ऐं क्रां नम:३८। ॐ ऐं स्क्ष्लीं नम:३९। ॐ ऐं सूं नमः४०। ॐ ऐं फ्रूं नम:४१।।

'ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं फट् स्वाहा'.
!!इति नवमोऽध्यायः
**************
🌹॥ बीजात्मक तंत्रदुर्गासप्तशती - दशमोऽध्यायः॥

~ध्यानम्~
ॐ उत्तप्तहेमरुचिरां रविचन्द्रवह्नि-नेत्रां धनुश्शरयुताङ्‌कुशपाशशूलम्।
रम्यैर्भुजैश्चर दधतीं शिवशक्तिरूपां कामेश्वभरीं हृदि भजामि धृतेन्दुलेखाम्॥

ॐ ऐं श्रौं नमः। ॐ ऐं ह्रीं नम:। ॐ ऐं ब्लूं नमः३। ॐ ऐं ह्रीं नम:४। ॐ ऐं म्लूं नमः। ॐ ऐं श्रौं नम:६ । 

ॐ ऐं ह्रीं नम:। ॐ ऐं ग्लीं नम:८। ऐं श्रौं नमः। ॐ ऐं ध्रूं नमः१०। ॐ ऐं हुं नमः११। ॐ ऐं द्रौं नमः१२। 

ॐ ऐं श्रीं नमः१३।  ॐ ऐं श्रूं नमः१४। ऐ ब्रूं नमः१५। ॐ ए फ्रें नमः१६। ऐं ह्रां नमः१७। ॐ ऐं जुं नमः१८। 

ॐ ऐं स्रौं नमः१९। ॐ ऐं स्लूं नमः२० । ॐ ऐं प्रें नम:२१ । ॐ ऐं ह्स्वां नम:२२॥ ॐ ऐं प्रीं नम:२३। 

ॐ ऐं फ्रां नमः२४। ॐ ऐं क्रीं नमः२५॥ ॐ ऐं श्रीं नम:२६ । ॐ ऐं क्रां नमः२७। ॐ ऐं सः नम:२८। 

ॐ ऐं क्लीं नम:२९। ॐ ऐं व्रें नमः३०। ॐ ऐं ईं नमः३१। ॐ ऐं ज्स्ह्ल्रां नमः३२॥ ॐ ऐं ञ्स्ह्लीं नमः३३।  

ॐ ऐं ह्रीं नमः क्लीं ह्रीं फट् स्वाहा'!!
!! इति दशमोऽध्यायः!!
************
🌹बीजात्मक तंत्रदुर्गासप्तशती एकादशोऽध्यायः॥
~ध्यानम्~
ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुङ्‌गकुचां नयनत्रययुक्ताम्।
स्मेरमुखीं वरदाङ्‌कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम्॥

ॐ ऐं श्रौं नम:। ॐ ऐं क्रूं नमः। ॐ ऐं श्रीं नम:३। ॐ ऐं ल्लीं नम:४। ॐ ऐं प्रें नम:५। ॐ ऐं सौं नमः६ ।

ॐ ऐं स्हौं नम:। ॐ ऐं श्रूं नमः८। ॐ ऐं क्लीं नम:। ॐ ऐं स्क्लीं नमः१०। ॐ ऐं प्रीं नम:११। ॐ ऐं ग्लौं नमः१२।

ॐ ऐ ह्ह्रीं नमः१३। ॐ ऐं स्तौं नमः१४। ॐ ऐं क्लीं नम:१५। ॐ ऐं म्लीं नमः१६ । ॐ ऐं स्तूं नमः१७।

ॐ ऐं ज्स्ह्रीं नमः१८। ॐ ऐं फ्रूं नमः१९। ॐ ऐं क्रूं नम:२०। ॐ ऐं ह्रीं नमः२१ । ॐ ऐं ल्लूं नम:२२ ।

ॐ ऐं क्ष्म्रीं नम:२३। ॐ ऐं श्रूं नम:२४। ॐ ऐं इं नमः२५। ॐ ऐं जुं नमः२६ । ॐ ऐं त्रैं नम:२७।

ॐ ऐं द्रूं नमः२८। ॐ ऐं ह्रौं नम:२९। ॐ ऐं क्लीं नम:३०॥ ॐ ऐं सूं नम:३१ । ॐ ऐं हौं नमः३२।

ॐ ऐं श्व्रं नमः३३। ॐ ऐं व्रूं नम:३४। ॐ ऐं फां नम:३५। ॐ ऐं ह्रीं नम:३६ । ॐ ऐं लं नम:३७। 

ॐ ऐं ह्सां नमः३८। ॐ ऐं सें नम:३९। ॐ ऐं ह्रीं नम:४०। ॐ ऐं ह्रौं नम:४१। ॐ ऐं विं नम:४२।

ॐ ऐं प्लीं नम:४३। ॐ ऐं क्ष्म्क्लीं नम:४४। ॐ ऐं त्स्रां नम:४५। ॐ ऐं प्रं नम:४६ । ॐ ऐं म्लीं नम:४७।

ॐ ऐं स्रूं नम:४८। ॐ ऐं क्ष्मां नम:४९। ॐ ऐं स्तूं नम:५०। ॐ ऐं स्ह्रीं नम:५१। ॐ ऐं थ्प्रीं नम:५२।

ॐ ऐं क्रौं नम:५३। ॐ ऐं श्रां नम:५४। ॐ ऐं म्लीं नम:५५।

'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं सौं नमः फट् स्वाहा'
!!इति एकादशोऽध्यायः!!

🌹॥ बीजात्मक तंत्रदुर्गासप्तशती द्वादशोऽध्यायः॥

~ध्यानम्~
ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्।
हस्तैश्च क्रगदासिखेटविशिखांश्चातपं गुणं तर्जनीं बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे॥

ॐ ऐं ह्रीं नमः। ॐ ऐ ओं नम:२। ॐ ऐं श्रीं नम:। ॐ ऐं ईं नम:४। ॐ ऐं क्लीं नम:। ॐ ऐं क्रूं नमः६। 

ॐ ऐं श्रूं नम:। ॐ ऐं प्रां नमः८। ॐ ऐं क्रूं नमः। ॐ ऐं दिं नमः१०। ॐ ऐं फ्रें नमः११। ॐ ऐं हं नम:१२।

ॐ ऐं सः नमः१३। ॐ ऐं चें नम:१४। ॐ ऐं सूं नमः१५। ॐ ऐं प्रीं नमः१६ । ॐ ऐं ब्लूं नमः१७। 

ॐ ऐं आं नमः१८। ॐ ऐं औं नमः१९। ॐ ऐं ह्रीं नमः२० । ॐ ऐं क्रीं नम:२१ । ॐ ऐं द्रां नमः२२॥ 

ॐ ऐं श्रीं नम:२३। ॐ ऐं स्लीं नम:२४। ॐ ऐं क्लीं नम:२५। ॐ ऐं स्लूं नम:२६ । ॐ ऐं ह्रीं नम:२७। 

ॐ ऐं ब्लीं नम:२८। ॐ ऐं त्रों नमः२९। ॐ ऐं ओं नमः३० । ॐ ऐं श्रौं नम:३१। ॐ ऐं ऐं नम:३२। 

ॐ ऐं प्रें नम:३३। ॐ ऐं द्रूं नम:३४। ॐ ऐं क्लूं नम:३५। ॐ ऐं औं नम:३६ । ॐ ऐं सूं नम:३७। 

ॐ ऐं चें नम:३८। ॐ ऐं हैं नम:३९। ॐ ऐं प्लीं नम:४०। ॐ ऐं क्षां नम:४१ ।

'ॐ यं यं यं रं रं रं ठं ठं ठं फट् स्वाहा'
!!इति द्वादशोऽध्यायः!!

🌹॥बीजात्मक तंत्रदुर्गासप्तशती त्रयोदशोऽध्यायः॥
~ध्यानम्~
ॐ बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम्। पाशाङ्‌कुशवराभीतीर्धारयन्तीं शिवां भजे॥

ॐ ऐं श्रौं नमः। ॐ ऐं व्रीं नमः। ॐ ऐं ओं नमः३। ॐ ऐं औं नम:४। ॐ ऐं ह्रां नम:५। 

ॐ श्रीं नम:। ॐ ऐं श्रां नम:। ॐ ऐं ओं नमः८। ॐ ऐं प्लीं नम:। ॐ ऐं सौं नमः१०। 

ॐ ऐं ह्रीं नम:११। ॐ ऐं क्रीं नमः१२। ॐ ऐं ल्लूं नमः१३। ॐ ऐं क्लीं नमः१४। ॐ ऐं ह्रीं नमः१५। 

ॐ ऐं प्लीं नमः१६। ॐ ऐं श्रीं नम:१७। ॐ ऐं ल्लीं नमः१८। ॐ ऐं श्रूं नमः१९। ॐ ऐं ह्रीं नम:२० । 

ॐ ऐं त्रूं नम:२१ । ॐ ऐं हूं नम:२२। ॐ ऐं प्रीं नम:२३। ॐ ऐं ओं नमः२४। ॐ ऐं सूं नम:२५। 

ॐ ऐं श्रीं नम:२६ । ॐ ऐं ह्लौं नमः२७। ॐ ऐं यौं नमः२८ । ॐ ऐं ओं नम:२९॥

'ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' स्वाहा॥
!!इति त्रयोदशोऽध्यायः!!
************
इसके बाद पुनः सप्तशती न्यास आदि करने उपरांत नवार्णमंत्र का जप करके देवीसूक्तम् का पाठ करें।
॥अथ देवी सूक्तम् ॥                                                                       
ॐ ऐं ह्रीं नमः॥१॥ ॐ ऐं श्रीं नमः॥२॥  ॐ ऐं हूं नमः॥३॥  ॐ ऐं क्लीं नमः॥४॥ ॐ ऐं रौं' नमः॥५॥  

ॐ ऐं स्त्रीं नमः॥६॥  ॐ ऐं म्लीं नमः॥७॥  ॐ ऐं प्लूं नमः॥८॥  ॐ ऐं स्हां नमः॥९॥  ॐ ऐं स्त्रीं नमः॥१०॥  

ॐ ऐं. ग्लूं नमः॥११॥  ॐ ऐं व्रीं नम:॥१२॥  ॐ ऐं सौं नम:॥१३॥  ॐ ऐं लूं नमः॥१४॥  ॐ ऐं ल्लूं नमः॥१५॥ 

 ॐ ऐं द्रां नमः॥१६॥  ॐ ऐं क्सां नम:॥१७॥  ॐ ऐं क्ष्म्रीं नम:॥१८॥  ॐ ऐं ग्लौं नमः॥१९॥  ॐ ऐं स्कूं नमः॥२०॥

ॐ ऐं त्रूं नम:॥२१॥  ॐ ऐं स्क्लूं नमः॥२२॥  ॐ ऐं क्रौं नम:॥२३॥  ॐ ऐं छ्रीं नम:॥२४॥  ॐ ऐं म्लूं नम:॥२५॥ 

ॐ ऐं क्लूं नमः॥२६॥  ॐ ऐं शां नम:॥२७॥  ॐ ऐं ल्हीं नम:॥२८॥  ॐ ऐं स्त्रूं नम:॥२९॥  ॐ ऐं ल्लीं नमः॥३०॥

ॐ ऐं लीं नम:॥३१॥  ॐ ऐं सं नम:॥३२॥  ॐ ऐं लूं नमः ॥३३॥  ॐ ऐं ह्सूं नमः॥३४॥  ॐ ऐं श्रूं नम:॥३५॥  

ॐ ऐं जूं नम:॥३६॥  ॐ ऐं ह्स्ल्रीं नम:॥३७॥  ॐ ऐं स्कीं नम:॥३८॥  ॐ ऐं क्लां नम:॥३९॥  ॐ ऐं श्रूं नम:॥४०॥

ॐ ऐं हं नम:॥४१॥  ॐ ऐं ह्लीं नम:॥४२॥  ॐ ऐं क्स्रूं नमः॥४३॥  ॐ ऐं द्रौं नम:॥४४॥  ॐ ऐं क्लूं नम:॥४५॥ 

ॐ ऐं गां नम:॥४६॥  ॐ ऐ सं नम:॥४७॥  ॐ ऐं ल्स्रां नम:॥४८॥  ॐ ऐं फ्रीं नम:॥४९॥  ॐ ऐं स्लां नम:॥५०॥ 

ॐ ऐं ल्लूं नमः॥५१॥  ॐ ऐं फ्रें नमः॥५२॥  ॐ ऐं ओं नमः॥५३॥  ॐ ऐं स्म्लीं नमः॥५४॥  ॐ ऐं ह्रां नम:॥५५॥  

ॐ ऐं ओं नम:॥५६॥  ॐ ऐं ह्लूं नम:॥५७॥  ॐ ऐं हूं नम:॥५८॥  ॐ ऐं नं नम:॥५९॥  ॐ ऐं स्रां नम:॥६०॥  

ॐ ऐं वं नमः॥६१॥  ॐ ऐं मं नम:॥६२॥  ॐ ऐं म्क्लीं नम:॥६३॥  ॐ ऐं शां नम:॥६४॥  ॐ ऐं लं नम:॥६५॥ 

ॐ ऐं भैं नम:॥६६॥  ॐ ऐं ल्लूं नम:॥६७॥ ॐ ऐं हौं नम:॥६८॥  ॐ ऐं ईं नम:॥६९॥  ॐ ऐं चें नम:॥७०॥ 

ॐ ऐं ल्क्रीं नम:॥७१॥  ॐ ऐं ह्ल्रीं नम:॥७२॥ ॐ ऐं क्ष्म्ल्रीं नम:॥७३॥  ॐ ऐं यूं नमः॥७४॥

!!इति देवी सूक्तम्॥

🔥॥ हवनविधि -बीजात्मक तंत्रदुर्गासप्तशती॥ 
बीजात्मक तंत्र दुर्गा सप्तशती के प्रत्येक बीज मंत्र के अंत में स्वाहा लगाकर हवन करें तथा प्रथम अध्याय के अंत में निम्न मंत्र से हवन करें-

ॐ ऐं जयन्ती सांगायै सायुधायै सशक्तिकायै सपरिवारायै सवाहनायै वाग्बीजाधिष्ठात्र्यै महाकालिकायै नमः अहमाहुति समर्पयामि स्वाहा ।

🚩द्वितीय से लेकर चतुर्थ अध्याय तक के अंत में निम्न मंत्र से हवन करें-
ॐ ह्रीं जयन्ती सांगायै सायुधायै सशक्तिकायै सपरिवारायै सवाहनायै हृल्लेखाबीजाधिष्ठात्र्यै महालक्ष्म्यै नमः अहमाहुति समर्पयामि स्वाहा ।

🚩पंचम से लेकर त्रयोदश अध्याय तक के अंत में निम्न मंत्र से हवन करें-
ॐ क्लीं जयन्ती सांगायै सायुधायै सशक्तिकायै सपरिवारायै सवाहनायै कामबीजाधिष्ठात्र्यै महासरस्व्त्यै नमः अहमाहुति समर्पयामि स्वाहा ॥

!! इति: श्रीबीजात्मक तंत्रदुर्गासप्तशती सम्पूर्ण!!
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Monday, 22 September 2025

कुंडली के भावों का परस्पर संबंध.

कुंडली का चार्ट भी कितनी शिद्दत और सोच समझ के बनाया हमारे ऋषि मुनियों ने..किसी भी घर की परेशानी का हल ठीक उसके सामने रखा है पर मुसीबत में हमे दिख नही पाता जैसे कि-:
प्रथम भाव-: प्रातः ब्रह्ममुहुर्त में उठो,चरित्र,स्वास्थ्य, सोच-विचार सही रखें तो(7th) की परेशानियों में काफी हद तक निजात मिलेगी।

द्वितीय भाव -:भाषा को सही रखो,सही खान पान रखो, बुरे समय के लिए कुछ धन जोड़ के रखो(8th)मृत्यु तुल्य कष्ट से बचे रहेंगे।

तृतीय भाव-:संघर्ष पूरी शिद्दत से करो,भाई दोस्तो के साथ धोखा मत करो साथ लेकर चलो (9th)भाग्य जरूर बदलेगा।

चतुर्थ भाव-:माँ दुनिया मे सबसे पहला गुरु होती है,माँ का सम्मान आशीर्वाद साथ रखो(10th)कारोबार नोकरी की परेशानियो के हल का रास्ता मिलेगा,,

पंचम भाव-:ज्ञान ओर (skill) को बढ़ाए (11th)आय भाव खुद बढ़ेगा।

षष्ठ भाव-:रोग ऋण शत्रु को समय रहते बड़ा होने से पहले मार दो (12th)कोर्ट कचहरी अस्पताल से बहुत हद तक निजात मिलेगी।

सप्तम भाव-:पति-पत्नी के बीच प्रेम और समर्पण,ईमानदारी हो तो (1st) आपका दिमाग,चरित्र,और स्वास्थ्य ठीक रहेगा।

अष्टम भाव-:शिव और मृत्यु ही सच है इस बात को याद रखे,गहनता से बुद्धि का उपयोग करें गलत तरीके से पैसा न कमाए न गलत जगह खर्च करें इंसान तो (2nd)धन कभी कम नही होगा बरकत बनी रहेगी।

नवम भाव-:धर्म के साथ चलना,ईश्वर का नित्य स्मरण करना इंसानियत के लिए जीना। किसी धर्म स्थान की साफ सफाई या बनने में सहयोग दें तो (3rd)पराक्रम सही दिशा में काम करेगा।

दशम भाव-:पिता के अनुभव को साथ लेकर चले पिता का सम्मान करें और व्यपार,नोकरी में ईमानदारी रखे तो (4th)सुख हर चीज़ का बहुत हद तक मिलेगा

एकादश भाव-:अपनी कमाई में से दसवंद निकाले,बदलते समय के अनुसार खुद के ज्ञान,(skill)को बढ़ाने पे भी थोड़ा खर्च करें तो (5th) सन्तान ओर ज्ञान के सुख में वृद्धि जरूर होगी।
द्वादश भाव-:सुबह जल्दी उठ कर यदि ध्यान,साधना,योग में थोड़ा समय लगाए तो(6th) रोग ऋण शत्रु,से बहुत हद तक निजात मिलेगी।

ब्रह्मांड में ऐसा कोई धागा,ताबीज,मन्त्र,यज्ञ,हवन,पंडित,मौलवी यंहा तक कि ईश्वर भी नही हुआ जो आपकी जिंदगी या ग्रहों को बदल दे तब तक,,जब तक आप खुद अपनी मदद न कर सको,,सबसे पहले खुद की रोजमर्रा,आदतों को बदलना होता है उसके बाद जीवन बदलना शुरू होता है उसके बाद ही पूजा पाठ यज्ञ,हवन,उपाय शिद्दत से आपके लिए काम करते हैं। हो सकता है किसी तपस्वी के आशीर्वाद से आपको उस समय दुख से निजात मिल जाये वो वो निजात लम्बे समय के लिए नही होती।
बहुत से लोग उदाहरण देते है कि टाटा बिरला relience के मुकेश अम्बानी को वो ही ग्रह तंग नही करते तो हम पर ही सूत्र लागू क्यों,,तो जनाब उनकी तरक्की ओर शोहरत तो देखी है एक बार उनकी जीने की दिनचर्या पर भी नज़र डालें,,जवाब खुद मिल जाएंगे अपनी कमियों ओर उनकी मेहनत ओर उसूलों से भरी जिंदगी को देख कर उनकी तरक्की ओर सुख के कारण।🙏🙏
खुद को बदलो खुद की मदद पहले खुद करो उसके बाद ब्रह्मांड की पूरी ऊर्जा आपके लिए काम करेगी आपके खिलाफ नही।।🙏,,कभी नोट कर लेना जब भी हमे किसी भाव से सम्बंधित परेशानी आती है 100%उसके सामने वाला घर को सही से हम निभा नही पा रहे होते,,
तभी कहा गया है ज्योतिष में भी की ग्रह जंहा बैठता है उससे अधिक असर वो वँहा डालता है जंहा उसकी दृष्टि होती है।। सही लगे तो Apriciate कर देना वरना घूमते रहो अपनी जन्म कुंडली लेकर दुनिया भर में ,क्या पता मिल जाये कोई ऐसा ज्योतिष या विद्वान जो बदल दे आपके ग्रह
क्षमा करना अगर कुछ गलत कहा गया हो🙏🙏पर मेरे 2nd house में शनि हैं स्ट्रेट फॉरवर्ड सच बोलने की आदत है बिन परवाह के😇

#उपवास_व्रत_एक_नियम_संयम--!

#उपवास_व्रत_एक_नियम_संयम--!!अवश्य पढ़े।
नियमो का पालन करना ही व्रत की सिद्धि है!!
>>>>अनेक वार जल पीने से ,पान खाने से, दिन में 
 सोने से, ओर मैथुन करने से व्रत भंग हो जाता है।

नोट--नमक आदि पदार्थ सर्वदा व्रत में त्याज्य है।

#ये_आठ_व्रत_के_नाशक_नहीं_है!!
 जल_ फल _मूल, _दूध _ हविष्य(घी मात्र) ब्राह्मण की इच्छापूर्ति_ गुरु का वचन _तथा _औषध ----ये आठ व्रत के नाशक नही है!!
>>>>> शास्त्रीय मार्गदर्शक..
(( ओषध का तात्पर्य उपवेदोचित ओषधियों से न कि एलोपथी इत्यादि इंग्लिश दवाईंयां! आयुर्वेद में भी भक्ष्याभक्ष्य ओषधिविचार करके ही द्विजों के लिये ग्राह्य हैं।))

#दश_नियम_आवश्यक_है_अन्यथा_व्रत_भंग_समझे!!
 क्षमा_ दया_सत्य_दान _शौच _इन्द्रिय संयम_देवपूजा_ अग्निहोत्र _सन्तोष_ तथा चोरी न करना---ये दश नियम सम्पूर्ण व्रतों में आवश्यक माने गये है!!

उपवास करनेवाले मनुष्य को कांसे का वर्तन, मसूर ,चना, साग,मधु, पराया अन्न,तथा स्त्री संग का त्याग करना चाहिए।।

------व्रती को फूल, अलंकार, सुन्दर वस्त्र ,सुगन्ध ,
  दातुन आदि का भी त्याग कर देना चाहिए!!

उपवास के दिन शरीर मे तेल लगाकर नहाना छोड़ दे!
--क्योकि यह कुरूप बनानेवाला(सौंदर्य का विनाशक)है!!

उपवास के दिन लकड़ी की दातुन नही करनी चाहिए-अन्यथा नरक की प्राप्ति होती है।।
किसी भी प्रकार के प्लास्टिक से दन्ता धावन न करे!!

नोट... जो शास्त्रीय विधि सिद्धान्त से व्रत उपवास करते हैं ये लेख उनके लिए है.. अन्य लोगो के लिए उपयोगी नहीं।।
Arun Dubey Jabalpur !!
प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें!
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
 #अस्कृज़्जलपणाच्च_ताम्बूलस्य_च_भक्षणम्!
#उपवासःप्रदुष्येत_दिवा_स्वप्नाच्च_मैथुनात्!!

#अष्टौ_तान्यब्रतघ्नानि_आपो_मूलं_घृतं_पयः!
#हविर्ब्राह्मणकाम्या_च_गुरौर्वचनमौषधम्!!
#अष्टौ_तान्यब्रतघ्नानि_आपोमूल_फलं_पयः!
#हविर्ब्राह्मणकामाय_गुरौर्वचनमौषधम्!!

  #क्षमा_सत्यं_दया_दानं_शौचमिन्द्रियनिग्रहः!
#देवपूजाग्निहरणं_सन्तोषो_स्तेय_मेव_च!!
#सर्वव्रतेष्वयं_धर्म:#सामान्यो_दशधा_स्मृत:!!

 #कांस्यं_मांसं_मसूरं_च_चणकं_कोरदूषकं!
#शाकं_मधुपरान्नं_च_त्यजेदुपवसन्_स्त्रियम्!!
#पुष्पालंकारवस्त्राणि_धूप_गन्धादि_लेपनम्!
#उपवासे_न_शस्यन्ति_दन्तधावनमंजनम्!!

 #उपोसितैर्नरैस्तस्मात्_स्नानमभ्यंगपूर्वकम्!
#वर्जनीयं_प्रयत्नेन_रूपघ्नं_तत्परं_नृप!
 #उपवासदिने_यस्तु_दन्तधावनकृन्नरः!
#स_घोरं_नरकं_याति_व्याघ्रभक्षश्चतुर्युगम्!!
Arun shastri जबलपुर
प्रश्न_नही_स्वाध्यायाय_करें!!

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#अपनी_सन्तति_को_सनातनी_बनायें_म्लेच्छ_नही!!
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एक ज्ञातव्य विषय_
#व्रत_या_उपवास_कितने_प्रकार_के_होते_हैं??????

व्रत रखने के नियम दुनिया को हिंदू धर्म की देन है। व्रत रखना एक पवित्र कर्म है और यदि इसे नियम पूर्वक नहीं किया जाता है तो न तो इसका कोई महत्व है और न ही लाभ, राजा भोज के राजमार्तण्ड में 24 व्रतों का उल्लेख है।

 हेमादि में 700 व्रतों के नाम बताए गए हैं। गोपीनाथ कविराज ने 1622 व्रतों का उल्लेख अपने व्रतकोश में किया है। व्रतों के प्रकार तो मूलत: तीन है:- 1. नित्य, 2. नैमित्तिक और 3. काम्य।
 
1.नित्य व्रत उसे कहते हैं जिसमें ईश्वर भक्ति या आचरणों पर बल दिया जाता है, जैसे सत्य बोलना, पवित्र रहना, इंद्रियों का निग्रह करना, क्रोध न करना, अश्लील भाषण न करना और परनिंदा न करना, प्रतिदिन ईश्वर भक्ति का संकल्प लेना आदि नित्य व्रत हैं। इनका पालन नहीं करते से मानव दोषी माना जाता है।
 
2.नैमिक्तिक व्रत उसे कहते हैं जिसमें किसी प्रकार के पाप हो जाने या दुखों से छुटकारा पाने का विधान होता है। अन्य किसी प्रकार के निमित्त के उपस्थित होने पर चांद्रायण प्रभृति, तिथि विशेष में जो ऐसे व्रत किए जाते हैं वे नैमिक्तिक व्रत हैं।
 
3.काम्य व्रत किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाते हैं, जैसे पुत्र प्राप्ति के लिए, धन- समृद्धि के लिए या अन्य सुखों की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले व्रत काम्य व्रत हैं।
 
व्रतों का वार्षिक चक्र :-
1.साप्ताहिक व्रत : सप्ताह में एक दिन व्रत रखना चाहिए। यह सबसे उत्तम है।
 
2.पाक्षिक व्रत : 15-15 दिन के दो पक्ष होते हैं कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। प्रत्येक पक्ष में चतुर्थी, एकादशी, त्रयोदशी, अमावस्या और पूर्णिमा के व्रत महतवपूर्ण होते हैं। उक्त में से किसी भी एक व्रत को करना चाहिए।
 
3.त्रैमासिक : वैसे त्रैमासिक व्रतों में प्रमुख है नवरात्रि के व्रत। हिंदू माह अनुसार पौष, चैत्र, आषाढ और अश्विन मान में नवरात्रि आती है। उक्त प्रत्येक माह की प्रतिपदा यानी एकम् से नवमी तक का समय नवरात्रि का होता है। इन नौ दिनों तक व्रत और उपवास रखने से सभी तरह के क्लेश समाप्त हो जाते हैं।
 
4.छह मासिक व्रत : चैत्र माह की नवरात्रि को बड़ी नवरात्रि और अश्विन माह की नवरात्रि को छोटी नवरात्रि कहते हैं। उक्त दोंनों के बीच छह माह का अंतर होता है। इसके अलावा
 
5.वार्षिक व्रत : वार्षिक व्रतों में पूरे श्रावण मास में व्रत रखने का विधान है। इसके अलवा जो लोग चतुर्मास करते हैं उन्हें जिंदगी में किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं होता है। इससे यह सिद्ध हुआ की व्रतों में 'श्रावण माह' महत्वपूर्ण होता है। सोमवार नहीं पूरे श्रावण माह में व्रत रखने से हर तरह के शारीरिक और मानसिक कलेश मिट जाते हैं।

उपवास के प्रकार:- 1.प्रात: उपवास, 2.अद्धोपवास, 3.एकाहारोपवास, 4.रसोपवास, 5.फलोपवास, 6.दुग्धोपवास, 7.तक्रोपवास, 8.पूर्णोपवास, 9.साप्ताहिक उपवास, 10.लघु उपवास, 11.कठोर उपवास, 12.टूटे उपवास, 13.दीर्घ उपवास। बताए गए हैं, लेकिन हम यहां वर्ष में जो व्रत होते हैं उसके बारे में बता रहे हैं।
 
1.प्रात: उपवास- इस उपवास में सिर्फ सुबह का नाश्ता नहीं करना होता है और पूरे दिन और रात में सिर्फ 2 बार ही भोजन करना होता है।
 
2.अद्धोपवास- इस उपवास को शाम का उपवास भी कहा जाता है और इस उपवास में सिर्फ पूरे दिन में एक ही बार भोजन करना होता है। इस उपवास के दौरान रात का भोजन नहीं खाया जाता।
 
3.एकाहारोपवास- एकाहारोपवास में एक समय के भोजन में सिर्फ एक ही चीज खाई जाती है, जैसे सुबह के समय अगर रोटी खाई जाए तो शाम को सिर्फ सब्जी खाई जाती है। दूसरे दिन सुबह को एक तरह का कोई फल और शाम को सिर्फ दूध आदि।
 
4.रसोपवास- इस उपवास में अन्न तथा फल जैसे ज्यादा भारी पदार्थ नहीं खाए जाते, सिर्फ रसदार फलों के रस अथवा साग-सब्जियों के जूस पर ही रहा जाता है। दूध पीना भी मना होता है, क्योंकि दूध की गणना भी ठोस पदार्थों में की जा सकती है।
 
5.फलोपवास- कुछ दिनों तक सिर्फ रसदार फलों या भाजी आदि पर रहना फलोपवास कहलाता है। अगर फल बिलकुल ही अनुकूल न पड़ते हो तो सिर्फ पकी हुई साग-सब्जियां खानी चाहिए।
 
6.दुग्धोपवास- दुग्धोपवास को 'दुग्ध कल्प' के नाम से भी जाना जाता है। इस उपवास में सिर्फ कुछ दिनों तक दिन में 4-5 बार सिर्फ दूध ही पीना होता है।
 
7.तक्रोपवास- तक्रोपवास को 'मठाकल्प' भी कहा जाता है। इस उपवास में जो मठा लिया जाए, उसमें घी कम होना चाहिए और वो खट्टा भी कम ही होना चाहिए। इस उपवास को कम से कम 2 महीने तक आराम से किया जा सकता है।
 
8.पूर्णोपवास- बिलकुल साफ-सुथरे ताजे पानी के अलावा किसी और चीज को बिलकुल न खाना पूर्णोपवास कहलाता है। इस उपवास में उपवास से संबंधित बहुत सारे नियमों का पालन करना होता है।
 
9.साप्ताहिक उपवास- पूरे सप्ताह में सिर्फ एक पूर्णोपवास नियम से करना साप्ताहिक उपवास कहलाता है।
 
10.लघु उपवास- 3 से लेकर 7 दिनों तक के पूर्णोपवास को लघु उपवास कहते हैं।
 
11.कठोर उपवास- जिन लोगों को बहुत भयानक रोग होते हैं यह उपवास उनके लिए बहुत लाभकारी होता है। इस उपवास में पूर्णोपवास के सारे नियमों को सख्ती से निभाना पड़ता है।
 
12.टूटे उपवास- इस उपवास में 2 से 7 दिनों तक पूर्णोपवास करने के बाद कुछ दिनों तक हल्के प्राकृतिक भोजन पर रहकर दोबारा उतने ही दिनों का उपवास करना होता है। उपवास रखने का और हल्का भोजन करने का यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक कि इस उपवास को करने का उद्देश्य पूरा न हो जाए।
 
13.दीर्घ उपवास- दीर्घ उपवास में पूर्णोपवास बहुत दिनों तक करना होता है जिसके लिए कोई निश्चित समय पहले से ही निर्धारित नहीं होता। इसमें 21 से लेकर 50-60 दिन भी लग सकते हैं। अक्सर यह उपवास तभी तोड़ा जाता है, जब स्वाभाविक भूख लगने लगती है अथवा शरीर के सारे जहरीले पदार्थ पचने के बाद जब शरीर के जरूरी अवयवों के पचने की नौबत आ जाने की संभावना हो जाती है।
Arun shastri जबलपुर
प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें।।

हमारे 100 कर्म-जिनमे से 06 विधि हाथ"कौन कौनसे हैं जानिए। जानिए कौन-कौन से हैं।

सम्भाल कर रखियेगा ये पोस्ट... फिर कभी नही मिलेगी।

"हमारे 100 कर्म-जिनमे से 06 विधि हाथ"

कौन कौनसे हैं जानिए।

📿 काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर ✍️ 94 लिखता है। यह सभी को नहीं मालूम है। खांटी बनारसी लोग या अगल बगल के लोग ही इस परम्परा को जानते हैं। बाहर से आये शवदाहक जन इस बात को नहीं जानते।

🌸 जीवन के शतपथ होते हैं। 100 शुभ कर्मों को करने वाला व्यक्ति मरने के बाद उसी के आधार पर अगला जीवन शुभ या अशुभ प्राप्त करता है। 94 कर्म मनुष्य के अधीन हैं। वह इन्हें करने में समर्थ है पर 6 कर्म का परिणाम ब्रह्मा जी 🙏 के अधीन होता है।

⚖️ हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश- अपयश ये 6 कर्म विधि के नियंत्रण में होते हैं। अतः आज चिता के साथ ही तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गये। आगे के 6 कर्म अब तुम्हारे लिए नया जीवन सृजित करेंगे।

🧮 अतः 100 - 6 = 94 लिखा जाता है।

📖 गीता में भी प्रतिपादित है कि मृत्यु के बाद मन 🧠 अपने साथ 5 ज्ञानेन्द्रियों 👀👂👃👅✋ को लेकर जाता है। यह संख्या 6 होती है। मन और पांच ज्ञान इन्द्रियाँ।

🌍 अगला जन्म किस देश में कहाँ और किन लोगों के बीच होगा यह प्रकृति के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं होता है। अतः 94 कर्म भस्म हुए 6 साथ जा रहे हैं।

🕉️ विदा यात्री। तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं।

🌼 आपके लिए इन 100 शुभ कर्मों का विस्तृत विवरण दिया जा रहा है जो जीवन को धर्म और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं एवं यह सूची आपके जीवन को सत्कर्म करने की प्रेरणा देगी।

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🪔 100 शुभ कर्मों की गणना

📜 धर्म और नैतिकता के कर्म

1. ✅ सत्य बोलना

2. ✌️ अहिंसा का पालन

3. 🚫 चोरी न करना

4. 💎 लोभ से बचना

5. 🔥 क्रोध पर नियंत्रण

6. 🤲 क्षमा करना

7. 💖 दया भाव रखना

8. 🤝 दूसरों की सहायता करना

9. 🎁 दान देना (अन्न, वस्त्र, धन)

10. 🙇 गुरु की सेवा

11. 👨‍👩‍👧‍👦 माता-पिता का सम्मान

12. 🏠 अतिथि सत्कार

13. 📖 धर्मग्रंथों का अध्ययन

14. 🕉️ वेदों और शास्त्रों का पाठ

15. 🛕 तीर्थ यात्रा करना

16. 🔥 यज्ञ और हवन करना

17. 🙏 मंदिर में पूजा-अर्चना

18. 🌊 पवित्र नदियों में स्नान

19. 🧘 संयम और ब्रह्मचर्य का पालन

20. 🧘‍♂️ नियमित ध्यान और योग

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👨‍👩‍👧 सामाजिक और पारिवारिक कर्म

21. 👨‍👩‍👧 परिवार का पालन-पोषण

22. 📚 बच्चों को अच्छी शिक्षा देना

23. 🍲 गरीबों को भोजन देना

24. 🏥 रोगियों की सेवा

25. 👶 अनाथों की सहायता

26. 👴 वृद्धों का सम्मान

27. 🕊️ समाज में शांति स्थापना

28. 🚫 झूठे वाद-विवाद से बचना

29. 🙊 दूसरों की निंदा न करना

30. ⚖️ सत्य और न्याय का समर्थन

31. 🌿 परोपकार करना

32. 🪧 सामाजिक कार्यों में भाग लेना

33. 🌳 पर्यावरण की रक्षा

34. 🌱 वृक्षारोपण करना

35. 💧 जल संरक्षण

36. 🐦 पशु-पक्षियों की रक्षा

37. 🤝 सामाजिक एकता को बढ़ावा देना

38. 🌟 दूसरों को प्रेरित करना

39. ✨ समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान

40. 📢 धर्म के प्रचार में सहयोग

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🙏 आध्यात्मिक और व्यक्तिगत कर्म

41. 📿 नियमित जप करना

42. 🕉️ भगवान का स्मरण

43. 🌬️ प्राणायाम करना

44. 🪞 आत्मचिंतन

45. 🧘 मन की शुद्धि

46. ⚖️ इंद्रियों पर नियंत्रण

47. 🚫 लालच से मुक्ति

48. 🌀 मोह-माया से दूरी

49. 🌿 सादा जीवन जीना

50. 📚 स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)

51. 🧘 संतों का सान्निध्य

52. 📖 सत्संग में भाग लेना

53. 🙇‍♂️ भक्ति में लीन होना

54. 🤲 कर्मफल भगवान को समर्पित करना

55. ❌ तृष्णा का त्याग

56. 🚫 ईर्ष्या से बचना

57. 🕊️ शांति का प्रसार

58. 💪 आत्मविश्वास बनाए रखना

59. 💝 दूसरों के प्रति उदारता

60. 🌈 सकारात्मक सोच रखना

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🤲 सेवा और दान के कर्म

61. 🍛 भूखों को भोजन देना

62. 👕 नग्न को वस्त्र देना

63. 🏠 बेघर को आश्रय देना

64. 🎓 शिक्षा के लिए दान

65. 🏥 चिकित्सा के लिए सहायता

66. 🛕 धार्मिक स्थानों का निर्माण

67. 🐄 गौ सेवा

68. 🌾 पशुओं को चारा देना

69. 💧 जलाशयों की सफाई

70. 🛤️ रास्तों का निर्माण

71. 🏘️ यात्री निवास बनवाना

72. 🏫 स्कूलों को सहायता

73. 📚 पुस्तकालय स्थापना

74. 🎉 धार्मिक उत्सवों में सहयोग

75. 🍽️ गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन

76. 👗 वस्त्र दान

77. 💊 औषधि दान

78. 📖 विद्या दान

79. 👰 कन्या दान

80. 🌍 भूमि दान

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🌟 नैतिक और मानवीय कर्म

81. 🚫 विश्वासघात न करना

82. 📝 वचन का पालन

83. ⚔️ कर्तव्यनिष्ठा

84. ⏳ समय की प्रतिबद्धता

85. 🙏 धैर्य रखना

86. ❤️ दूसरों की भावनाओं का सम्मान

87. ✊ सत्य के लिए संघर्ष

88. 📢 अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना

89. 😢 दुखियों के आँसू पोंछना

90. 👶 बच्चों को नैतिक शिक्षा

91. 🌍 प्रकृति के प्रति कृतज्ञता

92. 🌟 दूसरों को प्रोत्साहन

93. 🧘 मन, वचन, कर्म से शुद्धता

94. ⚖️ जीवन में संतुलन बनाए रखना

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🌌 विधि के अधीन 6 कर्म

95. 📉 हानि

96. 📈 लाभ

97. 👶 जीवन

98. ⚰️ मरण

99. 🏆 यश

100. 💔 अपयश

✨ 94 कर्म मनुष्य के नियंत्रण में
उपरोक्त सूची में 1 से 94 तक के कर्म वे हैं, जो मनुष्य अपने विवेक, इच्छाशक्ति, और प्रयास से कर सकता है। ये कर्म धर्म, सत्य, और नैतिकता पर आधारित हैं, जो जीवन को सार्थक बनाते हैं।

🌌 6 कर्म विधि के अधीन
अंतिम 6 कर्म (हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश) मनुष्य के नियंत्रण से बाहर हैं। इन्हें भाग्य, प्रकृति, या ईश्वर की इच्छा के अधीन माना जाता है।

🙏🙏🏻

पंकज ओझा RAS

धर्मध्वजा रक्षक🚩🔱

Saturday, 20 September 2025

अहम् पितरं सुवे' 'अहं सुवे पितरम्'

             'अहम् पितरं सुवे' 'अहं सुवे पितरम्'
             ___________________________

ऋग्वेद दशम मण्डल 'देवी-सूक्त' में यह स्वयं देवी का वचन है। पितृ तत्व नित्य है। यह कोई अनुपस्थित की क्षणिक उपस्थिति नहीं है। यह अस्तित्व के बाद का काव्यात्मक या भावात्मक नैरन्तर्य नहीं यह नित्य उपास्य प्राण का ही स्वरूप है। 

भारतीय उत्सवजीविता उत्सवधर्मिता, इसको जरा डूब कर देखें। पितृपक्ष हो या सर्वपितृ अमावस्या यह कोई मातम नहीं है। यह भी त्योहार ही है। पितर हों कि कुलदैवत, यह वही नाद-बिन्दु रक्त-डीएनए की एक दृश्य- अदृश्य डोर है जो कभी टूटती नहीं, एक धारा जो अजस्र है।

हमारे पिता बड़े डील-डौल के स्वामी, हमारी तुलना में। मैं बैठा होता हूं लोगों को संदेह हो जाता है कि पिता बैठे हैं। हमारे पितामह बड़े प्रशासनिक अधिकारी रहे, बोलना उनका काम नहीं था। मुझे अपने काम में बोलना पड़ता है, जिन लोगों ने बाबा को सुना है, वह कहते हैं कि वही तो बोलते हैं आपके मुख से। यह है निरन्तरता। यह है पितृ तत्व। 

एक बार दक्खिन के 'कैतहा' खेतों में मजदूर लोग पानी लगा रहे थे। हमारे यहां खेतों के भी नाम हैं कैतहा, कुरना, इटहवा, बड़की बारी, घुग्घा, कालीथान, पनपियहवा, तेतरी आदि। यह भूमि से नाभिनालबद्ध होने का तरीका भी प्रमाण भी।

कैतहा में ट्यूबवेल और इंजन दोनों चल रहे थे। कुछ मशीन की समस्या थी। मैं और मेरा सबसे छोटा भाई डीजल और कुछ रेंच स्क्रू ड्राइवर वगैरह लेकर खेतों की तरफ जा रहे थे पैदल ही। हमारे खेतों से ठीक पहले कुछ शूद्र महिलाएं मरणा अशौच स्नान कर रही थीं। पम्पिंग सैट चल रहा था, बलुई मिट्टी में जलधारा गड्ढे बना देती है, 'चौना' कहते उसे पूर्वांचल में। दो चार केला गाछ और बिना लगाए अपने आप उगे शीशम के बीच का 'चौना', महिलाएं वहीं शुद्धि स्नान के लिए एकत्रित हुई थीं। नजदीकी रक्त संबंधी स्त्रियां कुल कुटुम्ब में मृत्यु के बाद गांव से बाहर जाती हैं स्नान के लिए। यह अनुशासन सभी वर्णों पर लागू।

एक युवा स्त्री बुदबुदाई कि अरे बैठ जाओ, इधर दो लड़के आ रहे हैं। एक वृद्ध स्त्री का स्वर गूंजा ' "हरिहर बाबा के नाती लोग ह, मर जइहें लेकिन एहर ना तकिहें'! यह है आदित्य रूद्र वसु तत्व। यह है पितरों पूर्वजों की कमाई। यह इकबाल यह विश्वास हमारे इस देह की कमाई है क्या? यह एक जन्म का हासिल है क्या? 

यहां से समझ आती है पितृ तत्व की नित्यता। यहां से आता है रक्त में साहस, साधन, धैर्य! यहां से खड़ी हो जाती हैं रोमावलियां। 

देह अनित्य है। पर स्मृति! जल का स्वरूप ही तो बदल सकता है। अधिक से अधिक भाप बन कर उड़ेगा। फिर संघनित होकर बरस जाएगा। मरण तो है ही नहीं। गुरूदेव बारम्बार कहते हैं कि दुनिया कहती है मृत्यु अन्तिम सत्य है, मैं कहता हूं वह सबसे विश्वसनीय झूठ है। 

अभी सर्वपितृ अमावस्या आ रही है। एक बार जरा इन पर्वों के क्रम को ध्यान दें तो एक रहस्य का सूत्र दिखाई देने लग जाएगा। हम नवरात्रि में शक्ति संचय और आद्या प्रकृति की उपासना से ठीक पहले पहले गुरु पूर्णिमा को गुरु, नाग पञ्चमी को नाग, ऋषि पञ्चमी को ऋषि तत्व और पितृ पक्ष में पितरों को संतुष्ट तृप्त पूजित करके देवी की तरफ मन बढ़ाते हैं।  सम्भवतः यही प्रकृति का आरोही क्रम है। शाम्भवोपाय आणवोपाय का रहस्य भी यही कि गुरू, नाग, ऋषि, पितर का द्रोही शक्ति तत्व को उपलब्ध नहीं हो सकेगा। 

आश्विन अमावस्या का रहस्य समझते चलें।‌ 'अमा' महाकला है। गिनती में सोलहवीं पर सोलहों कलाओं की शक्तियां इसमें शामिल हैं। यह अमामासी सूर्य-चन्द्रमा संगम है। यही 'कुहू' है। 

कभी हमारे पूर्वपुरुष इस आश्विन अमावस की पूरे वर्ष प्रतीक्षा करते थे कि सविता की गोद में बैठे यम के संग आनंदित होते अपने वायव्य पितरों से अपने मन की बात घर का दुख सुख कहेंगे। वंशवृद्धि के लिए आशीष लेंगे। और यह तो पक्की रही कि अग्नि से आहुतियां लेने वाले हमारे पितर हमारी प्रार्थनाओं को सुनते भी हैं। तीनों लोकों को जोड़ने वाली रज्जु दर्भ है, कुशासन पर बैठकर जो सोमप्रेमी पितरों को अर्पित किया जाता है, उसे वह बड़े प्रसन्न मन से ग्रहण भी करते हैं। और समय की सीमा को देखें तो हम आप भी आने वाली न जाने कितनी पीढ़ियों के पितर ही तो हैं। 

हमने समय- परिधि का जिक्र किया। हमारी आयु का एक कारक निर्धारक तत्व चन्द्रमा और पृथ्वी का परिक्रमा परिपथ भी है। एस्ट्रोनॉमी में अर्थ-मून करैक्टरस्टिक डिस्टेंस नाम से एक यूनिट होती है, यह चंद्रमा की कक्षा के आधे परिमाण को दर्शाती है। इस पर आश्विन कृष्ण पक्ष में तनिक नजर रखें विज्ञानी लोग। यह चंद्रमा का प्राणायाम है। पितरों की कई कोटियां इस आयाम पर दृष्टि रखती हैं।

यह पितृ पक्ष खगोल को समझने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो सकता है। शतपथ कहता है- 'विभु: उध्र्वभागे पितरो वसन्ति'!  विभु अर्थात् चंद्रमा के दूसरे हिस्से में पितरों का निवास है। चंद्रमा का दक्षिण पक्ष जो हमसे ओझल है, जो यमालय है। 

आज के विज्ञान की दृष्टि में केनिस मेजर और माइनर के विकिरण चंद्रमा के इस ओझल पट पर पड़ते हैं। अथर्व की मानें तो यह दोनों सूर्य-श्वान ही श्राद्ध हवि के अनन्तिम भोक्ता हैं। 'श्यामश्च त्वा न सबलश्च प्रेषितौ यमश्च यौ पथिरक्षु श्वान"। 

मनुष्यों के प्राणों का चरम आयाम मुक्ति, मोक्ष, अथवा निर्वाण ही तो है। पितरों और श्राद्ध तत्व को समझने की दृष्टि से तनिक ज्योतिष में उतरते हैं। 
द्वादश भाव कालपुरूष विष्णु का पाद है। हम सब जानते ही हैं कि पितरों के मुक्ति के निमित्त विष्णुपाद गया में श्राद्ध किए जाते हैं।

मोक्ष विशुद्ध रूप से नारायण के अधिकार में है। शाक्त शैव सौर गाणपत्य सम्प्रदायों के भी लोग इसी अभिमत को मानते हैं। काशी में अन्नपूर्णा से भिक्षा मांग कर भगवान शिव भी जिस तारक मंत्र को बांटते फिरते हैं, वह भी 'नारायण' अथवा 'राम' नाम ही है।

अनंतशेषशायी विष्णु सो रहे हैं, और कमला उनके चरण दाब रहीं। यह मोक्षकारक महानारायण निर्वाण-पुरुष कैसे सोते हैं कहां सोते हैं?

यह महा-नारायण का सिर बद्री में है महाराज इसलिए इस तीर्थ को कपालगया कहते हैं, कभी कपालतीर्थ कहीं बद्रीकपाल। यहां ज्ञात अज्ञात सभी पितरों की मुक्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।मोक्ष नारायण की नाभि नाभिगया नैमिषारण्य में है। कलिकाल का तीर्थोत्तम। पाद सब जानते हैं विष्णुपाद बोधगया।

बृहदारण्यक कहता है 'प्राणा वै गया:। प्रकारान्तर से पिण्डदान अथवा श्राद्ध अपान में प्राण की, प्राण में प्राण की और प्राण में अपान की आहुति है। 'अपाने जुह्वति प्राणं! 

रहस्यदर्शी योगियों की शब्दावली कहती है कि गया ही गया में पिण्ड दान करती है। बचपन में लोग 'गया गया गया' इसका अंग्रेजी अनुवाद पूछते थे चुहल के लिए। इसका असली अर्थ तो केवल योगियों के पास है।
 प्राण, अपान, व्यान, उदान,समान। यह पञ्च प्राण ही पांच पितर हैं। प्राण ही प्राणायाम से इन पञ्च प्राणों का उद्धार करता है। यही 'गया गया गया' है। 

पितृ पक्ष शरद का प्रारम्भ भी है। कभी शरद हेमन्त शिशिर जीवन के लिए कठिन थे। शरद में सोमतत्त्व अग्नितत्त्वको अपमर्दन करना आरम्भ करता है। यह वैवस्वत यम का कालप्रभात है। शरद् (शॄ हिं॒साया॑म्) ऋतु (ऋ॒ गतिप्राप॒णयोः॑) कहते हैं न। इसलिए भी ऋषियों ने प्राण तत्व की चिन्ता की होगी।और, काक श्वान पिपिलिका ब्राह्मण गौ इस चिंता के क्यों न अंग हों। शरद में आयु की चिन्ता सहज रही होगी इसलिए ही तो वैदिक ऋषि प्रार्थना करते हैं जीवेम शरद: शतम्! पितरों की तृप्ति से शरद में प्राण को बल मिलेगा। आप श्राद्ध के दान वाली वस्तुओं पर गौर करें तिल, जौ, घी, जूता, कम्बल ! ऐसा लगता है कि शीत शरद की तैयारी है। 

जगत में ताप का एक चक्र है। निषेचन के समय शरीर गर्म होगा मृत्यु के समय ठंडा। यह प्राण ही अग्निसोमात्मक है। उष्म उर्ध्वगामी अग्नि जो अवाची से उदीची की तरफ गति करते हैं, शीत सोम जिनकी गति उदीची से अवाची की तरफ है और अनुष्णाशीत यम जिनका चक्रावसान पर नियंत्रण है। पितर इसी यम परिधि पर निवास करते हैं। 
जैसे देवता नेत्र-भोग से तृप्त हो जाते हैं, वैसे ही आवाहन के बाद पितृगण भी संस्कृत व्यञ्जनादि को देखकर तृप्त होते हैँ । 

इस अमावस्या हम सभी भारतवंशियों के पितृ तृप्त हों, यम तृप्त हों, वरूण तृप्त हों, ऋषि तृप्त हों।

|| ॐ मधु मधु मधु ||

✍️ मधुसूदन उपाध्याय 
     नैमिषारण्य,  आश्विन कृष्ण त्रयोदशी वि. सं. २०८२
वयं राष्ट्रे जागृयाम

Friday, 19 September 2025

डच नौसेना को धूल चटाने वाले प्रतापी हिन्दू राजा मार्तण्ड वर्मा। ( भारत के ऐसे गौरवशाली इतिहास के अनेक पात्रों को योजनाबद्ध रुप से छिपाया गया )

ऐसा इतिहास जो आप से साजिश के तहत छिपाया गया है। 

#डच_नौसेना_को_धुल_चटाने_वाले_प्रतापी_हिन्दू_राजा_मार्तण्ड_वर्मा।

✍जिस प्रकार आज चीन को वैश्विक शक्ति होने का दभ हैं, 17 वीं सदी में #डच_कम्पनी को भी अपनी आर्थिक तथा सैनिक शक्ति का अहंकार था ।

✍केरल के एक छोटे राज्य के राजा मार्तण्ड वर्मा ने अपने साहस, रणनीतिक कौशल तथा स्थानीय मछुआरों के सहयोग से उन्हें निर्णायक रूप से परास्त किया था।

✍#मार्तण्ड_वर्मा_त्रावनकोर_साम्राज्य के निर्माता माने जाते हैं, जिन्होंने सन 1729 से मृत्यु पर्यन्त सन् 1758 तक #ट्रावनकोर साम्राज्य पर शासन किया। 
उन्होंने 1741 में #कोलाचेल के युद्ध में उस समय की सबसे शक्तिशाली नौसेनाओं में से एक डच कम्पनी की नौसेना को परास्त करने का पराक्रम किया। संभवतया विश्व इतिहास में आधुनिक यूरोपीय नौसेना की
एशिया क्षेत्र में पराजय की यह पहली घटना है। इससे न केवल मार्तण्ड वर्मा की कीर्ति देशभर में फैली बल्कि डचों (नीदरलैण्ड/हालैण्ड वासियों) के भारत में व्यापार तथा विस्तार पर पूर्ण विराम भी लगा।

✍#राजा_मार्तण्ड_वर्मा_का_बचपन-

अभिझम तिरुनल मार्तण्ड वर्मा का जन्म 1706में अट्टिन्गल की रानी कार्तिक तिरुनल तथा राघव वर्मा के
#वेनाड राज परिवार में हुआ ।

✍वे बचपन से ही निडर और समझदार थे। उस समय वेनाड छोटा तथा कमजोर राज्य था, जिसमें नायर जमींदारों जागीरदारों के अलावा #पद्मनाभस्वामी_मंदिर के प्रतिनिधियों का हस्तक्षेप रहता था । 

✍उन्होंने शासन परपकड़ मजबूत करने तथा राज्य का विस्तार करने की नीति अपनाई जिससे राज्य का व्यापार, वाणिज्य तथा अर्थव्यवस्था मजबूत हो तथा लोग खुशहाल हों। 
उन दिनों केरल छोटी-छोटी रियासतों में बंटा हुआ था। #मार्तण्ड_वर्मा स्वयं भी छोटी रियासत के राजा थे। इसलिए दूरदर्शी राजा ने सोचा कि यदि मालाबार (केरल) को विदेशी शक्ति से बचाना है तो सबसे पहले केरल का एकीकरण करना होगा।

✍#मार्तण्ड_वर्मा_का_विजय_अभियान-

 मात्र 25 वर्ष की आयु में 1731 में उन्होंने #कोल्लम (व्विलोन) राज्य पर चढ़ाई की। उसके बाद उन्होंने रुकने का नाम नहीं लिया। उन्होंने अपनी सेना बनाई और षड़यंत्रकारी नायरों को सत्ता से उखाड फेंका। 

✍अपनी बुद्धि और निडरता से उन्होंने बड़े कम समय में ही #कोल्लम, #कयमकुलम, #कोटाराकारा रियासतों पर विजय का परचम फहराया। साथ ही अन्य छोटी-छोटी रियासतों को मिलाकर उन्होंने अपना साम्राज्य बनाया, जो त्रावणकोर साम्राज्य कहलाया।

इन विजयों से न केवल उनके शासन क्षेत्र का विस्तार वाणिज्यिक फसलों विशेष रूप से काली मिर्च उत्पादक क्षेत्र उनके नियंत्रण में आ गए। उन दिनों काली मिर्च के व्यापार में बड़ी कमाई थी, इसलिए यूरोपीय कंपनियां अपनी सामरिक तथा नौसैनिक शक्ति के बल पर केरल की रियासतों 
(विशेष रूप से काली मिर्च उत्पादक क्षेत्र) के शासकों पर प्रभाव जमाती थी।

✍#डच_ईस्ट_इंडिया_कम्पनी- 17 वीं शताब्दी के आसपास भारत में व्यापार के लिए #पुर्तगालियों, अंग्रेजों की तरह डच
(नीदरलैण्डवासी) भी आए। 
डच लोगों ने 1605 में #डच_ईस्ट_इंडिया कम्पनी बनाई तथा धीरे-धीरे के रल के मालाबार तट तक आ पहुँचे तथा क्विलोन और कोच्चि पर कब्जा कर लिया।

✍ ये लोग मुख्य रूप से कालीमिर्च, चीनी तथा मसालों का व्यापार करते थे।समय के साथ इन्होंने पूरे एशिया में अपने पांव पसारना शुरु कर दिया और धीरे-धीरे श्रीलंका, केरल, बंगाल, बर्मा (म्यानमार) आर सूरत तक अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया। इनके साम्राज्य का मुख्य गढ़ श्रीलका तथा मालाबार थे।
#डच_ईस्ट_इंडिया कम्पनी ने कोचि बंदरगाह से मसालों विशेषकर कालीमिर्च के निर्यात पर लगभग एकाधिकार किया हुआ था।

✍#कोलाचेल_युद्ध- मार्तण्ड वर्मा से परास्त कई राजा और मुखिया डच कम्पनी के पास सहायता के लिए गए। 

डच कम्पनी पूर्व में उनकी न केवल मित्र बल्कि सहायक भी रही थी। इसी क्रम में कयमकुलम का राजा कम्पनी की शरण में पहुँचा तो डचो ने मार्तण्ड वर्मा को चेतावनी दी कि या तो वह जीती हुई रियासतों को वापस कर दे अन्यथा युद्ध के लिए तैयार हो जाए।

✍सीलोन (श्रीलंका) के गवर्नर #गुस्ताफ_विलेम को लगा कि वह युद्ध की धमकी से उन्हें डरा देंगे। किंतु राजा मार्तण्ड ने बिना डरे, बड़े साहस के साथ उल्टा उन्हें चेता दिया। 

✍उन्होंने कहा हम किसी से नहीं डरते। अगर डच सेना हम पर हमला करती है तो वह अपनी हार के लिए तैयार रहे।
उन्होंने यह भी कहलवाया कि बाहरी लोगों को हमारे निजी मामलों में दखल देने का कोई हक नहीं है। अगर वे ऐसा करते हैं तो हम भी युद्घ की स्थिति में हॉलैण्ड पर अपने मछुआरों की मदद से हमला करवा सकते हैं।

✍डच सेना को विश्वास था कि वे आसानी से राजा मार्तण्ड को हरा देंगे। 
अतः उन्होंने मार्तण्ड को ललकारने के राजकुमारी #इलायादथु स्वरूप को कोट्टाराकारा का शासक नियुक्त कर दिया तथा कोट्टाराकारा और डच सेना ने मिलकर राजा मार्तण्ड वर्मा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 

✍इस युद्ध में डच सेना ने कमांडर #डी_लेननोय के नेतृत्व में कोलाचेल 
(आज की कन्याकुमारी ) को अपना ठिकाना बनाया, जो कि त्रावणकोर की राजधानी। 
पद्मनाभपुरम से मात्र 13 किमी दूर था। डच सेना में सीलोन तथा अन्य स्थानों से लाए गए 400 समुद्री जहाज, तोपे तथा आधुनिक हथियारों से लैस लगभग 50000 सैनिक थे। 
लेकिन मार्तण्ड वर्मा ने अपने 10,000 सैनिकों के साथ डच सेना पर जबर्दस्त हमला करके उनके हथियारों के गोदाम को उड़ा दिया। इसके बाद यूरोप की सबसे ताकतवर कम्पनी की सेना ने भारत के एक छोटे राज्य के सामने घुटने टेक दिए। दोनों की संयुक्त सेना को #त्रावणकोर सेना से बहुत बुरी तरह से मुँह की खानी पड़ी।

✍इस युद्ध में लगभग 11000 डच सैनिक बंदी बनाए गए जिसमें कमांडर तथा उप कमांडर भी शामिल थे। इसके अलावा डच सेना को कोचीन तक खदेड़ दिया गया और डचों के कब्जे वाले सारे किलों तथा इलाकों को अपने अधीन कर लिया।

✍#कोलाचेल में उनकी विजय का एक बड़ा कारण था, वहाँ के स्थानीय मछुआरों ने इस लड़ाई में डचों के प्रलोभनों को ठुकरा, अपने राजा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध किया।

✍राजा ने कोलाचल में विजय स्तम्भ लगवाया, जहां बाद में भारत सरकार ने भी शिला-पट्ट लगवाया। केरल और तमिलनाडू के बचे खुचे डचों को पकड़कर राजा मार्तण्ड वर्मा ने 1753 में उनको एक और सन्धि करने पर विवश किया जिसे "#मवेलिक्कारा_की_संधि" कहा जाता है। 

✍इस संधि के अनुसार डचों को इंडोनेशिया से शक्कर लाने और काली मिर्च का व्यवसाय करने की इजाजत दी गई और बदले में डच लोग राजा को यूरोप से उन्नत किस्म के हथियार और गोला-बारूद लाकर देंगे।

✍1753 में इस संधि के बाद मार्तण्डवर्मा ने अम्बालपुझा, कोट्टायम, मीनचिल तथा चंगनसेरी के राजाओं को हरा त्रावणकोर साम्राज्य में मिला लिया। इसी वर्ष कोची राज्य की जागीरदारी रियासतों करपुक्कम तथा अलंगड तथा 1755 में कोझीकोड को परास्त कर अपने साम्राज्य में मिलाया।

✍#सैन्य_सुधार- राजा मार्तण्ड वर्मा ने इतनी बड़ी जीत के बाद भी डच कमांडर दी #लेननोय तथा उप कमांडर #डोरदी की
हत्या नहीं की। बल्कि उनको त्रावणकोर

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(जो विशेष बात है उसके बाद निरंतर पढे)
#विशेष_बात- 1757 में अपनी मृत्यु से पूर्व दूरदर्शी राजा ने अपने पुत्र #राजकुमार_राम वर्मा को लिखा था-" जो मैंने डचों के साथ किया वही बंगाल के नवाब को अंग्रेजों के साथ करना चाहिए। उनको बंगाल की खाड़ी में युद्ध करके पराजित करें, अन्यथा एक दिन बंगाल और फिर पूरे हिन्दुस्थान पर अंग्रेजों का कब्जा हो जाएगा।

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की सेना को प्रशिक्षण दे आधुनिक बनाने की जिम्मेदारी दी। इस तरह नायर सेना आधुनिक युद्ध कला में निपुण हुई।

✍तत्कालीन शासन के शक्ति केन्द्र बने नायर जमींदारों-लड़ाकों के स्थान पर 50,000 सैनिकों वाली मजबूत सेना तथा नौसेना का गठन किया गया । सेना को आधुनिक हथियार बन्दूक-तोपें दी गई तथा सैनिकों के प्रशिक्षण के लिए यूरोपीय
विशेषज्ञों की सहायता ली गई। सेना में अश्वरोही सेना की ट्रकड़ियाँ भी थी । अरब सागर की ओर मुँह किए हुए पूरे सागर तट पुरक्कड़ (#कोजीकोड) से कन्याकुमारी तक बनाकर तोपें स्थापित की।

✍#प्रशासनिक_सुधार- 

मार्तण्ड वर्मा ने वित्त, व्यापार तथा सेना के लिए अलग-अलग प्रमुखों की नियुक्ति की तथा उनके नीचे व्यवस्थित प्रशासन का ढाचा बनाया। उन्होंने मालाबार तट से होने वाले समुद्री व्यापार पर अपनी पकड़ मजबूत बनाई। काली मिर्च के व्यापार पर नियंत्रण के लिए इसे शासन के अधीन बना, व्यापार के लिए लाइसेंस प्रणाली बनाई गई।

✍#कृषि_सुधार- कृषि विकास के लिए जल संचयन तथा सिंचाई परियोजनाएं बनाई गई। सरकारी कर व्यवस्था में सुधार कर नई कृषि भूमि तथा नए पेड़ लगाने पर कर माफी का प्रावधान किया गया। इससे न केवल खाद्यान्न उत्पादन बल्कि वाणिज्यिक फसलों (मुख्य रूप से मसाले कालीमिर्च)
के उत्पादन में वृद्धि हुई।

✍#धर्म_कला_एवं_संस्कृति- 
मार्तण्ड वर्मा के शासन विस्तार होने के साथ ही राज्य की राजधानी शिक्षा, कला,संस्कृति तथा धार्मिक गतिविधियों का केन्द्र बना ।

✍अन्य राज्यों/रियासतों के कला साधक (नृत्य, गायन इत्यादि) त्रावणकोर
साम्राज्य की शोभा बढ़ाने लगे तथा शासन के प्रोत्साहन तथा संरक्षण में फले फूले। उन्होंने #पद्मनाभस्वामी_मंदिर की दान भूमि से आय के उचित प्रबंध किए, ट्रस्टियों के
प्रभाव को कम करके मंदिर की व्यवस्थाओं में सुधार किया।

✍#तिरूअनन्तपुरम का प्रसिद्ध पद्मनाभस्वामी मंदिर राजा मार्तण्ड वर्मा ने बनवाया और अपनी सारी सम्पत्ति मंदिर
को दान करके स्वयं भगवान विष्णु के दास बन शासन किया। इस मंदिर के 5 तहखाने कुछ वर्ष पूर्व खोले गए थे, जिनमें बेशुमार सम्पत्ति (लाखों करोड़ का अनुमान) मिली। इससे पता लगता है कि उस काल में त्रावणकोर साम्राज्य कितना सम्पन्न था।

✍अपनी दूरदर्शिता से उन्होंने मृत्यु पर्यन्त पूरे 29 वर्ष तक शासन किया और 7 जुलाई 1758 को अपने उत्तराधिकारी को एक सुरक्षित शासन सौंपकर गए।

✍यह दूख की बात है कि महान राजा मार्तण्ड वर्मा और कोलाचेल के युद्ध को राज्य या #एनसीईआरटी की इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में कोई जगह नहीं मिली, जिससे नई पीढ़ी भारत के गौरवशाली इतिहास से आज भी अनभिज्ञ है।

आप से भी विशेष प्रार्थना है की इसे जरुर शेयर करे।

✍आज बड़ी #विडंबना है कि भारत को लूटने वाले #अंग्रेजों का व इनको तोडने वाले मुगलो का #इतिहास #पढ़ाया जाता है पर देश का असली इतिहास कही दुष्टो शक्तियो की वज़ह से दबा पडा है।
साभार - 
#We_support_hindutava_unity

वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Wednesday, 17 September 2025

नरेंद्र दामोदर दास मोदी.. एक प्रेरक व्यक्तित्व

कोई व्यक्ति कहीं से आ गया
और प्रधानमंत्री बन गया...
नहीं, ऐसा नहीं होता है।

आप
नरेंद्र दामोदर दास मोदी
के आलोचक हैं 
या प्रशंसक हैं..

ये बात जान लेनी चाहिए कि,
इस व्यक्ति ने संघर्ष किया है,
कड़ा संघर्ष,भीषण संघर्ष।

इतना Effortlessly किया है..
कि उन्हें खुद कभी इसका भान ही नहीं हुआ।

बात तब की है,
जब वो 21 वर्ष के थे।
2 वर्ष हिमालय में बिता कर आ चुके थे,
1-2 दिन घर में रहे और फिर घर छोड़ दिया।

अहमदाबाद आकर चाचा के पास रहने लगे।
गीता मंदिर स्टेट ट्रांसपोर्ट्स बस अड्डे पर,
उनके चाचा कैंटीन चलाते थे।

नरेंद्र मोदी किशोरावस्था में RSS में सक्रिय रहे थे,
ऐसे में अहमदाबाद में भी उन्होंने संघ से संपर्क पुनः जोड़ा।

इसी दौरान प्रान्त प्रचाकर लक्ष्मणराव ईमानदार (वकील साहब) से उनकी मुलाकात हुई।उसी दौरान एक सत्याग्रह में गिरफ्तार होकर जेल भी गए।

नरेंद्र मोदी ने चाचा के घर रहना छोड़ दिया
और वकील साहब के घर रहने लगे।

सोचिए,
एक 22 साल का लड़का वकील साहब के घर पर रहने गया, जहाँ एक दर्जन से अधिक लोग पहले से ही रह रहे थे।
वो लड़का सुबह उठ कर सबको जगाता था।
सबके लिए चाय बनाता था।
चाय पिलाता था। सारे बर्तन धोता था।
फिर शाखा जाता था।
शाखा से वापस आकर सबके लिए नाश्ता तैयार करता था।

सुबह के 9 बजे तक सबको नाश्ता करा देता था।
इतना ही नहीं, फिर वो 8-9 कमरों वाली इमारत की सफाई करता था, झाड़ू-पोछा सब।

दोपहर का भोजन किसी स्वयंसेवक के घर जाकर खाता था।फिर वापस आकर सबको चाय पिलाता था। और तो और, वकील साहब के कपड़े भी धोता था,उनके मना करने के बावजूद।

ये वकील साहब हैदराबाद में निज़ाम के खिलाफ सत्याग्रह में 7 वर्ष जेल की सज़ा काट चुके थे।
उनकी कहानी भी ऐसे ही संघर्षों से भरी है।

कहने का मतलब ये है,
कि लोग आज कह देते हैं कि अरे नरेंद्र मोदी क्या है,
एक नेता है।

नरेंद्र मोदी असल में एक पूरा का पूरा मिशन है।
अपने-आप में एक संस्था है।

आप सोचिए,आज आपको कहीं पूरी इमारत में झाड़ू-पोछा लगाने कहा जाए और रोज 12 लोगों को खाना-चाय वगैरह बना कर देने और बर्तन धोने को कहा जाए, वो भी बिना कोई पैसे के, आप करेंगे?सही बात है, कोई क्यों करेगा?

यही फ़र्क है हम-आप और नरेंद्र मोदी में।

नरेंद्र मोदी ने किया।
बिना किसी के कहे किया।
बिना किसी शर्म के किया,
पूरे एक वर्ष तक इस दिनचर्या का कड़ाई से अनुसरण किया। बदले में कुछ नहीं लिया, लेकिन किया।

आज वो Narendra Modi हैं, लेकिन ये सफर कोई अस्सी-नब्बे के दशक में शुरू नहीं हुआ था।

बचपन से ही उन्होंने रास्ते तलाशने शुरू कर दिए थे।

तभी 1950 से आज तक करोड़ों लोगों ने जन्म लिया और करोड़ों स्वर्ग सिधार गए, लेकिन ये व्यक्ति लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने जा रहा है।

नरेंद्र मोदी के जीवन से हमें प्रेरणा लेनी चाहिए।

आज जब 21-22 वर्ष के युवकों में कोई पढ़ाई-लिखाई को लेकर तनाव में होता है,कोई अवसाद में चला जाता है, कोई सोशल मीडिया पर दिन-रात लगा रहता है,कोई अय्याशी में लगा रहता है,कोई नेता बनने के लिए विधायक-मंत्रियों के साथ तस्वीरें क्लिक करवाने की फिराक में रहता है,कोई इस उम्र में भी लाखों कमाने लगता है - सबका जीवन है,
सबके किस्से हैं..

लेकिन जो @narendramodi_in ने उस उम्र में किया वो बहुत कम लोग करते हैं।

इसके लिए हार्वर्ड-कैम्ब्रिज-ऑक्सफ़ोर्ड की डिग्री नहीं, अंग्रेजी का ज्ञान नहीं, बल्कि अनुभव और अध्ययन चाहिए।

मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि नरेंद्र मोदी कोई कलाकार, खिलाड़ी,लेखक या संन्यासी होते तो क्या होता?

निश्चित ही देश का बहुत बड़ा नुकसान हो जाता,क्योंकि हमेशा कुछ नया सोचने वाला और बाकियों से 4 कदम आगे रहने वाले व्यक्ति देश का नेतृत्व मिलना ही चाहिए था।

बचपन में भी उनकी माँ ने घूमते-फिरते आ पहुँचे एक साधु को अपने बेटों में से 2 की कुंडली दिखाई थी तो साधु ने नरेंद्र की कुंडली देखते ही अवाक् होकर पूछा कि ये किसकी पत्री है? फिर स्पष्ट कहा कि या तो ये कोई महान संन्यासी होगा या फिर एक चक्रवर्ती सम्राट।

महान संन्यासी या सम्राट तो नहीं,
लेकिन परिवार वालों को ये पक्का लग रहा था कि ये साधु बन जाएगा। एक दिन वो लड़का झोला उठा कर निकल भी गया।
पास में एक पैसा नहीं।
राजकोट के रामकृष्ण मिशन से लेकर हिमालय तक की यात्रा की,2 साल ऐसे ही घूमते-फिरते रहा और फिर घर लौट आया।फिर घर से निकला तो आज तक घर नहीं गया।

संघ में और फिर भाजपा में संगठन का काम करते-करते साधु पीछे छूटता चला गया और राजा के गुण अधिक उभर कर सामने आने लगे। 

अगर वो खिलाड़ी होता तो?वडनगर में एक बार कबड्डी की प्रतियोगिता हुई। टीमें थी 'कुमार शाला नंबर 1' और 'कुमार शाला नंबर 2'। पहली टीम में नरेंद्र मोदी और अन्य छोटे खिलाड़ी थे। दूसरी टीम में बड़े खिलाड़ी। इसके कैप्टेन थे उमेद जी, जो कबड्डी के माहिर खिलाड़ी थे।

वो दाईं ओर से एंट्री लेते थे और फिर उन्हें कोई रोक नहीं पाता था। नरेंद्र मोदी ने एकाध बार उनको खेलते देखा, बहुत बारीकी से देखा। फिर ऐसी व्यूह-रचना की कि उनकी टीम को 3 बार हराया। सब चौंक गए। शिक्षक कनुभाई भावसार भी बोल पड़े कि बल के आगे बुद्धि, संगठन क्षमता और चपलता ने अपना काम कर दिखाया।

एक लेखक के रूप में उन्होंने अपने मार्गदर्शन 'वकील साहब' की जीवनी लिखी।
इतना ही नहीं, उन्होंने 'ज्योतिपुंज' नामक पुस्तक के जरिए RSS के उन नेताओं से जनता का परिचय कराया, जो निःस्वार्थ भाव से देशसेवा में लगे थे और जिनके बारे में बहुत कम लोगों को पता था।

आपातकाल के दौर को लेकर जो सबसे अच्छी पुस्तकें हैं, उनमें उनकी 'आपातकाल में गुजरात' भी है जिसे उन्होंने अपने अनुभवों से लिखा है।गुजरात के विकास पर उन्होंने पुस्तकें लिखीं।

प्रधानमंत्री बनने के बाद बच्चों के लिए 'Exam Warriors' लिखी। उनकी कविताएँ भी प्रकाशित हुई हैं। अगर व फुल टाइम लेखक होते तो ज़रूर लोकप्रिय होते ही होते।

वो अगर फ़िल्मी दुनिया में होते तो वहाँ भी सफल होते क्योंकि बचपन में वो खुद नाटक लिखा करते थे,उसका मंचन भी करते थे और निर्देशन भी। उन्होंने भेदभाव की समस्या को दिखाने के लिए 'पीला फूल' नामक एक नाटक का मंचन किया था,जिसने सबको भावुक कर दिया।

हाईस्कूल में जब दीवार बनवाने की ज़रूरत थी,
तब नरेंद्र 'जोगी दास खुमाण' नामक नाटक का मंचन किया और इसमें भावनगर के महाराजा की भूमिका निभाई।
इससे जो पैसे आए उससे दीवार बनी।

नरेंद्र मोदी अगर आज @PMOIndia बने हैं तो इसके पीछे का यही राज़ है - किसी भी क्षेत्र में कोई भी काम करो, एकदम बारीकी से चीजों को समझ कर करो,
निःस्वार्थ भाव से करो।

उन्होंने कभी पैसे की चाहत नहीं की,धन के पीछे नहीं भागे।

उन्होंने आदमी को पढ़ा है,अपने संघर्षों के दौरान हजारों लोगों को पढ़ा है, इस अनुभव से सीख ली है।

आज अमेरिका से लेकर UN तक इस व्यक्ति का लोहा मानता है, जिसके पीछे एक कलाकार, एक खिलाड़ी और एक साधु आज तक छिपा हुआ है।

उसके आप प्रशंसक हैं या आलोचक
वो व्यक्ति आज आपके हमारे भारत का सफलतम प्रधानसेक है,आप आलोचक भी हैं,तो भी उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं, मैं एक विद्यार्थी हूं और मैं उनसे और उनके जैसे हर संघर्षील व्यक्ति से बहुत कुछ सीखता हूं,उनमें से कोई कुछ बन चुका है,कोई बनने की क्रिया में है..

आज इस संघर्षशील व्यक्ति
को मेरे जैसे असंख्य युवाओं की ओर से
अनेकों अनेक मंगलकामनाएं🙏🏻

महादेव और योगेश्वर आपका यूं ही मार्गदर्शन करते रहें और आपके द्वारा भारत का उत्थान यूं ही होता रहे🙏🏻
🚩🚩🚩🚩
साभार- कृतिका राजपूत