नियम के अनुसार तर्पण करना चाहिए जिसमें 21 पीढ़ी तक का तर्पण हो करके गुरु इष्ट मित्र तथा आत्मीय संबंधित जनों का तर्पण भी हो जाता है। ऐसी दिव्यतम व्यवस्था केवल मेरे सनातन धर्म में ही अन्य किसी धर्म में नहीं।
तर्पण में मुख्यतः चांदी के पात्र हो तो बहुत ही अच्छी उत्तम है अभाव में पीतल अथवा ताम्रपत्र भी ले सकते हैं कुशा कच्चा दूध काले तिल सफेद पुष्प पितरों की प्रसन्नता के लिए अनिवार्य है इसके साथ ही उन्हें नैवेद्य में मधु तथा द्राक्षा (दाख) भी प्रिय है।
आज की आपाधापी में नित्य तर्पण कई लोग नहीं कर पाते हैं उनके लिए लघु तर्पण देने का प्रयास कर रहा हूं लेकिन यह केवल मानसिक संतोष ही प्रदान करेगा कि हमने तर्पण कर लिया है हालांकि इसका फल भी मिलता है लेकिन पूर्णरूपेण नहीं।
#तर्पण_में_सभी_का_अधिकार_है।
जिनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ है, वे देव तर्पण में दाहिनी ओर ऋषि तर्पण में कंठी अर्थात माला की तरह और पितृ तर्पण में बांयी ओर जनेऊ करके तर्पण करें।
जिनका जनेऊ नहीं हुआ है वे अंगोछा या गमछे को इसी तरह रख कर के तर्पण करें।
तर्पण से पहले दक्षिण में तिल का आसन देकर तिल के तेल का दीपक पितरों के निमित्त प्रज्वलित करें शालिग्राम को विराजमान करके चन्दन का तिलक करके जौ व तुलसी दल अर्पण करें।
देवता के
तर्पण में पूर्व की ओर मुख करके दोनों हाथों में जल भरकर पात्र में पूर्वाभिमुख होकर " इन मंत्रों से तर्पण करते हुए देवताओं को एक बार जलाअंजलि अर्पित करें"
#ॐ_भू:_देवान_तर्पयामि
#ॐ_भुवः_देवान_तर्पयामि
#ॐ_स्व:_देवान_तर्पयामि
#ॐ_भूर्भुवः_स्व:_देवान_तर्पयामि
इन चारों मंत्रों को बोलते हुए एक-एक अंजली जल देवताओं के प्रति सामने की ओर सीधे छोड़ना चाहिए।
#ऋषितर्पण
ऋषि तर्पण उत्तर की ओर मुख करके अंजलि के बीच में से दो दो बार मंत्र बोलते हुए जल अर्पण करें।
#ॐ_भू:_ऋषिन_तर्पयामि
#ॐ_भुवः=ऋषिन_तर्पयामि
#ॐ_स्व:=ऋषिन_तर्पयामि
#ॐ_भूर्भुवःस्व:_ऋषिनतर्पयामि
यह मंत्र बोलते हुए ऋषि तर्पण संपूर्ण करें उसके बाद #पितरों के तर्पण के लिए दक्षिण की ओर मुंह करके पितृ तीर्थ अर्थात दाहिने हाथ के अंगूठे से जल की धारा गिराए एक एक मंत्र को तीन बार बोलते हुए तीनों बार जल अर्पित करें।
#ॐ भू: पितृन तर्पयामि
#ॐ भुवः पितृन तर्पयामि
#ॐ स्व: पितृन तर्पयामि
#ॐ भूर्भुवः स्व:पितृन तर्पयामि
#ॐ भू: पितामहेभ्य: तर्पयामि
#ॐ भुवः पितामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ स्व: पितामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ भूर्भुवः स्व: पितामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ भू: प्रपितामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ भुवः प्रपितामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ स्व: प्रपितामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ भू: मातृभ्यः तर्पयामि
#ॐ भुवः मातृभ्यः तर्पयामि
#ॐ स्व: मातृभ्यः तर्पयामि
#ॐ भूर्भुवः स्व: मातृभ्यः तर्पयामि
#ॐ भू: मातामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ भुवः मातामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ स्व: मातामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ भूर्भुवः स्व: मातामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ भू: प्रमातामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ भुवः प्रमातामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ स्व: प्रमातामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ भूर्भुवः स्व: प्रमातामहेभ्य तर्पयामि।।
इतना तर्पण करने के बाद गाय स्वान अर्थात कुत्ता चींटी कौवा और अतिथि इनके लिए भोजन निकालें तथा ब्राह्मण भोजन करवाएं।
नियम से तर्पण योग्य ब्राह्मण के सानिध्य में होना चाहिए जलाशय पर होना चाहिए लेकिन महानगरों में तथा सेवारत व्यक्तियों के लिए यह सब संभव नहीं है इसलिए यह लघु प्रयोग दिया गया है लेकिन प्रयास कीजिए कि जहां तक संभव हो सके संपूर्ण तर्पण ही हो।
चित्र -साभार गूगल
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