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Thursday, 11 September 2025

स्वामी दयानन्द जीवन भर श्राद्ध करने का उपदेश देते रहे थे..

स्वामी दयानन्द जीवन भर श्राद्ध करने का उपदेश देते रहे थे, किन्तु जीवन के अंतिम चरण में, संभवतः ईसाइयों के प्रभाव में आकर उन्होंने कुछ समय के लिए इसे मानना बन्द कर दिया था। अन्य मतों की भाँति स्वामी जी ने श्राद्ध पर भी अपना मत बदला था। तथापि, स्वामी दयानन्द की लिखी पुस्तक "संस्कार-विधि" में मृतक पितरों को दिये जाने वाले अन्न एवं तर्पण आदि विधानों की सिद्धि होती है। हो सकता है कि, बाद में वे पुनः श्राद्ध को मानने लगे हों, किन्तु आर्यसमाजियों ने इसमें स्वामी जी की बेइज्जती समझकर उनकी पुस्तकों में प्रक्षेप करके यह मत प्रचारित किया कि स्वामी जी श्राद्ध के विरोधी थे। इस लेख में स्वामी जी की "संस्कार-विधि" पुस्तक से ही मृतक पितरों एवं श्राद्ध की सिद्धि की गयी है, साथ ही विषयगत आर्ष-ग्रन्थों के प्रमाण भी दिये गये हैं। इस लेख को आर्यसमाजियों तक अवश्य पहुँचाएँ। हो सकता है कि किसी एक की बुद्धि में सुधार आये और उसका कल्याण हो सके।

 'संस्कार-विधि' के "समावर्तनप्रकरण" में स्वामी दयानन्द लिखते हैं - "इस मंत्र से स्पर्श करके हाथ में जल लें, अपसव्य हों और दक्षिण की ओर मुख करके 'ॐ पितरः शुन्धध्वम्' इस मंत्र से जल को भूमि पर छोड़ दें। (चित्र संख्या १ देखें)"

(१)अगर यहाँ स्वामी दयानन्द को जीवित पितर इष्ट होते, तो उन जीवित पितरों के शरीर पर ही जल फेंकते। मंत्र पढ़कर पितरों के नाम से जल को भूमि पर छोड़ना सिद्ध करता है कि स्वामी जी को मृतक पितर ही अभीष्ट हैं।

(२)यहाँ पर "पितरः" यह बहुवचन है, अर्थात् बहुत से पितरों की बात है। फिर अंजलि-भर जल से आर्यसमाजियों के बहुत सारे जीवित पितर कैसे शुद्ध हो सकते हैं? अतः स्वामी जी को मृतक पितर ही अभीष्ट हैं।

(३)स्वामी दयानन्द इस जल को भूमि पर छोड़ते समय अपसव्य यज्ञोपवीत के बायें करने (दाहिने कंधे पर करने) का आदेश देते हैं। भला जीवित पितरों को शुद्ध करने के लिए अपसव्य की क्या आवश्यकता है? अतः स्वामी जी को मृतक पितर ही अभीष्ट हैं।

(४) स्वामी जी यह कार्य दक्षिणाभिमुख होकर करने की बात कहते हैं। क्या आर्यसमाजियों के सभी जीवित पितर दक्षिण दिशा में खाट बिछाए बैठे हैं? क्या वे किसी अन्य दिशा में नहीं जाते?

स्वामी जी ने 'ॐ पितरः शुन्धध्वम्' मंत्र का अर्थ यजुर्वेद भाष्य में किया है - "हे विद्वानों, आप लोग शुद्ध होकर हमें शुद्ध कीजिये।" तब प्रश्न उठता है कि - "यह अपसव्य करके, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, एक अंजलि-भर जल भूमि पर डालकर, आर्यसमाजी भूमि को शुद्ध कर रहे हैं अथवा अपने जीवित पितरों को?" 

आर्यसमाजी इन प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करें, अन्यथा स्वामी दयानन्द के कथन से मृतक पितरों की सिद्धि होती है। वे भी वैदिक धर्मी होकर श्राद्ध किया करे।

इसके उत्तर में आर्यसमाजी यदि कहें कि 'पितृ' शब्द से जल, अग्नि या सूर्य की किरणों का ग्रहण है, तब वे बताएँ कि एक अंजलि जल भूमि पर डालने से इनको क्या लाभ? यज्ञोपवीत दाहिने कंधे पर करने और दक्षिण की ओर मुख करने का क्या तात्पर्य है? यहाँ स्वामी जी ने "शुद्ध" करने की बात कही, तो क्या ये सूर्य, अग्नि, जल आदि पहले अशुद्ध थे और आपके जल छिड़कने से शुद्ध हो गये?

अतः स्पष्ट है कि जिन मृतक तथा दिव्य पितरों का शास्त्रानुसार दक्षिण दिशा से सम्बन्ध है, और अपसव्य (यज्ञोपवीत दायें-बायें) करने का निर्देश है, जिससे कि वे सूक्ष्म होने से खिंचे आते हैं और सूक्ष्मतावश थोड़े से ही जल से जिनका संस्कार व तर्पण हो जाता है, यहाँ उन पितरों का ही ग्रहण सिद्ध होता है।

गोभिलगृह्यसूत्र में कहा गया है - "सव्यं बाहुमुद्धृत्य शिरोऽवधाय दक्षिणान्से प्रतिष्ठापयति, सव्यं कक्षमन्ववलम्बं भवति, एवं प्राचीनावीती भवति (१।२।३)।" यह प्राचीनावीती (अपसव्य) की परिभाषा है। आगे कहा है - "पितृयज्ञे त्वेव प्राचीनावीती भवति (१।२।४)।" यहाँ पितरों के कार्य में यज्ञोपवीत अपसव्य करना पड़ता है। और श्राद्धप्रकरण में 'पितृ' शब्द मृत पितरों का वाचक है।

 त्रे॒धा भा॒गो निहि॑तो॒ यः पु॒रा वो॑ दे॒वानां॑ पितॄ॒णां मर्त्या॑नाम्। (अथर्ववेद ११।१।१५) में पितरों, देवताओं और मनुष्यों को 'त्रेधा' शब्द से तीन बताकर भिन्न-भिन्न सिद्ध किया है। इस अथर्ववेद के प्रमाण से पितर जीवित मनुष्यों से भिन्न सिद्ध होते हैं।

'दे॒वकृ॑त॒स्यैन॑सोऽव॒यज॑नमसि मनु॒ष्यकृत॒स्यैन॑सोऽव॒यज॑नमसि पि॒तृकृ॑त॒स्यैन॑सोऽव॒यज॑नमसि (यजुर्वेद ८।१३) तथा वशेदं सर्वमभवद्देवा मनुष्या३ असुराः पितर ऋषयः (अथर्ववेद १०।१०।२६) यहाँ भी मनुष्यों और पितरों का भेद स्पष्ट है।

मनुस्मृति में भी प्रमाण है - पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनम्। (मनु. १२।९४) तथा पितरश्वैव साध्याश्च द्वितीया सात्त्विकी गतिः। (मनुस्मृति १२।४९) (अर्थात् पितर तथा साध्य यह सत्त्वगुण से उत्पन्न गति बतायी गयी है। ये मनुष्यों से सर्वथा भिन्न सिद्ध होते हैं।)

"तानि वा एतानि चत्वारि अम्भासि देवा, मनुष्याः, पितरोऽसुराः" (तैत्तिरीय ब्राह्मण २।३।८) इन स्थलों में देवता, मनुष्य और पितर तीनों को भिन्न माना गया है।

स्वामी दयानन्द भी संस्कार-विधि के 'पितृयज्ञ' में "पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः" कहकर पितरों को स्वधा-योग्य और शालाकर्मविधि में "देवेभ्यः स्वाहा" देवताओं को स्वाहा-योग्य बताकर देव, पितर और मनुष्य का भेद स्पष्ट कर देते हैं।

"अथैनं पितरः प्राचीनावीतिनः सव्यं जानु आच्य उपासीदति" (शतपथ २।४।२।२) आदि प्रमाणों से मृतक पितृकर्म का प्राचीनावीती (अपसव्य) होकर करने का विधान है।

आपस्तम्ब गृह्यसूत्र का भी प्रमाण है - "अपरपक्षे पित्र्याणि प्राचीनावीतिना" (१।१।७।८), आश्वलायन श्रौतसूत्र - "तेषां दक्षिणत उत्तानाङ्गुलीः करोति, प्राचीनावीती तूष्णीम्- 'स्वधा पितृभ्यः' इति वा" (२।३), वैखानसगृह्यसूत्र में - "प्राचीनावीती पित्र्याणि करोति" (१।४)। यहाँ प्राचीनावीती का लक्षण है - "दक्षिणहस्तमुद्धृत्य उपवीतं धारयेद्-इति उपवीती। वामभुजुद्धृत्य प्राचीनावीती। कंठसक्ते निवीती भवति" (वैखानस गृह्य १।५), मनुस्मृति में - "सव्ये प्राचीनावीती" (२।६) तथा कौशम् सौत्रम् - पितृभ्यः (बोधायनधर्मसूत्र १।८।५-६)।

यदि पितर और मनुष्य आदि भिन्न योनि के न होते, तो "निवीतं मनुष्याणाम्, प्राचीनावीतं पितृणाम्, उपवीतं देवानाम्" (मीमांसादर्शन ३।४।१) उनकी क्रियाओं में भेद नहीं होता।

अतः उपरोक्त समस्त प्रमाणों से पितृकर्म में प्राचीनावीतिता के विधान से पितर, मनुष्यों से भिन्न सिद्ध होते हैं। मृतक ही इस लोक से पितृलोक में जाकर भिन्न योनि प्राप्त करते हैं, पितर कहे जाते हैं। मीमांसा शाबर ३।४।७ एवं ३।४।९ में यह निर्दिष्ट है। तथा "उपवीतं लिंगदर्शनात्" इस मीमांसा सूत्र में प्राप्त वृत्तिकार के सूत्र के वार्तिक में 'मृताग्निहोत्रे हि पितृदेवत्ये श्रूयते, प्राचीनावीती दोहयते, यज्ञोपवीती देवेभ्यो दोहयते' यहाँ पितृदेव सम्बन्धी कर्म में 'मृत' शब्द प्रत्यक्ष दिखायी देता है।

सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम संस्करण में स्वामी दयानन्द ने कहा है - "देवकर्मों को उपवीती होकर करें, पूर्व दिशा की ओर मुख करके देव-तर्पण करें। दक्षिण की ओर मुख करके प्राचीनावीती और पितृतीर्थ से पितृकर्म, तर्पण और श्राद्ध करना चाहिए। देव-तर्पण में एक बार एक मंत्र पढ़कर एक अंजलि दें और पितृ-तर्पण में एक बार मंत्र पढ़कर एक अंजलि दें, दूसरी बार मंत्र पढ़कर दूसरी अंजलि दें आदि।" (चित्र संख्या २ देखें)

अतः स्वामी दयानन्द के कथन और शास्त्र वाक्यों से मृतक पितृकर्म में अपसव्य और दक्षिणामुख होकर करना सिद्ध है। स्वामी दयानन्द ने भी संस्कार-विधि में वह मृतक पितरों के लिए लिखा है, यह अधिक स्पष्ट हुआ। क्योंकि जीवित पितरों के लिए तो यह सब कुछ व्यर्थ ही सिद्ध होता है एवं न ही उनके लिए यहाँ स्वामी जी द्वारा कराया ही जा रहा हैं।

संस्कार-विधि के 'नामकरण-संस्कार' में स्वामी दयानन्द लिखते हैं - "जिस तिथि और नक्षत्र में बालक का जन्म हो, उस तिथि और उस नक्षत्र के नाम से तथा उस तिथि के देवता के नाम से घृत की आहुति अग्नि में दें।" इसी पृष्ठ की टिप्पणी में अमावस्या तिथि के तथा मघा नक्षत्र के देवता 'पितर' बताये गये हैं। (देखें चित्र संख्या ३)

अब आर्यसमाजी बताएँ कि ये जो तिथि और नक्षत्र के देवता पितर हैं, वे जीवित हैं या मृत? यदि कहें कि मृत, तो अग्नि में आहुति देने से मृतक-श्राद्ध सिद्ध हो गया। अगर कहें कि 'ये जीवित पितर हैं', तब उनका अमावस्या तिथि और मघा नक्षत्र के साथ क्या सम्बन्ध है? क्या आर्यसमाजियों के ये जीवित पितर अन्य तिथियों में कहीं और चले जाते हैं? यदि नहीं, तो फिर ये अन्य तिथियों के भी देवता क्यों नहीं माने गये? यज्ञ में घी की आहुति देने पर ये जीवित पितर कैसे तृप्त होंगे? यदि जीवित पितर ही यहाँ पर इष्ट थे, तो अग्नि में आहुति क्यों? सीधे कुप्पी लगाकर अपने जीवित पितरों के मुँह में घी उड़ेल देते? और ऐसा करते समय मंत्र-पाठ की क्या आवश्यकता है? इस कर्म का कारण और फल क्या है? ये वे प्रश्न हैं, जिनके सीधे उत्तर आर्यसमाजियों से देना सम्भव नहीं हो सकता।

कुछ आर्यसमाजी इज्जत बचाने के लिए कह देते हैं कि यहाँ ऋतुओं को पितर कहा गया है। अगर ऐसा मानें, तो भी उन्हें उत्तर देना चाहिए कि तब इसका क्या फल है? ऋतुएँ अमावस्या की देवता कैसे हैं? क्या अन्य तिथियों में ऋतुएँ नहीं होतीं? क्या ऋतुएँ आपके दिये हुए घी को खाएँगी? मंत्र-पाठ से क्या ऋतुएँ आ जाएँगी? कितना भी प्रयास कर लें, तर्कप्रधान बनने वाले आर्यसमाजी यहाँ जीवित पितर सिद्ध नहीं कर सकते।

इसलिए समाजी वेद को माने, अथर्ववेद में, -- "ये च॑ जी॒वा येच॑ मृ॒ता ये जा॒ता ये च॑ य॒ज्ञियाः॑। तेभ्यो॑ घृ॒तस्य॑ कु॒ल्यैतु॒ मधु॑धाराव्युन्द॒ती (१८।४।५७) में मृत पितरों के नाम से घृत-प्रवाह डालने से उनकी तृप्ति लिखी है।

संस्कार-विधि पुस्तक के ही गृहाश्रम प्रकरण में, स्वामी दयानन्द पितृयज्ञ की बलिवैश्वदेवविधि में, पूर्व दिशा में इन्द्र के नाम से घी-मिश्रित भात या जो कुछ भी पूरी, हलवा आदि बने हों, उनका ग्रास रखवाते हैं। दक्षिण दिशा में यम के नाम का, पश्चिम में वरुण के नाम का, उत्तर में सोमदेव के नाम का ग्रास रखवाते हैं। इस प्रकार भिन्न-भिन्न देवताओं के नाम के ग्रास वे भिन्न-भिन्न दिशाओं में रखवाते हैं। यहीं पर स्वामी दयानन्द "ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः" इस मंत्र के साथ पितरों के लिए दक्षिण दिशा में ग्रास रखवाते हैं। यहाँ स्पष्ट है कि स्वामी दयानन्द मृतक पितरों के लिए अन्न रखवा रहे हैं।

आगे स्वामी दयानन्द लिखते हैं कि - "यदि इन्हें रखते समय कोई अतिथि आ जाए, तो उसे ये दे दें, अन्यथा अग्नि में डाल दें।"

इससे सिद्ध होता है कि स्वामी जी द्वारा निकलवाया गया ग्रास अतिथि के माध्यम से पितरों के पास पहुँचेगा। हिन्दू भी ब्राह्मण को ही खिलाते हैं। और अगर कोई ब्राह्मण उपस्थित न हो, तो ग्रास निकालकर हिन्दू भी अग्नि में ही डालते हैं, स्वामी जी भी अग्नि में ही डलवा रहे हैं।

यहाँ पर स्वामी दयानन्द को मृतक पितर ही अभीष्ट हैं। यह पूर्णतः सिद्ध होता है क्योंकि - यदि स्वामी दयानन्द को यहाँ जीवित पितर इष्ट होते, तो पितरों के नाम से निकाले गये ग्रास वे सीधे जीवित पितरों को क्यों नहीं खिलवा रहे? उनके स्थान पर पितरों के नाम से निकाला अन्नग्रास किसी अतिथि को क्यों खिलवा रहे हैं या अग्नि में क्यों डलवा रहे हैं?

इसके आगे स्वामी दयानन्द ने मनुस्मृति का श्लोक भी लिखा है, जिसके अर्थ में वे लिखते हैं - "कुत्ता, पतित, चण्डाल, पापरोगी, कौआ और कृमि, इन छह नामों से छह भाग (अन्न के) पृथ्वी पर धरे और ये छह भाग जिस-जिस के नाम के हैं, उसी को देने चाहिए।"

यहाँ पर कुत्ता, रोगी, कौआ आदि जीवित हैं, इसलिए स्वामी जी उनका ग्रास केवल उनको ही दिलवा रहे हैं। किन्तु देवता और मृतक पितर सदेह उपस्थित नहीं हैं, इसलिए उनके नाम से निकाले गये ग्रास, स्वामी जी अतिथियों को खिलवा रहे हैं या अग्नि में डलवा रहे हैं।

इस प्रकार स्वामी दयानन्द की ही पुस्तक से, उनके कहे विधानों से मृतक-पितरों का श्राद्ध सिद्ध होता है। जो आर्यसमाजी अपने पंथाग्रह एवं सनातन वैदिक धर्म के विरोध के कारण पूर्णतः अंधे नहीं हुए हैं, वे सत्य को देखें और स्वीकार करें। श्राद्ध-कर्म सनातन वैदिक धर्म का एक प्रधान कर्म है, धर्म है। 
                       ।। जय श्री राम ।।
                       ✍️ शचीन्द्र शर्मा 
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                        वयं राष्ट्रे जागृयाम

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