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Saturday, 20 September 2025

अहम् पितरं सुवे' 'अहं सुवे पितरम्'

             'अहम् पितरं सुवे' 'अहं सुवे पितरम्'
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ऋग्वेद दशम मण्डल 'देवी-सूक्त' में यह स्वयं देवी का वचन है। पितृ तत्व नित्य है। यह कोई अनुपस्थित की क्षणिक उपस्थिति नहीं है। यह अस्तित्व के बाद का काव्यात्मक या भावात्मक नैरन्तर्य नहीं यह नित्य उपास्य प्राण का ही स्वरूप है। 

भारतीय उत्सवजीविता उत्सवधर्मिता, इसको जरा डूब कर देखें। पितृपक्ष हो या सर्वपितृ अमावस्या यह कोई मातम नहीं है। यह भी त्योहार ही है। पितर हों कि कुलदैवत, यह वही नाद-बिन्दु रक्त-डीएनए की एक दृश्य- अदृश्य डोर है जो कभी टूटती नहीं, एक धारा जो अजस्र है।

हमारे पिता बड़े डील-डौल के स्वामी, हमारी तुलना में। मैं बैठा होता हूं लोगों को संदेह हो जाता है कि पिता बैठे हैं। हमारे पितामह बड़े प्रशासनिक अधिकारी रहे, बोलना उनका काम नहीं था। मुझे अपने काम में बोलना पड़ता है, जिन लोगों ने बाबा को सुना है, वह कहते हैं कि वही तो बोलते हैं आपके मुख से। यह है निरन्तरता। यह है पितृ तत्व। 

एक बार दक्खिन के 'कैतहा' खेतों में मजदूर लोग पानी लगा रहे थे। हमारे यहां खेतों के भी नाम हैं कैतहा, कुरना, इटहवा, बड़की बारी, घुग्घा, कालीथान, पनपियहवा, तेतरी आदि। यह भूमि से नाभिनालबद्ध होने का तरीका भी प्रमाण भी।

कैतहा में ट्यूबवेल और इंजन दोनों चल रहे थे। कुछ मशीन की समस्या थी। मैं और मेरा सबसे छोटा भाई डीजल और कुछ रेंच स्क्रू ड्राइवर वगैरह लेकर खेतों की तरफ जा रहे थे पैदल ही। हमारे खेतों से ठीक पहले कुछ शूद्र महिलाएं मरणा अशौच स्नान कर रही थीं। पम्पिंग सैट चल रहा था, बलुई मिट्टी में जलधारा गड्ढे बना देती है, 'चौना' कहते उसे पूर्वांचल में। दो चार केला गाछ और बिना लगाए अपने आप उगे शीशम के बीच का 'चौना', महिलाएं वहीं शुद्धि स्नान के लिए एकत्रित हुई थीं। नजदीकी रक्त संबंधी स्त्रियां कुल कुटुम्ब में मृत्यु के बाद गांव से बाहर जाती हैं स्नान के लिए। यह अनुशासन सभी वर्णों पर लागू।

एक युवा स्त्री बुदबुदाई कि अरे बैठ जाओ, इधर दो लड़के आ रहे हैं। एक वृद्ध स्त्री का स्वर गूंजा ' "हरिहर बाबा के नाती लोग ह, मर जइहें लेकिन एहर ना तकिहें'! यह है आदित्य रूद्र वसु तत्व। यह है पितरों पूर्वजों की कमाई। यह इकबाल यह विश्वास हमारे इस देह की कमाई है क्या? यह एक जन्म का हासिल है क्या? 

यहां से समझ आती है पितृ तत्व की नित्यता। यहां से आता है रक्त में साहस, साधन, धैर्य! यहां से खड़ी हो जाती हैं रोमावलियां। 

देह अनित्य है। पर स्मृति! जल का स्वरूप ही तो बदल सकता है। अधिक से अधिक भाप बन कर उड़ेगा। फिर संघनित होकर बरस जाएगा। मरण तो है ही नहीं। गुरूदेव बारम्बार कहते हैं कि दुनिया कहती है मृत्यु अन्तिम सत्य है, मैं कहता हूं वह सबसे विश्वसनीय झूठ है। 

अभी सर्वपितृ अमावस्या आ रही है। एक बार जरा इन पर्वों के क्रम को ध्यान दें तो एक रहस्य का सूत्र दिखाई देने लग जाएगा। हम नवरात्रि में शक्ति संचय और आद्या प्रकृति की उपासना से ठीक पहले पहले गुरु पूर्णिमा को गुरु, नाग पञ्चमी को नाग, ऋषि पञ्चमी को ऋषि तत्व और पितृ पक्ष में पितरों को संतुष्ट तृप्त पूजित करके देवी की तरफ मन बढ़ाते हैं।  सम्भवतः यही प्रकृति का आरोही क्रम है। शाम्भवोपाय आणवोपाय का रहस्य भी यही कि गुरू, नाग, ऋषि, पितर का द्रोही शक्ति तत्व को उपलब्ध नहीं हो सकेगा। 

आश्विन अमावस्या का रहस्य समझते चलें।‌ 'अमा' महाकला है। गिनती में सोलहवीं पर सोलहों कलाओं की शक्तियां इसमें शामिल हैं। यह अमामासी सूर्य-चन्द्रमा संगम है। यही 'कुहू' है। 

कभी हमारे पूर्वपुरुष इस आश्विन अमावस की पूरे वर्ष प्रतीक्षा करते थे कि सविता की गोद में बैठे यम के संग आनंदित होते अपने वायव्य पितरों से अपने मन की बात घर का दुख सुख कहेंगे। वंशवृद्धि के लिए आशीष लेंगे। और यह तो पक्की रही कि अग्नि से आहुतियां लेने वाले हमारे पितर हमारी प्रार्थनाओं को सुनते भी हैं। तीनों लोकों को जोड़ने वाली रज्जु दर्भ है, कुशासन पर बैठकर जो सोमप्रेमी पितरों को अर्पित किया जाता है, उसे वह बड़े प्रसन्न मन से ग्रहण भी करते हैं। और समय की सीमा को देखें तो हम आप भी आने वाली न जाने कितनी पीढ़ियों के पितर ही तो हैं। 

हमने समय- परिधि का जिक्र किया। हमारी आयु का एक कारक निर्धारक तत्व चन्द्रमा और पृथ्वी का परिक्रमा परिपथ भी है। एस्ट्रोनॉमी में अर्थ-मून करैक्टरस्टिक डिस्टेंस नाम से एक यूनिट होती है, यह चंद्रमा की कक्षा के आधे परिमाण को दर्शाती है। इस पर आश्विन कृष्ण पक्ष में तनिक नजर रखें विज्ञानी लोग। यह चंद्रमा का प्राणायाम है। पितरों की कई कोटियां इस आयाम पर दृष्टि रखती हैं।

यह पितृ पक्ष खगोल को समझने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो सकता है। शतपथ कहता है- 'विभु: उध्र्वभागे पितरो वसन्ति'!  विभु अर्थात् चंद्रमा के दूसरे हिस्से में पितरों का निवास है। चंद्रमा का दक्षिण पक्ष जो हमसे ओझल है, जो यमालय है। 

आज के विज्ञान की दृष्टि में केनिस मेजर और माइनर के विकिरण चंद्रमा के इस ओझल पट पर पड़ते हैं। अथर्व की मानें तो यह दोनों सूर्य-श्वान ही श्राद्ध हवि के अनन्तिम भोक्ता हैं। 'श्यामश्च त्वा न सबलश्च प्रेषितौ यमश्च यौ पथिरक्षु श्वान"। 

मनुष्यों के प्राणों का चरम आयाम मुक्ति, मोक्ष, अथवा निर्वाण ही तो है। पितरों और श्राद्ध तत्व को समझने की दृष्टि से तनिक ज्योतिष में उतरते हैं। 
द्वादश भाव कालपुरूष विष्णु का पाद है। हम सब जानते ही हैं कि पितरों के मुक्ति के निमित्त विष्णुपाद गया में श्राद्ध किए जाते हैं।

मोक्ष विशुद्ध रूप से नारायण के अधिकार में है। शाक्त शैव सौर गाणपत्य सम्प्रदायों के भी लोग इसी अभिमत को मानते हैं। काशी में अन्नपूर्णा से भिक्षा मांग कर भगवान शिव भी जिस तारक मंत्र को बांटते फिरते हैं, वह भी 'नारायण' अथवा 'राम' नाम ही है।

अनंतशेषशायी विष्णु सो रहे हैं, और कमला उनके चरण दाब रहीं। यह मोक्षकारक महानारायण निर्वाण-पुरुष कैसे सोते हैं कहां सोते हैं?

यह महा-नारायण का सिर बद्री में है महाराज इसलिए इस तीर्थ को कपालगया कहते हैं, कभी कपालतीर्थ कहीं बद्रीकपाल। यहां ज्ञात अज्ञात सभी पितरों की मुक्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।मोक्ष नारायण की नाभि नाभिगया नैमिषारण्य में है। कलिकाल का तीर्थोत्तम। पाद सब जानते हैं विष्णुपाद बोधगया।

बृहदारण्यक कहता है 'प्राणा वै गया:। प्रकारान्तर से पिण्डदान अथवा श्राद्ध अपान में प्राण की, प्राण में प्राण की और प्राण में अपान की आहुति है। 'अपाने जुह्वति प्राणं! 

रहस्यदर्शी योगियों की शब्दावली कहती है कि गया ही गया में पिण्ड दान करती है। बचपन में लोग 'गया गया गया' इसका अंग्रेजी अनुवाद पूछते थे चुहल के लिए। इसका असली अर्थ तो केवल योगियों के पास है।
 प्राण, अपान, व्यान, उदान,समान। यह पञ्च प्राण ही पांच पितर हैं। प्राण ही प्राणायाम से इन पञ्च प्राणों का उद्धार करता है। यही 'गया गया गया' है। 

पितृ पक्ष शरद का प्रारम्भ भी है। कभी शरद हेमन्त शिशिर जीवन के लिए कठिन थे। शरद में सोमतत्त्व अग्नितत्त्वको अपमर्दन करना आरम्भ करता है। यह वैवस्वत यम का कालप्रभात है। शरद् (शॄ हिं॒साया॑म्) ऋतु (ऋ॒ गतिप्राप॒णयोः॑) कहते हैं न। इसलिए भी ऋषियों ने प्राण तत्व की चिन्ता की होगी।और, काक श्वान पिपिलिका ब्राह्मण गौ इस चिंता के क्यों न अंग हों। शरद में आयु की चिन्ता सहज रही होगी इसलिए ही तो वैदिक ऋषि प्रार्थना करते हैं जीवेम शरद: शतम्! पितरों की तृप्ति से शरद में प्राण को बल मिलेगा। आप श्राद्ध के दान वाली वस्तुओं पर गौर करें तिल, जौ, घी, जूता, कम्बल ! ऐसा लगता है कि शीत शरद की तैयारी है। 

जगत में ताप का एक चक्र है। निषेचन के समय शरीर गर्म होगा मृत्यु के समय ठंडा। यह प्राण ही अग्निसोमात्मक है। उष्म उर्ध्वगामी अग्नि जो अवाची से उदीची की तरफ गति करते हैं, शीत सोम जिनकी गति उदीची से अवाची की तरफ है और अनुष्णाशीत यम जिनका चक्रावसान पर नियंत्रण है। पितर इसी यम परिधि पर निवास करते हैं। 
जैसे देवता नेत्र-भोग से तृप्त हो जाते हैं, वैसे ही आवाहन के बाद पितृगण भी संस्कृत व्यञ्जनादि को देखकर तृप्त होते हैँ । 

इस अमावस्या हम सभी भारतवंशियों के पितृ तृप्त हों, यम तृप्त हों, वरूण तृप्त हों, ऋषि तृप्त हों।

|| ॐ मधु मधु मधु ||

✍️ मधुसूदन उपाध्याय 
     नैमिषारण्य,  आश्विन कृष्ण त्रयोदशी वि. सं. २०८२
वयं राष्ट्रे जागृयाम

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