"शाक्त परंपरा की उपासना पद्धति और उसके शास्त्रों की व्याख्या और उसका तात्पर्य विवेचन शाक्त ही करेंगे ना, वैष्णव अपने मत पूजा पद्धति के लिए स्वतंत्र हैं, शाक्त में भी कई लोग बलि का अलग अर्थ लेते हैं, दक्षिणाचार का मार्ग लेते हैं, लेकिन इसका अर्थ वामाचार को बंद करना अथवा उनपर बल प्रयोग नहीं है... यह प्रथाएं यूं ही नहीं हैं, कांतार सिनेमा में इसको दिखाया गया है, हमारे तरफ लगभग हर गांव में आप इसको स्पष्ट अनुभव कर सकते हैं...
आप कह रहे हैं ये भगवती की इच्छा है, तो ये प्रारंभ से ही इच्छा क्यों नहीं थी, श्यामा मंदिर दरभंगा महाराज जैसे महान राजर्षि द्वारा स्थापित है, क्या वो मूर्ख थे या उनसे अधिक शास्त्र का तात्पर्य आप जान गए हैं?
वह मंदिर परिसर राजपरिवार का श्मशान है, चिताभूमि है, चिताओं पर बना है सारा मंदिर... श्मसान में उग्र रूप की ही पूजा होती है...असुरों का संहार करने वाली देवी को रक्त नहीं चढ़ेगा तो क्या मूली गाजर से अभिषेक करेंगे?
इसी कारण से कुछ जड़बुद्धि टाइप के वैष्णवो की कुटाई होती थी भूतकाल में...
यह पोस्ट कहीं दिखी थी - दुनिया के सभी धर्मो में हिंदू धर्म सच्चे अर्थ में लोकतांत्रिक है... काहे कि यहां ईश्वर के स्वरूप और उपासना प्रतीकों में आपको चुनने की आजादी है। शैव, वैष्णव, गणपति या शाक्त मत में से आप अपनी मर्जी के देवी देवता और उपासना पद्धति चुन सकते हैं। हां , आपने जिस स्वरूप को चुना है, पूजन और आचार व्यवहार वैसा ही रखिए उनको प्रसन्न रखने के लिए!
आप शैव हैं और शिव को सौम्य रूप में पूजना चाहते हैं तो गृहस्थ शिवजी को चुन लीजिए और पेड़े का भोग लगाइए, आप उग्र रूप में शिव को पूजना चाहते हैं भैरव बाबा की पूजा कर लीजिए, प्रसाद शराब का चढ़ेगा। आप निराकार शिव को पूजना चाहते हैं तो शिवलिंग में बेल पत्र चढ़ाते हुए सदाशिव का ध्यान रखिए। ऐसे ही वैष्णव संप्रदाय में आप सात्विक प्रभु श्रीराम को पूज सकते हैं राजसिक श्रीकृष्ण को पूज सकते हैं। श्रीकृष्ण को बालक मानकर पूजना है तो बालकृष्ण की लीला में रमिए और मक्खन मिश्री का भोग लगाइए, किशोरवय कृष्ण की प्रेम लीला में राधाकृष्ण का मनन कर सकते हैं या फिर ब्रह्मांड में स्वयं अथवा स्वयं में ब्रह्मांड को जानना है तो गीता पढ़ लीजिए! फिर विष्णुजी के सौम्य गृहस्थ रूप लक्ष्मीनारायण की पूजा कर सकते हैं। यहां तक कि आपको अगर विष्णु भगवान के ही उग्र रूप को पूजना है तो नरसिंह देव हैं। पूजिए जो रूप आपको पसंद हो! गणेश जी के ही 30 से अधिक रूप हैं जिसमे अलग अलग रूपों की अलग अलग पद्धति से पूजा की जाती है, मांत्रिक तांत्रिक हर तरीके से।
शाक्तों में तो सबसे अधिक पूजन की विविधता है, देवी मां के इतने रूप हैं, इतनी तरह की शक्तिरूप की अभिव्यक्ति है कि कोई सोच भी नही सकता। दसों महाविद्या अलग अलग रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं और सबकी पूजा अलग अलग तरह से होती है, आपको सात्विक पूजन करना है , आप करिए।
परंतु यदि कोई व्यक्ति देवी देवता के उग्र रूप की पूजा करना चाहता है या उसकी ये कुल परंपरा है तो उसमें बलि तो होगी ही। जिसको नही पसंद , वो न करे उस रूप की पूजा , पर किसी रूप की पूजा प्रथा पर घृणा करना या उसे अहिंदु करार देने का अधिकार किसको है?
बाहर गली-गली में मटन दुकानें हैं मांसाहारी होटल हैं, लेकिन विरोध केवल मंदिर में बली से है....शेर के रूप में प्राणी घास खायेगा क्या? असुरों का संहार करने वाले रूप में देवी को मिष्ठान नही रक्त चढ़ता है। शमशान तारा की पूजा मंदिर नही शमशान में ही होती है। ये विभिन्न राज्यों के सरकारी धार्मिक न्यास किस आधार पर बलि प्रथा पर रोक लगा सकते हैं जबकि अन्य धर्मों जैसे मुस्लिम धर्म में कुर्बानी पर कोई रोक नहीं है?
हनुमान जी को पान का भोग लगता है, अब कोई अड़ जाए कि पान खाना ठीक नहीं तो पान चढ़ाने पर रोक लगाओ! ऐसा होता है क्या?
ज्यादा तकलीफ है तो ईश्वर के अन्य रूप की पूजा कर लो!
वाया Pritam
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