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Saturday, 31 October 2026

अतः वेदानां नित्यविचार:(१)

# अथ वेदानां नित्यत्वविचारः

ईश्वरस्य सकाशाद् वेदानामुत्पत्तौ सत्यां स्वतः नित्यत्वमेव भवति, तस्य सर्वसामर्थ्यस्य नित्यत्वात् ।

**भाषार्थ—** अब वेदों के नित्यत्व का विचार किया जाता है सो वेद ईश्वर से उत्पन्न हुए हैं इससे वे स्वतः नित्यस्वरूप ही हैं, क्योंकि ईश्वर का सब सामर्थ्य नित्य ही है।

**अत्र केचिदाहुः—** न वेदानां शब्दमयत्वान्नित्यत्वं सम्भवति। शब्दोऽनित्यः कार्यत्वात्। घटवत्। यथा घटः कृतोऽस्ति तथा शब्दोऽपि। तस्माच्छब्दानित्यत्वे वेदानामप्यनित्यत्वं स्वीकर्तव्यम्।

मैवं मन्तव्यम्। शब्दो द्विविधो नित्यकार्यभेदात्। ये परमात्मज्ञानस्थाः शब्दार्थसम्बन्धाः सन्ति ते नित्या भवितुमर्हन्ति। येऽस्मदादीनां वर्तन्ते ते तु कार्यार्थाः। कुतः? यस्य ज्ञानक्रिये नित्ये स्वभावसिद्धे अनादी सतस्तस्य सर्वं सामर्थ्यमपि नित्यमेव भवितुमर्हति। तद्विधाभावत्वाद् वेदानामनित्यत्वं नैव घटते।

**भाषार्थ-प्र०—** इस विषय में कितने ही पुरुष ऐसी शङ्का करते हैं कि वेदों में शब्द, छन्द, पद और वाक्यों के योग होने से नित्य नहीं हो सकते। जैसे बिना बनाने से घड़ा नहीं बनता, इसी प्रकार से वेदों को भी किसी ने बनाया होगा। क्योंकि बनाने के पहले नहीं थे और प्रलय में भी न रहेंगे, इससे वेदों को नित्य मानना ठीक नहीं है।

**उ०—** ऐसा आपको कहना उचित नहीं, क्योंकि शब्द दो प्रकार का होता है—एक नित्य और दूसरा कार्य। इनमें से जो शब्द, अर्थ और सम्बन्ध परमेश्वर के ज्ञान में हैं वे सब नित्य ही होते हैं, और जो हम लोगों की कल्पना से उत्पन्न होते हैं वे कार्य होते हैं। क्योंकि जिसका ज्ञान और क्रिया स्वभाव से सिद्ध और अनादि हैं उसका सब सामर्थ्य भी नित्य ही होता है। इससे वेद भी उसके विद्यात्मक स्वरूप होने से नित्य ही हैं क्योंकि ईश्वर की विद्या अनित्य कभी नहीं हो सकती।

**किं च भोः ! सर्वस्यास्य जगतो विभागं प्राप्तस्य कारणरूपस्थितौ सर्वस्थूलकार्याभावे पठनपाठनपुस्तकानामभावात् कथं वेदानां नित्यत्वं स्वीकृत्यते ?**

**अत्रोच्यते—** इदं तु पुस्तकपत्रमसीपदार्थादिषु घटते, तथास्मत्क्रियापेक्षे च नेतरस्मिन्। अतः कारणाणीश्वरविद्यामयत्वेन वेदानां नित्यत्वं वयं मन्यामहे। किं च, न पठनपाठन-पुस्तकानित्यत्वेन वेदानित्यत्वं जायते। तेषामीश्वरज्ञानेन सह सदैव विद्यमानत्वात्। यथास्मिन् काले वेदेषु शब्दाक्षरार्थ-सम्बन्धाः सन्ति तथैव पूर्वमासन्नत्र भविष्यन्ति च। कुतः, ईश्वरविद्याया नित्यत्वाद्व्यभिचारित्वाच्च। अत एवेदमुक्तमृग्वेदे—

**सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् इति।**

**अस्यायमर्थः—** सूर्यचन्द्रग्रहणमुपलक्षणार्थं, यथा पूर्वकल्पे सूर्यचन्द्रादिरचनं तस्य ज्ञानमध्ये ह्यासीत् तथैव तेनास्मिन् कल्पेऽपि रचनं कृतमस्तीति विज्ञायते। कुतः ईश्वरज्ञानस्य वृद्धिक्षय-विपर्ययाभावात्। एवं वेदैर्वपि स्वीकर्तव्यं, वेदानां तेनैव स्वविधातुः सृष्टत्वात्।

**भाषार्थ-प्र०—** जब सब जगत् के परमाणु अलग-अलग होकर कारणरूप हो जाते हैं तब जो कार्यरूप सब स्थूल जगत् है उसका अभाव हो जाता है, उस समय वेदों के पुस्तकों का भी अभाव हो जाता है, फिर वेदों को नित्य क्यों मानते हो?

**उ०—** यह बात पुस्तक, पत्र, मसी और अक्षरों की बनावट आदि पक्ष में घटती है तथा हम लोगों के क्रियापक्ष में भी बन सकती है, वेदपक्ष में नहीं घटती, क्योंकि वेद तो शब्द, अर्थ और सम्बन्धस्वरूप ही हैं, मसी, कागज, पत्र, पुस्तक और अक्षरों की बनावटस्वरूप नहीं हैं। यह जो मसी आदि द्रव्य और लेखनादि क्रिया है सो मनुष्यों की बनाई है, इससे अनित्य है। और ईश्वर के ज्ञान में सदा बने रहने से वेदों को हम लोग नित्य मानते हैं। इससे क्या सिद्ध हुआ कि पढ़ना-पढ़ाना और पुस्तक के अनित्य होने से वेद अनित्य नहीं हो सकते, क्योंकि वे बीजाङ्कुर न्याय से ईश्वर के ज्ञान में नित्य वर्तमान रहते हैं। सृष्टि की आदि में ईश्वर से वेदों की प्रसिद्धि होती है और प्रलय में जगत् के नहीं रहने से उनकी अप्रसिद्धि होती है, इस कारण से वेद नित्यस्वरूप ही बने रहते हैं।

जैसे इस कल्प की सृष्टि में शब्द, अक्षर, अर्थ और सम्बन्ध वेदों में हैं इसी प्रकार से पूर्वकल्प में थे और आगे भी होंगे, क्योंकि जो ईश्वर की विद्या है सो नित्य एक ही रस बनी रहती है। उनके एक अक्षर का भी विपरीताभाव कभी नहीं होता। सो ऋग्वेद से लेके चारों वेदों की संहिता अब जिस प्रकार की हैं कि इनमें शब्द, अर्थ, सम्बन्ध, पद और अक्षरों का जिस क्रम से वर्तमान है इसी प्रकार का क्रम सब दिन बना रहता है, क्योंकि ईश्वर का ज्ञान नित्य है, उसकी वृद्धि, क्षय और विपरीतता कभी नहीं होती। इस कारण से वेदों को नित्यस्वरूप ही मानना चाहिए।

## अत्र वेदानां नित्यत्वे व्याकरणशास्त्रादीनां साक्ष्यार्थं प्रमाणानि लिख्यन्ते। तत्राह महाभाष्यकारः पतञ्जलिमुनिः—

‘नित्याः शब्दा नित्येषु शब्देषु कूटस्थैरविचालिभिर्वर्णैर्भवितव्यमनपायोपजनविकारिभिरिति।

इदं वचनं प्रथमाह्निकमारभ्य बहुषु स्थलेषु व्याकरणमहाभाष्येऽस्ति। तथा—

‘श्रोत्रोपलब्धिर्बुद्धिनिर्ग्राह्यः प्रयोगेणाभिज्वलित आकाशदेशः शब्दः।’

इदम् ‘अइउण्’ सूत्रभाष्ये चोक्तमिति। अस्यायमर्थः—

वैदिका लौकिकाश्च सर्वे शब्दा नित्याः सन्ति। कुतः? शब्दानां मध्ये कूटस्थ विनाशरहिता अचला अनपाया अनपजना अविकरणो वर्णाः सन्त्यतः। अपायो लोपो निर्वर्त्यग्रहणम्, उपजन आगमः, विकार आदेशः, एते न विद्यन्ते येषु शब्देषु तस्मान्नित्याः शब्दाः।

**भाषार्थ—** यह जो वेदों के नित्य होने का विषय है इसमें व्याकरणादि शास्त्रों का प्रमाण साक्षी के लिए लिखते हैं। इनमें से जो व्याकरण शास्त्र है सो संस्कृत और भाषाओं के सब शब्दविद्या का मुख्य मूल प्रमाण है। उसके बनाने वाले महर्षि पाणिनि और पतञ्जलि हैं। उनका ऐसा मत है कि—‘सब शब्द नित्य हैं, क्योंकि इन शब्दों में जितने अक्षरादि अवयव हैं वे सब कूटस्थ अर्थात् विनाशरहित हैं, और वे पूर्वापर विचलित भी नहीं, उनका अभाव वा आगम कभी नहीं होता।’ इससे वैदिक अर्थात् जो वेद के शब्द और वेदों से जो शब्द लोक में आये हैं वे लौकिक कहाते हैं, वे भी सब नित्य ही होते हैं क्योंकि उन शब्दों के मध्य में सब वर्ण अविनाशी और अचल हैं, तथा इनमें लोप, आगम और विकार नहीं बन सकते, इस कारण से पूर्वोक्त शब्द नित्य हैं।
✍️ आचार्य धनंजय शास्त्री 
     ( आर्यों का महाकुंभ ) 31/10/2026