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Saturday, 31 October 2026

वेद नित्य विषय (२)

# वेदनित्यत्वविषयः

ननु गणपाठाष्टाध्यायीमहाभाष्येष्वपायादयो विधीयन्ते पुनरुत्पत्तकथं सङ्गच्छते ? इत्येवं प्राप्ते ब्रूते महाभाष्यकारः—

‘सर्वे सर्वपदादेशाः दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेः। एकदेशविकारो हि नित्यत्वं नोपपद्यते ॥१॥’

‘दाधा छ्वदाप्’ इत्यस्य सूत्रस्योपरि महाभाष्यवचनम्। अस्यायमर्थः—

सर्वे सङ्घाताः सर्वेषां पदानां स्थान आदेशाः भवन्ति अर्थाच्छब्दसङ्घातान्तराणां स्थानभूते शब्दसङ्घाताः प्रयुज्यन्ते। तथा—वेदपार । गम् । डु । सुँ । भू । शप् । तिप् । इत्येतस्य वाक्यसमुदायस्य स्थाने वेदपारगोऽभवदितीदं समुदायान्तरं प्रयुज्यते। अस्मिन् प्रयुक्तसमुदाये ‘गम् डु सुँ शप् तिप् इत्येतोषाम् ‘अम् डु उँ शु पू इ पू’ इत्येतेषामुपयन्तीति केषाञ्चिद् बुद्धिर्भवति सा भ्रममूलैवास्ति। कुतः? शब्दानामेकदेशविकारो चेत्युपलक्षणात्। नैव शब्दस्यैकदेशापाय एकदेशोपजन एकदेशविकाराणि सन्ति दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेराचार्यस्य मते शब्दानां नित्यत्वमुपपन्नं भवतः। तथैवाडागमो, भू इत्यस्य स्थाने भो इति विकारो चैवं सङ्गतिः कार्यार्था।

(श्रोत्रोपलब्धिरिति) श्रोत्रेन्द्रियेण ज्ञानं यस्य, बुद्ध्या नितरां गृहीतं योग्यं, उच्चारणेनाभिप्रकाशितो यो, यस्याकाशो देशोऽधिकरणं वर्तते, स शब्दो भवतीति बोध्यम्। अनेन शब्दलक्षणेनापि शब्दो नित्य एवास्तीत्यवगम्यते। कथम्? उच्चारणश्रवणादिप्रयत्नक्रियायाः क्षणभङ्गित्वात्। ‘एकैकवर्णवर्तिनी वाक्’ इति महाभाष्यप्रमाणात्। प्रतिवर्णं वाक्क्रिया परिणमते, अतस्तस्या एकानित्यत्वं गम्यते, न च शब्दस्येति।

**भाषार्थ-प्र०—** गणपाठ अष्टाध्यायी और महाभाष्य में अक्षरों के लोप आगम और विकार आदि कहे हैं, फिर शब्दों का नित्यत्व कैसे हो सकता है?

इस प्रश्न का उत्तर महाभाष्यकार पतञ्जलि मुनि देते हैं कि—शब्दों के समुदायों के स्थानों में अन्य शब्दों के समुदायों का प्रयोगमात्र होता है। जैसे ‘वेदपार गम् डु सुँ भू शप् तिप्’ इस पदसमुदाय वाक्य के स्थान में ‘वेदपारगोऽभवत्’ इस समुदायान्तर का प्रयोग किया जाता है। इसमें किसी पुरुष की ऐसी बुद्धि होती है कि अम् डु उँ शु पू इ पू इनकी निवृत्ति हो जाती है, सो उसकी बुद्धि में भ्रममात्र है, क्योंकि शब्दों के समुदाय के स्थानों में दूसरे शब्दों के समुदायों के प्रयोग किये जाते हैं। सो यह मत दाक्षी के पुत्र पाणिनि मुनि जी का है, जिन्होंने अष्टाध्यायी आदि व्याकरण के ग्रन्थ किये हैं। सो मत इस प्रकार से है कि शब्द नित्य ही होते हैं, तथा ‘कान से सुन के जिनका ग्रहण होता है, बुद्धि से जो जाने जाते हैं, जो वाक् इन्द्रिय से उच्चारण करने से प्रकाशित होते हैं, और जिनका निवास का स्थान आकाश है उनको शब्द कहते हैं। क्योंकि जो उच्चारण और श्रवणादि हम लोगों की क्रिया है उसके क्षणभङ्ग होने से अनित्य गिनी जाती है। इससे शब्द अनित्य नहीं होते, क्योंकि यह जो हम लोगों की वाणी है, वही वर्ण वर्ण के प्रति अन्य अन्य होती जाती है परन्तु शब्द तो सदा अखण्ड एकरस ही बने रहते हैं।

**ननु च भोः ! शब्दोऽप्युपरतागतो भवति। उच्चारित उपागच्छति, अनुच्चारितोऽनागतो भवति, वाक्क्रियावत्। पुनरस्तस्य कथं नित्यत्वं भवेत्।**

**अत्रोच्यते—** नाकाशवत् पूर्वस्थितस्य शब्दस्य साधनाभावादभिव्यक्तिर्भवति, किन्तु तस्य प्राणवाक्क्रियाभिरभिव्यक्तिश्च। तथा गौरित्यत्र यावद्गकारोऽस्ति न तावद्वकारो,यावद्वकारो न तावद्विसर्जनीयः। एवं वाक्क्रिययोच्चारणस्यापायोपजने भवतः न च शब्दस्याखण्डैकस्य, तस्य सर्वत्रोपलब्धत्वात्। यत्र खलु वायुर्वाक्क्रियायां न भवत्-स्रोत्रोच्चारणश्रवणे अपि न भवतः। अतः शब्दस्त्वाकाशादेव सदा नित्योऽस्तीत्यादि-व्याकरणमतेन सर्वेषां शब्दानां नित्यत्वमस्ति, किमुत वैदिकानामिति।

**भाषार्थ-प्र०—** शब्द भी उच्चारण किये के पश्चात् नष्ट हो जाता है और उच्चारण के पूर्व सुना नहीं जाता है, जैसे उच्चारण क्रिया अनित्य है, वैसे ही शब्द भी अनित्य हो सकता है। फिर शब्दों को नित्य क्यों मानते हो?

**उ०—** शब्द तो आकाश की नाईं सर्वत्र एकरस भर रहे हैं, परन्तु जब उच्चारणक्रिया नहीं होती, तब प्रसिद्ध सुनने में नहीं आते। जब प्राण और वाणी की क्रिया से उच्चारण किये जाते हैं, तब शब्द प्रसिद्ध होते हैं। जैसे ‘गौः’ इसके उच्चारण में जब पर्यन्त उच्चारण क्रिया गकार में रहती है, तब पर्यन्त औकार में नहीं, जब औकार में है तब गकार और विसर्जनीय में नहीं रहती। इसी प्रकार वाणी की क्रिया की उत्पत्ति और नाश होता है, शब्दों का नहीं। किन्तु आकाश में शब्द की प्राप्ति होने से शब्द तो अखण्ड एकरस सर्वत्र भर रहे हैं, परन्तु जब पर्यन्त वायु और वाक् इन्द्रिय की क्रिया नहीं होती, तब पर्यन्त शब्दों का उच्चारण और श्रवण भी नहीं होता। इससे यह सिद्ध हुआ कि शब्द आकाश की नाईं नित्य ही हैं। जब व्याकरण शास्त्र के मत से सब शब्द नित्य होते हैं तो वेदों के शब्दों की कथा तो क्या ही कहनी है, क्योंकि वेदों के शब्द तो सब प्रकार से नित्य ही बने रहते हैं।

## एवं जैमिनिमुनिनापि शब्दस्य नित्यत्वं प्रतिपादितम्—

**‘नित्यस्तु स्याद् दर्शनस्य परार्थत्वात्’॥**

पूर्वमीमांसा अ० १। पा० १। सू० १८॥

**अस्यायमर्थः—** ‘तु’ शब्देनानित्यशङ्का निवार्यते। विनाशरहितत्वाच्छब्दो नित्योऽस्ति कस्माद् दर्शनस्य परार्थत्वात्। दर्शनस्योच्चारणस्य परस्यार्थस्य ज्ञापनार्थत्वात्, शब्दस्यानित्यत्वं नैव भवति। अन्यथायं गोशब्दार्थोऽस्तीत्यभिज्ञाननित्येन शब्देन भवितुमयोग्योऽस्ति। नित्यत्वे सति ज्ञाप्यज्ञापकयोर्विद्यमानत्वात् सर्वमेतत् सुसंगतं स्यात्। अतश्चैकमेव गोशब्दं युगपदनेकेषु स्थलेष्वनेक उच्चारका उपलभन्ते। पुनः पुनस्तमेव चेति। एवं जैमिनिना शब्दनित्यत्वेऽनेकैर्हेतवः प्रदर्शिताः।

**भाषार्थ—** इसी प्रकार जैमिनि मुनि ने भी शब्द को नित्य माना है—(नित्यस्तु) शब्द में जो अनित्य होने की शङ्का आती है, उसका ‘तु’ शब्द से निवारण किया है। शब्द नित्य ही हैं, अर्थात् नाशरहित हैं, क्योंकि उच्चारणक्रिया से जो शब्द का श्रवण होता है सो अर्थ के जानने ही के लिए है, इससे शब्द अनित्य नहीं हो सकता। जो शब्द का उच्चारण किया जाता है, उसकी ही प्रत्यभिज्ञा होती है कि श्रोत्रद्वारा ज्ञान के बीच में वही शब्द स्थिर रहता है, फिर उसी शब्द से अर्थ की प्रतीति होती है। जो शब्द अनित्य होता तो अर्थ का ज्ञान कौन कराता, क्योंकि वह शब्द ही नहीं रहा, फिर अर्थ को कौन जनावे। और जैसे अनेक देशों में अनेक पुरुष एक काल में ही एक गो शब्द का उच्चारण करते हैं, इसी प्रकार उसी शब्द का उच्चारण बारम्बार भी होता है, इस कारण से भी शब्द नित्य हैं। जो शब्द अनित्य होता तो यह व्यवस्था कभी नहीं बन सकती। सो जैमिनि मुनि ने इस प्रकार के अनेक हेतुओं से पूर्वमीमांसा शास्त्र में शब्द को नित्य सिद्ध किया है।

**अन्यच्च वैशेषिकसूत्रकारः कणादमुनिरप्याह—**

‘तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ॥’

वैशेषिक अ० १। सू० ३॥

**अस्यायमर्थः—** तद्वचनात् यो धर्मेश्वरयोर्वचनाद्धर्मस्यैव कर्तव्यतया प्रतिपादनादादेशकरणे-वोक्तत्वाच्चाम्नायस्य वेदचतुष्टयस्य प्रामाण्यं सर्वैर्नित्यत्वेन स्वीकरणीयम्।

**भाषार्थ—** इसी प्रकार वैशेषिक शास्त्र में कणाद मुनि ने भी कहा है—(तद्वचनात्) वेद ईश्वरोक्त हैं, इनमें सत्यविद्या और पक्षपातरहित धर्म का ही प्रतिपादन है, इससे चारों वेद नित्य हैं। ऐसा ही सब मनुष्यों का मानना उचित है क्योंकि ईश्वर नित्य है। इससे उसकी विद्या भी नित्य है।

## तथा स्वकीय-न्यायशास्त्रे गौतममुनिरप्याह—

‘मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यात् ॥’

अ० २। आ० १। सूत्र ६५॥

**अस्यायमर्थः—** तेषां वेदानां नित्यानामीश्वरवोक्तानां प्रामाण्यं सर्वैः स्वीकरणीयम्। कुतः? आप्तप्रामाण्यात्। धर्मात्मभिः कपटछलादिदोषरहितैर्देवर्षिभिः सत्योपदेशदृष्टिभिर्विद्यापारङ्गमैर्महायोगिभिः सर्वैर्ब्रह्मादिभिराप्तैर्वेदानां प्रामाण्यं स्वीकृतमतः। किंतु? मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवत्। यथा सत्यपदार्थविद्याप्रकाशकानां मन्त्राणां विचाराणां सत्यत्वेन प्रामाण्यं भवति, यथा चायुर्वेदोक्तस्यैकदेशोक्तौषधसेवनेन रोगनिवृत्त्या तदिन्द्रियस्यापि भागस्य तादृशस्य प्रामाण्यं भवति, तथा वेदोक्तार्थस्यैकदेशप्रत्यक्षणोत्तरस्यादृष्टार्थविषयस्य वेदभागस्यापि प्रामाण्यमङ्गीकर्तव्यम्।

एतत्सूत्रोपरि भाष्यकारेण वात्स्यायनमुनिनैव प्रतिपादितम्—

“दृष्टप्रवक्तृसामान्याच्चानुमानम्। य एवाप्ता वेदार्थानां द्रष्टारः प्रवक्तारश्च त एवायुर्-वेदप्रभृतीनामित्यायुर्-वेदप्रामाण्यवद्वेदप्रामाण्यमनुमातव्यमिति। नित्यत्वाद्वेदवाक्यानां प्रामाण्ये तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यादित्युक्तम्।”

**अस्यायमभिप्रायः—** यथाप्तोपदेशस्य शब्दस्य प्रामाण्यं भवति तथा सर्वधात्पनेश्वरप्रोक्तानां वेदानां सर्वैराप्तैः प्रामाण्येनाङ्गीकृतत्वाद्वेदाः प्रमाणमिति बोद्ध्यम्। अत ईश्वरविद्यामयत्वाद्वेदानां नित्यत्वमेवोपपन्नं भवतीति दिक्।

**भाषार्थ—** वैसे ही न्यायशास्त्र में गौतम मुनि भी शब्द को नित्य कहते हैं, (मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च) वेदों को नित्य ही मानना चाहिए, क्योंकि सृष्टि के आरम्भ से लेके आज पर्यन्त ब्रह्मादि जितने आप्त होते आये हैं वे सब वेदों को नित्य ही मानते आये हैं। उन आप्तों का अवश्य ही प्रमाण करना चाहिए। क्योंकि आप्त लोग वे होते हैं जो धर्मात्मा, कपट छलादि दोषों से रहित, सब विद्याओं से युक्त, महायोगी और सब मनुष्यों के सुख होने के लिए सत्य का उपदेश करने वाले हैं, जिनमें लेशमात्र भी पक्षपात वा मिथ्याचार नहीं होता। उन्होंने वेदों का यथावत् नित्य गुणों से प्रमाण किया है जिन्होंने आयुर्वेद को बनाया है। जैसे आयुर्वेद वैद्यकशास्त्र के एकदेश में कहे औषध और पथ्य के सेवन करने से रोग की निवृत्ति से सुख प्राप्त होता है, जैसे उसके एकदेश के कहे के सत्य होने से उसके दूसरे भाग का भी प्रमाण होता है इसी प्रकार वेदों का भी प्रमाण करना सब मनुष्यों को उचित है। क्योंकि वेद के एकदेश में कहे अर्थ का सत्यापन विदित होने से उससे भिन्न जो वेदों के भाग हैं, कि जिनका अर्थ प्रत्यक्ष न हुआ हो, उनका भी नित्य प्रमाण अवश्य करना चाहिए, क्योंकि आप्त पुरुष का उपदेश मिथ्या नहीं हो सकता।
✍️  आचार्य धनंजय शास्त्री ( 31/10/2026 )
      ( आर्यों का महाकुंभ)