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Tuesday, 10 February 2026

अज्ञानता वश या जानबूझकर वेद मंत्र या पुराणों के श्लोकों के गलत अर्थ ( भाष्य ) कर हमें अपने शास्त्रों से भटकाने का काम किया है।

इस अंश को देखें-
श्लोक संख्या 99 का अर्थ है- प्रतिदिन गोमांस खाना चाहिए और अमरवारुणी पीनी चाहिए। वही कुलीन कहलाता है, अन्य व्यक्ति कुलघातक कहे जाते हैं।
अब इस श्लोक को उद्धृत कर गोमांस तथा वारुणी का मनमाना अर्थ लगाकर सनातन धर्म पर खासकर, तन्त्र पर उँगली उठायी जा सकती है कि तान्त्रिक लोग दारू पीते थे तथा गोमांस खाते थे।
अब यहाँ गोमांस तथा अमरवारुणी ये दो पारिभाषिक शब्द हैं, जिनका उल्लेख अगले श्लोक में किया गया है कि जिह्वा को 'गो' कहते हैं और उसे तालु में प्रवेश कराने की प्रक्रिया को गोमांसभक्षण कहते हैं, इस खेचरी मुद्रा के करने से महान् पापों का नाश होता है।
इसी प्रकार, तालु के मूल में इस जिह्वाप्रवेश के कारण जो रस निकलता है वही अमरवारुणी है।
यूरोपीय विद्वान के वेष में ईसाइयों ने तथा दयानन्द ने यही काम किया है। चार श्लोकों में से एक को उद्धृत कर अपना उल्लू सीधा करने का काम किया है, हमें अपने शास्त्रों से भटकाने का काम किया है।
हम मूर्ख लोग उनकी बातों पर भरोसा कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते रहे हैं।https://www.facebook.com/share/p/1CEzme6vL2/