### सूफी संत बुल्ले शाह की अमर रचना
### “बुल्ला की जाणाँ मैं कौन”
ईश्वर की खोज, आत्मज्ञान और मानव-एकता का संदेश
पंजाब की महान सूफी परंपरा के संत और कवि बाबा बुल्ले शाह (1680–1758) ने अपनी रचनाओं में ईश्वर को बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर खोजने का संदेश दिया।
उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है — “बुल्ला की जाणाँ मैं कौन”। यह रचना मनुष्य की आत्मा, उसकी वास्तविक पहचान और परमात्मा से उसके संबंध पर गहरा प्रश्न उठाती है।
### मूल पंजाबी रचना (देवनागरी लिपि में)
बुल्ला की जाणाँ मैं कौन।
ना मैं मोमिन विच मसीतां, ना मैं विच कुफ़र दियां रीतां। ना मैं पाकां विच पलीतां, ना मैं मूसा, ना फिरऔन।
बुल्ला की जाणाँ मैं कौन।
ना मैं अंदर वेद किताबां, ना विच भंगां, ना शराबां। ना विच रिंदां मस्त खराबां, ना विच जागण, ना विच सौण।
बुल्ला की जाणाँ मैं कौन।
ना मैं अरबी, ना लाहौरी, ना मैं हिंदी शहर नागौरी। ना हिंदू, ना तुर्क पशौरी, ना मैं रहंदा विच नदाऊं।
बुल्ला की जाणाँ मैं कौन।
अव्वल आखिर आप नूं जाणां, ना कोई दूजा होर पछाणां। मैथों होर न कोई सयाणा, बुल्ला! ओह खड़ा है कौन?
बुल्ला की जाणाँ मैं कौन।
### हिंदी भावार्थ
कवि कहते हैं कि मैं अपनी वास्तविक पहचान नहीं जानता।
मैं केवल मस्जिद में जाने वाला मुसलमान नहीं हूँ, न ही किसी धार्मिक कर्मकांड या संप्रदाय की सीमाओं में बँधा हूँ।
मैं न मूसा हूँ, न फिरऔन। न मैं किसी एक धर्मग्रंथ या धार्मिक पहचान तक सीमित हूँ।
मैं न हिंदू हूँ, न मुसलमान; न अरबी हूँ, न लाहौरी। मेरी आत्मा को किसी देश, जाति, भाषा या धर्म की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता।
मैं उस परम सत्य को जानना चाहता हूँ, जो इन सभी पहचानों से परे है।
### इस रचना में ईश्वर का स्वरूप
बुल्ले शाह का ईश्वर किसी एक धर्म, संप्रदाय या पूजा-पद्धति का बंधक नहीं है।
उनके अनुसार ईश्वर को पाने के लिए मनुष्य को पहले अपने भीतर झाँकना होगा। जब अहंकार, जाति, धर्म, ऊँच-नीच और भेदभाव की दीवारें गिरती हैं, तभी मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सकता है।
### आज के समाज के लिए संदेश
बुल्ले शाह की यह रचना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी लगभग तीन सौ वर्ष पहले थी।
आज संसार में धर्म, जाति, भाषा और राष्ट्रीयता के नाम पर अनेक संघर्ष दिखाई देते हैं। बुल्ले शाह हमें याद दिलाते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसका मानवीय चरित्र है।
ईश्वर की सच्ची उपासना केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा, दया और मानवता है।
उनकी वाणी का सार यही है कि ईश्वर को खोजने से पहले स्वयं को पहचानो और मनुष्य को मनुष्य समझकर प्रेम करना सीखो।
### निष्कर्ष
बुल्ले शाह की सूफी वाणी हमें एक ऐसी आध्यात्मिक ऊँचाई पर ले जाती है जहाँ न कोई पराया है, न कोई छोटा-बड़ा। वहाँ केवल प्रेम है, आत्मज्ञान है और परमात्मा की अनुभूति है।
यही उनकी कविता की अमरता है।
संदर्भ : बुल्ले शाह की सूफी काव्य परंपरा और उनकी काफ़ी “बुल्ला की जाणाँ मैं कौन”। Shivpreet Singh +2
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साभार - नरोत्तम शर्मा