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Wednesday, 2 July 2025

अतिशोक, अतिहर्ष, एकादशी को उपवास आचमन का महत्व

                                   ॥ॐ॥
लग्न पंचम की परस्पर द्विपाद दृष्टि उदर एवं शिर का      
                                  संबंध 
अतिशोक व अतिहर्ष में एवं एकादशी को उपवास क्यों
                              करना चाहिए 

                                
••कुण्डली में लग्न तथा पञ्चम भाव एक दूसरे को द्विपाद दृष्टि से प्रभावित करते हैं। भाव वा ग्रह की होने पर नवम पंचम दृष्टि, द्विपाद होती है। लग्न से पञ्चम स्थान उदर है। पचम (उदर) से लग्न स्थान नवम है। लग्न शिर है। इस प्रकार सिर और पेट एक दूसरे से घनिष्ठ एवं प्रभावकारी संबंध रखते हैं। पेट की सिर पर द्विपाद दृष्टि तथा सिर की पेट पर द्विपाद दृष्टि होने से दोनों सम प्रभावशाली हैं। पेट गड़बड़ सिर भारी रहता है, विचार कुण्ठित होता है, मस्तिष्क क्षुब्ध रहता है। इसी प्रकार सिर की गड़बड़ी अर्थात् विचार दूषित होने से, मस्तिष्क में तनाव वा अशांति रहने से पेट खराब रहता है, आमाशय में जठर रस का लाव न्यून हो जाता है। यह सत्य है, प्रत्यक्ष सत्य है, अकाट्य सत्य है। यही कारण है कि अत्यधिक हर्ष होने पर वा अति विषाद होने पर भोजन न ग्रहण करने की परम्परा हमारे यहाँ शास्त्र सम्मत है। सुख एवं दुःख-इन दोनों की अतिशयता में मस्तिष्क तनावग्रस्त रहता है। ऐसी दशा में मस्तिष्क से चलने वाली पाचक तंत्रिकाएं जिनका कार्य जठर प्रन्थियों को उत्तेजित करके जठर रस गिराना होता है, अपना कार्य ठीक से नहीं करती। ऐसी दशा में भोजन का परिपाक नहीं होता। अधपचा भोजन विष होता है। इसलिये घनिष्ठ परिजन की मृत्यु के दिन दुःखाधिक्य होने से भोजन नहीं किया जाता। राज्याभिषेक से एक दिन पूर्व पूर्ण उपवास किया जाता है। राज्याभिषेक महान् सुख है। सुखाधिक्य के अवसर पर अनशन करना चाहिये। मुनि वसिष्ठ के आदेश से श्री राम ने राज्याभिषेक की पूर्व बेला में उपवास किया था ऐसा बाल्मीकि ने बालकाण्ड में लिखा है। वसिष्ठ राम से कहते हैं...
      "प्रसन्नस्ते पिता राम यत्त्वं राज्यमवास्यसि ।
       उपवासं भवानद्य करोतु सह सीतया ॥ 
      प्रातस्त्वामभिषेक्ता हि यौवराज्ये नराधिपः ।
      पिता दशरथः प्रीत्या ययाति नहुषो यथा ॥" 
               ( रामायण, बालकाण्ड ५। ९,१० ) 

•[श्री राम । तुम्हारे पिता तुम पर बहुत प्रसन्न हैं क्योंकि तुम्हें उनसे राज्य प्राप्त होगा। अतः आज की रात में तुम बधू सीता के साथ उपवास करो। जैसे नहुष ने ययाति का राज्याभिषेक किया था, उसी प्रकार तुम्हारे पिता दशरथ कल प्रातः काल बड़े प्रेम से युवराज पद पर तुम्हारा अभिषेक करेंगे ] 

•विचार दूषित होने पर व्यक्ति पाप करता है। पाप= निषिद्ध कर्म। पेट खराब होने पर रोगोत्पति होती है। इसलिये पाप और रोग से बचने के उद्देश्य से उपवास करने का व्रत लिया जाता है। यह सबके लिये है। रोग को उत्पत्ति पाप से होती है व्रतोपनास से पाप की निवृत्ति होती है। रोग नहीं होता, व्यक्ति स्वस्थ एवं प्रसन्न रहता है। यह गृहस्थ के लिये है। व्रतोपवास में निम्न दस धर्मो को अपनाना चाहिये। 

     "क्षमा-सत्यं, दवा-दानं, शौच-इन्द्रियनिगहः ।
     देवपूजा- अग्निहरणं, संतोषोऽस्तेयमेव च ॥
       सर्वव्रतेष्वयं धर्मः सामान्यो दशथास्मृतः ।"
               (अग्निपुराण १७५। १०-११ ।) 

••शारीरिक और मानसिक (वैचारिक) स्वास्थ्य के लिये कौन-सा व्रत करना चाहिये ? एकादशी। क्यों ? इसका उत्तर बहुत सरल है। संख्या ५ पेट है। इसे संख्या ११ पूर्ण दृष्टि से देखती है। ११ कुम्भ राशि वायु तत्व है। ५ सिंह राशि अग्नि तत्व है। अग्नि को प्रज्जवलित करने के लिये वायु की आवयकता होती है। मन्दाग्नि से रोग का जन्म होता है। मन्दाग्नि को तीक्ष्णाग्नि करने के लिये वायु तत्व की आवश्यकता होती है। इसलिये एकादशी के दिन पेट को हवा से भरना चाहिये, न कि अन्न-जल से। अग्नि और वायु में मैरी है। अग्नि और जल में शत्रुता है। अन्न, जल के साथ खाया जाता है। अन्न पृथ्वी तत्व है। पृथ्वी का अग्नि से सम संबंध है। अतः अन्न जल मन्दाग्नि करने वाले हैं, वायु मन्दाग्नि हरने वाला है। मन्दाग्नि के नाश के लिये एकादशी के व्रत का प्राविधान शास्त्रकारों ने किया है। एकादशी की महत्ता सर्वत्र कही गयी है। 

       "एकादशीसमं किञ्चित् पावनं भुवनत्रये । 
      न श्रुतं न मया दृष्टं तस्याः स्वामी हरिर्यतः ॥"
            ( जैमिनीय आश्वमेधिक पूर्व ५२ । ३९) 

•• [ एकादशी के समान पवित्र करने वाला दूसरा कोई व्रत इस त्रिलोकी में न तो मैंने सुना है और न देखा (जाना) ही है, क्योंकि इसके स्वामी साक्षात् श्री हरि हैं।] 

     "पातकानां गणः सर्वः प्राप्ते चैकादशी दिने ।
    भीतो विलीयते चान्ने न भोक्तव्यं ततो नरैः ॥"
                 ( जैमिनीय आ. ५२ । ३२ ) 

••एकादशी का दिन आने पर पातकों का समस्त समुदाय भयभीत होकर अन्न में छिप जाता है। इसलिये उस दिन मनुष्यों को अन्न नहीं खाना चाहिये । 

•• एकादशी के दिन न खाने से जो अन्न बचता है, उसे दूसरे दिन द्वादशी में अन्न ग्रहण करने के पूर्व दान करना चाहिये। द्वादशी के समान कोई पुण्यप्रद तिथि नहीं, नारायण के समान कोई बन्धु नहीं तथा गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं-ऐसा शास्त्रवचन है। 

        "नारायणसमो बन्धुर्न, तिथिद्वादशीसमा ।
        विष्णुपादोदकैतीर्थ न तुल्यं भुवनप्रये ॥"
                   ( जैमिनीय आ. ५९ । ९८ ) 

द्वितीय और पंचम भाव का परस्पर केंद्र संबंध और आचमन का महत्व 
••चम् धातु भ्वादिगणी परस्मैपदी चमति का अर्थ पीना, गटकना, उदरस्थ करना है। आ उपसर्ग पूर्वक चम् धातु और ल्युट् प्रत्यय से बनता है- आचमन घूंट-घूंट जल पीने की क्रिया का नाम है-आचम । प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान से पूर्व तथा भोजन के पूर्व और पश्चात् हथेली पर जल रख कर घूंट-घूंट कर के पीना ही आचमन है। आचमन न करने पर हमारे समस्त कृत्य विफल हो जाते हैं। 

    "यः क्रियां कुरुते मोहाद् अनाचम्यैव नास्तिकः। 
      भवन्ति हि वृथा तस्य क्रियाः सर्वा न संशयः ॥" 

••आचमन का इतना महत्व क्यों है ? आचमन क्यों करना चाहिये ? आचमन क्यों इतना आवश्यक है ? आचमन न करने पर जप एवं अनुष्ठान क्यों विफल हेते हैं ? 
       इन सब बातों का उत्तर ज्योतिषशास्त्र में कुण्डली के पञ्चम भाव से अच्छी तरह मिलता है। 

•द्वितीय भाव (मुख) और पंचम भाव (उदर) एक दूसरे से केन्द्र स्थान में हैं। द्वितीय से पंचम, चतुर्थ है तथा पंचम से द्वितीय, दशम है। पुराण वाक्य है-'मुखात् अग्निर्जायते ।' 

•ब्रह्मा के मुख से अग्नि की उत्पत्ति होती है। यह अग्नि रहती है, पंचम भाव (पेट) में विराट पुरुष के पंचम भाव में पाँचवी राशि सिंह पड़ती है। सिंह का अधिपति सूर्य है। पेट अग्नि का वास स्थान है। अग्नि और सूर्य में अभेद है। क्यों कि सूर्य अग्नि स्वरूप एवं प्रकाशमय है। सूर्य को उम्र कहा जाता है। अंग भ्वादि पर अंगति का अर्थ है चलना, चक्कर काटना। अंग् + रन् अग्न। जो चक्कर लगाता है, = उसे अग्र कहते हैं। उत् उपसर्ग + अग्र= उदग्र= उग्र (द का लोप करने पर) जो ऊपर की ओर अर्थात् आकाश में चक्कर लगाता है, उसे उग्र कहा गया। सूर्य ऐसा करता है। यह पूर्व में उदय होकर, ऊपर उठता हुआ पूरे आकाश का चक्कर लगाता हुआ पश्चिम में अस्त होता है। ऐसा सतत होता है। इसलिये सूर्य का नाम उग्र है। 

• सूर्य में उष्मा होती है। इसलिये इसका स्वभाव उष्ण हुआ उष्णता से जलन होती है, हिंसा होती है। अतः उग्र का अर्थ उष्ण वा सोक्षण हुआ। अग्नि और जल में सतत शत्रुता होती है। यद्यपि अग्नि से जल की उत्पत्ति होती है। रूप तन्मात्र से रस तन्मात्र उत्पन्न होता है। यहाँ अग्नि, जल का पिता हुआ तथा जल, अग्नि का पुत्र। पुत्र से पिता हारता है। यह लोक में देखा जाता है। अयोध्यापति राम अपने पुत्र लव-कुश से हार गये। पाण्डुपुत्र अर्जुन को उनके पुत्र बभ्रुवाहन ने रणक्षेत्र में परास्त किया था। हार जाने पर भी पिता अपने पुत्र से स्नेह करता है। इसलिये वह उसे देखते ही शान्त हो जाता है, अपनी उपता खो देता है, प्रसन्न हो जाता है। सूर्य को जब उसका पुत्र शनि अपनी तृतीय, सप्तम, दशम दृष्टि से देखता है। तो सूर्य निष्क्रिय हो जाता है। इस तथ्य को जो ज्योतिषी समझता है, उससे फलित में भूल नहीं होती। 

• उदरस्थ सूर्यारित को कैसे शान्त किया जाय ? कैसे प्रसन्न किया जाय ? आचमन से / जल से / शीतल जल से / रस से उदर की अग्नि के प्रसन्न होने पर कार्य की सिद्धि होती है, शरीर स्वस्थ रहता है, दीर्घायु होती है। जैसे आग्न्येयास्त्र को वरुणास्त्र से शान्त किया जाता है, वैसे उदर की उष्णता को जल के आचमन से न्यूनतर किया जाता है। इसका प्रभाव सिर पर पड़ता है। विचार सौम्य हो जाते हैं। पुष्टि कर्म सफल  होता है। 

•जैसे आचमन करने वा जल पीने से शिर प्रभावित होता है, वैसे ही शिर पर जल डालने से वा अभिषेक करने से पेट प्रभावित होता है। विराट् पुरुष की कुण्डली में लग्न में सूर्य की उच्च राशि मेष होती है। यह मंगल की स्व/ मूलत्रिकोण राशि है। पञ्चम में सूर्य की स्व/ मूलत्रिकोण राशि सिंह होती है। ये दोनों राशियाँ आग्न्येय हैं। दोनों परस्पर नवम-पञ्चम स्थिति के कारण संबंधित है। सिंह को अग्नि को शान्त करने के लिये हम आचमन करते हैं। मेष की उष्मा को शान्त करने के लिये हम अभिषेक (स्नान) करते हैं। अभिषेक शिर स्नान यह अनुभवगम्य सत्य है-भूख लगने पर स्नान किया जाय तो सुधा शान्त/ कम हो जाती है तथा क्रोध आने पर पानी पीने से क्रोध मिट जाता वा कम हो जाता है। आचमन और अभिषेक दोनों क्रियाओं का महत्व है। इनमें से एक (आचमन) आन्तरिक है तो दूसरी (अभिषेक) बाह्य। अभिषेक की अपेक्षा आचमन का प्रभाव अधिक है। क्योंकि पेट में अधिक समय तक जल टिकता है, जब कि शिर पर अल्प काल तक यह ठहरता है। शिर = शिव। दोनों 'शी' धातु से बने हैं और दोनों का अर्थ एक समान है। जो अपने शिर पर जल न छिड़क कर केवल पत्थर का अभिषेक करता है, वह बालक है। सूर्य अपनी किरणों से जल का शोषण करता है, क्योंकि सूर्य को जल प्रिय है। शिव को जल अर्पित किया जाता है। अतः सूर्य और शिव में अभेद है। सूर्य शिव सूर्य के अतिरिक्त अन्य किसी शिव की कल्पना करने वाला जड़मति है। उस जड़मति को मेरा नमस्कार । वैद्यचिन्तामणि नामक ग्रन्थ में लिखा है- 'जो शिव और विष्णु में भेद करता है, उसे उदर रोग होता है।' जो शिव और विष्णु में अभेद करता है, उस ज्ञानी को मेरा सतत नमस्कार । 

•आचमन के महत्व को दर्शाने वाली एक कथा महाभारत की है। इसे यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ। उत्तक नाम का एक ब्रह्मचारी राजा पौष्य के पास गुरुदक्षिणा के निमित्त गया। मार्ग में उसे बैल पर चढ़ा एक विशालकाय पुरुष मिला। उसके कहने से उत्तक ने उस बैल का गोबर खाया और खड़े खड़े उपस्पर्श (कुल्ला / आचमन किया। तद् वृषभस्य मूत्रपुरीषं च भक्षयित्वोत्तकः सम्भ्रमादुत्थित एवाप उपस्पृश्य प्रतस्थे ।' महाभारत आदि पर्व ३ । १०१ । राजा पौष्य के पास पहुँच कर उन्होंने अपने कार्य का निवेदन किया। तत्पश्चात् वे रनिवास में रानी से मिलने गये। उन्हें रानी का दर्शन नहीं हुआ, क्योंकि वे जूठे मुँह थे। जब वे पुनः विधिवत् आचमन किये तो रानी उनके सामने दृष्टिगोचर हुई। यहाँ वृष धर्म है, उसका मूत्र पुरीष धर्म का तत्व सत्य एवं आचार है। वह विशालकाय पुरुष शिव है। रानी इष्ट शक्ति है। राजा पौष्य सुकाल है। उत्तक साधक है। 

•इस कथा का सारांश है- योग्यता पात्रता तपस्या के होते हुए भी ठीक से विधिपूर्वक आचमन न करने से इष्टसिद्धि नहीं होती। आचमन कैसे किया जाय ? 

       १."अन्तर्जानुः शुची देशे उपविष्ट उदङ्मुखः ।
     प्राड् वा ब्राह्येन तीर्थेन द्विजो नित्यमुपस्पृशेत्॥" 
     ( याज्ञवल्क्यस्मृति, आचाराध्याय, श्लोक १८ । ) 

•शुचौ देशे= पवित्र स्थान पर उपविष्टः = बैठकर उदङ्मुखः उत्तरदिशा की ओर मुख करके। | 
• प्राचीमुख = पूर्व की ओर मुख कर ब्राह्येन तीर्थेन = हथेली के चन्द्र और शुक्र पर्वतों के बीच वाले भाग से। द्विजः = यज्ञोपवीती नित्यम् = प्रतिदिन, सदैव उपस्पृशेत् = आचमन करे ।] 

   २. "निवशिखकच्छस्तु द्विज आचमनं चरेत्।"
                           (पाराशरस्मृति)
[लौंग लगा कर शिखा बाँध कर द्विज आचमन करे ।] 

३. "त्रिः प्राश्यापो द्विरुन्सृज्य खान्यद्भिः समुस्पृशेत् ।"
                ( याज्ञवल्क्य, आचाराध्याय,२०) 

[ तीन बार जल पी कर दो बार अंगुष्ठमूल से होठों को पोंछना चाहिये। खानि = छिद्राणि = आँख, कान, नाक, मुख ऊपर के सात छिद्र ] 

•आचमन के समय बायें हाथ की तर्जनी से दायें हाथ के जल का स्पर्श करें तो सोमपान का फल मिलता है। 

     "दक्षिणे संस्थितं तोयं तर्जन्या सव्यपाणिना। 
       तत्तोयं स्पृशते यस्तु सोमपानफलं लभेत् ॥" 

•छींक आने पर थूकने पर, सो कर उठने पर, वस्त्र पहनने पर अश्रु गिरने पर आचमन करे, अथवा दाहिने कान के स्पर्श से भी आचमन को विधि पूरी होती है। 

       "क्षुते निष्ठीवने सुप्ते परिधानेऽश्रुपातने । 
  पञ्चस्वेतेषु चाचमनेत् श्रोत्रं वा दक्षिणं स्पृशेत्॥"
                ( देवी भगवान् ११ । ३ । २)
•आचमन मंत्रहीन नहीं होना चाहिये। विष्णु के सहस्रनामों में से केशव माधव नारायण गोविन्द पुण्डरीकाक्ष हृषीकेश आदि नामों के उच्चारयुक्त नमस्कार के साथ द्विज को अचमन करना चाहिये।
•आचमन का अर्थ है, शिवार्चन। शिवार्चन का अर्थ है, अग्नि प्रसादन। अग्नि को प्रसन्नता से क्या नहीं सिद्ध होता ?
                           " अग्नये नमः ।" 🙏
                     साभार ✍️#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्
                            वयं राष्ट्रे जागृयाम

"जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते"

    "जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते"।
इस श्लोक का कर्मणा वर्ण-व्यवस्था मानने वालों द्वारा बड़ा प्रचार किया जाता है। आर्यसमाजी कहते हैं कि - "देखो, देखो, सभी जन्म से शूद्र ही उत्पन्न होते हैं, और संस्कारों से वे द्विज कहलाते हैं"।

हालांकि इस श्लोक से उनका मंतव्य तो सिद्ध नहीं होता, उल्टा अनजाने में इससे जन्मना वर्ण-व्यवस्था ही सिद्ध हो जाती है। क्यों कि इस श्लोक में "जन्म" से सबको शूद्र वर्ण का मान लिया गया, तब कर्मणा वर्ण-व्यवस्था तो खंडित हो गई। क्यों कि शूद्र का कर्म सेवा करना माना जाता है। अब जन्म लेने वाले ने सेवा-कर्म तो कोई किया नहीं, उल्टा सेवा करवा रहा है, फिर भी "केवल जन्म के कारण" उसे कर्मणा-व्यवस्था के विरुद्ध शूद्र मान लेने से तो 'कर्मणा व्यवस्था की धज्जियाँ ही उड़ गईं, और जन्मना वर्ण सिद्ध हो गया।

आर्यसमाजियों के सामने फिर एक और बड़ी समस्या खड़ी होगी। वह यह कि - शूद्र के उपनयन संस्कार की विधि किसी शास्त्र में नहीं मिलती। स्वामी दयानंद भी शूद्रों के उपनयन-संस्कार का विधान बताकर नहीं गए हैं, अर्थात् वे शूद्रों का उपनयन-संस्कार का निषेध कर गए हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य का उपनयन तो स्वामी दयानंद अपनी पुस्तक 'संस्कार विधि' में लिख गए हैं, किस आयु में करना है, सब बताकर गए हैं, किंतु शूद्र का नहीं बताकर गए हैं। तब ये जो जन्म से सब आर्यसमाजी शूद्र पैदा होंगे, इनका उपनयन ही नहीं हो पाएगा, न वेद पढ़ पाएंगे, तब तो सब समाजी शूद्र ही रहेंगे, द्विज कैसे बन पाएंगे? ये श्लोक भी तब कैसे फलित होगा? अर्थात् यदि जन्म से सबको वास्तविक शूद्र माना गया होता, तब तो प्रत्येक शास्त्र में शूद्र के उपनयन आदि संस्कारो का विधान दिया गया होता, किंतु वह तो किसी शास्त्र में है ही नहीं। इस प्रकार यह पक्ष पूर्णतः खंडित हो गया।

अतः इस श्लोक का तात्पर्य यह नहीं है कि जन्म से सब शूद्र वर्ण के होते हैं। इसका तात्पर्य है कि उपनयन-कर्म से पूर्व एकज होने से सब शूद्र के समान होते हैं। क्यों कि शूद्र का उपनयन नहीं होता है। अर्थात् यहाँ असंस्कृत अवस्था कही गई है। 

अब समाजी कहें कि - श्लोक में "शूद्रवत्" शब्द है ही नहीं तो नहीं, फिर "शूद्र के समान" अर्थ क्यों ग्रहण करें?

इसके समाधान के लिए पतंजलि का महाभाष्य देखें, उसमें आता है - "अंतरेणापि वतिमतिदेशो गम्यते। तद् यथा - एष ब्रह्मदत्तः। अब्रह्मदत्तं ब्रह्मदत्त इत्याह, तेन मन्यावहे - ब्रह्मदत्तवद् अयं भवति।"

अर्थात - जो "वह" न हो, किंतु उसको "वह" कह दिया जाए, तो उसका भाव होता है - "उसके समान"।

अतः ऐसे स्थलों पर "वत्" प्रत्यय न होने पर भी "वत्" का अर्थ लग जाता है। जैसे कि कहा गया है - "विद्याविहीनः पशुः" अर्थात् विद्याविहीन मनुष्य पशु होता है। अब यहाँ क्या मनुष्य साक्षात चार पैरों वाला पशु हो जाता है? नहीं, बल्कि अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए यहाँ पर "पशुरिव" अर्थ लिया जाएगा। पशु के समान उसे समझा जाता है। इसी प्रकार उपनयन के पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि को शूद्र कहना भी अर्थवाद है।

जैसे कि कहा जाता है - "दुर्जनः सर्पः" - तब दुर्जन को क्या वास्तविक साँप समझकर आर्यसमाजी उसे स्वामी दयानंद के कहे अनुसार अंधा करके "बेडरूम" में लेकर भाग पड़ेंगे? कहा जाए - "कायरः मृतकः", तब आर्यसमाज में कोई मनुष्य कायरता दिखाए तो उसे मृतक ही मानकर समाजी उसका दाह संस्कार करने का उद्योग करने लगेंगे? "आलसीः पाषाणः" - आलसी मनुष्य को पत्थर मानकर समाजी उस पर सिर मारेंगे?

स्वयं आर्यसमाजी ही स्वामी दयानंद के लिए कहते हैं कि - "दयानन्दः सिंहः आसीत्।" - स्वामी जी शेर थे। तब आर्यसमाजी अपनी बुद्धि का उपयोग करके उन्हें "सिंह के समान" मानेंगे अथवा "जन्मना जायते शूद्रः" की भाँति स्वामी जी को शिकार करने वाला, नरभक्षी, मांस खाने वाला, शेरनियों से भोग करने वाला, जंगल का शेर ही मान लेंगे?

स्मृतियों में ऐसे अनेक वाक्य मिलते हैं - "ब्राह्मणाद्याः शूद्रतां यांति संस्कारहीनाः" - अर्थात - ब्राह्मण आदि, संस्कारों के अभाव में शूद्रतुल्य हो जाते हैं। बस यही शूद्रवत् होना संस्कारों के अभाव में जन्म से होना कहा गया है।

इसी प्रकार "ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः" का भी समझना चाहिए। वैसे यह उत्तरार्ध किसी टीका में मिलता नहीं है। लेकिन हो भी तो यह ब्रह्मज्ञान का प्रशंसार्थवाद है। अन्यथा उपनिषदों में वर्णित अश्वपति, प्रवाहण, जनक, अजातशत्रु, यम आदि ब्रह्मज्ञाता थे किंतु उन्हें ब्राह्मण नहीं कहा गया है। और ब्रह्मविद्या न जानने वालों को भी अब्राह्मण नहीं कहा गया, बल्कि ब्राह्मण ही कहा गया है। जैसे कि नचिकेता, गार्ग्य, बालाकि आदि ब्रह्मविद्या न जानते हुए भी ब्राह्मण ही कहे और माने गए हैं। शास्त्रो में ऐसे हजारो उदाहरण हैं, लेकिन जन्म से सबको शूद्र जाति का समझा गया हो, ऐसा कोई उल्लेख कही नहीं मिलता। अतः ऐसे कथन प्रशंसार्थवाद और औपचारिक होते है। वास्तविक नहीं।

न्याय शास्त्र में कहा गया है - "प्रधानशब्दानुपपत्तेः गुणशब्देन अनुवादः, निंदाप्रशंसोपपत्तेः"। ऐसे स्थलों पर निंदा-प्रशंसा ही विवक्षित होती है, वास्तविकता नहीं। जो शास्त्रीय रीति नहीं समझते अथवा किसी सांप्रदायिक दुराग्रह से ग्रस्त होते हैं, ऐसे अज्ञानी न शास्त्रों की शैली समझते हैं, न रीति, न ही बुद्धि-विवेक का प्रयोग करते हैं। केवल अपनी मतांधता में शास्त्रों के सैकड़ों प्रमाणों की अवहेलना करके, ऐसे श्लोकों से गलत भाव ग्रहण करके भ्रम फैलाते हैं।
                    साभार - शचींद्र शर्मा 
   (आर्य समाजी सहित सभी आर्य हिंदू खालसा विद्वान नागरिक इस लेख पर कमेंट अवश्य करें । )
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