इस श्लोक का कर्मणा वर्ण-व्यवस्था मानने वालों द्वारा बड़ा प्रचार किया जाता है। आर्यसमाजी कहते हैं कि - "देखो, देखो, सभी जन्म से शूद्र ही उत्पन्न होते हैं, और संस्कारों से वे द्विज कहलाते हैं"।
हालांकि इस श्लोक से उनका मंतव्य तो सिद्ध नहीं होता, उल्टा अनजाने में इससे जन्मना वर्ण-व्यवस्था ही सिद्ध हो जाती है। क्यों कि इस श्लोक में "जन्म" से सबको शूद्र वर्ण का मान लिया गया, तब कर्मणा वर्ण-व्यवस्था तो खंडित हो गई। क्यों कि शूद्र का कर्म सेवा करना माना जाता है। अब जन्म लेने वाले ने सेवा-कर्म तो कोई किया नहीं, उल्टा सेवा करवा रहा है, फिर भी "केवल जन्म के कारण" उसे कर्मणा-व्यवस्था के विरुद्ध शूद्र मान लेने से तो 'कर्मणा व्यवस्था की धज्जियाँ ही उड़ गईं, और जन्मना वर्ण सिद्ध हो गया।
आर्यसमाजियों के सामने फिर एक और बड़ी समस्या खड़ी होगी। वह यह कि - शूद्र के उपनयन संस्कार की विधि किसी शास्त्र में नहीं मिलती। स्वामी दयानंद भी शूद्रों के उपनयन-संस्कार का विधान बताकर नहीं गए हैं, अर्थात् वे शूद्रों का उपनयन-संस्कार का निषेध कर गए हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य का उपनयन तो स्वामी दयानंद अपनी पुस्तक 'संस्कार विधि' में लिख गए हैं, किस आयु में करना है, सब बताकर गए हैं, किंतु शूद्र का नहीं बताकर गए हैं। तब ये जो जन्म से सब आर्यसमाजी शूद्र पैदा होंगे, इनका उपनयन ही नहीं हो पाएगा, न वेद पढ़ पाएंगे, तब तो सब समाजी शूद्र ही रहेंगे, द्विज कैसे बन पाएंगे? ये श्लोक भी तब कैसे फलित होगा? अर्थात् यदि जन्म से सबको वास्तविक शूद्र माना गया होता, तब तो प्रत्येक शास्त्र में शूद्र के उपनयन आदि संस्कारो का विधान दिया गया होता, किंतु वह तो किसी शास्त्र में है ही नहीं। इस प्रकार यह पक्ष पूर्णतः खंडित हो गया।
अतः इस श्लोक का तात्पर्य यह नहीं है कि जन्म से सब शूद्र वर्ण के होते हैं। इसका तात्पर्य है कि उपनयन-कर्म से पूर्व एकज होने से सब शूद्र के समान होते हैं। क्यों कि शूद्र का उपनयन नहीं होता है। अर्थात् यहाँ असंस्कृत अवस्था कही गई है।
अब समाजी कहें कि - श्लोक में "शूद्रवत्" शब्द है ही नहीं तो नहीं, फिर "शूद्र के समान" अर्थ क्यों ग्रहण करें?
इसके समाधान के लिए पतंजलि का महाभाष्य देखें, उसमें आता है - "अंतरेणापि वतिमतिदेशो गम्यते। तद् यथा - एष ब्रह्मदत्तः। अब्रह्मदत्तं ब्रह्मदत्त इत्याह, तेन मन्यावहे - ब्रह्मदत्तवद् अयं भवति।"
अर्थात - जो "वह" न हो, किंतु उसको "वह" कह दिया जाए, तो उसका भाव होता है - "उसके समान"।
अतः ऐसे स्थलों पर "वत्" प्रत्यय न होने पर भी "वत्" का अर्थ लग जाता है। जैसे कि कहा गया है - "विद्याविहीनः पशुः" अर्थात् विद्याविहीन मनुष्य पशु होता है। अब यहाँ क्या मनुष्य साक्षात चार पैरों वाला पशु हो जाता है? नहीं, बल्कि अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए यहाँ पर "पशुरिव" अर्थ लिया जाएगा। पशु के समान उसे समझा जाता है। इसी प्रकार उपनयन के पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि को शूद्र कहना भी अर्थवाद है।
जैसे कि कहा जाता है - "दुर्जनः सर्पः" - तब दुर्जन को क्या वास्तविक साँप समझकर आर्यसमाजी उसे स्वामी दयानंद के कहे अनुसार अंधा करके "बेडरूम" में लेकर भाग पड़ेंगे? कहा जाए - "कायरः मृतकः", तब आर्यसमाज में कोई मनुष्य कायरता दिखाए तो उसे मृतक ही मानकर समाजी उसका दाह संस्कार करने का उद्योग करने लगेंगे? "आलसीः पाषाणः" - आलसी मनुष्य को पत्थर मानकर समाजी उस पर सिर मारेंगे?
स्वयं आर्यसमाजी ही स्वामी दयानंद के लिए कहते हैं कि - "दयानन्दः सिंहः आसीत्।" - स्वामी जी शेर थे। तब आर्यसमाजी अपनी बुद्धि का उपयोग करके उन्हें "सिंह के समान" मानेंगे अथवा "जन्मना जायते शूद्रः" की भाँति स्वामी जी को शिकार करने वाला, नरभक्षी, मांस खाने वाला, शेरनियों से भोग करने वाला, जंगल का शेर ही मान लेंगे?
स्मृतियों में ऐसे अनेक वाक्य मिलते हैं - "ब्राह्मणाद्याः शूद्रतां यांति संस्कारहीनाः" - अर्थात - ब्राह्मण आदि, संस्कारों के अभाव में शूद्रतुल्य हो जाते हैं। बस यही शूद्रवत् होना संस्कारों के अभाव में जन्म से होना कहा गया है।
इसी प्रकार "ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः" का भी समझना चाहिए। वैसे यह उत्तरार्ध किसी टीका में मिलता नहीं है। लेकिन हो भी तो यह ब्रह्मज्ञान का प्रशंसार्थवाद है। अन्यथा उपनिषदों में वर्णित अश्वपति, प्रवाहण, जनक, अजातशत्रु, यम आदि ब्रह्मज्ञाता थे किंतु उन्हें ब्राह्मण नहीं कहा गया है। और ब्रह्मविद्या न जानने वालों को भी अब्राह्मण नहीं कहा गया, बल्कि ब्राह्मण ही कहा गया है। जैसे कि नचिकेता, गार्ग्य, बालाकि आदि ब्रह्मविद्या न जानते हुए भी ब्राह्मण ही कहे और माने गए हैं। शास्त्रो में ऐसे हजारो उदाहरण हैं, लेकिन जन्म से सबको शूद्र जाति का समझा गया हो, ऐसा कोई उल्लेख कही नहीं मिलता। अतः ऐसे कथन प्रशंसार्थवाद और औपचारिक होते है। वास्तविक नहीं।
न्याय शास्त्र में कहा गया है - "प्रधानशब्दानुपपत्तेः गुणशब्देन अनुवादः, निंदाप्रशंसोपपत्तेः"। ऐसे स्थलों पर निंदा-प्रशंसा ही विवक्षित होती है, वास्तविकता नहीं। जो शास्त्रीय रीति नहीं समझते अथवा किसी सांप्रदायिक दुराग्रह से ग्रस्त होते हैं, ऐसे अज्ञानी न शास्त्रों की शैली समझते हैं, न रीति, न ही बुद्धि-विवेक का प्रयोग करते हैं। केवल अपनी मतांधता में शास्त्रों के सैकड़ों प्रमाणों की अवहेलना करके, ऐसे श्लोकों से गलत भाव ग्रहण करके भ्रम फैलाते हैं।
साभार - शचींद्र शर्मा
(आर्य समाजी सहित सभी आर्य हिंदू खालसा विद्वान नागरिक इस लेख पर कमेंट अवश्य करें । )
🙏
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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