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Friday, 9 January 2026

त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ॥

 •विष्णु के अतिरिक्त और कोई सत्ता नहीं हैं ।
 अष्टाविंशद्वय= २८ नक्षत्रों से युक्त नीलवर्ण आकाश का विष्णु  तामसरूप है। यह देखा जाता दिखायी पड़ता तथा इससे इसके आलोक में पार्थिव वस्तुएँ देखी जाती हैं। इससे यह पशु है। वृक्ष, लता, गुल्म, वीरुध, तृण तथा गिरि-यह ६ भेदों वाला मुख्य (उद्भिद) रूप भी विष्णु का है। खन् + अच् + यत्= मुख्य भूमि को खन कर/ चीर कर निकला हुआ प्राणी/वनस्पति समुदाय मुख्य वा उद्भिद है। विष्णु के इन नाना रूपों को नमस्कार कर मैं श्री महाराज जी के सम्मुख भक्तिभाव से नत होता हूँ।

 • एक सदाशिव है तो एक शिव है। एक महाविष्णु है तो एक विष्णु है। एक ब्रह्म है तो एक ब्रह्मा है। सदाशिव, महाविष्णु एवं ब्रह्म का वर्णन करना किसी के लिये भी शक्य नहीं है। जो पुरुष स्त्री के साथ ऊंचे स्थान एकान्त में अपरिग्रह वृत्ति से रहता हुआ पत्नी को ज्ञान कथा सुनाता, समाधि लगाता ऐसा पुरुष शिव है। उसे प्रणाम । जो पुरुष द्वीप द्वीपान्तर में सबसे दूर समुद्र से घिरे व दुर्गम स्थान में पत्नी सहित रहते हुए योगनिद्रा में लीन रहता तथा समस्त जगत् के कल्याण का उपक्रम करता, वह विष्णु है। उसे मेरा सादर प्रणाम । जो पुरुषों चारों वेदों को जानता, भूमि पर कमल की पंखुड़ियों के आसन पर बैठ कर धर्म पर प्रवचन करता और स्त्री वियुक्त होता, वह ब्रह्मा है। उसे मेरा महाप्रणाम ! इस सृष्टि में ऐसे अनेक पुरुष सतत विद्यमान रहते हैं। विष्णु की पत्नी लक्ष्मी पुत्रहीना/ बाँझ है। विष्णु के पास ऐश्वर्य एवं टाठवाट खूब है। शिव को भार्या पार्वती सपुरा है। शिव के पास कुछ है ही नहीं, सर्वाभाव है निष्कर्ष यह कि संतानहीन धनी होते हैं तथा पुत्रवान् लोग दरिद्र / धनहीन होते हैं। ब्रह्मा की स्त्री ब्रह्माणी उनके साथ ही नहीं रहती। उसे ब्रा की विद्वत्ता से चिढ़ है। तात्पर्य यह कि विद्वान पुरुषों की पलियों पति से असन्तुष्ट रहती हैं। यह सब लोक सत्य है। अतएव असाधारण बनना होना ठीक नहीं सामान्य स्तर का जीवन जीने वाले साधारण लोग वे हैं जिनके पास थोड़ा धन थोड़े पुत्र पुत्री, थोड़े मित्र बान्धव, थोड़ा ज्ञान बुद्धि है तथा जिनकी पत्नी थोड़ी पढ़ी लिखी एवं थोड़ी सुन्दर है। ऐसे सामान्य श्रेणी के लोगों को मेरा प्रणाम ।

 • जो सब के भीतर भाव बन कर व्याप रहा है तथा जिसमें सब लोग समाहित हैं, वह विष्णु है। फिर भी यह नित्य शान्त है, इसलिये यह शिव है। यह हर क्षेत्र में बढ़ा चढ़ा एवं बड़प्पन से युक्त है, इसलिये ब्रह्मा है। त्रिदेव को मेरा प्रणाम । 

 •जो मुझमें है, वह माया है। मयि या सा माया मुझमे विष्णु है, अतः विष्णु ही माया है। माया शून्य है। यह नवरूपों में अभिव्यक्त होती है। ये रूप अंक हैं। जो इन रूपों / अंकों को जानता है, वह अंकविद् सांख्यशास्त्री है। संख्या रूप विष्णु को मेरा प्रणाम !

 •शून्य से एक दो तीन चार पाँच छः सात आठ नौ का जन्म होता है। शून्य पिता है। इसके नौ पुत्र हैं। इन नौ पुत्रों से अनेक पौत्र पैदा हुए हैं। संख्यात्मक विश्व का इतना ही इतिहास है। अब मैं पिता पुत्र के नामार्थों का चिन्तन करता हूँ।

♂ १. शून्य का अर्थ- शुन् (गतौ तुदा. पर शुनति) + क्विप् + यत्= शून्य (उकारस्य उकारः)। 

•चलने योग्य स्थान, जहाँ निर्बाध रूप से चला जा सके, वह शून्य है। निर्बाध गति वहीं होती है जहाँ अवरोध न हो। अवरोध का अभाव रिक्त स्थान में ही होता है। खाली जगह, जहाँ कुछ भी न हो, हवा तक न हो, वह शून्य है। अकाश में कुछ नहीं है, हवा भी नहीं है। हवा तो अन्तरिक्ष में है। आकाश निर्बाध गति का स्थान है। अवकाश होने से यह आकाश है तथा रिक्त होने से इसे शून्य कहते हैं।

♂ २. एक का अर्थ - शून्य का ज्येष्ठ पुत्र एक है। इण् (गतौ अदा पर एति) + कन् = एक, जो बिना रुके हुएचलता है, शाश्वत गतिधारी ।

• प्रकाश का एक लाल गोला क्षितिज में एक नियत स्थान से प्रकट होता है, धीरे-धीरे चलता, ऊपर उठता, आगे बढ़ता, दूसरे विपरीत क्षितिज की ओर बढ़ता और अन्ततः एक नियत स्थान पर क्षितिज में लुप्त हो जाता। सदैव ऐसा होता रहता है। इस चलते रहने पाले गोले का कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है। इसके समान और दूसरा कोई नहीं है। यह सूर्य ही एक है। यह आकाश में अकेले इस तरह प्रकाश विखेरता हुआ विचरता है। आकाश से इसका जन्म होता है और किरण देता है। इसलिये यह आकाश के समान कोणरहित वर्तुल गोल है।

 ••वेद कहता है...
"एक एवाग्निर्बहुधा समिद्ध 
एक: सूर्यो विश्वमनु प्रभूतः ।
 एकैवोषा: सर्वमिदं वि भाति
 एक वा इदं वि बभूव सर्वम् ॥"
     ( ऋग्वेद ८/५८/२)

 •अग्नि एक ही है। वह बहुत रूपों में प्रज्जवलित होता है। सूर्य एक है। वह अनेक रूपों में हर स्थान से देखा जाता है। ऊषा एक ही है। वह इन सब रूपों को प्रकाशित करती है। यह सब एक ही हुआ ! एकाय नमः ।

 ♂३. द्वौ (दो) का अर्थ- (दारणे द्वरति) + क्विप् = द्वि [रलोपः] ।

• सूर्य पूर्व के क्षितिज से उदित होकर चलता हुआ, आकाश को फाड़ता हुआ, वाम (उत्तर) और दक्षिण भाग में आकाश को अलग करता हुआ पश्चिम के क्षितिज में अस्त होता है। उसका यह कार्य द्वि = दारण है। इस दारण कर्म के फलक-उत्तरायन एवं दक्षिणायन हैं। विराट् पुरुष अपने स्वरूप का दारण संकल्प से करता है। वाम भाग स्त्री तथा दक्षिण भाग पुरुष कहलाता है।

√•आकाश = विराट् पुरुष।
√•उत्तर अयन= स्त्री भाग। 
√•दक्षिण अयन = पुरुष भाग।
√•द्वि + औ = द्वौ = दो की संख्या।
 √•यह शून्य का पुत्र है जो 'एक' के पश्चात् उत्पन्न हुआ है [ द्वौ पुंलिंग, द्वे स्त्री एवं नपुंस् लिंग] ।

••वेद कहता है...

 "द्वे ते चक्रे सूर्ये ब्रह्माण ऋतुथा विदुः ।
 अथैकं चक्रं यद् गुहा तदद्धातय इद् विदुः ॥"
 (ऋग्वेद १०/८५/१६, अथर्व. १४ । १।१६ )

 • उन दो चक्रों को ब्रह्मवेत्ता लोग सूर्य की अयन गति के रूप में जानते हैं। उस एक चक्र सूर्य को जो कि गोपनीय है, उसे सत्यानुगामी विद्वान् ही जानते हैं। द्वाभ्यामयनाभ्यां नमः । 

♂४. त्रि (तीन) का अर्थ-तृ (तृ) (पारगतौ तरति) + क्विप्= त्रि (तृ)।
 इसका अर्थ है- आरपार की गति । सूर्य पूर्व से निकल कर पश्चिम की ओर अस्त होने के लिये कभी धीरे-धीरे चलता है, कभी तीव्रगति से चलता है तो कभी मध्यमगति (न तीव्र, न मन्द) से चलता है। मन्द गति से आकाश को पार करते समय दिन बड़ा होता है, फलतः रात छोटी होती है। तीव्र गति से व्योम का मापन करने से दिन छोटा होता और रात बड़ी होती है। सम गति से चलने पर दिन रात समान होते हैं। चैत्र एवं आश्विन मासों वा वसन्त एवं शरद ऋतुओं में समगति, ग्रीष्म में मन्द गति तथा शीत ऋतुओं में शीघ्र गति होती है। इस प्रकार सूर्य के शीघ्र, मन्द, सम- ये तीन पाद हैं। शून्य से तीन की उत्पत्ति इस प्रकार है।

•• वेद कहता है ...

"त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः ।
 अतो धर्माणि धारयन् ॥"
         (ऋगवेद १।२२।१८)

•विष्णु (सूर्य) अपने तीन पादों (गतियों)- शीघ्र मन्द एवं सम से आकाश को पार करता है। धर्मो (नियमों) में आबद्ध यह विश्व रक्षक सूर्य इस प्रकार निर्भय होकर चलता रहता है। [ अत् सातत्य गमने अतति इति अतः = शाश्वत गति] । त्रिभ्यः नमः ।

♂ ५. चतुर् (चार) का अर्थ- चत् (चतति-ते याचने) + उरच् =चतुर ।
 चतुर का अर्थ है- याचक, भिखारी। जो कार्य कुछ न करे और उपभोग्य धन/वस्तु दूसरे से ऐंठ ले। ऐसा करके वह स्वयं वस्तुवान् बन जाय वह चतुर है। याचक आगे से माँगता है, पीछे से माँगता है, बायें से माँगता है, दायें से माँगता है। सूर्य की उपस्थिति में पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण की दिशाएँ नीचे से लेकर ऊपर तक अर्थात् पूर्णतः सूर्य से प्रकाश लेती और स्वयं प्रकाशवती हो जाती है। बिना धन के दूसरे का धन लेकर ये धनी बनती हैं। इसलिये चतुर हैं । अर्थात् दिशाएँ चार (संख्या में) मुख्यतः हैं। चार की उत्पत्ति शून्य से होती है।
 चतुर् + जस् = चतस्त्रः (स्त्रीलिंग), चत्वारः (पुंलिंग) चत्वारि (नपुंसकलिंग)।

•• वेद मन्त्र है ...
 "तव  चतस्र: प्रदिशस्तव द्यौस्तव पृथिवी तवेदमुग्रोर्वन्तरिक्षम् ।
  तवेदं  सर्वमात्मन्वद् यत् प्राणत् पृथिवीमनु॥” 
        
(अथर्ववेद ११/२/१०)

•हे उग्र (सूर्य) ! चारों फैली हुए दिशाएँ तेरी हैं, द्युलोक तेरा है, पृथिवी तेरी है, यह विस्तृत अन्तरिक्ष तेरा है, यह सब जगत् तेरी सत्ता के कारण सात्मक हो रहा है और जो पृथिवी पर के प्राणी जीवन जी रहे हैं, वह भी तेरा है । चतुर्भ्यः नमः ।

♂६. पञ्च (पाँच) का अर्थ- पचि (पञ्च) (विस्तारे पञ्चयति-ते) + कनिन्= पञ्चन् । 

•जिसका प्रकाश फैला हुआ है, हमारे सामने, पीछे, दायें, बायें एवं ऊपर सिर पर किन्तु नीचे नहीं। पैर तले अंधेरा तो होता ही है। पैर शूद्र है । शूद्र के नीचे प्रकाश नहीं होता। प्रकाश (ज्ञान) पर शूद्र का अधिकार नहीं है। अग्र, पश्च, वाम, दक्षिण, ऊर्ध्व- इन दिशाओं में प्रकाश होने से सूर्य को पञ्च (मुख) कहते हैं। संख्या पाँच को सूर्य का घर मान लिया गया। सूर्य हिंसन कर्म करता है, अतः पाँच सिंह मान्य है। पञ्चन् + सु = पञ्च=पाँच की संख्या। यह शून्य से इस प्रकार उत्पन्न होती है।

••यह मन्त्र है...

"पञ्च दिशो दैवीर्यज्ञमवन्तु देवीरपामति दुर्मति बाधमानाः ।
 यज्ञपतिमाभजन्ती अस्थात् ॥
 रायस्पोषे रायस्पोषे अधियज्ञो।।"
        ( यजुर्वेद १७/५४)

 •अमति एवं दुर्मति का नाश करती हुई, यज्ञपति (सूर्य) को स्वीकार करती हुई (का सम्मान करती हुई), दिव्य पाँच दिशाएँ-पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण एवं ऊर्ध्व, धन की पुष्टि करें तथा आत्मिक धन (अन्तःकरण) की पुष्टि करें। पञ्चभ्यः नमः ।

 ♂७. षट् (छः) का अर्थ-सो (हिंसायम् स्याति) + क्विप्= पष् ।

 •जो मारक प्रभावापन्न, क्षतिकारक, पीडादायक तथा अमित्र है, वही षट् (षष् + सु) है। रोग और शत्रु पीड़ा देते हैं, दैहिक एवं मानसिक आघात पहुँचाते हैं और निर्बल होने पर मार डालते हैं। कुण्डली में जो भाव शत्रु वा रोग के लिये है, उसे ही पट की संज्ञा दी गयी । षट् = ६ छः की संख्या। यह संख्या ल होगा, वहाँ अवरोध विरोध वैमनस्य अशांति ताप दुःख होगा ही । ६ मुख वाला देवता कार्तिकेय पडानन मारक बन बैठा है। सूर्य स्वयं अग्नि होने से हिंसक है।

• षडैश्वर्य युक्त देवता दुःख देता, दुख लेता (हरता) है। इसलिये यह षण्मय शून्य से होती है। षट् = अशुभ । 

•इन्दो ! न तेभिः मन्त्र है  अष्ट ( पूर्णता का ह्रास है, वह अष्ट (अ संज्ञक होने से में शून्य नहीं होन है। संख्या आठ इसमें कोई सन्दे

 "षड् जाता भूता प्रथमजर्तस्य सामानि षडहं वहन्ति । 
षड्योगं सीरमनु साम साम षडाहुर्द्यावापृथिवी: षडुर्वीः ॥”
         (अथर्ववेद ८ । ९ । १६)

• जाताः भूताः षट्= उत्पन्न हुए भूत (प्राणी) विघ्न युक्त हैं। 

•द्यावापृथिवीः षट् = नीचे से लेकर ऊपर तक, पृथ्वी से द्युलोक पर्यन्त स्थान अवरोधमय है। 

•प्रथमजः सामसाम उर्वी: षट् = सर्वप्रथम उत्पन्न प्रशांतिमयी विस्तृत दिशाएँ मारक प्रभावापन्न हैं। 

•अहम् वहन्ति (वहन्ती) सामानि षट् = अहंकार से युक्त सामगान भी कष्टदायक/नेष्ट हैं। 

•सीरम् अनु-योगम् षट्= बन्धन से युक्त होना, ताप कर है। 

•आहुः =ऐसा कहा जाता है, प्रतिपादित किया गया है।

 ♂८. सप्त (सात का अर्थ- सप् (पूजायाम् सम्बन्धे च) + तनिन् = सप्तन् । सपति यः यत्र यस्मिन् वा स सप्तन् । सप्तन् + सु = सप्त।

 •जहाँ सम्मान का भाव हो, सम्बन्ध स्थापित किया जाय वह स्थान, वस्तु काल सप्त कहा जाता है। लग्न भाव से सामने १८०अंश पर कलत्र / पति भाव है। इसका नाम सप्त है। क्योंकि इस भाव में स्त्री का पुरुष से वा पुरुष का स्त्री से शारीरिक संबंध-संश्लेष परिश्लेष परिरंभ संगम संयोग होता है। इस भाव में स्त्री का पुरुष के प्रति सम्मान होता है तथा पुरुष का स्त्री के प्रति पूज्य भाव होता है। यह लग्न से गिनने पर ७ आता है। इसलिये सप्त = ७। यह अंक भी शून्य से उत्पन्न होता है।

•••यह मन्त्र है ...

“सप्त दिशो नाना सूर्याः सप्त होतार ऋत्विजः। 
देवा आदित्या ये सप्त तेभिः सोमाभि रक्ष इन्द्रयेन्दो परिस्रव ॥ " 
     ( ऋग्वेद ९ । ११४ । ३) 

•दिशः नाना सूर्याः सप्त = सभी दिशाएँ तथा सूर्य के नाना रूप (भिन्न-भिन्न नक्षत्रों में रहने से सूर्य के नाना प्रभाव) परस्पर सम्बन्धित हैं वा आदरणीय हैं।

• होतार: ऋत्विजः सप्त = यज्ञ करने वाला यजमान और यज्ञ को कराने वाले पुरोहित परस्पर सम्बन्धित हैं वा पूज्य हैं।

 •ये देवाः आदिजाः (ते) सप्त= जो देवगण आदित्य गण हैं, वे सब परस्पर सम्बन्धित हैं तथा पूज्य है।

•इन्दो ! इन्द्रय परिस्रव= हे इन्दु ! हमें प्रभुतासम्पन्न करो, अमृत की वर्षा करो।
 नः तेभिः सोमभिः रक्ष =हमारी, उस सोम के द्वारा रक्षा करो, पालन करो ।

♂९. अष्ट (आठ) का अर्थ- अंश् (विभाजने विखण्डने वा अंशयति-ते) + कनिन् = अष्टन् । 
अपूर्णकारक, पूर्णता का ह्रास करने वाला, विखण्डक विनाशक क्षारक दुःखद आपत्कर नेष्ट अनिष्टप्रद, अशुभ जो है, वह अष्ट (अष्टन् + सु) है। जिस भाव की अष्टसंज्ञा होती है, उसमें ये सब गुण स्वतः आ जाते हैं। अष्ट संज्ञक होने से कुण्डली का अष्टम भाव अशुभ हो गया है। अष्ट की उत्पत्ति शून्य से होती है। इसके रूप में केवल अर्धशून्य होता है। यह विशेषता है। इसलिये यह स्वयं में अपूर्ण (विखण्डित) है। संख्या आठ वा अष्टम राशि से जिस ग्रह का प्रत्यक्ष सम्बन्ध हुआ, वह ग्रह भी अशुभ हो जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं। इसका रूप यह है।

•••यह मन्त्र है...

 “अष्टचक्रं वर्तत एकनेमि सहस्राक्षरं प्रपुरो नि पश्चा। 
अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्धं कतमः सः केतुः ॥ "
       ( अथर्ववेद ११ । ४ । २२)

 

  •सहस्र- अक्षरम् एक नेमि प=बलवती, अक्षयशील तथा गतिशील नेमि (परिधि)।

•वर्तत (वर्तते)= विद्यमान है। 

•प्रपुर: निपश्चा= बहुत आगे एवं बहुत पीछे की ओर, अनादि एवं अनन्त, आद्यन्तविहीन ।

•अर्धेन = (अपनी) समृद्धि / ऐश्वर्य / वर्चस्व। [ऋध् (समृद्धौ ऋध्यति ऋध्नोति) + णिच् + अच् = अष्ट चक्रम = मारक दमनकारी चक्र अर्ध समृद्ध सम्पन्न] |

 • विश्वम् भुवनम् जजान = सम्पूर्ण भुवनों को उत्पन्न किया है।

 •यद् अस्य अर्धम् =जो इस (विराट् पुरुष) का ऐश्वर्यमय स्वरूप है।

 •स कतमः = वह अति सुख स्वरूप /
 आनन्दमय है।

• केतु : वह विज्ञानमय ज्ञानस्वरूप है।

♂१०. नव का अर्थ- नु (स्तुतौ नौति) + कनिन् = नवन्। 

•जो सदा स्तुतियोग्य है, स्तुतियों का आगार है, स्तुति का केन्द्र है, जो सदैव प्रसन्न है तथा सबको प्रसन्नता/तुष्टि देता है, वह नव (नवन् + सु) परमतत्व सर्वोपरि ईश्वर है। 

•वा (वादि गतौ) + ड=व = वायु बाहु, निवास, वस्त्र, तरंग, राहु नव जहाँ वायु नहीं, जिसका निवास नहीं, जो वस्त्रहीन है, जिसमें तरंग हलचल नहीं, नहीं राहु (अन्धकार) नहीं, जो भुजाविहीन है, ऐसा व्यापक तत्व ही नव है।

 •नव का अर्थ है, जो आज है जैसा आज है वही उसी रूप में वैसा ही कल (पहले) या, कल (बाद में) रहेगा। जिसमें तनिक भी परिवर्तन नहीं होता वही शाश्वत तत्व ही नव कहलाता है। इसकी उत्पत्ति भी शून्य से होती है। यह शून्य का अन्तिम पुत्र है। इसका अनुज कोई नहीं। इसका अनुगमन कोई नहीं कर सकता। इस अननुगम्य तत्व का स्वरूप यह ऐसा है। वेद मन्त्र है ...

"नव भूमी समुद्रा उच्छिष्टेऽधि श्रिता दिवः।
आसूर्यो भात्युच्छिष्टेऽहोरात्रे अपि तन्मयि॥" 
         (अथर्ववेद ११ । ७ । १४

• भूमी: = भूमिः भवन्त्यस्मिन् भूतानि = स्थान, भाव, पृथ्वी अवकाश (आकाश), परमेश। 

•नव = शाश्वत् ।

• समुद्राः = सम्पूर्ण जल राशि [सम् + उद् + रा + क], सम्पूर्ण आनन्द [ सह + मुद् + रक्]। 

•उच्छिष्टे = प्रलय काल आने पर ।

 •अधि = ब्रह्म तत्व में ।

 •श्रिताः = आश्रय पाते हैं, समाहित हो जाते हैं। 

•दिवः = आकाश में विद्यमान चमकते हुए प्रकाशमान ग्रह नक्षत्रादि पिण्ड ।

 •उच्छिष्टे सूर्यः आभाति = प्रलय काल में सूर्य प्रकाशित होता रहता ।

 •अहोरात्रे अपि (आभाति) = दिनरात (सर्वदा) प्रकाशित होता रहता है। 

•तत् मयि (आभाति)= वही मुझमें भी प्रकाशित है। 

 ••मन्त्रार्थ - भूमि शाश्वत है। सम्पूर्ण जलराशि शाश्वत है। स्वर्गीय पिण्ड शाश्वत हैं। प्रलय में ये बझ में स्थित होते हैं। प्रलय में भी सूर्य प्रकाशित होता है। वह सूर्य (ज्ञान) सर्वदा मुझमें रहे। श्री महाराज जी ने अंकों के अर्थ की अच्छा की इच्छा पूरी होना ही है। यह लेख उसी इच्छा का फल है। अंक जितने हैं, उतने ही ग्रह हैं। ये अंक अखिल जगत् का शासन ग्रह बन कर कर रहे हैं। शून्य से अंक निकले हैं। शून्य से यह प्रादुर्भूत हुए हैं। किन्तु भाव बारह रचे गये हैं, मास बारह रचे गये हैं, राशियाँ बारह रची गई हैं। ऐसा क्यों ? इसके पीछे क्या विज्ञान है ? अब मैं इसी तथ्य का अनुसन्धान अंकों के रूपायतन से करता हूँ। प्रत्येक अंक शून्य से जायमान है। इसलिये यह देखना है कि उस प्रत्येक अंक में शून्य तत्व की मात्रा कितनी है।

अंक                       अंकस्थ शुन्य तत्व
१                            एक
२                          एक+आधा
३                          एक+आधा+आधा
४                          एक+आधा
५                           एक+आधा
६                          एक+आधा+आधा
७                           एक
८                            आधा
९                           एक
योग=आठ एक +आठ आधा
       = ८×१+८×१/२
        =८+४
        =१२

•इन नवों अंकों में शून्य तत्व की विद्यमानता का योग १२ है । अतएव १२ शून्यों से १२ भावों की सिद्धि होती है।

• इकाई/अकेली गिनती को अंक कहते हैं। अंक नव ही क्यों हैं ? इससे कम वा अधिक क्यों नहीं हैं ? इसमें भी रहस्य है। मनुष्य न महीने ही गर्भ में रहता है। दसवाँ मास पूर्ण होने के पहले गर्भ से बाहर आ जाता है। इस प्राकृतिक अवस्था के कारण अंक नव ही हैं। नव के आगे की गिनती को संख्या कहते हैं। अंकशास्त्र सीमित है। क्योंकि, अंक सीमित मात्र नव ही हैं। संख्या शास्त्र असीमित है। कारण कि, संख्याएँ असीमित हैं। अंकशास्त्र को आंकिकी तथा संख्या शास्त्र को सांख्यिकी कहते हैं। इन दोनों को मिलाकर सांख्यशास्त्र/दर्शन बनता है। इसमें सृष्टि एवं प्रलय का ज्ञान समाहित है। सांख्य प्रवर्तक कपिल मुनि को मेरा प्रणाम ! 

•अंकों के लेखन की एक वैज्ञानिक ऋषि पद्धति है। यह पूर्णतः भारतीय है। यह संक्रमित होकर यूरोप महाद्वीप में पहुँची। वहाँ से विकृत होकर पुनः यहाँ संक्रामक रोग की तरह फैल गई है। अंग्रेजी अंकन प्रणाली भारतीय नागरी प्रणाली की विकृत/परिवर्तित रूपरेखा है। विद्युतीय/इलेक्ट्रानिक प्रणाली में ये अंक सरल रेखा द्वारा कोणीय आकृतियों में व्यक्त किये जाते हैं। 

इन नवों अंकों का योग १+२+३ + ४ + ५ + ६ + ७ + ८ + ९ = ४५ है ।
 ४५ = ४+५ = ९ पूर्ण ।
 पूणाय नमः ।

•ये अंक शून्य से निकलते हैं, शून्य में स्थित हैं तथा इनमें शून्य विद्यमान है। चित्र से स्पष्ट है- एक में एक शून्य, दो में एक शून्य और आधा शून्य, तीन में एक शून्य और दो आधे शून्य, चार में एक शून्य और एक आधा शून्य, पाँच में एक शून्य और एक आधा शून्य, छः में एक शून्य और दो आधे शून्य, सात में एक शून्य, आठ में केवल आधा शून्य तथा नउ में एक शून्य है। आधा शून्य मात्र होने से आठ का अंक अपूर्णता के कारण अशुभ है। यह अंक मृत्यु / हानिप्रद है। चित्र से यह भी स्पष्ट है- २, ५ में, ३, ६ में: ७, ९१ में कुछ समानता है। ८, ४ किसी अन्य से मिल नहीं रखते। इन नवों अंकों में संसार का सम्पूर्ण ज्ञान समाहित है। इसे जानना सबके लिये शक्य नहीं है। सभी नवों अंक बराबर हैं। कोई अंक किसी अन्य अंक से कम या अधिक नहीं है। व्यवहार में भिन्न-भिन्न प्रभाव रखने से ये असमान गिने / माने जाते हैं। किन्तु वास्तविक रूप से, ० = १ २ = = ३ = ४ = ५ = ६ = ७८ = ९ । यही वेदान्तशास्त्र है। जो इस सत्य को जानता है, वह वेदान्ती है। वेद = ज्ञान अन्त = पराकाष्ठा । वेदान्त = ज्ञान की पराकाष्ठा वेदान्त अव्यवहार्य विषय है। वेदान्ती तत्व की चर्चा में मौन हो जाता है। अल्पज्ञानी बकवास करता है। ब्रह्मज्ञानी शान्त रहता है। ब्रह्मवेत्ता एवं वेदान्ती एक ही हैं। कलियुग में वेदान्त पढ़ने पढ़ाने वाले वेदान्तियों के विषय में व्यास का यह वचन है...

 "कली वेदान्तिनो भान्ति फाल्गुने बालका इव।" 
वेदान्ती नित्य समादरणीय हैं।
          " वेदान्तिने नमः।"

 •ये सभी अंक नवग्रहों के बीज हैं। १ में मंगल, २ में राहु, ३ में शनि, ४ में चन्द्रमा, ५ में सूर्य, ६ में बुध, ७ में शुक्र, ८ में केतु ९ में गुरु की सुगन्ध विद्यमान रहती है। ९ अंक हैं। १२ भाव हैं। ज्योतिषशास्त्र का सारा खेल ९ और १२ के बीच ही खेला जाता है। ९ + १२ = २१ । २१ = २+१=३। पुनः १२ -९= ३ ।

    इस खेल में त्रिनेत्र शिव/त्रिविक्रम विष्णु प्रधान तत्व है। जो इस तत्व को जानता है, वह ब्रह्मज्ञानी इस खेल में दक्ष होता है। ऐसा व्यक्ति सृष्टि के रहस्य को आत्मसात कर लेता है। ऐसे खिलाड़ी श्री महाराज जी को मेरा प्रणाम ।🙏

                            साभार 
 ✍️ शेखर #Shekar Shulba #त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्

                         वयं राष्ट्रे जागृयाम 


अदरक पाग - सर्दियों की पौष्टिक शक्तिवर्धक औषधि ( टॉनिक )

अदरक पाग ...
जी हां 'पाग' ..'पाक' नहीं। हमारे यहां इसे इसी नाम से 
बनाने की विधि --
सामग्री (जितनी मैंने यूज़ की आप अपनी आवश्यकतानुसार घटा -बढ़ा लें इसी अनुपात में)
1.अदरक दो किलो।
2.दूध दो लीटर।(क्योंकि दस लीटर डालकर बनाने के लिए बहुत परिश्रम और लागत दोनों चाहिए। जबकि ये कम दूध में भी स्वादिष्ट और अच्छा बन जाता है)
3.गेहूं का आटा एक किलो।
4.पोस्ता दाना आधा किलो।
5.गुड़ चार किलो।
6.पचास ग्राम पीपर।
7.पचास ग्राम कालीमिर्च ।
8.पचास ग्राम अजवायन।
9.पचास ग्राम दालचीनी।
10.पचास ग्राम गोंद।
11.पचास ग्राम लौंग।
12.पचास ग्राम काला नमक।
13.सूखी मेवे काजू, बादाम, मूंगफली दाना।
14.आधा किलो देसी घी।
कैसे बनाएं --
अदरक छिल कर कद्दूकस करके पीस लें । पीस कर देसी घी में इतना भूनें की पानी सूख जाए।पोस्ता दाना भिगोकर रखें फूल जाने के बाद मिक्सी में पीस लें ।पीसने के बाद घी में पानी सूख जाने तक भूनें।
गेहूं के आटे को घी में लाल- लाल भून लें।सारे मसाले भूनकर मिक्सी में सूखा पीस लें।
दो लीटर दूध का खोआ बना लें।अब गुड़ की एक तार की चाशनी बनाएं और उसमें सबसे पहले अदरक पोस्ता दाना पेस्ट, फिर भुने हुए सारे मसाले का पाउडर और काला नमक डालें।अब इसमें पंजीरी और खोआ डालें खूब अच्छी तरह चलाएं गांठें ना पड़ने पाएं । सबसे आखिर में ड्रायफ्रूट्स डालकर चलाएं फिर उतार लें हल्का ठंडा होने पर हथेली में घी लगाकर लड्डू बांध दें।
अदरक पाग रेडी । 

इसे आप काढ़े के ऑप्शन के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। रोज रोज काढ़ा बनाने का झंझट खत्म।
  स्वादिष्ट तो इतना बनता है कि अदरक का स्वाद ना पसंद करने वाला भी चाव से सात आठ लड्डू खा जाए।

#अभिलाषासिंह 
#winter 

Wednesday, 7 January 2026

चक्रवर्ती विक्रमादित्य

चक्रवर्ती विक्रमादित्य ......

कलि काल के 3000 वर्ष बीत जाने पर 101 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य मालव का जन्म हुआ। उन्होंने 100 वर्ष तक राज किया। 

विक्रमादित्य मालव ईसा मसीह के समकालीन थे और उस वक्त उनका शासन अरब तक फैला था। विक्रमादित्य मालव के बारे में प्राचीन अरब साहित्य में भी वर्णन मिलता है। नौ रत्नों की परंपरा उन्हीं से शुरू होती है। विक्रमादित्य मालव उस काल में महान व्यक्तित्व और शक्ति का प्रतीक थे

विक्रमादित्य का शासन अरब और मिस्र तक फैला था और संपूर्ण धरती के लोग उनके नाम से परिचित थे। विक्रमादित्य भारत की प्राचीन नगरी उज्जयिनी के राजसिंहासन पर बैठे। विक्रमादित्य मालव अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे जिनके दरबार में नवरत्न रहते थे। कहा जाता है कि विक्रमादित्य बड़े पराक्रमी थे और उन्होंने शकों को परास्त किया था। 

देश में अनेक विद्वान ऐसे हुए हैं, जो विक्रम संवत को उज्जैन के राजा विक्रमादित्य मालव द्वारा ही प्रवर्तित मानते हैं। 
इसके अनुसार विक्रमादित्य मालव ने 3044 कलि अर्थात 57 ईसा पूर्व विक्रम संवत चलाया। नेपाली राजवंशावली अनुसार नेपाल के राजा अंशुवर्मन के समय (ईसापूर्व पहली शताब्दी) में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य मालव के नेपाल आने का उल्लेख मिलता है। 
भारत,पाकिस्तान,अफगानिस्तानतजाकिस्तान,उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्की, अफ्रीका,सऊदी अरब,नेपाल, थाईलैंड, इंडोनेशिया, कमबोडिया, श्रीलंका,चीन का बड़ा भाग इन सब प्रदेशो पर विश्व के बड़े भूभाग पर था ओर इतना ही नही सम्राट विक्रमादित्य मालव ने रोम के राजाओं को हराकर विश्व विजय भी कर लिया था।

"यो रूमदेशाधिपति शकेश्वरं जित्वा " ।।
अर्थ
उन्होंने रोम के राजा और शक राजाओं को जीता । कुल मिलाकर 95 देश जीतें आज भारत मे डेमोक्रेसी है, लेकिन भारत में शांति नही है लेकिन इस डेमोक्रेसी की नींव डालने की शुरुवात ही खुद महान राजा विक्रमादित्य ने की थी विक्रमादित्य की सेना का सेनापति प्रजा चुनती थी।

वह प्रजा द्वारा चुना हुआ धर्माध्यक्ष होता था प्रजा द्वारा अभिषिक्त निर्णायक होता था आज के समय मे अमरीका और रूस के राष्ट्रपति की जो शक्ति है वही शक्ति महाराज विक्रमादित्य मालव के सेनापति की होती थी। लेकिन यह सब भी अपना परम् वीर विक्रम को ही मानते थे महाराज विक्रम ने भी अपने आप को शासक नही, प्रजा का सेवक मात्र घोषित कर रखा था।

महाराज विक्रम बहुत ही शूरवीर और दानी थे शुंग वंश के बाद पंजाब के रास्ते से शकों ने भारत को तहस नहस कर दिया था लेकिन वीर विक्रम ने इन शकों को पंजाब के रास्ते से ही वापस भगाया पुष्यमित्र शुंग की मृत्यु के बाद जो हिन्दू असंगठित होकर शकों का शिकार हो रहे थे उन हिंदुओ को जीवन मंत्र देकर महाराज विक्रम में विजय का शंख फूंककर पूरे भारत को संगठित कर दिया ।।

महाराजा वीर विक्रम जमीन पर सोते थे अल्पाहार लेते थे वे केवल योगबल पर अपने शरीर को व्रज सा मजबूत बनाकर रखते थे इनहोने महान सनातन राष्ट्र की स्थापना कर सनातन धर्म का डंका पुनः बजाया था।

महाभारत के युद्ध के बाद वैदिक धर्म का दिया लगभग बुझ गया था हल्का सा टिमटिमा मात्र रहा था इस युद्ध के बाद भारत की वीरता, कला, साहित्य, संस्कृति सब कुछ मिट्टी में मिल गयी थी ।

ऐसा भी एक समय आया जब सारे हिन्दू ही "अहिंसा परमोधर्म" वाला बाजा बजा रहे थे।
विदेशों से हमले हो रहे थे ओर हम अहिंसा में पंगु होकर बैठ गये भारत के अस्ताचल से सत्य सनातन धर्म के सूर्य का अस्त होने को चला था प्रजा दुखी थी, विदेशी शक, हूण, कुषाण शासकों के आक्रमणों से त्राहि त्राहि मची थी ऐसे महान विपत्तिकाल में
" धर्म गौ ब्राह्मण हितायतार्थ " की कहानी को चरितार्थ करने वाला प्रजा की रक्षा करने वाला, सत्य तथा धर्म का प्रचारक वीर पराक्रमी विक्रम मालव पैदा हुए।

इनके पराक्रम का अंदाजा इस बात से लगा सकते है की जावा सुमात्रा तक के सुदूर देशों तक इन्होंने अपने सेनापति नियुक्त कर रखे थे।

उत्तर पश्चिमी शकों का मान मर्दन करने के लिए मुल्तान के पास जागरूर नाम की जगह पर महाराज विक्रम और शकों के भयानक युद्ध हुआ विशेषकर राजपुताना के उत्तरपश्चिमी राज्य में शकों ने उत्पात मचा रखा था । मुल्तान में विक्रम की सेना से परास्त होकर शक जंगलो में भाग गए उसके बाद इन्होंने फिर कभी आंख उठाने की हिम्मत नही की लेकिन उनकी औलादे जरूर फिर से आती रही।

विक्रमादित्य मालव के काल के सिक्कों पर " जय मालवाना लिखा होता था विक्रमादित्य के मातृभूमि से प्रेम से इससे अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है सिक्को पर अपना नाम न देकर अपनी मातृभूमि का नाम दिया।।

आज हमारी सनातन संस्कृति केवल विक्रमादित्य मालव के कारण अस्तित्व में है अशोक मौर्य ने बोद्ध धर्म अपना लिया था और बोद्ध बनकर 25 साल राज किया था भारत में तब सनातन धर्म लगभग समाप्ति पर आ गया था।
जब रामायण, और महाभारत जैसे ग्रन्थ खो गए थे, महाराज विक्रम ने ही पुनः उनकी खोज करवा कर स्थापित किया
विष्णु और शिव जी के मंदिर बनवाये और सनातन धर्म को बचाया विक्रमादित्य मालव के 9 रत्नों में से एक कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् लिखा,  भारत का इतिहास है अन्यथा भारत का इतिहास क्या मित्रो हम भगवान् कृष्ण और राम को ही खो चुके थे।आज उन्ही के कारण सनातन धर्म बचा हुआ है, हमारी संस्कृति बची हुई है ।

महाराज विक्रमादित्य मालव ने केवल धर्म ही नही बचाया उन्होंने देश को आर्थिक तौर पर सोने की चिड़िया बनाई, उनके राज को ही भारत का स्वर्णिम राज कहा जाता है

विक्रमादित्य मालव के काल में भारत का कपडा, विदेशी व्यपारी सोने के वजन से खरीदते थे भारत में इतना सोना आ गया था की, विक्रमादित्य मालव काल में सोने की सिक्के चलते थे ।

कई बार तो देवता (श्रेष्ठ ज्ञानी व्यक्ति) भी उनसे न्याय करवाने आते थे ,विक्रमादित्य मालव के काल में हर नियम धर्मशास्त्र के हिसाब से बने होते थे, न्याय , राज सब धर्मशास्त्र के नियमो पर चलता था विक्रमादित्य मालव का काल प्रभु श्रीराम के राज के बाद सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जहाँ प्रजा धनि और धर्म पर चलने वाली थी ।

महान सम्राट विक्रम ने रोम के शासक जुलियस सीजर को भी हराकर उसे बंदी बनाकर उज्जैन की सड़कों पर घुमाया था तथा बाद में उसे छोड़ दिया गया था। 

 विक्रमादित्य के काल में दुनियाभर के ज्योतिर्लिंगों के स्थान का जीर्णोद्धार किया गया था। कर्क रेखा पर निर्मित ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख रूप से थे मक्का के मुक्तेश्वर (मक्केश्वर/मक्का मदीना), गुजरात के सोमनाथ, उज्जैन के महाकालेश्वर और काशी के विश्वनाथ बाबा। 

कर्क रेखा के आसपास 108 शिवलिंगों की गणना की गई है।विक्रमादित्य मालव ने नेपाल के पशुपतिनाथ, केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिरों को फिर से बनवाया था। इन मंदिरों को बनवाने के लिए उन्होंने मौसम वैज्ञानिकों, खगोलविदों और वास्तुविदों की भरपूर मदद ली।
विक्रमादित्य मालव के समय ज्योतिषाचार्य मिहिर, महान कवि कालिदास थे।
विक्रमादित्य तो एक उदाहरण मात्र है , भारत का पुराना अतीत इसी तरह के शौर्य से भरा हुआ है । भारत पर विदेशी शासकों के द्वारा लगातार राज्य शासन के बावजूद निरंतर चले भारतीय संघर्ष के लिए ये ही शौर्य प्रेरणाएं जिम्मेदार हैं।
हम सबको इस महान सम्राट से प्रेरणा ले कर राष्ट्र व धर्म की रक्षा में उद्यत रहना चाहिए एवं हमारे गौरवपूर्ण इतिहास को जानना चाहिए।

ऋषि कण्डवाल 
वयं राष्ट्रे जागृयाम 

"दवा शरीर का इलाज करती है, भगवान मनुष्य को ठीक करते हैं । "

यह डॉ. जेम्स मिलर द्वारा शेयर की गई एक घटना हैं - लेख थोड़ा लम्बा है लेकिन उम्मीद जगाने वाला है 
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"दवा शरीर का इलाज करती है, भगवान मनुष्य को ठीक करते हैं"
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मैंने MRI स्कैन देखा और मेरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। यह मौत का फरमान था, जो काले और सफेद अक्षरों में छपा था। इस हॉस्पिटल में लोग मुझे लेजेंड कहते हैं। मैं डॉ. जेम्स मिलर हूँ, रिटायर्ड चीफ ऑफ वैस्कुलर सर्जरी। मैंने चालीस साल मानवीय शरीर के अंदर बिताए हैं। मैं शिकागो की सड़कों से ज्यादा अपनी धमनियों का नक्शा जानता हूँ। मैंने धड़कते हुए दिल अपनी हथेलियों में पकड़े हैं और अनगिनत शरीरों से बेलगाम बहते खून को कंट्रोल किया है। लेकिन उस स्कैन को देखकर, दशकों में पहली बार, मुझे सर्जन जैसा महसूस नहीं हुआ, मुझे लगा जैसे मुझे कुछ नहीं आता।
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मरीज का नाम सारा था। वह छब्बीस साल की थी, एक सिंगल मदर जो सिर्फ घर का खर्च चलाने के लिए एक होटल में डबल शिफ्ट में काम करती थी। कॉफी डालते समय वह गिर गई थी। उसके दिमाग में एन्यूरिज्म सिर्फ बड़ा नहीं था; किसी राक्षस जैसा बड़ा था। वह उसके ब्रेन स्टेम की सबसे नाजुक संरचनाओं के चारों ओर एक अजगर की तरह लिपटा हुआ था।
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"यह ऑपरेशन करने लायक नहीं है, मिलर," न्यूरोलॉजी के चीफ ने अपना सिर हिलाते हुए मुझसे कहा। "अगर तुम ऑपरेशन करते हो, तो टेबल पर ही उसका खून बह जाएगा। अगर तुम इसे छोड़ देते हो, तो यह 48 घंटे के अंदर फट जाएगा। दोनों ही तरह से उसकी मौत पक्की है।"
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मेडिकल सिस्टम में, हमें रिस्क का आकलन करना सिखाया जाता है। हम ज़िम्मेदारी, और सफलता दर के बारे में चिंता करते हैं। लॉजिक कहता था: इसे मत छुओ। दूर चले जाओ। प्रकृति को अपना काम करने दो।

लेकिन फिर मेरी नजर सारा की आँखों से मिली। और मैंने उसकी छोटी बच्ची को देखा, जो मुश्किल से चार साल की थी, वेटिंग रूम में एक किताब में रंग भर रही थी, पुराने निकर पहने हुए। अगर गौरी मर जाती है, तो वह छोटी बच्ची सिस्टम में चली जाएगी। वह अकेली हो जाएगी। मैंने एडमिनिस्ट्रेशन से ऑपरेशन थिएटर शेड्यूल करने को कहा। मैंने उनसे कहा कि मैं यह केस ले रहा हूँ। उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं पागल हूँ। शायद मैं था।

सर्जरी से एक रात पहले, मैं अपने ऑफिस में बत्तियाँ बंद करके बैठा था। शहर की स्काईलाइन बाहर चमक रही थी, अंदर जिन्दगी दांव पर लगी थी, उसे इसकी कोई परवाह नहीं थी। मैं बहुत डरा हुआ था। मेरे हाथ, जो आमतौर पर पत्थर की तरह स्थिर रहते थे, हल्के से काँप रहे थे। मैंने आखिरी बार स्कैन देखे। कोई साफ रास्ता नहीं था। हमले का कोई एंगल नहीं था। यह एक सुसाइड मिशन था।

मैं विज्ञान का आदमी हूँ। मैं स्केलपेल, टांके और ब्लड प्रेशर में विश्वास करता हूँ। लेकिन मेरी डेस्क पर, मेडिकल जर्नल्स के ढ़ेर के पीछे, मैं भगवान का एक छोटा, लैमिनेटेड पुराना कार्ड रखता हूँ - मेरी दादी ने मुझे यह तब दिया था जब मैंने मेडिकल स्कूल शुरू किया था। उन्होंने कहा था, "याद रखना, दवा शरीर का इलाज करती है, लेकिन भगवान मनुष्य को ठीक करते हैं।"

मैंने वह कार्ड उठाया। मैंने कोई औपचारिक प्रार्थना नहीं की। मैंने बस गौरी की फाइल पर अपना हाथ रखा, भगवान की तस्वीर देखी, और अंधेरे में कांपती हुई आवाज में बोला- "हे प्रभु, इस काम के लिए मेरे हाथ काफ़ी नहीं हैं। मैं यहाँ बस एक माध्यम हूँ। कल सुबह, ऑपरेशन आपको करना होगा। मैं आपको अपने हाथ दूँगा, लेकिन समझदारी आपको लानी होगी, सर्जन आपको बनना होगा।"

अगली सुबह, ऑपरेशन थिएटर बहुत ठंडा था। हवा में तनाव भरा हुआ था। नर्सें चुपचाप घूम रही थीं; एनेस्थेसियोलॉजिस्ट मेरी आँखों में आँखें नहीं मिला रहा था। हर कोई जानता था कि हम शायद एक बड़े हादसे की ओर बढ़ रहे हैं। हमने ऑपरेशन शुरू किया। असलियत स्कैन में दिखाए गए से भी ज्यादा बुरी थी। नस की दीवार कागज जितनी पतली थी, गुस्से से धड़क रही थी। एक गलत साँस, एक छोटा सा कंपन, और वह फट जाएगी। मैंने माइक्रो-कैंची उठाई। यही वह पल था। "विधवा बनाने वाला" पल। 

और फिर, वह हुआ।

कमरा एकदम शांत हो गया। सिर्फ शांत नहीं, बल्कि पूरी तरह, वैक्यूम जैसी शांति। मॉनिटर की बीप की आवाज बैकग्राउंड में चली गई। एक अजीब सी गर्मी मेरे कंधों पर फैल गई, मेरे हाथों से बहती हुई मेरी उंगलियों तक पहुँची। यह एड्रेनालाईन नहीं था। मैं एड्रेनालाईन को जानता हूँ - यह तेज और अचानक होता है। यह... शांति थी। पूरी, गहरी शांति।

मेरे हाथ बहुत तेज़ी से चलने लगे। मैं यह साफ़ करना चाहता हूँ: मैं उन्हें नहीं चला रहा था। मैं उन्हें चलते हुए देख रहा था।

मैंने ऐसे काम किए जिनका मैंने कभी अभ्यास नहीं किया था। मेरी उंगलियाँ ऐसी तेजी और सटीकता से नाच रही थीं जो सत्तर साल के आदमी में नहीं हो सकती। मैं बिना किसी हिचकिचाहट के ब्रेन स्टेम से मिलीमीटर दूर टिश्यू को काट रहा था। मैंने ऐसी जगहों पर क्लिप लगाए जिन्हें मैं पूरी तरह से देख भी नहीं पा रहा था, एक ऐसी सहज बुद्धि से निर्देशित होकर जो मेरी नहीं थी।

"BP स्थिर है," एनेस्थेसियोलॉजिस्ट हैरान होकर फुसफुसाया।

मैंने जवाब नहीं दिया। मैं नहीं दे सकता था। मैं एक समाधि में था। ऐसा लगा जैसे कोई ठीक मेरे पीछे खड़ा था, मेरी कोहनियों को गाइड कर रहा था, मेरी कलाइयों को सहारा दे रहा था। मुझे एक ऐसी मौजूदगी महसूस हुई जो इतनी मजबूत, इतनी हावी थी कि एक पल के लिए मुझे लगा कि सच में कोई दूसरा डॉक्टर टेबल के पास आ गया है।

और पैंतालीस मिनट बाद, मैंने आखिरी इंस्ट्रूमेंट ट्रे में रख दिया।

"एन्यूरिज्म चला गया है," मैंने कहा। मेरी आवाज बहुत दूर से आ रही थी। "टांकें लगाकर इसे बंद कर दो।"

कमरे में हंगामा मच गया। नर्सें रो रही थीं। रेजिडेंट्स अविश्वास से मॉनिटर को घूर रहे थे। हमने खून की एक बूंद भी नहीं खोई थी। यह अविश्वसनीय रूप से परफेक्ट था।

मैंने अपना गाउन उतारा और स्क्रब सिंक की तरफ चला गया। मैंने शीशे में देखा। आमतौर पर, ऐसी सर्जरी के बाद, मैं थका हुआ होता हूँ, पसीने से भीगा हुआ, मेरी पीठ में दर्द होता है। मैं बिलकुल सूखा था। मैं शांत था। मैं बिल्कुल भी थका हुआ नहीं था।
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मैंने अपने हाथों को देखा—मेरे झुर्रियों वाले, बूढ़े हाथ। उन्होंने आज एक माँ की जान बचाई थी। उन्होंने एक छोटी लड़की को अनाथ होने से बचाया था। लेकिन मुझे सच्चाई पता थी।
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मैं वापस अपने ऑफिस गया, मैंने भगवान का वो छोटा सा लैमिनेटेड कार्ड निकाला, और उसे वापस अपनी जेब में रख लिया।
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एक हफ़्ते बाद मैंने डिस्चार्ज पेपर्स पर साइन कर दिए। सारा अपनी बेटी का हाथ पकड़कर बाहर निकली। उसने मुझे धन्यवाद दिया, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, वह मुझे भगवान कह रही थी।
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मैं मुस्कुराया और मैंने सिर हिलाया। मैंने उससे कहा, "यह मैंने अकेले नहीं किया।" उसे लगा कि मेरा मतलब नर्सों की टीम से था। लेकिन मुझे पता था कि उस दिन मुख्य सर्जन कौन था।

विज्ञान 'कैसे' समझा सकता है। यह खून के बहाव और नर्व एंडिंग्स को समझा सकता है। लेकिन यह कभी भी 'क्यों' नहीं समझा सकता। यह कभी नहीं समझा सकता कि कैसे एक आदमी, असंभव का सामना करते हुए, अचानक एक ऐसा रास्ता ढूंढ लेता है जहाँ कोई रास्ता नहीं होता।

कभी-कभी, आपको यह मानना पड़ता है कि आप सिर्फ़ एक ज़रिया हैं। उस मंगलवार को, ऑपरेटिंग रूम नम्बर 4 में, दुनिया के सबसे महान चिकित्सक ड्यूटी पर थे।

इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ- जीवन में कभी उम्मीद मत छोड़ना। तब भी, जब स्कैन में कुछ न दिखे, तब भी जब दुनिया कहे कि सब खत्म हो गया है। चमत्कार हमेशा बिजली और गरज के साथ नहीं आते। कभी-कभी, वे बस दो स्थिर हाथों और एक शांत प्रार्थना के साथ भी आते हैं।
      साभार- अमित डागर सर
✍️सुनीता करोथवाल 
                        वयं राष्ट्रे जागृयाम 
                            

संगति, परिवेश और भाव

                संगति, परिवेश और भाव

एक राजा अपनी प्रजा का भरपूर ख्याल रखता था। राज्य में अचानक चोरी की शिकायतें बहुत आने लगीं, कोशिश करने से भी चोर पकड़ा नहीं गया।

हारकर राजा ने ढींढोरा पिटवा दिया कि जो चोरी करते पकडा जाएगा उसे मृत्युदंड दिया जाएगा. सभी स्थानों पर सैनिक तैनात कर दिए गए. घोषणा के बाद तीन-चार दिनों तक चोरी की कोई शिकायत नही आई।

उस राज्य में एक चोर था जिसे चोरी के सिवा कोई काम आता ही नहीं था। उसने सोचा मेरा तो काम ही चोरी करना है, मैं अगर ऐसे डरता रहा तो भूखा मर जाउंगा। चोरी करते पकडा गया तो भी मरुंगा, भूखे मरने से बेहतर है चोरी की जाए।

वह उस रात को एक घर में चोरी करने घुसा। घर के लोग जाग गए, शोर मचाने लगे तो चोर भागा। पहरे पर तैनात सैनिकों ने उसका पीछा किया। चोर जान बचाने के लिए नगर के बाहर भागा।

उसने मुडके देखा तो पाया कि कई सैनिक उसका पीछा कर रहे हैं। उन सबको चमका देकर भाग पाना संभव नहीं होगा । भागने से तो जान नहीं बचने वाली, युक्ति सोचनी होगी।

चोर नगर से बाहर एक तालाब किनारे पहुंचा, सारे कपडे उतारकर तालाब मे फेंक दिये और अंधेरे का फायदा उठाकर एक बरगद के पेड़ के नीचे पहुंचा।

बरगद पर बगुलों का वास था। बरगद की जड़ों के पास बगुलों की बीट पड़ी थी, चोर ने बीट उठाकर उसका तिलक लगा लिया ओर आंख मूंदकर ऐसे स्वांग करने बैठा जैसे साधना में लीन हो।

खोजते-खोजते थोडी देर मे सैनिक भी वहां पहुंच गए पर उनको चोर कहीं नजर नहीं आ रहा था । खोजते खोजते उजाला हो रहा था ओर उनकी नजर बाबा बने चोर पर पड़ी ।

सैनिकों ने पूछा- बाबा इधर किसी को आते देखा है। पर ढोंगी बाबा तो समाधि लगाए बैठा था । वह जानता था कि बोलूंगा तो पकडा जाउंगा सो मौनी बाबा बन गया और समाधि का स्वांग करता रहा.

सैनिकों को कुछ शंका तो हुई पर क्या करें, कही सही में कोई संत निकला तो ? आखिरकार उन्होंने छुपकर उसपर नजर रखना जारी रखा । यह बात चोर भांप गया. जान बचाने के लिए वह भी चुपचाप बैठा रहा।

एक दिन, दो दिन, तीन दिन बीत गए बाबा बैठा रहा । नगर में चर्चा शुरू हो गई की कोई सिद्ध संत पता नही कितने समय से बिना खाए-पीए समाधि लगाए बैठै हैं । सैनिकों को तो उनके अचानक दर्शऩ हुए हैं।

नगर से लोग उस बाबा के दर्शन को पहुंचने लगे।भक्तों की अच्छी खासी भीड़ जमा होने लगी। राजा तक यह बात पहुंच गई। राजा स्वयं दर्शन करने पहुंचे, राजा ने विनती की आप नगर मे पधारें और हमें सेवा का सौभाग्य दें।

चोर ने सोचा बचने का यही मौका है ।  वह राजकीय अतिथि बनने को तैयार हो गया । सब लोग जयघोष करते हुए नगर में लेजा कर उसकी सेवा सत्कार करने लगे।

लोगों का प्रेम और श्रद्धा भाव देखकर ढोंगी का मन परिवर्तित हुआ, उसे आभास हुआ कि यदि नकली में इतना मान-संम्मान है तो सही में संत होने पर कितना सम्मान होगा ।  उसका मन पूरी तरह परिवर्तित हो गया और चोरी त्यागकर संन्यासी हो गया।

शिक्षा:-
संगति, परिवेश और भाव मनुष्य में अभूतपूर्व बदलाव ला सकते है । रत्नाकर डाकू को गुरु मिल गए तो प्रेरणा मिली और वह आदिकवि हो गए । असंत भी संत बन सकता है, यदि उसे राह दिखाने वाला मिल जाए।

    अपनी संगति, परिवेश और भावों को शुद्ध रखिए,  विकारों का स्वतः पलायन आरंभ हो जाएगा ।

                        वयं राष्ट्रे जागृयाम

Tuesday, 6 January 2026

घमंडी का सिर नीचा

घमंडी का सिर नीचा

प्राचीन काल की बात है। किसी गांव में चंद्रभूषण नाम का एक विद्धवान पंडित रहता था। उसकी वाणी में गजब का आकर्षण था। वह भागवत कथा सुनाने में निपुण था। उसकी वाणी से कथासार सुनकर लोग मुग्ध हो जाते थे। इसीलिए उसके यहां पर रोज कथा सुनने वालों की भीड़ लगी रहती थी। दूर दूर से लोग चंद्रभूषण से भागवत कथा सुनने आते थे।
उसी गांव में एक दूसरे पंडितजी भी रहते थे,नाम था नंबियार। पढ़े लिखे तो बहुत थे,पर थे बहुत घमंडी,स्वयं को बहुत बड़ा विद्धवान समझा करते थे। सोचते,कहां कल का छोकरा चंद्रभूषण,जो अटक अटक कर कथा पढ़ता है और कहां मैं,शास्त्रों का मर्म जानने वाला पंडित। 
किंतु जब भी नंबियार चंद्रभूषण के घर के सामने से गुजरते,उसके श्रोताओं की भीड़ देखकर उनका मन ईर्ष्या से भर उठता। मन ही मन सोचते यह चंद्रभूषण क्या जादू करता है कि इसके यहां दिनों दिन श्रोताओं की भीड़ बढ़ती जा रही है। ऐसे तो मेरी नाक नीची हो जाएगी। मुझे कुछ करना चाहिए।
एक दिन की बात है,नंबियार थके हारे घर लौटे। भूख भी जोरों की लगी थी। लेकिन घर आकर देखा तो उसकी पत्नी दिखाई न दी। एक दो बार आवाज भी लगाई,मगर चुप्पी छाई रही। अचानक नंबियार का मन आशंका से भर उठा कहीं मेरी पत्नी चंद्रभूषण के यहां कथा सुनने तो नहीं चली गई?
ईर्ष्या और क्रोध से नंबियार के नथुने फड़कने लगे। एक एक पल उन्हें हजार घण्टे के बराबर लगा। जब रहा ही नहीं गया,तो वह चंद्रभूषण के घर की आरे चल दिए।
चंद्रभूषण के दरवाजे पर पहुंचकर नंबियार ठिठक गए। वहां श्रोताओं की अपार भीड़ थी। सब मंत्रमुग्ध होकर कथा सुन रहे थे। नंबियार ने देखा श्रोताओं के बीच उसकी पत्नी भी बैठी है। बस, फिर क्या था। उनका क्रोध भड़क उठा। 
वह दनदनाते हुए चंद्रभूषण के आसन के पास पहुंच गए और चिल्लाकर बोले.. ”चंद्रभूषण,तुम दुनिया के सबसे बड़े मूर्ख हो और तुमसे बड़े मूर्ख ये सारे लोग हैं जो यहां इकट्ठा होकर तुम्हारी बकवास सुन रहे हैं।“
नंबियार की बात को सुनकर चंद्रभूषण आश्चर्य में पड़ गया। कथा बीच में ही छूट गई। सारे श्रोता नंबियार को बुरा भला कहते हुए अपने अपने घर लौट गए।घर पहुंचकर बाकी बचा गुस्सा नंबियार ने अपनी पत्नी पर निकाला। बोले, ”क्या जरूरत थी तुम्हें वहां जाने की? 
क्या मुझसे बड़ा विद्धवान है चंद्रभूषण? मेरे पास शास्त्रों का भण्डार है। मगर तुम्हें कौन बताए, लगता है तुम्हारी खोपड़ी में बुद्धि नहीं है।“”क्यों अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हो? तुम ऐसे ही बड़े हो तो चंद्रभूषण की तरह इतने लोगों को इकट्ठा करके दिखाओ। मैं तुम्हारे ज्ञान को मान लूंगी।
मैं तुम्हारी जली कटी रोज सुनती हूं। अब तुम दूसरों को भी अपमानित करने लगे। तुम्हें कोई और काम नहीं सिवा ईर्ष्या के।“ इतना कहकर तिलमिलाती हुई नंबियार की पत्नी भीतर चली गई।
उस रात दोनों में से किसी ने भोजन नहीं किया। पत्नी तो थोड़ी देर में सो गई। पर नंबियार की आंखों में नींद नहीं थी। शाम की सारी घटना जैसे उनकी आंखों में तैर रही थी। रह रहकर उसी घटना के बारे में सोचते आखिर मैंने चंद्रभूषण का अपमान क्यों किया?
वह जितना सोचते,उनकी बेचैनी उतनी ही बढ़ती जाती। बाहर काफी सर्दी थी,मगर गला सूखने के कारण वह बार बार पानी पी रहे थे। यही बात सोचते सोचते उनका सारा गुस्सा पश्चाताप में बदल गया। ओह,यह मैंने क्या किया? मेरे मन में भगवान की भक्ति के नाम पर इतना द्वेष और चंद्रभूषण के स्वभाव में इतनी विनम्रता। इतना अपमान सहने के बाद भी वह एक शब्द न बोला।
जैसे ही भोर का तारा दिखा,नंबियार ने पश्चाताप प्रकट करने हेतु चंद्रभूषण के घर जाने के लिए दरवाजा खोला। उन्होंने देखा,चौखट के पास कोई आदमी कंबल ओढ़े बैठा है। वह जाड़े से सिकुड़ रहा था। जैसे ही नंबियार ने कदम आगे बढ़ाया,वह उनके पैर छूने के लिए आगे बढ़ा।”यह क्या करते हो? कौन हो तुम?“ कहते हुए नंबियार पीछे हट गए। उस व्यक्ति को ध्यान से देखा। 
सामने हाथ जोड़े खड़ा व्यक्ति और कोई नहीं था,कथावाचक चंद्रभूषण ही था।जब तक नंबियार कुछ कहते, चंद्रभूषण बोल उठा, ”आपने अच्छा ही किया, जो मेरा दोष मुझे बता दिया। लेकिन लगता है,आप मुझसे अभी तक नाराज हैं। मैं रात भर यहां बैठकर आपका इंतजार करता रहा। शायद आप बाहर आएं और मैं आपसे क्षमा मांगूं।“
नंबियार तो पहले ही लज्जित थे। उन्होंने लपककर चंद्रभूषण को अपने गले से लगा लिया। बोले, ”भाई, दोष मेरा है तुम्हारा नहीं। मैं घमंड में अंधा हो गया था। तुमने अपनी विनम्रता से मेरा घमंड चूर चूर कर दिया। सच कहता हूं, तुमने मेरी आंखें खोल दीं। 
वास्तव में यदि विनम्रता न हो तो ज्ञान भी नष्ट हो जाता है।“

साभार - भक्ति फेसबुक पेज 

कृष्णमयी मीरा

कृष्णमयी मीरा 

मेवाड़ के राजमहलों का सुख, कुल की मर्यादा और राणा सांगा के पुत्रवधू होने का अभिमान—सब कुछ पीछे छोड़कर, दुखों के पहाड़ और अपनों के अत्याचार सहकर मीराबाई अंततः अपनी अंतिम शरण, श्री धाम वृन्दावन आ पहुँचीं। उनके पैरों में छाले थे, लेकिन हृदय में गिरिधर गोपाल से मिलने की प्यास थी।

उस समय वृन्दावन में वैष्णव-सम्प्रदाय के प्रधान और प्रकांड विद्वान श्री जीव गोस्वामी जी का बड़ा मान था। मीरा के मन में संतों के प्रति अगाध श्रद्धा थी, सो वे गोस्वामी जी के दर्शन की अभिलाषा लेकर उनके आश्रम पहुँचीं।

परन्तु, वहां पहुँचते ही उन्हें द्वार पर रोक दिया गया।

शिष्य ने भीतर जाकर संदेश दिया, "गुरुदेव, मेवाड़ की रानी मीराबाई आपके दर्शन चाहती हैं।"

जीव गोस्वामी ने कठोरता से उत्तर भिजवाया, "मीरा से कहो कि मैं किसी 'स्त्री' से नहीं मिलता। यह मेरे नियमों के विरुद्ध है, वे लौट जाएं।"

यह सुनकर मीरा के होठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैर गई। उन्होंने शिष्य से कहा, "जाकर अपने गुरुदेव से कहो— मैं तो सोचती थी कि वृन्दावन में केवल एक ही 'पुरुष' है, और वे हैं मेरे गिरिधर गोपाल!

बाकी सब तो गोपियां (सखियाँ) हैं। मुझे आज ज्ञात हुआ कि श्री कृष्ण के अलावा यहाँ कोई और भी पुरुष रहता है, जो स्वयं को पुरुष मानता है!"

यह संदेश नहीं, एक व्यंग्य था उस 'पुरुष-अहंकार' पर, जो भक्ति के मार्ग में बाधा था।

अगली सुबह जो हुआ, उसने वृन्दावन को हिला कर रख दिया!

ब्रह्म मुहूर्त में जब जीव गोस्वामी जी ने बांके बिहारी के मंदिर के पट खोले, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उनके हाथ से आरती की थाली छूटते-छूटते बची।

सामने सिंहासन पर पीताम्बर धारी कृष्ण नहीं थे!

वहाँ खड़ी थी एक नव-यौवना सखी!

भगवान की मूर्ति ने घाघरा-चोली धारण कर रखी थी। कानों में झुमके, नाक में नथनी, माथे पर बिंदी, पैरों में रुनझुन करती पायल और हाथों में हरी चूड़ियाँ!

त्रिभुवन के स्वामी आज 'स्त्री-वेश' में मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।

जीव गोस्वामी का कंठ सूख गया। उन्होंने सेवक को चिल्लाकर पूछा, "यह किसका दुस्साहस है? मेरे बाद मंदिर में कौन आया था?"

पुजारी और सेवक थर-थर कांपने लगे, "महाराज, कसम ठाकुर जी की! पट आपने बंद किये थे और आपने ही खोले हैं। यहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता।"

तभी एक वृद्ध सेवक ने डरते हुए कहा, "गुसाईं जी... क्षमा करें, पर कल जिस महिला (मीरा) को आपने 'स्त्री' जानकर लौटा दिया था... लोग कहते हैं उनके एकतारे में जादू है। जब वे गाती हैं, तो पत्थर भी पिघल जाते हैं। कहीं यह ठाकुर जी का आपको कोई संकेत तो नहीं? कहीं आपने साक्षात भक्ति को तो द्वार से नहीं लौटा दिया?"

क्षण भर में जीव गोस्वामी का सारा ज्ञान, सारा अहंकार, उस शृंगारित मूर्ति के चरणों में बिखर गया। उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ— भक्ति में कोई स्त्री-पुरुष नहीं होता, वहां सब केवल 'आत्मा' हैं और परमात्मा एक ही है।

वे नंगे पाँव दौड़े!

धर्मशाला में जाकर देखा, मीरा अपनी मस्ती में मगन थीं। जीव गोस्वामी, जो किसी के आगे नहीं झुकते थे, आज मीरा के चरणों में दंडवत गिर पड़े।

रुंधे गले से बोले, "हे देवी! मुझ अज्ञानी को क्षमा कर दें। मैंने देह को देखा, आपने आत्मा को। आज आपने मुझे सिखा दिया कि वृन्दावन में 'पुरुष' होने का अहंकार व्यर्थ है।"

मीरा मुस्कुराईं और बोलीं, "चलिए, मेरे गिरधर गोपाल राह देख रहे होंगे।"

जब वे दोनों वापस मंदिर पहुँचे, तो एक और चमत्कार उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। भगवान वापस अपने पीताम्बर धारी रूप में आ चुके थे। लेकिन उस दिन जीव गोस्वामी की दृष्टि बदल गई थी।

उन्हें कभी मीरा में कृष्ण दिखते, तो कभी कृष्ण में मीरा।

भक्त और भगवान एकाकार हो चुके थे!

 मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा ना कोई.. 
कृष्णमयी मीरा 

वयं राष्ट्रे जागृयाम