मेवाड़ के राजमहलों का सुख, कुल की मर्यादा और राणा सांगा के पुत्रवधू होने का अभिमान—सब कुछ पीछे छोड़कर, दुखों के पहाड़ और अपनों के अत्याचार सहकर मीराबाई अंततः अपनी अंतिम शरण, श्री धाम वृन्दावन आ पहुँचीं। उनके पैरों में छाले थे, लेकिन हृदय में गिरिधर गोपाल से मिलने की प्यास थी।
उस समय वृन्दावन में वैष्णव-सम्प्रदाय के प्रधान और प्रकांड विद्वान श्री जीव गोस्वामी जी का बड़ा मान था। मीरा के मन में संतों के प्रति अगाध श्रद्धा थी, सो वे गोस्वामी जी के दर्शन की अभिलाषा लेकर उनके आश्रम पहुँचीं।
परन्तु, वहां पहुँचते ही उन्हें द्वार पर रोक दिया गया।
शिष्य ने भीतर जाकर संदेश दिया, "गुरुदेव, मेवाड़ की रानी मीराबाई आपके दर्शन चाहती हैं।"
जीव गोस्वामी ने कठोरता से उत्तर भिजवाया, "मीरा से कहो कि मैं किसी 'स्त्री' से नहीं मिलता। यह मेरे नियमों के विरुद्ध है, वे लौट जाएं।"
यह सुनकर मीरा के होठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैर गई। उन्होंने शिष्य से कहा, "जाकर अपने गुरुदेव से कहो— मैं तो सोचती थी कि वृन्दावन में केवल एक ही 'पुरुष' है, और वे हैं मेरे गिरिधर गोपाल!
बाकी सब तो गोपियां (सखियाँ) हैं। मुझे आज ज्ञात हुआ कि श्री कृष्ण के अलावा यहाँ कोई और भी पुरुष रहता है, जो स्वयं को पुरुष मानता है!"
यह संदेश नहीं, एक व्यंग्य था उस 'पुरुष-अहंकार' पर, जो भक्ति के मार्ग में बाधा था।
अगली सुबह जो हुआ, उसने वृन्दावन को हिला कर रख दिया!
ब्रह्म मुहूर्त में जब जीव गोस्वामी जी ने बांके बिहारी के मंदिर के पट खोले, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उनके हाथ से आरती की थाली छूटते-छूटते बची।
सामने सिंहासन पर पीताम्बर धारी कृष्ण नहीं थे!
वहाँ खड़ी थी एक नव-यौवना सखी!
भगवान की मूर्ति ने घाघरा-चोली धारण कर रखी थी। कानों में झुमके, नाक में नथनी, माथे पर बिंदी, पैरों में रुनझुन करती पायल और हाथों में हरी चूड़ियाँ!
त्रिभुवन के स्वामी आज 'स्त्री-वेश' में मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।
जीव गोस्वामी का कंठ सूख गया। उन्होंने सेवक को चिल्लाकर पूछा, "यह किसका दुस्साहस है? मेरे बाद मंदिर में कौन आया था?"
पुजारी और सेवक थर-थर कांपने लगे, "महाराज, कसम ठाकुर जी की! पट आपने बंद किये थे और आपने ही खोले हैं। यहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता।"
तभी एक वृद्ध सेवक ने डरते हुए कहा, "गुसाईं जी... क्षमा करें, पर कल जिस महिला (मीरा) को आपने 'स्त्री' जानकर लौटा दिया था... लोग कहते हैं उनके एकतारे में जादू है। जब वे गाती हैं, तो पत्थर भी पिघल जाते हैं। कहीं यह ठाकुर जी का आपको कोई संकेत तो नहीं? कहीं आपने साक्षात भक्ति को तो द्वार से नहीं लौटा दिया?"
क्षण भर में जीव गोस्वामी का सारा ज्ञान, सारा अहंकार, उस शृंगारित मूर्ति के चरणों में बिखर गया। उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ— भक्ति में कोई स्त्री-पुरुष नहीं होता, वहां सब केवल 'आत्मा' हैं और परमात्मा एक ही है।
वे नंगे पाँव दौड़े!
धर्मशाला में जाकर देखा, मीरा अपनी मस्ती में मगन थीं। जीव गोस्वामी, जो किसी के आगे नहीं झुकते थे, आज मीरा के चरणों में दंडवत गिर पड़े।
रुंधे गले से बोले, "हे देवी! मुझ अज्ञानी को क्षमा कर दें। मैंने देह को देखा, आपने आत्मा को। आज आपने मुझे सिखा दिया कि वृन्दावन में 'पुरुष' होने का अहंकार व्यर्थ है।"
मीरा मुस्कुराईं और बोलीं, "चलिए, मेरे गिरधर गोपाल राह देख रहे होंगे।"
जब वे दोनों वापस मंदिर पहुँचे, तो एक और चमत्कार उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। भगवान वापस अपने पीताम्बर धारी रूप में आ चुके थे। लेकिन उस दिन जीव गोस्वामी की दृष्टि बदल गई थी।
उन्हें कभी मीरा में कृष्ण दिखते, तो कभी कृष्ण में मीरा।
भक्त और भगवान एकाकार हो चुके थे!
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा ना कोई..
वयं राष्ट्रे जागृयाम
No comments:
Post a Comment