Pages

Friday, 1 November 2013

वेद, समाज और वर्ण (भाग-१)


वेद, समाज और वर्ण - व्यवस्था (भाग - १)


समाज मनुष्यो का समूह होता हैं | एक स्वस्थ व्यक्ति को निजी कार्यो के लिये अन्य व्यक्ति की आवश्यकता नहीं होती | परंतु परिवार सहित जीवन निर्वाह के लिये अन्य व्यक्तियों पर निर्भर होना पड़ता हैं |
जैसे मकान बनवाना, वस्त्र बनाना, अन्न आदि उत्पन्न करना , पशुपालन करना, औषधि निर्माण व चिकित्सा जैसी मौलिक आवश्यकताओ के अतिरिक्त ज्ञान उपार्जन के साधन, तकनीकी वस्तुएँ यांत्रिक ज्ञान विज्ञान तथा शत्रुओं से रक्षा हेतु अस्त्र-शस्त्र एवँ आवागमन हेतु वाहन आदि भी उच्च स्तर की आवश्यकताऐ हैं जिनके लिये व्यक्ति को अन्य दूसरे बहुत से लोगो पर निर्भर रहना पड़ता हैं , जो विभिन्न स्थानो पर इन आवश्यकताओ की पूर्ति हेतु एक दूसरे के लिये अलग-अलग प्रकार के कार्य करते हैं |
उक्त अलग-अलग कार्यो को करने के लिये जो व्यक्ति अपने जीवन की किशोर या यौवन अवस्था में एक कार्य का चुनाव करता हैं या उसे जो कार्य करना पड़ता हैं, उस कार्य के चुनाव को " वर्ण " कहते हैं |
तथा भिन्न-भिन्न कार्यो का चुनाव या वर्ण को एक नियम या व्यवस्था के अंतर्गत बाँधने को " वर्ण-व्यवस्था " कहते है |


वेद विश्व का सबसे पुराना ग्रंथ हैं, और वैदिककालीन समाज भी इसीलिए विश्व भर में प्राचीनतम समाज हैं |


वैदिककालीन समाज में मनुष्य की जो मौलिक तथा उच्चतर आवश्यकताएँ जो भी थी वे या तो ज्ञानोपार्जन शिक्षा और तकनीकी व वैज्ञानिक शिक्षा की थी या दूसरी समाज व राष्ट्र में अंदर और बाहर के शत्रुओ से रक्षा करने की थी या तीसरी अर्थव्यवस्था को बनाये रखने के लिये कृषि, पशुपालन और व्यापार की थी या चौथे पूरे समाज की उपरोक्त तीनो कार्यो में विविध आवश्यकताओ में सहायता पूर्ति के लिये हाथ बंटाने हेतु परिश्रम करने अर्थात जो मनुष्य मानसिक स्तर पर तो नहीं मगर शारीरिक स्तर पर बलवान हो वाले व्यक्तियों की जो निर्देशानुसार कार्यो में सहायता कर सके
(unskilled workers ) की थी |


इन्ही चार प्रकार के कार्यो को वैदिक काल में चार वर्णो में बाँटा गया था , जिन्हे वेद में चार वर्ण कहा गया हैं , और इन चार प्रकार के कार्यकलाप करने वाले चार वर्ण के लोगो को क्रमश: "ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, तथा शूद्र " वर्ण के नाम से पुकारा गया |


वेद पूरे समाज को एक शरीर के रुप मे समझता और उपस्थित करता हैं | सर्वांगीण शरीर में मुख्यतः चार अंग हैं जिनका मुख्य कार्य भी चार प्रकार का होता है | एक सिर , मस्तिष्क या मुख , दूसरा बाहु या भुजायें , तीसरा उदर और चौथा पैर | मुख या मस्तिष्क शरीर में ज्ञान के आदान-प्रदान का काम करता है , बाहु या भुजाऐं शरीर के विभिन्न अंगो की आवश्यकता के अनुसार उस भोजन के सार को सारे शरीर में बिना किसी भेदभाव के वितरण करने का काम कर सकता है और पैर सारे शरीर को इधर उधर लाने ले जाने या श्रम करने का काम करते हैं |
शरीर के इन अंगों में कोई ऊँच नीच का भेदभाव नहीं है अपितु इन अंगों के काम करने का सामर्थ्य के अनुसार ये अंग अपना-अपना काम स्वयं करते हैं |
इसी प्रकार समाज भी एक सर्वांगीण शरीर के रूप में है और समाज में भी प्रमुख रूप में है और समाज में भी प्रमुख रूप से यही चार प्रकार के कार्यकलाप चलते हैं | इनमे ज्ञान के आदान-प्रदान का काम करने वाले वर्ण को ब्राह्मण, समाज और राष्ट्र की रक्षा करने वाले को क्षत्रिय , कृषि , पशुपालन और व्यापार आदि अर्थव्यवस्था संबंधी काम करने वाले को वैश्य और समाज की अन्य सभी प्रकार की आवश्यकताओ की पूर्त्यर्थ काम करने वाले मानववर्ण को शूद्र वर्ण से कहा गया है |
समाज की इसी व्यवस्था को ऋग्वेद के निम्नलिखित प्रसिद्ध मंत्र में यूँ निरूपित किया है :-

" ब्राह्मणो$श्य मुखमासीद बाहु राजन्य: कृत: |
उरु तदश्य यद्ववैश्य: पदभ्यां शूद्रो अजायत् || "

क्रमश:

(सन्दर्भ: सत्यार्थ-सौरभ से )
-वंय राष्ट्रे जागृयाम_चंशे-
!! जय श्री राम !!


No comments:

Post a Comment