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Tuesday, 12 November 2013

कर्म-रहस्य.. (३) * क्रियमाण-कर्म *




कर्म-रहस्य (३)
* क्रियमाण-कर्म *
(संस्कार-अंश)


कोई भी नया कर्म करते समय मन, चित्त और मस्तिष्क पर इसकी एक बीज रुप में छाप सी रह जाती हैं जो "संस्कार" के नाम से जाना जाता हैं |

यह संस्कार ही आदत, स्वभाव या प्रकृति बन कर अगले कर्मों का कारण भी बनता हैं |

क्रियमाण-कर्म के "संस्कार-अंश" के भी दो भेद हैं - 'शुद्ध एवं पवित्र संस्कार' और 'अशुद्ध एवं अपवित्र संस्कार' | 
शास्त्र-विहित कर्म करने से जो संस्कार पड़ते है, वे शुद्ध और पवित्र होते हैं और शास्त्र, नीति, लोक मर्यादा के विरुद्ध कर्म करने से जो संस्कार पड़ते हैं, वे अशुद्ध एवं अपवित्र होते हैं |

इन दोनों शुद्ध और अशुद्ध संस्कारों को लेकर स्वभाव (प्रकृति, आदत) बनता है | इन संस्कारों में से अशुद्ध अंश का सर्वथा नाश करने पर स्वभाव शुद्ध, निर्मल पवित्र हो जाता हैं ; परंतु जिन पूर्वकृत कर्मों से स्वभाव बना है, उन कर्मों की भिन्नता के कारण जीवन्मुक्त पुरुषों के स्वभावों में भी भिन्नता रहती हैं | इन विभिन्न स्वभावों के कारण ही उनके कर्मों में भी भिन्नता होती हैं, पर वे कर्म दोषी नहीं होते, प्रत्युत सर्वथा शुद्ध होते हैं और उन कर्मों से जन-कल्याण होते हैं |

संस्कार-अंश से जो स्वभाव बनता हैं, वह एक दृष्टि से महान प्रबल होता हैं - "स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते" अतः उसे मिटाया नहीं जा सकता |

प्रसिद्ध श्लोक हैकि -

" व्याघ्रस्तुष्यति कानने सुगहनां सिंहो गुहा सेवते, हंसो वाञ्छति पद्मिनीं कुसुमितां गृध्रः श्मशाने स्थले |
साधुः सत्कृतिसाधुमेव भजते नीचोअपि नीचं जनं, या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते ||"

इसी प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णो का जो स्वभाव है, उसमें कर्म करने की मुख्यता रहती हैं | इसीलिए भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि जिस कर्म को तू मोहवश नहीं करना चाहता, उसको भी अपने स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश हो कर करेगा ! (गीता)



अब इसमें विचारणीय बात है कि :-
एक ओर तो स्वभाव की महान् प्रबलता जिसे कोई छोड़ ही नहीं सकता, और दूसरी ओर मनुष्य-जन्म की महान् प्रबलता कि मनुष्य सब कुछ करने में स्वतंत्र हैं | अतः इन दोनों में किस की विजय होगी और किस की पराजय होगी ? 

इसमें विजय-पराजय की बात नहीं है , अपनी-अपनी जगह दोनों ही प्रबल है |

जहां स्वभाव की बात है जिस जाति में जीव जन्मा है, जैसा वर्ण का रज-वीर्य था, उसके अनुसार बना हुआ जो स्वभाव है , उसे कोई बदल नहीं सकता ; अतः मनुष्य स्वभाव दोषी नहीं है, निर्दोष है | जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णों का जो स्वभाव है, वह स्वभाव नहीं बदल सकता और उसे बदलने की आवश्यकता भी नहीं है … और इसे बदलने के लिए शास्त्र भी नहीं कहता |

परंतु उस स्वभाव में जो अशुद्ध-अंश (राग-द्वेष )हैं, उसको मिटाने की सामर्थ्य ईश्वर ने मनुष्य को दी हैं | 

अतः जिन अशुद्ध संस्कार-अंश के दोषों से मनुष्य का स्वभाव अशुद्ध बना है, उन दोषों को मिटाकर मनुष्य स्वतंत्रता पूर्वक अपने स्वभाव को शुद्ध बना सकता है | 

मनुष्य चाहे तो कर्मयोग की दृष्टि से अपने प्रयत्न से राग-द्वेष मिटाकर स्वभाव शुद्ध बना ले, चाहे भक्तियोग की दृष्टि से सर्वथा भगवान् के शरण होकर अपना स्वभाव शुद्ध बना ले अथवा ज्ञानयोग से भी.. (गीता) इस प्रकार प्रकृति (स्वभाव) की प्रबलता भी सिद्ध हो गई और मनुष्य सब कुछ करने मे स्वतंत्र है यह भी सिद्ध हो गया | 

सारांश - शुद्ध स्वभाव को रखने में प्रकृति की प्रबलता है और अशुद्ध स्वभाव को मिटाने में मनुष्य की स्वतंत्रता हैं |

क्रमशः

वयं राष्ट्रे जागृयाम _चंशे-

!! जय श्री राम !!

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