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Thursday, 7 November 2013

वेद, समाज और वर्ण (भाग - ३)


वेद, समाज और वर्ण (भाग - ३)

यहां यह ध्यातव्य हैं कि मनुस्मृति के आदिकाल में वर्ण-व्यवस्था जन्म के आधार पर न होकर कर्म के आधार पर थी | इसीलिए मनुस्मृति में कहा गया हैं -

" शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् |
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च || "
(मनु.१.१०)
ब्राह्मण वर्ण में पैदा होने वाला व्यक्ति भी यदि ब्राह्मण वर्ण के गुण, कर्म और स्वभाव वाला नहीं हैं तो वह शूद्र वर्ण में गिना जायेगा और शूद्र वर्ण में पैदा होने वाला व्यक्ति भी यदि ब्राह्मण के गुण, कर्म और स्वभाव को अपना लेता हैं तो वह ब्राह्मण में गिना जायेगा |

      वर्तमान में पशुपालन व कृषि कर्म वैश्य वर्ण नहीं करके समाज का अन्य वर्ण जो कृषक कहलाता है, करता हैं | इसका कारण हैं कि मध्यकालीन समाज में विभिन्न परिवर्तन हुये और कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था डगमगा कर जन्म आधारित वर्ण को रुढ़ीगत मान्यता मिल गई और फिर जाति-प्रथा का प्रचलन हुआ ... विभिन्न रजवाड़े और मठ-मंदिरो के वैभव विलास के चलते वंशानुगत उच्च जाति को अनेक सुविधा व मान के चलते दूसरे वर्णों को निम्न कोटी का घोषित कर छूआछूत तक समाज का पतन हो गया, श्रमजीवीयों को कत्तई अछूत घोषित कर शताधिक जातियों में विभक्त कर दिया गया -
जैसे दस्तकारी व शिल्प के काम करने वाले हाथ के कुशल व्यक्तियों को भी शूद्र वर्ण के अंतर्गत रख दिया गया |

       जबकी भवन,वाहन,अस्त्र-शस्त्र आदि के उत्तम उपयोग हेतु काष्ट,स्वर्ण,लौह,ताम्र आदि प्राकृतिक संपदा को मनुष्यों के लिये प्रयोग करने योग्य विभिन्न विधियों से गुजार कर इन के भौतिक व रासायनिक संघटन के पूर्ण ज्ञान को जानने वाला एक कुशल व बुद्धिमान व्यक्ति संपन्न कर सकता हैं .. अत: इन्ह शूद्र वर्ण में रखने से भी भारत के पतन का मार्ग खुल गया | आज आधुनिक अविष्कारों में पश्चिम के लोगों को श्रेय जाता हैं क्योंकि वे अपने तकनीकी कार्यो को करने वाले को हेय दृष्टी से नहीं वरन् सम्मान से देखते हैं |

      खैर.. अब समाज में पुन: विलुप्त प्राय: वैदिक ज्ञान के लिये अनेक संस्कृत के विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय तथा गुरुकुल स्थापित हो रहे हैं | इनमें प्रबुद्ध आचार्य हमारे प्रमाणिक ग्रंथो के अनुकूल शिक्षा देगें अत: आशा हैं इनसे ज्ञान प्राप्त कर निकलने वाले नागरिक पुन: समाज में असमानता समाप्त कर सभी वर्णों को वेद सम्मत समान आदर भाव देगें ताकि हम सब एक हो एवँ मिलकर भारतराष्ट्र रुपी शरीर को स्वस्थ व पुष्ट कर विश्व में गरिमा पूर्ण स्थान दिला सके !

                                                                                  '' समाप्त ''
सभी मित्रों को शुभकामनाऐं !
-वयं राष्ट्रे जागृयाम_चंशे-
!! जय श्री राम !!

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