कर्म-रहस्य ..(२)
* क्रियमाण कर्म * ( फल-अंश )
क्रियमाण कर्म दो तरह के होते है - शुभ और अशुभ | वेद के अनुसार शास्त्रोक्त कर्म ' शुभकर्म ' और काम, क्रोध, लोभ, आसक्ति आदि को लेकर जो वेद विरूद्ध शास्त्र-निषिद्ध कर्म किये जाते है, वे ' अशुभकर्म ' कहलाते है |
शुभ (अच्छे) अथवा अशुभ (बुरे) प्रत्येक क्रियमाण कर्म का एक तो फल-अंश बनता है और एक संस्कार-अंश बनता है | ये दोनों भिन्न-भिन्न है|
क्रियमाण कर्म के फल-अंश के भी दो भेद है - दृष्ट और अदृष्ट | इनमें दृष्ट के पुनः दो भेद है - तात्कालिक और कालान्तरिक | इन नामो से क्रियमाण कर्म फल-अंश स्पष्ट है, उदाहरणार्थ - अच्छा भोजन करते हुए जो रस(स्वाद) आता है, सुख व प्रसन्नता होती है और तृप्ति होती है - यह दृष्ट का 'तात्कालिक' फल है और भोजन करने के परिणाम में आयु, बल, आरोग्य आदि का बढ़ना - यह दृष्ट का 'कालान्तरिक' फल है |
ऐसे ही जिसका अधिक मिर्च मसाले दार खाने का स्वभाव है, वह इन्हे खा कर सुखी तो होता और तेज मिर्च के कारण मुहँ मे जीभ मे जलन, आँखों व नाक से पानी निकलना पसीना आना ये दृष्ट के 'तात्कालिक' फल है और कुपथ्य के कारण परिणाम में पेट में जलन दस्त और रोग, दुःख आदि का होना - यह दृष्ट का 'कालान्तरिक' फल है |
इसी प्रकार अदृष्ट के भी दो भेद है - लौकिक और पारलौकिक |
जीते जी फल मिल जाये इस भाव से यज्ञ, दान, तप, व्रत, मंत्र-जप आदि शुभ कर्मोंको विधि-विधान से किया जाये और उनका प्रबल प्रतिबंध न हो तो यहाँ धरती पर पुत्र, धन, मान ( यश ) आदि की प्राप्ति होना और रोग, निर्धनता, आदि प्रतिकूल की निवृति होना - ये अदृष्ट का 'लौकिक' फल है | *
और मरने के बाद सदगति हो इस भाव से यज्ञादि दान तप किये जाये तो मृत्यु उपरान्त उच्च लोको की प्राप्ति होना - ये अदृष्ट का ' पारलौकिक' फल है |
इसी तरह चोरी, डाका, हत्या आदि अशुभ कर्मों का फल यहाँ धरती पर कैद, जुर्माना, फांसी आदि होना - ये अदृष्ट का 'लौकिक' फल है , और पाप कर्मो के कारण मृत्यु उपरान्त निम्न लोकों मे जाना, कीट पंतगे , पशु पक्षी बनना - यह अदृष्ट का 'पारलौकिक' फल है |*
* यहां दृष्ट का 'तात्कालिक' और अदृष्ट का 'लौकिक' फल एक समान ही लगते है, मगर दोनों में अंतर है कि - 'तात्कालिक' फल सीधे मिलता है , प्रारब्ध बन कर नहीं ; परंतु जो 'लौकिक' फल है वह प्रारब्ध बनकर भी मिलता है! ऐसा ही 'कालान्तरिक' व ' पारलौकिक' के लिए समझना !!
क्रमशः
वयं राष्ट्रे जागृयाम _चंशे-
!! जय श्री राम !!
और मरने के बाद सदगति हो इस भाव से यज्ञादि दान तप किये जाये तो मृत्यु उपरान्त उच्च लोको की प्राप्ति होना - ये अदृष्ट का ' पारलौकिक' फल है |
इसी तरह चोरी, डाका, हत्या आदि अशुभ कर्मों का फल यहाँ धरती पर कैद, जुर्माना, फांसी आदि होना - ये अदृष्ट का 'लौकिक' फल है , और पाप कर्मो के कारण मृत्यु उपरान्त निम्न लोकों मे जाना, कीट पंतगे , पशु पक्षी बनना - यह अदृष्ट का 'पारलौकिक' फल है |*
* यहां दृष्ट का 'तात्कालिक' और अदृष्ट का 'लौकिक' फल एक समान ही लगते है, मगर दोनों में अंतर है कि - 'तात्कालिक' फल सीधे मिलता है , प्रारब्ध बन कर नहीं ; परंतु जो 'लौकिक' फल है वह प्रारब्ध बनकर भी मिलता है! ऐसा ही 'कालान्तरिक' व ' पारलौकिक' के लिए समझना !!
क्रमशः
वयं राष्ट्रे जागृयाम _चंशे-
!! जय श्री राम !!

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