हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार, मृत्यु के पश्चात तीसरे वर्ष (या पूरे दो वर्ष बीतने पर तीसरे वर्ष के श्राद्ध/कनागत में) दिवंगत आत्मा को सामान्य पितरों की श्रेणी में सम्मिलित करने या उनका 'पितृ मिलन' कराने की परंपरा है। इसके पीछे धार्मिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक कारण निहित हैं:
शास्त्रोक्त व आध्यात्मिक कारण
• प्रेत योनि से मुक्ति और पितृ पद की प्राप्ति: शास्त्रों के अनुसार, मृत्यु के तुरंत बाद जीवात्मा की प्रेत योनि या उसकी ऊर्ध्व गतियों की यात्रा चलती रहती है। प्रेतत्व से मुक्त होकर दिव्य पितृ लोक या संयमन लोक तक पहुँचने और पितृ पद (पूर्वजों की श्रेणी) प्राप्त करने में लगभग तीन वर्ष का समय (या तीन वर्ष के चक्र) का आकलन किया जाता है।
• वार्षिक और त्रिवर्षीय विधान: पहले दो वर्षों तक विशेष रूप से सपिंडीकरण और बरसी (वार्षिक) आदि कृत्य होते हैं, जिनमें उस आत्मा का अलौकिक सफर चलता है। तीसरे वर्ष के श्राद्ध (जिसे पितृ मेलन भी कहते हैं) पर यह माना जाता है कि अब वह आत्मा प्रेत अवस्था से पूरी तरह मुक्त होकर अपने अन्य पूर्वजों (पितरों) के साथ एकनिष्ठ हो गई है।
• सामान्य पार्वण श्राद्ध में विलय: तीसरे वर्ष के उपरांत उस दिवंगत का अलग से पृथक शोक या विशेष विधान बंद करके, उन्हें सामान्य रूप से कुल के समस्त पितरों (वसु, रुद्र, आदित्य स्वरूप) के साथ हर वर्ष आने वाले सर्वपितृ अमावस्या या उनकी तिथि पर पार्वण श्राद्ध (संयुक्त तर्पण) में मिला दिया जाता है।
क्या आप इसके बारे में सपिंडीकरण (Sapindikaran) की प्रक्रिया या अन्य श्राद्ध नियमों के बारे में और विस्तार से जानना चाहते हैं?
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किसी भी मृत्यु के तीन साल बाद ही उसे श्राद्ध में मिलाया जाता है। उसके पीछे ...
16 Sept 2024 — ... और गृहस्थ को थोड़ा आर्थिक आराम भी तो चाहिए पहला पितृ मेलन श्राद्ध तीसरे वर्ष में तथा आपकी श्रद्धा और सामर्थ्य है तो फिर हर साल पार्वण श्राद्ध करें.
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क्या घर में मृत्यु होने पर उस वर्ष श्राद्ध नहीं करना चाहिए ? मां ध्यानमूर्ति जी
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